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सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

तृतीयः परिच्छेदः ४३ अब चतुर्थ मन्त्र का उद्धार कहते हैं—'ॐ अच्युतायाविकृतायानन्ताय अध्यक्षाय नमः' । यह २० अक्षरों का मन्त्र है । इस प्रकार सुषुप्ति व्यूह के चारों मन्त्र कह दिये गये ॥ ४७-५६ ॥ एकार्णं पदमाद्यं तु द्वितीयं चतुरक्षरम् । पञ्चाक्षरं तृतीयं तु चतुर्थं चतुरक्षरम् ॥ ५७ ॥ तथैव पञ्चमं विद्धि अन्तस्थं द्व्यक्षरं स्मृतम् । चतुर्णामपि मन्त्राणामुद्धारप्रकारं तत्तत्पदविभागांश्चाह—आदायाक्षगतं बीजमि- त्यारभ्य अन्तस्थं द्व्यक्षरं स्मृतमित्यन्तम् । एतद्व्याख्यानमार्गस्य पूर्वमेव प्रदर्शितत्वात् सुगमः । प्राग् वर्णचक्रं विलिख्य उक्तक्रमेण वर्णोद्धारे कृते—ॐ अप्रतिहतानन्तगतये परमेश्वराय कर्त्रे नमः । ॐ अमोघसर्वशक्त्यात्मने भगवते नमो नमः । ॐ प्राणापान- समानोदानव्यानप्राणाय परायोद्गमाय नमः। ॐ अच्युतायाविकृतायानन्ताय अध्यक्षाय नम इति क्रमेण एकविंशाक्षरोऽष्टादशाक्षरस्त्रयोविंशत्यक्षरो विंशत्यक्षरश्चत्वारो मन्त्रा भवन्ति ॥ १८-५७ ॥ इस चौथे मन्त्र में एक अक्षर का प्रथम पद, चार अक्षर का दूसरा पद, पाँच अक्षर का तीसरा पद, चार अक्षर का चौथा पद, उसी प्रकार चार अक्षर का पाँचवाँ पद, तदनन्तर दो अक्षर का छठाँ पद समझना चाहिये ॥ ५७-५८ ॥ पदानां वर्णसंख्यापूरणप्रकारकथनम् यत्र यत्र पदानां च वर्णाधिक्यमुदाहृतम् । तत्रादौ नाभिपूर्वं तु व्याहृत्याद्यं पदं न्यसेत् ॥ ५८ ॥ ॥ इति श्रीपाञ्चरात्रे श्रीसात्वतसंहितायां सुषुप्तिव्यूहसमाराधनं नाम तृतीयः परिच्छेदः ॥ ३ ॥ — ❦ — पदानां वर्णसंख्यापूरणप्रकारमाह—यत्रेति । पदानां पूर्वोक्तमन्त्रान्तर्गतपदानां मध्ये यत्र यत्र यस्मिन् यस्मिन् पदे प्रथममन्त्रेऽनन्तगतये इत्यत्र वर्णाधिक्यमुदाहृतम् । षडक्षरं तृतीयं त्विति अक्षराधिक्यमुक्तम् । तत्र तस्मिन् पदे, आदौ प्रथमत आद्यपदाद् अप्रतिहतेति पदस्य उपरि विद्यमानमकारमाहृत्यानन्तगतय इति पदस्यादौ योजयेदिति यावत् । तथा च अनन्तगतये इति षडक्षरत्वं संभवति । एवं चतुर्थमन्त्रे अविकृताया- नन्ताय इत्यत्रापि बोध्यम् ॥ ५८ ॥ ॥ इति श्रीमौज्यायनकुलतिलकस्य यदुगिरीश्वरचरणकमलार्चकस्य योगानन्दभट्टाचार्यस्य तनयेन अलशिङ्गभट्टेन विरचिते सात्वततन्त्रभाष्ये तृतीयः परिच्छेदः ॥ ३ ॥ — ❦ —

४४ सात्वतसंहिता अब वर्ण संख्या पूर्ति का प्रकार कहते हैं—पूर्वोक्त मन्त्रों के पद के मध्य में जिस-जिस पद में (जैसे प्रथम मन्त्र के ‘अनन्तगत’ पद में) वर्णाधिक्य कहा गया है, (षडक्षरं तृतीय त्विति यहाँ भी अक्षराधिक्य कहा गया है) वहाँ उस पद में आदि पद के ऊपर विद्यमान अकार को हटा कर ‘अनन्तगतये’, इस पद के आदि में जोड़ देवे । ऐसा करने से ‘अनन्तगतये’ यह छह अक्षर का पद सम्पन्न हो जायेगा । इसी प्रकार चतुर्थ मन्त्र में ‘अविकृतायानन्ताय’ यहाँ पर भी समझ लेना चाहिये ॥ ५८ ॥ विमर्श—यहाँ पर विचार करना चाहिये कि सात्त्वत संहिता के द्वितीय परिच्छेद में तूर्यव्यूह का एक ही मन्त्र उद्धृत किया गया है जबकि सुषुप्ति, स्वप्न तथा जाग्रत इन तीन व्यूहों में चार-चार मन्त्र उद्धृत किये गये हैं उसके अनुरोध से तूर्यव्यूह में भी चार मन्त्र का उद्धार अपेक्षित है । जबकि न केवल भाष्य में अपितु संहिता में भी चातुरात्म्य चतुष्ट्य का प्रतिपादन किया गया है । जब तूर्यव्यूह में भी चातुरात्म्य भासित हो रहा है तब वहाँ भी चार मन्त्र होना चाहिए यह स्वाभाविकी शङ्का उत्पन्न होती है । तब इसका परिहार इस प्रकार करना चाहिये—द्वितीय परिच्छेद में पर स्वरूप का विवरण मात्र है । किन्तु तृतीय, चतुर्थ एवं पञ्चम परिच्छेद में सुषुप्ति, स्वप्न एवं जाग्रत्पद में स्थित व्यूह स्वरूपों का वर्णन है । इस व्यूह्रन्य ब्रह्म को चातुरात्म्य पद से भी कहा जाता है । यह चातुरात्म्य परस्वरूप में अव्यक्तदशा में रहता है । इसलिये वहाँ भी चातुरात्म्य प्रयोग होता है । उसे तुर्यव्यूह नाम से भी कहा जाता है—यहाँ नित्योदित दशा तथा शान्तोदित दशा दो प्रकार की दशा स्वीकार की जाती है । नित्योदित दशा परात्पर वासुदेव दशा तथा शान्तोदित दशा पर वासुदेव दशा कही जाती है । किन्तु दोनों दशा में वासुदेव का प्राधान्य रहता है । उस अवस्था में सङ्कर्षणादि तीनों का तथा अच्युतादि तीन का अव्यक्त रूप से अवस्थान रहता है । प्रकृति में आदिमूर्ति वासुदेव का ही प्राधान्य प्रदर्शित करने के कारण तूर्यव्यूहापर नामक परस्वरूप के आराधन के लिये यहाँ एक ही मन्त्र का निर्देश किया गया है । ॥ इस प्रकार डॉ० सुधाकर मालवीय कृत सात्त्वत संहिता के सुषुप्तिव्यूहसमाराधन नामक तृतीय परिच्छेद की हिन्दी समाप्त हुई ॥ ३ ॥ — ᪥ —

चतुर्थः परिच्छेदः स्वप्नव्यूहसमाराधनम् नारद उवाच अथाह भगवान् देवो रक्तराजीवलोचनः । प्रसन्नः सुप्रसन्नास्यो विधानमपरं द्विजाः ॥ १ ॥ अथ चतुर्थो व्याख्यास्यते । स्वप्नव्यूहविधानमाहेत्याह—अथेति द्वाभ्याम् । येन कर्मणा, आत्मा परमात्मा, स्वप्ने आत्मैव जीव इव वर्णकमलोपरि व्यक्ततां नीतः = प्रकाशितः । तद्विधानमाहेति पूर्वश्लोकेनान्वयः ॥ १-२ ॥ अब चतुर्थ स्वप्नव्यूह की व्याख्या करते हैं । श्री नारदजी ने कहा—हे महर्षियों ! अब इसके बाद लाल कमल के समान नेत्रों वाले, प्रसन्न तथा प्रसन्न मुख वाले भगवान् ने दूसरा विधान कहा ॥ १ ॥ श्रीभगवानुवाच येनात्मा स्वप्न एवात्मा कर्मिणामनुकम्पया । क्रमेण व्यक्ततां नीतो वाग्वर्णकमलोपरि ॥ २ ॥ श्रीभगवान् ने कहा—जिस कर्म से साधक के ऊपर कृपा कर स्वप्न में परमात्मा को जीवात्मा के समान (मातृका) वर्ण कमल के ऊपर प्रकाशित किया जाता है, हे सङ्कर्षण ! अब आप उस विधान को सुनिये ॥ २ ॥ अभिन्नपूर्णषाड्गुण्यविभवेनोपबृंहितम् । भाभिः सितादिभिर्दीप्तमभिन्नाभिर्निरन्तरम् ॥ ३ ॥ अवलोक्यामलं देवमुदितं स्वेन तेजसा । कर्णिकाग्रं समाश्रित्य दिव्यं मन्त्रतनुं पुनः ॥ ४ ॥ पश्येत् स्वयं स्वशक्त्या वै कालेनालक्ष्यमूर्तिना । संहरन्तं च तद्रूपं व्यक्तं पूर्वोक्तलक्षणम् ॥ ५ ॥ एवं मन्त्रमयं देवमुपसंहृत्य लाङ्गलिन् । आमूलात् कर्णिकाग्रं च सम्पूर्यास्ते स्वतेजसा ॥ ६ ॥

