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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

१७२ संस्कारविधिः के पश्चिमभाग में पूर्व की ओर मुख करके थोड़ी देर दोनों खड़े रहें। तत्पश्चात् पूर्वोक्त प्रकार कलशसहित यज्ञकुण्ड की प्रदक्षिणा कर, पुनः दो बार इसी प्रकार, अर्थात् सब मिलके तीन परिक्रमा करके, अन्त में यज्ञकुण्ड के पश्चिम में थोड़ा खड़ा रहके, उक्त रीति से तीन बार क्रिया पूरी हुए पश्चात् वधू की माँ अथवा भाई उस सूप को तिरछा करके उसमें बाकी रही हुई धाणी को वधू की हस्ताञ्जलि में डाल देवे। पश्चात् वधू— ओं भगाय स्वाहा॥ इदं भगाय—इदन्न मम॥ इस मन्त्र को बोलके प्रज्वलित अग्नि पर वेदी में उस धाणी की एक आहुति देवे। पश्चात् वर-वधू को दक्षिण भाग में रखके कुण्ड के पश्चिम में पूर्वाभिमुख बैठके— ओं प्रजापतये स्वाहा॥ इदं प्रजापतये—इदन्न मम॥ इस मन्त्र को बोलके स्रुवा से एक घृत की आहुति देवे। तत्पश्चात् एकान्त में जाके वधू के बँधे हुए केशों को वर— प्र त्वा मुञ्चामि॒ वरु॑णस्य॒ पाशा॒द्येन॒ त्वाब॑ध्नात् स॒वि॒ता सु॒शेव॑ः। ऋ॒तस्य॑ यो॒नौ सु॒कृ॒तस्य॑ लो॒केऽरि॑ष्टां त्वा स॒ह पत्या॑ दधामि॥ १ ॥ प्रेतो मु॑ञ्चामि॒ नामुतः सुब॒द्धाम॒मुत॑स्करम्। यथेयमिन्द्र मीढ्वः सुपु॒त्रा सु॒भगास॑ति॥ २ ॥ इन दोनों मन्त्रों को बोलके प्रथम वधू के केशों को छोड़ना। तत्पश्चात् सभामण्डप में आके ‘सप्तपदी-विधि’ का आरम्भ करे। इस समय वर के उपवस्त्र के साथ वधू के उत्तरीय वस्त्र की गाँठ देनी, इसे ‘जोड़ा’ कहते हैं। वधू-वर दोनों जने आसन पर से उठके वर अपने दक्षिण हाथ से वधू की दक्षिण हस्ताञ्जलि पकड़के यज्ञकुण्ड के उत्तरभाग में जावें। तत्पश्चात् वर अपना

विवाहप्रकरणम् १७३ दक्षिण हाथ वधू के दक्षिण स्कन्धे पर रखके दोनों समीप- समीप उत्तराभिमुख खड़े रहें। तत्पश्चात् वर— मा सव्येन दक्षिणमतिक्राम ॥ ऐसा बोलके वधू को उसका दक्षिण पग उठवाके चलने के लिए आज्ञा देवे और— ओम् इष एकपदी भव सा मामनुव्रता भव विष्णुस्त्वा नयतु पुत्रान् विन्दावहै बहूंस्ते सन्तु जरदष्टयः ॥ इस मन्त्र को बोलके वर अपने साथ वधू को लेकर ईशान दिशा में एक पग* चले और चलावे। ओम् ऊर्जे द्विपदी भव०*॥ इस मन्त्र से दूसरा। ओं रायस्पोषाय त्रिपदी भव० ॥ इस मन्त्र से तीसरा। ओं मयोभवाय चतुष्पदी भव० ॥ इस मन्त्र से चौथा। ओं प्रजाभ्यः पञ्चपदी भव० ॥ इस मन्त्र से पाँचवाँ। ओम् ऋतुभ्यः षट्पदी भव० ॥ इस मन्त्र से छठा ॥ और— ओं सखे सप्तपदी भव० ॥ इस मन्त्र से सातवाँ पग चलना। इस रीति से इन सात मन्त्रों से सात पग ईशान दिशा में चलाके वधू-वर दोनों गाँठ बँधे हुए शुभासन पर बैठें। तत्पश्चात् प्रथम से जो जल के कलश को लेके यज्ञकुण्ड के दक्षिण में बैठाया था, वह पुरुष उस पूर्व-स्थापित जलकुम्भ

  • इस पग धरने की विधि ऐसी है कि वधू प्रथम अपना जमणा पग उठाके ईशानकोण की ओर बढ़ाके धरे, तत्पश्चात् दूसरे बायें पग को उठाके जमणे पग की पटली तक धरे, अर्थात् जमणे पग के थोड़ा-सा पीछे बायाँ पग रक्खे। इसी को एक पग गिणना। इसी प्रकार अगले छह मन्त्रों से भी क्रिया करनी, अर्थात् एक- एक मन्त्र से एक-एक पग ईशान दिशा की ओर धरना। जो 'भव' के आगे मन्त्र में पाठ है, सो छह मन्त्रों के इस 'भव' पद के आगे पूरा बोलके पग धरने की क्रिया करनी।

१७४ संस्कारविधिः को लेके वधू-वर के समीप आवे और उसमें से थोड़ा-सा जल लेके वधू-वर के मस्तक पर छिटकावे, और वर— ओम् आपो॒ हि ष्ठा म॑यो॒भुव॒स्ता न॑ ऽ ऊ॒र्जे द॑धातन। म॒हे रणा॑य॒ चक्ष॑से॥ १॥ यो व॑: शि॒वत॑मो॒ रस॒स्तस्य॑ भाजयते॒ह न॑:। उ॒श॒तीरि॑व मा॒तर॑:॥ २॥ तस्मा॒ऽ अरं॑ गमाम वो॒ यस्य॒ क्षया॑य॒ जिन्व॑थ। आपो॑ ज॒नय॑था च नः॥ ३॥ ओम् आपः शिवाः शिवतमाः शान्ताः शान्ततमास्तास्ते कृण्वन्तु भेषजम्॥ ४॥ इन चार मन्त्रों को बोले। तत्पश्चात् वधू-वर वहाँ से उठके— ओं तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्। पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतꣳ शृणुयाम शरदः शतं प्र ब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्॥ १॥ इस मन्त्र को पढ़के सूर्य का अवलोकन करें। तत्पश्चात् वर वधू के दक्षिण स्कन्धे पर अपना दक्षिण हाथ लेके उससे वधू का हृदय-स्पर्श करके— ओं मम व्रते ते हृदयं दधामि मम चित्तमनु चित्तं ते अस्तु। मम वाचमेकमना जुषस्व प्रजापतिष्ट्वा नियुनक्तु मह्यम्॥*

