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सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

१२२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

(२) यदि लग्नारूड स्थान से ११ बॅ स्थान को बहुत ग्रह देखें-उससे भी अधिक

घनी हो । राजा के समान हो बिना विघ्न बाधा के सदा धन लाभ हो । जितने

अधिक ग्रहों का योग हो उतना ही अधिक लाभ हो ।

(३) यदि लग्नारूह द्रष्टा ग्रह उच्च का हो-धनवान हो ।

(४) यदि seg द्रष्टा ग्रह पर अगंलाओं का संयोग हो-उससे भी अधिक

घनी हो ।

(५) अगंला शुभ ग्रह का हो-उस से भी अधिक घनी हो ।

(६) यदि ११ वां स्थान अपने शुभ स्वामी से दृष्ट हो उसमें भी यदि लग्न, भाग्य

आदि शुभ स्थान गत शुभ स्वामी से दुष्ट हो तो इस प्रकार के योगों में उत्त￾रोत्तर भाग्य की प्रबलता समझना ।

यदि पद से १२ स्थान में भी ग्रह का योग हो तो उक्त योगों में ग्रहों के

अनुसार फल मे न्यूनता आ जाती है । इस कारण ग्रह का योग या दृष्टि बारहवें

स्थान में न हो तव उपरोक्त उत्तरोत्तर घनवान होने का फल होता है।

लगन पद से १२ वें स्थान का फल

( १ ) शुभ ग्रह या पाप ग्रह से, युक्त या दृष्ट हो-अधिक खचं।

( २ ) पाप ग्रह से युक्त या दृष्ट हो-पाप कमं में खर्च ।

( ३ ) शुभ ग्रह से युवत या दुष्ट हो-शुभ कार्य में खर्च ।

( ४ ) शुभ और पाप क्षेत्रों से युत या दुष्ट-अच्छे और बुरे दोनों कार्य में खर्च ।

( ५) द्वादश में राहु या केतु हो तो-राजा द्वारा खर्च ।

( ६ ) द्वादश स्थान में शुक्र सूयं. या राहु हो-राजाओं के द्वारा धन व्यय ।

( ७ ) द्वादश स्थान में बुध और शुभ ग्रह से दुष्ट हो-गोतियों द्वारा व्यय ।

( ८ ) पाप ग्रह से दृष्ट हो-कलह में व्यय हो ।

( ९ ) द्वादशा स्थान में गुरु और अन्य ग्रह से दुष्ट हो-अपने हाथ से ही धन का व्यय हो।

(१०) द्वाद स्थान में शनि या मंगल या दोनों हों, अन्य ग्रह से दृष्ट हो-कलह में

व्यय हो ।

(११) इ।दश स्थान में चन्द्र की दृष्टि हो-रा जाओं द्वारा व्यय ।

(१२) द्वादश स्थान में बुघ हो-दामाद द्वारा कलह से व्यय । `

(१३) द्वादश स्थान में गुरु हो-अपने हाथ द्वारा व्यय ।

(१४) द्वादश स्थान में मंगल और शनि हो-भाई के द्वारा व्यय ।

लग्न पद से १२ स्थान में जिन ग्रहों द्वारा व्यय होना बताया है उसी प्रकार के

ग्रहों के लाम स्थान में होने से उसी प्रकार घन का लाभ समझना ।

लग्न पद से सप्तम स्थान का फल

पद से सप्तम में राहु या केतु हो-उदर रोगी ।

केतु यदि पाप दृष्ट हो-साहसी, saq केश आदि अवस्था के चिह्न से युक्त ।

ग्रह कारक : १२३

पद से सप्तम में गुरु शुक्र चन्द्र में कोई हो या तीनों हों-भीमान्‌ हो । पद से सप्तम में अपने उच्चगत शुभ या पाप ग्रह हों-कीति युक्त धनवान । लग्न पद से द्वितीय स्थान का फल

छान पद से हितीय में केतु हो-थोड़ी अवस्था में बुढ़ापे का चिह्ल। लग्न पद से द्वितीय में चन्द्र गुरु शुक्र-श्रीमान हो | sa पद से द्वितीय में शुभग्रह या पाप ग्रह उच्च का हो तो श्रोमान हो। लग्न पद से द्वितीय में केवर शुभग्रह-सावंभौम राजा या सर्वज्ञ हो । शुक्र हो तो-कवि और वक्ता हो । š जिस प्रकार पद से सप्तम में जिस ग्रह का जैसा फल कहा हे पद से द्वितीय स्थान से भी उसी प्रकार फल का विचार करना । आख्ढु स्थान से द्वितीय में-पाप ग्रह हो शुभ ग्रह न हों-चोर हो ।

बुध हो-सर्व विद्याओं का अधीश ।

गुरु-सर्वज्ञ ।

शुक्र-कवि या वक्ता ।

अब शेष फल जिस प्रकार आत्म कारक के नवांश में कहा है उसी प्रकार बहुषा ळग्नारूढ़ स्थान.से भी समझना । अर्थात्‌ जिस २ प्रकार आत्म कारक के नवांश से जिन

२ स्थान में जो २ फल कहा Š उसो प्रकार लग्नारूढ स्थान से उसी २ स्थान में उसी २ फल का विचार करना ।

( बाघक के अभाव रहने पर स्वांश वश फल समझना अन्यया नहीं )

जिस प्रकार पद या लानःसे भावों के फल कहे हैं उसी प्रकार आत्म कारकांण से

भी समझता । | लग्न पद से विशेष विचार

(१) अञेन्द्र या कोण में सप्तम भाव का पद हो या दोनों पद सबल ग्रहों से युक्त हों

तो लक्ष्मीवान हो, विख्यात हो ।

(२) पद से ६-८-१२ भाव में सप्तम का पद हो-जातक निर्धन हो |

( ३ ) केन्द्र त्रिकोण और षष्ठ रहित उपपद में सप्तम भाव का पद-स्त्री पुरुष दोनों में

मित्रता हो । ` पद या उससे ३,४,५,७,९,१०,११ में बलवान ग्रह हो-स्त्री पुरुष दोनों में

5 मित्रता हो ।

( ४ ) पद से सप्तम का पद केन्द्र या त्रिकोण में हो तो-स्त्री पुरुष दोनों में मित्रता हो 1 ( ५ ) यदि पद से ६-८-१० भाव में. सप्तम का पद पई-स्त्रो पुरुष दोनों में शत्रुता हो।

( ६) उसी प्रकार पद से पुत्रादि के पद भो केन्द्र में पड तो पुत्र आदि से asr समझना । यदि विक में पड़े तो शत्रुता समझना | इसो प्रकार भाई-पिता-पृत्र

और अन्य से भी मंत्री या वैर का विचार करना 1

१२४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

(७ ) तथा जिस भाव का पद लग्न पद से त्रिकोण में पड़े उस भाव की वृद्धि और

त्रिक ( ६-८-१२ ) में पड़े तो उस भाव की हानि समझना ।

(८) लग्न और सप्तम रो पद दोनों परस्पर केन्द्र त्रिकोण या ३-११ में पड़े तो जातक

पृथ्वीपति राजा होता है । -

(९) इसी प्रकार दोनों पदों को देख कर धन आदि भावों के भी फल विचारना ।

लग्नपद और अगला

(१) लग्नपद और उसके सप्तम में अप्रतिबन्ध अगंला पड़े-भाग्यवान हो ।

(२) प्रतिबन्ध रहित अर्गला में शुभ ग्रह या पाप ग्रह हो और वही ग्रह आरूढ लग्न को

देखें-भाग्य को प्रबलता हो ।

(३) प्रतिबन्ध सहित भगला में ग्रह हो तो-भाग्य योग को प्रबलता नहीं होती ।

(४) लग्नपद और उससे राप्तम इन स्थानों में शुभ ग्रह कृत अगला प्रतिबन्धक युक्त भी

हो-धन वृद्धि हो । ;

