शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
एकादश पटल ] [ २५५ प्रागुक्तमन्त्रसम्प्रोक्तान्प्रयोगाःमनुनाऽमुना । तैरस्तिन्नथवा प्रोक्तात् कुर्यान्मन्त्री विधानवित् ।१०६ पञ्चांतको विदुयुतो यामकर्णविभूषितः । तारादिहृदयांतोऽयं हेरम्बमनुरीरितः ।१०७ चतुर्वर्णांतमकी नृणां चतुर्वर्गफलप्रदः । षड्दीर्घभाजा बीजेन षडंगानि ममाचरेत् ।१०८ मुक्ताकाञ्चननीलकुन्दघुसृणच्छायैस्त्रिनेत्रान्वितै- र्नानास्यैर्हरिवाहन शशिधर' हेरम्बमर्कप्रभम् । दृप्तं दानमभीतिमोदकदर टङ्क' शिरोक्षात्मिकां मालां मदनमङ्कुशं त्रिशिखकदोभिर्दधान भजे ।१०६ लक्षत्रय जपेन्मन्त्र दशांशं जुहुवात्तिलैः । तीव्रादिपूजिते पीठे देवं हेरम्बमर्चयेत ।११० प्रणवः कवचद्वन्द्व' महासिंहाय ग ततः । हेरम्बेति पद पश्चादासनाय हृदन्वितः ।१११ अयमासनमत्रः स्यातत्रदंद्यादमुनाऽऽसनम् । तारादिविघ्नबीजेन मूर्ति तस्य प्रकल्पयेत ।११२ विधान का ज्ञाता मन्त्रधारी पुरुष इस मन्त्र के द्वारा पूर्व में कहे हुये प्रयोगों को अथवा इसमें कहे हुओं को उसके द्वारा करे ।१०६। पञ्चान्तक-गकार, नाम नेत्र, ऊकार, जो बिन्दु से युत हो, प्रणव आदि में हो और हृदय अन्त में-ऐसा हेरम्ब का मन्त्र कहा गया है ।१०७। यह चार वर्णोंके स्वरूप वाला मन्त्र है जो चतुर्वर्गके फल को देने वाला होता है। षट् दीर्घक् बीज के द्वारा छं अङ्गों का समाचरण करना चाहिए ।१०८। ध्यान—मुक्ता, काञ्चन नील कुन्द घुसृण-कुंकुम के सदृश कान्ति वाले नाग के मुखों से युक्त-तीन नेत्रों से समन्वित- हरि के वाहन वाले-चन्द्र के धारी-सूर्य की प्रभा से मुक्त— दृप्त, दान-अभय-मोद करोंमें धारण करने वाले-अक्षमाला, मदन-अंकुज और त्रिलिश को धारण करने वाले हेरम्बका मैं भजन करता हूँ ।१०६।
२५६ ] [ श्रीशारदा तिलक इस मन्त्र का तीन लाख जप करे और जप को दशांश तिलों से होम करना चाहिये । तीव्रा आदि से पूजित पीठकर हेरम्ब देव का अर्चन करे ।११०। प्रणव-कवच द्वन्द्व अर्थात् हुँ-हुँ और फिर ग, इसके पीछे हेरम्ब-यह पद आसन के लिये हृदन्वित होवे ।१११। यह आसन का मन्त्र होता है । इस मन्त्र से आसन अर्पित करना चाहिये । जिसके प्रणव कादि में होवे ऐसे विघ्न के बीज के द्वारा उनकी मूर्ति को प्रकल्पित करे ।११२। आवाह्य पूजयेत्तस्यामङ्गावरणसंयुतम् । वाह्ये लोकेश्वरा पूज्या वज्रादीनि ततः परम् ।११३ एवमभ्यर्चयेन्नित्यं साधयेत्स्वमभीप्सितम् । मोदकैर्जुहुयात्षष्ठ्यामष्टम्यां कृशरैस्तथा ।११४ चतुर्दशीदिनेऽपूपैर्यजुहुयाद्वाञ्छिताप्तये । एभिर्द्रव्यैः प्रजुहुयान्मन्त्रो पूर्वदिनेष्वपि । साधयेत्सकलान्कामान्यत्नेनैव साधकः ।११५ अम्भोजं प्रथमं लिखेद्वसुदलं मध्ये स्वबीजान्तरे । साध्याख्याम्बहिरङ्गमन्त्रविलसत्किञ्जल्कसंशोभितम् । पत्राणामुदरे विभज्य मुनिशो मालामनुं शेषिता- षड् वर्णंश्चरमे दले परिवृत शक्त्या शकारेण च ।११६ रोचनामदकाश्मीरैर्भूजपत्रे विलिख्य तत् । वेष्टित श्वेतसूत्रेण लोहैस्त्रिभिरपि क्रमात् ।११७ धारयेद्बाहुना यंत्र सर्वान्कामानवाप्नुयात् । शक्त्यङकुशोध्ववान्ते स्यात्स्वबीजं हृदयं ततः ।११८ सर्वविघ्नाधिपायन्ते ङेऽन्तं सर्वार्थसिद्धिदम् । प्रवदेत्सर्वदुःखप्रशमनाय पदं ततः ।११६ उस मूर्ति में आवाहन करके अङ्गावरण से समन्वित का अर्चन करना चाहिए । बाहिर में लोकेश्वरों का अर्चन करे और उनके बाहिर वज्रादि उनके आयुधों का यजन करे ।११३। इसी रीतिमें नित्य अर्चन
एकादश पटल ] [ २५७ करे और अपना अभीप्सित का साधन करना चाहिए । षष्ठी तिथि में मोदकों के द्वारा होम करे तथा अष्टमी में कृशरों से हवन करना चाहिए ।११४। चतुर्दशी तिथि में पूओं से वांछितों की प्राप्ति के लिये होम करना चाहिये । इस मन्त्र सहित द्रव्यों के द्वारा मन्त्रधारी पूर्व दिनों में भी आहुतियाँ देवे । साधक बिना ही पत्रों के सब कामों का साधन करे ।११५। सर्व प्रथम कमल का लेखन करे जिसमें आठ दल होवे । मध्य में अपने बीज के अन्तर में साध्य का नाम लिखे । जो अंक मन्त्रों से भूषित किञ्जल्क से संशोभित होवे । साध्य के साथ साधक और उसके कार्य को लिखना चाहिए । पत्रों के उदर में सात प्रकार से विभाग करके माला मन्त्र को शेषित वर्णों को अन्तिम दल में लिखे और शक्ति और प्रकार से परिवृत करे । रोचना मद और काश्मीर से भोज पत्र में उसे लिखे । फिर क्रम से सूत्र से और तीन लोहों से वेष्टित करे । इस मन्त्र बाँधी ‘वाह मे’ धारण करे तो साधक सभी कामनाओं को प्राप्त कर लिया करता है । शक्ति- अंकुश को ध्रुव के अन्त में लिखे फिर अपना बीज और हृदय लिखे, अन्त में चतुर्थी विभक्ति के अन्त वाले सर्व विघ्नाधिपाय लिखे तो यह सब अर्थों की सिद्धि का देने वाला होता है । इसके पश्चात् सर्वा दुःख प्रशमनाय-यह पद कहे ।