सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
१०२: ज्योतिष-शिक्षा, qata फलित खण्ड
( २१ ) कलह (झगडा) ( ३६ ) प्रहषं ( जीने पर हर्ष )
( २२ ) प्रयाण (यात्रा को प्रस्थान) ( २३) उन्मत्तता ( पागल या नशे में
( २९ ) शास्त्रलाभं ( शास्त्र आदि उन्मत्त ;
का लाभ होना ) (२४ ) सलिलाप्लवनं (जल में तैरना)
( ३० ) स्वैरं ( उद्ण्डता आदि ) a, र ५ ) विरोध ( वेर
( ३१ ) गोष्ठो ( वार्तालाप ) BU (र) ( ३२) योधने ( युद्ध करना ) ( २६) स्वेच्छा ( अपनो इच्छानुसार
( ३३ ) पुण्य कमं (पुण्य कमं करना ) कि 22028 )
( ३४ ) पापाचार ( पाप कर्म करना ) | (२७) स्तानं (स्नान करना )
( ३५ ) क्रूरकर्मा ( क्रूर कर्म करना ) ( २८ ) क्षुङ्धयं ( क्षुघा का भय )
चन्द्र वेला जानने की रीति
जन्म नक्षत्र की भुक्त घडीपल के पल बना कर १०० का भाग दो तो लन्च चन्द्र
वेला होगी, यदि शेष बचे तो आगे का लेना ।
उदाहरण- जन्म नक्षत्र घनिष्ठा क भुक्त घडी N: 5 = २२२३ पल
पल
१००) २२२३ ( २२ लब्धि ` यहाँ लब्चि २२. गत हो गई शेष बचा है तो
` २०० गत १ जोड़ कर आगे का २३ वां लिया । २३ =
२२३ उन्मत्तता वेला प्राप्त हुई ।
२०० ° यहाँ बताये चन्द्र अवस्था, क्रिया, वेला
२३: का विचार जन्म, प्रश्न, मुहुर्त आदि में कर
उनका फल विचारना । इनमें नाम सदृश फल होना है 1
७
अध्याय ६
ग्रह कारक
प्राणी मात्र का सुख दुःख जिन ग्रहों के प्रभावपर निभंर है उनके कायं में कर्ता ग्रह
को कारक कहते हैं ।
प्रत्येक ग्रह का कायं भिन्न है और ये घटनाओं पर अपना प्रभाव डालते हैं । इस
कारण बताया गया है कि कौन ग्रह किस कार्य का कारक है । अर्थात् किस ग्रह से क्या
बातें विचारनी चाहिये यह आगे दिया है उन बातों के कारक या अधिकारी प्रभाव कर्ता
वे ग्रह हैं जो आगे बताये हैं ।
ग्रहों कीईअवस्थाए और चन्द्र क्रिया : १०३
ग्रह के कारक
१ सूर्य---पिता का सुख, शरीर का सुख, पूर्व पुन्याई, मन की रुचि, राज्य कार्य, बड़े
भाई का सुख, वैद्यक विद्या, समीप या प्रयाण ( यात्रा ), श्रीमान और अघि-
कारी लोगो से मित्रता, राज विद्या, राज से मान सम्मान, श्रेष्ठ अधिकारी
सत्ताधारी योग, राज्याधिकारी वर्ग, लोक मान्यता, प्रसिद्ध नेता, राष्ट के
कर्णधार, बड़ी संस्थाओं के कर्णघार, जागीरदार, दीवान आदि व राज सेवा,
उपजीविका वोरता, योग्यता, तत्त्व ज्ञान, मन की शुद्धि, आत्मा, फजूल खर्ची,
स्वर्ण, अश्व, पद्मराग मणि; सिंहासन, रक्त तात्र, ब्रण, भेषज, शौर्य, नेत्र चिकित्सा,
प्रताप, बड़प्पन, धैर्य, सामर्थ्य, ( शक्ति ) साहस, युद्ध में जीत, शिव ईश्वर
के सम्बन्ध का कोई कार्य, जंगल वा पहाड़ो स्थान का जाना, होम यज्ञ कायं में
प्रवृत्त होना, देव स्थान, स्वभाव, निरोगता, लक्ष्मी का विचार, ज्ञान का उदय,
भाग्य, राजनैतिक शक्ति, पिता औरं पिता की ओर के सम्बन्धी, क्षत्रिय, रक्त
वस्त्र, रक्त चन्दन, मू गा, माणिक्य, गोधूम, गुड, केशर, कमल, नवीन गुड,
सवत्सा गौ आदि का ।
२ चन्द्र--मातृ सुख, सौन्दर्य सुख, यश प्राप्ति, ज्योतिष विद्या की रुचि, दूर का प्रयास,
जल प्रयास, मन बुद्धि, स्वास्थ्य, राज ऐश्वर्य, सम्पत्ति, सुगन्धित वस्तुओं का
शौक, वाइन: सुख, द्रव्य सञ्चय, धंधे में उन्नति, प्रजा पक्ष, जनता, सामान्य
लोग, जनता की वृत्ति, प्रजा पक्षीय नेताओ के मन को स्थिति तथा स्त्री मन,
आनन्द, चाँदी, चेहरा, कीति, दूध, यात्रा, वस्त्र, जल, कृषि, घन, गौ, शस्य,
लज्जा, मणि, शङ्क, विनय, पुष्प रस वर्ग, घातृ, दीप्ति, सन्तोष, समुद्र स्नान,
सफेद चादर, छत्र, सुव्यजन ( पंखा ) कोमलता, मुक्ता प्राप्ति, कांसा, सख
भोजन, प्रसन्नता, राजा, दया, हर्ष, हृदय की चेतना शक्ति, बुद्धि, राज कृपा,
ब्राह्मण, श्वेत वस्त्र, श्वेत चन्दन, श्वेत चावल, श्वेत पुष्प, घृत, दही, कपूर,
बैल, गेहूँ, लवण, वंश पात्र आदि का कारक है ।
३ मङ्गल--साहस, लघुआता सुख, पराक्रम, घैयं, अभिमान, शत्र कीति, बुद्धि के
आचार कार्य, युद्ध, नेतृत्व, धनुबिद्या, रोग घातु, विद्या, रक्त विकार, पास्त्रः
क्रिया ( आपरेशन ), युद्ध, लड़ाई; अग्नि, प्रलय अपनी सामर्थ्यं का घमंड
सेनापति, सेना, दुर्ग, क्रूरता, विजय, भूमि, भाई, क्रोध, पित्तविकार
ऋण, सोना, कृषि, शिव भक्ति, नुकताचीनो करना, काम, प्रलाप, उत्साह,
परस्त्रीरत, पाप, घाव, हाकिमो, युवराजत्व, उषण, बाहुबल, ताम्र, मूंगा,
माणिक्य, दण्ड नोति,. गृह, विष, कीट, वंश, खेर, गन्धक सिंह, व्याघ्र,
बल, विद्वेष, पकाने के बर्तन, अग्नि, अस्त्र, चौर, श मिथ्या-भाषण, .