(५) इससे सिद्ध होता है कि लग्तपद और उस से सप्तम में पाप ग्रह कृत अर्गला हो

तो-सामान्य रूप से घन हो ।

उपपद का फल विचार

(१) उपपद पाप ग्रह की .राशि में हो या पाप युक्त या दृष्ट हो-प्रब्राजक संन्यासी हो

या स्त्री नाश या स्त्री रहित ।

(२) उपपद से शुभ ग्रह का योग या दृष्टि हो-स्त्री पु्रादि का (पूर्ण सुख हो, उक्त

फल नहीं होता ।

(३) उपपद में नीच का ग्रह या नीच नवांश स्थिति या पाप qg हो-स्त्री का नाश ।

(४) उपपद में उच्चस्थ ग्रह हो या उच्च ग्रह की दृष्टि हो-रूप गुणों से युक्त हो, बहुत

पत्नी हों ।

(५) उपपद मिथुन राशि हो-बहुत स्त्री हों ।

( ६ ) उपपद अपने स्वामी से युक्त हो या अपनो दूसरी राशि में हो-वृद्धावस्था में

स्त्री-नाश ।

( ७.) उपपद उच्च में स्थित हो-श्रेष्ठ कुल से स्त्री लाभ ।

( ८ ) उपपद नीच में स्थित हो-नीच कुल से स्त्री ञाभ ।

(९ ) उपपद शुभ ग्रह के षडबगं, योग दृष्टि आदि से सम्बन्ध हो-सुन्दर स्त्री ।

(१०) उपपद और उस का स्वामौ शनि और राहु से युक्त दुष्ट हो-लोक अपवाद से

स्त्री का त्याग या नाश ।

(११) उपपद और उस का स्वामी शुक्र, केतु से युक्त. दुष्ट हो-स्त्री को. रक्त प्रदर ।

(१२) उपपद और उस का स्वामी बुध, केतु से युक्त दुष्ट हो-अस्थिश्वाव रोग युक्त,

मोटी स्त्री प्राप्त हो 1

(१३) उपपद और उसका स्वामी शनि, सूर्य, राहु से युक्त दृष्ट हो-अस्थि ज्वर वाली ।

ग्रह कारक : १२५

(१४) उपपद और उसका स्वामी ३ ९ राशि में हो शनि मंगल से राहु युक्त दुष्ट हो- नासिका रोग वाली स्त्री प्राप्त । (१५) उपपद ओर उसका स्वामी १-८ राक्षि में हो शनि मंगल या राहु से युक्‍त दृष्ट हो-नाड़िका निःसरण वाली स्त्री प्राप्त हो (१६) उपपद और उस का स्वामी गुरु राहु से युक्त दृष्ट हो-दन्त रोग वाली स्त्री हो । (१७) उपपद और उस का स्वामी १०-११ राशि में शनि राहु से युक्त दृष्ट हो- लंगड़ी-वात रोग वाली स्त्री प्राप्त हो। (१८) उपपद शुक्र ग्रह रो युक्त दृष्ट हो-पुर्वोक्त अशुभ फल नहीं होता । (१९) उपपद से सप्तम भाव, सप्तम भाव के नवांश और दोनों के स्वामी पर भी विचार कर पूर्वोक्त रीति से फल कहना । : यहां-सूर्य अपने उच्च में स्व राशि में या मित्र गृही हो तो पाप ग्रह नहीं समझना किन्तु नोच य। शत्र, गृह में हो तो पाप ग्रह ही समझना । ( १ ) उपपद से दितीय स्थान में शुभ ग्रह की राशि या sq qz की दृष्टि या योग हो-स्त्री सुख हो । क ( २ ) उपपद से द्वितीय स्थान में मिथुन राशि हो-बहुत पत्नी हों । (३ ) उपपद या द्वितीय में उस का स्वामी हो या अन्यत्र भी उसका स्वामी स्वराशि में हो-तो वृद्धावस्था में उस के सामने ही स्त्री का मरण हो। ( ५) उपपद स्वामी या स्थिर स्त्री कारक ग्रह उच्च में हो-उत्तम कुल से स्त्री लाभ। . नीच में हो-नीच कुल से स्त्रो लाम । i i

(.६ ) उपपद या उससे द्वितीय में शुभ ग्रह का सम्वन्ध हो-उस की स्त्री सौंदये और गुणों से युक्त हो ( ७ ) उपपद या उससे द्वितीय में शनि राहु हो-अपवाद से स्त्री त्याग या स्त्री मरण । ( ८ ) उपपद या उम से द्वितीय में केतु और शुक्र हो-स्त्री को रक्त प्रदर हो ।

(९) उपपद या उस से द्वितीय में बुघ केतु हो-अस्थि थाव ।

(१०) उपपद या उससे द्वितीय में शनि राहु सूयं-अस्थि ज्वर ।

(११) उपपद या उस से द्वितीय में बुध राह-स्थूलांगी 1

(१२) उपपद से द्वितीय स्थान में ३-६ राशि में शनि मंगल हो-नासिका रोग युक्त ।

(१३) उपपद से द्वितीय स्थान में १-८ ),: ,, ल्क जि

(१४) उपपद से द्वितीय स्थान में गुरु शनि हो-कर्ण रोग और नेत्र रोग ।

(१५) यदि उसमें स्तर ग्रह छोड कर भिन्न राशि का मंगल बुध हो या राहु बुध हो-स्त्री

दन्त रोग से युक्त ।

(१६) उपपद या द्वितीय में १०-११ राशि में शनि राहु-स्त्री पंगु, वात रोग पीडित ।

(१७) इन योगों में यदि शुभ ग्रहों का योग या दृष्टि हो-तो अशुभ फल नहीं होता । घ

(१८) इस प्रकार लग्न से, qz से, तथा उपपद से जो सप्तम राशि हो उससे, उसके

स्वामी से, उस वे; नवांश से भी फल निकाजना । š

१२६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

( १ ) उपरोक्त स्थान में मंगल शनि हो-पुत्र हीन व दत्तक पुत्र वाला या सहोदर के के पुत्र से पुत्रवान ।

