शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)
Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास द्वारा
१. अध्याय १-४: पाशुपत व्रत, राम-शिव संवाद व आत्म-विद्या
दक्षिणकी ओर पर्वतके समान मुषकपर चढ़े गणेशजी और उत्तरकी ओर मयूर पर चढ़े कार्तिकेय ॥४४॥ महाकाल और चण्डेश्वर पार्षदगण सेनानायक भयंकर मूर्ति धारे इधर उधर स्थित दावाग्नि की समान दीप्तिमान दुर स्थित कालाग्नि रुद्र ॥४५॥ तीन चरण है जिसके और कुटिल मूर्तिवाले प्रमथ गण तथा उनके अग्रभागमें नृत्य करनेवाले भृंगिरिटि ऐसे अनेक मूर्तिवाले करोड़ों प्रमथगण ॥४६॥ और अनेक प्रकारके वाहनोंपर स्थित चारो ओर मातृमण्डल और पञ्चाक्षरी विद्या जपनेमें तत्पर सिद्ध विद्याधरादिक ॥ ४७॥ और दिव्य रुद्रके गीत गाते हुए किन्नरोंके समूह और (त्र्यम्बक यजामहे) इस मंत्र को जपनेहारे ब्राह्मणोंके समूह ॥ ४८॥ आकाशमें वीणा बजाकर गाते और नाचते हुए नारद और नाट्यकी विधिसे नृत्य करते हुए रम्भादिक अप्सराओंके झुण्ड ॥४९॥ और गानेमें तत्पर चित्ररथदि गन्धर्वोंके समूह तथा शिवजीके कानोंमें कुण्डलताको प्राप्त हुए कम्बल और अश्वतर नाग ॥५०॥ तथा गीत गानेमें तत्पर कम्बल और अश्वतरनागोंसे शोभित सब देवसभाको देखकर रामचन्द्र कृतार्थ हुए ॥५१॥ और हर्षसे गद्गदकण्ठ हो शिवजी की स्तुति और दिव्य सहस्रनामके उच्चारणसे बारंबार प्रणाम करने लगे ॥५२॥ इति श्रीपद्मपुराणान्तर्गतशिवगीतायां भाषाटीकायां शिवप्रादुर्भावो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥ अध्याय ५ श्रीसूतजी बोले-इसके उपरान्त उस स्थानमें एक सुवर्णका बड़ा रथ प्रादुर्भूत हुआ जिसकी अनेक रत्नोंकी कान्तिसे सब दिशो चित्र विचित्र हो गई थी ॥१॥ नदी के किनारेकी पंकमें जिसके चारो चक्र स्थित थे, मोतियोंकी झालर और सैकड़ो श्वेत छत्रसे युक्त ॥२॥ सुवर्णके खुरमढे हुए चार घोडोंसे शोभित मोतियोंकी झालर और चंदोवेसे शोभायमान जिसकी ध्वजामें वृषभका चिह्न था ॥३॥ जिसके निकट एक मत्त हस्तिनी चलती थी, जिसपर रेशमकी गद्दियाँ बिछाई थी, पांच भूतोंके अधिष्ठातृ देवताओंसे शोभित पारिजात कल्पवृक्षके फूलोंकी मालाओंसे सज्ज्त ॥४॥ मृगनाभिसे उत्पन्न हुई कस्तूरीके मदवाला कपूर और अगर धूप की उठी हुई गन्धसे भौंरों को आकर्षण करनेवाला ॥५॥ प्रलयकालके समान शब्दायमान अनेक प्रकार के बाजोंसे युक्त वीणावेणु मधुर बाजे और किन्नरो गणों से युक्त ॥६॥ इस प्रकारके श्रेष्ठरथको देखकर वृषभसे उतर शिवजी पार्वती सहित वस्त्रकी शय्यावाले उस रथके स्थानमें प्रविष्टित हुए ॥७॥ उसमें देवांगना श्वेत चमर और व्यजनके चलानेसे शिवजीको प्रसन्न करने लगी ॥८॥ शब्दायमान कंकणोकी ध्वनि और निर्मल मंजीरीके शब्द वीणावेणु के गीतसे मानों त्रिलोक पूर्ण हो गया ॥९॥ तोतोंके वाक्यकी मधुरता और श्वेत कबूतरोंके शब्दसे जगत शब्दायमान हो गया, प्रसन्नतासे अपने फण उठाये हुए शिवजीके भूषणरूप शरीरमें लिपटे सर्पोंको देखकर करोड़ो मयूर प्रसन्न हो अपनी चन्द्रका दिखाते हुए नृत्य करने लेगे ॥ १०॥ तब शिवजी प्रणाम करते हुए रामको उठाकर प्रसन्न मनसे दिव्य रथमें ले आये ॥११॥ और अपने दिव्य कमण्डलुके जलसे सावधान हो आचमनकर रामचन्द्रको आचमन कराय अपनी गोदमें बैठाया ॥१२॥
इसके उपरान्त रामचन्द्रको दिव्य धनुष, अक्षय तरकस और महापाशुपतास्त्र प्रदान किया ॥१३॥ और रामचन्द्रसे बोले, हे राम! यह मेरा उग्र अस्त्र जगत्का नाश करनेवाला है ॥१४॥ इस कारण सामान्य युद्धमें इसका प्रयोग नही करना । इसका निवारण करनेवाला त्रिलोकीमें दूसरा नही है ॥१५॥ इस कारण हे राम! प्राणसंकट उपस्थित होनेपर इसका प्रयोग करना उचित है, दूसरे समयमें इसका प्रयोग करनेसे जगतका नाश हो जाता है ॥१६॥ फिर शिवजी देवताओंमें श्रेष्ठ लोकपालों को बुला प्रसन्न मन हो बोले, रामचन्द्रको सब कोई अपने २ अस्त्रप्रदान करो ॥ १७॥ यह रामचन्द्र उन अस्त्रोंसे रावणको मारेंगे कारण कि, उसको मैने वर दिया है कि, तू देवताओं से न मरेगा ॥१८॥ इस कारण तुम सब युद्धमें भयंकर कर्म करनेवाले वानरों का शरीर धारण करके इनकी सहायता करो इससे तुम सुखी होगे ॥१९॥ शिवजीकी आज्ञा को शिरपर धर प्रणामकर हाथ जोड देवताओंने शिवजीके चरणों में प्रणाम कर अपने २ अस्त्र दिये ॥ २०॥ विष्णुने नारायणास्त्र, इन्द्रने ऐन्द्रास्त्र, ब्रह्माने ब्रह्मदण्डास्त्र, अग्निने आग्नेयास्त्र दिया ॥२१॥ यमराजने याम्यास्त्र, निऋतिने मोहनास्त्र, वरुणने वरुनास्त्र, वायुने वायव्यास्त्र ॥२२॥ कुबेरने सौम्यास्त्र, ईशानने रुद्रास्त्र, सूर्यने सौरास्त्र, चन्द्रमाने सौम्यास्त्र, विश्वेदेवाने पार्वतास्त्र, आठों, वसुओंने वॉसवास्त्र प्रदान किया ॥२३॥ तब दशरथकुमार रामचन्द्र प्रसन्न हो शिवजीको प्रणाम कर हाथ जोड़ खडे हो भक्तिपूर्वक बोले ॥२४॥ श्रीराम उवाच । श्रीरामचन्द्र बोले, हे भगवन् ! मनुष्यों से तो क्षारसमुद्र उल्लंघन नही किया जायेगा और लंकादुर्ग देवता तथा दानवों को भी दुर्गम है ॥२५॥ और वहां करोड़ो बली राक्षस रहते है वे सब जितेन्द्रिय वेदपाठ करने में तत्पर और आपके भक्त है ॥२६॥ अनेक प्रकारकी मायाके जानने हारे बुद्धिमान अग्निहोत्री है । केवल मै और भ्राता लक्ष्मण युद्धमें उनको कैसे जीतसकेंगे ॥२७॥ श्रीमहादेव उवाच । शिवजी बोले - हे रामचन्द्र ! रावण और राक्षसोंके मारनेमें विचार करने की कुछ आवश्यकता नही, कारण कि उसका काल आगया है ॥२८॥ वे देवता और ब्राह्मणका दुःख देनेरूपी अधर्ममें प्रवृत्त हुए है सुव्रत! इस कारण उनकी आयु और लक्ष्मीका भी क्षय हो गया है ॥२९॥ उसने राजस्त्री जानकीजी की अवमानना की है । इस कारण तुम उसे सहज में मार सकोगे, कारण कि वह इस समय मद्यपानमें आसक्त रहता है ॥३०॥ अधर्ममें प्रीति करनेवाला शत्रु भाग्यसे ही प्राप्त होता है । जिसने वेदशास्त्र पढा हो और सदा धर्ममें प्रीति करता हो वह विनाशकाल आने पर धर्मकाँ त्याग कर देता है ॥३१॥ जो पापी सदा देवता, ब्राह्मण और ऋषियों को दुःख देता है, उसका नाश स्वयं होता है ॥३२॥ हे राम ! किष्किंधा नामक नगरमें देवताओंके अंशसे बहुतसे महाबली और दुर्जय वानर उत्पन्न हुए है ॥३३॥ वे सब तुम्हारी सहायता करेंगे । उनके द्वारा तुम सागरपर सेतु बंधवाना अनेक पर्वत पर लाकर वे वानर पुल बांधेगे उसपर सँब वानर उतर जायेंगे । इस प्रकार रावणको उसके साँथियों सहित मारकर वहां से अपनी प्रियाको लाओ ॥३४॥ जहां संग्राममें शस्त्रसे ही जय प्राप्त होनेकी संभावना हो वहां अस्त्रोंका प्रयोग न करना और जिनके पास अस्त्र नही है अथवा थोडे शस्त्र है तथा जो भाग रहे ऐसे पुरुषोके ऊपर दिव्यास्त्रका प्रयोग करनेवाला स्वयं नष्ट हो जाता है ॥३५॥ बहुत कहने से क्या है यह संसार जो मेरा ही उत्पन्न किया है, मै ही इसका पालन और मै ही इसका संहार करता हूँ
॥३६॥ मै ही एक जगत् की मृत्यु का भी मृत्युस्वरूप हूँ, हे राजन्! मै ही इस चराचर जगत् का भक्षण करनेवाला हूँ ॥३७॥ इति श्रीपद्मपुराणे शिवगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे शिवराघवसंवादे रामाय वरप्रदानं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥ वे युद्धदुर्मद सब राक्षस तो मेरे मुखमें प्राप्त हो चुके है तुम निमित्तमात्र होकर संग्राममें कीर्ति पाओगे ॥३८॥ इति श्रीपद्मपुराणे शिवगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे शिवराघवसंवादे रामाय वरप्रदानं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥
अध्याय ६ श्रीरामचन्द्र बोले, हे भगवन् ! आप कहते हो कि मै ही जगत्की उत्पत्ति और पालन करता हूँ इसमें मुझे बड़ा आश्चर्य है । स्वच्छ स्फटिक मणिकी समान जिनका शरीर और तीन नेत्र तथा मस्तकपर चन्द्रमा है ॥१॥ ऐसे आप परिच्छिन्न और पुरुषाकृति मूर्ति धारण किये हो और पार्वती सहित प्रमथ आदि गणों के साथ यही विहार करते हो ॥२॥ फिर तुमने पंचभूतादि यह चराचर जगत् कैसे उत्पन्न किया है । हे गिरिजापते! जो आपकी मुझपर कृपा है तो आप कहिये ॥३॥ श्रीभगवानुवाच । श्रीभगवान बोले- हे महाभाग रामचंद्र! सुनो, जो देवताओंकी भी बुद्धिमें नही आता वह से यत्नपूर्वक तुमसे कहता हूँ, जिससे तुम अनायास ही संसार के पार हौ जाओगे ॥