शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
द्वादश पटल ] [ २७१ तारादि खं खखोल्काय मनुना मूर्तिकल्पना । साक्षिणं सर्वलोकानां तस्यामावाह्य पूजयेत् ।४३ अङ्गानि पूजयेदादौ दिक्पत्रेष्वर्कमूर्त्तयः । आदित्याद्याश्चतस्रोऽर्च्यः शक्तयः कोणपत्रगाः ।४४ स्वस्वनामादिवर्णाः स्युस्तासां बीजान्यनुक्रमात् । उषा प्रज्ञा संध्या शक्तयः परिकीर्तिताः ।४६ पत्राग्रसंस्था ब्राह्मण्याः पुरयोऽरुणमर्चयेत् । चंद्रादानर्चयेत्पश्चाद्ग्रहानष्टौ ततो बहिः ।४७ इन्द्रादींश्च तदीस्त्राणि यथा पूर्वं समर्चयेत् । एव संपूज्य विधिवद्भास्करं भक्तवत्सलम् ।४८ दद्यादर्घं प्रतिदिनं वारे वा तस्य चोदिते । प्रभाते मन्डल' कृत्वा पूर्वत्पीठमर्चयेत् ।४६ पात्रं ताम्रमयं प्रस्थतोयग्राहि मनोहरम् । निधाय तत्र मनुना पूरयेत्तच्छुभोदकैः ।५० ह्रस्व त्रियत-अ,इ,उ इन स्वरोंको जो बिन्दु और अग्नि अर्थात् रेफ से संयुत होवे । ब्रह्मा-विष्णु और शिवके स्वरूपवाले पदको चतुर्थीकेअंत वालाबोले । इसके अनन्तर-सौराय योगपीठाय नमः यहबोलना चाहिए। यह जगतपति दिनेश्वर का पीठ मन्त्र बताया गया है।४१-४२। खखो- ल्काययह स्वरूप है-जिसमें प्रणव आदिमें हो ऐसा खं यह मंत्र है । इससे मूत्ति की कल्पना करनी चाहिए । उसमें सब लोकोंके साक्षी का आवा- हन करके पूजन करना चाहिए ।४३। आदि में अङ्गों का पूजन करे और दिशाओं के पत्रों में अर्क देव की मूर्तियों का यजन करना चाहिए । आदित्य आदि कोणों के पत्रोंमें स्थित चारों का अर्चन करना चाहिये । ।४४। उन मूर्त्तियों के बीज अनुक्रम से अपने-अपने नामों के आदि वर्ण होते हैं । तथा प्रज्ञा,प्रभा-संध्या, ये शक्तियां बतलायी गयीहै ।४६। पत्रों के अग्र भागों में विराजमान ब्राह्मणी आदि हैं । आगे अरुण का अर्चन करे । पीछे चन्द्रादि आठ ग्रहों को बाहिर समन्वित करनी चाहिए ।४७।
२७२ ] [ श्रीशारदा तिलक इन्द्र आदि ओर उनके अस्त्रों का पूर्व की तरह से समर्चन करे । उस प्रकार से भक्तों पर दया करने वाले भास्कर देव का विधि के साथ पूजन करके प्रतिदिन अर्घ्यदेवे अथवा उनके प्रेरित वार (दिन) में देवे । प्रभात से मण्डल की रचना करके पूर्व की तरह ही पीठ का अर्चन करना चाहिये ।४८-४६। ताम्रगण प्रस्थ से जल का ग्रहण करने वाले- मनोहर पात्र को वहाँ पर रखकर उसे मन्त्र द्वारा शुभ जल से भर देवे ।५०। कुंकुमं रोचना राजी रक्तचन्दनवैणवान् । करवीरजपांशालिकुशश्यामाकतण्डुलान् ।५१। निक्षिपेत्सलिले तस्मिन्नेकग्रं सञ्चिन्त्य भानुना । सांगमभ्यर्चयेत्तस्मिन् भास्करं प्रोक्तलक्षणम् ।५२ गन्धपुष्पादिनैद्यैर्यथाविधि विधानवित् । तत्पिधाय जपेन्मन्त्रं सम्यगष्टोत्तर शतम् ।५३ पुनः संपूज्य गन्धाद्यैर्जानुभ्यामवनि गतः । आमस्तकं तदुद्धृत्य व्योम्नि सावरणं रवौ ।५४ दृष्टि निधाय स्वैक्येन मूलमन्त्रं धिया जपन् । दद्यादर्थं दिनेशाय प्रसन्नेनान्तरात्मना ।५५ कृत्वा पुष्पाञ्जलि भूयोजपेदष्टोत्तरं शतम् । यावदर्घ्यामृतं भानुः समादत्ते निजैः करैः ।५६ उनमें कुंकुम, रोचना, राजी, रक्त, चन्दन, वैष्णव, करवीर, जपा, शाली, कुश, श्यामा तण्डुलों का निक्षेप कर देवे । उस जल में भानु के साथ एकता का चिन्तन करना चाहिये । उसमें कहे हुये लक्षणों वाले भास्कर का अङ्गों के सहित अर्चन करना चाहिये ।५१-५२। विधान का ज्ञाता तथा गन्ध-पुष्प और नैवेद्य आदि से अर्चन करे । उसको ढककर भली भाँति एक सौ आठ बार मन्त्र जप करना चाहिए ।५३। फिर गन्धादिके द्वारा पूजनकरके घुटनोंसे पृथ्वीपर स्थित होवे । मस्तक तक उसका उद्धार करके व्योम में सावरण दृष्टि रखकर
द्वादश पटल ] [ २७३ मूल मन्त्र का आन्तरिक एकता से जप करे । फिर दिनेश्वर के लिये अर्घ्य देवे और अन्तरात्मा में परम प्रसन्न होकर ही देवे ।५४-५५ फिर पुष्पाञ्जलि देकर पुनः अष्टोत्तर शत मन्त्र का जप करना चाहिए जब तक सूर्य अपने करों से अर्घ्य के अमृत का समाधान करे तब तक करे । ५६। तेन तृप्तो दिनमणिर्दद्यादस्मै मनोरथान् । अर्घदानमिदं पुंसामायुरारोग्यवर्द्धनम् ।५७ धनधान्यपशुक्षेत्रपुत्रमित्रकलत्रम् । तेजोवीर्ययशः कान्तिविद्याविभवभाग्यदम् ।५८ आकाशमग्निदीर्घेन्दुसंयुक्तं भुवनेश्वरी । सर्गान्वितोभृगुर्भानोस्त्रयक्षरो मनुरोरितः ।