संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
उपशम-प्रकरण ] * असङ्ग सुखमें परम शान्तिको प्राप्त पुरुषके व्यवहार-कालमें दुखी न होनेका प्रतिपादन * ३२७
असङ्ग सुखमें परम शान्तिको प्राप्त पुरुषके व्यवहार-कालमें भी दुखी न होनेका प्रतिपादन, ज्ञानीकी तुर्यावस्था तथा देह और आत्माके अन्तरका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जो संसारमें रागके अत्यन्त अभावसे उत्पन्न निर्विशेष आनन्दके अभ्यासमें संलग्न हैं और जिनके अन्तःकरण अत्यन्त विशाल हैं, वे जीवन्मुक्त महापुरुष चाहे व्यवहार करें, पर वे सदा-सर्वदा भय और शोकसे रहित होकर ही स्थित रहते हैं। जिसका अन्तःकरण दृश्य-चिन्तनसे रहित, केवल नित्य चेतन परमात्माका ही अवलम्बन करनेवाला तथा सम्पूर्ण चिन्ताज्वरोंसे मुक्त हैं, उस महात्मा पुरुषके सत्सङ्गसे मनुष्य वैसे ही विशुद्ध हो जाते हैं, जैसे निर्मलीसे जल शुद्ध हो जाता है। परमात्माके स्वरूपमें निमग्न रहनेवाला वह तत्त्ववेत्ता पुरुष क्रियाशील होते हुए भी अपने स्वरूपमें नित्य स्थित रहता है। जैसे चिकने स्फटिक मणिपर वास्तवमें किसी भी रंगसे रंग नहीं चढ़ता, वैसे ही परमात्मस्वरूपको प्राप्त तत्त्ववेत्ताका अन्तःकरण सुख-दुःखकी प्राप्ति होनेपर विकारवान् नहीं होता। जिसने सगुण-निर्गुणरूप परमात्माको भलीभाँति जान लिया है और जो परमात्मस्वरूप परम अभ्युदयको प्राप्त हो गया है, उस महात्मा पुरुषके चित्तको संसारका दृश्य उसी प्रकार लिपायमान नहीं कर सकता, जैसे जलरेखा कमलको लिपायमान नहीं कर सकती। जब यह जीवात्मा परमात्माका ज्ञान प्राप्तकर समस्त कल्पनाओंके हेतुभूत मलोंसे रहित हुआ ध्यानाभाव-दशामें भी परमात्माके स्वरूपानुभवमें निमग्न रहता है, तब वह 'स्वसक्त' (आत्माराम) कहलाता है। आत्माराम होनेसे ही मनुष्य संसारमें असङ्गभावको प्राप्त करता है; क्योंकि आत्माके ज्ञानसे ही विषयासक्तिका क्षय होता है। चित्तके विषय-सम्बन्धिनी वृत्तियोंसे रहित हो जानेपर क्षीणवृत्तिवाले अन्तःकरणोंकी जो वासनाओंसे रहित शान्तिमयी स्थिति है, वही जाग्रत्में सुषुप्तिके समान समाधि-अवस्था कही जाती है। इस प्रकार अखण्ड समाधि-अवस्थाको प्राप्त मनुष्य व्यवहार करता हुआ भी सुख-दुःखरूपी रस्सोंसे बँधकर संसारकी ओर कभी आकृष्ट नहीं होता; क्योंकि उसकी दृष्टिमें संसार है ही नहीं। जो पुरुष जाग्रत्में ही परमात्मामें स्थित हुआ जगत्के कार्योंको करता है, उस पुरुषको यन्त्रकी पुतलीके समान सुख-दुःखका अनुभव नहीं होता।
जो पूर्वसे ही यानी साधनावस्थासे ही तीव्र वैराग्यके कारण उपेक्षाबुद्धिसे कर्म करता है तथा जिसकी बुद्धि परमात्मामें ही स्थित है, वह मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है और फिर वह उन कर्मोंके फलोंसे नहीं बँधता। विवेकशील साधकको कर्मोंका अनुष्ठान या परित्याग—कुछ भी अच्छा नहीं लगता। किंतु जिन्होंने आत्मतत्त्वको जान लिया है, वे महात्मा तो जिस समय जो कुछ प्राप्त हो जाता है, तदनुसार न्याययुक्त जीवन-यापन करते हुए स्थित रहते हैं। सांसारिक विषयोंके सम्बन्धसे रहित सच्चिदानन्दघन परमात्मपदमें भलीभाँति स्थित परमात्मप्राप्त पुरुष जो-जो कर्म करता है, उसमें वस्तुतः उसका कर्तापन नहीं रहता। श्रीराम ! यही अखण्ड समाधिरूप सुषुप्ति-स्थिति अभ्यासयोगसे जब दृढ़ हो जाती है, तब तत्त्वज्ञ महात्माओंके द्वारा वह तुर्य-स्थिति कही जाती है। जिसके अन्तःकरणसे समस्त विकार विनष्ट हो चुके हैं और जिसके मनका अत्यन्त अभाव-सा हो गया है, वह ज्ञानी महानुभाव विशुद्ध आनन्दमय हो जाता है। उपर्युक्त अखण्ड समाधिमें स्थित रहनेवाला ज्ञानी अतिशय प्रसन्नतासे परिपूर्ण और परम आनन्दमें निमग्न हुआ इस जगत्के व्यवहारको सदा लीलाकी ज्यों देखता रहता है। श्रीराम ! जिसके शोक, भय एवं सांसारिक क्लेश सदाके लिये निवृत्त हो गये हैं तथा जो संसाररूपी भ्रमसे रहित है, वह तुर्यावस्थामें सदा-सर्वदा स्थित आत्मज्ञानी फिर इस संसारचक्रमें कभी नहीं गिरता। जैसे आकाशमार्ग वायुओंके लिये गम्य है,
३२८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त-योगवासिष्ठ
वैसे ही दूरसे भी अति दूर परमपद विदेहमुक्त पुरुषोंके लिये अनुभवगम्य है । परमानन्दमें निमग्न ज्ञानी पूर्वोक्त सुषुप्तिके समान अखण्ड ब्रह्माकार समाधि अवस्थासे जगत्स्थितिका वास्तविक अनुभव करके उसके पश्चात् तुर्यावस्था ( जीवन्मुक्तावस्था ) को प्राप्त होता है । रघुकुलतिलक ! जिस प्रकार तुर्यातीत पदका ज्ञान रखनेवाले आत्मतत्त्व-ज्ञानी महात्मा तुर्यातीत पदमें स्थित रहते हैं, उसी प्रकार तुम भी सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंसे रहित हो उस परमपदमें स्थित रहो । चाहे देह नष्ट हो जाय, चाहे वह नष्ट न हो यानी स्थिर रहे, उससे तुमको क्या प्रयोजन है ? तुम तो केवल आत्मज्ञानमें ही स्थित रहो । यह देह जैसा है, वैसा भले ही बना रहे । श्रीराम ! जैसे अन्धकार और मेघ-मण्डलसे मुक्त शरत्पूर्णिमाकी रात्रिका आकाशमण्डल सुशोभित होता है, वैसे ही तुम अभीष्ट और अनभीष्ट विषयोंसे मुक्त हुए शीतल साक्षात्काररूपी आलोककी शोभासे सुशोभित हो रहे हो ।
रघुनन्दन ! इस संसारमें देश, काल और वस्तुके परिच्छेदसे शून्य एक विशुद्ध चेतन आत्मा ही है, उसके सिवा अन्य कुछ नहीं है । सर्वत्र व्यापक चेतन 'आत्मा' यह नाम केवल व्यवहारके लिये ही कल्पित है, वास्तवमें नाम-रूप आदि भेद तो इस चेतनसे अत्यन्त दूर ही हैं अर्थात् यह चेतन आत्मा नाम-रूप आदि उपाधिसे रहित है । जैसे समुद्र जलस्वरूप ही है, उससे भिन्न तरङ्ग आदि कुछ भी नहीं हैं, वैसे ही यह सब जगत् आत्मस्वरूप ही है, उससे भिन्न पृथ्वी-जल आदि कुछ भी नहीं हैं । जैसे छाया और धूपका तथा प्रकाश और अन्धकारका परस्पर सम्बन्ध नहीं हो सकता, वैसे ही शरीर और आत्माका भी परस्पर सम्बन्ध नहीं हो सकता । श्रीराम ! जैसे सदा परस्पर विरुद्ध रहनेवाले शीत और उष्णका एक दूसरेसे सम्बन्ध नहीं हो सकता, वैसे ही देह और आत्माका भी एक दूसरेसे कभी सम्बन्ध नहीं हो सकता । जैसे मरुभूमिमें सूर्यकी किरणोंसे प्रतीत हुआ जल किरणोंके यथार्थ ज्ञानसे विनष्ट हो जाता है; वैसे ही अज्ञानजनित यह देह और आत्माका परस्पर सम्बन्ध-भ्रम भी आत्म-तत्त्वके साक्षात्कारसे विनष्ट हो जाता है । वह चेतन आत्मा शुद्ध, अविनाशी, स्वप्रकाश एवं सम्पूर्ण विकारोंसे रहित है और देह विनाशशील, अनित्य और मलरूप विकारसे युक्त है; ऐसी स्थितिमें अत्यन्त अन्तर होनेके कारण आत्माका शरीरके साथ सम्बन्ध कैसे हो सकता है । प्राणवायुसे बलवान् होकर ही शरीर स्पन्दको प्राप्त करता है, इसलिये आत्माके साथ किंचित् भी शरीरका सम्बन्ध नहीं है । श्रेष्ठ बुद्धिसे सम्पन्न श्रीराम ! जब द्वैतको माननेपर भी आत्माके साथ पूर्वोक्त प्रणालीसे देहादिका सम्बन्ध नहीं हो सकता, तब द्वैतकी असिद्धिमें तो इस प्रकार सम्बन्धकी कल्पना ही कैसे हो सकती है । जैसे परस्पर अत्यन्त विरुद्ध प्रकाश और अन्धकारका एक दूसरेसे सम्बन्ध और सादृश्य नहीं हो सकता, वैसे ही परस्पर अत्यन्त विरुद्ध आत्मा और शरीरका भी एक दूसरेसे सम्बन्ध और सादृश्य नहीं हो सकता ।
जैसे शीत और उष्णकी एकता कहीं दिखलायी नहीं पड़ती, वैसे ही क्रमशः जड और चेतनस्वरूप देह और आत्माका भी संयोग नहीं हो सकता। यह देह प्राणवायुसे ही चलता है, उसीसे उसका गमनागमन होता है एवं देह-की नाड़ियोंमें संचार करनेवाले प्राणवायुसे ही शब्द होता है। जिस प्रकार छिद्रयुक्त बाँसोंसे वायुके गमनागमनसे शब्द उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार शरीरके कण्ठरूप छिद्रसे निकले हुए प्राणवायुसे जब कण्ठ, तालु आदि स्थानोंमें जिह्वा आदिके द्वारा अभिघातसे निकाले जाते हैं, तब कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग आदि शब्द प्रकट होते हैं—यह बात प्रत्यक्ष सिद्ध है । शरीररूपी स्थानको छोड़कर जहाँ चित्तरूपी पक्षी अपनी वासनाके अनुसार जाता है, वहींपर विचार करनेपर आत्माका अनुभव होता है । जहाँ पुष्प रहता है, वहींपर जैसे गन्धका ज्ञान रहता है, उसी
**२४—महर्षि उद्दालककी साधना, तपस्या और परमात्मप्राप्तिका कथन, सत्ता-सामान्य, समाधि और समाहितके लक्षण ... ३०६**
उपशम-प्रकरण ] * देहादिके संयोग-वियोगादिमें हर्षशोकसे रहित शुद्ध आत्माके स्वरूपका विवेचन * ३२९
