सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
w s. Ti
गुलिक आदि विचार : १३५
बार १ खंड २ खंड ३खंड ४खंड ५१ खंड ६ खंड ७ खंड ८ खंड
रविवार गुरु शुक्र शनि रवि चंद्र मंगल बुध
सोमवार शुक्र शनि रवि चंद्र मंगल बुघ गुरु
मंगलवार शनि रवि चन्द्र मंगल बुध गुरु शुक्र
बुधवार रवि चन्द्र मंगल बुध गुरु शुक्र शनि
गुरुवार चन्द्र मंगल बुध गुरु शुक्र शनि रवि
शुक्रवार मंगल बुध गुर qm शनि रवि चन्द्र
शनिवार बुध गुरु शुक्र शनि रवि चन्द्र मंगल
रात्रि खणड
, उपरोक्त दिन व रात्रि खण्ड देखने से प्रगट होगा कि शनि कोन-कोन खण्ड में है,
१ शनि का खण्ड=्गुलिक खण्ड जहाँ-जहाँ शनि है, वह गुलिक का खण्ड
२ गुर. ,, =्यमघण्ट ,, हुमा । गुरु से यमघंट, मंगल से मृत्यु, रवि
३ मंगल „ मृत्यु # से काल और बुघ से अद्ध प्रहर का खण्ड
४ रवि „ काल र होता है। किस दिन रात्रि या दिन में कोनwq ,, घ्अद्धंप्रहर ,, कौन सा खण्ड होता है ऊपर चक्र से समझ
पड़ेगा आठवां खण्ड बिना स्वामी के होता है ।
गुलिक यमघण्ट आदि का ध्रुवक उपरोक्त चक्रानुसार
लंड दिन राव रविवार nes सोमवार. मंगलवार मरी बुधवार गुरुवार शुक्रवार शनिवार
खंड
गुलिक दिन ७ ६ ५ ॐ ३ २ १
pis s 9 ३३०१ ३ २ ००० १ ७ < ५ v
यमघण्ट दिन ५ x 3 २ १ ७ <
(aÍ) राव t ४ ९४ ` — कंटक) रात १ ७ ६ ५ x 3 २३४०5
मृत्यु खण्ड दिन ३ र १० NAN 3
KOR ६ ५ x 3 तया” २ १ ७
कार दिन १ ७ ६ ५ x ३ २
५400 हात bas हर मको x ३ २ १ ७ < ç
अडंप्रहर दिन x 3 २ रै ७ ६ ५
अभ र 0 00 न > नि क नु सकन ७ ६ प् x 3 २ १
उपरोक्त विधि से यह मी जान सकते हैं कि इष्ट काल में किसी विक्षेष दिन को
कौन सा खण्ड हे ।
१३६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
अप्रकाश ग्रह उपग्रह ५ हें उदाहरण--- १ घूम-सूर् स्पष्ट + ४ रा. -१३०-२०' रा.
२ पात .(व्यतीपात)=(१२ राशि-धूम) सूर्य स्पष्ट=११-५९_४०'-४५" ३ परिषि=(पात + ६ राशि) + ४-१३-२०
Rf इन्द्रचाप=(१ २ राशि-परिघि) १ घ्म = ३-१ ९..०-४५ ५ घनु या शिखि या केतु=(इन्द्र चाप + १२-००-०१०५
१६९०-४० र =शिखि कित + १ राशि —धूम ३-१९- ०-४५
` q डर ) २ पात =८-१०-५९-१५
+< ३ परिघि =२-१०-५९-१५
१२-००-००"
= परिधि २-१०-५९-१५
४ इन्द्रचाप =९-१९- ०-३५
- १६-४०
५ शिखि =१०¬ ५-४०-४५
+१
सूर्य स्पष्ट २१३५-४०-४५
ये ५ अदृश्य उपग्रह Š
ये घुम आदि उपग्रह आकाश में विना दिखे विचरते है । यदि किसी समयये कहीं दिखाई देते हैं तो संसार में घोर उपद्रव होने की छाया डालते हुँ ।
अदृष्य उपग्रह की पहिचान ( अन्यमत से )
(१) घूम- आकार घुम्न पट के समान है । कोई कहते Ç यह पुछलूतारा है ।
(र) व्यतिपाव--कोई इसे तारा टूट कर गिरने को कहते हैं ।
(३) परिषि सूर्यं का चन्द्र के आसपास गोल चक्कर होता है ।
(४) इन्द्रचाप--या इन्द्रघनुष या कोदण्ड--प्रसिद्ध इन्द्रधनुष है, जो वर्षा में दिखता ë ।,
(५) केतु- यह घूमकेतु ë । संसार में बहुत उपद्रव करता है ।
धूम आदि अप्रकाश ग्रह के फल पर विचार
इन अप्रकाश ग्रहों से आव के फळ का भी विचार होता Š । सूर्य आदि प्रकाश ग्रहों के भाव फळ विचारते समय अप्रकाश ग्रहों के भाव फळपर सी विचार कर फल का निर्णय करना चाहिये । यदि सूर्यादि ग्रहों के माव फळ शुम हों ओर अभ्रकाश ग्रहों के भी भाव फल शुम हों तो अति qa फल होता हे । यदि दोनों का फळ sqa हो तो अति अशुभ फल होता है । एक शुभ दुसरा अशुम हो तो मध्यम फळ होता है ।
गुलिक आदि विचार : १३७
अप्रकाश ग्रहों का पृथक् भाव अनुसार फल
१ धूम फल
(१) लग्न में-योद्धा, निबंल दृष्टि, स्तब्ध, निर्दय, क्रूर, अति क्रोधी । | (२) द्वितीय मॅ-रोगी, धनी, अंगहीन, मन्द बुद्धि, कार्यहीन, राज्य से हृत मन वाला । (३) सहज में-बुद्धिमान्, शूरवीर, उदार, प्रियवक्ता, परिजन और घन से युक्त । (४) चतुथं मॅ-स्त्री से त्यक्त होने से सदा दुःखी, सब शास्त्रों का ज्ञाता । (५) पंचम में-अल्प सन्तान, धन हीन, गौरवी, सवंभक्षो, मित्रों के विचार से विमुख रहे ।
