सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५७७ एषां चोड्डीयमानानां स्वायामा पक्षविस्तृतिः । पञ्चानां च परिज्ञेया स्थितानामर्धलक्षणा ॥ २३४ ॥ ये व्यूह जब उड़ने लगते हैं तब इनके आयाम के अनुसार इनके पक्ष भी बढ़ जाते हैं, इस प्रकार से स्थित पाँचों गरुड़ों की अर्धलक्षणा समझनी चाहिये ॥२३४॥ वामनलक्षणकथनम् एतदादाय मानं तु पुच्छभ्रूपक्षवर्जितम् । विद्धि वामनरूपस्य लक्षणं किन्तु लाङ्गलिन् ॥ २३५ ॥ ललाटनासावक्त्रेभ्यः समादायाङ्गुलत्रयम् । मस्तकस्योपरिष्टात् तु जटाबन्धं प्रकल्पयेत् ॥ २३६ ॥ वामनलक्षणमाह—एतदिति सार्धद्वाभ्याम् ॥ २३५-२३७ ॥ यही गरुड़ पञ्चव्यूहों का पुच्छ, भ्रू एवं पक्ष वर्जित मान वाला लक्षण वामन का भी समझना चाहिये । किन्तु हे सङ्कर्षण ! ललाट, नासिका और वक्त्र (मुख) से तीन अङ्गुल लेकर वामन के मस्तक के ऊपर जटाबन्ध का निर्माण करना चाहिए ॥ २३५-२३६ ॥ जटावसानमायामं यथा स्यात् पञ्चतालकम् । इत्युक्तं लेशतो बिम्बलक्ष्म पीठमथोच्यते ॥ २३७ ॥ वामन के जटा की लम्बाई पाँच ताल बनानी चाहिये । यहाँ तक लेश मात्र बिम्ब का लक्षण कहा गया, अब पीठ का लक्षण कहता हूँ ॥ २३७ ॥ पीठलक्षणकथनम् बिम्बानामुपविष्टानां चतुरश्रं तु तद् भवेत् । चतुरश्रायतं चैव प्रोत्थितानां सदैव हि ॥ २३८ ॥ वृत्तवृत्तायतत्वेन ह्यनयो रूपमन्यथा । याऽङ्गुलैः परमाणूत्थैराराधकमयैस्तु वा ॥ २३९ ॥ धत्तेऽर्चा तु सामायामं द्वाराद् वा मन्दिरोत्थितात् । तन्मानेन तु पीठस्य दैर्घ्यमर्धेन विस्तृतिः ॥ २४० ॥ द्वारोर्ध्वाच्च त्रिरन्तानि एकपूर्वाणि वै पुरा । उक्तनि(र्ग?ग)मनपूर्वकं पीठलक्षणमाह—इत्युक्तं लेशतो बिम्बमित्यारभ्य विलोमाद् विपरीतदम्'इत्यन्तम् ॥ २३७-२८१ ॥ बैठे हुए बिम्ब के लिये पीठ चौकोर बनानी चाहिये तथा खड़े रहने वाले बिम्ब के लिये चतुरस्र और आयत बनाना चाहिये । इन दोनों रूपों के अतिरिक्त
५७८ सात्वतसंहिता अन्य रूप वाले विम्ब के लिये वृत्त, अवृत्त अथवा आयत पीठ का निर्माण करे। जो अङ्गुलियों से परमाणुओं के सहारे अथवा आराधकमय होकर अर्चा ग्रहण करे, उसे मन्दिर के द्वार के समान आयाम में निर्माण कर उसके मान के अनुसार पीठ को दीर्घ बनावे। उसके आधे मान से उसका विस्तार बनावे ॥ २३८-२४१ ॥ सन्त्यज्य द्वादशांशाद् वै अधः पीठोन्नतिस्त्रिभिः ॥ २४१ ॥ शेषेणास्त्रांशसङ्घेन प्रतिमा चोत्थिता भवेत् । अथवा वाहनारूढा न्यूना वा मध्यमोत्तमा ॥ २४२ ॥ नीचे से द्वादशांश त्याग कर तीन अंशों से पीठ की ऊँचाई निर्मित करे। शेष अस्त्रांश समूह से प्रतिमा खड़ी बनानी चाहिये, अथवा यदि वाहनारूढ़ प्रतिमा बनावे तो उसे न्यून, मध्यम एवं उत्तम रूप में निर्माण करे ॥ २४२ ॥ चतुर्भिर्द्वादशांशैस्तदुपविष्टस्य चोन्नतिः । विहिता चास्य सर्वत्र प्रतिमाध्रेन विस्तृतिः ॥ २४३ ॥ चार द्वादशांश से उपविष्ट प्रतिमा की ऊँचाई निर्माण करे। इसका विस्तार प्रतिमा के आधे भाग में सर्वत्र निर्माण करे ॥ २४३ ॥ तत् त्र्यंशपरिलुप्ता च चतुर्थांशोज्झिताऽथवा । परिवारवशेनैव चातुरात्म्यस्य वै पुनः ॥ २४४ ॥ पुनः चातुरात्म्य के परिवार वश से वह प्रतिमा तीन अंशों से पूर्ण बनाई जाय अथवा चतुर्थांश छोड़कर बनाई जावे ॥ २४४ ॥ अलुप्तांशं च विहितं पीठायामं च सर्वदिक् । चतुर्दिग्दृग्गतस्यैवम् एकदिग्दृग्गतस्य च ॥ २४५ ॥ सभी दिशाओं में पीठ का आयाम अंश लोप के बिना निर्माण विहित है। चारों दिशाओं में दिखाई पड़ने वाले पीठ को अथवा एक दिशा में दिखाई पड़ने वाले पीठ के लिये यही नियम है ॥ २४५ ॥ तदेव दैर्घ्यद्विगुणं लाञ्छनैरावृतस्य च। सार्धं चानावृतस्यैव तद्बाहुल्यं पुरोदितम् ॥ २४६ ॥ यदि वह लाञ्छन से आवृत है, तो उसे दीर्घ का दुगना निर्माण करे, यदि वह लाञ्छन से अनावृत है तो अढ़ाई गुना कर निर्माण करे। इसका बाहुल्य पहले कह आये हैं ॥ २४६ ॥ (चतुष्कमेकपीठानां केवलं लक्ष्मवर्जितम् ।) एकैकं लक्ष्मभेदेन तत्संख्यं विद्धि वै पुनः ।
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५७९ पीठसंख्याकथनम् अनन्तासनमाद्यं च द्वितीयं पक्षमन्दिरम् ॥ २४७ ॥ कमलाङ्गं तृतीयं तु चतुर्थं चक्रभूषणम् । एवं हि सर्वसामान्यं पीठानां हि द्विरष्टकम् ॥ २४८ ॥ एक पीठ के ही चार भेद होते हैं जो केवल लक्ष्म (चिह्न) से वर्जित होते हैं। फिर लक्ष्म (= चिह्न) के भेद से एक-एक क्रम से वे भिन्न हो जाते हैं। हे सङ्कर्षण ! अब पुनः उनकी संख्या सुनिये। पहले आसन (पीठ) का नाम अनन्त है, द्वितीय पीठ का नाम 'पक्ष मन्दिर' है। तृतीय आसन (पीठ) का नाम कमलाङ्ग है। चतुर्थ का नाम चक्रभूषण है। इस प्रकार सर्व सामान्य पीठों की संख्या सोलह कही गई है ॥ २४७-२४८ ॥ भेदभिन्नं समासेन पुनरेव निबोध तु। दिक्षु लक्ष्माणि पीठानां विद्धि कण्ठगतानि च ॥ २४९ ॥ अब पुनः भेद से भिन्न होने के कारण उन पीठों के विषय में सुनिये। आठो दिशाओं में पीठों के लक्ष्म (चिह्न) कण्ठगत होते हैं ॥ २४९ ॥ अन्योन्यसन्निवेशाच्च तेषां बाह्यात्मना पुनः। चक्राम्बुजाभ्यां तत्स्थाभ्यां लुप्ताभ्यामपि तत्क्षितेः ॥ २५० ॥ ताभ्यामन्योन्ययोगाच्च दिक्ष्वनन्तखगाश्रयात् । द्विद्वयात्मना द्वयात्मना वा बहुत्वमवधारय ॥ २५१ ॥ पद्मेनोर्ध्वगतेनैव द्वयं चक्रेण तद्बहिः । एवं ह्याधोगतेनैव परिज्ञेयं द्वयं द्वयम् ॥ २५२ ॥ उपरिष्टात् तु पद्माभ्यामधश्चक्रं द्वयं द्वयम् । द्वितयव्यत्ययाच्चान्यत् परिज्ञेयं महामते ॥ २५३ ॥ पुनः अन्योन्य के सन्निवेश से वे पीठ अधिक संख्या में हो जाते हैं। पीठ में स्थित चक्र और कमल के भेद से, उन दोनों के स्थापित करने के भेद से, दोनों को एक में मिलाकर स्थापित करने के भेद से, दिशाओं में अनन्त और गरुड़ के स्थापन करने से, इस प्रकार दो-दो को अलग-अलग स्थापित करने से, अथवा दोनों को एकत्र स्थापित करने से वे पीठ अनेक हो जाते हैं। हे सङ्कर्षण ! इसे समझिए। इस प्रकार पीठ के ऊपर पद्म स्थापन से, उसके बाहर चक्र स्थापन से और इसी प्रकार के नीचे स्थापन करने से उसके दो भेद हो जाते हैं। ऊपर दो-दो पद्मों के स्थापन से, इसी प्रकार नीचे दो-दो चक्र के स्थापन से दो-दो भेद होते हैं और दोनों के व्यत्यय से भी दो-दो भेद हो जाते हैं। हे महामते ! इस प्रकार पीठ के अनेक भेद हो जाते हैं ॥ २५०-२५३ ॥
५८० सात्वतसंहिता अन्तर्बहिःस्थितिवशाच्चक्रपद्मद्वयस्य च। व्यत्ययादनयोर्विद्धि ऊर्ध्वभागाच्चतुष्टयम्॥ २५४ ॥ भीतर बाहर चक्र और पद्म के आठ ऊर्ध्व भाग के व्यत्यय होने से इनके चार भेद हो जाते हैं ॥ २५४ ॥ अधोभागादेवमेव चतुष्कमपरं तु वै। पीठानामष्टकमिदमधस्तादूर्ध्वतस्तु वा॥ २५५ ॥ युक्तमेकेन वै कुर्याच्चक्रेण कमलेन वा। चक्राकारास्तु विहिता ह्येकभ्रमसमाश्रिताः॥ २५६ ॥ इसी प्रकार अधोभाग में भी व्यत्यय होने से एक और चार भेद हो जाता है। ये पीठ के आठ भेद नीचे और ऊपर होने के कारण हो जाते हैं। इस पीठ का निर्माण केवल चक्र से अथवा केवल कमल से अर्थात् दो में से एक ही से करना चाहिये ॥ २५५-२५६ ॥ बहवो हि दलास्तद्वदीषद् वै कर्णिकान्विताः। इति लाञ्छनसञ्चारो बहुधा ते मयोदितः॥ २५७ ॥ यस्मिन् प्रकृतिभूते तु पीठे तदधुना शृणु। कृत्वा द्विर्दशधा पीठं पुरायामात् समैः पदैः॥ २५८ ॥ केवल एक गोले में ही चक्राकार पीठ निर्माण करना चाहिये । इसी प्रकार बहुत दलों से युक्त थोड़े कर्णिकाओं से कमल द्वारा पीठ निर्माण करे । इस प्रकार पीठ के अनेक लाञ्छन युक्त सञ्चार का वर्णन मैने किया । अब जिस प्रकृतिभूत पीठ में (जो करना है) उसे सुनिये । पीठ का आयाम (लम्बाई) के अनुसार बराबर-बराबर भागों में बारह भाग करे ॥ २५७-२५८ ॥ एकेन चरणं जङ्घा-कलशौ च त्रिभिस्त्रिभिः । कण्ठवीथिमथैकेन षड्भिः कण्ठं तदूर्ध्वतः ॥ २५९ ॥ एक भाग में चरण, तदनन्तर जङ्घा और कलश तीन-तीन भागों में निर्माण करे । एक भाग से कण्ठ एवं वीथी बनावे और उसके ऊपर छः भागों में कण्ठ निर्माण करे ॥ २५९ ॥ भागेन कण्ठसूत्रं तु शक्तिकांशत्रयेण तु। उष्णीषं च तदूर्ध्वे तु कुर्यादंशद्वयेन वै॥ २६० ॥ शुक्ति के अंशत्रय भाग से कण्ठ सूत्र निर्माण करे और उसके ऊपर दो अंश से उष्णीश निर्माण करे ॥ २६० ॥
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५८१ निर्गमः स्वदलेनैव विहितश्चरणस्य तु। चतुर्दिक्षु महाबुद्धे क्षेत्रतोऽभ्यधिकः स्मृतः॥ २६१ ॥ विहित चरण का निर्गम उसके भाग से ही करे। हे महाबुद्धे! इस प्रकार चारों दिशाओं में निर्गम क्षेत्र से अधिक बनावे ॥ २६१ ॥ सर्ववृत्तं घटं कुर्यात् पल्लवैर्वारिकैर्युतम्। परितोऽशद्वयेनैव कण्ठपीठं प्रवेशयेत् ॥ २६२ ॥ पत्तों तथा अस्त्रों से युक्त चारों ओर से गोला घट का निर्माण करे। दो अंश से कण्ठ पीठ बनाकर उस घट में प्रवेश करावे ॥ २६२ ॥ अन्तःप्रवेशमेकेन विध्यंशेन गलस्य च। कुर्याद् गलप्रवेशस्य समां सूत्रस्य निःसृतिम्॥ २६३ ॥ एक अंश से निर्मित गला का अन्तःप्रवेश करावे। गल-प्रवेश के समान सूत्र को उसमें से निकाल लेवे ॥ २६३ ॥ शुक्तेरधः कण्ठसूत्रभागात् पादेन निर्गतम्। वदनान्तं समासेन शुक्तेः संकोचमाचरेत्॥ २६४ ॥ शुक्ति के नीचे कण्ठसूत्र के भाग से एक पाद निकला हुआ मुख का भाग संक्षेप में शुक्ति से संकुचित करे ॥ २६४ ॥ उष्णीषघटजङ्घानामश्रिसाम्यं यथा स्थितम्। घटवद् भूषयेच्छुक्तिमरकैर्वाब्जपल्लवैः॥ २६५ ॥ तत्रोपरिष्टात् परिधिं चतुरंशकसम्मितम्। सन्त्यज्य निखनेद् द्रोणीमंशनिम्नां समन्ततः ॥ २६६ ॥ ऐसा करने से उष्णीष, घट और जङ्घा के कोण एक साम्य में स्थित हो जाएँगे। तदनन्तर शुक्ति को अरक तथा कमल पत्र से घट के समान भूषित करे। उसके ऊपर चार अंश की परिधि का भाग छोड़कर एक अंश गहरी द्रोणी चारों ओर (गड्ढा) खननी चाहिए ॥ २६५-२६६ ॥ विस्तृतैर्मध्यभागेऽथ स्वत्र्यंशेन च निर्गमम्। तन्मानं चतुरश्रं तु पीठक्षेत्राद् विनिर्गतम् ॥ २६७ ॥ मध्य भाग को विस्तृत कर उसके तीन अंश से निर्गम का पानी निकलने का स्थान खने। पीठ क्षेत्र से निकले हुए उस निर्गम (जल निकासी) का मान चतुरस्र (चौकोर) बनावे ॥ २६७ ॥ तच्चाग्रतस्त्रिधा कृत्वा पक्षभागौ क्षयं नयेत्।
४. चतुर्थ भाग (परिच्छेद २०-२५): योग-साधना, मोक्ष-धर्म एवं सात्वत उपसंहार