मानसिक विचारों को उच्चता, पुत्र, खज्ग, पर्सा, कुल्हाड़ा, तोप, धनुष, बाण,
` —— SCRE -
१०४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड
आदि, गम्भीरता, कलंक, स्वातंत्र्य, आचरण के गुण, रक्त के सम्बन्ध के
बन्धु, बहिन ( पितृ वंश के ), उद्योग, शाला, पुत्र, मसूर, गोधूम, केसर,
कस्तूरी, रक्त वस्त्र, रक्त पुष्प, रक्त चन्दन, रक्त वृष, गुड़ ।
४ बुघ--युवराज, कौमार, बंधु सौख्य, बुद्धि, विद्या ववतृत्व शक्ति, प्रवीणता, मित्र सुख,
मनः शान्ति, सम्पत्ति, स्वतन्त्र धन्या, वाणी, लेखन कला, वेदान्त विषय की
रुचि, कला कौशल, ज्योतिष विद्या की रुचि तथा ज्ञान, गणित शास्त्र,
विद्वत्ता, विवेक, लेखक, ग्रन्थकार, वक्ता, सम्पादक, मुद्रक, प्रकाशक परराष्ट्रीय मन्त्रो, कारभारी, व्यापारी, सराफी का धन्या, ज्योतिषी, वकीली
आदि घन्धा, तत्व ज्ञान, विष्णु की भक्ति, व्यापार, चाक्य चातुर्य, उपासना
आदि में पटुता, घर्म, चाची, मामा, मौसी, मामी, बान्धव, सुहद्, बहन को
सन्तान, युवराज सन्तान, शान्ति, नर्मता, हास्य, नृत्य, वैद्य, भय, दासी,
मुद्ग मैथुन, तरुण, शस्य, यजन, कोलाहल, माध्यस्थ्य, चित्र क्रीड़ा, सौभाग्य,
शुक्र, पिजरा, ताम्बूल, पलास, कांसा, सुवर्ण, सीप, गजदन्त, मूंगा, घृत,
पन्ना, पुष्प, रत्न, कर्पूर, फल, शस्त्र, षटरस, सत्य भाषण, क्रीडास्थल ।
५ गुरु सन्तति, सम्पत्ति, ज्ञान, अधिकार, ऐक्वयं, राजसन्मान, लोक संग्रह, वेदान्त
ज्ञान, घन्धा, उपजीविका, मल्ल विद्या, तीब्र बुद्धि, ग्रहण शक्ति, धर्माभिमानी,
ग्रन्थकर्ता, स्थिर वृत्ति, राज कारण, परोपकारी, घामिकक्नुत्य, वाहन आदि
सुख, धर्म गुरु, संस्कृत विद्या, व्याकरण, शास्त्र, अधिकारी, न्यायाधीश,
वकील, श्रीमान, व्यापारी, जागीरदार, शान्तिप्रिय, संस्थापक आदि ।
स्वास्थ्य, घन, कोमल वाणी, पुत्र, घरेलू आनन्द, मन्त्रीपना, सचिव, उचित
व्यय आत्मज्ञान, स्वतन्त्रता, दान, हृदय, कविता, वेद वेदान्त, ब्राह्मण्य,
भवित, श्रद्धा, मेधा, प्रणय, सदाचार, वैष्णव, गौरव, प्रज्ञता, प्रवचन,
पाण्डित्य, विद्या, सुख, आचायं, माहात्म्य, सदगति, देव ब्राह्मण भक्ति, बलि,
तप, जितेन्द्रिय, कोष स्थल, पति का सुख, सन्मान, धन, जीवन का उपाय,
कमं योग, सिंहासन, शारीरिक विकास, पितामह, देव ब्राह्मण, गृह, पीत वस्त्र,
पीत घान्य, पीत पुरुष, पीत फल, सुवणे, पुखराज, मधु, हल्दो, लवण,
गज, छत्र, सत्कर्म, अध्ययन, मित्र, कातंस्वर, शिष्टत्व, जथपत्र, कीति, श्रुति
शास्त्र और स्मृति ज्ञान, सर्व उन्नति, वाहन, अनेक रंग के वस्त्र ।
६ शुक्त--स्त्री, व प्रापञ्चिक सुख, कवित्व, गायन, वादन कला में निपुण, प्राचीन
संस्कृति का अभिमानी, सौन्दर्य के प्रति प्रीति, विषय सुख इन्द्रिय आनन्द,
सुगन्ध पदार्थ का प्रेमी, कला-कीशलप्रिय, द्रव्य लाभ, स्वतन्त्र धन्या,
राजाश्रय, राजकायंभार का ज्ञान, अलङ्कार, यान्त्रिक विद्या, अष्ट सिद्धि,
साहित्य ज्ञान, व्यापार, होरा, मोतो, कपास का व्यापारी, शेयर, ऐश
आरामी, देश की सम्पत्ति, विवाह, कोति, सुन्दरता, ललित कला, गाना
">>>
ग्रह कारक : १०५
नाचना, कविता आदि, आनन्द, बुद्धि, तमाशा, व्यभिचार, कुटुम्ब, नेत्र, अकाश, शयन गृह, वाहन, देवी की भक्ति, हाथो घोडे आदि वाहन सुख, मन्त्रित्व, सहनशील, स्त्रो संभोग, स्वतः के द्रव्य के सम्बन्ध का ज्ञान, काम- क्रीडा, मन्दिर, उन्नति, विलास, सुन्दर भाषण, उत्सव, दासत्व, रस, अद्भुत (रस), सुन्दरता, राजा, राजपुरुष, वशीकरण, गरुड़ विद्या; इन्द्रजाल, चातुरी, भाग्य, आचरण, सुख, गौरव, विभव, श्वेत तण्डुल, इवेत चन्दन, चित्र वस्त्र, श्वेत पुष्प, घृत, दघि, सुवणं, चाँदो, हीर', सुगन्ध द्रव्य, गौ, भूमि, कौमार, यौवन, अवस्था और रस, सृष्टि, सोभाग्य, सुभोजन, शैया
सुख, विनोद पुष्प गन्ध, मन्द, भोगस्थान, वेश्या रति, स्त्री जन के शरीर,
वेत वस्त्र ।
७ शनि--आयुष्य, दुष्ट बुद्धि, लोभ, मोह, घात कर्म, रोगी, सरकारो आरोप, राज दण्ड,
कंद, उद्योग हानि, दासत्व, नीच विद्या, मजदूर वगग, खेती, खनिज, नौकर
वर्ग, पराधीनता, विश्वासघात, कामगार, प्रेस का स्वामी, अशिक्षित, कायदा-
कानून में प्रवीण, नपुसकता, मिथ्यापन, पाप, नरक, शोक, अंग्रेजी शिक्षा,
जुआ खेलना, मदिरापान, मृत्यु दण्ड, जीवन, पेट, लिवर, वातव्याधि, कष्ट,
क्लेश, पराभव, भय, पतित होना, दुःख अपमान, रोग, अपवाद, कुलीपना,
अशौच, निन्दा, आपत्ति, बुढापा, स्थिरता, नीच जन आश्रय, तन्द्रा, ऋण,
महिष, लोहा, नोछ वस्त्र कम्बळ, गर्देभ, पादुका, दलिया, कृष्ण अन्न,
माषान्न, तिल तेल, कृष्ण वस्त्र, कुल्यी, कृष्णघेनु, कृष्णपुष्प, जूता, कस्तुरी,
गज, नीलम, - आयुर्दाय, जीवन का उपाय, सवं राज्य, आयुष, शूद्र, भूत्य,
(सेवक) विघ्न, शल्य, शूल रोग, बात, कृषि साधन, मृत्यु का कारण, ठगी,
मोह, लोभ, पर पीडा, निष्ठुरता, दरिद्रता, दुर्दशा और पुत्र ।
८ राहु-- आजा का सुख, गारुडी विद्या, आकस्मिक घटना, भूत बाधा, अरुचि, राज
छत्र, सन्मान, अंग्रेजी शिक्षा, बगीचा, राज्य, नाना, म्लेच्छ प्रताप, धूप,
इमशान, तस्कर भेद, विधवा, व्यौहार, शिला, बाल्मीक, चमं, ज्वर, अपस्मार, विशूचिका, संकोच, देशाटन, बैराग्य, बलात्कार, भ्रष्टता, घोर युद्ध,
पितामहे, यश, प्रतिष्ठा, छत्र का कारण, अन्धेरापन, विष, सपं, यात्राकाल,
द्यूत, माषान्न, सप्त धान्य, गोपद, नील वस्त्र, खड्ग, तिल तैछ, लोह,
कस्बल, घोडा, कृष्ण पुष्प, ताम्र पात्र, महारण्य, महोत्पात, सुख कष्ट
आदि ।
९ केतु-- तन्त्र, मन्त्र, गुप्त विद्या, आजी का सुख, एक तन्त्री विचार, मन्त्र सिद्धि के
प्रयत्न, युक्ति, गंगा स्नान, मन्त्र शास्त्र, आत्मज्ञान, विष, ज्वर, शंका,
तत्वज्ञान की ओर मन का झुकाव, वैराग्य, तीर्थाटन, भिक्षाटन, क्षोभ,