प्रकार जहाँ चित्त रहता है, वहींपर आत्माका ज्ञान होता है। जिस प्रकार सर्वत्र स्थित आकाश दर्पणमें प्रतिबिम्बित होता है, वैसे ही सर्वत्र स्थित आत्मा शुद्ध अन्तःकरणमें दिखलायी पड़ता है। जैसे पृथ्वीमें नीचेका भाग जलका आश्रय-स्थान होता है, उसी प्रकार अन्तःकरण ही आत्माके अनुभवका आश्रय-स्थान है। महान् बुद्धिवाले पुरुष कहते हैं कि संसारकी उत्पत्तिमें अविचार, अज्ञान और मूर्खता ही सारभूत है और यही अन्तःकरणकी उत्पत्तिमें हेतु है। रघुनन्दन ! जैसे प्रज्वलित दीपकसे अन्धकारका तत्क्षण ही नाश हो जाता है, वैसे ही नित्य सिद्ध आत्माके यथार्थ ज्ञानसे ही चित्तका तत्क्षण नाश हो जाता है। जैसे बंदर वनके एक वृक्षको त्यागकर दूसरे वृक्षपर चला जाता है, उसी प्रकार वासनाके वशीभूत जीव कर्मानुसार एक शरीरको त्यागकर दूसरे शरीरमें चला जाता है। श्रीराम ! जिस शरीरमें वह चला गया, उस शरीरको भी त्यागकर फिर दूसरे समयमें अन्य विशाल देशके अन्तर्गत दूसरे शरीरमें चला जाता है। इस प्रकार जीवोंके यथार्थ स्वरूपको आवृत करके रहनेवाली अपनी ही बन्धक वासना जीवोंको इधर-उधर भटकाती रहती है। श्रीराम ! वासनारूपी रज्जुमें बँधे हुए जीव पहलेसे ही जीर्ण तो हैं ही, फिर भी वे पर्वततुल्य जड शरीरोंमें अत्यन्त दुःखपूर्वक आयु क्षीण कर रहे हैं। जिन्होंने जीर्णसे भी अधिक जीर्ण होकर दरिद्रता, रोग, वियोग आदिसे उत्पन्न हुए दुःखोंका भार वहन किया है तथा जिनका जीवन अनेक योनियोंमें दुर्दशाग्रस्त परिणामोंसे जर्जर हो चुका है, वे जीव बारंबार अपने हृदयकी दुर्वासनाओंसे दीर्घकालतक नरकोंमें निवास करते हैं।
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! मुनिवर श्रीवसिष्ठजीके ऐसा कहनेपर जब दिन बीत गया, सूर्यभगवान् अस्ताचलकी ओर जाने लगे, तब सभामें उपस्थित सब लोग मुनिको प्रणाम करके सायंकालीन स्नान-संध्या-वन्दनादि नित्यकर्म करनेके लिये चले गये और रात्रि बीत जानेपर दूसरे दिन सूर्यकी किरणोंके साथ ही पुनः सभामें उपस्थित हो गये।
( सर्ग ७०-७१ )
देहादिके संयोग-वियोगादिमें राग-द्वेष और हर्ष-शोकसे रहित शुद्ध आत्माके स्वरूपका विवेचन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तुम देहके उत्पन्न होनेपर उत्पन्न नहीं होते और देहके नष्ट होनेपर नष्ट नहीं होते; क्योंकि अपने स्वरूपमें तुम विकार-रहित और विशुद्ध हुए नित्य स्थित हो। इस विनाशीशील देहके नष्ट हो जानेपर शुद्ध आत्माका नाश नहीं होता; इसलिये जो देहका विनाश हो जानेपर 'मैं नष्ट हो जाता हूँ' इस प्रकारकी भावनासे दुखी होता है, उस अन्धबुद्धिको धिक्कार है ! जैसे घोड़ेकी लगाम और रथका सम्बन्ध राग-द्वेषसे रहित है, उसी प्रकार चेतन आत्माका भी देह, चित्त, इन्द्रिय आदिके साथ सम्बन्ध राग-द्वेषसे रहित है। जैसे मार्ग बटोहियों-के संयोग और वियोगमें हर्ष-शोकका अनुभव नहीं करता, वैसे ही विशुद्ध आत्मा शरीरोंके संयोग-वियोगमें हर्ष शोकसे रहित है। जिस प्रकार कल्पित प्रेतके विकराल रूपसे भयभीत बालकको होनेवाला भय मिथ्या ही है, वैसे ही ये कल्पित स्नेह, सुख आदि मिथ्या ही हैं। जैसे लकड़ियोंके बोझेमें लकड़ियोंके सिवा और कुछ भी नहीं दिखलायी पड़ता, वैसे ही आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी—इन पाँचों भूतोंके शरीरमें पाँचों भूतोंके संघातके सिवा और कुछ भी नहीं दिखलायी पड़ता। अतः श्रोतागण ! आपलोग इन पाँचों भूतोंकी उत्पत्ति, विनाश और विकार होनेपर हर्ष-अमर्ष और विषादके वशमें क्यों हो जाते हैं ? जिस देहका 'छी' यह दूसरा नाम है, उस तुच्छ भूतोंके समूहमें यानी छी-
| ३३० | * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ |
|---|
शरीरात्मक पाँच भूतोंके पिण्डमें पुरुषोंको ऐसी कौन-सी विशेषता प्रतीत होती है, जिससे उनकी उस स्त्रीरूप विषय-भोगाग्निमें पतंगेकी तरह गिरनेकी चेष्टा उचित कही जाय ! स्त्रीकी सुन्दरता, रूप लावण्य और शरीर-संगठनको लेकर जो विलक्षणता दिखायी पड़ती है, उससे तो केवल अज्ञानी ही आनन्दित होता है; किंतु विवेकी पुरुषोंको तो वह पाँच भूतोंका पिण्ड ही दिखायी देता है। जैसे एक पत्थरसे बनायी गयी दो पाषाण-प्रतिमाओंका परस्पर आलिङ्गन होनेपर उनमें राग नहीं होता, उसी प्रकार चित्त और शरीरका परस्पर आलिङ्गन होनेपर भी राग नहीं होना चाहिये। तथा जैसे पत्थरकी बनायी गयी प्रतिमाओंमें परस्पर स्नेहका सम्बन्ध नहीं होता, वैसे ही देह, इन्द्रिय, आत्मा और प्राणोंमें भी परस्पर स्नेहका सम्बन्ध नहीं है। इसलिये यहाँ शोक किसका ? जिस प्रकार समुद्र ऊँची-ऊँची भँवरोंसे युक्त हो तृण, काठ आदि पदार्थोंसे संयोग करता है, वैसे ही जीवात्मा भी चित्ताकृतिको प्राप्तकर देह और प्राणियोंके साथ संयोग करता है। (अतः मनुष्यको समुद्रकी भाँति सबसे निर्लेप रहना चाहिये।) जैसे जल अपनी स्पन्दन-क्रियासे ही मलिनताका परित्याग करके स्वयं ही स्वच्छताको प्राप्त करता है, उसी प्रकार जीवात्मा यथार्थज्ञानके द्वारा विषयरूपताका परित्याग करके स्वयं ही विशुद्ध आत्मरूपताको प्राप्त करता है। उस समय सम्पूर्ण भूत-प्राणियोंमें आसक्तिसे रहित जीवात्मा द्रष्टा — साक्षी हुआ देहको आत्मासे भिन्न देखता है तथा भूत-समूहको भी अपनेसे पृथक् देखकर अविनाशी आत्मा देहातीत हो जाता है। इस प्रकार आत्मा अपनेसे ही प्रमाण-प्रमेयरूप विकारोंसे रहित अपने यथार्थ स्वरूपको जान लेता है। श्रीराम ! जिनका सम्पूर्ण राग विनष्ट हो गया है, जिनके पाप दूर हो गये हैं तथा जो परब्रह्मपदको प्राप्त हो चुके हैं वे जीवन्मुक्त महात्मा पुरुष उसी प्रकारके विशिष्ट विज्ञानसे युक्त हो इस संसारमें विचरण करते हैं, जैसे समुद्रकी तरङ्गें अनेक प्रकारके रत्नोंके साथ अनासक्तभाव-से व्यवहार करती हैं, उसी प्रकार वासनारहित उत्तम महात्मा लोग भी चित्तकी चेष्टाओंके साथ अनासक्त भावसे व्यवहार करते हैं। जैसे समुद्र अपने तटपर पड़े हुए काष्ठ-समूहोंसे मलिन नहीं होता, वैसे ही आत्माके यथार्थ स्वरूपको जाननेवाला वह मनुष्य इस संसारमें अपने सांसारिक व्यवहारोंसे मलिन नहीं होता। जैसे समुद्रको गत, आगत, स्वच्छ, चञ्चल, मलिन और जड तरङ्गोंसे राग और द्वेष नहीं होता, उसी प्रकार उस तत्त्वज्ञानी महात्मा पुरुषको गत, आगत, स्वच्छ, चञ्चल, मलिन और जड भोगोंसे राग-द्वेष नहीं होता; क्योंकि जो अहं, भूत आदि तथा तीनों कालोंमें उत्पन्न होनेवाली वस्तुएँ दृश्य और दर्शनके सम्बन्धोंसे दिखायी पड़ती हैं, वह सब केवल मनकी कल्पना ही है। इसलिये आत्मसाक्षात्काररूप दृश्य-दर्शनसे रहित सुखानुभूतिका अवलम्बन करनेसे संसारका अभाव हो जाता है, आत्मस्वरूपको आवृत करनेवाली दृष्टिका विच्छेद हो जाता है और यथार्थ आत्मानुभव प्रकाशित हो जाता है। उसीका अवलम्बन करनेपर तुर्यावस्था प्राप्त हो जाती है और उसीके अवलम्बनसे मुक्ति हो जाती है। रघुनन्दन ! जब दृश्य और दर्शनके सम्बन्धसे मुक्त और परम विशुद्ध बुद्धिसे युक्त यह स्वरूप-दृष्टि होती है, तब दृश्य और दर्शनके सम्बन्धके असली तत्त्वको जानकर पुरुष मुक्तिको प्राप्त होता है। मुक्त होनेके अनन्तर वहाँ आत्माका स्वरूप न स्थूल है न अणु, न प्रत्यक्ष है न अप्रत्यक्ष, न चेतन है न जड, न असत् न है सत्, न अहंरूप है न अन्यस्वरूप, न एक है न अनेक, न समीप है न दूर, न सत्तायुक्त है न असत्तायुक्त, न ग्राह्य है न अग्राह्य, न सर्वात्मक है न सर्वव्यापक, न पदार्थ है न अपदार्थ, न पाँचों भूतोंका आत्मा है और न पाँचों भूत ही।
उपशम-प्रकरण ] * मुक्तिदायक और बन्धनकारक अहंकारका एवं परमात्माके स्वरूपका वर्णन * ३३१
( तात्पर्य यह कि वह समस्त विशेषणों और लक्षणोंसे रहित विशुद्ध आत्मा मन, वाणी और बुद्धिका विषय नहीं है; इसलिये उसे इदंताके द्वारा न कहा जा सकता है न समझाया जा सकता है । अतएव उसका यहाँ निषेधमुखसे वर्णन किया गया है। श्रुतिमें भी उसका निषेधमुखसे वर्णन किया गया है । ) किंतु मनके साथ चक्षु आदि छहों इन्द्रियोंका विषय जो यह दृश्यत्वको प्राप्त जगत् है, वह कुछ भी नहीं है। उससे अतीत जो पद है, वही यथार्थ वस्तु है। जिस प्रकारका यह जगत् है, उस प्रकारके इस जगत्को भलीभाँति जाननेवाले पुरुषके लिये यह समस्त विश्व आत्मस्वरूप ही है, कहीं भी आत्मस्वरूपसे अतिरिक्त कोई वस्तु नहीं है। यह आत्मा ही कठोरता, द्रवता, प्रकाश, स्पन्दन और अवकाश-क्रमसे पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाशरूप सम्पूर्ण जगत्-भावोंमें विद्यमान है । श्रीराम ! पदार्थोंकी जो-जो सत्ता है, वह चेतन आत्माके सिवा दूसरी वस्तु नहीं है; इसलिये जो यह कहता है कि 'मैं आत्मासे अतिरिक्त हूँ', उसके इस कथनको उन्मत्तके प्रलापके समान समझो !