५८२ सात्वतसंहिता अनुपादेन चामूलात् सम्यग् लाङ्गलवक्त्रवत्॥ २६८ ॥ फिर उसे आगे के भाग से तीन भागों में बाँट कर उसका किनारा नष्ट कर देवे । इस प्रकार मूल से लेकर पाद के अनुसार उसे हल के मुख के समान निर्माण करना चाहिए ॥ २६८ ॥ अग्रतो मूलदेशाच्च कृत्वादौ वै त्रिधा त्रिधा । भूयस्तन्त्रिखनेन्मध्याज्जलं याति यथा द्रुतम्॥ २६९ ॥ मूल देश से आगे, उसे तीन-तीन भागों में विभक्त कर, फिर मध्य में उसे इस प्रकार खने जिससे पीठ का जल उसमें से शीघ्रता से बह जावे ॥ २६९ ॥ सूकराननतुल्यं तु भवत्येवं महामते । कुर्याद् वै शङ्खसदृशं मकरास्योपमं तु वा॥ २७० ॥ हे महामते ! उस नाली को इस प्रकार खने जिससे वह सूकर के मुख के समान हो जावे । अथवा शङ्ख के सदृश या मकर के समान हो जावे ॥ २७० ॥ जलनिर्गममेतद् वै पीठेषूदितलक्षणम् । न कुर्यात् कर्मबिम्बानामाश्मादिमितात्मनाम् ॥ २७१ ॥ चित्रमृत्काष्ठजानां तु चलानां तु विशेषतः । तथैव चतुरश्रस्य चतुर्मूर्तिगतस्य च॥ २७२ ॥ इस प्रकार पीठों पर से निकलने वाले जल के निकास का रास्ता कहा गया है । जहाँ शम (दो अङ्गुल) प्रमाण से छोटा कर्म बिम्ब हो, वहाँ प्रणाली का निर्माण न करे । विशेष कर जहाँ चित्र, मिट्टी और काष्ठ निर्मित बिम्ब हो, अथवा चल बिम्ब हों और जहाँ चौकोर चतुर्मूत्ति हो, वहाँ प्रणाली का निर्माण न करे ॥ २७१-२७२ ॥ प्रणालमग्रगं मूर्तेर्यतः संसिद्धिहानिकृत् । प्रयोजनं विना काचिन्न क्षतिस्तस्य तद्विना ॥ २७३ ॥ यतः मूर्ति के आगे निकाले जाने वाला प्रणाल साधक की सिद्धि की हानि करता है । अतः उसका निर्माण नहीं करना चाहिये । प्रयोजन के बिना यदि प्रणाल का निर्माण न किया जाय तो उसके बिना कोई क्षति नहीं होती ॥ २७३ ॥ सामान्यस्य तु वै यस्मादाधारस्य विशेषतः । सप्रणालं भवेत् पीठमासनं च प्रणालकम् ॥ २७४ ॥ जहाँ सामान्य आधार हो वहाँ विशेष रूप से प्रणाल युक्त पीठ का निर्माण करे और आसन भी प्रणाल युक्त बनावे ॥ २७४ ॥
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५८३ भूरिनीरादिना स्नानं यत्र यच्छति साधकः । प्रत्यहं तद्विना तत्र प्रत्यवायो भवेत् स्फुटम् ॥ २७५ ॥ साधक जहाँ भगवान् को पर्याप्त जल से प्रतिदिन स्नान कराता है । वहाँ यदि स्नान न करावे तो उसे प्रत्यवाय लगता है ॥ २७५ ॥ एवमेव बृहद्विम्बभूषितानां विधीयते । धातुशैलोत्थितानां च निमित्तस्नपनार्थतः ॥ २७६ ॥ यह विधान बृहद् बिम्ब से भूषित मूर्तियों के लिये विहित हैं । धातु शैल से निर्मित बिम्ब का स्नपन ही निमित्त है ॥ २७६ ॥ भद्रासनगते कर्मबिम्बे तस्य समाचरेत् । सततं च यथालाभं दधिक्षीरघृतादिना ॥ २७७ ॥ कर्म-बिम्ब के भद्रासन पर अधिष्ठित होने पर जिस प्रकार दधि, क्षीर, घृत प्राप्त हो उससे सतत स्नान करावे ॥ २७७ ॥ भूप्रतिग्रहकथनम् तोयेन तन्नयेद् यत्नाद् भूभागं वा प्रतिग्रहम् । यथा नाक्रम्यते पादैर्जन्तुभिस्तन्महर्द्धिदम् ॥ २७८ ॥ अब भूपरिग्रह कहते हैं—बिम्ब के लिये ग्रहण किये जाने वाले भू-भाग का जल से प्रतिग्रह लेवे । जहाँ जन्तु अपने पद से भूमि पर आक्रमण न करे । ऐसी भूमि महान् सिद्धि देने वाली होती है ॥ २७८ ॥ अतः प्रणालं विहितं निषिद्धमत एव हि । तत्संस्थापनकाले तु देवानां दिग्विधे हितम् ॥ २७९ ॥ प्राक्प्रत्यगाननानां च तदुदग्दिग्गतं शुभम् । उदग्दक्षिणवक्त्राणां प्राग्भागे विहितं सदा ॥ २८० ॥ तत्पुनर्भद्रपीठीयदेवाद् वामेऽर्थसिद्धिदृत् । सदैवाराधकानां तु विलोमाद् विपरीतदम् ॥ २८१ ॥ इसी कारण प्रणाल विहित है और निषिद्ध भी है । पीठ पर देवताओं के स्थापन काल में हितकारी दिशायें इस प्रकार हैं—पूर्व एवं पश्चिम दिशा में मुख वाले देवताओं के स्थापन में साधक को उत्तर दिशा हितकारी कही गई है (साधक उत्तराभिमुख हो स्थापन करे) । उत्तर और दक्षिण में मुख वाले देवताओं के स्थापन में सदैव साधक को पूर्व दिशा हितकारी कही गई है (साधक पूर्व दिशा में मुख कर स्थापन करे) । भद्र पीठ पर स्थापन किये जाने वाले देवता के बायें
५८४ सात्वतसंहिता होकर स्थापित करने से अर्थ सिद्धि होती है । इससे विलोम दिशा में होकर स्थापन करने से आराधक को विपरीत फल होता है ॥ २७९-२८१ ॥ प्रासादनिर्माणविधानम् पीठवच्च परिज्ञेयं प्रासादस्य च उच्यते । शुभे दिनेऽनुकूले तु नक्षत्रे पूजिते ग्रहे ॥ २८२ ॥ लग्ने स्थिरे स्थिरांशे च दृक्शुद्धे चोत्तरायणे । दिव्याद्युत्पातसंशुद्धे सितपक्षेऽमलेऽम्बरे ॥ २८३ ॥ आ जलान्तं कृते खाते पूर्ववत् सम्प्रपूरिते । विमुक्तदोषे भूभागे सर्वलक्षणलक्षिते ॥ २८४ ॥ पूरणादंशशेषे तु सूपलिप्ते धरातले । चतुष्षष्टिपदीभूते प्राग्वत् सूत्रेण सर्वदिक् ॥ २८५ ॥ स्नातः शुक्लाम्बरः स्रग्वी कृतन्यासः सुशान्तधीः । सर्वसाधनसंयुक्तश्चार्घ्यपात्रसमन्वितः ॥ २८६ ॥ मङ्गल्यकुम्भमादाय ध्यायमानोऽच्युतं हृदि । सह चैकायनैर्विप्रैः सदागमपरायणैः ॥ २८७ ॥ तथा ऋङ्मयपूर्वस्तु आ मूलाद् भगवन्मयैः । विशेत् प्रासादभूभागं मध्ये कुम्भं निधाय तम् ॥ २८८ ॥ कुर्यान्निरीक्षणं भूमेस्ताडनं प्रोक्षणं ततः । सेचनं पञ्चगव्येन सह चास्त्रोदकेन तु ॥ २८९ ॥ अथ प्रासादनिर्माणविधिं दर्शयन् तत्र वास्तुपुरुषार्चनपूर्वकं तन्मध्ये महाकुम्भ- स्थापनविधिमाह—पीठवच्च परिज्ञेयमित्यारभ्य वर्णाध्वा च तदूर्ध्वत इत्यन्तम् । 'आ जलान्तं कृते खाते पूर्ववत्सम्प्रपूरित' इत्यत्र पूर्ववदित्यनेनाष्टादशपरिच्छेदोक्तः क्ष्मा- परिग्रहो गृह्यते । एवं क्ष्मापरिग्रहादिकं पौष्करे विस्तरेणोक्तमत्रापेक्षितम् । अत एवेश्वरतन्त्रे तत्संगृहीतं द्रष्टव्यम् । एवं क्ष्मापरिग्रहप्रयोगः कुम्भस्थापनादिप्रयोगश्च श्रीसात्वतामृते सुस्पष्टं प्रति- पादितः । एवं प्रासादभूमध्ये स्थापितकुम्भाधिदेवता बिम्बप्रतिष्ठान्तं प्रत्यहं पूजनीयाः । तदनन्तरमपि प्रतिदिनं विमानार्चनप्रकरणे तदर्चनविधानमीश्वरपारमेश्वरयोरेव सुस्पष्टं प्रतिपादितम् । किन्तु पारमेश्वरे विमानार्चनप्रकरणे पौष्करोक्तरीत्या "तेषां विदिक्- स्थितानां च" (१०।२३) इत्यादिभिर्विदिकूस्थितकुम्भचतुष्के स्वमन्त्रेण लक्ष्मीम्, पूर्वादिदिक्स्थितकुम्भचतुष्के स्वमन्त्रेण कौस्तुभम्, मध्यकुम्भे षडक्षरेण निष्कलं शब्दविग्रहं शक्त्यात्मानं भगवन्तं न्यसेदित्युक्तम् । "तत्र मध्यमकुम्भस्य" (१०।२६) इत्यादिभिर्मध्यमकुम्भपिधाने पराशक्तिः प्रभाशक्तिश्च, दिक्षु स्थितकुम्भपिधानचतुष्के ज्ञानशक्तिः, विदिकूकुम्भपिधानचतुष्टये क्रियाशक्तिर्न्यस्तव्येति चोक्तम् । पुनः
