सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
५७० सात्वतसंहिता अथ वराहवक्त्रलक्षणमाह—दैर्घ्येण सार्धतालं चेत्यादिभिः ॥ १८८-१९४ ॥ अब वराह के मुख का लक्षण कहते हैं—वराह का मुख लम्बाई में १ १/२ डेढ़ ताल होना चाहिये । विस्तार में ललाट तक उसका मान दो अङ्गुल कम होना चाहिये । सौम्य रूप पृथ्वी उद्धार के लिये उद्यत उन विभु का मुख एक कला रहित होना चाहिये ॥ १८८-१८९ ॥ तच्चतुर्थांशमानेन पोत्रदेशस्य विस्तृति । तस्योपरिष्टाद् बाहुल्यं तत्समं चाङ्गुलं त्वधः ॥ १९० ॥ उनके पौत्र देश का विस्तार मान में चतुर्थांश होना चाहिये । उसके ऊपर का बाहुल्य उसके समान होना चाहिये और नीचे का मान एक अङ्गुल होना चाहिये ॥ १९० ॥ हनुद्वयस्य वै मानं सार्धं सप्ताङ्गुलं स्मृतम् । शेषमाननरन्ध्रं तु सृक्किणीभ्यां यदन्तरम् ॥ १९१ ॥ वाराह के दोनों हनु का मान सात अङ्गुल कहा गया है । शेष मुख का छिद्र दोनों सृक्किणी में जितना अन्तर है उतना होता है ॥ १९१ ॥ तद्विकासश्च सार्धेन कलार्धेनाग्रदेशतः । स एवाङ्गुलमानेन विज्ञेयः सृक्किणीद्वयात् ॥ १९२ ॥ उसका विकास अग्रदेश से सार्ध कलार्ध मान का होता है, दोनों सृक्किणियों से वह विकास एक अङ्गुल मान का होता है ॥ १९२ ॥ घ्राणरन्ध्रं च वक्त्रोक्ते दंष्ट्रे द्व्यर्थकलोन्नते । नासावंशं यथापूर्वं कदलीनाडिपृष्ठवत् ॥ १९३ ॥ नाक का छिद्र मुख के दो दाँत द्वयार्ध कला उन्नत होना चाहिये । नासावंश (प्रशस्त नासिका) यथापूर्व केला की नाड़ी के पृष्ठभाग के समान करे ॥ १९३ ॥ श्रोत्रे वाजिमुखोक्ते तु कोटेः सप्तकलान्तरे । तत्तुल्ये लोचने किन्तु प्रान्ततीक्ष्णे यवोज्झिते ॥ १९४ ॥ दोनों श्रोत्र हयग्रीव के मुख के समान एवं दोनों किनारों का अन्तर सात कला का होना चाहिए । लोचन भी उतने ही बसबर जो दोनों प्रान्त में तीक्ष्ण और यव से कम होने चाहिये ॥ १९४ ॥ एतेषां विहिता ग्रीवा ह्यङ्गुलद्वितयेन तु । प्रत्येकदेशात् संयुक्ता सौम्यमूर्त्युदिता च या ॥ १९५ ॥
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५७१ अथ हयग्रीवादीनां ग्रीवाद्यवयवलक्षणानि त्रिचतुःपञ्चवक्त्रादिबिम्बस्य मुखाद्य- वयवलक्षणानि चाह— एतेषां विहिता ग्रीवेत्यारभ्य कृता भवति सिद्धिदेत्यन्तम् ॥ १९५-२१४ ॥ अब हयग्रीव के ग्रीवादि का लक्षण जो तीन, चार और पाँच संख्यक मुख वाला है, उस मुख बिम्ब के अवयवादि लक्षण कहते हैं—तीन, चार, पाँच मुख वाले हयग्रीव की ग्रीवा दो अङ्गुल होनी चाहिये। वह ग्रीवा सभी मुखों से संयुक्त है, उसकी मूर्त्ति सौम्य है ॥ १९५ ॥ विनोच्छ्रायेण नृहरेर्यस्य गात्रस्य या प्रमा। सा सा सवेष्टनाद् व्यासात् कलार्धेनाधिका भवेत् ॥ १९६ ॥ उन हयग्रीव की ऊँचाई के बिना जिस गात्र की जितनी प्रमा है, वह गोलाई व्यास से आधे कला से अधिक कही गई है ॥ १९६ ॥ वक्षःकट्युदरांसस्फिक्कलामानाधिकानि च। तथैव नखपत्राणि देहश्चास्य समांसलः ॥ १९७ ॥ हयग्रीव का वक्षःस्थल, कटिभाग, उदर और नितम्ब कलामान से अधिक है उसी प्रकार नख पत्र भी समझना चाहिये। इनका शरीर मांसल युक्त बनाना चाहिये ॥ १९७ ॥ सम्पूर्णो दक्षिणावर्त्तैर्लोमभिश्चातिकुञ्चितैः। त्रिचतुःपञ्चवक्त्रस्य विनैवोर्ध्वमुखेन तु ॥ १९८ ॥ इनका शरीर चिक्कन और अत्यन्त कुञ्चित दक्षिणावर्त्त लोम से युक्त होना चाहिये। ये तीन, चार, पाँच मुख वाले हयग्रीव ऊर्ध्वमुख से रहित हैं ॥ १९८ ॥ दक्षिणोत्तरवक्त्राभ्यां ह्रासं कुर्याद् द्विगोलकम्। विकासः सिंहवक्त्रोक्त उदग्वक्त्रस्य तत्र च ॥ १९९ ॥ दक्षिण और उत्तर वाले मुख को परस्पर दो गोलक कम करके निर्माण करे। उसमें उत्तर मुख का विकास सिंह के मुख के समान बनाना चाहिये ॥ १९९ ॥ समो दृक्सन्निवेशस्तु चतुर्णां मोक्षसिद्धये। अरोग्यभोगकैवल्यप्राप्तयेऽर्धाङ्गुलेन तु ॥ २०० ॥ चारो प्रकार की मोक्ष सिद्धि के लिये हयग्रीव के नेत्र का सन्निवेश समान रूप से करे। आरोग्य, भोग तथा कैवल्य प्राप्ति के लिये आधा अङ्गुल सन्निवेश करे ॥ २०० ॥ कुर्यात् सव्यापसव्याभ्यामधो दृक्सन्निवेशनम्।
५७२ सात्वतसंहिता सह पूर्वाननेनैव साम्यं प्रत्यङ्मुखस्य च॥ २०१ ॥ हयग्रीव के मुख का सन्निवेश बायें, दाहिने और नीचे की ओर करे। पूर्व के मुख के समान पश्चिम का मुख निर्माण करे ॥ २०१ ॥ निष्कासायामविस्तारघ्राणदृग्भ्रूश्रुतिष्वथ । ईषत्तिर्यक्क्षितिन्यस्तदृङ्मुखं दक्षिणं शुभम्॥ २०२ ॥ निष्कास तथा आयाम, विस्तार, घ्राण, दृष्टि, भ्रू तथा कानों में करे। कुछ तिरछापन लिये हुए पृथ्वी पर स्थित दक्षिण की ओर का नेत्र और मुख कल्याणकारी कहा गया है ॥ २०२ ॥ तद्वच्च पोत्रदृग्वक्त्रमुत्तरं सर्वसिद्धिकृत् । स्वकार्यसूचनान्न्यूनं तन्मन्त्रस्य च सन्निधिः॥ २०३ ॥ उसी प्रकार पोत्र, दृक् (नेत्र) और मुख उत्तर की दिशा में सभी सिद्धियों को देने वाले कहे गए हैं। अश्वग्रीव के मन्त्र की सिद्धि तब समझनी चाहिये जब वह आराधक के कार्य होने की सूचना प्रदान करे ॥ २०३ ॥ अतोऽन्यथा समाश्रित्य शान्तिमास्ते च मन्त्रराट् । नित्यं तत्सन्निधानाच्च भूतवेतालराक्षसाः॥ २०४ ॥ आ दर्शनात् पलायन्ते आविशन्ति च दर्शनात् । आदाय शिरसा मन्त्रिसमाज्ञां सम्प्रयान्ति ते॥ २०५ ॥ यदि सिद्धि नहीं होती तो ये मन्त्रराट् शान्त (चुपचाप) रहते हैं। इनके सन्निधान से, अथवा दर्शन से भूत, बेताल और राक्षस दूर भाग जाते हैं, अथवा दर्शन मात्र से स्थिर होकर खड़े रहते हैं और मन्त्रज्ञ की आज्ञा शिर से वहन करते हुए तदनन्तर जाते हैं ॥ २०४-२०५ ॥ अतः समाचरेद् यत्नाद् येन स्याद् बिम्बसन्निधिः। नहि तत्सन्निधानाद् वै कश्चिदारभते शुभम्॥ २०६ ॥ इसलिये आराधक ऐसा करे जिससे बिम्ब का सन्निधान बना रहे। उसके सन्निधान के बिना कोई भी शुभ कार्य का आरम्भ नहीं हो सकता ॥ २०६ ॥ वराहदंष्ट्रं सिंहाक्षं तथा चिपिटनासिकम् । विधेयं पञ्चमं वक्त्रं पञ्चवक्त्रस्य वै विभोः॥ २०७ ॥ इन विभु पञ्चवक्त्र का पाँचवाँ मुख वराह के समान दाँतों वाले हैं। सिंह के समान इनकी आँखें और नासिका चिपटी बनाना चाहिये ॥ २०७ ॥ अस्याधरोत्तराभ्यां त्वप्योष्ठाभ्यां समता भवेत् ।
