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सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

१४२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

आगे ग्रहों को रश्मि का फल दिया है

१ से ४ तक रब्मि--बहुत दुःख पावे, कुल से होन, पतित, दुष्ट, दरिद्री, नीच

कुल से स्नेह करने वाला, उत्तम कुल में भी पैदा हो तो नोच को चाकरी करे, दारिद्रय

से दुःखी रहे ।

५ से १० तक रह्िम--प्राणियों में अतिहीन, परदेश जाने में मन रखने वाला, भाग्य

से हीन, सदा मलिन, क्लेश युक्त, ऐश्‍वर्य हीन, निरन्तर दूसरों के पालन करने ने

दुःखी, निधन, भारवाहक, स्त्री-पुत्रादि से हीन, ऐसा कर्म करे जिससे वंश कुल की

हानि हो ।

१० से १५ तक--प्रधान तथा पूजनीय जनों में भक्ति रखने वाला, उत्तम सुख

भोगने वाला, अपने कुल के अनुकूल, अल्प धन, घर्म युक्त सुन्दर वेष ।

११ रदिम--अल्प पुत्रवान्‌, स्वल्प धन, स्वल्प कुटुम्ब का भी पालन कष्टमय हो ।

१२ रश्मि--स्वल्पघन, मूर्ख, धूर्त, सत्यहीन निर्धन ।

१३ रश्मि--चोर, निर्धन ।

१४ रहिम-घनी, कुटुम्व पालक, विद्वान, कुलोचित कार्यकर्ता, धर्मी, क्रोध रहित,

द्रव्य उपाजंन करने में तत्पर ।

१५ रङ्मि--वंश से सुख हो, घनी हो, सव विद्या, गुण और धन से युक्त, कुल में

श्रेष्ठ ।

१५ से २० रश्मि--कुल श्रेष्ठ, घनी, सदा स्वजनों से युक्त, अल्पशील, धीर,

उत्तम कीति, उत्तम कलाओं में चतुर, अच्छा स्वभाव, थोड़ा द्रव्य, हो, धमं करे, सम्ब￾न्थियों से पूर्ण, बहुत सेवक, बहुत कुटुम्ब ।

१६ रदिम--कुल श्रेष्ठ ।

१७ रदिम--बहुत नौकरों वाला 1

१८ रक्ष्म--बहुत कुटुम्ब वाला ।

१९ रश्मि--बिख्याठ कीति ।

२० रस्मि--स्वजनों से परिपूर्ण ।

२० से २५ रह्मि-सवंत्र पूज्य सौंदयं युक्त, धैयंवान्‌, विद्वान्‌, वीर, सब काम

करने में चतुर, भाग्यवान्‌, पंडित, शीऊवान्‌, धन सुख, मित्रों को सुख देनेवाला, राजा

से मान, सम्पत्ति थोड़ी हो ।

२१ रश्मि--पचास मनुष्यों का पालक, दानशील, दयावंत ।

२२ रश्मि--लोभी, घनवात्‌, शत्र हीन, समर्थ, अल्पगुणो, दयाळू, दान शील 1

२३ रव्मि--विद्याहीन हो तब भी सब जगह प्रधानता हो, धनवान्‌, सुखी,

सुशील ।

२४ से ३० रश्मि--लक्ष्मीवान्‌, बलवान्‌, राजप्रिय, प्रतापी, घनवान्‌, बहुत जनों

से युक्त, तेजस्वी, राजा से धन और सुख प्राप्त, राजमन्त्री, मनुष्यों में पुज्य सेनापति ।

ग्रहों का रश्मि फल विचार : १४३

३० से अधिक रदिम--कारबारा, मुख्य मालिक हो, गाँव खेती आदि हो ।

३१ रदिम--अति विख्यात, पृथ्वी का भोगनेवाला, चतुर, राजा के तुल्य, सेनापति

प्रधान पद ।

३२ रहिम--५०० ग्रामों का अधिपति, अनेक ग्राम पर्वतों का स्वामी, अनेक नगरों

का बसाने वाला या १०० ग्रामों का अधिपति ।

३३ रदिम--१००० से अधिक ग्रामों का अधिपति ।

३३-३४--रदिम--हजार ग्रामों का स्वामी या कोई ३००० का स्वामी ।

३४ रश्मि--३००० से अधिक ग्रामों का अधिपति ।

३२ से ३५ रश्मि-५०० से १००० मनुष्यों का पोषक ।

३५ रश्मि-अनेक कोषों से सम्पन्न, बड़ा पराक्रमी, लोगों में विख्यात यश, सौंदर्य

युक्त) मंडल का स्वामी, विजय युक्‍त, निमंल शोल, विलास युक्त 1

३६ रदिम--एक लाख गाँवों का नियंत्रण करने वाला, डेढ़ लाख ग्रामों का स्वामी,

या २५ गाँव का अधिपति ।

३६-३७ रदिम--१॥ लाख गाँवों का अधिपति बड़ा प्रतापी, शत्रुहंता ।

३७ रहिम--३ लाख गाँवों का स्वामी या अन्य मत से २६ गाँव का अधिपति ।

३१ से ४० रदहिम--क्रम से १०० से १००० मनुष्यों का पोषक समान ।

३८ रदिम--७ लाख गाँवों का स्वामी अन्य मत से ४ लाख गाँवों का - स्वामी या

२७ गाँव का अधिपति, बड़ा पराक्रमी, इन्द्र के समान सम्पत्ति वाला ।

३९ रश्मि--सम्पूर्ण जनों को सन्तुष्ट करने वाला, पृथ्वी का पति, बड़ा प्रतापी

राजा, तेजस्वी, विख्यात कीति, कठिन घर्मेवाला, शत्रू, नाशक, ३० ग्राम का अधिपति ।

४० रद्दिम--बड़ा प्रतापी राजा, सेवा, वाहन से परिपूर्ण, विजय यात्रा हो । ३६

गाँव का अधिपति, राजाओं को जीतने वाला । अन्यमत से १०० गाँव हों। |

४१ रब्मि--सूर्य तुल्य तेजस्वी, समुद्र-मण्डला भूमि का पालनकर्ता, समुद्र पर्यन्त

विख्यात कीति, राजा निश्‍चय होता है । एक देश का राज्य करे 1

४२ रव्मि-दो समुद्रों तक की पृथ्वी का राजा, दो देशों का राज्य करे 1

४२-४३ रदिम--शत्रु हंता, अतुल वीर्य, चारों समुद्र तक पृथ्वी का पालन कर्ता

बड़ा यश ।

४३ रङ्मि--तीन समुद्र तक पृथ्वी का राजा या रे देश का राज करे ।

४४ रहिम -चक्रवर्ती राजा, अति सोख्य, देव ब्राह्मण का भक्त दीर्घायु, सेना,

बाहन, आदि युक्त सम्राट्‌ अन्यमत से ४ देशों का राज्य करे । ;

