सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
२६० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
(३) मिथुन राशि--६ मास, ६ वर्ष में कष्ट, अंग रोग, १० में नेत्र पीडा, १२८
१८ š घात, २४, ५३, ६३ में अल्प मृत्यु । उस राशि पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो ८५
वर्ष की आयु हो पोष मास अष्टमी, बुधवार, आर्द्रा नक्षत्र, प्रथम प्रहर में मृत्यु हो
(मान सा०) पांचवें में वृक्ष भय, १६ में शत्रु मय, १८ में मृत्यु तुल्य पीड़ा, ८० वर्ष
की आयु हो । वैशाख शुक्ल पक्ष द्वादशी तिथि वुधवार, के मध्याह्न समय हस्त नक्षत्र में
मृत्यु हो । (जा० भ०)
(४) कर्क राशि--११ दिन में कष्ट, ९ मास में कष्ट, १ वर्ष में रोग, ७-में जल
चात, ९ में अंग रोग, १२ में जल घात, १६ में अंग रोग, २० वषं में लोह घात, २७
और ३५ में अल्प मृत्यु, ४५ में देव दोष, ५५ ओर ६१ में अल्प मृत्यु, राज कष्ट, असाध्य
रोग, सर्प घात, जल घात, साँड़ से और व्याघ्र से मय इस राशि पर शुमग्रह की दृष्टि
हो तो ७० वषं ५ मास ६ दिन में.फाल्गुन मास शुक्ल पक्ष के चतुर्थ प्रहर में गोधूलि के
समय मृत्यु हो (मान० सा०) पहिले में रोग हो, ३० में लिंग पोड़ा, ३१ में सर्प से भय,
३२ में बहुत पीड़ा, ८५ या ९६ वर्ष को आयु माघ मास शुक्ल ९ तिथि शुक्रवार रोहणो
नक्षत्र मे मृत्यु हो (जा० भ०)
(५) पिह राशि--८ मास या १ वर्ष में कष्ट, १० वर्ष, १५ वर्ष में अंग रोग,
२५, ४५ वर्ष में देव दोष, सन्निपात, ५१, ६१ वर्ष में घात । अस्प मृत्यु से बचे तो
६५ वषं जोवे, श्रावण शुदी १० रविवार पूर्वाफाल्गुनो नक्षत्र एक प्रहर में मृत्यु हो
` (मान सा०) पहिले वर्ष में मूत बाघा, पाँचवें वर्ष में अग्नि भय, ७ वें वर्ष में ज्वर,
या विणूचिका रोग हो । २८ वषं में झगड़ा, ३२ वर्ष में बड़ी पीड़ा, पेट के दाहिने तरफ
वात रोग गुल्म रोग हो । जो चन्द्र को शुभग्रह देखता हो तो १०० वर्ष को आयु हो
फाल्गुल शुक्ल पक्ष मे, पंचमी, मंगलवार को भध्याह्ल समय जल के बोच मृत्यु हो
(जा० qo)!
(६) कन्या राशि--३ मास ३ वर्ष में अंग रोग, १ वषं १३ वर्ष में नेत्ररोग और
जल घात, २६ वर्ष में अंग रोग, देवकोप स पीड़ा, ३३ वर्ष में लोह घात, ४३ वर्ष में
अंग रोग । चन्द्र पर शुभग्रह को दृष्टि हो तो ८४ वर्ष जीकर भाद्र शुक्र ९ रविवार हस्तनक्षत्र में गोधुली के समय देह त्यागे (मान सा०) तोसरे वर्ष अग्नि को पोड़ा, पांचवे
वर्ष नेत्र रोग, नवम वर्ष, १३ वर्ष में बाधा, १५ वर्ष में सर्प भय, २१ वर्ष में वृक्ष से गिरे
या भीत से गिरे । ३० वर्ष में जंगछ में हथियार का घात, ८० वर्ष को आयु हो बदि
चंद्र पर शुभग्रह को दृष्टि हा तो चैत्र कृष्ण १३ रविवार को मृत्यु हो ( जा० भ० )।
(७) तुला राशि--४ मात मॅ कष्ट, १६ मास में अंग रोग, ४ वर्ष में कष्ट, १६
वर्ष में जल घात, २१, २३ वर्ष में अंग रोग, ४१ वर्ष में अंग वृद्धि, ५१ वर्ष में देव
दोष, ६१ वर्षमें अल्प मृत्यु, चन्द्र पर गुमप्रह को दृष्टि हों तो ८५ वर्ष जीवें,
वैशाख शुक्ल १३ शुक्रवार चित्रा नक्षत्र मध्याह्न के समय मृत्यु हो ( मान० सा० ) ।
७ वर्ष में अग्नि भय, ८ वर्ष में ज्वर, १२ वर्ष में जल से भय, वृक्ष से या घोड़े से गिरने
- का। २० वर्ष सें सपं का सय । २१ वर्ष में पीड़ा । चन्द्र पर शुभ दृष्टि हो तो ८५ वर्ष
युग संवत्सरादि फलाध्याय : २६१
की आयु । वैशाख कृष्ण पक्ष आश्लेषा नक्षत्र में शुक्रवार को पहिले प्रहर में मृत्यु हो
( जा० भ० ) °
(८) वृश्चिक राशि--२ मास में कष्ट, ७ वर्ष में अंग रोग, ८ वर्ष में जलघात,
१३ वर्ष में वृक्ष घात, ३२-३५ वर्ष में अंग रोग, लोह घात, ४५ वर्ष में अंग रोग ।
६३ वर्ष में अल्प मृत्यु, राशि को शुभग्रह देखे तो ७५ वर्ष २ माह ७ दिन जीता है,
ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष एकादशी मंगळवार प्रथम पहर में देह त्यागे, (मान० सा० ) १ वर्ष
में ज्वर की पीडा, तोसरे में अरिन भय, ५ में ज्वर भय, १५ में ज्वर भय, २५ में बड़ी
पीड़ा, चन्द्र पर शुभ दृष्टि हो तो ९० वर्ष की आयु हो, ज्येष्ठ शुक्ल दशमी बुधवार
हस्तनक्षत्र में आधीरात को देह त्यागे । ( जा० भ०)।
(९) घनराशि--५ मास, ३ वर्ष में कष्ट, ९ में अंग रोग, ११ में चक्षु पीडा,
१६ š जलघात, २४-२६ में अंग रोग, ४७, ५७, ६७ में सर्प, जलघात, अल्प मृत्यु क्रमशः
हो, चन्द्र पर शुभ दृष्टि हो तो ८५ वर्ष जीकर आषाढ़ qas प्रतिप्रदा गुरुषार हस्तनक्षत्र
š गोधूलिका के समय देह त्यागे । ( मान सा० ) पहिले वर्ष में बाघा, १३ में बड़ी
थीड़ा, ६८ या ७५ वर्ष को आयु होतो है । चन्द्रमा पर शुभ दृष्टि हो तो १०० वर्ष
जिये। आषाढ़ शुक्ल ५ शुक्रवार रात्रि में हस्त नक्षत्र में मृत्यु हो । (जा० wo)
(१०) मकर राशि--३ मास में कष्ट, १ मास में देव दोष पोड़ा, रे वर्ष में अंग
रोग, ७५ में देव दोष, १० में अंग रोग, अग्नि पीडा, ३२ में लोह घात, ३३ में कष्ट,
४३, ५१ में अल्प मृत्य, चन्द्र पर शुभग्रह की दृष्टि हो तो ८१ वषं जोकर शुक्लपक्ष की
यंचमी श्रवण नक्षत्र में मृत्यु हो । ( मान सा० ) ५ वषं में पीडा और ७ में जल भय,
१० में वृक्ष से गिरे, १२ वर्ष में शस्त्र से भय, २० में ज्वर, २५ में अंगों में पीड़ा, २५
जें वायें अंग में अग्न भय, ९० वर्ष की आयु, श्रावण शुक्ल दशमी मंगलवार ज्येष्ठा
नक्षत्र में मृत्यु हो । |
(११) कुम्भराशि--सात दिन में कष्ट, १८, ३२ वर्ष में अल्प मृत्यु भय, चन्द्र पर
शुभ दृष्टि हो तो ६१ वर्ष जीकर माघ मास शुक्ल २ गुरुवार के दिन उत्तर भाद्रपद
अक्षत्र में मृत्यु हो (मान सा० ) पहिले वर्ष में पौड़ा, ५ में अग्नि भय, या १२ में सपे
से या जल से भय। २८ में घाव चोरों से, ९० वर्ष की आयु पाकर भाद्र कृष्ण चतुर्थी
शनिवार भरणी नक्षत्र में मृत्यु हो ( जा० भ० )
(१२) मीन राशि--१८, ३३ वर्ष में क्लेश । चन्द्र को शुभग्रह देखता हो तो
६१ वर्ष आयु पाकर माघ शुक्ल १२ गुरुवार पुनवंसु नक्षत्र में प्रातः काल देह त्यागे ।
(मान सा० ) ५ वर्ष में जल से भय, ८ में ज्वर की पीडा, २२ में बढी पीड़ा, २४ में
पूवे को यात्रा, ९० वर्ष की आयु में आश्विन कृष्ण पक्ष को द्वितीया गुरुवार कृतिका नक्षत्र
में सायंकाल में मृत्यु हो (जा० भ०) ।
२६२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
