भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

४९० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

आसक्तिसे रहित हो जानेके कारण मैं प्रारब्धानुसार न्यायतः प्राप्त वस्तुकी न तो प्रशंसा करता हूँ और न निन्दा ही करता हूँ। अतः अब तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा ही करो।

चूड़ाला बोली--जीवन्मुक्तस्वरूप महाबाहो ! यदि ऐसी बात है तो अब आप मेरा मत सुनिये और उसे सुनकर तदनुकूल आचरण कीजिये। महाराज ! सर्वत्र अद्वैतका बोध होनेसे हमलोगोंके अज्ञानका विनाश हो गया है, अतः अब हमलोग सारी इच्छाओंसे मुक्त होकर आकाशकी तरह निर्मल रूपमें स्थित हैं। प्रभो ! इस समय राज्य-शासनद्वारा क्रमशः अपनी अवशिष्ट आयु बिताकर कुछ कालके बाद हमलोग विदेहमुक्त हो जायेंगे। इसलिये नाथ ! अब आप अपने नगरमें लौट चलिये और राजसिंहासनपर बैठकर राजकाज सँभालिये। रमणियोंकी भूषणस्वरूपा मैं आपकी पटरानी होकर रहूँगी। राजन् ! न तो मुझे भोगोंकी इच्छा है, न विभूतियोंकी। मैं तो स्वभाववश जो कुछ भी न्यायतः प्राप्त हो जाता है, उसीसे निर्वाह करती हूँ। यह स्वर्ग, राज्य अथवा क्रिया—कोई भी मेरे लिये सुखदायक नहीं है। मैं तो अपने स्वरूपमें स्थित होकर तदनुकूल व्यापार-से युक्त हो अपनी वास्तविक स्थितिके अनुसार बिना किसी क्षोभके स्थित रहती हूँ। 'यह सुख है और यह दुःख है' इस द्वन्द्वके नष्ट होनेके साथ-साथ मैं शान्त परमपदमें सुखपूर्वक स्थित हूँ।

शिखिध्वजने कहा—विशाल नेत्रोंवाली प्रिये ! तुमने अपनी निर्विकार बुद्धिसे जो कुछ कहा है, वह ठीक ही है। हमें राज्यके ग्रहण अथवा त्यागसे क्या प्रयोजन है। हमलोग सांसारिक सुख-दुःखकी चिन्ता और मत्सरसे रहित मत्सरशून्य और ब्रह्मस्वरूपमें स्थित हुए यथाप्राप्त स्थितिके अनुसार निवास करेंगे।

इस प्रकार वहाँ उन दोनों निर्दोष एवं प्रेमी पति-पत्नीके बहुत देरतक परस्पर वार्तालाप करते हुए सायंकाल हो गया। तब उन दोनोंने उठकर अपना दैनिक कार्य सम्पन्न किया। वे दोनों जीवन्मुक्त तो थे ही, अतः स्वर्गकी सिद्धिका अनादर करके सर्वथा समचित्त हो वे दोनों एक ही शय्यापर बैठ गये। उनकी वह रात्रि तरह-तरहकी प्रेमभरी चेष्टाओंकी पूर्तिमें ही बीत गयी।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तदनन्तर प्रातः-काल होनेपर वे प्रेमी दम्पति उस सुन्दर कन्दरामें बिछे हुए कोमल एवं चिकने पत्तोंके आसनपर उठकर बैठ गये। उस समय चूड़ालाने कहा--'प्रभो ! आपका यह शान्त तेजःस्वरूप केवल मुनियोंके योग्य है, अतः इसका परित्याग करके अब आपको इन्द्रादि अष्ट लोकपालोंके समान तेजस्वी रूप धारण करना चाहिये।'

उस वनमें चूड़ालाके यों कहनेपर राजा शिखिध्वजने 'ठीक है, ऐसा ही करूँगा' यों कहकर महाराजका स्वरूप धारण कर लिया और अपनी प्रिया चूड़ालासे कहा—'कमलदलके सदृश नेत्रोंवाली प्राणवल्लभे ! अब तुम्हें चाहिये कि क्षणभरमें ही अपने सत्यसंकल्पसे महान् वैभवसे युक्त विशाल सैन्यदल एकत्र कर दो।' अपने पतिकी यह बात सुनकर सुन्दरी चूड़ालाने ज्यों ही सेनाका संकल्प किया, त्यों ही उन दोनोंने देखा कि एक विशाल सेना सामने प्रत्यक्ष खड़ी है, जिसने उस काननको ठसाठस भर दिया है। वह हाथी-घोड़ोंसे भरी-पूरी है तथा पताकाओंसे आकाशको पूर्ण-सा कर रही है। जिसकी तुरही आदिके शब्द पर्वतोंकी गुफाओं तथा गहन कोटरोंको प्रतिध्वनित कर रहे हैं। तब उस सेनामें, जिसके चारों ओर राजालोग मण्डलाकारमें खड़े थे तथा हृष्ट-पुष्ट सामन्त जिसकी रक्षा कर रहे थे ऐसे एक मदस्रावी गजराजकी पीठपर वे राजदम्पति सवार हुए। तत्पश्चात् अपनी प्रियतमा महा-रानीसहित महाबली राजा शिखिध्वजने पैदल सैनिकों तथा रथोंसे खचाखच भरी हुई उस विशाल सेनाके साथ उस वनसे प्रस्थान किया। उस महेन्द्र पर्वतसे चलकर राजा शिखिध्वज मार्गमें काननोंसहित पर्वत, देश, नदी

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * बृहस्पतिपुत्र कचकी सर्वत्याग-साधनसे जीवन्मुक्ति * ४६१


और ग्रामोंको देखते हुए तथा अपना सारा वृत्तान्त एवं तदन्तर्गत घटनास्थल अपनी प्रिया चूडालाको दिखाते हुए थोडे ही समयके बाद अपनी पुरीमें जा पहुँचे, जो स्वर्गके समान शोभायमान हो रही थी।

वहाँ पहुँचनेपर जय-जयकारके तुमुल नादसे जब राजाके सम्मानित सामन्तोंको पता लगा कि महाराज पधार रहे हैं, तब वे उनके स्वागतके लिये सेना लेकर नगरसे बाहर निकले। उस समय तुरहीके तुमुल नादसे निनादित हुई दोनों सेनाएँ एकमेक हो गयीं। तत्पश्चात् राजा शिखिध्वजने उन दोनों सेनाओंके साथ नगरमें प्रवेश किया। उस समय नगरकी नारियों मञ्जरोंसे उनपर अञ्जलि भर-भरकर लाजा और पुष्पोंकी वर्षा कर रही थीं। राजा शिखिध्वज व्यापारियोंके मार्गोंसे, जो दृष्ट्मोत्सव परम रमणीय था, देखते हुए राजमहलमें प्रविष्ट हुए। वह महल ध्वजा-पताकाओंसे खूब सजाया गया था और राजाके योग्य सारी माङ्गलिक वस्तुओंसे सन्नद्ध था। वहाँ राजाने नमस्कार करते हुए प्रजावर्गका भलीभाँति सम्मान किया। इस प्रकार सात दिनोंतक नगरमें बड़े धूमधामके साथ उत्सव मनाकर राजा अपने अन्तःपुरमें निवास करते हुए अपने राज्यका पालन करने लगे।

श्रीराम ! इस प्रकार भूतलपर चूडालाके साथ दस हजार वर्षोंतक राज्य करनेके पश्चात् राजाका देहावसान हो गया। वे महाबुद्धिमान् नरेश इस शरीरको त्यागकर परमपदरूप निर्वाणको प्राप्त हो गये।

श्रीराम ! राजा शिखिध्वजके भय और विषाद नष्ट हो गये थे। मान और मात्सर्यसे वे रहित हो गये थे तथा वे न्याययुक्त प्राप्त शास्त्रोक्त सात्त्विक कर्मोंका सम्पादन करनेवाले थे। भोगोंमें उनकी वैराग्यबुद्धि हो गयी थी और वे सबमें समरूप ब्रह्मदृष्टिसे युक्त हो गये थे। इस प्रकार उपर्युक्त बोधके द्वारा उन्होंने मृत्युको—द्वन्द्व-दशाओंको जीतकर दस हजार वर्षोंतक एकच्छत्र राज्य किया था।

(सर्ग १०९-११०)


बृहस्पतिपुत्र कचकी सर्वत्याग-साधनसे जीवन्मुक्ति, मिथ्यापुरुपरी आख्यायिका और उसका तात्पर्य

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! यह शिखिध्वज-की कथा मैंने तुमसे आद्योपान्त कह दी। श्रीराम ! राजा शिखिध्वजने जिस प्रकार व्यवहार करते हुए राज्य किया, उसी प्रकार तुम भी राज्य-व्यवहार करो। शिखिध्वजकी तरह ही बृहस्पतिके पुत्र कचने भी ज्ञान प्राप्त किया था।

श्रीरामचन्द्रजीने कहा—भगवन् ! बृहस्पतिके पुत्र समस्त वैभवोंसे परिपूर्ण कचने किस क्रमसे ज्ञान प्राप्त

४९२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ

किया था, उस क्रमको संक्षेपमें मुझसे कहिये ।

श्रीवसिष्ठजी बोले—श्रीराम ! देवताओंके आचार्य बृहस्पति के पुत्र श्रीमान् कचने राजा शिखिध्वजकी तरह ही सर्वोत्तम ज्ञान प्राप्त किया था । इसकी कथा तुम सुनो। कचका अभी बाल्यकाल समाप्त ही हुआ था और ज्यों ही यौवन आरम्भ हुआ. त्यों ही वह संसार-सागरको तर जानेके लिये कटिबद्ध हो गया । वह पद और पदार्थका यथार्थ ज्ञाता था । वह अपने पिता बृहस्पतिसे कहने लगा—

कचने कहा—भगवन् ! सब धर्मोंका ज्ञान रखनेवाले पिताजी ! मैं इस संसाररूपी जालसे कैसे बाहर निकल सकता हूँ, यह आप बताइये ।

बृहस्पति बोले—पुत्र ! अनर्थरूप हजारों मगरोंके निवासस्थान इस संसार-सागरसे किसी प्रकारके उद्वेगके बिना किये गये सर्व-त्यागसे तत्काल ही प्राणी बाहर निकल जा सकता है ।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! अपने पिताका यह परम पवित्र वचन सुनकर कच सब कुछ परित्याग करके एकान्त वनमें चला गया । पुत्रके चले जानेसे बृहस्पतिको चित्तमें जरा भी उद्वेग नहीं हुआ; क्योंकि जो महान् होते हैं, उनका मन संयोग और वियोग—दोनोंमें सुमेरु पर्वतके सदृश अचल रहता है । वनमें जानेके अनन्तर उसे जब आठ वर्ष व्यतीत हो गये, तब किसी महारण्यमें उस कचने अपने पिताजीका दर्शन किया । कचने पहले अपने पिताजीकी विधिपूर्वक पूजा की, फिर उन्हें प्रणाम किया । बृहस्पतिने भी अपने पुत्रका आलिङ्गन किया । इसके बाद कचने अत्यन्त मधुर वाणीमें बृहस्पतिसे कहा—

कचने कहा—पिताजी ! मैंने जो सर्व-त्याग किया है, उसका आज यद्यपि आठवाँ वर्ष है, तथापि मुझे अभीतक निर्मल शान्ति प्राप्त नहीं हुई ।

श्रीवसिष्ठजी बोले — श्रीराम ! कच अरण्यमें इस प्रकार दीन वचन बोल ही रहा था कि 'सभीका त्याग करो' यों कहकर बृहस्पति आकाशमें जाकर अदृश्य हो गये । बृहस्पतिके चले जानेके अनन्तर कचने अपने शरीरपरसे वल्कल आदिका भी परित्याग कर दिया और शरत् कालके आकाशकी तरह वह दिगम्बर हो गया । वह अनावृत दिशाओंमें रहने लगा । उसका शरीर शान्त और सुन्न हो गया था तथा वह श्वासमात्र ले रहा था । तीन वर्षके बाद खिन्न-चित्त उसने किसी एक जंगलमें फिर अपने गुरु उन्हीं पिताजीका दर्शन किया । भक्तिसे उसने अपने पिताजीका पूजन-अभिवादन आदि किया । पिताने भी अपने पुत्रका आलिङ्गन किया । इसके अनन्तर कच दुःखित होकर गद्गद वाणीसे पूछने लगा ।

कचने कहा—पिताजी ! मैंने सबका त्याग कर दिया, कन्था, दण्ड, कमण्डलु आदिका भी त्याग कर दिया । तथापि अपने आत्मपदमें मेरी स्थिति नहीं हुई । अब मैं क्या करूँ ?

