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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

३७८ शतपथ ब्राह्मण वा॒ ऽऋ॒तुलं॑ वाव॒कृते॒ऽङ्गुली॒भाज॑न॒मध्व॒र्युर्वा॒ यज॑मानो वा सोमोपनह॒नमाद॑त्ते॒ य ए॑व कश्च॑ सोमपर्याण॒हनम् ॥४॥ अथ॒ग्रेण॒ राज्ञा॑नं वि॒चिन्व॑न्ति। तद्यत्कु॒म्भ उप॑नि- हितो भ॑वति॒ तद्ब्राह्मणा उपा॑सते॒ तद॒भ्याया॑न्ति प्राञ्चः॑ ॥५॥ तदा॒यन्त्सु॑ वाचयति । ए॒ष ते॑ गाय॒त्रो भा॒ग इति॑ मे॒ सोमा॑य ब्रूतादे॒ष ते॒ त्रैष्टु॑भो भा॒ग इति॑ मे सोमा॑य ब्रूतादे॒ष ते॒ जा॒गतो॑ भा॒ग इति॑ मे॒ सोमा॑य ब्रूताच्छन्दो॑नामाना॒ꣳ सा॒म्राज्यं॑ ग॒च्छेति॑ मे॒ सोमा॑य ब्रूतादित्येकं॑ वा॒ऽए॒ष क्रिय॒माणो॒ऽभिक्री॑यते॒ छन्द॑सामेव॒ राज्या॑य॒ छन्द॑- साꣳ साम्रा॑ज्याय॒ यन्न्वे॑ वा॒ऽए॒नमेतद्‍यद॑भिषु॒ण्वन्ति॑ त॒मेतदा॑ह॒ छन्द॑सामेव॒ वा रा- ज्या॑य॒ क्रियाणा॑नि॒ छन्द॑साꣳ सा॒म्राज्या॑य॒ न्व॑ ब॒धाय॒त्येत्य॑ प्राङुप॑विशति ॥६॥ सो ऽभि॒मृश॑ति । आ॒स्मा॒को॒ऽसीति॑ स्व॒ऽइव॒ ह्यस्यैतद्भव॑ति॒ यदाग॑तस्त॒स्मादा॑हास्मा॒को ऽसी॑ति शुक्र॒स्ते॒ ग्रह्य॒ इति॑ शु॒क्रꣳ ह्य॑स्माद॒हं ग्र॑हीष्य॒न्भव॑ति॒ विचि॑तस्त्वो॒ विचि॑- न्वन्विति॑ सर्वत ए॒वैतदा॑ह ॥७॥ अत्र॒ हैके॑ । तृणं॑ वा॒ काष्ठं॑ वा वि॒ह्लापा॒स्यन्ति॑ तदु॒ तथा॑ न कुर्यात्तन्त्रं॒ वै सोमो॑ वि॒टन्या॒ ओष॑धयो॒ऽन्त्रं॒ वै क्ष॑त्रियस्य॒ विट् स यथा॒ ऽसितम॑नुद्या॒याच्छि॒द्य परा॑स्येदे॒वं तत्स्तस्मादु॑भयैव मू॒र्तेर्विचितस्त्वो॒ विचि॑न्वन्त्वि- ति॒ तद्य॒ऽङ्गुर्वा॒स्य वि॑चे॒तार॒स्तऽए॒नं वि॑चिन्वन्ति ॥८॥ अथ वासः । द्वि॒गुणं॑ वा च॒तुर्गुणं॑ वा प्राग्द॑शं वोद॑ग्दशं वोप॑स्तृणाति॒ तद्राज्ञा॑नं मिमी॒ते स यद्राजा॑नं मि- मी॒ते त॒स्मान्मात्रा॑ मनु॒ष्येषु॑ मात्रो॒ यो चाप्यन्या मात्रा॑ ॥९॥ सावि॒त्र्या मिमी॑ते । सवि॒ता वै दे॒वानां॑ प्रसवि॒ता तयो॒ ह्यस्माऽए॒ष स॑वितृप्रसूत ए॒व क्रया॑य भव॑ति ॥१०॥ अति॑च्छन्दसा मिमीते । ए॒षा वै सर्वा॑णि॒ छन्दा॑ꣳसि॒ यदति॑च्छन्दा॒स्तथा॒ ह्य- स्यैष सर्वै॑रेव॒ छन्दो॑भिर्मीतो भ॑वति॒ तस्मादति॑च्छन्दसा मिमीते ॥११॥ स मि- मीते । अ॒भि त्यं दे॒वंꣳ स॑वि॒तार॑मोण्योः क॒विक्र॑तुम॒र्चामि॑ स॒त्यस॑वꣳ रत्न॒धाम॒भि प्रि॒यं म॒तिं क॒विम् । ऊ॒र्ध्वा य॒स्याम॑तिर्भा अ॒द्युदौत्तत्स॒वीम॑नि॒ हिर॑ण्यपाणिरमिमीत सुक्रतुः॑ कृ॒पा स्वरिति॑ ॥१२॥ ए॒तया सर्वा॑भिः । ए॒तया॒ चत॑सृभिरे॒तया ति॒सृभि॑रे-

कां० ३, अ० ३, ब्रा० २, क० ४-१३ शतपथब्राह्मण / ३७६ उसकी उष्णीष बना ले। सोम-वस्त्र को अध्वर्यु ले या यजमान। अंगोछा कोई और ले ले ॥४॥ अब सोम राजा को चुनते हैं। उसके निकट जल के घड़े को रखते हैं। और एक ब्राह्मण पास बैठता है। अब वे पूर्व की ओर जाते हैं ॥५॥ जाते हुए यह मन्त्र बोलते हैं—‘‘एष ते गायत्रो भागऽइति मे सोमाय ब्रूताद्, एष ते त्रैष्टुभो भागऽइति मे सोमाय ब्रूताद्, एष ते जागतो भागऽइति मे सोमाय ब्रूताच्छन्दोनामानाꣳ साम्राज्यं गच्छेति मे सोमाय ब्रूतात्’’ (यजु० ४।२४)—‘‘मेरे लिए सोम से कहो कि यह तुम्हारा गायत्र भाग है। मेरे लिए सोम से कहो कि यह तुम्हारा त्रैष्टुभ भाग है। मेरे लिए सोम से कहो कि यह तुम्हारा जगती का भाग है। मेरे लिए सोम से कहो कि छन्दों के साम्राज्य को प्राप्त करो।’’ सोम राजा को क्रय करते हैं तो एक उद्देश्य के लिए— छन्दों के राज्य के लिए, छन्दों के साम्राज्य के लिए। उसको निचोड़ते हैं तो मानो उसको मारते हैं। इसीलिए कहते हैं कि तुझे छन्दों के राज्य के लिए और छन्दों के साम्राज्य के लिए मोल लेते हैं, मारने के लिए नहीं। अब चलकर वह (सोम के) पूर्व में बैठता है ॥६॥ इस मन्त्र को पढ़कर (सोम के पौधे को) छूता है—‘‘अस्माकोऽसि’’ (यजु० ४।२४)— ‘‘तू हमारा है।’’ जब सोम आ गया तो वह अपना ही हो गया। इसलिए कहते हैं कि तू हमारा है। ‘‘शुक्रस्ते ग्रह’’ (यजु० ४।२४)—‘‘तेरा शुक्र(रस) ग्रहण के योग्य है’’ क्योंकि वह उसको ग्रहण करेगा ही। ‘‘विचितस्त्वा विचिन्वन्तु’’ (यजु० ४।२४)—‘‘चुननेवाले तुझे चुनें।’’ वह सम्पूर्णता के लिए ऐसा कहता है ॥७॥ कुछ लोग (सोम के साथ) तृण या काष्ठ को देखकर उसे फेंक देते हैं। परन्तु ऐसा नहीं करना चाहिए। सोम राजा है और अन्य वृक्षादि प्रजा। प्रजा राजा का अन्न है, इसलिए (इसको फेंक देना ऐसा ही होगा) जैसा किसी के मुँह में रखे हुए अन्न को निकालकर फेंक देना। इसलिए केवल उसको छूकर कहे कि ‘चुननेवालो, इसको चुन लो।’ चुननेवाले उसको चुन लेंगे ॥८॥ अब वह कपड़े को दुल्लर या चौलर करके बिछाता है इस प्रकार कि झालर पूर्व या उत्तर की ओर रहे। उस पर सोम राजा को तोलता (मापता, मिमीते) है। चूंकि उससे सोम राजा को तोलता है इसलिए उसको मात्रा कहते हैं—चाहे वह मनुष्यों में प्रचलित मात्रा हो या अन्य कुछ ॥६॥ वह सावित्री मन्त्र पढ़कर तोलता है। सविता सब देवों का प्रेरक है। ऐसा करने से मानो सोम-क्रय सविता की प्रेरणा से होता है ॥१०॥ अतिछन्द पढ़कर तोलता है। अतिछन्द में सब छन्द आ जाते हैं। अतिछन्द से इसलिए तोलता है कि वह सब छन्दों से तुला होने के बराबर हो जाता है ॥११॥ वह इस मन्त्र को पढ़कर तोलता है—‘‘अभि त्यं देवँ॒ सवितारमोण्योः कविक्रतुमर्चामि सत्यसवँ॒ रत्नधामभि प्रियं मतिं कविम्। ऊर्ध्वा यस्यामतिर्भाऽअदियुतत् सवीमनि हिरण्य- पाणिरमिमीत सुक्रतुः कृपा स्वः’’ (यजु० ४।२५)—‘‘मैं उस द्यावापृथिवी के प्रेरक, कवि, ऋतु, सत्यसव, रत्नधा, प्रिय, बुद्धिमान्, कवि की पूजा करता हूँ, जिसकी न नापी जानेवाली ज्योति ऊपर चमकती है और जिस प्रकाश-युक्त किरणोंवाले यज्ञ-साधक ने संसार में शक्ति की प्रेरणा की है’’ ॥१२॥ इसी मन्त्र को पढ़कर वह सोम को लेता है सब अँगुलियों से, फिर चार से, फिर तीन