(६) षष्ठ में-चली शत्रु को जीतने वाला, तेजस्वी, विख्यात, और रोगहीन । (७) सप्तम में-निघंन, कामी, परस्त्री गामी, पंडित किन्तु प्रतिभाहीन | (८) अष्टम में-प शक्रम रहित भी उत्साहो, सत्यप्रतिज्ञ; अप्रिय वक्ता, निदुर, स्वार्थी । (९) नवम-पुत्रवान्, माग्यवान्, घनी मानी, दयालु, धर्मात्मा, भाइयों का पोषक । (१०) दशम-पुत्र, सौभाग्य, संतोष, सुबुद्धि से युक्त, सुखी और सत्य प्रतिज्ञ (११) लाभ-धन धान्य, सुवणं युक्त, विनीत, संगीतज्ञ, सुन्दर कला को जानने
वाला ।
(१२) व्यय-पतित, पापो, पर-स्त्रो गामी, व्यसनी, निदंय, शठ ।
२ पात फल
(१) लग्न में-दुःखी, क्रूर, हिंसक, मूर्ख बन्धुओं का द्वेषी ।
(२) घन में-कुटिल, पित्त प्रकृति, भोगी, निदंय, कृतघ्न, दुष्ट, पापी ।
(३) सहज-स्थिर बुद्धि, योद्धा, दाता, घनी, राजमान्य, सेनापति ।
(४) चतुथे-बंघन व रोग से पीड़ित, सन्तान और सौभाग्य से हीन ।
(५) पंचम-घन होन, रूपवान्, कफ पित्त वायु से पीडित, निठुर, निलज्ज ।
(६) षष्ठ-शत्रु को जीते, पृष्ट देह, शांत चित्त, सब अस्त्र ओर कला में निपुण ।
(७) सप्तम-धन ओर स्त्रो से रहित या स्त्री के वश, दुःखी, निळंज्ज, कामी,
छत्रुओं को सुखदायक ।
(८) सष्टम-नेत्र रोगी, कुरूप, भाग्यहीन, ब्राह्मणों का निन्दक, रक्त पीड़ा से
=i
(९) sea व्यापार करने वाळा, बहुत मित्र, स्त्री का प्रिय, प्रियवक्ता,
अनेक विषयों का ज्ञाता ।
(१०) दश्चम-सम्पत्तिवान्, घमंज, घकारो, महा बुद्धिमान्, पंडित ।
(११) छाम-अत्यन्त घनी, मानी, सत्यवक्ता, दृढ़ भ्रतिज्ञ, संगीत जानने वाळा, घोड़े
को सवारी करने बाळा । š
(१२) व्यय-क्रोषी, अंग हीन, घर्म निंदक, बन्धुं का द्वेषो, बहुत कार्य करने वाला ।
१३८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
३. परिधि फल
(१) लग्न मे-विद्वान्, सत्य वक्ता, शान्त, घनी, पुत्रवान्, पवित्र, दाता, गुरुभवत ।
(२) घन-महाघनी, सुन्दर, भोगी, सुधी, धर्मात्मा, राजा ।
(३) सहज-्त्री का प्रिय, सुन्दर देह, देव और कुटुम्ब का भक्त, नौकरो करने
वाला, गुरुभक्त ।
(४) चतुर्थ-विस्मय से युवत, सरल हृदय, संगीत ज्ञाता, शत्रुओं का भी हित
करने वाला ।
(५) पंचम-घनी, सुशील, सुन्दर, मधुर वाणी, धर्मात्मा, स्त्री का प्रिय ।
(६) षष्ठ-विख्यात, धनी, भोगो, सब जन्तु पर दया करने वाला, शत्रुओं को
जीतने वाला । ;
(७) सप्तम-अल्प सन्तान, सु खहीन, मन्द बुद्धि, निष्ठुर, रोगिणी स्त्री वाला ।
(८) अष्टम-अध्यात्म ज्ञानी, शान्त, चित्त, दृढ़ देह, दृढ़ प्रतिज्ञ, धर्मात्मा, बलवान् ।
(९) नवम-पुत्रवान्, सुखो, सुन्दर, धनी, स्थिर मानी और थोड़े में सन्तुष्ट होने
वाला ।
(१०) दशम-कलाओं का ज्ञाता, भोगी, मजबूत देह, सरल हृदय, सब शास्त्रों में
, निपुण ।
(११) लाभ-स्त्री से सुखी, बुद्धिमान, कुटुम्बियों का प्रिय, मन्दाग्नि रोग 1
(१२) व्यय-बहुत खर्च करने वाला, दुःखी, दुष्ट, बुद्धि, गुरुनिदक ।
४ चाप फल
(१) लग्न में-घन घान्य सुवणं से पूणं, कृतज्ञ, सज्जनों का प्रिय, सब दोषों से रहित ।
(२) घन-प्रिय वक्ता, दृढ़, धनी, विनीत, विद्यावान, सुन्दर, घर्मात्मा ।
(३) सहज-कंजूस, कलाओं को जानने वाला, चोर, अंग हीन, मित्र हीन ।
(४) चतुर्थ-सुखी, गो, घन धान्य से युक्त, राजमान्य, रोग हीन ।
(५) पंचम-सुन्दर, दुरदर्शी, देव भक्त, प्रिय वक्ता, सब कायं में सफल ।
(६) षष्ठ-शत्रुओं को जीतने वाला, अतिधूतं, सुखी, प्रेमी, पवित्र, सव कार्य
में लाभ ।
(७) सप्तम-ऐश्वयं युक्त, गुणो से पूर्ण, शास्त्रज्ञ, घर्मात्मा, जनप्रिय 1
(८) अष्टम-पापी, क्रूर, परस्त्री गामी, विकल अंग वाला ।
(_) नवम-तपस्वो, ब्रतघारी, विद्यावान्, लोक में विख्यात ।
s= (१०) दशम-बहुत पुत्र, घन ऐश्वयं, गौ भैंस आदि हो, लोक में विख्यात ।
L°. (११) छाम-सदा लाभ करने वाला, निरोग, प्रबल कोप, Tera, स्त्री प्रिय, अस्त्र
चलाने में निपुण । (१२) व्यय-दुष्ट, अभिमानी, कुजु, निर्लज्ज, धन हीन, वरस्त्रीगामी ।
गुलिक आदि विचार : १३९
५ केतु (शिखि) फल
( १) लग्न में-सब विद्या में निपुण, सुखी, बोलने में चतुर, लोगों का प्रिय, सब