बृहस्पति बोले—पुत्र ! चित्त ही सब कुछ है; अतः उसीका त्यागकर तुम अपने स्वरूपमें स्थित हो जाओ । सर्वज्ञ लोग चित्तत्यागको ही सर्वत्याग कहते हैं ।

श्रीवसिष्ठजीने कहा- - श्रीराम ! पुत्रसे ऐसा कहकर बृहस्पति शीघ्रतासे आकाशमें उड़ गये । इसके अनन्तर अन्तःकरणसे खेद निकालकर वह कच त्यागके उद्देश्यसे चित्तकी खोज करने लगा । खोज करनेपर भी जब उसे चित्तकी प्राप्ति नहीं हुई, तब उसने विवेक-पूर्वक विचार किया कि 'देह आदि जो भी कुछ ये प्रसिद्ध पदार्थ हैं, वे तो चित्त नहीं कहे जा सकते और उनमें चित्त कहाँ रहता है, इसका भी निरूपण नहीं हो सकता । इसलिये बेचारे अपराधशून्य देह आदिका मैं व्यर्थ ही क्यों त्याग करूँ ! इस परिस्थितिमें अब चित्तरूप महाशत्रुको जाननेके लिये पिताजीके पास

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * बृहस्पतिपुत्र कचकी सर्वत्याग-साधनसे जीवन्मुक्ति * ४९३


ही जाता हूँ। उनसे जानकर मैं उसका त्याग करूँगा। तदनन्तर शीघ्र ही समस्त शोकोंसे मुक्त हो जाऊँगा।'

रघुवर ! ऐसा विचारकर वह कच स्वर्गमें चला गया तथा बृहस्पतिके पास जाकर उसने स्नेहपूर्वक वन्दना और प्रणाम किया। फिर, एकान्तमें उसने उनसे पूछा—'भगवन् ! चित्त क्या है ? इसका आप मुझे उपदेश दीजिये और चित्तका स्वरूप भी बतलाइये, जिससे कि मैं उसका त्याग करूँ।'

बृहस्पतिने कहा—आयुष्मन् ! चित्त-तत्त्वज्ञ महानुभाव अपने अहंकारको ही चित्त जानते हैं; अतः प्राणीका जो यह भीतरी अहंभाव है, वही चित्त कहा जाता है।

कचने कहा—तैतीस करोड़ देवताओंके गुरु ! महामते ! अहंभाव ही चित्तरूप कैसे हो सकता है, उसे मुझसे कहिये। योगियोंमें श्रेष्ठ ! मैं तो मानता हूँ कि इसका त्याग इतना असम्भव-सा है कि किसी प्रकार सिद्ध हो ही नहीं सकता। इसलिये इसका त्याग कैसे होगा ?

बृहस्पतिने कहा—पुत्र ! अहंकाररूप चित्तका त्याग तो फूलोंके मर्दनसे भी और नेत्रोंके मींचनेसे भी अत्यन्त सुलभ है; अतः इसके त्यागमें तनिक भी क्लेश नहीं है। तनय ! इसका त्याग जिस उपायसे सुगम होता है, वह उपाय मैं तुम्हें बतलाता हूँ, सुनो। जो वस्तु केवल अज्ञानसे उत्पन्न होती है, उसका परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे विनाश हो जाता है। पुत्र ! जैसे मिथ्या भ्रम कुछ वस्तु नहीं है, वैसे ही अहंकार भी वास्तवमें कुछ है ही नहीं। अज्ञानियोंकी दृष्टिसे यह उसी प्रकार असत् होता हुआ भी सत्-सा प्रतीत होता है, जिस प्रकार बालकोंकी दृष्टिसे असत् बेताल प्रतीत होता है। जैसे रज्जुमें भ्रान्तिसे बिना हुए ही साँप दिखायी पड़ता है, जैसे मरुभूमिमें बिना हुए ही जल दिखायी पड़ता है, वैसे ही अज्ञानसे अहंकार भी मिथ्या ही प्रतीत होता है। जैसे चन्द्रमा एक ही है; परंतु नेत्र-दोषसे मिथ्या ही दो दिखायी देता है, वैसे ही यह अहंकार अज्ञानसे ही दिखायी देता है। यह अज्ञानसे प्रतीत होता है; इसलिये तो असत्य नहीं है, और वास्तवमें है नहीं; इसलिये सत्य नहीं है। एक, आदि और अन्तसे रहित, चैतन्यमात्र, सभी ओरसे निर्मल, शरदाकाशसे भी अत्यन्त स्वच्छ सर्वानुभवरूप परमात्मा ही सत्य वस्तु है। सभी जगह और सभी प्राणियोंमें निरपेक्ष सब ओरसे प्रकाश करनेवाला वही एक चिन्मात्रस्वरूप परमात्मा उसी प्रकार प्रकाशित होता है, जिस प्रकार समुद्रकी चञ्चल अनन्त तरङ्गोंमें जल। विचारपूर्वक विचार करना चाहिये कि यह अहंकार नामकी कौन वस्तु है और किस प्रकार किससे उत्पन्न हुई है ? अज्ञानके कारण ही यह प्रतीत होता है; अतः मिथ्या है। इसलिये पुत्र ! यह देह आदि मैं हूँ, इस प्रकार परिमितताका और देश-कालसे परिच्छिन्न निष्कल विश्रामको

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छोड़ दो। तुम तो देश, काल आदि परिच्छेदोंसे शून्य, स्वच्छ, निरन्तर उदय-स्वभाव, व्यापक, सब पदार्थोंके रूपसे भासमान, निर्मल, अद्वय केवल सच्चिदानन्दमय हो। तुम सर्वदा ही अत्यन्त विशुद्ध, अनन्त, नित्य चिन्मय परमात्मा हो। कच! सत्स्वरूप तुम्हारा यह अहंभाव क्या वस्तु है? अर्थात् कुछ नहीं है।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम! देवगुरु बृहस्पतिसे अपनी आत्माको परमात्माके साथ एकरूपतासे सम्पन्न करानेवाला उत्तमोत्तम इस प्रकारका परम उपदेश पाकर उनका पुत्र कच जीवन्मुक्त हो गया। जिस प्रकार बृहस्पतिका पुत्र कच ममता और अहंकाररहित, अज्ञानमूलक जडचेतनकी ग्रन्थिसे रहित और परम शान्तबुद्धि होकर ब्रह्ममें स्थित रहा, उसी प्रकार तुम भी निर्विकार होकर स्थित रहो। इस अहंकारको तुम असत् समझो; क्योंकि मिथ्या खरगोशके सींगोंका त्याग और ग्रहण क्या? तुम एकदेशी नहीं हो। संकल्परहित, सर्वभावरूप सर्वव्यापी, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर, मनसे रहित केवल सच्चिदानन्दघन-स्वरूप हो। निष्पाप श्रीराम ! यह मायामय सम्पूर्ण जगत् अज्ञानसे तो सत्-सा दिखायी पड़ता है और ज्ञानसे वह सब ब्रह्मरूप ही है; क्योंकि यह अत्यन्त गाढ़, जो संसारकी माया है, उसका पार पाना यद्यपि अत्यन्त कठिन है, तथापि जैसे शरद् ऋतुसे कुहरा नष्ट हो जाता है, वैसे ही यह माया परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे तुरंत नष्ट हो जाती है।

श्रीरामजीने कहा—गुरुवर ! ज्ञातव्य तत्त्वके ज्ञानसे तृप्त हुआ भी मैं आपसे यह प्रश्न पूछता हूँ। भला बतलाइये तो सही कि कौन ऐसा प्राणी है, जो तृप्त होता हुआ भी सामने रखे हुए अमृतरूपी पेयको न पीयेगा? मुनिश्रेष्ठ ! मुझसे शीघ्र यह बतलाइये कि मिथ्यापुरुष नामकी कौन वस्तु है, जिसने सत्य वस्तु ब्रह्मको असत्य-सा बना रखा है और असत्य वस्तु समस्त जगत्‌को सत्य-सा बना डाला है?

श्रीवसिष्ठजी बोले—राघव ! मिथ्यापुरुषको जाननेके लिये यह सुन्दर हास्यप्रद आख्यायिका तुम सुनो, जो मेरे द्वारा कही जाती है। महाबाहो ! कोई एक माया-यन्त्रमय पुरुष था। वह केवल बालकके सदृश तुच्छबुद्धि, मूढ़ और अज्ञानसे आवृत था। वह किसी एक निर्जन एकान्त प्रदेशमें उत्पन्न हुआ था और उसी शून्य प्रदेशमें रहता था। वह वास्तवमें आकाशमें नेत्रदोषसे दिखायी पड़नेवाले केशोंके झुंड-सदृश और मरुभूमिमें मृगतृष्णाजलके सदृश मिथ्या ही था। वहाँ वृद्धिको प्राप्त हुए उस मिथ्यापुरुषके मनमें यह संकल्प हुआ कि मेरी प्रियसे प्रिय वस्तु आकाश है, अतः उसे कहीं-पर रखकर स्वयं मैं ही उसकी बड़े आदरसे रक्षा करूँ। इस प्रकार विचार करके आकाशकी रक्षाके लिये उसने एक घरका निर्माण किया। रघुनन्दन ! तदनन्तर उस घरके अंदर उसने यह आस्था बाँध ली कि यह आकाश मेरा है और इसकी मैंने रक्षा की है और उस गृहाकाशसे वह सन्तुष्ट हो गया। इसके अनन्तर कुछ कालके बाद वह उसका घर नष्ट हो गया। जब वह नष्ट हो गया, तब मिथ्यापुरुष इस प्रकार शोक करने लगा—'हा गृहाकाश, तुम नष्ट हो गये, अरे ! तुम एक ही क्षणमें कहाँ चले गये। हा हा ! तुम टूट गये। तुम बड़े अच्छे थे।'

इस प्रकार सैकड़ों बार शोक कर फिर उस दुर्बुद्धि मिथ्यापुरुषने वहाँपर आकाशकी रक्षा करनेके लिये एक कूपका निर्माण किया और उसी कूपाकाशकी रक्षामें तत्पर होकर संतुष्ट हो गया। कुछ समयके बाद उसका वह कूप भी नष्ट हो गया। जब कूपाकाशका नाश हो गया, तब वह महान् शोक-सागरमें निमग्न हो गया। कूपाकाशके लिये शोक कर चुकनेके अनन्तर उसने तत्काल ही एक घड़ेका निर्माण किया और घटाकाशकी रक्षामें तत्पर होकर संतुष्ट हो गया। रघुकुलश्रेष्ठ ! कालसे उसका वह घट भी नष्ट हो गया। भाग्यहीन जिस किसी दिशाका ग्रहण करता है, वही नष्ट हो जाती

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * बृहस्पतिपुत्र कचकी सर्वत्याग-साधनसे जीवन्मुक्ति * ४१५

है। घड़ेके आकाशका शोक कर लेनेके बाद उसने आकाशकी रक्षाके लिये कुण्डका निर्माण किया और पहले-की तरह ही कुण्डाकाशकी रक्षाके लिये तत्पर होकर संतुष्ट हो गया। कुछ कालके बाद उसका कुण्ड भी उसी प्रकार विनाशको प्राप्त हो गया, जिस प्रकार तेजसे अन्धकारका नाश हो जाता है। कुण्डाकाशके विषयमें भी उसने महान् शोक किया। कुण्डके आकाशका शोक करनेके बाद उसने आकाशकी रक्षाके लिये एक ऐसे घेरेका निर्माण किया, जिसमें चारों ओर कमरे तथा बीचमें एक बड़ा कमरा था, फिर उसीके आकाशकी रक्षामें तन्मय होकर वह संतुष्ट हो गया। जिसने अनेक प्रजाओंका ग्रास कर लिया है, समयपर वह काल इस घरको भी खा गया। उससे भी वह शोक-निमग्न हो गया। उस चतुःशाल घरके शोकके बाद उसने आकाशकी रक्षाके लिये मेघाकार कुसूल (कोठार) बनाया और फिर उसीके आकाशकी रक्षामें निरत हो संतुष्ट हो गया। उसके उस कुसूलको भी कालने वैसे अपहृत कर दिया, जैसे वायु मेघको अपहृत कर लेता है। उस कुसूल-विनाशके शोकसे वह अत्यन्त सन्तप्त हो गया। इस प्रकार घर, चतुःशाल, कुण्ड और कुसूल आदिसे आकाशकी रक्षा करते हुए उस मिथ्यापुरुषका यह कभी समाप्त न होनेवाला काल बीतता ही जाता था। श्रीराम! इस प्रकार गहन घर, कूप, कुण्ड आदि उपाधियोंसे आकाशको आत्मबुद्धिसे पकड़कर स्थित हुआ वह मिथ्यापुरुष गमनागमनकी आसक्तिसे मूढ़ और विवश होकर एक दुःखसे अति कठिन दूसरे दुःखमें आता और जाता रहता है।