४॥ जो कुछ यह पाँच महाभूत, चौदह भुवन, समुद्र, पर्वत, देवता, राक्षस और ऋषि दीखते है ॥५॥ १ चौदहभुवन भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यं यह सात ऊपरके लोक, अतल, वितल, सुतल, रसातल,तलातल, महातल और पाताल यह सात अधोलोक मिलकर चौदह लोक हुए । तथा और स्थावर जंगम, गन्धर्व, प्रमथ और नाग दीखते है यह सब मेरी विभूति है ॥६॥ प्रथम ब्रह्मादि देवता मेरा रूप देखनेके निमित्त मेरे प्रिय मंदराचल पर गये ॥७॥ देवता हाथ जोड मेरे आगे स्थित हुए तब मैने देवताओं को लीलासे व्याकुलचित्त जानकर उन ब्रह्मादि देवताओका ज्ञान हरलिया ॥८॥ वे तत्काल ही ज्ञानरहित हो हमसे बोले तुम कौन हो? तब मैने देवताओँसे कहा मै ही पुरातन हूँ ॥९॥ हे देवताओं! सृष्टिसे पहिले मै ही था, वर्तमानमें भी मै ही हूँ और अन्तमें भी मै ही रहूँगा । इस लोकमें मेरे सिवाय और कुछ नही ॥१०॥ हे सुरेश्वरो! मुझसे व्यतिरिक्त और कुछ वस्तु नही है ॥ नित्य अनित्य भी मै ही हूँ तथा मै ही पापरहित वेद और ब्रह्मौका भी पति हूँ ॥११॥ मै ही दक्षिण उत्तर पूर्व पश्चिम हूँ । हे सुरेश्वरो! ऊपर नीचे दिशा विदिशा सब मै ही हूँ ॥१२॥ सावित्री, गायत्री, स्त्री, पुरुष, नपुंसक, त्रिष्टुप्, जगती, अनुष्टुप् और पंक्ति छन्दभी मै ही हूँ, तथा मै ही तीनो वेदोंमे वर्णन किया गया हूँ ॥१३॥ मै ही सत्यस्वरूप मायाके विकास से रहित हूँ, सब प्रकार शांत दक्षिणाग्नि, गार्हपत्य, आहवनीय तीन अग्निस্বরূপ हूँ, गौ, गुरुमें गुरुता, वाणीका रहस्य, स्वर्गे और जगत् का पति मै ही हूँ ॥१४॥ मै ही सबसे ज्येष्ठ सब देवताओं से श्रेष्ठ ज्ञानियोंमें पूज्य सब जलोंका पति सागर मै ही हूँ । मै ही अर्चा के योग्य षड्गुण ऐश्वर्यसम्पन्न तेजः स्वप्न और उसकी आदिवायु भी मै ही हूँ ॥१५॥ मै ही ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और श्रेष्ठ अंगिरस अथर्ववेद हूँ मै ही स्वयम्भू हूँ ॥१६॥
भारतादि इतिहास, ब्राह्मपुराणादि पुराण, कल्पसूत्र, उनका प्रवर्तक बोधायनादि ऋषि, नाराशंसी नामक रुद्रतत्त्वके प्रतिपादक मुख्य तत्त्व कीं प्रतिपादनै करनेवाली गोथा, उपासनाकाण्ड, उपनिषद् यह सब मै ही हूँ ॥१७॥ 'तदप्येश श्लोको भवति' इत्यादि श्लोक सांख्ययोगादि सूत्र व्याख्यान अनुव्याख्यान गान्धर्वगान विद्यादि यज्ञहोम आहुति ॥१८॥ गाय आदि दानके पदार्थ दान देना, यह लोक, अविनाशि पर लोक, क्षर-प्राणीमात्रों के हृदयमें वास करनेहारा, इन्द्रियनिग्रह, मनोनियह और खग-जीवनभी मै ही हूँ, सब वेदोंमें गूढ भी ही हूँ, निर्जनस्थानवासी भी मैं हूँ, जन्मरहितभी मैं ही हूँ ॥१९॥ पुष्कर, पवित्र, सबके मध्य और बाहर भीतर आहे अविनाशी मै ही हूँ ॥