५६ आधारादिपदाग्रान्तं कण्ठाधारकावधि ! मूर्द्धादिकण्ठपर्यन्तं क्रमाद्वीजत्रयं न्यसेत् । षड् दीर्घवरयुक्तेन मध्ययेनाङ्गक्रिया मता ।६० रक्ताम्बुजासनमशेषगुणैकसिन्धुं भानुं समस्तजगतामधिपं भजामि । हृद्मद्ध्याभयवरान् दधतं कराब्जेर्माणिक्यमौलिमरुणाङ्गरुचिं त्रिनेत्रम् ।६१ उससे सन्तुष्ट होकर दिनमणि इस लिये मनोरथों को दिया करते हैं । यह अर्घ्यदान पुरुषों को आयु और आरोग्य के बढ़ाने वाला होता है । ५७। इससे धन-धान्य, पशु, क्षेत्र, पुत्र, मित्र, कलत्र की प्राप्ति हुआ करती है और यह तेज, वीर्य, यश, क्रान्ति, विद्या, विभव और भाग्य का देनेवाला होता है । ५८। अब प्रयोजन तिलक मन्त्र बताया जाताहै- आकाश, हकार, अग्नि, रेफ, दीर्घ बिन्दुके सहित था, भुवनेश्वरी-विसर्गों से समन्वित भृगु-सः, यह भानु का तीन अक्षरों वाला मन्त्र है ऐसा कहा गया है । ५६। आधार से आदि लेकर पादोंके अग्रभाग के अन्त तक तथा कण्ठ से आधार की अवधि पर्यन्त-मूर्द्धा से आदि लेकर कण्ठ पर्यन्त
२७४ ] [ श्रीशारदा तिलक क्रम से तीनों बीजों का न्यास करना चाहिये । षट् दीर्घस्वर स युक्त मध्य से अङ्ग क्रिया मानी गयी है ।६०। अब ध्यान कहा जाता है- रक्त अम्बुज के आसन वाले, सम्पूर्ण गुणों का एक महासागर, समस्त जगतों का स्वामी, करकमलों में दो पद्म, वर और अभयदान को धारण करती हुई, मस्तक में माणिक्य रखने वाले, अरुण अङ्ग रुचि से सम- न्वित, तीन नेत्रों के धारण करने वाले भानुदेव का मैं भजन करता हूँ अर्थात् यजन करता हूँ ।६१। भानुलक्षं जपेन्मन्त्रमन्त्राज्येन दशांशतः । तिलैर्वा मधुरासिक्तै र्जुहुयाद्विजितेन्द्रियः ।६२ पूर्वोक्ते पूजयेत्पीठे विधानंनामुना रविम् । प्रथमावृत्तिरङ्गैः स्यात् परा चन्द्रादिभिर्ग्रहैः ।६३ तृतीया लोकपालैः स्याच्चतुर्थी स्यात्तदायुधैः । इति संपूज्य निर्माल्यं तेजश्चन्द्राय दीयताम् ।६४ अर्घं प्रागीरितं दद्याद्भानवे संयतेन्द्रियः । सोऽपि रत्नं धनं धान्यं पुत्रपौत्रान्पशूंस्तथा ।६५ वस्त्राणि भूषणादीनि दद्यादस्मै न संशयः । आकाशमग्निपवनसद्यान्तोऽधीशबिन्दुमत् ।६६ मार्त्तण्डभैरवं नाम बीजमेतदुदोहृतम् । पुटितं विम्बबीजेन सर्वकामफलप्रदम् ।६७ ठान्तं दहननेत्रेन्दुसहित तदुदीरितम् । पञ्चह्रस्वाद्यबीजेन पञ्चमूर्त्ति प्रविन्यसेत् ।६८ बारह लाख मन्त्र का जप करे । इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने वाला जप का दशांश घृत से अथवा मधुर से अक्त तिलों से होम करना चाहिए । इसी विधान से पूर्वमें कथित पीठ में रवि का अभ्यर्चन करे । प्रथम आवृत्ति अंगों से होती है और परा आवृत्ति चन्द्र प्रभृति ग्रहों से होती है ।६२-३३, तीसरी आवृत्ति लोक पालों से की जाती है तथा चौथी आवृत्ति उन लोक पालो के आयुधों से होती है । इस रीति से भली भांति पूजन करके निर्माल्य और तेज चन्द्र के लिये देवे ।६४।
द्वादश पटल ] [ २७५ सप्त इन्द्रियों वाला होकर भानु देव के लिये पूर्व में वर्णित अर्घ देना चाहिये । वह भी रत्न, धान्य, पुत्र, पौत्र तथा पशुओं को और वस्त्र और भूषण आदि इसके लिये दे दिया करते हैं-इसमें लेश मात्र भी संशय नहीं है । अब मार्त्तण्ड भैरवी बीज बतलाया जाता है-आकाश- हः, अग्नि-रेफ, पवन-यः, सद्यान्त-ओ, अधीश-ऊः जो बिन्दु से संयुत होता है-यह मार्त्तण्ड भैरव नामक बीज कहा गया है। यह विम्ब बीज के साथ सम्पुटित किये जाने पर सब मनोरथों के फल का प्रदान करने वाला हुआ करता है ।६७। टान्त-ठः, दहन-रेफ, नेत्र-इ, बिन्दु से सहित होवे अर्थात् अनुस्वार से समन्वित होवे ऐसा यह कहा गया है । पाँच ह्रस्वाद्य बीज से पंच मूर्ति का विन्यास करना चाहिए ।६८। मध्यमादिकनिष्ठान्तमङ्गुलीषु क्रमादिकाः । सूर्याख्यो भास्करो भानुस्तथा रविदिवाकरौ ।६६ शिरोवदनहृद्गुह्यपाददेशे तु ताः पुनः । दीर्घ युक्तेन बीजेन नेत्रान्ताङ्गानि विन्यसेत् । व्यापकं मूलबीजेन कुर्वीत तदनन्तरम् ।७० हेमाम्भोजप्रवालप्रतिमनिजरुचि चारुखट्वाङ्गपद्मे । चक्रं शक्तिं च पाशं सृणिमतिरुचिरामक्षमालां कपालम् । हस्ताम्भोजैर्दधानं त्रिनयनविलसद्देववक्त्राभिरामम् । मार्त्तण्डं वल्लभाद्धं फणिमयमुकुट हारदीप्तं भजामः ।७१ लक्षत्रयं जपेन्मन्त्री बीजं बिम्बपुटीकृतम् । दशांशं कमलैः फुल्लैर्जुहुयान्मधुरीक्षितैः ।७२ पीठे दीप्तादिभिर्युक्तैः कर्णिकायामुषादिकाः । पूर्वादिदिक्षु संपूज्य मूर्तिं मूलेन कल्पयेत् ।७३ मध्यमा से आदि लेकर कनिष्ठिका के अन्त तक अंगुलियों में क्रम से विन्यास करे । सूर्य्य भास्कर, भानु, रवि, दिवाकर फिरउनको शिर- मुख, हृदय, गुह्य और पादों के देश में दीर्घ युक्त बीज से नेत्रान्त अंगों का विन्यास करे । उसके अनन्तर मूल बीज से व्यापक न्यास करना चाहिए ।६६-७०। अब ध्यान बतलाते हैं-हेम, अम्भोज, प्रवाल के