श्रीरामचन्द्रजीने कहा—प्रभो! मिथ्यापुरुषके प्रसंगसे आपने जिस मायामय पुरुषका कथन किया, वह किस अभिप्रायसे किया है और उसके द्वारा किये गये आकाश-रक्षणका भी क्या अभिप्राय है, यह मुझसे कहिये।

श्रीवसिष्ठजी बोले—श्रीराम! सुनो। अभी जो मैंने मिथ्यापुरुषकी कथा तुमसे कही है, उसका यथार्थ तात्पर्य तुमसे प्रकट करता हूँ। रघुनन्दन! मैने मन्दकल्पनासे जिस मिथ्यापुरुषका उस कथामें उल्लेख किया है, उसे तुम अहंकार ही जानो। वह शून्य आकाशमें मायासे उत्पन्न हुआ है। जिस मायामय आकाशके एक कोनेमें यह जगत् स्थित है, वह स्वयं सृष्टिके आदिमें भी असमीचीन, असत् और शून्यरूप ही रहता है। उस मायाकाशके अंदर प्राणियोंसे अत्यन्त अगम्य परब्रह्म परमात्मा विराजमान हैं और उसी ब्रह्मरूप मायाकाशसे प्रारम्भमें अहंकारका वैसे ही उदय होता है, जैसे आकाशमे शब्द और वायुसे स्पन्दनका उदय होता है। यह अहंकार ही पूर्वोक्त कथाका मायापुरुष है और वही मिथ्यापुरुष है; क्योंकि मायासे जो अहंकार उत्पन्न हुआ है, वह असत्य एवं मिथ्यारूप ही है। कुँआ, कुण्ड, चतुःशाल, घड़ा आदि शरीरोंकी रचना कर मैने उनके सम्बन्धकी रक्षा की—यों अहंकारने ही आकाशमें संकल्प किया था। जगदाकाररूप विभ्रमोंसे यह अहंकार ही जीवात्माको मोहित करता है। उस व्यापक, शून्य, अनन्ताकाशस्वरूप ब्रह्ममें यह जगत् निश्चय ही मिथ्या है। उसीमें यह अहंकाररूप पुरुष मिथ्या ही सुख-दुःखोंका अनुभव करता हुआ स्थित था। श्रीराम! आकाशमें नाशवान्की रक्षा करते हुए उस मिथ्यापुरुषने घट आदिका निर्माण कर उनके आकाशोंका रक्षण करनेमें अनेक बारके क्लेशोंका ही अनुभव किया था। जो आत्मा है, वह तो सब प्रकारसे भी बड़ा है, परम शुद्ध है, अत्यन्त सूक्ष्म है, परम कल्याणरूप तथा शुभ है। उसको कौन पकड़ सकता है और कौन उसकी रक्षा कर सकता है? जैसे घट आदिके विनष्ट हो जानेपर घटस्थित आकाशका नाश नहीं होता, वैसे ही देहोंके नष्ट होनेपर भी नित्य जीवात्माका कभी विनाश नहीं होता; क्योंकि यह आत्मा शुद्ध, केवल, चिन्मय तथा अहंकारसे रहित है॥

४९६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

अत्यन्त सूक्ष्म तथा अहंकारसे रहित नित्य स्वप्रकाशरूप चेतन ही है; इसलिये आकाशके समान उसका नाश नहीं होता। वास्तवमें तो कहीं, किसी समय न कुछ उत्पन्न होता है और न मरता ही है, केवल ब्रह्म ही जगत्‌के रूपमें प्रकाशित हो रहा है। आदि, मध्य,और अन्तसे तथा उत्पत्ति और विनाशसे रहित वह परमात्मा एक, अद्वितीय, सत्य, परमपदस्वरूप और शान्तिमय है।

(सर्ग १११, ११२, ११३)


सब कुछ ब्रह्म ही है—इसका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! सृष्टिके आदिकालमें परब्रह्मसे यह संकल्प-विकल्पात्मक समष्टि मन उत्पन्न हुआ। वह उस परब्रह्ममें स्थित हुआ ही अनेक भिन्न-भिन्न कल्पनाओंका निमित्त बनकर आजतक विद्यमान है। जैसे फूलोंमें सुगन्ध, सागरमें बड़े-बड़े तरङ्ग और सूर्यमें किरणें स्वाभाविक ही रहती हैं, वैसे ही ब्रह्ममें मन भी स्वाभाविक ही रहता है। किंतु राघव ! जो पुरुष इन किरणोंकी आदित्यसे अलग भावना करता है, उस पुरुषके लिये ये किरणे, आदित्यसे अलग ही हैं। जिसने केयूरकी सुवर्णसे पृथक्रूपसे भावना की, उसकी दृष्टिमें सुवर्णसे पृथक् ही केयूर प्रतीत होता है; क्योंकि उसकी भावनामें केयूर सुवर्ण नहीं है। परंतु जिसने किरणोंकी आदित्य-स्वरूपसे ही भावना की, उसकी दृष्टिमें वे किरणें आदित्यरूप ही ठहरती हैं और वह यह कहता है कि आदित्य रश्मिभेदोंसे शून्य ही है यानी आदित्य और किरणोंका परस्पर कोई भेद नहीं है। जिसने तरङ्गकी जलभिन्नरूपसे भावना की, उसमें एकमात्र तरङ्ग-बुद्धि ही स्थित रहती है, जल-बुद्धि नहीं। किंतु जो पुरुष तरङ्गकी जलरूपतासे भावना करता है उसे सामान्य जल-बुद्धि ही होती है। ऐसा पुरुष जल और तरङ्गके भेदसे निर्मुक्त निर्विकल्पक कहा जाता है। जो पुरुष केयूर स्वर्णसे भिन्न नहीं है, ऐसी भावना करता है, वह सामान्य स्वर्ण-बुद्धिवाला भेदशून्य निर्विकल्प कहा जाता है। ज्वालापङ्क्ति अग्निसे भिन्न है, जो पुरुष ऐसी भावना करता है उसे अग्नि-बुद्धि उत्पन्न नहीं होती, केवल ज्वाला-बुद्धि ही रहती है।

किंतु ज्वालाकी पङ्क्ति अग्निसे भिन्न नहीं है, इस प्रकार जो भावना करता है उसको केवल अग्नि-बुद्धि ही रहती है और उसे निर्विकल्पक कहा जाता है। जो पुरुष निर्विकल्प है, वही महान् है। उसकी बुद्धि कभी क्षीण नहीं होती, सदा एकरस रहती है। उसने प्राप्तव्य वस्तु परमात्माको प्राप्त कर लिया। इसलिये वह सांसारिक पदार्थोंमें कभी नहीं फँसता। स्वप्रकाश स्वयं आत्मा ही अपने आप जब संकल्प करता है, तब वह आत्मा ही भिन्नकी तरह भासनेवाला संकल्पात्मक मन हो जाता है। फिर मन ही अपनी विश्वाकार आकृतिक़ी भावना कर लेता है। वह विश्वाकार संकल्पस्वरूप चित्त इस जगत्की जिस रूपसे कल्पना करता है, तत्क्षण हीं संकल्पोंसे वह तद्रूप हो जाता है। यह जो जगद्रूप विशाल आकार देखा जाता है, सब मनका संकल्प ही है। वह सत्य तो इसलिये नहीं है कि वह वास्तवमें संकल्परूप होनेके कारण मिथ्या है और सर्वथा सत्य इसलिये नहीं कहा जाता कि वह प्रतीत होता है। किंतु स्वप्नोंके सदृश अनिर्वचनीय ही उत्पन्न हुआ है; क्योकि वह स्वप्नके संसार-जालके समान है। जैसे साधारण प्राणीके मनका संकल्प विविध सामग्री-रचनाओंसे सुन्दर लगता है, वैसे ही हिरण्यगर्भका भी यह व्यापक मनका संकल्प सुन्दर लगता है। 'जगत् परब्रह्म-स्वरूप है' इस प्रकारकी भावना करनेपर यह जगत् ब्रह्ममें विलीन हो जाता है। वास्तवमें तो यदि देखा जाय, तो यह जगत् कुछ भी नहीं है। किंतु यदि इस जगत्को अपरमार्थतः देखा जाय, तो यह

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * महादेवजीके द्वारा महाकर्ता, महाभोक्ता, महात्यागीके लक्षण-निरूपण * ४१७

हजारों शाखा-प्रशाखाओंमें विभक्त हो जाता है। अतः तुम जो कुछ करते हो, उसे निर्मल चिन्मय ब्रह्म ही समझो; क्योंकि ब्रह्म ही जगत्‌के रूपमें वृद्धिको प्राप्त हो रहा है। इसलिये उस ब्रह्मसे भिन्न और कुछ भी नहीं है। (सर्ग ११४)


भृङ्गीशके प्रति महादेवजीके द्वारा महाकर्ता, महाभोक्ता और महात्यागीके लक्षणोंका निरूपण

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! किसी समयकी बात है कि सुमेरु पर्वतके अग्निसदृश उत्तरीय शिखर-पर अपने समस्त परिवारके साथ भगवान् शङ्कर विराजमान थे। अपने परिवारके साथ बैठे हुए उमापतिसे साधारण आत्मज्ञान रखनेवाले महान् तेजस्वी विनम्र भृङ्गीशने, जो वहींपर उपस्थित था, अञ्जलि बाँधकर पूछा—'महाराज ! इस क्षणभङ्गुर जगद्रूपी घरके अंदर विश्रामसुखसे किस आन्तरिक निश्चयका अवलम्बन करके मैं समग्र चिन्ताओंसे मुक्त होकर निश्चलरूपसे स्थित रह सकता हूँ ?'

भगवान् शङ्कर बोले—अनघ ! तुम समस्त शङ्काओंसे रहित होकर अविनाशी अचल धैर्यका अवलम्बन कर महाकर्ता, महाभोक्ता और महात्यागी हो जाओ।

भृङ्गीशने कहा—प्रभो ! ऐसे वे कौन-से लक्षण हैं, जिनकी प्राप्ति हो जानेपर पुरुष महाकर्ता, महाभोक्ता और महात्यागी कहा जा सकता है, उन्हें मुझसे भली-भाँति कहिये।

भगवान् शङ्कर बोले—महाभाग ! अहंता, पाप और मात्सर्यसे रहित जो मननशील पुरुष उद्वेगसे रहित हो शास्त्रविहित क्रियाओंका अनुष्ठान करता है, वह महाकर्ता कहा जाता है। जो कहींपर भी स्नेह नहीं रखता, जो साक्षीके सदृश निर्विकार रहता है और जो न्याययुक्त प्राप्त कार्यका निष्कामभावसे आचरण करता है, वह पुरुष महाकर्ता कहा जाता है। उद्वेग और हर्षसे रहित जो पुरुष निर्मल समबुद्धिसे शोकजनक परिस्थितियोंमें शोक नहीं करता और हर्षजनक परिस्थितियोंमें हर्ष नहीं करता, वह महाकर्ता कहा जाता है। जो ज्ञानवान् मुनि अपने प्रारब्धसे जिस समय जो भी कोई न्यायविहित कार्य प्राप्त हो जाय, उस समय उस कार्यको रागद्वेष-रहित हो करता है, वह महाकर्ता कहा जाता है। जन्म, स्थिति और विनाशमें तथा उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंमें जिसका मन सम ही रहता है, वह महाकर्ता कहा जाता है।

जो किसीसे द्वेष नहीं करता, जो किसीकी अभिलाषा नहीं करता और जो प्रारब्धके अनुसार न्याययुक्त प्राप्त हुए सारे पदार्थोंका उपभोग करता है, वह महाभोक्ता कहा जाता है। जो पुरुष अहंकारसे रहित और परमात्मामें स्थित होनेके कारण न्यायपूर्वक इन्द्रियोंसे विषयोंका ग्रहण करता हुआ भी ग्रहण नहीं करता, कर्मोंका आचरण करता हुआ भी आचरण नहीं करता एवं पदार्थोंका उपभोग करता हुआ भी उपभोग नहीं करता, वह महाभोक्ता कहा जाता है। जो पुरुष बुद्धिको विरसतासे रहित होकर साक्षीके सदृश समस्त लोकव्यवहारोंका किसी इच्छाद्वेषके बिना अनुभव करता है, वह पुरुष महाभोक्ता कहा जाता है। जैसे समुद्र नाना नदियोंके जलको सम-रूपसे ग्रहण करता है, वैसे ही जो मनुष्य समतासे बड़े-बड़े सुख-दुःखोंको समानरूपसे सहन करता है, वह महाभोक्ता कहा जाता है। जो पुरुष मधुर, खट्टे, नमकीन, तीते, मीठे, खारे, रूखे या सुस्वादु भोजनके प्राप्त अन्नको समान बुद्धिसे ग्रहण करता है—वह महाभोक्ता कहा जाता है।

