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सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

कर्म

४१

४२

४३

५९

, ६०

नाम षष्ठय'श

कल्पाँश

वंशक्षयांश

उत्पातकांश

कालख्पांश

सौम्यांश

मृद्दश

सुशोतलांश

दष्ट्राकरालांश

इन्दुमुखांश

प्रवीणांश

कालाग्न्यंश

दंडायुधांश'

निमेलांश

सौम्यांश

ऋरांश

अतिशीतांश

सुधांश

पयोधीशांश

अमणांश

इन्दुरेखांश ६०

षड्वर्ग विचार : ६५

मतान्तंर

. कल्यंश

नाशांश

वंशक्षयांश

उत्पातकांश

कालरूपाँश

सौम्यांश

मृद्ांशः

सुशीतलांश

दंष्ट्राकरालांश.

इन्दु मुखांश

प्रवीणांश

काळार्न्यंश

दंडायुधांश

निर्मलांश

शुभांश

अशुभांश

अतिशीतलांश

सुधापयोध्यंश

भ्रमणांश

इन्दुरेखांश॑

जैसे यहाँ बताया है । ५७ क्रम तक यह अन्तर है ५७ सुधांश ओर ५८ पयोधी-

शांश एकं मिलाकर ५८ में सुधापयोध्यंश कर दिया है आगे ५९ और ६० क्रम: में कोई अन्तर नहीं है ।

शुभ षष्ठ्यंश--मुद्वंश, देवलोकांश, किन्नरांश आदि हैं ।

कूर षष्ठ्यंश--घोर राक्षस, अग्नि प्रेतपुरी आदि हैं ।

नाम के आगे + ऐसा चिह्न देकर बता दिया है वे अशुभ षष्ट्यंश हैं ।'

क्रूर षष्ट्यंश में ग्रह बुरा फल देते हैं ।

शुभ षष्ठ्यंश में ग्रह अच्छा फल देते हैं ।

वर्ग विचार

ग्रहों के वर्ग विचार में कहीं षड़वर्ग का कहीं सप्तवगे का कहीं १० वर्ग का

विचार होता है जिनका वर्णन आगे दिया है।

१० वर्ग में जो ग्रह स्ववर्ग आदि में हों उसकी संख्या के अनुसार उसकी

पारिजात आदि संज्ञाएँ होती हैं जो शुभ हैं जिनका वर्णन आगे दिया है ।

OX

` ६६ ! सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

अंश--फल वर्णन करने में कहीं-कहीं दिया रहता है कि ग्रह अपने अश में हो

उसका अथं है कि अपने नवांश में हो । अंश से सदा नवांश समझना ।

वर्गोत्तम-जो राशि हो वही राशि नवांश में हो तो वर्गोत्तम कहछायगा जैसे

शेष राशि हो और नवांश में भी मेष का नवांश हो तो वह वर्गोत्तम होता हैँ

` चरराशि के आदि के नवांश वर्गोत्तम हैं--वर्गोत्तम में जन्म हो तो कुछ में मुख्य

होता है।

स्थिर के मध्य के नवांश वर्गोत्तम हैं।

द्विस्वभाव के अन्त के नवांश वर्गोत्तम हैं ।

मतान्तर - अपने-अपने घरों में जो अपने नवांश हों बह वर्गोत्तम हैं ।

षडवगे शुद्धि-षड़ वर्ग में जो राशि हो उसी राशि का .अंशक ( वर्ग ) में जो

अह हो वह षड़ वर्ग शुद्धि कहलाता है जैसे मेष राशि में मेष का नवांश वृष में वृष

का नवांश आदि । इसी प्रकार प्रत्येक वर्ग में विचारना ।

षड़ वग शुद्धि-होरा केवल सूर्य चन्द्र का होता है मंगल आदि दूसरे ग्रह का

नहीं होता । त्रिशांश सूर्य चन्द्र का नहीं होता केवल मंगल आदि ५ ग्रहों का होता है

इससे षड़ वर्ग शुद्धि नहीं हो सकती पंचवगे शुद्धि ही होती है ।

षड़वगे शुद्धि ग्रह का. फल

कोई ग्रह मित्रगृही, स्वगृही, उच्च, मूल त्रिकोण में हो वह षड़वर्ग शुद्ध ग्रह

सब फल देता है ।

कुण्डली में एक भी षड़वर्ग शुद्ध ग्रह हो--तो वह सब सम्पत्तियों से युक्त हो

ओर धन का स्वामी हो । वाहन युक्त हो । १

यदि एक से अधिक २ ग्रह आदि ऐसे हों तो--पुस्वी-में सिद्ध तथा किन्नरों के

समान. होता है । र

खये में शुभाशुभ फल विचार

{१) मित्र वर्ग, सौम्य वर्ग या उच्चगत ग्रह हो--तो शुभ होता है । गा च डत पाप वर्ग में हो तो--अशूभ होता है । ३) इनमें पाप वर्ग ओर शुभ वर्ग का न्यूनाधिक देखके--जिसकी १ उसके अनुसार फल कहे । ( याशी:

शुभाधिक्य वग में क्रूर भी हो तो- शुभ होता है 1 शुभाधिक्य वर्ग में शुभ ग्रह भी हो तो--अधिक शुभ होता है । पाप वर्गाधिक्य में शुभ प्रह भी-क्र र होता है । हे पाप वर्गाधिक्य में कूर ग्रह भो--अधिक क्रूर फल होता है । बड़वगे में शुभ गुण अधिक हो--घनी और अधिक आयु वाला हो ।

षड्वर्ग विचार : ६७

'बड़वर्ग में लग्न क्रूर अंश में हो--दीन, शठ, अल्पायु हो ।

अंशों के स्वामी बळी हों तो--राजा हो ।

यदि उदित नवांश स्वामी बली हो तो--सुखी । यदि उदित द्रेष्काण स्वामी बली हो तो--राजा तुल्य । यदि उदित लग्त राशि स्वामी बली हो तो--भाग्यवान्‌, भूपति हो ।

चगो के प्रभाव में मत

नवांश का प्रभाव राशि के प्रभाव के समान होता है ।

राशि में पूर्ण फल होता है ।

वर्ग में आधा फल होता है ।

खोडशाँश, दशांश पष्ठ्यंश में--पाव ( ३ ) फल होता है ।

ग्रहों का बल साधने -के लिये यह वर्ग साधन करना पड़ता है ।

शुभग्रह-अपने उच्चगत, मित्र राशिगत ग्रह--शुभ होते हैं ।

पाप ग्रह-अपने नीच, शत्रु राशिस्थ ग्रह--अशुभ है ।

इससे ग्रह होरा आदि स्थापन करके शुभ पंक्ति पृथक्‌ रखना पाप पंक्ति पृथक्‌ रखना

यदि शुभ पंक्ति अधिक हो-तो वह ग्रह दशा और भाव में शुभ फल देग। ।

यदि पाप पंक्ति अधिक हो-तो वह ग्रह दशा और भाव में अनिष्ट फल देगा ।

शुभ ग्रह शुभ वर्गाधिक हो तो-अति शुभ |

पाप ग्रह शुभ वर्गाधिक हो तो-शुभ ग्रह भी निन्द्य हो जाते हैं।

इस प्रकार पाप ग्रह शुभवर्गाधिक्य होने से-शुभ हो जाता है ।

इस प्रकार पाप ग्रह पापवर्गाधिक्य होने से-अति निद्य है ।

ग्रहों का वर्ग साधन करके भावों के साथ उनका सम्बन्ध देखना जसे लग्नेश शुभ

ग्रह शुभ राशि में मित्र राशि या उच्च में हो तो-लग्न शुभाधिक्य होने से लग्न

सम्बन्धी सभी फलं शुभ होंगे। लग्न पापाधिक वर्ग हो और उसका स्वामी पाप ग्रह, पाप￾राशि गत व शत्रु राशि गत व नीच में हो तो-छरन सम्बन्धी अनिष्ट फल अधिक होगा ।,