४५ रश्मि--द्वीपान्तरों में पालन कर्ता, सब में पुज्य, महाबली, सौभाग्य सस्पन्त

बडा प्रतापी । ५ देशों का राज्य करे, । š

४५ रदिम के ऊपर--द्वोपान्तरों में उसका यश गाया जावे, देवताओं से मी अजेय | |

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१४४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

४६ रदिमि-सार्वेभौम राजा हो, सब नृपों पर उसकी आज्ञा चले, ६ देशका

सज्य करे ।

४७ रश्मि--समस्त भूलोक के भार को सहने वाळा, शत्रुहंता, इन्द्र के तुल्य, सब

छोकों में यश, चक्रवर्ती, ७ देशों का राज्य करे ।

४७ से ५० तक रश्मि--राजा हो ।

४८ से ५० तक रष्मि-सार्वभौम राजा हो !

५० से ऊपर रङ्मि- इन्द्र तुल्य हो, भूप कुलात्मक चक्रवर्ती राजा होता है, वैश्य

कुलोत्पन्न राजा होता हैं, शुद्र कुलोत्पन्न घनवान्‌, विप्र कुलोत्पन्न विद्वान्‌, यज्ञ आदि कर्म

करने वाला हो ।

५१ रिम के ऊपर--चक्रवर्ती राजा (सम्राट) होता ë ।

रदिमि (किरण) रहित ग्रह--होने से उसी प्रकार विपरीत फल होता है। जिस

समय ग्रहों की अन्तिम अवस्था हो तो किरणों का क्षय ओर प्रथम अवस्थाएं हो तो

किरणों की वृद्धि होती हे ।

विशेष विचार-उच्चाभिमुख. ( नीच से उच्च को भोर जाने वाला ) ग्रहों के

किरण अनुसार पूर्ण फल होता है । |

नीचाभिमुख ( उच्च से नीच की ओर जानेवाला ) ग्रहों की किरण अनुसार फल से

न्यून फल होता है ।

सब ग्रहों का शुभ या अशुभ फल रश्मि संख्या के अनुसार ही होता है । बिना रिम

ज्ञान से वास्तविक फल समझ में नहीं आता । इसलिए रश्मि ज्ञान करने के उपरान्त फळ

का विचार करें ।

रहिम से संतान विचार

३३ ररिम = १० संतान ४२ रदिमि 5२१ संतान

WoT ERR ४३ =२४

३५ 3 =१५ ” xx ” =२५ शा

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RO इससे अधिक रश्मि=इससे अधिक संतान

हो ऐसा ( वृ. पारा. का ) मत है ।

ग्रहों का रश्मि फल विचार : १४५

उच्च रदिम का फल _

सप्त बल से जो अधिक बलवान्‌ हो उपे उच्च रश्मि का फल ।

(१) स्थान बल में अधिक हो = देश में मुख्य हो । |

(२) दिग त क्र = विजयी

(३) चेष्टा ,, न = प्रभुताई

(४)काल ,, » = सवं काल में कुशल ।

(५) अयन बल 1 = सवं काल आनन्द ।

(६) उच्च बल > = वंश में मुख्य ।

(७) नैसगिक बल = =स्वजाति घमं का विशेष प्रतिपादन ।

रश्मि का विशेष फल

(१) पशु पालन संख्या-उच्च <fšq और चेष्टा का योग कर उसका आधा करे इसे

पुर्व प्राप्त योग में गुणा कर ६० का भाग देना जो लब्धि आये वह संख्या, नर, अश्व,

गज, गौ आदिं पोष्य वर्ग जानने, अर्थात्‌ इतने जीवों का वह पालन करेगा ।

(२) राजयोग में रश्मि का विचार--पहिके रदिमयोग का फल कहा है 1 आगे राज￾योग का फल भी बताया गया है । परन्तु राजयोग में रदिमियोग के फल का भी विचार

करना तब ही उस का यथार्थ फल प्रगट होगा ।

(३) भाव फल में रश्मि विचार--आगे जो भाव फल बताये गये Q उन का शुभा-

शुभ विचारने में रदिम का भी फल विचारना । रश्मि फल के अनुपात से शुभाशुभ फल

अधिक या अल्प होगा । रहिम फल को जोड़ या घटा कर निर्माण करना ।

(४) राजयोग में ररि का और विचार--जो आगे राजयोग के फळ वताये हँ

ब्राह्मण के हों और उत्तम रश्मि योग हो तो वह यज्ञ कर्मादि निष्ठ हो जिसके पुष्य प्रताप

से स्वर्ग प्राप्त करे ।

रदिम साधन

पिछले गणित खंड में उच्च रहमि और चेष्टा रदिम साधन करना बताया है यहां

रश्मि साधन में कुछ भिन्नता है । वृहत्पाराशरी में इस प्रकार रश्मि साधन करना

बताया है-

( ग्रह स्पष्ट-ग्रह नीच ) शेष ६ से अधिक हो तो षड़भाल्प करने को १२ राशि से

घटा कर जो शेष बचे वह लेना ।

इस से शेप में उम ग्रह के श्रुवांक से गुणा कर ६ का भाग देने से लब्धि रहिम प्राप्त

होती है । ग्रहों के ध्रूवांक ये हैँ

ग्रह सूर्य चन्द्र मङ्गल | बुध | गुरु | शुक्र | दानि

ह| १० | ९ ५ ५ | ५ ८ | ५

यहां बताये ध्रुवांक से परमोच्च की ददिम प्राप्त होती है । मध्य की रदिम अनुपात

से निकाल लेना ।

१०

१४६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय-फलित खण्ड

विशेष संस्कार

यदि ग्रह उच्च में हो तो उक्त विधि से प्राप्त रश्मि संख्या > रे

82 मूल त्रिकोण 77 21 ”> x २

” स्वराशि ”> ”> ” x š

” अधिमित्र 5 x १. xš

” मित्र रु z र? अ.