( सर्ग ७२ )
दो प्रकारके मुक्तिदायक अहंकारका और एक प्रकारके बन्धनकारक अहंकारका एवं परमात्माके स्वरूपका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जैसे चिन्तामणि-के तत्त्वको जाननेवाले लोग चिन्तामणिको प्राप्त कर लेते हैं, वैसे ही उपर्युक्त विचार-दृष्टिसे द्वैतभावको त्यागकर आत्माके स्वरूपको जाननेवाले महापुरुष विशुद्ध आत्मस्वरूपको प्राप्त हो जाते हैं । श्रीराम ! अब मैं तुमसे दूसरी दृष्टिका वर्णन करता हूँ; उसे तुम सुनो। मैं ही आकाश हूँ, मैं ही आदित्य हूँ, मैं ही दिशाएँ हूँ, मैं ही अधः हूँ, मैं ही ऊर्ध्व हूँ, मैं ही दैत्य हूँ, मैं ही देव हूँ, मैं ही लोक हूँ, मैं ही चन्द्रमा आदिकी प्रभा हूँ, मैं ही अन्धकार हूँ, मैं ही मेघ हूँ, मैं ही पृथ्वी हूँ, मैं ही समुद्र आदि हूँ एवं रेणु, वायु, अग्नि और यह सारा जगत् भी मैं ही हूँ; तीनों लोकोंमें सब जगह जो परमात्मा स्थित है, वह मैं ही हूँ । उस सर्वरूप परमात्मासे भिन्न परिच्छिन्न मैं कौन हूँ ? मैं कभी परिच्छिन्न नहीं हो सकता । देह आदि भी मुझसे भिन्न क्या हैं ? एक अद्वितीय वस्तु परमात्मामें द्वैत कैसे हो सकता है । कमलनयन निष्पाप श्रीराम ! तुम्हीं बतलाओ, इस प्रकार इस सम्पूर्ण जगत्के आत्मरूपसे स्थित हो जानेपर कौन अपना और कौन पराया रहेगा ? तत्त्वज्ञसे भिन्न ऐसी कौन-सी वस्तु है, जो उसे यदि प्राप्त हो जाय तो वह हर्ष और विषादसे ग्रस्त हो ? यदि उसको ऐसी वस्तुके आ जानेसे विषाद दिखायी पड़े तो वह तत्त्वज्ञ ही नहीं है, किंतु मूढ़ ही है; क्योंकि ऐसा पुरुष जगन्मद ही होता है, सच्चिदानन्दमय नहीं ।
रघुनन्दन ! दो प्रकारकी अहंकार-दृष्टियाँ सात्त्विक और अत्यन्त निर्मल हैं । उनकी तत्त्वज्ञानसे उत्पत्ति होती है । वे मोक्ष प्रदान करनेवाली और परमार्थस्वरूपा हैं। मैं सबसे परे, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर और विनाशशील सम्पूर्ण पदार्थोंसे अतीत हूँ—यह पहली अहंकार-दृष्टि है तथा जो कुछ है, वह सब मैं ही हूँ—यह दूसरी अहंकार-दृष्टि है । निष्पाप श्रीराम ! इन दोनोंसे भिन्न तीसरी अहंकार-दृष्टि यह है—देह मैं हूँ । इस दृष्टिको तुम केवल दुःखदायिनी ही जानो, यह कभी शान्तिदायिनी नहीं होती । अब तुम इन तीनों ही अहंकारोंको छोड़कर सबके शेषमें रहनेवाले अहम्भावनाशन्य पूर्ण सच्चिदानन्द-स्वरूपका अवलम्बन करके उसी अवलम्बनयोग्य परम-तत्त्वमें निरत हुए ही स्थित रहो, क्योंकि इस मिथ्या
३३२ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
जगत्में परिपूर्ण और सर्वप्रकाशक आत्मा वास्तवमें अखिल प्रपञ्चस्वरूपसे मुक्त और समस्त पदार्थोंकी सत्तासे अतीत ही है । इसलिये श्रीराम ! तुम अपने ही अनुभवसे शीघ्र देखो कि तुम सदा-सर्वदा प्रकट सच्चिदानन्दघन परब्रह्मस्वरूप ही हो । आत्मा न तो केवल अनुमानसे प्रत्यक्ष होता है और न आप्तवचन तथा शास्त्र आदिके श्रवणमात्रसे ही; किंतु वह सदा-सर्वदा सब प्रकारसे केवल अनुभवसे ही प्रत्यक्ष होता है । ये जो कुछ स्पर्श, स्पन्द और ज्ञान आदि पदार्थ हैं, वे सब दृश्य और दर्शनसे रहित सच्चिदानन्द-घन परमात्मा ही हैं । यह प्रकाशस्वरूप परमात्मा वास्तवमें न तो सत् है और न असत् है, न अणु है और न महान् है तथा न सत् और असत्के मध्यमें है । यह आत्मा है और यह आत्मा नहीं है—यों जो संज्ञाभेद है, इसकी स्वयं आत्माने ही अपनेमें अपनी सर्वव्यापिनी शक्तिसे कल्पना कर रक्खी है। वह प्रकाशमान परमात्मा तीनों कालोंमें सदा-सर्वदा सब जगह स्थित है तथापि केवल सूक्ष्म और महान् होनेके कारण वह अज्ञानी पुरुषोंके द्वारा जाननेमें नहीं आता । जैसे लोकदृष्टिसे सारे पदार्थोंका अस्तित्व सर्वत्र विद्यमान है, उसी प्रकार परमार्थदृष्टिसे सच्चिदानन्दघन परमात्मा भी सर्वत्र विद्यमान है तथा सर्वव्यापी है; वह कहीं एकदेशमें स्थित है—ऐसी बात नहीं है । सबका यह आत्मा किसी समय भी वास्तवमें न तो उत्पन्न होता है न मरता है, न कुछ ग्रहण करता है न कुछ चाहता है, न मुक्त होता है और न बद्ध होता है। जैसे सर्पमें रज्जुकी भ्रान्ति दुःख देनेवाली ही होती है, वैसे ही आत्माके अज्ञानसे उत्पन्न देह आदि अनात्मपदार्थोंमें आत्मबुद्धिरूप भ्रान्ति केवल दुःख देनेवाली ही होती है । यह आत्मा कभी भी उत्पन्न नहीं हुआ, क्योंकि यह अनादि है; और यह विनष्ट भी नहीं होता, क्योंकि यह अजन्मा है । तथा वह आत्मभिन्न वस्तुकी कभी भी अभिलाषा नहीं करता; क्योंकि आत्मासे भिन्न कोई वस्तु है ही नहीं । यह आत्मा दिशा, देश और कालसे परिमित न होनेके कारण कभी भी बँधता नहीं; और जब बन्धन ही नहीं है, तब मोक्ष कहाँसे होगा । अतएव वास्तवमें आत्मा बन्ध-मोक्षसे रहित है। रघुनन्दन ! उपर्युक्त गुणोंसे युक्त ही यह सबका आत्मा है; किंतु ये सब लोग शरीरका विनाश होनेपर अविचारसे मोहित हुए व्यर्थ ही रुदन कर रहे हैं । जैसे गेहूँ आदिको पीसनेके लिये निर्मित जल-चक्की आदि यन्त्रके द्वारा गेहूँ आदिका पेषण चालू होनेपर पुरुष केवल साक्षीमात्रसे उक्त कार्यको करता है, वैसे ही आत्मज्ञानी विद्वान् मुनिको बन्धन और मोक्षरूपी दोनों ही कल्पनाओंसे रहित होकर ( यन्त्रकी ज्यों ) देह आदिका व्यवहार करना चाहिये । सम्पूर्ण विषयोंमें अनासक्तिसे संकल्प और कामनाका अभाव हो जानेके कारण जो स्वतः ही साधकके मनका विनाश हो जाता है, उसीको आत्मदर्शी तत्त्वज्ञ महापुरुषोंने 'मोक्ष' नामसे कहा है । श्रीराम ! तुम समस्त कल्पनाओंसे रहित अवस्थाको प्राप्त और आसक्तिरहित हो, अतः इस सगर-पुत्रोंके द्वारा खोदी गयी समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका दीर्घकालतक पालन करो ।
( सर्ग ७३ )
मन, अहंकार, वासना और अविद्याके नाशसे मुक्ति तथा जीवन्मुक्त पुरुषके लक्षण और महिमाका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं--रघुनन्दन ! जैसे मरुभूमिमें सूर्यकी किरणोंसे जल प्रतीत होता है, वैसे ही अहन्तः-ममता, राग-द्वेष आदि विकारोंसे युक्त और बिना हुए ही अपने स्वरूपको कायम रखनेवाली मायासे ही यह सम्पूर्ण जगत् प्रतीत हो रहा है । जैसे बर्फसे भिन्न शुक्लताकी कल्पना की जाती है पर वास्तवमें बर्फ और शुक्लतामें
उपशम-प्रकरण ] * मन, अहंकार, वासना और अविद्याके नाशसे मुक्ति तथा जीवन्मुक्त पुरुषके लक्षण * ३३३
परस्पर पार्थक्य नहीं है, उसी प्रकार चित्त और अहंकार-की पृथक् कल्पना व्यर्थ ही की जाती है; वास्तवमें उनका परस्पर कोई भेद नहीं है। श्रीराम ! मन और अहंकार—इन दोनोंमेंसे किसी एकका विनाश हो जानेपर मन एवं अहंकार दोनोंका विनाश हो ही जाता है। इसलिये अन्यान्य इच्छाओंका परित्याग करके अपने वैराग्य और आत्मा-अनात्माके विवेकसे केवल मनका ही विनाश कर देना चाहिये। जैसे वायु वृक्षमें पल्लवोंकी पंक्तिको चलाता है, वैसे ही प्राणादि वायु देहमें अङ्गोंकी पंक्तियोंको पर्याप्तरूपसे चलाता है; किंतु सब पदार्थोंको व्याप्त कर लेनेवाला अति सूक्ष्म चेतन आत्मा न तो स्वतः चल है और न किसीसे चलायमान होता है। जैसे अचल मेरु-पर्वत वायुओंसे कम्पित नहीं होता, उसी प्रकार यह चेतन आत्मा भी प्राणादि वायुओंसे कम्पित नहीं होता।
रघुनन्दन ! यह मैं आनेवाला हूँ, मैं भोक्ता हूँ, मैं कर्ता हूँ—इस प्रकारकी वासना मूढ पुरुषोंके हृदयमें व्यर्थ ही उत्पन्न हुआ करती है, जैसे अज्ञानसे मरुभूमिमें सूर्यकिरणोंसे मृगतृष्णा उत्पन्न होती है। वास्तवमें असत्य होते हुए भी सत्य-सी दिखायी पड़नेवाली यह अविद्यारूपा वासना विषयोंकी अभिलाषासे युक्त मनरूप मत्त मृगको उसी प्रकार खींचती है, जिस प्रकार जलकी अभिलाषासे युक्त मृगको मृगतृष्णा खींचती है; किंतु उस अविद्यारूपा वासनाका यथार्थ स्वरूप जान लेनेपर उसका विनाश हो जाता है । जैसे 'यह मृगतृष्णाका जल है' इस प्रकार तात्त्विक स्वरूपसे जान लेनेपर मृगतृष्णा तृषार्त्त मनुष्यको अपनी ओर नहीं खींचती, उसी प्रकार 'यह अविद्या है' इस प्रकार तत्त्वतः जान लेनेपर अविद्या मनको नहीं खींच सकती। श्रीराम ! जैसे दीपकसे अन्धकार नष्ट हो जाता है और प्रकाश आ जाता है, वैसे ही परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे वासना समूल (अविद्यासहित) नष्ट हो जाती है और परमात्माका वास्तविक स्वरूप प्रकाशित हो जाता है। अविद्याका अस्तित्व किसी प्रकार नहीं है—इस तरह शास्त्र और युक्तिसे दृढ़ निश्चय हो जानेपर अविद्याका तत्क्षण विनाश हो जाता है। इस जड़ देहके लिये भोगोंसे क्या प्रयोजन है—इस प्रकारके निश्चयसे युक्त तत्त्वज्ञ पुरुष इच्छाओंके कारणरूप अपने अज्ञानको विनष्ट कर देता है। जैसे राज्य मिल जानेपर दरिद्र मनुष्य परम शान्तिको पा लेता है, वैसे ही यह तत्त्वज्ञ पुरुष परम शान्तिको प्राप्त होता है। जैसे प्रशान्त समुद्र अपने स्वरूपमें सदा अचल स्थित रहता है, उसी प्रकार वह अपने विज्ञानानन्दघन स्वरूपमें ही