२७६ ] [ श्रीशारदा तिलक सदृश अपनी कान्ति वाले-कर कमलों के द्वारा चारु खटाङ्ग, दो पद्म, चक्र, शक्ति पाश, सृणि, अतीव रुचिर अक्षों की माला-कपाल को धारण करते हुए तीन नेत्रों से शोभित चार मुखों से अभिराम-वल्लभाधं फणि मयमुकुट से अन्वित तथा हार से देदीप्यमान भानु का हम भजन करते हैं ।७१। मंत्र को धारण करने वाला पुरुष इस बिम्बपुटीकृत बीज का तीन लाख जप करे । मधुर में उक्षित विकसित कमलों के द्वारा जप का दशांश होम करे । दीप्ता आदि से से युक्त पीठ में कर्णिका में उषादि का पूर्व आदि दिशाओं में भली भाँति अर्चन करके मूल मंत्र से मूत्ति की कल्पना करनी चाहिए ।७२-७३। आवाह्य पूजयेद्देवं वक्ष्यमाणविधानतः । सूर्यादींश्चतुरोदिक्षु विदिक्ष्वन्यं समर्चयेत् ।७४ अङ्गपूजा यथापूर्वं नेत्रमीशानदिग्गतम् । ग्रहानष्टौ ततो बाह्ये लोकपालांस्ततः परम् ।७५ अर्घप्रधानं प्रजपेन्मन्त्री मार्त्तण्डभैरवम् । इतिसिद्धमनुमन्त्री साधयेदिष्टमात्मनः ।७६ शाल्याज्यतिलबिल्वानां लक्षहोमाद्भवेन्निधिः । राजवृक्षसमुद्भूतैः पुष्पैर्होमोरमाकरः ।७७ जपाकुसुमहोमेन वशयत्यचिरात्नृपान् । मातुलिङ्गफलैर्हुत्वा धनमिष्टं लभेत सः ।७८ आवाहन करके आगे कहे गये विधानसे देव का यजन करे । चारों दिशाओंमें सूर्यादिक का तथा विदिशाओंमें अन्य का समर्चन करे ।७४। पूर्व की तरह अङ्गार्चन करे और ईशान दिशा में स्थित नेत्र का फिर बाह्य में आठ ग्रहों का और उनके आगे लोक पालों का पूजन करे । मंत्रधारी अर्धप्रधान मार्त्तण्ड भैरव का जप करे । इस प्रकार से मंत्र की सिद्धि करनेवाला मंत्रधारी अपने अभीप्सितका साधनकरे ।७५-७६। शाली-आज्य (घृत) तिलों की तथा विल्वों की एक लाख आहुतियों के देने से निधि हो जाया करती है । राज वृक्ष के समुद्भूत पुष्पों से किया
द्वादश पटल ] [ २७७ हुआ होम रमाके करने वाला है ।७७। जपा के पुष्पों से किया हुआ होम स्वरूप समय में ही मानवों को वश में कर दिया करता है। मातुलिङ्ग के फलों के द्वारा होम करके यह अभीष्ट धन का लाभ किया करता है।७८। इमं मन्त्रं जपन्मर्त्यः कान्ति पुत्रान्बलं द्युतिम् । वित्तर्द्धिममितां लक्ष्मीं सौभाग्यमपि साधयेत् ।७६ वियददर्धेन्दुसहितं तदादिः सर्गसंयुतः । अजपाख्यो मनुः प्रोक्तोद्व्यक्षरः सुरपादपः ।८० ऋषिर्ब्रह्मा स्मृतो देवी गायत्रीच्छन्दं ईरितम् । देवता जगतामादिः संप्रोक्तो गिरिजारतिः ।८१ हंसा षड्दीर्घयुक्तेन कुर्यादङ्गक्रियां मनोः ।८२ उद्यद्भानुस्फुरियतडिदाकणरमर्द्धाम्बिकेशम् । पाशाभीती वरदपरशु सन्दधानं कराग्रैः । दिव्याकल्पैरमृतमणिमयैः शोभितं विश्वमूलं । सौम्याग्नेयं वपुरवतु वश्चन्द्रचूडं त्रिनेत्रम् ।८३ इस मंत्र का जप करता हुआ मनुष्य कान्ति, पुत्रों, बल, द्युति, अमित वित्तकी ऋद्धि-लक्ष्मी और सौभाग्य का भी साधन किया करता है ।७६। अब आज्या मंत्र बतलाया जाता है-वियत्-हः, र्धेन्दु-विन्दु, तदादि-सः सर्ग अर्थात् विसर्गों से संयुत है-यह अजपा नाम वाला मंत्र कहा गया है जो दो अक्षरों का है और कल्प वृक्ष है अर्थात् मनोवा- ञ्छितों का प्रदाता होता है ।८०। इसका ऋषि ब्रह्मा, आदि स्मृति, गायत्री छन्द कहा गया है । उसका देवता जगतों का आदि गिरिजापति कहा गया है ।८१। षड् दीर्घ युक्त उससे मंत्र की अङ्ग क्रिया करनी चाहिए ।८२। अब ध्यान बतलाया जाता है-उदीयमान भानु और स्फुरण करती हुई विद्युल्लता के आकार से संयुत-अर्द्धाम्बिका के ईश- करों के अग्रभागों के द्वारा पाश, अभय वरदान और परशु को धारण