” शत्रु ” ” 12 x 3

” अधिषात्रु टर पि ” xš

” समगृही ws ” > पुवे प्राप्त रश्मि ही

इस प्रकार सब ग्रहों की रश्मि निकाल कर सब को योग करना 1 जिस प्रकार ग्रहों

में रदिम निकाली गई है उसी प्रकार षड़वर्ग से भी रश्मि निकाली जाती है ।

होरा, नवांश, त्रिंशांश, द्वादशांश आदि से भी रश्मि निकालने के पूर्व प्राप्त रश्मि

में षड्वर्ग के अनुसार मैत्री का विचार कर देखना कि यह वगंस्वामी पंचघा मैत्री में सूर्य

आदि ग्रह (जिसकी रदिम प्राप्त हुई है) उसकी मित्र शत्रु या सम आदि है । उस मैत्री के

अनुसार पूर्वे प्राप्त रद्म में विशेष संस्कार करना पड़ता है तब उस वगग की प्रत्येक ग्रह

की रषिम जानी जाती ë ।

क्षेशवीय जातक में उच्च रदिमिसाधन कुछ भिन्न प्रकार से इस प्रकार बताया ë —

( ग्रह स्पष्ट-नौच ) = शेष से अधिक हो तो षड़भाल्प कर ग्रहण करना अर्थात्‌ १२

गशि से घटाकर ग्रहण करना । पदचात्‌ ६ का भाग देना तब उच्च पल कलादि में प्राप्त

तेता है । इसमें ६ गुणा कर १ अंश जोड्ने से उच्च रहिम होती है 1 यहाँ ६ का भाग

ने की विशेष रीति है--शेष में २ का गुणा कर राशि के अंश बना कर ६ का भाग

ने से उच्च पल आता है या शेष की राशि को अंश बनाकर २ का भाग देदेनेसेभी

च्च पळ प्राप्त होता है । यहाँ बताई रीति में कुछ भिन्नता है एवं कुछ अधिक

स्कार है।

यहाँ ६ का भाग देना बताया है वह उपरोक्त विशेष रीति से ही देना उचित है या

बके अंश बना कर ३ का भाग देने से काम चल जायगा ।

ग्रहों का रिम फल विचार १४७ Ó—ÚA3+z2cYAO ,. . l lo llleJllJJ.lua.UUUUIDIDLLLliCCU— ा ाौ एक टे ॥ 7,8०० t= nA 3-०?= 1०५, š— °= n> o 2A— S= ४ण Ayo t= nË t-,१ट¬०१= ॥१९०,१९० र, ०९-४६ -}7} &2-४2-०१०५ १&-७४-४७ ४०००» ०६-४- १80 2८/-६९-७१ ०४०९-२० —— — Fnans,oa `x sx ax hx Yx sx ०३१८ २३-६३-६८ $३- "गेट tt—th-e= 8०७४० Ab—bA—At= 2£-2००%८८ भेष t-7h = t t t=. t t = t= t= 22-१६-2०४- 2/-६ ६-४ 8 ४८८ ९ —At-7= 2४३०४ ८०-०५ »/--५८-५०४- ११० “9? १9००) छड = ग्य 0 Wg oO ००1४09 अ: ५ 11 1 २० n १ ० 9

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१४८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

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फल का स्थूल विचार : १५१

मंतांतर--ग्रह की गति के अनुसार भी ररिम में संस्कार करना बताया है--

ग्रह वक्ती आरम्भन्रदिम x २

ग्रह की अंतभागनरक्मि-- किम

ग्रह वक्री मध्यभागरअनुपात से

रह्मि

१० ग्रह इंदरा तिरि

ग्रह बहुत मंद गति-- Ër

ग्रह को शीघ्र a= R — हे -

शीघ्रतर मतिरिह

राजयोग और दरिद्रयोग में रश्मियोग का विशेष संस्कार

राजयोग करनेवाले ग्रह और दरिद्रयीग करनेवाले ग्रह की रदिम को लेकर राजयोग

रदिम से दरिद्र रस्मि घटाना, जो राजयोग ग्रह की रश्मि शोष रहे बही स्पष्ट जानना । इसी

प्रकार शुभ, अशुभ, शत्रू , मित्र आदि ग्रहों या रहिम के सम्बन्ध से उपरोक्त विचार करना ।

इसी प्रकार कई इष्ट बल कष्ट बल में पृथक-पृथक ग्रह रदिम का गुणा कर इष्ट

रश्मि और कष्ट रदिम बनाकर उस पर से शुभाशुभ फल का विचार करते हैं ।

अध्याय ९

फळ का स्थूल विचार

पिछले अध्यायो में फलित विचारने के लिए किन-किन बातों का विचार करना

आवश्यक है यह बताया गया है । रदिमफळ, भावफल, प्रहफळ, दृष्टिफल आदि फल

बिचारने की अनेक बातें आगे बताई जायगीं ।

यहाँ फलित का स्थूल विचार दिया जाता है । जिसको जान लेने से फलित बिचारने

में सहायता मिळती है । यह बात ध्यान रहे कि परिस्थिति वश इस स्थूल में भो परिवर्तन

हो सकता हूँ । š

ग्रहों का मित्र, शत्रू, स्व, उच्च, नीच आदि जिस प्रकार की राशि में है वेसा विचार

कर फल कहना पड़ता है ।

१--भाव में पाप ग्रह हो-पापफल, भाव को हानि, विचारणीय विषय का नाश ।

२--भाव में पाप युक्त या पाप दृष्टनफल हानि ।

३--भाव में पाप ग्रह नीच काउ्सब फल नाश ।

४--भाव में शुभ ग्रहन्र्भावफल की वृद्धि ।

१५२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

५--भाव में मिश्चित ग्रह=मिश्रफल ( अच्छा और बुरा मिला हुआ फल /।

६--पापग्रह यदि मित्रराशि में या उच्च मेंच्शुभ फल ।

७--शुभग्रह यदि शत्रु राशि में, नोचराशि में या अस्त gl=m< फल

s: डी ग्रह नीच या शत्रु गृही पाप युवत या अस्त हो-्हानिकारक है, वुरा फल

1 है ।

९--कोई ग्रह दृष्ट स्थान में. हो था शत्रू गृही या नीच नवांशक में होम्त्अयुभ फल ।

१०--पापग्रह भी मूलत्रिकोण उच्च या मित्रगृही हो तो-भाव शुभ फल देता है,

उस भाव की वृद्धि करता है ।

११--पापग्रह भो जब केन्द्र, त्रिकोण जैसे अच्छे घर में होंच्ञच्छा फल देते हैं ।

१२--पापग्रह भी योगकारक ग्रह (उन्नति करनेवाले ग्रह) से सम्बन्ध हों तो अच्छा

फल देते हैं ।

१३--अच्छे या बुरे भाव किसी ग्रह से युक्‍त या दृष्ट न हों तो मध्यम फल देते हैं ।

१४--जो भाव शुभग्रह से युक्त या दुष्ट हों या पापग्रह युषत या दुष्ट न हो तो

शुभ फल देते हैँ ।

१५--भाव में नीच या शत्र क्षेत्री या अस्त ग्रह हो तो भाव फल निष्फल ।

१६--मिन्रक्षेत्री स्त्रक्षेत्री या उच्च या मूलत्रिकोण का ग्र हर्‌ # वृद्धि करता ë!