नित्य अचल स्थित रहता है। जैसे मेरु पर्वत स्थिरता और धीरताको धारण करता है, वैसे ही तत्त्ववेत्ता पुरुष स्थिरता और धीरताको धारण करता है। वह तत्त्वज्ञानी महात्मा पुरुष अपने विज्ञानानन्दघन स्वरूपमें ही सदा परम शान्त और परम तृप्त रहता है तथा वह तत्त्वज्ञ महापुरुष उस सम्पूर्ण भूतोंके आत्मस्वरूप, सर्वत्र व्यापक, सबके नियन्ता, सबके नायक, सर्वाकार और निराकार सच्चिदानन्दघन परमात्माके स्वरूपको अपना आत्मा जान लेता है। तत्त्ववेत्ता पुरुष विषयी पुरुषोंके सङ्ग और विषयोंकी आसक्तिसे रहित, मान और मानसिक चिन्ताओंसे शून्य, परमात्मामें ही रत तथा विज्ञानानन्दसे परिपूर्ण और विशुद्ध अन्तःकरणसे युक्त होता है। वह आत्मज्ञानी महात्मा कामरूपी कीचड़से मुक्त, बन्धनस्वरूप आत्मभ्रमसे शून्य तथा हर्ष-शोक, राग-द्वेषादि द्वन्द्वरूप दोष और भयसे रहित होता है। अतएव वह संसार-समुद्रसे तर चुका होता है। वह तत्त्वज्ञ विद्वान् सर्वोत्तम परम शान्तिको, दुर्लभ परम पदको तथा अनावृत्तिरूप परम गतिको प्राप्त है। सभी लोग मन, वाणी और कर्मद्वारा इस महापुरुषके आचरणोंके अनुकरणकी इच्छा करते हैं; पर वह किसी प्रकारकी इच्छा नहीं करता। सभी मनुष्य इसके आनन्दका अनुमोदन करते हैं, पर वह किसीका भी अनुमोदन नहीं करता—उदासीन रहता है। तत्त्वज्ञ पुरुष न तो त्याग करता है न ग्रहण; न किसीकी स्तुति करता है न किसीकी
३३४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
निन्दा, न मरता है न जन्म लेता है, न हर्ष करता है और न शोक । वह समस्त आरम्भों, सम्पूर्ण विकारों और सारी आशा, इच्छा, वासना आदिसे रहित पुरुष 'जीवन्मुक्त' कहा जाता है ।
श्रीराम ! मनुष्यको न राज्यसे, न स्वर्गसे, न चन्द्रमा- से, न वसन्तसे और न कान्ताके कमनीय संसर्गसे ही वैसे उत्तम सुख-शान्ति प्राप्त होते हैं, जैसे आशा- त्यागसे, क्योंकि आशाका त्याग ही सबसे बढ़-चढ़कर सुख-शान्ति है । जिस परम निर्वाणरूप मोक्षके लिये तीनों लोकोंकी सम्पत्तियाँ तिनकेकी तरह कुछ भी काम नहीं देतीं, वह आशाके त्यागसे ही प्राप्त होता है । जिसके हृदयमें आशा अपना स्थान कभी नहीं जमा सकती, सम्पूर्ण त्रिभुवनको तृणके सदृश समझनेवाले उस विरक्त पुरुषकी उपमा किससे दी जा सकती है ? अर्थात् किसीसे नहीं । मेरे लिये यह होना चाहिये और यह नहीं होना चाहिये—इस प्रकारकी इच्छा जिसके चित्तमें नहीं होती, उस स्वाधीन चित्तवाले ज्ञानी महात्मा पुरुषकी मनुष्य कैसे तुलना कर सकते हैं ? श्रीराम ! तुममें न तो आशाओंका अस्तित्व है और न तुम्हारा आशाओंसे किसी तरहका सम्बन्ध ही है । तुम इस जगत्को मिथ्या भ्रममात्र ही समझो; क्योंकि जैसे दौड़ते हुए रथमें लगे पहियोंके ऊर्ध्व और नीचे प्रदेशमें होनेवाला घुमाव नेमीका आश्रय लेनेवाले पिपीलिका आदि जीवोंके पतन, पेषण आदि अनर्थोंका ही कारण होता है, वैसे ही यह जगत् भी उसका आश्रय लेनेवाले (इसमें सत्य-बुद्धि रखनेवाले) जीवोंके जन्म-मरण आदि अनर्थोंका ही कारण है ।
रघुनन्दन ! यह सम्पूर्ण जगत् परमात्मस्वरूप ही है, यहाँ नानारूपता है ही नहीं । जगत्को अद्वितीय परमा- नन्दस्वरूप जानकर धीर महात्मा तनिक भी खिन्न नहीं होते। इन पदार्थोंके समूहोंका जो यथार्थ—आत्मासे अभिन्न स्वरूप है, उसको जाननेसे ही पुरुष बुद्धिके परम विश्राम- स्वरूप नैराश्यको प्राप्त होता है । जैसे वीर केसरीके पाससे मृगी दूर भाग जाती है, उसी प्रकार तीव्र वैराग्यसे वीरताको प्राप्त अन्तःकरणसे युक्त पुरुषके पाससे यह संसारको मोहित करनेवाली माया दूर भाग जाती है— फिर उसके पास भी नहीं फटकती । जिस प्रकार वायु पर्वतको न आनन्द दे सकता है, न खेद और न धैर्यसे च्युत कर सकता है, उसी प्रकार ज्ञानी महात्मा पुरुषको न तो विषयोपभोग आनन्द पहुँचा सकते हैं, न सांसारिक आपत्तियाँ हृदयमें खेद पहुँचा सकती हैं और न दृश्य-सम्पत्तियाँ धैर्यसे च्युत कर सकती हैं। जिसके प्रति युवती स्त्रियाँ अनुरक्त हैं, ऐसे उदारबुद्धि तत्त्वज्ञ महात्माके अन्तःकरणमें कामदेवके बाण छिन्न-भिन्न होकर धूलके समान हो जाते हैं—उन युवती स्त्रियोंका उसपर कोई असर नहीं होता । जो परमात्माके स्वरूपको जानता है और मन-इन्द्रियोंके वशमें नहीं है, उस महापुरुषको राग और द्वेष अपनी ओर आकृष्ट नहीं कर सकते । इस प्रकार वह जब राग-द्वेषके द्वारा तनिक-सा भी विचलित नहीं किया जा सकता, तब उनके द्वारा उसके आक्रान्त होनेकी तो बात ही क्या है। जो लता और वनिता- में एक-सी दृष्टि रखता है तथा जो पर्वतकी तरह अचल है, वह ज्ञानी-पुरुष इन तुच्छ विषयभोगोंमें उसी प्रकार रमण नहीं करता, जैसे बटोही मरुभूमिमें रमण नहीं करता । जिसका अन्त करण किसी भी भोग-पदार्थमें आसक्त नहीं है, वह तत्त्वज्ञानी महात्मा पुरुष बिना प्रयत्नके अपने-आप प्राप्त अनिषिद्ध भोग-पदार्थोंका केवल शरीररक्षाके लिये अनासक्तभावसे लीलापूर्वक सेवन करता है । काकतालीय- न्यायकी भाँति अनायास न्याययुक्त प्राप्त ललना आदि भोग-समूह आस्वादित होनेपर भी तत्त्वज्ञ धीर पुरुषको सुख-दुःख नहीं दे सकते; क्योंकि जिसने परमात्माकी प्राप्तिके मार्गको भलीभाँति जान लिया है, उस तत्त्वज्ञ महापुरुषको सुख-दुःख तनिक भी विचलित नहीं कर सकते । इन विनाशशील विषयोंको त्याज्य बुद्धिसे
उपशम-प्रकरण ] * हर्ष-शोकादिसे रहित जीवन्मुक्त महात्माओंका वर्णन * ३३५
देखनेवाला वह मृदु, दमनशील और सम्पूर्ण चिन्ता आदि ज्वरोंसे रहित ज्ञानी महापुरुष सब भूतोंमें अन्तरात्मास्वरूप-से स्थित आत्मपदका ही अवलम्बन कर स्थित रहता है । जैसे ऋतुओंके आने-जानेसे पर्वत विचलित नहीं होता, वैसे ही ज्ञानी महात्मा पुरुष कालानुसार, देशानुसार और क्रमानुसार आपत्तियों और सुख-दुःखोंके आनेपर भी विचलित नहीं होता । शरीरसे पृथक् आत्माका अपरोक्ष साक्षात्कार करनेवाले, नित्यानित्य वस्तुके यथार्थ विवेकसे सम्पन्न ज्ञानीके शरीरका छेदन करनेपर भी उसका कुछ भी छेदन नहीं होता; क्योंकि वह अपने विज्ञानानन्दघन स्वरूपमें ही नित्य स्थित रहता है । विशुद्ध प्रकाशस्वरूप परमात्माका एक बार यथार्थ ज्ञान हो जानेपर वह सदा ज्ञात ही रहता है, फिर उसका विस्मरण नहीं होता । अपने हृदयकी चिज्जडग्रन्थिका उच्छेद हो जानेपर मायाके तीनों गुणोंके द्वारा आत्माका पुनः बन्धन उसी प्रकार नहीं हो सकता, जैसे वृक्षसे टूटा हुआ फल किसी-के द्वारा पुनः नहीं जोड़ा जा सकता । अविद्याका असली स्वरूप जान लेनेके अनन्तर कौन बुद्धिमान् पुरुष फिर उसमें डूबता ( फँसता ) है; क्योंकि सांसारिक वासना विवेकपूर्वक बुद्धिके विचारसे निवृत्त हो जाती है ।
श्रीराम ! तत्त्ववेत्ता पुरुष रूप-लावण्ययुक्त कामिनीको भी चित्रमें लिखित कान्ताकी प्रतिमाकी तरह ही समझते हैं, क्योंकि जैसे चित्रमें चित्रित कामिनीके केश, ओष्ठ आदि अवयव मषी, कुङ्कुम आदि रंग-स्वरूप पाँच भूतोंको छोड़कर और कुछ भी नहीं होते, उसी प्रकार रूप और लावण्यसे युक्त जीवित कामिनीके केश, ओष्ठ आदि भी पाँच भूतोंके स्वरूपसे अतिरिक्त दूसरे कुछ नहीं हैं । इसलिये कान्ता-प्रतिमा और जीवित कान्तामें तत्त्वतः समानता है—इस तत्त्वको जाननेवाले विवेकशील विरक्त महात्मा पुरुषका जीवित कान्ताके उपभोगमें आग्रह कैसे हो सकता है । जैसे परपुरुषमें व्यसन ( आसक्ति ) रखनेवाली नारी, घरके काम-काजमें व्यग्र रहनेपर भी उसी परपुरुष-सम्बन्ध-रूप रसायनका अपने अंदर आह्लाद लेती रहती है, उसी प्रकार व्यवहार करते हुए भी विशुद्ध परब्रह्मतत्त्वमें उत्तम विश्रामको प्राप्त धीर तत्त्वज्ञ पुरुष उस विज्ञानानन्दघन परमात्माके स्वरूपमें ही मग्न रहता है; फलतः वह इन्द्रादि देवताओंके द्वारा प्रलोभित किये जानेपर भी विचलित नहीं होता । क्योंकि जिस महात्माकी अविद्या निवृत्त हो गयी है, जिसको परमात्मविषयका अच्छी प्रकार ज्ञान है तथा जो सदाचारसे युक्त है, वह महात्मा सुचारु-रूपसे व्यवहार करता हुआ भी अपने अन्तरात्मामें प्रसन्न रहता है । उसके शरीरका छेदन होनेपर भी उसका छेदन नहीं होता, गिरते हुए अश्रुओंसे युक्त होता हुआ भी वह रोता नहीं, दग्ध होता हुआ भी दग्ध नहीं होता और देहका विनाश होनेपर भी उसका विनाश नहीं होता; क्योंकि वह देहसे रहित हुआ सच्चिदानन्दघन ब्रह्मके स्वरूपमें नित्य स्थित है । श्रीराम ! वह तत्त्वज्ञ पुरुष प्रारब्धभोगके विधानके अनुसार चाहे दरिद्र-अवस्थामें रहे या संकटावस्थामें, उत्तम नगरके महलमें रहे या विस्तृत पहाड़ या वनमें, वह सदा-सर्वदा सुख-दुःखके उपद्रवसे रहित ही होता है । ( सर्ग ७४ )
मनुष्य, असुर, देव आदि योनियोंमें होनेवाले हर्ष-शोकादिसे रहित जीवन्मुक्त महात्माओंका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! अपने राज्यके व्यवहारमें तत्पर होते हुए भी राजा जनक सम्पूर्ण चिन्तारूप ज्वरसे तथा अन्तःकरणकी व्याकुलतासे रहित होकर ही सदा-सर्वदा स्थित हैं । आपके पितामह महाराज दिलीपने अनेक तरहके उचित सांसारिक कर्मोंको सुचारुरूपसे करते हुए भी आसक्तिसे रहित होकर ही