४६ सात्वतसंहिता ब्रह्मयूपस्वरूपेण त्वाक्रम्य स्वं महामते। आदौ वासुदेवादिनां चतुर्णामपि मूलभूतस्य विशाखयूपसंज्ञस्य भगवतो लक्षण- माह—अभित्रेति सार्धैश्चतुर्भिः। अभिन्नपूर्णषाड्गुण्यविभवेनोपबृंहितम्। सङ्कर्षणादि- वद् गुणद्वयभेदं विना वासुदेववद् अन्यूनानतिरिक्तषाड्गुण्यपरिपूर्र्णमित्यर्थः। अभिन्नाभिः सितादिभिर्भाभिर्दीप्तं = वासुदेवादिवत् पार्थक्येन सितादिवर्णभेदं विना श्वेतरक्तपीतकृष्णैश्चतुर्भिरपि तेजोभिर्भास्वरमित्यर्थः। स्वेन तेजसा उदितम् = केवल- तेजोरूपमित्यर्थः। देवं = विशाखयूपाख्यम् अवलोक्य = पूर्वमेव तेजोरूपं दृष्ट्वे- त्यर्थः। पुनः कर्णिकाग्रं समाश्रित्य मन्त्रतनुं पश्येत्, मूर्तीभूतं पश्येदित्यर्थः। पुनस्तद्रूपं संहरन्तं च पश्येदित्यन्वयः। एवं मन्त्रमयं देहमुपसंहृत्य आमूलात् कर्णिकाग्रं स्वतेजसा सम्पूय ब्रह्मयूपस्वरूपेणास्ते, मूर्तिवर्जितः केवलतेजोरूपमाश्रित्य हृत्कमलकर्णिका- रूपेण शाखाभूतानां वासुदेवादीनां मध्ययूपस्थानीयत्वं प्राप्नोतीत्यर्थः। एवमेवोपबृंहितं लक्ष्मीतन्त्रेऽपि—व्यूहाद् व्यूहसमुत्पत्तौ पदाद् यावत् पदान्तरम्। अन्तरं सकलं देशं सम्पूरयति तेजसा॥ पूजितस्तेजसां राशिरव्यक्तो मूर्तिवर्जितः। विशाखयूप इत्युक्तस्तत्तज्ज्ञानादिबृंहितः॥ तस्मिन् तस्मिन् पदे तस्मान्मूर्तिशाखाचतुष्टयम्। वासुदेवादि कं शक्र प्रादुर्भवति वै क्रमात्॥ (११।११-१३) इति। विशाखयूपशब्दनिर्वचनं च तत्रैवोक्तम्— ‘शाखास्तु वासुदेवाद्या विभोर्देवस्य कीर्तिताः। विशाखयूपो भगवान् वितता हि करोति तत्॥’ (लक्ष्मी० ११।२९) इति ॥ ३-६॥ सर्वप्रथम वासुदेवादि चार व्यूहों के मूलभूत विशाखयूप संज्ञक भगवान् का लक्षण कहते हैं—षाड्गुण्य विभव से अभिन्न एवं सितादि वर्ण भेद के विना चारों प्रकार के तेजों से भास्कर (श्वेत, रक्त, पीत एवं कृष्ण इन चारों प्रकारों के तेजों से देदीप्यमान) केवल तेजःस्वरूप विशाखयूप भगवान् को प्रथम देख कर, कर्णिका के अग्रभाग का अवलम्बन कर, मन्त्र शरीर को मूर्ति रूप में दर्शन करे। फिर उस रूप का उपसंहार करते हुए देखे। फिर मन्त्रमय उस शरीर का उपसंहार कर कर्णिका के मूल से कर्णिका के अग्रभाग तक अपने तेज से पूर्ण कर जो विशाख- यूप भगवान् ब्रह्मयूपशरीर से विद्यमान हो जाते हैं वह मूर्ति रहित होकर केवल तेजःस्वरूप का आश्रय लेकर शाखाभूत वासुदेवादि में मध्य यूप के स्थान में विराजमान हो जाते हैं ॥ ६-७ ॥ विमर्श—वही विशाखयूप भगवान् अपने तेज से ब्रह्मरूप में परिणत हो जाते हैं। यतः उन सर्वव्यापक विभु के वासुदेवादि शाखायें हैं इसलिये उन्हें विशाखयूप कहा जाता है ॥ ६-७ ॥

चतुर्थः परिच्छेदः ४७ वासुदेवादीनां लक्षणकथनम् सौम्यमूर्तिचतुष्कं तु सूर्यदिक्प्रसृतं च यत् ॥ ७ ॥ प्राच्यां सितेन वपुषा सूर्यकान्त्यधिकेन तु । व्यक्तिमभ्येति भगवान् वासुदेवात्मना स्वयं ॥ ८ ॥ पद्मरागसमानेन तेजसा तदनन्तरम् । उदेति दक्षिणस्यां वै प्रभुः सङ्कर्षणात्मना ॥ ९ ॥ अथ वासुदेवादीनां लक्षणान्याह—सौम्येत्यारभ्य ज्वालामण्डलमध्यगा इत्यन्तम् ॥ ७-१६ ॥ अब वासुदेवादि का लक्षण कहते हैं—वे भगवान् पूर्व से उत्तर दिशा तक चार प्रकार की सौम्यादि मूर्तियों में प्रकट हैं । पूर्व में सूर्य कान्ति से भी अधिक अपने तेज से वासुदेव के रूप में व्यक्त हो जाते हैं ॥ ८-९ ॥ घर्मांशुरश्मिसन्तप्तशतधामाधिकेन तु । रूपेण पश्चिमस्यां च व्यक्तं प्रद्युम्नसंज्ञया ॥ १० ॥ वही भगवान् सैकड़ों सूर्य से अधिक रश्मियों से भी अधिक तेज से युक्त प्रद्युम्न रूप से पश्चिम दिशा में व्यक्त हो जाते हैं ॥ १० ॥ शरद्गगनसंकाशवर्णेन परमेश्वरः । समास्त उत्तरस्यां चाप्यनिरुद्धात्मना ततः ॥ ११ ॥ वही परमेश्वर शरत्कालीन आकाश के समान अपने स्वच्छ रूप से उत्तर दिशा में अनिरुद्ध रूप से प्रगट हो जाते हैं ॥ ११ ॥ संस्थानमादिमूर्तेर्वे सर्वेषां तु समं स्मृतम् । सूर्यकोटिप्रभाः सर्वे तेजसा कमलेक्षणाः ॥ १२ ॥ आदि मूर्ति के सभी स्वरूपों का संस्थान समान ही कहा गया है । सभी के नेत्र कमल के समान मनोहर हैं । तेज में वे सभी मूर्त्तियाँ करोड़ों सूर्य के समान तेजस्विनी हैं ॥ १२ ॥ दन्तज्योत्स्नावितानैस्तु प्रकटीकृतदिङ्मुखाः । पूर्णचन्द्रायुताकारा मुक्ताहाराद्यलङ्कृताः ॥ १३ ॥ लसत्पीयूषसदृशैः स्वाम्बरैः स्रग्वरैर्युताः । वरायुधोद्यतकराः स्वकैश्चिह्नैरनुज्झिताः ॥ १४ ॥ सभी प्रभु की मूर्तियाँ अपने दाँतों की ज्योत्स्ना से समस्त दिशाओं को देदीप्यमान करती हैं । अयुत संख्यक चन्द्रमा की कान्ति के समान सभी मोतियों