स्त्रक्षेत्री, मित्रक्षेत्री, अधिमित्रक्षेत्री या उच्च का ग्रहन्शुभ दायक है 1

१७--कोई ग्रह स्व या उच्च का हो और उसी समय मित्रग्रह से युक्त या दृष्ट हो

तो घन युक्त राजा सरीखा पद देता है ।

¿—q अपने उच्च या मित्र के नवांश या राशि में शुभग्रह से दृष्ट हो तो शुभ

फल देता है ।

१९--ग्रह उच्च का हो ती इष्टबल देता है, परन्तु परमोच्च हो तो उस भाव का

उत्तम फल देता है, मूलत्रिकोण का उससे मध्यम फल देता है ।

मूलच्रिकोण ग्रह उच्च से अधिकार में कम है परन्तु यह अपने अधिकार में उत्तम

फल देता है उच्च के बराबर ही बलवान्‌ होता ë ।

२०--उच्च, मित्र या बली ग्रह से युक्त या दृष्टग्रहःशुभ होता ë |

२१--स्वक्षेत्री उच्च या शुभवर्ग का ग्रह भाव को पृष्ट करता है !

२२--ग्रह समक्षेत्री हो तो सम फल देता ë ।

२३--स्वक्षेत्री, उच्च, मित्रक्षेत्री ग्रह पडबल में बलवान भी हो तो भी यदि

संधि में हो तो भाव का पूर्ण फल नहीं देता ।

२४--सुयं से उदय ग्रह यदि वक्री होकर निमंल कान्ति हो तो अच्छा फल देता ë ।

जळ तारा ( मंगल, बुघ, गुरु, शुक्र, शनि) यदि वक्री हो तो साधारण

अशुभ

२६--जिन ग्रहों के २ स्वस्थान ë उनमें जो उसका मूलत्रिकोण हो उसका प्रभाव

रहेगा उसी का फल जान पड़ेगा ।

७७ - क

फल का स्थूल विचार : १५३

: २७--ऐसे २ स्थान वाले ग्रह की दशा में उसके दोनों भावों का फल होगा पूर्वा

में दशाकाल में जो क्रम से आता हैं उसका फल रहेगा । इसमें विषम घर में उस ग्रह का

फल पहिले अनुभव होगा 1 सम राशि का बाद में ।

२८--भावेश अपने घर में हो या स्वस्थान पर उसकी दृष्टि हो या उसका स्वस्थान

शुभयुक्त या दृष्ट हो तो उस भाव की वृद्धि करता है । अर्थात्‌ भावेश युक्‍त या दुष्ट या

शुभयुवत या दुष्ट भाव की वृद्धि होती है।

२९--भावेश स्वस्थानी, उच्च या मूलत्रिकोण का हो तो अच्छा फल देते हैँ अन्यथा

शुभ फल नहीं देते

३०--कोई भाव अपने भावेश से युवत या दुष्ट न हो तो मध्यम फल देते हैँ ।

३१--पाप ग्रह और भावेश के शत्रु से युक्त या दृष्ट ग्रह अनिष्ट फल देता है ।

३२--शुभ भाव के स्वामीयुक्त या दृष्टमाव जो पापयुक्त न हो, शुभ फल

देते हैं ।

३३--पापयुक्त, पाप भाव के स्वामीयुक्त, या पापदृष्ट, नीचगत, अस्तंगत, हीनबल

ग्रह अशुभ फल देते हैं ।

३४--पापयुबत या दृष्ट भाव की हानि होती है । परन्तु ६-८-१२ भाव में विप￾रीत फल होता हैं ।

३५--भावेश शत्रु गही या नीचराशि में हो, शुभयुबत या दृष्ट न हो तो उस भाव

का नाश होता है ।

३६--भावेश अष्टम में हो या अस्त, नीच या शत्रु गृही हो, कोई शुभयुक्‍त या

दृष्ट न हो तो उस भाव की हानि होती है । इसमें उस भाव से उस भाव का स्वामी

अष्टम हो या लग्न से अष्टम हो, दोनों प्रकार से विचारना । ,

३७--यदि शुभ ग्रह भी सिवाय भावेश के उपरोषत प्रकार से भाव में हो तो भाव￾फल अच्छा नहीं देता । यदि पापग्रह उपरोवत प्रकार से हो तो उस भाव का फल पूर्ण

नाश हो ।

३८--किसी भाव का स्वामी जिप राशि में है उस राशि का स्वामी दुष्ट स्थान

में हो तो वह भाव दुर्बल हो जाता है ।

३९--भावेश्‌ को छोड़कर अन्य ग्रह कुछ शुभ, कुछ अशुभ हो तो उस भाव का फल

मिश्च होता है ।

४०--भावेश यदि पापग्रह हो तो उससे युक्त या दृष्ट भाव जब वे नीच में या

अस्तंगत या शत्रू गृही न हों तो शुम फल देते हैं ।

४१--भावेश या उसके मित्र या शुभ ग्रह से युक्त व दृष्ट भाव हो तो फल की वृद्धि

होती है । ४२--भावेश पापयुक्त या दृष्ट हो या उसके घर में पापग्रह हो या पापदृष्टि हो

तो बुरा फल होता Š 1 उस माव के फल का हवास होता है।

१५४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

४३--शुभ राशिवाले भाव के स्वामी उन भावों में हों और वे पापयुक्त या दृष्ट

न हों तो उस भाव की वृद्धि होती है ।

४४--कोई ws पापग्रह और शुभ ग्रह दोनों से युक्त या दृष्ट हो या उस भाव

में शुभ और पापग्रह दोनों हों या उनकी दृष्टि हो तो मिश्रफल होगा ।

४५--कोई भावेदा शुभग्रह युक्त या दृष्ट हो या वह भाव शुभयुक्त या दृष्ट होतो

उस भाव का शुभफल होता है ।

४६--किसी भाव में शुभग्रह हो या शुभस्थान के स्वामी से युक्त या दृष्ट यह भाव

हो यदि उस भाव में दुष्टग्रह या दुष्टमावेश युक्त या दृष्टि न हो तो वह भाव अच्छा फल