11 ० विषम राशि-बहुत पुत्र ।

पा ` ऐप -अल्प पुत्र

„ ३ नवम भाव में शनि, चन्द्र, वुध-सन्तान हीन ।

रवि गुरु राहु-बहुत पुत्र.। चन्द्र-एक पुत्र । मिश्र ग्रह हो-विलस्ब.से पुत्र ।

किन्तु सूर्य गुरु राहु के योग से जो पुत्र हो-वह बली प्रतापी होता ë 1

उपपद गें सिंह राशि हो-थोड पुत्र वाला ।

उपपद में कन्या राशि हो-अधिक कन्या ।

इसी प्रकार पञ्चम के नवांश से भी विचारना और जैसे लग्न - कुंडली से .विचार

कहा गया है वैसे ही त्रिशांश कुंडली में भी योगों से विचार करना ।

पद से ३ में शनि हो तो-छोटे भाई का मरण ।

११ में शनि हो तो--बड़े भाई का मरण ।

शुक्र हो तो--मातृ गर्भ का नाश करता है ।

लग्न या पद या उस से ८ में शुक्र का योग या दृष्टि हो--तो भी उपरोक्त फल 1

यदि ३-११ भाव में चन्द्र बुध गुरु हो--बहुत बड़े प्रतापी सहोदर होते हैं ।

यदि ३-११ भाव में केवल शनि हो--तो स्वयं शेष और सहोदर भाई नष्ट 1

केतु हो तो--अधिक बहिन होती ë ।

पद से ६ भाव में पाप ग्रह हो उस पर शुभग्रह की योग दृष्टि न हो--चोर हो ।

७ या १० स्थान में यदि राहु का योग या दृष्टि हो तो" ज्ञानी और भाग्यवान हो पद

मॅ बुध हो सब देशों का अधिप । गुरु--सर्वज्ञ । शुक्र--कवि और वक्ता !

उपपद या पद से द्वितीय स्थान में शुभग्रह--सब द्रव्यो से युत्त और बुद्धिमान ।

उपपद से द्वितीयेश यदि द्वितीय भाव में पाप युक्त हो--चोर हो ।

उपाख्ढ़ से जो सप्तमेश हो उससे द्वितीय स्थान में राहु हो--दंतुल ( दंष्ट्रावान ) हो 1

केतु हो--बोलने में अक्षम । शनि हो--कुरूप हो । मिश्र ग्रह से--मिश्र फल ।

अर्गला विचार

जिससे ग्रह का या भाव का फल निश्चित होता है उसे भगला कहते हैं ।

(१) किसी राशि के ग्रह से ४-२-११ स्थान में ग्रह हो तो अर्गला होता है ।

(२) इन तीनों अर्गछास्थानों के १०,१२, ३ घाधक स्थान हँ अतः इनमें ग्रह हो तो

उक्त अगला का प्रतिबन्ध होता है अर्यात्‌ ४ का प्रतिबन्ध १०,२ कः १२ और ११

का प्रतिबन्ध ३ होता है ।

(३) अगला कारक ग्रह से बाघक स्थानस्थ ग्रह निर्बल हो या--न्यून संख्या में हो तो

बाधक नहीं होता । अर्थात्‌ अगला ३ हो और बाधक २ ग्रह हों तो बाधक नहीं

होता है । या अर्गला कारक २ हो वाघक १ हो तो मी बाधक नहीं होता । बाघक

निर्बल हो तो भी बाघा नहीं होती ।

ग्रह कारक : १२७ (४) यदि तृतीय भाव में ३ या ३ से अधिक पाप ग्रह हों तो बाधा रहित विपरीत अगंला I होता है । उस अगला से भी फल की पुष्टता होती है (५) उसी प्रकार ५ स्थान अर्गला का ९ स्थान बाघक है । (६)

अर्थात्‌

राहु केतु

की

अगंला

सदा वक्रगति होने से अगला और बाधक स्थान विपरीत होते हैं, स्थान ५ बाधक स्थान है । (e) एक ग्रह से कनिष्ठ, २ से मध्यम, ३ या अधिक ग्रह से अगला श्रेष्ठ होती है । (८) इस प्रकार राक्षि और ग्रह दोनों से अगंला बिचारना । निर्बाध अगंला ही फल-प्रद है

उसका

सबाघा अर्गला निष्फल होती है। जो राशि या ग्रह सागंल हो उसको दशा में ही फल पुष्ट होता है । (९) अर्गछा और उसका प्रतिवन्ध भी राशि के प्रथम चरण में स्थित ग्रह को चतुर्थ चरण स्थित ग्रह से और द्वितीय चरण स्थित ग्रह को तृतीय चरणस्थ ग्रह से ही परस्पर स्पष्ट मान से समझना ।

(१०) ग्रह स्पष्ट करके अगला और उसका वाधक स्थान का इस प्रकार विचार करे । अर्गला स्थान ४ २ ११ ५ ३ राहु केतु का अर्गला स्थान ९ वाधक स्थान १० १२३ ९ ० राहुकेतुका वाधक स्थान प (११) अग्रह राशि = जिस राहि में ग्रह नहीं हँ । सग्रह राशि = जिस राखि में ग्रह हो । (१२) अग्रह राशि से सम्रह राशि बली होती हैं 1 यदि विचारणीय दोनों राशि सग्रह हों तो जिसमें ज्यादा ग्रह हों वह बली होती है। यदि दोनों में ग्रह की समता हो तो क्रमशः चर से स्थिर, स्थिर से द्विस्वभाव राशि बलवान होती है । अगला फल

(१) वद लग्न और उससे सप्तम भाव में निर्वाध अर्गला हो-विख्यात, भाग्यवान हो | (२) जिस ग्रह से अर्गला स्थान में पाप या शुभ ग्रह हो तथा उसका बाधक ग्रह न हो तो उस ग्रह की लग्न पर दृष्टि होने से भी-भाग्यवान, निरोग, सुखी हो I (३) इसी प्रकार धन आदि भाधों में अर्गला से घन आदि सुख होता हैं । (४) ६-८-१२ भाव का अगला अशुभ है शेष भाव में शुभ है ।

(५) इन में भी १-५-९ भाव की अर्गला अति शुभ है ।

(६) शुभ फल देने वाले ग्रह सागंल हों तो शुभ हैं ।

(७) अर्गला घन भाव में-धन धान्य युक्त हो 1 पाप फल देने वाले ग्रह सार्गल हों तो अशुभ होते हैं ।

तृतीय भाव-में-सहोदर आदि को सुख । अष्टम भाव में-कष्ट हो ! चतुर्थ भाव मे-घर पशु बन्धु कुल युक्त । नवम भाव मॅ-भाग्योदय हो ।

पञ्चम भाव मॅ-पृत्र पौत्रादि युक्त । दशम भाव मॅ-राज्य सम्मान ।

छठे भाव में-रिपु भव हौ । एकादश भाव में-लाम हो । |

सप्तम भाव में-धन स्त्री सुख बहुत हो । द्वादश भाव में-अधिक खचं हो । |

शुभ अगंला--बहुत सुख । पाप अती भष्म ।

१२८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड

लगन कुण्डली

ग्रहों झा अला निकालने का उदाहरण--

_ अर्गला स्थान | २ २ | ४५१११ राहु | ९

J: _बाधक स्थान HE १०| ९ | ३| केतु | ५

rd के भाव में| ग्रह ग्रह ET [ह

|?