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५८५ सात्वतोक्तरीत्या "पिधाननवके" (१०।२८) इत्यादिभिर्नवशक्तित्न्यासपक्षोऽप्युक्तः । पारमेश्वरव्याख्यातृभिस्तु "मध्यकुम्भस्य पिधाने मध्यतो निष्कलः शब्दविग्रहः षडक्षरः" इत्युक्तम् । तदज्ञानमूलकम्, "षडक्षरेण मन्त्रेण निष्कलं शब्दविग्रहम्" (१०।२५) इति वाक्यस्य पूर्ववाक्य एव योजनीयत्वात्, एवमुत्तरत्र योजिते विरोध- बाहुल्याच्च । पारमेश्वरमूलभूतपौष्करसंहितायां द्विचत्वारिंशेऽध्याये "षडक्षरेण" (४२।१६६) इति वाक्यान्तरं सार्धश्लोकषट्कमतिलङ्घ्यैव "शक्तिर्वा या परा देवी" (४२।१७३) इत्यादिकमुक्तम्, तदबुद्ध्वा पारमेश्वरसंहितादर्शनमात्रेणैव सर्व- ज्ञम्मन्यमानैर्व्याख्यातृभिरेवमुक्तम् । किञ्च, "मध्यकुम्भपिधानस्य चतुर्दिक्षु विश्वसन्धा- रणक्षमा ज्ञानशक्तिः, तद्विद्दिक्ष्वानन्दलक्षणा क्रियाशक्तिः" इत्युक्तम् । अत्र पराशक्तिः प्रभाशक्तिश्च ज्ञानक्रियाशक्त्योरिवात्मनोऽपि यथोक्तस्थानव्यत्ययः संभवेदिति भिया व्याख्यातृदृष्टिगोचरतामेव न प्राप्तुः । अत्र चतुःशक्त्यर्चनं पौष्करे कण्ठरवेणोक्तम्— पिधाननवकं दद्यात् ताम्रं वा शैलजं समम् । सुवृत्तं चतुरश्रं वा सुघनं द्वादशाङ्गुलम् ॥ चतुःशक्तिनिरुद्धं च (४२।१७२-१७३) इति । शक्तिचतुष्टयमपि तत्रैव विवृतम् "शक्तिर्वा या परा देवी" (४२।१७३) इत्यादिभिः । प्रागादिचतुष्टये ज्ञानशक्तिः, आग्नेयादिपिधानचतुष्टये क्रियाशक्ति- रित्यर्थोऽपि पारमेश्वरे "विदिग्व्यक्तिसमूहे तु" (१०।२७) इत्यत्र व्यक्तिपदेनैव ज्ञायते । तदपि स्पष्टमुक्तं पौष्करे "विदिग्घटसमूहे तु" (४२।१७४) इत्यत्र । अत्र घटशब्दस्य तत्पिधाने लक्षणा । अपि च, "पिधाननवके त्वस्मिन्" (पा०सं० १०।२८) इत्याद्युक्तज्ञानभासा दिशक्तिन्यासस्य पक्षान्तरत्वमपि न ज्ञातम् । ननु तत्र यद्यऽथवेत्यादिपक्षान्तरत्वगमकशब्दो न दृश्यते, ज्ञानक्रियाशक्त्योः प्रागादिपिधानाष्टके न्यासाङ्गीकारे "पिधाने मध्यतो न्यसेत्" (पा०सं० १०।२६) इत्यत्र मध्यशब्दस्य वैय्यर्थ्यं च स्यादिति चेत्, ब्रूमः— पक्षान्तरत्वगमकशब्दाभावेऽ- प्यर्थपर्यालोचनया तस्य पक्षान्तरत्वं सिद्धमेव । मध्यशब्दप्रयोजनं तु "मन्त्रराट् कर्णिकामध्ये" (पा०सं ५।१३०) इत्यत्र यथाङ्गीक्रियते, तथैवात्रापीति बोद्धव्य- मायुष्मता । पारमेश्वरव्याख्यातृभिरत्र "नवकुम्भवत्त्वं वृत्तायतविमानभेदविषयम् । "यत्र प्रासादभेदेषु" (१०।६८) इति वक्ष्यमाणत्वात्" इत्युक्तम् । तदतीव मन्दम्, प्रासादनिर्माणार्थं खातदेशे नवकुम्भस्थापनं सर्वविमानसाधारणम्, "अनेकभेदभिन्नेषु प्रासादेषु महामते" (पा०सं० १०।३) इत्यारभ्य लोकव्याप्त्यादीनां सर्वसाधारण्ये- नोक्तत्वात्, अत्र पौष्करे चैवं नवकुम्भस्थापनस्य सर्वविमानसाधारणत्वेनोक्तत्वाच्च । पारमेश्वरव्याख्यातृभिरेतन्नवकुम्भेषु शिखाकुम्भत्वभ्रान्त्या व्याख्यानमेवं कृतमिति मन्यामहे । अलं प्रसक्तानुप्रसक्त्या । प्रकृतमनुसरामः ॥ २८२-३५९ ॥ ॥ इति श्रीमौज्यायनकुलतिलकस्य यदुगिरीश्वरचरणकमलार्चकस्य योगानन्दभट्टाचार्यस्य तनयेन अलशिङ्गभट्टेन विरचिते सात्वततन्त्रभाष्ये चतुर्विंशः परिच्छेदः ॥ २४ ॥ — ❦ ❧ — सा० सं० - 41
५८६ सात्वतसंहिता यहाँ तक पीठ का निर्माण कहा। अब प्रासाद निर्माण का विधान कहा जा रहा है। शुभ दिन में, अनुकूल नक्षत्र में, प्रशस्त ग्रह होने पर, स्थिर लग्न, स्थिर लग्न के स्थिरांश में, उत्तरायण में, दिव्यादि उत्पात से रहित काल में, शुक्ल पक्ष में, निर्मल आकाश होने पर पृथ्वी में किये गये खात को जल से पूर्ण कर लेने पर, शल्यादि अपनयन से, भू-पूजन से, भू-भाग के शुद्ध कर लेने पर उसको सर्वलक्षण लक्षित होने पर ऐसे सुन्दर उपलिप्त धरातल में सूत्र के द्वारा चारों दिशाओं में उसके ६४ बराबर-बराबर भाग कर लेने पर यजमान स्नान कर, शुक्ल वस्त्र धारण कर, माला पहन कर न्यास करे। बुद्धि स्थिर रखे, सर्व साधन से संयुक्त हो, अर्घ्य पात्र से समन्वित माङ्गलिक घड़ा लेकर हृदय में अच्युत का ध्यान करते हुए सदागम परायण, एकायन विप्रों के साथ तथा मूल से ही भगवद् भक्तिमय ऋग्वेदी ब्राह्मणों के साथ प्रासाद के भूभाग में प्रवेश करे। मध्य में कुम्भ स्थापित कर भूमि का निरीक्षण करे। भूमि का सन्ताडन करे, तदनन्तर प्रोक्षण करे। अस्त्रोदक के साथ पञ्चगव्य से सेचन करे ॥ २८२-२८९ ॥ ओंङ्गाराद्यं पवित्रान्तं मन्त्राणां प्राक् चतुष्टयम् । पाठयेच्च सपुण्याहं ब्राह्मणान् कृतमण्डनान् ॥ २९० ॥ बाह्वृचं शाकुनं सूक्तं ततो भद्रं यजुर्मयान् । इडा मायेति सामज्ञान् शान्ता द्यौरित्यथर्वणान् ॥ २९१ ॥ सर्वप्रथम ॐकारादि से लेकर पवित्रान्त चार मन्त्र का पाठ करावे। फिर भूषित ब्राह्मणों से पुण्याहवाचन करवाए। यजुर्वेदी ब्राह्मणों से बह्वृच शाकुन सूक्त, तदनन्तर 'भद्रं कर्णेभिः' इत्यादि मन्त्र का पाठ करावे। 'इडा माया' इस मन्त्र का सामवेदियों से तथा 'शान्ता द्यौः' इस मन्त्र का अथर्ववेदियों से पाठ करवाए ॥ २९०-२९१ ॥ ईशकोणात् समारभ्य प्रागादौ प्रतिपङ्क्तिषु । द्वादशाक्षरमन्त्रेण स्वनाम्ना तु पदे पदे ॥ २९२ ॥ नतिप्रणवगर्भेण दैवतं देहलक्षणम् । यष्टव्यो वास्तुपुरुषो दधिस्रक्चन्दनादिना ॥ २९३ ॥ पूर्व से प्रारम्भ कर ईशानकोण पर्यन्त प्रत्येक पङ्क्ति में द्वादशाक्षर मन्त्र से, जिसके प्रत्येक पद में अपने नाम के साथ नमस्कार युक्त प्रणव मध्य में हो, ऐसे मन्त्र से देहधारी देवता वास्तुपुरुष का दधि, माला तथा चन्दनादि द्वारा साधक को पूजन करना चाहिए ॥ २९२-२९३ ॥ सात्त्विकेनोपहारेण अग्नौ सन्तर्पयेत् ततः । कुर्यात् कुम्भप्रतिष्ठानं यथा तदवधारय ॥ २९४ ॥