काम में पूर्ण ।
(२) घन में-ववठा, मधुरभाषी, सुन्दर, कवि, पंडित, मानी, विनीत, वाहनसुख युक्त । ( ३ ) सहज में-कंजूस, कुकर्मी, कृश देह, कठिन रोग से युक्त ।
(४) चतुथं-सुन्दर, गुणी, सात्विक, वेदज्ञाता, सदा सुखी ।
( ५) पंचम-सुखी, योगी, कलाओ का ज्ञाता, युक्ति जाननेवाला, बुद्धिमान् वक्ता
गुरु भवत ।
(६ ) षष्ठ-मातृ कुल नाशक, शत्रुओं को जीतने वाला, बहुत बन्यु, श्रवीर, सुन्दर,
चतुर ।
( ७) सप्तम-जुभारी, कामी, भोगी, वेश्या में रत ।
( ८) अष्टम-ऊुकर्मी, पापी, निर्लज्ज, पर निंदक, स्त्री सुख हीन ।
( ९ ) नवम-वैष्णव आदि भेष धारी, प्रसन्न चित्त, सब जन्तुओं का हित साधक, घम
काये में निपुण ।
(१०) दशम-सुख सौभाग्य युक्त, स्त्रियों का प्रिय, दानी, ब्राह्मणों से संगति ।
(११) लाभ-वित्तलाभ करने वाला, धर्मात्मा, घनी, सुन्दर, शूर, सुकर्मी, महा पंडित 1
(१२) व्यय-पापी, श्र, श्रद्धा और दया से रहित, पर स्त्री गामी, क्रूर ।
सूर्य आदि ग्रहों के उपग्रहों का दिन के अनुसार
कालादि ज्ञान चक्र
दिन का कालादि चक्र
39 3 MSS MT l
दिन १ =
खंड २ खंड ३खंड ४ खंड ५ खंड ६ खंड ७ खंड ८ खंड
रविवार काल परिधि घुम अढयाम यमघंट कोदंड गुछिक निरींश
सोमवार परिषि धूम अद्धंयाम यमघंट कोदंड गुरिक काल
मंगलवार घूम adam यमघंट कोदंड गुलिक काल परिधि »
बुधवार sam यमघंट कोदंड गुर्छिक काल परिधि धुम
गुरुवार यमघंट कोदंड गुलिक कार परिधि घुम अर्घयाम ,,
शुक्रवार कोदंड गुलिक काल परिधि घूम गर्ढयाम यमर्घं ,,
शनिवार गुलिक काल परिधि धूम अद्धंयाम यमघंट कोदंड „
or ESS iT
(१४० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
रात्रि का कालादि ज्ञान चक्र
रात्रि १ खंड २ खंड ३ खंड ४ खंड ५ खंड ६ खंड ७ खंड ८ खंड
रविवार यमघंट कोदंड गुलिक काल परिधि धूम अद्धंयाम ।नरीश
सोमवार कोदंड गुलिक काल परिधि धम अडढ्याम यमघंट
मंगलवार गुलिक काल परिधि धूम अढद्धयाम यमघंट कोदंड i
बुधवार काल परिधि घुम . अद्धंयाम यमघंट कोदंड . गुलिक
गुरवार परिधि धुम बअरद्धयाम यमघंट कोदंड गुरिक कार
शुक्रवार धूम अद्धंयाम यमघंट कोदंड गुलिक काल परिधि ,,
शनिवार arar यमघंट कोदंड गुलिक काल परिधि घुम
दिन रात में उपरोक्त ७ उपग्रहों के प्रत्येक के खण्ड बताये ë । आठवां खंड=निरीश
अर्थात् बिना स्वामी के होता है । अर्थात् केवल ५ ही खंडों में उपरोक्त ग्रह स्वामी
होते हे जिनको नानर चाहिये कि किस समय कौन उपग्रह स्वामी ë 1
रीतिः—दिन का जानने को ( दिनमान = ८ ) %,खंड संझ्याञउस उपग्रह का
समय । रात्रि में इष्ट हो तो ( रात्रिमान + ८ ) x खंड संख्या + दिनमान=समय ।
उदाहरणः--मान छो इतवार के दिन को गुलिक खंड कब जायेगा यह जानना है,
इतवार को दिनमान २८-३० है । २८ घ. ३० प. Z= घ. २३ प. ४५ वि. का
एक खंड हुआ । इतवार को .गुलिक खंड ७वां है । १ खंड २-२३-४५ X ७=९
५६ प. १५ वि. इष्ट तक इतवार के दिन को गुझिक खण्ड रहेगा ।
मान छो इतवार कीं रात्रि को काल खण्ड जानना है । काल खण्ड चौथा है इतबार
का दिनम्ान २८-३०=६०-( २८-३० )=रात्रिमान ३१-३० :- ८८१ खंड=३-५६-१५
का हुआ । ३-५६-१५ X ४ खंड=१ ५-४९ रात्रि + दिनमान २८-३०४४-१५ इष्ट
तक कार खंड रहेगा ।
फल विचार
उपग्रह ९ माने जाते ë (६) गुलिक (मांदि), (२) यमकंटक, (३) अड याम, (४)
काळ, (५) घूम, (६) पात (व्यतीपात), (७) परिधि (परिवेश), (८) कोदंड (इन्द्रधनुष); (९) केतु (घूमकेतु या शिखी) ।
१ गुिक--गुरिक काल सदा त्याज्य है । राजा को भी भिखारी बनाता है । बुरा
फल देता हे । गुछिक फल देने में शनि के समान है । गुलिका मृत्यु लाती हैं ।
२ यमघंट (यमकंटक)--गुरु के समान फल देता है । यमकण्टक के साथ गुलिका
हो तो अच्छे फल की आशा की जाती है । यह यमकंटक अच्छा फल देने में शक्तिशालो ë ।
३ अद्धयाम--बुघ के समान फल है । शुभ घर में अच्छा फल देता है; बुरे घर में
जा बरा फर देता है ।
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ग्रहो का रश्मि फल विचार : १४१