अध्याय-३, ब्राह्मण-३

३८० शतपथ ब्राह्मण तया॒ द्वाभ्या॑मे॒तयै॒कये॒तयै॒कये॒तया॒ द्वाभ्या॑मे॒तया तिसृ॑भिरे॒तया॒ चत॑सृभिरे॒तया॒ स- र्वाभिः॒ सम॒स्याञ्जलि॑ना॒धाव॑पति ॥ १३॥ स वाऽउ॒दाचं॒ न्याचं॒ मिमी॑ते । स यदु- दाचं॒ न्याचं॒ मिमी॑ते॒ऽइमा॒ एवै॒तद॒ङ्गुलीर्नाना॑नानाः करोति॒ तस्मा॑दि॒मा नाना॑ ज्ञा- यन्ते॒ऽथ॒ यत्स॒ह सर्वा॑भि॒र्निमी॑ते स॒श्लिष्टा॑-इव॒ ह्येतवे॒मा जा॑येरं॒स्तस्मा॑दा॒ऽउदा॑चं॒ न्या- चं॒ मिमी॑ते ॥ १४॥ यद्वेवो॒दाचं॒ न्याचं॒ मिमी॑ते । इमा॒ एवैतन्ना॑नावी॒र्याः करोति तस्मा॑दि॒मा ना॑नावी॒र्या॒स्तस्मा॑दा॒ऽउदा॑चं॒ न्याचं॒ मिमी॑ते ॥ १५॥ यद्वे॒वोदा॑चं॒ न्याचं॒ मिमी॑ते । वि॒राज॑मे॒वैतद॒र्वाचीं॑ च प॒राचीं॑ च युनक्ति परा॒च्यह दे॒वेभ्यो॑ य॒ज्ञं वह॑- त्य॒र्वाची मनु॒ष्यानव॑ति॒ तस्मा॑दा॒ऽउदा॑चं॒ न्याचं॒ मिमी॑ते ॥ १६॥ अथ॒ दश॑ कृत्वो मिमी॑ते । दशा॑क्षरा॒ वै वि॒राडैरा॑जः॒ सोम॒स्तस्मा॒द्दश॑ कृत्वो मिमी॑ते ॥ १७॥ अथ सोमोपनह॒नस्य॒ समुत्पर्या॑न्तान् । उ॒ष्णीषे॑ण॒ विग्र॑थ्नाति प्र॒जाभ्य॒स्त्वेति॑ प्र॒जाभ्यो॒ ह्ये- नं क्रीणा॑ति स य॑द्देवै॒दं शिर॑श्चा॒ऽसौ चात्तरोपेनितमिव तद्दे॒वास्यै॒तत्करो॑ति ॥ १८॥ अथ॒ मध्ये॒ऽङ्गुल्त्या॑का॒शं करो॑ति । प्र॒जास्त्वानु॑प्राण॒न्त्विति॒ तम॑यतीव वा॒ऽएनमेतत्स॒- मापन्नप्राणमिव करोति॒ तस्यैतदृत एव॒ मध्य॑तः प्रा॒णमु॑त्सृज॑ति॒ तं ततः॑ प्रा॒णन्तं॑ प्र॒जा अनु॑प्राणन्ति॒ तस्मा॑दाह प्र॒जास्त्वानु॑प्राण॒न्त्विति॒ त सोम॑विक्र॒यिणे॒ प्रय॑हृत्य- र्थात्तः प॒णन॑स्यैव ॥ १९॥ ब्राह्मणम् ॥ ५ [३.२.]॥ ॥ स वै राजानं॑ पणते । स यद्राजानं॑ पणते॒ तस्मा॑दि॒दं सकृ॒त्सर्वं॑ प॒ण्यं॒ स आ- ह॒ सोम॑विक्रयिन्क्र॒य्यस्ते॒ सोमो॒ राजा॑३॒इति॒ क्रय्य॒ इत्या॑ह सोम॑विक्रयी॒ तं वै॑ ते क्री॒णानीति॑ क्री॒णीहीत्या॑ह सोम॑विक्रयी क॒लया॑ ते क्रीणानीति॒ भूयो वा॒ऽअतः॑ सोमो॒ राजा॑र्ह॒तीत्या॑ह॒ सोम॑विक्रयी॒ भूय॒ एवातः॒ सोमो॒ राजा॑र्हति म॒हांस्त्वेव गोर्म- हि॒मेत्य॑ध्व॒र्युः ॥ १॥ गोर्वै प्रतिधुक् । तस्यै॑ शृ॒तं तस्यै॑ श॒रस्तस्यै॒ दधि॒ तस्यै॑ म॒स्तु तस्या॑ऽऽतञ्चनं॒ तस्यै॒ नव॑नीतं॒ तस्यै॑ घृ॒तं तस्या॑ऽऽमि॒क्षा तस्यै॑ वा॒जिनं॑ ॥ २॥ श॒फेन॑ ते क्रीणानी॑ति । भूयो॒ वा॒ऽअतः॒ सोमो॒ राजा॑र्ह॒तीत्या॑ह सोम॑विक्र॒यी भूय॑

कां० ३, अ० ३, ब्रा० २-३, कं० १३-१६ व १-३ शतपथब्राह्मण / ३८१ से, फिर दो से, फिर एक से, फिर एक से, फिर दो से, फिर तीन से, फिर चार से, फिर सब से ॥१३॥ वह अँगुलियों को झुकाकर और ऊपर को उठाकर सोम को तोलता है। उठाकर और झुकाकर इसीलिए तोलता है कि अँगुलियों को अलग-अलग मान लेता है। इसीलिए ये अलग- अलग उत्पन्न होती हैं। और सब अँगुलियों से इसलिए तोलता है कि वे संयुक्त उत्पन्न हों। इसीलिए वह अंगुलियों को उठाकर और झुकाकर तोलता है ॥१४॥ अँगुलियों को उठाकर और झुकाकर इसलिए लेता है कि ये भिन्न शक्तिवाली हो जायें। इसीलिए अँगुलियाँ भिन्न-भिन्न शक्तिवाली हैं ॥१५॥ अंगुलियों को उठाने और झुकाने का प्रयोजन यह है कि विराज् (विराज् छन्द को जिसमें दश अक्षर के पद होते हैं) को ले जाता और ले आता है। अर्थात् यज्ञ को पहले देवों के लिए ले जाता है, फिर मनुष्यों के लिए वापस लाता है ॥१६॥ इस बार तोलने का तात्पर्य यह है कि विराट् छन्द में दश अक्षर होते हैं। सोम विराट् के समान है। इसलिए दश बार तोलता है ॥१७॥ सोम-वस्त्र के किनारों को पकड़कर अध्वर्यु उसको पगड़ी से बाँधता है यह पढ़कर— “प्रजाभ्यस्त्वा” (यजु० ४।२५)—“सन्तान के लिए तुझे।” सन्तान के लिए ही सोम को मोल लिया जाता है। शिर और कन्धों के बीच में जो शक्ल होती है वैसी ही बना देता है (अर्थात् सोम की गठरी ऐसी बाँधी जाती है कि लड़के की आकृति हो जाय, सिर निकला रहे) ॥१८॥ अब इस मन्त्र को पढ़कर गांठ में अँगुली जाने के लिए छेद कर देता है—“प्रजास्त्वाऽनु- प्राणन्तु” (यजु० ४।२५), अर्थात् सन्तान तेरे समान प्राण (साँस) लें। जब गाँठ बाँधी तो मानो उसका गला घोंट दिया। वह साँस न ले सका। अब वह इस प्रकार प्राणों को छोड़ता है (साँस को लेता है)। इसी के समान सन्तान भी साँस लेगी। इसीलिए कहा ‘सन्तान तेरे समान साँस लें।’ अब वह उसको सोम बेचनेवाले को दे देता है। अब आगे मोल चुकाने की बात आवेगी ॥१९॥ अध्याय ३—ब्राह्मण ३ सोम राजा के लिए मोल किया जाता है। चूंकि सोम राजा का मोल किया जाता है इसलिए सभी चीजों का मोल करते हैं। पहले सोम बेचनेवाले से पूछता है, ‘क्या सोम राजा बिकाऊ है?’ वह उत्तर देता है, ‘हाँ, बिकाऊ है।’ वह पूछता है, ‘मैं तुझसे मोल लूंगा।’ सोम बेचनेवाला उत्तर देता है, ‘ले लो।’ अध्वर्यु कहता है कि, ‘कला (गौ के सोलहवें भाग) के बदले सोम को लूंगा।’ सोम बेचनेवाला कहता है, ‘सोम राजा का मोल इससे अधिक है।’ अध्वर्यु कहता है कि ‘निस्सन्देह सोम राजा का मोल इससे अधिक है, परन्तु गाय की महिमा भी तो अधिक है’ ॥१॥ गाय से दूध मिलता है, उसी से शृत, उसी से मलाई, उसी से दही, उसी से मस्तु, आतंचन, नवनीत, घी, आमिक्षा और वाजी। (ये सब दूध से बनी चीजों के नाम हैं) ॥२॥ ‘मैं गाय के एक शफ (खुर) के बदले इसको मोल लूंगा।’ सोम बेचनेवाला कहता है,

३८२ शतपथ ब्राह्मण ॒श्वातः॑ सोमो॒ राजा॑र्हति म॒हांस्त्वेव गोर्म॑हि॒मेत्य॑ध्व॒र्यु॒रेता॒न्येव दश॑ वी॒र्या॑ण्युदाच॒क्षा- णा॒ह पदा॒ तेऽर्धेन ते॒ गवा॑ ते क्रीणामीति क्रेतः सोमो राजेत्याह सोमविक्रयी वयांसि प्रब्रूहीति ॥३॥ स॒ आह॑ । च॒न्द्रं ते॒ वस्त्रं॑ ते॒ छागा॑ ते धे॒नुस्ते॑ मिथुनौ ते॒ गावौ॑ ति॒स्रस्ते॒ऽन्या इति॒ स यद॒र्वाक्य॑णान्ते॒ परः॑ सम्पाद॒यन्ति॒ तस्मादि॒दं सकृ॑- त्स॒र्वं पण्यम॒र्वाक्य॑णान्ते परः सम्पादयन्त्यथ यदध्व॒र्युुरेव गोर्वी॒र्या॑ण्युदाच॒ष्टे न सोम॑- स्य सोमविक्रयी महितो वै सोमो देवो हि सोमोऽथैतदध्वर्युंर्ग महयति तस्यै पश्यन्वी॒र्या॑णि क्रीणा॒दिति॒ तस्मादध्व॒र्युुरेव गोर्वी॒र्या॑ण्युदाच॒ष्टे न सोम॑स्य सोम- विक्रयी ॥४॥ अथ यत्पञ्च कृत्वः प॒णते॒ । सं॒वत्स॑रसंमितो वै य॒ज्ञः पञ्च॒ वा ऋ॒त- वः सं॑वत्स॒रस्य॒ तं प॒ञ्चभिराप्नो॑ति॒ तस्मा॑त्पञ्च कृत्वः प॒णते॒ ॥५॥ अथ हिर॑ण्ये वा- चयति । शु॒क्रं त्वा शु॒क्रेण॑ क्रीणामीति शुक्रं॒ ह्येतच्छुक्रेण॑ क्रीणा॒ति यत्सोमं॑ हि॒- रण्येन च॒न्द्रं च॒न्द्रेणेति॑ च॒न्द्रं ह्येतच्चन्द्रेण क्रीणा॒ति यत्सोमं॑ हिर॑ण्येन॒ामृतम॒मृ॑- तेने॒त्यमृ॑तं॒ ह्येतद॒मृते॑न क्रीणा॒ति यत्सोमं॑ हि॒रण्येन ॥६॥ अथ सोमविक्रयि- णम॑भिकम्पयति । स॒ग्मे ते॒ गोरिति॒ यज॑माने ते॒ गौरित्ये॒वैतदा॑ह॒ तद्यद्यज॑मानम- भ्यावृत्य॒ न्यस्ये॑त्स॒मे ते॒ चन्द्राणी॑ति॒ स आत्म॒न्नेव वीर्यं॑ धत्ते॒ शरीर॑मेव॒ सोम॑वि- क्रयी कुरुते तत्ततः सोमविक्रय्यादत्ते ॥७॥ अथैतायां प्रतीचीनमुख्यां वाचयति । तप॑सस्त॒नूर॑सीति तपसो ह॒ वा॒ऽए॒षा प्र॒जाप॑तेः संभूता यदजा तस्मादाह तपस- स्तनूरसीति प्रजापतेर्वर्ण॒ इति सा यन्त्रिः॒ संवत्सरस्य विजायते तेन प्रजापतेर्वर्णः परमेण पशुना क्रीतस्त॒ऽइति॒ सा यन्त्रिः॒ संवत्स॒रस्य॑ वि॒जाय॑ते तेन पर॒मः पशुः॑ स॒- हस्रपोषं पुषेयमित्याशिषमेवैतदाशास्ते भूमा वै सहस्रं भूमानं गछानीत्येवैतदाह ॥८॥ स वा॒ऽअने॑नैवैनां प्र॒युन॑क्ति । अनेन राजानमादत्तऽआज्ञा॒ ह वै नामैषा यदजेतया ह्येनमेतत आप्नोति तमेतत्परोऽक्षमजेत्याचक्षते ॥९॥ अथ राजानमा- दत्ते । मित्रो न एहि सुमित्रध इति शिवो नः शान्त एहीत्येवैतदाह तं यजमा-

