भारतकोश
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सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

Wa, दृष्टि आदि : ६९

चन्द्र जब पूर्ण हो तो चेष्टा बल पाता है । सूय चन्द्र जब उत्तरायण में हों तो

चेष्टाबली होते हैं । दूसरे ग्रह चन्द्र के साथ समागम होने से चेष्टा बल पाते Ë ।

जो ग्रह ग्रहयुद्ध में जीते वह चेष्टा बल पाता है ।

दक्षिणायन में वुध चन्द्र शनि, उत्तरायण में शेष सूर्य, मंगल, गुरु, शुक्र बली

होते हैं । (५) स्वाभाविक घल ( नैसगिक बल )

शनि, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, चन्दर, सूर्य-क्रमानुसार उत्तरोत्तर बली Ë । जब बल में

समता हो तो नैसगिक बल विचारना ।

स्वभाव अनुसार बल ( जेमिनी० )

शनि से | | गुरु से | छुक्र से | चंद्र सं सबसे मंगल | बुध गुरु शुक्र | चंद्र | सूयं | राहु — गुणा क | नि q क | ८ | a | SE २

(६) दृष्टि बल--शुभग्रह से दृष्ट ग्रह बली होता है ।

गति के अनुसार बल

mm वक्र | विल अनुवक्र | a" विकल | | समागम aa चंद्र | मंदतर | i शीघ्र | शीघ्रतर पूर्ण बल | आधा । पाद के साथ आधा | अष्टमांश | पौन आघा

उपचय स्थान का बल

उपचय २ प्रकार से हैं । (१) लग्न से, (२) चन्द्र से ३-६-१०-११ वां स्थान | कोई भी राशि हो जिस कु डली में चन्द्र या लग्न दोनों में उपचय स्थान में शुभग्रह बुध

गुरु शुक्र हो

(१) यदि ये तीनों ग्रह हों-वह अति धनी हो क्योंकि ये दोनों योग हों तो केमद्रुम आदि

बुरे योग भी हों तो उसका नाश कर उत्तम फल देते हैं ।

(२) इन ३ में से २ ही हों-साधारण धनवान्‌ ।

(३) „ ,, १ ,-थोड़ा घन हो पर दरिद्री न हो ।

(४) रून या चन्द्र के उपचय 'में-शुभ ग्रह नहो पाप ग्रह हो-घनबान्‌ हो ।

(५) दोनों योग में कोई एक से योग हो-दरिद्री हो ।

ग्रहबल--बली ग्रह का अथं है, अच्छा साथी, या अच्छी दृष्टि, शुभ राशि में हो। दो

शुभ ग्रहों के बीच में हो, शुभ ग्रह के अंश में हो, शुभ युक्त या दृष्ट हो,

उच्च या मित्र नवांश में हो इत्यादि) *

जो ग्रह उच्च मूल त्रिकोण, स्व या मित्र गृही हो या स्व नवांश द्र ष्काण

आदि वर्ग में हो, प्रह जो उच्च और नीच के घर में हो वह भी बलवान्‌

होता दै ।

७० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

बली qg ( १ ) जो उदित, स्वक्षेत्री, मित्रक्षेत्री, उच्च मूल त्रिकोण या वर्ग में स्ववर्ग

या मित्र के वर्ग में हो या उपरोवत बताये प्रकार से हो ।

(२) जब ग्रह की किरणे पूर्ण तेज हाँ चाहे वह शत्रु आदि राशि या अंश में हों ।

(३) चन्द्र को जब पूर्ण पक्ष बल प्राप्त हो, पुर्ण चन्द्र हो ।

(४) सूर्य जब उसे दिग्बल प्राप्त हो अर्थात्‌ दशम घर में हो ।

(५) दूसरे पञ्चतारा जब वक्री हों, उदय हों और निर्मल कांति हो 1

( सूर्य से सप्तम स्थान में स्थित ग्रह पूर्ण फल देता है । )

राहु केतु बल

राहु-कर्क, वृष, मेष, कु भ, वृश्चिक, मिथुन कन्या में बली ।

केतु-मोन, कन्या, वृष, घनु का उत्तराध॑, सिंह, परिवेष में, इन्द्रचाप में बली । ये दोनों

उस समय बली होते हैं जब सूर्य चन्द्र का मेल हो और रात समय हो ।

वन्त बल-१ से १० दिन तक चन्द्र मध्यम बली, द्वितीय भाग में पूर्ण बली है इससे शुभ

फल होता है । उपरान्त १० दिन क्षीण बल! चन्द्र का बल क्रमानुसार

घटने लगदा है । परन्तु जब सौम्य ग्रह से युत या दुष्ट हो तो सदा बलो है ।

कृष्ण अष्टमी से शुवल अष्टमी तक चन्द्र क्षीण, तदनंतर पूर्ण बल ।

चन्द्र-लग्न, षष्ठ या अष्टम में अरिष्ट कारक हे द्विपद राशि में कुभ को छोड़ कर बाकी

के लग्न में चन्द्र का होना शुभ है।

राशि बल -

(१) जो राशि किसी ग्रह š युक्त हो वह वली होती है ।

( क ) यदि दोनों राशियों में ग्रह हो तो जो राशि अधिक ग्रह से युत्रत हो वह बूली है 1

( ख ) यदि दोनों राशियों मॅ ग्रह संख्या बरावर हो तो जिसमें उच्च स्वगृही मित्र गुही

आदि ग्रह हो वह बलो होगा ।

( T) उस में भी बल तुल्य हो तो नैसगिक बल से विचारना, चर से स्थिर, स्थिर से

द्विस्वभाव राशि बली होती है ।

( घ ) बल की समता होने पर उक्त रीति से राशि स्वामी के बल निर्णय में उस राशि

का वल समझना ।

( च ) उस में भी समान बल भा जाय तो जिस राशि के स्वामी का अंश अधिक हो वह

राशि बली समझना ।

( छ ) विषम राशि में द्वितीय या द्वादश में जो ग्रह हो वह बली ।

(२ ) प्रत्येक राशि अपने स्वामी गुरु बुध इनसे युक्त-दृष्ट हो तो वली ।

(३ ) जिस राशि का स्वामी बळी हो वह राशि बली । अपने स्थान से केन्द्र आदि में

š ग्रह हो तो आगे की राशि से पूर्व राशि अधिक बली होती है अर्थात्‌ स्वस्थान से

केन्द्र मे ग्रह हो तो पर्ण बली, पणफर में हो तो मध्यबली, आपोक्लिम में हो तो

द्दीनबली ।

मैत्री, दृष्टि आदि : ७१

( ४ ) पाप आदि ग्रहों की दृष्टि व योग राशियों का बल होता है तथा उच्च मूल

त्रिकोण, स्वस्थान, अधिमित्र, मित्र राशि में गत ग्रह की दृष्टि योग राशियो का

बल होता है । ये अपने अधिकार प्रमाण से फल देते है 1

(५) जो राशि अपने स्वामी से युक्त दृष्ट हो, बुध या गुरुसे दृष्ट हो बह-राशि निदचय

बलवान होती ë ।

(६) जो राशि किसी ग्रह से युवत या दृष्ट न हो तो पूर्वोवत अपने भाव के अनुसार

फल देती ë ।

( ७ ) ग्रह युषत दृष्ट होने से उसके स्वभावानुसार फल करती ë

शुभ ग्रह के योग दृष्टि से पाप ग्रह भी शुभ फल देते हैं और पाप योग से शुभ भी

पाप फल देते हैं ।

( ८) जिस राशि पर चन्द्र हो तो वणित पूरा फल देता है परन्तु नक्षत्र राशि और चन्द्र

ये तीन हैं ये तीनों वली हों तो दशा फल बरावर हो । ,इन में एक बली हो तो

थोड़ा फल हो । कोई वली न हो तो कुछ फल न हो । ;

(९ ) जिस राशि पर पाप ग्रह हो, शत्रु ग्रह बैठा हो या शुभ ग्रह से युक्त दुष्ट न हो बह

बलहीन होती है 1

लग्न में-नर राशि बली

चतुथं मँ-जलचर राशि,,

सप्तम मॅ-कीट ., ., इनसे सप्तम स्थान में ये राशियां दशम में-पशु ,, ,, बलहीन होती हैं 1