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५७३ विभिन्नताऽङ्गुलाधैन ताभ्यां तन्मध्यगा स्फुटा ॥ २०८ ॥ इनके ऊपर और नीचे के दोनों ओष्ठ सम बनाना चाहिये, अथवा आधा अङ्गुल कम वेशी के मान से विभिन्न निर्माण करे । इनका मध्य भाग अधिक स्पष्ट होना चाहिये ॥ २०८ ॥ कार्या दशनपाली वै मूलमध्याग्रतः समा । कलार्धेनोल्बणं वृत्तं तद्गण्डद्वितयं ततः ॥ २०९ ॥ दर्शनपाली (मसूढों) का निर्माण मूल, मध्य तथा अग्र भाग में समान रूप से करना चाहिए । उनका दोनों गण्डस्थल आधे कला का उल्बण (उग्र) एवं वृत्ताकार बनावे ॥ २०९ ॥ द्विकलं चायतः श्मश्रु कला चार्धकला क्रमात् । सम्बद्धवेणिः पूर्वोक्तमानेन शुभकृद् भवेत् ॥ २१० ॥ आगे का श्मश्रु दो कला का, अथवा एक कला का, अथवा आधे कला का होना चाहिये । शिर से सम्बद्ध वेणी पूर्व में कहे गये मान से बनाने पर शुभकारक होती है ॥ २१० ॥ सिंहसूकरवाज्याख्यवक्त्राणां सौम्यतां नयेत् । प्रमाणं दृग्गताल्लक्ष्याद् व्यवहारमयात् तु वै ॥ २११ ॥ हयग्रीव के सिंह, सूकर तथा अश्व के समान मुख की सौम्यता निर्माण करे । उस बिम्ब का प्रकाश दृष्टि से देखे जाने वाले लक्ष के अनुसार तथा व्यवहार के अनुसार बनाना चाहिये ॥ २११ ॥ विकासश्चाश्ववक्त्रोक्तः सौम्यरूपस्य भूभृतः । तदाद्योक्तस्तु नृहरेः प्रागुक्तो यः स चोदितः ॥ २१२ ॥ यहाँ तक हयग्रीव के मुख का विकास कहा गया है । सौम्य रूप धारण करने वाले वराह के मुख का विकास पहले कह आये हैं । उसके भी पहले नृसिंह के मुख का विकास कह आये हैं ॥ २१२ ॥ तथा वक्त्राङ्गभावित्वे विभोः शक्तीश्वरस्य च । हारनूपुरवस्त्रस्रक्कटकाङ्गदभूषिता ॥ २१३ ॥ माल्योपवीतकेयूरमकुटाद्युपशोभिता । प्रतिमा मन्त्रमूर्तीनां कृता भवति सिद्धिदा ॥ २१४ ॥ ये सभी विभु शक्तीश्वर के मुख के अङ्ग है । इनकी प्रतिमा हार, नूपुर, वस्त्र, माला, कटक, अंगद से भूषित करनी चाहिये तथा माल्य, उपवीत, केयूर
५७४ सात्वतसंहिता एवं मुकुट से शोभित करना चाहिये । इस प्रकार भूषित तथा शोभित की गई मन्त्र मूर्ति की प्रतिमा सिद्धि प्रदान करने वाली होती है ॥ २१३-२१४ ॥ विमर्श—सलक्षण, बिम्ब मान, हयग्रीव मुख लक्षण, नृसिंह मुख लक्षण, वराह मुख लक्षण, हयग्रीवादि के तीन, चार और पञ्चमुख लक्षणों को विष्णु- धर्मोत्तर पुराण तथा चतुर्वर्ग चिन्तामणि (हेमाद्रि) व्रतभाग के प्रथमखण्ड में देखिये । बिम्ब के अङ्गावयवों के लक्षण एवं पर्याय अमरकोशादि ग्रन्थों में द्रष्टव्य है । सत्यसुपर्णादिगरुडव्यूहादिलक्षण कथनम् यत्पुरा पञ्चधा प्रोक्तं वाहनं प्राणदैवतम् । तस्य बिम्बसमुत्थेन तालेन मुखमण्डलम् ॥ २१५ ॥ द्व्यङ्गुलं तु ललाटोक्तं जटाबन्धो द्विलोचनः । द्व्यङ्गुलेनोन्नतः कण्ठ उरः पञ्चकलं स्मृतम् ॥ २१६ ॥ अष्टाङ्गुलं तदुदरं कटिः पञ्चाङ्गुलोन्नता । नवाङ्गुलोन्नतावूरू जानुनी द्व्यङ्गुले स्मृते ॥ २१७ ॥ संत्यसुपर्णादिगरुडव्यूहलक्षणमाह—यत्पुरा पञ्चधा प्रोक्तमित्यारभ्य स्थितानाम- र्धलक्षणेत्यन्तम् ॥ २१५-२३४ ॥ अब सत्य सुपर्णादि गरुड़ व्यूह का लक्षण कहते हैं—पहले प्राण देवता वाले वाहन रूप गरुड़ को पाँच प्रकार का कहा गया है । उनके मुख मण्डल का मान बिम्ब के अनुसार एक ताल का होना चाहिए । ललाट दो अङ्गुल का होना चाहिये । जटाबन्ध दो लोचन का, कण्ठ दो अङ्गुल ऊँचा तथा वक्षःस्थल पाँच कला का होना चाहिये । उदर आठ अङ्गुल का और कटि पाँच अङ्गुल ऊँची होनी चाहिये । दोनों ऊरु नव अङ्गुल उन्नत तथा जानु दो अङ्गुल का निर्मित होना चाहिये ॥ २१५-२१७ ॥ अष्टाङ्गुलोच्छ्रिते जङ्घे द्व्यङ्गुले पादपिण्डके । शममेककलाहीनं तद्ग्रीवायाश्च वेष्टनम् ॥ २१८ ॥ दोनों जङ्घा आठ अङ्गुल ऊँची, पैर की पिण्डिका दो अङ्गुल, उस बिम्ब की ग्रीवा का वेष्टन (= गोलाई) एक कलाहीन कम परिमाण में निर्माण करे ॥ २१८ ॥ बिम्बतुल्या परिज्ञेया सर्वदाऽस्याङ्गविस्तृतिः । तद्विभागाधिकं विद्धि वेष्टनं हृदरस्य च ॥ २१९ ॥ इसके अंग का विस्तार सर्वदा बिम्ब के तुल्य समझना चाहिये । उदर का वेष्टन उसके विभाग से अधिक समझे ॥ २१९ ॥ परिधिः कटिदेशस्य चतुर्नेत्राधिकस्तु वै ।
