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सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

५१६ सात्वतसंहिता परदारस्पृहामुक्तः सद्विवेकपदाश्रितः । क्षत्रविट्शूद्रजातीये मद्यमांसेष्वलम्पटः ॥ ८ ॥ शौचस्वाध्यायनिरतः सन्तुष्टः सततोद्यतः । उच्छिष्टवर्जनपरश्चक्रतप्ततनुः सदा ॥ ९ ॥ मानमात्सर्यकार्पण्यपरित्यागपरो महान् । दैवे पित्र्ये सदोद्युक्तो दम्भाचारविवर्जितः ॥ १० ॥ निःशेषाणामकर्मण्यद्रव्याणां परिहारकृत् । मातूर्जनकनिष्ठानां सद्बन्धूनां च वत्सलः ॥ ११ ॥ उक्तनिर्वाहकश्चाभीर्नित्यं नीचासनप्रियः । सर्वेषामूर्ध्वतो नित्यं स्थितिकामपरायणः ॥ १२ ॥ वंशोद्धारैकरतया सुधियाऽलङ्कृतः सदा । गुरुप्रसादादन्यत्र स्वगृहे वा गुरोर्गृहे ॥ १३ ॥ लब्धदर्शनमात्रो वै मन्त्रमूर्तेस्तु मण्डले । गुरुदृग्वीक्षणेनैव प्रोक्षणेनेव संस्कृतः ॥ १४ ॥ बुद्ध्यते तावता चैव कृतार्थोऽस्मीति साम्प्रतम् । ततः प्रभृतिकालाच्च सुप्रसन्नाच्च देशिकात् ॥ १५ ॥ पाठपूर्वं हि शास्त्रार्थमभ्यर्थयति योऽनिशम् । श्रुत्वा विचारयत्यथनिकान्ते विजने स्थितः ॥ १६ ॥ नाभिमानपदं याति सुसम्पूर्णोऽपि चोदितः । शिक्षयत्यथ नान्येषां लुब्धः स्वार्थस्य सिद्धये ॥ १७ ॥ एवं पृष्टो वासुदेवः पूर्वं समयिलक्षणमाह—'यः श्रीमन्' इत्यारभ्य शिष्यो जात्या चतुर्विध इत्यन्तम् । एवं च यथोक्तलक्षणविशिष्टो दीक्षोक्तरीत्या नेत्रबन्धविमोचनपूर्वकं लब्धमण्डलदर्शनमात्रः शास्त्रार्थग्रहणशीलोऽयनादिविशेषेष्वेव भगवदर्चनपरो यः स समयीति ज्ञेयः ॥ २-३१ ॥ श्री भगवान् से कहा—सर्वप्रथम समयी शिष्य का लक्षण कहते हैं—जो श्री सम्पन्न, श्रद्धावान्, मतिमान्, दृढ़व्रत, सत्यवक्ता, भगवद्भक्त, मिताशी, सङ्गरहित, गुरु की आज्ञा में तत्पर, स्थिरबुद्धि, आलस्यरहित, उत्तम वैष्णवकुल में उत्पन्न, संस्कारों से संस्कृत, माता-पिता के द्वारा पहले से उत्तम सुयोग्य बनाये गये, साङ्कर्य-दोष से रहित, इन्द्रियों का दमन करने वाले, विश्वास के साथ परलोक का भयंकर शङ्कित रहने वाले, साधुओं के सत्सङ्ग की इच्छा रखने वाले, शास्त्रार्थ के आस्वाद में लम्पट, शास्त्रार्थ के सञ्चय में व्यसनी, धार्मिकों के रास्ते पर स्थित

द्वांविंशः परिच्छेदः ५१७ रहने वाले, निरन्तर सत्कर्म में लगे हुए, नित्य दैन्य रहित, सत्त्ववान, क्षमाशील, धैर्यशाली, दयालु, साधुओं का उपकार करने वाले, स्वच्छ वस्त्र सदैव धारण करने वाले, शुक्लवर्ण युक्त, प्रियवक्ता, प्रसन्नचित्त, दूसरे के द्रव्य से घृणा करने वाले, दूसर की स्त्री की स्पृहा से सर्वथा मुक्त, सद्विवेक का आश्रय लेने वाले, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र जाती में उत्पन्न, मद्य, मांस में लम्पटता रहित, शौच स्वाध्याय में निरत, सन्तुष्ट, सतत उद्योग शील, उच्छिष्ट वर्जन करने वाले, सर्वदा चक्र से अङ्कित शरीर वाले, मान, सात्सर्य एवं कार्पण्य का परित्याग करने वाले, महान दैव पित्र्य कार्य में सदा तत्पर, दम्भ से रहित सभी अकर्मण्य द्रव्यों का परिहार करने वाले, माता-पिता के तथा सद् बन्धुओं के वत्सल कही हुई बातों का पालन करने वाले, नित्य निर्भय, विनम्र, सभी से ऊपर रहकर स्थिति तथा काम में परायण, वंशोद्धारक, रूप सुन्दर बुद्धि से अलङ्कृत, अथवा गुरु के प्रसाद से अन्यत्र गुरु गृह में अथवा अपने गृह में दर्शन मात्र से सन्तुष्ट, मन्त्र मूर्ति के दर्शन से सन्तुष्ट, मण्डल दर्शन से सन्तुष्ट, गुरु के नेत्र द्वारा देखे जाने पर, अथवा उनके प्रोक्षण मात्र से संस्कृत, मात्र इतने से ही अपने को कृतार्थ समझने वाले, शिष्यता को प्राप्त काल से सन्तुष्ट रहने वाले, आचार्य से पढ़कर अथवा पाठ सुन कर जो एकान्त में निर्जन में निरन्तर पाठ का अनुशीलन करे, जो सम्पूर्ण पाठ याद कर कभी अभिमान न करे, जो क्षुब्ध होकर स्वार्थ सिद्धि के लिये किसी दूसरे को पाठ न पढ़ावे । (क्षोभरहित होकर दूसरे को पाठ पढ़ावे) ॥ २-१७ ॥ नोद्ग्राहयति शास्त्रार्थमभ्यर्थयति योऽनिशम् । न विक्रियामवाप्नोति ह्याक्षिप्तोऽप्यथ संसदि ॥ १८ ॥ न मन्यते तदा सम्यग् विजेष्यामीति वादिनः । कुण्डमण्डलमुद्रास्त्रपीठबिम्बालयेषु च ॥ १९ ॥ समन्त्रेषु च बुद्धिस्थं नित्यं कुर्याच्च संग्रहम् । अयनादिषु कालेषु प्रत्यहं त्वस्य सम्भवात् ॥ २० ॥ देवमर्चापयेत् कुर्यात् स्वयं वा मान्त्रमर्चनम् । जो निरन्तर शास्त्रार्थ का स्वयं अभ्यास करे और वैष्णवातिरिक्त को शास्त्रार्थ न बतावे । सभा में आक्षिप्त होकर भी विक्रिया (मलीनता, असन्तोष) प्राप्त न करे। 'मैं वादी पर विजय प्राप्त करूँगा' जो इस विचार को अच्छा नहीं समझता, समन्त्रक, कुण्ड, मण्डल, मुद्रा, अस्त्र, पीठ, बिम्ब तथा देवालय बुद्धि में जानकारी रखे । उत्तरायणादि काल उपस्थित होने पर देवाधिदेव की अर्चा करावे और स्वयं मन्त्र द्वारा अर्चन करे ॥ १८-२१ ॥ गुर्वादिष्टो गुरूणां च कुर्यात् पादाभिवन्दनम् ॥ २१ ॥ कार्या तेषां न जिज्ञासा यया यान्त्यप्रसन्नताम् ।