४८ सात्वतसंहिता की माला से अलङ्कृत हैं । सभी स्वच्छ पीयूष के समान अम्बरों तथा मालादि से युक्त हैं । सभी के हाथों में श्रेष्ठ आयुध हैं और सभी अपने-अपने चिह्नों से विराजमान हैं ॥ १३-१४ ॥ रेखोत्थितैस्तु कह्लारैः पादपद्मतलाङ्किताः । विनम्रजनसन्तापशमनव्याप्ताननाः ॥ १५ ॥ रेखा के रूप में विद्यमान सभी के पादपद्म के तलवे अलङ्कृत हैं । किं बहुना सभी के मुख मण्डल विनम्रजनों के सन्ताप शमन के लिये व्याप्त हैं ॥ १५ ॥ करुणापूर्णहृदया जगदुद्धरणोद्यताः । स्वदेहतेजःसम्भूतज्वालामण्डलमध्यगाः ॥ १६ ॥ सभी का हृदय करुणा से पूर्ण है । सभी जगत् के उद्धार के लिये प्रयत्नशील हैं । सभी अपने शरीर के तेज से उत्पन्न ज्वाला मण्डल के मध्य में विद्यमान है ॥ १६ ॥ एवमेवैष भगवान् सम्पूज्यः प्राक्प्रयोगतः । एकैकेन तु भागेन प्राभवेण क्रमेण तु ॥ १७ ॥ पुनरेवानिरुद्धादीन् प्राङ्‌मूर्त्यन्तं महामते । क्रमान्निरन्तरैर्भोगैरभ्यर्च्य परमेश्वरम् ॥ १८ ॥ प्रणवद्वितयेनैव बुद्ध्या तु सुविशुद्धया । अप्ययाख्येन विधिना हृद्यागनिरतैर्बुधैः ॥ १९ ॥ एषां वासुदेवादीनां प्रभवव्ययक्रमेण मानसार्चनमाह—एवमेवेति त्रिभिः । क्रमेण सृष्टिक्रमणेत्यर्थः । वासुदेवाद्यनिरुद्धान्तमिति यावत् । प्रणवद्वितयेन द्वितीयपरिच्छेदोक्त- प्रीतिमन्त्रेणेत्यर्थः । किन्तु तत्र 'प्रीयतां मे परः प्रभुः' (सा० २।७६) इत्युक्तम् । अत्र तु परशब्दस्थाने वासुदेवसङ्कर्षणाद्यन्यतमशब्दः प्रकरणानुरोधेन योज्यः ॥ १७-१९ ॥ वासुदेवादिकों का प्रभव सृष्टि एवं प्रलय क्रम से मानस अर्चना का प्रकार— इस प्रकार इन भगवान् के एक भाग की सृष्टि क्रम से पूर्व प्रयोग के अनुसार पूजा करे अर्थात् पहले वासुदेव, फिर सङ्कर्षण, फिर प्रद्युम्न, फिर अनिरुद्ध की पूजा करे । फिर, हे महामते ! अव्यय एवं संहार क्रम से अनिरुद्ध से आरम्भ कर प्राक् मूर्ति श्री वासुदेव पर्यन्त निरन्तर भोगों द्वारा प्रीति मन्त्र से अर्चना करे । विमर्श—द्वितीय परिच्छेद में 'प्रीयतां मे परः प्रभुः' यह प्रीति मन्त्र कहा गया है यहाँ 'पर' के स्थान में दो प्रणव लगा कर वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न एवं अनिरुद्ध का प्रयोग करना चाहिए (यथा—ॐ ॐ वासुदेवः प्रीयताम् इत्यादि) ॥ १९ ॥ अथ भिन्नतनोर्मन्त्रं देवस्यास्य महात्मनः । विशाखयूपसंज्ञस्य वक्ष्ये विद्याविवेकदम् ॥ २० ॥

चतुर्थः परिच्छेदः ४९ आदौ विशाखयूपमन्त्रमाह—अथेत्यारभ्य मन्त्रस्यास्य महामते इत्यन्तम् । 'ॐ पराय तेजोरूपाय परानपेक्षाय परानपेक्षिताय नमः' इति चतुर्विंशत्यक्षरोऽयं मन्त्रः समुद्धृतो भवति ॥ २०-३० ॥ अब विभिन्न शरीर वाले इन महात्मा विशाखयूप संज्ञक देव का विद्या एवं विवेकप्रद महामन्त्र कहता हूँ ॥ २० ॥ वर्णमक्षस्थमादाय त्वाद्यमेकादशात् ततः । भिन्नं नाभिद्वितीयेन तृतीयं नेमिमण्डलात् ॥ २१ ॥ द्वितीयं केवलं बाह्यात् तेजोरूपाय वै पदम् । ततस्त्वेकादशात् पूर्वं केवलं तु समाहरेत् ॥ २२ ॥ तृतीयमक्षरं बाह्याद् युक्तं नाभ्यपरेण तु । दशमादपरं वर्णं पूर्वमेकादशात् ततः ॥ २३ ॥ एकादशस्वराक्रान्तमुद्धरेत् तदनन्तरम् । ततो नाभिद्वितीयेन युक्तं प्रध्यक्षरं हि यत् ॥ २४ ॥ केवलं द्वितीयं बाह्यादाद्यमेकादशात् तथा । नेमेस्तृतीयं तदनु द्वितीयं स्वरसंयुक्तम् ॥ २५ ॥ दशमादपरं शुद्धं पूर्वमेकादशात् ततः । नाभ्येकादशसंयुक्तं तदन्तेऽमललोचन ॥ २६ ॥ नाभेस्तृतीयसंयुक्तं प्रधिवर्णं समाहरेत् । अथ नाभिद्वितीयेन युक्तं यत्परमष्टमात् ॥ २७ ॥ नेमिद्वितीयं तदनु नमस्कारसमन्वितम् । चतुर्विंशतिभिर्वर्णैर्युक्तो मन्त्रो ह्ययं महान् ॥ २८ ॥ 'वर्णमक्षस्थमादाय ... ... नमस्कारसमन्वितम्' पर्यन्त (२१-२८) महामन्त्र कहा गया है, जिसका स्वरूप इस प्रकार है—'ॐ पराय तेजोरूपाय परानपेक्षाय परानपेक्षिताय नमः' । यह महामन्त्र चौबीस वर्णों से युक्त है ॥ २१-२८ ॥ प्रणवेन पदं चास्य पूर्वमेकाक्षरं स्मृतम् । द्वितीयं त्र्यक्षरं प्रोक्तं पञ्चार्णं तदनन्तरम् ॥ २९ ॥ षडक्षरं चतुर्थं तु सप्तार्णं चात्र पञ्चमम् । पदं तु द्व्यक्षरं षष्ठं मन्त्रस्यास्य महामते ॥ ३० ॥ अब इसके अन्तर्गत पदों तथा अक्षरों को कहते हैं—प्रथम पद एकाक्षर, द्वितीय पद तीन अक्षर, तृतीय पद पाँच अक्षर, चतुर्थ पद छह अक्षर, पञ्चम पद सात अक्षर, षष्ठ पद दो अक्षर इस प्रकार मन्त्रों के अक्षरों एवं पद की संख्या कही गई ।