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५८७ तदनन्तर सात्त्विक उपहार से अग्नि में उनका सन्तर्पण करे। अब जिस प्रकार वहाँ कुम्भ स्थापित करना चाहिये उस विधि को सुनिये ॥ २९४ ॥ पूर्ववत् तोरणाद्यैस्तु भूभागमुपशोभयेत् । कर्णिकालयवक्त्रस्य अग्रतस्तत्क्षितर्बहिः ॥ २९५ ॥ सर्वोपकरणोपेतं कुर्यान्मण्डपमुत्तमम् । कुण्डाष्टकान्तरस्थं च स्थलं तत्राष्टहस्तकम् ॥ २९६ ॥ सर्वप्रथम प्रासाद के भूमिभाग को तोरणादि द्वारा सजावे। इसके बाद कर्णिका वलय वक्त्र के आगे, उस पृथ्वी से बाहर सभी उपकरणों से युक्त मण्डप निर्माण करे। वहाँ आठ कुण्डों का निर्माण करे जिसके मध्य का अन्तर आठ हाथ का हो ॥ २९५-२९६ ॥ सपिण्डिका द्विहस्तास्तु कुण्डाः पूर्वोक्तलक्षणाः । त्रिहस्तापचिता वीथी स्यादेवं द्विनवः शमः ॥ २९७ ॥ वहाँ दो हाथ की पिण्डिका तथा पूर्वोक्त लक्षण युक्त कुण्ड का निर्माण करे। वीथी तीन हाथ की इस प्रकार अट्ठारह शम बनावे ॥ २९७ ॥ पूर्ववत् प्रतिकुण्डे तु विनिवेश्यं च साधनम् । आत्मनश्चोत्तरे कुर्यात् कुण्डं चाथ समस्थले ॥ २९८ ॥ प्रत्येक कुण्ड पर साधन सामग्री स्थापित करे। अपने उत्तर दिशा में समतल भूमि पर कुण्ड निर्माण करे ॥ २९८ ॥ दक्षिणे पूर्ववद् देवमवतार्य यजेत् क्रमात् । स्थलायां स्थण्डिलस्योर्ध्वे उन्नतायां च पूर्ववत् ॥ २९९ ॥ अपने से दक्षिण, पूर्व की भाँति स्थण्डिल के ऊपर उन्नत स्थल में देव को पीठ से उतार कर क्रमशः यजन करे ॥ २९९ ॥ तर्पयित्वा यथाकाममुद्धृत्याग्निगणं ततः । दिक्कुण्डेषु विनिक्षिप्य संस्कृतेषु च पूर्ववत् ॥ ३०० ॥ इस प्रकार यथेष्ट सन्तृप्त करने के अनन्तर स्थण्डिल स्थल में से अग्निगणों को उठाकर सुसंस्कृत दिक्कुण्डों में स्थापित करे ॥ ३०० ॥ तथैव च विदिकस्थेषु उद्धृत्याभ्यर्च्य वै क्रमात् । ततः प्रभवयोगेन चतुर्दिक्षु निवेशयेत् ॥ ३०१ ॥ चतुरो वासुदेवादीन् नाम्ना एकायनान् द्विजान् । स्वाभिः स्वाभिरसंख्यं तु तैः कार्यमभिधाय च ॥ ३०२ ॥
५८८ सात्वतसंहिता इसी प्रकार वहाँ से उठाकर सुसंस्कृत विदिक् कुण्डों में स्थापित कर उनका क्रम से अभ्यर्चन करे । इसके बाद सृष्टि-क्रम से चारों दिशाओं में वासुदेवादि चार नामों वाले एकायन द्विजों को सन्निविष्ट करे । उनको दिये गये अपनी-अपनी सामग्रियों से असंख्य कार्य निवेदन करे ॥ ३०१-३०२ ॥ कर्मावसानं हवनं साज्यैस्तु तिलतण्डुलैः । एवमप्यययोगेन वाव्वादीशानगोचरम् ॥ ३०३ ॥ ऋग्वेदाद्यांस्तु चतुरः संस्कृत्यादौ तथा न्यसेत् । तैरप्यच्युतलिङ्गैस्तु स्वशाखोक्तैश्च पावनैः ॥ ३०४ ॥ हवनं विधिवत् कार्यं भक्तियुक्तेन चेतसा । अथेशकोणमासाद्य ब्राह्मणैरपरैः सह ॥ ३०५ ॥ प्राङ्निर्दिष्टं न्यसेत् तत्र स्नानोपकरणं तु यत् । दशार्धगव्यपूर्वं तु कलशेषु पृथक् पृथक् ॥ ३०६ ॥ तानर्च्यार्ध्यादिना पश्चाद् द्विषट्केनाभिमन्त्र्य च । समानीय शिलोपेतान् कलशान् पूर्वसम्भृतान् ॥ ३०७ ॥ कर्मावसान में घृतसहित तिल-तण्डुलों से होम करावे । इसी प्रकार संहार क्रम से वाय्वादि कोण से ईशानकोण पर्यन्त संस्कार कर ऋग्वेद के चार ब्राह्मणों को स्थापित करे । वे भी अपने-अपने चिह्नों को धारण किये हुए, अपने पवित्र शाखाओं से भक्ति युक्त चित्त से विधिवत् हवन करें । इसके बाद ईशानकोण में जाकर अन्य ब्राह्मणों के साथ पूर्वनिर्दिष्ट समस्त स्नानोपकरण स्थापित करे । फिर कलशों में पृथक्-पृथक् पञ्चगव्य डाले । अर्घ्यादि से अर्चन करे, द्वादशाक्षर मन्त्र से उसे अभिमन्त्रित करे । पूर्व में स्थापित शिला सहित उन कलशों को ले आवे ॥ ३०३-३०७ ॥ कलशलक्षणकथनम् उत्कृष्टधातुसम्भूतान् नवशैलमयांस्तु वा । समान् सुपक्वान् सुघनान् मृण्मयांस्तदभावतः ॥ ३०८ ॥ अब कलशों का लक्षण कहते हैं—वे कलश उत्कृष्ट धातुओं के बने होने चाहिये अथवा नवीन शिलामय से बने होने चाहिये । उनके अभाव में सभी मिट्टी के कलश समान सुपरिपक्व एवं परिपुष्ट होने चाहिये ॥ ३०८ ॥ द्वादशाङ्गुलिविस्तीर्णांस्तन्मानेन तु चोन्नतान् । द्विगुणान् सति सामर्थ्ये नृपाणां हेमजान् हितान् ॥ ३०९ ॥ उनकी लम्बाई का मान द्वादश अङ्गुल तथा उतने ही मान में ऊँचाई होनी