४ काल--राहु के समान फल देता है ।
५ घूम--जहाँ धूम हो वहाँ सदा गर्मी से त्रास अग्नि भय और मानसिक त्रास
होता है । यदि.लग्न या अन्य भाव अपने स्वामी से युक्त धूम के साथ हो या अद्धयाम
के साथ हो तो उस भाव का नाश होता ë ।
६ व्यतीपात--सींगवाले जानवर या चौपायो से भय मृत्यु ।
७ परिधि--जब परिवेश या परिधि हो तो जल का भय हो, जल के रोग से
बंधन भी सम्भव है ।
८ कोदंड--पत्थर से या शस्त्र से चोट लगे और गिर भी पड़े ।
९ केतु-गिरने से चोट, व्यापार में हानि से कष्ट, बिजली गिरने का भय ।
ये फळ उस ग्रह को दशा में होंगे जो उस घर में है जहाँ ये उपग्रह Š ।
उपग्रहों का लग्न आदि भाव का फल
१ लग्न में--अल्प जीवन ।
२ द्वितीय में--कुरूप चेहरा।
३ तृतीय में--साहस 1
४ चतुर्थ में--दुःख ।
५ पञ्चम में--सन्तानहीन।
६ षष्ठ में--शत्रु द्वारा मानसिक त्रास ।
५ सप्तम में--ओज शक्ति का ह्वास।
८ अष्टम में--दुर्मार्ग से मृत्यु ।
९ नवम में--धर्म आदि की प्रतिकूलता ।
१० दशम में--सदा भटकते रहने का झुकाव ।
११ लाभ में--लाभ ।
१२ व्यय में--नित्य दोष करना ।
७
अध्याय ८
ग्रहों का रश्मि फल विचार
रदिम अर्थात् ग्रह की किरण जो गणित द्वारा प्राप्त हो । 2
जिस ग्रह की बहुत रश्मि हो वही ग्रह स्थान पर स्थावर माल का %% देता ë!
अधिक रश्मि हो तो बडा राज्य प्राप्त हो, बल में श्रेष्ठ हो तो युद्ध में जय
प्राप्त हो ।
यदि ५ रदिम है तो दुःख देता है, दरिद्री हो, नीच की संगति करे । वह ग्रह नीच
का हो तो कैद कराता है 1 जितनी रश्मि अधिक हो उतना अच्छा फल होगा 1
१४२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
आगे ग्रहों को रश्मि का फल दिया है
१ से ४ तक रब्मि--बहुत दुःख पावे, कुल से होन, पतित, दुष्ट, दरिद्री, नीच
कुल से स्नेह करने वाला, उत्तम कुल में भी पैदा हो तो नोच को चाकरी करे, दारिद्रय
से दुःखी रहे ।
५ से १० तक रह्िम--प्राणियों में अतिहीन, परदेश जाने में मन रखने वाला, भाग्य
से हीन, सदा मलिन, क्लेश युक्त, ऐश्वर्य हीन, निरन्तर दूसरों के पालन करने ने
दुःखी, निधन, भारवाहक, स्त्री-पुत्रादि से हीन, ऐसा कर्म करे जिससे वंश कुल की
हानि हो ।
१० से १५ तक--प्रधान तथा पूजनीय जनों में भक्ति रखने वाला, उत्तम सुख
भोगने वाला, अपने कुल के अनुकूल, अल्प धन, घर्म युक्त सुन्दर वेष ।
११ रदिम--अल्प पुत्रवान्, स्वल्प धन, स्वल्प कुटुम्ब का भी पालन कष्टमय हो ।
१२ रश्मि--स्वल्पघन, मूर्ख, धूर्त, सत्यहीन निर्धन ।
१३ रश्मि--चोर, निर्धन ।
१४ रहिम-घनी, कुटुम्व पालक, विद्वान, कुलोचित कार्यकर्ता, धर्मी, क्रोध रहित,
द्रव्य उपाजंन करने में तत्पर ।
१५ रङ्मि--वंश से सुख हो, घनी हो, सव विद्या, गुण और धन से युक्त, कुल में
श्रेष्ठ ।
१५ से २० रश्मि--कुल श्रेष्ठ, घनी, सदा स्वजनों से युक्त, अल्पशील, धीर,
उत्तम कीति, उत्तम कलाओं में चतुर, अच्छा स्वभाव, थोड़ा द्रव्य, हो, धमं करे, सम्बन्थियों से पूर्ण, बहुत सेवक, बहुत कुटुम्ब ।
१६ रदिम--कुल श्रेष्ठ ।
१७ रदिम--बहुत नौकरों वाला 1
१८ रक्ष्म--बहुत कुटुम्ब वाला ।
१९ रश्मि--बिख्याठ कीति ।
२० रस्मि--स्वजनों से परिपूर्ण ।
२० से २५ रह्मि-सवंत्र पूज्य सौंदयं युक्त, धैयंवान्, विद्वान्, वीर, सब काम
करने में चतुर, भाग्यवान्, पंडित, शीऊवान्, धन सुख, मित्रों को सुख देनेवाला, राजा
से मान, सम्पत्ति थोड़ी हो ।
२१ रश्मि--पचास मनुष्यों का पालक, दानशील, दयावंत ।
२२ रश्मि--लोभी, घनवात्, शत्र हीन, समर्थ, अल्पगुणो, दयाळू, दान शील 1
२३ रव्मि--विद्याहीन हो तब भी सब जगह प्रधानता हो, धनवान्, सुखी,
सुशील ।
२४ से ३० रश्मि--लक्ष्मीवान्, बलवान्, राजप्रिय, प्रतापी, घनवान्, बहुत जनों
से युक्त, तेजस्वी, राजा से धन और सुख प्राप्त, राजमन्त्री, मनुष्यों में पुज्य सेनापति ।
ग्रहों का रश्मि फल विचार : १४३
३० से अधिक रदिम--कारबारा, मुख्य मालिक हो, गाँव खेती आदि हो ।
३१ रदिम--अति विख्यात, पृथ्वी का भोगनेवाला, चतुर, राजा के तुल्य, सेनापति