अध्याय १२
कालांग विचार
१२ राशिका जो एक चक्र है वह पुरा कालपुरुष समझा जाता है। और प्रत्येक राशि
चलेगा से विचार होता है कि वह राशि काळपुरुष का कौन सा अंग है। राशि से पता कि किस अंग पर उस ग्रह का प्रभाव पड़ेगा । राशि अंग š (१) मेष--सिर, मरतक अर्थात् कपाल, आँखें और मुंह के उपर का भाग । (२) वृष--मुख, चेहरा, पुरा गला, और कंठ भी इससे लेते हैं । (३) मिथुन--छाती, कठ से छाती तक का भाग, स्तन मध्य इसमें बाहु गौर कंधा भी लेते हैं । (४) कर्क--हृदय, वक्ष-स्थल, चित्त ।
(६)
(५) सिंह--उदर (पेट) इससे हृदय, रक्ताशय, कलेजा, पीठ, पसली भो लेते हैं १ कन्या--कटि (कमर) कुक्षि, जठर, अँतडी भी लेते हैं | (७) तुला--वस्ति, नाभि के नीचे का भाग, मूत्र पिंड ( गुरदा ), नाभि, qz हाथ का पंजा । (८) वृश्चिक--गुप्तांग जननेन्द्रिय, गुदा आदि, गुह्चेन्द्रिय । (९) घन--जाँघ दोनों, तथा पैर की संधि, वृषण । (१०) मकर--घुटने दोनों । (११) कुंम--दोनों पिडलो । (१२) भीन--दोनों पैर (चरण) पर की अंगुली आदि । जिस राशि पर कोई पाप अह हो उस राशि के अंग में चिल्ल करता है इसका विचार आगे दिया है। जति
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भाव के अनुसार मी इसी प्रकार विचार होता है जैसे छन सिर व्यय भाव
व्याधि करता है। या कोई
दाहिना बायाँ अंग--किसी राशि के १ से १५ अंश तक दाहिना अंग १५ से ३० अंश तक बायाँ अंग ë एवं लग्न से ६ पर कालपुरुष का दाहिना अंग है और सप्तम से ६ घर आगे पुरुष का बायाँ अंग है । द्रेष्काण के अनुसार कालांग
१- शरीर के ३ भाग करना प्रथम द्रेष्काण का उदय हो तो उससे सिर, आँख, कान, नाक, गला, ठोड़ी, मुख यहां बताये अनुसार अंग का विचार होता है।
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कालांग विचार : २६३
२--द्वुसरा द्रेष्काण हो तो कंठ, कंधा, बाहु, पाएवं, वक्षस्थल, पेट, नामि आदि का विचार होता है ।
र--तीसरे द्रेष्काण में बस्ति गुप्तांग अंडकोष उर जांघ आदि का विचार होता है।
प्रथम द्रेष्काण
भा.क्र. अंग
मस्तक
दाहिनी आँख
दाहिना कान
दाहिना नकपुड़ा
दाहिनी गाल
दाहिनी ठोड़ी
मुख
बाइँ ठोड़ी
बायाँ गाळ
१० बायाँ नाक
११ वायां कान
२ बायीं झाल
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द्वितीय द्रेष्काण
भा.क्र. अंग
१ कंठ
२ दाहिना कंघा
३ दाहिना हाथ (भुजा)
४ दाहिनी कांख
५ दाहिना हृदय
६ दाहिना पेट
७ नाभि
८ बायाँ पेट
९ बायाँ हृदय
१० बायीं कांख
११ बायों भुजा
११ बायाँ कंघा
तृतीय द्रेष्काण
भा.क्र. अंग
नाभि से शिएन तक
गुदा दिन
दाहिनी गुदा
दाहिना अंडकोष
दाहिनो उर
दाहिनो जांघ
दोनों पैर
बाइ जाँघ
बाई उरु
बायाँ अंडकोष
बायों गुदा
बायाँ शिशन
२६४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड
मतांतर-तुतोय द्रेष्काण--ऊपर द्रेष्काण के
अनुसार जो अंग बताये हैं उनमें केघल तीसरे
द्रेष्काण. में कुछ भिन्नता है जैसा यहाँ चक्र में
बताया है ।
१ लग्न--बस्ति, २ भाव--दाहिना शिएन
व गुदा, ३ भाव--दाहिना अंडकोष, ४ भाव--
वट उर दाहिना, ५ भाव--जानु दाहिना, ६ भाव--
घुटना दाहिना, ७ भाव-दोनों पैर, ८-बांया घुटना, ९-ायी जच, १०-बाँया उरु, ११-
बाँया वृषण, १२- बाँया शिईन w गुदा (वृहज्जातक, शंभु होरा० में इसे ही माना है) ।
ग्रहों का कालांग
१ सूयं-सिर से मुख तक, २ चंद्र--गले से हृदय तक, ३ मंगल--पेट से पीठ तक,
४ बुध--हाथ ओर पैर, ५ गुरु--कमर से जंघा, ६ शुक्र--णिदन से वृषण, ७ शनि
घुटने से पिंडली । : s
ग्रहों की शुभाशुभ स्थिति के अनुसार अनुष्य के इन अंगों पर से ग्रह प्रभाव डालते 8 ।
ग्रहों के शुभाशुभत्व उच्च नीच या अंश के फल पर योग दृष्टि अनुसार फल: होता ë ।
अन्य मत से-- षष्ठेश पाप युक्तं होकर लग्न या रूख से अष्टम में हो तो इस प्रकार
अंगों में घाव फरते हैं ।
(१) सूयं--सिर में (२) चन्द्र--मुख में (३) मेंगल--कंठ में, (४) बुध-हृदय (५)
गुरु--नाभि के नीचे (६) शुक्र--नेत्र या पीठ (७) शनि-पैर में (८) राहु केतु-ओठ में ।
द्रेष्काण के अनुसार शरीर का अंग विचारने में इस प्रकार भी विचार करते हैं कि
लग्न एवं अन्य भाव में कोन-कौन द्रेष्काण है । इसके विचार से अंग विभाग के ३ खंड
हो जाते ( इसमें राशियों का विचार नहीं है ) भाव के स्पष्ट पर से उनका द्रेष्काण निकालना
यदि प्रथम द्रेष्काण में जन्म हो तो प्रथम खंड के बाद द्वितीय अंग खंड, फिर उसके बाद तृतीय अंग खंड का विचार करना ।
दूसरे द्रेष्काण में जन्म हो तो पहिले द्वितीय खंड के बाद तृतीय खंड पश्चात् इसके प्रथम खड से अंग विचारना ।
यदि तृतीय द्रेष्काण में जन्म हो तो पहिले तृतीय अंग खंड फिर प्रथम अंग खंड अन्त में द्वितीय अंग खंड के अनुसार अंग विचारना । ट्
अर्थात् प्रथम द्रेष्काण में जन्म हो तो प्रथम भाव के प्रथम खंड में प्रथम खंड के अंगों
का क्रमश: जन्म द्रेष्काण से आरम्भ कर लेवे । एवं लग्न के द्वितीय द्रेष्काण से आरम्भकर
प्रत्येक भाव के द्वितीय द्रेष्काण में द्वितीय खंड के अंगों का क्रमशः एवं लग्न के तृतीय द्रेष्काण में तृतोय खंड के अगों का क्रमशः विचार करना । परन्तु यदि जन्म लग्न द्वितोय , द्रेष्काण में.हो तो प्रथम भाव के द्वितीय द्रेष्काण से आरम्भ कर क्रमशः सभी भावों के.द्वितीय द्रेष्काण में द्वितीय खंड के अंगों को लेना . फिर लग्न के द्वितीय ब्रेष्काण से. आरम्य कर क्रमशः समो भावों के प्रति द्रेष्काय में तुतोय
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कालांग विचार $ २६७
३--यदि यह ग्रह स्वगृही हो या स्थिर राशि या स्थिर नवांश में हो, कुछ की राय
में यदि शनि उस ग्रह के साथ हो, तो यह चिह्न जन्म से ही होगा । यदि ऐसा न हो तो `
जन्म के पश्चात् उस ग्रह की दशा अंतदेशा में घाव व्रण आदि होंगे ।
४--जन्म प्रश्न या गोचर में जो राशि पापाक्रांत हो उस राशि वाले अंग में तिल:
ससा या चोट आदि का चिल्ल होगा। जो राशि शुभ से युक्त ६ व६ अंग
पुष्ट होगा ।
तिल मसा व्रण घाव आदि होने के अन्य योग
(१) घाव--षष्ठ भाव में यदि कोई पाप ग्रह हो तो उस अंग में भी जो छठे भाव
की राशि से प्रगट हो, घाव होगा ।
तिल मसा--परन्तु छठे भाव में बेठे पाप ग्रह पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो केवल.