५१८ सात्वतसंहिता प्रसाद्य विधिवत् पृच्छेदबुद्धमथ विस्मृतम् ॥ २२ ॥ विज्ञातमथवा ज्ञातमाचार्यैः परिचोदितः । क्लृप्तां तेषां स्वकां मुद्रां गुप्तां कृत्वा प्रकाशयेत् ॥ २३ ॥ संस्कृतश्रुतपाठाभ्यां स्वगुरुं प्रार्थयेत् ततः । भगवद्यागपूर्वं तु पुत्रकाख्यं परं पदम् ॥ २४ ॥ असन्निधानात् स्वगुरोः प्रार्थयेत् तत्प्रतिष्ठितम् । तदभावात् तु वै चान्यं क्रमात् सद्धैष्णवो हि यः ॥ २५ ॥ नान्यदर्शनसंस्थं तु गुरोर्यस्मादवैष्णवात् । गुरु के द्वारा आदेश प्राप्त कर अन्य गुरु सदृशों का पादाभिवन्दन करे । उनसे ऐसी कोई जिज्ञासा न करे जिससे वे अप्रसन्न हों । जिस विषय का अपने को ज्ञान न हो, अथवा जिसका विस्मरण हो गया हो, उस पदार्थ की जिज्ञासा करके उन्हें प्रसन्न कर करे । आचार्य के द्वारा आज्ञा प्राप्त कर उनसे ज्ञात अथवा अज्ञात पदार्थ पूछे । गुरुओं द्वारा बताई गई मुद्रा गुप्त रूप से भी प्रकाशित न करे । संस्कृत के विषय में तथा श्रुतपाठ के विषय में (ज्ञान के लिये) गुरु से प्रार्थना करे । गुरु के सन्निधान में न रहने पर उनके स्थान पर भगवद् यागपूर्वक प्रतिष्ठित 'पुत्रक' नामक शिष्य से प्रार्थना करे । पुत्रक के अभाव में अन्य से और इसी प्रकार क्रमशः जो सद् वैष्णव हो उससे प्रार्थना पूर्वक पूछे ॥ २१-२६ ॥ कर्मतन्त्रं समन्त्रं च द्रव्यसामान्यजं फलम् ॥ २६ ॥ नूनं वैफल्यमायाति तस्मात् तं परिवर्जयेत् । द्रव्यमन्त्रक्रियाभावभेदात् फलमनश्वरम् ॥ २७ ॥ जायते कर्मिणां शश्वदभेदाद् वै ह्यकर्मिणाम् । सर्वत्र समबुद्धीनामात्मन्यभिरतात्मनाम् ॥ २८ ॥ लोकाचारवियुक्तानां यज्ञविग्रहिणां तु वै । ज्ञात्वैवं सह वै यस्य सम्बन्धः सफलो भवेत् ॥ २९ ॥ अवैष्णव गुरु से अथवा अन्य दर्शन से समन्त्रक कर्मतन्त्र तथा द्रव्य- सामान्यज फल नहीं होता । निश्चय ही ऐसे लोगों द्वारा कराये गये समन्त्रक कर्मतन्त्र निष्फल हो जाते हैं । इसलिये उनका परिवर्जन करे । भगवान् की आराधना में निरत भक्तों को द्रव्य मन्त्र क्रिया तथा भाव भेद से उसका अनश्वर फल होता है इसी प्रकार सर्वत्र समबुद्धी रखने वाले, अपनी आत्मा में निरत, लोकाचार रहित, यज्ञ विग्रह वाले महात्माओं को उनमें अभेद बुद्धि से उनका अनश्वर फल होता है । इस प्रकार जान कर जिसका जिस प्रकार उनमें सम्बन्ध होता है वही सफल होता है ॥ २६-२९ ॥

द्वाविंशः परिच्छेदः ५१९ सर्वदा स उपास्तव्य इहामुष्मिकसिद्धये । लिङ्गैरेतैः परिज्ञेयः सहजोत्यैरकृत्रिमैः ॥ ३० ॥ आचार्यैः समयी नाम शिष्यो जात्या चतुर्विधः । इस लोक तथा परलोक में सिद्धि प्राप्त करने के लिये मात्र परमात्मा ही उपासना के योग्य है । इस प्रकार स्वभाव में रहने वाले अकृत्रिम लिङ्गों से आचार्य समयी शिष्य का ज्ञान करे । ऐसे शिष्य चार प्रकार के होते हैं ॥ ३०-३१ ॥ एवं पुत्रकपूर्वा ये परिज्ञेयास्तु ते त्रयः ॥ ३१ ॥ किन्तु तस्य विशेषो यस्तमिदानीं निबोधतु । पूर्वोक्तानि समयिलक्षणानि पुत्रकादिषु त्रिष्वपि समानानि । तद्विशेषांस्तूपरि वक्ष्यामीत्याह—एवमिति ॥ ३१-३२ ॥ जिनमें समयी शिष्य का लक्षण (२२.२.३०) कह दिया गया । इसी प्रकार पुत्रक आदि तीन शिष्यों में भी पूर्वोक्त लक्षणों को जानना चाहिये ॥ ३१-३२ ॥ २. पुत्रकशिष्यस्य विशेषलक्षणकथनम् विज्ञाता गुरुणा यस्य विनियोगात् कृतार्थता ॥ ३२ ॥ स्वल्पमध्योत्तमाद्येन शिक्षितेनागमेन च । तस्यानुग्रहबुद्ध्या तु आहूतस्याच्युतालये ॥ ३३ ॥ कृत्वा निरीक्षणाद्यं च देवधाम्नि तु क्षेपयेत् । तुष्टो मन्त्रमयं सम्यक् सार्घ्यपुष्पाक्षताञ्जलिः ॥ ३४ ॥ ततः प्रभृति कालाच्च ध्यानं न्यासादिकं विना । पूजनं मन्त्रमात्रेण वह्नितर्पणवर्जितम् ॥ ३५ ॥ योग्यतापदसिद्ध्यर्थं दत्तं बिम्बेऽप्सु वा स्थले । सामान्यविधिना चोक्तो गुरुणा चार्चयाऽच्युतम् ॥ ३६ ॥ स तथेति तदुक्तं च मत्वाऽऽस्ते मुदितः सदा । आलोचयंस्तु शास्त्रार्थं स्वमुद्रामुद्रितं तु वै ॥ ३७ ॥ शक्त्या निरीक्षमाणं च योगक्षेमादिकं गुरोः । तदाराधननिष्ठस्तु तच्चित्तस्तत्परायणः ॥ ३८ ॥ पुत्रकस्य विशेषलक्षणान्याह—विज्ञाता गुरुणा यस्येत्यारभ्य स्वपुत्रादधिकः सदेत्यन्तम् । एवं च सम्यग् गृहीतशास्त्रार्थः पुत्रपदार्होऽयमिति गुरुणा ज्ञातः । मण्डलोपरि प्रक्षेपितपुष्पाञ्जलिकस्तदा प्रभृत्यत्राच्युतमर्चयेति गुरुणानुज्ञातो बिम्बे मण्डलेऽप्सु वा प्रत्यहं ध्यानन्यासवह्नितर्पणानि विना मन्त्रमात्रार्चनपरः शास्त्रार्थ- पर्यालोचनादिशीलो यः स पुत्रक इति ज्ञेयः ॥ ३२-४१ ॥

५२० सात्वतसंहिता अब हे सङ्कर्षण! पुत्रक शिष्य में जो विशेषता है, उसे सुनिये। जिसके विनियोग (क्रिया संकल्प) से स्वल्प, मध्य, उत्तम प्रकार के द्वारा शिक्षित आगम से गुरु जिसकी कृतार्थता जान लेता है उस पर अनुग्रहदृष्टि रख कर उसे विष्णु- मन्दिर में बुलावे और पुनः उसका अवलोकन करे। फिर उसे देवधाम (मण्डल) में रखे। उस पर सन्तुष्ट होकर उसकी अञ्जलि में अर्घ्य, पुष्प एवं अक्षत से पूर्णकर मण्डल में पुष्प प्रक्षेप कराकर मन्त्र प्रदान करे। किन्तु ध्यान एवं न्यास का उपदेश न करे। अग्नि के तर्पण (होम मन्त्र) के बिना मन्त्र मात्र के पूजन का उपदेश करे। उसकी योग्यता की सिद्धि के लिये गुरु सामान्य विधि से उपदेश करे कि आप बिम्ब के जल में अथवा स्थल में अच्युत का अर्चन कीजिये। फिर गुरु द्वारा उपदिष्ट होने पर प्रसन्नचित्त हो शिष्य 'तथास्तु' कहे। फिर स्वमुद्रा से मुद्रित शास्त्रार्थ का परिशीलन करे। अपनी शक्ति के अनुसार गुरु के योग-क्षेमादि का निरीक्षण करता रहे। उनकी आराधना में तत्पर रहकर तच्चित्त एवं तत्परायण रहे ॥ ३२-३८ ॥ समाक्षिप्तस्तदादेशान्मन्त्रमुद्राद्वयं विना। कीर्त्यर्थं स्वगुरोर्ब्रूयात् ज्ञातं शास्त्रार्थमुत्तमम्॥ ३९ ॥ उनकी आज्ञा होने पर मन्त्र एवं मुद्रा दोनों के बिना अपनी कीर्ति के लिये गुरु के द्वारा उपदिष्ट उत्तम शास्त्रार्थ उन्हें सुना देवे ॥ ३९ ॥ विचार्य स्वधिया सम्यग् वैष्णवानां हि संसदि। यथा नैति जनानां च मध्ये मात्सर्यभूमिताम्॥ ४० ॥ वैष्णवों की सभा में तथा सामान्य जनों की सभा में जिस प्रकार वह मात्सर्य की भूमि (ईर्ष्या का स्थान) न बने, वैसा अपनी बुद्धि से विचार करता रहे ॥४०॥ स शिष्यः पुत्रको नाम स्वपुत्रादधिकः सदा। ऐसा शिष्य 'पुत्रक' कहा जाता है। वह अपने पुत्र से भी अधिक प्रिय होता है ॥ ४१ ॥ ३. साधकलक्षणकथनम् साधकाख्ये विशेषो यस्तमिदानीं निबोध मे॥ ४१ ॥ पूर्ववल्लब्धदीक्षस्तु मन्त्राराधनतत्परः। स्नानादिनाऽखिलेनैव देवभूतेन कर्मणा॥ ४२ ॥ सिद्धये स्वात्मनश्चैव न लोकाराधनाय च। वने वायतनोद्देशे स्वगृहे वा मनोरमे॥ ४३ ॥ मन्त्रसेवार्घ्यदानं च कुर्यान्मन्त्रव्रतं महत्।