बाघक है या नहीं ।

राहु | १० | केतु दोनों समान नहीं हैं केन्द्र से

मिथुन घन हि. खण्ड में है अंश बराबर

fz. स्व. द्वि. स्व. | है इससे अगला में प्रवलता नहीं होने से नहीं लिया ।

गुरु ३ x वाघा नहीं सूर्य शुक्र | १२.| गुरु अगला कारक २ बाघक १ है

x ° ° तो बाघा नहीं ।

राहु ९| > बाघा नहीं ।

केतु ३|। x |

x

केतु | १२| + n

|

गुरु रु ° ° >

चंद्र बुध | १० | श. बाधक केवल १ है बाधा नहीं

शुक्र सूयं | ९| x बावा नहीं

१ १ x ° ° J” ” ” ”

चंद्र बुध | १२ | केतु बाघक केचल १, बाघा नहों

स्‌. शुक्र 2 Q ” ” ” 3”

१५ 12 o 9 31 11 ” ”

१ | मंगल | ३ | सूर्य शुक्र बाधक में अधिक हैं बाधा हुई

० x बाघक नहीं

९ x

š x

षु x

७६00 ai 01. 000 x yi mia Tre

ग्रह कारक : १२९

भाव से अर्गला विचार

"EU ; <s É =

ग्रह I बाधक है या नहीं भाव ! ग्रह

बावक द्विस्वभाव में है बली है

बाघक है ।

. | वाधक ग्रह अधिक है बाधा हुई

बाधक ग्रह नहीं है

3 >?

दोनों समान बली हुँ अर्गला

प्रबल नहीं हे

बाधा नहीं

बाधा नहीं x णु,

I

4° | वाघक ग्रह कम है बाधा नहीं हुई च. बु. | बाधक द्विस्व० के प्रबलहे। | ,, |

बाघा है 1

बाधा नहीं केतु |

17 गुरु बा. कम ग्रह । बाघा नहीं हुई |च. बु. |

१३० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड

१२ | गुरु

बु

णु

x

x

सू | बाधक ग्रह अधिक हैं। बाघा हुई x

j q x

Tg

x २ | मंगल वृश्चिक| बाघक स्थिर में sas हुमा । x

स्थिर arar हुई x

° बाघा नहीं गु,

१० | > x र्यं २.

x | x x

१२ | केन्द्र बाधक कम ग्रह बाधा नहीं हुई gas.

बाधा सू.शु.

x

बाधक ग्रह कम हैं वाघा नहीं हुई हि. शु.

x | x

९| x बाधक नहीं र

३| > x केतु

x | x x

१० | केतु | दोनों समान बली ë अर्गला प्रवल | x

I घन नहीं है ।

३ | राहु | बाधक द्वि. भाव में हे बाघा हुई x

मिथुन हवि.स्व. x | x x

0 ० राहु

९ | केतु | बाघक हिस्वभाव में वळी š x

: बाबा हुई

.स्व.

३| > बाधक नहीं है चंद्रगुरु

१२ | x राहु x

१० चं. | बाधक में अधिक ग्रह बाघा हुई x

31 > वाधा नहीं सू. शु.

त SNR

अध्याय ७

गुलिक आदि विचार

गुलिक का फल भिन्न २ भावों में

१ लग्न में गुलिक-चोर, कूर, विनय रहित, वेद शास्त्र के ज्ञान रंहित, बहुत स्थूल

नहीं होगा, नेत्र दोष युक्त, बहुत बुद्धिमान नहीं होगा, बहुठ सन्तान भी

नहीं होगी । अधिक भोजन करेगा, सुख रहित, लम्पट ओर दुष्ट,

दुराचारी, अधिक आयु न हो, शुरवीर नहीं होगा, मुखे, मंद बुद्धि,

चिडचिडा स्तरभाव, रोगी, पापी, शठ, अति दुःखी ।

२ दूसरे भाव सें-कलह करने चाला, मिष्ट भाषी न हो, अन्न धन रहित, विदेश में रहे,

अपनी बात पर स्थिर न रहे, विवाद में बुद्धि पूर्वक भाग लेने योग्य

नहीं रहे, क्रोधो, विषयातुर, श्रमण झील, व्यथं बकवाद करने वाला ।

पाप युक्त हो तो दरिद्र और मूर्ख हो । निलंज्ज, दुःखी ।

३ तीसरे में-एकान्त प्रिय होने से चमंडो, नशेवाज, और इसी प्रकार के गुण होने में

प्रसिद्ध, विरह, अहंकार आदि दुर्गुण युक्त, विशेष कोप, घन एकत्र करने

में व्यग्र चित्त, शोक भय से रहित, भाई बहनों से रहित, सुन्दर स्वरूप,

सज्जनों का प्रिय, राजमान्य ।

४ चतुर्थ में-विद्या से रहित, घन वाहन, गृह सुल रहित, पारिवार रहित) परदेश वासी,

रोगी, पापी, वात पित्त रोग से पीड़ित ।

५ पञ्चम-अति चंचळ, शील रहित, पाप बुद्धि, अल्पपुत्र, अल्पआयु, निन्दक, निर्धन,

अल्प बुद्धि, gs, नास्तिक, बोयं होन, स्त्री के वश ।

६ षष्ठ-बहुत शत्रुओं को मारने वाला, भूत विद्या में विनोदो, पराक्रमो, अच्छे पुत्र

वाला, पुष्ट देह, उत्साही, लोक हित कारक, स्त्री का प्रिय, शत्रु होन ।

७ सप्तम-कलह करने वाला, दुष्टा स्त्री वाला, कई स्त्रियों का पति, स्त्री के वश, सर्व

जनों का विरोधी, कृतघ्न, मंद बुद्धि, अल्प ज्ञान, दुर्बल देह, अल्प क्रोधी ।

मैत्री हीन, महापापी, स्त्री के घन से जीने वाला ।

च अष्टस-कुरूप मुख, विक नेत्र, हस्त्रदेह ( ठिंगना ), दुःखी, क्रूर, कठिन रोग,

निर्धन, निर्दय, तिगुंण, क्षुधा से पीड़ित ।

q नवम-गुरुजनों तया पितरों को मारने वाला या उनसे त्यक्त, पुत्रों से त्यक्त, नीच

कर्म कर्ता, कुकर्मी, निर्दय, चुगलखोर, बहुत कष्ट, पानी सा ठंडा ।

१० दशस-सैकडों अशुभ कर्म युक्त, घामिक और अच्छा काम त्यागे, निज कुल के हित￾कारी आचरण से रहित । बिना मान वाला । दूसरों को कोई चीज देने का

मन न करे । पुत्रवान, सुखी, मोगी, देव मदत योगी !