११६-११९। एह्येहि भगवन्सर्व खादय स्तम्भय द्वयम् । भुवनेशी स्वबीजजाङ्ग नतिः पावकवल्लभाः ।१२० पुनरङ्कुशमायान्तं पञ्चपञ्चाशदक्षरः । मालामन्त्रेण मनुना प्रयोगान् साधयेत्सुधीः ।१२१ तारं खङ्गीश्वरः कूर्मो निःस्वरेणान्तईरित । ध्रुवे नतिः सप्तवर्णः सुब्रह्मण्यात्मकोमनुः । वह्निबीजेन षड्दीर्घयुक्तेनाङ्गक्रिया मता ।१२२ सिन्दूरारुणकान्तिमिन्दुवदनं केयूरहारादिभि- र्दिव्यैराभरणैर्विभूषिततनुं स्वगस्य सौख्यप्रदम् ।
२५८ ] [ श्रीशारदा तिलक अम्भोजाभयशक्तिकुक्कुटधरं रक्ताङ्गरागांशुकम् । सुब्रह्मण्यमुपास्महे प्रणमतां भीतिप्रणाशोद्यतम् ।१२३ लक्षमेकं जपेन्मन्त्रं साज्येन हविषा ततः । दशांशं जुहुयादन्ते ब्राह्मणानापि भोजयेत् ।१२४ धर्म्मादिकल्पिते पीठे वह्निमण्डलपश्चिमे । पूजयेद्विधिना देवमुपचारैर्यथोदितैः ।१२५ केसरेष्वङ्गपूजा स्यात्पत्रमध्यगतानिमान् । जयन्ताख्यमग्निवेश्यं कृत्तिकापुत्रसंज्ञकम् ।१२६ इसके अनन्तर ऐहि एहि भगवान् सर्व खाद्य और स्तम्भय-इन को दो-दो बार कहे । भुवनेशी का अपना बीज-ह्रीं गं-नतिः पावक वल्लभा अर्थात् स्वाहा कहे । फिर आमान्त अंकुश कहे-यह माला मन्त्र पचपन अक्षरों वाला होता है । इस माला मन्त्र के द्वारा साधक सुधी अपने प्रयोगों का साधन करे ।१२०-१२१। अब सुब्रह्मण्य मन्त्र को बतलाते हैं-प्रणव-खगीश-वः, कूर्म-चकार, निःस्वर-स्वर से हीन, णान्तः-तकार, भुवे यह स्वरूप हैं । फिर नति नमः-यह पद कहे-यह सुब्रह्मण्य के स्वरूप वाला मन्त्र सात वर्षों वाला होता है । षट् दीर्घ से युक्त वह्नि बाज से हङ्गक्रिया मानी गयी है ।१२२। अब ध्यान बतलाया जाता है-सिन्दूर के समान कान्ति से युक्त चन्द्र के समान मुख वाले-केयूर और हार आदि परम दिव्य भूषणों से विभूषित शरीर से समन्वित-स्वर्ग के सौख्य के प्रदान करने वाले -- करों से कमल, अभयदान-शक्ति और कुक्कुटको धारण करने वाले-रक्त अङ्गराग से युक्त वस्त्र वाले - प्रीति और प्रमाण को उद्यत रहते हैं जो प्रणाम करने वाले हैं ऐसे सुब्रह्मण्य देवकी हम उपासना करते हैं ।१२३। इस मन्त्र का एक लाख जप करना चाहिये । और घृत के सहित हविसे जप का दशांश होम करे और अन्त में ब्राह्मणोंको भोजन करना चाहिये ।१२४। वह्नि मण्डल के पश्चिम में धर्म्मादि से कल्पित पीठ पर यथो- चित उपचारों के द्वारा विधि के साथ देवता का पूजन करना चाहिए । केसरों से अङ्ग पूजा करे तो ये पत्रों के मध्य संस्थित है ।१२५-१२६।
एकादश पटल } { २५६ अनन्तर भूतपतिं सेनान्यं गुहसंज्ञकम् । हेमशूलं विशालाक्षं शक्तिशूलकरान् यजेत् १२७ दिग्दलाग्रेषु पूर्बादि देवसेनापतिं पुनः । विद्यां मेधां ततो वज्रं कोणस्थान् शक्तिकुक्कुटौ १२८ मयूरं द्वीपमध्यचैद्वाह्ये लोकेश्वरान्पुनः । अस्त्राणि तेषामते स्युः सुब्रह्मण्यार्चनेरिता १२६ स्वादुभिर्भक्ष्यभोज्याद्यैः षष्ठ्यां संप्रीणयेद्विभुम् । पूजयेद्देवताबुद्ध्या कुमारब्रह्मचारिणः ।१३० सतानं विजयं वीर्यरक्षामायुः श्रियं यशः । प्रदद्यात्साधकस्याशु सुब्रह्मण्यः सुरार्चितः १३१। जपतर्पणपूजादौ विघ्नेश सर्वसिद्धिदम् । प्रीणयेदनया स्तुत्या प्राप्तये सर्वसम्पदाम् ।१३२ ॐ रूमामाद्यं प्रवदन्ति सन्तोवाचः श्रुतौ यामभियं गृणन्ति । गजाननं देवगणानताङ्घ्रि भजेऽहपद्धेन्दुकृतोवतसम् ।१३३ जयन्त-अग्नि वैश्य-कृत्तिका पुत्र-भूतपति-सेनान्य-गुह- हेम शूल-विशालाक्ष ओर शक्ति तथा त्रिशूल करों में रखने वालों का यजन करना चाहिये । १२७। दिग्दलों के पूर्व अग्र भागों में पूर्बादि देव सेनापति का यजन करे - विद्या-मेधा-वज्र और कोणों में स्थितों का- शक्ति और कुक्कुटों का, मयूर, द्वीप का अर्चन करना चाहिये फिर बाहिर में लोकेश्वरों का तथा उनके अन्त में अस्त्रों का अर्चन सुब्रह्मण्य के यजन में कहा गया है ।१२८-१२६। परम स्वादु भक्ष्य भोज्यों के द्वारा षष्ठी में विभु को प्रीणित करना चाहिए । देवता की बुद्धि से कुमार ब्रह्मचारियों का पूजन करना चाहिये ।१३०। सुरों के द्वारा समर्चन किये हुये सुब्रह्मण्य देव साधना करने वाले व्यक्तियों को शीघ्र ही सन्तति -विजय -दीर्घ - रक्षा -आयु -श्री-यश को देते हैं ।१३१। जप, तर्पण और पूजा आदि में समस्त सिद्धियों के प्रदाता विघ्नेश को प्रीणित करे । इस स्तुति के द्वारा उनको प्रसन्न करे