प्रधान पद ।
३२ रहिम--५०० ग्रामों का अधिपति, अनेक ग्राम पर्वतों का स्वामी, अनेक नगरों
का बसाने वाला या १०० ग्रामों का अधिपति ।
३३ रदिम--१००० से अधिक ग्रामों का अधिपति ।
३३-३४--रदिम--हजार ग्रामों का स्वामी या कोई ३००० का स्वामी ।
३४ रश्मि--३००० से अधिक ग्रामों का अधिपति ।
३२ से ३५ रश्मि-५०० से १००० मनुष्यों का पोषक ।
३५ रश्मि-अनेक कोषों से सम्पन्न, बड़ा पराक्रमी, लोगों में विख्यात यश, सौंदर्य
युक्त) मंडल का स्वामी, विजय युक्त, निमंल शोल, विलास युक्त 1
३६ रदिम--एक लाख गाँवों का नियंत्रण करने वाला, डेढ़ लाख ग्रामों का स्वामी,
या २५ गाँव का अधिपति ।
३६-३७ रदिम--१॥ लाख गाँवों का अधिपति बड़ा प्रतापी, शत्रुहंता ।
३७ रहिम--३ लाख गाँवों का स्वामी या अन्य मत से २६ गाँव का अधिपति ।
३१ से ४० रदहिम--क्रम से १०० से १००० मनुष्यों का पोषक समान ।
३८ रदिम--७ लाख गाँवों का स्वामी अन्य मत से ४ लाख गाँवों का - स्वामी या
२७ गाँव का अधिपति, बड़ा पराक्रमी, इन्द्र के समान सम्पत्ति वाला ।
३९ रश्मि--सम्पूर्ण जनों को सन्तुष्ट करने वाला, पृथ्वी का पति, बड़ा प्रतापी
राजा, तेजस्वी, विख्यात कीति, कठिन घर्मेवाला, शत्रू, नाशक, ३० ग्राम का अधिपति ।
४० रद्दिम--बड़ा प्रतापी राजा, सेवा, वाहन से परिपूर्ण, विजय यात्रा हो । ३६
गाँव का अधिपति, राजाओं को जीतने वाला । अन्यमत से १०० गाँव हों। |
४१ रब्मि--सूर्य तुल्य तेजस्वी, समुद्र-मण्डला भूमि का पालनकर्ता, समुद्र पर्यन्त
विख्यात कीति, राजा निश्चय होता है । एक देश का राज्य करे 1
४२ रव्मि-दो समुद्रों तक की पृथ्वी का राजा, दो देशों का राज्य करे 1
४२-४३ रदिम--शत्रु हंता, अतुल वीर्य, चारों समुद्र तक पृथ्वी का पालन कर्ता
बड़ा यश ।
४३ रङ्मि--तीन समुद्र तक पृथ्वी का राजा या रे देश का राज करे ।
४४ रहिम -चक्रवर्ती राजा, अति सोख्य, देव ब्राह्मण का भक्त दीर्घायु, सेना,
बाहन, आदि युक्त सम्राट् अन्यमत से ४ देशों का राज्य करे । ;
४५ रश्मि--द्वीपान्तरों में पालन कर्ता, सब में पुज्य, महाबली, सौभाग्य सस्पन्त
बडा प्रतापी । ५ देशों का राज्य करे, । š
४५ रदिम के ऊपर--द्वोपान्तरों में उसका यश गाया जावे, देवताओं से मी अजेय | |
š । °
१४४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
४६ रदिमि-सार्वेभौम राजा हो, सब नृपों पर उसकी आज्ञा चले, ६ देशका
सज्य करे ।
४७ रश्मि--समस्त भूलोक के भार को सहने वाळा, शत्रुहंता, इन्द्र के तुल्य, सब
छोकों में यश, चक्रवर्ती, ७ देशों का राज्य करे ।
४७ से ५० तक रश्मि--राजा हो ।
४८ से ५० तक रष्मि-सार्वभौम राजा हो !
५० से ऊपर रङ्मि- इन्द्र तुल्य हो, भूप कुलात्मक चक्रवर्ती राजा होता है, वैश्य
कुलोत्पन्न राजा होता हैं, शुद्र कुलोत्पन्न घनवान्, विप्र कुलोत्पन्न विद्वान्, यज्ञ आदि कर्म
करने वाला हो ।
५१ रिम के ऊपर--चक्रवर्ती राजा (सम्राट) होता ë ।
रदिमि (किरण) रहित ग्रह--होने से उसी प्रकार विपरीत फल होता है। जिस
समय ग्रहों की अन्तिम अवस्था हो तो किरणों का क्षय ओर प्रथम अवस्थाएं हो तो
किरणों की वृद्धि होती हे ।
विशेष विचार-उच्चाभिमुख. ( नीच से उच्च को भोर जाने वाला ) ग्रहों के
किरण अनुसार पूर्ण फल होता है । |
नीचाभिमुख ( उच्च से नीच की ओर जानेवाला ) ग्रहों की किरण अनुसार फल से
न्यून फल होता है ।
सब ग्रहों का शुभ या अशुभ फल रश्मि संख्या के अनुसार ही होता है । बिना रिम
ज्ञान से वास्तविक फल समझ में नहीं आता । इसलिए रश्मि ज्ञान करने के उपरान्त फळ
का विचार करें ।
रहिम से संतान विचार
३३ ररिम = १० संतान ४२ रदिमि 5२१ संतान
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RO इससे अधिक रश्मि=इससे अधिक संतान
हो ऐसा ( वृ. पारा. का ) मत है ।
ग्रहों का रश्मि फल विचार : १४५
उच्च रदिम का फल _
सप्त बल से जो अधिक बलवान् हो उपे उच्च रश्मि का फल ।
(१) स्थान बल में अधिक हो = देश में मुख्य हो । |
(२) दिग त क्र = विजयी