कां० ३, अ० ३, ब्रा० ३, कं० ३-१० शतपथब्राह्मण / ३८३ 'सोम राजा इससे कहीं अधिक कीमती है।' अध्वर्यु कहता है, 'सोम राजा अवश्य कीमती है परन्तु गाय की महिमा भी तो अधिक है।' इस प्रकार दश गुण वर्णन करके अध्वर्यु कहता जाता है कि 'एक पद के बदले खरीदूँगा, आधी गाय के बदले, पूरी गाय के बदले।' यहाँ तक कि सोम बेचनेवाला कह उठता है, 'बस सोम राजा खरीदा जा चुका। क्या-क्या दोगे, यह बताओ' (वयांसि प्रब्रूहि) ॥३॥ अध्वर्यु कहता है, 'चन्द्र (सोना ?) तुम्हारा हुआ, वस्त्र तुम्हारा हुआ, बकरी तुम्हारी हुई, गाय तुम्हारी हुई, एक बैल का जोड़ा तुम्हारा हुआ। तीन और गायें तुम्हारी हुईं।' पहले वे मोल करते हैं और फिर मोल का निश्चय होता है। इसीलिए हर एक बिक्री की चीज में पहले मोल किया जाता है, फिर निश्चय करते हैं। केवल अध्वर्यु ही गाय के गुण क्यों कहता है ? सोमवाला सोम के गुण क्यों नहीं कहता ? इसका कारण यह है कि सोम देवता है, उसकी महिमा तो प्रख्यात है। इसलिए अध्वर्यु गाय के गुण कहता है, सोमवाला सोम के नहीं। सोम- वाला गाय के गुण सुनकर उसको ले लेगा। इसीलिए अध्वर्यु गाय के गुण गाता है, सोमवाला सोम के गुण नहीं कहता ॥४॥ पाँच बार क्यों मोल करता है ? यज्ञ संवत्सर के तुल्य है। संवत्सर में पाँच ऋतु होते हैं। पाँच बार मोल करने से इसको भी पाँच अंगवाला बना देता है ॥५॥ अब वह यजमान से स्वर्ण के लिए कहलवाता है- "शुक्रं त्वा शुक्रेण क्रीणामि" (यजु० ४।२६) - "तुझ शुद्ध को शुद्ध के बदले खरीदता हूँ।" वस्तुतः जब वह स्वर्ण के बदले सोम को लेता है तो शुद्ध के बदले ही शुद्ध को खरीदता है। "चन्द्रं चन्द्रेण" (यजु० ४।२६) - "चन्द्र को चन्द्र के बदले।" सोम को स्वर्ण के बदले लेना मानो चमकी ली चीज के बदले लेना है। "अमृतं अमृतेन" (यजु० ४।२६) - "अमृत को अमृत के बदले।" सोम को स्वर्ण के बदले खरीदना मानो अमृत को अमृत के बदले खरीदना ही है ॥६॥ अब सोमवाले को धमकाता है, "सग्मे ते गोः" (यजु० ४।२६) - "गायवाले अर्थात् यजमान के साथ तेरी गाय हो।" अब (स्वर्ण को) यजमान की ओर लाकर फेंक देता है- "अस्मे ते चन्द्राणि" (यजु० ४।२६) - "ये चमकीले सोने के टुकड़े हमारे हों।" इससे यजमान वीर्य (शक्ति) धारण करता है। और सोम-विक्रेता के पास केवल शरीर रह जाता है। इसके पीछे सोम-विक्रेता उस सोने को ले लेता है ॥७॥ पश्चिमाभिमुखी बकरी के प्रति यजमान से कहलवाता है- "तपस्तनूरसि" (यजु० ४।२६) - "तू तप का शरीर है।" यह जो बकरी है वह प्रजापति के तप से उत्पन्न हुई। इसी- लिए कहता है कि 'तू तपःका शरीर है।' अब कहता है- "प्रजापतेर्वर्णः" (यजु० ४।२६) - "प्रजापति का वर्ण है।" चूंकि वर्ष में तीन बार जनती है, इसलिए प्रजापति के समान हुई। "परमेण पशुना क्रीयसे" (यजु० ४।२६) - "तूपरम पशु के बदले खरीदा गया।" बकरी तीन बार वर्ष में जनती है, इसलिए परम पशु है। "सहस्रपोषं पुषेयम्" (यजु० ४।२६) - "मैं सहस्रों वस्तुओं से पुष्ट हो जाऊँ।" यह आशीर्वाद है। सहस्र का अर्थ है भूमा या बहुत। तात्पर्य यह है कि मुझे बहुत-सी चीजें मिल जायें ॥८॥ इस (बायें हाथ) से बकरी को देता है और इस (दाहिने हाथ) से सोम को लेता है। यह जो 'अजा' है वह 'आजा'। इसी बकरी के द्वारा वह अन्त में सोम को ले जाता है (आजाति) इसलिए उसका परोक्ष नाम 'आजा' या 'अजा' हुआ ॥६॥ इस मन्त्र को पढ़कर सोम राजा को लेता है, "मित्रो नऽएहि सुमित्रधः" (यजु० ४।२७) - "तू मित्र बनकर हमारे पास आ, अच्छे मित्रों का देनेवाला।" इसका अर्थ यह हुआ कि तू कल्याण- कारी है, हमारे लिए कल्याण कर। उसको यजमान की दाहिनी जाँघ पर रखकर वस्त्र से ढाँपकर

३८४ शतपथ ब्राह्मण नस्य दक्षिण॒ ऊरौ॑ प्रत्यु॑च्य॒ वामो॑ निद॒धानीन्द्र॑स्योरुमा॒विश॒ दक्षि॑णमित्येष वा ऽअत्रेन्द्रो॒ भव॑ति॒ यद्यज॑मानस्तस्मादाहेन्द्र॑स्योरुमा॒विश॒ दक्षि॑णमित्युशुश॒तमिति॑ प्रियः प्र॒ियमित्ये॒वैतदाह स्यो॒नः स्यो॒नमिति॑ शि॒वः शि॒वमित्ये॒वैतदाह ॥१०॥ अथ सोम॑क्रय॒णाननु॒दिश॑ति । स्वान भ्राजा॑ङ्घ्रे॒ बम्भा॑रे॒ हस्त॒ सु॒हस्त॒ कृशा॑नवे॒ते वः॑ सोम॑क्रय॒णास्तान्त्सर्वान् रक्ष॒ मा वो॑ दभन्निति धिष्याणां वाऽए॒ते भाङ्गिनैतानि वै धि- ष्याणां॒ नामा॑नि तान्ये॒वैभ्य ए॒तदन्व॑दिशन ॥११॥ अथात्रापोर्णुते । गर्भो वाऽए॒- ष भ॑वति यो दीक्षते प्रावृता वै गर्भा उल्वेनेव जरायुणेव तमत्राजीजनत् तस्मा- द्वयोर्णुतः स्य वाऽअत्र॒ गर्भो भ॑वति॒ तस्मात्परिवेष्टितो भव॑ति॒ परिवृता-इव हि ग- र्भा उल्बेनेव जरायुणेव ॥१२॥ अथ वाचयति । परि॒ माग्ने॑ दु॒श्च॒रिता॑द्बाधस्वा॒ मा सु॒चरि॑ते भजेत्यासीनं वाऽएनमेष आगच्छति स आगतोऽउत्तिष्ठति तन्मिथ्याकरोति व्रतं प्रमीणाति तस्यो हेषा प्रायश्चित्तिस्तथो हास्यैतन्न मिथ्याकृतं भवति न व्रतं प्रमीणाति तस्मादाह परि माग्ने दुश्चरिताद्बाधस्वा मा सुचरिते भजेति ॥१३॥ अथ राजानमादायापोत्तिष्ठति । उदायुषा स्वायुषोदस्थाममृताँ२ऽअन्वित्यमृ॒तं वाऽए॒षो ऽनुत्तिष्ठात यः सोमं क्रीतं तस्मादाहोदायुषा स्वायुषोदस्थाममृताँ२ऽअन्विति ॥१४॥ अथ राजानमादायारोहणमभिप्रैति । प्रति पन्थामपद्महि स्वस्ति गामने- हसम् । येन विश्वाः परि द्विषो वृणक्ति विन्दते वस्विति ॥१५॥ देवा ह वै य- ज्ञं तन्वानाः । तेऽसुररक्षसेभ्य आसङ्गाद्विभयां चक्रुस्तऽएतद्यजुः स्वस्त्ययनं ददृ- शुस्तदेतेन यजुषा नाष्ट्रा रक्षांस्यपकृत्यैतस्य यजुषोऽभयेऽनाष्ट्रे निवाते स्वस्ति समाश्नुवत तथोऽएवैष एतेन यजुषा नाष्ट्रा रक्षांस्यपकृत्यैतस्य यजुषोऽभयेऽनाष्ट्रे निवाते स्वस्ति समश्नुते तस्मादाह प्रति पन्थामपद्महि स्वस्ति गामनेहसम् । ये- न विश्वाः परि द्विषो वृणक्ति विन्दते वस्विति ॥१६॥ तं वाऽइति हरति । अनसा परिवहन्ति मध्यन्त्येनमेतत्त्माक्षीला वीतं हरन्त्यनसोदावरुति ॥१७॥

कां० ३, अ० ३, ब्रा० ३, कं० १०-१७ शतपथब्राह्मण / ३८५ कहता है, “इन्द्रस्योरुमाविश दक्षिणम्” (यजु० ४।२७)—“इन्द्र की दाहिनी जंघा पर बैठ।” यहाँ यजमान इन्द्र है। इसलिए कहता है कि इन्द्र की जांघ पर बैठ। “उशन्नुशन्तम्” (यजु० ४।२७) —“प्यारा प्यारे के पास।” ’स्योनःस्योनम्” (यजु० ४२७)—“कोमल कोमल के पास।” अर्थात् कल्याणकारक कल्याणकारक के पास ॥१०॥ अब सोम के मोल को सुपुर्द करता है यह कहकर कि—‘हे स्वान, हे भ्राज, हे अंघारि, हे बंभारि, हे हस्त, हे सुहस्त, हे कृशानु, ये-ये चीजें तुम्हारे सोम का मोल हैं। इनकी रक्षा करो। ये तुमको प्रतिकूल सिद्ध न हों (यजु० ४।२७)। स्वान—उपदेश देनेवाला। भ्राज— चमकनेवाला। अंघारि—अघ अर्थात् पाप का शत्रु। बंभारि—विश्व का धारण करनेवाला। हस्त—जिसके द्वारा हँसते या प्रसन्न होते हैं वह। सुहस्त—जिसके द्वारा हाथ की क्रियाएं ठीक होती हैं। कृशानु—जो कृश अर्थात् दुर्बलों को जिलाता है (कृशं अनीति इति) या जो दुष्टों को दुबला करता है (दुष्टान् कृशति इति)। ये सात नाम धिष्ण्या अर्थात् यज्ञ की वेदी के हैं, और इसलिए वेदी के अधिष्ठाताओं के भी ये नाम हैं। अतः इन्हीं के लिए ये अनुदेश हैं ॥११॥ अब वह अपने सिर को खोलता है। जो दीक्षा लेता है वह गर्भ के तुल्य होता है। गर्भ उल्ब और जरायु से लिपटा होता है। उसी गर्भ का अब जन्म हुआ। इसलिए वह सिर को खोल लेता है। अब वह सोम गर्भ का रूप धारण करता है, इसलिए ढका हुआ होता है, क्योंकि गर्भ उल्ब और जरायु से ढका होता है ॥१२॥ अब वह इस वेदमन्त्र को पढ़वाता है—‘‘परि माग्ने दुश्चरिताद् बाधस्वा मा सुचरिते भज” (यजु० ४।२८)—‘हे अग्नि ! तू मुझे दुश्चरित से हटा और अच्छे चरित में ले जा।” जब सोम राजा आया था तब वह यजमान बैठा था। उसके आने पर वह यजमान खड़ा हो जाता है। यही मिथ्या आचरण है। इससे व्रत भंग होता है (क्योंकि उसने व्रत किया था कि सोमरस निकालने तक गर्भ की अवस्था में ही बैठा रहूँगा)। यह मन्त्र पढ़ना मानो इस दोष का प्रायश्चित्त है। इस पाठ से मिथ्या आचरण नहीं होता और न व्रत भंग होता है, इसलिए ‘परि माग्ने’ मन्त्र का पाठ किया जाता है ॥१३॥ अब सोम राजा को लेकर उठता है यह मंत्रांश पढ़कर—“उदायुषा स्वायुषोदस्था- ममृताँ २ ऽ अनु’ (यजु० ४।२८)—“उत्कृष्ट और अच्छी आयु के द्वारा मैं अमृृतों का अनुसरण करके उठूं (उन्नत होऊँ)।” वस्तुतः वह मोल लिये हुए सोम के पीछे उठता है, मानो अमृत के पीछे उठता है। इसलिए इस ‘उदायुषा’ मन्त्र का पाठ करता है ॥१४॥ अब सोम राजा की लेकर गाड़ी तक आता है इस मन्त्र को पढ़कर—“प्रति पन्थामपद्महि स्वस्तिगामनेहसम्। येन विश्वाः परि द्विषो वृणक्ति विन्दते वसु” (यजु० ४।२६)—“हमने कल्याणकारक और पाप-रहित मार्ग का अवलम्बन किया है जिससे मनुष्य सब बुराइयों (शत्रुओं) को छोड़ता और धन को प्राप्त करता है” ॥१५॥ एक बार देवों ने यज्ञ ताना। वे असुर राक्षसों के आक्रमण से भयभीत हुए। तब उन्होंने इस यजुः (प्रार्थना) को कल्याण-गृह के रूप में देखा और इस यजुः के द्वारा राक्षस दुष्टों को मारकर इस यजुः के अभय और क्लेशरहित घर में शान्ति प्राप्त की। इसी प्रकार इस यजुः की सहायता से दुष्ट राक्षसों को मारकर इस यजुः के अभय और क्लेशरहित घर में शान्ति प्राप्त करता है। इसीलिए ‘प्रति पन्थाम्’ मंत्र का पाठ करता है ॥१६॥ इस सोम को पहले इस प्रकार (हाथ में सिर पर रखकर) ले जाते हैं और फिर गाड़ी में ले जाते हैं। इससे वे उसकी महत्ता बढ़ाते हैं। इसलिए वे बीज को सिर पर रखकर (खेत में) ले जाते हैं ॥१७॥