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५८९ चाहिये । यदि राजा सामर्थ्यवान हो तब मिट्टी के कलश से दूने मान में सोना और चाँदी का कलश निर्माण करावे, जो उसके लिये हितकारी है ॥ ३०९ ॥ तत्संख्यं चतुरश्रं तु द्वादशाङ्गुलविस्तृतम् । तत्र्यंशतुल्यं बाहुल्यात् शिलावृन्दं समाहरेत् ॥ ३१० ॥ संस्थाप्य विधिवत् कुम्भान् पूर्वोक्तेन क्रमेण तु । कम्बुतुल्यमथैकं वा तत्कण्ठं त्र्यङ्गुलोन्नतं ॥ ३११ ॥ तद्गुणैरपि विस्तीर्णं तत्खातोऽष्टाङ्गुलः स्मृतः । परितः कर्णवर्जं तु शङ्खो वा सुसितो महान् ॥ ३१२ ॥ विहितो जननाथस्तु अन्तःशुद्धस्तु साक्षतः । एवं हि सान्तराद् बाह्यात् समालभ्याधिवास्य च ॥ ३१३ ॥ इन कलशों की संख्या भी उतनी ही होनी चाहिये और उनका विस्तार भी द्वादशाङ्गुल होना चाहिये । शिला भी द्वादश अङ्गुल विस्तार की चौड़ाई, तृतीय अंश की कलश की संख्या में निर्माण करावे । तदनन्तर उस शिला पर विधिवत् कुम्भों को स्थापित करे । उसमें एक कलश का कण्ठ शङ्ख के समान उसकी ऊँचाई तीन अङ्गुल, उसके गुण के अनुसार लम्बाई और उसके भीतरी भाग की गहराई आठ अङ्गुल बनावे । उसमें कान न बनावे और चारों ओर श्वेत शङ्ख स्थापित करे । इस प्रकार अन्तःशुद्ध कलश में अक्षत सहित भगवान् को स्थापित करे । इस प्रकार भीतर से एवं बाहर से स्पर्श कर अधिवासन करे ॥ ३१०-३१३ ॥ फलैर्हेमादिकै रत्नैः सर्वौषधिमयैस्ततः । गन्धैर्बीजैस्तथा धान्यैर्विद्रुमाद्यैस्तु मौक्तिकैः ॥ ३१४ ॥ नेत्रवस्त्रैरलङ्कारैर्भूषयेत् स्रग्वरैः शुभैः । द्वादशाक्षरमन्त्रेण एकैकस्य समाचरेत् ॥ ३१५ ॥ मूर्तिसंसिद्धये न्यासं प्रणवैस्तच्चिदात्मना । ततश्चार्घ्यादिकैर्भोगैर्बल्यन्तैर्विविधैर्यजेत् ॥ ३१६ ॥ फिर एक-एक के लिये फल, होम, रत्न, सर्वौषधि, गन्ध, बीज, धान्य, विद्रुम, मोती, वेत्र वस्त्र, उत्तमोत्तम माला तथा द्वादशाक्षर मन्त्रों से उनको शोभित करे । मूर्त्ति की संसिद्धि के लिये प्रणव द्वारा तथा चिदात्मना (चिच्छक्ति) द्वारा न्यास करे । फिर उनका अर्घ्यादिकों से एवं नाना प्रकार के भोगों से अन्त में बलिदान से इस प्रकार अनेक प्रकार से पूजन करे ॥ ३१४-३१६ ॥ शिलास्वेवं कृते पश्चाग्निनयेत् कुण्डसन्निधिम् । सशिलं कुम्भवृन्दं तु आधारेषु परिन्यसेत् ॥ ३१७ ॥
५९० सात्वतसंहिता तदाधारशिलां पश्चात् तत्र वा मण्टपाद् बहिः । एवमेव च संस्कृत्य भावयेत् प्रणवेन तु ॥ ३१८ ॥ शिला पर इस प्रकार पूजन करने के पश्चात् उन कलशों को कुण्ड के सन्निधि में ले जावे । फिर शिला सहित समस्त कुम्भ वृन्द को आधार पर स्थापित करे । तत्पश्चात् उस आधार शिला को वहीं अथवा मण्डप से बाहर सुसंस्कृत करे और प्रणव मन्त्र से उसे अभिमन्त्रित करे ॥ ३१७-३१८ ॥ ज्वलन्तीं गोसहस्रेण खचितां सूर्यबिम्बवत् । ततश्चाराध्य मन्त्रं तु सन्तर्प्य शतसंख्यया ॥ ३१९ ॥ मध्ये तत्कलशं न्यस्य साङ्गं सपरिवारकम् । निःशेषशक्तिगर्भं तु व्यापकं ब्रह्मतत्त्ववित् ॥ ३२० ॥ अत ऊर्ध्वं तिर्यगाभिर्वागाद्याभिश्च शक्तिभिः । व्रतमूर्तिसमेताभिरभिन्नाभिस्तु तत्त्वतः ॥ ३२१ ॥ पाठयेद् ब्राह्मणांस्तत्र आत्मव्यूहं तु मन्त्रराट् । तथैवात्मानुभावाय प्रणवाद्यन्तगं तु वै ॥ ३२२ ॥ उसमें सूर्य बिम्ब के समान हजारों किरणों से देदीप्यमान होने की भावना करे और तदनन्तर सौ संख्या में सन्तर्पण करे । इस प्रकार मन्त्राराधन करे । मध्य के कलश में साङ्ग सपरिवार एवं हृदय में समस्त शक्तियों को धारण किये व्यापक ब्रह्मतत्त्व का न्यास करे । उस कलश के ऊपर तिरछे व्रत मूर्ति समेत अभिन्न रूप से स्थित वागादि शक्तियों से तत्त्वतः न्यास करे । वहाँ ब्राह्मणों से आत्मव्यूह मन्त्रराट् का पाठ करावे । इसी प्रकार अपने ज्ञान के लिये अन्त में तथा आदि में प्रणव का पाठ करावे ॥ ३१८-३२२ ॥ तमर्चयित्वा विधिवत् तर्पयित्वा त्वनन्तरम् । दिक्स्थितानां च कुम्भानां वासुदेवादिकान् न्यसेत् ॥ ३२३ ॥ इस प्रकार विधिवत् उनकी अर्चना कर, तदनन्तर तर्पण कर, दिशाओं में स्थापित कुम्भों पर वासुदेवादि का न्यास करे ॥ ३२३ ॥ पूर्ववच्चानिरुद्धाद्यान् विदिक्संस्थापितेषु च । पाठयेच्चातुरात्मीयं संज्ञामन्त्रचतुष्टयम् ॥ ३२४ ॥ विदिक् (कोणों) पर स्थापित कुम्भों पर अनिरुद्धादि का न्यास करे । फिर चातुरात्मीय चार संज्ञा मन्त्रों का पाठ करावे ॥ ३२४ ॥ प्रभवाप्यययोगेन ततः सूक्तं तु पौरुषम् । ऋग्वेदान् पाठयेद् भक्त्या युञ्जतेत्यपरान् यजुः ॥ ३२५ ॥
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५९१ रथन्तराख्यं यत्साम सामज्ञान् भगवन्मयान् । सहस्रशिरसं चेति मन्त्रांश्चाथर्वणांस्ततः ॥ ३२६ ॥ फिर सृष्टि एवं संहार क्रम से ऋग्वेद के पुरुष सूक्त का पाठ करावे । तदनन्तर भक्तिपूर्वक 'युञ्जते' इस यजुर्वेद का यजुर्वेदी ब्राह्मणों से पाठ करावे । फिर 'रथन्तराख्यं यत्साम' इस सामवेद का सामवेदी भगवन्मय ब्राह्मण से गान कराए । फिर 'संहस्रशिरसं च' इस अथर्ववेद के मन्त्र का अथर्ववेदी ब्राह्मण से पाठ करावे ॥ ३२५-३२६ ॥ एकस्मिन् वा महाबुद्धे सर्वोक्तं कलशे हितम् । तथैव हवनं कुण्डे मध्यमे विहितं स्वयम् ॥ ३२७ ॥ किन्तु क्रमेण वै मन्त्रान् पाठयेच्च यथास्थितान् । एवं सम्पातहोमं तु कृत्वा पूर्णान्तिकं ततः ॥ ३२८ ॥ अथवा हे महाबुद्धे यह सर्वोक्त एक कलश पर भी पाठ कराना हितकारक होता है । इसी प्रकार स्वयं द्वारा हवन भी एक मध्यम कुण्ड पर विहित है । किन्तु इन मन्त्रों का जिस प्रकार वे स्थित हैं उसी प्रकार से पाठ करावे । इसी प्रकार 'सम्पात होम' भी पूर्णाहूति पर्यन्त करावे ॥ ३२७-३२८ ॥ महाशक्तिसमूहस्तु परः सामर्थ्यलक्षणः । अभेदेन च मन्त्रादिमूर्तीनां यः स्थितः स्फुटम् ॥ ३२९ ॥ स सन्धेयः शिलानां च स्वनाम्ना प्रणवेन तु । ज्ञानभासा निवसति तथाऽनन्तबला प्रभा ॥ ३३० ॥ सर्वगा ब्रह्मवदना द्योतकी सत्यविक्रमा । सम्पूर्णा चेति कथिताः शक्तयो विश्वधारिकाः ॥ ३३१ ॥ महाशक्ति समूह जो सबसे अधिक शक्तिशाली लक्षण वाला है और जो मन्त्र मूर्तियों से भेद रहित होकर स्पष्ट रूप से स्थित है, उसे प्रणव के साथ अपने नाम से शिला में स्थापित करे । उस शिला में ज्ञानमासा, अनन्तवला, प्रभा, सर्वगा, ब्रह्मवदना, द्योतकी, सत्यविक्रमा, सम्पूर्ण विश्व को धारण करने वाली विश्व- धारिका। इतनी शक्तियाँ निवास करती है ॥ ३२९-३३१ ॥ या शिला कलशाधारसंज्ञा तां विद्धि सर्वगाम् । सामर्थ्यशक्तिसामान्यां निष्कलां पारमेश्वरीम् ॥ ३३२ ॥ जिस शिला का नाम कलशाधार है साधक को उसे सर्वगा समझना चाहिये तथा जो शिला सामान्य सामर्थ्य शक्ति वाली है, उसे निष्कला पारमेश्वरी शक्ति जानना चाहिये ॥ ३३२ ॥