द्विपद राशि-दिन वली

पशु राशि-रात्रि बली

कीट व जलचर-संघ्या बली ( सूर्योदय और अस्त समय )

लग्न घल-अपने स्वामी. के बल के अनुसार होता ë ।

लम्न मै नरराशि जल्चरया कीट राशि अन्य मत से पणं बल चतुष्पद, ० कीट १|४

आघा बल

लग्नेश-उपचय में या शुभग्रह युक्त हो, पाप दृष्ट न हो तो पूर्ण बली ।

लग्न बली-लग्नेश गुरु लग्न में हो लग्न--गुरु बुध शुक्र युत या दृष्ट हो पाप दृष्ट न हो ।

लग्न निर्बल--पाप युक्त हो तो हीन बल पाप ओर शुभ युक्त हो तो मध्यम बल ।

भाव बल-भावेश युक्त या दृष्ट या बली ग्रह से दृष्ट हो, पाप युक्त या दृष्ट न हो ।

अपने स्वामी के मित्र, या वुध या उच्च ग्रह से युक्त या दृष्ट हो या सम्पूणं

ग्रहों से दृष्ट हो तो बली ।

निग्रह से सग्रह स्थान बली है, सग्रह में अधिक. बलवाला बलवान होता है,

समता में चर स्थिर द्विस्वभाव के अनुसार क्रमसे बली समझना ।

१-४-७-१० भाव-उत्तरोत्तर बली हैं ।

५-९ ,,=भी उत्तरोत्तर बली हैं ।

१७७1:

७२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

ग्रहों के षडबल का फल

१ स्थान बल-जन्म समय जातक को ५ प्रकार के स्थान बल प्राप्त हों तो अत्यंत ऐश्वयं

ब बल, अधिकार, योग्यता तेज बुद्धि अर्थात्‌ शासकीय विचार से योग्यता, नाना

प्रकार का घन अर्थात्‌ वस्त्र रत्न सुवर्ण, बहुत प्रकार की घातु कोशल अर्थात्‌

कुशलता व चतुराई, गौरव अर्थात सन्मान, नाना प्रकार के घोडा गाडी भादि

वाहन, बडी २ हवेली आदि पृथ्वी अर्थात्‌ खेत व वगीचा, झाइ अमराई, ताछ,

बैहर, राज्य आदि वह ग्रह अपनी दशा व अंतदंशा में निश्‍चय पूर्वक देता है । परन्तु

वह यदि पांचों प्रकार से स्थान बल से पूर्ण हो। यदि २ या ३ प्रकार के स्थान

फेवर हों तो उसी प्रकार स फल होया ।

यदि पांचों प्रकार के स्थान बल से पूणं २ या तोन ग्रह हों तो राजा प्रमाण

से स्थिति प्राप्त करता है ।

भिन्न भिन्न प्रकार के स्थान बल का फल

( १ ) उच्च बल प्राप्त या स्वञच्च मे-पृथ्वी, नाना प्रकार का उत्साह, शौयं, धन,

वाहन, स्त्री, पुत्र, बुघ पूज्य, विद्या, मान, नाना प्रकार का लाभ अपनी दशा में

देता है । :

(२ ) मूल त्रिकोण में-उपरोक्त फल का ३|४ फल ।

(३) स्वक्षेत्र में-स्थिर अंतःकरण करता है, प्रसन्न चित्त करता है, धन, सौख्य, विद्या

यश, प्रीत, महत्त्व, पृथ्वी, लाभ, अपनी दशा में देता है धमं कराता है । संतति

देता है । š

( ४ ) अधिमिन्न-वस्त्र, पृथ्वी, सुगंध पदार्थ, पुत्र, द्रव्य, 93, वाहन भूषण देता हैं,

पुराण श्रवण कराता है ।

(५ ) मित्रक्षेत्र-सोख्य, धैर्य, पृथ्वी, वाहन, विद्या, संतोष, घर्म, वस्त्र, द्रव्य, राज

सम्मान आदि देता ë ।

( ६ ) समक्षेत्री-स्थान से भ्रष्ट करे, वंधु का द्वेष, नोच वृत्ति को उपजीविका, स्वजन

से त्याग, नाना प्रकार के रोग ।

( ७ ) अधिवात्न क्षेत्री-अति दुःख, नाना प्रकार का दुःख, निरंतर प्रवास, विदेशी त्रास,

माता बहिन बंधु नाश, चोर अस्ति से भय ।

( ८) शत्र कषत्री-शत्रु सरीखा फल दे पर थोड़ा देवे, त्र क्षेत्री ग्रह निबंल ही

जाता है ।

( ९ ) पापगृहो-पाप का योग, कलह, स्त्री वियोय, शत्र, से पीड़ा, घन भूभि नाश,

स्वजन निदा आदि ।

(१०) पाप युक्त-सब काल दुःख देकर व्याकुल करता है, भ्रान्ति करता है । स्नेह का

नाश) स्त्रा, पुत्र, वाहन, चोर इनसे डर, नाश, बस्त्र नाश ।

मैत्री, दृष्टि आदि : ७३

(११) सूर्य युक्त-बहुत प्रकार से पाप करावे, विद्या धन स्त्री बंधु का नाश, पुत्र से क्लेश,

नेत्रों में रोग हो ।

(१२) अस्तंगत-पाप युक्त ग्रह के समान फल, ग्रह निबंली हो तो बल बहुत कम हो

जाता है ।

(१३) कुचस्तंम-मंगल आदि कुच स्तंभ ३-६-१०-११ राशियों में हो तो उत्तम फलः `

२, ५, ७, ९ राशि में मध्यम फल, १, ४, ८, १२ राशि में कुचस्तंभ हो तो बुरा

फल हो ।

(१४) स्तंभ-उपरोक्त फल ।

(१५) वक्री-शुभ ग्रह वक्री हो और सब ग्रहों में बलवान हो तो राज्य पद सरीक्षा फछ

दे व उस ग्रह की रदिम बहुत हो तो राज्यपद दे ।

पाप ग्रह वक्री हो और सब ग्रहों में बली हो तो दुःख देता है यदि <q बहुत

हो तो पृथ्वी दे ।

(१६) अतिचार-बुरा फल दे, अधिशत्रु की अपेक्षा बुरा फल दे ।

(१७) नीच क्षेत्री-अघिशत्रु सदृश बुरा फल दे ।

(१८) युद्ध में जय-युद्ध में विजयी ग्रह हो तो कुश्ती लड़ाई मुकदमा आदि जीते

पराजय-युद्ध में हारे तो उपरोक्त सब बातें क्षीण हों । ”

शुभग्रह के शुभ उच्च मूल fto स्वक्षेत्री

फळ का प्रमाण पूर्ण १ ३।४ १।२ `

मित्र गृही शत्रु क्षेत्री नीच व अस्तंगत

१।४ १।४ से अल्प का शुभ ०

पाप ग्रह के पाप | अस्तंगत नीच में | शत्रु क्षोत्री मित्र क्षे?