अध्याय-३, ब्राह्मण-४

३८६ शतपथ ब्राह्मण अथ॒ यद॒पामन्त॑ क्री॒णाति॑ । र॒सो वाऽआप॑ः सर॒समे॒वैतत्क्री॑णात्यथ॒ यद्धिर॑ण्यं भव॑- ति सशु॒क्रमे॒वैतत्क्री॑णात्यथ॒ यद्वा॑सो भव॑ति सवच॑समे॒वैतत्क्री॑णात्यथ॒ यद॒जा भव॑- ति सतप॑समे॒वैतत्क्री॑णात्यथ॒ यद्धे॒नुर्भव॑ति साशिर॒मेवैतत्क्री॑णात्यथ॒ यन्मिथु॒नौ भ॑- वतः॒ स॒मिथु॑नमे॒वैतत्क्री॑णाति॒ तं वै दश॑भिरेव॒ क्री॑णीयान्नादश॑भिर्दशाक्षरा॒ वै वि॒- राड्वि॒राट् सोम॒स्तस्माद्दश॑भिरेव॒ क्री॑णीयान्नादश॑भिः ॥ १८ ॥ ब्राह्मणम् ॥ ६ [३. ३.] ॥ द्वितीयः प्रपाठकः ॥ कण्डिकासंख्या १२८ ॥ ॥ नीडे॑ कृष्णाजिनमास्तृणाति । अ॒दित्या॒स्त्वग॑सीति॒ सोऽत्रै॑व बन्धु॒रथैनमासा॒- दय॒त्यदि॑त्यै॒ सद॒ आसी॒देती॒यं वै पृ॑थि॒व्यदि॑तिः सेयं प्रतिष्ठा॒ तद॒स्यामे॒वैनमे॒तत्प्र॑ति॒- ष्ठाय प्रतिष्ठा॑पयति॒ तस्मा॑दाहादि॑त्यै॒ सद॒ आसी॒देति॑ ॥ १ ॥ अथैनमभिमृश्य वाच- यति । अ॒स्तम्भा॒द्द्यां वृ॑ष॒भोऽअ॒न्तरि॑क्षम॒ति दे॒वा ह॒ वै य॒ज्ञं त॒न्वाना॒स्तेऽसुर॒रक्ष॑- सेभ्य आस॒ङ्गाद्बिभ॑यां चक्रुस्त॒देनमेत॒च्छाया॑ऽसमे॒व ब॒धाञ्च॑क्रुर्यदाहास्तम्भा॒द्द्यां वृ॑- ष॒भोऽअ॒न्तरि॑क्षम॒ति ॥ २ ॥ अ॒मिमी॑त व॒रिमा॑णं पृथि॒व्या इति॑ । त॒देनेने॒माँल्लोका- नास्तृणोति॒ तस्य॒ हि न वृत्तास्ति॒ न ब॒धो येने॒मे लो॒का आ॑स्तृ॒तास्तस्मा॑दाहा॒मि- मी॑त व॒रिमा॑णं पृथि॒व्या इति॑ ॥ ३ ॥ आसी॑द्वि॒श्वा भुव॑नानि स॒म्राडिति॑ । त॒देने॒ने- द॒ꣳ सर्व॑मास्तृणोति॒ तस्य॒ हि न वृत्तास्ति॒ न ब॒धो येने॒दꣳ सर्व॑मास्तृतं॒ तस्मा॑दा- हासी॑द्वि॒श्वा भुव॑नानि स॒म्राडिति॑ ॥ ४ ॥ विश्वेत्तानि॒ वरु॑णस्य व्र॒तानीति॑ । तद॒- स्मा॒ऽइदꣳ सर्व॒मनु॑वर्त्म करोति॒ यदि॒दं किं च॒ न कं च॒न प्र॒त्युद्यामि॑नं॒ तस्मा॑दाह॒ विश्वेत्तानि॒ वरु॑णस्य व्र॒तानीति॑ ॥ ५ ॥ अथ सोमपर्याणहननेन पर्याणह्यति । नैदे- नं नाष्ट्रा रक्षा॑ꣳसि प्रमृशा॒निति॒ गर्भो वाऽए॒ष भ॑वति ति॒र्-इव॒ वै गर्भास्ति॒र्-इ- वैतत्पर्याणहं ति॒र्-इव॒ वै दे॒वा मनु॒ष्येभ्यस्ति॒र्-इवैतद्यत्पर्याणहं तस्मा॑द्वै पर्याण- ह्यति ॥ ६ ॥ स पर्याणह्यति । वने॑षु व्य॒न्तरि॑क्षं तता॒नेति॒ वने॑षु॒ हीद॒मन्तरि॑क्षं वि॒ततं॒ वृक्षाग्रे॑षु॒ वाज॒मर्व॑त्सु॒ पय॑ उ॒स्रिया॑स्विति वी॒र्यं वै वाज॑ः पुमाꣳसो॒ऽर्व॑न्तः

कां० ३, अ० ३, ब्रा० ३-४, कं० १८ व १-७ शतपथब्राह्मण / ३८७ सोम को जल के समीप मोल लेता है। जल ही रस है। इस प्रकार वह उसको रस-युक्त करता है। सोने के होने का तात्पर्य यह है कि वह उसको शुक्र-(तेज)-सहित मोल लेता है। वस्त्र के होने का तात्पर्य यह है कि वह उसको चमड़े-सहित मोल लेता है। बकरी के होने का तात्पर्य यह है कि वह उसको तप के साथ मोल लेता है। गाय के होने का तात्पर्य यह है कि वह उसको दूध-सहित मोल लेता है जिससे सोमरस में मिलाया जा सके। गायों के जोड़े का अर्थ यह है कि वह सोम को जोड़े के साथ मोल लेता है। सोम को दश चीजों के बदले मोल ले। दश से कम या ज्यादा नहीं, क्योंकि विराट् छन्द में दश अक्षर होते हैं। सोम विराट् है इसलिए दश के बदले खरीदे, न्यूनाधिक के बदले नहीं ॥१८॥ अध्याय ३—ब्राह्मण ४ गाड़ी के नीड अर्थात् बन्द स्थान में काले हिरन के चर्म को रखता है यह कहकर— “अदित्यास्त्वगसि” (यजु० ४।३०)-“तू अदिति की त्वचा है।” अब वह सोम को रख देता है यह कहकर-“अदित्यै सदऽआसीद” (यजु० ४।३०)-“तू अदिति के स्थान पर बैठ।” यह पृथिवी ही अदिति है और यही प्रतिष्ठा है। इस प्रकार वह उसको इस प्रतिष्ठा में स्थापित करता है। इसीलिए कहा, 'तू अदिति के स्थान पर बैठ' ॥१॥ अब वह सोम को छूकर पढ़ता है-“अस्तभ्नाद् द्यां वृषभोऽअन्तरिक्षम्” (यजु० ४।३०)- “इस वृषभ ने द्यौ और अन्तरिक्ष को उभारा।” देवों ने यज्ञ ताना और वे असुर राक्षसों के आक्रमण से डरे। उन्होंने इस सोम को वध की अपेक्षा बड़ा कर दिया। इसीलिए कहा, 'अस्तभ्नाद्' इति ॥२॥ “अमिमीत वरिमाणं पृथिव्याः” (यजु० ४।३०)-“उसने पृथिवी के विस्तार को मापा। इस प्रकार इस सोम की सहायता से इन लोकों को प्राप्त करता है। जिसने इन लोकों को प्राप्त कर लिया उसके लिए न कोई वध है, न मारनेवाला। इसीलिए कहता है, 'अमिमीत वरिमाणं पृथिव्याः' ॥३॥ “आसीदद् विश्वा भुवनानि सम्राट्” (यजु० ४।३०)-“सब भुवनों में वह सम्राट् के रूप में बैठा।” इसकी सहायता से वह 'सब' की प्राप्ति करता है। जिसको इस 'सब' की प्राप्ति हो गई उसके लिए कोई घातक या वध करनेवाला नहीं रहता। इसीलिए 'आशीदद्' मन्त्र पढ़ा ॥४॥ “विश्वेत् तानि वरुणस्य व्रतानि” (यजु० ४।३०)-“वस्तुतः ये वरुण के व्रत हैं।” इसके द्वारा वह सबको उसका अनुयायी करता है, अर्थात् जो कुछ यहाँ है अथवा जो कोई प्रतिकूल है उस सबको। इसीलिए 'विश्वेत् तानि' मन्त्र पढ़ा गया ॥५॥ अब सोम पर्याणहन अर्थात् सोम-वस्त्र से सोम को लपेटता है कि दुष्ट राक्षस उसको छू न ले। वस्तुतः यह गर्भ है, गर्भ छिपा रहता है; और यह जो ढका हुआ है वह भी छिपा रहता है। देव मनुष्यों से छिपे रहते हैं। जो ढका हुआ है वह भी छिपा रहता है, अतः सोम को कपड़े में लपेटता है ॥६॥ इस मन्त्र को पढ़कर लपेटता है-“वनेषु व्यन्तरिक्षं ततान” (यजु० ४।३१)-“वनों के ऊपर अन्तरिक्ष ताना गया।” वनों अर्थात् वृक्षों के सिरों पर तो अन्तरिक्ष तना हुआ है ही। “वाजमर्वत्सु पयऽउस्रियासु” (यजु० ४।३१)-“मनुष्यों में वीर्य और गायों में दूध।” यहाँ 'वाज्' का अर्थ है वीर्य और 'अर्वन्त' का अर्थ है मनुष्य। इस प्रकार मनुष्यों में वीर्य धारण करता है।