४९८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

काम्य कर्म, निषिद्ध कर्म, सुख, दुःख, जन्म और मृत्युका जिसने विवेकपूर्वक सर्वथा त्याग कर दिया है, वह महात्यागी कहा जाता है। सम्पूर्ण इच्छाओं, समस्त संशयों, वाणी, मन और शरीरकी सभी चेष्टाओं तथा सम्पूर्ण सांसारिक निश्चयोंका जिस पुरुषने विवेक-पूर्वक सर्वथा त्याग कर दिया है, वह महात्यागी कहा जाता है। यह जितनी भी सम्पूर्ण दृश्यरूप मनकी कल्पना दिखायी दे रही है, उसका जिस पुरुषने अच्छी तरहसे त्याग कर दिया है, वह महात्यागी कहा जाता है।

'निष्पाप श्रीराम ! देवदेवेश भगवान् शङ्करने बहुत दिन पहले भृङ्गीशको इस तरहका उपदेश दिया था।

श्रीराम ! सदा प्रकाशमान, निर्मलस्वरूप, आदि और अन्तसे शून्य केवल परब्रह्म ही है, ब्रह्मसे अतिरिक्त कुछ भी पदार्थ नहीं है; क्योंकि इस संसारमें जो कुछ भी प्रतीत होता है, वह सब कुछ कल्पोंके कार्यका एकमात्र मूल कारण निर्विकार परमात्मस्वरूप परब्रह्म ही है। वह परमात्मा बड़े-बड़े अनेक सर्गोसे विशाल आकारवाला होनेपर भी वास्तवमें आकाशके समान निराकार ही है। कहींपर कुछ भी पदार्थ, फिर चाहे वह स्थूल हो, सूक्ष्म हो अथवा कारणरूप हो,—सदा एकरस परब्रह्मसे भिन्न किसी तरह नहीं हो सकता; इसलिये तुम 'मैं सद्रूप ब्रह्म हूँ,' इस प्रकारका अपने अंदर निश्चय करके स्थित रहो।

(सर्ग ११५)


सर्वथा विलीन हुए या विलीन होते हुए अहंकार-रूप चित्तके लक्षण

श्रीरामचन्द्रजीने कहा—सर्वधर्मज्ञ ! भगवन् ! अहंकार नामक चित्त जिस समय सर्वथा विलीन हो जाता है या विलीन होने लग जाता है, उस समयके वासनारहित अन्तःकरणका क्या स्वरूप होता है ?

श्रीवसिष्ठजी बोले—श्रीराम ! वासनारहित अन्तः-करणको बलपूर्वक उत्पन्न हुए भी—लोभ, मोह आदि दोष वैसे ही लिप्त नहीं कर सकते, जैसे कमलपत्रको जल लिप्त नहीं कर सकते। अहङ्कार नामक चित्त और पापके विलीन हो जानेपर पुरुष सदा शान्त प्रसन्नमुख रहता है। उस समय साधककी वासनाओंका समूह छिन्न-भिन्न-सा होकर धीरे-धीरे बिल्कुल क्षीण होने लग जाता है। क्रोध और मोहका क्षय होने लगता है। काम और लोभ चले जाते हैं। इन्द्रियाँ और दुःख विकसित नहीं होते। ये सुख-दुःख आदि प्रतीत होनेपर भी, तुच्छ होनेके कारण, उस साधकके मनको लिप्त नहीं कर सकते। चित्तके विलीन हो जानेपर उस श्रेष्ठ साधक पुरुषकी देवतागण भी प्रशंसा करते हैं। उस पुरुषके हृदयमें शीतल चाँदनीरूपी समता उत्पन्न होती है। ऐसा श्रेष्ठ साधक पुरुष उपशान्त, कमनीय, सेव्य, अप्रतिरोधी (दूसरेकी इच्छाका विघात न करनेवाला), विनीत, बलशाली और स्वच्छ श्रेष्ठ शरीरवाला होकर रहता है। जो बुद्धिकी तीक्ष्णतासे प्राप्त करने योग्य है और जिसकी प्राप्ति होनेपर समस्त आपत्तियाँ अस्त हो जाती हैं, उस परमात्म-वस्तुमें जो मनुष्य मोहके कारण प्रवृत्त नहीं होता, उस नराधमको धिक्कार है। श्रीराम ! दुःखरूपी रत्नोंकी खानि और जन्म-मरणरूप संसार-सागरके पार होनेकी इच्छावाले पुरुषको निरतिशयानन्दमय परमात्मामें नित्य निरन्तर समुचित विश्राम पानेके लिये 'मैं कौन हूँ' 'यह जगत् क्या है, परमात्मतत्त्व कैसा है ? इन तुच्छ भोगोंसे कौन-सा फल मिलेगा ?' इन प्रश्नोंपर विवेकपूर्वक विचार करना चाहिये। यही परम साधन है। इसलिये मनुष्यको उपर्युक्त साधनका आश्रय लेना चाहिये।

(सर्ग ११६)

निर्वाण-प्रकरण पू०]    * महाराज मनुका इक्ष्वाकुके प्रति उपदेश *    ४९९


महाराज मनुका इक्ष्वाकुके प्रति, 'मैं कौन हूँ, यह जगत् क्या है'—यह बताते हुए देहमें आत्मबुद्धिका परित्यागकर परमात्मभावमें स्थित होनेका उपदेश

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं— श्रीराम ! तुम्हारे वंशके आदिपुरुष इक्ष्वाकु नामक राजा जिस प्रकारके विवेकपूर्वक विचारसे मुक्त हो गये, उस विचारको तुम सुनो। अपने राज्यका परिपालन करते हुए इक्ष्वाकु नामक राजा किसी समय एकान्तमें जाकर अपने मनमें स्वयं यह विवेकपूर्वक विचार करने लगे कि 'बुढ़ापा, मृत्यु, क्षोभ, सुख, दुःख तथा भ्रमसे युक्त इस दृश्य-प्रपञ्चका हेतु क्या है।' इस प्रकार विचार करते हुए भी वे जब जगत्के कारणको न समझ सके, तब उन्होंने एक दिन ब्रह्मलोकसे आये हुए सभामें बैठे तथा पूजित हुए अपने पिता प्रजापति मनुसे पूछा।

इक्ष्वाकुने कहा— भगवन् ! आपकी दया ही आपसे पूछनेके लिये मुझे प्रेरित कर रही है। करुणानिधे ! 'यह सृष्टि कहाँसे आयी है, इसका स्वरूप कैसा है तथा कब किसने इसकी रचना की है ?' यह आप कहिये। भगवन् ! विस्तृत जालमें फँसे हुए पक्षीकी भाँति मैं इस विषम संसारजालसे किस प्रकार मुक्त हो सकूँगा ?'

मनु बोले— राजन् ! तुम्हारे अंदर सुन्दर विकासयुक्त विवेकका उदय हुआ है, तभी तुमने यह प्रश्न किया है। यह प्रश्न किया मिथ्या संसारजालका उच्छेद करनेवाला तथा सब प्रश्नोंका सार है। महीपते ! यह जो कुछ जगत् दिखायी दे रहा है, वस्तुतः कुछ भी नहीं है। यह आकाशमें प्रतीत होनेवाले गन्धर्वनगरकी भाँति तथा मरुस्थलमें प्रतीत होनेवाले जलकी भाँति मिथ्या है। किन्तु जो अविनाशी परब्रह्म है, वही 'सत्' और 'परमात्मा' इत्यादि नामोंसे कहा जाता है। उस परमात्मारूप दर्पणमें यह दृश्यरूप जगत् प्रतिबिम्बकी तरह प्रतीतिमात्र है। इसलिये वस्तुतः संसारमें न तो किसीका बन्धन है और न मोक्ष है। केवल एकमात्र सब विकारोंसे शून्य ब्रह्म ही है। जैसे समुद्रमें एक ही जल अनेक तरङ्गोंके रूपमें प्रतीत होता है, उसी तरह एक सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही जगत्के अनेक रूपोंमें प्रतीत होता है। उस ब्रह्मके अतिरिक्त और कुछ नहीं है, इसलिये राजन् ! तुम द्वन्द्व और शोकसे रहित होकर निर्भय-पदरूप परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाओ।

अज्ञानकी उपाधिसे युक्त जीव कर्मानुसार सुख-दुःख भोगते हुए अनेक योनियोंमें भ्रमण करते रहते हैं। किन्तु वास्तवमें सुख-दुःख और मोह आदि चित्तके धर्म ही होते हैं, आत्मामें नहीं। परमेश्वर न तो ग्रन्थोंके स्वाध्यायद्वारा और न गुरुके द्वारा ही दिखायी देता है, वह तो अपनी सुप्रसन्न-श्रद्धायुक्त पवित्र और स्थिर बुद्धिसे ही अपने आप दिखायी देता है। इसलिये जैसे मार्गमें राग-द्वेषरहित बुद्धिसे पथिक दौड़े जाते हैं, वैसे ही अपनी राग-द्वेषरहित बुद्धिसे ही इस अपनी इन्द्रिय आदिका अवलोकन करना चाहिये। अपनी बुद्धिमें देहादि पदार्थमात्रका दृश्य ही त्यागकर अपने अन्तःकरणको शान्तिमय बनाकर नित्य परमात्ममय हो जाओ। 'मैं ही देह हूँ' यह बुद्धि संसारमें फँसानेवाली है। इसलिये मुमुक्षु पुरुषोंको इस प्रकारकी बुद्धिको कभी नहीं अपनाना चाहिये। 'मैं सब पदार्थोंमें भी सूक्ष्मतर सच्चिदानन्दघन हूँ'— ऐसी जो निष्प्रपञ्च बुद्धि है, वह संसार-बन्धनसे छुड़ानेवाली है। जैसे केयूर, कड़े, कुण्डल आदि जाम्बूनदके भूषण सुवर्णके रूप ही हैं, वैसे इस प्रपञ्चके कार्यरूप जगत्का उपादान जो परमात्माका संकल्प होनेसे परमात्मा ही है। इसलिये अनात्म देहादि दृश्यसमूहोंमें आत्मभावका त्यागकर अन्तःकरणको वासनारहित करके, परमात्मामें अपना अनायास अखण्ड निवास हो। जैसे केवल जल-प्रवाह ही फेन, बुद्बुद और तरङ्ग आदिके रूपमें विभिन्न आकारोंमें दिखायी देता है, वैसे ही जगत् भी ब्रह्मरूप ही है।

५००* अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

सच्चिदानन्द ब्रह्म ही नाना प्रकारके आकारोंमें प्रकट होता है । वत्स ! तुम सङ्कल्परूपी कलङ्कोंसे रहित चित्तको परमात्मामें स्थापित करके कर्म करते हुए भी कर्त्तापनके अभिमानसे रहित, शान्त और सुखपूर्वक ब्रह्मके स्वरूपमें स्थित हुए राज्य-पालन करो ।

जैसे चन्द्र, सूर्य, अग्नि, तप्तलोह एवं रत्न आदिके प्रकाश, वृक्षोंके पत्ते तथा झरनोंके कण कल्पित हैं, वैसे ही इस ब्रह्ममें जगत् तथा बुद्धि आदि भी कल्पित ही हैं तथा वही ब्रह्म जगद्रूप होकर अज्ञानियोंके लिये दुःखप्रद हो रहा है। अहो ! विश्वको मोहमें डाल देनेवाली यह माया कैसी विचित्र है, जिसके कारण संपूर्ण अङ्गोंमें भीतर और बाहर सब जगह व्याप्त परमात्माको यह जीव नहीं देख सकता । इसलिये अहंकारसे रहित निर्मल सात्त्विक अन्तःकरणसे 'सभी पदार्थ निराकार सच्चिदानन्द ब्रह्म ही है'--ऐसी भावना करे । 'यह रमणीय है और यह रमणीय नहीं है'--इस प्रकारकी भावना ही तुम्हारे दुःखका कारण है। वह भावना जब सर्वत्र समदृष्टिरूपी अग्निसे जल जाती है, तब कहीं भी दुःखका नामोनिशान भी नहीं रह जाता । निर्वासनारूप अस्त्रसे प्रियाप्रिय-रूप विषमताको परम पुरुषार्थके द्वारा तुम स्वयं ही काट डालो । राजन् ! तुम निर्वासनारूप अस्त्रसे वासनारूप कर्म-वृक्षको काटकर सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर ब्रह्मभाव प्राप्तकर शोकरहित हो जाओ। पुत्र ! तुम सदसद्वस्तुके विवेकरूप विचारसे युक्त होकर समस्त कल्पनाओंसे रहित हो जाओ तथा समस्त विशाल भुवनोंको परमात्माके स्वरूपसे परिपूर्ण समझो । तदनन्तर जन्म-मरणरूप रोगसे रहित होकर परब्रह्म परमात्माके आनन्दका अनुभव करते हुए दीर्घकालतक स्थिर रहो और समता तथा शान्तिसे युक्त होकर निर्मथ चेतन ब्रह्मस्वरूप बन जाओ ।