तिल मसा आदि होंगे या छठे शुभ ग्रह हो तो भी लहसन तिल मसा आदि होंगे ।
(२) ब्रण या मसा--यदि शुक्र अशुभ होकर किसी द्रेष्काण में हो तो उस अंग]में
ब्रण आदि होंगे परन्तु वैसे शुक्र पर शुभ ग्रह को दृष्टि हो तो केवल मसा आदि होंगे ।
यदि वैसे शुक्र के साथ कोई शुभ ग्रह बैठा हो तो उस भंग में कोई शुभ सूचक
चिह्न होगा । :
अशुभ शुभ” शुक्र रवि से ५ अंश के भीतर रहने से, अशुभ नवांश गत होने से,
छत्रुगुही या नीच का होने से अशुभ कहा जाता है 1 x
(३) ब्रण आदि--जिस स्थान में सूरय चंद्र हों उसके सदृश कार पुरुष के अंग में
बल के अनुसार और चर आदि वश से सहज ( जन्म से ही ) या आगन्तुक ब्रण आदि
कहना ।
(४) ब्रण--जिस द्रेष्काण में अणुम या पाप ग्रह बैठे हों और उनके साथ बुध भी
हो तो उस अंग में त्रण होगा । बलवान् ग्रह इनमें जो हो उसकी दशा में त्रण होगा ।
रिपुगृही पाप ग्रह भी व्रण करते हैं। यदि शुभ ग्रह से युत-दृष्ट हो तो तिळ या कोई
चिह्न करता है ।
(५) शनि राहु ये दोनों जहाँ हों उस अंग में तिल लांछन आदि कृष्ण चिह्न
करते हैं ।
(६) सूर्य मंगल जहाँ हो रक्त चिह्न करते हैं ।
(७) चन्द्रमा जहाँ हो उस अंश में मसा आदि चिह्न होंगे 1
(८) सूर्य चंद्र एकत्र एक राशि में हों तो वहाँ तिल मसा आदि होंगे ।
(९) पाप ग्रह के साथ शुभ ग्रह हो या यह पाप ग्रह शुभ नवांश में हो तो चिह्न
नहीं करेगा यदि करेगा भी तो शोप्न दूर हो जायेगा । !
(१०) जो ग्रह अपने नवांश देष्काण में हो ओर स्थिर राशि में हो तो पूर्वोक्त चिह्न
स्थिर होंगे इसके विपरीत हो तो चिल्ल बाद को होंगे ।
२६८ : ज्यातिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
(११) चिल्ल करने वाला पाप ग्रह बली हो तो. व्रण फोड़ा भगंदर मूलक व्याधि मेह
` आदि रोगहों।
(१२) यदि ३-४ पाप ग्रह वहाँ हों और वहाँ बुघ भी हो तो भी व्रण भगंदर प्रमेह
चुषण[वृद्धि, पाँद को सूजन कोढ आदि हो यदि वहाँ बुध न हो तो इनके चिल्ल न होंगे ।
ये ग्रह जहाँ हों उनके द्रेष्काण के अंगों मै प्रभाव करेंगे । ;
इतर चिह्न होने के योग व उनका स्थान
१--छग्न से सप्तम में राहु, लर्न में गुरु, अष्टम में पाप ग्रह या शुक्र हो तो बाँयीं
भुणा में चिल्ल करते हैं ।
२ सप्तम या लग्न में गुरु हो तो वाई भुजा में तिल मसक आदि चिल्ल करते हैं ।
३--नवम भाव में चंद्र ओर तीसरे में शनि हो या तीसरे भाव में राहु शुभ युक्त या
दुष्ट हो तो भुजा या कुक्षि में चिह्व हो ।
` डॅ--तोसरे भाव में मंगल पाप ग्रह से दृष्ट हो तो भुजा में घाव का चिह्न हो या
गले में पित्त से रोग हो ।
१-३, ६ या ११ घर में मंगल, १२ घर में शुक्र के साथ मंगल हो तो वायें बगल
में घाव का चिह्न हो । S— में शुक्र अष्टम में बुघ गुरु, चतुर्थ में शनि हो तो कुक्षि में चिल्ल ।
७--पंचम या नवम स्थान में शुक्र, अष्टम में बुघ गुरु, चतुर्थं या लगन में शनि हो तो[कुक्षि या पेट में चिह्न हो ।
८ द्वितीय में शुक्र, अष्टम या लग्न में सूर्य ओर मंगल शनि तीसरे में हो तो कटि
में चिह्न हो ।
९--राहुया शनि छठे घर में हो तो कटि में काला चिह्न हो । १०-बारहवे गुरु, ३, ६ ११ घर में बुघ, ३ आव में शुक्र हो तो हृदय में चिह्न । ११- चतुर्थ भाव पाप युक्त हो तो कंधा, कुक्षि या हृदय में तीखी चोट लगने का चिह्न हो ।
१२- छन में मंगल ओर शुक्र से दुष्ट शनि त्रिकोण में हो तो लिंग या गुदा के समीप तिल हो ।
१३--छर्न में मंगल व बुध और ६, ५, ९ घर में राहु हो तो छि या गुदा में rosae आदि चिह्न हो ।
४ शुक्र रै भाव में, गुरु ३, ६, ११ घर में, चंद्र नवम हो तो गुदा में गोलक चिह्न हो ।
(em से १२ वें घर में गुह, नवम में चंद्र, ३, ६, ११ घर में बुध हो तो गुदा म घाव का चिह्न हो ।
१६ नवम भाव में शुर अष्टम में सूर्य, दशम में राहु हो तो नाभि में चिह्न हो ।
कालांग विचार : २६९.