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५७५ बिम्बोक्तसदृशं विद्धि तदूर्वोर्मूलवेष्टनम् ॥ २२० ॥ कटि देश की परिधि का मान चार नेत्र से अधिक मान में निर्माण करे । उस बिम्ब के ऊरु का वेष्टन (= गोलाई) पूर्व में कहे गये बिम्ब के सदृश समझना चाहिये ॥ २२० ॥ तदेव जङ्घामध्यस्य जङ्घान्तस्य तदेव हि । पादं पञ्चकलायामं चतुरङ्गुलविस्तृतम् ॥ २२१ ॥ वही परिमाण जङ्घा के मध्य का तथा वही परिमाण जङ्घा के अन्त का भी होना चाहिए । पैर पाँच कला लम्बा और चार अङ्गुल चौड़ा बनावे ॥ २२१ ॥ त्र्यङ्गुलं पाणिदेशाच्च अङ्गुष्ठोऽर्धकलासमः । विज्ञेया अङ्घ्रिदैर्घ्याच्च यवोनाङ्गुलयः क्रमात् ॥ २२२ ॥ पाणिदेश से तीन अङ्गुल दूर अङ्गुष्ठ का मान आधी कला का बनावे । अङ्गुलियाँ पैर की चौड़ाई से एक यव कम करे ॥ २२२ ॥ नाभिरन्ध्रं सुविस्तीर्णं ह्यर्धलोचनविस्तृतम् । मध्यमाङ्गुलिपर्यन्तं मणिबन्थान्नवाङ्गुलम् ॥ २२३ ॥ नाभि का छिद्र विस्तार युक्त तथा अर्धलोचन विस्तृत निर्माण करे । मणिबन्ध से मध्यमाङ्गुलि पर्यन्त दूरी नव अङ्गुल कही गई है ॥ २२३ ॥ त्रिकलः पाणिविस्तारस्तन्नखा निशितोन्नताः । तद्द्बाहुमस्तकं विद्धि उच्छ्रायेण द्विलोचनम् ॥ २२४ ॥ हाथ का विस्तार तीन कला का तथा नख अत्यन्त निशित (तीक्ष्ण) एवं समुन्नत होने चाहिये । बिम्ब का बाहु और मस्तक ऊँचाई में दो लोचन का बनाना चाहिये ॥ २२४ ॥ भुजोपभुजयुग्मं यत् तद् द्वितालसमं स्मृतम् । कलार्धेनाधिकं बिम्बं बाहोस्तद्द्बाहुवेष्टनम् ॥ २२५ ॥ दोनों भुजायें एवं दोनों उपभुज दो ताल के समान बनाना चाहिये । बिम्ब का एवं बाहु का बाहु-वेष्टन एक कला से अधिक निर्माण करे ॥ २२५ ॥ बिम्बोक्तां सद्धिधिं ह्येवं स्तनभूर्लोचनोल्बणा । वृत्तवैपुल्यमानेन लोचने पद्मपत्रवत् ॥ २२६ ॥ इस प्रकार बिम्ब की सुन्दर विधि कही गई । स्तन, भ्रू और लोचन उल्बण बनावे । दोनों नेत्रों को गोलाई तथा वैपुल्य के अनुसार कमल पत्र के समान विशाल बनावे ॥ २२६ ॥
५७६ सात्वतसंहिता भ्रूयुगं नरसिंहोत्थं घ्राणाग्रं शुकचञ्चुवत् । कलार्धमानं दीर्घं च तद्वंशं गजपृष्ठवत् ॥ २२७ ॥ गरुड़ के दोनों भ्रू नरसिंह के समान और घ्राण का अग्रभाग सुग्गे के चञ्चु के समान होना चाहिए। घ्राणवंश कला को अर्धमान का दीर्घ तथा गज पृष्ठवत् निर्माण करना चाहिए ॥ २२७ ॥ स्वायामदीर्घं तत्पक्षयुगलं कुक्षिदेशगम् । तदेव दैर्घ्यादर्धेन विस्तृतं हंसपक्षवत् ॥ २२८ ॥ उनके कुक्षि में रहने वाला दोनों पक्ष लम्बाई के अनुसार चौड़ा बनावे। वह उसकी चौड़ाई, लम्बाई का आधा तथा हंस-पक्ष के समान विस्तृत बनावे ॥२२८॥ स्वपक्षमानाद् द्विगुणं तत्पुच्छं शतशाखकम् । सपक्षमिममायामं सात्यं त्ववयवान्वितम् ॥ २२९ ॥ उसका पुच्छ उसके पङ्क के मान से द्विगुणित तथा हजारों शाखा से युक्त बनावे। इस प्रकार यहाँ अवयव युक्त पक्ष सहित यह आयाम सत्य नाम सुपर्ण का कहा गया है ॥ २२९ ॥ सर्वेषां विद्धि सामान्यं विशेषाख्यमथोच्यते । ऊरुद्वयान्नयेद् ह्रासमङ्गुलानां त्रयं तथा ॥ २३० ॥ जङ्घाकाण्डोच्छ्रितेः कुर्याज्जङ्घाभ्यां चात्र वेष्टनम् । बिम्बाख्यं मणिबन्धस्य सममूलान्महामते ॥ २३१ ॥ जानुदेशात् तदर्धेन सह चार्धाङ्गुलेन तु । पादे जालं परिज्ञेयं विस्तारेण षडङ्गुलम् ॥ २३२ ॥ यहाँ तक जङ्घा काण्ड का सामान्य लक्षण कहा गया है। अब जो विशेष है उसे कहा जा रहा है। दोनों जङ्घाओं का वेष्टन दोनों ऊरु से तीन अङ्गल कम रखे। उसकी ऊँचाई जङ्घा काण्ड की ऊँचाई के समान रखे। हे महामते! उसका बिम्ब मणिबन्ध के मूल के समान रखे। जानुदेश से उसके आधे के समान अथवा आधा अङ्गल के समान पैर का जाल निर्माण करे, जिसका विस्तार छः अङ्गुल होना चाहिये ॥ २३०-२३२ ॥ शेषं सत्योदितं सर्वं सर्वेषां विद्धि सर्वदा । किन्तु पादोज्झितौ पक्षौ दैर्घ्यात् तद्दलविस्तृतौ ॥ २३३ ॥ शेष सब कुछ सत्य गरुड़ के लक्षण में कह दिया गया है किन्तु पैर रहित दोनों पक्ष लम्बाई से चार गुना विस्तृत बनावे ॥ २३३ ॥
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५७७ एषां चोड्डीयमानानां स्वायामा पक्षविस्तृतिः । पञ्चानां च परिज्ञेया स्थितानामर्धलक्षणा ॥ २३४ ॥ ये व्यूह जब उड़ने लगते हैं तब इनके आयाम के अनुसार इनके पक्ष भी बढ़ जाते हैं, इस प्रकार से स्थित पाँचों गरुड़ों की अर्धलक्षणा समझनी चाहिये ॥२३४॥ वामनलक्षणकथनम् एतदादाय मानं तु पुच्छभ्रूपक्षवर्जितम् । विद्धि वामनरूपस्य लक्षणं किन्तु लाङ्गलिन् ॥ २३५ ॥ ललाटनासावक्त्रेभ्यः समादायाङ्गुलत्रयम् । मस्तकस्योपरिष्टात् तु जटाबन्धं प्रकल्पयेत् ॥ २३६ ॥ वामनलक्षणमाह—एतदिति सार्धद्वाभ्याम् ॥ २३५-२३७ ॥ यही गरुड़ पञ्चव्यूहों का पुच्छ, भ्रू एवं पक्ष वर्जित मान वाला लक्षण वामन का भी समझना चाहिये । किन्तु हे सङ्कर्षण ! ललाट, नासिका और वक्त्र (मुख) से तीन अङ्गुल लेकर वामन के मस्तक के ऊपर जटाबन्ध का निर्माण करना चाहिए ॥ २३५-२३६ ॥ जटावसानमायामं यथा स्यात् पञ्चतालकम् । इत्युक्तं लेशतो बिम्बलक्ष्म पीठमथोच्यते ॥ २३७ ॥ वामन के जटा की लम्बाई पाँच ताल बनानी चाहिये । यहाँ तक लेश मात्र बिम्ब का लक्षण कहा गया, अब पीठ का लक्षण कहता हूँ ॥ २३७ ॥ पीठलक्षणकथनम् बिम्बानामुपविष्टानां चतुरश्रं तु तद् भवेत् । चतुरश्रायतं चैव प्रोत्थितानां सदैव हि ॥ २३८ ॥ वृत्तवृत्तायतत्वेन ह्यनयो रूपमन्यथा । याऽङ्गुलैः परमाणूत्थैराराधकमयैस्तु वा ॥ २३९ ॥ धत्तेऽर्चा तु सामायामं द्वाराद् वा मन्दिरोत्थितात् । तन्मानेन तु पीठस्य दैर्घ्यमर्धेन विस्तृतिः ॥ २४० ॥ द्वारोर्ध्वाच्च त्रिरन्तानि एकपूर्वाणि वै पुरा । उक्तनि(र्ग?ग)मनपूर्वकं पीठलक्षणमाह—इत्युक्तं लेशतो बिम्बमित्यारभ्य विलोमाद् विपरीतदम्'इत्यन्तम् ॥ २३७-२८१ ॥ बैठे हुए बिम्ब के लिये पीठ चौकोर बनानी चाहिये तथा खड़े रहने वाले बिम्ब के लिये चतुरस्र और आयत बनाना चाहिये । इन दोनों रूपों के अतिरिक्त