( सर्ग ११७-११९ )


सात भूमिकाओंका, जीवन्मुक्त महात्मा पुरुषके लक्षणोंका एवं जीवको संसारमें फँसानेवाली और संसारसे उद्धार करनेवाली भावनाओंका वर्णन करके मनु महाराजका ब्रह्मलोकमें जाना

मनु महाराजने कहा-राजन् ! सबसे पहले शास्त्र और सज्जनोंकी संगतिसे अपनी बुद्धि शुद्ध और तीक्ष्ण करनी चाहिये । यही योगीके योगकी पहली भूमिका कही गयी है । इसका नाम 'श्रवण' भूमिका है। सच्चिदानन्द ब्रह्मके स्वरूपका निरन्तर चिन्तन करना 'मनन' नामक दूसरी भूमिका है । संसारके संगसे रहित होकर परमात्माके ध्यानमें नित्य स्थित रहना 'निदिध्यासन' नामक तीसरी भूमिका है। जिसमें वासनाका अत्यन्त अभाव है, वह ब्रह्म-साक्षात्कारसे अज्ञान आदि निखिल प्रपञ्चकी निवृत्ति करनेवाली 'विलापनी' नामकी चौथी भूमिका है। इस 'ब्रह्मवित्' पुरुषको संसार स्वप्नवत् प्रतीत होता है । विशुद्ध चिन्मय आनन्दस्वरूपकी प्राप्ति पाँचवीं भूमिका है । इस भूमिकामें जीवन्मुक्त पुरुष आधे सोये या जागे हुए पुरुषके सदृश रहता है। अर्धसुप्त पुरुषको संसारकी जैसी प्रतीति होती है, वैसी ही इस 'ब्रह्मविद्वर' जीवन्मुक्त पुरुषको होती है। छठी भूमिकामें एक विज्ञानानन्दघन परमात्माका ही अनुभव रहता है, संसारका अनुभव ही नहीं रहता । जैसे सुषुप्ति अवस्थामें मनुष्यको संसारकी प्रतीति नहीं होती, वैसे ही इस 'ब्रह्मविद्वरीयान्' योगीको जाग्रत् अवस्थामें भी संसारकी प्रतीति नहीं होती । इसे स्वसंवेदनरूप शान्तिमय 'तुर्यावस्था' कहते हैं । केवल विदेह-मुक्तिरूप अवस्था ही सप्तम भूमिका है। यह अवस्था समता, स्वच्छता और सौम्यतारूप है*। (इस


* शास्त्रसज्जनसम्पर्कैः प्रज्ञामादौ विवर्धयेत् ।
प्रथमा भूमिकैषोक्ता योगस्यैव च योगिनः ॥
विचारणाद्वितीया स्यात्तृतीयाऽसङ्गभावना ।
विलापनी चतुर्थी स्याद्वासनाविलयात्मिका ॥
शुद्धसंविन्मयानन्दरूपा भवति पञ्चमी ।
अर्धसुप्तप्रबुद्धाभो जीवन्मुक्तोऽत्र तिष्ठति ॥

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * सात भूमिकाका, जीवन्मुक्त महात्मा पुरुषके लक्षण आदिका वर्णन ५०१

तुर्यातीत सप्तम भूमिकामें स्थित योगीको 'ब्रह्मविद्वरिष्ठ' कहते हैं। इसमें गाढ़ सुषुप्तिकी तरह संसारका अत्यन्त अभाव हो जाता है। छठी भूमिकामें स्थित योगीको तो दूसरेके द्वारा जगाये जानेपर प्रबोध होता है। किंतु सातवीं भूमिकामें स्थित योगी मुर्देकी भाँति दूसरेके द्वारा जगाये जानेपर भी नहीं जागता; क्योंकि वह जीता हुआ ही मुर्देके तुल्य है। वह जीता है तो भी थोड़े समय ही जीता है। मरनेपर उसकी आत्मा ब्रह्ममें विलीन हो जाती है, तब उसको भी विदेहमुक्त कहते हैं। यह तुर्यातीत अवस्था परम मुक्तिरूप है।

इन सातोंमें जो पहलेकी तीन भूमिकाएँ हैं, वे जाग्रद्रूप ही हैं और जो चौथी भूमिका है वह तो स्वप्न ही कही गयी है; क्योंकि उसमें जगत् स्वप्नके सदृश प्रतीत होता है। आनन्दके साथ एकात्मभाव हो जानेसे पाँचवीं भूमिका अर्ध-सुषुप्तरूप है तथा अन्य पदार्थोंके ज्ञानसे रहित एकमात्र स्वसंवेदनरूप छठी भूमिका तुर्य शब्दसे कही जाती है। तुर्यातीत शब्दसे कहलानेवाली अवस्था सातवीं भूमिका सबसे अन्तिम है। यह अवस्था मन और वाणीसे परे है तथा केवल स्वप्रकाश परब्रह्मरूप ही है। राजन्! इस सप्तम भूमिकाके अवलम्बनसे सब दृश्योंको ब्रह्ममें विलीन करके तुम यदि दृश्यके चिन्तनसे रहित हो जाओगे तो निश्चय ही मुक्त हो जाओगे, इसमें सन्देह नहीं; क्योंकि जिसकी बुद्धि भोगों और सुख-दुःखोंसे लिपायमान नहीं होती, वही पुरुष जीवन्मुक्त है। 'मैं जीवन-मरण, सत्-असत् सबसे रहित हूँ'— इस प्रकार जो मनुष्य आत्माराम होकर स्थित रहता है, वह जीवन्मुक्त कहा गया है। मनुष्य व्यवहार करे चाहे न करे, गृहस्थ हो चाहे अकेला विचरण करनेवाला

स्वसंवेदनरूपा च षष्ठी भवति भूमिका।
आनन्दैकघनाकारा सुषुप्तसदृशस्थितिः ॥
तुर्यावस्थोपशान्ताथ मुक्तिरेवेह केवलम्।
समता स्वच्छता सौम्या सप्तमी भूमिका भवेत् ॥
(नि० पू० १२० । १–५)

यदि हो, परंतु 'मैं वास्तवमें कुछ भी नहीं हूँ, केवल सच्चिदानन्द ब्रह्म ही हूँ' ऐसा निश्चय करनेसे सदा शोकसे मुक्त ही रहता है। 'मैं निर्लेप, अजर, राग-रहित, वासनाओंसे शून्य, शुद्ध अनन्त चिन्मय ब्रह्म हूँ'—ऐसा मानकर पुरुष सदाके लिये शोकसे मुक्त हो जाता है। 'मैं अन्त और आदिसे रहित, शुद्ध-बुद्ध, अजर-अमर और शान्त हूँ तथा सभी पदार्थोंमें समरूपसे स्थित हूँ'— ऐसा मानकर पुरुष सदाके लिये शोकसे परे हो जाता है। क्षीण वासनासे युक्त हो या सर्वथा वासनासे रहित होकर जो पुरुष जिस अर्थका सेवन करता है वह अर्थ उस पुरुषके लिये न सुखजनक होता है और न दुःखजनक ही होता है। अनघ ! वासनारहित बुद्धिसे जो कर्म किया जाता है, वह कर्म जले हुए बीजके सदृश रहता है। वह फिर अङ्कुर उत्पन्न नहीं करता अर्थात् भावी जन्मको देनेवाला नहीं होता। देह, इन्द्रिय आदि जो भिन्न- भिन्न करण हैं, उन्हींके द्वारा कर्म किये जाते हैं। ऐसी स्थितिमें जीवात्मा कर्ता नहीं है, इसलिये भोक्ता भी नहीं है। यह परमात्म-विषयक ज्ञानकी वृत्ति यदि भीतर एक बार उत्पन्न हो जाय तो उर्वराभूमिमें बोये गये धानके सदृश अनिवार्यरूपसे दिन-पर-दिन बढ़ती ही जाती है।

राजन्! व्यष्टिचेतनको जबतक विषयभोगकी अभिलाषा बनी रहती है, तभीतक उसकी 'जीव'-संज्ञा है। यह अभिलाषा भी अज्ञानके कारण ही है। जब यथार्थ ज्ञानसे विषयभोगकी अभिलाषा नष्ट हो जाती है, तब यह व्यष्टि- चेतन जीवत्वरहित और निर्विकार होकर ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। राजन् ! कर्मानुसार ऊपरके लोकसे नीचेके लोकमें तथा नीचेके लोकसे ऊपरके लोकमें दीर्घकालतक आवागमन करते हुए तुम संसाररूपी अरहट्टकी चिन्तारूपी रज्जुमें घड़ेके सदृश मत बनो। 'ये पुत्र-कलत्र आदि मेरे हैं और मैं इन पुत्र-कलत्र आदिका हूँ' इस प्रकारके व्यवहाररूपी दृढ़ भ्रमका जो शठ मोहसे सेवन करते हैं, वे नीचीसे भी नीची योनिको

५०२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

प्राप्त होते हैं। 'पुत्र-कलत्र आदिका मैं सम्बन्धी हूँ और पुत्र, कलत्र आदि परिवार मेरा सम्बन्धी है तथा मैं ऐसा हूँ' इस प्रकारके मोहको जिन लोगोंने बुद्धिपूर्वक छोड़ दिया है, वे महानुभाव ऊँचेसे भी ऊँचे लोकको प्राप्त होते हैं। इसलिये राजन्! तुम अपने आप ही प्रकाशित होनेवाले चिन्मय परमात्माका शीघ्र ही आश्रय लेकर स्थित हो जाओ और समस्त जगत्‌को परिपूर्ण अनन्त विज्ञानानन्दघनरूप ही देखो। जिस समय तुम इस प्रकारके सर्वव्यापी, पूर्ण, चिन्मय परमात्माके स्वरूपको यथार्थरूपसे जान जाओगे, उसी समय संसारसे तर जाओगे और परब्रह्म हो जाओगे; क्योंकि जो पुरुष विज्ञानानन्दघन-स्वरूप हो गया है, जो संसाररूपी मृत्युसे पार हो चुका है और जिसका चित्त विलीन हो गया है, उस महापुरुषको जो परमानन्द प्राप्त होता है, उसकी उपमा किस आनन्दसे दी जा सकती है? इस परमात्माके स्वरूपको प्राप्त करनेपर अविद्या शान्त हो जाती है। फिर, उसके लिये ब्रह्मकी प्राप्तिके सिवा मोक्ष नामका न कोई देश है, न कोई काल है और न कोई स्थिति ही है; क्योंकि यह जो वासनारूपी अविद्या है, वह अहंकाररूपी मोहके विनाशसे विलीन हो जाती है और अविद्याका यह अभाव ही प्रसिद्ध मोक्ष है। जब योगीपुरुषकी अविद्या नष्ट हो जाती है, तब उसकी नाना प्रकारके शास्त्रार्थोंके विचारकी चञ्चलता शान्त हो जाती है। काव्य, नाटक आदि विषयोंकी उत्कण्ठा नष्ट हो जाती है और उसके सारे विकल्प-विभ्रम विलीन हो जाते हैं। वह केवल शाश्वत और सम परमात्मस्वरूप होकर सुखपूर्वक स्थित रहता है।

जो वाणीसे अतीत ब्रह्ममें स्थित है तथा विषय-कामनासे रहित है, वह पुरुष संसारमें परम शोभासे सम्पन्न है। वह गम्भीर, प्रसन्न तथा निरन्तर परमात्माके आनन्दमें मत्त योगी स्वयं ही अपने आत्मस्वरूप परब्रह्ममें रमण करता रहता है। वह सम्पूर्ण कर्मोंके फलोंका त्याग करनेवाला, ब्रह्मानन्दमें नित्य तृप्त और संसारके आश्रयसे रहित योगीपुरुष पुण्य-पाप और हर्ष-शोक आदि विकारोंसे लिपायमान नहीं होता, जनसमूहमें विचरण करता हुआ भी वह महाज्ञानी अपनी देहके छेदन या पूजनसे शोक या हर्षका अनुभव नहीं करता। उस ब्रह्मज्ञानी पुरुषसे प्राणियोंको उद्वेग नहीं होता। वह भी दूसरे प्राणियोंकी प्रतिकूल चेष्टासे उद्वेगवान् नहीं होता। वह ज्ञानीपुरुष अपने शरीरका किसी तीर्थमें त्याग कर दे या किसी चाण्डालके घरमें त्याग कर दे अथवा कभी भी शरीरका त्याग न करे या वर्तमान क्षणमें ही त्याग कर दे, फिर भी वह ज्ञानप्राप्तिकालमें पहलेसे ही अन्तःकरणसे रहित और जीवन्मुक्त हो चुका है। अहंकारकी भ्रान्ति बन्धनकारक है और ज्ञानसे अहंकारका नाश होकर मोक्ष-की प्राप्ति होती है। विभूति और वैभव चाहनेवाले पुरुष-को प्रयत्नपूर्वक उपयुक्त ज्ञानी महात्मा पुरुषकी पूजा, स्तुति, नमस्कार, दर्शन और अभिवादन करना चाहिये। प्रिय पुत्र ! जो सांसारिक दोषोंसे सर्वथा रहित हैं, उन जीवन्मुक्त आत्मज्ञानी सज्जनोंकी श्रद्धाभक्तिपूर्वक सेवा-पूजा करनेसे जो परम पवित्र पद प्राप्त होता है, वह न तो यज्ञों और तीर्थोंसे प्राप्त होता है एवं न तपस्याओं तथा दानोंसे ही।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं - श्रीराम ! यों कहकर मनु-भगवान् ब्रह्मलोकको चले गये और इक्ष्वाकु भी उस बोधरूप दृष्टिका अवलम्बन करके स्थिर हो गये।