फल का प्रमाण पूर्ण १ ३।४ १।२

स्वश्षेत्री त्रिकोण उच्च या पाप

शड १४सेकम |काफल०

इस प्रकार भाव फल, दशा अष्टकवर्ग गोचर आदि में विचारना ।

२ दिश्बल पूर्ण या मध्यम बली हो तो अपनी योग्यता तथा शक्ति अनुसार फल देता

ë V वह अपनी दिशा में ग्रह की दिशा की ओर से लाकर वस्त्र भूषण, विद्या, यश,

कीति, नाना प्रकार का लाभ, घनघान्य, राज्य, पृथ्वो, वाहन, स्त्री सौख्य, कीति व

सम्पत्ति देता Š । द्रव्य का संग्रह करवाता है ।

यदि वह ग्रह अविशत्रु के घर में हो या पाप ग्रह की दृष्टि हो तो उसका बुरा

फल नहीं होने देता । कभो अच्छा कमी बुरा मिश्रित फल देता है 1

३ काल बली ग्रह-शात्रुओं का नाश करता है, भूमि वाहन की वृद्धि, वीरता सहित,

रत्न और वस्त्र की सम्पदा की प्राप्ति, निर्मल यश, लीलाओं ( खेल कौतुक आदि ) का

विकास करने वाखा सम फल करता हूँ ।

७४ : ज्प्रोतिष-शिक्षा, तुतोय फलित* खण्ड

( १ ) नतोन्‍नत-बुध,उच्च का हो तो पूर्ण फल देता है नहीं तो योग्यतानुसा र फल देता

है : शेष ग्रहों का जो गणित से नतोन्नत बल आवे उसका जितना कला बल आवे

उसी प्रमाण से व स्थान प्रमाण से फल देता है ।

(२ ) पक्ष घल--जिसका जन्म जिस पक्ष में हो उस पक्ष के प्रत्येक ग्रह का गणित के

अनुसार जो कला बल आवे उसके अनुसार फल 'मिलेगा। शत्रु का नाश एवं

. ` वस्त्र, संतति, स्त्री सुवर्णं भूमि का लाभ पुणं वलो होने पर देते हैं ।

( ३ ) दिन रात त्रिभाग बल--दिन के विभाग में बुध, सूर्य, शनि को क्रमानुसार एवं

रात्रि से विभाग में चंद्र शुक्र मंगळ को क्रमानुसार पूर्ण बल प्राप्त होता है गौर

भुर को दिन, और रात्रि में पूर्ण बल प्राप्त होना बताया ह । ये ग्रह उच्च के हों

तो पूर्ण फल मिलेगा नहीं तो स्थान प्रमाण में फल दे देंगे। पूर्ण बली होने पर

ग्रह पृथिवी, शौर्य, सेवक इनकी वृद्धि करते हूँ ।

(४ ) होरेश, दिनेश, मासेश और नर्षेश का वळ यदि ये स्व या उच्च के हों तो उसकी

प्राप्त कला बल अनुसार फल देते हैं ।

४ चेष्टाघली ग्रह--(१। थोड़ा राज्य, थोड़ी पूजा, थोड़ा घन, थोड़ा यश मिलता

है अर्थात कहीं राज्य कहीं ऐश्वयं कही पूजा ( मदद ) मिलती है।

» यदि ग्रह बलवान्‌ हो तो नाना प्रकार का लाभ व सुख देता है

१, — शुभग्रह वक्री हो सब बलमें बली हो तो राज्य प्राप्ति सरीखा फल

दे । पाप ग्रह वक्री हो तो दु:ख देता है । अपने क्षेत्रके अनुसार योग्यता प्रमाण

पदवो व अधिकार देता है, व्यर्थ फिराता ë 1 चन्द्र का समागम करने वाला

ग्रह चित्त स्वस्थ व सौख्य देता है 1

(२) ग्रह युद्ध में ग्रह बलवान्‌ हो तो युद्ध में जय देता है । बल न हो युद्ध में हार

गया हो तो कैदमे डाले, व्यर्थ फंसे, दगाबाजी का काम करे, मुकदमा हारे ।

(३) राशि में जो बलवान हो वह राज्य व अधिक सोल्य देता है ।

निसर्ग बल

जो ग्रह अधिक बलवान्‌ हो तो ऊपर बताये फल को सिद्धि में सहायक होता ë ।

शुभ ग्रह बली हों-आचार में पवित्र, शुभ और सत्यतायुक्त, सुन्दर रूप, तेजस्वी,

देव-ब्राह्मणों का भक्त कृतज्ञ, उत्तम पुष्प, भूषण वस्त्र युक्त होता है !

क्रूर ग्रह त्ली-लाभी, खोटे कर्म में तत्पर तमोगुणी, मरिन, कृतघ्न, साधुओं का

वैरी, क्रू र स्वभाव, कलह युतत । '

यदि २-३ ग्रह बलवान हों तो पुर्वोक्त शुभाशुभ फलमें उतनी ही अधिकता विचारना 1

६ ऋण घरात्मक दृष्टि बल-दुग्बली ग्रह बुरा फळ देने वाला शुभ ग्रह से दृष्ट

हो तो पुर्ण दृष्ट फल नहीं देता और पाप ग्रह देवता हो तो अच्छे फल को देने वाला ग्रह

भी शुभ फल नहीं देता ।

ग्रहों की अवस्थाए और चन्द्रक्रिया : ७५

सप्तवर्ग बळ

उच्च में मूल कि० में | स्वगृही | अघि मित्र [| मित्र | सम | गृही

T १ ` ३ २ १ पुण बल = — — — — — Š v ३ v ४+ ।८ [४%

१ गृहेश-शुभ ग्रह हो तो अपने स्थान के अनुसार बळ पाता है, सुख देता है । वली न हो

तो दुःख दे ।

२ होरेश-यदि बली हो तो सुख सम्पत्ति देवे । न हो तो न देवे.

३ द्रेष्काणेश-गृहेश प्रमाण से वल हो तो भाई बंधु से सुख, न हो तो दुःख देवे ।

४ सप्तमांशेश- ,, , बली हो तो पुत्र पौत्रका सुख देवे, बली न हो तो दुःख देवे ।

५ नवभांदोश- ,, > स्त्री से सुख न हो चिता व वलांत मन हो ।

`w दढ्वादशांशेश- ,, ,, मां बाप से सुख मिले, नहीं तो चिता हो 1

७ ब्रिणांदोश- ,, ` „ कष्ट न हो सुख हो, नहीं तो निरन्तर कष्ट हो ।

इस प्रमाण से सप्तवर्गाधिपति जिस राशि में हो उसके स्वामी का उपरोक्त प्रकार

से बल विचारना 1 वल के अनुसार फल मिलेगा 1

नवांश स्वामी बल

राशि में ग्रह फे वल के अतिरिक्त नवांश स्वामो का बळ स्थान के अनुसार प्रथम

विचारणीय है । जैसे चन्द्र वृष में उच्च का है यदि वह पंचमेश हो जाये और बह यदि

केन्द्र में, ३-१० या ११ स्थान में हो तो वहुत अच्छा होता है । परन्तु बुरे नवांश में

जैसे मकर या कुंभ में हो तो नवांश स्वामी जहां है अर्थात्‌ छनि जहाँ हो उसके प्रभावसे

फल में अन्तर पड़ जायगा । केवल ग्रह का बली होना और शुभ होना पर्याप्त नहीं है

परन्तु वह जहाँ हो उसके नवांश स्वामी की स्थिति पर भी विचार करना । _

५)

अध्याय ५

ग्रहों की अवस्थाए और चन्द्रक्रिया

ग्रह-अवस्था ;

१ दोप्त-उच्चस्थानीय ग्रह 1

२ स्वस्थ-स्वक्षेत्री ग्रह ।

३ मुदित (प्रमुदित या हषित)-मित्र गृही, या अधिमित्र गृही, या गुरु से युक्‍त दृष्ट

कोई शुभगृही को भी मुदित कहते ë 1

४ शाँत-पित्र गृही या तत्काल मित्र गृही ।

५ सुखित-मूल त्रिकोण में ग्रह ।

६ गधित-उच्च मूल त्रिकोण में 1

७ इत्स्त-उदित ।

७६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

८-विफल-अस्त, कोई अधिषत्रुगृही या पाप युक्त को भी कहते हैं ।

९ खल-पाप युक्त या पाप वर्ग में या पाप राशि में कोई नीच या पराजित को

भो कहते हैं । ;