देता है । यदि वह भाव बुरा धर है तो भी अच्छे ग्रहों के प्रमाव से अच्छा हो जाता है ।

४७--शुभ ग्रह जैसे शुभ या अशुभ स्थान में हो उसके शुभ या अशुभ फल को

बढ़ाते हैं और अशुभ ग्रह अच्छे या बुरे दोनों प्रकार के फलों को घटाते हैँ । इसलिये

शुभग्रह शुभ स्थान मे अतिशुभ और अशुभ ग्रह अशुभ स्थान में हो तो अशुभ फछ को

कम करने के कारण अच्छे होते हैं तथा शुभ घर में बैठकर उसके शुभ प्रभाव को घटाने

के कारण हानिकारक हैं ।

४८--म्रह जिस भाव को देखता है उसके बल को बढ़ाता हुँ । विशेषकर जब किसी

भाव का स्वामी होकर उस भाव पर दृष्टि डाळे तो उत्तम हे ।

४९--कोई भावेश अपने मिन्रस्थान, स्वगृह, मूलत्रिकोण या उच्च में हो तो अच्छा

फल देता है । यदि शत्रु स्थान या नीचगृही हो तो बुरा फल देता ë!

५०--भावेश उच्च स्थान में हो और नवांश में नोच स्थान में भा जावे तो उस

भाव का फल लाभजनक नहीं होगा । यह शीघ्र नीच फल देता है ।

५१--किसी भाव का स्वामी नीच में हो परन्तु नवांश में उच्च का हो जाये तो

उस भाव का फल अच्छा होगा ।

५२--प्रह केन्द्र, त्रिकोण व लाभ में वली होकर शुभ फल देते हैं ।

५३--शुभ ग्रह केन्द्र, त्रिकोण और लग्न में आयु बढ़ाते हैं ।

५४-केन्द्र और त्रिकोण के स्वामियों से शुभ सम्बन्ध करने वाला ग्रह शुभ

होता है ।

५५--ग्रह जो ३, ६, ११, २, ७, ८ भाव के स्वामी न हों शुभ होते हैं 1

५६--प्रह जो १, ४, १०, ११ भाव में हो और जिसे हषंबल प्राप्त हुआ हो शुभ

होता है।

५७--भावेश अस्तंगत या नीच का हो तो केन्द्र, त्रिकोण में रहने पर भी शुभ फल

नहीं देता परन्तु अडचन और कष्ट के उपरांत फल देता है ।

५८--भावेश अनिष्टकारी होने पर भावस्थित ग्रह उतना उपकारी नहीं होता क्‍यों -

कि भावस्थित ग्रह तो उसका किरायेदार के समान है असलो उस भाव का मालिक तो

भावेश ही है । इससे भाव में वैसा शुभग्रह उस भाव को बाहरी चमक अवश्य देता है;

फल का स्थूल विचार : १५५

परन्तु भावेश बुरा होने पर उत्पन्न सच्चे फल की प्राप्ति म॑ अडचन होतो है । इससे

पहिले भावेश से फल का विचार करना ।

५९--भावेश ओर भाव बलरहित हो और उस भाव का कारक पापग्रह के बीच में

हो या पापयुक्त या पापदृष्ट हो या शत्रुग्रह युक्त या दृष्ट हो तो उस भाव का फल नाश

'हो जाता है, दूसरे प्रकार से नहीं ।

६००-कोई भाव जहाँ लग्नेश हो उस भाव को उन्नति होती है ।

६१--भावेश लग्न से केन्द्र त्रिकोण या लाभ में हो या किसी भाव से उस भाव का

भावेश १-५-९-११ स्थान में हो तो उस भाव की वृद्धि होती है ।

६२--भावेश उच्चादि वर्ग में प्राप्त होकर बलवान्‌ हो तो उस भाव की पुष्टि

होती है ।

३--छग्न आदि प्रत्येक भाव से विचार करना कि उस भाव से त्रिकोण या

४-७-१० घर मे शुभग्रह या उसका स्वामी हो और वहाँ पापग्रह का योग या दृष्टि न हो

तो उस भाव का सब फल शुभ होता है या भाव पुष्ट होता ë । यदि ऐसा न हो तो उन￾उन भावों का नाश समझना । मिश्रग्रह युक्त हो तो मिश्रफल होता ë ।

६४--किसी भावेश के साथ नवमेश हो तो लाभजनक है ।

६५--कोई भावेश शुभग्रह हो और छरन से तीसरे घर में हो तो साधारण फल

देता है ।

६६--कोई भावेश जहाँ हो उस भाव का स्वामी दुष्टस्थान में हो तो मूलभाव को

निर्बल करता Š । यदि वह उच्च, मित्रराशि या स्वराष्षि में हो तो उस भाव की पुष्टि

करता है ।

६७--जिस भाव से ११, २, ३, स्थान में गत उस भावेश के मित्र या उसके

उच्चस्थान के स्वामी हों और वे ग्रह अस्त, शत्रुगृही या नीच गत न हों तो उस भावको

पुष्ट और बलवान्‌ करते हैं 1

६८--जो भावेश अपने अंश के बराबर होकर जिस भाव में हो उप्त भाव का पूर्ण

फल देता है ! भाव से अल्प या अधिक ग्रह का अंश हो तो अनुपात से उसके फल का

अनुमान करना । -

६९--भावेश से ग्रहों के पापस्य और शुभत्व में अन्तर इस प्रकार पड़ जाता है—

(अ) केन्द्रेश-पाप ग्रह हो = शुभ फल देता ë

शुभ ग्रह हो = अशुभ फल देता हैं

(ब) त्रिकोणेश--चाहे पाप या शुभ ग्रह हो = सदा शुभ ।

(म) केन्द्र में उत्तरोत्तर १-४७-१० भाव क्रम से वली होते हैँ । अर्थात्‌

लग्नेश और चतुर्थेश पापग्रह हों तो लग्नेश की अपेक्षा चतुथंश शुभ फल

देने में अधिक समर्थं होगा और दशमेश पाप ग्रह हो तो सबसे उत्तम

फल देगा । इसी प्रकार लग्नेश और चतुर्थेश शुभग्रह होतो लग्न की

१५६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड

अपेक्षा चतुर्थेश पापफल देने में अधिक बलवान्‌ होगा । दशमेश यदि शुभ￾ग्रह हो तो सब से अधिक हानिकारक होगा । दशमेश से कम सप्तमेश