५० सात्वतसंहिता नानामन्त्रस्वरूपेण ह्यादिदेवः परो विभुः । आदिमध्यावसानेषु स्थितः सर्वस्य सर्वदा ॥ ३१ ॥ अथ विशाखयूपः पूर्वोक्तः परवासुदेव एवेत्यभिप्रायं विशदयति—नानामन्त्रेति । वही आदिदेव पर विभु वासुदेव सर्वदा सभी के आदि, मध्य एवं अवसान में अनेक मन्त्र स्वरूपों से स्थित हैं ॥ ३१ ॥ चतुर्व्यूहचतुष्के स्वे शान्तादिव्यक्तलक्षणे । प्राधान्येन त्रयाणां च देवानांमवतिष्ठते ॥ ३२ ॥ एवं शान्तोदितादिव्यूहचतुष्टयेऽपि परवासुदेव एव तत्तद्व्यूहान्तर्गतवासुदेव- रूपेणावतिष्ठत इत्याह—चतुर्व्यूहेति । अत्र शान्तोदितव्यूहान्तर्गतवासुदेवस्य परात्पर- वासुदेवाभिन्नत्वेनोभयोरप्येकेनैव मन्त्रेण चारितार्थ्यात् सङ्कर्षणादीनां त्रयाणां तदङ्गत्वेन प्रत्येकं मन्त्रानुक्तेश्च शान्तोदितवासुदेवस्याङ्गित्त्वरूपं प्राधान्यं ज्ञेयम् । सुषुप्त्यादिव्यूहत्रये तु प्रत्येकं चतुर्णां वासुदेवादिमन्त्राणामुक्तत्वात् तत्र वासुदेवस्याग्रगण्यत्वरूपं प्राधान्यं बोध्यम् ॥ ३२ ॥ वही वासुदेव प्रभु शान्तोदितादि व्यूह चतुष्टय में एवं सङ्कर्षणादि तीनों देवों में प्रधान रूप से स्थित रहते हैं ॥ ३२ ॥ यथाम्बरस्थः सविता त्वेक एव महामते । जलाश्रयाणि चाश्रित्य बहुत्वं सम्प्रदर्शयेत् ॥ ३३ ॥ एवमेकोऽपि भगवान् नानामन्त्राश्रयेषु च । तुर्यादिपदसंस्थेषु बहुत्वमुपयाति च ॥ ३४ ॥ अनुग्रहार्थं भविनां नानाश्रद्धावशेन तु । एवं परस्यैकस्यैव नानारूपत्वं दृष्टान्तमुखेन द्रढयति—यथेति सार्ध- द्वाभ्याम् ॥ ३३-३५ ॥ हे महामते ! जिस प्रकार आकाश स्थित एक ही सूर्य जल के आश्रय में प्रतिबिम्बित होकर अपना बहुत्व रूप प्रकट करते हैं इसी प्रकार एक भगवान् भी अपना बहुत्व लोगों पर अनुग्रह करने के लिये तथा भक्तों के श्रद्धावश अनेक मन्त्रों में तथा चार प्रकार के अपने रूपों में प्रकट करते हैं अर्थात् बहुत्व को प्राप्त करते हैं ॥ ३३-३५ ॥ स्वप्नव्यूहमन्त्रचतुष्टयोद्धारः चतुष्कमथ मन्त्राणां निबोध गदतो मम ॥ ३५ ॥ सितादिवर्णव्यक्तीनां वाचकत्वेन वै क्रमात् । अथ स्वप्नव्यूहमन्त्रचतुष्टयोद्धारमाह—चतुष्कमथ मन्त्राणामित्यारभ्य यावत्

चतुर्थः परिच्छेदः ५१ परिच्छेदपरिसमाप्ति । तथा च—'ॐ अं नमो भगवते वासुदेवाय ।' 'ॐ आं नमो भगवते सङ्कर्षणाय ।' 'ॐ अं नमो भगवते प्रद्युम्नाय ।' 'ॐ अः नमो भगवते अनिरुद्धाय' इति मन्त्रचतुष्कमुद्धृतं भवति ॥ ३५-४६ ॥ ॥ इति श्रीमौज्यायनकुलतिलकस्य यदुगिरीश्वरचरणकमलार्चकस्य योगानन्दभट्टाचार्यस्य तनयेन अलशिङ्गभट्टेन विरचिते सात्वततन्त्रभाष्ये चतुर्थः परिच्छेदः ॥ ४ ॥ — ❦*❧ — अब चारों मन्त्रों के स्वरूप को कहते हैं, जो सितादि वर्ण वाले देवों के क्रमशः वाचक हैं, उसे सुनिए ॥ ३५-३६ ॥ अक्षस्थं नाभिपूर्वं च वर्णं यद् दशमात् परम् ॥ ३६ ॥ नेमिपूर्वमधो नाभेस्त्रयोदशसमन्वितम् । द्वितीयं द्वादशाद् वर्णं द्वितीयात् परमं ततः ॥ ३७ ॥ पञ्चमं च बहिष्ठेभ्यस्त्रीनेतान् विद्धि केवलान् । ततोऽष्टमाद् द्वितीयं तु नाभ्येकादशभेदितम् ॥ ३८ ॥ पञ्चार्णं वासुदेवाय पदं च तदनन्तरम् । त्रयोदशाक्षरो ह्येष प्रथमं परिकीर्तितः ॥ ३९ ॥ 'अक्षस्थं ... ... प्रथमं परिकीर्तितः' (३६-३९) पर्यन्त प्रथम मन्त्र का स्वरूप इस प्रकार है—'ॐ अं नमो भगवते वासुदेवाय' । इस मन्त्र में अक्षरों की संख्या तेरह है ॥ ३६-३९ ॥ क्रमेण वक्ष्याम्यन्येषामुद्धारं तु यथा स्थितम् । अक्षस्थमक्षरं नाभेर्द्वितीयं तदनन्तरम् ॥ ४० ॥ पूर्वमन्त्रानुसारेण ततो दद्यात् पदत्रयम् । 'अक्षस्थमक्षर ... ... ततो दद्यात् पदत्रयम्' पर्यन्त (३९-४१) द्वितीय मन्त्र का स्वरूप इस प्रकार है—'ॐ आं नमो भगवते सङ्कर्षणाय' । यह तेरह अक्षर का दूसरा मन्त्र है ॥ ४०-४१ ॥ अथात्र पञ्चदशमं नाभेरोङ्कारपूर्वकम् ॥ ४१ ॥ पदत्रयेण तेनैव संयुक्तं विद्धि मन्त्रपम् । 'अथात्र पञ्चदशं ... ... विद्धि मन्त्रपम्' (४१-४२) पर्यन्त तृतीय मन्त्र का स्वरूप इस प्रकार है—'ॐ अं नमो भगवते प्रद्युम्नाय' । यह बारह अक्षर का तीसरा मन्त्र है ॥ ४१-४२ ॥

५२ सात्वतसंहिता अथ षोडशसंख्यं यन्नाभेः प्रणवपूर्वकम् ॥ ४२ ॥ 'अथ षोडश संख्यं यन्नाभेः प्रणवपूर्वकम् ' (४२) पर्यन्त चौथे मन्त्र का स्वरूप इस प्रकार है—'ॐ अः नमो भगवते अनिरुद्धाय' । यह तेरह अक्षर का मन्त्र है ॥ ४२ ॥ पूर्वोक्तलक्षणानां तु पदानां प्राङ्निवेश्यते । अस्मान्मन्त्रत्रयाद् विद्धि द्वयं प्राङ्‌मन्त्रसंख्यया ॥ ४३ ॥ एक एकार्णरहितः पदभेदमतः शृणु । अब इन मन्त्रों में पूर्वोक्त की भाँति पद संख्या का निवेश सुनिए—इन चारों मन्त्रों में पदों की संख्या समान है और मन्त्रों में पहला मन्त्र तेरह अक्षर का है, यह कह आये हैं । शेष तीन मन्त्रों में दो में १३-१३ अक्षर संख्या समान है । केवल दूसरे मन्त्र में अक्षर संख्या बारह है ॥ ४३-४४ ॥ पदद्वयं तु सर्वेषामाद्यमेकाक्षरं स्मृतम् ॥ ४४ ॥ द्व्यक्षरं च तृतीयं तु चतुर्थं चतुरक्षरम् । पञ्चाक्षरं पञ्चमं वै त्रयाणां समुदाहृतम् ॥ ४५ ॥ अब पदों में अक्षर संख्या कहते हैं—सभी मन्त्रों के आदि पद में एक-एक अक्षर समान हैं । दूसरे पद में भी दो अक्षर हैं । तृतीय और चतुर्थ पद चार-चार अक्षर वाले हैं । तीन मन्त्रों में पाँचवाँ पद पाँच-पाँच अक्षर का है । केवल तृतीय मन्त्र के पञ्चम पद 'प्रद्युम्नाय' में चार अक्षर हैं ॥ ४४-४५ ॥ तदेकस्य चतुर्वर्णं प्रद्युम्नाख्यस्य लाङ्गलिन् । एवं स्वप्नपदस्थस्य समासात् परिकीर्तितम् ॥ ध्यानार्चनं समन्त्रं च भक्तानां हितकाम्यया ॥ ४६ ॥ ॥ इति श्रीपाञ्चरात्रे श्रीसात्वतसंहितायां स्वप्नव्यूहसमाराधनं नाम चतुर्थः परिच्छेदः ॥ ४ ॥ — ५ ❖ २ — इस प्रकार, हे सङ्कर्षण ! स्वप्नपद के चारों मन्त्रों का संक्षेप में यहाँ ध्यान एवं अर्चन भक्तों की हित की दृष्टि से कहा गया है ॥ ४६ ॥ ॥ इस प्रकार डॉ० सुधाकर मालवीय कृत सात्त्वत संहिता के स्वप्नव्यूहसमाराधन नामक चतुर्थ परिच्छेद की हिन्दी समाप्त हुई ॥ ४ ॥ — ५ ❖ २ —