१० दीन दुःखी-नीच गृही । कोई शत्र क्षेत्री को भी कहते हैं ।

११ हीन-नीचाभिमुख ( अवरोही ग्रह ) ।

१२ सुदीर्य-आरोही ।

१३ पीड़ित-पाप ग्रहों से दबा 1 अन्यमत से अस्त ।

१४ निपीड़ित-दूसरे ग्रहों से पराजित ।

१५ पीड़-राशि के अन्त में ।

१६ मुषित-अस्त ।

१७ कोपी-क्रू ग्रहों से युक्त । अन्यमत से कोपिष्ट या कोपी (विकल) अस्त ।

१८ दुःखी या अतिदुःखित-शत्र गृही ।

१९ भीत-नीच गुही । अन्य मत से शत्र गृही या अतिचर 1

२० बाल-वक्र ग्रह ।

२१ सुप्त या क्ष घित-शत्र गृही या शत्र युक्‍त या दृष्ट व शनि से युवत ।

२२ क्षोभित-सूर्य युक्त और पाप दृष्ट या अपने शत्र से दृष्ट ।

२३ तृषित-जलचर राशि में केवल पाप दृष्ट या अपने शत्र से दृष्ट, शुभ ग्रह से

अदृष्ट ।

२४ लज्जित-पंचम में पापयुक्त ग्रह (ग्रह अपने पुत्र की राणि में तथा पाप युवत) ।

उपरोक्त संक्षेप में

१ दीप्त-उच्च में ।

२ श्वस्थ-स्वगृही ।

३ मुदित, हृषित या संतोषी-मित्र गृही या शुभ गृही 1

४ शांत-मित्र गृही या शुभ वर्ग में ।

५ विकल, पीड़ित, मुषित, कोपिष्ट या कोपी-अस्त ।

६ गवित या सुखित-उच्च या मूलत्रिकोण में ।

७ शक्त-उदित ।

८ खल, दीन या भीत-नीच गुही ।

९ खला, विकल या कोप-पापयुक्त, पापराशि या पाप वर्ग में ।

१० दीन, भीत, दुःखी, सुप्त, क्षुषित-शत्र, क्ष त्री ।

११ पीडित, निपीडित-पाप ग्रहों से दबा ।

. १९ निपीडित खल-पराजित ।

१३ क्षोभित सुर्य युक्त पापदृष्ट या शत्र, से दृष्ट ।

१४ प्रमुदित-अधिमित्र गृही ।

ग्रहों की अवस्थाएँ और चन्द्र क्रिया : ७७

१५ विकल-अधिशत्र गृहो ।

१६ घाल-वक्र ।

१७ हीन-अवरोही ।

१८ सुषौर्य-आरोही ।

१९ तुबित-जचछर राशि में पाप दृष्ट ।

यहाँ पर मुदित -मित्र गृही, शुभगृही दोनों को बताया जाता है ।

शांत-मित्र गृही और शुभ वग ,, प्र)

दीन-नीच और शत्रु क्षेत्री को भी बताया गया है 1

विकल-अस्त, पापयुक्त या अधिशत्रु गृही को भी कहा है 1

क्षु धित--शत्र गृही, या शत्र, युक्त या दृष्ट ।

दीप्तादि अवस्था के फळ

१ दीप्त-दीघ॑ जीवन, संतानोन्नति, उत्साह (मन को आनन्द), ऐइवर्य, धन, वाहन स्त्री

पुत्र लाभ, राजा से सम्मान, अपने प्रभाव से शत्र ओं को संतप्त करने वाला,

प्रतापी, श्रेष्ठ वाहन, लक्ष्मी युक्त, सुखी, बंधु वर्ग में पूज्य, पृथ्वी लाभ,

विद्या व पदवी लाभ ।

२ स्वस्थ-आनन्द, कीति, भूमि लाभ, राजासे धन लाभ, आरोग्यता, विद्या यश प्रेम

लाभ, स्त्री पुत्र धन और धर्म लाभ, उत्तम वाहन, तेजस्वी, पराक्रमी,

विजयी, कुटुम्ब युक्त, उत्तम बुद्धि, भूषण आदि से युक्‍त, अति सुखी,

उद्योगी, सेनापति, सम्पत्तिवान्‌ ।

३ मुदित या हृषित-अच्छे वस्त्र, आनंद, सुख, अच्छी स्थिति योग्यता, सुगंध, पुत्र, धन

युक्त, स्त्रियों का अति प्रिय, स्त्रो सुख, घेयेवान्‌, पुराण श्रवण, धर्म वाहन

भूमि आभरण लाभ । बहुमूल्य वस्तुओं में पूर्ण घनो, धर्म कमं में मन रखने

वाळा, उदार चित्त, शत्र, नाशक, हर्षित, नृत्य वाद्य गीत प्रिय, भोजन सुख,

बंधु प्रेम, वुद्धि, राज दरबार मैं निवास ।

४ शांत--धैय॑ युक्त, संबन्धियों का सहायक, समय पर साहस, सुखी जीवन, पुत्र स्त्री

वाहन भूमि विद्या और धर्म युक्त, शास्त्र चितन से आनन्द, राज्य से सम्मान

लाभ, अति शांत प्रकृति, राजाओं का मन्त्री, स्वतन्त्र, अनेक मित्र, परोप￾कारी, पुण्य कार्य में चित्त, विनय सौभाग्य स्नेह और सदाचार युक्त, अच्छी विद्या, बहुत पुत्र, प्रयोजन सिद्ध 1

५ शक्त--स्याति युक्त, सव कार्य में समर्थ, सदा प्रसन्न, सज्जन, परोपकारी, पवित्र,

धनी, पुष्पों में रुचि, सर्वज्ञ, तिमान्‌, की शत्र, हंता, अति आसक्त ।

६ गवित--तवीन गृह, बगीचा, राज्य कलाओं में पाण्डित्य, धन लाभ, सदा

व्यापार में बृद्धि ।

७ दीन - मन अशान्त, मानसिक चिता, अत्यन्त दीन, दरिद्री, राजा तथा दात्र, से

भय, शत्रु पीड़ा, कांति हीर, स्वजाति से वेर, नीति रहित, स्थानसें भ्रष्ट,

७८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

स्वजन से परित्यक्त, बंधु विरोध, अनादर, नीच वृत्ति से उपजीविका; नाना

प्रकार के रोग से पीडा :

द हीन — समान फल, स्थानान्तर गमन, बन्धु वैर, दुःख, निदनीय वृत्ति से उप￾जीविक्ता, अपने जनों से त्यक्त, शरोर और मन रोगो, व्यर्थ का व्यापार ।

९ दुःखो या अति दुःखित--अनेक प्रकार के कष्ट से दुःखो मन, बिदेश यात्रा या विदेश

वान, राजा चोर या अग्नि से भय, शत्र, पीड़ा या भाई वहन नाश या कई

शोक ।

१० विक-कत्र, के पपञ्च से मन्द वृद्धि, मानसिक गड़बड़ी, अपमान, विफलता, मान￾मिक फष्ट, इष्ट मित्रों का मरण, बलक्षीण, मलिन, व्यर्थ भटकने वाला, अति

दुवेल, परोपकार रहित, कायं में आलस्य, पराये उपकार में अनादर, पिता

आदि का मरण; स्त्री पुत्र वाहन हानि, चोर से पीडा, नोति रहित, सदा

दुःखी, भांति, स्नेह नाश, वस्त्रनाण, वुद्धि हानि, दुष्ट मित्र, पराया कार्य

विगाड़े, शत्रू वृद्धि, शत्रू, से पराजय, रोग की वृद्धि ।

११ खल--लगातार हानि, अचानक अइचनें,. झगड़ा, स्त्री साता पिता का वियोग,

शत्रुओं द्वारा भूमि धन नाश, दुष्टों से मुकदमा वाजी, परदेश वास, लोभी,

सज्जनों से निन्दा, स्वजनों का वियोग, क्रोधी, बुद्धि हीन, स्त्री बच्चों से

झगडा और वियोग, सदा दुःखी, बीमारी दुःख आदि, धन हानि, मित्रों से

कलह ।

१२ पोड्य-मित्रो और सम्बन्धियों से कलह फौजदारी मुकदमा आदि ।

१३ भीत्य--चोर और अग्नि से डर, अपमान ।

१४ कोपी--पाप कम में प्रवृत्ति, विद्या धन स्त्रो पुत्र और बन्धुओं की हानि, नेत्र में