  • हे वधू! (ते) तेरे (हृदयम्) अन्तःकरण और आत्मा को (मम) मेरे (व्रते) कर्म के अनुकूल (दधामि) धारण करता हूँ (मम) मेरे (चित्तमनु) चित्त के अनुकूल (ते) तेरा (चित्तम्) चित्त सदा (अस्तु) रहे, (मम) मेरी (वाचम्) वाणी को तू (एकमनाः) एकाग्रचित्त से (जुषस्व) सेवन किया कर। (प्रजापतिः) प्रजा का पालन करनेवाला परमात्मा (त्वा) तुझको (मह्यम्) मेरे लिए (नियुनक्तु) नियुक्त करे।

विवाहप्रकरणम् १७५ इस मन्त्र को बोले और उसी प्रकार वधू भी अपने दक्षिण हाथ से वर के हृदय का स्पर्श करके इसी ऊपर लिखे हुए मन्त्र को बोले*। तत्पश्चात् वर वधू के मस्तक पर हाथ धरके— सु॒म॒ङ्गली॒रियं व॒धूरि॒मां स॒मेत॒ पश्य॑त । सौभा॑ग्यमस्यै द॒त्त्वा याथास्तं॒ वि परे॑तन ॥ इस मन्त्र को बोलके कार्यार्थ आये हुए लोगों की ओर अवलोकन करना और इस समय सब लोग— ‘ओं सौभाग्यमस्तु। ओं शुभं भवतु ॥’ इस वाक्य से आशीर्वाद देवें। तत्पश्चात् वधू-वर यज्ञकुण्ड के समीप पूर्ववत् बैठके, पुनः पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे दोनों (ओं यदस्य कर्मणो०), इस स्विष्टकृत् मन्त्र से होमाहुति, अर्थात् एक आज्याहुति और पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे (ओं भूरग्नये स्वाहा) इत्यादि चार मन्त्रों से एक-एक से एक-एक आहुति करके चार आज्याहुति देवें और इस प्रमाणे विवाह का विधि पूरे हुए पश्चात् दोनों जने आराम, अर्थात् विश्राम करें।

  • वैसे ही हे प्रिय वीर स्वामिन् ! आपके हृदय, आत्मा और अन्तःकरण को मेरे प्रियाचरण कर्म में धारण करती हूँ। मेरे चित्त के अनुकूल आपका चित्त सदा रहे। आप एकाग्र होके मेरी वाणी का जो कुछ मैं आपसे कहूँ उसका सेवन सदा किया कीजिए, क्योंकि आज से प्रजापति परमात्मा ने आपको मेरे अधीन किया है वैसे मुझको आपके अधीन किया है, अर्थात् इस प्रतिज्ञा के अनुकूल दोनों वर्त्ता करें, जिससे सर्वदा आनन्दित और कीर्तिमान, पतिव्रता और स्त्रीव्रत होके सब प्रकार के व्यभिचार, अप्रियभाषणादि को छोड़के परस्पर प्रीतियुक्त रहें।

१७६ संस्कारविधिः इस रीति से थोड़ा-सा विश्राम करके विवाह का उत्तर- विधि करें। यह उत्तर-विधि सब वधू के घर की ईशान दिशा में, विशेष करके एक घर प्रथम से बना रक्खा हो, वहाँ जाके करना। तत्पश्चात् सूर्य अस्त हुए पीछे जब आकाश में नक्षत्र दीखें, उस समय वधू-वर यज्ञकुण्ड के पश्चिम भाग में पूर्वाभिमुख आसन पर बैठें और पृष्ठ ३० में लिखे प्रमाणे अग्न्याधान (ओं भूर्भुवः स्वद्यौं०) इस मन्त्र से करें। यदि प्रथम ही सभामण्डप ईशान दिशा में हुआ और प्रथम अग्न्याधान किया हो, तो अग्न्याधान न करें। (ओम् अयन्त इध्म०) इत्यादि चार मन्त्रों से समिदाधान करके, जब अग्नि प्रदीप्त होवे तब पृष्ठ ३२-३३ में लिखे प्रमाणे (ओम् अग्नये स्वाहा) इत्यादि चार मन्त्रों से आघारावाज्यभागाहुति चार और पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे (ओं भूरग्नये स्वाहा) इत्यादि चार मन्त्रों से चार व्याहृति आहुति, ये सब मिलके आठ आज्याहुति देवें। तत्पश्चात् निम्नलिखित मन्त्रों से प्रधान-होम करें— ओं लेखासन्धिषु पक्ष्मस्वारोकेषु च यानि ते। तानि ते पूर्णाहुत्या . सर्वाणि शमयाम्यहं स्वाहा ॥ इदं कन्यायै—इदन्न मम ॥ ओं केशेषु यच्च पापकमीक्षिते रुदिते च यत्। तानि०॥ ओं शीलेषु यच्च पापकं भाषिते हसिते च यत्। तानि०॥ ओम् आरोकेषु च दन्तेषु हस्तयोः पादयोश्च यत्। तानि०॥ ओम् ऊर्वोरुपस्थे जङ्घयोः सन्धानेषु च यानि ते। तानि०॥ ओं यानि कानि च घोराणि सर्वाङ्गेषु तवाभवन्। पूर्णाहुतिभिराज्यस्य सर्वाणि तान्यशीशमं स्वाहा॥ इदं कन्यायै—इदन्न मम ॥ ये छह मन्त्र हैं। इनमें से एक-एक मन्त्र बोल, एक-एक से एक-एक आहुति, अर्थात् छह आज्याहुति देनी। तत्पश्चात्