१०६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय-फलित खण्ड
कलह, विप्लव, शिव की भक्ति, गुहा प्रवेश, चिताएँ; स्त्री, माता पिता
` सास स्वसुर, मातामह ( नाना ) मातामही, ब्रण, चमं रोग, शूरु, क्षुघा,
पीड़ा, कम्बल, कस्तूरी, वैड्यं, शस्त्र, माषान्न, कृष्ण पुष्प, तिल तैल, रक्त,
सुवणं, लोहा, सप्त धान्य ।
अन्य प्रकार के कारक
(१) ग्रह एक दूसरे.के सम्बन्ध से जन्म समय में कारक होते है । जैसे-गुरु जन्म में
सूर्य से नवम हो तो यह कारक होता है । शनि जन्म में चन्द्र से ११ वां होतो
यह कारक होता है इत्यादि प्रकार से । शनि मंगल का कारक तब होता है जब
वह जन्म समय जहां है वहाँ से ११ वें स्थान में हो इत्यादि । एक दूसरे ग्रह
के शुभ मम्बन्ध से कारक कहलाते हैं ।
(२) अन्य प्रकार-ग्रह जन्म समय उच्च में, मूल त्रिकोण में हो और केन्द्र में हो तो वह
दूसरे ग्रह का कारक होता हैं। जो जन्म से दूसरे केन्द्र में होकर उच्च मूल
त्रिकोण या स्वगृही हा तो इसी प्रकार दूसरे कारक ग्रह होते है । अर्थात् ग्रह
की लाभ जनक स्थिति जब हो तब उपरोक्त बताये । स्वगृही, उच्च या मूल
त्रिकोण में ग्रह हो तो ये सब आपस में कारक होते हैं । इनमें कर्म स्थान स्थित
ऐसा ग्रह विशेष कारक होता है । जैसे लग्न में कर्क राशि में चन्द्र हो, मंगल,
शनि, सूर्य तथा गुरु अपने उच्च के हों ये परस्पर कारक कहलायेंगे । लग्न में
स्थित ग्रह का चतुर्थं दशम स्थान में स्थित ग्रह पूणं कारक होता है ।
कारक विचार पर कुछ उदाहरण
अधिकार के सम्बन्त्र में विचार करना है तो {ण्डली में रवि की स्थिति पर पहिले
बिचार करना क्योंकि इसकी शुभाशुभ स्थिति पर दशमेश और लग्नेश का फल
निभर है ।
स्त्री और प्रापडिचक सुख का निर्णय करते समय केवल सप्तम के ग्रह तथा सप्तमेश
की स्थिति से ही नहीं बिचारना किन्तु शुक्र जो इस सुख का दाता है इससे भी प्रथम
बिचार करना । विद्या सन्तति सम्पत्ति का निर्णय करते समय केवल लग्नेश, धनेश,
पञ्चमेश, नवमेश, और लामेश की ही स्थिति नही विचारना किन्तु गुर की शुभाशुभ
स्थिति पर विचार कर इन स्थानों पर उनको दृष्टि का विचार अवश्य करना चाहिये
तब पूर्ण फल प्रगट होगा ।
आथिक सुख का विचार करते समय धनेश और छामेश के साथ शुक्र चन्द्र का भी
बिचार अवश्य करना चाहिये ।
दुःख, संकट, रोग, आयुष्य आदि का शनि कारक है । इन विषयों का विचार
करते समय शनि के उच्च नीच राशि और अंश शुभ ग्रहों को दृष्टि और युति का भी
विचार करना चाहिये तभी ठीक फल मिलेगा । 1).
ग्रह कारक : १०७
आशय यह है कि किसी भी बात के विचारने में केवल ST भाव के ग्रह या उस भावेश के हो विचार करने से काम न चलेगा किन्तु उस विपय के कारक ग्रह का भी विचार कर कारक ग्रह का शुभाशुभत्व, ग्रहों की युति और दृष्टि एवं स्थिति आदि पर भी विचार करना आवश्यक है। इस कारण किसी फल के निर्णय करते समय उसके
कारक ग्रह की स्थिति आदि पर पूरा विचार करना आवश्यक है तभी ठीक फल
निकलता है 1
सुख दुःख के कारक ग्रह पर विचार
मन में सुख की इच्छा स्वाभाविक होती है परन्तु प्रत्येक प्रकार के सुख की परिभाषा भिन्न है । यहाँ वताया है कि किस ग्रह से किस प्रकार के सुख का विचार करना ।
गुरु शुक्र से--धन की स्थिति एवं द्रव्य लाभ का विचार ।
शुक्र से--स्त्री व प्रापञ्चिक सुख ।
रवि चन्द्र से--शारीरिक एवं मानसिक सुख ।
गुरु से- बुद्धि विद्या एवं सन्तति सुख ।
रवि गुरु शनि से--नौकरी अधिकार राज सम्मान ।
शुक्र बुध से--व्यौपारं या लेनदेन के धस्थे साहुकारी आदि ।
मंगल से--साहस, पराक्रम या यश का विचार करना ।
सुख का विचार करने के प्रथम कुंडली में इन ग्रहों का शुभाशुभ स्थिति आदि का
विचार करना चाहिये । इनकी शुभाशुभ स्थिति के अनुसार प्रत्येक को हानि या लाम
होना निश्चित है । इन ग्रहों का फल कुण्डली में इन ग्रहों के उच्च, नोच राशि, अंश,
गुण; दृष्टि आदि के अनुसार मिलता हे । इस कारक फल का विचार करते समय कारक
का अवश्य विचार, करना ।
भावेश और कारक में अन्तर है'
भावेश और किसी विषय का कारक भिन्न है । जैसे चौथा भाव कृषि माता भूमि
शिक्षा वाहन और पशु का है तो उस भाव के स्वामी से विचारने के अतिरिक्त उस भाव
के कारक से भी फल विचारना । इन भिन्न २ विषयों के कारक ग्रह पृथक् २ ë परन्तु
उस भाव का भावेश एक ही हूँ । जिस विषय को विचारना हैँ उसका कारक कोन ग्रह
है उससे फल निकालना ।
जैसे पाँचवां घर सन्तान और मन्त्रणा शक्ति का है । मानो मेष लग्न है तो षञ्चमेश सूर्य होगा जो सिंह का स्वामी है । परन्तु पुत्र कारक गुरु है यें दोनों अर्थात सूयं
और गुरु शक्तिशालो हों ता अच्छी और उन्नति शोल सन्तान होतो. हैं । परन्तु मन्त्रणा
शक्ति का कारक शुक्र है इससे शुक्र से भो विचार करने से मन्त्रणा शवित का फळ
प्रकट होगा ।
१०८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
कारक ग्रह का शुभाशुभत्व
कारक ग्रह--पाप युवत हो तो पराया घन-स्त्री भोगने वाला, नीरस वचन, कपट बुडि,
आलसी ।
पापदृष्ट-दुष्ट, रोगो, अपने धमं गुण यश से होन ।
शुभ युधत-दात्रु को जीतने वाला, घर्मवान, बुद्धिमान हो ।
शुभ दृष्ट-पुत्र घन से युवत) भोगी, सुन्दर, राज पूज्य पराभव से रहित ।
आत्म कारक आदि का विचार
१ आत्मकारक ग्रह--सूर्य से शनि तक सात ग्रहों में से जिम ग्रह के स्पष्ट करने पर अंश
अधिक हों वह ग्रह आत्म कारक होता है । कोई इसमें राहु ग्रह भी ले लेते
हैं अर्यात् ८ ग्रह लेकर अंश का विचार करते हैं ।
यदि ग्रहों के अंश बराबर हों कला विकला में जो अधिक हो उसे
लेना । यदि अंश कला विकला भी समान हो तो उनमें .जो सबसे बली हो
वही आत्मकारक होगा ।
आत्म कारक ग्रह नोच राशि या पाप योग से बंधन का स्वामी होता
है अर्थात प्रतिकूल होकर पाप कर्म में प्रवृत्ति के द्वारा संसार रूपी बंधन