. १७--चतुथ में राहु और शुक्र, रून में शनि या मंगल हो तो पाद मूल या बाँये
पाद में चिह्न हो ।
१८--छूग्न से सप्तम में मंगल गुरु व शुक्र हो तो मस्तक में चिह्न ह! ।
१९--छगन में मंगळ शुक्र व चंद्र हो तो १२ वर्ष में मस्तक में चिह्न हो ।
२०--द्वितीय भाव में सूयं हो तो मुख पर शिला सम्बन्धी या व्याधि का
चिह्न atl
२१--जन्म लग्न में शुक्र और अष्टम में राहु हो तो मस्तक या बाँये कर्ण में
चिह्न हो । `
२२---लग्न में मंगल और सप्तम में गुरु या शुक्र हो तो सिर में घाव चिह्न हो ।
२३--लरन में मंगल शुक्र और चंद्र हो तो उसके सिर में दूसरे या छठे वर्ष किसी
प्रकार का चिह्न हो । :
२४--लग्नेश और मंगल लग्न में बुरे ग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो सिर में जख्म,
या फोडा, पत्थर के काटने से या तलवार छगने से होगा ।
२५--यदि मंगल के बदले शनि लग्नेश के साथ बुरे ग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो
सिर में चोट, गिरने से या चट्टान, अग्नि या दूसरे चीजों से चोट हो।
२६--मंग वरा ग्रह है दुसरे बुरे ग्रह शनि सुर्यं अशक्त चन्द्र, पाप युक्त बुध, राहु
केतु Š इनमें से कोई ग्रह या सब लग्न में हों तो शिर के चिल्ल बड़े भारी होंगे । बड़ा
कटने का चिल्ल या कुरूपता छाने वाला चिह्न होगा । यदि ये पाप ग्रह यथार्थ में बुरे हैं ।
और लग्नेश अशक्त हो तो वे चोट के चिह्न बड़े भारो कुरूपता लाने वाले अवष्य होंगे ।
यदि लग्नेश अच्छे साथी युक्त हो उच्च या गुम युक्त या गुम दृष्ट हो तो ये चोट अल्प
लगेंगी और सिर में नाम मात्र का चिह्न होगा ।
२७--छू्त द्रेष्काण के विभाग में लग्न में राहु मंगळ या शनि सिर स्थान में हो तो
अग्नि, शस्त्र या काष्ट से भय हो ।
इस प्रकार ग्रहों के बलाबल से अच्छे या बुरे प्रभाव की घटाबढी विचार कर
अपनी वुद्धि ज्ञान और व्यावहारिक अनुभव से फल के घट बढ़ आदि का विचार करना ।
कारांग का और भी उपयोग :
faran जन्म में सूर्य मेष का उच्च काहै। मेष का स्थान सिर है । उच्च
का होने से प्रगट करता है उच्च मस्तिष्क वाला होगा । मस्तिष्क क बळ रुपया पैदा
- करेगा । यह उच्च पदाविकारी मंत्रो आदि हो सकता है या मेप का सूय ऊन में हों तो
सिर में चोंट आदि का भग्र उत्पन्न करेगा 1
तिळ और sgr होने का फल f
खनो पुरुष के देह स्थित भंवर तिल मशक आदि होने का फल स्त्रियों के बाग भाग
में शुभ और पुरुषों के दक्षिण माग में तिळ मशक या रोमावर्त शुभ होता है ।
स्त्री के हृदय में तिल सौभागयवती 1
२७० : ज्यौतिष-शक्षा, qara फलित खण्ड
स्त्री के दक्षिण स्तन पर रक्त वर्ण तिल आदि qaq चिह्न हो तो सुख सौभाग्य युक्त हो बहुत संतति हो । अधिक कन्या और पुत्र हों ।
वाम स्तन पर रक्तचिल्व--केवल १ पुत्र हो ।
ओंठ के मध्य या ललाट पर रक्त वणं तिल आदि चिल्व---राज्यप्रद ।
गाल पर--नित्य मिष्ठान्न भोजन दायक ।
गुह्य स्थान के दक्षिण भाग में--राजपत्नी या राज माता होती है ।
जिसके नाक पर लाल चिह्न हो--राजपत्नी ।
कृष्ण वर्ण दाग--व्यमिचारिणी या विघवा हो।
नाभि के नीचे पुरुष या स्त्री के सब चिक्त शुभ होते हैं । कान, गाळ, हाथ, तथा कंठ पर तिल आदि--सुख सोभाग्य युक्त, प्रथम पुत्र संतान ।
जांघ में तिलादि चिह्ल--दुःखो रहे ।
स्त्री के कपाल में त्रिशूळ सदुश चिह्न--रानो हो ।
पुरुष के कपाल में त्रिशूल सदृश चिह्न--राजा हो ।
हृदय, जीम, हाथ, कान, पृष्ठ के दाहिने भाग और वस्ति में रोमावलो हो तो दक्षिणावतं शुभ, वामावतं अशुभ है ।
कमर गोप्य स्थान में रोमावलो-शुभ नहीं ।
पेट में हो तो--विघवा हो 1 पोठ के मध्य भाग में--व्यभिचारिणो हो । =
कंठ ललाट माँग या मस्तक के मध्य (चोट) में आव्त--शुम । ` उक्त सुलक्षण वाली स्त्री अल्पायु पति को भी सुखी और दीर्घायु बना देती है । ग्रह किस प्रकार व्रण आदि चिह्न करते हैं
( १ ) सूय-यह ब्रणकारी हो या द्रेष्काण पर रवि की दृष्टि हो तो काष्ठ के द्वारा चोट या चौपाये जानवर के द्वारा चोट हो ।
( २) चन्द्र--क्षीण चन्द्र त्रण कारक हो या उस द्रेष्काण पर चन्द्र की दृष्टि हो तो 'सौंग मारने या किसी जलजन्तु के आघात से या किसो जल पदाथं द्वारा या किसी तरल पदार्थ तेजाब आदि द्वारा ।
( ३ ) मंगळ--यह व्रण कारक हो या उक द्रेष्काण पर मंगल की दृष्टि हो तो अग्नि, विष (सर्पा।द) या अस्त्र (हथियार) द्वारा घाव । ( ४) बुघ- यह त्रणकारी हो या उस द्रेष्काण पर बुघ को 'गिरने से या पत्थर आदि के चोट से घाव । Rennie
(५) गुरु शुक्र, गुरु, पूर्ण चन्द्र, शुभ बुष ( जो पाप ग्रह के साथ न हो ) जिसके द्रेष्काण में हो या उसे देखते हों उस द्रेष्काण के अंग में कोई चिह्न नहीं होगः। बह .. अंग पृष्ट होगा ।
कालांग विचार : २७१
सता चुके
(६)
हैं।
शुक्र शुक्र अशुभ हो तो वह व्रणकारी होता है इसके सम्वन्ध में पहिले
क चोट ( ७
से
)
या
शनि--यह
किसी
ब्रण कारक हो या उस द्रेष्काण पर शनि की दृष्टि हो तो पत्थर जल विकार ms T< से या वात रोग से घाव करता है (८) रवि चन्द्र--जिस
शुभगृही या द्रेष्काण में हों उसमें भो व्रण आदि करते हँ । और
विलादि होते
पाप
हैं
गृही
।
से भी ब्रण होते हैं परन्तु शुभ ग्रह की दृष्टि से ब्रण नहीं हो दो
ग्न (९) शुभ ग्रह ब्रण कारक हो तो शुम कमं से घाव व्रण आदि होते हूँ । से शरीर का विचार
लग्न से शरीर को ये बातें जाननी चाहिये ।
(७) (१) रूप (२) वणं (३) जाति-कुछ (४) शरीर पर चिह्न (५) सुख (६) दुःख शरीर का प्रमाण ठिंगना ऊँचा आदि (८) स्वभाव क्रूर शांत आदि (९) आयुष । इनके विचार के नियम
( १ ) कोई भी लग्नेश लग्न में हो, स्व नबांश में हो, वह सब ग्रहों में बली हो तो उसका जो रूप गुण स्वभाव आदि है बहुत करके उसी के अनुसार उपरोक्त बाते प्रगट होंगी ।