x - "नै

१३२ : ज्योतिष-शिक्षा, तुतोय फलित खण्ड

११ लाभ-बहुत सुखी, धनी, तेजस्वी, सुन्दर सन्तान युक्त, बुद्धिमान, शवितवान, ज्येष्ठ

भाई को मारने वाला, पूज्य, योगी, नेता, बंधु उपकारी, छोटा कद 1

१२ व्यय-विषय-वासना से रहित, दोन बचन में प्रवीण, सब का धन हरे, खर्च अधिक,

गरीब, आलसी, पापी, भाग्य होन, अंग होन, गुणी होकर भी नीच कर्मी ।

गुलिकेश विचार

झ्ुभ- गुलिक के ग्रह का स्वामी बल युक्त हो तो अच्छा फल होता है वह वर

युवत हो और केन्द्र या त्रिकोण में हो या स्वगृही, स्वउच्च या मित्र गृही

हो तो-उसके पास हाथी घोड़े आदि वाहन हों, वह कामदेव तुल्य सुन्दर हो,

बहुत माननीय हो, अति प्रसिद्ध हो और पृथ्वीपति हो 1

अनिष्ट- गुलिक से त्रिकोण गत लग्न में जो ग्रह हो उसके द्वादशांश या नवांश में

जो ग्रह हो, गुलिक से युवत, गुलिक स्थित राशि का स्वामी ये सब अनिष्ट

करने वाले होते हैं ।

) गुलिक का फल भिन्न ग्रहों के साथ

) गुलिक सूर्य युकत-अपने पिता का विरोधी या पिता को मारे या क्लेश देवे ।

रर चन्द्र “ -माता को क्लेश देवे ।

२१ मंगल ” -भाइयो से रहित, या भाइयों को खोवे ।

” बुघ ” -उन्मादी हो ।

११ गुरु ” -पाखंडी हो, दूसरों का दूषक हो 1

० शुक्र ”-नीच पुरुष, नीच स्त्री का स्वामी, स्त्री जनित रोग से निहत ।

शनि ”-कुष्ट व्याधि युक्त, अल्पायु, सोख्य से युक्त ।

” राहु "विष देने वाला, विषैले रोग से रोगी ।

” केतु ”-गृहादि जलाने वाला या अग्नि से पीडित ।

विष नाडी से युक्त गृह में गुलिक-राजा भी हो तो निश्चय भिखारी हो ।

जन्म में उपग्रह से युक्त गुलिक-अनिष्ट फल दायक ।

यम कंटक के साथ गुलिक-अच्छे फळ की आशा रहती है।

गुलिक बुरा फल देने में बहुत शक्तिमान है यह फल देने में शनि के समान है ।

गुलिक मृत्यु लाता है।

प्राणपद फल

१ लग्न में-दुबल रोगी, ग्‌ गा, पागल, मूर्ख, अंग हीन, दुःखी, कृश ।

२ घन सँ बहुत घन घान्य नौकर तथा प्रजा से युक्त, सुन्दर सोभाग्यवान ।

३ सहज हिसक, गौरव वाला, निठुर, मलिन, गुरुओं का अभक्त ।

` ४ चतुथ-सुली, सुन्दर, मित्रों और स्त्रियों का प्रिय, गुरु भक्त, मुदु, सत्य वक्ता ।

५ पञ्चम-सुखी, सुकर्मी, दयालु, सव कार्यो में निपुण। _

१ |

„ गुलिक आदि विचार : १३३

६ षष्ठ - बंधु क और शत्रु के वश में रहनेने वाला, मंदाग्नि रोगीगी, अल्पायु, दया होन,

७ सप्तम-ईर्ष्यावान, कामी, कठोर, भयंकर रूप, सब से अप्रसन्न, sq fg ।

ड अष्टभ-रोगो, राजा, नौकर, बंधु ओर पुत्रों से सदा दु:खी ।

९ नवम ना, घनी, भाग्यवान, सुन्दर रूप, नौकरी करने वाला, सरल हृदय और पंडित ।

१० वशस-बलो, बुद्धिमान, राज कार्य में चतुर, पंडित, देव भक्त ।

११ लाभ-विख्यात, गुणी, पंडित, भोगी, गौर वणं, माता का प्रिय ।

१२ व्यय-क्षुद्र, दुष्ट, अंग होन, बंधुओं का द्वेषी, नेत्र रोगी, काना ।

प्राणपद गुलिक आदि निकालना ।

प्राणपद

३ घड़ी-१२ राशि | १५ पल- ३० अंश | इन प्रकार इष्ट काल की घटा-

१ घड़ी- ४ राशि | १ पल २ अंश | पल का राशि अंश आदि बना लेना ।

१९पल- १ राशि| १ विपल- २ कला। वह मध्यम प्राणपद हागी ।

राशि १२ से अधिक हो तो १२ से भाग देने से जो बचे उप लेना ।

फिर निरयन सूर्य स्पष्ट लेना, देखना यह चर स्थिर आदि किस राशि में है यदि

सूर्य स्पष्ट चर राशि में हो सूर्य स्पष्ट में मध्यम प्राणपद जोड़ देने से षष्ट प्राणपद

हो जायगा ।

यदि सूर्य स्पष्ट चर न हो तो उस से पञ्चम या नवम भाव में जो राणि हो उन

में देखना कौन चर राशि है वही चर राशि का अंक लेना और सूर्य स्पष्ट में राशि के

स्थान में प्राप्त चर राशि लेकर शेष अंश पूर्ववत रहेंगे । इसमें मध्यम प्राणपद जोड़ने

से स्पष्ट प्रणपद हो जायगा ।

उवाहरण

घ. प. वि. रा०

इष्ट १५-५१-४२ का प्राणपद निकालना है । सूयं स्पष्ट ११-५-४००४५ हैं ।

रा. ०

१५ घड़ी=१५ > ४-६० राशि=०-०-०=०

५१ पल=५१ X २=१०२ अंश=३-१२-:-०

४२ वि.=४२ > २८४ कर्ा=०-१-२४

š वि.= % २=१ कला-=०-०-१

मध्यम प्राण पद योग्=२¬१ ३-२५ `

सूर्य मीन का द्वि स्वमाब है यदि चर राशि का सूर्य होता तो इसी में मध्यम प्राणपद

जोड़ना पड़ता 1 यहाँ दिस्वमाव राशि होने से इसके पंचम और नवम को राशि खोजा 1

पंचम में कर्क चर राशि है। नवम में वृश्चिक स्थिर राशि है। तो चर राशि कर्क

— `

गुलिकम दिन | रविवार | सोमवार

१३४ : ज्योतिष-शिक्षा, तुतीय फलित खण्ड

यहाँ लिया । मीन के स्थान में ककं राशि सिर्फ बदलेगी शेष अंश आदि यही रहेंगे ।

तब सूर्य रेरा.-५ ४४ ०-४५४ मानना पड़ेगा 1

रा. ० "

सूर्य ३- ५-४०-४५ सूर्य मीन का था उसके बदले कर्क का होगा

मध्यम प्राणपद ३-१३-२५ अंशादि वे ही रहे । जो ऊपर गणित से प्राप्त हुआ था ।

— °

प्राणपद ६-१५-५-४५ .'. तुला राशि पर प्राणपद आया ।

प्राणपद स्पष्ट ६रा.-१ ९०-५'--४५" आया १

गुलिक इष्ट जानना em नाला

| बुघवार | गुरुवार | शुक्रवार | शनिवार

NR < ५ SNR x ३ २ १

७ २ र्‌ ७ ६ 64 ! ४

रीति-दिन में=दिन मान 7 ८-लब्धि एक खंड का मान %इष्ट दिन का दिन￾ध्रुवांक-गुलिक दिन इष्ट । रात्रि में-रात्रि मान + ८=छब्वि एक खंड का मान X इष्ट

दिन का रात्रि-धुवांक=्गुखिक रात्रि खंड + दिन मान=्गुलिक इष्ट 1

उदाहरण- मंगवार का जन्म, दिनमान २९-५३-२५ रात्रिमान ३० -९-३५

रात्रि का जन्म है।

रात्रि मान ३०६-३५ + ¿=š घ०-४५ ५०-४९ वि० रात्रि का एक खंड हुआ ।

मंगल को रात्रि धुवांक १ से । ( ३-४५-४९ ) x (०-४ व०-४९ वि०

रात्रि गुलिक खंड ३-४५-४१ गुलिक इष्ट से लग्नवत्‌ गुलिक लग्न निकाल

ब.