विवाहप्रकरणम् १७७ पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे (ओं भूरग्नये स्वाहा) इत्यादि चार व्याहृति मन्त्रों से चार आज्याहुति देके— वधू-वर वहाँ से उठके सभामण्डप के बाहर उत्तर दिशा में जावें। तत्पश्चात् वर— ध्रुवं पश्य॥ ऐसा बोलके वधू को ध्रुव का तारा दिखलावे१ और वधू वर से बोले कि मैं— पश्यामि ॥ ध्रुव-तारे को देखती हूँ। तत्पश्चात् वधू बोले— ओं ध्रुवमसि ध्रुवाहं पतिकुले भूयासम् ( अमुष्य२ असौ ) ॥ इस मन्त्र को बोलके, तत्पश्चात्— अरुन्धतीं पश्य ॥ ऐसा वाक्य बोलके वर वधू को अरुन्धती का तारा दिखलावे और वधू— पश्यामि ॥ ऐसा कहके— १. हे वधू वा वर ! जैसे यह ध्रुव दृढ़ स्थिर है, इसी प्रकार आप और मैं एक-दूसरे के प्रियाचरणों में दृढ़ स्थिर रहें। २. (अमुष्य) इस पद के स्थान में षष्ठीविभक्त्यन्त पति का नाम बोलना, जैसे—शिवशर्मा पति का नाम हो तो ‘‘शिवशर्मणः’’ ऐसे, और (असौ) इस पद के स्थान में वधू अपने नाम को प्रथमा- विभक्त्यन्त बोलकर इस मन्त्र को पूरा बोले जैसे ‘‘भूयासं सौभाग्यदाहम् शिवशर्मणस्ते’’ इस प्रकार दोनों पद जोड़के बोले। ‘‘हे स्वामिन्! सौभाग्यदा (अहम्) मैं (अमुष्य) आप शिवशर्मा की अर्द्धांगी (पतिकुले) आपके कुल में (ध्रुव) निश्चल जैसेकि आप ( ध्रुवम् ) दृढ़ निश्चयवाले मेरे स्थिर पति (असि) हैं, वैसे मैं भी आपकी स्थिर दृढ़ पत्नी (भूयासम्) होऊँ।

१७८ संस्कारविधिः ओम् अरुन्धत्यसि रुद्धाहमस्मि (अमुष्य१ असौ) ॥ इस मन्त्र को बोलके वर वधू की ओर देखके वधू के मस्तक पर हाथ धरके- ओं ध्रुवा द्यौर्ध्रुवा पृथिवी ध्रुवं विश्वमिदं जगत्। ध्रुवासः पर्वता इमे ध्रुवा स्त्री पतिकुले इयम्२ ॥ ओं ध्रुवमसि ध्रुवं त्वा पश्यामि ध्रुवैधि पोष्ये मयि। मह्यं त्वाद्राद् बृहस्पतिर्मया पत्या प्रजावती संजीव शरदः शतम्३ ॥ १. (अमुष्य) इस पद के स्थान में पति का नाम षष्ठयन्त और (असौ) इसके स्थान में वधू का प्रथमान्त नाम जोड़कर बोले। २. हे वरानने ! जैसे (द्यौः) सूर्य की कान्ति वा विद्युत् (ध्रुवा) सूर्यलोक वा पृथिव्यादि में निश्चल, जैसे (पृथिवी) भूमि अपने स्वरूप में (ध्रुवा) स्थिर, जैसे (इदम्) यह (विश्वम्) सब (जगत्) संसार प्रवाहस्वरूप में (ध्रुवम्) स्थिर है, जैसे (इमे) ये प्रत्यक्ष (पर्वताः) पहाड़ (ध्रुवासः) अपनी स्थिति में स्थिर हैं, वैसे (इयम्) यह तू मेरी (स्त्री) (पतिकुले) मेरे कुल में (ध्रुवा) सदा स्थिर रह ॥ ३. हे स्वामिन् ! जैसे आप मेरे समीप (ध्रुवम्) दृढ़ संकल्प करके स्थिर (असि) हैं या जैसे मैं (त्वा) आपको (ध्रुवम्) स्थिर दृढ़ (पश्यामि) देखती हूँ वैसे ही सदा के लिए मेरे साथ आप दृढ़ रहिएगा, क्योंकि मेरे मन के अनुकूल (त्वा) आपको (बृहस्पतिः) परमात्मा (अदात्) समर्पित कर चुका है, वैसे मुझ पत्नी के साथ उत्तम प्रजायुक्त होके (शतं शरदः) सौ वर्षपर्यन्त (सम् जीव) जीविये तथा हे वरानने पत्नी ! (पोष्ये) धारण और पालन करने योग्य (मयि) मुझ पति के निकट (ध्रुवा) स्थिर (एधि) रह, (मह्यम्) मुझको अपनी मनसा के अनुकूल तुझे परमात्मा ने दिया है, तू (मया) मुझ (पत्या) पति के साथ (प्रजावती) बहुत उत्तम प्रजायुक्त होकर सौ वर्ष पर्यन्त आनन्दपूर्वक जीवन धारण कर। वधू-वर ऐसी दृढ़ प्रतिज्ञा करें कि जिससे कभी उलटे विरोध में न चलें ॥