(सर्ग १२०-१२२)

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * श्रीवसिष्ठजीके द्वारा जीवन्मुक्त पुरुषकी विशेषता आदिका प्रतिपादन * ५०३


श्रीवसिष्ठजीके द्वारा श्रीरामचन्द्रजीके प्रति जीवन्मुक्त पुरुषकी विशेषता, रागसे बन्धन और वैराग्यसे मुक्ति तथा तुर्यपद और ब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—आत्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ भगवन् ! ऐसा होनेपर श्रेष्ठबुद्धि आत्मज्ञानी जीवन्मुक्त पुरुषमें अन्य सिद्धोंकी अपेक्षा कौन-सी विशेषता होती है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! जीवन्मुक्त ब्रह्मज्ञानी पुरुषकी बुद्धि सच्चिदानन्द परमात्मामें ही दृढ़रूपसे जम जाती है । यही कारण है कि वह नित्यतृप्त शान्तचित्त पुरुष परमात्म-स्वरूपमें ही स्थित रहता है । मन्त्र, तप एवं तन्त्रकी सिद्धिसे युक्त सिद्धोंके द्वारा प्राप्त की गयी जो आकाशगमन आदि सिद्धियाँ हैं, उनमें कौन-सी अपूर्व ( महत्त्वकी ) विशेषताकी बात है ? मन्त्रसिद्धि आदिसे युक्त उन सिद्धोंने प्रयत्नपूर्वक साधन कर जिन अणिमादि सिद्धियोंकी प्राप्ति की है, उनमें ब्रह्मज्ञानी पुरुष कोई विशेषता नहीं समझता । उस जीवन्मुक्त महात्मामें यही विशेषता है कि वह मूढ़बुद्धि अज्ञानी पुरुषोंके समान नहीं रहता । उस महाबुद्धिका मन सभी वस्तुओंमें आसक्तिके परित्यागके कारण रागरहित तथा निर्मल ही बना रहता है और वह कभी भी विषयभोगोंमें नहीं फँसता है । जिसका स्वरूप समस्त बाहरी चिह्नोंसे रहित है तथा तत्त्वज्ञानसे दीर्घकालिक सांसारिक भ्रमकी निवृत्ति हो जानेके कारण जो परम शान्तिको प्राप्त हो चुका है, उस ज्ञानी महापुरुषमें काम, क्रोध, विषाद, मोह, लोभ आदि आपत्तियोंका नित्य अत्यन्त अभाव ही रहता है ।

प्रिय श्रीराम ! महासर्गके आरम्भमें प्राणी उस परमात्मासे निकलकर अपने अपने कर्मोंके अनुसार अनेक प्रकारके जन्मोंका अनुभव करते हैं । परमात्मासे निकलनेके बाद उन जीवोंके अपने-अपने जो कर्म हैं वे ही सुख और दुःखके कारण होते हैं तथा अपनी-अपनी समझके अनुसार उत्पन्न हुआ जो संकल्प है वही शुभाशुभ कर्मोंका कारण होता है । निष्पाप श्रीराम ! ये इन्द्रियाँ जिस-जिस विषयकी ओर निरन्तर दौड़ती हैं, उस-उस विषयमें पुरुष रागके द्वारा बँध जाता है । इसलिये उन विषयोंमें राग न करनेवाला पुरुष ही मुक्त होता है । अतएव तृणसे लेकर देहादि शरीरतकके जितने स्थावर-जङ्गमस्वरूप विनाशशील पदार्थ हैं, उनमें तुमको रुचि नहीं करनी चाहिये । तुम जो कुछ करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ हवन करते हो और जो कुछ दान करते हो, उन सब क्रियाओंमें तुम वास्तवमें न कर्ता हो और न भोक्ता हो; क्योंकि तुम उन सबसे मुक्त और शान्तस्वरूप हो । जो महात्मा पुरुष हैं, वे न तो अतीतके विषयमें शोक करते हैं और न भविष्यके विषयमें चिन्ता ही करते हैं । वे तो वर्तमानकालमें जो कुछ न्याययुक्त कर्म प्राप्त हो जाता है, उसीका उचितरूपमें सम्पादन करते हैं । श्रीराम ! तृष्णा, मोह, मद आदि जितने त्याज्य भाव हैं वे सब मनमें ही स्थित रहते हैं, इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको अपने विवेक-विचारयुक्त मनके द्वारा ही मनसहित उनका विनाश कर देना चाहिये; क्योंकि जैसे अति तीक्ष्ण लोहेसे लोहा काटा जाता है, वैसे ही सब भ्रमोंकी शान्ति-के लिये अति तीक्ष्ण विवेक-विचारयुक्त मनसे दोषसहित मन काटा जाता है ।

श्रीरामचन्द्रजीने कहा—मुनिनायक ! जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओंमें व्यापक और अनवच्छिन्न जो तुर्यरूप है, उसका विशेषरूपसे विवेचन करते हुए बतलाइये ।

श्रीवसिष्ठजी बोले—श्रीराम ! जो असक्त, सम और स्वच्छ स्वरूपस्थित है वही तुर्य है । जिसमें जीवन्मुक्त पुरुषोंकी स्थिति है, जो स्वच्छ, समरूप और शान्त है तथा जो व्यवहारकालमे साक्षीरूप है, वही तुर्यावस्था कही

५०४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

जाती है। संकल्पोंका अभाव रहनेके कारण यह अवस्था न जाग्रत् है, न स्वप्न है और अज्ञानका अभाव होनेसे यह न सुषुप्त ही है अर्थात् यह इन तीनों अवस्थाओंसे अतीत है। ज्ञानके द्वारा सामने दिखायी देनेवाले इस जगत्की जो निवृत्ति है, परमात्मामें स्थित एवं भलीभाँति प्रबुद्ध हुए ज्ञानी पुरुषोंकी उसी अवस्थाको तुर्यपद कहते हैं। अहङ्कारका त्याग होनेपर और चित्तके विलीन हो जानेपर जब समताकी उत्पत्ति हो जाती है, तब उसे तुर्यावस्था कहते हैं।

श्रीराम ! इसके अनन्तर अब तुम्हें मैं एक दृष्टान्त बतला रहा हूँ, उसे सुनो। किसी एक विस्तृत घने जंगलमें महामौन धारण करके बैठे हुए किसी एक अद्भुत मुनिको देखकर एक व्याधने उनसे पूछा—'मुने मेरे बाणके द्वारा घायल एक मृग इधर आया था, वह कहाँ चला गया ? इस प्रकारका उस व्याधका प्रश्न सुनकर उस मुनिने उस व्याधको उत्तर दिया—'सखे ! हम जंगलके निवासी मुनि समता और शीलवान् होते हैं। व्यवहारका कारण जो अहंकार है, वह हमलोगोंमें नहीं है। सम्पूर्ण इन्द्रियोंका कार्य अकेला अहङ्काररूप मन ही करता है और वह मेरा मन निःसन्देह चिरकालसे विलीन हो चुका है। जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति नामक किसी भी अवस्थाको मैं नहीं जानता। इन अवस्थाओंसे अतीत एकमात्र तुर्यपदमें ही, जहाँ दृश्यका अभाव है, मैं स्थित रहता हूँ।' रघुनन्दन ! उस मुनिश्रेष्ठके ऐसे वचन सुनकर वह व्याध उनके अर्थको न समझकर अपनी अभीष्ट दिशाकी ओर चला गया। इसीलिये मैं कहता हूँ कि महाबाहो ! तुर्यसे श्रेष्ठ अन्य कोई अवस्था नहीं है। कल्पनासे रहित सच्चिदानन्द परमात्मा ही तुर्य है और वही यहाँ विद्यमान है, उसके सिवा अन्य कुछ नहीं है;

क्योंकि जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—ये तीनों अवस्थाएँ चित्तका ही विकार होनेसे उसका स्वरूप है। जाग्रत् अवस्थाका चित्त घोर है, स्वप्न अवस्थाका चित्त शान्त है और सुषुप्त अवस्थाका चित्त मूढ़ है। जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओंसे रहित हुआ चित्त 'मृत' है। जो 'मृत' चित्त है, उसमें एकमात्र सत्त्व ही सम-रूपसे स्थित रहता है। इसीका समस्त योगीजन बड़े यत्नके साथ सम्पादन करते हैं और मुक्त हो जाते हैं।

समस्त दृश्य-जगत्का बाध करना ही सम्पूर्ण अध्यात्मशास्त्रोंका परम सिद्धान्त है। वहाँ न तो अविद्या है और न माया ही है; किंतु एक अद्वितीय, क्रियारहित शान्त विज्ञानानन्दघन परब्रह्म ही है। जो शान्त, चेतन, स्वच्छ, सर्वत्र एकरूपसे विद्यमान तथा सर्वशक्तिसम्पन्न 'ब्रह्म' नामसे कहा गया है, उसे अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार निर्णय करके कोई शून्य, कोई विज्ञानमात्र और कोई ईश्वररूप कहते हुए आपसमें विवाद किया करते हैं। मनुष्यको रमणीय या अरमणीय वस्तुको देखकर उनमें समभावसे स्थित रहना चाहिये। बस, इतने ही अपने साधनसे यह संसार जीत लिया जाता है। सुख या दुःख अथवा सुख-दुःख-मिश्रित पदार्थके प्राप्त होनेपर उनकी ओर ध्यान नहीं देना चाहिये। बस, इतने ही अपने साधनसे वास्तविक अक्षय अनन्त सुखरूप परमात्मा-की प्राप्ति हो जाती है। जिसने तीनो लोकोंकी सभी वस्तुओंके साररूप परमात्माका ज्ञान कर लिया है, जो शोभायमान तथा अमृतमय है और जिसका अन्तःकरण पूर्ण चन्द्रमण्डलके सदृश शान्त है, ऐसा परमपदमें स्थित ज्ञानी महात्मा पुरुष विज्ञानानन्दघन परमात्माको प्राप्त करता है। वह कर्मोंको करता हुआ भी कुछ नहीं करता।

(सर्ग १२३—१२५)

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * योगकी सात भूमिकाओंका अभ्यासक्रम और लक्षण * ५०५

योगकी सात भूमिकाओंका अभ्यासक्रम और लक्षण, योगभ्रष्ट पुरुषकी गति एवं महान् अनर्थकारिणी हथिनिरूप इच्छाके स्वरूप और उसके नाशके उपाय

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा— मुने ! सातों योगभूमिकाओंका अभ्यास कैसे किया जाता है तथा प्रत्येक भूमिकामें योगीके चिह्न किस तरहके होते हैं ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा— रघुनन्दन ! जीव चौरासी लाख योनियोंमें घूमता हुआ अन्तमें मनुष्य-जन्ममें भाग्योदय होनेपर विवेकी बन जाता है । 'अहो ! संसारकी यह व्यवस्था बिल्कुल असार है । इस व्यवस्थासे मुझे क्या प्रयोजन है ? इन व्यर्थ कर्मोंसे ही मैं अपना दिन क्यों बिता रहा हूँ ? मैं वैराग्यवान् बनकर किस तरह संसार-सागरको तैर जाऊँ'—इस प्रकारके विचारमें जब सद्बुद्धि प्राणी तत्पर होता है, तब उसके हृदयमें भोगों और सांसारिक सङ्कल्पोंमें हर समय वैराग्य रहता है । वह सत्सङ्ग, स्वाध्याय, ईश्वरोपासना आदि उत्तम क्रियाओंका अनुष्ठान करता है और उन्हींमें प्रसन्न रहता है । तुच्छ व्यर्थ चेष्टाओंमें उसे निरन्तर वैराग्य रहता है । वह दूसरोंके दोषोंको प्रकट नहीं करता और स्वयं यज्ञ, दान, तप, सेवा-पूजा आदि पुण्य कर्मोंका ही सेवन करता है । वह किसीके भी मनमें उद्वेग न पहुँचानेवाले शास्त्रविहित विनययुक्त कर्मोंका आचरण करता है, शास्त्रविपरीत कर्मसे सदा डरता रहता है और सांसारिक विषयभोगोंकी कभी अभिलाषा नहीं करता । वह स्नेह और प्रणयसे पूर्ण, कोमल, सत्य, प्रिय और हितकारक तथा देश-कालोचित वचन बोलता है । वह मन, कर्म एवं वाणीसे सत्पुरुषोंका संग और सेवा करता है । जिस-किसी जगहसे ज्ञानदायक शास्त्रोंको प्राप्त करके उनका विवेक-विचारपूर्वक स्वाध्याय करता है । संसार-सागरको तैर जानेके लिये इस प्रकारके विचारसे सम्पन्न पुरुष प्रथम 'शुभेच्छा' नामक भूमिकाको प्राप्त होता है । इसमें उसे आत्मोद्धारके सिवा और कोई भी इच्छा नहीं रह जाती । इसीको 'श्रवण' भूमिका भी कहते हैं ।