देता है । उच्चादि राशि और शुभ योग से मोक्ष का स्वामी होता है अर्थात्
अनुकूल होकर ज्ञान घर्म स्थान वासादि द्वारा मोक्ष कर्ता होता है ।
२ अमात्य कारक qg -( मन्त्रो कारक ग्रह )--आत्म कारक ग्रह से कुछ न्यून अंश
बाला ग्रह होता है ।
` जिस कुंडली में अमात्य कारक ग्रह नोचादि पाप ग्रह से युक्त हो
उसको राजा मन्त्री, स्वामी आदि श्रेष्ठ लोगों से दुःख देता है उच्चादि शुभ
ग्रह से युक्त हो तो राजा आदि जनों से सुख देता है ।
३ आतु कारक ग्रह--आमात्य कारक ग्रह से कुछ अल्प अंशादि से कम ग्रह होता है ।
इससे भ्रातु सम्बन्धी दुःख सुख का विचार होता है ।
४ मातु कारक--भ्रातु कारक ग्रह से कुछ अल्प अंशादि वाला ग्रह । इससे मातृ सम्बन्धी
दुःख सुख का विचार होता है । इससे कोई qq का भी विचार करते हैं।
५ पितु कारक--मातृ कारक से कुछ अल्प अंश वाला ग्रह । इससे पिता सम्बन्धी दुःख
सुख का विचार होता ë ।
६ पुत्र कारक ग्रह--पितु कारक से अल्प अंश वाला ग्रह । इससे पुत्र सम्बन्धी दुःख सुख
का विचार होता ë । :
७ ज्ञाति कारक qg—qa कारक से अल्प अंश वाला ग्रह । इससे ज्ञाति सम्बन्धी दुःख
सुख का विचार होता है ।
ग्रह कारक : १०९
८ वारा कारक ग्रह- जाति कारक से अल्प. अंश वाला ग्रह । इससे दारा (स्त्री ) संबंधी दुःख सुख का विचार होता है । सम, . स्थिर, पद, उपपद आदि कारक से भी स्त्री सम्बन्धी विचार होता है । उदाहरण स्वरूप ७ ग्रह स्पष्ट में आत्म कारक आदि नीचे बताया जाता है ( इसमें राशि का कोई विचार नहीं होता केवल अंशादि का विचार करना ) ।
आत्म कारक आदि का उदाहरण
EZ गण[sas
१ सूर्य ११-५-४०-४५ ग्रह ५ गुरु ९-१३-३४-९ ` स्पष्ट | रे चन्द्र १०-२-७-५५ ६ शुक्र ११-१३-३३-४८ ३ मंगल ७-१२-२९-४४ ७ शनि ४-८-३९-४८ ४ बघ १०-२०-५६-५६ ८ राहु २-८-६-३२
उनि कारक | आत्म | अमात्य र | भ्रातृ आज
मातृ कारक | कारक | कारक | कारक | पुत्र | ज्ञाति नक आओ कारक | कारक l
i I
ग्रह
शि १ ३ x कारक आत्म अमात्य भ्रातृ मातु कारक कारक कारक कारक ग्रह मंगल
अंशादि १२-२९-४४
५ < ७ < पितृ पुत्र ज्ञाति दारा कारक कारक कारक कारक
यं चं sf" , ” दहु 1 ” w 1 77 ० 3 3
TT
८-३९-४८ ८-६-३२ ५-४०-४५ | २-७-५५
— h आळ
११० : ज्योतिष-जिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
स्थिर कारक विचार
(१) पितृ कारक- सूयं और शुक्र में जो बको हो इन दोनों से माता और पिता के
(२) मातृ कारक- चन्द्र और शुक्र ,, ,, शुभाशुभ का विचार होता है।
चर कारक
( १) अमात्य- आत्म कारक से न्यून अंश वाला
( २) ञ्रातृ--उससे न्यून अंश वाला
(३) पिता--,, ४
( x ) पुत्र esa 11 ”
(५) ज्ञाति-- ,, i;
(६)स्त्री- , १
इस विचार में भो भिन्न २ मत हैं :--किसो का मत है कि जब किसी ग्रह में
अंक्षादि तुल्य हो जावें तब राहु से भी कारक का विचार करे कोई कहते हैं कि राहु सहित
८ कारक पृथक् विचारना ।
कुछ का मत है कि मातु कारक और पुत्र कारक एक हो है अर्थात् दोनों को एक
मानते हैं । यह भी बताया है कि जब दो ग्रहों के अंश तुल्य हों तो एक ही कारक समझना उसके अग्रिम कारक का लोप हो जाता है। उस हालत में स्थिर कारक के द्वारा ही
छुभाशुभ का विचार करना ।
राहु के अंश का विचार
राहु का कारक विचारने में उसके स्पष्ट अंश को ३०° में से घटा कर शेष अंकों
को लेकर कारक विचारना क्यों कि वह सदा उल्टा चलता है । जैसे राहु स्पष्ट
रा अं ? ” है इस के अंश ३० से घटाये तो शेष २ १-५३-२८ ३०-"-०
२-८-६-३२ ; -८-६-३२
रहे । यहां २१° राहु लेता बताया ë! शेष २१-५३-२८
यहां इस प्रकार विचारने से राहु के अंश सब में अधिक जाने से उपरोक्त ग्रहों
में वह आत्म कारक हो जाता है।
आत्म कारक ग्रह--सब से अधिक अंश वाला ग्रह ।
अन्त्य कारक ग्रह--सब से अल्प अंश वाला ग्रह ।
मध्य कारक .उपखेट--मध्य के अंश वाला ग्रह् ।
प्रन्त्री आदि अधिकारी राजा को आज्ञा के बिना किसी का कुछ नहीं कर सकते इसी
प्रकार आत्म कारक के विरुद्ध कोई भी ग्रह अपने फल देने में समर्थ नहीं होते । जैसे
आत्म कारक ग्रह अशुभ हो तो अन्य शुभ ग्रह भी अपने फल को नहीं दे सकते । यदि
आत्म कारक शुभ हो तो ग्रह अपने अशुभ फल को नहीं देते ।
कारकांश विचार
आत्म कारक ग्रह के नवांश को कारकांश कहते हैं ।
ग्रह कारक : १११
आत्म कारक ग्रह के नवांश पर से ग्रहों का फल
१ मेष नवांश-घर में चुहे और बिल्ली का उपद्रव, पाप दृष्टि हो तो विशेष कर, र शुभ दृष्टि हो तो थोड़ा उपद्रव हो ।
२ वृष ,,--चतुष्पद पशुओं से सुख हो । ३ मिथुन ,,--दाद खुजलो आदि रोग हो, कुष्ठादि रोग हो । ४ कर्क ,,--जल में डूबने का भय हो, कुष्ठादि रोग हो | ५ सिंह ,,--बाघ आदि हिंसक जन्तुओं या कुवकुर आदि जीवों से भय हो । ६ कन्या ,,--खुजली स्थूलता और अग्नि भय । ७तुला ,,--वणिज से लाभ, व्यापारी और वस्त्र आदि बनाने वाला । ८ वृश्चिक ,,--जल सपं आदि जन्तुओ से भय, माता के स्तन में पीड़ा या दुध की हानि ।
५ घन उच्च स्थान से या वाहन से क्रमशः ( कहीं २ रुक २ कर ) पतन हो । १० मकर ,,--जल जन्तु और पक्षी आदि से लाम | तथा ग्रह दुःख दायक हो, कंडु रोग, दृष्ट, ग्रन्थि, गंड माला आदि का भय ।
११ कुंभ ,,--तालाब, कूप जलाशय आदि बनावे ।
१२ मीन ,,-घर्म में नित्यता और मोक्ष पावे ।
१ शुभ राशि या शुभ नवांश में आत्मकारक हो तो धनी होता है ।
२ केन्द्र में अंश हो शुम हो तो राजा होता है । शुभ राशि के अंश में शुभ ग्रह हो
स्वउच्च, स्वगृद्दी आदि हो, पाप योग रहित हो तब उपरोक्त फल होता है ।
इनमें शुभ ग्रहों को दृष्टि हो तो अशुभ फल नाश होता है । पाप दृष्टि हो तो शुभ
फल का अभाव रहता है । अर्थात्
` १ यदि आत्म कारक के नत्रांश में या लग्न के नवांश में शुभ ग्रह हो और केवल शुभ
दृष्टि हो तो निश्चय रूप से राजा हो!