३८८ शतपथ ब्राह्मण पु॒रु॒ष्वे॒वैतद्वीर्यं॑ दधाति पय॑ उ॒स्त्रिया॑स्विति पयो॒ हीदमु॒स्रिया॑सु हि॒तं॒ हृत्सु क्रतुं॒ वरु॑णो वि॒द्वन्निति॑ हृ॒त्सु ह्ययं॒ क्रतुर्मनोजवः॒ प्रवि॑ष्टो वि॒द्वन्निति॑ वि॒न्दु॒ र्ह्ययं॒ प्रज्ञा॑स्व॒ग्निर्दिवि सूर्य॑मदधा॒त्सोम॒मद्रा॑विति दि॒वि ह्य॑सौ सूर्यो॑ हि॒तः सोम॑म॒- द्रा॑विति गि॒रिषु॒ हि सोमो॒त्तस्मा॑दाह दि॒वि सूर्य॑मदधा॒त्सोम॒मद्रा॑विति ॥७॥ अथ॑ य॒दि द्वे कृ॒ष्णाजिने भवतः॑ । तयो॒रन्यतर॒त्प्रत्यानह्यति प्रतीनाह॒भाजनं॒ यद्यु॒त्वेकं॑ भव॑ति कृ॒ष्णाजिनग्रीवा॒मु॒वाव॑कृत्य॒ प्रत्या॑नह्यति प्रतीनाह॒भाजनं॒ सू॒र्यस्य॒ चक्षु॒- रारो॒हम॒ग्नेर॒क्ष्णः कनी॑नकम् । यत्रे॒तशे॑भिरीयसे॒ भ्राज॑मानो विपश्चि॒तेति॒ सूर्य॑मे॒वैत॒- त्पुर॒स्ता॑त्करोति॒ सूर्यः॑ पुर॒स्तान्नाष्ट्रा॒ रक्षा॑ꣳस्यपघ्नन्नेत्यथाभयेनानाष्ट्रेण॒ परिव॑हन्ति ॥८॥ उ॒द्धते प्र॒ऽउगे फलके भवतः । तदुत्तरेण तिष्ठ॒न्त्सुब्रह्मण्यः प्राज॑ति श्रेया॒- न्वाऽए॒षोऽभ्यारोहाद्भवति को ह्येतमर्ह॒त्यभ्यारो॑ढुं॒ तस्मा॑दुत्तरेण तिष्ठ॒न्प्राज॑ति ॥९॥ पलाशशाखया प्राज॑ति । यत्र॒ वै गायत्री सो॒मम॒च्छाप॑तत्तदस्या॒ऽआहर॑न्त्या॒ऽअपादु॒- स्ताम्भायत्य॑ पर्णं प्रचि॒च्छेद॒ गाय॒त्र्यै वा सो॒मस्य वा॒ राध॑स्तत्पति॒त्वा प॒र्णोऽभव॒त्त- स्मात्प॒र्णो नाम॒ तय्दे॒वात्र॒ सोम॑स्य॒ न्यक्तं॒ तदिहाप्यसदिति॒ तस्मा॑त्पलाशशाखया प्राज॑ति ॥१०॥ अथानडुहा॑वाह्वय॑ति । तौ यदि॑ कृ॒ष्णौ स्या॑तामन्यत॒रो वा कृष्णस्त॒- न्न विद्या॑द्वर्षिष्यत्ये॒षमः पर्जन्यो वृष्टिमा॒न्भविष्यतीत्येतद्विज्ञानम्॑ ॥११॥ अथ॑ युनक्ति । उ॒स्रावे॑तं धूर्षाहा॒वित्य॒स्रौ हि भवतौ धूर्षाहा॒विति धूर्वाहा॑ हि भवतौ यु॒ज्येथामनश्रू॒रिति यु॒ज्येते ह्यनश्रू॒ऽइत्यनार्ता॒विति तद्वीरहणावित्यपापकृतावि- ति तद्ब्रह्मचोदनाविति ब्रह्मचोदनौ हि भवतः स्वस्ति यज॑मानस्य गृ॒हान्गच्छत- मिति यथैनावतरा नाष्ट्रा रक्षाꣳसि न हिꣳस्युरेवमेतदाह ॥ १२ ॥ अथ पश्चात्प- रिक्रम्य । अपालम्बमभिपद्य॒त्याह॒ सोमा॑य क्रीतायानुब्रूहीति॒ सोमा॑य पर्याह्रियमाणा॒ये- ति वातो यत॒रथा कामयेत ॥ १३॥ अथ वाचयति । भ॒द्रो मे॒ऽसि प्र॒च्यव॑स्व भुव- स्प॒तऽइति भ॒द्रो ह्यस्यैष भ॑वति तस्मा॑न्नान्यमाद्रियते॒ऽप्यस्य राजानः सभागा आ-

कां० ३, अ० ३, ब्रा० ४, कं० ७-१४ शतपथब्राह्मण / ३८६ गायों में तो दूध होता ही है। [मेरी धारणा है कि पुमान् का अर्थ है 'नर' और 'उस्रियासु' का मादा। नरों में वीर्य होता है और नारियों में दूध'] । "हृत्सु क्रतुं वरुणो विश्व॑म॒ग्निम्" (यजु० ४।३१)-"मनों में बुद्धि और घरों में अग्नि वरुण ने (स्थापित की) ।" मनों में बुद्धि स्थापित है ही और घरों में या प्रजाओं में अग्नि । "दिवि सूर्य॑मदधात्स सोममद्रौ" (यजु० ४।३१) - "सूर्य को द्युलोक में स्थापित किया और सोम को पहाड़ पर" [यहाँ सोम का अर्थ 'चन्द्र' ठीक नहीं है। सोमलता ही पहाड़ पर होती है और द्यौलोक का सूर्य उसको प्रभावित करता है ? ] द्यौलोक में सूर्य है ही और सोम पहाड़ों में होता ही है। इसलिए कहा 'दिवि सूर्य' इत्यादि ॥७॥ यदि दो मृगचर्म हों तो उनमें से एक को ध्वजा बनाकर लटकाता है। यदि एक हो तो गर्दन के ऊपर से काटकर ध्वजा के रूप में लटकाता है। यह मन्त्र पढ़कर - "सूर्य॑स्य चक्षुरारोहा- ऽग्नेरक्षणः कनीनकम् । यत्रैतशेभिरीयसे भ्राज॑मानो विपश्चिता" (यजु० ४।३२) - "हे मृगचर्म, तू सूर्य की आँख के ऊपर चढ़ और अग्नि की आँख के तारे के ऊपर चढ़। जहाँ सूर्य और अग्नि के साथ चमकता हुआ तू चढ़ता है।" इस प्रकार वह सूर्य को आगे करता है। सूर्य के सामने दुष्ट राक्षस नहीं आने पाते। अब वे सोम को निर्विघ्न गाड़ी में ले जाते हैं ॥८॥ गाड़ी को बल्लियों के आगे के भाग में प्रउग या त्रिभुजाकार दो तख्ते होते हैं। उन दोनों के बीच में सुब्रह्मण्य (उद्गाता का सहायक) खड़ा होकर गाड़ी को चलाता है। सोम राजा उससे बहुत ऊँचा होता है। ऐसा कौन है जो सोम राजा के बराबर बैठ सके ? इसलिए वह खड़ा होकर गाड़ी को चलाता है ॥६॥ पलाश की शाखा से हाँकता है। जब गायत्री सोम की ओर उड़ी और उसको लिये जा रही थी तो एक बिना पैर के मनुष्य ने निशाना लगाकर गायत्री का या सोम राजा का एक पर गिरा दिया। वह गिरकर पर्ण हो गया। इसीलिए उसे पर्ण कहते हैं। वह सोचता है कि जो बात उस सोम के साथ हुई वह यहाँ भी हो। इसलिए वह पलाश से हाँकता है ॥१०॥ दो बैल जुतते हैं। यदि दोनों काले हों या एक काला हो तो जानना चाहिए कि वर्षा बहुत अच्छी होगी। यही विज्ञान है ॥११॥ बैलों को जोतता है यह मन्त्र पढ़कर - "उस्त्रावेतं धूर्षाहौ" (यजु० ४।३३)-"हे धुरे को सहन करनेवाले दो बैलो, तुम आओ।" क्योंकि ये दो बैल हैं और धुरे को सह सकते हैं। "युज्येथामनश्रू" (यजु० ४।३३)-"आँसूरहित तुम जुतो।" 'आँसूरहित' का अर्थ हैदुःख-रहित' । "अवीरहणौ" (यजु० ४।३३)- "पापरहित।" "ब्रह्मचोदनौ" (यजु० ४।३३)- "ब्रह्म के प्रेरक ।" "स्वस्ति यजमानस्य गृहान्गच्छतम्" (यजु० ४।३३)-"यजमान के घर में कल्याणकारक होकर आओ।" इसके कहने का प्रयोजन यह है कि मार्ग में दुष्ट राक्षस उसको न सतावें ॥१२॥ मुड़कर गाड़ी के पीछे जाता है और अपालम्ब (गाड़ी के पीछे एक लकड़ी का टुकड़ा लगा रहता है जिसे अपालम्ब कहते हैं) को पकड़कर (होता से) कहता है, 'खरीदे हुए सोम के लिए पढ़ो' या 'गाड़ी में लाये हुए सोम के लिए पढ़ो' इन दोनों वाक्यों में से जिस वाक्य को चाहे कहे ॥१३॥ अब वह मन्त्र पढ़वाता है - "भद्रो मेऽसि प्रच्यवस्व भुवस्पते" (यजु० ४।३४)-'हे संसार के पति ! तू मेरे लिए कल्याणकारी है, चल।" सोम वस्तुतः उसके लिए कल्याणकारी है। अतः वह सोम के सिवाय और किसी का आदर नहीं करता। जिस प्रकार महाराजा के आधीन राजा

३६० शतपथ ब्राह्मण गच्छ॑ति पूर्वी॒ राज्ञो॒ऽभिव॑दति भ॒द्रो हि भव॑ति॒ तस्मा॑दाह भ॒द्रो मे॒ऽसीति॒ प्रच॑व- स्व॒ भुव॑स्पत॒ऽइति॒ भुव॑नानाꣳ ह्ये॒ष पति॒र्विश्वान्य॒भि धामा॑नी॒त्यङ्गा॑नि॒ वै विश्वा॑- नि धामा॑न्य॒ङ्गान्ये॒वैतद॑भ्याह॒ मा त्वा॑ परिप॒रिणो॑ विद॒न्मा त्वा॑ परिप॒न्थिनो॑ विद- न्मा त्वा॒ वृका॑ अघाय॒वो वि॑द॒न्निति॒ यथै॑नम॒लरा॒ नाष्ट्रा रक्षा॑ꣳसि॒ न वि॒न्देयु॑रे॒वमे॒- तदा॑ह ॥ १४॥ श्ये॒नो भू॒त्वा परा॑प॒तेति॑ । वय॒ ह्ये॑नमेत॒द्भूतं॒ प्रपा॑तयति॒ यद्वा॒ऽउग्रं॑ तन्नाष्ट्रा रक्षा॑ꣳसि॒ नान्न्व॑वपल्येतद्वै॒ वय॑सामो॒जिष्ठं॒ बलि॑ष्ठं॒ यच्छ्ये॒नस्तमे॒वैत॒द्भूतं॒ प्रपा॑- तयति॒ यदा॑ह श्ये॒नो भू॒त्वा परा॑प॒तेति॑ ॥ १५॥ अथ श॒रीर॑मे॒वान्व॑वहरन्ति । य॒ज्ञम॑- नस्य गृ॒हान्ग॑च्छ॒ तन्वौ॒ सꣳस्कृ॒तमिति॒ नात्र॑ तिरो॒हित॑मिवास्ति ॥ १६॥ अथ सु॒ब्रह्म॑- ण्यामाह्व॑यति । यथा॒ येभ्यः॑ पच्येत॒ तान्ब्रू॑यादि॒त्यह्वं॑ वो पक्ता॒स्मीत्ये॑वमे॒वैतद्दे॒वे- भ्यो य॒ज्ञं निवे॑दयति सुब्रह्म॒ण्यो३ꣳ सु॒ब्रह्म॑ यो३मि॒ति ब्रह्म॑ हि दे॒वान्प्रच्या॒वय॑ति त्रिष्कृ॑त्व॒ आह॑ त्रि॒वृद्धि य॒ज्ञः ॥ १७॥ इन्द्राग॑च्छेति॒ । इन्द्रो॒ वै य॒ज्ञस्य॑ दे॒वता॒ तस्मा॑- दाहेन्द्राग॒च्छेति॒ हरिव॒ आग॑ह मेधाति॒थेर्मे॑ष वृषणश्वस्य मेने । गौरावस्कन्दि॒न्नह॑- ल्यायै॑ जारेति॒ तद्या॒न्येवा॑स्य॒ चर॑णानि॒ तैरे॒वैन॑मे॒तत्प्रमु॑मोदयिषति ॥ १८॥ कौशि॑- क ब्राह्म॑ण गौतम ब्रुवा॒णेति॑ । शश्व॑द्वैतद्दारुणि॒नाधु॒नोप॑ज्ञातं॒ यद्गौ॑तम ब्रुवा॒णेति॑ स॒ यदि॑ कामयेत ब्रू॒यादे॒तद्यद्यु॑ काम॒येतापि॒ नाद्रि॑येतत्यह्वे॒ सुत्या॒मिति॒ याव॑दहे सु॒- त्या भ॑वति ॥ १९॥ देवा॑ ब्रह्म॒ण आग॑हतेति । तद्दे॒वांश्च॑ ब्राह्म॒णांश्चा॑है॒तैर्यत्रो॒भ- यैर॒र्थो भ॑वति॒ यद्दे॒वैश्च॑ ब्राह्म॒णैश्च॑ ॥ २०॥ अथ प्रतिप्रस्थाता । अग्रेण शालामग्नी- षोमी॑येण प॒शुना॒ प्रत्यु॑पतिष्ठतेऽग्नीषोमौ॒ वाऽए॒तमन्त॑र॒म्भऽआ॑दधाते॒ यो दीक्ष॑त ऽआग्नावैष्ण॒वं ह्यदो दी॑क्षणी॒यं ह॒विर्भव॑ति॒ यो वै विष्णुः॒ सोमः॒ स ह॒विर्वा॒ऽए॒- ष भ॑वति॒ यो दीक्ष॑ते॒ तदेन॑मन्त॒रम्भऽआ॑दधाति॒ तत्प॒शुना॒त्मानं॒ निष्क्री॑णीते ॥ २१॥ तद्धै॑के । आ॒ह॒व॒नीया॑दु॒ल्मुक॒माहृत्य॑य॒मग्निर॒यꣳ सोम॒स्ताभ्याꣳ॒ सह॑ स॒द्यां निष्क्रे॑- ष्यामह॒ऽइति॒ वद॑न्त॒स्तदु॒ तथा॑ न कु॒र्यादत्र॑ वा॒ऽए॒तौ क्व॑ च॒ तत्सहैव॑ ॥ २२॥ स PARS II.