जहाँ एक प्रकार से शुभ दूसरे प्रकार से अशुभ हो वहाँ मिश्र फल होगा जैसे

लग्नेश शुभ राशि में तीच व शत्रू, राशि गत हो या लग्नेश पाप, मित्र, उच्चराशि

में हो तो मिश्र फल होगा ।

इसी प्रकार द्वितीय तृतीय आदि भाव के सम्बन्ध से फल विचारना ।

ग्रहों के वग

षडवर्ग-(१) गृह (२) होरा (३) द्रेष्काण (४) नवमांश (५) द्वादणाँश

(६) त्रिशांश ।

सप्तवगं-(१) गृह (२) होर! (३) द्रेष्काण, (४) सप्तर्माश (५) नवमांश

(६) द्वादशांश (७) त्रिशांश ।

दशवर्ग-(१) गृह, (२) होरा, (३) द्रेष्काण, (४) सप्तमांश (५) नवमांश,

0

६८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

(६) दशांश (७) द्वादशांश, (८) कलांश (षोड़शांश), (९) त्रिशांश, (१०) षष्ठ्यंश ॥

वर्ग कुण्डली बनाने का उदाहरण

लग्न २रा--२०-११--५३” बुध १०रा.२०१५६'-५६०

सूर्यं ११- ५--- ४०--४५ गुरु ९---१३---३४--९

चन्द्र १०-- २-- ७9२ शुक्र १९-१३---३३---४८

मंगल ७--१२-- २९--४४ शनि ४-- 5--३९--४८

(१) लग्न कुण्डली के अनुसार कोन ग्रह किस स्थान में है उसके अनुसार गृह इतर

होरा द्रेष्काण सप्तमांश नवमांश आंदि निकालने के चक्र आगे दिये हैं उनसे किस वर्ग

में कौन ग्रह किस राशि में है प्रगट होगा । जंसे लग्न २रा.-२०-११'-५३” है

इसका वर्ग निकालना है ।

(१) लग्न कुण्डली में जिस जिस राशि में जो ग्रह है स्थापित होगा ।

(२) होरा मिथुन में १५० के ऊपर और ३०° के भीतर है मिथुन में २०" के

सामने ४ दिया है कर्क का होरा आया ककं का स्वामी चन्द्र है इस कारण चन्द्र का

होरा है लग्न में ४ राशि होरा कुंडली में रहेगी ।

(३) द्रेष्काण चक्र में ९०° के ऊपर ३०” के सामने मिथुन के नीचे ११ दिया

है द्रेष्काण कुंडली का लग्न ११ रहेगा ।

(४) सप्तमांश चक्र में १७-८''के आगे २१°.१५' के भीतर लग्न है इसके

सामने मिथुन के नीचे ७ दिया है । सप्तमांश कुण्डली का लग्न ७ हुआ ।

(५) नवमांश चक्र में २०० के ऊपर २३०-२०' के भीतर लग्न है । २३१-२०' के

सामने मिथुन लग्न के नीचे १ दिया है । नवमांश कुण्डली का लर्न १ हुआ ।

(६) दशमांश चक्र में २१° के भीतर लग्न है इसके सामने और मिथुन लग्न के

नीचे ९ दिया है । दशमांश कुण्डली का लग्न ९ आया ।

(७) द्वादशांश चक्र में २२-३०' के भीतर लग्न है । इसके सामने मिथुन के नीचे ११ है द्वादशांश कुण्डली का लग्न ११ हुआ ।

(८) षोडशांश चक्र में लग्न २०९-३७'-३०” के भीतर है इसके सीध में और मिथुन लग्न के नीचे ७ है । षोडशांश कुण्डली में तुला लग्न आया ! (९) त्रिशांश चक्र में मिथुन विषम राशि है लग्न, २५° के भीतर है इसके सामने मिथुन के नीचे ३ आया । इससे त्रिशांश कुण्डली का लग्न मिथुन ही रहा ।

(१०) षष्ठ्यंश चक्र में लग्नांश २०११-३५” मिथुन के हैं यह २०९-३०' के भीतर है इसके सामने और मिथुन के नीचे ७ दिया है। षष्ठ्यंश कुण्डली में लग्न “तुला आया ।

अन्य मत से २०° ५ २-४० +-१=(३० अंश से कम होने से १ जोड़ा)=४१-:-१२ ऱशेष ५ है । मिथुन छग्न विषय है । मिथुन से सीघे ५ गिना तो तुला आया इससे तुला लग्न आया ।

इसी प्रकार सव ग्रहों का वर्ग निकाल कर आगे चक्र में दिया है ।

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७० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

ग्रह वगं की उत्तमांश अनुसार संज्ञा ] उत्तमांश ग्रह मुल त्रिकोण, परमोच्च, स्वगृही, वर्गोत्तम ग्रह उत्तमांश कहे जाते हैं ॥ २ वर्ग में स्वगृही आदि हो तो पारिजातकोश ।

३ वर्ग में स्वगृही आदि हो तो उत्तमांश । ४ वगे में स्वगृही आदि हो तो गोपुरांश । ५ वर्ग में स्वगृही आदि हो तो सिंहासनांश ।

६ वर्ग में स्वगृही आदि हो तो पारावतांश । ७ वे में स्वगृही आदि हो तो देवछोकांश । ४ ८ वर्ग में स्वगृही आदि हो तो अपरांश या कुमकुमांश या. ब्रह्म लोक याः सुरलोक । ९ वर्ग में स्वगृही आदि हो तो ऐरावतांश या शक्रवाहन । १० वर्ग में स्वगृही आदि हो तो स्वांशकीय वैशेषिकांशक या वैष्णवांश या श्रीधाम ) ११ वर्ग में स्वगृही आदि हो तो शैवांश । १२ वर्ग में स्वगृही आदि हो तों भगवदंश । १३ वर्ग में स्वगृहो आदि हो तो वैशेषिकांश । जितने वर्गों की एकता हो उसके अनुसार यहाँ नाम दिया है। इसमें स्वगृही, भूल त्रिकोण उच्च, और वर्गोत्तम जिस जिस' वर्ग में हो उन्को गिनकर उनकी उपरोक्त संज्ञा निर्धारित करना जिसका फल आगे बताया है । अन्य प्रकार-- सप्त वर्ग में अन्य २. स्ववर्ग आदि में किशुक २. में भेदक 5. में चन्दन वन ३. स्ववर्ग आदि में व्यंज ३, में कुसुम ९. में पुर्णचन्द्र ४. स्ववर्ग आदि में चामर ४. में नागपुष्प १७ में उच्चेधवा' ४. स्ववर्ग आदि में छत्र ५, में कंदुक ११. में धन्वन्तरि ६. स्ववर्ग आदि में कुंडल ६. में केरल १२. में सूर्येकान्त ७. स्ववर्ग आदि में मुकुट ७. में कल्पवृक्ष १३. में विदुभ

१४. में शक्र सिंहासन पारिजातकांश आदि वर्ग का फल (१) स्वांश में अह-मशस्वी, बुद्धिमान्‌ और सुखी । (२)

(३)