२ आत्म कारक के नवांश से केन्द्र या त्रिकोण में शुभ ग्रह हो पाप योग या दृष्टि न हो
तो धनी और विद्वान हो 1 मिश्र ग्रह (शुभ और अशुभ ग्रह) से मिश्र फल हो ।
३ पूर्वोक्त उपग्रह (मध्यमांश) यदि अपने गृह या शुभ राशि में हो उस पर पाप योग
या दृष्टि न हो तो मुक्ति का भागी हो ।
४ आत्म कारक यदि चन्द्र मंगल या शुक्र के षड्वर्ग में हो तो परस्त्रीगामी हो उपरोक्त स्थिति से अन्यथा हो तो फल भी अन्यथा होगा ।
कारकांश में ग्रह स्थिति का फल
आत्म कारक नबांश में यदि
१ सुर्य हो--राज्य कायं कर्ता हो 1
११२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
` ९ पूर्ण चन्द्र हो--भोगी, विद्या से जीविका चलावे ।
३ शुक्र की दृष्टि या योग हो--विशेष योगी और विद्वान हो ।
४ मंगल हो--माळा रखने वाला, अग्नि से जीविका करने वाला तथा दसों का
जानने चाला ।
५ बली बुध हो--कला और शिल्प विद्या में निपुण, व्यापार दक्ष, कपडा बिनने वाला या
चित्रकार या व्यापारी ।
६ गुरु हो--सुकर्म करने वाला ज्ञानी, वेदज्ञ ।
७ शुक्र हो--शताब्द जीवी (१०० वर्ष की आयु), कामी, राज्य कर्म करने वाला ।
८ शनि हो--प्रसिद्ध कर्म से जीविका करने वाला ।
९ राहु हो--धनुर्धारो, चोर, विष विद्या जानने वाला, (विष वैद्य) लोह यन्त्रादि बनाने
वाला ।
१० केतु--हाथियों आदि का व्यापार करने वाला, चोर ।
विशेष विचार
(१) कारकांश राहु से युकत--सूर्य हो तो सपं से भय या मृत्यु, शुभग्रह की दृष्टि हो तो
सर्प से मरण नहीं होता, या भय टल जाता है । पाप दृष्टि हो तो सपं से मृत्यु हो।
` इसमें शुभग्रह का पड्वर्ग हो या शूभ सम्बन्ध हो तो विषवेद्य हो । इसमें केवल
मंगल की दृष्टि हो तो अपने या दूसरे का घर जछाने वाला । Tasa दृष्टि होकर
शुक्र भी देखे तो गृह दाह रने वाला नहीं होता है । मंगल की दृष्टि होकर बुध
भो देखे तो गृह दाह करने वाला नहीं होता है । मंगल की दृष्टि होकर गुरु भी देखे .
तो स्वगृह और समीप के ग्रह जलावें । पाप ग्रह का षड्वर्गं हो और गुरु को दृष्टि
हो तो समीप के ग्रह सहित इष्ट घर जलावे ।
(२) यदि कारकांश में गुलिक हो तो दूसरों को विष देवे या स्वयं विष खाकर मरे।
यदि कारकांश में गुलिक हो चन्द्र की दृष्टि हो-उसका घन चोर ले जाय या रवयं
चोरी करने वाला हो ।
उसमें केवल बुध की दृष्टि हो तो बड़े अंड कोष वाला हो ।
(३) केतु युक्त कारकांश पर पाप ग्रह को.दृष्टि-कणे रोग हो या कणंच्छेद हो ।
उसपर शुक्र की दुष्टि-जातक दीक्षित हो, यज्ञादि में मन्त्र ग्रहण करे ।
शनि और बुध की दृष्टि ही-निबंल हो ।
बुध ओर शुक्र की दृष्टि हो-दासी पुत्र या पुनभू का पुत्र हो या एक ही बात को
फिर २ बोलने वाला sl!
शनि और अन्य ग्रह की दृष्टि हो तो तपस्वी या भृत्य हो 1
ग्रह कारक : ११३
| केवल शनि की दृष्टि--संन्यासी का भेष धारण करने वाला नकली संन्यासी हो । रवि और शुक्र की दृष्टि-राजभूत्य हो ।
ये फल आत्मकारकांश के कहे हैं आगे कारकांश के अन्स्थान का फल कहा है।
२ फारकांश से हितोय स्यान का फल
(१) द्वितीय भाव में शुक्र और मंगल का षड़वर्ग हो-पर स्त्री गामी । उसपर शुक्र और मंगल की दृष्टि हो-आमरण परपत्नी के रहे ।
उसमें केतु हो तो यह फल नहीं होता ।
द्वितीय में केतु हो उस पर पाप दृष्टि हो-तो शीघ्र बोलने में असमर्थ हो ।
(२) द्वितीय में गुरु-स्त्री में आसक्त ।
राहु-्त्री के हेतु धन का नाश ।
हे तृतीय स्थान फल
(१) कारकांश से तृतीय स्थान में पाप ग्रह हो-शूर प्रतापी ।
तृतीय स्थान में शुभ ग्रह हो-कायर ( डरपोक ) ।
४ चतुर्थं स्थान फल š
कारकांश से चतुर्थ में-चन्द्रमा या शुक्र का योग या दृष्टि ही-पक्का मकान हो ।
उच्च का ग्रह हो-प्रासाद ( पक्काघर ) ।
शनि या राहु का योग या दृष्टि हो-शिला गृह ।
मंगल केतु का योग या दृष्टि-इंट का घर 1
गुरु गा > लकड़ी का घर |
रवि ४. तृण का घर |
कारकांश से चतुर्थ में चन्द्रमा-आवरण रहित स्थान में हो गृहिणी (स्त्री ) के साथ
प्रथम समागम हो अर्थात् बिना परदे की जगह में स्त्रीसँयोग करने वाला ।
कारकांश से चतुर्थ में केतु हो-घड़ी बनाने वाला ।
बुध हो-परमहंस या दंडी ।
राहु -लोह यन्त्र बनाने वाला ।
सूर्यं -खड्ग धारण करने वाला ।
मंगल -भाला रखने वाला ।
५ पञ्चम स्थान फल
कारकांश से पञ्चम में मङ्गल और राहु हो तो-क्षय रोग की सम्भावना ।
उस पर चन्द्र की दृष्टि हो तो-निश्चय क्षय रोग हो ।
मङ्गल की दृष्टि-पिड़की आदि रोग का मय ।
केतु ,, संग्रहणी या जलोदर ।
राहु सहित गुलिक हो क्षुद्र विष का भय हो ।
११४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
पञ्चम में बुध हो तो-परमहंस या दंडी हो ।
रवि ,, -खड्गघारी हो ।
मङ्गल ,, -माछा रखने वाला ।
शनि ,, -धनुष रखने वाला या धनुविद्या में निपुण ।
राहु ,, —g यन्त्री ( लोह यन्त्र बनाने वाला )
केतु ,, -घटी यन्त्र बनाने वाला या घड़ी साज ।
शुक्र ,, "कवि वक्ता और काव्य को जानने वाला हो ।
कारकांदा ओर उसके पञ्चम स्थान का विदोष फल
७
आरमकारक या उससे पञ्चम में चन्द्रमा और गुरु हो-प्रन्य बनाने वाला (ग्रंथकार)
और सब विद्या जानने वाला हो ।
चन्द्र और शुक्र हो-उपयोग की अपेक्षा कुछ-न्यून ग्रन्य बनाने वाला ।
चन्द्र और बुध हो-भोर भो न्यून ग्रन्थकार ।
केवल गुरु हो-सवंज्ञ ओर ग्रन्थकार वेदान्त, शब्दज्ञ तथापि अधिक वक्ता नहीं