रोग, यश और भूमि नाश, ' रोग, प्राण संकट, विष जन्तु भय, शत्रु भय,

ज्ञाति भय, राज भय, राजा से घन हरण, जुर्वांना, जप्तो आदि, एक पुत्र से

नलेश ।

१५ पीड़ित-अनेक व्याधि पीड़ित, दुव्यंसन से अपक्रीति, स्वस्थान त्याग कर अन्यत्र

अमण, बन्धु चिता से व्याकुलता, अपमान, वन्धन, कारागार, पराधीनता

आदि। ,

“१६ लज्जित--ईश्वर में अनिष्ठा, सुमति नाश, व्ययं भ्रमण, कलह में रुचि, धर्म में

अरुचि ।

१७ क्षोभित--द रिद्रता, कुबुद्धि, कष्ट, धन नाश, पैरों में आघात, राजा से क्रोध, घन

में बाधा ।

१६ क्षुभित-शोक, मोह, परिजनों के सन्ताप से मानसिक व्यथा, शरीर में दुर्बलता,

: शत्रु ओं से कलह, घन हानि, बलह्वास, विषाद से बुद्धि कुण्ठित ।

१९ तृषित-स्त्रियों को रोग भय, बुकार्य में प्रवृत्ति, वन्धुओं के विवाद से धन हानि,

ग्रहों की अवस्थाएँ और चन्द्र क्रिया: ७९

शरीर में दुर्बलता, दुष्टों द्वारा क्लेश और मान हानि, व्यभिचार, अपने

परिवार द्वारा चित्त में सन्ताप ।

संक्षिप्त में प्रदीप्त का अच्छा प्रभाव पुरा होता है । विकल में फल को बिलकुल

हानि हो जाती ë । बीच + अवस्था में क्रमानुसार फल घटेगा जैत्ती अवस्था होगी फल

अच्छा या बुरा उसो प्रमाण से होगा ।

दीप्त में सव कार्य साघे । स्वस्थ में आधा कार्य साघे। अतिदुःखित में शत्रु की

बहुत पीड़ा हो । विकल में रोगी होवे इत्यादि फछ का अनुमान करना । कुंडली का फल

कहने में ग्रहों की उपथु'बत अवस्था का विचार करना और व्यापार अवस्था आदि का

भी विचार करना जो आगे बताई गई है 1 ये 65 ग्रहों के वळ या निबंछता से भी अधिक

या न्यून फळ के द्योतक हैं । यहां अवस्था में किसो का शुभ किसी का अशुभ फल कहा

है केवल इतने से ही फल निश्चित नहीं होता । इसमें राशि शील, ग्रह शील, भाव,

आवेश, ग्रह कारक, ग्रह दृष्टि योग आदि सब विषयों पर विचार कर ग्रहों के बल के

अनुसार फलाफल निश्चित करना । इन सब के अनुसार इन अवस्थाओं के फल में भी

अन्तर पड़ जाता है और इन का फल उन ग्रहों को दशा में होता है ।

जिस २ भाव में क्षुधित या क्षोभित ग्रह हों उस भाव का नाश कर दुःख देते हैं 1

इन अवस्थाओं का भाव-विद्येष में फल

१ कर्म स्यान भे--लज्जित, तृषित, क्ष घित, या क्षोभित ग्रह हो तो वह सदा सुखी

रहता. ह ।

२ पंचम स्थान सॅ--लज्जित ग्रह हो तो उसका पुत्र नाश होता है या केवल, एक पुत्र

रह जाता है ।

३ सप्तम भाव में-क्षोभित या तुषित ग्रह हो तो उसकी स्त्रो मर जाती ë ।

बाल वृद्ध अवस्था विचार

N

राशि | विषम राशि सम राशि | अवस्था का क्ला

रा०के अंश | में अवस्था | में अवस्था फल

१ १से६०तक वाल मृत बालं (घोडा फलः

š = उन्तति शील ६ से १२०, कुमार वृद्ध कुमार आघा फल=सुखी

१२से १८°,| तरुण तरुण तरुण पूर्ण फल=राजा हंसल मे !

१८से२४०,। वृद्ध कुमार बुद्ध र्द फल=अनिष्ट फल, रोग

२४्से ३०, मृत बाल मृत शून्य फश=मरण

८० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

बाल में प्रभाव नहीं के बराबर है | कुमार १२ वर्ष तक रहता है तब ग्रह का कुछ

अच्छा या आघा प्रभाव पड़ता है । तीसरी श्रेणी तरुण की है उसमें सबसे अधिक प्रभाव

या ग्रह का पूरा प्रभाव पड़ता है । चतुथं श्रेणी वृद्ध की है, जब शित क्षीण हो जाती है

बहुत कम फल देने की शक्ति रहती हैं परन्तु जान परिपक्वता बढ़ जाती है इस सम्बन्ध

में विचार किया जा सकता है । पांचवीं अंतिम अवस्था मृत्यु की है यहां ग्रह की शक्ति

बिलकुल ही नहीं रहती उस समय वह कुछ फ देने योग्य नहीं रहता ।

शुक्र, गुरु, का चन्द्र बाल-वृद्धत्व

शुक्त--जब पूर्व में उदय हो-३ दिन तक बालक । पश्चिम में उदय हो तो १० दिन तक

बालक । अस्त होने के ५ दिन पहिले वृद्ध ।.

गुर--?५ दिन वाल ओर वृद्ध रहता है । अन्य मत-वृद्धत्व में ५ दिन, बालकत्वमें ३

दिन, शुभ कार्य में वजित ।

चन्द्र-३ दिन वृद्धत्व, आधा दिन बालकत्व, ३ दिन अस्त ।

वृद्ध ग्रह-राहु, सूर्य, गुरु, शनि; ग्रह वृद्ध ग्रह Š ।

लग्न में चन्द्र और शुक्र हो तो न तो अति वृद्ध स्वभाव वाला और न तरुण

अवस्था का स्वभाव वाला ग्रह है ।

स्वप्नादि अवस्था

राशि के अंश | विषम राशि में | सम राशि में अवस्था फल १ से १०° तक | जागृत सुषुप्ति १ जागृत-कार्य साधन करने वाली

१०से २००तक | स्वप्न स्वप्न २ स्वप्न-मध्यम फल वाली

qoq ३०°तक | सुषुप्ति जागृत ३ सुषुप्ति-निष्फल

१ जाग्रत=अपनी राशि या उच्च में-पूर्ण फल

२ स्वप्न = मित्र या सम के गृह में-शून्य फल

३ सुषुप्ति = शत्रु या नीच स्थान में-शून्य फल

ग्रहों की १२ चेष्टाएँ

जन्म काल में कोन ग्रह बया चेष्टा करता है उसी प्रमाण में उसकी चेष्टा का फल

होता ë । यह गणित में इस प्रकार निकाला जाता है--

रीति-ग्रह की राशि शोड़कर केवल अंश कला विकला लेना उसमें २ का गुणाकर ५ का

भाग देना जो अधिक हो उसी अनुसार चेष्टा होगी 1

जैसे लग्न में बुघ कन्या राशि के २५-३०-१५” पर है | इस पर से जानना

है जन्म समय बुघ को क्या चेष्टा थी ।

२५०-३०१५" x २ = १५-०-३० + ५=१० लब्धि है । ओर शेष बचा है

= ११ की चेष्टा, जिसका फल संताप या हानि है ।

१२ चेष्टाओ के भाव

ग्रहों को अवस्थाएँ और चन्द्र क्रिया : ८१

(१) प्रवास-प्रबारा करना (परदेश जाना) (७) क्रोडित-सौख्य

(२) नष्ट-द्र व्य नष्ट

(३) मृत-मृत्यु, डर, या रोग

(४) जय-जय होना

(५) हास्म-स्त्री विलास

(६) रति-स्त्री विषय का सुख

(८) अवस्था-२ भेद ë

१ मुषुप्त-निद्रा फल

२ कलही-कलह

(९) मुक्ता-द्रेह पीड़ा

(१०) ज्वरा-भय होना

(११) कंपित-संताप व हानि, ताप (ज्वर)