पारिजातक मे-धनवान्‌, आदरणीय, बहुगुण युक्त, विभव, मान, सौख्य युक्तः ॥ उत्तमांश-सम्पूर्ण विनयी , शक्तियों से उक्त, राजा का मित्र, स्वमाचार निपुण, निरोग । (४) गौपुर-धनवान्‌, सम्पुर्ण विद्या जानने वाला, बन्धुओं में श्रेष्ठ, शुभमति, धन, भूमि, गो, गृहयुक्त । (१) सिहासन-समस्त छोकों में स्तुत्य राजा, बन्धुप्रिय, सम्पत्ति और वैभवयुक्त, राजा का मित्र, या राजा तुल्य ।

षड्वर्ग विचार : ७१

(६) पारावत-समस्त शास्त्र जानने वाळा, अच्छा घर, अच्छा वाहन, एवं अन्य

राजकीय सामग्री युक्त, विद्या, यश,बहुत धन युक्त ।

(७) देवलोक-महादान करने वाला, संसार का राजा, सत्कीतियुक्त राजा, बहुत

वाहन ओर सेनायुक्त ।

(८) अमर (सुरलोक)-सद्भाग्य, धनधान्य पुत्रयुक्त, राजा ।

(९) ऐरावत-चक्रवर्ती राजा होकर समस्त ऐश्वर्य से परिपूर्ण, इन्द्रसदृश राजा,

अन्य राजाओं से वंदित राजा बनाता है ।

(१०) वैशेषिकांश-सम्पूर्ण श्रेष्ठ फल ।

(१) ग्रह स्ववर्ग में हो उसको परिजात आदि का फल शुभ होता है ।

(२) जो ग्रह रिक स्थान, शत्रु राशि, नीच राशि, अस्तंगत या बलहीन॑ हो या

मरण अवस्था में हो वे परिजात आदि के शुभफल नष्ट कर देते हैं ।

(३) जो ग्रह उच्च मूळ त्रिकोण आदि में पूर्ण बली. हो और कूर षष्ठघंश में,हो

तो उपरोक्त शुभफल का नाश कर देते हैं ।

जन्म समय दशवग में बलहीन ग्रह का. फल

१-वर्ग में ग्रह बलहीन हो-राजा ।

२-वर्गा में ग्रह बलहीन हो-धनी ।

३-वर्ग में ग्रह बलहीन हो-राजा का सित्र ।

४-वर्ग में ग्रह बलहीच हो-बन्धुओं में श्रेष्ठ ।.

श-वर्ग में ग्रह बलहीन हो-बन्धु प्रिय ।

६-वर्ग में ग्रह बलहीन हो-सुखहीन ।

छ-वर्ग में ग्रह बलहीन हो-अनथं ( विपत्ति ) ।

८-वर्ग में ग्रह बलहीन हो-दुःख ।

९-वर्ग में ग्रह बलहीन हो-नाश ।

१०-वर्ग में ग्रह बलहीन हो-जातक की मृत्यु ।

सर्व वर्ग में ग्रह बलवान्‌ हो तो-राजाओं में श्रेष्ठ हो ।

केन्द्रेश त्रिकोणेश आदि होने के अनुसार फल

वर्ग केन्द्रोश फल पंचमेश फल नवमेश फल

१-परिजात दाता कुलोचित विद्या तीथं करने वाला

२-वर्गोत्तम श्रेष्ठदाता उत्तम विद्या अनेक जन्म में तीर्थ करने वाला

३-गोपुर पुरुषत्व से युक्त संसार में ख्याति यज्ञ करने वाला

४-सिहासन लोकमान्य राजमंत्री वीर सत्यवक्ता जितेन्द्रिय

र १ ब्रह्म उपासक |

श-पारावत शूरवीर ब्रह्मज्ञानी परमहंस -

६-देवलोक सभापति कर्मयोगी दंडी या त्रिदंडी

७२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

७-ब्रह्मलोकं मुनि ईश्वरोपासक यज्ञ कर इन्द्र पद पावे

द-ऐरावत संवंदा सन्तुष्ट ईश्वर भक्त स्वयं धर्मावतार होता है

( दुःखहीन ) केन्द्रेश त्रिकोणेश दोनों के परस्पर सम्बन्ध से राजयोग होता है । इनका वर्ग में

फल-केन्द्रेश त्रिकोणेश दोनों यदि- बू-पारिजात में-प्रजा रक्षक राजा श-पारावत-मनु आदि सरीखे

२-वर्गत्तिम-भ्रे ष्ठ वाहन युक्त श्रेष्ठ राजा ६-देवलोक-विष्णु का अवतार

चे-योपुर-राजाओों में मान्य राजा ७-क्रह्वालोक-ज्नह्या आदि सदृश देव

विश्व पालक

४-सिहासन-गुधिष्ठिर आदि सरीखे चक्रवर्ती राजा ८-ऐरावत-पुवे स्वयंभू मनु हुए ।

वर्ग में होरा का फल

१--सूर्‍र्य मे होरा का फल (१) सूर्ये होरा में जन्म-धामिक, सत्यवक्ता, गुरु और देव पूज क, स्वउपाजित धन . का भोगी । तेजस्वी. हो परन्तु कायं में क्रूर हो। सिद्धि एवं राज्य प्राप्त हो सुखी, धनी पुत्र पौत्र कल्याण युक्त पूर्ण आयु । (२) सूर्य होरा क्रूर ग्रह-धन धान्य वैभव युक्त, राजप्रियः आचार सत्व शील, निरोग, बली जितेन्द्रिय, स्त्री संभोग कठिनता से प्राप्त हो। (३) सूर्यं होरा में विषम राशि में पाप ग्रह-क्ीतिमान्‌, बड़ा उद्यमी, बलवान्‌, घनवान्‌, तेजस्वी ।

सूयं होरा में सम राशि में पाप ग्रह-पूर्वोक्तफल मध्यम । सूयं होरा में विषम राशि में शुभ ग्रह-मृदु शरीर कांति सौख्य, सौभाग्य, बुद्धि मधुर वाणी के फल उल्टे हों । (४) सूर्य स्वहोरा मे-विद्वान्‌ सेतर पुषषार्थी जितेन्द्रिय शूरवीर उद्यमी । सूर्य होरा में चन्द्र-सदा नीच बुद्धि । सूर्य होरा में मंगल-बड़ा धीर, वाहन वाहक, सज्जनप्रिय, बड़ा शूरवीर, विख्यात, धन सम्पन्न, उत्तम मित्र युक्त, अनेक सम्पत्ति युक्त । सूर्य होरा में बुध-दरिद्री और चुगलखोर । सूर्यं होरा में गुरु -रोग से अनवसर मृत्यु । सूर्य होरा में शुक्र-अगम्या स्त्री से रमण । सूयं होरा में शनि-वुषलीपति होता है। जि होरा का फल १) चन्द्र के होरा में जन्म हो तो मुदु होता है। सब कार्य में शुभ है । र i द्विपद राशि में कुंभ लग्त को छोड़ कर अन्य लग्न स बा का होरा