२७८ ] [ श्रीशारदा तिलक करते हुए मणिमय दिव्य कल्पों से शोभित, विश्व के मूल, सौम्याग्नेय, तीन नेत्रों से सयुत चन्द्रचूड का वपु आपकी रक्षा करे ॥८३॥ भानुलक्षं जपेन्मन्त्रं पायसेन ससर्पिषा । दशांश जुहुयात्सम्यक् ततः सिद्धो भवेन्मनुः ।८४ दीप्तादिपूजिते पीठे प्रागुक्ते पूजयेद्विभुम् । मूत्तिं मूलेन सङ्कल्प्य यजेदङ्गादिभिः सह ।८५ क्रतुं वसुं नरवरौ दिग्दलेषु विदिक्ष्वथ । अर्चयेहृतजां गोजामब्जाख्यामद्रिजां पुनः ।८६ लोकेश्वरांस्तदस्त्राणि पूजयेदेवमन्वहम् । अर्घं च विधिवद्दद्यात्प्राक् प्रोक्तेनैव वर्त्मना ।८७ मन्त्राद्यमातृकाङ्कपूर्णकुम्भं निधाय तम् । पिधाय वामहस्तेन न्यस्तमन्त्रेण संयतः ।८८ इस मन्त्र का बारह लाख जप करना चाहिए घृत से संयुत पायस से जप का दशांश होम करे फिर यह मन्त्र सिद्ध होजाया करता है ।८४ पूर्व में कथित दीप्त आदि से पूजित पीठ में विभु का अर्चन करे । मूल मन्त्र से मूत्ति की कल्पना करके फिर अंगादि के साथ यजन करना चाहिए।८५। क्रतु वसु और नरवरों का यजन करे । दिशाओं के दलों में और विदिशाओं में ऋतजा-गोजा-अन्जा और अद्रिजा का यजन करना चाहिये ।८६। प्रति दिन लोकेशों का तथा उसके आयुधोंका इसी भाँति पूजन करे। पूर्व में वर्णित विधान से ही विधि के साथ अर्थ देना चाहिए ।८७। मन्त्राद्य मातृका पद्म सम्पूर्ण उस कुम्भ को रखकर वाम कर से ढककर न्यास किये हुए मन्त्र द्वारा संयत होकर करे ।८८। अष्टोत्तरशतं मन्त्रं जपेत्तोयं सुधामयम् । स्मृत्वा तेनाभिषिञ्चेद्यं स भवेद्विगतामयः ।८६ आयुरारोग्यविकवानमिताल्लभते नरः । अनेनैव विधानेन विषार्त्तोनिर्विषो भवेत् ।६०
द्वादश पटल ] [ २७६ इन्दुभ्यां विगलत्सुधापरिचित मन्त्रान्त्यबीज ततः । प्राच्ये तत्परमामृतार्द्रशशिना ससिक्तमाद्यं स्मरन् । मन्त्री मन्त्रमिमं जपेद्विषगदोन्मादापमृत्यज्वरान् । जित्वा वर्षशतं विशिष्टविभवोजीवेत्सुखं बन्धुभिः ।६१ व्याहृतित्रयमग्निः स्ताज्जातवेद इहावह । सर्वकर्माणि संभाष्य साधयाग्निप्रियां ततः ।६२ ताराद्योय मन्ः प्रोक्तः पञ्चविंशतिवर्णवान् । ऋिषिर्भृगुर्भवेच्छन्दो गायत्रं देवताऽनलः ।६३ एक सौ आठ बार मन्त्र का जाप करे और उस जल को सुधा से परिपूर्ण स्मरण करके जिसका उससे अभिषिंचन करे वह विगत आमय (रोग) वाला हो जाया करता है ।८६। मनुष्य आयु-आरोग्य और अमित विभवों को लाभ किया करता है। इसी विधान के करने से विष से आत्तं मानव निर्विष हो जाया करता है ।६०। इन्दुओं से गल कर गिरने वाली सुधा से परिचित फिर मन्त्र का अन्तिम बीज-प्राच्य में उस पर अमृत में आर्द्र चन्द्र से संसिक्त आद्य का स्मरण करता हुआ मन्त्रधारी इस मन्त्र का जप करे तो विषगद-उन्माद-अपामृत्यु- ज्वरों को जीतकर विशिष्ट वैभव वाला होते हुए बन्धुओं के साथ सुख पूर्वक सौ वर्ष तक जीवित रहा करता है ।६१। व्याहृतियों का जप और अग्नि फिर जात-वेद इहावह। इसके पीछे 'सर्व कर्माणि' यह कहे । फिर 'साधय, -यह पद कहकर स्वाहा' कहे । इसके आदि में प्रणव होता है-यह ऐसा मन्त्र कहा गया है जिसमें पच्चीस वर्ण होते हैं। इसका ऋषि भृगु-छन्द गायत्र और इसका देवता अनल कहा गया है ।६२-६३। विभक्तैः पञ्चभिः षड्भिश्चतुर्भि पञ्चभिस्त्रिभिः । द्वाभ्यामङ्गक्रिया प्रोक्ता वर्णै मूलमनोः क्रमात् ।६४ अं सामक्तसुवर्णमाल्यमरुणस्रक्चन्दनालङकृतं । ज्वालापुञ्जजटाकलापविलसन्मौलि सुशुल्कांशुकम् ।
२८० ] [ श्रीशारदा तिलक शक्तिस्वस्तिकदर्भमुष्टिकजपस्रक्स्रुवाभीवरान् दोर्भिर्विभ्रतमञ्चितत्रिनयन रक्ताभमग्नि भजे ।६५ गुरोर्लब्धमनुर्मन्त्री चतुर्दश्यामुपोषितः । जपेद्भानुसहस्राणि शुद्धाचारोजितेन्द्रियः ।६६ अमावास्यादिने विप्रान् भोजयेन्मधुरोत्तरैः । भक्ष्यभोज्यैर्यथाशक्ति दद्यात्तेभ्योऽथदक्षिणाम् ।६७ भुक्त्वास्वयं समानीय होमद्रव्याणि शोधयेत् । अपरं दिनमारभ्यहोमं कुर्यादतन्द्रितः ।६८ मूल मंत्र के क्रम से विभक्त पाँच-छै-चार-पाँच-तीन- दो से अङ्ग क्रिया कही गयी है ।६४। अब ध्यान का क्रम कहा जाता है-असामक्त सुवर्णमाल्य से संयुत-अरुण सृक् और चन्दन से सम- लकृत ज्वाला के पुंज के सदृश जटाकलाप से शोभित मस्तक वाले शुक्ल वस्त्रधारी, करों, में शक्ति, स्वस्तिक, दर्भ मुष्टि, जप, माला- स्रुक्, स्रुव्, अभय और वरदानों को धारण किये हुए, तीन नेत्रों से आंचित-रक्त आभा वाले अग्नि देव का सेवन करता है ।६५। मंत्र के धारण करने वाला पुरुष गुरुदेव से मंत्र का लाभ करके चतुर्दशी में उपवास करे और शुद्ध आचार वाला तथा इन्द्रियों को जीतने वाला बारह सहस्र मंत्र का जप करे ।६६। अमावस्या के दिन में मधुरोत्तर भक्ष्यों तथा भोज्यों से विप्रों को भोजन करावे और अपनी शक्ति के अनुसार दक्षिणा देनी चाहिए ।६७। स्वयं भोजन करके होम द्रव्यों को लाकर शोधन करे । दूसरे दिन में अशन करके अतन्द्रित होकर होम करना चाहिये ।६८। क्रमाऽवटससिद्व्रीहितिलराजीहविर्घृतैः । प्रत्येकमष्टोत्तरशतं जुहुयाहिनशा सुधीः ।६६ दशाहमेवं निर्वर्त्य विधानेन विधानवित् । दत्त्वा पूर्णाहुतिं सम्यगेकादश्या द्विजोत्तमान् ।१००