५७८ सात्वतसंहिता अन्य रूप वाले विम्ब के लिये वृत्त, अवृत्त अथवा आयत पीठ का निर्माण करे। जो अङ्गुलियों से परमाणुओं के सहारे अथवा आराधकमय होकर अर्चा ग्रहण करे, उसे मन्दिर के द्वार के समान आयाम में निर्माण कर उसके मान के अनुसार पीठ को दीर्घ बनावे। उसके आधे मान से उसका विस्तार बनावे ॥ २३८-२४१ ॥ सन्त्यज्य द्वादशांशाद् वै अधः पीठोन्नतिस्त्रिभिः ॥ २४१ ॥ शेषेणास्त्रांशसङ्घेन प्रतिमा चोत्थिता भवेत् । अथवा वाहनारूढा न्यूना वा मध्यमोत्तमा ॥ २४२ ॥ नीचे से द्वादशांश त्याग कर तीन अंशों से पीठ की ऊँचाई निर्मित करे। शेष अस्त्रांश समूह से प्रतिमा खड़ी बनानी चाहिये, अथवा यदि वाहनारूढ़ प्रतिमा बनावे तो उसे न्यून, मध्यम एवं उत्तम रूप में निर्माण करे ॥ २४२ ॥ चतुर्भिर्द्वादशांशैस्तदुपविष्टस्य चोन्नतिः । विहिता चास्य सर्वत्र प्रतिमाध्रेन विस्तृतिः ॥ २४३ ॥ चार द्वादशांश से उपविष्ट प्रतिमा की ऊँचाई निर्माण करे। इसका विस्तार प्रतिमा के आधे भाग में सर्वत्र निर्माण करे ॥ २४३ ॥ तत् त्र्यंशपरिलुप्ता च चतुर्थांशोज्झिताऽथवा । परिवारवशेनैव चातुरात्म्यस्य वै पुनः ॥ २४४ ॥ पुनः चातुरात्म्य के परिवार वश से वह प्रतिमा तीन अंशों से पूर्ण बनाई जाय अथवा चतुर्थांश छोड़कर बनाई जावे ॥ २४४ ॥ अलुप्तांशं च विहितं पीठायामं च सर्वदिक् । चतुर्दिग्दृग्गतस्यैवम् एकदिग्दृग्गतस्य च ॥ २४५ ॥ सभी दिशाओं में पीठ का आयाम अंश लोप के बिना निर्माण विहित है। चारों दिशाओं में दिखाई पड़ने वाले पीठ को अथवा एक दिशा में दिखाई पड़ने वाले पीठ के लिये यही नियम है ॥ २४५ ॥ तदेव दैर्घ्यद्विगुणं लाञ्छनैरावृतस्य च। सार्धं चानावृतस्यैव तद्बाहुल्यं पुरोदितम् ॥ २४६ ॥ यदि वह लाञ्छन से आवृत है, तो उसे दीर्घ का दुगना निर्माण करे, यदि वह लाञ्छन से अनावृत है तो अढ़ाई गुना कर निर्माण करे। इसका बाहुल्य पहले कह आये हैं ॥ २४६ ॥ (चतुष्कमेकपीठानां केवलं लक्ष्मवर्जितम् ।) एकैकं लक्ष्मभेदेन तत्संख्यं विद्धि वै पुनः ।
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५७९ पीठसंख्याकथनम् अनन्तासनमाद्यं च द्वितीयं पक्षमन्दिरम् ॥ २४७ ॥ कमलाङ्गं तृतीयं तु चतुर्थं चक्रभूषणम् । एवं हि सर्वसामान्यं पीठानां हि द्विरष्टकम् ॥ २४८ ॥ एक पीठ के ही चार भेद होते हैं जो केवल लक्ष्म (चिह्न) से वर्जित होते हैं। फिर लक्ष्म (= चिह्न) के भेद से एक-एक क्रम से वे भिन्न हो जाते हैं। हे सङ्कर्षण ! अब पुनः उनकी संख्या सुनिये। पहले आसन (पीठ) का नाम अनन्त है, द्वितीय पीठ का नाम 'पक्ष मन्दिर' है। तृतीय आसन (पीठ) का नाम कमलाङ्ग है। चतुर्थ का नाम चक्रभूषण है। इस प्रकार सर्व सामान्य पीठों की संख्या सोलह कही गई है ॥ २४७-२४८ ॥ भेदभिन्नं समासेन पुनरेव निबोध तु। दिक्षु लक्ष्माणि पीठानां विद्धि कण्ठगतानि च ॥ २४९ ॥ अब पुनः भेद से भिन्न होने के कारण उन पीठों के विषय में सुनिये। आठो दिशाओं में पीठों के लक्ष्म (चिह्न) कण्ठगत होते हैं ॥ २४९ ॥ अन्योन्यसन्निवेशाच्च तेषां बाह्यात्मना पुनः। चक्राम्बुजाभ्यां तत्स्थाभ्यां लुप्ताभ्यामपि तत्क्षितेः ॥ २५० ॥ ताभ्यामन्योन्ययोगाच्च दिक्ष्वनन्तखगाश्रयात् । द्विद्वयात्मना द्वयात्मना वा बहुत्वमवधारय ॥ २५१ ॥ पद्मेनोर्ध्वगतेनैव द्वयं चक्रेण तद्बहिः । एवं ह्याधोगतेनैव परिज्ञेयं द्वयं द्वयम् ॥ २५२ ॥ उपरिष्टात् तु पद्माभ्यामधश्चक्रं द्वयं द्वयम् । द्वितयव्यत्ययाच्चान्यत् परिज्ञेयं महामते ॥ २५३ ॥ पुनः अन्योन्य के सन्निवेश से वे पीठ अधिक संख्या में हो जाते हैं। पीठ में स्थित चक्र और कमल के भेद से, उन दोनों के स्थापित करने के भेद से, दोनों को एक में मिलाकर स्थापित करने के भेद से, दिशाओं में अनन्त और गरुड़ के स्थापन करने से, इस प्रकार दो-दो को अलग-अलग स्थापित करने से, अथवा दोनों को एकत्र स्थापित करने से वे पीठ अनेक हो जाते हैं। हे सङ्कर्षण ! इसे समझिए। इस प्रकार पीठ के ऊपर पद्म स्थापन से, उसके बाहर चक्र स्थापन से और इसी प्रकार के नीचे स्थापन करने से उसके दो भेद हो जाते हैं। ऊपर दो-दो पद्मों के स्थापन से, इसी प्रकार नीचे दो-दो चक्र के स्थापन से दो-दो भेद होते हैं और दोनों के व्यत्यय से भी दो-दो भेद हो जाते हैं। हे महामते ! इस प्रकार पीठ के अनेक भेद हो जाते हैं ॥ २५०-२५३ ॥
५८० सात्वतसंहिता अन्तर्बहिःस्थितिवशाच्चक्रपद्मद्वयस्य च। व्यत्ययादनयोर्विद्धि ऊर्ध्वभागाच्चतुष्टयम्॥ २५४ ॥ भीतर बाहर चक्र और पद्म के आठ ऊर्ध्व भाग के व्यत्यय होने से इनके चार भेद हो जाते हैं ॥ २५४ ॥ अधोभागादेवमेव चतुष्कमपरं तु वै। पीठानामष्टकमिदमधस्तादूर्ध्वतस्तु वा॥ २५५ ॥ युक्तमेकेन वै कुर्याच्चक्रेण कमलेन वा। चक्राकारास्तु विहिता ह्येकभ्रमसमाश्रिताः॥ २५६ ॥ इसी प्रकार अधोभाग में भी व्यत्यय होने से एक और चार भेद हो जाता है। ये पीठ के आठ भेद नीचे और ऊपर होने के कारण हो जाते हैं। इस पीठ का निर्माण केवल चक्र से अथवा केवल कमल से अर्थात् दो में से एक ही से करना चाहिये ॥ २५५-२५६ ॥ बहवो हि दलास्तद्वदीषद् वै कर्णिकान्विताः। इति लाञ्छनसञ्चारो बहुधा ते मयोदितः॥ २५७ ॥ यस्मिन् प्रकृतिभूते तु पीठे तदधुना शृणु। कृत्वा द्विर्दशधा पीठं पुरायामात् समैः पदैः॥ २५८ ॥ केवल एक गोले में ही चक्राकार पीठ निर्माण करना चाहिये । इसी प्रकार बहुत दलों से युक्त थोड़े कर्णिकाओं से कमल द्वारा पीठ निर्माण करे । इस प्रकार पीठ के अनेक लाञ्छन युक्त सञ्चार का वर्णन मैने किया । अब जिस प्रकृतिभूत पीठ में (जो करना है) उसे सुनिये । पीठ का आयाम (लम्बाई) के अनुसार बराबर-बराबर भागों में बारह भाग करे ॥ २५७-२५८ ॥ एकेन चरणं जङ्घा-कलशौ च त्रिभिस्त्रिभिः । कण्ठवीथिमथैकेन षड्भिः कण्ठं तदूर्ध्वतः ॥ २५९ ॥ एक भाग में चरण, तदनन्तर जङ्घा और कलश तीन-तीन भागों में निर्माण करे । एक भाग से कण्ठ एवं वीथी बनावे और उसके ऊपर छः भागों में कण्ठ निर्माण करे ॥ २५९ ॥ भागेन कण्ठसूत्रं तु शक्तिकांशत्रयेण तु। उष्णीषं च तदूर्ध्वे तु कुर्यादंशद्वयेन वै॥ २६० ॥ शुक्ति के अंशत्रय भाग से कण्ठ सूत्र निर्माण करे और उसके ऊपर दो अंश से उष्णीश निर्माण करे ॥ २६० ॥
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५८१ निर्गमः स्वदलेनैव विहितश्चरणस्य तु। चतुर्दिक्षु महाबुद्धे क्षेत्रतोऽभ्यधिकः स्मृतः॥ २६१ ॥ विहित चरण का निर्गम उसके भाग से ही करे। हे महाबुद्धे! इस प्रकार चारों दिशाओं में निर्गम क्षेत्र से अधिक बनावे ॥ २६१ ॥ सर्ववृत्तं घटं कुर्यात् पल्लवैर्वारिकैर्युतम्। परितोऽशद्वयेनैव कण्ठपीठं प्रवेशयेत् ॥ २६२ ॥ पत्तों तथा अस्त्रों से युक्त चारों ओर से गोला घट का निर्माण करे। दो अंश से कण्ठ पीठ बनाकर उस घट में प्रवेश करावे ॥ २६२ ॥ अन्तःप्रवेशमेकेन विध्यंशेन गलस्य च। कुर्याद् गलप्रवेशस्य समां सूत्रस्य निःसृतिम्॥ २६३ ॥ एक अंश से निर्मित गला का अन्तःप्रवेश करावे। गल-प्रवेश के समान सूत्र को उसमें से निकाल लेवे ॥ २६३ ॥ शुक्तेरधः कण्ठसूत्रभागात् पादेन निर्गतम्। वदनान्तं समासेन शुक्तेः संकोचमाचरेत्॥ २६४ ॥ शुक्ति के नीचे कण्ठसूत्र के भाग से एक पाद निकला हुआ मुख का भाग संक्षेप में शुक्ति से संकुचित करे ॥ २६४ ॥ उष्णीषघटजङ्घानामश्रिसाम्यं यथा स्थितम्। घटवद् भूषयेच्छुक्तिमरकैर्वाब्जपल्लवैः॥ २६५ ॥ तत्रोपरिष्टात् परिधिं चतुरंशकसम्मितम्। सन्त्यज्य निखनेद् द्रोणीमंशनिम्नां समन्ततः ॥ २६६ ॥ ऐसा करने से उष्णीष, घट और जङ्घा के कोण एक साम्य में स्थित हो जाएँगे। तदनन्तर शुक्ति को अरक तथा कमल पत्र से घट के समान भूषित करे। उसके ऊपर चार अंश की परिधि का भाग छोड़कर एक अंश गहरी द्रोणी चारों ओर (गड्ढा) खननी चाहिए ॥ २६५-२६६ ॥ विस्तृतैर्मध्यभागेऽथ स्वत्र्यंशेन च निर्गमम्। तन्मानं चतुरश्रं तु पीठक्षेत्राद् विनिर्गतम् ॥ २६७ ॥ मध्य भाग को विस्तृत कर उसके तीन अंश से निर्गम का पानी निकलने का स्थान खने। पीठ क्षेत्र से निकले हुए उस निर्गम (जल निकासी) का मान चतुरस्र (चौकोर) बनावे ॥ २६७ ॥ तच्चाग्रतस्त्रिधा कृत्वा पक्षभागौ क्षयं नयेत्।
४. चतुर्थ भाग (परिच्छेद २०-२५): योग-साधना, मोक्ष-धर्म एवं सात्वत उपसंहार
५८२ सात्वतसंहिता अनुपादेन चामूलात् सम्यग् लाङ्गलवक्त्रवत्॥ २६८ ॥ फिर उसे आगे के भाग से तीन भागों में बाँट कर उसका किनारा नष्ट कर देवे । इस प्रकार मूल से लेकर पाद के अनुसार उसे हल के मुख के समान निर्माण करना चाहिए ॥ २६८ ॥ अग्रतो मूलदेशाच्च कृत्वादौ वै त्रिधा त्रिधा । भूयस्तन्त्रिखनेन्मध्याज्जलं याति यथा द्रुतम्॥ २६९ ॥ मूल देश से आगे, उसे तीन-तीन भागों में विभक्त कर, फिर मध्य में उसे इस प्रकार खने जिससे पीठ का जल उसमें से शीघ्रता से बह जावे ॥ २६९ ॥ सूकराननतुल्यं तु भवत्येवं महामते । कुर्याद् वै शङ्खसदृशं मकरास्योपमं तु वा॥ २७० ॥ हे महामते ! उस नाली को इस प्रकार खने जिससे वह सूकर के मुख के समान हो जावे । अथवा शङ्ख के सदृश या मकर के समान हो जावे ॥ २७० ॥ जलनिर्गममेतद् वै पीठेषूदितलक्षणम् । न कुर्यात् कर्मबिम्बानामाश्मादिमितात्मनाम् ॥ २७१ ॥ चित्रमृत्काष्ठजानां तु चलानां तु विशेषतः । तथैव चतुरश्रस्य चतुर्मूर्तिगतस्य च॥ २७२ ॥ इस प्रकार पीठों पर से निकलने वाले जल के निकास का रास्ता कहा गया है । जहाँ शम (दो अङ्गुल) प्रमाण से छोटा कर्म बिम्ब हो, वहाँ प्रणाली का निर्माण न करे । विशेष कर जहाँ चित्र, मिट्टी और काष्ठ निर्मित बिम्ब हो, अथवा चल बिम्ब हों और जहाँ चौकोर चतुर्मूत्ति हो, वहाँ प्रणाली का निर्माण न करे ॥ २७१-२७२ ॥ प्रणालमग्रगं मूर्तेर्यतः संसिद्धिहानिकृत् । प्रयोजनं विना काचिन्न क्षतिस्तस्य तद्विना ॥ २७३ ॥ यतः मूर्ति के आगे निकाले जाने वाला प्रणाल साधक की सिद्धि की हानि करता है । अतः उसका निर्माण नहीं करना चाहिये । प्रयोजन के बिना यदि प्रणाल का निर्माण न किया जाय तो उसके बिना कोई क्षति नहीं होती ॥ २७३ ॥ सामान्यस्य तु वै यस्मादाधारस्य विशेषतः । सप्रणालं भवेत् पीठमासनं च प्रणालकम् ॥ २७४ ॥ जहाँ सामान्य आधार हो वहाँ विशेष रूप से प्रणाल युक्त पीठ का निर्माण करे और आसन भी प्रणाल युक्त बनावे ॥ २७४ ॥