३३६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
दीर्घकालतक पृथ्वीका पालन किया। तथा राग आदि दोषोंसे रहित होनेके कारण आत्मज्ञानको प्राप्त तथा सदा जीवन्मुक्त-स्वरूप महाराज मनुने चिरकाल-तक प्रजाओंका संरक्षण करते हुए राज्यका पालन किया। विचित्र सैन्य और बाहुबलके प्रयोगसे युक्त युद्धों तथा अनेक व्यवहारोंको निष्कामभावसे दीर्घकालतक करते हुए महाराज मान्धाता परम पदको प्राप्त हुए। पातालके राज्यसिंहासनपर आसीन, सदा त्यागी, सदा अनासक्त राजा बलि यथार्थ-रूपसे व्यवहारको करते हुए भी जीवन्मुक्तरूपसे स्थित हैं। दानवोंके अधिपति नमुचि देवताओंके साथ युद्ध करते हुए तथा सदा नाना प्रकारके व्यवहार एवं विचार-विमर्शों-में तत्पर होते हुए भी भीतरसे संतप्त (खिन्न) नहीं होते थे। इन्द्रके युद्धमें अपने शरीरका परित्याग करनेवाले विशाल-हृदय मानी वृत्रासुरने प्रशान्तमन होकर ही देवताओंके साथ युद्ध किया। पातालतलका परिपालन करते समय दानवोचित कर्मोंका अनासक्त भावसे अनुष्ठान करते हुए भक्तप्रवर प्रह्लाद अविनाशी अनिर्वचनीय परमानन्दस्वरूप परमपदको प्राप्त हुए। समस्त देवताओंके मुखस्वरूप अग्नि क्रियासमूहमें तत्पर होते हुए यज्ञिय शोभाका चिरकालतक उपभोग करते हैं तथापि वे मुक्त होकर ही इस त्रिभुवनमें निवास करते हैं। जगत्के प्राणिसमूहोंके अङ्गोंका चिरकालसे संचरण कराते हुए भी वायु, जो सदा-सर्वदा सर्वत्र संचरण करनेवाले हैं, मुक्त ही स्थित हैं। ज्ञानरूप रत्नोंके एकमात्र समुद्र, तीक्ष्णबुद्धि, वीरवर स्वामी कार्तिकेयने मुक्त होते हुए भी तारकादि असुरोंसे युद्ध किया। महामुनि नारद मुक्त-स्वभाव होते हुए भी इस जगत्में कार्यशील और शान्त बुद्धिसे विचरण किया करते हैं। जीवन्मुक्त होकर ही अनासक्तभावसे सहस्रमुख नागराज शेष पृथ्वीको धारण करते हैं, सूर्य दिवस-परम्पराओंका निर्माण करते हैं और यमराज धर्माधर्म-विचारपूर्वक लोगोंका नियमन करते हैं। इन पूर्वोक्त महानुभावोंके सिवा दूसरे भी सैकड़ों महात्मा यक्ष, राक्षस, मनुष्य और देवता इस त्रिभुवनमें मुक्तस्वरूप हुए ही संसारमें अनासक्त भावसे विचरण करते हैं। विचित्र आचार-व्यवहारोंमें स्थित कितने ही पुरुष भीतर शान्तिसे युक्त हैं, जब कि कुछ तामसी मूढ़ पुरुष तो मोहमें मग्न हुए पत्थरके सदृश बने रहते हैं। कुछ महात्माओंने परम ज्ञानका सम्पादन करके तपोवनका आश्रय लिया, जैसे—'भृगु, भरद्वाज, विश्वामित्र, शुक आदि। कुछ महात्मा परम ज्ञान प्राप्तकर राज्योंमें ही छत्र, चवँर धारण किये रहते हैं—जैसे जनक, शर्याति, मान्धाता, सगर आदि। कुछ तत्त्वज्ञ आकाशमें ग्रह, नक्षत्र आदिके आधारभूत ज्योतिष्चक्रके मध्यमें स्थित हैं—जैसे बृहस्पति, शुक्राचार्य, चन्द्र, सूर्य, सप्तर्षि आदि। तिर्यक् योनियोंमें भी सदासे कृतबुद्धि महात्मा रहते हैं और देवयोनियोंमें भी मूर्खबुद्धिवाले लोग विद्यमान हैं। जिसका अत्यन्त व्यापक स्वरूप है, उस सर्वस्वरूप परमात्मामें सब कुछ सर्वभावसे सर्वत्र सब प्रकारसे सदा ही सम्भव है।
श्रीराम ! मुक्ति हो जानेपर फिर इस संसारमें किसी प्रकार जन्मकी प्राप्ति सम्भव नहीं। किंतु करोड़ों मनुष्य आत्माके ज्ञानका अभाव होनेसे ही अज्ञानमें निमग्न रहते हैं। रघुकुलतिलक ! मुक्ति होनेपर इस संसारमें विज्ञानानन्दघन परमात्माकी प्राप्ति सदा ही बनी रहती है, इसलिये आत्मा-अनात्माके यथार्थ विवेक-विज्ञानको प्राप्त करके करोड़ों मनुष्य विमुक्त हो चुके हैं। ज्ञानसे मुक्ति सुलभ है और अज्ञानसे दुर्लभ। अतः जिसको मुक्तिकी अभिलाषा हो, उसे आत्मज्ञानके लिये प्रयत्न करना चाहिये। आत्मज्ञानसे सम्पूर्ण दुःखोंका सर्वथा विनाश हो जाता है। इस वर्तमान कालमें भी रागशून्य, भयरहित महाबुद्धिमान् राजा सुहोत्र और जनक आदिके समान अनेक जीवन्मुक्त महापुरुष विद्यमान हैं। इसलिये श्रीराम ! तुम भी ज्ञान-वैराग्यसे उत्पन्न धीरबुद्धिसे युक्त, मिट्टीके ढेले, पत्थर और सुवर्णमें समदृष्टि तथा जीवन्मुक्त हुए विचरण करो।
कल्याण
जनकका तमालकी झाड़ीमें छिपे सिद्धोंके गीत-श्रवण
(उपशम-प्रकरण सर्ग ८)
(इस पृष्ठ पर कोई पाठ्य सामग्री उपलब्ध नहीं है / यह पृष्ठ रिक्त है।)
उपशम-प्रकरण ] * स्त्रीरूप तरङ्गसे युक्त संसाररूपी समुद्र तथा उससे तरनेके उपायका वर्णन * ३३७
रघुनन्दन ! इस लोकमें देहधारी जीवोंकी दो प्रकारकी मुक्ति होती है—एक तो सदेह मुक्ति और दूसरी विदेह-मुक्ति। अब तुम इनका विभाग सुनो। निष्पाप श्रीराम ! पदार्थों (विषयों)-के असङ्गसे जो मनकी शान्ति होती है, वही विमुक्तता है। वह विमुक्तता देहके रहते हुए और देहावसान होनेपर ही होती है। जो विद्वान् विषय-स्नेह-से रहित होकर जीता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है एवं जो विषय स्नेहसे युक्त होकर जीता है, वह बद्ध कहलाता है। इन दोनोंसे भिन्न तीसरा जो देहत्यागके पश्चात् ब्रह्ममें विलीन हो जाता है, वह विदेही तो मुक्त है ही। इसलिये मनुष्यको मोक्षके लिये युक्ति और प्रयत्नपूर्वक साधन करना चाहिये। युक्ति और प्रयत्नके बिना तो गायका खुर टिके, इतनी भूमि भी नहीं लाँघी जा सकती।
(सर्ग ७५)
स्त्रीरूप तरङ्गसे युक्त संसाररूपी समुद्र, उससे तरनेके उपाय और तरनेके अनन्तर सुखपूर्वक विचरणका वर्णन, जीवन्मुक्त महात्माओंके गुण, लक्षण और महिमा
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! यह जगत् ब्रह्मसे ही उत्पन्न होता है, अविवेकसे स्थिरताको प्राप्त होता है और परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे निश्चय ही प्रशान्त हो जाता है; क्योंकि परमात्माका यथार्थ ज्ञान न होना ही संसारकी स्थितिमें कारण है और परमात्माका यथार्थ ज्ञान ही उस संसारके विनाशमें कारण है। यह संसार-सागर ऐसा घोर है कि इससे पार हो जाना अत्यन्त दुष्कर है; युक्ति और प्रयत्नके बिना इसका तरण नहीं किया जा सकता। यह संसाररूपी सागर है। इसमें मुग्ध अङ्गनारूपी विस्तृत तरङ्ग हैं। ये स्त्रीरूपी तरङ्ग ओठोंकी शोभारूप पद्मराग-मणियोंसे युक्त, नेत्ररूपी नील-कमलोंसे परिपूर्ण, स्मित-रूपी फेनोंसे सुशोभित, दाँतरूपी प्रफुल्लित पुष्पोंसे अलंकृत, केशरूपी इन्द्रनीलमणियोंसे सुसज्जित, भौंहोंके विलासरूपी वायुसे आन्दोलित, नितम्बरूपी पुलिनोंसे युक्त, कण्ठरूपी शङ्खोंसे विभूषित, ललाटरूपी मणिसमूहोंसे सुशोभित, विलासरूपी ग्राहोंसे संकुल, कटाक्षोंकी चपलताके कारण अति गहन तथा देहकान्तिरूपी सुवर्ण-बालुकासे युक्त हैं। इस प्रकारकी अति चञ्चल लहरियोंके कारण जो अत्यन्त भयंकर है—ऐसे सागरमें निमग्न हुआ पुरुष यदि पार हो जाय तो वह परम पुरुषार्थ ही है। शुद्ध और तीक्ष्ण बुद्धिरूपी बड़ी नौका और विचारपूर्वक विवेकरूपी नाविकके रहते हुए भी जो मनुष्य इस संसार-सागरसे पार नहीं हुआ, उस पुरुषको धिक्कार है। श्रीराम ! जो मनुष्य श्रेष्ठ पुरुषोंके साथ परब्रह्मका विचार करके तथा बुद्धिसे संसार-सागरका तत्त्व समझकर जगत्में विचरण करता है, वही वास्तविक शोभा पाता है। इस संसारमें तुम धन्य हो, जो इस बाल-अवस्थामें ही विवेकयुक्त बुद्धिसे इस संसारके विषयमें विचार करते हो। जिसने तत्त्वको जान लिया है, उस पुरुषके बल, बुद्धि और तेज उसी प्रकार बढ़ते हैं, जिस प्रकार वसन्त ऋतुमें वृक्षोंके सौन्दर्य आदि गुण बढ़ते हैं। रघुनन्दन ! तुम जानने योग्य वस्तुको जानते हो। इस कारण इस समय तुम चिन्मय घनीभूत आनन्दामृत रसायनसे परिपूर्ण सुशीतल (त्रिविध तापोसे रहित), विशुद्ध और सम शोभासे पूर्ण चन्द्रमाकी तरह अत्यन्त सुशोभित हो रहे हो।
श्रीरामचन्द्रजीने कहा—मुनिवर ! जिसने ब्रह्मतत्त्वरूप चमत्कारका अपरोक्ष साक्षात्कार कर लिया है, ऐसे तत्त्वज्ञानी पुरुषका उदार चरित्र आप मुझसे साररूपमें कहिये; क्योंकि आपके वचनोंसे तृप्ति किसको हो सकती है।
श्रीवसिष्ठजी बोले—महाबाहु श्रीराम ! अनेक बार मैंने तुमसे जीवन्मुक्तके लक्षण कहे हैं, फिर भी मैं तुमसे कह रहा हूँ; सुनो। जिसकी समस्त अभिलाषाएँ
३३८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