२६० ] [ श्रीशारदा तिलक जिससे सब सम्पदाओं की प्राप्ति होती है ।१३२। अब ध्यान कहा जाता हैं-सत्पुरुष आदि में होने वाले ॐ को क्रम से कहते हैं जिसका श्रुतियों की वाणियाँ भी ग्रहण किया करती हैं । देवगणोंके द्वारा जिसके चरणों में नमस्कार किया गया है ओर जो अर्ध चन्द्र के द्वारा भूषित हैं, उन गजानन प्रभु का भजन करता हूं ।१३३। पादारविन्दाच्च॑न..त्पराणां संसारदावानलभङ्गदक्षम् । निरन्तरं निगतदानतोयैस्तं नौमि विघ्नेश्वरमम्बुदाभम् ।१३४ कृताङ्गरागं नवकुङ्कुमेन मत्तालिमालां मेदाङ्कलग्नाम् । निवारयंतं निजकर्णतालैः काविस्मरेत्पुत्रमनङ्गशत्रोः ।१३५ शंभोजंटाजूटनिवासिगङ्गाजल समादाय कराम्बजेन । लीलाभिराराच्चिवमर्चयन्तं गजाननं भक्तियुता भजन्ति ।१३६ कुमारभक्तौ पुनरात्महेतोः पयोधरौ पर्वतराजपुत्र्याः । प्रक्षालयन्तं करसीकरेण मौग्ध्येन तं नागमुखं भजामि ।१३७ त्वया समुद्धृत्य गजास्य हस्तं ये सोकराः पुष्कररन्ध्रमुक्ताः । व्योमाङ्गणे ते विचरन्ति ताराः कालात्मना मौक्तिकतुल्यभासः ।३८ क्रीडारते वारिनिधौ गजास्ये वेलामतिक्रामति वारिपूरे । कल्पावसानं प्रविचिन्त्य देवाः कैलासनाथ स्तुतिभिः स्तुवन्ति ।१३६ नागानने नाग हुतोत्तरीये क्रीडारते देवकुमार संघैः । त्वयि क्षणं कालगति विहाय तौ प्राप्तुः कन्दुकतामिनेन्द ।१४० चरणार विन्दों के अभ्यर्चन न परायण भक्तों के संसार दावानलके भङ्ग करने में दक्ष है, जो मेघ की आभा वाले हैं और निरन्तर निकलने हुये मद के जलके समूह से समन्वित है उन भगवान् विघ्नेश्वर के लिएमैं प्रणाम करता हूँ ।१३४। नूतन कुंकुम के द्वारा अङ्गराग की करने वाले, मद के कर्दम में लगे हुये मद मस्त भ्रमरों की पक्तियों को अपने कानों के तालों के द्वारा निवारण करने वाले अनङ्ग के शत्रु भगवान् शिव के
एकादश पटल ] [ २६१ पुत्र का कौन विस्मरण किया करता है, अर्थात् कोई भी उसको भूल नहीं सकता है ।१३५। भगवान् शम्भु के जटाओं में निवास करने वाले गङ्गा के जल को अपने कर कमलों के द्वारा आदान करके लीला से समीपमें शिव का अर्चन करते हुए गजानन का भक्तिसे युक्त भक्तिगण भजन किया करते हैं ।१३६। कुमार अर्थात् स्वामि कार्तिकेय के द्वारा पर्वतराज की पुत्री के मुक्त पयोधरों को अपने लिये करों के सीकरोंके द्वारा मुग्धता से प्रक्षालन करते हुए उन गज के समान मुख वालों का मैं भजन करता हूँ ।१३७। हे गजास्य ! काल स्वरूप आपके द्वारा हस्त सूँड) को समृद्ध त करके पुष्कर (हाथी के सूँड का अग्रभाग) के रन्ध्र से मुक्त किये हुये सीकर हैं वे व्योम के आँगन में मोतियों के समान कान्ति वाले तारागण विचरण किया करते हैं ।१३८। गजास्य अर्थात् श्री गणेश के सागर में क्रीड़ारत होने पर जल समूह के वेग के अति- क्रमण करने पर देवगण कल्प का अवसान विचार करके कैलास के स्वामी की स्तुतियों के द्वारा स्तवन किया करते हैं ।१३६। नागानन (गणेश) के नाग (गज) का उत्तरीय वस्त्र करने पर क्रीड़ा में रत ही जाने से देव कुमारों के संघों के द्वारा तुम्हारे क्षण पर्यन्त कालगति का त्याग करके वे दोनो सूर्यचन्द्र कन्दुकता को प्राप्त हुए थे ।१४०। मदोल्लसत्पञ्चमुखैरजस्रमध्यापयन्तं सकलागमार्थान् । देवानृषीन् भक्तजनैकमित्रं हेरम्बमर्कारुजमाश्रयामि ।१४१ पादाम्बुजाभ्यामतिवामनाभ्यां कृतार्थयन्तं कृपया धरित्रीम् । अकारणं कारणमोप्तवाचां तं नागवक्त्रं न जहाति चेतः ।१४२ येनार्पितं सत्यवतीसुताय पुराणमालिख्य विषाणकोट्या। तंचन्द्रमौलेस्तनयं तपोभिरवाप्यमानन्दघनं भजामि ।१४३ पदं स्तुतीनामपदं श्रुतीनां लीलावतारं परमेष्टमूर्त्तेः। नागात्मको वा पुरुषात्मकोवेत्यभेद्यमाद्यं भज विघ्नराजम् ।१४४ पाशाङ्कुशौ भग्नरदं त्वभीष्टं करैर्दधानं कररन्ध्रमुक्तैः । मुक्ताफलाभैः पृथुसीकरोधैः सिंचत्समग्रं शिवयोर्भजामि ।१४५