उससे कम चतुर्थेश उससे कम लग्नेश शुभग्रह होने पर हानिकारक होंगे ।

(द) त्रिकोण में पंचमेश से नवमेश बरी हैं । _

७०-लग्न से ५, ९, ४, ७ वां स्थान शुभयुक्त या दुष्ट हो, पापयुक्त या दृष्ट न हो

तो पूर्ण शुभ, यदि पापग्रहों का योग व दृष्टि हो तो भाव के शुभ फल का ह्लास हो जाता

है । शुभ पाप दोनों प्रकार के ग्रहों के योग व दृष्टि से मिश्रफल होता है ।

७१--किसी भाव से त्रिकोण ( ५-९ ) और २, ४, ७, १० भावों में शुभग्रह

हो और पाप दृष्टि न हो या भावेशयुक्त हो, पापयुक्त न हो तो बह भाव पुष्ट होता है ।

इसके विरुद्ध होने से भावफल नाश होते हैं, मिश्रग्रह होने से भावफल मिश्चित होता है ।

७२--ग्रह एक दूसरे से -६-८-१२ घर में हो तो बुरे होते हैं। कुछ हद तक

बुरा प्रभाव डालते हैं ।

७३--३, ६, ८, १२ भाव के स्वामी जिस भाव के साथ हों बुरे होते हैं ५, ९,

भाव के स्वामी अच्छे होते हैं ।

७४--४, ९, ११, २ भाव के स्वामी लग्न के सम्बन्धी हों और अधिक बलवाले

हों तो भाग्योदय करते हैं, कार्य सिद्ध होता है । ये भावेश बलवान और लग्न से सम्बद्ध

हों तब पूर्ण फल देते हैं। यदि निवळ हों तो दुःख देत हैं । मिश्रित हों तो मिश्रफल

देते हँ । इनका भाव कारक ग्रह, भावेश और भावगत ग्रह निर्बल हो तो विशेष कष्ट￾दायक होते हैं । ;

७५--भावेश त्रिकोण या स्वस्थानी या ४, ७, १० घर में शुभयुक्त हो, पापग्रह

की दृष्टि न हो, नवम घर के स्वामी से युक्त हो और पापयुक्त न हो तो उस भाव की

उन्नति होती है ।

७६--जो ग्रह लग्न को देखे वह सुख और घन देता है ।

७७--भाव में शुभ ग्रह का पड्वर्ग शुभ होता है। पापग्रह का षड्वर्ग अशुभ

होता है ।

७८--पडवर्ग में बली ग्रह अर्थात्‌ स्वक्षेत्री या अपने मित्र के द्रेष्काण, नवांश, त्र्यंश

आदि में स्थित ग्रह शुभ होता है 1

७९--षडवगं में निबंल ग्रह अर्थात शत्रुक्षेत्री आदि ग्रह अशुभ होते हैं ।

८०--पंचम घर में कको लग्न के नवांश या द्वादशांश में जो ग्रह हो वह शुभ फळ

` देताहे।

८१--नवम घर में जो राशि हो उसके नवांश या ढादशांश में जो ग्रह हो वह यदि

गुरु के द्रेष्काण में हो तो उसकी दशा शुभ होती है ।

८२-चतुर्थं भाव के नवांश या द्वादशांश में जो ग्रह अपने या चोथे लात के

द्रेष्काण में हो उसकी दशा में शुभ फल होता है ।

`

फल का स्थूल विचार : १५७

८३--ग्रह जिस भाव पें है उसका अधिकार सप्तवर्ग में जो है उस भाव के अधिकार प्रमाण अच्छा या वुरा पुर्ण फळ देते हैं ।

८ “--भावेश अपने भावस्थान में हो और वही कारक हो तो अच्छा फल देता हँ । ८५ कोई भावेश और उसका कारक भी बली हो तो अच्छा फल देगा ।

लग्नेश विचार

१--जिस भाव में लग्नेश हो उस भाव के फल को वृद्धि होती है ।यदि वह भाव या उसका भावेश बली हो तो भावफल अच्छा देगा । बलहीन हो तो दुःख देगा ।

२--परन्तु लग्नेश जिस भाव में अष्टमे से युक्त हो उस भाव की हानि होती है ।

३--लग्नेश जिस भाव-स्वामी के साथ हो उस भाव का फल देगा । यदि यह भाव या भावेश बली हो तो अच्छा फछ देगा बलहीन हो तो दुःख देगा ।

४-०लेग्नेषा पापग्रह हो तो वह जहाँ हो उस भात्र के फल को बढ़ायेंगा । यदि वह ६-८-१२ भाव का स्वामी हो तो छान के स्वामित्व का फल बढ़ेगा न कि दसरे का जैसे लग्नेश मंगल सिहराशि का पंचम में हो और शुभग्रहों को दृष्टि हो ततो बहुत शीघ्र

पंचमभाव का फल देगा।

५--अ्रह अष्टमेश होकर लग्नेश भी हो तो शुभ समझा जाता है ।

६--लग्नेश के साथ जो ग्रह हो या जो ग्रह लग्नेश को देखे उस ग्रह का स्वस्थान

क्या है माळूम करें, इन्हीं भावों के प्रभाव का फल लग्नेश के प्रभाव से बढ़ेगा ।

७--जो भाव लग्नेश के अष्टकवगं में बहुत शुक्र रेखा लिये हो यदि उससे

सम्बन्धित स्वामी थलो हो और लग्नेश के साथ हो तो फल सुखप्रद होता है ।

८ लग्नेश लग्न में हो, स्वनवांश में हो व सब ग्रहों में बली हो उसका जो रूप,

गुण, स्वभाव आदि लग्न से विचारणीय वातें हैं बह बहुत करके उस ग्रह के प्रभाव से

होते हैं ।

९--लग्नेश लग्न में न होकर दूसरी जगह. हो यह जिस ग्रह के नवांश में हो उस

ग्रह सरीखा भावफल देता है ।

१०--लग्नेश गुरु हो, लग्न में हा तो लगन वलवान्‌ हो जाता है । यदि उस गुरु

पर बुघ को दृष्ट हो तो, लग्न और बली हो जाता है परन्तु और ग्रहों को दृष्टि लग्न

पर नहों होती ।

११--ह स्नेश शुभग्रह युक्त शुभराशि में व मित्रगृही या उच्च में हो तो लग्न शुभ

वर्गाधिक्य होने से इनके सम्बन्ध के सब शुभ फड होंगे ।

१२--छग्नेश ६-८-१२ भाव के स्वामियों के माथ हो तो बुरा है !