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५८३ भूरिनीरादिना स्नानं यत्र यच्छति साधकः । प्रत्यहं तद्विना तत्र प्रत्यवायो भवेत् स्फुटम् ॥ २७५ ॥ साधक जहाँ भगवान् को पर्याप्त जल से प्रतिदिन स्नान कराता है । वहाँ यदि स्नान न करावे तो उसे प्रत्यवाय लगता है ॥ २७५ ॥ एवमेव बृहद्विम्बभूषितानां विधीयते । धातुशैलोत्थितानां च निमित्तस्नपनार्थतः ॥ २७६ ॥ यह विधान बृहद् बिम्ब से भूषित मूर्तियों के लिये विहित हैं । धातु शैल से निर्मित बिम्ब का स्नपन ही निमित्त है ॥ २७६ ॥ भद्रासनगते कर्मबिम्बे तस्य समाचरेत् । सततं च यथालाभं दधिक्षीरघृतादिना ॥ २७७ ॥ कर्म-बिम्ब के भद्रासन पर अधिष्ठित होने पर जिस प्रकार दधि, क्षीर, घृत प्राप्त हो उससे सतत स्नान करावे ॥ २७७ ॥ भूप्रतिग्रहकथनम् तोयेन तन्नयेद् यत्नाद् भूभागं वा प्रतिग्रहम् । यथा नाक्रम्यते पादैर्जन्तुभिस्तन्महर्द्धिदम् ॥ २७८ ॥ अब भूपरिग्रह कहते हैं—बिम्ब के लिये ग्रहण किये जाने वाले भू-भाग का जल से प्रतिग्रह लेवे । जहाँ जन्तु अपने पद से भूमि पर आक्रमण न करे । ऐसी भूमि महान् सिद्धि देने वाली होती है ॥ २७८ ॥ अतः प्रणालं विहितं निषिद्धमत एव हि । तत्संस्थापनकाले तु देवानां दिग्विधे हितम् ॥ २७९ ॥ प्राक्प्रत्यगाननानां च तदुदग्दिग्गतं शुभम् । उदग्दक्षिणवक्त्राणां प्राग्भागे विहितं सदा ॥ २८० ॥ तत्पुनर्भद्रपीठीयदेवाद् वामेऽर्थसिद्धिदृत् । सदैवाराधकानां तु विलोमाद् विपरीतदम् ॥ २८१ ॥ इसी कारण प्रणाल विहित है और निषिद्ध भी है । पीठ पर देवताओं के स्थापन काल में हितकारी दिशायें इस प्रकार हैं—पूर्व एवं पश्चिम दिशा में मुख वाले देवताओं के स्थापन में साधक को उत्तर दिशा हितकारी कही गई है (साधक उत्तराभिमुख हो स्थापन करे) । उत्तर और दक्षिण में मुख वाले देवताओं के स्थापन में सदैव साधक को पूर्व दिशा हितकारी कही गई है (साधक पूर्व दिशा में मुख कर स्थापन करे) । भद्र पीठ पर स्थापन किये जाने वाले देवता के बायें
५८४ सात्वतसंहिता होकर स्थापित करने से अर्थ सिद्धि होती है । इससे विलोम दिशा में होकर स्थापन करने से आराधक को विपरीत फल होता है ॥ २७९-२८१ ॥ प्रासादनिर्माणविधानम् पीठवच्च परिज्ञेयं प्रासादस्य च उच्यते । शुभे दिनेऽनुकूले तु नक्षत्रे पूजिते ग्रहे ॥ २८२ ॥ लग्ने स्थिरे स्थिरांशे च दृक्शुद्धे चोत्तरायणे । दिव्याद्युत्पातसंशुद्धे सितपक्षेऽमलेऽम्बरे ॥ २८३ ॥ आ जलान्तं कृते खाते पूर्ववत् सम्प्रपूरिते । विमुक्तदोषे भूभागे सर्वलक्षणलक्षिते ॥ २८४ ॥ पूरणादंशशेषे तु सूपलिप्ते धरातले । चतुष्षष्टिपदीभूते प्राग्वत् सूत्रेण सर्वदिक् ॥ २८५ ॥ स्नातः शुक्लाम्बरः स्रग्वी कृतन्यासः सुशान्तधीः । सर्वसाधनसंयुक्तश्चार्घ्यपात्रसमन्वितः ॥ २८६ ॥ मङ्गल्यकुम्भमादाय ध्यायमानोऽच्युतं हृदि । सह चैकायनैर्विप्रैः सदागमपरायणैः ॥ २८७ ॥ तथा ऋङ्मयपूर्वस्तु आ मूलाद् भगवन्मयैः । विशेत् प्रासादभूभागं मध्ये कुम्भं निधाय तम् ॥ २८८ ॥ कुर्यान्निरीक्षणं भूमेस्ताडनं प्रोक्षणं ततः । सेचनं पञ्चगव्येन सह चास्त्रोदकेन तु ॥ २८९ ॥ अथ प्रासादनिर्माणविधिं दर्शयन् तत्र वास्तुपुरुषार्चनपूर्वकं तन्मध्ये महाकुम्भ- स्थापनविधिमाह—पीठवच्च परिज्ञेयमित्यारभ्य वर्णाध्वा च तदूर्ध्वत इत्यन्तम् । 'आ जलान्तं कृते खाते पूर्ववत्सम्प्रपूरित' इत्यत्र पूर्ववदित्यनेनाष्टादशपरिच्छेदोक्तः क्ष्मा- परिग्रहो गृह्यते । एवं क्ष्मापरिग्रहादिकं पौष्करे विस्तरेणोक्तमत्रापेक्षितम् । अत एवेश्वरतन्त्रे तत्संगृहीतं द्रष्टव्यम् । एवं क्ष्मापरिग्रहप्रयोगः कुम्भस्थापनादिप्रयोगश्च श्रीसात्वतामृते सुस्पष्टं प्रति- पादितः । एवं प्रासादभूमध्ये स्थापितकुम्भाधिदेवता बिम्बप्रतिष्ठान्तं प्रत्यहं पूजनीयाः । तदनन्तरमपि प्रतिदिनं विमानार्चनप्रकरणे तदर्चनविधानमीश्वरपारमेश्वरयोरेव सुस्पष्टं प्रतिपादितम् । किन्तु पारमेश्वरे विमानार्चनप्रकरणे पौष्करोक्तरीत्या "तेषां विदिक्- स्थितानां च" (१०।२३) इत्यादिभिर्विदिकूस्थितकुम्भचतुष्के स्वमन्त्रेण लक्ष्मीम्, पूर्वादिदिक्स्थितकुम्भचतुष्के स्वमन्त्रेण कौस्तुभम्, मध्यकुम्भे षडक्षरेण निष्कलं शब्दविग्रहं शक्त्यात्मानं भगवन्तं न्यसेदित्युक्तम् । "तत्र मध्यमकुम्भस्य" (१०।२६) इत्यादिभिर्मध्यमकुम्भपिधाने पराशक्तिः प्रभाशक्तिश्च, दिक्षु स्थितकुम्भपिधानचतुष्के ज्ञानशक्तिः, विदिकूकुम्भपिधानचतुष्टये क्रियाशक्तिर्न्यस्तव्येति चोक्तम् । पुनः
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५८५ सात्वतोक्तरीत्या "पिधाननवके" (१०।२८) इत्यादिभिर्नवशक्तित्न्यासपक्षोऽप्युक्तः । पारमेश्वरव्याख्यातृभिस्तु "मध्यकुम्भस्य पिधाने मध्यतो निष्कलः शब्दविग्रहः षडक्षरः" इत्युक्तम् । तदज्ञानमूलकम्, "षडक्षरेण मन्त्रेण निष्कलं शब्दविग्रहम्" (१०।२५) इति वाक्यस्य पूर्ववाक्य एव योजनीयत्वात्, एवमुत्तरत्र योजिते विरोध- बाहुल्याच्च । पारमेश्वरमूलभूतपौष्करसंहितायां द्विचत्वारिंशेऽध्याये "षडक्षरेण" (४२।१६६) इति वाक्यान्तरं सार्धश्लोकषट्कमतिलङ्घ्यैव "शक्तिर्वा या परा देवी" (४२।१७३) इत्यादिकमुक्तम्, तदबुद्ध्वा पारमेश्वरसंहितादर्शनमात्रेणैव सर्व- ज्ञम्मन्यमानैर्व्याख्यातृभिरेवमुक्तम् । किञ्च, "मध्यकुम्भपिधानस्य चतुर्दिक्षु विश्वसन्धा- रणक्षमा ज्ञानशक्तिः, तद्विद्दिक्ष्वानन्दलक्षणा क्रियाशक्तिः" इत्युक्तम् । अत्र पराशक्तिः प्रभाशक्तिश्च ज्ञानक्रियाशक्त्योरिवात्मनोऽपि यथोक्तस्थानव्यत्ययः संभवेदिति भिया व्याख्यातृदृष्टिगोचरतामेव न प्राप्तुः । अत्र चतुःशक्त्यर्चनं पौष्करे कण्ठरवेणोक्तम्— पिधाननवकं दद्यात् ताम्रं वा शैलजं समम् । सुवृत्तं चतुरश्रं वा सुघनं द्वादशाङ्गुलम् ॥ चतुःशक्तिनिरुद्धं च (४२।१७२-१७३) इति । शक्तिचतुष्टयमपि तत्रैव विवृतम् "शक्तिर्वा या परा देवी" (४२।