द्वाविंशः परिच्छेदः ५२१ परमः पालनीयश्च तेनैष समयः सदा ॥ ४४ ॥ अथ साधकलक्षणमाह—साधकाख्ये विशेषो य इत्यारभ्य साधको भगवन्मय इत्यन्तम् । एवं च यावन्तं पूर्वोक्तदीक्षया संस्कृत आयतने वने भवने वा यथाविधि ध्यानन्यासादिभिः सह मन्त्रार्चनं कुर्वन् जपादिभिस्तत्साधनपरो यः स साधक इति बोध्यः ॥ ४१-४६ ॥ अब हे सङ्कर्षण ! साधक शिष्य में जो विशेषता है उसे मुझसे सुनिये— साधक शिष्य पूर्व की भाँति दीक्षा प्राप्त कर समस्त स्नानादि तथा दैवी कर्म से युक्त होकर लोकाराधन के लिये नहीं, अपनी सिद्धि के लिये मन्त्राराधन में तत्पर रहे । वन में, अथवा किसी देवतायतन में, अथवा अपने गृह में, अथवा किसी मनोरम स्थान में निवास करते हुए मन्त्र, सेवा एवं अर्घ्यदानपूर्वक महान् मन्त्र- व्रत का पालन करे । सब प्रकार से यही पालनीय है इसीलिये इसे समय कहा जाता है ॥ ४१-४४ ॥ यदतीव च संलब्धं यच्छक्त्यानन्दमात्मनि । तदाश्चर्यं न वक्तव्यं पूजापूर्वं गुरोर्विना ॥ ४५ ॥ आत्मीयमुद्रासंयुक्तो नित्योद्युक्तः स्वकर्मणि । श्रद्धया यः स बोद्धव्यः साधको भगवन्मयः ॥ ४६ ॥ जो अत्यन्त रूप से प्राप्त हो तथा जिसकी शक्ति से अपूर्व आनन्द हो, उसे बहुत आश्चर्य न समझे, वह अपूर्व गुरु की पूजा का फल है । इस प्रकार जो श्रद्धापूर्वक आत्मीय मुद्रा से संयुक्त हो, अपने कर्म में सर्वदा सावधानी रखने वाला हो, उस भगवन्मय को साधक शिष्य समझना चाहिये ॥ ४५-४६ ॥ ४. आचार्यलक्षणकथनम् लिङ्गैः पूर्वोदितैर्युक्तस्त्वभियुक्तो विशेषतः । अनुग्रहार्थं गुरुणा भक्तानां विनियोजितः ॥ ४७ ॥ पदानि पदमन्त्राणां सार्थकानि च वेत्ति यः । वाच्यवाचकभावेन साङ्गानङ्गवशेन वा ॥ ४८ ॥ करविग्रहकह्लारचक्रन्यासार्थमेव च । समेन विषमेणैव सकृच्चित्रादिकेन च ॥ ४९ ॥ तेषामर्थवशाच्चैव विनियोगं हि वस्तुषु । ध्यानदैवतविज्ञानाद् व्यापकत्वं तु चाध्वनि ॥ ५० ॥ निर्लिङ्गं देवतानां च शब्दब्रह्मत्वमेव हि । यथावदनुजानाति स्ववर्णैः प्रागुदीरितम् ॥ ५१ ॥ सा० सं० - 37

५२२ सात्वतसंहिता साङ्कर्यमागमानां च वेत्ति वाक्यवशात् तु यः । अथाचार्यलक्षणमाह—लिङ्गैः पूर्वोदितैर्युक्त इत्यारभ्य सर्वैः सामयिकैर्गुणैरित्य- न्तम् । अथ प्रसङ्गात् शास्त्रसङ्करभेदं दिव्यादिभेदैरागमत्रैविध्यमपि दर्शितम् । तत्र मुनि- भाषितस्यापि सात्त्विकादिभेदैस्त्रैविध्यमैश्वर (१।५७-६३)परमेश्वरा(१०।३४७- ३७४)दिषूपबृंहितं ग्राह्यम् । एतत्साङ्कर्यविचारः श्रीपाञ्चरात्ररक्षायां बहुशः प्रतिपादितो द्रष्टव्यः । "अनिवाहकमाद्योक्तेरिति दिव्यमुनिभाषितयोर्विरुद्धार्थत्वमुच्यते । असम्बद्ध- मिति पूर्वापरविरुद्धत्वम्" (पृ० २९) इति पौरुषवाक्यलक्षणप्रकरणोक्तं पदद्वयमपि तत्रैव व्याख्यातम् । एवं च पूर्वोक्तलक्षणैर्युक्तो व्रतादिभिः सिद्धमन्त्र आचार्याभिषेकेना- भिषिक्तः पदमन्त्रार्थज्ञानसम्पन्नो यः स आचार्य इति बोध्यः । ननु "पूर्ववल्लब्धदीक्षः" (२२।४२) इति साधकस्य, 'लिङ्गैः पूर्वोदितैर्युक्तः' (२२।४७) इत्याचार्यस्य च प्राप्तदीक्षत्वमुक्तं भवति, समयिपुत्रकयोस्तु तन्नास्ति, तथापि तयोर्मन्त्रमात्रार्चने कथमधिकारः सिद्ध्यति? दीक्षाकालमन्तरा तयोर्मन्त्रः कदा प्राप्त इति चेत्, मध्ये (कमनीया?किमनया) शङ्कया? वचनात् प्रवृत्तिः, वचनान्नि- वृत्तिः । अदीक्षितानामर्चना(न)धिकारप्रतिपादकानि वचनानि तु मुद्रान्याससहितार्चना- धिकारनिषेधपराणि बोध्यानि । मन्त्रस्तु मण्डलदर्शनानन्तरं शास्त्राभ्याससमय एव संगृह्यते ॥ ४७-६१ ॥ पूर्वोक्त चिह्नों से विशेष रूप से युक्त ऐसा अभियुक्त जिसे गुरु ने भक्तों पर अनुग्रह करने के लिये विनियोजित किया हो । जो साङ्ग अथवा बिना अङ्ग के अर्थ सहित पदों को तथा पदमन्त्रों को वाच्यवाचकभावरूप से जानने वाला हो, कर- विग्रह कह्लार तथा चक्रन्यास के लिये सम, विषम, सकृत् चित्रादिक के द्वारा जो पदों के अर्थ के अनुसार वस्तुओं में विनियोग, ध्यान एवं देवता का ज्ञान रखते हुए, अध्व में व्यापकता ज्ञान रखने वाला हो, जो अपने-अपने वर्णों के अनुसार पहले कहे गये देवताओं की निर्लिङ्गता तथा शब्द ब्रह्ममितत्त्व को ठीक-ठीक जानने वाला हो, जो वाक्यों के अनुसार वाक्य-वश आगमों के साङ्कर्य को जानने वाला हो वह आचार्य के योग्य है ॥ ४७-५२ ॥ तत्र वै त्रिविधं वाक्यं दिव्यं च मुनिभाषितम् ॥ ५२ ॥ पौरुषं चारविन्दाक्ष तद्भेदमनवधारय । यदर्थाढ्यमसन्दिग्धं स्वच्छमल्पाक्षरं स्थिरम् ॥ ५३ ॥ तत्पारमेश्वरं वाक्यमाज्ञासिद्धं च मोक्षदम् । प्रशंसकं वै सिद्धीनां सम्प्रवर्तकमप्यथ ॥ ५४ ॥ सर्वेषां रञ्जकं गूढं निश्चयीकरणक्षमम् । मुनिवाक्यं तु तद्विद्धि चतुर्वर्गफलप्रदम् ॥ ५५ ॥ यह आगमों का साङ्कर्य भेद दिव्यादिभेद तीन प्रकार का कहा गया है । हे