षड्वंगं विचार : ७३

(३) चन्द्र होरा में सम राशि में शुभ ग्रह-मृदु स्वभाव, कीतिमान्‌, सुखी, सब का

च्यारा, वुद्धिमान्‌, मधुर वाणी, सौभाग्य युक्त ।

चन्द्र होरा सम राशि में पापग्रह-पुर्वोक्त महा उद्यम बल धन तेज से हीन ।

(४) चन्द्रहोरा विषम राशि में पाप ग्रह-पूर्वोक्त शुभ फल मध्यम ।

इनमें बहुत ग्रह होने से बहुत फल ।

इनमें थोड़ा ग्रह होने से थोड़ा फल ।

(५) चन्द्र होरा में चन्द्र -अति सुन्दर और प्रिय पुत्र हो ।

चन्द्र होरा में बुध-स्वंत्र विख्यात, स्त्री पतिव्रता, शुभाचार युक्त ।

चन्द्र होरा में गुरु-धन रहित, तेजस्वी, अनिदनीय ।

चन्द्र होरा में शुक्र-भोगने योग्य स्त्री मिले ।

चन्द्र होरा में क्षीण चन्द्र-शुक्र के समान फल ।

चन्द्र होरा में मंगल-मृतस्त्री ओर नराधम हो ।

चन्द्र होरा में सूयं-अति दुःखी, गुह्य स्थान की पीड़ा से पीड़ित ।

चन्द्र होरा में शनि-दासी का पति हो ( दासी से विवाह करे ) ।

(६) चन्द्र होरा में शुभ ग्रह हो तो-शुभ फल होता है, स्त्रियों का सनेही, स्त्रियों

को प्रसन्न रखने वाला ।

चन्द्र होरा में पाप ग्रह हो तो-शुभ फल नहीं होता ।

(७) चन्द्र होरा में विषम राशि-वाग्मी ,दाता, चारु शरीर, दयालु, लम्पट, स्त्री

अकृति वाला ।

चन्द्र होरा में सम राशि-बोलने में दक्ष, आलसी, सती स्त्री में रत ।

र द्रेष्काण फल विचारना

द्रेष्काण के विशेष नाम

१-आय॒ध द्रेष्काण-मेष का पहला, तीसरा । मिथुन का दूसरा तीसरा । सिंह का

पहिला दूसरा और तीसरा, धन का तीसरा, कुम्भ के तीनों । मीन का पहिला और

दूसरा द्रेष्काण ।

२-सपं द्रेष्काण-वृष का दूसरा । ककं का दूसरा और तीसरा, वृश्चिक का पहिला

और दूसरा, मोन का तीसरा द्रेष्काण ।

३-निगड़ ( वेड़ी ) द्रेष्काण-मकर का पहिला द्रेष्काण ।

४-पक्षी द्रेष्काण-मिथन का दसरा, सिंह का पहिला, कन्या के तीनों, तुला का

पहिला दूसरा, धन का पहिला, मकर का पहिला । ७

इनमें सिद्ध द्रेष्काण--सिह का पहिला, तुला का दूसरा, कुंभ का पहिला । प

४--चतुष्पद द्रेष्काण--मेष का पहिला दूसरा, वृष के तीनों, मिथुन का पहिला

ककं का पहिला, सिंह का पहिका ओर तीसय, तुला का तीसरा, वृश्चिक का तीसरा,

मकर के तीनों द्रेष्काण 1

७४ : सचित्र. ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

६--वराह द्रेष्काण--कर्क का पहिला ।

७--पाश (फांसी) द्रेष्काण--वृश्चिक का दूसरा ।

अग्नि द्रेष्काण--पाप ग्रह का द्रेष्काण ।

जल द्रेष्काण--शुभ ग्रह द्रेष्काण ।

मिश्र द्रेष्काण--पाप और शुभ दोनों से युक्त या दृष्ट ।

२२ वां द्रेष्काण--अष्टम स्थान में जो तत्काल द्रेष्काण हैं वही लग्न से २२ वां द्रेष्काण होता है।

द्रष्काण फल

राशिपर द्रेष्काण संज्ञा जन्म फल

५, १, ११, ८, १० --खल बुद्धि, घूमने वाला, ५, ७, ८, १२ ( ११ द्रेष्काण ) पापकर्मा, अपवादी । ४-५

४-१२ १ | ६ द्रेष्काण) --दाता भोगी, दयालु, कृषि तथा १२-६ २? जलचर वस्तु से घनवन्‌ शील रहित ॥ २-३ ३]

१, २, ९, १०, ११ ( ११ द्रेष्काण ) --सुख, धन, पुत्र युक्त, दयालु,

७, ९, ६ रमणीक शरीर । ६, ९, ११

१, ४, १९ ३ ८ द्रेष्काण ) --कुशील, पर स्त्री में रमण, कूर २, ९ १ मिश्र दृष्टि, चंचल आत्मा। ३, ५, ७ २

इष्काण विचार--यात्रा में कहीं जाते समय या दूसरी जगह से कहीं जाना हो तब विचारना ।

१ द्रेष्काण शुभ का हो तो पुण्य युक्त या रत्न युक्त है शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो- जय हो ।

२ जिस द्रेष्काण में आयुध युक्त है उस पर पाप ग्रह की दृष्टि हो तो-हार या नाश हो ।

३ भुजंग (सपे), पाश, इन द्रेष्काणों में यात्रा करने से कैद होता है । ४ द्रेष्काण के समान चोर कहना यह स्वरूप बताने का प्रयोजन है ये स्वरूप आदि आगे बताये गये हैँ ।

५ (१), आयुध, (२), पाश, (३), निगड, (४), गृद्ध, (४), पक्षी, (६), वाराह, (७), सपे, (०), चतुष्पद, इन द्रेष्काणो में जन्म हो तो घन. रहित, कर स्वभाव, निद्य ओर दरिद्र हो

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षड्वगं विचार : ७५

३६ द्रेष्काण की संज्ञा

राशि द्रेष्काण स्वरूप स्वामी

क्रम

१ मेष १. नर शस्त्र युक्त मंगल

२. पशु साँच्च द्रेष्काण, घोड़े सदृश मुख, सूर्य

३. नर दुष्ट द्रेष्काण शस्त्र युक्त गुरु

२ वृष १. स्त्री रोयेंदार | शुक्र

२. नर चोपाया बुघ

३. नर चौपाया शनि

३ मिथुन १. स्त्री बुध

२. नर पक्षी द्रेष्काण-हृथियार बन्द शुक्र

३. नर हथियार बन्द शनि

४ ककं प्‌. तर पशु चन्द्र

२. स्त्री मंगल

३. नर मनुष्य, सपं द्रेष्काण गुरु

५ मिह १. नर पशु पक्षी सूर्य

२. नर हथियार बन्द गुरु

३. नर पशु सायुध हथियार बन्द मंगल

इकन्या १. स्त्री बुध

२. नर सायुध शनिः

३. चर शुक्र

७ तुला १. नर मनुष्य शुक्र

२. चर पक्षी शनि

३. नर बन्दर की शकल का पशु बुध

८ वृश्चिक १. स्त्री सपं मंगळ

२. स्त्री सपं गुरु

३. नर चौपाया कछुआ की शकल, सिंह की शकक चंद्र

९ धन १. नर चौपाया घोड़े का शरीर या देह गुरू

२- स्त्री | मंगळ

३. नर सायुध सूर्यं

१० मकर १. नर पशु सांक ( बेड़ी ) में जकड़ी शनि

२. स्त्री शुक्र

३. नर सायुध बुघ

११ुंभ १- नर गरुड पक्षी का स्वरूप शनि .