मंगलवार

+दिन मान २९-५३-९५ लेना ।

गुलिक इष्ट =३३-३९-१४

गुत आदि खंड के स्पष्टीकरण का I l — आदि खंड के स्पष्टीकरण का चक्र

बार १संड १ खड रेलंड २खंड ३ vse खंड अ '४खंड ५ खंड ६ खंड . ७ खंड ८ खंड

रविवार रवि चंद्र मंगल बुध शु शुक्र शनि x

सोमवार चंद्र मंगल बुध गुरु शुके शनि रवि x

मंगलवार मंगल बुध गुरु शुक्र शनि रवि चंद्र Xx

E बुधवार बुघ गुरु शुक्र शनि रवि चंद्र मंगल x

गुरुवार गुरु शुक्र शनि रवि चंद्र मंगल बुघ Xx

शुक्रवार शुक्र शनि रवि चंद्र मंगल वुध गुरु x

tamia ss 2 —— शनि रवि चंद्र मंगल बध गुरु शुत्र >

w s. Ti

गुलिक आदि विचार : १३५

बार १ खंड २ खंड ३खंड ४खंड ५१ खंड ६ खंड ७ खंड ८ खंड

रविवार गुरु शुक्र शनि रवि चंद्र मंगल बुध

सोमवार शुक्र शनि रवि चंद्र मंगल बुघ गुरु

मंगलवार शनि रवि चन्द्र मंगल बुध गुरु शुक्र

बुधवार रवि चन्द्र मंगल बुध गुरु शुक्र शनि

गुरुवार चन्द्र मंगल बुध गुरु शुक्र शनि रवि

शुक्रवार मंगल बुध गुर qm शनि रवि चन्द्र

शनिवार बुध गुरु शुक्र शनि रवि चन्द्र मंगल

रात्रि खणड

, उपरोक्त दिन व रात्रि खण्ड देखने से प्रगट होगा कि शनि कोन-कोन खण्ड में है,

१ शनि का खण्ड=्गुलिक खण्ड जहाँ-जहाँ शनि है, वह गुलिक का खण्ड

२ गुर. ,, =्यमघण्ट ,, हुमा । गुरु से यमघंट, मंगल से मृत्यु, रवि

३ मंगल „ मृत्यु # से काल और बुघ से अद्ध प्रहर का खण्ड

४ रवि „ काल र होता है। किस दिन रात्रि या दिन में कोन￾wq ,, घ्अद्धंप्रहर ,, कौन सा खण्ड होता है ऊपर चक्र से समझ

पड़ेगा आठवां खण्ड बिना स्वामी के होता है ।

गुलिक यमघण्ट आदि का ध्रुवक उपरोक्त चक्रानुसार

लंड दिन राव रविवार nes सोमवार. मंगलवार मरी बुधवार गुरुवार शुक्रवार शनिवार

खंड

गुलिक दिन ७ ६ ५ ॐ ३ २ १

pis s 9 ३३०१ ३ २ ००० १ ७ < ५ v

यमघण्ट दिन ५ x 3 २ १ ७ <

(aÍ) राव t ४ ९४ ` — कंटक) रात १ ७ ६ ५ x 3 २३४०5

मृत्यु खण्ड दिन ३ र १० NAN 3

KOR ६ ५ x 3 तया” २ १ ७

कार दिन १ ७ ६ ५ x ३ २

५400 हात bas हर मको x ३ २ १ ७ < ç

अडंप्रहर दिन x 3 २ रै ७ ६ ५

अभ र 0 00 न > नि क नु सकन ७ ६ प्‌ x 3 २ १

उपरोक्त विधि से यह मी जान सकते हैं कि इष्ट काल में किसी विक्षेष दिन को

कौन सा खण्ड हे ।

१३६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

अप्रकाश ग्रह उपग्रह ५ हें उदाहरण--- १ घूम-सूर् स्पष्ट + ४ रा. -१३०-२०' रा.

२ पात .(व्यतीपात)=(१२ राशि-धूम) सूर्य स्पष्ट=११-५९_४०'-४५" ३ परिषि=(पात + ६ राशि) + ४-१३-२०

Rf इन्द्रचाप=(१ २ राशि-परिघि) १ घ्‌म = ३-१ ९..०-४५ ५ घनु या शिखि या केतु=(इन्द्र चाप + १२-००-०१०५

१६९०-४० र =शिखि कित + १ राशि —धूम ३-१९- ०-४५

` q डर ) २ पात =८-१०-५९-१५

+< ३ परिघि =२-१०-५९-१५

१२-००-००"

= परिधि २-१०-५९-१५

४ इन्द्रचाप =९-१९- ०-३५

  • १६-४०

५ शिखि =१०¬ ५-४०-४५

+१

सूर्य स्पष्ट २१३५-४०-४५

ये ५ अदृश्य उपग्रह Š

ये घुम आदि उपग्रह आकाश में विना दिखे विचरते है । यदि किसी समयये कहीं दिखाई देते हैं तो संसार में घोर उपद्रव होने की छाया डालते हुँ ।

अदृष्य उपग्रह की पहिचान ( अन्यमत से )

(१) घूम- आकार घुम्न पट के समान है । कोई कहते Ç यह पुछलूतारा है ।

(र) व्यतिपाव--कोई इसे तारा टूट कर गिरने को कहते हैं ।

(३) परिषि सूर्यं का चन्द्र के आसपास गोल चक्कर होता है ।

(४) इन्द्रचाप--या इन्द्रघनुष या कोदण्ड--प्रसिद्ध इन्द्रधनुष है, जो वर्षा में दिखता ë ।,

(५) केतु- यह घूमकेतु ë । संसार में बहुत उपद्रव करता है ।

धूम आदि अप्रकाश ग्रह के फल पर विचार

इन अप्रकाश ग्रहों से आव के फळ का भी विचार होता Š । सूर्य आदि प्रकाश ग्रहों के भाव फळ विचारते समय अप्रकाश ग्रहों के भाव फळपर सी विचार कर फल का निर्णय करना चाहिये । यदि सूर्यादि ग्रहों के माव फळ शुम हों ओर अभ्रकाश ग्रहों के भी भाव फल शुम हों तो अति qa फल होता हे । यदि दोनों का फळ sqa हो तो अति अशुभ फल होता है । एक शुभ दुसरा अशुम हो तो मध्यम फळ होता है ।

गुलिक आदि विचार : १३७

अप्रकाश ग्रहों का पृथक्‌ भाव अनुसार फल

१ धूम फल

(१) लग्न में-योद्धा, निबंल दृष्टि, स्तब्ध, निर्दय, क्रूर, अति क्रोधी । | (२) द्वितीय मॅ-रोगी, धनी, अंगहीन, मन्द बुद्धि, कार्यहीन, राज्य से हृत मन वाला । (३) सहज में-बुद्धिमान्‌, शूरवीर, उदार, प्रियवक्ता, परिजन और घन से युक्त । (४) चतुथं मॅ-स्त्री से त्यक्त होने से सदा दुःखी, सब शास्त्रों का ज्ञाता । (५) पंचम में-अल्प सन्तान, धन हीन, गौरवी, सवंभक्षो, मित्रों के विचार से विमुख रहे ।