पञ्चमः परिच्छेदः जाग्रद्व्यूहसमाराधनम् नारद उवाच अथ विप्रवरा भूयः प्राह सर्वेश्वरो हरिः । व्यामोहविनिवृत्त्यर्थं भविनां सीरिणः स्फुटम् ॥ १ ॥ अथ पञ्चमो व्याख्यास्यते । अत्र पुनर्जाग्रद्व्यूहलक्षणमाह—अथेति । भविनां = संसारिणां व्यामोहविनिवृत्त्यर्थम् । सीरिणः = सङ्कर्षणस्य प्राहेत्यन्वयः ॥ १ ॥ नारद जी ने कहा—हे विप्रवरो ! संसारियों के व्यामोह की निवृत्ति के लिये श्रीभगवान् वासुदेव ने सङ्कर्षण से जाग्रल्लक्षण व्यूह को इस प्रकार कहा ॥ १ ॥ श्रीभगवानुवाच अनन्तसरसि क्षार्णे विश्रान्तं यन्महामते । अकाराक्षरमूलं तु नित्यं सर्वाश्रयाम्बुजम् ॥ २ ॥ अकाराक्षरनालं तु शेषसवर्णापिल्लवम् । दिगष्टकं समाश्रित्य यत्तत् तिष्ठति चक्रवत् ॥ ३ ॥ तत्पत्रमध्ये भगवान् जाग्रत्संज्ञपदे त्वधः । यष्टव्यो भावनीयश्च यथा तदधुनोच्यते ॥ ४ ॥ हृदयकमलस्य वर्णमयत्वनिरूपणपूर्वकं जाग्रत्यदसंज्ञे तत्पत्रे जाग्रद्व्यूहार्चनं कार्य- मित्याह—अनन्तसरसि = महासरोवर इत्यर्थः । अत्र क्षकारस्य जगदुत्पत्तिहेतुभूतब्रह्म- शक्तिपञ्चकप्राथमिकत्वात् सरोवरत्वं ज्ञेयम् । तदुक्तं लक्ष्मीतन्त्रे— क्षादि शान्तं सुरेशान शक्त्युन्मेषविशेषितम् ॥ क्ष इत्येव महाक्षोभ उदितः सत्यसंज्ञया । वासुदेवाख्यया होऽभूत् सांख्यः सङ्कर्षणोदयः ॥ प्रद्युम्नः षाख्यया ज्ञेयो हानिरुद्धस्तु शाख्यया । ता एताः शक्तयः पञ्च पञ्चब्रह्मात्मिकाः पराः ॥ स्फूर्तयो मदभिन्नास्ता जगदुत्पत्तिहेतवः । ज्वाला इव महावह्नेर्ब्रह्मणो मम शक्तयः ॥ —(लक्ष्मी० १९।३०-३३) इति ।

५४ सात्वतसंहिता एवमेव— अनुत्तरं स्वसंवेद्यं चिद्रूपं मम शाश्वतम्। वाक्तत्त्वं तदकारात्मा सर्ववाङ्मयसंभवः॥ (लक्ष्मी० १९।२-३) इति लक्ष्मीप्रोक्तवैभवस्याकारस्य मूलत्वमपि सयुक्तिकं बोध्यम्। 'तदेवानन्दरूपेण द्वितीयः स्वर इष्यते' (लक्ष्मी० १९।३) इत्युक्तस्याकारस्य नालत्वमप्युचितम्। शेषसवर्णपल्लवं शेषाणि पूर्वोक्ताव- शिष्टानि सर्वाणि यानि वर्णानि इकारादीनि तान्येव पल्लवानि दलानि यस्य तत् तथो- क्तम्। अत्र सर्वशब्दस्य प्रायिकत्वमङ्गीकृत्य इकारादिसकारान्तानामेव वर्णानां दलत्वं वाच्यम्। यतस्तृतीयपरिच्छेदे— 'हवर्णकर्णिकायां तु सुषुप्त्याख्यपदे त्वधः' (सात्वत० ३।२) इति हकारस्य कर्णिकात्वमुक्तम्। यत् कमलं दिगष्टकं समाश्रित्य स्वदलैः सर्वदिशः समाश्रित्य चक्रवद् वर्तुलाकारेण तिष्ठति, तत्पत्रमध्ये भगवान् यष्टव्यो भाव- नीयश्च। जाग्रत्संज्ञपदे अध इति च पदद्वयं पत्रमध्यस्य विशेषणम्। हृदयकमला- काशस्य तुर्यपदत्वम्, तत्कर्णिकास्थानस्य सुषुप्तिपदत्वम्, केसरस्थानस्य स्वप्नपद- त्वम्, तदधःस्थितस्य पत्रस्थानस्य जाग्रत्पदत्वं च सुव्यक्तम्॥ २-४॥ श्रीभगवान् ने कहा—यह क्षकार वर्ण अनन्त सरोवर है। हे महामते! जिसमें सर्वाश्रय अम्बुज का अकार रूप अक्षर मूल में विराज रहा है॥ २॥ आकार अक्षर उसका नाल है और शेष सभी इकारादि वर्ण उसके पत्ते हैं। यह कमल अनेक दिशाओं में व्याप्त होकर चक्रवत् गोलाकार रूप में स्थित है। उसके पत्तों के मध्य में स्थित जाग्रत् नामक पत्र के नीचे जिस प्रकार भगवान् का यजन तथा उनकी भावना करनी चाहिये अब मैं उसे कह रहा हूँ। विमर्श—यहाँ यह समझ लेना चाहिये—हृदय कमलाकाश 'तुर्य' पद है और उसका कर्णिका स्थान 'सुषुप्ति' पद है। केशर 'स्वप्न' पद है, उसके नीचे स्थित पत्र स्थान 'जाग्रत्' पद है। इस हृदयरूप वर्ण कमल में जाग्रत्संज्ञक अब्ज पत्र में जाग्रन्नामक व्यूह है। उसी के नीचे जाग्रद् व्यूह की अर्चना करे॥ ३-४॥ परं प्रणवबीजेन सम्पूर्णं स्वेन तेजसा। स्थितं स्वकर्णिकोर्ध्वाच्च केसरान्तं निरीक्ष्य च॥ ५॥ ततः प्रणवपूर्वात् तु ब्रह्मबीजचतुष्टयात्। कदम्बपुष्पसदृशान्मरीचिशतसङ्कुलात् ॥ ६॥ आदौ तत्कर्णिकोर्ध्वात् केसरान्तं स्थितं तेजःपरिपूर्णं परं जाग्रद्व्यूहकारणं भगवन्तं तद्वाचकप्रणवबीजेनावलोक्य ततस्तत्परितः प्रागादिषु वासुदेवादिमूर्तिचतुष्टयं समुत्पन्नं पश्येदित्याह—परमिति चतुर्भिः। ब्रह्मबीजचतुष्टयात् श ष स हात्मकाद् वर्णचतुष्टयादित्यर्थः।