५९२ सात्वतसंहिता सन्तर्प्य मूलमन्त्राच्च शिखामन्त्रेण लाङ्गलिन् । अजस्य नाभावध्येकमन्त्रेणैकायनैस्ततः ॥ ३३३ ॥ तादर्थ्येन तु होतव्यमृङ्मयैस्तु तथैव हि । होतव्यमस्यवामीयं गायत्रीभिरतोऽपरैः ॥ ३३४ ॥ हे सङ्कर्षण ! उन शिलाओं का मूल मन्त्र से तथा शिखा मन्त्र से सन्तर्पण करे । इसके बाद 'अजस्य नमः' पर्यन्त इसी एक मन्त्र से एकायन लोग घृताति से होम करें । ऋग्वेद भी उसी प्रकार 'अस्य वामीयम' इस मन्त्र से, इसके अतिरिक्त अन्य लोग गायत्री मन्त्र से होम करे ॥ ३३३-३३४ ॥ होतव्यं ब्राह्मणैः सम्यक् तद्व्याप्तेरुपलक्षकैः । दत्वा पूर्णां स्वयं कृत्वा स्थलस्थस्यार्चनं पुनः ॥ ३३५ ॥ ब्राह्मण लोग ब्रह्मव्याप्ति के उपलक्षक मन्त्रों से होम करें । तदनन्तर स्वयं पूर्णाहुति कर स्थल का अर्चन करे ॥ ३३५ ॥ बलिदानं च भूतानां समाचम्य ततो व्रजेत् । प्रासादब्रह्मभूभागं न्यसेत् तत्र महाशिलाम् ॥ ३३६ ॥ संस्मरंश्चक्रमन्त्रं तु सानन्तं प्रणवेन वै । बीजभूतं तदन्तःस्थमध्वषट्कं स्मरन् यजेत् ॥ ३३७ ॥ इसके बाद भूतों को बलिदान देकर, आचमन कर, जहाँ प्रासाद ब्रह्म का भूभाग है वहाँ स्वयं जावे और प्रणव के साथ अनन्त के सहित चक्र मन्त्र का स्मरण करते हुए उस स्थान पर महाशिला स्थापित करे । उसके भीतर रहने वाले बीज भूत षडध्वा का स्मरण करते हुए उस महाशिला का पूजन करे ॥ ३३६-३३७ ॥ निश्शेषमन्त्रवृन्देन तामर्घ्याद्यैरनन्तरम् । द्वारदिग्विीक्षमाणं तु मध्ये मन्त्रघटं न्यसेत् ॥ ३३८ ॥ विशेष मन्त्र समूह से उस शिला पर अर्घ्यदान के अनन्तर द्वार की दिशा की ओर देखते हुए शिला के मध्य भाग में मन्त्रघट स्थापित करे ॥ ३३८ ॥ स्वदिक्ष्वन्यान् यथावस्थान् स्वैः स्वैर्मन्त्रैर्निवेशयेत् । ततः स्वशक्तिपाषाणैरेकैकं स्थगयेद् घटम् ॥ ३३९ ॥ पूरयेदस्त्रमन्त्रेण घटानामन्तरं ततः । मृदुमृद्बालुकाभिस्तु सुधयाऽचलसिद्धये ॥ ३४० ॥ अन्य घटों को अपने-अपने मन्त्रों से अपनी-अपनी दिशाओं में यथावत् स्थित करे । फिर स्वशक्ति वाले पाषाण के साथ एक-एक घट स्थापित करे ।
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५९३ तदनन्तर घटों के बीच की दूरी घट की स्थिरता के लिये मिट्टी से, बालुका से और चूना से पूर्ण करे ॥ ३३९-३४० ॥ संवेष्ट्य नेत्रवस्त्रैस्तु ऋग्वेदान् पाठयेत् ततः । आ त्वा हार्षेति सूक्तं तु प्रतिष्ठा साम सामगान् ॥ ३४१ ॥ फिर उन घटों को नेत्र वस्त्र से वेष्टित करे । ऋग्वेदियों से 'आत्वा हर्षेति' इस ऋग्वेद के मन्त्र का और 'प्रतिष्ठा साम' इस सामवेद के मन्त्र का सामवेदियों से पाठ करावे ॥ ३४१ ॥ द्वादशाक्षरसंयुक्तं बलमन्त्रं पुनः पुनः । वक्तव्यं ब्रह्मनिष्ठैस्तु प्रणवान्तं सुभावितैः ॥ ३४२ ॥ द्वादशाक्षर संयुक्त बल मन्त्र का पुनः पुनः पाठ करावे । ब्रह्मनिष्ठ विद्वान् अन्त में प्रणव का उच्चारण करे ॥ ३४२ ॥ तदेकतनुतां यातं संस्मरेत् प्रणवेन तु । मूर्त्यादिशक्तिनिष्ठं यन्नामरूपक्रियात्मकम् ॥ ३४३ ॥ द्वादशाक्षरमन्त्रेण भूयः सहृदयङ्गमैः । तत्राराध्यं स्वमूर्तिं तु संयजेत् तेजसां निधिम् ॥ ३४४ ॥ फिर प्रणव के साथ मूर्त्यादिशक्ति निष्ठ जो नाम, रूप, क्रिया उसे एक शरीर में मिला हुआ समझे । फिर सहृदयङ्गम विद्वान् द्वादशाक्षर मन्त्र से आराध्य तेजस की निधि उस स्वमूर्त्ति का यजन एवं पूजन करे ॥ ३४३-३४४ ॥ ततस्त्वों भगवन् भोगैः पाठयेत् पाञ्चरात्रिकान् । अर्चाभि तेति ऋग्वेदानर्चा साम च तद्विदः ॥ ३४५ ॥ फिर पाञ्चरात्रिकों से 'ॐ भगवन् भोगैः' मन्त्र का पाठ करावे, ऋग्वेदियों से ऋग्वेद के 'अर्चाभि' इस मन्त्र का और सामवेदियों से 'अर्चा साम' इस मन्त्र का पाठ करावे ॥ ३४५ ॥ ततः परिगृहीते तु क्षेत्रे देवगृहीयके । द्वादशाङ्गुलमानं तु दिग्विधिक्ष्वष्टकं न्यसेत् ॥ ३४६ ॥ स्नापितं पूजितं सम्यक् शिलानां शुभलक्षणम् । तदन्तः सन्निरोद्धव्या बुद्धिर्धर्मगुणाः क्रमात् ॥ ३४७ ॥ तदनन्तर आराधक द्वारा देवगृह सम्बन्धी उस क्षेत्र को परिगृहीत कर लेने पर दिशाओं और कोणों में बारह अङ्गुल मान वाली सम्यक् स्नापित एवं पूजित तथा शुभ लक्षण युक्त आठ शिलायें स्थापित करे । उसके भीतर बुद्धि तथा धर्म के गुणों को सन्निरोधित करे ॥ ३४६-३४७ ॥