निकल गयी हैं, ऐसा आत्मवान् ( तत्त्ववेत्ता ) पुरुष उपरत हुआ ही इस दृश्यमान अखिल जगत्को सर्वत्र सदा असत्-सा देखता है। जिसने आत्मज्ञान प्राप्त कर लिया है और जिसका मन विक्षेपरहित—शान्तियुक्त हो गया है, वह कैवल्यको प्राप्त महापुरुष आनन्दमें मग्न हुआ रहता है। शान्त बुद्धिसे सम्पन्न ज्ञानी महात्मा अन्तरात्मामें लीन दृष्टिसे जनताके व्यवहारोंको यन्त्रनिर्मित कठपुतलीके खेलके समान देखता है। तत्त्ववेत्ता पुरुष न भविष्यकी परवा करता है, न वर्तमानमे किसी पदार्थमें तन्मय होता है, न भूतकालीन वस्तुका स्मरण करता है और सब कुछ करता हुआ भी निर्लेप रहता है। तत्त्वज्ञानी सोता हुआ भी आत्मज्ञानमें जागता रहता है और जागता हुआ भी संसारसे निःस्पृह तथा उपरत रहता है। वह सब कुछ करता हुआ भी कर्तापनके अभिमानसे रहित होनेके कारण कुछ भी नहीं करता। सम्पूर्ण संसारकी आसक्तिसे शून्य और सदा-सर्वदा सम्पूर्ण कामनाओसे रहित तत्त्ववेत्ता महात्मा सब कार्योंको करता हुआ भी समभावसे स्थित रहता है। वह तत्त्वज्ञ पुरुष उदासीन मनुष्यकी तरह स्थित रहता है। वह प्रारब्धानुसार प्राप्त हुई क्रियाओंमें न इच्छा करता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है और न प्रसन्न होता है। तत्त्वज्ञ महात्मा जब अपने मुखसे वाणीको प्रवृत्त करता है, तब पवित्र कथाओंको ही कहता है। उसका अन्तःकरण दीनतासे रहित रहता है। वह धीर बुद्धिवाला, प्रत्यक्ष आनन्दमें मग्न तथा दक्ष होता है और लोकमें उसके पुण्य चरित्रोंका वर्णन होता है। तत्त्वज्ञ उदार-चरित एवं उदार आकारसे युक्त, सम, सौम्य, सुखका समुद्र एवं स्निग्ध होता है; उसका स्पर्श शान्तिमय होता है और वह पूर्णचन्द्रकी तरह नित्य उदित रहता है। उसका न आवश्यक कर्मोंके तथा ऐहिक और आमुष्मिक फलके हेतुरूप कर्मोंके आरम्भसे, न कर्मोंके अभावसे, न बन्धनसे, न मोक्षसे, न पातालसे और न स्वर्गसे ही प्रयोजन होता है; क्योंकि सम्यक्-ज्ञानरूपी अग्निसे जिसके सन्देहरूपी जाल विनष्ट हो गये हैं, उस तत्त्वज्ञ महात्माने समस्त जगत्की स्वरूपभूत अद्वितीय परमात्मारूप यथार्थ वस्तुको भली प्रकार जान लिया है।
जिसका अन्तःकरण भ्रान्तिसे रहित होकर समतारूप ब्रह्मके स्वरूपमें स्थित हो गया हो, वह आकाशकी तरह सभी दृष्टियोंमें न मरता है और न जन्मता है। देश और कालके अनुसार प्राप्त हुई क्रियाओंमें स्थित हुआ भी वह कर्मोंसे जनित सुख और दुःखकी प्राप्तिमें तनिक भी विकारवान् नहीं होता। वह प्राप्त हुई दुःखावस्थाकी उपेक्षा नहीं करता और न सुखावस्थाकी परवा ही करता है। न कार्योंके सफल होनेपर हर्षित होता है और न कार्योंके विनष्ट होनेपर खिन्न होता है। यदि सूर्य शीतल हो जाय, चन्द्रमा तपने लग जाय, अग्नि अधोमुख होकर जलने लगे, तो भी ( इस प्रकारकी विपरीत घटनाएँ होनेपर भी ) तत्त्वज्ञानी महात्माको आश्चर्य नहीं होता; क्योंकि तत्त्ववित् पुरुष यह जानता है कि चिन्मय परब्रह्म परमात्माकी ये असीम मायाशक्तियाँ इस प्रकार प्रस्फुरित हो रही हैं। इसलिये आश्चर्य-समूहोंके होनेपर भी उसको आश्चर्य नहीं होता। वह कभी भी दीनतायुक्त नहीं होता, न कभी उद्दण्ड होता है तथा न कभी उन्मत्त, खिन्न, उद्विग्न और हर्षयुक्त ही होता है। अर्थात् इन सब विकारोंका उसमें अत्यन्त अभाव होता है। उस परमात्मप्राप्त पुरुषके आकाशकी तरह अत्यन्त निर्मल, विशाल चित्तमें कोप आदि विकार उत्पन्न नहीं होते। सुख-दुःख दोनोंके क्षीण हो जानेसे उसके लिये हेय और उपादेय तथा शुभ और अशुभका भी विनाश हो जाता है; ऐसी स्थितिमें अनुकूल और प्रतिकूल कैसे रह सकते हैं। श्रीराम ! तिलोंके भस्म हो जानेपर तेलकी कल्पना ही कैसे हो सकती है। इसी प्रकार मूलसहित मनके विनष्ट हो जानेपर संकल्पकी चर्चा ही
उपशम-प्रकरण ] * चित्तके स्पन्दनसे होनेवाली जगत्की भ्रान्ति तथा उसके निरोधरूप योगकी सिद्धिके उपाय ३३९
क्या है। रघुनन्दन ! परमात्मासे पृथक् कोई भी पदार्थ नहीं है, इस प्रकारकी दृढ़ भावनाके कारण समस्त दृश्य पदार्थोंके संकल्प-विकल्पका अभाव करके सर्वव्यापी सच्चिदानन्दघन परमात्मामें एकीभावसे स्थित ज्ञानी महात्मा नित्यतृप्त तथा अपने निरतिशयानन्दस्वरूपसे आनन्दवान् होकर स्थित रहता है। (सर्ग ७६-७७)
चित्तके स्पन्दनसे होनेवाली जगत्की भ्रान्ति, चित्त और प्राण-स्पन्दनका स्वरूप तथा उसके निरोधरूप योगकी सिद्धिके अनेक उपाय
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जैसे रात्रिमें जलती हुई लुकाठीको गोल घुमानेसे अग्निमय चक्र असत् होते हुए भी सत्-सा दिखायी पड़ता है, वैसे ही चित्तके संकल्पसे असत् जगत् सत्-सा दिखायी पड़ता है। जैसे जलके चारों ओर घूमनेसे जलसे पृथक् गोल—नाभिके आकारका आवर्त (भँवर) दिखायी पड़ता है, वैसे ही चित्तके संकल्प-विकल्पसे जगत् दिखायी पड़ता है। जैसे आकाशमें नेत्रोंके दोषसे असत् मोरके पंख और मोतीके समूह सत्य-से दिखायी पड़ते हैं, वैसे ही चित्तके संकल्पसे असत् जगत् सत्य-सा दिखायी पड़ता है। रघुनन्दन ! जैसे शुक्लत्व और हिम, जैसे तिल और तेल, जैसे पुष्प और सुगन्ध तथा जैसे अग्नि और उष्णता एक दूसरेसे मिले हुए और अभिन्नरूप हैं, वैसे ही चित्त और संकल्प एक दूसरेसे मिले हुए और अभिन्नरूप हैं। उनके भेदकी केवल मिथ्या कल्पना की गयी है। चित्तके विनाशके लिये दो उपाय शास्त्रोंमें दिखलाये गये हैं—एक योग और दूसरा ज्ञान। चित्तवृत्तिका निरोध योग है और परमात्माका यथार्थ अपरोक्ष साक्षात्कार ही ज्ञान है।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! प्राण और अपानके निरोधरूप योग नामकी किस युक्तिसे और कब मन अनन्त सुखको देनेवाली परम शान्तिको प्राप्त करता है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! जैसे जल पृथ्वीमें चारों ओरसे प्रवेश करके व्याप्त होता है, वैसे ही इस देहमें विद्यमान असंख्य नाड़ियोंमें चारों ओरसे जो वायु प्रवेश करके व्याप्त होता है, वह प्राणवायु है। स्पन्दनके कारण भीतर क्रियाके वैचित्र्यको प्राप्त हुए उसी प्राणवायुके अपान आदि नामोंकी योगी-विवेकी पुरुषोंने कल्पना की है। जैसे सुगन्धका पुष्प तथा जैसे शुक्लताका हिम आधार है, वैसे ही चित्तका यह प्राण आधार है। प्राणके स्पन्दनसे चित्तका स्पन्दन होता है और चित्तके स्पन्दनसे ही पदार्थोंकी अनुभूतियाँ होती हैं, जिस प्रकार जलके स्पन्दनसे चक्कीकी तरह गोल आकारकी रचना करनेवाली लहरें उत्पन्न होती हैं चित्तका स्पन्दन प्राण-स्पन्दनके अधीन-है। अतः प्राणका निरोध करनेपर मन अवश्य उपशान्त (निरुद्ध) हो जाता है—यह बात वेद-शास्त्रोंको जानने-वाले विद्वान् कहते हैं। मनके संकल्पका अभाव हो जानेपर यह संसार विलीन हो जाता है।
श्रीरामजीने पूछा—महाराज ! देहरूपी घरमें स्थित हृदयादि स्थानोंमें विद्यमान नाड़ीरूपी छिद्रोंमें निरन्तर संचरण करनेवाले तथा मुख, नासिका आदि छिद्रोंमें निरन्तर गमनागमनशील प्राण आदि वायुओंका स्पन्दन कैसे रोका जा सकता है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! शास्त्रोंके अध्ययन, सत्पुरुषोंके सङ्ग, वैराग्य और अभ्याससे सांसारिक दृश्य पदार्थोंमें सत्ताका अभाव समझ लेनेपर चिरकालपर्यन्त एकतानतापूर्वक अपने इष्टदेवके ध्यानसे और एक सच्चिदा-नन्दघन परमात्माके स्वरूपमें स्थितिके लिये तीव्र अभ्याससे प्राणोंका स्पन्दन निरुद्ध हो जाता है। सुखपूर्वक रेचक, पूरक और कुम्भक आदि प्राणायामोंके दृढ़ अभ्याससे तथा एकान्त ध्यानयोगसे प्राणवायु निरुद्ध हो जाता है। ॐकारका उच्चारण और ॐकारके अर्थका चिन्तन करनेसे बाह्य विषयोंके ज्ञानका अभाव हो जानेपर प्राण-
| ३४० | * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ |
|---|
वायुका स्पन्दन रुक जाता है। रेचक प्राणायामका दृढ़ अभ्यास करनेसे विशाल प्राणवायुके बाह्य आकाशमें स्थित हो जानेपर नासिकाके छिद्रोको जब प्राणवायु स्पर्श नहीं करता, तब प्राणवायुका स्पन्दन रुक जाता है। इसीका नाम बाह्यकुम्भक प्राणायाम है। पूरकका दृढ़ अभ्यास करते-करते पर्वतपर मेघोंकी तरह हृदयमें प्राणोके स्थित हो जानेपर जब प्राणोंका संचार शान्त हो जाता है, तब प्राण-स्पन्दन रुक जाता है। इसीका नाम आभ्यन्तर-कुम्भक प्राणायाम है। कुम्भकी तरह कुम्भक प्राणायामके अनन्तकालतक स्थिर होनेपर और अभ्याससे प्राणका निश्चल स्तम्भन हो जानेपर प्राणवायुके स्पन्दनका निरोध हो जाता है। इसीका नाम स्तम्भवृत्ति प्राणायाम है।*
* रेचक, पूरक और कुम्भक—इन तीनों प्राणायामोंका योगदर्शनमें महर्षि पतञ्जलिने इस प्रकार वर्णन किया है।
तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः ।
( योग० साधन० ४९ )
'आसन सिद्ध होनेके बाद श्वास और प्रश्वासकी गतिका रुक जाना 'प्राणायाम' है। तात्पर्य यह कि प्राणवायुका शरीरमें प्रविष्ट होना श्वास है और बाहर निकलना प्रश्वास है। इन दोनोंकी गतिका रुक जाना—प्राणवायुकी गमनागमनरूप क्रियाका बंद हो जाना ही प्राणायामका समान्य लक्षण है।
इस प्राणायामके तीन भेद हैं—
बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः ।
( योग० साध० ५० )
'उक्त प्राणायाम बाह्यवृत्ति, आभ्यन्तरवृत्ति और स्तम्भ-वृत्ति—ऐसे तीन प्रकारका होता है तथा वह देश, काल और संख्याद्वारा देखा जाता हुआ लंबा और हल्का होता जाता है।'