विवाहप्रकरणम् १७९ इन दोनों मन्त्रों को बोले। पश्चात् वधू और वर दोनों यज्ञकुण्ड के पश्चिम भाग में पूर्वाभिमुख होके कुण्ड के समीप बैठें और पृष्ठ २९ में लिखे प्रमाणे (ओम् अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा) इत्यादि तीन मन्त्रों से एक-एक से एक-एक आचमन करके तीन-तीन आचमन दोनों करें। पश्चात् पृष्ठ २३ में लिखी हुई समिधाओं से यज्ञकुण्ड में अग्नि को प्रदीप्त करके, पृष्ठ २४ में लिखे प्रमाणे घृत और स्थालीपाक, अर्थात् भात को उसी समय बनावें। पृष्ठ ३१ में लिखे प्रमाण (ओम् अयन्त इध्म०) इत्यादि चार मन्त्रों से समिधा-होम दोनों जने करके, पश्चात् पृष्ठ ३२-३३ में लिखे प्रमाणे आधारावाज्यभागाहुति चार और पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे व्याहृति आहुति चार, दोनों मिलके आठ आज्याहुति वर-वधू देवें। तत्पश्चात् जो ऊपर सिद्ध किया हुआ ओदन, अर्थात् भात है, उसे एक पात्र में निकालके उसके ऊपर स्रुवा से घृत सेचन करके, घृत और भात को अच्छे प्रकार मिलाकर दक्षिण हाथ से थोड़ा-थोड़ा भात दोनों जने लेके— ओम् अग्नये स्वाहा ॥ इदमग्नये—इदन्न मम ॥ ओं प्रजापतये स्वाहा ॥ इदं प्रजापतये—इदन्न मम ॥ ओं विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा ॥ इदं विश्वेभ्यो देवेभ्यः—इदन्न मम ॥ ओम् अनुमतये स्वाहा ॥ इदमनुमतये—इदन्नमम ॥ इनमें से प्रत्येक मन्त्र से एक-एक करके चार स्थालीपाक, अर्थात् भात की आहुति देनी। तत्पश्चात् पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे (ओं यदस्य कर्मणो०) इस मन्त्र से एक स्विष्टकृत् आहुति देनी। तत्पश्चात् पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे व्याहृति आहुति चार और पृष्ठ ३४-३५ में लिखे प्रमाणे अष्टाज्याहुति आठ, दोनों मिलके

१८० संस्कारविधिः बारह आज्याहुति देनी। तत्पश्चात् शेष रहा हुआ भात एक पात्र में निकालके उसपर घृत-सेचन और दक्षिण हाथ रखके— ओम् अन्नपाशेन मणिना प्राणसूत्रेण पृश्निना। बध्नामि सत्यग्रन्थिना मनश्च हृदयं च ते१ ॥१॥ ओम् यदेतद्धृदयं तव तदस्तु हृदयं मम। यदिदँ हृदयं मम तदस्तु हृदयं तव२ ॥२॥ ओम् अन्नं प्राणस्य षङ्गिँशस्तेन बध्नामि त्वा असौ३ ॥३॥ इन तीनों मन्त्रों को मन से जपके वर उस भात में से प्रथम थोड़ा-सा भक्षण करके, जो उच्छिष्ट=शेष भात रहे वह अपनी वधू के लिए खाने को देवे और जब वधू उसे खा चुके, तब वधू-वर यज्ञमण्डप में सन्नद्ध हुए शुभासन पर नियम प्रमाणे पूर्वाभिमुख बैठें और पृष्ठ ३६-३७ में लिखे प्रमाणे सामवेदोक्त १. हे वधू वा वर! जैसे अन्न के साथ प्राण, प्राण के साथ अन्न तथा अन्न और प्राण का अन्तरिक्ष के साथ सम्बन्ध है, वैसे (ते) तेरे (हृदयम्) हृदय (च) और (मनः) मन (च) और चित्त आदि को (सत्यग्रन्थिना) सत्यता की गाँठ से (बध्नामि) बाँधती वा बाँधता हूँ॥१॥ २. हे वर! हे स्वामिन् वा हे पत्नी! (यदेतत्) जो यह (तव) तेरा (हृदयम्) आत्मा वा अन्तःकरण है (तत्) वह (मम) मेरा (हृदयम्) आत्मा अन्तःकरण के तुल्य प्रिय (अस्तु) हो, और (मम) मेरा (यदिदम्) जो यह (हृदयम्) आत्मा, प्राण और मन है (तत्) सो (तव) तेरे (हृदयम्) आत्मादि के तुल्य प्रिय (अस्तु) सदा रहे॥२॥ ३. (असौ) हे यशोदे! जो (प्राणस्य) प्राण का पोषण करनेहारा (षड्विंशः) छब्बीसवाँ तत्त्व (अन्नम्) अन्न है (तेन) उससे (त्वा) तुझको (बध्नामि) दृढ़ प्रीति से बाँधता वा बाँधती हूँ॥३॥

विवाहप्रकरणम् १८१ महावामदेव्यगान करें। तत्पश्चात् पृष्ठ ९-२१ में लिखे प्रमाणे ईश्वर की स्तुतिप्रार्थनोपासना, स्वस्तिवाचन, शान्तिकरण कर्म करके क्षार- लवणरहित मिष्ट, दुग्ध, घृतादिसहित भोजन करें। तत्पश्चात् पृष्ठ ३६, ३७ में लिखे प्रमाणे पुरोहितादि सद्धर्मी और कार्यार्थ इकट्ठे हुए लोगों को सन्मानार्थ उत्तम भोजन कराना। तत्पश्चात् पुरुषों का पुरुष और स्त्रियों का स्त्री यथायोग्य आदर-सत्कार करके उन्हें विदा कर देवें। तत्पश्चात् दश घटिका रात्रि जाए, तब वधू और वर पृथक्- पृथक् स्थान में भूमि में बिछौना करके तीन रात्रिपर्यन्त ब्रह्मचर्य- व्रतसहित रहकर शयन करें और ऐसा भोजन करें कि स्वप्न में भी वीर्यपात न होवे। तत्पश्चात् चौथे दिवस विधिपूर्वक गर्भाधानसंस्कार करें। यदि चौथे दिवस कोई अड़चन आवे तो अधिक दिन ब्रह्मचर्यव्रत में दृढ़ रहकर जिस दिन दोनों की इच्छा हो और पृष्ठ ४१-४२ में लिखे प्रमाणे गर्भाधान की रात्रि भी हो, उस रात्रि में यथाविधि गर्भाधान करें। तत्पश्चात् दूसरे वा तीसरे दिन प्रातःकाल वर पक्षवाले लोग वधू और वर को रथ में बैठाके बड़े सन्मान से अपने घर में लावें और जो वधू अपने माता-पिता के घर को छोड़ते समय आँख में अश्रु भर लावे तो— जी॒वं रु॑दन्ति॒ वि म॑यन्ते अध्व॒रे दी॒र्घामनु॒ प्रसि॑तिं दीधियुर्नर॑: । वा॒मं पि॒तृभ्यो॒ य इदं समे॑रि॒रे मय॑: पति॑भ्यो॒ जन॑यः परि॒ष्वजे॑ ॥ इस मन्त्र को वर बोले और रथ में बैठते समय वर अपने साथ दक्षिण बाजू वधू को बैठावे। उस समय वर— पू॒षा त्वे॒तो न॑यतु॒ हस्त॒गृह्या॒श्विना॑ त्वा॒ प्र व॑हतां॒ रथे॑न । गृ॒हान्ग॑च्छ गृ॒हप॑त्नी॒ यथासो॑ व॒शिनी॒ त्वं वि॒दथ॑मा व॑दासि ॥ १ ॥