(२) लग्नेश लग्न में नहीं हो दूसरे स्यान में हो तो बह जिस ग्रह के नवांध में हो उस ग्रह सरीखी उपरोक्त बातें होंगी । (३) रूस में जो ग्रह हो उस सरीखी उपरोक्त बातें होंगी । २-४ ग्रह लग्न में हों तो उसमें से जो विशेष बली हो उस सरीखी बातें होंगी । या कुण्डली में सब ग्रहों में जो बलवान हो उस सदृश उपरोक्त बातें होंगी । ( ४ ) उपरोक्त योगों में से कौन होना चाहिए या इन सबका प्रभाव होगा, इसका विचार करना पड़ेगा । आयु के प्रमाण से जो बलवान् होगा उस ग्रह का गुणदोष पहिले होगा । बाद को उससे कम बल वाले का प्रभाव होगा । 2 इसो प्रकार सम्पूर्ण १२ भाव के सम्वन्ध से भी विचार होगा । ग्रह के गुण घमं स्व- रूप आदि जो पहिले दे चुके हँ 1 उनपर यह विचार करना होगा । मनुष्य के गुण, वर्ण, मूत्ति आदि इस प्रकार भी जानना लरन का सप्त वर्ग निकालना उसपर से विचार करना । मूति (शरीर)--लग्न का जो नवांश हो या जो लग्नेश हो उस सरीखी मृति होगी । वर्ण--चंद्र जिस ग्रह के नवांदा में हो उस सदृश वर्ण होगा 1 गुण--सूर्य जिस ग्रह के नवांश में हो उस सदृश गुण सतगुणो, रजोगुणी, तमोगुणी आदि होगा ।
स्वरूप विचार
(१) छन में जिस नवांद का उदय हो उस नवां के समान स्वरूप होगा या तत्काळ
(
२७२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
में जो बलवान् ग्रह हो उससे विचारे । राशि बल विशेष हो तो लर्न नवांश के तुल्य
होगा । ग्रह बल विशेष हो तो ग्रह नवांश के तुल्य होगा ।
(२) बुध जिस नवाँश में हो उस नवांश राशि के अनुरूप रूप होगा । जैसे मेष से
चौपाया सदृश आदि 1
(३) बलवान् ग्रह के अनुसार नेत्र होंगे।
चंद्र नवांश स्वामी के सदृश वर्ण होगा 1
(१) कुछ, जाति, देश आदि का विचार कर कहना । जैसे इंग्लैण्ड में गोरे होते हैं,
अफ्रिका में काले होते हैं या यहाँ भील कोल किरात आदि काले होते हैं । इन सब बातों
का विचार रखना चाहिए ।
(२) लग्नेश व लग्न में जो ग्रह हो उसके विचार से उसके समान वर्ण और उसी केः
समान आचार वाला होगा ।
(३) ९ या ५ भाव के स्वामी के अनुसार रंग और गुण भी होता है 1
जातक का गुण
(१) सूर्य जिस व्रिशांश में हो उन-उन त्रिशांशों का स्वामी जो ग्रह हो उसके गुणकी
अधिकता कहना 1
सूर्य, चन्द्र, गुर--सतोगुणी, शनि-मंगल--तमोगुणी और बुध-शुक्र--रजोगुणी Š t
(२) लग्नस्थ ग्रहों के अनुसार स्वभाव भी विचारना । -
(३) लग्न का बल ओर लग्न के साथ ग्रहों का योग या दृष्टि से प्रकृति विचारना b
शरीर--(१) लग्न में जो नवांश हो उसके स्वामी के अनुसार या उस समय सक
ग्रहों में जो बली हो उसके अनुसार ।
(२) उदित राशि और दूसरी राशियाँ जो सिर आदि कालपुरुष के अंग की सूचक हैं.
उनके अनुसार होगा ।
लग्नेश आदि से विचार--शरोर की आकुति स्वभाव, गुण, दोष, अवगुण अवस्था,
रस, पुरुष-स्त्री चेष्टा, अभ्यास और ग्राम आदि स्थिति का विचार लग्नेश के आक्नुति,
प्रकृति गुणादि के अनुसार एवं लग्त ग्रह के अनुसार विचारना ।
यहाँ कई प्रकार से बिचारन। बताया है जहाँ एक से अधिक प्रकार से कोई फल
प्रगट हो उपै ग्रहण करना ।
ग्रहों का स्वरूप जो शरोर रंग-रूप आदि विचारने में काम आता है
१ सूर्य- शूर, गंभोर, चतुर, रूपवान् है पर साँवला, सिर में थोडे बाल, गोल शरीर, भिगर नेत्र, पित्त प्रकृति, ठिंगना, शरीर में बहुत हड्डी । मेष लग्न s| सूर्य--
द्रव्यवान् परन्तु नेत्र रोगी । सिंह लग्न में रात्रि अंध । तुला में अंधा, दरिद्री, कर्क में
आंख š फूली । इनसे अन्य लग्न में-लड़ाई करने वाला, निर्दय, आलसी दरिद्री क
करके काम करने वाला हो । बट
है s.
कालांग विचार : २७३
२ चंद्र--मधुर वाणी, विलासी, बुद्धिमान्, ऊंचा शरीर, कुंचित केश, बहुत रक्त, चात क्फ प्रकृति, बड़े नेत्र, गोरा वर्ण, परन्तु मंगल या सूयं उसके पास हों और चन्द्र छगन में हो--काला व साँवला हो, अकेला चन्द्र लग्न में हो तो उन्मत्त जड़, अंघ अर्थात् अनुचित कर्म करने वाला, बहिरा, लोगों का चाकर हो । परन्तु मेष वृष व कर्क लग्न में चन्द्र हो तो र हो और अधिकारी (आफीसर) हो । मेष लग्न में चन्द्र हो तो विशेष I
३ मंगल--रक्त वर्ण, गोरा, पिंगल, अति उदार, घातकी, शूर, तामस प्रकृति,क्रोधी, गर्वीला, ठिंगना, क्रांति युक्त । i लग्न में मंगल हो--शरीर के किसो भाग में शस्त्र लगे, घाव हो, कुछ दिनों में बह् लगड्ञा तथा कुबड़ा हो 1
४ बुघ--श्याम वर्ण, विशेष कला, मृदु वाणो, रजोगुणी, गोल मुँह, छाल नेत्र, मध्यम शरीर 1 लग्न में बुध हो तो-साघारण पंडित हो। | ५ गुरु--शरीर का आकार छोटा और ऊंचा, सुन्दर कांति, मधुर भाषण उदार, दक्ष, भिगर नेत्र, कफ प्रकृति । गुरु लग्न में हो तो थोड़ी विद्या आवे । ६ शुक्र--मेघ सरीखा वर्ण, शीत व वात प्रकृति, बड़े नेत्र, केश तिरछे व कारे, रणोगुणां, स्त्री लम्पट, मीठा व कड़वा खाने को रुचि । लग्न में शुक्र हो तो स्त्री शास्त्री , सुखी हो ।
७ शनि- सुन्दर, काला वर्ण, मलिन, आळसी, सिर पर बालों का भोर, दुबळा, ऊंचा, लम्बा, दाँत बडे, नेत्र पिंगर, नख बहे, दुष्ट, वात प्रकृति । णानि लग्न में होतो दरिद्री रोगी हो, सदा मैथुन प्रिय, तोतला, तुला, मकर, कुंभ या घन राशि की लग्न हो तो श्रीमंत हो, महत्त्व बढ़े । र लग्न से शरीर का स्वभाव प्रगट होता है लग्न से मनुष्य का स्वभाव आदि का अनुमान होता हैं। या जब लग्न में शंका हो तो अन्य विचार के अतिरिक्त मनुष्य के स्वभाव से लग्न का भी अनुमान हो सकता है 1 इससे यहाँ लग्न द्वारा प्रगट स्वभाव आदि दिया जाता है ।