द्वाविंशः परिच्छेदः ५२३ अरविन्दाक्ष ! हे सङ्कर्षण ! ये आगमों के भेद दिव्य, मुनि तथा पौरुष रूप से तीन प्रकार के कहे गये हैं । जो विशिष्ट अर्थों से युक्त होने के कारण (दृढ़) अकाट्य हो, स्वल्प एवं अल्पाक्षर हो, स्थित हो, ऐसा आज्ञासिद्ध मोक्षप्रद ईश्वर का वाक्य ‘दिव्य’ कहा जाता है । जो सिद्धियों का प्रशंसक हो, संसार में अथवा स्वर्ग में प्रवृत्त कराने वाला हो, सभी का रञ्जन करने वाला हो, गूढ (गुप्त रूप से कहा गया हो) जिससे निश्चय करने की क्षमता हो, ऐसे धर्म, अर्थ, काम, मोक्षपरक वाक्यों को ‘मुनि वाक्य’ कहा जाता है ॥ ५२-५५ ॥ अनर्थकमसम्बद्धमल्पार्थं शब्दडम्बरम् । अनिर्वाहकमाद्योक्तेर्वाक्यं तत्पौरुषं स्मृतम् ॥ ५६ ॥ अर्थहीन, पूर्वापर विरुद्ध, अल्पार्थ, शब्दाडम्बर से परिपूर्ण दिव्यवाक्य का निर्वाह करने में अशक्य, ऐसे वाक्य को ‘पौरुष वाक्य’ कहा जाता है ॥ ५६ ॥ हेयं चानर्थसिद्धीनामाकरं नरकावहम् । प्रसिद्धाथानुवादं यत् संगतार्थं विलक्षणम् ॥ ५७ ॥ अपि चेत् पौरुषं वाक्यं ग्राह्यं तन्मुनिवाक्यवत् । यह पौरुषवाक्य अनर्थ सिद्धियों का समूह नरक प्रदान करने वाला है । किन्तु जो प्रसिद्ध अर्थों का अनुवाद करने वाला है, जिसका अर्थ संगत तथा विलक्षणता से परिपूर्ण है, ऐसा पौरुषवाक्य मुनिवाक्य के समान ग्राह्य है ॥ ५७-५८ ॥ एवमादेयवाक्योत्थ आगमो यो महामते ॥ ५८ ॥ सन्मार्गदर्शनं कृत्स्नं विधिवादं च विद्धि तम् । तत्रामाण्यात् तु यत्किञ्चित् समभ्यूह्य यथार्थतः ॥ ५९ ॥ पूर्वापराविरोधेन निर्वाहयति सर्वदा । भक्तानां चोदितस्त्वेवं पदवाक्यप्रमाणवित् ॥ ६० ॥ स्वमुद्रालङ्कृतश्चापि यः सदा चक्रधृक् चरेत् । स देशिको निबोद्धव्यः सर्वैः सामयिकैर्गुणैः ॥ ६१ ॥ इसी प्रकार हे महामते ! जो आगम उपादेय वाक्य वाला है, ऐसे सम्पूर्ण सन्मार्ग दर्शक वाक्य को विधिवाद जानो । भक्तों की प्रेरणा से विधिवाद से यथार्थता का ठीक-ठीक ज्ञान कर पूर्वापर का विरोध न करते हुए ऐसे वाक्यों का सर्वदा निर्वाह करे । आचार्य पद (व्याकरण), वाक्य (मीमांसा), प्रमाण (न्याय), शास्त्र का वेत्ता हो, जो मुद्रा से अलङ्कृत होकर चक्रधारण करते हुए, सञ्चरण करे । इस प्रकार जो सभी सामायिक गुणों से संयुक्त हो, उसे आचार्य समझना चाहिये ॥ ५८-६१ ॥

५२४ सात्वतसंहिता वेदयत्यन्यथात्मानं योऽन्यस्मिन् योजितं पदे। कृत्वापेक्षां तु हृदये स याति नरकेऽधमः ॥ ६२ ॥ नो भाजनं स्यात् सिद्धीनां क्रमत्यागे कृते सति। स्वमाचारं स्वकां जातिं स्वगोत्रं स्वगुरोर्गृहम् ॥ ६३ ॥ समयिपुत्रकाद्यवरपदस्थोऽपि प्रतिष्ठापेक्षया साधकाचार्यपदारूढत्वेनात्मानं वेद- यति, तस्य महत्तरं दोषमाह—वेदयतीति सार्धेन ॥ ६२-६३ ॥ स्वपदं च स्वसंस्कारं प्राङ्‌निषिद्धेन वै विना। गोपायत्यचिराद् यो वै पातित्यमुपयाति सः ॥ ६४ ॥ एवं स्वाचारजातिगोत्रादिगोपनेऽपि पातित्यं संभवतीत्याह—एवमिति सार्धेन। प्राङ्‌निषिद्धेन मन्त्रमुद्रादिनेत्यर्थः, समाक्षिप्तस्तदादेशान्मन्त्रमुद्राद्वयं विना। कीर्त्यर्थं स्वगुरोर्ब्रूयाद् ज्ञातं शास्त्रार्थमुत्तमम् ॥ (२२।३९) इत्यादिभिस्तेषां प्रकाशन(स्य) निषिद्धत्वात्। अतस्त्वहङ्कारादुत्कृष्टत्वकथनं च न कार्यम् ॥ ६३-६४ ॥ क्रमत्याग करने के कारण उसे सिद्धियाँ नही प्राप्त होती । जो अपना आचार, अपनी जाति, अपना गोत्र, अपने गुरु का गृह, अपना पद, अपना संस्कार, अपनी मुद्रा, अपना मन्त्र, नहीं छिपाता वह सिद्धि प्राप्त कर लेता है किन्तु जो उसे छिपाता है वह अवश्य पतित होता है ॥ ६३-६४ ॥ तस्माच्छ्रेयोऽर्थिना नित्यं नाभिमानं न तत्क्षयात्। अधरोत्तरता सम्यग् आचर्त्तव्या च कुत्रचित् ॥ ६५ ॥ वास्तवार्थेकथनं श्रेयस्करमित्याह—तस्मादिति ॥ ६५ ॥ इसलिये साधक को चाहिये कि वह अहङ्कार वश अपने को अपनी अवस्था से उत्कृष्ट की अभिव्यक्ति न करे। ऐसा करने से उसका क्षय निश्चित है ॥ ६५ ॥ सङ्कर्षण उवाच मुद्राचतुष्टयं देव कीदृग्लक्षणलक्षितम्। ज्ञायते यत्परिज्ञानाद् देशिकान्तं चतुष्टयम् ॥ ६६ ॥ पूर्वोक्तसमयिपुत्रकादिज्ञापकतत्तन्मुद्राचतुष्टयलक्षणं पृच्छति सङ्कर्षणः— मुद्रेति ॥ ६६ ॥ भगवान् सङ्कर्षण ने कहा—हे भगवन्! अब मैं पूर्व में कहे गये समयी साधकादि के मुद्रा का लक्षण जानना चाहता हूँ। वह किस लक्षण से लक्षित होता है ॥ ६६ ॥

द्वाविंशः परिच्छेदः ५२५ श्रीभगवानुवाच यत्पूर्वं नृहरेः प्रोक्तं शिरोमुद्रादिपञ्चकम् । तदङ्गुष्ठविनिर्मुक्तं विद्धि न्यूनाङ्गुलैः क्रमात् । चतुष्टयं चतुर्णां तु गुर्वन्तानां यथास्थितम् ॥ ६७ ॥ ॥ इति श्रीपाञ्चरात्रे श्रीसात्वतसंहितायां अधिकारिमुद्राभेदविधिर्नाम द्वाविंशः परिच्छेदः ॥ २२ ॥ — ❧ — एवं पृष्टो वासुदेवः पूर्वं नृसिंहकल्पोक्त(१७।१०२)शिखामुद्रादिचतुष्टयमेव समयिपुत्रका(णां?दीनां) मुद्राचतुष्टयमित्याह—यदिति सार्धेन ॥ ६७ ॥ ॥ इति श्रीमौज्यायनकुलतिलकस्य यदुगिरीश्वरचरणकमलार्चकस्य योगानन्दभट्टाचार्यस्य तनयेन अलशिङ्गभट्टेन विरचिते सात्वततन्त्रभाष्ये द्वाविंशः परिच्छेदः ॥ २२ ॥ — ❧ — श्री भगवान् के कहा—हे सङ्कर्षण हमने पूर्व में नृसिंह कल्प (सत्रहवें अध्याय) में शिखामुद्रादि चतुष्टय तथा सामयिकादि चतुष्टय का मुद्रा लक्षण वह जिस प्रकार होता है उसे कह दिया है ॥ ६७ ॥ ॥ इस प्रकार डॉ० सुधाकर मालवीय कृत सात्त्वत संहिता के अधिकारिमुद्राभेदविधि नामक बाइसवें परिच्छेद की हिन्दी समाप्त हुई ॥ २२ ॥ — ❧ —