२६२ । [ श्रीशारदा तिलक अनेकमेकं गजमेकदन्तं चैतन्यरूपं जगदादिबीजम् । ब्रह्मेति यं ब्रह्मविदोवदन्ति तं शम्भुसुतं शरणं भजामि ।१४६ स्वाङ्कस्थिताया निजवल्लभाया मुखाम्ब जालोकनलोलनेत्रम् । स्मेराननास्यं मदवैभवेन रुद्धं भजे विश्वविमोहनं तम् ।१४७ मद से समुल्लसित पाँच मुखों के द्वारा निरन्तर समस्त आगमों के अर्थ को देवों और ऋषियों को पढ़ाते हुए भक्तजनों के एक मित्र परम दयालु हेरम्ब की मैं शरण में जाता हूँ ।१४१। अपने अतीव गमन चरण कमलों के द्वारा कृपा करके धरित्री को कृतार्थ करते हुये आप्तवचनों के अकारण कारण स्वरूप उन गजमुख प्रभु को चित्त कभी त्याग नहीं करता है ।१४२। जिसने सत्यवती के पुत्र व्यासदेव को अपनी विषाण की कोटि से पुराण का लेखन करके अर्पितकर दिया था उन चन्द्रमौलि शिव के पुत्र का जो तपोंके द्वारा अवाध्य है और आनन्दघन हैं मैं भजन करता हूँ ।१४२। स्तुतियों का अपद अर्थात् अस्थान और श्रुतियों का अपद अर्थात् जो श्रुतियों का भी स्थान नहीं है, अष्ट मूर्ति का परम लीलाववतार हैं। वह नाग स्वरूप से युक्त हैं अथवा पुरुष स्वरूप वाले हैं ऐसे भेद के अयोग्य आद्य विघ्नराज का भजन करो ।१४४। पाश- अंकुश भग्न दन्त और अभीष्ट को कर कमलोंके द्वारा धारण करने वाले करों के रन्ध्रों (छिद्रों) से मुक्त- मुक्ताफल की आभा वाले पृथु सीकरों के समुदायों से शिवा और शिवके अङ्गों का सेवन करते हुए गणेश का मैं भजन करता हूँ ।१४५। अनेक एक दन्त--चैतन्य स्वरूप-जगत् के आदि बीज गज को अर्थात् गणेश को जिसको ब्रह्म के ज्ञाता जन ब्रह्म कहते हैं उन भगवान् शम्भु के पुत्र की मैं शरणागति में जाता हूँ अवलोकन करने में चंचल नेत्रों वाले-मदके वैभव से रुद्ध-स्मेर (मन्दहास्य) से संयुत आनन वाले, विश्व को विमोहित करने वाले उन गणेश का मैं भजन करता हूँ ।१४७। ये पूर्वमाराध्य गजानन त्वां शास्त्राणि सर्वाणि पठन्ति ऐषाम् ।
एकादश पटल । ] [ २६३ स्वत्तो न चान्यत्प्रतिपाद्यमेतैस्तदस्तित चेत्सर्वमसत्यकल्पम् ।१४८ हिरण्यगर्भं जगदीशितारमृषि पुराणं रविमण्डलस्थम् । गजाननं यं प्रविशन्ति संतस्तत्कालयोगैस्यमहं प्रपद्ये ।१४६ वेदान्तगीतं पुरुषं भजेऽहमात्मानन्दघनं हृदिस्थम् । गजाननं यन्महसा जनानां महाऽन्धकारोविलयं प्रयाति ।१५० शम्भोः समालोक्य जटाकलापं शशाङ्कखण्डं निजपुष्करेण । स्वभग्नदन्तं प्रविचिन्त्य मोग्धांदाक्रष्टु रुक्तमः श्रियमातनोतु ।१५१ विघ्नार्गलानां विनिपातनाथंयं नारिकेलैः कदलीफलाद्यैः । प्रभाव (साद) यन्तोमदवारणास्यम्त्रापूर्नरोऽभीष्टमहं भजेतम् ।१५२ यज्ञै रनेकैर्र्बहुभिस्तपोभिराराध्यमाद्यं गजराजचक्रं । स्तुत्याऽनता ये विधिना स्तुवन्ति ते सर्वलक्ष्मीनिधयोभवंति ।१५३ जो पूर्व में गजानन आपकी आराधना करके उनके समस्त शास्त्रों को पढ़ते हैं, वे आपसे अन्य प्रतिपादन करनेके योग्य नहीं है। यदि ऐसा हो तो वह सब असत्य कल्पना ही है ।१४८। हिरण्यगर्भ-जगत् के ईश- ऋृषि-पुराण और रविमंडल में संस्थित जिस गजानन के अन्दर काल के योगों द्वारा प्रवेश करता है, उनकी शरणागति में गमन करता हूँ ।१४६। वेदान्त में गान किये गये-आनन्द घन अर्थात् घनी-भूत आनन्द स्वरूप हृदय में स्थित आत्म गजानन का में सेवन करता हूँ । जिसके तेज से जनों का महान् अन्धकार विलोनता को प्राप्त हो जाया करता है ।१५०। भगवान् शम्भु के जटाजूटमें चन्द्रमा के खन्ड को समालोकित करके अपना भग्न हुआ दाँत समझकर अपनी सूँड के अग्रभाग से मुग्धता से उसे खींच लेने की इच्छा वाले होते हैं । ऐसे श्री गणेशजी हमारी श्री का विस्तार करें ।१५१। विघ्नों की अर्गला के विनिपालन करने के लिये जिसको नारियलों से तथा कदली के फलादि के द्वारा प्रसन्न करते हुए मद वारणस्य को प्राप्त हुए नरों से अभीष्ट उन गणेश का भजन करता हूँ ।१५२। अनेक यज्ञों के द्वारा बहुत से
२६४ ] [ श्रीशारदा तिलक तपों से आराधना के योग्य-आद्य गजराज मुख (गणेश) का इस स्तुति के द्वारा विधि के साथ स्तवन जो लोग किया करते हैं वे सम्पूर्ण सम्पत्ति और निधियों वाले हो जाया करते हैं ॥५३॥ द्वादश पटल ॥ चन्द्र प्रकरण ॥ अथोच्यते चन्द्रमसोमनुःसर्वसमृद्धिदः । खड्गीशस्थो भृगुर्बिन्दुसनुस्वरसमन्वितः ।१ सोमाय हृदयान्तोऽयं मन्त्रः प्रोक्तः षडक्षरः । ऋषिरुक्तो भृगु छन्दः पंक्तिः सोमोऽस्य देवता । दीर्घभाजा स्वबीजेन मनोरङ्गक्रिया मता ।२ कर्पूरस्फटिकावदातमनिशं पूर्णेन्दुविम्बाननम् । मुक्तादामविभूषितेन वपुषा निर्मूलयन्तं तमः । हस्ताभ्यां कुमुदं वरं च दधतं नीलालिकोद्भासितम् । स्वास्याङ्कस्थमृगोदिताश्रयगुणं सोमं सुधाब्धि भजे ।३ रसलक्षां जपेन्मन्त्रं साधको विजितेन्द्रियः । षट्सहस्रं प्रजहुयात्पायसेन ससर्पिषा ।४ सौमान्तं पूजिये पीठे पूजयेद्रोहिणीपतिम् । अङ्गानि केसरेषु स्युस्तद्देव्यः पत्रमध्यगाः ।५ रोहिणी कृत्तिका भूयोरेवती भरणी पुनः । रात्रिराद्रा तनोज्योतिः कला हारसमप्रभाः ।६ सितमाल्याम्बरधरा मुक्ताहारविभूषणाः । पयोधरभराक्रान्ता रचिताञ्जलयः शुभा ।७