(१) मेष लरन--मध्यम गठन, लम्बा चेहरा, पतला शरीर, गर्दन म्बौ, कपाल की ओर का भाग चौड़ा । बड़ी बड़ी आँखें, बाळ कड, वर्ण तामडे रंग का गौर, स्वभाव क्रोधी, उतावळा, महत्वाकांक्षा, चंच, साहा, चुगल खोर, गर्वीला, आत्म 'बश्वामी, अयत्न वादा, अपने पैर पर खडा रहन बाला । स्वतः के परिश्रम मे आगे बड़े । बात- चीत में साधारण, स्पष्ट वादी, शूरवीर, दानी, पूजनीय नहीं, सदा हिसा काम में लगे रहने की रुचि, कभी-कभो किसो को तंग करने का प्रकृति, अच्छी बुद्धि, आरम्म आयु में अनेक कठिनाइयों का अनुभव, स्वतंत्रता ओर निरंकुश रहने का इच्छुक, चित्त में ज्र | जाय तो पर कायं साघन मे बड़े उत्साह से कठिनाई सहन करने को उद्यत, सर्व कार्थ
में निडर ओर निर्भीक, जोवन में उच्च स्थान का इच्छुक, अनेक गुण युक्त ।
१८
२७४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड
( २) वृष--शरोर साधारण ठिंगना, मोटा, चौरस शरीर, सकरी व मोटी गर्दन;
गोल चेहरा, हृष्ट और पुष्ट कंघे, छोटो चोड़ो और पुष्ट भुजायें, सुन्दर शरीर, घु घराले
बाळ, सुन्दर नेत्र, अभिमानो, क्रोत्रो, दोघं उद्योगी, पुराने मत से चलने वाला, दुराग्रही,
ममतालु) क्रोध आने पर परिणाम का विचार न करे, एकांत प्रिय, विषयी, साधारण
आलसो, बहुत व्योहार दक्ष, खेतो बगीचा, जमीन सम्बन्धी काम या व्यवस्थापक आदि
के कायं से लाभ हो, संगीत, आभूषण और आकर्षित पदार्थों का प्रेमी, नियमित आचरण और स्वभाव, शांति प्रिय, सहन शील । अपने स्वतंत्र विचार के अनुसार कार्य करे
दूसरों की राय के अनुसार न चले । आराम तलव, गम्भीर चित्त, उसका भेद कोई
जानने न पावे, शांत चित्त से विचार करने वाला, शीघता में कोई कायं न करे, अच्छा
स्वभाव, मीठी बोली, दयालु, प्रेमी, बहुत मित्र, जीवन में उन्नति करे, घनी हो ।
( ३ ) मिथुन--दुवला व ऊँचा शरीर नाक चेहरा ठोड़ी लम्बी, हाथ को अंगुलियां
व बाहु इसी प्रमाण से लम्बे, लम्बे पतले हाथ पैर, तीब्र भोर भेदी दृष्टि। स्वभाव
विद्या व्यसनो । लेखन, वाचन का काम करने वाला, भाषा शास्त्री, अच्छा स्वभाव,
उदार विचार, बहुत बुद्धिमान्, काम करने में तेज, बातचीत में चतुर चालाक, बहुत
गंभोरता पूवंक विचार करने को शक्ति, तक में प्रवृत्ति जिससे प्रभाव शोल और विश्वास
योग्य वार्तालाप कर सके । परिवर्तन शील अस्थिर मन, बहुत समय तक एक वात का
पाबन्द न रह सके । चतुर, सूक्ष्म रीति से वर्णन करने वाला । बातें समझने वाला,
अग्र सोचो, क्रोध शोध्र उत्पन्न, चतुराई से काम करने वाला । योग्य, प्रभाव शील वक्ता
ओर लेखक, तेज बुद्धि। स्वमाव के गुण से प्रसिद्धता की संभावना । कला और विज्ञान
सीखने में रुचि । बिना रुकावट के काम करनेवाला जिससे स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव
पड़े । अच्छी मानसिक शांति न प्राप्त कर सके । उसके सम्बन्धी उसके सहायक गौर
पालक हों ।
( v ) कर्क--मध्यम शरीर, गोल चेहरा, निस्तेज वर्ण, छोटी नाक, चलते में टेढ़ी- गति । स्वभाव शांत, शोध संस्कार ग्रहण करने वाळा, नुकता चोनी करने वाला,
चंच$, प्रवास या नित्य नवोन देश देखने या घुमने का प्रेमा, माता-पिता से इसे लाभ
हो। जमोन खेती आदि के व्योहार से इसे लाभ हो । इसे सावेजनिक काम बिलकुल
आगे आने वाला दिखता है । मिलनसार, आनंद ओर भोग का प्रेमी, सुन्दर और स्वच्छ वस्त्रं का प्रेमी, शरोर को स्वच्छता और सुन्दरता के दिखावे का प्रमो, विचिछ ओर सुन्दर वस्तुओ का प्रेमो । प्रभाव शोल रहन: सहन आचरण । क्ंव्यशील, गुरु ओर घाभिक मनुष्यों का मान करने वाळा । मिष्ठान्न और स्वादिष्ट भोजन का प्रेमी । अपने कुटुम्शियो से अच्छा बताये । रुचि और अरुचि में तीव्र । जिसे चाहे उससे वार्ता- - जाप में आनन्द हो उसरी राय पर ध्यान देवे जिसे न चाहे उसकी संगति और परामशां
स्वीकार न करे 1 किन्हो वस्तुओं के मूल्य उपयोग में अच्छो समझ जिससे लाभ या सफ- लता हो । पुश स्त्रो से या स्त्री पुरुष से मिलने में बहुत योग्य । ç
कालांग विचार : २७५
(५) सिंह--शरीर ऊँचा, हड्डी दृढ़, चेहरा भव्य, कपाल चौडा, सुन्दर नेत्र) नाक साचारण, शरीर पुष्ट, चौड़ा गठन, स्वभाव आत्म विश्वासो, महत्वाकांक्षो, गविष्ट अपनी सत्ता अधिकार नाम आदि के लिये खट पट करने वाळा, उदार स्वच्छ हृदय, क्रोधी शारीरिक परिश्रम खेल आदि का प्रेमी, निर्भय, निश्चय, विरोधियों पर बिजय 'यावे । अच्छे गुण, सीधा ओर सच्चा, सहनशोलता के कारण कठिनाई भोर कष्टों को शीघ्र पार करने वाला, अपने लाम के लिये भी नीच कार्य न करेगा, मित्रों का विश्वास भाव, दयालु, लोगों का सहायक । अपने शत्रुओं से लड़ाई न करे शांति पूर्वक वर्ताव करे । आनन्द और योग का प्रेमी । कितना हो परिश्रम करे परन्तु थोड़ा फल हो । दूसरों पर प्रभाव डालने का गुण हो । अपने कार्य में दूसरों को आज्ञाकारी बनाने में चतुर । जीवन के अन्तिम अघं भाग में घन और सम्पत्ति प्राप्त करे । बिचार पर्क कायं करे | š
(६) कन्या--मध्यम शरीर, मुँह q चेहरा गोल, साधारण कृष्ण वर्ण, सुन्दर
बुद्धिमान्, कल्पना करने वाला, विया व्यसनो, मायावो, ममताल, साधारण आलमी, टीका टिप्पणी करने में चतुर, स्वतंत्र घंघा करने की अपेक्षा दूसरों के साझे में काम करने या नौकरी करने में लाभ बड़ा, वैद्य, नाना प्रकार के घंघे या व्यवसाय करने में बिलकुल कण्ट न हो 1 शोधक । विना पक्षपात के सत्य और न्याय का प्रेमी, अच्छी बुद्धि, व्योहार में दूसरों के आनन्द या दुःख का विचार न करने वाला । अपने कायं में दूसरों का उपयोग करने में कोई विचार या पशोपेश न करने वाला । सब काम में बहुत सावधान और विचार शोल । मिलनसार नहीं । बिना कारण के न बोलने वाला । बिना सोचे
कोई बात न करे। दुसरे के कार्य में नुकताचीनी करने वाला और सदा दोष निका-
ने वाला । प्रत्येक कायं अपनो पद्धति से करने वाला, कोई उसके विषय में अधिक