पञ्चमः परिच्छेदः ५५ शादिक्षान्तं तु विज्ञेयं विशुद्धं ब्रह्मपञ्चकम् ॥ शषसहोऽनिरुद्धाद्या विज्ञेयास्त्रिदशेश्वर । (लक्ष्मी० १९।१६-१७) इति लक्ष्मीतन्त्रवचनात् । अथवा वक्ष्यमाणाद् वासुदेवादिबीजचतुष्टयादित्यर्थः । सुव्यक्तलक्षणमित्यनेन केवलगुणमात्रलक्ष्यतयाऽगोचरसुषुप्तिव्यूहापेक्षया स्वप्नव्यूहस्य स्वप्नप्रत्यक्षवदीषद्व्यक्तत्वम्, तदपेक्षयाऽस्य जाग्रद्व्यूहस्य जागरप्रत्यक्षवत् सुव्यक्तत्व- मुक्तं भवति ॥ ५-८ ॥ सर्वप्रथम उस कमल की कर्णिका के ऊपर से केसर पर्यन्त स्थित तेज से परिपूर्ण जाग्रद् व्यूह के कारण भूत भगवान् को तद्वाचक प्रणव बीज से देख कर चारों ओर वासुदेवादि मूर्तियों को देखे। फिर कदम्बपुष्पों के समान मुकुलित सैकड़ों सूर्यों की किरणों से देदीप्यमान उस प्रणव (ॐ) सहित ब्रह्म बीज चतुष्टय (शां षं सं हं) से चारों दिशाओं में उदीयमान वासुदेवादि मूर्तियों को देखे ॥ ५-६ ॥ दिक्क्रमेणोदितं ध्यायेद् विभोर्मूर्तिचतुष्टयम् । सुव्यक्तलक्षणं मान्त्रं विभावेनावृतं बहिः ॥ ७ ॥ स्फुलिङ्गकणतुल्येन समुद्भूतेन वै परात् । वाचकान्तर्निविष्टेन व्यक्ततामागतेन च ॥ ८ ॥ दिशाओं के क्रम से उन विभु की मूर्ति चतुष्टय का ध्यान करे, जो 'सुषुप्ति' होने से आराधना के योग्य है तथा 'स्वप्न व्यूह' की अपेक्षा 'जाग्रत्' होने के कारण अधिक सुव्यक्त है एवं मन्त्र स्वरूप है और बाहर से विभव से आहत है। जो पर से स्फुलिङ्ग कण के समान समुत्पन्न हुआ है और व्यक्त स्वरूप है ॥ ७-८ ॥ वासुदेवादीनां विशेष लक्षणानि तत्राद्यं भगवद्रूपं हिमकुन्देन्दुकान्तिमत् । चतुर्भुजं सौम्यवक्त्रं पुण्डरीकनिभेक्षणम् ॥ ९ ॥ पीतकौशेयवसनं सुवर्णध्वजशोभितम् । मुख्यदक्षिणहस्तेन भीतानामभयप्रदम् ॥ १० ॥ विद्याकोशस्तु वामेन संगृहीतश्च शङ्खराट् । पृष्ठगे ह्यपरस्मिंस्तु प्रोद्यतो दक्षिणे त्वसिः ॥ ११ ॥ वासुदेवादीनां विशेषलक्षणान्याह—तत्राद्यमित्यादिभिः ॥ ९-१८ ॥ अब वासुदेवादि के विशेष तथा मान्य लक्षणों को कहते हैं—उन आद्य भगवान् वासुदेव का स्वरूप हिम कुन्द के समान कान्तिमान है। वह चार भुजाओं से समन्वित हैं और सौम्य वस्त्र तथा कमल के समान विशाल नेत्रों वाले हैं। पीताम्बर धारण किये हुए, सुवर्ण की ध्वजाओं से शोभित हैं और अपने ऊपर वाले दाहिने हाथ से भयभीत

५६ सात्वतसंहिता जनों को अभय प्रदान करते हैं तथा अपने बायें हाथ में विद्या के कोशभूत् शङ्खराट् (पाञ्चजन्य) को धारण किये हुए हैं। पीछे वाले अन्य दाहिने हाथ में प्रोद्यत, असि (= तलवार) तथा उसी ओर बायें हाथ में पृथ्वी पर गदा रखी गई है ॥ ९-११ ॥ तथाविधे गदा वामे निषण्णा वसुधातले। सिन्दूरशिखराकारमेकवक्त्रं चतुर्भुजम्॥ १२ ॥ अतसीपुष्पसङ्काशं वासोभृत् ताललाञ्छितम्। मुख्येन पाणियुग्मेन तुल्यमाद्यस्य वै विभोः॥ १३ ॥ सीरं चक्रं च हस्तेऽस्य मुसलं तु गदा करे। अब दूसरे भगवान् सङ्कर्षण के स्वरूप को कहते हैं—एक वक्त्र है जो सिन्दूर के पर्वत के समान विशाल एवं पीला है, चार भुजायें है, अतसी पुष्प के समान वस्त्र है, हाथ में ताल का चिह्न है, उन विभु के हाथ में हंस, चक्र, मुशल और गदा है ॥ १२-१४ ॥ प्रावृण्निशासमुदितखद्योतचयदीधितिम् ॥ १४ ॥ रत्नकौशेयवसनं मकरध्वजशोभितम् । एकवक्त्रं चतुर्बाहुं तृतीयं परमेश्वरम् ॥ १५ ॥ मुख्यहस्तद्वयं चास्य प्राग्वद् ध्येयं महामते । वामे परस्मिन् शार्ङ्गं च दक्षिणे बाणपञ्चकम् ॥ १६ ॥ तृतीय भगवान् प्रद्युम्न का स्वरूप—वर्षा काल की निशा में उदीयमान खद्योत के समान जिनकी कान्ति है, रत्न जड़ित रेशमी वस्त्र समन्वित है तथा जो मयूर- ध्वज से शोभित हैं, जिनके एक वक्त्र और चार भुजाएँ हैं, जो तृतीय परमेश्वर कहे जाते हैं, जिनके दो हाथ पूर्व के समान हैं, जिनके बायें हाथ में शार्ङ्ग धनुष तथा दाहिने हाथ में बाण-पञ्चक है, ऐसे तृतीय परमेश्वर का ध्यान करे ॥ १४-१६ ॥ अञ्जनाद्रिप्रतीकाशं सुसिताम्बरवेष्टितम् । चतुर्भुजं विशालाक्षं मृगलाञ्छनभूषितम् ॥ १७ ॥ आदिवत् पाणियुगलमाद्यमस्यापि कीर्तितम् । दक्षिणादिक्रमेणाथ द्वाभ्यां वै खड्गखेटकौ ॥ १८ ॥ अब चतुर्थ भगवान् अनिरुद्ध स्वरूप को कहते हैं—जिनका स्वरूप कज्जल के पर्वत के समान काला है, जो अत्यन्त श्वेत वस्त्रों से आवेष्टित हैं, जिनकी चार भुजायें तथा कमल के समान विशाल नेत्र है, जिनके हाथ में मृग का चिह्न है, दो हाथ आदि स्वरूप के समान है, शेष दो हाथों में दक्षिणादि क्रम से खड्ग तथा खेटक शोभित हो रहा है ॥ १७-१८ ॥

पञ्चमः परिच्छेदः ५७ सामान्यलक्षणानि वनमालाधराः सर्वे श्रीवत्सकृतलक्षणाः । शोभिताः कौस्तुभेनैव रत्नराजेन वक्षसि ॥ १९ ॥ किरीटमुकुटै रम्यैर्हारकेयूरनूपुरैः । ललाटतिलकैश्चित्रैः स्फुरन्मकरकुण्डलैः ॥ २० ॥ सामान्यलक्षणमाह—वनमालाधरा इति त्रिभिः ॥ १९ - २१ ॥ यहाँ तक भगवान् के चारों स्वरूपों की विशिष्टता कही गई । अब उनके सामान्य स्वरूप का वर्णन करते हैं—ये चारों प्रकार के सभी भगवान् विष्णु वनमाला धारण किये हुए हैं, श्रीवत्स के चिह्न से भूषित हैं तथा सभी अपने वक्षःस्थल पर रत्नराज कौस्तुभ धारण कर शोभित हो रहे हैं । ये विचित्र रत्नजड़ित केयूर मुकुट, मनोहर केयूर नूपुर तथा देदीप्यमान मकरा-कृति कुण्डल, ललाट में विचित्र तिलक से शोभित हैं ॥ १९-२० ॥ स्रग्वरैर्विविधैर्माल्यैः कर्पूराद्यैर्विलेपनैः । रम्यैरलङ्कृताश्चैव भावनीयाः सदैव हि ॥ २१ ॥ ये सभी अनेक प्रकार की पुष्प मालाओं से सुशोभित तथा कपूर आदि के आलेपन से तथा सुरम्य रत्नादि अलङ्कारों से समन्वित हैं । इस प्रकार के स्वरूप वाले चारों विष्णु का सदैव ध्यान करना चाहिये ॥ २१ ॥ पुनरप्यययोगेन प्रागुदङ्मध्ये दले । सितकृष्णेन वपुषा चानिरुद्धं स्मरेत् प्रभुम् ॥ २२ ॥ ईशानाद्याग्नेयान्तमप्यधःक्रमेण स्थितानां तेषां शबलरूपमाह— पुनरित्यादिभिः ॥ २२-२७ ॥ इसके बाद पुनः संहार क्रम से पूर्व और उत्तर दिशा के मध्य वाले दल में सित और कृष्ण शरीर वाले प्रभु अनिरुद्ध का स्मरण करे ॥ २२ ॥ उदक्पश्चिममध्यस्थे प्रद्युम्नं भावयेच्छदे । रूपेण कृष्णपीतेन ह्याप्यायावसरे तु वै ॥ २३ ॥ उत्तर और पश्चिम के मध्य वाले दल में कृष्ण पीत शरीर वाले प्रभु प्रद्युम्न का स्मरण करे ॥ २३ ॥ प्रत्यग्दक्षिणमध्यस्थे पीतरक्तवपुर्धरम् । स्मरेत् सङ्कर्षणं देवं प्रतिस्रोतः क्रियाविधौ ॥ २४ ॥ पश्चिम और दक्षिण के मध्य वाले दल में पीत रक्त शरीर वाले संहार क्रम में सङ्कर्षण देव का स्मरण करे ॥ २४ ॥ सा० सं० - 8