द्वादश पटल ] [ २६५ इसके अनन्तर समस्त समृद्धियों के प्रदान करने वाले चन्द्रमा के मन्त्र को बतलाया है-सौभाग्य और हृदयान्त अर्थात् जिनके अन्त में हृदय है-यह छै अक्षरों वाला मन्त्र होता है। मन्त्र का उद्धार यह होता है-खङ्गीश-त्रः उसमें स्थित भृगु-सः। वह बिन्दु अनुस्वार से समुन्वित है। भृगु इसका ऋषि है छन्दपंक्ति है और इसका देवता सोम है। दीर्घ का सेवन वाले अपने ही बीज के द्वारा इस मन्त्र की अङ्ग क्रिया करनी चाहिए ।१-२। कर्पूर और स्फटिक के समान अवदात अर्थात् श्वेत और निरन्तर पूर्ण चन्द्रमा के समान मुखबिम्ब वाले- मोतियों की माला से विभूषित वपु से अन्धकारका निर्मूलन करने वाले तथा हाथों से कुमुद ओर वर को धारण करने वाले-नीले अलकों से उद्भासित-अपने अंक में स्थित मृग चिह्न से उदित आश्चर्य गुण वाले सुधा के सागर सोमका ही मैं भजन करता है ।३। साधना करने वालेको अपनी इन्द्रियों को जीतकर छः लाख मन्त्र जप करना चाहिये। छै सहस्र का होम करना चाहिये। पायस और घृत मे ही हवन करे ।४। पूजित पीठ पर सोमान्त रोहिणी के पतिका पूजन करे। केसरों में अङ्गों का यजन करना चाहिए। उसकी देवियों का पत्त्रों के मध्य में पूजन करे ।५। रोहिणी कृत्तिका रेवती, भरणी, रात्रि, आर्द्रा, ज्योति, कला,ये सब हीर के समान प्रभा वाली है ।६। ये श्वेत माल्यों की धारण करने वाली है और मुक्ताओं के हारों से विभूषित हैं। पयोधरों के भार से समाक्रान्त है और शुभा तथा हाथों की अं जलियाँ बांधे हुई हैं ।७। वल्लभाभक्तमनसी मदविभ्रममन्थराः । समभ्यर्च्य्याः सरोजाक्ष्यश्चन्द्रबिम्बनिभाननाः ।८ आदित्यमङ्गल बुधमन्दवाक्पतिराहवाः । शुक्रकेतुयुताः पूज्या दलाग्रेषु ग्रहा इमे ।६ स्वस्ववर्णज्वरोपेताः स्वनामद्यर्णबीजकाः । रक्तारुणश्वेतनीलपीतधूम्रसितासिताः ।१०
२६६ ] [ श्रीशारदा तिलक वामोरुन्यस्ततद्धस्तस्तदधस्तो दक्षिणेन धृताऽभयाः । अम्बुजाड्यकरोभानुर्दंष्ट्राभीममुख शनिः ।११ राहुविकृतवक्त्रः स्यात्केतुः स्याद्विहिताञ्जलिः । लोकपालास्ततः पूज्या वज्राद्यस्रैः सह क्रमात् ।१२ एवं सिद्धमनुर्मंत्री सम्पदां वसतिर्भवेत् । हृत्पुण्डरीकमध्यस्थं तारविभूषितम् ।१३ तारापतिं स्मरन्मंत्री त्रिसहस्रं मनु जपेत् । राज्यैश्वर्यं दरिद्रोऽपि प्राप्नुयाद्वत्सरान्तरे ।१४ पूर्वोक्तसंख्यं प्रजपेत् शशिनं मूर्ध्नि चिन्तयन् । रोगापमृत्युदुःखानि जित्वा वर्षशतं वसेत् ।१५ ब्रह्मचर्यरतः शुद्धश्चतुलंक्षमिमं जपेत् । निधानंभुगतं सद्यः प्राप्नुयाद्यत्नवर्जित ।१६ अपने प्रियतम में समासक्त मन वाली ओर मदके विभ्रर्मों से मन्थर जरोजाक्षी ओर चन्द्र विम्व के समान मुखों वालियों का भली भाँति अभ्यर्चन करना चाहिए ।८। रवि, मङ्गल, बुध, शनि, गुरु, राहु, शुक्र, केतु ये ग्रह दलों के अग्र भागों में पूजने चाहिए ।६। ये स्वर्णवर्णों वाले वस्त्रों से संजित हैं और अपने नाम के आद्य वर्ण के बीजों वाले हैं। इनका वर्ण रक्त, पीत, अरुण, श्वेत, नील, धूम्र, सित और असित है ।१०। ये अपने वाम हस्त को वामोरु पर रखे हुए हैं और दाहिने हाथ में अभय दान धारण करने वाले हैं। भानु के करमें अम्बुज है-दाढ़ों से भयानक मुख वाला शनि है । विकृत मुख वाला राहु होता है । केतु अञ्जलिको विहित करने वाला है-इसके अनन्तर क्रम से वज्र आदि अस्त्रों के सहित पूजने चाहिए ।११२। इस रीति से मन्त्र सिद्ध करने वाला मन्त्रधारी सम्पदाओं का निवास स्थान हो जाता है। हृदय कमल के मध्य में स्थित, मुक्तहार से अलंकृत तारापति का स्मरण करता हुआ दो हजार मन्त्र का जप करे । तो दरिद्र पुरुष भी एक ही वर्ष के बीच में राज्य और ऐश्वर्य को प्राप्त कर लियाँ करता है ।१३।
द्वादश पटल ] [ २६७ । ४। मस्तक में चन्द्र का चिन्तन करते हुए पूर्व कथित संख्या में जप करे तो वह रोग—अपमृत्यु और दुःखों को जीतकर सौ वर्ष तक स्थित रहा करता है । १५। ब्रह्मचर्य से रत होकर शुद्ध होवे और इसका चार लाख जप करे तो यत्न रहित होते हुए भी भूमि में रहने वाले निधान को तुरन्त ही प्राप्त कर लेता है ।१६। जितेन्द्रियो जपेन्मंत्रं पौर्णमास्यां विशेषतः । भवेत्सौभाग्यनिलयः सम्पदामपरोनिधि ।१७ घोरान् ज्वरान् शिरोरोगानभिचारानुपद्रवान् । विष,णमपि संघातं नशियेन्मनुनाऽमुना ।१८ पूर्णमास्या निराहारो दद्यादर्घं विदूदये । प्राक्प्रत्यगायतं कुर्याद्भूतले मण्डलत्रयम् ।