(६) षष्ठ में-चली शत्रु को जीतने वाला, तेजस्वी, विख्यात, और रोगहीन । (७) सप्तम में-निघंन, कामी, परस्त्री गामी, पंडित किन्तु प्रतिभाहीन | (८) अष्टम में-प शक्रम रहित भी उत्साहो, सत्यप्रतिज्ञ; अप्रिय वक्ता, निदुर, स्वार्थी । (९) नवम-पुत्रवान्‌, माग्यवान्‌, घनी मानी, दयालु, धर्मात्मा, भाइयों का पोषक । (१०) दशम-पुत्र, सौभाग्य, संतोष, सुबुद्धि से युक्त, सुखी और सत्य प्रतिज्ञ (११) लाभ-धन धान्य, सुवणं युक्त, विनीत, संगीतज्ञ, सुन्दर कला को जानने

वाला ।

(१२) व्यय-पतित, पापो, पर-स्त्रो गामी, व्यसनी, निदंय, शठ ।

२ पात फल

(१) लग्न में-दुःखी, क्रूर, हिंसक, मूर्ख बन्धुओं का द्वेषी ।

(२) घन में-कुटिल, पित्त प्रकृति, भोगी, निदंय, कृतघ्न, दुष्ट, पापी ।

(३) सहज-स्थिर बुद्धि, योद्धा, दाता, घनी, राजमान्य, सेनापति ।

(४) चतुथे-बंघन व रोग से पीड़ित, सन्तान और सौभाग्य से हीन ।

(५) पंचम-घन होन, रूपवान्‌, कफ पित्त वायु से पीडित, निठुर, निलज्ज ।

(६) षष्ठ-शत्रु को जीते, पृष्ट देह, शांत चित्त, सब अस्त्र ओर कला में निपुण ।

(७) सप्तम-धन ओर स्त्रो से रहित या स्त्री के वश, दुःखी, निळंज्ज, कामी,

छत्रुओं को सुखदायक ।

(८) सष्टम-नेत्र रोगी, कुरूप, भाग्यहीन, ब्राह्मणों का निन्दक, रक्त पीड़ा से

=i

(९) sea व्यापार करने वाळा, बहुत मित्र, स्त्री का प्रिय, प्रियवक्ता,

अनेक विषयों का ज्ञाता ।

(१०) दश्चम-सम्पत्तिवान्‌, घमंज, घकारो, महा बुद्धिमान्‌, पंडित ।

(११) छाम-अत्यन्त घनी, मानी, सत्यवक्ता, दृढ़ भ्रतिज्ञ, संगीत जानने वाळा, घोड़े

को सवारी करने बाळा । š

(१२) व्यय-क्रोषी, अंग हीन, घर्म निंदक, बन्धुं का द्वेषो, बहुत कार्य करने वाला ।

१३८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

३. परिधि फल

(१) लग्न मे-विद्वान्‌, सत्य वक्ता, शान्त, घनी, पुत्रवान्‌, पवित्र, दाता, गुरुभवत ।

(२) घन-महाघनी, सुन्दर, भोगी, सुधी, धर्मात्मा, राजा ।

(३) सहज-्त्री का प्रिय, सुन्दर देह, देव और कुटुम्ब का भक्त, नौकरो करने

वाला, गुरुभक्त ।

(४) चतुर्थ-विस्मय से युवत, सरल हृदय, संगीत ज्ञाता, शत्रुओं का भी हित

करने वाला ।

(५) पंचम-घनी, सुशील, सुन्दर, मधुर वाणी, धर्मात्मा, स्त्री का प्रिय ।

(६) षष्ठ-विख्यात, धनी, भोगो, सब जन्तु पर दया करने वाला, शत्रुओं को

जीतने वाला । ;

(७) सप्तम-अल्प सन्तान, सु खहीन, मन्द बुद्धि, निष्ठुर, रोगिणी स्त्री वाला ।

(८) अष्टम-अध्यात्म ज्ञानी, शान्त, चित्त, दृढ़ देह, दृढ़ प्रतिज्ञ, धर्मात्मा, बलवान्‌ ।

(९) नवम-पुत्रवान्‌, सुखो, सुन्दर, धनी, स्थिर मानी और थोड़े में सन्तुष्ट होने

वाला ।

(१०) दशम-कलाओं का ज्ञाता, भोगी, मजबूत देह, सरल हृदय, सब शास्त्रों में

, निपुण ।

(११) लाभ-स्त्री से सुखी, बुद्धिमान, कुटुम्बियों का प्रिय, मन्दाग्नि रोग 1

(१२) व्यय-बहुत खर्च करने वाला, दुःखी, दुष्ट, बुद्धि, गुरुनिदक ।

४ चाप फल

(१) लग्न में-घन घान्य सुवणं से पूणं, कृतज्ञ, सज्जनों का प्रिय, सब दोषों से रहित ।

(२) घन-प्रिय वक्ता, दृढ़, धनी, विनीत, विद्यावान, सुन्दर, घर्मात्मा ।

(३) सहज-कंजूस, कलाओं को जानने वाला, चोर, अंग हीन, मित्र हीन ।

(४) चतुर्थ-सुखी, गो, घन धान्य से युक्त, राजमान्य, रोग हीन ।

(५) पंचम-सुन्दर, दुरदर्शी, देव भक्त, प्रिय वक्ता, सब कायं में सफल ।

(६) षष्ठ-शत्रुओं को जीतने वाला, अतिधूतं, सुखी, प्रेमी, पवित्र, सव कार्य

में लाभ ।

(७) सप्तम-ऐश्वयं युक्त, गुणो से पूर्ण, शास्त्रज्ञ, घर्मात्मा, जनप्रिय 1

(८) अष्टम-पापी, क्रूर, परस्त्री गामी, विकल अंग वाला ।

(_) नवम-तपस्वो, ब्रतघारी, विद्यावान्‌, लोक में विख्यात ।

s= (१०) दशम-बहुत पुत्र, घन ऐश्वयं, गौ भैंस आदि हो, लोक में विख्यात ।

L°. (११) छाम-सदा लाभ करने वाला, निरोग, प्रबल कोप, Tera, स्त्री प्रिय, अस्त्र

चलाने में निपुण । (१२) व्यय-दुष्ट, अभिमानी, कुजु, निर्लज्ज, धन हीन, वरस्त्रीगामी ।

गुलिक आदि विचार : १३९

५ केतु (शिखि) फल

( १) लग्न में-सब विद्या में निपुण, सुखी, बोलने में चतुर, लोगों का प्रिय, सब

काम में पूर्ण ।

(२) घन में-ववठा, मधुरभाषी, सुन्दर, कवि, पंडित, मानी, विनीत, वाहन￾सुख युक्त । ( ३ ) सहज में-कंजूस, कुकर्मी, कृश देह, कठिन रोग से युक्त ।