(२२) सुस्थित -सोख्य

वर्ष प्रवेश आदि में भो विशेष कर चन्द्र को चेष्टा निकाल कर फल का विचार

होता है ।

ग्रहों के २७ व्यापार या अवस्था

अवस्था

१ शुद्घ समय jm

२ वस्त्र धारण-कपड़े पहिरना

३ qg धारण-तिलक या सुगन्ध

लगाना

४जप -पूजा की तैयारी

५ शिव पुजा -शिव पूजा

६ उपासना -पुजा

e विष्णु पूजा -विष्णु पूजा

८ विप्र पुजा -त्राह्मण पूजा

९ नमस्कार -घुटना टेकना

१० आअद्विप्रदक्षिण -परिक्रमा करना

११ वैश्वदेव आशा

१२ अतिथि पूजा -अतिथि सत्कार

१३ भोजन -भोजन

१४ विद्या परिश्रम-पढ़ना

२५ अक्रोध “क्रोध

१६ ताम्बूल “पान खाना

१७ नृपालय -दरवार प्रवेश

१८ गमन “यात्रा को तयारी

१९ जलपान -पानी पोना

२० आलस्य -देर

<

फल अन्य मत से नाम

«उन्नति (१) स्नान

-अच्छा (२) वस्त्र धारण

-रक्षा (३) सुगन्च

-पुख (४) पूजा की तैयारी

-शत्रू, पर विजय (५) प्रार्थना करना ०

-मेळ (६) पूजा

-सफल्ता (७) बलि की तैयारी +

-शुभ (८) च्यात +

भोग (९) घुटना टेकना

-कठिनाई (१०) वेदी को परिक्रमा

बुरा (११) आशा

-बहुत आनन्द (१२) अतिथि सत्कार

-शुभ (१३) भोजन

-उन्नति (१४) जळ पीना *

-द्योक (१५) क्रोष

  • कीति (१३) ताम्बूल भक्षण

-सफलता (१७) समा प्रवेश

-अच्छाबुरा मिश्रित (१८) आनंद शब्द उच्चारण

-सुख (१९) निजी मंत्रणा

-डर (२०) देरी

८२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय-फलित खण्ड

२१ शयनम्‌ “सोना -गरीद्री (२१) निद्रा

२२ अमृत पान -अमृत पीना -संतोष (२२) पानो पीना

२३ अलंकार -गहना पहिरना -संपत्ति प्राप्ति (२३) मीठा पीना *

२४ स्त्रीशाला पांप-स्त्रियों से प्रेमालाप -भोग (२४) घन प्राप्त रू

२२ संभोग “भोग -उदासी या निराशा (२५) मुकुट उतारना

२६ निद्रा -गहरी निद्रा -रोग (२६) गहरी निद्रा

२७ रत्न पारख-हीरा की परख “धन (२७) स्त्री योग

( * चिन्ह वाले में अन्य मत से अंतर है इसका, आगे और फल दिया ë )

किसो भी ग्रह का व्यापार जानना

( लग्न राशि संख्या x ग्रह की राशि संख्या ) + २७ = शेष

( शेष > ग्रह महादशा वर्ष ) + २७ = शेष = व्यापार क्रम--

विश्योत्तरी महादशा में जो वर्ष बताये Š वही यहाँ लेना ।

विशोत्तरी दशानुसार ग्रहोंके वर्ष

ग्रह | सूर्यं | चन्द्र , मंगल | राहु | गुर शनि | बुध | केतु | शुक्र

वर्ष | ६ | १० | ७ १८ | १६ | १९ |१७| ७ | २०

उदाहरण--मान लो इस कुंडली से मंगल का व्यापार जानना है ।

लर्न मंगल लग्न कुंडली

राशि राशि

३ x ८=२४=२७=देष २४

शष मंगल वषं

२४ X७=१६८-२७= ष्र =

शेष ६ = उपासना

मंगल का उपासना व्यापार आया फल

मेल आच्छा है । सूर्य का =

लग्न रातति सूये राशि सूर्य वर्ष `

३ x १२ x ६० २१६३ २७० ८३३ = शेष ° = २७ = रत्न पारख =

शुभ है घन देने वाली है । इसी प्रकार और ग्रहों का निकाल लेना । जब सूर्य की दशा

आवेगी तब घन लाभ होगा ।

अन्य प्रकार से ग्रहों का व्यापार निकालना

( लर्न संख्या + लग्न से ग्रह स्थान ) > q x ग्रह वर्ष + २७ ग्रह का व्यापार ।

जैसे सूर्य का व्यापार निकालना है :—

ग्रहो को अवस्थाएँ ओर चन्द्र क्रिया : ८३

(लग्न + सूर्य स्थान) सूर्य वर्ष

३ १० १२१९ ६

२१ निद्रा = फल बूरा ।

इस मत के अनुसार ग्रहो का व्यापार इस प्रकार दिया है

१३५२६१५६३२७५२ Mathes शेष

१ स्मान — उन्नति, अच्छा कुटुम्ब और संतान, आदर सफलता पूवंक

कार्य ।

२ वस्त्र घारण --भुषण, घन. प्रभाव, स्वाद, वस्त्र, लाभ ।

३ सुगन्ध -— मिलनसार, विदेश में लाभ, व्यापार, आदरणीय ।

४ पूजा की तैयारी --भूमि से लाभ, अच्छे वाहन, आदरणीय ।

५ प्रार्थना करना --भूमि का प्रेमी, राजनैतिक नाश, घन हानि, भारी दोषारोपण ।

६ पुजा धन) मिलनसारी, दुष्टों से मेल ।

७ बलि को तैयारी --पित्रज दुःख, अच्छी शिक्षा ।

८ घ्याल --धनवान, सम्बन्ध, भूमि से लाभ ।

९ घुटना टेकना --मघुर भाषण, अच्छा वाहन, दुहरे हृदय वाला ।

१० वेदी की परिक्रपा--जिगर के रोग, पेचिस, फौजदारी, मुकदमे बाजी ।

११ भाल्या --राजनैतिक शक्ति, इच्छित कुटुम्ब, सफल जोवन ।

१२ अतिथि सत्कार --विचार, जाहगिर, छिपे घन का खोजी ।

१३ भोजन --धोखेग्राज, रोगी, जाति से च्युत, धार्मिक द्वेष ।

१४ जल पीना — भोजन, नीच स्वभाव ।

१५ कोघ --मनुष्यों से घृणा, खुदगर्जी ।

१६ ताम्बूल भक्षण -उच्च सेवा, अच्छी शिक्षा, बहुत घन, कीति ।

१७ सभा प्रवेश--नियमित, घामिक, आदरणीय, निरपराघ 1

१८ आनन्द शाब्द उच्चारण--महान्‌ सैनिक जीवन, भारी विद्या, धन, ।

१९ गुप्त संत्रणा ---आलसपन, मीठे शब्द, दुहरा हृदय वाला 1

,२० विलम्ब --विद्वान्‌, भद्दा, अकायंशोल, लापरवाह ।

२: निद्रा --दूसरों पर जीवन, कामी, रोगी, केर बर्ताव अपने बन्धुओं से 1

२२ पानी पीना -लापरवाह, मित्रों का बुरा करे, योग्य मनुष्यों को हानि दृष्टि से देखे,

हानि ( नष्ट होना ) ।

२३ सोठा पोना--निरोग, अच्छी सन्तान, सुन्दर स्त्री, बन्धुओ से मान, अच्छा भोजन ।

२४ घन प्राप्त --नवनशील, बडा लाभ, लाभ जनक व्यापार ||

२५ मुकुट उतारना--काम की हानि, दुःखो, मित्रों और बन्धुओं से त्यक्त ।

२६ गहरी निद्रा --कठिन रोग, राजनेतिक मुकदमा, पीना । s

२७ स्त्रो भोग --निरादर योग्य स्त्रियों में संलग्न, बुरे विचार, दुःखी, धोखेबाज, शक्की

और बदला लेने वाला ।

८४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय-फलित खण्ड

ग्रहो की १२ अवस्था जानना भवस्था नाम अन्यमत अवस्था नाम अन्य मत ७ सभा वसति (७) आगमन ६ १ शयन (१) शयन (समा में बैठना) (छेटना) ८ आगमन (८) भोजनष्् २ उपवेशन (२) उपवेशन (आना) (बैठना) ९ भोजन (९) नृत्य ३ नेत्रपाणि (३) नेत्रपाणि (खाना) (कुछ से नेत्र ढके) १० नृत्य रिप्सा (१०) लिप्साक् ४ प्रकाशन (४) प्रकाशन (नृत्य को इच्छा) (प्रकाशित) ११ कौतुक (११) कोतुक ` ५ ग्रमनेच्छा (५) गमन (प्रसन्न चित्त) (जाने को तत्पर) १२ निद्रा (१२) निद्रा ६ गमन (६) सभावसतिक्ष (सोना) (जाना)