१६ निषण्णः पश्चिमे मन्त्री मण्डले विहितासने । मध्यस्थे स्थापयेत्पश्चात् पूजाद्रव्याण्यशेषतः ।२० अन्यस्मिन्मण्डले सोममर्चयित्वाम्बुलान्विते । राजतं चषकं तत्र स्थापयेत् पुरतः सुधीः ।२१ गोदुग्धेन समापूर्य स्पृष्ट्वा तं प्रजपेन्मनुम् । अष्टोत्तरशतं पश्चाद्विद्यामन्त्रेण देशिकः ।२२ दद्यादर्घं शशाङ्काय सर्वकार्यार्थसिद्धये । अनेन विधिना कुर्यात्प्रतिमासमहतन्द्रितः ।२३ मन्त्र का जप जितेन्द्रिय होकर करे और विशेष रुप से पौर्णमासी में करे तो वह सौभाग्यका स्थान हो जाता है और सम्पदाओं का दूसरा निधि ही बन जाया करता है ।१७। इस मन्त्र के द्वारा घोर ज्वर-शिरो रोग-अभिचार-उपद्रव विषों के संघानों का विनाश कर दिया करता है ।१८। पौर्णमासी में निराहार रहकर चन्द्रोदय के समय में चन्द्रमाको अर्घ्य देवे । पूर्व और पश्चिममें भूतलायत तीनमण्डल बनावे ।१९। मन्त्रधारी मण्डल में विहित आसन पर पश्चिम में स्थित होवे । पीछे मध्य में सम्पूर्ण पूजा ने द्रव्यों को स्थापित करे ।२०। अम्बुजान्वित
२६८ ] [ श्रीशारदा तिलक अन्य मण्डल में सोम का अर्चन करके सुधी को चाँदी से निर्मित चषक से वहाँपर आगे स्थापित करना चाहिये ।२१। गायके दूध से समापूरित करके उसका स्पर्श करे और इस मन्त्र का जप करे । पीछे एक सौ आठ विद्या तन्त्र के द्वारा आचार्य चन्द्रमा के लिए सब कार्यों की विधि के लिये अर्घ्य देवे । इसी विधिसे प्रत्येक मासमें अतन्द्रित रहकर करना चाहिये ।२२-२३। षण्मासाभ्यन्तरे सिद्धि साधकेन्द्रः समश्नुते । प्रियमत्पूर्जितान् पुत्रान् सौभाग्यं पुष्कलं यशः ।२४ कन्याभिष्टामवप्नोति कन्यापि वरमाप्नुयात् । वहुना किमिहोक्तेन सर्व दद्यान्निशापतिः ।२५ विद्ये विद्यामालिनति स्याच्चन्द्रिण्यन्ते ततो भवेत् । पुनश्चन्द्रमुखिस्वाहा विद्यामन्त्र उदाहृतः । २६ ततोघृणिर्भृ गः पश्चाद्वामकर्णविभूषितः । वह्न्यासनेामरुच्छेषेः ससुत्रोत्रिस्त्यपश्चिमः ।२७ अष्टाक्षरोमनुःप्रोक्तोभानोरभिमतप्रदः । देवनागोमुनिः प्राक्तोगायत्री छन्द ईरितम् ।२८ आदित्यो देवता प्रोक्तोदृष्टादृष्टफलप्रदः । सत्याय हृदयं प्रोक्तं ब्रह्मणे शिर ईरितम् ।२६ इससे छै मास के अन्दर ही साधक सिद्धियों प्राप्तकर लिया करता है । श्री-अत्यन्त ऊर्जित पुत्र-सौ भाग्य-पुष्कल यश-अभीष्ट कन्या और कन्या भी अभीष्ट वर की प्राप्ति करती है। बहुत अधिक कथन से क्या लाभ है यही पर्याप्त है कि चन्द्रदेव सभी कुछ दे दिया करते हैं। ।२४-२५। मन्त्रका उद्धार बताया जाता है-विद्ये विद्यामालिनि- चन्द्रिणि चन्द्रमुखि स्वाहा-यह विद्या मन्त्र बताया गया है ।२६। अब- सूर्य का मन्त्र बताया जाता है-घृणि-वह स्वरूप है, भृगु-सः नाम वर्ण-ऊ-इससे भूषित अर्थात् 'सू'-मरुन - यकार, वह्नि-रेफ के आसन वाला अर्थात् जिस पर रकार हो, शेष-ना, सेमेघ इकार युक्त
द्वादश पटल ] | २६६ अ.त्रद, स्य अन्तिम होता है। यह भानुदेय का अभिमत का प्रदाता आठ अक्षरों वाला मन्त्र बताया गया है। कल्याण हृदय कहा है और ब्रह्मणे शिर कहा गया है। २७-२६। विष्णवे स्याच्छिखा वर्म रुद्राय परिकीर्तितम् । अग्नयेनेत्रमाख्यातं शर्वाययास्त्रमुदीरितम् । ३० तेजोज्वालामणिहुंफट्द्विठान्ताः पृथगीरिताः । अंगमन्त्रान्विन्यस्येत्पञ्च मूर्तीर्यथाक्रमम् । ३१ आदित्यं विन्यसेन्मूर्ध्नि रविं मुखगतं न्यसत् । हृदये भानुनामनं भास्करं गुह्यदेशतः । ३२ सूर्य चरणयोर्न्यस्येद्व्रस्वैः सद्यादिपञ्चभिः । प्रधानमूर्तिप्रतिमाःसर्वाभरणभूषिताः । ३३ मूर्द्धास्यकण्ठहृदयकुक्षिनाभिध्वजाङ्घ्रिषु । मन्त्रवर्णान् न्यसेक्यो प्रत्येकं प्रणवादिकान् । ३४ विष्णवे - यह शिखा है, रुद्राय - वह वर्म कीर्तित किया गया है। अन्नेये नेत्र कहा है और शर्वाय अस्त्र होता है। दो ठकार और स्वाहा है, तेजो ज्वाला मणिहूँ फट् - यह होता है। फिर अङ्ग मन्त्रोंका न्यास करना चाहिये और यथा क्रम पाँच मूर्तियों का करे । ३०-३१। आदित्य का मूर्धा में विन्यास करे और रवि का मुख में न्यास करे। हृदम में भानु का और भास्कर का गुह्य देश में न्यास करना चाहिये । ३२। सूर्य, का चरणों में सद्यादि पाच व्याहृतियोंहैके साथ न्यास करे। प्रधान मूर्ति की प्रतिमायें सग आभरणों से भूषित हों । ३३। मूर्धा, मुख, कण्ठ हृदय, कुक्षि, नाभि, ध्वज और चरणोंमें प्रणव जिसके आदिमें होवे ऐसे प्रत्येक मन्त्र के वर्णों का न्यास करना चाहिए। ३३-३४। एवं न्यस्यशरीरोऽसौ चिन्तयेत्तेजसांनिधिम् । ३५ रक्ताब्जयुग्माऽभयदानहस्तं केयूरहारांगदभूषणाढ्यम् । मणिक्यमौलिं दिननाथमीडे बन्धूककान्ति विलसत्त्रिनेत्रम् । ३६