कां० ३, अ० ३, ब्रा० ४, क० १४-२२ शतपथब्राह्मण / ३६१ लोग आते हैं और वह पहले उनका अभिवादन करता है और कल्याणकारी होता है, इसीलिए कहा, ‘भद्रो मे ऽ असि’ इत्यादि। यह भुवनों का पति है। इसलिए कहा है ‘चल’। “विश्वान्यभि धामानि” (यजु० ४।३४)-“सब धामों के लिए।” ‘विश्वानि धामानि’ से तात्पर्य है अंगों से। “मा त्वा परिपारिणो विदन् मा त्वा परिपन्थिनो विदन् मा त्वा वृकाऽअघायवो विदन्” (यजु० ४।३४)-“तुझे लुटेरे न मिलें, तुझे डाकू न मिलें, तुझे खाऊ भेड़िये न मिलें।” यह इसलिये कहता है कि दुष्ट राक्षस उसको किसी प्रकार से न सतावें ॥१४॥ “श्येनो भूत्वा परापत” (यजु० ४।३४)-“बाज होकर उड़ जा।” उसको पक्षी बनाकर उड़ाता है। जो बलवान् होता है, दुष्ट राक्षस उसका पीछा नहीं करते। श्येन या बाज सब पक्षियों में बलवान् होता है। उसको बाज बनाकर उड़ाता है। इसलिये कहा, ‘श्येनो भूत्वा’ आदि ॥१५॥ अब वे उसके शरीर को लाते हैं। “यजमानस्य गृहान् गच्छ तन्नौ संस्कृतम्” (यजु० ४।३४)—“यजमान के घरों को जा, जो हमारे लिए तैयार किया हुआ है।” यह बहुत स्पष्ट है ॥१६॥ अब सुब्रह्मण्य-सम्बन्धी जाप करता है। जैसे जिन लोगों के लिए खाना पकाना हो उनसे कहे कि मैं आपके लिए अमुक दिन भोजन बनाऊँगा, इसी प्रकार देवताओं के लिए यज्ञ का निवेदन करता है। ‘सुब्रह्मण्यमो ३ म्’ ऐसा तीन बार कहता है, क्योंकि ब्रह्मा ही देवताओं को प्रेरणा करता है। तीन बार कहने का प्रयोजन यह है कि यज्ञ के तीन भाग हैं ॥१७॥ 'इन्द्र, आ।' इन्द्र यज्ञ का देवता है। इसलिए कहा कि इन्द्र आ। ‘आ जा; घोड़ोंवाले मेधातिथि के भेड़े, आ ! वृषणश्व की स्त्री (या बाणी), आ ! भैंस के सवार, आ ! अहल्या के जार या उपपति, आ !' इन प्रकार वह उसको उसके व्यवहार में प्रसन्न करता है। (पता नहीं कि इन्द्र के ये नाम क्यों हैं ? या इनका वास्तविक अर्थ क्या है) ॥१८॥ ‘कौशिक, ब्राह्मण, गौतम कहलानेवाले’ (ये भी इन्द्र के ही नाम मालूम होते हैं)। आजकल आरुणि ने यह वाक्य निकाला है अर्थात् ‘कौशिक, ब्राह्मण, गौतम कहलानेवाले’। यदि जी चाहे तो इस वाक्य को कहे, जी चाहे न कहे। ‘इतने दिनों में सोम-यज्ञ होगा।' यहाँ जितने दिनों में होनेवाला हो उनके नाम ले दे ॥१९॥ ‘देव और ब्राह्मण, आओ !' यह वह देवों और ब्राह्मणों से कहता है, क्योंकि इन्हीं देवों और ब्राह्मणों की उसको आवश्यकता है ॥२०॥ अब प्रतिप्रस्थाता शाला के आगे अग्नि और सोम के पशु को लाता है। जो दीक्षा लेता है वह अपने-आपको अग्नि और सोम को दाढ़ों में रख देता है। दीक्षा की हवि वस्तुतः अग्नि और विष्णु की होती है। जो विष्णु है वही सोम है। हवि वही है जो दीक्षा लेता है। इस प्रकार उन्होंने उसको दाढ़ों में दबा लिया है और इस पशु के द्वारा ही उसका छुटकारा होता है ॥२१॥ कुछ लोग आहवनीय में से जलती लकड़ी निकाल लाते हैं यह कहते हुए, ‘यह अग्नि है, यह सोम है। इन्हीं दोनों के सहारे हमारा उद्धार होगा।' परन्तु ऐसा नहीं करना चाहिए। जहाँ कहीं वे हों वे साथ ही होते हैं ॥२२॥

अध्याय-४, ब्राह्मण-१

३६२ शतपथ ब्राह्मण

वै द्विरूपो भवति । द्विदेवत्यो हि भवति देवतयोरसम॑दं॒ कृ॒ष्णसारं॑गं स्या॒दित्या॒- क्षरेत॒द्ध्येनयो॑ रू॒पतम॒मिवेति॒ यदि॑ कृ॒ष्णसारं॑गं न॒ विन्दे॒दप्य॑-ऽपि लो॒हितसा॑रंगं स्यात् ॥ २३ ॥ तस्मिन्वाचयति । नमो॒ मित्र॑स्य॒ वरु॑णस्य॒ चक्ष॑से म॒हो दे॒वाय॒ तदृ॒- तꣳ॒ स॑पर्यत । दू॒रे दृशे दे॒वजा॑ताय के॒तवे॑ दि॒वस्पु॒त्राय॒ सूर्या॑य॒ शꣳस॒तेति॒ नम ए॒- वास्मा॒ एतत्क॑रोति मित्रे॒धैर्य॑मे॒वैने॑नैतत्कु॑रुते ॥ २४ ॥ अथाधर्यु॑रारो॒हणं॒ विमु॑ञ्चति । वरु॑णस्योत्तम्भन॒मसीत्युप॑स्तम्भनेनोप॑स्तभ्नाति वरु॑णस्य स्कम्भस॒र्जनी॑ स्थ॒ इति॑ श॒- म्येऽऽउद्व॑हति स॒ यदा॒ह वरु॑णस्य स्कम्भस॒र्जनी॑ स्थ॒ इति॑ वरु॒ण्यो ह्ये॑ष ए॒तर्हि॑ भ॒- वति॒ यत्सोमः॑ क्री॒तः ॥ २५ ॥ अथ चत्वारो॒ राज्ञा॒सन्दी॒माद॑दते । द्वौ वा॒ऽअ॒स्मै॑ मा॒- नुषा॒य राज्ञ॒ऽआद॑दाते॒ऽथैवैतां चत्वारो॒ योऽस्य॑ स॒कृत्स॒र्वस्येष्टे॑ ॥ २६ ॥ औदु॑म्बरी भवति । अन्नं॒ वाऽऊर्गौदु॑म्बर ऊर्जो॒ऽन्नाद्य॒स्यावरु॑द्ध्या॒ तस्मा॑दौदुम्बरी भवति ॥ २७॥ नाभिदघ्ना भवति । अत्र वाऽअन्नं॒ प्रति॑तिष्ठत्य॒न्नꣳ सो॑म॒स्तस्मा॑न्नाभिदघ्ना भवत्यत्रो ऽएव रेत॑स॒ आश॑यो रेत॒: सोम॒स्तस्मा॑दत्रदघ्ना भवति ॥ २८ ॥ ता॒मभि॒मृश॑ति । व॒- रुण॒स्य॒ऽऋत॒सद॑न्यसीत्यथ कृष्णाजिन॒मास्तृ॑णाति वरु॑णस्य॒ऽऋत॒सदन॑मसी॒त्यथैनमा॒- सादयति वरु॑णस्य॒ऽऋत॒सदन॒मासी॑देति स॒ यदा॒ह वरु॑णस्य॒ऽऋत॒सदन॒मासी॑देति वरु॒ण्यो ह्ये॑ष ए॒तर्हि॑ भवति ॥ २९॥ अथैनꣳ शालां॑ प्रपा॒दय॑ति । स प्रपा॒द्यन्वा॒- चयति या ते॒ धामा॑नि ह॒विषा॒ यज॑न्ति॒ ता ते॒ विश्वा॑ परि॒भूर॑स्तु य॒ज्ञम् । गयस्फा॒- नः प्र॒तर॑णः सु॒वीरो॒ऽवीर॑हा प्रचरा सोम दु॒र्यानि॒ति गृ॒हा वै दु॒र्या गृ॒हान्त् शि॒वः शा॒न्तोऽपा॑पकृत्प्र॒चरि॑त्ये॒वैतदा॑ह ॥ ३०॥ अत्र॒ हैके॑ । उदपा॒त्रमुप॑निन॒यन्ति॒ यथा॑ रा॒- ज्ञऽआग॑तायोदक॒माहृ॑रेदे॒वमे॒तदिति॒ वद॑न्त॒स्तदु॒ तथा॑ न॒ कुर्या॑न्मानु॒षꣳ ह॒ ते य॒ज्ञे कुर्व॑न्ति॒ व्यृ॑द्धं॒ वै तद्य॒ज्ञस्य॒ यन्मानु॑षं॒ नेद्व्यृ॑द्धं य॒ज्ञे कर॒वाणी॑ति॒ तस्मा॒न्नोप॑निनयेत् ॥ ३१ ॥ ब्राह्मणम् ॥ १ [३.४] ॥ तृतीयोऽध्यायः [१८] ॥ ॥ शिरो॒ वै य॒ज्ञस्याति॑थ्यं बा॒हू प्र॑ायणीयोदयनी॒यौ । अ॒भितो॒ वै शिरो॑ बा॒हू भ॒-