१८२ संस्कारविधिः सु॒किं॒शुकं॑ शल्म॒लिं वि॒श्वरू॑पं॒ हिर॑ण्यवर्णं॒ सु॒वृतं॑ सु॒च॒क्रम॑। आ रो॑ह सूर्ये अ॒मृत॑स्य लो॒कं स्योनं॒ पत्ये॑ वह॒तुं कृ॑णुष्व॥२॥ इन दो मन्त्रों को बोलके रथ को चलावे। यदि वधू को वहाँ से अपने घर लाने के समय नौका पर बैठना पड़े तो इस निम्नलिखित मन्त्र को पूर्व बोलके नौका पर बैठें— अश्म॑न्वती रीयते॒ सं र॑भध्व॒मुत्ति॑ष्ठत् प्र त॑रता सखायः। और नाव से उतरते समय— अत्रा॑ जहाम॒ ये अस॒न्नशे॑वाः शिवा॒न्व्यय॒मुत्त॑रेमा॒भि वाजा॑न्॥ इस उत्तरार्द्ध मन्त्र को बोलके नाव से उतरें। पुनः इसी प्रकार मार्ग में चार मार्गों का संयोग, नदी, व्याघ्र, चोर आदि से भय या भयङ्कर स्थान, ऊँचे-नीचे खाढ़ावाली पृथिवी, बड़े-बड़े वृक्षों का झुण्ड या श्मशानभूमि आवे तो— मा वि॑दन् परिप॒न्थिनो॒ य आ॒सीद॑न्ति दम्पती। सु॒गेभि॑र्दुर्गमती॒तामप॑ द्रा॒न्त्वरा॑तयः॥ इस मन्त्र को बोले। तत्पश्चात् वधू-वर जिस रथ में बैठके जाते हों, उस रथ का कोई अङ्ग टूट जाए, अथवा किसी प्रकार का अकस्मात् उपद्रव होवे, तो मार्ग में कोई अच्छा स्थान देखके निवास करना और साथ रक्खे हुए विवाहाग्नि को प्रगट करके उसमें पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे चार व्याहृति आज्याहुति देनी। पश्चात् पृष्ठ ३६- ३७ में लिखे प्रमाणे महावामदेव्यगान करना। पश्चात् जब वधू-वर का रथ वर के घर के आगे आ पहुँचे, तब कुलीन, पुत्रवती, सौभाग्यवती, या कोई ब्राह्मणी,

विवाहप्रकरणम् १८३ या अपने कुल की स्त्री आगे-सामने आकर वधू का हाथ पकड़के वर के साथ रथ से नीचे उतारे और वर के साथ सभामण्डप में ले-जावे। सभामण्डप द्वारे आते ही वर वहाँ कार्यार्थ आये हुए लोगों की ओर अवलोकन करके— सु॒म॒ङ्ग॒लीरियं व॒धूरि॒मां स॒मेत॒ पश्य॑त । सौभा॑ग्यमस्यै द॒त्त्वायाऽथास्तं॒ वि प॑रतैन ॥ इस मन्त्र को बोले। और आये हुए लोग— ओं सौभाग्यमस्तु। ओं शुभं भवतु॥ इस प्रकार आशीर्वाद देवें। तत्पश्चात् वर— इ॒ह प्रि॒यं प्र॒जया॑ ते॒ समृ॑ध्यताम॒स्मिन् गृ॒हे गार्ह॑पत्याय जा॒गृ॒हि । एना॒ पत्या॑ त॒न्वं१॒॑ सं सृ॑जस्वाऽधा॒ जिब्री॑ वि॒दथ॒मा व॑दाथः ॥ इस मन्त्र को बोलके वधू को सभामण्डप में ले-जावे। तत्पश्चात् वधू-वर पूर्व-स्थापित यज्ञकुण्ड के समीप जावें। उस समय वर— ओम् इ॒ह गावः॑ प्रजा॑यध्वम॒मिहाश्वा॑ इ॒ह पूरू॑षाः । इ॒हो स॒हस्र॑दक्षिणोऽपि॑ ए॒षा नि षी॑दतु ॥ इस मन्त्र को बोलके यज्ञकुण्ड के पश्चिम भाग में पीठासन अथवा तृणासन पर वधू को अपने दक्षिण भाग में पूर्वाभिमुख बैठावे। तत्पश्चात् पृष्ठ २९ में लिखे प्रमाणे (ओम् अमृतोप- स्तरणमसि स्वाहा) इत्यादि तीन मन्त्रों से एक-एक से एक- एक करके तीन-तीन आचमन करें। तत्पश्चात् पृष्ठ ३० में लिखे प्रमाणे कुण्ड में यथाविधि समिधाचयन, अग्न्याधान करें। जब उस कुण्ड में अग्नि प्रज्वलित हो, तब उसपर घृत सिद्ध करके

१८४ संस्कारविधिः पृष्ठ ३३-३४ में लिखे प्रमाणे आघारावाज्यभागाहुति चार और व्याहृति आहुति चार, अष्टाज्याहुति आठ, सब मिलके सोलह आज्याहुति वधू-वर करके प्रधानहोम का प्रारम्भ निम्नलिखित मन्त्रों से करें— ओम् इह धृतिः स्वाहा॥ इदमीह धृत्यै—इदन्न मम॥ ओम् इह स्वधृतिः स्वाहा॥ इदमीह स्वधृत्यै—इदन्न मम॥ ओम् इह रन्तिः स्वाहा॥ इदमीह रन्त्यै—इदन्न मम॥ ओम् इह रमस्व स्वाहा॥ इदमीह रमाय—इदन्न मम॥ ओं मयि धृतिः स्वाहा॥ इदं मयि धृत्यै—इदन्न मम॥ ओं मयि स्वधृतिः स्वाहा॥ इदं मयि स्वधृत्यै—इदन्न मम॥ ओं मयि रमः स्वाहा॥ इदं मयि रमाय—इदन्न मम॥ ओं मयि रमस्व स्वाहा॥ इदं मयि रमाय—इदन्न मम॥ इन प्रत्येक मन्त्र से एक-एक करके आठ आज्याहुति देके— ओम् आ न॑ः प्र॒जां ज॑नयतु प्र॒जाप॑तिराजर॒साय॒ सम॑नक्त्वर्य॒मा। अदु॑र्मङ्गलीः पतिलोकमा वि॑श॒ शं नौ भव द्वि॒पदे॒ शं चतु॑ष्पदे॒ स्वाहा॑*॥ इदं सूर्यायै सावित्र्यै— इदन्न मम॥ १॥