त्रयोविंशः परिच्छेदः अधिवासदीक्षाविधिः नारद उवाच कामपालेन देवेशस्त्वथ ब्राह्मणसत्तमाः । चोदितो यत् तदधुना कथयामि समासतः ॥ १ ॥ अथ त्रयोविंश परिच्छेदो व्याख्यास्यते । इह सङ्कर्षणेन वासुदेवो यत्पृष्टस्तत् कथयामीत्याह—कामपालेनेति ॥ १ ॥ नारद जी ने कहा—हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! इतना सुन लेने के अनन्तर सङ्कर्षण द्वारा पूछे जाने पर देवाधिदेव श्रीकृष्ण ने जो कहा उसे संक्षेप में कहता हूँ ॥ १ ॥ सङ्कर्षण उवाच ज्ञातो विभवदेवानां देव बीजगणो मया । अधुना ज्ञातुमिच्छामि तत्पिण्डनिचयो हि यः ॥ २ ॥ प्रश्नप्रकारमाह—ज्ञात इति ॥ २ ॥ सङ्कर्षण ने कहा—हे देव! मैंने विभव देवताओं का बीजगण जान लिया है। अब जो उनके पिण्डमन्त्र हैं, उन्हें जानना चाहता हूँ ॥ २ ॥ श्रीभगवानुवाच यथाक्रमोदितानां च देवानां विनिबोधतु । पिण्डमन्त्रगणं मत्तः सावधानेन चेतसा ॥ ३ ॥ एवं पृष्टो वासुदेवः पिण्डमन्त्रान् शृण्वित्याह—यथेति । यथाक्रमोदितानां देवानां पद्मनाभध्रुवाणामित्यर्थः ॥ ३ ॥ श्री भगवान् ने कहा—पूर्व में यथाक्रम कहे गये पद्मनाभ एवं ध्रुवादि विभव देवताओं के पिण्डमन्त्रगणों को सावधान चित्त होकर सुनिये ॥ ३ ॥ नाभेरष्टमबीजं यत् स्थितं तत् सप्तमोपरि । तदधश्चोत्तरं चाक्षादरान्तेन विभूषयेत् ॥ ४ ॥

त्रयोविंशः परिच्छेदः ५२७ अथोत्तरं चाक्षदेशादादाय तदधो न्यसेत्। बीजं नेमेर्द्वितीयं यन्मध्यान्मध्यं तदासने ॥ ५ ॥ आधारषष्ठसंरूढं कुर्याद् वै नाभिसप्तकम्। अष्टमं च तदूर्ध्वे तु एतद् विद्धि तृतीयकम् ॥ ६ ॥ नाभ्यष्टममथादाय अरात् षष्ठासनस्थितम्। ततो नाभिद्वितीयस्य क्रमेणाधो निवेश्य च ॥ ७ ॥ तदुद्देशात् तृतीयं च सप्तमं तुर्यमेव च। अथादाय च नेमेः प्राक् तदधो नाभिसप्तमम् ॥ ८ ॥ तस्याप्यधस्तदुद्देशात् तृतीयं विनिवेश्य च। ततस्तु नवमं नाभेस्तस्योर्ध्वाधोगतं न्यसेत् ॥ ९ ॥ तत्रैव यद् द्वितीयं तु तत्पिण्डं विद्धि सप्तमम्। अरात् षष्ठस्य चोर्ध्वे तु नाभिपूर्वं तु विन्यसेत् ॥ १० ॥ सप्तमं चाष्टमं चापि ह्युपर्युपरि वै क्रमात्। अथाष्टमं नाभिदेशादारूढं सप्तमोपरि ॥ ११ ॥ तदधो मध्यगं चाक्षान्नवमं परिकीर्तितम्। भूयोऽरात् पञ्चमस्योर्ध्वे दद्यान्नाभितृतीयकम् ॥ १२ ॥ बाह्यात् तृतीयं तन्मूर्ध्ना पिण्डोऽयं दशमः स्मृतः। द्वितीयं नाभिदेशाच्च तत्तृतीयं तदूर्ध्वगम् ॥ १३ ॥ नेमेराद्यन्तमूर्ध्वं तु स्मृतमेकादशं त्विदम्। अथो नाभिचतुर्थस्य सप्तमं विनिवेश्य च ॥ १४ ॥ तदधो नेमिपूर्वं तु एतद् द्वादशमं स्मृतम्। नेमेस्त्रिदशमादाय तदधो योजयेत् क्रमात् ॥ १५ ॥ सप्तमं च चतुर्थं च पूर्वं नाभेर्महामते। अरषष्ठासनाः सर्वे पिण्डमेतत् त्रयोदशम् ॥ १६ ॥ नाभेेश्चतुर्थमादाय तदूर्ध्वे सप्तमं न्यसेत्। नवमं चापि तन्मूर्ध्नि एतद्विद्धि चतुर्दशम् ॥ १७ ॥ नेमेश्चतुर्थसंख्यस्य ऊर्ध्वाधोभ्यां निवेश्य च। वर्णं नाभिद्वितीयं यत् तत्पञ्चदशमं स्मृतम् ॥ १८ ॥ यद्विंशसंख्यकं बाह्यादादायाराख्यमण्डलात्। सान्तिमेन च षष्ठेन युक्तं कुर्यादनन्तरम् ॥ १९ ॥ नेमेः सप्तमवर्णस्य ऊर्ध्वाधोभ्यां निवेश्य च।

५२८ सात्वतसंहिता नाभिदेशाद् द्वितीयं यद् विद्धि सप्तदशं तु तत् ॥ २० ॥ नवमं नाभिदेशाच्च सप्तमस्योपरि न्यसेत् । अथाष्टमं नाभिदेशात् कुर्यात् सप्तममूर्ध्वगम् ॥ २१ ॥ द्वितीयमपि तस्याधस्तस्माद् वै नाभिमण्डलात् । अरात् त्रयोदशादूर्ध्वं न्यूनविंशतिमं तु तत् ॥ २२ ॥ नाभेश्चतुर्थं तस्योर्ध्वे तत्तृतीयं तदूर्ध्वगम् । तत्रैव सप्तमं यद् वै विद्धि विंशतिमं त्विदम् ॥ २३ ॥ द्वितीयस्याष्टमं नाभेर्वर्णस्योर्ध्वे नियोज्य च । अरात् षष्ठं च तस्याधः कुर्यात् तदनु लाङ्गलिन् ॥ २४ ॥ नवमं नाभिदेशाच्च तृतीयस्योपरि न्यसेत् । द्वितीयं तदधः कुर्यात् त्रयोविंशतिमं शृणु ॥ २५ ॥ अष्टमं सप्तमं नाभेर्द्वितीयं प्रथमं ततः । क्रमेण योजयेच्चैव अरात् षष्ठस्य मूर्धनि ॥ २६ ॥ नेमेः सप्तममादाय तदधो नाभिसप्तमम् । तत्तृतीयं च तस्याधश्चतुर्विंशतिमं स्मृतम् ॥ २७ ॥ नाभेस्तृतीयं तस्योर्ध्वे द्वितीयं तस्य चोपरि । निवेश्य नेमिपूर्वं तु षड्विंशमधुनोच्यते ॥ २८ ॥ अरात् षष्ठासनं कुर्याद् वर्णं नाभितृतीयकम् । तदूर्ध्वे सप्तमं चैव अतोऽन्यमवधारय ॥ २९ ॥ न्यूनं षड्विंशतिं नेमेस्तस्योर्ध्वाधोगतं न्यसेत् । सप्तमं नाभिवर्णेभ्यस्त्वरवर्गाच्च पञ्चमम् ॥ ३० ॥ नेमेराद्यद्वितीयं च आदाय तदधो न्यसेत् । मध्यमक्षान्महाबुद्धेरष्टाविंशतिमं स्मृतम् ॥ ३१ ॥ नवमं सप्तमं नाभेस्तृतीयं च तृतीयकम् । अथोत्तरस्थमक्षाच्च आदाय तदधो न्यसेत् ॥ ३२ ॥ तृतीयं च द्वितीयं च नाभिदेशादनन्तरम् । नाभिद्वितीयमादाय सप्तमं तुर्यमेव च ॥ ३३ ॥ तृतीयस्याथ वै नाभेर्बाहादाद्यं तु मूर्धगम् । ततस्तु नवमं नाभेरक्षमध्यस्थमूर्ध्वगम् ॥ ३४ ॥ अष्टमस्याथ वै नाभेरथ ऊर्ध्वे द्वितीयकम् ।