(४) चतुथं-सुन्दर, गुणी, सात्विक, वेदज्ञाता, सदा सुखी ।

( ५) पंचम-सुखी, योगी, कलाओ का ज्ञाता, युक्ति जाननेवाला, बुद्धिमान्‌ वक्ता

गुरु भवत ।

(६ ) षष्ठ-मातृ कुल नाशक, शत्रुओं को जीतने वाला, बहुत बन्यु, श्रवीर, सुन्दर,

चतुर ।

( ७) सप्तम-जुभारी, कामी, भोगी, वेश्या में रत ।

( ८) अष्टम-ऊुकर्मी, पापी, निर्लज्ज, पर निंदक, स्त्री सुख हीन ।

( ९ ) नवम-वैष्णव आदि भेष धारी, प्रसन्न चित्त, सब जन्तुओं का हित साधक, घम

काये में निपुण ।

(१०) दशम-सुख सौभाग्य युक्त, स्त्रियों का प्रिय, दानी, ब्राह्मणों से संगति ।

(११) लाभ-वित्तलाभ करने वाला, धर्मात्मा, घनी, सुन्दर, शूर, सुकर्मी, महा पंडित 1

(१२) व्यय-पापी, श्र, श्रद्धा और दया से रहित, पर स्त्री गामी, क्रूर ।

सूर्य आदि ग्रहों के उपग्रहों का दिन के अनुसार

कालादि ज्ञान चक्र

दिन का कालादि चक्र

39 3 MSS MT l

दिन १ =

खंड २ खंड ३खंड ४ खंड ५ खंड ६ खंड ७ खंड ८ खंड

रविवार काल परिधि घुम अढयाम यमघंट कोदंड गुछिक निरींश

सोमवार परिषि धूम अद्धंयाम यमघंट कोदंड गुरिक काल

मंगलवार घूम adam यमघंट कोदंड गुलिक काल परिधि »

बुधवार sam यमघंट कोदंड गुर्छिक काल परिधि धुम

गुरुवार यमघंट कोदंड गुलिक कार परिधि घुम अर्घयाम ,,

शुक्रवार कोदंड गुलिक काल परिधि घूम गर्ढयाम यमर्घं ,,

शनिवार गुलिक काल परिधि धूम अद्धंयाम यमघंट कोदंड „

or ESS iT

(१४० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

रात्रि का कालादि ज्ञान चक्र

रात्रि १ खंड २ खंड ३ खंड ४ खंड ५ खंड ६ खंड ७ खंड ८ खंड

रविवार यमघंट कोदंड गुलिक काल परिधि धूम अद्धंयाम ।नरीश

सोमवार कोदंड गुलिक काल परिधि धम अडढ्याम यमघंट

मंगलवार गुलिक काल परिधि धूम अढद्धयाम यमघंट कोदंड i

बुधवार काल परिधि घुम . अद्धंयाम यमघंट कोदंड . गुलिक

गुरवार परिधि धुम बअरद्धयाम यमघंट कोदंड गुरिक कार

शुक्रवार धूम अद्धंयाम यमघंट कोदंड गुलिक काल परिधि ,,

शनिवार arar यमघंट कोदंड गुलिक काल परिधि घुम

दिन रात में उपरोक्त ७ उपग्रहों के प्रत्येक के खण्ड बताये ë । आठवां खंड=निरीश

अर्थात्‌ बिना स्वामी के होता है । अर्थात्‌ केवल ५ ही खंडों में उपरोक्त ग्रह स्वामी

होते हे जिनको नानर चाहिये कि किस समय कौन उपग्रह स्वामी ë 1

रीतिः—दिन का जानने को ( दिनमान = ८ ) %,खंड संझ्याञउस उपग्रह का

समय । रात्रि में इष्ट हो तो ( रात्रिमान + ८ ) x खंड संख्या + दिनमान=समय ।

उदाहरणः--मान छो इतवार के दिन को गुलिक खंड कब जायेगा यह जानना है,

इतवार को दिनमान २८-३० है । २८ घ. ३० प. Z= घ. २३ प. ४५ वि. का

एक खंड हुआ । इतवार को .गुलिक खंड ७वां है । १ खंड २-२३-४५ X ७=९

५६ प. १५ वि. इष्ट तक इतवार के दिन को गुझिक खण्ड रहेगा ।

मान छो इतवार कीं रात्रि को काल खण्ड जानना है । काल खण्ड चौथा है इतबार

का दिनम्ान २८-३०=६०-( २८-३० )=रात्रिमान ३१-३० :- ८८१ खंड=३-५६-१५

का हुआ । ३-५६-१५ X ४ खंड=१ ५-४९ रात्रि + दिनमान २८-३०४४-१५ इष्ट

तक कार खंड रहेगा ।

फल विचार

उपग्रह ९ माने जाते ë (६) गुलिक (मांदि), (२) यमकंटक, (३) अड याम, (४)

काळ, (५) घूम, (६) पात (व्यतीपात), (७) परिधि (परिवेश), (८) कोदंड (इन्द्रधनुष); (९) केतु (घूमकेतु या शिखी) ।

१ गुिक--गुरिक काल सदा त्याज्य है । राजा को भी भिखारी बनाता है । बुरा

फल देता हे । गुछिक फल देने में शनि के समान है । गुलिका मृत्यु लाती हैं ।

२ यमघंट (यमकंटक)--गुरु के समान फल देता है । यमकण्टक के साथ गुलिका

हो तो अच्छे फल की आशा की जाती है । यह यमकंटक अच्छा फल देने में शक्तिशालो ë ।

३ अद्धयाम--बुघ के समान फल है । शुभ घर में अच्छा फल देता है; बुरे घर में

जा बरा फर देता है ।

w =” sss m [ T

ग्रहो का रश्मि फल विचार : १४१

४ काल--राहु के समान फल देता है ।

५ घूम--जहाँ धूम हो वहाँ सदा गर्मी से त्रास अग्नि भय और मानसिक त्रास

होता है । यदि.लग्न या अन्य भाव अपने स्वामी से युक्त धूम के साथ हो या अद्धयाम

के साथ हो तो उस भाव का नाश होता ë ।

६ व्यतीपात--सींगवाले जानवर या चौपायो से भय मृत्यु ।

७ परिधि--जब परिवेश या परिधि हो तो जल का भय हो, जल के रोग से

बंधन भी सम्भव है ।

८ कोदंड--पत्थर से या शस्त्र से चोट लगे और गिर भी पड़े ।

९ केतु-गिरने से चोट, व्यापार में हानि से कष्ट, बिजली गिरने का भय ।

ये फळ उस ग्रह को दशा में होंगे जो उस घर में है जहाँ ये उपग्रह Š ।

उपग्रहों का लग्न आदि भाव का फल

१ लग्न में--अल्प जीवन ।

२ द्वितीय में--कुरूप चेहरा।

३ तृतीय में--साहस 1

४ चतुर्थ में--दुःख ।

५ पञ्चम में--सन्तानहीन।

६ षष्ठ में--शत्रु द्वारा मानसिक त्रास ।

५ सप्तम में--ओज शक्ति का ह्वास।

८ अष्टम में--दुर्मार्ग से मृत्यु ।

९ नवम में--धर्म आदि की प्रतिकूलता ।

१० दशम में--सदा भटकते रहने का झुकाव ।

११ लाभ में--लाभ ।

१२ व्यय में--नित्य दोष करना ।

अध्याय ८

ग्रहों का रश्मि फल विचार

रदिम अर्थात्‌ ग्रह की किरण जो गणित द्वारा प्राप्त हो । 2

जिस ग्रह की बहुत रश्मि हो वही ग्रह स्थान पर स्थावर माल का %% देता ë!

अधिक रश्मि हो तो बडा राज्य प्राप्त हो, बल में श्रेष्ठ हो तो युद्ध में जय

प्राप्त हो ।

यदि ५ रदिम है तो दुःख देता है, दरिद्री हो, नीच की संगति करे । वह ग्रह नीच

का हो तो कैद कराता है 1 जितनी रश्मि अधिक हो उतना अच्छा फल होगा 1