होता ।
मङ्गल हो-नैयायिक ।
बुध हो -मीमांसक ।
शनि हो -सभा में मूक ( सभा जड़ )
सूर्य हो -गीताज्ञ, वेदान्त और ज्ञान जानने वाला ।
चन्द्रमा हो-साँख्य योग साहित्य और सद्धोत जानने वाला ।
राहु या केतु-गणितज्ञ 1
é
इन दोनों में गुन का सम्बन्ध हो तो उसे सम्प्रदाय को मिदि होतो है ।
कोई कारकांश से द्वितीय स्थान से भी इन फलों को कहते हैं ।
कुछ आचायं तृतीय स्थान से भी इसी प्रकार का ws विचारते हुँ ।
कारकांश से षष्ठ स्थान का फल
कारांश से षष्ठ स्थान में पाप ग्रह हो-कृषि कर्मा हो ।
शुभ ग्रह „आलसी ।
तृतीय स्थान से भी यही फल विचारना ।
सप्तम स्थान का फल कारकांश से सप्तम में चन्द्र व गुरु का योग या दृष्टि हो-अति सुन्दरी स्त्री हो ।
सूयं व गुरु शा योग या दृष्टि हो-अपने कुल में रक्षिता और विकलांगो ।
शनि » रु -आयु से अधिक, तपस्विनी या रोग-युक्ता
स्त्री हो ।
राहू = -विधवा स्त्री का संग होता है । अर्थात्
विधवा से सम्बन्ध हो ।
८
ग्रह कारक : ११५
मद्धळ का योग या दृष्टि हो कुल लक्षण से युवत अङ्ग वाली स्त्री | चुन c pp गीत वाद्य आदि कलाओं में निपुण ।
फारकांश से अष्टम स्थान का फल
कारकांश से अष्टम में शुभ ग्रह हो और अपने स्वामी से युका या दृष्ट हो-दीर्घायु ।
n x” पाप दृष्टिया युक्त -- अल्पायु ।
" „» दोनो से युक्त या दृष्ट -- मध्यमायु ।
कारकांश से नवम स्थान का फल
कारकांश से नवम में शुभ ग्रह की दृष्टि या योग-सत्यवक्ता और धर्मात्मा, गुरु भक्त पाप ग्रह की दृष्टि या योग-बाल्यावस्था में अपने घमं में रहता है । वृद्धावस्था में धमं का त्याग कर मिथ्यावादी होता है । असत्य भाषी, गुरु का अभक्त ।
शनि या राहु से युक्त या दुष्ट-गुरु द्रोही वाल काल में शास्त्र से विमुख हो ।
सूर्य या गुरु गै n गुरु द्रोही, गुरु का वाक्य न माने अविश्वास करे। शुक्र या मङ्गल का षड़वर्ग हो या युक्त दृष्टि हो-दूसरे की स्त्री को मारने वाला
या परस्त्री रत ।
शुक्र या मङ्गल का पड़वर्ग और गङ्गल और शुक्र की दृष्टि हो-मरण पगंन्त
परस्त्रीरत ।
बुध, चन्द्र, युत या दृष्ट-पर स्त्री सम्बन्ध में त्रन्धन प्राप्त हो ।
केवल गुरु की योग दृष्टि-अपनी स्त्री में आसतत, स्त्रीठोलुप विषयी ।
केतु ,, मरने तक परस्त्री में आसक्त नहीं रहता परन्तु परस्त्री रत होता है ।
राहु णा पर स्त्री के लिये घन का नाश ।
नवम में गुरु हो-विशेष कर खेती करने वाला हां ।
वशम स्थान का फल
कारकांश से दशम में शुभ ग्रह या योग या दृष्टि-स्थिर धन वाला, गम्भीर, बली,
बुद्धिमान ।
पाप ग्रह का योग या दृष्टि-व्यापार में हानि, पिता के सुख से होन ।
बुध शुक्र दोनों का ,, „ व्यापार में अनन्त लाभ बड २ कार्य करने वाला ।
सूर्य चन्द्र से और गुरु से युत या दृष्ट-राजा हो ।
बुध का योग का दृष्टि-प्रसिद्ध कमं से जीविका करने वाला |
बुध से शुभ ग्रह की दृष्टि-पुरोहित या विवाद का निर्णय करने वाला हो t
रवि हो और केवल गुरु से दृष्ट हो-गौरक्षक |
११६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
११ एकादश लाभ स्थान का फल
कारकांश से लाभ स्थान शुभग्रह युक्त या दृष्ट हो-भाई के 'सुख से से युत, सब
कार्यो में लाभ ।
हर पाप ss „ अनीतिसे लाभ करने वाला,
. विख्यात, पराक्रमी ।
१२ हादश (व्यय ) स्थान का फल
आत्मकारक नवांश से व्यय भाव शुभ ग्रह युत या दुष्ट-सत कायं में व्यय करने
वाळा और अन्त में सदगति पाने वाला स्वर्ग आदि शुभ लोक प्राप्ति हो ।
पाप ग्रह से युत या दुष्ट हो-असत कायं में खर्च । अन्त अघोगति पावे ।
आत्मकारक नवांश से व्यय भाव में कोई ग्रह न हो तो-शुभ फल ।
यदि स्वोच्च या स्वगृहो शुभ ग्रह हो-स्वगं आदि लोक को प्राप्ति ।
शुभ ग्रह से युत दृष्ट केतु हो-मोक्ष ।
शुभ ग्रह से युत या दृष्ट मेष या घनु में केतु हो-सायुज्य मुक्ति ।
केवल केतु हो या पाप ग्रह से युत दृष्ट-शुभ लोक की प्राप्ति नहीं होती ।
व्यय में केतु सूर्य युक्त हो-शंकर में भक्ति 1
» चन्द्र ,, -गौरी में ।
» शुक्र , “लक्ष्मी में ।
„ मङ्गल ,, -कातिकेय में ।
„ वघ शनि युक्त-विष्णु में ।
„# गुरु „ “शिव में ।
राहु से युत-तामसी दुर्गा में और क्षूद्र देवता में भक्ति ।
केतु - गणेश और कातिकेय में ।
पापराशि में शनि शुक्र हो-क्ष द्र देवताओं का भक्त हो ।
मीन या कर्क राशि हो : उसमें शुभ ग्रह हो-स्वर्ग आदि लोक प्राप्ति, सायुज्य
मुक्ति मिले ।
” | पाप ,, -नरक आदि की प्राप्ति हो ।
जिस प्रकार आत्मकारकांश के व्यय स्थान से देवताओं की भक्ति का विचार
होता है, उसी प्रकार आत्म कारकांश से षष्ठ स्थान से भी विचारना अर्थात्
बष्ट में सूर्य केतु -शिव में भक्ति ।
» चन्द्र ,, “गौरी में ।
„ शुक्र ,, लक्ष्मी में
`, मंगल ,, -कातिकेय में ।
» बुध ओर शनि -बिष्णु में ।
११ 8 ,, “पार्वती सहित शिव में ।
ग्रह कारक : ११७
षष्ठ मै राहु केतु -मूतादिक देवताओं में ।
-गणेश और कातिकेय में । पापराणि में शनि व शुक्र हों-क्ष॒द्र देवताओं में भक्ति । कारकांश का ओर भी विशेष फल १
५