इसके बाद अधिकारकी प्राप्ति होनेपर वह 'विचार' नामक दूसरी योगभूमिकामें प्रवेश करता है । उस समय वह श्रुति, स्मृति, सदाचार, धारणा, ध्यान और कर्मोंमें तत्पर रहनेवाले पुरुषोंमेंसे, जिन्होंने अध्यात्म-शास्त्रोंकी प्रशस्त व्याख्या करनेके कारण अच्छी ख्याति प्राप्त कर ली है, उन श्रेष्ठ विद्वानोंका आश्रय लेकर उनके उपदेशानुसार साधन करता है । वह आगमशास्त्रका श्रवण करके कार्य और अकार्यके स्वरूपको तत्त्वतः जान लेता है । वह मद, अभिमान, मात्सर्य, मोह और लोभको उसी तरह छोड़ देता है, जिस तरह साँप केंचुलको । उपर्युक्त यथार्थ निश्चयसे युक्त पुरुष सत् शास्त्र, गुरु और सज्जनोंकी सेवासे ब्रह्मविषयक रहस्यको विवेक-विचार-पूर्वक यथार्थरूपसे पूर्णतया जान लेता है और उसके अनुसार मनन करता है । वह अध्यात्मविषयक शास्त्रोंके वाक्यार्थमें अपनी बुद्धिको निश्चलतापूर्वक स्थापित करता है, तपस्वियोंके आश्रमोंमें निवास करता है, अध्यात्मशास्त्रोंकी कथाओंका मनन करता है तथा निन्दनीय संसारके विषय-भोगरूप पदार्थोंसे वैराग्य करके पत्थरकी चट्टानरूपी शय्यापर आसीन हो अपनी आयु बिताता है । अध्यात्म-विषयक सत्-शास्त्रोंके अध्ययन-मननरूप अभ्याससे तथा निष्काम पुण्यकर्मोंके अनुष्ठानसे उस पुरुषको अध्यात्मविषयक यथार्थ दृष्टि प्राप्त हो जाती है । इस भूमिकाका नाम 'विचारणा' है । इसीको 'मनन' भी कहते हैं ।

तीसरी भूमिकामें पहुँचकर विवेकी पुरुष दो प्रकारके असङ्गका अनुभव करता है । श्रीराम ! तुम उसके इस भेदको सुनो । यह असङ्ग दो तरहका है--एक सामान्य और दूसरा श्रेष्ठ (विशेष) । 'मैं न कर्ता हूँ और न भोक्ता ही; मैं सांसारिक कर्मोंके लिये बाध्य नहीं हूँ और न दूसरोंके लिये बाधक हूँ।' इस प्रकारके निश्चयसे

५०६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

विषयभोगोंकी आसक्तिसे रहित होना ही सामान्य असङ्ग है। 'सुख या दुःखकी प्राप्ति पूर्वकर्मके अनुसार निश्चित और ईश्वरके अधीन है अर्थात् ईश्वरके विधानके अनुसार होती है । इसमें मेरा कर्तृत्व कैसा ? ये विस्तृत विषयभोग अन्तमें संताप देनेवाले होनेके कारण महारोग हैं तथा ये सांसारिक सारी सम्पत्तियाँ परम आपत्तियाँ हैं । संयोगका अन्तमें वियोग निश्चित है और ये मनके सारे विकार बुद्धिकी व्याधियाँ हैं। सब पदार्थोंको ग्रास बना लेनेके लिये काल सदा तैयार रहता है।' इस तरह अध्यात्मविषयक वचनोंके अर्थमें संलग्र चित्तवाले पुरुषकी सम्पूर्ण पदार्थोंमें जो आन्तरिक मिथ्यात्वकी भावना है, वह भी सामान्य असङ्ग कहलाता है । इस पूर्वोक्त अभ्यासयोगसे, महापुरुषोंकी संगतिसे, दुर्जनोंकी संगतिके त्यागसे, आत्मज्ञानके प्रयोगसे तथा लगातार अभ्यासयोगद्वारा अपने पुरुष-प्रयत्नसे संसारसागरके पार, सबके सार, परम कारणभूत परमात्माके ध्यानकी स्थिति हस्तामलकवत् दृढ़रूपसे खूब स्पष्ट हो जानेपर जो नाम-रूपकी भावनासे रहित होकर 'न मैं कर्ता हूँ, न ईश्वर कर्ता है, न प्रारब्ध कर्ता है'—यों शान्त और मौनरूपसे स्थित रहना है वही श्रेष्ठ (विशेष) असङ्ग कहलाता है। तथा जो शान्त, आदि-अन्तसे रहित सुन्दर सच्चिदानन्दघन ब्रह्म है वही श्रेष्ठ असङ्ग कहा जाता है । यही श्रेष्ठ असङ्ग नामक तीसरी भूमिका है। इसीको 'निदिध्यासन' भी कहते हैं। इस भूमिकामें स्थित पुरुष सम्पूर्ण संकल्पोंकी कल्पनाओंसे शून्य होकर परमात्माके ध्यानमें स्थित हो जाता है ।

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—भगवन् ! असत्कुलमें उत्पन्न, कामोपभोगमें ही प्रवृत्त, अधम तथा योगी महात्माके सङ्गसे रहित मूढ़ मनुष्यका उद्धार कैसे होगा ? तथा पहली, दूसरी, तीसरी भूमिकामें आरूढ होकर मरे हुए प्राणीकी कैसी गति होती है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! प्रवृद्ध रागादि दोषों-वाले मूढ़ पुरुषको सैकड़ों जन्मोंके बाद जबतक काकतालीय न्यायसे या महापुरुषोंके सङ्गसे वैराग्य उत्पन्न नहीं हो जाता, तबतक उसका यह विस्तृत संसार रहता ही है अर्थात् बिना वैराग्यके उसका उद्धार होना कठिन है। वैराग्य उत्पन्न हो जानेपर प्रथम भूमिकाका उदय प्राणीको अवश्य होता है और तदनन्तर उसका संसार नष्ट हो जाता है, यही शास्त्रोंका परम सिद्धान्त है ! प्रथम आदि भूमिकाओंमें पहुँचकर मरनेवाले प्राणीका भूमिकाओंके अनुसार ही पूर्वजन्मका दुष्कृत नष्ट हो जाता है। तदनन्तर वह योगी देवताओंके विमानोंमें, लोकपालोंके नगरोंमें तथा सुमेरु पर्वतके वन-कुञ्जोंमें, अप्सराओंके साथ रमण करता है। उसके बाद पूर्वजन्ममें किये गये पुण्यों और पापोंका भोगसमूहोंके द्वारा नाश हो जानेपर वे योगी लोग पृथ्वीपर पवित्र, गुणवान् और लक्ष्मीवान् सज्जनोंके घरमें जन्म लेते हैं और वहाँ जन्म लेकर वे लोग पूर्वजन्मके योग-साधनके संस्कारोंके अनुसार योगका ही साधन करते हैं। वहाँपर पूर्व जन्ममें की गयी भावनाओंसे अभ्यस्त हुए योगभूमिकाओंके क्रमका स्मरण करके वे बुद्धिमान् लोग आगेके भूमिका-क्रमका भलीभाँति अभ्यास करने लग जाते हैं।

श्रीराम ! ये पूर्वोक्त तीनों भूमिकाएँ जाग्रत् कही गयी हैं; क्योंकि इन भूमिकाओंमें यथार्थ भेदबुद्धि रहनेसे यह सम्पूर्ण दृश्यसमूह उस जाग्रत्कालकी तरह ही दिखायी पडता है। इन तीनों भूमिकाओंमें योगयुक्त पुरुषोंमें केवल आर्यता (श्रेष्ठता) का उदय होता है, जिसे देखकर मूढ़बुद्धि पुरुषोंको भी मुक्त होनेकी अभिलाषा उत्पन्न हो जाती है। जो मनुष्य शास्त्रविहित कर्तव्य-कर्मोंका भलीभाँति सम्पादन करता है तथा शास्त्र-निषिद्ध कर्मोंको सर्वथा नहीं करता है एवं सदाचारमें स्थित रहता है, वह आर्य कहा गया है । श्रेष्ठ पुरुषोंके द्वारा आचरित, शास्त्रोक्त तथा मनको प्रिय और हितकर यथोचित व्यवहारोंको जो ग्रहण करता है, वह आर्य कहा गया है।

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * योगकी सात भूमिकाओंका अभ्यासक्रम और लक्षण * ५०३

योगीकी वही आर्यता प्रथम भूमिकामें अङ्कुरित, द्वितीय भूमिकामें विवेकके द्वारा विकसित तथा तृतीय भूमिकामें संसारके असङ्ग और परमात्माके ध्यानरूप फलसे फलित होती है । इस तीसरी भूमिका (आर्यता) की प्राप्तिके बीचमें ही मृत्युको प्राप्त हुआ योगी पुरुष शुभ संकल्पयुक्त भोगोंका चिरकालतक उपभोगकर पुनः योगी ही होता है। क्रमशः तीनों भूमिकाओंका अभ्यास करनेसे अज्ञानके नष्ट हो जानेपर वास्तविक ज्ञानका उदय होनेके बाद जब चित्त पूर्ण-चन्द्रोदयके सदृश हो जाता है, तब चौथी भूमिकामें पहुँचे हुए युक्तचित्त योगीलोग सम्पूर्ण जगत्‌में विभागसे तथा आदि और अन्तसे रहित समभावसे परिपूर्ण सच्चिदानन्द ब्रह्मका ही अनुभव करते हैं। द्वैतके सर्वथा शान्त हो जानेपर जब अद्वैत ही अचल रह जाता है तब चौथी भूमिकामें गये हुए योगीलोग समस्त संसारको स्वप्नके समान अनुभव करते हैं । इसलिये पूर्वोक्त तीन भूमिकाओंको तो जाग्रत् कहते हैं और चौथी भूमिकाको स्वप्न कहते हैं।

जो पुरुष पञ्चम भूमिकामें पहुँच गया है, वह केवल सत्स्वरूप ब्रह्म बनकर रहता है। इस अर्धसुषुप्त पञ्चम भूमिकाको प्राप्त करके पुरुष समस्त विकारोंसे मुक्त हो जाता है और अद्वैत परब्रह्मरूप तत्त्वमें नित्य स्थित हो जाता है। पाँचवीं भूमिकामें स्थित पुरुष अन्तर्मुख वृत्तिसे रहता है। बाह्य व्यापारमें लगा हुआ भी निरन्तर चारों ओरसे शान्त होनेके कारण तन्द्रामें स्थितके सदृश दिखायी देता है। वह कभी तो बाहरी व्यवहार करता है और कभी अटल समाधिमें स्थित रहता है। इस भूमिकामें वासनाशून्य होकर अभ्यास करता हुआ पुरुष क्रमशः तुर्या नामकी छठी भूमिकामें चला जाता है। उस भूमिकामें निर्विकल्प होनेके कारण योगी द्वैत और अद्वैतकी भावनासे रहित हो जाता है। वह चिज्जड-ग्रन्थिसे और संदेहसे रहित हो जाता है। वह वासनाओंसे रहित जीवन्मुक्त योगी चित्रलिखित प्रदीपकी भाँति निर्वाणको न प्राप्त हुआ भी निर्वाणको प्राप्त हुआ-सा स्थित रहता है। (उसको बाहरी ज्ञान नहीं रहता। किंतु दूसरोंके चेष्टा करनेपर बाह्य ज्ञान हो सकता है।) वह जीवन्मुक्त योगी बाहर और भीतरसे शून्य आकाशमें स्थित घटकी तरह बाहर-भीतर संसारसे रहित रहता है तथा सागरमें परिपूर्ण घटके समान बाहर-भीतर ब्रह्मसे परिपूर्ण रहता है। तदनन्तर छठी भूमिकामें स्थित हुआ वह योगी सातवीं भूमिकामें पहुँचता है। सातवीं योग-भूमिका विदेहमुक्ता कही गयी है। वह शान्तस्वरूप, वाणीसे अगम्य और सभी भूमिकाओंकी सीमा है।

शैव उसे शिव कहते हैं, वेदान्ती उसे ब्रह्म कहते हैं और साङ्ख्यवादी उसे प्रकृति और पुरुषका यथार्थ ज्ञान कहते हैं। इस प्रकार भिन्न-भिन्न लोगोंने अपनी बुद्धिके अनुसार अनेक रूपोंसे सप्तम भूमिकाकी भावना की है। यद्यपि यह भूमिका सर्वथा उपदेशयोग्य नहीं है, तथापि किसी तरह इसका उपदेश किया ही जाता है। (इस भूमिकामें स्थित योगीको दूसरोंके द्वारा चेष्टा करनेपर भी संसारका ज्ञान नहीं होता।) श्रीराम ! ये सातों भूमिकाएँ मैंने तुमसे कह दीं। इनके अभ्यासयोगसे मनुष्य सम्पूर्ण दुःखोंसे रहित हो जाता है। धीरे-धीरे चलनेवाली अत्यन्त मदोन्मत्त, लड़ाई करनेमें सदा तत्पर, अपने बड़े-बड़े दाँतोंमें ख्यातिको प्राप्त करनेवाली तथा अनन्त अनर्थोंको पैदा करनेवाली एक हथिनी है। उसे यदि किसी तरह मार दिया जाय तो मनुष्य इन उपर्युक्त समस्त भूमिकाओंमें विजयी बन सकता है। वह मदोन्मत्त हथिनी जबतक पराक्रमसे जीत नहीं ली जाती, तबतक कौन ऐसा धीर योद्धा है, जो उपर्युक्त भूमिका-पङ्क्तिरूपी समरभूमियोंमें प्रवेश करनेमें भी समर्थ हो !