१३--लग्नेश वलहीन हो और उसमें पापग्रह हो तो और बुरा है, रोगी रहेगा ।

१४--लग्नेश बलहीन होकर केन्द्र, त्रिकोण में हो तो बुरा स्वास्थ्य रहे।

१५--लग्नेश जहां हो उस भाव का स्वामी ६-८-१२ भाव में हो तो शरीर रण

= <ë ।

१५८ : ज्योतिष-जिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

१६--वः लग्नेश शुभग्रह युक्त या दृष्ट होकर जिस भाव में हो उस भाव का

विशेष शुभ फल और यदि नीच या शब्गृही हो तो अशुभ फल होगा ।

१७--लग्नेश अष्टम हो तो स्वास्थ्य विगड़ेगा परन्तु शत्रुदृ ष्ट हो तो बुरा फल नहीं

होता ।

लग्न

१--लग्न में जो ग्रह ३ उस सरीखो भावोक्त बातें होती हैं । यदि वहां २-४ ग्रह

हों तो उनमें से जो बली हो उसी सरोखा फल होगा । ग्रहों के आयुप्रमाण से जो वली

हो उस ग्रह का गुण दोष आगे होगा उसकी अपेक्षा कम बळ वाले का प्रभाव होगा ।

२--लग्न अधिक पापवर्ग हो, उसका स्वामी पाप या पापराशिगत या शत्र”

राशि व तीचराशि में हो तो लग्न सम्बन्धी अनिष्टफल होगा। एक प्रकार से शुभ

और अन्य प्रकार से अशुभ हो तो मिश्रफल होगा । जैसे लग्गेश शुभराशि में नीच व

शन्रुराशि गत हो या लग्नेश पापराशि में मित्र या उच्चराशि में हो तो मिश्रफल होगा ।

३--इसी प्रकार हितीय, तृतीय आदि भाव के सम्बन्ध में विचारना ।

४--छर्न पापग्रह युवत और अस्तंगत हो तो निर्बल होकर दुष्टफल देता है l

५--लग्त के पूर्वार्ध में जो लग्न है वह प्रत्यक्षे फल देता है । पराद्धं में जो ग्रह है

बह परोक्ष फल देता है ।

६--.लग्न व लग्नेश दोनों पूर्णबली हों तो फल वृद्धि हो । दोनों बलहीन हों तो फल

की हानि हो ।

७-- लग्न स्वट्टादशञांदा या स्पद्रेष्काण में हो तो वह शुभ होता है ।

८--लछग्न और उसका नवांश आरम्भ में पूर्ण फल देता है । मध्य में मध्यम और

अन्त में अशुभ फल देता है ।

९--लग्न में सौम्य ग्रह का नवांश शुभ होता है । पाप या शत्र्‌ राशि का नवांश

अशुभ होता है !

१०--लग्न में पापग्रह हो तो स्वास्थ्य बिगड़े ।

११--लग्न में शुभ राशि हो तो दीर्घायु एवं सुखी ह्रो ।

१४--लग्न को ल नेश देखता हो तो धन और करीति की वृद्धि हां ।

भाव से २-१२ स्थान ( दिर्ढादश योग )

१--यदि किसी भाव का स्वामी या किसी भावविद्येष में एक ओर शुभ ग्रह हो

दुसरी ओर भी शुभ ग्रह हो अर्थात्‌ शुभ ग्रहों से घिरा हो तो उप भाव के फळ की बुद्धि

होगी । जैसे चतुर्थ स्थात लो, इसके पहिले अर्थात्‌ तीसरे भाव में और आगे पंचम भाव

में शुभग्रह हो तो शुभ ग्रहों के बीच यह चतुर्थ भाव हुआ ।

२--यदि कोई भाव दोनों ओर से पाप ग्रहों से घिरा हुआ हो तो उस भावका

फल नष्ट होगा ।

फल का स्थूल विचार : १५९

३--यदि एक ओर शुभग्रह दूसरी ओर अशुभग्रह हो तो मिश्रफल होगा ।

२ और १२ भाव पर विचार

१--व्ययेश और धनेश अपने स्वभाव के अनुसार फल नहीं देते । ये भाव, भावेश

और राशि के अनुसार फल देते हैं ।

( अ ) जिस प्रकार शुभ या अशुभ घर में हो ।

( आ ) जिस प्रकार शुभ या अशुभ भावेश के साथ हो।

(इ) या जिस स्थान का स्वामी हो वह राशि जैसी शुभ या अशुभ हो उसी के

अनुसार शुभ या अशुभ फल देते हैं ।

अर्थात्‌ ( क ) द्वितीये के साथ जो ग्रह हो वह अपना ही फल देगा यदि वहाँ बहुत

ग्रह हों तो उनमें जो बली हो उसके अनुसार द्वितीयेश फल देगा ।

( ख ) यदि किसी ग्रह का साथ न हो तो जिस अन्य स्थान का स्वामी हो उसी के

के अनुसार फल देगा ।

( ग ) यदि वह अन्य दूसरे स्यान का स्वामी भी न हो जैसे सूर्य और चंद्र जिनका

एक ही स्वस्थान है तो हितीयेश जिस भाव में बैठा हो उसके अनुसार फल देगा ।

( घ ) यदि ये योग न हों तथा अन्य स्थान का स्वामी भी न हो और अपने स्थान

में ही हो तो वह अपने स्वभाव के अनुसार ही शुभ या अशुभ फल देगा ।

२--इसी प्रक्रार व्ययेश का फल भी विचारना ।

३-२-१२ भाव के स्वामियों का अपना कोई विशेष गुण-दोष नहीं है । ये स्वामी

जिस भाव में पड़े हों, जिस ग्रह के साथ हों, जिस भाव में पड़े हो, उस भाव का स्वामी

किस भाव में पड़ा है इन तीनों रीति से उस के गुण दोष विचारना अर्थात्‌ शुभ स्थान में

शुभ युक्त हो तो शुभ, अशुभ स्थान ( ६.८.१२ भाव ) या अशुभ ग्रह युक्त हो तो अशुभ

होता है ।

धनभाव

१--घनेश धन रखनेवाला है उसके साथ यदि पापी ( दुष्ट ) रहता है तो उसके

घन को समय पाकर नष्ट कर देता है और यदि उसके साथ शुभ अर्थात्‌ शुभावितक रहे तो

उसके धन की रक्षा करेगा इस कारण घनेश अपने साथो के अनुसार फल देता है ।

इससे द्वितीयेश अपने साथी, स्थिति और दृष्टि के अनुसार अच्छे या बुरे हो जाते gë!