द्वादश पटल ] [ २८१ सम्पूज्य तर्पयेद्द्विजैर्यथा विभवमादरात् । गुरवे दक्षिणां दद्यादरुणां गां पयस्विनीम् ॥१०१ वासांसि धरधान्यानि दत्त्वा सम्प्रीणयेत्पुनः । स्वमण्डलान्तं प्रजयेत्पीठं सनवशक्तिकम् ॥१०२ पीता श्वेताऽरुणा कृष्णा धू म्रा तीव्रा स्फुलिङ्गिनी । रुचिरज्वालिनी प्रोक्ता कृशानोर्नव शक्तयः ॥१०३ सुधी पुरुष क्रम से वट की समिध!, व्रीहि, तिल, राजी, हवि, घृत से दिन में ही प्रत्येक का अष्टोत्तर शत होम करे ।६६। विधान के ज्ञाता को चाहिये कि विधि - विधान से दश दिन पर्यन्त इसको करके एकादशी में भलीभांति पूर्णाहुति देकर द्विजोत्तमो का पूजन करके श्रेष्ठ विप्रों को आदर से विभव के अनुसार तृप्त करना चाहिए ।१००। फिर अपने श्री गुरुदेव के लिए दक्षिणा तथा अरुण वर्ण वाली पयस्विनी गौ, वस्त्र, धनधान्य देकर उनकी प्रीणित करे । अपने मण्डल के अन्दर नौशक्तियों से समन्वित पीठ का अर्चन करना चाहिए ।१०१-१०२। अब उन नौ शक्तियों के कर्मोंका परिगणन किया जाता है-पीता, श्वेता, अरुणा, कृष्णों, धूम्रा, तीवा, स्फुलिङ्गिनी, रुचिर ज्वालिनी और कृशालु-ये नौ शक्तियाँ होती है ।१०३। स्वबीजेनासनं दद्यान्मूर्त्तिमूलेन कल्पयेत् । तत्र सम्पूजयेद्वह्निं विधिना प्रोक्तलक्षणम् ॥१०४ अङ्गपूजां पुरा कृत्वा मूर्तीरष्टौ दलष्विमाः । जातवेदा सप्तजिह्वाहव्यवाहनसंज्ञकः ॥१०५ अश्वोदरजसंज्ञोन्यः पुनवैश्वानराह्वयः । कौमारतेजाः स्याद्द्विश्वमुखोदेवमुखः परः ॥१०६ अर्च्यत्स्वस्तिकशक्तिभ्यां विराजितकराम्बुजाः । लोकेशानर्चयेद्वाह्ये वज्राद्यायुधसंयुतान् ॥१०७ इतित्सम्पूज्येग्नित्यं जपेन्मात्रं सहस्त्रकम् । जायते वत्सरादर्वाग्वनधान्यसमृद्धिमान् ॥१०८
२८२ ] [ श्रीशारदा तिलक साज्यमन्नं प्रजुहुयाद्वत्सराल्लभते श्रियम् । कुसुमैर्ब्रह्मवृक्षस्य दधिक्षौध्रप्लुतैः ।१०६ करवीरप्रसूनैर्वा मण्डलात्स्यात्समृद्धिमान् । षण्मासं कपिलाज्येन जुहुयाद्वत्सरान्तरे ।११० तस्य संजायते लक्ष्मीः कीर्तिस्त्रैलोक्यवन्दिता। शालिभिर्जुहुयान्नित्यं विधिनाष्टोत्तरशतम् ।१११ अपने बीज के द्वारा आसन समर्पित करे और मूल मन्त्र से मूर्त्ति की कल्पना करनी चाहिए । इसके अनन्तर कहे हुए लक्षण वाले वह्नि का विधि के साथ पूजन करना चाहिये ।१०४। पहिले अङ्ग पूजा करके दलों में इस अष्ट मूर्तियों का यजन करे । जात वेदा-सप्तजिह्वा-हव्य वाहन-यशवीदरज-वैश्वानर-कौमार तेजा-विश्य मुख-देव मुख स्वस्तिक और शक्ति के सहित करों में अम्बुज रखे हुए अर्चन करना चाहिए । बाहिर में लोकेशों का जो वज्रायुधों के संयुत होवें अर्चन करे । इस प्रकार से नित्य ही एक सहस्र आठ बार पूजन करना चाहिए इसका यह प्रभाव है कि एक वर्ष के पहिले ही धन-धान्य की समृद्धि वाला हो जाता है ।१०५-१०८। आज्य के सहित अन्न का हवन करना चाहिए । इसमें एक वर्ष में श्री को लाभ क्रिया करता है। ब्रह्म वृक्ष के पुष्पों से जो दही और शहद और घृतसे आप्लुत करके होम करे अथवा करवीर के पुष्पों से होम करे तो मण्डल में समृद्धिमान् हो जाता है । छै मास तक कपिला गौ के घृत से होम करे तो वर्षके अन्दर ही उसको लक्ष्मी और त्रैलोक्य से वन्दित कीर्त्ति हो जाया करती है। शाली से नित्य विधि से एक सौ आठ बार हवन करना चाहिए ।१०६-१११। व्रीहिगोमहिषान्गाद्यैर्भवनां तस्य पूर्यते । तिलहोमेन महतीं लक्ष्मीमाप्नोति मानवः।११२ पलाशविल्वखदिरशमीदुग्धमहीरुहाम् । विकं'कताकारवधयोः समिद्भिः करवीरजैः । ११३