त्रयोविंशः परिच्छेदः ५२९ दद्यात् तदन्वरात् षष्ठं तस्यैवाधोगतं तु वै ॥ ३५ ॥ अरात् षष्ठस्य चोर्ध्वं तु नाभिपूर्वं च तत्परम् । विनिवेश्याष्टमं चापि षट्त्रिंशमवधारय ॥ ३६ ॥ सप्तमं च तृतीयं च चतुर्थं नाभिमण्डलात् । योजयित्वा तदूर्ध्वं चाप्यराणां त्रिदशं न्यसेत् ॥ ३७ ॥ अथवा नवमं नाभेस्तृतीयं च द्वितीयकम् । तत्सप्तत्रिंशकं विद्धि नाभिदेशादथाहरेत् ॥ ३८ ॥ अरात् षष्ठासनं पूर्वं द्वितीयं च तदूर्ध्वतः । नवमं चापि तस्योर्ध्वं पिण्डास्त्वद्यादिमं विना ॥ ३९ ॥ आरान्ताद्येन वै मूर्ध्ना सर्वे कार्या ह्यलङ्कृताः । नमोऽन्ताः प्रणवाद्याश्च युक्ताः संज्ञापदैः स्वकैः ॥ ४० ॥ तेषामुद्धारक्रममाह—नाभेरष्टमबीजं यदित्यारभ्य नमोऽन्ताः प्रणवाद्याश्च युक्ताः संज्ञापदैः स्वकैरित्यन्तम् । नाभेरष्टमबीजं यद् हकारं तत्सप्तमोपरि सकारोपरि स्थितं कृत्वा तदधः सकारस्याधस्ताद् अक्षरादुत्तरं नकारं संयोज्य अरान्तेन विसर्गेण भूषयेत् । पद्मनाभस्य पिण्डाक्षरमिदम् । उत्तरत्राप्येवं रीत्या बोध्यम् । तथा चैषां प्रयोगः—ह्स्र्नः, न्ख्मं, ह्स्यूं, हूं, ल्स्वं, क्स्लं, क्षं, ह्सयूूं, ह्समं, ग्लुं, क्स्त्रं, ख्स्कं, क्स्व्थं, क्स्वं, श्वं, ग्रं, भुं, द्भ्रं, क्ष्सं, स्त्रों, स्ल्र्वं, ह्धूं, क्ष्लं, ह्स्यूं, जुस्वं, क्यं, स्त्र्यूं, स्वूं, क्ख्भं, ह्लं, न्रं, स्वं, क्षं, क्ष्मं, ह्धं, ह्वां, स्ल्र्वां, क्षरुं, क्ष्रूूं । इत्यष्टत्रिंशत् पिण्डमन्त्राः । अत्राद्यं पिण्डं विनाऽन्ये सर्वेऽप्यनुस्वारेण योज्याः, प्रणवादिनमोन्ताश्च चतुर्थ्यन्तपद्मनाभादिसंज्ञायुक्ताश्च कार्याः ॥ ४-४० ॥ पद्मनाभादि अड़तीस विभवदेवताओं के नाम इस प्रकार हैं— १. पद्मनाभ, २. ध्रुव, ३. शक्त्यात्मा, ४. मधुसूदन, ५. विद्याधिदेव, ६. कपिल, ७. विश्वरूप, ८. विहङ्गम, ९. क्रोडात्मा, १०. बड़वावक्त्र, ११. धर्म, १२. वागीश्वर, १३. देव एकावर्णवशाय, १४. पातालधारककूर्म्म, १५. वाराह, १६. नरसिंह, १७. अमृतातहरण, १८. दिव्यदेह श्रीपति, १९. अमृतधारक कान्तात्मा, २०. राहुजित्, २१. कालनेमिघ्न, २२. महान् परिजातहर, २३. शान्तात्मा लोकनाथ, २४. महाप्रभु दत्तात्रेय, २५. भगवान् न्यग्रोधशायी, २६. एक शृङ्ग, २७. दिव्य वामनै, २८. सर्वव्यापी त्रिविक्रम, २९. नर, ३०. नारायण, ३१. हरि, ३२. कृष्ण, ३३. ज्वलत्परशुधुकराम, ३४. धनुर्धर राम, ३५. वेदवित् भगवान्, ३६. कल्की, ३७. पातालशयन, ३८. प्रभु । नाभि का अष्टमबीज हकार उसको उससे सप्तम सकार पर स्थापित करे । उस सकार से उत्तर नकार को संयुक्त करे । उसके बाद उसे अरान्त (विसर्ग) से भूषित करे । उसके आदि में ॐ लगावे और अन्त में नमः लगावे । फिर उसकी

५३० सात्वतसंहिता संज्ञा से संयुक्त करे—यथा 'ॐ हसूनः नमः पद्मनाभाय' इसी प्रकार अन्य पिण्ड मन्त्रों को समझे । ३८ विभवदेवताओं के पिण्ड-मन्त्र इस प्रकार हैं—हसूनः, न्खमं, हस्यूं, हूं, ल्स्वं, क्स्लं, श्वं, हसूमं, ग्लुं, क्स्त्रं, ख्स्कं, क्स्वं, क्ष्स्वं, श्वं, घ्रं, ध्रुं, द्ध्रं, क्ष्सं, स्त्रों, स्ल्वं, हूं, क्ष्तुं, हस्यूं, ज्स्वं, क्यं, स्त्र्यूं, स्सूं, क्ख्खं, हस्र्लं, न्त्रं, स्वं, क्षं, क्ष्मं, हूं, हूं, स्ल्वों, क्षूं, क्ष्रूं । यहाँ प्रथम पिण्ड को विसर्ग से संयुक्त करे और शेष ३७ पिण्ड मन्त्रों को अनुस्वार से युक्त करे ॥ ४-४० ॥ अरान्ताद्यं विना यस्य य ऊर्ध्वे वर्तते स्वरः । अधो वा नाभिपूर्वेण सह वा केवलं हि तम् ॥ ४१ ॥ अपास्य च ततः कुर्यात् सर्वेषां पूजनाय च । स्वेन स्वेन तु पिण्डेन सिंहवच्चाङ्गकल्पनम् ॥ ४२ ॥ नमः प्रणवसंज्ञाऽस्या जातिः कर्मवशात् पुनः । आ तदुक्तात् तु यजनाद् मोक्षनिष्ठः समाचरेत् ॥ ४३ ॥ बीजपिण्डपदोत्थानां विनियोगं तु चाखिलम् । किन्त्वेषां वैभवी मुद्रा देयाऽऽराधनकर्मणि ॥ ४४ ॥ तदङ्गमुद्राश्चाङ्गानां योज्या मन्त्रैः स्वकैः सह । अथ तत्तत्पिण्डं विहायाकारादिस्वरैः पूर्वोक्तविश्वत्रातृनृसिंहमन्त्रवद् हृदयाद्यङ्ग- कल्पनां सर्वेषां मन्त्राणामप्यविशेषेण दशमपरिच्छेदोक्त(१०।४८) वैभवमुद्राप्रदर्शनं हृदयादीनां नृसिंहकल्पोक्त(१७।९७-१०६)तत्तन्मुद्राप्रदर्शनं नृसिंहमन्त्रवदेव तेषामपि दीक्षापूर्वमर्चनादिभिश्चतुर्विधपुरुषार्थसाधनं चाह—अरान्ताद्यं विना यस्येत्यारभ्य चतु- र्वर्गं हि साधनमित्यन्तम् ॥ ४१-४६ ॥ तत्तत् पिण्ड को छोड़कर केवल अकारादि स्वर से पूर्वोक्त विश्वमान् नृसिंह मन्त्र के समान उसी से हृदयादि अङ्ग की कल्पना कर सभी मन्त्रों की सामान्यतः वैभवमुद्रा, जैसा कि दशम परिच्छेद (१०.४८) में कही गयी है, उसी प्रकार करे । हृदयादि मुद्रा नृसिंह कल्पोक्त (द्र. १७.९७-१०६) की भाँति करे ॥ ४१-४५ ॥ सर्वं साधारणमुद्दिष्टं सैंहमन्त्रोदितं मया ॥ ४५ ॥ दीक्षापूर्वं हि मन्त्राणां चतुर्वर्गं हि साधनम् । भगवान् कहते हैं—यहाँ तक हमने साधार सभी बातें नृसिंह मन्त्र में कह दी हैं । दीक्षापूर्वक अर्चनादि से चतुर्विध पुरुषार्थ की सिद्धि होती है । लक्षणं पदमन्त्राणामथेदानीं निबोधतु ॥ ४६ ॥