७६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

२. स्त्री रोयेंदार बुघ

लेः नर शुक्र

१२. मीन १. नर नाव चलाना युर

२. स्त्री सुसज्जित चन्द्र

३. नर सपे मंगल

द्वेष्काण के स्वरूप

द्रेष्काण के स्वरूप आगे बताये हैं इनका प्रयोजन यह है कि इन द्रेष्काणों के रूप

का रूप और चोरे हुए द्रव्य के स्थान आदि बताने के काम आता है ।

नीचे प्रत्येक द्रेष्काण मे स्वरूप आदि दिये हैं---

(१) मेष का

पहिला द्रेष्फाण-पुरुष द्रेष्काण एवं उदित या आयुध द्रेष्काण । यह पाप ग्रह का

ज्रेष्काण है । इससे इसे अग्नि द्रेष्काण भी कहते हैं । कमर में श्वेत रङ्ग का वस्त्र बेधा

हुआ, श्याम रङ्ग, शुभ वस्त्र, लोगों के कल्याण विषय व संरक्षण विषय में समर्थ, रूप

भयंकर, लाळ नेत्र, हाथ में कुल्हाड़ी या फरसा उठा कर कन्धे पर धरा पृथ्वी पर रहता

है । यह चौपाया द्रेष्काण भी है ।

दुसरा द्रेष्काण--स्त्री रूप चौपाया द्रेष्काण है । लाल रंग का वस्त्र पहिने, भूषण

और भोजन की चिन्ताकर्ता, घड़े जैसा पेट, घोड़े जैसा मुख, प्यासी या पानी बहुत

पिये, एक पैर से खड़ी या एक पैर से लंगडी, मग्नि कोण में जाती है ।

तीसरा द्रेष्काण--आयुध द्रेष्काण है । विषम स्वभाव, अनेक प्रकार की कामना

कलाकौशल जानने वाला, लाल वस्त्र पहिने, निरन्तर उद्यमी, वर्ण पिंगल, भूरे केश,

सन्मुख हाथ से लाठी उठा कर रखता है या हाथ में डण्डा लिये, क्रोधी पुरुष, द्विपद

स्वरूप, नियम भंग करने वाला ।

(२) वृष का

पहिला द्रेष्काण--स्त्री द्रेष्काण, चतुष्पद, शुभ ग्रह का द्रेष्काण है । टेढ़े और छोटे

सिर के बाल) घड़े के समान पेट, अग्ति से जले वस्त्र पहिने, नित्य प्यासी या बहुत

पानी पीये, भोजन वहुत करे, भूषणों की इच्छा अधिक करे, भक्ति करे, भोजन बनावे

ऐसी स्त्री । र

दूसरा द्रेष्काण--चतुष्पद, सर्प द्रेष्काण, मिश्र द्रेष्काण है। खेती का काम, अन्न

` सम्हाऊने का काम, घर का काम, हल चना, गाड़ी बैल चलाना, गौ की रक्षा करने _

वाला, गीत वाद्य नाच, छिखना, चित्र बनाना आदि कर्म जानने वाला, पंडित, बैल के

समान कंध या गर्दन, बहुत भूख, बकरे जैसा मुख, मलिन वस्त्र पहिने, पुरुष, चौपाया द्रेष्काण ।

तीसरा द्रेष्काण--पुरुष द्रेष्काण चतुष्पद, पाप ग्रह का द्रेष्काण, हाथी के

सयात बड़ा स्थूल शरीर, श्वेत दांद, ऊॅट क्रे समान बड़े पेर, शरीर का रंग पिंगल

षडूवगे विचार : ७७

( पीया ), बकरे व मृगो के लोभ में व्याकुल चित्त अर्थात्‌ इनसे प्रेम, जंगल में रहना,

चौपाया द्रेष्काण ।

(३) मिथुन का

पहिला द्रेष्काण--स्त्री और चतुष्पद द्रेष्काण है । रूपवती स्त्री सिलाई का और

कसीदे का काम जानने वाली, भूषणों से अति श्रद्धा अर्थात्‌ भूषण पहिने, संतान रहित,

दोनों भुजा उठाये रखे, ऋतुमती या अति कामी । -

दूसरा द्रेष्काण-- पक्षी द्रेष्काण है कवच पहिने, धनुष बाण लिये, वन वगीचे में

खड़ा या रहना । शूरवीर, रणको प्यारा मानने वाला, गरुड़ सरीखा मुख) अस्त्र विद्या

यन्त्र विद्या ( जादूगरी ) जानने वाला, क्रीड़ा ( खेल ) करने वाला, पुत्र, आभूषण

और धन का चितन करने वाला पुरुष पक्षी द्रेष्काण ।

तीसरा द्रेषकाण--पुरुष अग्नि क्रिया मिश्र द्रेष्काण है । बहुत आभूषण से भूषित,

अनेक रत्नयुक्त कवच, धनुष बाण धारण कर्ता, नाचते बजाने गाने में कुशळ, कविता

काव्य आदि रचने वाला पंडित, भ्रमण करने वाला, नर द्रेष्काण ।

(४) ककं का

प्रथम द्रेण्काण--पुरुष द्रेष्काण, चतुष्पद, जल द्रेष्काण, पत्ते फूल फल इनको

धारण करना या खाना, हाथी जैसा स्थूल शरीर, ऊंट जैसे लंबे पैर, घोड़े जैसी गर्दन,

सूकर जैसा मुख, वन विहारी या जंगल का वास, ऐसा पुरुष चतुष्पद द्रेष्काण ।

दूसरा द्रेष्काण--मिश्र द्रेष्काण, स्त्री एवं सपं द्रेष्काण, स्त्री सिर में कमळ का फूल

धारण करती, सपं युक्त और बड़ी कठोर ककंशा, जवानी भरी, बचपन में पलास की

टहनी पकड़ कर खड़ी या पलास के पत्ते रखी हुई । एकान्त वासी ।

तीसरा द्रेष्काण--पुरुष द्रेष्काण, सपं द्रेण्काण, स्त्रियों के लिए आभूषण लाने को

समुद्र में नाव पर बंठा व्यापार करे, सर्प अंग में धर कर चलता, सोने के आभूषण

है, चपटा दुःख ।

(५) सिंह का

पहिला द्रेष्काण--पुरुष, उग्र, आयुध द्रेष्काण, सेमर के वृक्ष पर एक गीध और

एक स्याल (लड़ैया) वैठा एक कुत्ता एक मनुष्य मैले वस्त्र पहिने मां बाप से रहित होने

के वियोग से रो रहा है । यह नर द्रेष्काण, चौपाया और पक्षी हैं ।

दूसरा द्रेष्काण--घोड़े जैसा पुष्ट शरीर सिर में गुलाबी रंग के फूल धरे काळे

हिरन का चमं ओढे व कम्बल लिये। सिह के समान सहज में साध्य नहीं होता,

धर्नुधारी, नाक का अग्र भाग ऊँचा, पुराने कपड़े गुप्त वेश पुरुष द्रेष्काण सायुध,

चतुष्पद ।

तीसरा द्रेष्काण-रीक्ष के समान कुरूप मुख, बानर के समान चेष्टा करे । दाढी

बडी, लाठी फल मांस धारण किये या भक्षण किये ! सिर के केश मुडाये । पुरुष ओर

चतुष्पद द्रेष्काण, अग्नि द्रेष्काण है ।

७८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

(६) कन्या का

पहिला द्रेष्काण-कुमारी, फूलों से भरा घड़ा सिर पर धरे, मलिन वस्त्र पहिने, वस्त्र ओर घन का संग्रह चाहती । गुरु की सेवा करती या गुरु कुछ की ओर गमन करती स्त्री द्रेष्काण, मिश्र पक्षी द्रेष्काण ।

दूसरा द्रेष्काण-श्याम रंग, हाथ में कमल की लेखनी लिये । सिर में पगड़ी बांधे आमदनी खर्च की गिन्ती करने वाला बहुत धन मिले खर्च भी करे । सर्वाङ्ग में रोम व्याप्त, बड़ा धनुष धारण किये । पुरुष द्रेष्काण, मिश्र, पक्षी द्रेष्काण । तीसरा द्रेष्काण-गोरे रंग की स्त्री, सुन्दर स्वच्छ दुपट्टा ओढे लम्बा शरीर, घड़ा और करछुली हाथ में लिये । सावधानी से मन्दिर जाने को तैयार हो रही। स्त्री द्वेष्काण, पक्षी द्रेष्काण ।