(३) चेष्टा ,, न = प्रभुताई
(४)काल ,, » = सवं काल में कुशल ।
(५) अयन बल 1 = सवं काल आनन्द ।
(६) उच्च बल > = वंश में मुख्य ।
(७) नैसगिक बल = =स्वजाति घमं का विशेष प्रतिपादन ।
रश्मि का विशेष फल
(१) पशु पालन संख्या-उच्च <fšq और चेष्टा का योग कर उसका आधा करे इसे
पुर्व प्राप्त योग में गुणा कर ६० का भाग देना जो लब्धि आये वह संख्या, नर, अश्व,
गज, गौ आदिं पोष्य वर्ग जानने, अर्थात् इतने जीवों का वह पालन करेगा ।
(२) राजयोग में रश्मि का विचार--पहिके रदिमयोग का फल कहा है 1 आगे राजयोग का फल भी बताया गया है । परन्तु राजयोग में रदिमियोग के फल का भी विचार
करना तब ही उस का यथार्थ फल प्रगट होगा ।
(३) भाव फल में रश्मि विचार--आगे जो भाव फल बताये गये Q उन का शुभा-
शुभ विचारने में रदिम का भी फल विचारना । रश्मि फल के अनुपात से शुभाशुभ फल
अधिक या अल्प होगा । रहिम फल को जोड़ या घटा कर निर्माण करना ।
(४) राजयोग में ररि का और विचार--जो आगे राजयोग के फळ वताये हँ
ब्राह्मण के हों और उत्तम रश्मि योग हो तो वह यज्ञ कर्मादि निष्ठ हो जिसके पुष्य प्रताप
से स्वर्ग प्राप्त करे ।
रदिम साधन
पिछले गणित खंड में उच्च रहमि और चेष्टा रदिम साधन करना बताया है यहां
रश्मि साधन में कुछ भिन्नता है । वृहत्पाराशरी में इस प्रकार रश्मि साधन करना
बताया है-
( ग्रह स्पष्ट-ग्रह नीच ) शेष ६ से अधिक हो तो षड़भाल्प करने को १२ राशि से
घटा कर जो शेष बचे वह लेना ।
इस से शेप में उम ग्रह के श्रुवांक से गुणा कर ६ का भाग देने से लब्धि रहिम प्राप्त
होती है । ग्रहों के ध्रूवांक ये हैँ
ग्रह सूर्य चन्द्र मङ्गल | बुध | गुरु | शुक्र | दानि
ह| १० | ९ ५ ५ | ५ ८ | ५
यहां बताये ध्रुवांक से परमोच्च की ददिम प्राप्त होती है । मध्य की रदिम अनुपात
से निकाल लेना ।
१०
१४६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय-फलित खण्ड
विशेष संस्कार
यदि ग्रह उच्च में हो तो उक्त विधि से प्राप्त रश्मि संख्या > रे
82 मूल त्रिकोण 77 21 ”> x २
” स्वराशि ”> ”> ” x š
” अधिमित्र 5 x १. xš
” मित्र रु z र? अ.
” शत्रु ” ” 12 x 3
” अधिषात्रु टर पि ” xš
” समगृही ws ” > पुवे प्राप्त रश्मि ही
इस प्रकार सब ग्रहों की रश्मि निकाल कर सब को योग करना 1 जिस प्रकार ग्रहों
में रदिम निकाली गई है उसी प्रकार षड़वर्ग से भी रश्मि निकाली जाती है ।
होरा, नवांश, त्रिंशांश, द्वादशांश आदि से भी रश्मि निकालने के पूर्व प्राप्त रश्मि
में षड्वर्ग के अनुसार मैत्री का विचार कर देखना कि यह वगंस्वामी पंचघा मैत्री में सूर्य
आदि ग्रह (जिसकी रदिम प्राप्त हुई है) उसकी मित्र शत्रु या सम आदि है । उस मैत्री के
अनुसार पूर्वे प्राप्त रद्म में विशेष संस्कार करना पड़ता है तब उस वगग की प्रत्येक ग्रह
की रषिम जानी जाती ë ।
क्षेशवीय जातक में उच्च रदिमिसाधन कुछ भिन्न प्रकार से इस प्रकार बताया ë —
( ग्रह स्पष्ट-नौच ) = शेष से अधिक हो तो षड़भाल्प कर ग्रहण करना अर्थात् १२
गशि से घटाकर ग्रहण करना । पदचात् ६ का भाग देना तब उच्च पल कलादि में प्राप्त
तेता है । इसमें ६ गुणा कर १ अंश जोड्ने से उच्च रहिम होती है 1 यहाँ ६ का भाग
ने की विशेष रीति है--शेष में २ का गुणा कर राशि के अंश बना कर ६ का भाग
ने से उच्च पल आता है या शेष की राशि को अंश बनाकर २ का भाग देदेनेसेभी
च्च पळ प्राप्त होता है । यहाँ बताई रीति में कुछ भिन्नता है एवं कुछ अधिक
स्कार है।
यहाँ ६ का भाग देना बताया है वह उपरोक्त विशेष रीति से ही देना उचित है या
बके अंश बना कर ३ का भाग देने से काम चल जायगा ।
ग्रहों का रिम फल विचार १४७ Ó—ÚA3+z2cYAO ,. . l lo llleJllJJ.lua.UUUUIDIDLLLliCCU— ा ाौ एक टे ॥ 7,8०० t= nA 3-०?= 1०५, š— °= n> o 2A— S= ४ण Ayo t= nË t-,१ट¬०१= ॥१९०,१९० र, ०९-४६ -}7} &2-४2-०१०५ १&-७४-४७ ४०००» ०६-४- १80 2८/-६९-७१ ०४०९-२० —— — Fnans,oa `x sx ax hx Yx sx ०३१८ २३-६३-६८ $३- "गेट tt—th-e= 8०७४० Ab—bA—At= 2£-2००%८८ भेष t-7h = t t t=. t t = t= t= 22-१६-2०४- 2/-६ ६-४ 8 ४८८ ९ —At-7= 2४३०४ ८०-०५ »/--५८-५०४- ११० “9? १9००) छड = ग्य 0 Wg oO ००1४09 अ: ५ 11 1 २० n १ ० 9