का० ३, अ० ३-४, ब्रा० ४-१, क० २३-३१ व १ शतपथब्राह्मण / ३६३ पशु दो रूप का होता है, क्योंकि दो देवताओं का होता है। कुछ का कथन है कि इन दोनों का मेल करने के लिए कृष्ण सारंग होना चाहिए, क्योंकि यही उन दोनों देवताओं के समानतम है। यदि कृष्ण-सा रंग न मिले तो लोहित सारंग (लाल धब्बेवाला) होना चाहिए ॥२३॥ अब यह मन्त्र पढ़वाता है— “नमो मित्रस्य वरुणस्य चक्षसे महो देवाय तदृतं॒ सपर्यत। दूरेदृशे देवजाताय केतवे दिवस्पुत्राय सूर्याय शं॒सत” (यजु० ४।३५)—“मित्र और वरुण की आँख के लिए नमस्कार। बड़े देव के लिए इस पूजा को करो। इस दूरदर्शी देवोत्पन्न, केतु, द्यौ के पुत्र, सूर्य के लिए प्रशंसा करो।” इस प्रकार पशु की अर्चना करता है और उसकी मित्रता का चिह्न बनाता है ॥२४॥ अब अध्वर्यु कपड़े को कटाता है। “वरुणस्योत्तम्भनमसि” (यजु० ४।३६)—“वरुण का खम्भा है तू।” इससे गाड़ी में खम्भा लगाता है। “वरुणस्य स्कम्भसर्जनी स्थः” (यजु० ४।३६)— “तुम दोनों वरुण की खूंटी हो।” इससे खूंटियाँ निकालता है। ‘वरुण की तुम दोनों खूंटियां हो’ इसलिए कहता है कि सोम ही अब वरुण है ॥२५॥ अब चार आदमी सोम राजा के तख्त को उठाते हैं। मनुष्य राजा के तख्त को दो आदमी उठाते हैं। सोम राजा के तख्त को चार उठाते हैं क्योंकि यह सबके ऊपर है ॥२६॥ यह तख्त उदुम्बर की लकड़ी का होता है, उदुम्बर रस और अन्न है। रस और अन्न के लिए। इसलिए यह उदुम्बर की लकड़ी का होता है ॥२७॥ यह नाभि के बराबर ऊँचा होता है। क्योंकि नाभि तक ही अन्न पहुंचता है। सोम अन्न है, इसलिए यह नाभि के बराबर ऊँचा होता है। यहीं वीर्य रहता है, सोम वीर्य है। इसलिए नाभि के बराबर होता है ॥२८॥ अब वह तख्त को छूता है यह पढ़कर-‘वरुणस्य ऽ ऋतसदन्यसि’ (यजु० ४।३६)-‘तू वरुण की उचित बैठक है।” अब वह उस पर काला मृग-चर्म बिछाता है यह पढ़कर—“वरुणस्य ऋतसदनमासीद”(४।३६)—“वरुण के उचित स्थान पर बैठ।” सोम अब वरुण जैसा हो गया। इसलिए कहा ‘वरुण के उचित स्थान पर बैठ’ ॥२६॥ अब सोम को शाला में ले जाता है। और ले जाते हुए यजमान से यह कहलवाता है— “या ते धामानि हविषा यजन्ति ता ते विश्वा परिभूरस्तु यज्ञम्। गयस्फानः प्रतरणः सुवीरोऽवीरहा प्रचरा सोम दुर्यान्” (यजु० ४।३७)—“हवि से ये लोग तेरे जिन धामों की अर्चना करें वे सब धाम यज्ञ को चारों ओर से घेर लें। हे सोम, हमारे घरों में आ जा !” गृहस्थ की सम्पत्ति को देने- वाला, आपत्तियों का भगानेवाला, वीर और वीरों का हनन न करनेवाला, (ये चार विशेषण सोम के हैं) ‘दुर्यान्’ का अर्थ है घर। इसके कहने का तात्पर्य यह है कि हमारे घर शुभ और शान्त तथा पापरहित होवें ॥३०॥ कुछ लोग जल के पात्र से जल उंड़ेलते हैं और कहते हैं कि जब राजा आता है तो उसके लिए भी जल-सिंचन किया जाता है; परन्तु ऐसा न करे। यह तो मानुषी क्रिया है, यज्ञ में मानुषी क्रिया करना ठीक नहीं। इसलिये जल-सिंचन न करे, क्योंकि ऐसा करना अनुचित है ॥३१॥ अध्याय ४-ब्राह्मण १ आतिथ्य (मेहमान का सत्कार) यज्ञ का सिर है। प्रायणीय और उदयनीय बाहू हैं।

वत॒स्तस्मा॑द॒भित॑ आति॒थ्यमे॒ते ह॒विषी॑ भवतः प्रायणी॒यश्चो॑दय॒नीय॑श्च ॥ १ ॥ अथ यस्मा॒दाति॒थ्यं नाम॑ । अ॒तिथि॑र्वाऽए॒ष ए॒तस्याग॑च्छति॒ यत्स्रोमः क्री॒तस्त॒स्माऽए॒तत्क॑- था॒ राज्ञे॑ वा ब्रा॒ह्मणा॑य वा म॒होक्षं॑ वा म॒हाजं॑ वा प॒चेत्तद॑ह॒ मानु॑ष॒ꣳ ह॒विर्देवा॑- नामेवम॒स्माऽए॒तदाति॑थ्यं करोति ॥ २॥ तदा॑हुः । पूर्वी᳭स्ती॒र्त्वा ग्र॑ह्णीया॒दिति॒ यत्र॒ वाऽअर्ह॑न्त॒माग॑तं॒ नाप॑चाय॒न्ति क्रुध्य॑ति॒ वै स तत्र॒ तथा॒ ह्याप॑चिती भवति ॥ ३॥ तद्वाऽअ॒न्यत॑र एव विमुक्तः स्या॒त् । अ॒न्यत॑रोऽविमुक्तोऽथ॑ गृह्णीया॒त्स यद॒न्यत॑रो विमु॒क्तस्तेनाग॑तो॒ यद॒न्यत॑रो॒ऽविमु॒क्तस्तेनाप॑चितः ॥ ४॥ तदु॒ तथा॒ न कु॑र्यात् । विमु॒च्यै॑व प्र॒पाद्य॑ गृह्णीयाद्यथा॒ वै दे॒वानां॑ च॒रणं॒ तद॒न्व॑नु मनु॒ष्याणां॒ तस्मान्मा- नु॒षे याव॒न्न वि॒मुञ्च॑न्ते॒ नैवास्मै॑ तावदुद॒कꣳ हर॑न्ति॒ नाप॑चितिं कुर्वन्त्यनाग॑तो॒ हि स ताव॒द्भव॑त्यथ॒ यदैव वि॒मुञ्च॑न्ते॒ऽथास्मा॑ऽउद॒कꣳ हर॑न्त्यथाप॑चितिं कुर्वन्ति त॒र्हि हि स आ॑ग॒तो भव॑ति॒ तस्मा॑द्विमु॒च्यै॑व॒ प्रपा॒द्य गृह्णी॒यात् ॥ ५॥ स वै संत्वर॑माण- इव गृह्णी॒यात् । तथा॒ ह्याप॑चितो भवति॒ तत्प॒त्यन्वा॑रभते॒ पर्यु॑ह्य॒माणं॒ वै य॒ज्ञमा- नोऽन्वा॑रभते॒ऽथाय॑ पत्न्यु॒भयत॑ ए॒वैत॒न्मिथुने॒नान्वा॑रभेते॒ यत्र॒ वाऽअर्ह॑न्नाग॒च्छति॒ सर्व॑गृह्या-इव वै तत्र॒ चेष्ट॑न्ति॒ तथा॒ ह्याप॑चितो भव॑ति ॥ ६॥ स वाऽअ॒न्येने॑व त- तो य॒जुषा॑ गृह्णीयात् । येनो चान्या॑नि ह॒वीꣳष्येकं॒ वाऽए॒ष भागं॑ क्रियमा॒णोऽभि॑- क्रीयते॒ छन्द॑सामेव॒ राज्या॑य॒ छन्द॑साꣳ साम्रा॒ज्याय॒ तस्य॒ छन्दा॑ꣳस्य॒भितः॑ साचया॑नि यथा॒ राज्ञोऽरा॑जानो राज॒कृतः॑ सूतग्राम॒ण्य॑ एवमस्य॒ छन्दा॑ꣳस्य॒भितः॑ साचया॑नि ॥७॥ न वै तद॒वक॑ल्पते । यच्छन्दो॑भ्य॒ इति॒ केव॑लं गृह्णी॒याद्यत्र॒ वाऽअर्ह॑न्ते पच॑न्ति त- द॒भितः॑ साचयोऽन्वा॑भक्ता भवन्त्यरा॒जानो॑ राज॒कृतः॑ सूतग्राम॒ण्य॑स्त॒स्माद्य॒त्रैवैतस्यै॑ गृह्णी॒यात्तदे॑व छन्दा॑ꣳस्यन्वा॒भजे॑त् ॥ ८॥ स गृह्णाति । अग्ने॒स्तनू॑रसि॒ विष्ण॑वे॒ त्वेत्य- ग्रिर्वै गाय॒त्री तद्वाय॒त्रीमन्वा॒भज॑ति ॥ ९॥ सोम॑स्य तनू॑रसि॒ विष्ण॑वे॒ त्वेति॑ । क्ष॒त्रं वै सोम॑ः क्ष॒त्रं त्रि॒ष्टुब्ध्रैष्टुभ॑मन्वा॒भज॑ति ॥ १०॥ अ॑तिथेराति॒थ्यम॑सि॒ विष्ण॑वे॒ त्वेति॑ ।

का० ३, अ० ४, ब्रा० १, कं० १-११ शतपथब्राह्मण / ३६५ सिर के दोनों ओर बाहू होते हैं। इसलिये प्रायणीय और उदयनीय आहुतियाँ आतिथ्य के दोनों ओर होती हैं ॥१॥ यह आतिथ्य नाम यों पड़ा। यह जो खरीदा गया सोम है वह यजमान के पास अतिथि के रूप में आता है। जैसे राजा या ब्राह्मण के सत्कारार्थ [साथ आए] महोक्ष (बड़े बैल) या महाज (बड़े बकरे) को पकाते (पोषित करते) हैं, यह मानुषी सत्कार होता है, इसी प्रकार देवताओं के लिए हवि दी जाती है, इसलिए आतिथ्य-सत्कार किया जाता है। (सम्भव है 'महोक्ष' और 'महाज' किन्हीं भोजनविशेष के नाम हों) ॥२॥ इस पर कहते हैं कि पहले सोम के पास जाये; तब आतिथ्य की सामग्री निकाले। जब कोई अर्हन्त आता है और उसका कोई आदर नहीं करते तो वह क्रुद्ध हो जाता है। इस प्रकार सोम का सत्कार किया जाता है ॥३॥ उन (गाड़ी के बैलों) में से एक को मुक्त कर दे (जुआ खोल दे) और दूसरे को नहीं। एक को विमुक्त करने का अर्थ यह हुआ कि सोम आ गया, और दूसरे को न छोड़ने का अर्थ यह हुआ कि उसका सत्कार किया गया। (युक्ति हमारी समझ में नहीं आई—अनुवादक) ॥४॥ परन्तु ऐसा न करना चाहिए। दोनों बैलों को खोलने और शाला में सोम के आने के पश्चात् सामग्री निकाले। जैसा देवों का चलन होता है वैसा ही मनुष्यों का। मनुष्यों में चलन यह होता है जब आगन्तुक बैल खोल देता है और भीतर आ जाता है तभी पानी लाते हैं और सत्कार करते हैं, क्योंकि तभी वह 'आया हुआ' समझा जाता है। इसी प्रकार बैल खोलकर और सोम को भीतर लाकर ही सामग्री इकट्ठी करे ॥५॥ इसमें शीघ्रता करनी चाहिए। सत्कार की यही रीति है। एक ओर से पत्नी आरम्भ करती है और दूसरी ओर से यजमान। इस प्रकार सोम के दोनों ओर पति और पत्नी लगते हैं। जब कोई अर्हन्त आता है तो सभी मिलकर सत्कार करते हैं। इसी प्रकार चेष्टा करते हैं और इसी प्रकार सत्कार किया जाता है ॥६॥ इस सामग्री को भिन्न यजुः से ग्रहण करे; उसी से नहीं जिससे अन्य हवियां ग्रहण की जाती हैं। क्योंकि जब सोम खरीदा जाता है तो विशेष कार्य के लिए खरीदा जाता है अर्थात् छन्दों के राज्य के लिए, छन्दों के साम्राज्य के लिए। छन्द सोम के परिचारक (सेवक) होते हैं। जैसे सूत या ग्रामीण लोग जो राजा नहीं हैं राजा के सेवक होते हैं, इसी प्रकार छन्द भी सोम के परिचारक होते हैं ॥७॥ ऐसा न चाहिए कि केवल छन्दों के लिए ही सामग्री ग्रहण करे। जब किसी अर्हन्त के लिए भोजन बनाते हैं तो जो उसके साथी सूत या ग्रामीण मनुष्य हैं,उनको भी राजा के साथ- साथ खाना देते हैं। इसी प्रकार जब सोम के सत्कार की सामग्री इकट्ठी करे तो छन्दों के लिए भी भाग निकाले ॥८॥ इस मन्त्र से ग्रहण करे—"अग्नेस्तनूरसि विष्णवे त्वा" (यजु० ५।१)—"तू अग्नि का शरीर है। विष्णु के लिए तुझको।" अग्नि गायत्री है। इस प्रकार गायत्री को उसका भाग मिलता है ॥६॥ "सोमस्य तनूरसि विष्णवे त्वा" (यजु० ५।१)-"सोम का तू शरीर है। विष्णु के लिए तुझको।" सोम क्षत्र है। क्षत्र त्रिष्टुभ् है। इसलिये त्रिष्टुभ् का सत्कार किया जाता है ॥१०॥ "अतिथेरातिथ्यमसि विष्णवे त्वा" (यजु० ५।१)-"अतिथि का आतिथ्य है तू। तुझको