(७) तुला का

पहिला द्रेष्काण-रास्ता बाजार में दुकान खोलकर तराजू हाथ में लिए पुरुष बैठा है चाप तौल में दक्ष सुवर्ण आदि द्रव्य के पात्रादिकों को तोल कर मोल बताता नर ड्रेष्काण, जल और पक्षी द्रेष्काण भी है । रज दूसरा द्रेष्काण-गीध पक्षी जैसा मुख, घडा लेकर गिरने को तैयार हो रहा, भूख ओर प्यास से व्याकुल पुरुष शरीर मन में भी स्त्री पुरुषों को याद कर रहा अन्य मत ` से घोड़े सरीखा मुख । नर द्रेष्काण, मिश्र, पक्षी द्रेष्काण । तीसरा द्रेष्काण-पुरुष मणियो के अलंकार से भूषित । जंगल में मृगों को भय दिखाता, सोने का आभूषण धनुष, तरकस कवच लिये । फल ओर मांस धारण करता या भक्षण करता वानर सरीखा दिखने वाछा पुरुष, चतुष्पद द्रेष्काण । ५८) वृश्‍चिक का

पहिला द्रेष्काण-स्त्री, वस्त्र पुष्पों से रहित, बड़े समुद्र के तीर और अपने स्थान से अष्ट, पैरों में सपं लपटा, मनोहर सुरत, स्त्री व अग्नि और सर्प द्रेष्काण । दूसरा द्रेष्काण-कछुआ या घड़े के समान शरीर स्त्री अपने पति के लिए स्थान 'सुख चाहती, शरीर में सर्पाकार चिह्न या पति के लिए शरीर पर सपं धारण करे, मिश्र, स्त्री और सपं द्रेष्काण । तीसरा द्रेष्काण-बड़ा और चिपटा सा मुख कछवे के मुख के समान, कुत्ता, हरिण स्यार, सुकर इनको डरवाने वाला हाथ में चन्दन लगाया या चन्दन के उत्पत्ति स्थान का रक्षक मित्र द्रेष्काण, पुरुष चतुष्पद । (९) घत्‌ का

पहिला द्रेष्काण-मनुष्य जैसा मुंह, घोए जैसा शरीर, अडा धनुष धारण किये, आश्रम में बैठा, यज्ञ के उपयोगी धुव आदि पात्र और यज्ञ करने वाले तपस्वियो की रक्षा करना पुरुष, मिश्र, उदित ( पक्षी ) द्रेष्काण। ` दुसरा द्रेष्काण-मन को रमण करने वाळी कांति, चम्पा के पुष्प या सुवणं सरीखी

षड्वग विचार : ७९

भद्रासन पर बैठी । अति सुन्दर भी नहीं मध्यम रूप, समुद्र के रत्न घारण करने वाली ` स्त्री । मिश्र द्रेष्काण, स्त्री व धनुष द्रेष्काण ।

तीसरा द्रेष्काण-दाढीवाला पुरुष मुछें बड़ी, सोना या चम्पा पुष्प के समान कांति, श्रेष्ठ आसन सिंहासन कुरसी आदि में बैठा हुआ । लाठी हाथ में लिये, कुसुम्बी वस्त्र पहिने मृग चर्म धारण किये । मिश्र, पुरुष व आयुध द्रेष्काण । (१०) मकर का-पहिला द्रेष्काण-सर्वांग में दोष व्याप्त, मगर सरीखे दाँत, सुअर सरीखी देह, खेती करे वल जोते, जाळ, फाँसी, वेडी आदि लिये, भयानक मुख, मिश्च, पुरुष व चतुष्पद द्रेष्काण ।

दूसरा द्रेष्काण-सम्पूणं कला जानने वाली चतुर, कमल सदृश नेत्र । श्याम रंग की अनेक वस्तु को ढूंढ़ती, भूषणों से सजी कान में लोहा का भूषण पहिनी। जल द्रेष्काण, स्त्री व चतुष्पद द्रेष्काण ।

तीसरा द्रेष्काण-किन्नर सरीखी योनि, घोड़े जैसा मुख, उनके सरीख शरीर, कम्बल धारी, कवच धनुष भाला लिये। रत्न सहित घडा कन्धे पर रखा, सायुध पुरुष द्रेष्काण, मिश्च व चतुष्पद द्रेष्काण ।

(११) कुम्भ का-पहिला द्रेष्काण-तेल व शराव पिये, जल-भोजन मिलने के लिए अन्तः करण दुःखी । कम्बल ओढे, रेशमी वस्त्र व मृग चर्म धारण करना, गीध सरीखा मुख, अग्नि द्रेऽक्ञाण, पुरुष व आयुध द्रेष्काण ।

दूसरा द्रेष्काण-स्त्री जळती गाड़ी पर गोठी, सेमर के वृक्ष के पास, लोहा लिए, वन में मैले वस्त्र पहिने, बर्तन सिरथें धरे, मिश्र, सारिनक स्त्री द्रेष्काण, आयुध द्रेष्काण । तीसरा द्रेष्काण-स्याम वणं, कानों में बाल जमे हुए, सिर में किरीट ( मुकुट ) 'घारण किए । लोहे के पात्र में वृक्ष की छाल, पत्ते गोंद तेल और फल को रखे, एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाना, पुरु ष, आयुध द्रेष्काण ।

(१२) मीन का-पहिला द्रेष्काण-त्न्‌ वादि यज्ञ पात्र सामान मोती मणि शंख सब हाथ में लिए, भूषण पहिने स्त्री के भूषणों के निमित्त, समुद्र में नाव आदि में बैठा जा रहा । पुरुष द्रेष्काण, आयुध द्रेष्काण ।

दूसरा द्रेष्काण-अँची ध्वजा वाले जहाज में नैठकर कुटुम्ब सखी जनों को लेकर समुद्र के तीर चछ रही। चम्पा पुष्प के समान मुख की पांति, जल स्त्री व आयुध द्रेष्काण ।

तीसरा द्रेष्काण-खाई के समीप रहे, सपं देह में घरे, बिना वस्त्र के अर्थात्‌ नंगा पुरुष वन में चोर और अग्नि के भय से मन में व्याकुल हो रहा । अग्नि द्रेष्काण, पुरुष, सपं द्रेष्काण ।

द्रेष्काण में चन्द्र का फल

जन्म में चन्द्र का फल द्रेष्काण अनुसार विचारना

(१ ) चन्द्र अपने या तात्कालिक मित्र के ३ष्काण में हो तो-रूप गुण अच्छे हों ।

चन्द्र सम द्रेष्काण में हो-गुण मध्यम ।

२० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

चन्द्र शत्रु द्रेष्काण में हो-गुण रूप से हीन ।

चन्द्र सपं द्रेष्काण में हो-उग्न स्वभाव ।

चन्द्र उद्दत आयुध द्रे में हो-प्राण घात के लिए हथियार उठाये रहे ।

चन्द्र चौपाया द्रेष्काण में-गुरुजन की स्त्री गमन करना ।

चन्द्र अंडज ( पक्षी ) द्वे० में हो-फिरने वाला ।

जहाँ जहाँ अपने द्रेष्काण और सपं द्रेष्काण में भी हो तो दोनों फल हों ।

द्रेष्काण के अनुसार चन्द्र का फल

(१) मेष के पहिले द्रे० में चन्द्र हो-छोगों का घातक हो । यदि मित्र द्रेष्काण

हो तो सुन्दर तेजस्वी ।

दूसरे द्रे० में चन्द्र हो-सुन्दर, तेजस्वी, गुरुजन की पत्नी से रमण करने

वाला ।

तीसरे ब्रे० में चन्द्र हो-पहिले द्रेष्काण के अनुसार फल ।

(२) वृष के पहिले द्रे० में चन्द्र हो-गुरु स्त्रियों से गमन करता, शुक्र दृष्टि हो:

तो शुभ फल।

दुसरे द्वे० में चन्द्र हो-गुरु स्त्रियों में पाप बुद्धि ।

तीसरे द्रे० में चन्द्र हो-लोगों का घात करने वाला ।

(३) मिथुन के पहिले द्वे० में चन्द्र हो-पुरुष सुन्दर तेजस्वी ।

दुसरे द्रे० में चन्द्र हो-गुणहीन, परिभ्रमण करने वाला ।

तीसरे द्रे० में चन्द्र हो-रूप व गुण कम हो ।

(४) ककं के पहिले द्रे० में चन्द्र हो-सुन्दर व तेजस्वी । बूसरे ३० में चन्द्र हो-उग्न स्वभाव ।

तीसरे द्रे० में चन्द्र हो-सुन्दर हो पर उग्र हो । (५) सिह के पहिले द्रे० में चन्द्र हो-हिसा करने वाला, सुन्दर तेजस्वी । दूसरे द्रे० में चन्द्र हो-सुन्दर हो, परस्त्री से गमन करे । तीसरे द्रे० में चन्द्र हो-परस्त्रियों से गमन करे, उग्र हो । (६) कन्या के पहिले ३० में चन्द्र हो-परिभ्रमण करे । दुसरे द्रे में चन्द्र हो-परिभ्रमण करे । तीसरे द्रे० में चन्द्र हो-भ्रमण करे. दुर्गति हो । (७) तुळा के पहिले द्रे० में चन्द्र हो-कोमरू हो, भ्रमण करे । दुसरे ३० में चन्द्र हो-निस्तेज हो, भ्रमण करे । तीसर 8० में चन्द्र हो-सुन्दर हो, परस्त्री पर लक्ष करे । (८) वृश्चिक के पहिले ३० में चन्द्र हो-उग्र हो । दूसरे द्रे० में चन्द्र हो-सुन्दर ग्रुणवान्‌ हो, उम्र हो । तीसरे द्रे० में चन्द्र हो-सुन्दर तेजस्वी हो, परस्त्री से गमन करे | (९) घन के पहिले द्रे० में चन्द्र हो-तेजस्वी हो, हिसा, करने वाला हो ।

षड्वर्ग विचार : ८५५

दुसरे द्रे० में चन्द्र हो-उग्र हो ।

तीसरे द्रे० में चन्द्र हो-सुन्दर हो हिसा करने वाला हो | '

(१०) मकर के पहिले द्रे० में चन्द्र हो-गुरु पत्नी से गमन करे ।

दूसरे द्रे० में चन्द्र हो-परस्त्री से समन करे ।

तीसरे द्रे० में चन्द्र हो-आपस वाले को स्त्री से संग हो ।

(११) कुंभ के पहिले द्रे० में चन्द्र हो-लोगों का घात करने वालो ।

दूसरे द्वे० में चन्द्र हो-छोगों का घात करने वाला 1

तीसरे द्रे० में चन्द्र हो-छोगों का घात करने वाला ।

(१२) मीन के पहिले द्रे० में चन्द्र हो-घात करने वाला 1

दूसरे द्रे० में चन्द्र हो-सुन्दर हो, वात करने वाला $

तीसरे द्रे में चन्द्र हो-उग्र हो ।

द्रेष्काण का विशेष फल विचार

(१) द्रेष्काण में उच्च या स्ववर्ग के सौम्य ग्रह हों--वर देने वाली सत्य वादिनी

लक्ष्मी का भोग करवाते हैं ।

(२) स्व द्रेष्काण में सौम्य ग्रह त्रिकोण या केन्द्र में बली होकर पड़े--द्रव्य. का

संचय करने वाला, मान तथा गुण से युक्त विद्यावान्‌, कलाओं में चतुर ।

(३) द्रेष्काणेश शुभ ग्रह की राशि का बैठा हो या शुभ ग्रह या शुक्र से दुष्ट

हो-अनेक प्रकार का सौख्य, आरोग्य, मान, यश की वृद्धि, स्वदेश के हित के कायं

करने से संसार में विख्यात किन्तु दूसरी समस्याओं के विरुद्ध रहे ।

(४) द्रेष्काणेश चन्द्र से युत या दृष्ट या मंगल से दृष्ट या श्‌ क्र युत या दृष्ट--

उसकी आयु के प्रमाणानुसार कर्म फलता है, धमं के निमित्त, अनेक प्रकार से धन

प्राप्त होता है ।

(५) द्रेष्काणेश उच्च में रहते केन्द्र में हो--राजा हो ।

द्वेष्काणेश स्वक्षेत्री हो पूर्ण धन युक्त ।

द्रेष्काण मित्र गृही हो--सम्मान युक्त ।

द्रेष्काणे शपणफर में मित्र क्षेत्री उच्च का-अच्छे मित्र सहित,राजा सदृश धनी।

्रेष्काणेश आपोक्लिम में मित्र गृही या स्वगृही-संतति सदाचार युक्त हो, सुबोध

हो, खेती से धन प्राप्त करे ।

(६) शत्रु या नीच धर में जितने ग्रह हों उसी तुल्य जन्म लग्न में भी हो-उसी के

अनुसार देह में प्रण या चोट छगने का योग हो ।

वह ग्रह जिस राशि में हो-उसी राशि तुल्य शरीर में चोट से व्रण होता है ।

(७) द्रेष्काणेश अपने वर्ग में हो या शुभ ग्रह युक्त हो या अपने उच्च या मित्र घर

में हो यदि उदित त्रिगांश, द्वादशांश यो होरा ( लग्न ) का स्वामी बली होकर उक्त

[] ६

'८२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

स्थान में हो तो अच्छे गुण प्राप्त हों सदा पबित्र रहे, प्रवीण, दयावान्‌, धनवान्‌, संतान

“युक्त, कीतिमान्‌, दीर्घायु और राजा सरीखा हो ।

(८) चन्द्र स्व या मित्र द्रेष्काण में हो-तो जातक, सतगुणी हो, देखने में सुन्दर

हो, चन्द्र उत्तम वर्ग में हो तो भाग्यवान्‌ हो । 9

यदि कोई दूसरे स्थान में हो तो जातक को वह गुण देवे जो उस ग्रह के हों

जिसके साथ चन्द्र पैदा हो ।

(९) जो ग्रह स्व द्रेष्काण में हो तो उसका कारक ग्रह उसे सब फल देगा ।

(१०) ग्रह अपने स्व या उच्च के घर में हो उसी समय मित्र ग्रह से युक्त या दृष्ट

हो तो वह धन युक्त राजा हो ।

(११) द्विस्वभाव राशि में द्रेष्काण-क्रमानुसार अधमा, मध्यमा, उत्तमा ।

चर राशि में द्रेष्काण-उल्टा क्रम-उत्तमा, मध्यमा, अधमा ।

स्थिर राशि मैं द्रेष्काण-अच्छा बुरा मिश्रित फल होगा ।

सप्तमांश फल |

(१) सप्तमांशेश चन्द्र युक्त या दृष्ट हो या सौम्य ग्रह से दृष्ट हो-सहोदर

भाइयों से युक्त, श्रढ़ती कांति, यश, उत्तम मित्र, अति प्रगल्भ । र (२) सप्तमांशेश सूर्य रहित जितने ग्रह नीच में बैठे हो उनमें जो सवसे वली हो- उसी के अनुसार उसकी भाइयों के निमित्त से चिन्ता युक्त स्थिति होती है । (३) उप्तमांशेश उच्च में या शुभ वर्ग में हो-राजा सम पुज्य, सव कार्यों में सफ- लता पावे, धन से अति सम्पन्न हो ।