२७० ] [ श्रीशारदा तिलक वसुलक्षं जपेन्मंत्र समिद्भिः क्षीरशाखिनाम् । तत्सहस्रं प्रजुहुयात् क्षीराक्ताभिर्जितेन्द्रियः । ३७ पीठस्य क्लृप्तेः प्रथमं दिक्षु मध्ये च संयजेत् । प्रभूतं विमलं सारं समाराध्यमनन्तरम् । ३८ परमादिसुखं पीठं स्वम्बिान्तं प्रकल्पयेत् । दीप्तः सूक्ष्मा जया भद्रा विभूतिर्विमला पुनः ।.६। अमोघा विद्युता सर्वतोमुखी पीठशक्तयः । दीप्तदीपशिखाकारा बीजान्यासां विदुः क्रमात् ।४० इस तरह से शरीर में न्यास किया हुआ साधक तेजों के निधि का चिंतन करे । ३५। ध्यान-हाथों में रक्त कमलो का जोड़ा और अभय- दान धारण करने वाले केयूर-अङ्गद हार आदि भूषणों से अन्वित- मस्तक में माणिक्य धारी-बन्धूक पुष्प के समान कांति वाले-तीन नेत्रों से भूषित दिन नाथ का मैं स्तवन करता हूँ । ३६। दूधवाले वृक्षोंकी समिधाओं से आठ लाख मन्त्र का जप करके एक सहस्र का होम करे । क्षीर से अवन समिधाओं से तन्द्रा रहित होकर हवन करना चाहिये । ३७। क्लृप्त पीठ के प्रथम दिशाओं में और पीछे मध्य में यजन करे । अनन्तर में प्रभूत, विमल और सार का समाराधन करके अपने विम्बके अन्त में परमादि सुख पीठ की कल्पना करनी चाहिए । पीठ शक्तियोंके नामों का परिगणन किया जाता है-दीप्ता, सूक्ष्मा, जया, मुद्रा, विभूति, विमला, अमोघा, विद्युता, और सर्वतोमुखी-ये पीठ शक्तियाँ होती हैं । क्रम से बीजन्यास दीप्त दीप की शिखा के आकार वाली का जानना चाहिए । ३८-४०। अक्लीवह्रस्वत्रितस्वरान् बिन्दुग्निसंयुतान् । वदेत्पदं चतुर्थ्यन्तं ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम् । ४१ सौराय योगपीठाय तमः पदमनंतरम् । पीठमंत्रोऽयमाख्यातो दिनेशस्य जगतपतेः ।४२
द्वादश पटल ] [ २७१ तारादि खं खखोल्काय मनुना मूत्तिकल्पना । साक्षिणः सर्वलोकानां तस्यामावाह्य पूजयेत् ।४३ अङ्गानि पूजयेदादौ दिक्पत्रेष्वर्क्रमूर्त्तयः । आदित्याद्याश्चतस्रोऽर्च्य्याः शक्तयः कोणपत्रगाः ।४४ स्वस्वनामादिवर्णाः स्युस्तासां बीजान्यनुक्रमात् । उषा प्रज्ञा संध्या शक्तयः परिकीर्त्तिताः ।४६ पत्राग्रसंस्था ब्राह्मण्याः पुरयोऽरुणमर्चयेत् । चंद्रादानर्चयेत्पश्चाद्ग्रहानष्टौ ततो वहिः ।४७ इन्द्रादींश्च तदीस्त्राणि यथा पूर्वं समर्चयेत् । एव संपूज्य विधिवद्भास्करं भक्तवत्सलम् ।४८ दद्यादर्घं प्रतिदिनं वारे वा तस्य चोदिते । प्रभाते मण्डल ं कृत्वा पूर्वत्पीठमर्चयेत् ।४६ पात्र ं ताम्रमयं प्रस्थतोयग्राहि मनोहरम् । निधाय तत्र मनुना पूरयेत्तच्छुभोदकैः ।५० ह्रस्व त्रियत-अ,इ,उ इन स्वरोंको जो बिन्दु और अग्नि अर्थात् रेफ से संयुत होवे । ब्रह्मा-विष्णु और शिवके स्वरूपवाले पदको चतुर्थीकेअं त वालाबोले । इसके अनन्तर-सौरया योगपीठाय नमः यहबोलना चाहिए। यह जगतपति दिनेश्वर का पीठ मन्त्र बताया गया है।४१-४२। खखो- ल्काययह स्वरूप है-जिसमें प्रणव आदिमें हो ऐसा खं यह मंत्र है । इससे मूर्त्ति की कल्पना करनी चाहिए । उसमें सब लोकोंके साक्षी का आवा- हन करके पूजन करना चाहिए ।४३। आदि में अङ्गों का पूजन करे ओर दिशाओं के पत्रों में अर्क देव की मूर्तियों का यजन करना चाहिए । आदित्य आदि कोणों के पत्रोंमें स्थित चारों का अर्चन करना चाहिये । ।४४। उन मूर्त्तियों के बीज अनुक्रम से अपने-अपने नामों के आदि वर्ण होते हैं । तथा प्रज्ञा,प्रभा-संध्या, ये शक्तियां बतलायी गयीहै ।४६। पत्रों के अग्र भागों में विराजमान ब्राह्मणी आदि हैं । आगे अरुण का अर्चन करे । पीछे चन्द्रादि आठ ग्रहों को बाहिर समन्वित करनी चाहिए ।४७।
२७० ] [ श्रीशारदा तिलक वसुलक्षं जपेन्मंत्र समिद्भिः क्षीरशाखिनाम् । तत्सहस्रं प्रजुहुयात् क्षीराक्ताभिर्जितेन्द्रियः । ३७ पीठस्य कॢप्तेः प्रथमं दिक्षु मध्ये च संयजेत् । प्रभूतं विमलं सारं समाराध्यमनन्तरम् । ३८ परमादिसुखं पीठं स्वम्व्रान्तं प्रकल्पयेत् । दीप्तः सूक्ष्मा जया भद्रा विभूतिर्विमला पुनः । ३६। अमोघा विद्युता सर्वतोमुखी पीठशक्तयः । दीप्तदीपशिखाकारा बीजान्यासां विदुः क्रमात् ।