न जान पावे, बहुत गोपनीय । कार्य या व्यापार कला में बहुत चतुर एवं युक्ति पूर्ण ।
"कीन काम कब्र करना इसका अच्छा ज्ञान ओर कायं को सावधानी साहस ओर बृद्धि-
मानो से शांतिपूवंक करे, खर्च में सावधान । उसमे अच्छी स्थिति वालों को सहायता और
रक्षा प्राप्त हो ।
(७) तुला--म्राघारण गठन, साधारण ऊँचा व पतला, सुंदर वर्ण, साधारण उजला
ओर देखने याग्य, स्वभाव ममतालु, मित्र वत्सल, विलासी, अस्थिर, बुद्धिमान्, काव्य
कळा का प्रेमी, अशांत और अस्थिर चित्त, शोळ स्वभाव और रहून सहन परिवर्तन शील,
व्यर्थ खर्च करने वाला, दान को ओर प्रवृत्ति, स्वच्छ हृदय, दूसरों की सहायता करने
की ओर झुकाव, मिलनसार, संगीत प्रिय, स्वच्छता से रहने वाला, भ्रसन्न और शांत
स्वाप, ठीक और सच्चा वर्ताव, सदा दया और न्याय का वर्ताव करे, शीघ क्रोध में
आने वाला और सरलता से शांत होने वाळा, उच्च और प्रभाव शील स्थिति बाळे उसके
सहायक ओर मित्र हों ।
२७६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
(८) वृश्चिक-गठन व शरोर मध्यम आकार का, ऊंचाई मध्यम, चलने में तिरछः
चले, नाक नुकीलो, स्वभाव क्रोघो, कपटी, साहसी, आत्म विश्वासो, परिश्रमो, निश्चयो
ब ढोठ, वैद्यक शस्त्रक्रिया रसायनशास्त्र, सिपाही गिरी व इंजीनियर के समान कोई
घंघा करने से लाभ हाता है, व्यापार से लाभ हो, सावधान और बहुत झगडाकू, झगड़ने
में परिणाम या हानि का विचार न करे और हठ से निश्चय पूर्वक झगडा चाळू रखे,
स्वभाव मे व्यसनी और बे रोक, अपना स्वास्थ्य बिगाड़े, अपने ध्येय प्राप्त करने का अति
परिश्रम करे, बदला लेने वाला, सरलता से उत्तेजित होने वाळा, स्ष्पट वात करने में
कोई पशोपेश न करे, जोबन में उच्च स्थिति रहे, अपने वर्ताव से दूसरों को डर उत्पन्न
करे, उससे मतभेद करने वाले का विरोधो, काम काज में संक्षिप्तता ।
(९) घनु--ऊँचा शरीर, मजबूत, गठोला बदन, सुन्दर गौर वर्ण का दुसरे पर
सरलता से अपनी छाप डालने वाला, लम्बा चेहरा, गंजा, निडर साहसी, स्पष्ट वक्ता,
यात्रा, खेल, शिक्षा वदान्त विषय, घामिक विषय, कानून का प्रेमो, सरल और स्वच्छ
हृदय, सत्य और न्याय के लिए बहुत प्रयत्न करे, उच्च आत्मा, पारितोषिक का विचार
कर काम करने वाला, किसो बात को अच्छी प्रकार समझे । अपने गुण से उच्च स्थिति
प्राप्त करे, तत्त्व ज्ञान की ओर मन का झुकाव रहे । घन सम्पत्ति आदि को असत्य समझे,
घमं और तत्त्व ज्ञान के कायं में बहुत प्रेम, बिना दिखावट के शांत जीवन व्यतीत फरे,
उसका जीवन मनुष्य की सेवा में छगा रहे, दूसरों के दु:ख के लिये अपने सुख का भी
त्याग करे, अपने कुटुम्ब ओर जाति में वह बहुत चतुर और स्मरणोय होगा, उसके बहुत
से आश्रित और सेवक रहें ।
(१०) मकर “साधारण मध्यम शरोर, दुबला, बड़ी नाक, पूर्य आयु में अशक्त,
ठुड्डी लम्बी आगे बढो हुई, लम्बी गर्दन, सकरी छाती, दाढ़ी में थोड़े बाल, पाल काळे क मजबूत, आत्म विश्वासी महत्त्वाकांक्षा, दोघं उद्योगी, टीका टिप्पणी करने वाला, स्वार्थी, लोभी, मौजी, उत्तर वय में आगे प्रसिद्ध होता है । महत्त्वाकांक्षी होने से अधिकार s सम्पत्ति के लिए अनेक प्रयत्न, सब कार्य में बहुत उत्साही, दृढ्तापुर्षक कायं करने वाला, जो उसे हानि पहुंचावे उसका बदला लेने वाला, दुसरे के विचारो की कुछ परवाह न कर अपने विचार स्पष्ट प्रगट करे, कटाक्ष करे, झाकत चित्त, शंका के कार्य में सावघानी से बिचार पुर्वक कायं करे, ईश्वर और भक्त को मानने वाळा, अपने आश्रितां के कार्य , साधन मे चतुर, अधिक जांच पड़ताल करने वाळा नहीं केवल अपने काम की परवाह करने वाला, अपनी कीति प्राप्त करने का प्रयत्न ste, मित्रों और सम्वन्षियों में मान- नीय और प्रसिद्ध होने का इच्छुक ।
(६१) कुम--रूप साधारण सुन्दर, शरीर का गठन मध्यम, शरोर बलवान्, वणे साधारण उजला, विद्वान्, अच्छा स्वभाव, निश्चयी, व्यवहार कुशळ, चतुर, विद्याव्यसनी, ज्ञान अधिक, मामिक, सार्वजनिक संस्था में काम करने से लाभ, दयाळू, दुसरो के कार्या में सहायता पहुँचाने वाळा, दसरों का == न देव पकने वाला, दूसरों का विचार भाव
rent 2
कालांग विचार : २७७
च सन समझने और अध्ययन करने वाला, ईश्वर घर्म और तत्त्वज्ञान. में प्रेम और विश्वास,
थाप और अघमं से डरे, प्रसन्न चित्त रहे, अच्छा नाम ओर कीति प्राप्त करे, घनवान्
शौर प्रिय हो, कोई कार्य सरलता पूर्वक कर सके, दूमरे की स्त्रियों का इच्छुक और
प्रेमी, बड़े लोगों से मित्रता, प्रभावशाली और मिलनसार, बड़े लोगों में मित्रता, कभी-
कभी सिर दर्द, उदर पीड़ा, अजीर्ण आदि अन्य प्रकार के उदर रोग से पीड़ा आदि।
(१२) मीन--शरीर साधारण ठिंगना, मोटा एवं मांसल शरीर, हाथ पांव कम
लंबे । शरीर प्रकृति से अशक्त व रोगी, सरल्मार्गी, अच्छे स्वभाव वाला, आसो,
अस्थिर, चंचल चित्त, घामिक, ममतालु, घामिक संस्था औषधालय आदि से राभ,
संगीत प्रेमी, लेखन कला से लाभ हो, सदा आनन्द का इच्छुक, अधिक से अधिक आनन्द,
शांति और सरल जीवन प्राप्ति का घ्यान रहे । इससे पैसे की परवाह न कर बहुत पैसा
खर्च करे 1 कविता और लेखन में बुद्धि और इसमें आनन्द, सदा काम में लगा रहे व्ययं
समय न जाने दे, कभी भो अपने काम में फिजूळ खर्च न करे । विश्वसनीय, आँख बंद
कर विशवास कर लेवे, बचपन और आरम्भ आयु में बहुत खतरे से बचे, शत्रु से या
ser बाजी में धन की हानि, कभी-कभी डरपोक कभी अवसर पर साहसी, अनिश्चित
अनन की दशा में कभी अच्छा अवसर हाथ से निकल जाने दे, संगीत नृत्य, नॉटक, ललित
वला में रुचि और आनन्द, उसके प्रसिद्ध मित्र रहें ।
लग्न से विशेष विचार--छग्न में जब कोई ग्रह न हो तब इन राशियों का प्रमाय
प्रगट होता है । यदि लग्न में कोई ग्रह हों या लग्न फे अंश पर बलवान् qg का दृष्टि