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१४८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
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फल का स्थूल विचार : १५१
मंतांतर--ग्रह की गति के अनुसार भी ररिम में संस्कार करना बताया है--
ग्रह वक्ती आरम्भन्रदिम x २
ग्रह की अंतभागनरक्मि-- किम
ग्रह वक्री मध्यभागरअनुपात से
रह्मि
१० ग्रह इंदरा तिरि
ग्रह बहुत मंद गति-- Ër
ग्रह को शीघ्र a= R — हे -
शीघ्रतर मतिरिह
राजयोग और दरिद्रयोग में रश्मियोग का विशेष संस्कार
राजयोग करनेवाले ग्रह और दरिद्रयीग करनेवाले ग्रह की रदिम को लेकर राजयोग
रदिम से दरिद्र रस्मि घटाना, जो राजयोग ग्रह की रश्मि शोष रहे बही स्पष्ट जानना । इसी
प्रकार शुभ, अशुभ, शत्रू , मित्र आदि ग्रहों या रहिम के सम्बन्ध से उपरोक्त विचार करना ।
इसी प्रकार कई इष्ट बल कष्ट बल में पृथक-पृथक ग्रह रदिम का गुणा कर इष्ट
रश्मि और कष्ट रदिम बनाकर उस पर से शुभाशुभ फल का विचार करते हैं ।
अध्याय ९
फळ का स्थूल विचार
पिछले अध्यायो में फलित विचारने के लिए किन-किन बातों का विचार करना
आवश्यक है यह बताया गया है । रदिमफळ, भावफल, प्रहफळ, दृष्टिफल आदि फल
बिचारने की अनेक बातें आगे बताई जायगीं ।
यहाँ फलित का स्थूल विचार दिया जाता है । जिसको जान लेने से फलित बिचारने
में सहायता मिळती है । यह बात ध्यान रहे कि परिस्थिति वश इस स्थूल में भो परिवर्तन
हो सकता हूँ । š
ग्रहों का मित्र, शत्रू, स्व, उच्च, नीच आदि जिस प्रकार की राशि में है वेसा विचार
कर फल कहना पड़ता है ।
१--भाव में पाप ग्रह हो-पापफल, भाव को हानि, विचारणीय विषय का नाश ।
२--भाव में पाप युक्त या पाप दृष्टनफल हानि ।
३--भाव में पाप ग्रह नीच काउ्सब फल नाश ।
४--भाव में शुभ ग्रहन्र्भावफल की वृद्धि ।
१५२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
५--भाव में मिश्चित ग्रह=मिश्रफल ( अच्छा और बुरा मिला हुआ फल /।
६--पापग्रह यदि मित्रराशि में या उच्च मेंच्शुभ फल ।
७--शुभग्रह यदि शत्रु राशि में, नोचराशि में या अस्त gl=m< फल
s: डी ग्रह नीच या शत्रु गृही पाप युवत या अस्त हो-्हानिकारक है, वुरा फल
1 है ।
९--कोई ग्रह दृष्ट स्थान में. हो था शत्रू गृही या नीच नवांशक में होम्त्अयुभ फल ।
१०--पापग्रह भी मूलत्रिकोण उच्च या मित्रगृही हो तो-भाव शुभ फल देता है,
उस भाव की वृद्धि करता है ।
११--पापग्रह भो जब केन्द्र, त्रिकोण जैसे अच्छे घर में होंच्ञच्छा फल देते हैं ।
१२--पापग्रह भी योगकारक ग्रह (उन्नति करनेवाले ग्रह) से सम्बन्ध हों तो अच्छा
फल देते हैं ।
१३--अच्छे या बुरे भाव किसी ग्रह से युक्त या दृष्ट न हों तो मध्यम फल देते हैं ।
१४--जो भाव शुभग्रह से युक्त या दुष्ट हों या पापग्रह युषत या दुष्ट न हो तो
शुभ फल देते हैँ ।
१५--भाव में नीच या शत्र क्षेत्री या अस्त ग्रह हो तो भाव फल निष्फल ।
१६--मिन्रक्षेत्री स्त्रक्षेत्री या उच्च या मूलत्रिकोण का ग्र हर् # वृद्धि करता ë!
स्त्रक्षेत्री, मित्रक्षेत्री, अधिमित्रक्षेत्री या उच्च का ग्रहन्शुभ दायक है 1
१७--कोई ग्रह स्व या उच्च का हो और उसी समय मित्रग्रह से युक्त या दृष्ट हो
तो घन युक्त राजा सरीखा पद देता है ।
¿—q अपने उच्च या मित्र के नवांश या राशि में शुभग्रह से दृष्ट हो तो शुभ
फल देता है ।
१९--ग्रह उच्च का हो ती इष्टबल देता है, परन्तु परमोच्च हो तो उस भाव का
उत्तम फल देता है, मूलत्रिकोण का उससे मध्यम फल देता है ।
मूलच्रिकोण ग्रह उच्च से अधिकार में कम है परन्तु यह अपने अधिकार में उत्तम
फल देता है उच्च के बराबर ही बलवान् होता ë ।
२०--उच्च, मित्र या बली ग्रह से युक्त या दृष्टग्रहःशुभ होता ë |
२१--स्वक्षेत्री उच्च या शुभवर्ग का ग्रह भाव को पृष्ट करता है !