३६६ शतपथ ब्राह्मण सो॒ऽस्योद्वा॑रो यथा॒ श्रेष्ठ॒स्योद्वा॒र ए॒वम॒स्यैष॒ऽऋ॒ते छन्दो॑भ्यः ॥११॥ श्ये॒नाय॑ त्वा सो॒मभृते॒ विष्ण॑वे॒ वेति॑ । तद्गाय॒त्रीमन्वा॒भज॑ति सा यद्गाय॒त्री श्ये॒नो भू॒त्वा दि॒वः सो॒ममाह॑र॒त्तेन॒ सा श्ये॒नः सो॒मभृ॒त्तेनै॒वैना॑मेतद्वीर्येण द्वितीय॒मन्वा॒भज॑ति ॥१२॥ अ॒ग्नये॑ त्वा रायस्पोष॒दे विष्ण॑वे॒ वेति॑ । पश॒वो वै रा॒यस्पोषः॑ पश॒वो जग॑ती तज्जग॑- तीमन्वा॒भज॑ति ॥१३॥ अथ॒ यत्पञ्च॑ कृ॒त्वो गृ॑ह्णाति । सं॑वत्स॒रसं॑मितो॒ वै य॒ज्ञः प॒ञ्च वाऽऋ॒तवः॑ संवत्स॒रस्य॒ तं प॒ञ्चभि॑रा॒प्नोति॒ तस्मा॒त्पञ्च॑ कृ॒त्वा गृ॑ह्णात्यथ यद्विष्ण॑- वे त्वा॒ विष्ण॑वे॒ वेति॒ गृह्णा॑ति विष्ण॑वे॒ हि गृह्णा॑ति यो य॒ज्ञाय॒ गृह्णा॑ति ॥१४॥ न॒- वकपा॒लः पु॒रोडाशो॑ भवति । शिरो॒ वै य॒ज्ञस्या॑ति॒थ्यं॒ नवाक्ष॑रा॒ वै गा॑य॒त्र्यष्टौ ता- नि यान्य॒न्वाह॒ प्रण॑वो नव॒मः पूर्वा॑र्धो॒ वै य॒ज्ञस्य॑ गायत्री पूर्वा॒र्ध ए॒ष य॒ज्ञस्य॒ त- स्मान्न॑वकपा॒लः पु॒रोडाशो॑ भवति ॥१५॥ कार्ष्मर्यम॒याः प॑रि॒धयः॑ । दे॒वा ह॒ वा ऽए॒तं वन॒स्पति॑षु रा॒ज्ञोऽध्रं॑ ददृशुर्यत्कार्ष्म॒र्य॑ शिरो॒ वै य॒ज्ञस्या॑ति॒थ्यं॒ नेद्रक्षो॒ य॒ज्ञस्य॑ नाष्ट्रा॒ रक्षाँ॑सि हि॒न्सन्निति॒ तस्मा॒त्कार्ष्म॑र्यम॒याः प॑रि॒धयो॑ भवन्ति ॥१६॥ आ॒श्व- वा॒लः प्र॑स्त॒रः । य॒ज्ञो ह॒ दे॒वेभ्यो॒ऽपच॑क्राम सो॒ऽश्वो भू॒त्वा परा॑ङाववर्त्त॒ तस्य॑ दे॒वा अनु॒हाय॒ वालान॑भिपेदु॒स्ताना॑लुलुपु॒स्ताना॑लुप्य॒ सार्द्धं॒ संन्या॑सुस्तत एता ओष॑ध- यः स॒मभव॒न्यद॑श्ववा॒लाः शिरो॒ वै य॒ज्ञस्या॑ति॒थ्यं॑ जघनार्धो॒ वाला॑ उभ॒यत ए॒वैतद्य॒- ज्ञं परि॑गृह्णाति॒ यदा॑श्ववा॒लः प्र॑स्त॒रो भव॑ति ॥१७॥ ऐक्षव्यौ॑ विधृती । नेद्रक्ष॑श्श्व प्रस्त॒रञ्च॒ संल्लु॑भ्या॒त इत्य॑थो॒त्पूया॑ऽथ॒ सर्वा॑ण्ये॒व चतु॑र्गृहीता॒न्याज्या॑नि गृह्णाति॒ न ह्यत्रा॑नुया॒जा भव॑न्ति ॥१८॥ आ॒साद्य॑ ह॒वीँष्य॒ग्निं म॑न्थति । शिरो॒ वै य॒ज्ञस्याति॑- थ्यं॑ जनय॒न्ति वाऽए॒नमेतद्यन्म॒न्थन्ति॑ शीर्ष॒तो वाऽअ॒ग्ने जा॒यमा॑नो जायते शीर्ष॒त ए॒वैतद॒ग्रे य॒ज्ञं ज॑नयत्य॒ग्निर्वे सर्वा॑ दे॒वता॑ अ॒ग्नौ हि सर्वा॑भ्यो दे॒वता॑भ्यो जुह्व॑ति शिरो॒ वै य॒ज्ञस्या॑ति॒थ्यं॑ शीर्ष॒त ए॒वैतद्य॒ज्ञꣳ सर्वा॑भिर्देव॒ताभिः॑ समर्धयति॒ तस्मा॑द॒ग्निं म॑न्थति ॥१९॥ सो॒ऽधिमन्थनꣳ॑ शकल॒माद॑त्ते । अ॒ग्नेर्ज॒नित्र॑मसी॒त्यत्र॒ ह्य॒ग्निर्जा॑यते

कां० ३, अ० ४, ब्रा० १, कं० ११-२० शतपथब्राह्मण / ३६७ विष्णु के लिए।" यह उस (सोम) का भाग है। जैसे राजा का भाग अलग होता है, इसी प्रकार छन्दों से अतिरिक्त यह सोम का भाग है ॥११॥ "श्येनाय त्वा सोमभृते विष्णवे त्वा" (यजु० ५।१) – "तुझे सोम लानेवाले श्येन के लिए। तुझे विष्णु के लिए।" इस प्रकार गायत्री का भाग देता है, क्योंकि गायत्री श्येन होकर द्यौलोक से सोम लाई। इसलिए गायत्री को सोम लानेवाला 'श्येन' कहते हैं। इस पराक्रम के लिए उसको दूसरा भाग देता है ॥१२॥ "अग्नये त्वा रायस्पोषदे विष्णवे त्वा" (यजु० ५।२) - "अग्नि के लिए तुझको, धन और पुष्टि के देनेवाले के लिए तुझको, विष्णु के लिए तुझको।" 'रायस्पोष' से यहाँ पशु से तात्पर्य है। पशु जगती हैं। इस प्रकार जगती का भाग देता है ॥१३॥ पंचगुना इसलिये लेता है कि यज्ञ संवत्सर के तुल्य है। संवत्सर में ऋतुएँ पांच होती हैं। संवत्सर के पाँच भाग हैं। इसलिए वह पंचगुना लेता है। 'विष्णु के लिए तुझको, विष्णु के लिए तुझको' यह कहकर वह सामग्री इसलिए लेता है कि जो चीज यज्ञ के लिए ली जाती है वह विष्णु के लिए ही ली जाती है ॥१४॥ पुरोडाश के नौ कपाल होते हैं। आतिथ्य यज्ञ का शिर है। गायत्री में नौ अक्षर होते हैं। आठ तो वे हैं जो पढ़े जाते हैं और नवाँ प्रणव (ओ३म्) है। गायत्री यज्ञ का पूर्वार्ध है। पुरोडाश भी यज्ञ का पूर्वार्ध है। इसलिए उसमें नौ कपाल होते हैं ॥१५॥ परिधि की समिधाएँ कार्ष्मर्य लकड़ी की होती हैं। देवताओं ने अनुभव किया कि वृक्षों में यह वृक्ष राक्षसों का घातक है। आतिथ्य यज्ञ का सिर है। परिधियां कार्ष्मर्य की इसलिये होती हैं कि राक्षस यज्ञ के सिर को हानि न पहुँचा सकें ॥१६॥ प्रस्तर आश्ववाल घास का होता है। एक बार यज्ञ देवताओं के पास से भाग गया। वह घोड़ा बनकर भाग गया। देवों ने उसका पीछा किया और पूँछ के बाल तोड़ डाले, और उनको तोड़कर एक जगह फेंक दिया। उसकी अश्वबाल घास उग खड़ी हुई। आतिथ्य यज्ञ का सिर है और पूँछ के बाल पिछला भाग होते हैं। इस प्रकार अश्वबाल का प्रस्तर होने से वह यज्ञ को दोनों ओर से घेर लेता है ॥१७॥ विधृतियाँ (बर्हि के ऊपर रखने के डंठल) गन्ने की होती हैं जिससे बर्हि और प्रस्तर मिल न जायें। घी को शुद्ध करके सब-का-सब चार भागों में ले लेवे, क्योंकि इसमें अनुयाज नहीं होते ॥१८॥ हवियों को रखकर अग्नि का मंथन करता है। आतिथ्य यज्ञ का शिर है। अग्नि के मन्थन का अर्थ यह है कि यज्ञ को उत्पन्न किया जाय। जब बच्चा उत्पन्न होता है तो सिर की ओर से उत्पन्न होता है, इस प्रकार वह यज्ञ को सिर की ओर से उत्पन्न करता है। इसके अतिरिक्त अग्नि 'सब देवता' के अर्थ में आता है; अग्नि में सब देवताओं के लिए आहुति दी जाती है। 'आतिथ्य यज्ञ का सिर है' इस प्रकार सब देवताओं के द्वारा वह यज्ञ को सिर अर्थात् आरम्भ से ही बढ़ाता है। इसलिये अग्नि का मंथन करता है ॥१९॥ अब अधिमंथन शकल को लेता है। (अधिमंथन शकल एक लकड़ी का टुकड़ा होता है जो अधरारणि के ऊपर रक्खा जाता है।) इस मन्त्र से- "अग्नेर्जनित्रमसि" (यजु० ५।२) - "तू अग्नि का जन्म-स्थान है।" क्योंकि यहीं तो अग्नि उत्पन्न की जाती है। इसलिए कहा कि 'तू