४० इस तरह से शरीर में न्यास किया हुआ साधक तेजों के निधि का चिंतन करे । ३५। ध्यान-हाथों में रक्त कमलों का जोड़ा और अभय- दान धारण करने वाले केयूर-अङ्गद हार आदि भूषणों से अन्वित- मस्तक में माणिक्य धारी-बन्धूक पुष्प के समान कांति वाले-तीन नेत्रों से भूषित दिन नाथ का मैं स्तवन करता हूँ । ३६। दूधवाले वृक्षोंकी समिधाओं से आठ लाख मन्त्र का जप करके एक सहस्र का होम करे । क्षीर से अवत समिधाओं से तन्द्रा रहित होकर हवन करना चाहिये । ३७। कॢप्त पीठ के प्रथम दिशाओं में और पीछे मध्य में यजन करे । अनन्तर में प्रभूत, विमल और सार का समाराधन करके अपने विम्बके अन्त में परमादि सुख पीठ की कल्पना करनी चाहिए । पीठ शक्तियोंके नामों का परिगणन किया जाता है-दीप्ता, सूक्ष्मा, जया, मुद्रा, विभूति, विमला, अमोघा, विद्युता, और सर्वतोमुखी-ये पीठ शक्तियाँ होती हैं । क्रम से बीजन्यास दीप्त दीप की शिखा के आकार वाली का जानना चाहिए । ३८-४०। अक्लीबह्रस्वत्रितस्वरान् बिन्द्वग्निसंयुतान् । वदेत्पदं चतुर्थ्यन्तं ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम् ।४१ सौराय योगपीठाय तमः पदमनंतरम् । पीठमंत्रोऽयमाख्यातो दिनेशस्य जगत्पतेः ।४२
द्वादश पटल ] [ २७१ तारादि खं खखोल्काय मनुना मूर्तिकल्पना । साक्षिणं सर्वलोकानां तस्यामावाह्य पूजयेत् ।४३ अङ्गानि पूजयेदादौ दिक्पत्रेष्वर्कमूर्त्तयः । आदित्याद्याश्चतस्रोऽर्च्यः शक्तयः कोणपत्रगाः ।४४ स्वस्वनामादिवर्णाः स्युस्तासां बीजान्यनुक्रमात् । उषा प्रज्ञा संध्या शक्तयः परिकीर्तिताः ।४६ पत्राग्रसंस्था ब्राह्मण्याः पुरयोऽरुणमर्चयेत् । चंद्रादानर्चयेत्पश्चाद्ग्रहानष्टौ ततो बहिः ।४७ इन्द्रादींश्च तदीस्त्राणि यथा पूर्वं समर्चयेत् । एव संपूज्य विधिवद्भास्करं भक्तवत्सलम् ।४८ दद्यादर्घं प्रतिदिनं वारे वा तस्य चोदिते । प्रभाते मन्डल' कृत्वा पूर्वत्पीठमर्चयेत् ।४६ पात्रं ताम्रमयं प्रस्थतोयग्राहि मनोहरम् । निधाय तत्र मनुना पूरयेत्तच्छुभोदकैः ।५० ह्रस्व त्रियत-अ,इ,उ इन स्वरोंको जो बिन्दु और अग्नि अर्थात् रेफ से संयुत होवे । ब्रह्मा-विष्णु और शिवके स्वरूपवाले पदको चतुर्थीकेअंत वालाबोले । इसके अनन्तर-सौराय योगपीठाय नमः यहबोलना चाहिए। यह जगतपति दिनेश्वर का पीठ मन्त्र बताया गया है।४१-४२। खखो- ल्काययह स्वरूप है-जिसमें प्रणव आदिमें हो ऐसा खं यह मंत्र है । इससे मूत्ति की कल्पना करनी चाहिए । उसमें सब लोकोंके साक्षी का आवा- हन करके पूजन करना चाहिए ।४३। आदि में अङ्गों का पूजन करे और दिशाओं के पत्रों में अर्क देव की मूर्तियों का यजन करना चाहिए । आदित्य आदि कोणों के पत्रोंमें स्थित चारों का अर्चन करना चाहिये । ।४४। उन मूर्त्तियों के बीज अनुक्रम से अपने-अपने नामों के आदि वर्ण होते हैं । तथा प्रज्ञा,प्रभा-संध्या, ये शक्तियां बतलायी गयीहै ।४६। पत्रों के अग्र भागों में विराजमान ब्राह्मणी आदि हैं । आगे अरुण का अर्चन करे । पीछे चन्द्रादि आठ ग्रहों को बाहिर समन्वित करनी चाहिए ।४७।
२७२ ] [ श्रीशारदा तिलक इन्द्र आदि ओर उनके अस्त्रों का पूर्व की तरह से समर्चन करे । उस प्रकार से भक्तों पर दया करने वाले भास्कर देव का विधि के साथ पूजन करके प्रतिदिन अर्घ्यदेवे अथवा उनके प्रेरित वार (दिन) में देवे । प्रभात से मण्डल की रचना करके पूर्व की तरह ही पीठ का अर्चन करना चाहिये ।४८-४६। ताम्रगण प्रस्थ से जल का ग्रहण करने वाले- मनोहर पात्र को वहाँ पर रखकर उसे मन्त्र द्वारा शुभ जल से भर देवे ।५०। कुंकुमं रोचना राजी रक्तचन्दनवैणवान् । करवीरजपांशालिकुशश्यामाकतण्डुलान् ।५१। निक्षिपेत्सलिले तस्मिन्नेकग्रं सञ्चिन्त्य भानुना । सांगमभ्यर्चयेत्तस्मिन् भास्करं प्रोक्तलक्षणम् ।५२ गन्धपुष्पादिनैद्यैर्यथाविधि विधानवित् । तत्पिधाय जपेन्मन्त्रं सम्यगष्टोत्तर शतम् ।५३ पुनः संपूज्य गन्धाद्यैर्जानुभ्यामवनि गतः । आमस्तकं तदुद्धृत्य व्योम्नि सावरणं रवौ ।५४ दृष्टि निधाय स्वैक्येन मूलमन्त्रं धिया जपन् । दद्यादर्थं दिनेशाय प्रसन्नेनान्तरात्मना ।५५ कृत्वा पुष्पाञ्जलि भूयोजपेदष्टोत्तरं शतम् । यावदर्घ्यामृतं भानुः समादत्ते निजैः करैः ।५६ उनमें कुंकुम, रोचना, राजी, रक्त, चन्दन, वैष्णव, करवीर, जपा, शाली, कुश, श्यामा तण्डुलों का निक्षेप कर देवे । उस जल में भानु के साथ एकता का चिन्तन करना चाहिये । उसमें कहे हुये लक्षणों वाले भास्कर का अङ्गों के सहित अर्चन करना चाहिये ।५१-५२। विधान का ज्ञाता तथा गन्ध-पुष्प और नैवेद्य आदि से अर्चन करे । उसको ढककर भली भाँति एक सौ आठ बार मन्त्र जप करना चाहिए ।५३। फिर गन्धादिके द्वारा पूजनकरके घुटनोंसे पृथ्वीपर स्थित होवे । मस्तक तक उसका उद्धार करके व्योम में सावरण दृष्टि रखकर