२२--ग्रह समक्षेत्री हो तो सम फल देता ë ।
२३--स्वक्षेत्री, उच्च, मित्रक्षेत्री ग्रह पडबल में बलवान भी हो तो भी यदि
संधि में हो तो भाव का पूर्ण फल नहीं देता ।
२४--सुयं से उदय ग्रह यदि वक्री होकर निमंल कान्ति हो तो अच्छा फल देता ë ।
जळ तारा ( मंगल, बुघ, गुरु, शुक्र, शनि) यदि वक्री हो तो साधारण
अशुभ
२६--जिन ग्रहों के २ स्वस्थान ë उनमें जो उसका मूलत्रिकोण हो उसका प्रभाव
रहेगा उसी का फल जान पड़ेगा ।
७७ - क
फल का स्थूल विचार : १५३
: २७--ऐसे २ स्थान वाले ग्रह की दशा में उसके दोनों भावों का फल होगा पूर्वा
में दशाकाल में जो क्रम से आता हैं उसका फल रहेगा । इसमें विषम घर में उस ग्रह का
फल पहिले अनुभव होगा 1 सम राशि का बाद में ।
२८--भावेश अपने घर में हो या स्वस्थान पर उसकी दृष्टि हो या उसका स्वस्थान
शुभयुक्त या दृष्ट हो तो उस भाव की वृद्धि करता है । अर्थात् भावेश युक्त या दुष्ट या
शुभयुवत या दुष्ट भाव की वृद्धि होती है।
२९--भावेश स्वस्थानी, उच्च या मूलत्रिकोण का हो तो अच्छा फल देते हैँ अन्यथा
शुभ फल नहीं देते
३०--कोई भाव अपने भावेश से युवत या दुष्ट न हो तो मध्यम फल देते हैँ ।
३१--पाप ग्रह और भावेश के शत्रु से युक्त या दृष्ट ग्रह अनिष्ट फल देता है ।
३२--शुभ भाव के स्वामीयुक्त या दृष्टमाव जो पापयुक्त न हो, शुभ फल
देते हैं ।
३३--पापयुक्त, पाप भाव के स्वामीयुक्त, या पापदृष्ट, नीचगत, अस्तंगत, हीनबल
ग्रह अशुभ फल देते हैं ।
३४--पापयुबत या दृष्ट भाव की हानि होती है । परन्तु ६-८-१२ भाव में विपरीत फल होता हैं ।
३५--भावेश शत्रु गही या नीचराशि में हो, शुभयुबत या दृष्ट न हो तो उस भाव
का नाश होता है ।
३६--भावेश अष्टम में हो या अस्त, नीच या शत्रु गृही हो, कोई शुभयुक्त या
दृष्ट न हो तो उस भाव की हानि होती है । इसमें उस भाव से उस भाव का स्वामी
अष्टम हो या लग्न से अष्टम हो, दोनों प्रकार से विचारना । ,
३७--यदि शुभ ग्रह भी सिवाय भावेश के उपरोषत प्रकार से भाव में हो तो भावफल अच्छा नहीं देता । यदि पापग्रह उपरोवत प्रकार से हो तो उस भाव का फल पूर्ण
नाश हो ।
३८--किसी भाव का स्वामी जिप राशि में है उस राशि का स्वामी दुष्ट स्थान
में हो तो वह भाव दुर्बल हो जाता है ।
३९--भावेश् को छोड़कर अन्य ग्रह कुछ शुभ, कुछ अशुभ हो तो उस भाव का फल
मिश्च होता है ।
४०--भावेश यदि पापग्रह हो तो उससे युक्त या दृष्ट भाव जब वे नीच में या
अस्तंगत या शत्रू गृही न हों तो शुम फल देते हैं ।
४१--भावेश या उसके मित्र या शुभ ग्रह से युक्त व दृष्ट भाव हो तो फल की वृद्धि
होती है । ४२--भावेश पापयुक्त या दृष्ट हो या उसके घर में पापग्रह हो या पापदृष्टि हो
तो बुरा फल होता Š 1 उस माव के फल का हवास होता है।
१५४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
४३--शुभ राशिवाले भाव के स्वामी उन भावों में हों और वे पापयुक्त या दृष्ट
न हों तो उस भाव की वृद्धि होती है ।
४४--कोई ws पापग्रह और शुभ ग्रह दोनों से युक्त या दृष्ट हो या उस भाव
में शुभ और पापग्रह दोनों हों या उनकी दृष्टि हो तो मिश्रफल होगा ।
४५--कोई भावेदा शुभग्रह युक्त या दृष्ट हो या वह भाव शुभयुक्त या दृष्ट होतो
उस भाव का शुभफल होता है ।
४६--किसी भाव में शुभग्रह हो या शुभस्थान के स्वामी से युक्त या दृष्ट यह भाव
हो यदि उस भाव में दुष्टग्रह या दुष्टमावेश युक्त या दृष्टि न हो तो वह भाव अच्छा फल
देता है । यदि वह भाव बुरा धर है तो भी अच्छे ग्रहों के प्रमाव से अच्छा हो जाता है ।
४७--शुभ ग्रह जैसे शुभ या अशुभ स्थान में हो उसके शुभ या अशुभ फल को
बढ़ाते हैं और अशुभ ग्रह अच्छे या बुरे दोनों प्रकार के फलों को घटाते हैँ । इसलिये
शुभग्रह शुभ स्थान मे अतिशुभ और अशुभ ग्रह अशुभ स्थान में हो तो अशुभ फछ को
कम करने के कारण अच्छे होते हैं तथा शुभ घर में बैठकर उसके शुभ प्रभाव को घटाने
के कारण हानिकारक हैं ।
४८--म्रह जिस भाव को देखता है उसके बल को बढ़ाता हुँ । विशेषकर जब किसी
भाव का स्वामी होकर उस भाव पर दृष्टि डाळे तो उत्तम हे ।
४९--कोई भावेश अपने मिन्रस्थान, स्वगृह, मूलत्रिकोण या उच्च में हो तो अच्छा
फल देता है । यदि शत्रु स्थान या नीचगृही हो तो बुरा फल देता ë!
५०--भावेश उच्च स्थान में हो और नवांश में नोच स्थान में भा जावे तो उस
भाव का फल लाभजनक नहीं होगा । यह शीघ्र नीच फल देता है ।
५१--किसी भाव का स्वामी नीच में हो परन्तु नवांश में उच्च का हो जाये तो
उस भाव का फल अच्छा होगा ।
५२--प्रह केन्द्र, त्रिकोण व लाभ में वली होकर शुभ फल देते हैं ।
५३--शुभ ग्रह केन्द्र, त्रिकोण और लग्न में आयु बढ़ाते हैं ।
५४-केन्द्र और त्रिकोण के स्वामियों से शुभ सम्बन्ध करने वाला ग्रह शुभ
होता है ।
५५--ग्रह जो ३, ६, ११, २, ७, ८ भाव के स्वामी न हों शुभ होते हैं 1
५६--प्रह जो १, ४, १०, ११ भाव में हो और जिसे हषंबल प्राप्त हुआ हो शुभ
होता है।
५७--भावेश अस्तंगत या नीच का हो तो केन्द्र, त्रिकोण में रहने पर भी शुभ फल
नहीं देता परन्तु अडचन और कष्ट के उपरांत फल देता है ।
५८--भावेश अनिष्टकारी होने पर भावस्थित ग्रह उतना उपकारी नहीं होता क्यों -
कि भावस्थित ग्रह तो उसका किरायेदार के समान है असलो उस भाव का मालिक तो
भावेश ही है । इससे भाव में वैसा शुभग्रह उस भाव को बाहरी चमक अवश्य देता है;