प्राणवायुको शरीरसे बाहर निकालकर बाहर ही जितने कालतक सुखपूर्वक—रुक सके, रोके रखना और साथ-ही-साथ इस बातकी भी परीक्षा करते रहना कि वह बाहर आकर कहाँ ठहरा है, कितने समयतक ठहरा है और उतने समयमें स्वाभाविक प्राणकी गतिकी कितनी संख्या होती है—यह 'वाह्यवृत्ति प्राणायाम' है। इसे रेचक भी कहते हैं; क्योंकि इसमें रेचनपूर्वक प्राणको रोका जाता है। अभ्यास करते-करते यह दीर्घ (लंबा) बहुत कालतक रुके रहनेवाला और सूक्ष्म (हल्का)—अनायाससाध्य हो जाता है।
जिह्वाके द्वारा तालुके मध्यभागमें रहनेवाली घण्टिकाको प्रयत्नपूर्वक स्पर्श करनेसे जब प्राण ऊर्ध्वरन्ध्रमें (ब्रह्मरन्ध्र अर्थात् कपाल-कुहरमें, जो सुषुम्णाके ऊपरी भागका द्वार कहा जाता है) प्रविष्ट हो जाता है, तब प्राणवायुका स्पन्दन निरुद्ध हो जाता है। समस्त संकल्प-विकल्पोंसे रहित होनेपर कोई भी नाम-रूप नहीं रहता, तब अत्यन्त सूक्ष्म चिन्मय-आकाशरूप परमात्माके ध्यानसे बाह्याभ्यन्तर सारे विषयोंके विलीन हो जानेपर प्राणवायुका स्पन्दन निरुद्ध हो जाता है। † नासिकाके अग्रभागसे लेकर बारह अंगुल-
प्राणवायुको भीतर ले जाकर भीतर ही जितने कालतक सुखपूर्वक रुक सके, रोके रखना और साथ-साथ यह देखते रहना कि आभ्यन्तर देशमें कहाँतक जाकर प्राण रुकता है, वहाँ कितने कालतक सुखपूर्वक ठहरता है और उतने समयमें प्राणकी स्वाभाविक गतिकी कितनी संख्या होती है—यह 'आभ्यन्तरवृत्ति प्राणायाम' है। इसे 'पूरक' प्राणायाम भी कहते हैं; क्योंकि इसमें शरीरके अंदर ले जाकर प्राणको रोका जाता है। अभ्यासबलसे यह भी दीर्घ और सूक्ष्म होता जाता है।
शरीरके भीतर जाने और बाहर निकलनेवाली जो प्राणोंकी स्वाभाविक गति है, उसे प्रयत्नपूर्वक बाहर या भीतर लाने अथवा ले जानेका अभ्यास न करके प्राणवायु स्वभावसे बाहर निकला हो या भीतर गया हो—जहाँ हो वहीं उसकी गतिको स्तम्भित कर देना (रोक देना) और यह देखते रहना कि प्राण किस देशमें रुके हैं, कितने समयतक सुखपूर्वक रुके रहते हैं, इस समयमें स्वाभाविक गतिकी कितनी संख्या होती है—यह 'स्तम्भवृत्ति प्राणायाम' है; इसे 'कुम्भक' प्राणायाम भी कहते हैं। अभ्यासबलसे यह भी दीर्घ और सूक्ष्म होता है।
† इस प्राणायामका वर्णन योगदर्शनमें यों किया गया है—
बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः। ( योग० साधन० ५१ )
'बाहर और भीतरके विषयोंका त्याग कर देनेसे अपने-आप होनेवाला चौथा प्राणायाम है।'
भाव यह है कि बाहर और भीतरके विषयोंके चिन्तनका त्याग कर देनेसे—इस समय प्राण बाहर निकल रहे हैं या भीतर जा रहे हैं अथवा चल रहे हैं कि ठहरे हुए हैं, इस जानकारीका त्याग करके मनको परमात्मामें लगा देनेसे देश, काल और संख्याके जानके बिना ही अपने-आप जो प्राणोंकी गति जिस किसी देशमें रुक जाती है, वह चौथा प्राणायाम है। यह अनायास होनेवाला राजयोगका प्राणायाम है।
९२—महामुनि वीतहव्यकी ॐकारकी अन्तिम मात्राका अवलम्बनकर परमात्मप्राप्तिरूप मुक्ता-वस्थाका निरूपण**
उपशम-प्रकरण] * चित्तके स्पन्दनसे होनेवाली जगत्की भ्रान्ति तथा उसके निरोधरूप योगकी सिद्धिके उपाय * ३४१
पर्यन्त निर्मल आकाशमार्गमें नेत्रोंकी लक्ष्यभूत संविद्दृष्टि (वृत्तिज्ञान)-के शान्त हो जानेपर अर्थात् नेत्र और मनकी वृत्तिको रोकनेसे प्राणका स्पन्दन निरुद्ध हो जाता है।
अभ्याससे यानी योगशास्त्रोंमें प्रदर्शित पवन-निरोधके अभ्याससे ऊर्ध्वरन्ध्रके द्वारा (सुषुम्णामार्गसे) तालुके ऊपर जो ब्रह्मरन्ध्र है, उसमें स्थित प्राणवायु जब विलीन हो जाता है, तब प्राणवायुका स्पन्दन रुक जाता है। भृकुटीके मध्यमें चक्षु-इन्द्रियकी वृत्तिके शान्त होनेसे आज्ञाचक्रमें प्राणोंके विलीन हो जानेपर जब चिन्मय परमात्माका अनुभव हो जाता है, तब प्राणोंका स्पन्दन रुक जाता है। ईश्वरके अनुग्रहसे तुरंत उत्पन्न हुए दृढीभूत तथा समस्त विकल्पांशोंसे रहित परमात्मज्ञानके हो जानेपर प्राणोंका स्पन्दन निरुद्ध हो जाता है। मननशील श्रीरामजी ! हृदयमें स्थित एकमात्र चिन्मय आकाशस्वरूप परमात्माके ज्ञानसे, विषय-वासनाके अभावसे और मनके द्वारा परमात्माका निरन्तर ध्यान करनेसे प्राणोंका स्पन्दन निरुद्ध हो जाता है।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—ब्रह्मन् ! इस जगत्में प्राणियोंके उस हृदयका स्वरूप क्या है, जिसमें यह सब दर्पणमें प्रतिबिम्बकी तरह स्फुरित होता है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! इस जगत्में प्राणियोंके दो प्रकारके हृदय हैं—एक उपादेय और दूसरा हेय। अब तुम इनका विभाग सुनो। इयत्तारूपसे परिच्छिन्न इस देहमें वक्षःस्थलके भीतर शरीरके एक देशमें स्थित जो हृदय है, उसे तुम हेय हृदय जानो। चेतनमात्रस्वरूपसे स्थित हृदय (परमात्मा) को उपादेय कहा गया है। वह परमात्मा सबके भीतर और बाहर है और भीतर एवं बाहर नहीं भी है। अर्थात् संसारके प्रतीतिकालमें तो परमात्मा उसके भीतर और बाहर—सब जगह परिपूर्ण है और वास्तवमें वह संसारके भीतर-बाहर नहीं है; क्योंकि संसारका अत्यन्त अभाव है। अतः परमात्मा ही अपने आपमें नित्य स्थित हैं। वह उपादेय परमात्मा ही प्रधान हृदय है। उसीमें यह समस्त जगत् विद्यमान है, वही समस्त पदार्थोंका दर्पण है अर्थात् उसीमें यह संसार दर्पणमें प्रतिबिम्बकी ज्यों संकल्परूपसे स्थित है और वही सम्पूर्ण सम्पत्तियोंका कोष है। श्रीराम ! चेतन परमात्मा ही सभी प्राणियोंका हृदय कहा जाता है। जड और जीर्ण पत्थरके सदृश देहके अवयवका मांस-खण्डरूप एक अंश वास्तविक हृदय नहीं है। इसलिये चेतनस्वरूप विशुद्ध हृदय—परमात्मामें वासनाओंसे रहित होकर बलपूर्वक चित्तको लगानेसे प्राणका स्पन्दन निरुद्ध हो जाता है। इन पूर्वोक्त उपायोंसे तथा अन्यान्य अनेक तत्त्वज्ञ आचार्योंके मुखसे उपदिष्ट नाना संकल्पोंसे कल्पित उपायोंसे प्राण-स्पन्द निरुद्ध हो जाता है। ये पूर्वोक्त योगविषयक युक्तियाँ अभ्यासके द्वारा ही श्रेष्ठ साधकके लिये संसारका उच्छेदन करनेमें बाधारहित उपाय हैं। भ्रू, नासिका, तालुसंस्थान तथा कण्ठाम्र-प्रदेशसे लेकर बारह अङ्गुल-परिमित प्रदेशमें अभ्याससे प्राण लीन हो जाता है अर्थात् प्राणोंका निरोध हो जाता है। अभ्याससे ही पुरुष आत्माराम, वीतशोक तथा परमात्माकी प्राप्तिरूप भीतरी सुखसे पूर्ण होता है। उस परमपदरूप परमात्मामें यह समस्त जगत् विद्यमान है; उससे यह सब उत्पन्न हुआ है, वह समस्त जगत्का स्वरूपभूत है और वह इस जगत्के चारो ओर विद्यमान है। किंतु वास्तवमें उसमें न तो यह दृश्यमान समस्त जगत् विद्यमान है, न यह उससे उत्पन्न हुआ है और न जगत् उसका स्वरूप ही है। वास्तवमें इस प्रकारका जगत् है ही नहीं, प्रत्युत वह परमात्मा स्वयं ही अपने आपमें स्थित है। श्रीराम ! जो महाबुद्धिमान् ज्ञानी महात्मा पुरुष सारी सीमाओंके अन्तरूप उस परमपदका अवलम्बन करके स्थित रहता है, वह स्थितप्रज्ञ, तत्त्ववेत्ता, जीवन्मुक्त कहलाता है। जिस महात्माकी समस्त कामोपभोगोंकी
३४२ * अविच्छिन्नविदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
इच्छाएँ निवृत्त हो गयी हैं, जिसका सम्पूर्ण पदार्थोंमें अनुकूलता और प्रतिकूलतारूप संकल्प निवृत्त हो गया है तथा जिसका अन्तःकरण समस्त व्यवहारोंमें हर्ष और विषादसे रहित तथा सम हो गया है एवं जिसका मन शान्त हो चुका है, वह महात्मा सब पुरुषोंमें श्रेष्ठ है। (सर्ग ७८)
चित्तके उपशमके लिये ज्ञानयोगरूप उपाय एवं विवेक-विचारके द्वारा चित्तका विनाश होनेपर ब्रह्मविचारसे परमात्माकी प्राप्ति
श्रीरामचन्द्रजीने कहा—भगवन् ! उपर्युक्त दो उपायोंमेंसे आपने योगयुक्त पुरुषके चित्त-विनाशका ही निरूपण किया है। अब आप अनुग्रह करके मुझसे यथार्थ ज्ञानका सम्यक् प्रकारसे निरूपण कीजिये।
श्रीवसिष्ठजी बोले—श्रीराम ! इस जगत्में आदि और अन्तसे रहित प्रकाशस्वरूप परमात्मा ही है—इस प्रकारका जो दृढ़ निश्चय है, उसी निश्चयको ज्ञानी महात्मागण सम्यक् ज्ञान यानी परमात्माके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान कहते हैं। ये जो घट-पट आदि आकारोंसे युक्त पदार्थोंके सैकड़ों समूह हैं, वे सब परमात्मस्वरूप ही हैं; उससे भिन्न अन्य कुछ नहीं है—इस प्रकारका दृढ़ निश्चय ही परमात्माके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान है। परमात्माका यथार्थ ज्ञान न होनेसे जन्म होता है और परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे मोक्ष होता है। रज्जुका यथार्थ ज्ञान न होनेसे रज्जु सर्परूप प्रतीत होती है और उसका यथार्थ ज्ञान होनेसे रज्जु सर्परूप नहीं प्रतीत होती यानी रज्जु रज्जुरूप ही दिखायी पडती है। इस मुक्तिमें संकल्पसे सर्वथा रहित, समस्त विषयोंसे रहित केवल चिन्मय परमात्मा ही सच्चिदानन्दरूपसे विराजमान रहता है; उससे अन्य कुछ भी नहीं रहता। इन तीनो लोकोंमें यथार्थ आत्मदर्शन इतना ही है कि यह सब जगत् परमात्मा ही है, ऐसा निश्चय करके पुरुष पूर्णताको प्राप्त हो जाय। उस परमात्मासे भिन्न न तो दृश्य जड जगत् है और न मन है। ब्रह्म ही यह दृश्य रूप बनकर चेष्टा कर रहा है। समस्त ब्रह्माण्ड एक चिन्मय आकाशरूप विज्ञानानन्दघन ब्रह्म ही है; अतः क्या मोक्ष है और क्या बन्धन है।