१७३) इत्यादिभिः । प्रागादिचतुष्टये ज्ञानशक्तिः, आग्नेयादिपिधानचतुष्टये क्रियाशक्ति- रित्यर्थोऽपि पारमेश्वरे "विदिग्व्यक्तिसमूहे तु" (१०।२७) इत्यत्र व्यक्तिपदेनैव ज्ञायते । तदपि स्पष्टमुक्तं पौष्करे "विदिग्घटसमूहे तु" (४२।१७४) इत्यत्र । अत्र घटशब्दस्य तत्पिधाने लक्षणा । अपि च, "पिधाननवके त्वस्मिन्" (पा०सं० १०।२८) इत्याद्युक्तज्ञानभासा दिशक्तिन्यासस्य पक्षान्तरत्वमपि न ज्ञातम् । ननु तत्र यद्यऽथवेत्यादिपक्षान्तरत्वगमकशब्दो न दृश्यते, ज्ञानक्रियाशक्त्योः प्रागादिपिधानाष्टके न्यासाङ्गीकारे "पिधाने मध्यतो न्यसेत्" (पा०सं० १०।२६) इत्यत्र मध्यशब्दस्य वैय्यर्थ्यं च स्यादिति चेत्, ब्रूमः— पक्षान्तरत्वगमकशब्दाभावेऽ- प्यर्थपर्यालोचनया तस्य पक्षान्तरत्वं सिद्धमेव । मध्यशब्दप्रयोजनं तु "मन्त्रराट् कर्णिकामध्ये" (पा०सं ५।१३०) इत्यत्र यथाङ्गीक्रियते, तथैवात्रापीति बोद्धव्य- मायुष्मता । पारमेश्वरव्याख्यातृभिरत्र "नवकुम्भवत्त्वं वृत्तायतविमानभेदविषयम् । "यत्र प्रासादभेदेषु" (१०।६८) इति वक्ष्यमाणत्वात्" इत्युक्तम् । तदतीव मन्दम्, प्रासादनिर्माणार्थं खातदेशे नवकुम्भस्थापनं सर्वविमानसाधारणम्, "अनेकभेदभिन्नेषु प्रासादेषु महामते" (पा०सं० १०।३) इत्यारभ्य लोकव्याप्त्यादीनां सर्वसाधारण्ये- नोक्तत्वात्, अत्र पौष्करे चैवं नवकुम्भस्थापनस्य सर्वविमानसाधारणत्वेनोक्तत्वाच्च । पारमेश्वरव्याख्यातृभिरेतन्नवकुम्भेषु शिखाकुम्भत्वभ्रान्त्या व्याख्यानमेवं कृतमिति मन्यामहे । अलं प्रसक्तानुप्रसक्त्या । प्रकृतमनुसरामः ॥ २८२-३५९ ॥ ॥ इति श्रीमौज्यायनकुलतिलकस्य यदुगिरीश्वरचरणकमलार्चकस्य योगानन्दभट्टाचार्यस्य तनयेन अलशिङ्गभट्टेन विरचिते सात्वततन्त्रभाष्ये चतुर्विंशः परिच्छेदः ॥ २४ ॥ — ❦ ❧ — सा० सं० - 41
५८६ सात्वतसंहिता यहाँ तक पीठ का निर्माण कहा। अब प्रासाद निर्माण का विधान कहा जा रहा है। शुभ दिन में, अनुकूल नक्षत्र में, प्रशस्त ग्रह होने पर, स्थिर लग्न, स्थिर लग्न के स्थिरांश में, उत्तरायण में, दिव्यादि उत्पात से रहित काल में, शुक्ल पक्ष में, निर्मल आकाश होने पर पृथ्वी में किये गये खात को जल से पूर्ण कर लेने पर, शल्यादि अपनयन से, भू-पूजन से, भू-भाग के शुद्ध कर लेने पर उसको सर्वलक्षण लक्षित होने पर ऐसे सुन्दर उपलिप्त धरातल में सूत्र के द्वारा चारों दिशाओं में उसके ६४ बराबर-बराबर भाग कर लेने पर यजमान स्नान कर, शुक्ल वस्त्र धारण कर, माला पहन कर न्यास करे। बुद्धि स्थिर रखे, सर्व साधन से संयुक्त हो, अर्घ्य पात्र से समन्वित माङ्गलिक घड़ा लेकर हृदय में अच्युत का ध्यान करते हुए सदागम परायण, एकायन विप्रों के साथ तथा मूल से ही भगवद् भक्तिमय ऋग्वेदी ब्राह्मणों के साथ प्रासाद के भूभाग में प्रवेश करे। मध्य में कुम्भ स्थापित कर भूमि का निरीक्षण करे। भूमि का सन्ताडन करे, तदनन्तर प्रोक्षण करे। अस्त्रोदक के साथ पञ्चगव्य से सेचन करे ॥ २८२-२८९ ॥ ओंङ्गाराद्यं पवित्रान्तं मन्त्राणां प्राक् चतुष्टयम् । पाठयेच्च सपुण्याहं ब्राह्मणान् कृतमण्डनान् ॥ २९० ॥ बाह्वृचं शाकुनं सूक्तं ततो भद्रं यजुर्मयान् । इडा मायेति सामज्ञान् शान्ता द्यौरित्यथर्वणान् ॥ २९१ ॥ सर्वप्रथम ॐकारादि से लेकर पवित्रान्त चार मन्त्र का पाठ करावे। फिर भूषित ब्राह्मणों से पुण्याहवाचन करवाए। यजुर्वेदी ब्राह्मणों से बह्वृच शाकुन सूक्त, तदनन्तर 'भद्रं कर्णेभिः' इत्यादि मन्त्र का पाठ करावे। 'इडा माया' इस मन्त्र का सामवेदियों से तथा 'शान्ता द्यौः' इस मन्त्र का अथर्ववेदियों से पाठ करवाए ॥ २९०-२९१ ॥ ईशकोणात् समारभ्य प्रागादौ प्रतिपङ्क्तिषु । द्वादशाक्षरमन्त्रेण स्वनाम्ना तु पदे पदे ॥ २९२ ॥ नतिप्रणवगर्भेण दैवतं देहलक्षणम् । यष्टव्यो वास्तुपुरुषो दधिस्रक्चन्दनादिना ॥ २९३ ॥ पूर्व से प्रारम्भ कर ईशानकोण पर्यन्त प्रत्येक पङ्क्ति में द्वादशाक्षर मन्त्र से, जिसके प्रत्येक पद में अपने नाम के साथ नमस्कार युक्त प्रणव मध्य में हो, ऐसे मन्त्र से देहधारी देवता वास्तुपुरुष का दधि, माला तथा चन्दनादि द्वारा साधक को पूजन करना चाहिए ॥ २९२-२९३ ॥ सात्त्विकेनोपहारेण अग्नौ सन्तर्पयेत् ततः । कुर्यात् कुम्भप्रतिष्ठानं यथा तदवधारय ॥ २९४ ॥
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५८७ तदनन्तर सात्त्विक उपहार से अग्नि में उनका सन्तर्पण करे। अब जिस प्रकार वहाँ कुम्भ स्थापित करना चाहिये उस विधि को सुनिये ॥ २९४ ॥ पूर्ववत् तोरणाद्यैस्तु भूभागमुपशोभयेत् । कर्णिकालयवक्त्रस्य अग्रतस्तत्क्षितर्बहिः ॥ २९५ ॥ सर्वोपकरणोपेतं कुर्यान्मण्डपमुत्तमम् । कुण्डाष्टकान्तरस्थं च स्थलं तत्राष्टहस्तकम् ॥ २९६ ॥ सर्वप्रथम प्रासाद के भूमिभाग को तोरणादि द्वारा सजावे। इसके बाद कर्णिका वलय वक्त्र के आगे, उस पृथ्वी से बाहर सभी उपकरणों से युक्त मण्डप निर्माण करे। वहाँ आठ कुण्डों का निर्माण करे जिसके मध्य का अन्तर आठ हाथ का हो ॥ २९५-२९६ ॥ सपिण्डिका द्विहस्तास्तु कुण्डाः पूर्वोक्तलक्षणाः । त्रिहस्तापचिता वीथी स्यादेवं द्विनवः शमः ॥ २९७ ॥ वहाँ दो हाथ की पिण्डिका तथा पूर्वोक्त लक्षण युक्त कुण्ड का निर्माण करे। वीथी तीन हाथ की इस प्रकार अट्ठारह शम बनावे ॥ २९७ ॥ पूर्ववत् प्रतिकुण्डे तु विनिवेश्यं च साधनम् । आत्मनश्चोत्तरे कुर्यात् कुण्डं चाथ समस्थले ॥ २९८ ॥ प्रत्येक कुण्ड पर साधन सामग्री स्थापित करे। अपने उत्तर दिशा में समतल भूमि पर कुण्ड निर्माण करे ॥ २९८ ॥ दक्षिणे पूर्ववद् देवमवतार्य यजेत् क्रमात् । स्थलायां स्थण्डिलस्योर्ध्वे उन्नतायां च पूर्ववत् ॥ २९९ ॥ अपने से दक्षिण, पूर्व की भाँति स्थण्डिल के ऊपर उन्नत स्थल में देव को पीठ से उतार कर क्रमशः यजन करे ॥ २९९ ॥ तर्पयित्वा यथाकाममुद्धृत्याग्निगणं ततः । दिक्कुण्डेषु विनिक्षिप्य संस्कृतेषु च पूर्ववत् ॥ ३०० ॥ इस प्रकार यथेष्ट सन्तृप्त करने के अनन्तर स्थण्डिल स्थल में से अग्निगणों को उठाकर सुसंस्कृत दिक्कुण्डों में स्थापित करे ॥ ३०० ॥ तथैव च विदिकस्थेषु उद्धृत्याभ्यर्च्य वै क्रमात् । ततः प्रभवयोगेन चतुर्दिक्षु निवेशयेत् ॥ ३०१ ॥ चतुरो वासुदेवादीन् नाम्ना एकायनान् द्विजान् । स्वाभिः स्वाभिरसंख्यं तु तैः कार्यमभिधाय च ॥ ३०२ ॥
५८८ सात्वतसंहिता इसी प्रकार वहाँ से उठाकर सुसंस्कृत विदिक् कुण्डों में स्थापित कर उनका क्रम से अभ्यर्चन करे । इसके बाद सृष्टि-क्रम से चारों दिशाओं में वासुदेवादि चार नामों वाले एकायन द्विजों को सन्निविष्ट करे । उनको दिये गये अपनी-अपनी सामग्रियों से असंख्य कार्य निवेदन करे ॥ ३०१-३०२ ॥ कर्मावसानं हवनं साज्यैस्तु तिलतण्डुलैः । एवमप्यययोगेन वाव्वादीशानगोचरम् ॥ ३०३ ॥ ऋग्वेदाद्यांस्तु चतुरः संस्कृत्यादौ तथा न्यसेत् । तैरप्यच्युतलिङ्गैस्तु स्वशाखोक्तैश्च पावनैः ॥ ३०४ ॥ हवनं विधिवत् कार्यं भक्तियुक्तेन चेतसा । अथेशकोणमासाद्य ब्राह्मणैरपरैः सह ॥ ३०५ ॥ प्राङ्निर्दिष्टं न्यसेत् तत्र स्नानोपकरणं तु यत् । दशार्धगव्यपूर्वं तु कलशेषु पृथक् पृथक् ॥ ३०६ ॥ तानर्च्यार्ध्यादिना पश्चाद् द्विषट्केनाभिमन्त्र्य च । समानीय शिलोपेतान् कलशान् पूर्वसम्भृतान् ॥ ३०७ ॥ कर्मावसान में घृतसहित तिल-तण्डुलों से होम करावे । इसी प्रकार संहार क्रम से वाय्वादि कोण से ईशानकोण पर्यन्त संस्कार कर ऋग्वेद के चार ब्राह्मणों को स्थापित करे । वे भी अपने-अपने चिह्नों को धारण किये हुए, अपने पवित्र शाखाओं से भक्ति युक्त चित्त से विधिवत् हवन करें । इसके बाद ईशानकोण में जाकर अन्य ब्राह्मणों के साथ पूर्वनिर्दिष्ट समस्त स्नानोपकरण स्थापित करे । फिर कलशों में पृथक्-पृथक् पञ्चगव्य डाले । अर्घ्यादि से अर्चन करे, द्वादशाक्षर मन्त्र से उसे अभिमन्त्रित करे । पूर्व में स्थापित शिला सहित उन कलशों को ले आवे ॥ ३०३-३०७ ॥ कलशलक्षणकथनम् उत्कृष्टधातुसम्भूतान् नवशैलमयांस्तु वा । समान् सुपक्वान् सुघनान् मृण्मयांस्तदभावतः ॥ ३०८ ॥ अब कलशों का लक्षण कहते हैं—वे कलश उत्कृष्ट धातुओं के बने होने चाहिये अथवा नवीन शिलामय से बने होने चाहिये । उनके अभाव में सभी मिट्टी के कलश समान सुपरिपक्व एवं परिपुष्ट होने चाहिये ॥ ३०८ ॥ द्वादशाङ्गुलिविस्तीर्णांस्तन्मानेन तु चोन्नतान् । द्विगुणान् सति सामर्थ्ये नृपाणां हेमजान् हितान् ॥ ३०९ ॥ उनकी लम्बाई का मान द्वादश अङ्गुल तथा उतने ही मान में ऊँचाई होनी
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५८९ चाहिये । यदि राजा सामर्थ्यवान हो तब मिट्टी के कलश से दूने मान में सोना और चाँदी का कलश निर्माण करावे, जो उसके लिये हितकारी है ॥ ३०९ ॥ तत्संख्यं चतुरश्रं तु द्वादशाङ्गुलविस्तृतम् । तत्र्यंशतुल्यं बाहुल्यात् शिलावृन्दं समाहरेत् ॥ ३१० ॥ संस्थाप्य विधिवत् कुम्भान् पूर्वोक्तेन क्रमेण तु । कम्बुतुल्यमथैकं वा तत्कण्ठं त्र्यङ्गुलोन्नतं ॥ ३११ ॥ तद्गुणैरपि विस्तीर्णं तत्खातोऽष्टाङ्गुलः स्मृतः । परितः कर्णवर्जं तु शङ्खो वा सुसितो महान् ॥ ३१२ ॥ विहितो जननाथस्तु अन्तःशुद्धस्तु साक्षतः । एवं हि सान्तराद् बाह्यात् समालभ्याधिवास्य च ॥ ३१३ ॥ इन कलशों की संख्या भी उतनी ही होनी चाहिये और उनका विस्तार भी द्वादशाङ्गुल होना चाहिये । शिला भी द्वादश अङ्गुल विस्तार की चौड़ाई, तृतीय अंश की कलश की संख्या में निर्माण करावे । तदनन्तर उस शिला पर विधिवत् कुम्भों को स्थापित करे । उसमें एक कलश का कण्ठ शङ्ख के समान उसकी ऊँचाई तीन अङ्गुल, उसके गुण के अनुसार लम्बाई और उसके भीतरी भाग की गहराई आठ अङ्गुल बनावे । उसमें कान न बनावे और चारों ओर श्वेत शङ्ख स्थापित करे । इस प्रकार अन्तःशुद्ध कलश में अक्षत सहित भगवान् को स्थापित करे । इस प्रकार भीतर से एवं बाहर से स्पर्श कर अधिवासन करे ॥ ३१०-३१३ ॥ फलैर्हेमादिकै रत्नैः सर्वौषधिमयैस्ततः । गन्धैर्बीजैस्तथा धान्यैर्विद्रुमाद्यैस्तु मौक्तिकैः ॥ ३१४ ॥ नेत्रवस्त्रैरलङ्कारैर्भूषयेत् स्रग्वरैः शुभैः । द्वादशाक्षरमन्त्रेण एकैकस्य समाचरेत् ॥ ३१५ ॥ मूर्तिसंसिद्धये न्यासं प्रणवैस्तच्चिदात्मना । ततश्चार्घ्यादिकैर्भोगैर्बल्यन्तैर्विविधैर्यजेत् ॥ ३१६ ॥ फिर एक-एक के लिये फल, होम, रत्न, सर्वौषधि, गन्ध, बीज, धान्य, विद्रुम, मोती, वेत्र वस्त्र, उत्तमोत्तम माला तथा द्वादशाक्षर मन्त्रों से उनको शोभित करे । मूर्त्ति की संसिद्धि के लिये प्रणव द्वारा तथा चिदात्मना (चिच्छक्ति) द्वारा न्यास करे । फिर उनका अर्घ्यादिकों से एवं नाना प्रकार के भोगों से अन्त में बलिदान से इस प्रकार अनेक प्रकार से पूजन करे ॥ ३१४-३१६ ॥ शिलास्वेवं कृते पश्चाग्निनयेत् कुण्डसन्निधिम् । सशिलं कुम्भवृन्दं तु आधारेषु परिन्यसेत् ॥ ३१७ ॥