त्रयोविंशः परिच्छेदः ५३१ यैर्विना लब्धसत्तानामर्चनं हि न जायते । विश्वातीताय विमलं पदं विद्याविधायिने ॥ ४७ ॥ पद्मनाभाय वै विश्वव्यापिने तदनन्तरम् । चतुर्विंशाक्षरं विद्धि एतत्संख्यं परं शृणु ॥ ४८ ॥ अथ पदमन्त्रानाह—लक्षणं पदमन्त्राणामित्यारभ्य भक्त्या सत्कर्मणां भुवीत्य- न्तम् । तथा चैषां प्रयोगः— ॐविश्वातीताय विमलविद्याविधायिने पद्मनाभाय विश्वव्यापिने नमः । ॐज्योती- रूपाय गगनमूर्तये ध्रुवाय परमपदप्राप्तिहेतवे नमः । ॐअनन्तायाऽपरिमित्याय सर्वा- श्रयाय धृतशक्तये नमः । ॐनमो भगवते वासुदेवाय सर्वशक्त्यात्मनेऽनन्तमूर्तये नमः । ॐवीर्यात्मने महापुरुषाय मोहमायाविध्वंसिने सदोदिताय सर्वशक्तये नमः । ॐवेदविदे विश्वरञ्जकाय विश्वपतये परमात्मने नमः । ॐज्ञानात्मने संवित्प्रकाशाशयाय शान्त- रूपाय नमः । ॐअनन्तशक्तये सर्वव्यापिने जगन्मयाय विश्वरूपाय नमः । ॐसतसत्त्व- गुहा(शया)य परहंसाय मानसचारिणे नमः । ॐयज्ञमूर्तये विश्वान्तर्वर्तिने भुवनवराहाय विभूतिस्वामिने नमः । ॐनमो भगवते वडवाग्नये जगज्जलेन्धनप्रदीप्तवीर्याय फट् नमः । ॐसर्वान्तश्चारिणे प्रसन्नमूर्तये धर्मात्मने नमः । ॐसर्वविद्येश्वराय वाक्पतये वद वद वाग्विभवं नमः । ॐयोगैश्वर्यप्रदाय योगनिद्रारसाय नीरदाय भगवज्जलशायिने नमः । ॐभगवदनन्तबलशक्तये तेजोमयाय भुवनधृते कच्छपात्मने नमः । ॐयज्ञाङ्ग- देहाय महावराहाय पुराणपुरुषाय प्रजापतये नमः । ॐनमो भगवते नारसिंहाय तेजोनिधये हन हन विकर्मजात्यं दुष्कृतं नमः । ॐअमृतमूर्ते ज्ञानबलात्मने सर्वेश्वराय भगवन्नमः । ॐपुण्डरीकाक्ष परमेश्वर सकलसुखसौभाग्यनिधे वाञ्छितसिद्धिप्रदा- खिलदुःखशमनाग्नये आनन्दसुन्दरलक्ष्मीपतये नमः । ॐसदसन्मूर्तये विश्वोत्तमायामृत- निधये नमः । ॐपुरुषोत्तमायाप्रतिहतशक्तये सर्वेश्वराय समग्रोग्रभयनिवारणाय नमः । ॐनियन्त्रे विश्वहेतवे परब्रह्मसेतवे ॐ नमः । ॐअप्रतिमप्रभावमहाविभूते महामाया- दर्शकतालकेतवे नमः । ॐशान्तात्मने यमनियमाश्रयाय परमर्धिप्रदाय नारायणाय नमः । ॐभवभङ्गकारिणे भगवते दत्तात्रेयाय वर्णाश्रमधर्मपरिग्रहाय ॐ नमः । ॐसर्वज्ञाय विश्वात्मने विमलसर्वेश्वराय न्यग्रोधशयनाय नमः । ॐभूतभावनाय विश्वात्मने विमलनिकेतनाय कन्थराय नमः । ॐविष्णवे निरस्तास्त्राय ब्रह्ममयाय जटिने दण्डिने विदितविभवाय नमः । ॐसर्वव्यापिने सहस्रार्चिषे त्रिविक्रमायाऽपरिमित- प्रभावाय नमः । ॐनरनाथाय पुरुषप्रवराय आत्मध्यानपरायणाय नमः । ॐनारायणाय निरतिशयानन्दमयाय निरभिमानपदासक्ताय नमः । ॐपराय परमात्मने योगेश्वराय हरये नमः । ॐनमः परमात्मने कृष्णाय कमलदलविततनेत्राय ब्रह्मिष्ठाय ब्रह्मणे नमः । ॐभगवन् युगान्तदहनदीप्तये संसारबन्धविच्छेदकर्त्रे नमः । ॐचतुर्मूर्तये चतुर्गतमयाय शरशाङ्गभृते शरदिन्दीवरत्विषे भगवतेऽभिरामशरीराय नमः । ॐविशदपरमार्थवेद- विदे विदुषे व्यापकाय स्वामिन् नमः । ॐगरुडवाहन सर्वशस्त्रास्त्रोद्यत शमयाऽशुभं धुन धुन कर्मबन्धान् धर्मं पाहि जहाधर्मं नमः । ॐसंहारमूर्तये कालवैश्वानरार्चिषे पाताल- शयनाय अज्ञाननिगडनिचयं हन हन ॐनमः । इत्यष्टत्रिंशत्पदमन्त्राः ॥ ४६-११३ ॥

५३२ सात्वतसंहिता अब हे सङ्कर्षण! पद मन्त्रों के लक्षण सुनिये । जिसके बिना सत्ता (अधिकार) प्राप्त होने पर भी अर्चन संभव नहीं होता ॥ ४६-४७ ॥ १. ॐ विश्वातीताय विमलविद्याविधायिने पद्मनाभाय विश्वव्यापिने नमः ॥ ४७-४८ ॥ ज्योतीरूपाय पञ्चार्णं पदं गगनमूर्तये । ध्रुवाय दद्यात् तदनु परमं त्र्यक्षरं ततः ॥ ४९ ॥ पदप्राप्तिचतुर्वर्णं हेतवे त्र्यक्षरं त्विति । अनन्ताय पदं दद्यात् ततोऽपरिमिताय च ॥ ५० ॥ २. ॐ ज्योतीरूपाय गगनमूर्त्तये ध्रुवाय परमपदप्राप्तिहेतवे नमः ॥ ४९-५० ॥ सर्वाश्रयाय तदनु तदन्ते धृतशक्तये । एतद्विंशतिसंख्यं च द्वाविंशार्णमतः शृणु ॥ ५१ ॥ ३. ॐ अनन्तायाऽपरिमिताय सर्वाश्रयाय धृतशक्तये नमः ॥ ५१ ॥ नमो भगवते कृत्वा वासुदेवाय वै ततः । सर्वशक्त्यात्मनेऽनन्तमूर्तये तु पदं त्विति ॥ ५२ ॥ ४. ॐ नमो भगवते वासुदेवाय सर्वशक्त्यात्मनेऽनन्तमूर्तये नमः ॥ ५२ ॥ वीर्यात्मने महाशब्दं पुरुषाय पदं ततः । मोहमायापदं चैव ततो विध्वंसिने तु वै ॥ ५३ ॥ सदोदिताय शब्दं तु सर्वशक्तिपदं ततः । नियोक्तव्यं चतुर्वर्णं सप्तविंशाक्षरं स्मृतम् ॥ ५४ ॥ ५. ॐ वीर्यात्मने महापुरुषाय मोहमायाविध्वंसिने सदोदिताय सर्वशक्तये नमः ॥ ५३-५४ ॥ पदं वेदविदे विश्वरञ्जकाय ततो भवेत् । तदन्ते विश्वपतये ततो वै परमात्मने ॥ ५५ ॥ ६. ॐ वेदविदे विश्वरञ्जकाय विश्वपतये परमात्मने नमः ॥ ५५ ॥ एष विंशतिभिर्वर्णैः शृणु सप्तदशाक्षरम् । ज्ञानात्मने पदं कुर्यात् संविच्छब्दमतः परम् ॥ ५६ ॥ पदं प्रकाशाशयाय शान्तरूपाय वै ततः । अनन्तशक्तये सर्वव्यापिने तदनन्तरम् ॥ ५७ ॥ जगन्मयाय तदनु विश्वरूपाय वै पदम् । एकविंशतिभिर्वर्णैरयमुक्तोऽपरं शृणु ॥ ५८ ॥