जितने बड़े-से-बड़े पदार्थ हैं, उन सबसे भी ब्रह्म महान् है। जैसे काष्ठ, पाषाण और वस्त्र आदि सब कुछ पृथ्वी ही है—इस प्रकारका यथार्थ ज्ञान हो जानेपर उनमें तनिक भी भेद नहीं रह जाता, वैसे ही परमात्माका यथार्थ ज्ञान हो जानेपर परमात्मासे भिन्न कोई वस्तु नहीं रहती। रघुनन्दन ! आदि और अन्तमें जो अविनाशी, पूर्ण, शान्त-स्वरूप है, वास्तवमें वही सच्चिदानन्दघन परमात्मा है। जो महात्मा उस विशुद्ध परमात्माका अनुभव करके अन्तःस्थ बुद्धिसे सदा-सर्वदा स्थित रहता है, वह तत्त्वज्ञानी आत्माराम पुरुष भोगोंके द्वारा बन्धनमें नहीं पड़ता। जैसे मन्द पवन पर्वतका भेदन नहीं कर सकते, वैसे ही जिस ज्ञानीने प्रकाशमान परमात्माका पूर्णरूपसे अनुभव कर लिया है, उस तत्त्वज्ञके अन्तःकरणको काम आदि शत्रु तनिक भी भेदन (विचलित) नहीं कर सकते। जैसे जलसे बाहर निकली हुई मछलीको बगुले निगल जाते हैं, वैसे ही इस संसारमें आशाओमें निरत, मूढ़, अज्ञानी और अविचारी पुरुषको दुःख निगल जाते हैं। श्रीराम ! जैसे अनेक प्रकारके सरोवरोंमें जल, फेन आदि जलसे पृथक् नहीं हैं, वैसे ही दृश्य जगत् ब्रह्मसे पृथक् नहीं है। केवल कल्पनाओमें ही नानात्व है, वास्तवमें नानात्व नहीं है—इस प्रकार विवेकपूर्वक भलीभाँति अर्थको जान लेनेवाला एक निश्चययुक्त ज्ञानी पुरुष विमुक्त कहा जाता है।
श्रीराम ! अपने हृदयमें ब्रह्मविषयक विचार करनेवाले विवेकी वीतराग पुरुषकी सर्वदा सम्मुखस्थित सांसारिक भोगोंमें भी रुचि उत्पन्न ही नहीं होती। अधम नेत्र ! स्त्री,
उपशम-प्रकरण ] * चित्तके उपशामके लिये ज्ञानयोगरूप उपाय, ब्रह्मविचारसे परमात्माकी प्राप्ति * ३४३
पुत्र आदिके सौन्दर्यरूप रूपात्मक कीचड़का तुम आस्वादन मत करो। यह रूप क्षणमें ही विनष्ट हो जानेवाला है और तुम्हें भी विनष्ट कर देनेवाला है। नेत्र ! जो उत्पत्ति-विनाशशील है और जो केवल देखने-मात्रमें ही रमणीय प्रतीत होता है, ऐसे मिथ्या रूप-सौन्दर्यका तुम उस अवश्यम्भावी मृत्युके मुखमें प्रवेश करनेके लिये आश्रय मत लो । जैसे वास्तवमे परस्पर असम्बद्ध मुख, दर्पण और प्रतिबिम्ब एक दूसरेसे सम्बद्ध प्रतीत होते हैं, वैसे ही वास्तवमें परस्पर एक दूसरेसे असम्बद्ध रूप, प्रकाश और मन एक दूसरेसे सम्बद्ध प्रतीत होते हैं। जैसे दो काठ लाहके द्वारा एक दूसरेसे संश्लिष्ट हो जाते हैं, वैसे ही ये रूप, आलोक और संकल्प आदि मनन चित्तकी कल्पनासे एक दूसरेसे संश्लिष्ट हो जाते हैं। अपने चित्तका संकल्प-विकल्पात्मक तन्तु विवेकशील बुद्धिके द्वारा यत्नपूर्वक किये गये विवेक-विचाररूप अभ्याससे विनष्ट हो जाता है। फिर उस तन्तुके नष्ट हो जानेपर स्वभावत. ही अज्ञान-भावना प्रवृत्त नहीं होती। अज्ञान-के विनाशसे क्षीण हुए मनमें फिर ये रूप, आलोक और मनन—कोई भी एक दूसरेसे संघटित नहीं होते।
चित्त ! तुम मिथ्या ही उछल-कूद मचाते हो। मैंने तुम्हारे उच्छेदके लिये उपाय ढूंढ निकाला है। तुम आदि और अन्त दोनोंमें नितान्त तुच्छ (क्षणभङ्गुर) हो, इसलिये वर्तमान कालमें भी विनष्ट ही हो। तुम इन्द्रियोंसे सम्बद्ध शब्द आदि पाँच विषयोंके द्वारा अपने भीतर क्यों वृथा उछल रहे हो ? जो मनुष्य तुम्हें अपना मानता है, उसीके सामने तुम उछल-कूद कर सकते हो । किंतु दुष्ट चित्त ! तुम्हारी उछल-कूदसे मुझे तनिक भी प्रसन्नता नहीं होती। तुम रहो चाहे जाओ, तुम न तो मेरे हो और न तुम जीते हो। विचार करनेपर अपने मिथ्या स्वभावसे तुम सदा मृतक ही हो। तुम साररहित जड, भ्रान्त और शठ हो । तुम्हारा आकार अत्यन्त विनाशशील है। अज्ञानस्वरूप तुम्हारे द्वारा अज्ञानी पुरुषको ही बाधा पहुँच सकती है, विचारवान् विवेकी पुरुषको नहीं।
जगद्रूपी-चित्त-वेताल ! शठरूप तुम पहले ही नहीं थे, वर्तमान कालमें भी नहीं हो और आगे भी नहीं रहोगे। इस प्रकार तुम्हारी तीनों कालोंमें सत्ता नहीं है। बिना हुए ही तुम कायम हो । तुम्हें क्या लज्जा नहीं आती ? चित्तरूपी वेताल ! तृणारूपी पिशाचिनियों तथा क्रोध आदि गृध्रोंके साथ तुम मेरे शरीररूपी घर-से बाहर निकल जाओ। बड़े आश्चर्यकी बात है कि महान् जड एवं क्षणभङ्गुर शठ मनने इस समस्त जन-समूहको विवश कर रखा है। अज्ञानी दीन चित्त! मैं आज तुमको मारता नहीं हूँ; क्योंकि तुम पहलेसे ही मर चुके हो, यह मैंने जान लिया है। चित्त मरा हुआ है; अतः उसका अस्तित्व ही नहीं है—यह मैंने आज जान लिया । इसलिये मैं चित्तके आश्रयका परित्याग करके केवल अपने आत्मामें ही स्थित हूँ। मनको देहरूपी घरसे क्षणभरमें निकालकर मैं इस वेतालरूप मनसे रहित हो भीतरसे स्वस्थ हुआ स्थित हूँ। भाग्यवश बहुत कालके अनन्तर अब मैंने विचाररूपी तलवारसे पीडितकर चित्तरूपी वेतालको, जो ताल वृक्षके सदृश ऊँचाईसे युक्त है, हृदय-मन्दिरसे हटा दिया है। चित्तरूपी वेतालके शान्त हो जाने और पवित्र पदवीको प्राप्त कर लेनेपर अब उत्तम भाग्यसे शरीररूपी नगरमें केवल मैं सुखपूर्वक स्थित हूँ । विवेक-विचाररूपी मन्त्रसे मन, चिन्ता और अहंकाररूपी राक्षसका विनाश हो गया । अब समस्त विषमताओंसे रहित मैं केवल अपने स्वरूप-में ही स्थित हूँ । एक, कृतकृत्य, नित्य, विशुद्ध-स्वरूप तथा निर्विकल्प सच्चिदानन्दघन परमात्मरूप मुझको बार-बार नमस्कार है । विकारशून्य, नित्य, अंगरहित, सर्वरूप तथा सर्वकालात्मक परमात्मस्वरूप मुझको बार-बार नमस्कार है। नाम और रूपसे रहित, प्रकाश
| ३४४ | * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ |
|---|
रूप, स्वयं अपने आपमें ही स्थित अद्वितीय सच्चिदानन्द-घन परमात्मस्वरूप मुझको ही बार-बार नमस्कार है । मननरहित, सम, अत्यन्त सुन्दर समस्त विश्वका आविर्भाव करनेवाले, वास्तवमें विश्वरहित, अनन्त, खस्वरूप, अजन्मा, जरारहित, समस्त गुणोंसे अतीत तथा अविनाशी विज्ञानानन्दघन परमेश्वरके स्वरूपको मैं प्रणाम करता हूँ ।
रघुनन्दन ! जैसे आकाशमें दृष्टिदोषसे प्रतीत होनेवाला वृक्ष भ्रमवश वृक्षरूपमें प्रतीत होता है, वास्तवमें वह विशुद्ध आकाशस्वरूप ही है, उससे पृथक् आकाश-वृक्ष नहीं है, वैसे ही चित्त अविद्यमान, जड और मायाका कार्य होनेसे निश्चयरूपसे असत् ही है, वह परमात्मासे भिन्न कोई पदार्थ नहीं है । जैसे नौकामें स्थित अज्ञानी बालकको तटवर्ती वृक्ष और पहाड़में प्रतीत होनेवाली गति केवल भ्रान्तिसे ही दिखायी पड़ती है, वैसे ही अज्ञानी मनुष्यको यह चित्त दिखायी पड़ता है। किंतु आत्मज्ञानी तत्त्वज्ञकी दृष्टिमें वह असन्मय ही है—है ही नहीं। मेरे समस्त संदेह शान्त हो चुके हैं, समस्त चिन्ताज्वरोंसे रहित होकर मैं स्वानुभावसे ही इच्छाओंसे रहित हुआ स्थित हूँ । मेरा चित्त मर गया, तृष्णाएँ हट गयीं और मैं मोह तथा अहंकारसे रहित हो गया । इससे मैंने अपने स्वाभाविक—वास्तविक स्वरूपको जान लिया । जगत् शान्त होकर अद्वितीय परब्रह्मस्वरूप ही हो गया और नानात्व वास्तवमें है ही नहीं । जीवत्वसे तथा आदि और अन्तसे रहित पवित्र परमपदको मैं प्राप्त हो गया हूँ । अतः मैं सौम्य, सर्वत्र व्यापक, अतिसूक्ष्म, सनातन परमात्मस्वरूपसे स्थित हूँ । श्रीराम ! इस प्रकारकी बुद्धिसे तत्त्वज्ञानी पुरुषको खाते, चलते, सोते और स्थित रहते सदा-सर्वदा सर्वत्र प्रतिदिन भलीभाँति विचार करना चाहिये । जिनका अन्तःकरण प्रमुदित है, जिनकी शरद्ऋतुके चन्द्रमाकी तरह चमकीली मुखकान्ति है और जो प्राप्त हुए शास्त्रानुमोदित व्यवहारोंमें विहार करते हैं, वे असीम बुद्धिवाले महापुरुष इस संसारमें मान और मदसे रहित हुए सुखपूर्वक विचरण करते हैं। (सर्ग ७९—८१)
वीतहव्य मुनिका एकाग्रताकी सिद्धिके लिये इन्द्रिय और मनको बोधित करना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! मैंने तुम्हें जिस विचारका दिग्दर्शन कराया है, उस विचारको पहले विद्वान् संवर्त (बृहस्पतिके छोटे भाई) ने किया था । विन्ध्याचल पर्वतके ऊपर उसी आत्मतत्त्वज्ञ संवर्तने उक्त विचारको मुझसे कहा था । अब तुम इस दूसरी दृष्टिका, जो परमपदको प्रदान करनेवाली है, श्रवण करो । इसी दृष्टिसे महामुनि वीतहव्यने निःशङ्क परमपदको प्राप्त किया था । एक समयकी बात है, महामुनि वीतहव्य संसाररूपी भ्रम प्रदान करनेवाले घोर आधि-व्याधिमय आकारयुक्त सांसारिक क्रियाकलापोंसे वैराग्ययुक्त होकर विरक्त अवस्थाको प्राप्त हो गये और केवल निर्विकल्प समाधिसे प्राप्त होनेवाले परम उदार परब्रह्म परमात्माको जाननेकी इच्छासे ही उक्त महामुनिने अपने सांसारिक व्यवहारोंका त्याग कर दिया । तदनन्तर महामुनि वीतहव्यने स्वरचित पर्णकुटीमें प्रवेश किया । उस पर्णकुटीमें अपने द्वारा बिछाये गये सम और शुद्ध आसनपर वे बैठ गये । फिर बाह्य और आभ्यन्तर विषयोंका परित्याग करते हुए उन महामुनिने विशुद्ध मनसे क्रमशः इस प्रकार विचार