कारकांश से ५--९ भाव में २ पाप ग्रह हों = मन्त्र तन्त्र जानने वाला । उस पर पाप ग्रह कौ दृष्टि हो = यह निग्रह ( दंड ) करने वाला हो । उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो = अनुग्रह करने वाला हो । आत्मकारक नवांश में चन्द्र हो 'उस पर शुक्र को दृष्टि हो-रस ( स्वर्णभस्म, मकर- ध्वज आदि ) का बनाने वाला और जानने वाला । उस पर वुध को दृष्टि-उत्तम धैच हो । आत्मकारकांश से चतुर्थ में चन्द्र हो उस पर शुक्र को दृष्टि हो-श्वेत कुष्ठी या पाण्डुरोग ।
चन्द्र हो मङ्गल को दृष्टि-रक्त पित्त से महारोगी । चन्द्र हो केतु की दृष्टि हो-नील कुष्ठी ।
आत्मकारकांश से ४ या ५ भाव में मङ्गल या राहु हो-क्षय रोगी ।
इस राहु पर चन्द्र की दृष्टि हो-निश्चय क्षय रोगी । आत्मकारकांश से ४-५ भाव में केवल मंगल हो-पिड़को ( फोड़ा आदि 'रोग ) होती है।
केवल केतु हो-संयहणो या जलोदर रोग । केवल राहु और गुलिक हो-विष वैद्य या विष से पीड़ित, या बिच्छू आदि क्षुद्र विष
से पोडित ।
आत्मकारकांश से २ या ३ भाव में केतु-बोलने में अक्षम ।
पाप दृष्टि हो-विशेष कर बोलने में अक्षम । कारक योग विचार द ( १') कारक-लग्न गत ग्रह का दशम चतुर्थ वाला ग्रह यदि उच्चादि राशियों में हो
तो कारक कहलाता ë ।
(२ ) स्वराशि का मूल त्रिकोण या उच्चगत ग्रह केन्द्र में हो और वंसा ही स्वगृहादि
स्थिति बाला ग्रह उससे दशम में हो तो कारक योग होता हैं । दशम स्थान में
वह तात्कालिक मित्र होता है इससे दशम का महत्त्व है। अर्थात् जन्म समय मित्र
की राशि, स्व॒रांशि, उच्च या मूल त्रिकोण के ग्रह होकर केन्द्र में हों तो यह
कारक (सुख योगोत्पादक ) होते हैं। जैसे १,७,४,१० भाव bie उच्चादि
शुभ स्थान में ग्रह हो तो योग कारक होते हँ । उनमें ss में विशेष योग कारक
होते है । यहाँ लग्न से केन्द्र होना योग का हेतु नहो हे । यदि ग्रह अपने २
उच्चादि में होकर किसी भाव से भी परस्पर केन्द्र में हों तो भी ' योग्य कारक
११८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
समझे जाते हैं । जिनके जन्म समय इस प्रकार योग कारक हो वह नीच बंश में
भी उत्पन्न होकर राजा के समान धनवान. और सुखी होता हँ । राज बंशोपन्न
तो निश्चय हो राजा होता है। इसी प्रकार कारक की संख्या और कुल के
अनुसार अनुपात से फल समझना। जैसे
लग्न कर्क में चन्द्र गुरु हो, चतुर्थ में शनि
हो, सप्तम मंगल; दशम _ सूर्य हो- तो ये
सब ग्रह केन्द्र में उच्चवर्गी हैं भतः ये
परस्पर कारक हुए। ऐसे हो स्वगृही, मूल
विशषण वाले ग्रह भी कारक होते हैं ।
या चन्द्र स्वगृही होकर या उच्च का
होकर लग्न में हो ओर मंगल सूर्य शनि गुरु ये चारों ग्रह भी केन्द्र में हों तब सब ग्रह
कारक संज्ञक कहलायेंगे ।
या जन्म में सिह या मेष का सूर्य लग्न में हो तो सूयं शनि गुरु ये परस्पर कारक
संज्ञक हुए ।
( ३ ) कुंडली में शुभ ग्रह लग्न में हो और कोई भी ग्रह दशम या चतुर्थ में बैठा हो तो
वह कारक संज्ञक हो जाता है वह कारक ग्रह अपने उच्च राशि मूल त्रिकोण या
स्व राशि में हो तो फलदायक होता है ।
( ४ ) उच्च, मूल, त्रिकोण, स्वराशि, व स्वनवांश में बैंठा ग्रह दशम भाव में हो तो
विशेष कारक होतां है । इनमें भी विशेष कर सूर्य को यह कहा जाता है ।
(५ ) एक ग्रह दुसरे ग्रह से अच्छा सम्बन्ध होने से जन्म समय. कारक होते हैं जैसे गुरु
जन्म में सूर्य से नवम है तो यह कारक हो गया ।
शनि जन्म में चन्द्र से ग्यारहवां है तो यह कारक हो गया ।
शनि मंगल का कारक तब हो जाता है जब वह जन्म समय जहां है वहाँ से
ग्यारहवें में हो । ऐसी स्थिति लाभजनक होती है।
( ६) जो ग्रह दशम स्थान में ह वह॒ उस ग्रह से दशम स्थान में जो ग्रह है उस ग्रह में
विशेष कर कारक हो जाता है ।
(७ ) लग्न को छोड़कर परस्पर केन्द्र .में स्वक्षेत्र या उच्च या मूल त्रिकोण में हो तो
कारक होता ë । -
(८) जो ग्रह लग्न में हो यह ग्रह लन में दशाम में या चतुर्थ में हो तो कारक होता है ।
(९) इग्न में जो ग्रह हो उससे सर्व ग्रह कारक होता हूँ. परन्तु शेष स्थान में लग्न में
का ग्रह कारक नहीं होता ।
(१०) कारक होने का केन्द्र कारण है ऐसा नहीं है परन्तु जो ग्रह. स्वदोत्री उच्च या
मूल त्रिकोण में है व उसते दशम में. जो ग्रह है वह ऊपर बताये अधिकार का या
मित्र क्षेत्र का है तो कारक होता ë 1: यदि जन्म काल में उपरोक्त अधिकार को
ग्रह कारक: ११९
छोड़ कर केवल दशम स्थान में हो तो कारक नहीं होता क्योंकि उसे स्वक्षीत्र आदि का अधिकार नहीं है ।
(११) कारक ग्रह यात्रा व युद्ध के समय अवश्य देखना चाहिये क्योंकि उस समय (१) नीच का ग्रह (२) पराजित ग्रह (३) या लग्नेश का शत्रु ग्रह हो तो इन ३ ग्रहों की दशा में गमन नहीं करना ।
(१२) जन्म लग्नेश की दशा या उसके मित्र की दशा में या चन्द्र से दूसरे स्थान में शुभ ग्रह है तो उसकी दशा में या जिस:राशि का कारक है वहाँ उस राशि में चन्द्र ë तो युद्ध या यात्रा करने में सौख्य, धन प्राप्त होता है । इसके अतिरिक्त अन्य की दशा मे कष्ट होता है ।
(१३) सूर्य से दूसरे स्थान में शुभ ग्रह बुध, गुरु, शुक्र में से कोई हो तो जन्म सफल जानो । (१४) चार केन्द्र में से एकाघ केन्द्र में ग्रह न. हो तब भी जन्म सफल जानो । (१५) जन्मकाल में कारक ग्रह जिसे है उसका जन्म शुभ होता है जितना विशेष गुण हो उतना शुभ होता है।
(१६) यदि जन्म या यात्रा काल में शुभ ग्रह केन्द्र में न हो तो वह जन्म या यात्रा शुभ नहों समझना ।