“ (४) सप्तमांश में सहज भाव में सूर्य, गुरु या मंगल हो-तो अधिक लक्ष्मी को प्राप्त, मित्र को मृत्यु के पश्चात्‌ उसके पुत्र जन्मे हों । (५) युक्त स्थान में शुक्र, बुध या चन्द्र हों-कन्या का जन्म होता है । (६) स्व सप्तमांश में सभी ग्रह उच्च में हो-महा धनी हो । स्व सप्तमांश में सभी नीच क्षेत्र में हों-दरिद्री हो । (७) सप्तमांशेश-पाप ग्रह होकर पाप ग्रह के सप्तमांश में-वे क्रूर ( दुष्ट ) होते

हैं, बुरा फल देते हैं । शुभ ग्रह होकर शुभ ग्रद् के सप्तमांश में-उत्तम फल देते हैं । मित्र ग्रह हो तो -मिश्र फल देते हैं।

नवांश फल

राशियों के भिन्न भिन्त नवांश का फल झे

१-मेष लग्न में दृष्टि हो तो शुभ फल हो व परस्त्री पर (१) पहिला नवांश हो-चोरों का स्वामी, प्रेम करे ।

मुखिया अधिकारी हो । इस पर मंगळ की (२) नवांश हो-उपभोग करने वाळा

षड्वर्ग विचार : ८३

(३) नवांश हो-पंडित हो । - (७) नवांश-पापी हो । (४) नवांश हो-मुख्य मालिक हो। (५) नवांश-घातकी हिंसक (४) नवांश हो-राजा हो। (९) नवांश-ढीट धीर । (६) नवांश हो-नपुंसक हो । ४-सिंह लग्न का नवांश फल (७) नवांश हो-शूर हो । (१) नवांश-चोर । (८) नवांश हो-हम्माल आदि हो। (२) नवांश-भोक्ता । (९) नवांश हो-चाकर हो। (३) नवांश-पंडित ।

२-वृष लग्न में (४) नवाश-स्वामी । (१) नवांश-नाना प्रकार का पाप करे। (५) नवांश-राजा । (२) नवांश-हिसा करे । (६) नवांश-नपुंसक । (३) नवांश-ढीठ व निर्भय । (७) नवांश-शूर । (४)-नवांश-चोर हो । (८) नवांश-हम्माल । (५) नवांश-भाइयों में प्रसिद्ध । (९) नवांश-चाकर ।

(६) नवांश-पंडित हो । ६-कन्या लग्न के नवांश का फल (७) नवांश-घर में स्वामी हो । (१) नवांश-पापी । (८) नवांश-राजा प्रमाण हो । (२) नवांश-त्रातकी । (९) नवांश-नपुंसक हो । : (३) नवांश-ढीठ।

३-मिथुन में (४) नवांश-चोर । (१) नवांश मे-शरवीर हो । (५) नवांश--भोक्ता ।

(२) नवांश में-हेम्माल हो । (६) नवांश--पंडित ।

(३) नवांश में-चाकर हो'1 (७) नवांश-मारिक । (४) नवांश में-पाप करने वाळा । (=) नवांश--राजा । (५) नवांश में-घातकी । (९) नवांश--नपुंसक । (६) नवांश में-ढीट । ७--तुला लग्न के नवांश का फल '७) नवांश मॅ-चोर । (१) नवांश-शूर । ८) नवांश में-उपभोग कर्ता । (२) नवांश--मजदुर । ९) नवांश में-पंडित । ` (३) नवांश--चाकर । ४-ककं लग्न का नवांश फल (४) नवांश--पापी ।

॥) नवांश-मालिक हो. (५) नवांश--घातकी । () नवांश-राजा हो 1 (६) नवांश--ढीठ । () नवांश-नपुंसक हो । - ` (७) नवांश--चोर | () नवांश-शूर हो । (८) नवांश--भोक्ता ।

($ नवांश-हस्माल हो । (९) नवांश--पंडित ।

,(६नवांश-चाकर हो ।

८४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

८--वृश्‍चिक लग्न के नवांश का फक (५) नवांश--भोक्ता ।

(१) नवांश--मालिक ।

(२) नवांश---राजा ।

(३) नवांश--नपुंसक ।

(४) नवांश--शूर ।

(५) नवांश---मजदूर ।

(६) नवांश--चाकर ।

(७) नवांश--पापी ।

(८) नवांश--घातकी ।

(९) नवांश--धै्येवान्‌ ।

९--धन लग्न के नवांश का फल

(१) नवांश--चोर ।

(२) नवांश--भोक्ता ।

(३) नवांश--पंडित ।

(४) नवांश--स्वामी ।

(५) नवांश--राजा ।

(६) नवांश- नपुँसक ।

(७) नवांश--शूर ।

(८) नवांश--हम्माल ।

(९) नवांश--चाकर ।

१०--मकर के नवांश का फल

(१) नवांश--पापी ।

(२) नवांश--घातकी ।

(३) नवांश--धर्यवान्‌ ।

(४) नवांश--चोर ।

(६) नवांश--पंडित ।

(७) नवांश--मालिक ।

(८) नवांश--राजा ।

(९) नवांश--नपुंसक ।

११--क्रुभ के नवांश का फल

(१) नवांश--शूर ।

(२) नवांश--मजदूर ।

(३) नवांश--चाकर ।

(४) नवांश--पापी ।

(५) नवाश--घातकी ।

(६) नवांश--धैयंवान्‌ ।

(७) नवांश--चोर ।

(८) नवांश--भोक्ता ।

(९) नवांश--पंडित ।

१२--मीन लग्न के नवांश का फल

(१) नवांश--स्वामी ।

(२) नवांश--राजा । .

(३) नवांश--नपुंसक ।

(४) नवांश--शूर ।

(५) नवांश--मजदूर ।

(६) नवांश--चाकर ।

(७) नवांश--पापी ।

(८) नवांश--घातकी ।

(९) नवांश--धैयंवान्‌ ।

टिप्पणी--कुम्भ लग्न का कुम्भ नवांश या द्वादशांश हो तो-विशेष बुरा फल

होता है ।

चंद्र का नवाश फल

(१) मेष लग्न-में चन्द्र यहाँ बताये (४) गुरु की दृष्टि हो-राज्य का कार्य कारी ।

नवांश में किसी नवांश में हो परन्तु निम्न (५) शुक्र की दृष्टि हो-जिमीदार ।

ग्रहों की दृष्टि हो तो उसका फल-

(१) सूर्य की दृष्टि हो-नगर का रक्षक ।

(२) मंगल की दृष्टि हो-घातक ।

(३) बुध को दृष्टि हो-कलहकारी ।

(६) शनि की दृष्टि हो-कलहकारी 1

(२) वृष लग्त-क्ते किसी नवांश प

चंद्र हो तो ग्रहों की दृष्टि का फल- , ` (१) सूर्य को दृष्टि हो-मुर्ख ।