द्वादश पटल ] [ २८३ प्रसूनैः कुमुदैः पद्मैः कह्लारैररुणोत्पलैः । जातीप्रसूनैर्दूर्वाभिर्नित्यमष्टोत्तरं शतम् । ११४। एकेन जुहुयान्मन्त्री प्रतिपत्स्वथ वा सुधीः । साधयेदखिलान्कामान् षण्मासान्नत्र संशयः । ११५ उत्तिष्ठ पुरुष ब्रूयाद्धरिपिङ्गलतत्परम् । लोहिताक्षरपदं देहि मेददापयठद्वयम् । ११६ चतुर्विंशत्यक्षरात्मा समृद्धिमन्नु रीरितः । ऋष्यादयः पुरा प्रोक्ताः षड्भूतकरणैस्त्रिभिः । ११७ चतुर्भियुगलेनार्णैर्मूलमन्त्रसमुद्भवैः । विदधीत षडङ्गानि जातियुक्तानि मन्त्रवित् । ११८ उसका भवन व्रीहि गो-महिषी अन्य आदि से भर जाया करता है। तिलों से होम करने से बहुत बड़ी लक्ष्मीको मानव प्राप्तकर लिया करता है । ११२। पलाश-खदिर-शमी और दूध वाले वृक्ष- विकंकतक, अपावध को तथा करवीर की समिधाओं से कुमुद पद्म-कल्हार-अरुणोत्पल-जाती पुष्प और दूर्वा से तथा नित्य ही एक सौ आठ हवन करे । ११३-११४। मन्त्रधारी से हवन करे अथवा सुधी प्रतिपदा से होम करे । इससे होता सम्पूर्ण मनोरथों का साधन कर लेता है और छै मासों के अन्दर ही सब साधन बन जाता है। इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।११५। अब तुरगगग्निमन्त्रको बताया जाता है-उत्तिष्ठ पुरुष-बोले और इसके पीछे हरि पिङ्गल-यह कहे लोहिताक्षर पद कहकर 'देहि में ददापय और दोठकार कहे। यह चौबीस अक्षरों वाला समृद्धि मन्त्र कहा गया है। इसके ऋषि पहिले ही कह दिये गये हैं। तीन षड्भूत करणों से-चारों से-युगल अर्णों से तथा मूल मन्त्र समुद्भूतों से छै अङ्गों को मन्त्र वेत्ता जाति युक्त करें । ।११६-११८। स्वर्णश्वत्थविनिर्गतं हुतवहं सिन्दूरपुञ्जप्रभं । ज्वालाभिर्निचितांवरोमनिनचय कन्त्या जगन्मोहनम् ।
२८४ ] [ श्रीशारदा तिलक अश्वाकारमनर्घ रत्नविलसद्भूषालसत्कन्धरं रत्नैरिन्द्रयनिर्गतैर्वसुमतीमाच्छादयन्तं स्मरेत् । ११९ लक्षं मनुं जपेदेनं पयोऽन्नेन ससर्पिषा । दशांशं जुहुयाद्वह्नौ तुरगाग्निमनस्मरन् । १२० पीठं प्रागीपितेऽभ्यर्च्य दङ्गैस्तन्मूर्त्तिभिः सह । आशापालैस्तदीयास्त्रै रचये द्धव्यवाहनम् । १२१ प्रातः स्नानरतो मन्त्री सहस्रं योजपेन्मनुम् । जित्वा रोगान्सुखं जीवेत् श्रिया वर्षशतं नरः । १२२ हृत्प्रमाणे जले स्थित्वा भानमालोक्य संयतः । चतुः सहस्रं प्रजपेन्नित्यं संवत्सरावधि । १२३ अब ध्यान कहते हैं—सुवर्ण अश्वत्थ से निकले हुये सिन्दूर के पुंज के समान प्रभा से युक्त, ज्वालाओं से अङ्ग रोगों के निश्चित होने वाले कान्ति के द्वारा जगत को मोहने वाले, अश्व के आकार से अन्वित, बहुमूल्य रत्नों से शोभित कन्धरा वाले, इन्द्रियों से निर्गत रत्नों से वसु, मती को उदित करते हुए हुतवह का स्मरण करना चाहिये । ११९। इस मंत्र का एक लाख जप करे । घृत के सहित पद अन्न से जप का दशांश वह्नि में होम करे और तुरगाग्नि का स्मरण करता रहे । १२०। पूर्व मे कहे हुए पीठ पर अङ्गों और मूर्त्तियों के सहित अर्चन करना चाहिए । दिक्पालों और उनके आयुधों के साथ हव्य वाहन का अर्चन करे । १२१। जो मंत्रधारी स्नानरत होकर प्रातःकाल में इस मन्त्र को एक सहस्र जप करे वह मानव रोगों पर विजय पाकर सुख पूर्वक श्री के साथ सौ वर्ष तक जीवित रहा करती है । १२२। हृदय तक प्रमाण वाले जल में स्थित होकर भानुदेव का दर्शन करके संयत रहे और एक वर्ष तक नित्य चार हजार जप करे । १२३। अपमृत्यु भयं रोगं कृत्यादारिद्र यसम्भवन् । क्लेशान्निर्ज्जित्य तेजस्वी जीवेद्वर्षशतं पुनः । १२४
द्वादश पटल ] [ २८५ कृत्तिकायां प्रतिपदि शालिहोमो धनप्रदः । दध्ना शमोसद्भिर्वा प्रतिपत्सु भवेद्धनम् ।१२५ इष्टावाप्तिर्भवेदाज्यैः पद्मैग्राममवाप्नुयात् । तिलैर्ज्योतिष्मतीभूतैरिरिपुराज्यं जयेन्नृपः । १२६ अश्वत्थसमिधोमेषीघृताक्ता जुहुयान्नरः । कन्यामिष्टामवाप्नोति सापि तं वरममाप्नुयात् । १२७ शुद्धाज्येन कृतो होमो ज्वरनाशकरः स्मृतः । सप्ताहं जुहुयान्मन्त्री बन्धूककुसुमैः शुभैः । १२८ साग्रं सहस्रमचिरान्महतीं श्रियमाप्नुयात् (मश्नुते) । मासं क्षीरेण गव्येन क्षीराहारी जितेन्द्रियः । १२६ सहस्रं जुहुयान्मन्त्री सम्पदामाश्रयोभवेत् । १३० वह मनुष्य अपमृत्यु का भय-रोग-कृत्या दारिद्रय से होने वाले कष्टों को जीतकर तेजस्वी सो वर्ष तक जीवित रहा करता है । १२४। कृत्तिका में प्रतिपदा में शाधितयों के होम जल के प्रदान करने वाला होता है । दधि से अथवा शमी की समिधाओं से प्रतिपदाओं में धन होता है ।१२३। आज्य से हवन करके अभीष्ट को प्राप्ति किया करता है और पद्मों से होम करके ग्राम को प्राप्त किया करता है । नित्य तिलों से और ज्योतिष्मती से हवन करने से शत्रु के राज्य को जीत लेता है । १२६। मनुष्य अश्वत्थ की समिधाओं से भेड़ के घृत में अक्त करके होम करे । इससे अभीष्ट कन्या को पाता है और कन्या भी अभी प्सित वरको प्राप्त कर लिया करती है । १२७। शुद्धघृत से किया हुआ ज्वर का नाश करने वाला कहा गया है । मन्त्रधारी शुभ बन्धूक के पुष्पों से एक सप्ताह तक होम करे । १२८। एक सहस्र आठ बार हवन करे तो महती (बहुत बड़ी) श्री को प्राप्त कर लेता है । एक मास तक गव्यक्षीर से क्षीर के आहार वाला जितेन्द्रिय रहे और मन्त्रधारी एक सहस्र का होम करे तो वह सम्पदाओं का आश्रय होता है ।१२६।१३०।