  • हे वधू (अर्यमा) न्यायकारी, दयालु (प्रजापतिः) परमात्मा कृपा करके (आजरसाय) जरावस्था पर्यन्त जीने के लिए (नः) हमारी (प्रजाम्) उत्तम प्रजा को शुभ गुण, कर्म और स्वभाव से (आजनयतु) प्रसिद्ध करे, (समनक्तु) उससे उत्तम सुख को प्राप्त करे, और वे शुभगुणयुक्त (मङ्गलीः) स्त्रीलोग सब कुटुम्बियों को आनन्द (अदुः) देवें, उनमें से एक तू हे वरानने ! (पतिलोकम्) पति के घर वा सुख को (आविश) प्रवेश वा प्राप्त हो (नः) हमारे (द्विपदे) पिता आदि मनुष्यों के लिए (शम्) सुखकारिणी और (चतुष्पदे) गौ आदि को (शम्) सुखकर्त्री (भव) हो॥ १॥

विवाहप्रकरणम् १८५ ओम् अ॒घोर॑चक्षुरप॑तिघ्न्येधि शि॒वा प॒शुभ्यः॑ सु॒मनाः॑ सु॒वर्चाः॑। वी॒रसू॒र्देवृ॑कामा स्यो॒ना शं नौ॑ भव द्वि॒पदे॒ शं चतु॑ष्पदे॒ स्वाहा॑*॥ इदं सूर्यायै सावित्र्यै-इदन्न मम॥ २॥ ओम् इ॒मां त्वमि॑न्द्र मीढ्वः सु॒पु॒त्रां सु॒भगां॑ कृणु। दशा॑स्यां पु॒त्राना धे॑हि पति॑मेकाद॒शं कृ॑धि स्वाहा॑**॥ इदं सूर्यायै सावित्र्यै-इदन्न मम॥ ३॥

  • इस मन्त्र का अर्थ पृष्ठ १५७ में लिखे प्रमाणे जानना॥ २॥ ** ईश्वर पुरुष और स्त्री को आज्ञा देता है कि हे (मीढ्वः) वीर्यसेचन करनेहारे (इन्द्र) परमैश्वर्ययुक्त इस वधू के स्वामिन्! (त्वम्) तू (इमाम्) इस वधू को (सुपुत्राम्) उत्तम पुत्रयुक्त (सुभगाम्) सुन्दर सौभाग्य भोगवाली (कृणु) कर। (अस्याम्) इस वधू में (दश) दश (पुत्रान्) पुत्रों को (आ धेहि) उत्पन्न कर, अधिक नहीं। और हे स्त्री! तू भी अधिक कामना मत कर, किन्तु दश पुत्र और (एकादशम्) ग्यारहवें (पतिम्) पति को प्राप्त होकर सन्तोष (कृधि) कर। यदि इससे आगे सन्तानोत्पत्ति का लोभ करोगे तो तुम्हारे दुष्ट, अल्पायु, निर्बुद्धि सन्तान होंगे, और तुम भी अल्पायु, रोगग्रस्त हो जाओगे, इसलिए अधिक सन्तानोत्पत्ति न करना। तथा (पतिमेकादशं कृधि) इस पद का अर्थ नियोग में दूसरा होगा, अर्थात् जैसे पुरुष को विवाहित स्त्री में दश पुत्र उत्पन्न करने की आज्ञा परमात्मा ने की है, वैसी ही आज्ञा स्त्री को भी है कि दश पुत्र तक चाहे विवाहित पति से अथवा विधवा हुए पश्चात् नियोग से करे-करावे। वैसे ही एक स्त्री के लिए एक पति से एक बार विवाह और पुरुष के लिए भी एक स्त्री से एक ही बार विवाह करने की आज्ञा है। जैसे विधवा हुए पश्चात् स्त्री नियोग से सन्तानोत्पत्ति करके पुत्रवती होवे, वैसे पुरुष भी विगतस्त्री होवे तो नियोग से पुत्रवान् होवे॥ ३॥

१८६ संस्कारविधिः ओं स॒म्राज्ञी॒ श्वशु॑रे भव॒ सम्रा॑ज्ञी॒ श्व॒श्र्वां भव॑। नना॑न्दरि स॒म्राज्ञी॑ भव॒ सम्राज्ञी॒ अधि॑ दे॒वृषु॒ स्वाहा॑*॥ इदं सूर्यायै सावित्र्यै—इदन्न मम॥४॥ इन चार मन्त्रों से एक-एक से एक-एक करके चार आज्याहुति देके, पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे स्विष्टकृत् होमाहुति एक, व्याहृति आज्याहुति चार और प्राजापत्याहुति एक, ये सब मिलके छह आज्याहुति देकर— सम॑ञ्जन्तु विश्वे॑ दे॒वाः समापो॒ हृद॑यानि नौ। सं मा॑त॒रिश्व॒ सं धा॒ता समु॑ दे॒ष्ट्री द॑धातु नौ**॥ इस मन्त्र को बोलके दोनों दधिप्राशन करें। तत्पश्चात्— अहं भो अभिवादयामि ¶ ॥