त्रयोविंशः परिच्छेदः ५३३ ७. ॐ ज्ञानात्मने संवित्प्रकाशाशयाय शान्तरूपाय नमः । ८. ॐ अनन्तशक्तये सर्वव्यापिने जगन्मयाय विश्वरूपाय नमः ।। ५७-५८ ।। सत्सत्त्वपदमादाय गुहाशयपदं ततः । ततः परमहंसाय ततो मानसचारिणे ।। ५९ ।। ९. ॐ सत्सत्त्वगुहाशयाय परमहंसाय मानसचारिणे नमः ।। ५९ ।। न्यूनविंशत्यक्षरश्चैवाथातो यज्ञमूर्तये । पदमादाय तदनु विश्वान्तर्वर्तिने तु वै ।। ६० ।। ततो भुवनशब्दं तु वराहाय पदं त्वथ । विभूतिस्वामिने चेति चतुर्विंशाक्षरस्त्वयम् ।। ६१ ।। १०. ॐ यज्ञमूर्तये विश्वान्तर्वर्तिने भुवनवराहाय विभूतिस्वामिने नमः ।। ६०-६१ ।। नमो भगवते दद्यात् ततो वै वाडवाग्नये । जगज्जलेन्धनपदं प्रदीप्तपदमेव तु ।। ६२ ।। वीर्याय फट् तदन्ते तु एतत्संख्यस्त्वयंस्मृतः । ११. ॐ नमो भगवते वडवाग्नये जगज्जलेन्धनप्रदीप्तवीर्याय फट् नमः ।।६२।। सर्वान्तश्चारिणे दद्यात् प्रसन्नपदमेव च ।। ६३ ।। मूर्तयेऽथ तदन्ते वै दद्याद् धर्मात्मने पदम् । षोडशाक्षरमेतद् वै अतो गुह्यतमं शृणु ।। ६४ ।। १२. ॐ सर्वान्तश्चारिणे प्रसन्नमूर्तये धर्मात्मने नमः ।। ६३ ।। सर्वविद्येश्वरायाथ दद्यात् वाक्पतये ततः । पदं वद वदादाय ततो वाग्विभवं त्विति ।। ६५ ।। न्यूनविंशाक्षरो ह्येष त्वपरं कथयामि ते । १३. ॐ सर्वविद्येश्वराय वाक्पतये वद वद वाग्विभवं नमः ।। ६४-६५ ।। योगैश्वर्यप्रदायाथ योगनिद्रारसाय वै ।। ६६ ।। निरताय पदं दद्याद् भगवज्जलशायिने । त्रिराष्टवर्णसंख्यश्च अयमेकाधिकस्तु वै ।। ६७ ।। १४. ॐ योगैश्वर्यप्रदाय योगनिद्रारसाय नीरदाय भगवज्जलशायिने नमः ।। ६७ ।। भगवत्पदमादाय अनन्तबलशक्तये । तेजोमयाय भुवनभृतेऽथ द्व्यक्षरं पदम् ।। ६८ ।।

५३४ सात्वतसंहिता तदन्ते विनियोक्तव्यं पदं वै कच्छपात्मने । षड्विंशार्णमिमं विद्धि मन्त्रं मन्त्रविदांवर ॥ ६९ ॥ १५. ॐ भगवदनन्तबलशक्तये तेजोमयाय भुवनधृते कच्छपात्मने नमः ॥ ६८-६९ ॥ यज्ञाङ्गदेहायाद्याय महापदमत्ः परम् । वराहाय ततो दद्यात् पुराणपुरुषाय वै ॥ ७० ॥ दद्यात् ततः प्रजाशब्दं तदन्ते पतये पदम् । चतुर्विंशाक्षरं मन्त्रमेतन्मन्त्रविदांवर ॥ ७१ ॥ १६. ॐ यज्ञाङ्गदेहाय महावराहाय पुराणपुरुषाय प्रजापतये नमः ॥ ७०-७१॥ नमो भगवते कृत्वा नारसिंहाय वै ततः । तेजोनिधे पदं दद्यात् पदं हन हनेति च ॥ ७२ ॥ ततो विकर्मजाद्यं वै शब्दं पञ्चाक्षरं भवेत् । दुष्कृतं हि तदन्ते वै सप्तविंशाक्षरस्त्वयम् ॥ ७३ ॥ आदायामृतमूर्ते वै ततो ज्ञानबलात्मने । सर्वेश्वराय भगवन्न्यूनविंशाक्षरस्त्वयम् ॥ ७४ ॥ १७. ॐ नमो भगवते नारसिंहाय तेजोनिधये हन हन विकर्मजात्यं दुष्कृतं नमः ॥ ७२-७३ ॥ १८. ॐ अमृतमूर्ते ज्ञानबलात्मने सर्वेश्वराय भगवन्नमः ॥ ७३-७४ ॥ आदाय पुण्डरीकाक्षपदं वै परमेश्वर । ततः सकलशब्दं तु सुखसौभाग्य वै पदम् ॥ ७५ ॥ निधे वाञ्छितशब्दं तु ततः सिद्धिप्रदेति वै । पदं चाखिलदुःखेति ततस्तु शमनाग्नये ॥ ७६ ॥ आनन्दसुन्दरपदं ततो लक्ष्मीपदं न्यसेत् । पतये शब्दमुच्चार्य पञ्चाशार्णस्त्रिरुज्झितः ॥ ७७ ॥ १९. ॐ पुण्डरीकाक्ष परमेश्वर सकलसुख सौभाग्यनिधे वाञ्छित सिद्धि- प्रदाखिलदुःखशमनाग्नये आनन्दसुन्दरलक्ष्मीपतये नमः ॥ ७५-७७ ॥ सदसत्पदमादाय मूर्तये तदनन्तरम् । विश्वोत्तमाय तदनु ततोऽमृतनिधे तु वै ॥ ७८ ॥ षोडशार्णस्त्वयं मन्त्र उक्तः कान्तात्मनोविभोः । २०. ॐ सदसन्मूर्तये विश्वोत्तमायामृतनिधये नमः ॥ ७८-७९ ॥

त्रयोविंशः परिच्छेदः ५३५ पुरुषोत्तमाय शब्दं तु ततोऽप्रतिहतेति च ॥ ७९ ॥ शक्तयेऽथ पदं दद्यात् सर्वेश्वरपदं ततः । समग्रोग्रभयेत्यत्र निवारणपदं ततः ॥ ८० ॥ सप्तविंशाक्षरो मन्त्र उक्तश्चातः परं शृणु । नियन्त्रे पदमुद्धृत्य तदन्ते विश्वहेतवे ॥ ८१ ॥ परब्रह्मसमेतं च सेतवे ओमनन्तरम् । मन्त्रो द्विरष्टवर्णश्च कथितो वक्ष्यतः परम् ॥ ८२ ॥ २१. ॐ पुरुषोत्तमायाप्रतिहतशक्तये सर्वेश्वराय समग्रोग्रभयनिवारणाय नमः ॥ ७९-८१ ॥ २२. ॐ नियन्त्रे विश्वहेतवे परब्रह्मसेतवे ॐ नमः ॥ ८१-८२ ॥ पदमप्रतिमेत्यादौ प्रभावं तदनन्तरम् । महाविभूते तदनु महामायापदं ततः ॥ ८३ ॥ अथ दर्शकिशब्दं तु तदन्ते तालकेतवे । चतुर्विंशाक्षरो मन्त्रस्त्वयमुक्तः समासतः ॥ ८४ ॥ २३. ॐ अप्रतिमप्रभाव महाविभूते महामायादर्शकितालकेतवे नमः ॥८३-८४॥ शान्तात्मने पदं दद्यात् तदन्ते यम विन्यसेत् । नियमाश्रयाय दद्यात् परमर्धिप्रदाय च ॥ ८५ ॥ नारायणाय शब्दं तु पूर्वसंख्यासमं स्मृतम् । भवभङ्गपदं चैव कारिणे तदनन्तरम् ॥ ८६ ॥ २४. ॐ शान्तात्मने यमनियमाश्रयाय परमर्धिप्रदाय नारायणाय नमः ॥ ८५-८६ ॥ ततो भगवते शब्दं दत्तात्रेयाय वै ततः । वर्णाश्रमपदं चाथ धर्मशब्दमतः परम् ॥ ८७ ॥ परिग्रहाय प्रणवमष्टाविंशाक्षरः स्मृतः । सर्वलोकमयायेति सर्वज्ञाय पदं ततः ॥ ८८ ॥ सर्वेश्वराय न्यग्रोधशयनाय पदं त्वथ । त्रयोविंशत्यक्षरश्च त्वयमन्यं निबोधतु ॥ ८९ ॥ २५. ॐ भवभङ्गकारिणे भगवते दत्तात्रेयाय वर्णाश्रमधर्म परिग्रहाय ॐ नमः ॥ ८७-८८ ॥