२८६ ] [ श्रीशारदा तिलक आज्याक्तदूर्वाहोमेन जीवेद्वर्षशतं नरः । अष्टोत्तरशतं नित्यं हविषा मृगमुद्रया । १३१ जुह्वन्नीजायते लक्ष्मीर्धनधान्यसमृद्धिदा । प्रतिमासं प्रतिपदि जुहुयादयुतं घृतैः ।१३२ श्रीर्भवेन्महती तत्र षण्मासादनपायिनी । दरुणैरुत्पलैः फुल्लैर्मधुरत्रयसंयुतैः ।१३३ जुहुयाद्वत्सराद्धं यः स भवेदिन्दिरापतिः । अरुणाब्जैस्त्रिमध्वक्तैर्जुहुयादन्वहं सुधीः ।१३४ सहस्रं वत्सराद्धेन भवेद्भूमिपुरन्दरः । वत्सरं जुह्वतस्तु स्याल्लक्ष्मीरिन्द्रेण वाञ्छिता ।१३५ जुहुयादमृताखण्डैः पयोक्तैः सप्तवासरम् । त्रिसहस्रं प्रतिदिनं मन्त्रविद्विजितेन्द्रियः ।१३६ कृत्याद्रोहज्वरोन्मादरोगान् जित्वा निरन्तरम् । जीवेद्वर्षशतं भूत्वा तेजसा भास्करोपमः ।१३७ करवीर जपाबिल्वपलाशनृपभूरुहाम् । प्रसूनैः कुमुदैः फुल्लैः कुरण्टैर्जातिसम्भवै ।१३८ पुष्पैर्हुत्वा त्रिमध्वक्तैमन्त्री प्रतिपदं प्रति । आप्नुयान्महतीं लक्ष्मीं वत्सराद्वाञ्छिताधिकाम् ।१३६ मानव आज्य से अक्त दूर्वा के होम से सौ वर्ष तक जीवित रहा करता है । मृगमुद्रा से हवि के द्वारा नित्य ही एक सौ आठ आहुतियाँ देवे तो धन धान्य की समृद्धि देने वाली लक्ष्मी हो जाती । प्रतिमास में प्रतिपदा में घृत से दश हजार आहुतियाँ देवे ।१३१-१३२। इससे छै मासों में बहुत बड़ी अनपायिनी श्री होती है । अरुण विकसित उत्पलों से तीनों मधुरों में प्लुत करके जो होम करें तो उससे वह आधे वर्ष में ही इन्दिरा का पति हो जाया करता है । तीन मधुरों में अक्त अरुण उत्पलों से सुधी प्रतिदिन होम करे और एक सहस्र आहु- तियाँ देवे तो वह आधे वर्ष से भूमिका इन्द्र हो जाया करता है । एक
दश पटल ] [ २८७ वर्ष तक होम करने वाले के पास इन्द्र के द्वारा वाञ्छित लक्ष्मी आती है ।१३४-१३५। पय में अक्त अमृता के खन्डों से सात वार में हवन करे और मन्त्र का ज्ञाता पुरुष जितेन्द्रिय रहकर तीन सहस्र प्रतिदिन आहुतियाँ देवें तो वह पुरुष कृत्या के द्रोह-ज्वर-उन्माद रोगों पर विजय पाकर तेज से भास्कर के समान होकर निरन्तर सौ वर्ष तक जीता है । ।१३६-१३७। करवीर-जपा-विल्व-पलाश और राजवृक्षों के प्रसूनों से तीन मधुरों में अक्त करके मन्त्रधारी प्रतिपद के प्रति होम करे तो एक वर्ष में अभीप्सित से भी अधिक बड़ी लक्ष्मी को प्राप्त किया करता है । १३८-१३६। आदाय तण्डुलं प्रस्थं निर्मलं साधुशोधितम् । गोदुग्धेन हविः कृत्वा केवलं तेन कल्पयेत् ।१४० आज्याक्तं तत्समादाय पूजिते हव्यवाहने । गन्धपुष्पादिभिः सम्यग्जपित्वाष्टोत्तरं शतम् ।१४१ जुहुयात्प्रतिपत्स्वग्निं ध्यात्वा तुरगविग्रहम् । जायते वत्सरादवग्लक्ष्मीस्त्रैलोक्यमोहिनी ।१४२ मन्त्रेणानेन सञ्जप्तां वचां खादेद्दिनागमे । भारती निवसेत्तस्य मुखाम्भोजेऽतिनिश्चिला ।१४३ अष्टोत्तरशतं जप्तं जलं प्रातः पिबेन्नरः । जठराग्निर्ज्वलेत्तस्य घृतेनेव हुताशनः ।१४४ भली-भाँति शोधित निर्मल तण्डुल प्रस्थ का समादान करके गायके दूध से केवल हवि बनाकर के उससे कल्पित करे आज्य को लाकर गन्ध पुष्पादि के द्वारा पूजित हव्य वाहन में भली-भाँति एक सौ आठ बार जप करके प्रतिपदाओं में तुरग (अश्व) के विग्रह वाले अग्नि का ध्यान करके होम करे तो उसके समीप में एक वर्ष के पहले ही तीनों लोकों को मोहन करने वाली लक्ष्मी हो जाया करती है ।१४०-१४२। इस मन्त्र के द्वारा अभिमन्त्रित वच को दिन के आगम में अर्थात् प्रातः काल में भक्षण करे तो उसके मुख में अतीव निश्चला होकर भारती