५९४ सात्वतसंहिता धर्माद्याश्चाग्निकोणात् तु यावदीशपदं पुनः । प्रागादावुत्तरान्तं च अधर्माद्यं चतुष्टयम् ॥ ३४८ ॥ शिलानामन्तरे भूमौ षट्कं षट्कं क्रमेण तु । न्यस्तव्यं पूर्ववर्णाच्च वर्णानां सावसानकम् ॥ ३४९ ॥ अग्निकोण से लेकर ईशानकोण पर्यन्त धर्मादि की तथा पूर्व दिशा से लेकर उत्तर दिशा पर्यन्त अधर्मादि चार की स्थापना करे । शिलाओं के अन्तर में भूमि पर छः-छः के क्रम से (अकारादि पूर्व वर्ण से 'स' पर्यन्त ४८ वर्णों की) स्थापना करे ॥ ३४८-३४९ ॥ शब्दब्रह्मानुविद्धां च कृत्वैवं बुद्धिवागुराम् । सूत्रभूतां न्यसेत् सम्यक् प्रासादतलसंस्थिताम् ॥ ३५० ॥ इस प्रकार शब्द ब्रह्म से अनुविद्ध को बुद्धि वागुर बना कर उसे सूत्र रूप बना कर प्रासाद तल में स्थापित करे ॥ ३५० ॥ न्यसेत् प्राङ्गणभित्त्यर्थं तथैव हि शिलाष्टकम् । तासु संरोधयेत् सम्यक् प्रागुक्तांस्तु दिगीश्वरान् ॥ ३५१ ॥ वहाँ प्राङ्गणभित्ति के लिये आठ शिला स्थापित करे । उसमें पहले कहे गये इन्द्रादि आठ दिगीश्वरों का सन्निरोध करे ॥ ३५१ ॥ चक्रं तदन्तर्भूमीनां भ्रमद्वह्निस्फुलिङ्गवत् । क्षार्णेन चिन्तयेद् व्याप्तं भूभागं चाङ्गोणीयकम् ॥ ३५२ ॥ उसके भीतर की भूमि में जहाँ आंगन वाला भूभाग है वहाँ चक्कर काटते हुए अग्नि स्फुलिङ्ग के समान चक्र का 'क्ष' वर्ण से ध्यान करे ॥ ३५२ ॥ आभोगं तदधः शेषं तदूर्ध्वं गगनेश्वरम् । बहिः प्राङ्गणभित्तीनां सास्त्रं सपरिवारकम् ॥ ३५३ ॥ प्राङ्गण भित्ति का जहाँ आभोग है वहाँ शेष का, उसके ऊपर गगनेश्वर का और उसके बाहर सपरिवार अस्त्र मन्त्र का स्मरण करे ॥ ३५३ ॥ प्रागादावीशकोणान्तमिन्द्राद्यं चाष्टकं न्यसेत् । तथाविधेषूपलेषु अन्तर्भूमिगतेषु च ॥ ३५४ ॥ तत् स्वनाम्नाऽर्चयित्वा तु ऋग्वेदान् पाठयेत् ततः । क्लीबो न विद्वानिति वै ये देवास्तु यजुर्मयान् ॥ ३५५ ॥ पूर्व से प्रारम्भ कर ईशानकोण पर्यन्त भूभाग में इन्द्रादि आठ दिगीश्वरों का न्यास करे । तदनन्तर उस प्रकार की शिला, जो भीतर की भूमि में स्थित है,
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५९५ उसका अपने नाम से अर्चन करे । तदनन्तर वहाँ 'क्लीबो न विद्वान्' इस ऋग्वेद का और 'ये देवास्तु' इस यजुर्वेद के मन्त्र का पाठ करावे ॥ ३५४-३५५ ॥ देवव्रतं च सामज्ञान् प्रविश्याभ्यन्तरं ततः । स्थित्वाऽग्रतो मन्त्रमूर्तेरध्वव्याप्तिमनुस्मरेत् ॥ ३५६ ॥ 'देवव्रतम्' इस मन्त्र का पाठ सामवेदी से करावे, इसके बाद भीतर प्रवेश कर मन्त्र मूर्त्ति के आगे खड़े होकर अध्वव्याप्ति का स्मरण करे ॥ ३५६ ॥ बीजतश्चाङ्कुरीभूता पुरस्ताद् व्यक्तिमेति या । प्रासादपीठपर्यन्तं कुम्भाधारोपलात् तु वै ॥ ३५७ ॥ भुवनाध्वा यथावस्थो भावनीयः पुरोदितः । गर्भोच्छ्रायावधिं यावत् पदाध्वानं विलोकयेत् ॥ ३५८ ॥ यह अध्व व्याप्ति जिस प्रकार बीज अङ्कुर रूप से बढ़ते-बढ़ते स्पष्ट रूप से प्रगट दिखाई पड़ता है, उसी प्रकार कुम्भाधार शिला से प्रासाद पीठ पर्यन्त बढ़ते- बढ़ते 'भुवनाध्वा' दिखाई पड़ता है । उसका ध्यान करे । इसे पहले कहा जा चुका है । गर्भ की ऊँचाई पर्यन्त 'पदाध्वा' का ध्यान करे ॥ ३५७-३५८ ॥ मन्त्राध्वा शुकनासान्तस्तत्त्वाध्वा वेदिकावधिः । कलाध्वाऽनुगलान्तश्च वर्णाध्वा च तदूर्ध्वतः ॥ ३५९ ॥ भुवनासान्त तक 'मन्त्राध्वा' का, वेदिका तक 'तत्त्वाध्वा' का, गले के अन्त तक 'कलाध्वा' का और उसके ऊपर 'वर्णाध्वा' का ध्यान करे ॥ ३५९ ॥ प्रासादलक्षणकथनम् समीकृत्य पुरा सर्वं प्रासादं प्रारभेत् ततः । तलादूनाधिकाच्चैव साङ्गुलैरुचितैः करैः ॥ ३६० ॥ अथ प्रासादलक्षणमाह—समीकृत्य पुरा सर्वं प्रासादं प्रारभेत् तत इत्यारभ्य यावत् परिच्छेदपरिसमाप्ति । अत्र विधिवत् स्थापनं तस्येत्यारभ्य स्थित्यपेक्षावशेनैव ह्यालयस्य तु वै विभो (४०२-४१०) रित्यन्तं द्वारप्रतिष्ठाविधानमुक्तं ज्ञेयम् । एतत्प्रासादप्रतिष्ठां तु बिम्ब- प्रतिष्ठानन्तरं वक्ष्यति ॥ ३६०-४३३ ॥ प्रासाद का लक्षण—तदनन्तर सबको समतल बनाकर तले से कम अथवा अधिक अङ्गुलि सहित हाथ से नाप कर प्रासाद का प्रारम्भ करे ॥ ३६० ॥ द्विद्वादशकरं यावत् तालेनोनाधिकेन तु । शुभाय सिद्धये विद्धि गर्भे देवगृहस्य च ॥ ३६१ ॥
५९६ सात्वतसंहिता वह प्रासाद देवगृह के गर्भ में १ ताल से अधिक अथवा न्यून मान में द्वादश हाथ का होना चाहिये । ऐसा प्रासाद कल्याण के लिये अथवा सिद्धि के योग्य समझना चाहिये ॥ ३६१ ॥ कृत्वा क्षेत्राङ्गुलानां च कराणां वा घनं पुरा । त्यजेत् तदष्टभिः सम्यग् यच्छेषं तद्विचार्य च ॥ ३६२ ॥ क्षेत्राङ्गुल को अथवा हाथ को घना बनाकर आठ भाग का त्याग कर जो शेष हो उसमें विचार कर प्रासाद निर्माण करे ॥ ३६२ ॥ एकाद्यष्टमपर्यन्ता ध्वजधूममृगेश्वराः । श्वा च गोखरमातङ्गवायसास्तु ततः शुभाः ॥ ३६३ ॥ एक से लेकर आठ हाथ तक ध्वज, धूम, मृगेश्वर, श्वा, गौ, खर, मातङ्ग और वायस नामक प्रासाद होते हैं, इसके बाद के प्रासाद शुभ होते हैं ॥ ३६३ ॥ एकत्रिपञ्चसप्ताख्याः सर्वत्रैव विधीयते । गर्भषड्भागमानेन तद्बहिर्भित्तिविस्तृतिः ॥ ३६४ ॥ तन्मानं परितस्त्यक्त्वा भित्तिरन्या विधीयते । एवमत्र क्रमेणैव सह भित्तिगणेन तु ॥ ३६५ ॥ गर्भद्विगुणविस्तीर्णं क्षेत्रं देवगृहस्य च । मन्दिरे त्वेकभित्तीये क्षेत्रमानं विधीयते ॥ ३६६ ॥ सर्वत्र एक, तीन, पाँच और सात संख्या में गर्भ का विधान है । गर्भ के छठे भाग के मान के अनुसार उसके बाहर भित्ति का विस्तार करे । चारों ओर उतने ही मान को छोड़कर अन्य भित्ति का निर्माण करे । इसी प्रकार यहाँ क्रम से भित्तिगण के साथ गर्भ के दुगुने विधान में देवगृह के क्षेत्र का निर्माण करे । इस प्रकार एक भित्ति वाले मन्दिर में क्षेत्र का मान होना चाहिये ॥ ३६४-३६६ ॥ गर्भोक्तं तत्रिभागेन युक्तं युक्तेन वर्त्मना । तत्रापि ह्रासवृद्ध्या तु आयशुद्धिं विचारयेत् ॥ ३६७ ॥ गर्भ में जितना परिमाण कहा गया है उसके तीसरे भाग की वीथी बनानी चाहिये । उस प्रासाद के लम्बाई चौड़ाई के ह्रास वृद्धि के अनुसार आयशुद्धि का विचार करे ॥ ३६७ ॥ एवं निर्जगतीकं च भागं पीठविवर्जितम् । प्रासादक्षेत्रमानं च तद्युक्तमवधारय ॥ ३६८ ॥ इस प्रकार पीठ विवर्जित निर्जगती का भाग होता है । हे सङ्कर्षण ! अब