यहाँ ६8 चिन्ह वाले में अन्तर है। आरम्भ में जो नाम दिये हैं वे वृहत्पाराशरी और भाव कुतूहल के अनुसार हैं |

ग्रह की अवस्था जानने की रीति

जन्म नक्षत्र संख्या + इष्ट घड़ी: + लग्न = इष्टादि योग । ग्रह जिस नक्षत्र में हो उसकी संख्या में उस ग्रह के अंश का गुणा कर ग्रह के क्रम का गुणा करना उसमें उप- रोक्त इष्टादि योग जोड़कर १२ का भाग देना जो होष रहे वही यहां बताये क्रम रे; उस

ग्रह की अवस्था होगी ।

ग्रह सुर्य | चंद्र | | बुध | गुरु | शुक्र | शनि | राहु |

क्रम- ३

रीति :- जन्म नक्षत्र + इष्ट घड़ी + लून=इष्टादि योग ।

ग्रह नक्षत्र ., ग्रह अंश ., ग्रह

संख्या संख्या * क्रम + इष्टादि योग + १२ = शेष अवस्था

बृहत्पाराशरी में ग्रह अंश के स्थान में प्रह की नवांश संख्या लो है

ग्रह नक्षत्र qg नवांश , ग्रह < अर्थात्‌ संझ्या संख्या क्रम + इष्टादि योग = १२८ शेष अवस्था

यहां ग्रह स्पष्ट में जो ग्रह का अंश हो वह उपरोक्त गणित में लेना ।

उदाहरण :

n mains १३मोन१ सिंह “मिथुन८वनु š q

२५ | २२॥ २६ Í

नक्षत्र २३

+q ४ | गुरु ५ | शुक्र शनि ७राहु ८ के =१५घ

ग्रहों को अवस्थाएँ और चन्द्र क्रिया : ८५

जन्म नक्षत्र त्र __ इष्ट घडी + लर्न २३ १५ f ३ = ४१ इष्टादि योग

ग्रह नक्षत्र संख्या > ग्रह अंश > ग्रह क्रम = इष्टादि योग शेष अवस्था

(१) सूयं-२६ > ५% १८१३०, +४१=१७१ = १२ -उनेत्रपाणि (२) चंद्र-२३ x RX २७९२ --४१-१३३ + १२--१ शयन (३) मंगल-१७ x १२% ३5६१२ + ४१६५३ + १२--५ गमनेच्छा (v) बुध-२४ x २०% Y=qooo + ४१-२०४१ + १२--१ शयन (५) गुर- २२ x १३% ५७१४३० + ४१-१४७१ = १२--७ सभावर्सात (६) शुक्र-२६ x १३२९ ६७२०२८ + ४१२०६९ = १२--५ गमनेच्छा

(७) शनि-१० x ८X ७-५५६० +४१=६०१ = १२--१ शयन (८) रप्हु- ६% éX ८-३८५ + ४१०४२५ +१२--५ गमनेच्छा (९) केतु-१९ x €X ९०१२६८ + ४११४०९ + १२---५ गमनेच्छा इन सब के फल आगे बताये गये हैं ।

अवस्था की चेष्टा जानना

( उपरोक्त शेष + वही शेष ) -- नाम का स्वरांक 1-१२ = दोप । (प्राप्त शेष + ग्रह धरुवांक ) + ३ = शेप--चेष्टा । ग्रह ध्ुवांक सूर्य चन्द्र मंगल वुध गुरू शुक्र शनि राहु ३ RR २ ५ ३ ३ x बाण का स्वर्शक देष्टा

है १।२|।३ | ४५ 5 apasi फल | रवि आदि ग्रहों की इस प्रकार

i ष्टा-पुण फल दृष्टि आदि होती है । परन्तु राहु छ| भ |इ उ|ए|ओ क्ल i z चहल वि च ३ विष्चेटा-अल्प फल | और ह के फल सदा एक रूप

| |ज s| | ठ

Ë र Ë š: थ | द | उदाहरण---चालू नाम बाबू सिह-आदि अक्षर ब-स्वरांक फ़} H ष्ट भ!म|य|र | =: । (9 गुरु को (शेष ७१८ ७) + ५ स्वरांक= ४- १२-पप्राप्त

ए)व!श|ष|स|ह ! शेष ६

प्राप्त शेष गुरु ध्रुवांक

दि प्‌ = ११ = ३-शेष २-चेष्टा ।

इसी प्रकार प्रत्येक ग्रहों को निकाल लेना ।

राहु केतु की चेष्टा आदि निकालने को आवश्यकता नहीं हैं । कई राहु को भी

निकालते ë ।

शयन आदि अवस्था का विशेष फल 5

इबल---पाप ग्रहों में से कोई ग्रह सप्तम घर में पत्नो का विनाश

किसी अन्य पाप ग्रह से पीडित होकर पाप करता हूँ । ग्रह बैठा हो कोई शुभ दृष्टि न हो तो

८६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्डं

शथन/-लग्न से पंचम घर में उच्च या स्वक्षेत्री

ग्रह हो, यदि यह पाप ग्रह युक्त या पापदृष्ट उसके पुत्र का नाश करे

हो तो, यदि शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो एक पुत्र का नाशक होता ë ।