श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! वह प्रमत्त हथिनी कौन है, वे समरभूमियाँ कौन हैं, वह कैसे मारी जाती है तथा वह चिरकालतक कहाँ रमण करती है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! 'मुझसेयह मिट जाय,'

५०८* अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

ऐसी जो 'इच्छा' है, उसीका नाम हथिनी है। वह शरीर-रूपी जंगलमें रहती है और मत्त होकर अनेक तरहके शोक, मोह आदि विकारोंको उत्पन्न करनेमें लगी रहती है। मत्तवाले इन्द्रियोंके समूह ही उसके उग्र प्रकृतिके बच्चे हैं। वह जीभसे मनोहर भाषण करती है, शुभाशुभ कर्मरूपी दो दाँतोंसे युक्त वह मनरूपी गहन स्थानमें लीन रहती है। चारों ओर दूरतक फैले हुए वासनाओं-का समूह ही इस हथिनीका मद है। और श्रीराम ! संसार-की स्मृतियाँ इसकी युद्धभूमियाँ हैं। यहाँपर पुरुष बार-बार जय और पराजयका अनुभव करता है। यह इच्छा नामवाली हथिनी लोभी मनुष्योंको मारती है। वासना, इच्छा, मनन, चिन्तन, सङ्कल्प, भावना और स्पृहा इत्यादि इसके नाम हैं। यह अन्तःकरणरूपी कोशके अंदर रहती है। बहुत दूरतक फैली हुई तथा सब पदार्थोंमें निवास करनेवाली इस इच्छारूपी हथिनीपर अवहेलनापूर्वक 'धैर्य' नामक सर्वश्रेष्ठ अस्त्रसे प्रहार करके सब प्रकारसे विजय प्राप्त कर लेनी चाहिये।

'यह वस्तु मुझे इस प्रकार प्राप्त हो जाय !' यह इच्छा जबतक अन्तःकरणके भीतर प्रकट रहती है, तभीतक यह महाभयंकर कुत्सित संसार रूपी महाविषसे उत्पन्न विषूचिकादूपी महामारी बनी रहती है। 'यह मुझे मिल जाय' यह जो संकल्परूप इच्छा है, बस, यही संसार है तथा इसका शान्त हो जाना ही मोक्ष है, यही ज्ञानका सार है। इच्छारहित विशुद्ध अन्तःकरणमें महापुरुषोंके पवित्र और सात्त्विक प्रसन्नता पैदा करनेवाले हितमय उपदेश दर्पणमें तैल-बिन्दु की भाँति जम जाते हैं। एकमात्र विषयोंके स्मरणका परित्याग कर देनेसे इच्छारूपी संसारका अङ्कुर उत्पन्न नहीं होता। विषके तुल्य अनेक प्रकारका अनर्थ पैदा करनेवाली इस इच्छाको तनिक-सी बढ़ते ही विषयोंके विस्मरणरूप शस्त्रसे काट डालना चाहिये। इच्छासे युक्त जीवात्मा दीनताको कभी भी नहीं छोड़ सकता। सुन्दर असंवेदनमें यानी उत्तम रूपसे विषयोंका स्मरण न होनेमें श्रेष्ठ प्रयत्न यही है कि चित्त अपने अंदर संकल्पोंसे रहित होकर मृतककी तरह स्थित रहे।

'यह मुझे मिल जाय' इस तीव्र इच्छाको ही उत्तम पुरुष 'संकल्प' कहते हैं और जो संसारके पदार्थोंकी भावना से रहित होना है, उसीको 'संकल्पका त्याग' कहते हैं। श्रीराम ! सङ्कल्पको ही तुम स्मरण समझो। और विस्मरण (संकल्पके अभाव) को विद्वान्लोग कल्याण-रूप समझते हैं। सङ्कल्पमें पहलेके अनुभव किये हुए पदार्थोंकी तथा भविष्यमें होनेवाले पदार्थोंकी भी भावना की जाती है। मै ऊपर हाथ उठाकर बार-बार ऊँचे स्वरसे चिल्लाकर यह कह रहा हूँ, किंतु इसे कोई सुनता नहीं कि संकल्पत्याग ही परम श्रेयका सम्पादक है। इसकी भावना लोग अपने हृदयमें क्यों नहीं करते ?

श्रीराम ! सम्पूर्ण इन्द्रियों और मनके व्यापारोंसे रहित और ध्यान-समाधिमें लीन वेश हुआ पुरुष उस परम पदको प्राप्त करता है, जहाँ एकच्छत्र साम्राज्य भी तृणके सदृश तुच्छ है। इस विषयमें अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता है ? संक्षेपसे मैं इतना ही कहता हूँ कि संसारका सङ्कल्प ही सबसे बढ़कर बन्धन है और उस संकल्पका अभाव ही मोक्ष है। संसारके स्मरणके अभावको ही स्वाभाविक 'चित्त-विनाशस्वरूप योग' कहते हैं और वह अक्षय योग शान्तरूपसे नित्य स्थित है। श्रीराम ! शिव, सर्वव्यापी, शान्तिमय, चिन्मय, अज और कल्याणरूप ब्रह्मके साथ जो जीव-ब्रह्मके एकत्वका निश्चय है, वही वास्तविक सर्वत्याग है। श्रीराम ! अहंता-ममताकी भावना रखनेवाला मनुष्य दुःखसे कभी छुटकारा नही पाता; किंतु अहंता-ममताकी भावना से रहित हुआ मनुष्य मुक्त हो जाता है।

(सर्ग १२६)

निर्वाण-प्रकरण पू०] * भरद्वाज मुनिके प्रश्न करनेपर श्रीवाल्मीकिजीके द्वारा उपदेश * ५०९


भरद्वाज मुनिके उत्कण्ठापूर्वक प्रश्न करनेपर श्रीवाल्मीकिजीके द्वारा जगत्की असत्ता और परमात्माकी सत्ताका प्रतिपादन करते हुए कल्याणकारक उपदेश

श्रीभरद्वाजजीने पूछा—गुरो ! निश्चय ही श्रीरामभद्र तो परम योगी, सबके वन्दनीय, देवताओंके भी ईश्वर, जन्म-मरणसे रहित, विशुद्ध ज्ञानमय, समस्त उत्तम गुणोंकी खान, समस्त ऐश्वर्योंके आधार तथा तीनों लोकोंके उत्पादन, रक्षण एवं अनुग्रह करनेवाले थे । उन ब्रह्मानन्दसे परिपूर्ण पूर्णज्ञानी और विशुद्धबुद्धि रघुकुलश्रेष्ठ श्रीरामभद्रने मुनिवर वसिष्ठजीके द्वारा उपदिष्ट इस अति प्राचीन समस्त ज्ञानरूपी सारका श्रवण कर क्या और भी कुछ पूछा था ?

श्रीवाल्मीकिजीने कहा—भरद्वाज ! वसिष्ठ मुनिके वेदान्तशास्त्रके सङ्ग्रहरूप वचनोंका श्रवण कर अखिल विज्ञानोंके ज्ञाता कमललोचन श्रीरामभद्र अपने चिन्मय आनन्द-स्वरूपमें स्थित रहे । उस समय वे प्रश्न, उत्तर और विभाग आदि करनेकी पद्धतिसे उपरत हो गये थे । उनका चित्त आनन्दरूप अमृतसे पूर्ण था । वे चिन्मय और सर्वव्यापी होनेके कारण अपने मङ्गलमय स्वरूपमें ही समभावसे नित्य स्थित थे । अतः उन्होंने उस समय वसिष्ठजीसे कुछ भी नहीं पूछा ।

श्रीभरद्वाजजीने पूछा—मुनिनायक ! कहाँ तो मेरे-जैसे मूर्ख, स्तब्ध, अल्पज्ञ, पापी और कहाँ ब्रह्मा आदि देवता भी जिसकी आकाङ्क्षा करते हैं—उन भगवान् श्रीरामचन्द्रजीकी अपने स्वरूपमें स्थिति ! मुनीश्वर ! अहो ! मैं किस प्रकार परमात्मपदमें विश्राम पा सकूँगा और इस दुस्तर संसाररूपी महासागरके मोहरूपी जलसे किस प्रकार पार हो सकूँगा ? यह शीघ्र मुझसे कहिये ।

श्रीवाल्मीकिजी बोले—शिष्य ! श्रीवसिष्ठजीके द्वारा कथित आरम्भसे अन्ततक सम्पूर्ण राम-वृत्तान्त, मैंने तुमको सुना दिया, अब तुम अपनी बुद्धिसे पहले विवेकपूर्वक विचारकर पीछे उसका मनन करो । मैं भी इस विषयमें तुमसे जो वर्णन करने योग्य रहस्य है, उसे कहता हूँ, सुनो । भद्र ! यह जो यहाँ संसाररूप अविद्या-प्रपञ्च दीख रहा है, वह तनिक भी सत्य नहीं है। अर्थात् समस्त संसाररूप प्रपञ्च सर्वथा मिथ्या ही है । विवेकी पुरुष वास्तविक तत्त्वको विवेचनपूर्वक ग्रहण कर लेते हैं, किंतु अविवेकी मनुष्य वाद-विवाद करते रहते हैं । प्रिय मित्र ! वास्तवमें सच्चिदानन्द परमात्मासे अतिरिक्त कोई वस्तु ही नहीं है अतः प्रपञ्चसे तुम्हारा क्या प्रयोजन है ? मैं तुमसे आगे जो वेदान्तशास्त्रोंके रहस्य बतलाता हूँ, उनके अभ्याससे तुम अपने चित्तको परम विशुद्ध बना डालो।

मित्र ! यह जो संसाररूप प्रपञ्च दीखता है, इसके मूलमें भी सत्ताका अभाव ही है और इसके अन्तमें भी सत्ताका अभाव ही है । मध्यकालमें भी विचार करनेपर इसकी कोई सत्ता न होनेके कारण केवल प्रतीतिमात्र ही है । अतः विवेकी पुरुष इस संसारमें किसी तरहका विश्वास नहीं करते; क्योंकि अनादि वासनाके दोषसे ही यह असत् संसार दिखायी देता है । इसका गन्धर्वनगरके सदृश मिथ्या स्वरूप है और यह अनेक प्रकारके भ्रमोंसे भरा है। भद्र ! तुम चिन्मय कल्याणरूपी अमृत-लताका अभ्यास न कर विषय-वासनारूपी विषलताका आश्रय कर क्यों व्यर्थ मोहमें फँसे हो ? सखे ! यह समस्त जगत् न तो आरम्भमें है और न अन्तमें ही है । इसलिये तुम यह भी समझ लो कि मध्यमें भी यह है ही नहीं । इस जगत्का सारा वृत्तान्त स्वप्न-जैसा है। अज्ञानमूलक ये सारे भेद जलमें बुद्बुदोंकी तरह क्षण-क्षणमें उत्पन्न होते रहते हैं; और अज्ञानका नाश होते ही एकमात्र ज्ञानरूप समुद्रमें विलीन हो जाते हैं । अकेला अज्ञानरूपी समुद्र ही समस्त जगत्को व्याप्त करके स्थित है। इस समुद्रमें