  • हे वरानने! तू (श्वशुरे) मेरे पिता जोकि तेरा श्वशुर है, उसमें प्रीति करके (सम्राज्ञी) सम्यक् प्रकाशमान, चक्रवर्ती राजा की राणी के समान पक्षपात छोड़के प्रवृत्त (भव) हो। (श्वश्र्वाम्) मेरी माता जोकि तेरी सासु है, उसमें प्रेमयुक्त होके उसी की आज्ञा में (सम्राज्ञी) सम्यक् प्रकाशमान (भव) रहा कर। (ननान्दरि) जो मेरी बहिन और तेरी ननन्द है, उसमें भी (सम्राज्ञी) प्रीति से प्रकाशमान (अधि भव) अधिकारयुक्त हो, अर्थात् सबसे अविरोधपूर्वक प्रीति से बर्त्ता कर॥४॥ ** इस मन्त्र का अर्थ पृष्ठ १५६ में लिखित समझ लेना। ∂ इससे उत्तम 'नमस्ते' यह वेदोक्त वाक्य अभिवादन के लिए नित्यप्रति स्त्री-पुरुष, पिता-पुत्र अथवा गुरु-शिष्य आदि के लिए है। प्रातः-सायं अपूर्व समागम में जब-जब मिलें तब-तब इसी वाक्य से परस्पर वन्दन करें।

गृहाश्रमप्रकरणम् १८७ इस वाक्य को बोलके दोनों वधू-वर, वर की माता-पिता आदि वृद्धों को प्रीतिपूर्वक नमस्कार करें। पश्चात् सुभूषित होकर शुभासन पर बैठके पृष्ठ ३६-३७ में लिखे प्रमाणे वामदेव्यगान करके, उसी समय पृष्ठ ९-१२ में लिखे प्रमाणे ईश्वरोपासना करनी। उस समय कार्यार्थ आये· हुए सब स्त्री-पुरुष ध्यानावस्थित होकर परमेश्वरं का ध्यान करें। तथा वधू-वर .पिता, आचार्य और पुरोहित आदि को कहें कि— ओं स्वस्ति भवन्तो ब्रुवन्तु॥ आप लोग स्वस्तिवाचन करें। तत्पश्चात् पिता, आचार्य, पुरोहित जो विद्वान् हों, अथवा उनके अभाव में यदि वधू-वर विद्वान्, वेदवित् हों, तो वे ही दोनों पृ० १३-१७ में लिखे प्रमाणे स्वस्तिवाचन का पाठ बड़े प्रेम से करें। पाठ हुए पश्चात् कार्यार्थ आये हुए स्त्री-पुरुष सब— ओं स्वस्ति ओं स्वस्ति ओं स्वस्ति॥ इस वाक्य को बोलें। तत्पश्चात् कार्यकर्त्ता, पिता, चाचा, भाई आदि पुरुषों को तथा माता, चाची, भगिनी आदि स्त्रियों को यथावत् सत्कार करके विदा करें। तत्पश्चात् यदि किसी विशेष कारण से श्वशुरगृह में गर्भाधान-संस्कार न हो सके, तो वधू-वर क्षार-आहार और विषय-तृणारहित व्रतस्थ होके पृष्ठ ३८-५४ में लिखे प्रमाणे विवाह के चौथे दिवस में गर्भाधान संस्कार करें। अथवा उस दिन ऋतुकाल न हो, तो किसी दूसरे दिन गर्भस्थापन करें और जो वर दूसरे देश से विवाह के लिए आया हो तो वह जहाँ

१८८ संस्कारविधिः जिस स्थान में विवाह करने के लिए जाकर उतरा हो, उसी स्थान में गर्भाधान करे। पुनः अपने घर आके पति, सासु, श्वशुर, ननन्द, देवर, देवराणी, ज्येष्ठ-जेठाणी आदि कुटुम्ब के मनुष्य वधू की पूजा, अर्थात् सत्कार करें। सदा प्रीतिपूर्वक परस्पर वर्तें और मधुरवाणी, वस्त्र, आभूषण आदि से सदा प्रसन्न और सन्तुष्ट वधू को रक्खें तथा वधू भी सबको प्रसन्न रक्खे और वर उस वधू के साथ पत्नीव्रतादि सद्धर्म से वर्तें तथा पत्नी भी पति के साथ पतिव्रतादि सद्धर्म, चाल-चलन से सदा पति की आज्ञा में तत्पर और उत्सुक रहे तथा वर भी स्त्री की सेवा-प्रसन्नता में तत्पर रहे॥ ॥ इति विवाहसंस्कारविधिः समाप्तः ॥

अथ गृहाश्रमसंस्कारविधिं वक्ष्यामः 'गृहाश्रम-संस्कार' उसे कहते हैं कि जो ऐहिक और पारलौकिक सुख-प्राप्ति के लिए विवाह करके अपने सामर्थ्य के अनुसार परोपकार करना और नियत काल में यथाविधि ईश्वर-उपासना एवं गृहकृत्य करना और सत्य धर्म में ही अपना तन-मन-धन लगाना तथा धर्मानुसार सन्तानों की उत्पत्ति करना। अत्र प्रमाणानि सोमो॑ वधू॒युर॑भवद॒श्विना॑स्तामु॒भा व॒रा। सूर्या॒ यत्पत्ये॒ शंस॑न्तीं मन॑सा सवि॒ताद॑दात्॥ १॥ इ॒हैव स्तं॒ मा वि यौ॑ष्टं॒ विश्व॒मायु॒र्व्य॑श्नुतम्। क्रीड॑न्तौ पु॒त्रैर्नप्तृ॑भि॒र्मोद॑मानौ स्व॒स्त्यौ॑॥ २॥ अर्थ—(सोमः) सुकुमार, शुभगुणयुक्त, (वधूयुः) वधू की कामना करनेवाला पति तथा पति की कामना करनेवाली वधू (अश्विना) दोनों ब्रह्मचर्य से विद्या को प्राप्त (अभवत्) होवें और (उभा) दोनों (वरा) श्रेष्ठ, तुल्य गुण-कर्म-स्वभाववाले (आस्ताम्) होवें। ऐसी (यत्) जो (सूर्याम्) सूर्य की किरणवत्, सौन्दर्य गुणयुक्त, (पत्ये) पति के लिए (मनसा) मन से (शंसन्तीम्) गुण-कीर्त्तन करनेवाली वधू है, उसको पुरुष और इसी प्रकार के पुरुष को स्त्री (सविता) सकल जगत् का उत्पादक परमात्मा (ददात्) देता है, अर्थात् बड़े भाग्य से दोनों स्त्री-पुरुषों का, जोकि तुल्य गुण-कर्म-स्वभाव हों, जोड़ा मिलता है॥ १॥ हे स्त्री और पुरुष ! मैं परमेश्वर आज्ञा देता हूँ कि तुम्हारे लिए विवाह में जो पूर्व प्रतिज्ञा हो चुकी है, जिसे तुम दोनों