५८ सात्वतसंहिता मध्ये प्राग्दक्षिणस्यां च सितरक्तेन तेजसा । वासुदेवो जगन्नाथो भावनीयो महामते ॥ २५ ॥ पूर्व और दक्षिण के मध्य वाले दस में सित और रक्त कान्ति वाले भगवान् जगन्नाथ वासुदेव की आराधना करे ॥ २५ ॥ अतिशुद्धाशयत्वेन स्फटिकोपलवद् विभुः । स्थानभेदं समासाद्य स च कान्तिद्वयात्तु वै ॥ २६ ॥ गृह्णाति शबलं रूपमुपसंहारलक्षणम् । अत्यन्त शुद्ध स्वरूप होने के कारण एवं स्फटिक मणि के समान वे प्रभु स्थान भेद के कारण दो-दो रंग की कान्ति से संहार लक्षण शबल रूप धारण करते हैं ॥ २६-२७ ॥ जाग्रतव्यूहमन्त्रचतुष्टयोद्धारः क्रमशोऽथ चतुर्णां वै वक्ष्ये मन्त्रगणं शृणु ॥ २७ ॥ अक्षान्तर्गतमादाय नाभेः पूर्वमतः परम् । भि(त्रे? त्रं) नाभिद्वितीयेन नेमिपूर्वमतः परम् ॥ २८ ॥ नाभिपञ्चमसंयुक्तं दशमात् प्रथमं ततः । तृतीयं च द्वितीयं च नेमेरादाय चाङ्कयेत् ॥ २९ ॥ नाभिद्वितीयबीजेन नवमादपरं ततः । तदधो विनियोक्तव्यं द्वितीयं द्वादशात्तु यत् ॥ ३० ॥ पञ्चमेनाथ वै नाभेर्युक्तं कुर्यादनन्तरम् । अष्टमादपरं शुद्धं नेमिपूर्वं तथाविधम् ॥ ३१ ॥ युक्तं नाभिद्वितीयेन द्वितीयं नेमिमण्डलात् । भूयस्तत्केवलं दद्यात् पदं योगेश्वराय वै ॥ ३२ ॥ तदन्ते चक्रिणे शब्दमथ नेमेर्यदष्टकम् । पश्चिमेनान्वितं नाभेस्तदन्ते विनिवेश्य च ॥ ३३ ॥ शुद्धमेकादशात् पूर्वमाद्यं तदनु चाष्टमात् । नेमेस्तृतीयेनाक्रान्तं ध्वजायाथ पदं न्यसेत् ॥ ३४ ॥ भिन्नमेकादशात् पूर्वं नाभितुर्येण वै ततः । अष्टमादपरं शुद्धं पञ्चमं नेमिमण्डलात् ॥ ३५ ॥ द्वितीयं स्वरसंयुक्तं ससेऽथ द्व्यक्षरं पदम् । वासुदेवाय तदनु सनमस्कं पदं भवेत् ॥ ३६ ॥ ततस्तन्मन्त्रानाह—क्रमशोऽथ चतुर्णामित्यादिभिः ।

पञ्चमः परिच्छेदः ५९ 'अक्षान्तर्गतमादायत्यारभ्य पदं पदविदांवरेत्यन्तम् 'ॐ अमाधुरायाद्भूतमयाय योगेश्वराय चक्रिणे सुपर्णध्वजाय पीतवाससे वासुदेवाय नमः' इति षट्त्रिंशदक्षरो मन्त्रः समुद्धृतो भवति ॥ २७-३९ ॥ अब इन चारों की आराधना के लिये क्रमशः मन्त्रगणों को कहता हूँ, उसे हे सङ्कर्षण ! सुनिये— 'अक्षान्तर्गतमादाय ... पदविदांवर' पर्यन्त मन्त्रों का उद्धार कहते हैं—मन्त्र का स्वरूप इस प्रकार है—'ॐ अमाधुरायाद्भूतमयाय योगेश्वराय चक्रिणे सुपर्ण- ध्वजाय पीतवाससे वासुदेवाय नमः'। यह ३६ अक्षर का मन्त्र है ॥ २७-३६ ॥ षट्त्रिंशदक्षरो मन्त्रो भेदस्तस्याधुनोच्यते । पदमेकादशार्णं तु प्रथमं परिकीर्तितम्॥ ३७ ॥ पञ्चाक्षरं द्वितीयं तु तृतीयं त्र्यक्षरं स्मृतम् । षडक्षरं चतुर्थं तु पञ्चार्णं पञ्चमं तु वै॥ ३८ ॥ षष्ठं सप्ताक्षरं विद्धि पदं पदविदांवर । हे महामते ! यह ३६ अक्षर का महामन्त्र है, इसमें ११ अक्षर का प्रथम पद है। द्वितीय पद पाँच अक्षर का है। तृतीय पद तीन अक्षर का, चतुर्थ पद छह अक्षर का, पञ्चम पद पाँच अक्षर का, छठाँ पद सात अक्षर का है। इस प्रकार, हे पदविदांवर ! इसके पदों और पदाक्षरों को समझना चाहिए ॥ ३७-३९ ॥ प्रणवान्ते त्वथादाय द्वितीयं नाभिमण्डलात् ॥ ३९ ॥ चतुर्दशेन वै नाभेर्युक्तं नेम्यष्टकं ततः । द्वितीयं दशमाच्छृन्दमथ भूयः समाहरेत् ॥ ४० ॥ तदधो नवमादन्तं नाभेस्तुर्यादिनान्वितम् । एकादशस्वराक्रान्तं द्वितीयं दशमात् ततः ॥ ४१ ॥ बाह्यादथाष्टमं नाभेर्युक्तं पञ्चदशेन तु । केवलं पञ्चमं नेमेर्द्वितीयं चाष्टमात् ततः ॥ ४२ ॥ नेमेस्तृतीयेनाक्रान्तं वर्णमेतत् समाहरेत् । युक्तं नाभेस्तृतीयेन प्रागरात् प्रथमं तु वै ॥ ४३ ॥ द्वितीयं दशमाद्वर्णं नाभेरेकादशाङ्कितम् । पञ्चाक्षरं पदं दद्यात् तदन्ते तालकेतवे ॥ ४४ ॥ भूयस्तदवसाने तु पञ्चार्णं नीलवाससे । प्रथमात् प्रथमं चाथ द्वितीयं स्वरसंयुक्तम् ॥ ४५ ॥ केवलं नेमिपूर्वं तु चाद्यमेकादशात् ततः ।

६० सात्वतसंहिता बहिष्ठेभ्यश्चतुर्थं तु द्वाभ्यां नाभेः परं न्यसेत् ॥ ४६ ॥ द्वितीयं केवलं बाह्यात् सङ्कर्षणाय वै पदम् । तृतीयं प्रथमं नेमेरादायाकारसंयुक्तम् ॥ ४७ ॥ द्वितीयमपि वै बाह्याच्छुद्धं तदनु वै नमः । षट्त्रिंशाक्षरसंयुक्तस्त्वयं मन्त्रो महामते ॥ ४८ ॥ प्रणवान्ते त्वथादायेत्यारभ्य त्रीणि पञ्चाक्षराणयत इत्यन्तम् 'ॐ आं सौनन्दकिने संवर्तकिने तालकेतवे नीलवाससे कामपालाय सङ्कर्षणाय रामाय नमः' इति षट्त्रिंश- दक्षरमन्त्रः समुद्धृतः ॥ ३९-४९ ॥ अब 'प्रणवान्ते त्वथादाय ... ... पञ्चाक्षराणयतः' (५.३९-५.४९) पर्यन्त दूसरे मन्त्र का उद्धार कहते हैं । मन्त्र का स्वरूप—'ॐ आं सौनन्दकिने संवर्तकिने तालकेतवे नीलवाससे कामपालाय सङ्कर्षणाय रामाय नमः' । यह ३६ अक्षर का मन्त्र कहा गया है ॥ ३९-४९ ॥ षड्वर्णं पदमस्याद्यं पञ्चार्णं तदनन्तरम् । दशाक्षरं तृतीयं तु त्रीणि पञ्चाक्षराणयतः ॥ ४९ ॥ इसका आदि पद छः अक्षर का, द्वितीय पद पाँच अक्षर का, तृतीय पद १० अक्षर का, इसके बाद ३ पद पाँच-पाँच अक्षरों के हैं ॥ ४९ ॥ अथादायार्क्षगं बीजं नाभेः पञ्चदशात् ततः । शार्ङ्गधृते पदं दद्याच्चतुर्वर्णमतः परम् ॥ ५० ॥ नेमिपूर्वमथादाय प्रागरात् प्रथमं ततः । तृतीयं च बहिष्ठेभ्यः पदं त्र्यर्णं ध्वजाय वै ॥ ५१ ॥ ततस्तृतीयं बाह्यात् तु प्रथमात् प्रथमं ततः । तदधो विनियोक्तव्यं द्वितीयं वर्णमष्टमात् ॥ ५२ ॥ द्वितीयस्वरसंयुक्तमथ बाह्यात् तु पञ्चमम् । अष्टमं तं तदुद्देशात् केवलं पुनरेव तत् ॥ ५३ ॥ नाभेरेकादशाक्रान्तं षडक्षरमतः परम् । पदं सनत्कुमाराय पञ्चाक्षरमनन्तरम् ॥ ५४ ॥ पदं जगत्प्रियायेति प्रद्युम्नाय नमस्ततः । चतुस्त्रिंशाक्षरः सोऽयं मन्त्रः शृणु पदान्यपि ॥ ५५ ॥ अथादायार्क्षगं बीजमित्यारभ्य षड्वर्णं षष्ठमेव हीत्यन्तम् 'ॐ अं शार्ङ्गधृते मकरध्वजाय रक्तवाससे सनत्कुमाराय जगत्प्रियाय प्रद्युम्नाय नमः' इति चतुस्त्रिंशदक्षरः समुद्धृतः ॥ ५०-५७ ॥