२८८ ] [ श्रीशारदा तिलक निवास किया करती ।१४३। एक सौ आठ वार जप किये हुए जल को प्रातः काल में पीवे तो घृत ले अग्नि की ही भाँति उसकी जठराग्नि जला करती है ।१४४। कृत्वा नवपदात्मानं मण्डलं प्रागुदीरितम् । कलशान्नव कल्याणांस्थापयेत्प्रोक्तवर्त्मना ।१४५ क्षीरवृक्षत्वगुद्भूतैः क्वाथैस्तान्पूरयेत्क्रमात् । वस्त्रादिभिरलङ्कृत्य नवरत्नानि निः क्षिपेत् ।१४६ मध्ये सम्पूज्येदग्निं मूर्तीरष्टौदिशं क्रमात् । कुम्भेषु गन्धपुष्पाद्यैर्धूपदीपैर्मनोरमैः ।१४७ स्पृष्ट्वाः जपेत्ततःकुम्भान् मंत्रमष्टोत्तरं शतम् । अभिषिञ्चेत्ततः साध्यं विनीत दत्तदक्षिणम् ।१४८ ज्वरग्रह महारोगदारिद्र्यादीन्विजित्य सः । जीवेद्वर्षशतं सम्यगभिषिक्तः श्रिया सह ।१४६ पूर्व में वर्णित नव पदों के स्वरूप वाले मण्डल की रचना करके वहाँ पर नौ मङ्गल कलशों को कथित मार्ग के द्वारा स्थापित करना चाहिये ।१४५। फिर दूध वाले वृक्षों के वल्कल से बनाये हुये क्वाथ से क्रम से उनको भर देवे । फिर वस्त्र आदि से उनको भूषित करके उनमें नौ रत्नों का निःक्षेप करना चाहिये ।१४६। मध्य में अग्नि का पूजन करे और क्रम से आठों दिशाओं में आठ मूर्तियों का गन्ध पुष्पादि के द्वारा कुम्भों में मनोरम धूप-दीपों के द्वारा पूजन करे । इसके अनन्तर उन कुम्भों का स्पर्श करके अष्टोत्तर शत मन्त्र का जप करना चाहिये । फिर परम विनीत दक्षिणा देने वाले साध्य का अभिषिंचन करे ।१४७। ।१४८। वह पुरुष ज्वर—ग्रह-महारोग और दरिद्रता ओदि पर विजय प्राप्त करके श्री के सहित अभिषिक्त हुआ भली-भांति एक सौ वर्ष तक जीवित रहा करता है ।१४६।
त्रयोदश पटल ] [ २८६ त्रयोदश पटल ॥ विष्णु प्रकरण ॥ अथ वक्ष्ये महामन्त्रान्विष्णोः सर्वार्थसाधकान् । यस्य संस्मरणात् सन्तो भवाब्धेः पारमाश्रितः । १। तारं नमः पदं ब्र यान्तरौ दीर्घसमन्वितौ । पावनोणाय मन्त्रो यं प्रोक्तो वस्वक्षरान्वितः । २ साध्यनारायणः प्रोक्तो मुनिश्च्छन्दउदाहृतम् । मन्त्रस्ये देवी गायत्री देवता विष्णुरव्ययः । ३ क्रुद्धोल्काय हृदाख्यातं महोल्काय शिरः स्मृतन् । वीरोल्काय शिखा प्रोक्ता द्युल्काय कवचं स्मृतम् ।४ सहस्रोल्कायास्त्रमुक्तमङ्गक्लृप्तिरियं मता । भूयोवर्णैर्मनोःषड्भिः षडङ्गानि समाचरेत् ५ अब क्रम से प्राप्त हुए विष्णु देव के मन्त्रों को बतलाया जाता है- इसके अनन्तर सभी अर्थों के साधक भगवान् विष्णु के मन्त्रों को बत- लाया जायेगा, जिन भगवान् विष्णु के केवल संस्मरण करने ही से सन्त गण इस संसार महासागर से पार हो गये थे ।१। मन्त्र का उद्धार कहा जाता है —तार-ओंकार, दीर्घ आकार से समन्वित नकार और रेफ- नमः—यह पद और यवतः—यकार—इस रीति से यह आठ अक्षरों वाला मन्त्र कहा गया है ।२। इसका साध्य नारायण और छन्द मुनि कहा गया है । इस यन्त्र की देवी गायत्री है और इसका देवता अव्यय भगवान् विष्णु है ।३। इसका क्रुद्धोल्काय हृदय कहा गया है तथा महोल्काय शिर बताया गया है । वीरोल्काय शिखा है और उल्काय कवच कहा है ।४। सहस्रोल्काय अस्त्र कहा गया है यह अङ्गक्लृप्ति
२६० ] [ श्रीशारदा तिलक मानो गयी है। फिर मंत्र के छै वर्णों से छै अङ्गों का समाचरण करना चाहिये ।५। अवशिष्टौ पुनर्वर्णौ विन्यसेत्कुक्षिपृष्ठयोः । बद्धदिक चक्रमन्त्रेण मन्त्रवर्णान्स्तनौ न्यसेत् ।६। आधारे हृदये वक्त्रे दोःपादमूलेसु नासिके । कण्ठे नाभौ हृदि कुचे पार्श्वपृष्ठेषु तत्परम् ।७ मूर्द्धास्य नेत्रश्रवणघ्राणेषु तदनन्तरम् । दोःपादसन्ध्यंगुलिषु धातुप्राणेषु हृत्स्थले ।८ मूर्द्धेक्षणास्यहृत्कुक्षिसोरुजंघापदद्वये । एकैकशोन्यरेद्वर्णान् गण्डांसोरुपदेषु च ।६ चक्रशङ्खगदाम्भोजपदेष्ववहितो न्यसेत् ।१० अवशिष्ट वर्णों को फिर कुक्षि और पृष्ठों में विन्यस्त करे। बद्धदिक् चक्र मन्त्र के द्वारा मन्त्र के वर्णों का स्तनों में न्यास करे ।६। इसके पीछे आधार, हृदय, मुख, बाहु और पदों के मूल, नासिका, कण्ठ, नाभि, हृदय, कुच, पार्श्व पृष्ठ में न्यास करना चाहिये । इसके अनन्तर मूर्धा, मुख, नेत्र, श्रवण, घ्राण में न्यास करना चाहिये । बाहु, पाद, सन्धि, अंगुलियों में, धातु प्राणों में, हृदय स्थल में, मूर्धा, ईक्षण, मुख, हृदय, कुक्षि, ऊरु दोनों जाँघों में और पादों में एक-एक वर्णों का गन्ड--अंस और पदों में न्यास करना चाहिए ।७-८-६। शंख, चक्र, गदा, और अम्भोज पदों में अवहित होकर न्यास करे ।१०। अष्टाणोंष्टप्रकृत्यात्या ज्ञेयोऽसौ चतुरात्मनाम् । संयोगात्सूरिभिः प्रोक्तो विशिष्टो द्वादशाक्षरः । अतस्तन्मन्त्रवर्णाद्या द्वादशस्वरसंयुताः ।११ द्वादशादित्यसहिता मूर्त्तिर्द्वादश विन्यसेत् । केशवाद्यःक्रमादुद्देहे वक्ष्यमाणविधानतः ।१२