१९० संस्कारविधिः ने स्वीकार किया है, (इहैव) इसी में (स्तम्) तत्पर रहो, (मा वियौष्टम्) इस प्रतिज्ञा से वियुक्त मत होओ। (विश्वमायुर्व्यश्नुतम्) ऋतुगामी होके वीर्य का अधिक नाश न करके सम्पूर्ण आयु, जो सौ वर्षों से कम नहीं है, उसे प्राप्त होओ और पूर्वोक्त धर्मरीति से (पुत्रैः) पुत्रों और (नप्तृभिः) नातियों के साथ (क्रीडन्तौ) क्रीड़ा करते हुए (स्वस्तकौ) उत्तम गृहवाले (मोदमानौ) आनन्दित होकर गृहाश्रम में प्रीतिपूर्वक वास करो ॥ २ ॥ सुम॒ङ्गली प्र॒तर॑णी गृ॒हाणां॑ सु॒शेवा॒ पत्ये॑ श्वशु॑राय॒ शंभूः॑ । स्यो॒ना श्व॒श्र्वै प्र गृ॒हान् वि॒शेमान् ॥ ३ ॥ स्यो॒ना भ॑व॒ श्वशु॑रेभ्यः स्यो॒ना पत्ये॑ गृ॒हेभ्यः॑ । स्यो॒नास्यै सर्व॑स्यै वि॒शे स्यो॒ना पु॒ष्टायै॑षां भव ॥ ४ ॥ या दु॒र्हार्दो॑ यु॒वत॑यो याश्चे॒ह ज॒रती॑रपि॑ । वर्चो॒ न्व१॑स्यै सं द॒त्ताथास्तं॑ वि॒परै॑तन ॥ ५ ॥ आ रो॑ह॒ तल्पं॑ सुम॒न॒स्यमा॑ने॒ह प्र॒जां ज॑नय॒ पत्ये॑ अ॒स्मै । इ॒न्द्रा॒णीव॑ सु॒बुधा॒ बुध्य॑माना॒ ज्योति॑रग्रा उ॒षसः॒ प्रति॑ जागरासि ॥ ६ ॥ अर्थ—हे वरानने ! तू (सुमङ्गली) अच्छे मङ्गलाचरण करने तथा (प्रतरणी) दोष और शोकादि से पृथक् रहनेवाली, (गृहाणाम्) गृह-कार्यों में चतुर और तत्पर रहकर (सुशेवा) उत्तम सुखयुक्त होके (पत्ये) पति (श्वशुराय) श्वशुर और (श्वश्र्वै) सासु के लिए (शम्भूः) सुखकर्त्री और (स्योना) स्वयं प्रसन्न हुई (इमान्) इन (गृहान्) घरों में सुकपूर्वक (प्रविश) प्रवेश कर ॥ ३ ॥ हे वधू ! तू (श्वशुरेभ्यः) श्वशुरादि के लिए (स्योना) सुखदाता, (पत्ये) पति के लिए (स्योना) सुखदाता, (गृहेभ्यः)

गृहाश्रमप्रकरणम् १९१ गृहस्थ सम्बन्धियों के लिए (स्योना) सुखदायक (भव) हो और (अस्यै) इस (सर्वस्यै) सब (विशे) प्रजा के अर्थ (स्योना) सुखप्रद और (एषाम्) इनके (पुष्टाय) पोषण के अर्थ तत्पर (भव) हो॥४॥ (याः) जो (दुर्हर्दः) दुष्ट हृदयवाली, अर्थात् दुष्टात्मा (युवतयः) जवान स्त्रियाँ, (च) और (याः) जो (इह) इस स्थान में (जरतीः) बुड्डी = वृद्ध स्त्रियाँ हों, वे (अपि) भी (अस्यै) इस वधू को (नू) शीघ्र (वर्चः) तेज (सं दत्त) देवें। (अथ) इसके पश्चात् (अस्तम्) अपने-अपने घर को (विपरेतन) चली जावें और फिर इसके पास कभी न आवें॥५॥ हे वरानने ! तू (सुमनस्यमाना) प्रसन्नचित होकर (तल्पम्) पर्यङ्क पर (आरोह) चढ़के शयन कर और (इह) इस गृहाश्रम में स्थिर रहकर (अस्मै) इस (पत्ये) पति के लिए (प्रजां जनय) प्रजा को उत्पन्न कर। (सुबुधा) सुन्दर ज्ञानी (बुध्यमाना) उत्तम शिक्षा को प्राप्त (इन्द्राणीव) सूर्य की कान्ति के समान तू (उषसः) उषःकाल से (अग्रा) पहली (ज्योतिः) ज्योति के तुल्य (प्रति जागरासि) प्रत्यक्ष सब कामों में जागती रह॥६॥ दे॒वा अग्रे॒ न्य॑पिद्यन्त॒ पत्नीः॒ सम॑स्पृशन्त त॒न्व॑स्त॒नूभिः॑। सूर्यै॑व नारि वि॒श्वरू॑पा महि॒त्वा प्र॒जाव॑ती॒ पत्या॒ सं भ॑वेह॥७॥ सं पि॑तरावृ॒त्विये॑ सृजेथां मा॒ता पि॒ता च॒ रेत॑सो भवाथः। मर्य॑ इव यो॒षामधि॑ रोहयैनां प्र॒जां कृ॑ण्वाथामि॒ह पु॑ष्यतं॒ रयिम्॥८॥ तां पू॑षञ्छि॒वत॑मा॒मेर॑यस्व॒ यस्यां॑ बी॒जं मनु॒ष्या॑३ वप॑न्ति। या न॑ ऊ॒रू उ॑श॒ती वि॒श्रया॑ति॒ यस्या॑मुश॒न्तः प्र॒हरे॑म॒ शेपः॑॥९॥ अर्थ—हे सौभाग्यप्रदे (नारि) नारी ! तू जैसे (इह) इस