योग हो तो अपने घमं के प्रमाण से यहाँ वर्णित लग्न के स्वरूप स्वभाव में अन्तर पड़
जायगा ।
जब लग्न में कोई ग्रह न हो उस समय चन्द्र या जन्म लग्नेश जिस राशि पर हो
इन दोनों में जो बली हो गा केन्द्री हो उस राशि के गुण घर्म व स्वरूप के प्रमाण से
विचार कर लग्न से प्राप्त होने वाले स्वरूप व स्वभाव में अन्तर जान लेना । जब एक
राशि में चार या अविक ग्रह हों उस समय उस राशि के गुण घम उस मनुष्य के शरीर
में स्पष्ट दिखाई देंगे । हि काल पुरुष के अंग के अनुसार इन राशियों का कुण्डली से विचारने का उदाहरण
जन्म में जिस राशि का लग्न हो उस जज
छर्न से १२ भाव में जो राशियाँ हैं
उनमें से कही पापग्रह हों तो राशि के
अनुसार जो कालपुरुष का अंग हो उस
अंग मे उस ग्रह की दशा में दुःख
होगा ।
यदि शुभग्रह को दृष्टि उस पापग्रह :
वर हो तो उस शुभग्रह को दक्षा में वह दुःख अच्छा हो जायगा t
२७८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
यदि वह भाव शुभ ओर पापग्रह दोनों से युक्त हो तो यदि शुभ बलवान् होगा तो दुःख
नहीं होने देगा ।
यदि यहाँ केवल शुभग्रह हो तो उस अंग में व्याधि न होगी अपितु वह अंग पुष्ट
होने को संभावना है 1
१--यहाँ कुंडली में मिथुन लग्न है वह जातक का मुख है वहाँ कोई पापग्रह नहीं
है तो मुख पर कोई चिह्व न होगा । लग्न में गुरु है इससे कपाल और सिर सुन्दर देखने
योग्य होगा ।
२--सरे स्थान में कर्क राशि है वह मुख हुआ मुख स्वच्छ होगा क्योंकि वहाँ कोई
ग्रह नहीं है ।
३--तृतीय में सिंह है तृतीय छाती का स्थान है वहाँ कोई ग्रह न होने से वह स्वस्य होगा ।
४-चतुर्थस्यान हृदय का है कन्या राशि है कोई ग्रह नहीं है तो हृदय स्वच्छ होगा t
५--पञ्जस स्थान पेट का है जिसमें तुला राशि है इसमें ५ ग्रह हैं जिसमें ३ पाप०
ग्रह हैं इनमें शनि मंगल अस्तंगत हैं । अस्तंगत होने के कारण थे प्रभावहीन हो गये परन्तु
उनकी दशा में पेट में पोड़ा होगो 1 गर्मी का उपद्रव करेगा । इसमें सूर्य भा है जो नीच
का है इससे वह २ वर्ष को आयु तक व्याधि ग्रस्त रहेगा । परन्तु उस स्थान में शुभ
ग्रह भी हूँ वे उस व्याधि को ठोक कर देंगें ओर पेट के भाग में दाग का चिह्न नहीं के
बराबर होगा ।
६--छठा स्थान कटि का ë जिसमें पापग्रह केतु है यह वृश्चिक राशि में है । जिस
समय गोचर में वृषचिक राशिका mg आयेगा तो खाज आदि चर्म रोग उत्पन्न करेगा ॥
परन्तु उस स्थान में चन्द्र भी है वह अपनी दशा में रोग अच्छा कर देगा 1
७--सप्तम स्थान नाभि के नीचे का है--कोई ग्रह न होने से वह निरोग होगा t
८---अष्टम स्थान गुप्तांग का हे कोई ग्रह वहाँ न होने से निरोग होगा 1
९--नवम स्थान दोनों जाँघ और वृषण का है यह स्थान शनि का (कुम्भ राशि) है। शनि उच्च का है और शनि से त्रिकोण पंचम स्थान में है शनि पापग्रह है इससे षह अपनो दशा में दाहिनी ओर वृषण की वृद्धि करेगा परन्तु वह हानिकारकः नहीं होगी ।
१०--दशम भाव घुटने का है इसमें ग्रह न होने से निरोग होंगे ।
११--एकादश भाव--दोनों पिंडली हैं कोई ग्रह नहीं । परन्तु यहाँ मेष रागि है जिसका स्वामी मंगळ उसे देखता है इससे वहाँ कष्ट देगा क्योंकि मंगळ पापग्रह है । १२-वारहवां स्थान पंजों का है जिसमें राहु पापग्रह है इससे वहाँ कोई दाग या चिल्ल करेगा ।
शरोर का रंग गोरा-काला आदि जानना (१) जन्म लर्न से चन्द्र किसी मो राशि में हो परन्तु वह चन्द्र जिस राशि के
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कालांग विचार : २७९
नवांश में हो उत्त सरीखा रंग होगा 1 कई चन्द्र के होरा से मी विचार करते हैं। चन्द्र
का होरा गौर वर्ण देता है सूर्य का श्याम वर्ण ।
चन्द्र के नवांश के अनुसार इस प्रकार वर्ण होता हेन
सूयं--श्याम वणे, चन्द्र--गौर वरणे, मंगल--रक्त गौर (ललाई लिए गौर वर्ण),
बुध--श्याम वणं, गुरु--तप्त कंचन वण, शुक्र--श्याम वर्ण कितु चित्ताकर्षक, शनि
काला ।
(२) लग्न में जो बलवान् ग्रह हो उस सरीखा वर्ण ।
सूर्य--ताम्र वणे, चन्द्र--गौर वर्ण, मंगल रक्त गोर, बुघ--स्वच्छ एयाम वर्ण
अर्थात् काला नहीं, गुरु--चित्ताकर्षक कंचन वर्ण, शुक्र--रंग गोरा न हो पर चित्ताकर्षक
हो, शनि--काला वणं ।
(३) चन्द्र के नवांश पति ओर छन्न स्पष्ट के समीप कोई ग्रह हो तो दोनों के
भिश्चित रंग के अनुसार होगा । जैसे चन्द्र नवांदा में गुरु और लग्न में सूयं हो तो तप्त
कंचन और ताम्र वर्ण मिश्रित होगा ।
(४) लग्न में कोई ग्रह न हो तो राशि के नवांश स्वामी के सरोखा रंग होगा ।
(५) इसी प्रकार लग्नेश, छान नवांश, चन्द्र, नवांश, ओर लग्न गत TG के मिश्रण
का विचार कर रंग का विचार करना । इन सब में जो बलवान् ग्रह हो उसका ध्यान
रखना । जैसे ग्रह बली हो तो ग्रह नवांश तुल्य, राशि बली हो तो राशि नवांश तुल्य रंग
होगा ।
शरीर का गठन विचार
१--शरीर ५ तत्त्व से बना है और जल का अंश कितना है जानने को कह ग्रह
सजल है या निर्जल नीचे दिया है ।
ग्रह सूर्यं चन्द्र मंगल बुध गुरुं ` शुक्र शनि
तत्त्व अग्नि जल अग्नि ` पृथ्वी . आकाश (तेज) जळ. वायु
जल शुष्क जल शुष्क जल जल जल शुष्क
इसके अनुसार जातक के शरीर का गठन आदि का अनुमान होता है ।
२--केवल ग्रह का हो नहीं, राशि का भो प्रभाव शरीर के गठन पर होता है इसछिपे राशियों का तत्त्व और जल का विचार नीचे दिया है । š
राशि मेष वृष मिं कर्क सिंह कन्या तुला वृक्चिक धन मकर कुंभ मीन
तत्व अग्नि पृथ्वो वायु जल अग्नि पृथ्वी वायु जल sf पृथ्वी वायु जळ
जल जल जल निल जळ Fri निजंछ जल जल जल जल जल जल
कितना पूर्ण पूर्ण पूर्ण
क वल WEA MYC DR arden br Q
३--(क) ४-८-१२ राशियाँ जल तत्त्व की हैं परन्तु पूर्ण अदे भाव आवि जलके