निम्रा--वर्तमान ग्रह सप्तम भाव में हो शत्रु -तो उसकी स्त्री यदि देव से भी

ग्रह से दृष्ट हो या शत्रु ग्रह समीप हो, रक्षित हो तो मर जाती है ।

स्त्रो मारक ग्रह को कोई शुभ ग्रह की -तो एक पत्नी मर जाती हैं दूसरी

दृष्टि हो या शुभ ग्रह युक्त हो नही मरती ।

जो शुभ और अशुभ दोनों ग्रहों की -पत्नो सब समय कष्ट युवत

दृष्टि हो तो रहती है मरती नहीं ।

नित्रा--इस अवस्था में मंगल और शनि दोनों तो थोड़ी अवस्था मैं शस्त्र की

` राहु से युक्त होकर लग्नसे अष्टम घरमें चोट लग कर मृत्यु हो ।

हों कोई शुभ ग्रह इस अवस्था में लग्न से

अष्टम घर में हों और उसे कोई पाप तब भी संग्राम में शस्त्र से

ग्रह या उसका शत्र ग्रह देखता हो. मृत्यु हो ।

निद्रा या- निद्रा या शयन अवस्था में कोई

शयन शुभ ग्रह पाप ग्रह युक्त लग्न से अष्टम हो त्रु के कोप से मृत्यु

निद्रा या शयन अवस्था में कोई मरने के समय गंगा तट पर

पाप ग्रह अष्टम घर में हो उसे शुभ देह त्याग कर भगवान्‌ की

ग्रह देखे या कोई शुभ ग्रह पास हो सायुज्य गति को पाता है अर्थात्‌

अष्टमेश ग्रह उसके साथहोतो ईदवरके अंगमें लीन हो जाता है।

इन अवस्थाओं का और भी शुभाशुभ विचार

( १) जन्म समय शयन अवस्था में स्थित शुभ ग्रह जिस भाव में हो उस भाव का

फल शुभ होता हे ।

(२) भोजन अवस्था में पाप ग्रह जिस भाव में हो उस भाव का फल नष्ट

होता है ।

( ३ ) निद्रा अवस्था में पाप ग्रह यदि सप्तम भाव में हो तो शुभ फल समझना

यदि उस पर पाप ग्रह की दृष्टि हो तो शुभ नहीं होता ।

(४) निद्रा या शयन अवस्था में पंचम भाव में यदि पाप ग्रह हो तो शुभ फछ ।

( ५ ) निद्रा या शयन अवस्था में पाप ग्रह अष्टम भाव में हो तो राजदण्ड आदि से

अपमृत्यु हो ।

यदि उस पर शुभ ग्रहका योग या दृष्टि हो तो उसका मरण गंगादि तीर्थं में हो

( ६ ) शयन या भोजन अवस्था में पाप ग्रह दशम माव में हो तो कमं से अनेक

प्रकारे दुःख होते हैं ।

ग्रहों की अवस्थाएँ और चन्द्रक्रिया : ८७

(७) चन्द्रमा कौतुक या प्रकाश अवस्था में दशम भाव में हो तो निदचय राजयोग

होता है । यहाँ चन्द्रमा उपलक्षण है अर्थात्‌ कोई भी शुभ ग्रह या दशमेश

दशम भाव मे कौतुक या प्रकाश अवस्था में हो तो राजा या राजतुल्य

होता है ।

यहां ग्रहों की अवस्था और बल के अनुसार ग्रह से सब भावों का फल समझना ।

अब प्रत्येक ग्रहों की १२ अवस्थाओं का पृथक्‌ पृथक्‌ फल देते Š

(१) सूर्य की १२ अवस्थाओं का फल

9 शयन अवस्था में--मंदाग्नि ( क्षुपा की हानि ), पित्त का कोप, गुह्य भाग में रोग

(गुदा में त्रण), हृदय शूळ, हाथ पांव में स्थूलता या हाथी पांव ।

२ उपवेदन--दरिद्र, भारवाही, विवादी, हृदय कठोर, धन को नष्ट करने वाला, अच्छी

शिक्षा से रहित, सदा दूसरों की सवा में तत्पर, दस्तकारी के काम मे लग्न

परन्तु दुःखी, काला वर्ण परन्तु सुन्दर ।

3 चेत्रपाणि--सदा आनन्द युक्त, विवेकी, परोपकारी, बली, धनी, सुखो, राजा का कृपा

पात्र, अभिमानी ।

इस अवस्था में लग्न से ५-९ या १० वें घर में सूर्य हो तो सब प्रकार

का सुख हो, उत्तम फल । यदि अन्य स्थान में हो तो शरीर में द्रव्य

पदार्थ सम्बन्धी रोग से बीमार रहे क्रूर स्वभाव हो ।

४ प्रकाशन--उदार हृदय, पूर्ण धनी और गुणवान्‌, पुण्यवान्‌, बलवान्‌, सुरूप, सभा में

वक्ता पर क्रोधी, उपद्रवी, अनेक धर्म करने धाला, यदि लग्न से ५ या ७

घर में सूर्य हो तो दानी, मानयुक्त धनी हो आनन्द भोगे और राजकीय'

पुरुष का पुत्र हो । अन्य मत से पुत्र हानि ।

५ गमनेच्छा--विदेश वासी, दुःखी, आळसी, बुद्धि हीन, डरपोक, क्रोधी, कृपण, कुबुद्धि,

निद्रालु, उग्र, कठोर चित्त, कुपार्ग में बुद्धि, पर-स्त्रो भोगने का इच्छुक,

सर्वत्र प्रकाश करने वाला, अशुद्धता से रहने वाला ।

६ गसन--पर-स्त्री गामी, परिजन रहित ( अकेला रहने वाला ), गमन शील, ( गमन

करने वाला ) खल, मलिन, कुबुद्धि, स्त्री और पहिले पुत्र का नाश, विदेश

वास, पैर के रोग से पोड़ित इस अवस्था में सूर्य ५ या १२ घर में हो तो

पुत्र हानि करे ।

७ सभावसति--प्यारी स्त्रो मिले, सबसे मान पाये, अनेक गुण युक्त, ज्ञानवान्‌ और सम्य

हो, परोपकारी, घन धान्य से पूर्ण, बली, मित्र का (अनेक मित्र) प्रेमी,

दयालु, कलाओं का ज्ञाता, नवीन वस्त्र, भूमि ग्रह युवत ।

८ आगमन- -शत्रुओं से तंग, चंचल, दुष्ट, दुबल, घर्म कर्महीन, मदोद्धत, (मद से उद्धत)

अज्ञानी, सदा काम H लगा रहे, मिथ्यावादी, निम्न श्रेणी की शिक्षा से

युक्त, कठोर चित्त, बुरे आचरण वाला ।

८८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

९ भोजन--छरीर में पीड़ा, परस्त्री गामी, पर-स्त्री के कारण धन नाश, बल का ह्वास,

असत्य भाषण, मस्तक पीडा, क्षुद्र अन्न भोजन, कुमार्ग गमन, उग्र स्वभाव,

मांस का लालची, शास्त्र का ज्ञाता, मीन भक्षी, सतगुण कार्य का अनुयायी,

गठिया के रोग से युक्त । इस अवस्था में नवम घर में सूर्य हो तो पुण्य कर्म

में बाधा हो ।

१० नृत्यलिप्त--कणं रोगी, नाना विषय के अध्ययन में मर्न, विद्वान्‌, राजा से मान,

विज्ञजनों से सम्मानित, काव्य विद्याओं का ज्ञाता, राजपूज्य बड़ा

पंडित, पंडित पुरुषों के साथ रहने वाला ।

११ ष्लोतुक--सवंदा हषं युवत, ज्ञानी, यज्ञ करने वाला, राजा का आश्रित, शन्नु से जीत,

सुन्दर मुर्ख, काव्य प्रेमी, कार्य शील, धनी, सदा हास्य युक्त, दानी, आनन्द

भोवता, अपनी स्त्री और संतान का प्रेमी, कला के काम का प्रेमी । इस

अवस्था में छठे घर में सूर्य हो तो--शन्नु नाश हो, पंचम दोषप्रद में शरीर

में बिगाडू, पुत्र, मृत्यु, गुप्तेन्द्रिय में रोग हो ।

१९ निग्रा- आँख निद्रा से भरी, विदेश वास, स्त्री की हानि, अनेक प्रकार के घन का

नाश, निद्रालु या ऊंघता, रोगी, रक्त नेत्र, उम्र स्वभाव दूसरों को डांटने

की आदत ।

(२) चंद्र की १२ अवस्थाओं का फळ

चन्द्र शुक्ल पक्ष में शुभ होता है । कुष्ण पक्ष में अशुभ होता है ।

चन्द्र की शासन अवस्था को छोड़कर अन्य अवस्थायें बुरी नहीं हैं ।

१ शयन अवस्था-गरीब हो, क्रोधी स्वभाव का, बुरे आचरण का, निद्वालु, शरीर के

गुप्तांग में रोग । बड़ा अभिमानो, बड़ा कामी, घन का व्यर्थ खर्चे

करने वाला । मृदु स्वभाव, कृष्ण पक्ष में बुरा प्रभाव पड़ता है, कृपण,

झगड़ाछू, क्रूर, मर्यादा के बाहर कार्य करने वाला (बुरे आचरण का)

दुसरे को डांटने वाळा, दाहिनी वाजू त्रण, अग्नि में जलने की सभ्भा-

बना, सपं से भय, जळ में डूबने का भय ।

२ उपवेधन--पितृज पीड़ा या अन्य प्रकार का रोग, मलिन हृदय, कृपण, घन रहित,

घोखेबाज, विदेशवासी, दांत के गड़ने या काटे जाने की सम्भावना, मन्द

बुद्धि, घन हीन, बड़ा कठोर, वियोगी, दूसरे के घन को इरने वाला ।

३ चेत्रपाणि--नेत्र के रोग, हाथी पांव रोग, उपद्रवी, घोखेवाज प्रकृति का, अधिक कानूनी,

बड़ा रोगी, निरर्थक बोलने वाळा, धूतं, कुकर्म में रत ।

४ प्रझाशन- घन के लिये लाम जनक, दुढ़ शरीर, तीर्थ यात्रा की भोर झुकाव, विमल

गुण युक्त, राजा के सम्बन्ध से गुण प्रकाश, संसार में ख्याति, राजा से धन

लाभ, हाथी घोड़े आदि वाहन युवत, सम्पत्ति भूषण वस्त्र और स्त्री के सुख

से युक्त, तोथं करने वाला । कृष्ण पक्ष में इसका उल्टा फल होगा ।