पञ्चमः परिच्छेदः ६१ 'अथादायाक्षगम् ... षड्वर्णं षष्ठमेव हि' पर्यन्त तृतीय मन्त्र का उद्धार कहते हैं । मन्त्र का स्वरूप—'ॐ अं शार्ङ्गिधृते मकरध्वजाय रक्तवाससे सनत्कुमाराय जगत्प्रियाय प्रद्युम्नाय नमः' । यह चौंतीस अक्षर का मन्त्र है ॥ ५०-५५ ॥ आद्यं षडक्षरं ज्ञेयं द्वितीयं तद्वदेव हि । पञ्चाक्षरं तृतीयं तु चतुर्थं तु षडक्षरम् ॥ ५६ ॥ पञ्चार्णं पञ्चमं विद्धि षड्वर्णं षष्ठमेव हि । इसमें पहला पद ६ अक्षर का, द्वितीय पद भी ६ अक्षर का, तृतीय पद पाँच अक्षर का, चौथा पद ६ अक्षर का, पाँचवाँ पद पाँच अक्षर का, छठाँ पद ६ अक्षर का कहा गया है । यहाँ तक तृतीय मन्त्र का उद्धार कहा गया ॥ ५६-५७ ॥ अक्षस्थं षोडशं नाभेर्द्वितीयं दशमात्तु वै ॥ ५७ ॥ केवलं ह्यथ तेनैव चाक्रान्तं नवमात् परम् । अथादाय च तस्यान्ते प्रथमात् प्रथमं परात् ॥ ५८ ॥ युक्तं नाभिद्वितीयेन वर्णमेकं महामते । वर्णद्वयं पदस्यादौ तदेवान्तेऽस्य वै पुनः ॥ ५९ ॥ अथ द्वितीयं नवमात् प्रथमात् प्रथमं ततः । तृतीयमथ वै नेमेर्द्वितीयस्वरसंयुतम् ॥ ६० ॥ द्वितीयं केवलं बाह्यात् सप्तमं नाभिमण्डलात् । अथ षष्ठेन वै नेमेराक्रान्तं द्वितीयं न्यसेत् ॥ ६१ ॥ प्राग्वर्णं दशमान्नेमेः पञ्चमस्योर्ध्वगं त्वथ । चतुर्थादपरं वर्णं द्वितीयं नेमिमण्डलात् ॥ ६२ ॥ द्वाभ्यां नाभिद्वितीयं तु योजयेत् तदनन्तरम् । दशमादपरं वर्णं तृतीयस्वरसंयुतम् ॥ ६३ ॥ तृतीयमथ वै नेमेर्नाभिपञ्चमसंयुतम् । द्वितीयस्वरसंयुक्तं द्वितीयं नवमादरात् ॥ ६४ ॥ अस्यैवाधो नियोक्तव्यं दशमात् प्रथमं हि यत् । शुद्धं नेमिद्वितीयं तु पदं त्वसितवाससे ॥ ६५ ॥ विष्वक्सेनाय तदनु नमस्कारसमन्वितम् । द्वात्रिंशार्णो ह्ययं मन्त्रः पदभेदेन वै पुनः ॥ ६६ ॥ एकाधिकस्तु भवति पदान्यथ निबोध मे । द्व्यक्षरं तु पदं पूर्वं द्वितीयं तु नवाक्षरम् ॥ ६७ ॥ त्रीणि पञ्चाक्षराण्यन्यत् षष्ठं सप्ताक्षरं स्मृतम् ।

६२ सात्वतसंहिता 'अक्षस्थं षोडशं नाभेरित्यारभ्य षष्ठं सप्ताक्षरं स्मृतम्' इत्यन्तम् 'ॐ अः नन्द- कानन्दकराय ऋष्यध्वजायानिरुद्धायासितवाससे विष्क्कसेनाय नमः' इति द्वात्रिंशद- क्षरो मन्त्रः समुद्धृतः ॥ ५७-६८ ॥ 'अक्षस्थं षोडशं विद्धि ... ... सप्ताक्षरं स्मृतम्' पर्यन्त चौथे मन्त्र का उद्धार कहते हैं । मन्त्र का स्वरूप इस प्रकार है—'ॐ अः नन्दकानन्दकराय ऋष्य- ध्वजायानिरुद्धायासितवाससे विष्क्कसेनाय नमः' । यह बत्तीस अक्षर का मन्त्र है । अब इसके पदों तथा अक्षरों की संख्या सुनिए—पद का भेद करने पर यह मन्त्र ३२ से एक अक्षर अधिक ३३ अक्षर का हो जाता है । पहला पद दो अक्षर का, द्वितीय नव अक्षर का, इसके बाद तीन पद पाँच-पाँच अक्षर का, छठाँ सात अक्षरों का होता है । इस प्रकार पद और मन्त्रों की संख्या कही गई ॥ ५७-६८ ॥ पुरुष, सत्य, अच्युत, वासुदेवमन्त्रोद्धारः अप्ययावसरे प्राप्ते स्मरणे चार्चने विभोः ॥ ६८ ॥ शृणु मन्त्रचतुष्कं तु पुनरन्यत् समासतः । आद्यमेकादशाद् वर्णं पञ्चमस्वरसंयुक्तम् ॥ ६९ ॥ युक्तं स्वरेण तेनैव तृतीयं नेमिमण्डलात् । द्वितीयस्वरसंयुक्तमथ बाह्यात् तु सप्तमम् ॥ ७० ॥ द्वितीयं केवलं नेमेराद्यन्ते प्रणवो नमः । शुद्धं त्वथाष्टमं बाह्याद् द्वितीयमथ चाष्टमात् ॥ ७१ ॥ अथो नेमिद्वितीयेन युक्तं नाभ्यपरेण तु । केवलं द्वितीयं बाह्यान्नमस्कारमतः परम् ॥ ७२ ॥ अथाक्षगं नाभिपूर्वं द्वितीयं त्रितयादरात् । तदधो द्वितयं बाह्यान्नाभिपञ्चमसंयुक्तम् ॥ ७३ ॥ अथ नाभिद्वितीयेन युक्तं यत् परमाष्टमात् । द्वितीयं केवलं बाह्यान्नमस्कारं ततः परम् ॥ ७४ ॥ अक्षस्थबीजं तदनु द्वितीयं द्वादशादरात् । द्वितीयात् प्रथमं चाथ पञ्चमं नेमिमण्डलात् ॥ ७५ ॥ केवलं त्रितयं ह्येतद् द्वितीयं च तथाष्टमात् । एकादशस्वराक्रान्तं वासुदेवाय वै नमः ॥ ७६ ॥ अथाप्ययक्रमेण व्यूहार्चने मन्त्रचतुष्टयमाह—अप्ययावसर इत्यादिभिः । तथा च—'ॐ पुरुषाय नमः, ॐ सत्याय नमः, ॐ अच्युताय नमः, ॐ भगवते वासुदेवाय नमः' इत्यनिरुद्धादिवासुदेवान्तमन्त्रचतुष्कमुक्तं भवति ॥ ६८-७९ ॥