२--घनेश जहाँ हो उस भाव राशि को जगह में विशेष वृद्धि करते हैं। वह राशि

जिस दिशा की है उस ओर से द्रव्यलाभ होता है । यदि वक्री हो तो सब दिशाओं में

लाभ हो । र

३--द्वितीयभाव में अच्छा ग्रह हो और हितोयेश शुम ग्रह हो तो उसकी दशा मे

उन्नति होगी । शुभ वार्ता सुनने का आनंद होता है ।

४--द्वितीयेश पापग्रह हो पापयुक्त हो तो दणा-अतर्दशा में अग्नि, शस्त्र चोर आदि

शोक के द्वारा हानि हो साधारण असुख हो ।

१६० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

५--द्वितीयेश पापग्रह हो तो जब उस राशि में बुरे ग्रह आवें तो उस समय जिम्मे-

दारी का काम करने से हानि होगी ।

२-७ भाव

१--२-७ घर मारक होने से अशुभ समझे जाते हैं । इन स्थानों के स्वामी मार￾केश कहलाते हैं ।

२--यह अशुभ होकर २-४ घर में हों तो अशुभ होते हैं ।

३--ग्रहो के स्वस्थान में सप्तम स्थान अशुभ समझा जाता ë । जैसे मकर का

चन्द्र । यह चन्द्र के स्वस्थान ककं से सातवाँ है !

तुतीय भाव

१--कोई भावेश पापग्रह हो तो वह लग्न से तीसरे घर में पड़ जाय तो अच्छा

फल देगा ।

२--यदि शुभ ग्रह तीसरे स्थान में पड़े तो मध्यम फल देगा जैसे नवमेश गुरु तीसरे

स्थान में हो तो गुरु शुभ होने से मध्यम फल देगा ।

चतुर्थंभाव

१--चतुर्थं और दशमभाव विशेष शुभ होते है । इनमें शुभ ग्रह अच्छे है पाष ग्रह

कुछ कष्ट देते हैँ ।

२--शुभ ग्रह उच्च या स्वक्षेत्री या चतुर्थ में हो तो पशु वाहन आदि प्राप्त हो,

चन्द्र हो तो अन्न मिले, शुक्र हो तो गाने-बजाने में रचि हो, गुरु हो तो धन याः उत्तम

बाहन प्राप्त हो ।

पाप ग्रह मंगल हो तो अग्नि भय, भूमि हानि आदि, सूयं हो तो राजभय, राहुं हो

तो बिष आदि का भय, घनहानि, शनि हो तो शरीर कष्ट हो ।

पंचमभाव

१--पंचमेश बुरे स्थान में हो तो अशुभ समझा जाता है ।

२--पंचमेश क्रूर ग्रह हो तो भी शुभ होता है !

३--पंचम घर में दशमेश हो तो सुखदायक होता है ।

४- पंचम में गुरु हो या ९-१२ राशि हो तो संतान का दुःख हो ।

षष्ठभाव

१--कोई कहते हैं कि छठे घर में, ग्रह अच्छा फल देता है, कोई कहते हैं बुरा

फल देता ë परन्तु सिद्धांत यह हैं कि--

पापग्रह किसी भाव में हो उस भाव के फल को नष्ट करते हैं या कम करते हैं और

शुभग्रह किसी भाव में हो तो उस भाव के फळ को बढ़ाते हैँ ।

२---छठा भाव रोग, ऋण, शत्रु का मुख्य स्थान है यदि पापग्रह वहाँ हो तो उस

भाव के बुरे फल को नाश करेगा अर्थात रोग शत्रु ऋण आदि नष्ट होने से अवश्य

सुख होगा ।

फल का स्थूल विचार : १६१

यदि अच्छे ग्रह यहाँ हों तो उस भाव के फलको बढ़ावेंगे अर्थात्‌ रोग आदि की

वृद्धि होगी ।

3—= कई का मत है कि छठे भाव में ग्रह विरुद्ध फल देता है । इस पर

भिन्न-भिन्न मंत Š । बताया गया है कि गुरु छठे भाव में हो तो शत्रू, आदि का नाश

कर सुख देता है।

४--छठा घर उपचय भी है, अघि या वसुमती योग में छठे भाव में अच्छे ग्रह हों

तो अच्छा फल बताया है । इस प्रकार भिन्न-भिन्न मत हैं । लेखक का मत है कि अज्छे

ग्रह इस भाव में हों तो षष्ठेश होने पर अधिक लाभ नहीं करः सकते यदि कुछ अच्छा .

करेंगे तो तो अधिक रूप से नहीं ।

५--छठे भाव का स्वामी अशुभ है 1

६--यवनाचायं के मत से षष्ठेश षष्ठ में शुभ है।

७६-७ s< का स्वामी दशम में हो या दशमेश के साथ हो तो शुभ समझा

जाता है ।

६-८ घर

१--शुभ ग्रह नीच या शत्रु गृही या ६-८ घर में हो दुःखदाई होता है।

२--पाप ग्रह ऐसी स्थिति में बहुत ही दुःखदाई होते हैं।

३--मंगल या शनि अष्टम हो तो मृत्यु समीप होगी वनिस्वत गुरु के, यदि गुरु

अष्टम हो ।

४-६-८ घर में अशुभ ग्रह नीच का हो तो उसकी दशा में शत्रू या चोर से

हानि हो।

८ भाव

१--अष्टम भाव में सूर्य चन्द्र बली होते हैं ।

२--अष्टम भाव का स्वामी लग्नेश हो तो शुभ है।

अष्टमेश यह भाग्य का व्यय भाव होने से अशुभ है यदि यह लग्नेश भी हो तो

अशुभ होने पर भी शुभ हो जाता है। :

३--अष्टमेश स्वतः अष्टमेक्ष मात्र हो अर्थात वह किसी दूसरे स्थान का स्वामी न

हो तो शुभ होता है । जैसे सूर्य ओर चन्द्र जिनके एक ही स्वस्थान है । परन्तु दूसरे ग्रहों

के दो स्वस्थान होने से यहाँ बुरे माने जाते हैं ।

४--त्रिकोण शुभ माना जाता है यहाँ ९-५ भाव की अपेक्षा लग्न अल्पबली है

इससे लग्नेश हो जाने से अष्टमेश शुभ हो जाता है। यदि बह पंचमेश या नवमेश भी

हो तो और भी शुभ हो जाता है ।

५--अष्टमेश यदि त्रिषडाय अशुभ स्थान का स्वामी भी हो तो विशेष अशुभकारक

हो जाता है । ६--अष्टमेश निबॅळ होकर जहाँ रहता है उस भाव का नाश करता है ।

११