(१७) जिसके देखि संज्ञक स्थान में ( सूर्य से दूसरे स्थान में ) शुभ ग्रह हो और लग्न और जन्म राशि अपने नवांश में स्थित हो और समस्त केन्द्र ( चारों केन्द्र ) शुभ ग्रहों से युक्त हों उसके घर में लक्ष्मी वास करती है अर्थात् कई पीढ़ियों तक द्रव्य का अभाव नहीं रहता ।
“ इस योग में जन्म लग्न ही केवल अपने नवांश में हो तो भी उपरोक्त फल होगा ।
(१८) जिसका गुरु, लग्नेश ओर जन्म राशि का स्वामी केन्द्र में बैठे हों उसका भाग्य
मध्यावस्था में (जवानी में) उदय होता. ह अर्थात् सुख हो, भाग्य का विस्तार हो।
(१९) उपरोक्त गुरु, लग्नेश और जन्म राशीश यदि .शीर्षोदय राशि में हों तो गुरु से
बालपने में, छग्नेश से मध्यावस्था में, और चन्द्र राशोश से बृद्धावस्था में भाग्यो-
दय होगा अर्थात् इनमें से जो भी शीर्षोदय राशि में हो उस अवस्था में भाग्योदय
गा ।
(२०) र 'कुण्डली में वर्गोत्तम लग्न, नवांश हो या चन्द्र वर्गोत्तम नवांश में हो उसका
` सारा जन्म शुभ होता है । (२१) जिसके चारों केन्द्र ग्रह रहित नहो हैं उसका सारा जम्म शुभ होता है । इसमें शुभ प्रह होने से विशेष शुभ होता ë ।
(२२) जिसके ग्यारहवें या दशर्वे या लग्न हो के सम्मुख ग्रह हों तो कारक योग होता ë ।
नीच वंश में उत्पन्न भो उच्चपद पाता ë ।
१२० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
(२३) शुभ वर्गोत्तम में जिसका जन्म हो और बारहवे स्थान में शुभ ग्रह और अशून्य
कारक ग्रह हो तो--
सूय केन्द्र में होने से-राजा का सेवक ।
चन्द्रमा केन्द्र में होने से-वेल्य वृत्ति करने वाला ।
मंगल केन्द्र में होने से-वीर और शस्त्र की वृत्ति करने वाला ।
बुघ केन्द्र में होने से-पढ्ने वाला ।
गुरु केन्द्र में होने से-अपने अनुष्ठान में रत अच्छी बुद्धि वाला ।
शूक्र केन्द्र में होने से-विद्या और द्रव्य युक्त ।
शनि केन्द्र में होने से-नीच की सेवा करने वाला ।
पद लग्न या आरूढ़ लग्न निकालना
जिस कुण्डली में पद लग्न जानना हो तो देखो लग्न स्वामी कौन है और कहाँ पर
हैं । लग्न से जितने स्थान पर लग्ने होगा उस स्थान अर्थात् लग्नेश के स्थान से उतना
ही स्थान और गिनने पर जो राशि वहाँ ही वहो पदलग्न होगी । जैसे यहाँ पर लग्नेश
बुध ९ स्थान कुंभ में है। तो बुघ से स्लम
९ स्थान आगे और गिना तो तुला
आया । लग्न से पांचवें घर में है तो
यहाँ तुला पदलरन हुआ ।
यदि लग्नेश सप्तमम हो तो सप्तम
स्थान से गिनने पर वही सप्तम स्थान
आया जहाँ लग्न है । ऐसी परिस्थिति
में लग्न की राशि ही पदलग्न हुआ। जैमिनि ने पदलग्न का प्रयोग किया है इसे ही
लरनाख्ढ़ कहा है । इसे पद कहते हैं । पद शब्द Q ऊग्नपद ग्रहण करना ।
इसमें स्वस्थान या सप्तम राशि पर पद नही होता । यह भी कहा हैं कि जब
सप्तम स्थान पर पद होता हो तो चतुथं भाव को पद समझना ।
यदि स्वस्थान पर पद होता हो तो दशम भाव को पद समझना ।
जैसे जब चतुर्थ में लग्नेश हो तो उससे चतुर्थ गिनने पर सप्तम भाव में पद आता
है ऐसी परिस्थिति में चतुथं भाव को ही पद समझना ।
जब लग्नेश सप्तम में हो तो उससे सप्तम स्थान गिनने पर वह लग्न स्थान आ
जाता है तब दशम भाव को पद समझना बताया गया है । i
यह पदलरन महत्त्व का होता है । इसको भी लग्न मानकर फल या विचार
होता है । '
भाव पद
लर्न का पद qaq प्रत्येक भाव का पद निकाळ कर उससे फल का विचार होता
है । उस भाव का स्वामी जितने स्थान पर है उस भावेश के स्थान से उतना ही आगे
OR **्णाणाणा -— 1
ग्रह कारक : के `
गिनने पर भाव का पद निकलता है 1 जैसे दूसरे स्थान मे कर्त है जिमका स्वामी चन्द्र कर्क राशि से अष्टम स्थान कुम्भ में है तो उससे आगे ८ स्थान और गिना तो सिह. राशि आई यहां शनि है यह दूसरे भाव का पद हुआ । इसो प्रकार प्रत्येक भावका | पद समझना ।
ग्रहों का पद
उपरोक्त प्रभार से ग्रहों का भी पद निकलता हे । जिस ग्रह से उसका गृह (स्वस्थान) जितने घर आगे हो उससे उतना ही आगे गिनने पर उस ग्रह का आरूढ़ ( qz) समझना । जिस ग्रह की २ राशि हों उसकी प्रवठ राशि तक गिनतो कर पद समझ कर उसके अनुसार फल विचारना ।
उपपद् विधार
(१) सम राशि का लग्न हो उससे जो द्वितीय भाव हे उतरा जो पद हुँ उसको उपपद कहते है । इस की गणना उत्क्रम गणना से होतो ë!
(२) विषम राशि क! लग्न हो तो उस से बारहवें भाव का जो पद Š उस को उपपद कहते हैँ । इस का गिनती क्रम गणना से होती ë
जैसे यहां धन लग्न है zg विपम हँ इस
कारण यहां क्रम गणना से लग्न के पृष्ठवर्ती
बारहवें भाव में वृश्चिक राशि हुई जिस का
स्वामी मंगल, वृद्दिचक से ११ वें स्थान कन्या
में हूँ । इस कारण कन्या से ११ स्थान आगे
गिना तो ११ š स्थान पर कर्क आया यही
इस कुण्डली में उपपद हुआ । उपपद को
उपारूढ़ और गौण पद भी कहते हैं ।
लग्न पद का फल
पद लग्न से ११वें स्थान में ग्रह के अनुसार फल
(१) पाप ग्रह या छूम ग्रह का योग या दृष्टि हो-सुखी और घनवान हो ।
( २) शुभ ग्रह से युत या दृष्ट हो-नीति मार्ग से घनका लाभ हो ।
(३) पाप ग्रह से युत या दृष्ट हो-कुत्सित वृत्ति से <न लाम हो ।
(४) दोनों शुभ और पाप ग्रह युत या दृष्ट होतो सुमागं ओर कुमार्ग से घन
लाभ करे । š
(५ ) उच्च स्वराशि मूल त्रिकोण आदि राशि मे ग्रह हो-विशेष कर लाभ हो 1
२-(१) यदि लग्नाख्ढ स्थान मे १ रैवें स्थान का ग्रह देखे ऑर द्वादश स्थात को न देखे
तो अति घनवान हो ।