२०॥ तेज, अन्धकार, इन्द्रिय, इन्द्रियके गुण, बुद्धि, अहंकार और शब्दादि विषय मै ही हूँ ॥२१॥ ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, उमा, स्कन्द, गणपति, इंद्र, अग्नि, यम, निरृति, वरुण, वायु ॥२२॥ कुबेर, ईशान, भूःभुव, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यं, यह सात लोक, पृथ्वी, जल, वायु ॥२३॥ आकाश, सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, ग्रह, प्राण, काल, मृत्यु, अमृत, भूत, प्राणी यह सब मै ही हूँ ॥२४॥ वर्तमान और भविष्य मै ही हूँ, सम्पूर्ण विश्व सर्वरूपभी मै ही हूँ ओंकारके आदि और मध्यमें भूर्भुवः स्वः मै ही हं और गायत्री शीर्ष जपनेवालोंका विराट् स्वरूप भी मै ही हूँ ॥२५॥ भक्षण, पान, कृत, अकृत, (नही किया) तथा पर, अपर, मै ही हूँ और सबका आश्रय मै ही हूँ ॥२६॥ मै ही जगत का हित, अक्षर, सूक्ष्म, दिव्य, प्रजापति, पवित्र, सोम, देवता, अग्राह्यं (जो ग्रहण करने में न आवै) और सबका आदि मे ही हूँ ॥२७॥ मै ही सबका उपसंहार करनेवाला, मै ही पर्वत, सागर इत्यादि गुरुवस्तु और प्रलयकालिक अग्नि सूर्यादितेज इन सब पदार्थों में विद्यमान हूँ, मै ही सब प्राणियों के हृदयमें देवता और प्राणरूप से स्थित हूँ ॥२८॥ जिसका शिर (स्पर्श संज्ञकवर्ण) उत्तरको, और जिसके पाद (उष्म संज्ञक वर्ण) दक्षिणको और जिसके अन्तर अन्तस्थसंज्ञक वर्ण) मध्यमें है ऐसा त्रिमासिक साक्षात ओंकार मैं हूँ ॥२९॥ जिस कारणसे कि मैं जप करनेवालों को स्वर्गादि लोकको ले जाता हूँ पुण्यक्षीण पुरुषोंको नीचे ले ता हौं, इस कारण मै एक निरन्तर नित्य सनातन ओंकार हूँ ॥३०॥ यज्ञकर्म में ब्रह्मा नामक ऋत्विक होकर ऋग्यजु और सामके मन्त्र ऋत्विजो को देता हूँ, इस कारण मैं ही प्रणवस्वरूप हूँ, तात्पर्य यह कि सब मै ही हूँ ॥३१॥ जैसे घृत तैलादि स्नेह द्रव्य मांसपिंडमें व्यापत होकर भक्षण करनेवाले की सब देह को व्याप्त करते है, इसी प्रकार सब लोकोंमें अधिष्ठानरूप से व्याप्त होकर मै सर्वव्यापी हूँ ॥३२॥ ब्रह्मा हरि भगवान् व और दूसरे देवभी मेरा आदि और अन्त नही ऐसा जानते इस कारणसे मैं अनन्त हूँ ॥३३॥ गर्भवास जन्म जरा मृत्युसे भरे संसारसागर से मै भक्तोंको तारता हूँ इस कारण मेरा नाम तारक है ॥३४॥ जरायुजु, स्वेदज, अंडज, अद्भि्ज इन चार प्रकारके देहो में मै जीवरूपसे वास करता हूँ, और इनके हृदयाकाशमें सूक्ष्मरूप होकर वास करता हूँ, इससे मै सूक्ष्म कहता हूँ ॥३५॥ महान्धकारमें मग्न हुए भक्तों को उद्धार करनेके निमित्त बिजलीकी समान दीप्तिमान् निरुपम तेजरूप प्रगट करता हुं इस कारण मै विद्युत्स्वरूप हूँ ॥३६॥ जिस कारणसे कि मै एकही लोकोंको उत्पन्न अरु संसार करके लोकान्तरमें पहुँचाता हूँ अरु ग्रहण करता हूँ इस कारणसे मुझे स्वतंत्र और एक ईश्वर कहते है ॥३७॥ प्रलयकालमें कोई दूसरा स्थित नही रहता केवल मै ही तीन गुणोंसे परे स्वयं ब्रह्मरुद्रस्वरूप सब प्राणियों को अपने में लय करके स्थित होता हूँ ॥३८॥ जो कि मै सब लोकोंकी ईशिनी अर्थात् सब लोकोंको स्वाधीन रखनेवाली शक्तियों से स्वाधीन रखता हूँ उन पर सत्ता चलाता हूँ इस कारण सर्वद्रष्टा सबका चक्षु मै ईशान कहाता हूँ ॥३९॥ मै स्थिर और चर सब प्राणियों का सदा ईश्वर हू तथा सब विद्याओंका अधिपति हूँ, अर्थात् सर्व ईश्वर शक्तिसम्पन्न हूँ, इससे मेरा ईशान नाम सार्थक है ॥४०॥
मैं सब अतीत और अनागत पदार्थोंको आत्मज्ञानसे देखता हूँ, इसी प्रकार साधनसम्पन्न पुरुष को आत्मज्ञानरूपयोग का उपदेश करता हूँ और सबमें व्यापने से मै भगवान ऐश्वर्यवाने हूँ ॥४१॥ मै निरन्तर सब लोकोंकी उत्पत्ति, पालन और संहार करता हूँ, इस कारण मुझे महेश कहते है ॥४२॥ महत् पुरुषों में आत्मज्ञान और अष्टांग योगसे जो महिमा विद्यमान है और जो सब पदार्थों को उत्पन्न करके रक्षा करता है वह महादेव मै ही हूँ ॥४३॥ मै ही श्रुतिप्रतिपादित एक देव सम्पूर्ण दिशाओंमें वर्तमान हूँ मै ही सबसे प्रथम गर्भमें वास करनेहारा, गर्भसे निकलनैहारा और पीछे उत्पन्न होनेहारा हू मै ही सम्पूर्ण लौक हूँ और सब दिशाओं में मेरा ही मुख है ॥४४॥ सर्वत्र मेरे नेत्र सर्वत्र मेरा मुख सर्वत्र मेरी भुजा और सर्वत्र मेरे चरण है मै ही भुजा और चरणोंसे स्वर्ग और भूमिको उत्पन्न करता हुआ एक देवस्वरूप हूँ ॥४५॥ केशके अग्रभागकी समान सूक्ष्मरूप हृदयमें रहनेवाला, विश्वव्यापक, स्वप्रकाश, श्रेष्ठ आत्मस्वरूप मै हूँ मुझे जो चतुर पुरुष तत्त्वमस्यादि वाक्यों के ज्ञानसे (वह तू है) ऐसी उपाधि त्यागकर जीव और ब्रह्म को एकता से देखतै है अर्थात ऐकस्वरूप जानते है वही निरन्तर मोक्ष को प्राप्त होते है दूसरे नही ॥४६॥ सीपी में जो रजतबुद्धि है यह भ्रम ही है परन्तु रजतके भ्रमका आधार शुक्ति यथार्थ है उसी प्रकार मेरे स्वरूपमें भासनेहारा जगत् मिथ्या है परन्तु उसका आधार मै सत्य तथा एकरूप हूँ मै ही यह पंचभूतात्मक जगत् धारण किये हूँ ऐसे मुझे ईश्वरके स्वरूपमें जो विवेक करेगा उसको अनन्त शान्ति अर्थात् मुक्तिकी प्राप्ति होगी ॥४७॥ प्राणका ही अन्तर्गत मन है वहां क्षुधा पिपासा और तृष्णा रहती है इससे शुभाशुभ फल प्राप्तिका कारण जो धर्म अधर्म है उसके भी कारण विषयतृष्णा को छिन्नकर निश्चयात्मक बुद्धि मुझमें अन्तःकरण लगाकर जो मेरा ध्यान करते है उनको निरन्तर शांति और मोक्षसुख प्राप्त होता है दूसरोंको नही ॥४८॥ जहां वीणा की गति नही जहां मन नहीं पहुंच सकता इस प्रकार आनन्द ब्रह्मरूप मेरे जाननेवाले को कहीं से भय प्राप्त नही होता ॥४९॥ इस कारण देवता मेरे वचन जो कि आत्मस्वरूप जानके देनेवाले है सुनकर मेरा नामका जप करके मेरेही ध्यानपरायण हुए ॥५०॥ देहान्तमें वे सब मेरे सायुज्यको प्राप्त होगये । जो कुछ ये पदार्थ दीखते है यह सब मेरी ही विभूति है ॥५१॥ यह सब वस्तु मुझहीसे उत्पन्न है औरु मुझही में प्रतिष्ठित है और अन्तमें मुझमें ही लय हो जाती है मैं ही अद्वय ब्रह्म हूँ ॥५२॥ मै ही सूक्ष्मसे भी अति सूक्ष्म महानसे भी महान मै ही विश्वरूप निर्लेप पुरातन पुरुष सर्वेश्वर तेजोमय और शिवरूप हूँ ॥५३॥ मेरे हस्त चरण नही और सब कुछ कर सकता हूँ मेरी शक्ति किसी के ध्यानमें नही आती मेरे भौतिक नेत्र नही तथापि सब कुछ देखता हूँ कान नही और सब कुछ सुनता हूँ मै सत् असत् सब विचारको जानता हूँ मेरा एकान्तस्वरूप हूँ मेरा जाननैवाला कोई नही मै सदा चैतन्यस्वरूप हूँ ॥५४॥ सम्पूर्ण वेदोंमें मै ही जानने योग्य हूँ वेदान्तका कर्ता और वेदका जाननेवाला भी मै ही हूँ । मुझमें पाप और पुण्य नही, मेरा नाश तथा जन्म नही मुझे देह इन्द्रिय और बुद्धिका संबंध नही है ॥५५॥ भूमि, जल, तेज, वायु आकाश इनसे मै लिप्त नही हूँ । इस प्रकारसे पंचकोशात्मक गुहामें निवासा करनेहारा निर्विकार संगरहित सर्वसाक्षी कार्यकारण भेदशून्य परमात्मा हूँ । जो मुझको इस प्रकार मै जानते है वह मेरे शुद्ध परमात्मस्वरूप को प्राप्त होते है ॥५६॥ हे महाबुद्धिमन्! रामचन्द्र! इस प्रकार जो मुझे तत्त्वसे जानता है वही संसारमें मुक्त होता है दूसरा नही ॥५७॥ इति श्रीपद्मपुराणे शिवगीतासूपनिषत्सु० विभूति योगो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६॥
अध्याय ७
श्रीरामचन्द्र बोले - हे भगवन् ! जो कुछ मैने प्रश्न किया है वह तो उस प्रकार स्थित है, हे महेश्वर! आपने इस विषयका कोई उत्तर नही दिया ॥१॥ हे महेश्वर ! आपका देह परिच्छिन्नपरिमाण अर्थात् इयत्ता करनेके योग्य है फिर सब संसारकी उत्पत्ति पालन नाश कैसे करते हो ॥२॥ इसी प्रकार अपने २ अधिकार के पालन करनेवाले इन्द्र वरुणादि सब देवता तुम्हारी देह में कैसे रहते है और वे सब देवता और चौदह भुवन यह मैं ही हूँ, ऐसा जो तुम कहते तो कैसे कहते हो अर्थात् जबतक उपाधि है तबतक जीव ईश्वरका अभेद संभौवित नही होता और जड प्रपंच महाभूतोंमें चेतनाका तादाम्य संभावति नही ॥३॥ हे देव! आपसे उत्तर सुना परन्तु संदेह नही जाता कारण कि चित्तका निश्चय नही उस सन्देहकी दूर करनेको आपही समर्थ हो ॥४॥ श्रीभगवानुवाच । श्रीभगवान् बोले ! सूक्ष्म वटके बीजमें जिस प्रकार महान वटका वृक्ष सदा रहता है और उसीसे वह वृक्ष निकल भी आता है यदि ऐसा न हो तो बताओ वह वृक्ष कहां से आता है इसी प्रकार मेरे सूक्ष्म शरीरसे सब भूतोंका जन्म पालन और नाश होता है ॥५॥ जिस प्रकारसे जलके बीचमें बड़ा सैन्धैका खण्ड डालनेसे वह उसमें विलीन होजाता है और नही दीखता पीछे जलको अग्निमें औटाने से वह पूर्ववत् प्राप्त हो जाता है ॥६॥ अथवा जैसे प्रतिदिन सूर्यसे प्रकाश उत्पन्न होता और संध्या समय विलीन हो जाता है इसी प्रकार मुझसे जगत् उत्पन्न होकर विलीन हो जाता है और मुझमें हि स्थिर रहता है । हे सुव्रत राम! तुम ऐसा जानो ॥७॥ श्रीराम उवाच । श्रीरामचंद्र बोले- हे भगवन् ! आपने दृष्टान्तसे प्रतिपादन किया परन्तु जिस प्रकार दिशाओंके भ्रमवाले को उत्तरादि दिशाओंका भ्रम हो जाता है, इसी प्रकार मुझे भ्रम हो गया है । वह निवृत्त नही होता मै क्या करूं ॥८॥ श्रीभगवानुवाच । श्रीभगवान बोले - हे राम ! जिस प्रकार यह चराचर जगत् मुझमें वर्तमान है, सो मैं तुमको दिखाता हूँ परन्तु तुम उसे देखनेको समर्थ नही ॥९॥ इस कारण उसके देखनेको मै तुम्हे दिव्यनेत्र देता हूँ, उन नेत्रोंसे भय त्यागकर तुम मेरा दिव्य स्वरूप देखो ॥१०॥ नरेन्द्र वा देवता इस मेरे तेज स्वरूपको मेरे अनुग्रह बिना चर्म चक्षुसे नही देखे सकते ॥११॥ सूत उवाच । सूतजी बोले ऐसा कहकर शिवजीने रामचन्द्रको दिव्यनेत्र दिये और पातालकी समान बडा विस्तृत मुख रामचन्द्रको दिखाया ॥१२॥ करोड़ो बिजलीकी समान प्रकाशमान अतिशय भयदायक भयंकर उस रूपको देखतेही रामचन्द्र जंघाओं के बलसे पृथ्वी में बैठ गये ॥१३॥ प्रणाम और दंडवत् करके शिवजीको बारंबार प्रसन्न करने लगे फिर महाबली रामचन्द्र उठकर जबतक देखते है ॥१४॥ जबतक त्रिपुरघाती शिवजीके मुखमें करोड़ो ब्रह्मान्ड प्रलय कालकी अग्निमें व्याप्त होकर चटका पक्षीके पंखो कि समान दीखे ॥१५॥ सुमेरु, मंदराचल, विंध्याचलादि पर्वत, सात समुद्र, चंद्र सूर्यादि सब ग्रह, पांच महाभूत और शिवजीके साथ आये हुए सब देवता ॥१६॥ वन, बड़े २ सर्प, चौदह भुवन इस प्रकार रामचन्द्रने प्रत्येक ब्रह्माण्डको देखकर ॥१७॥ उन्हींमें पूर्वकालमे हुआ देवता और असुरोंका संग्रामभी देखा विष्णुके दश अवतार और उनके र्कतव्य कंसवध रावणवध आदि ॥१८॥ युद्धमें देवताओंकी पराजय, शिवजीका त्रिपुरासूरको मारना इसी प्रकार उत्पन्न हुए सम्पूर्ण जीवों का लय देखकर ॥१९॥ रामचंद्र भयभीत हो बारंबार प्रणाम करने लगे । यद्यपि रामचन्द्र को तत्त्वज्ञान भी हो गया था तथापि भयभीत हो गये ॥२०॥
तब उपनिषदोंका सार और अर्थरूप वाणीसे शिवजीकी स्तुति करने लगे ॥२१॥ श्रीराम उवाच । श्रीरामचन्द्र बोले । हे विश्वेश्वर ! हे शरणागतदुःखनाशक, हे चन्द्रशेखर ! प्रसन्न हूजिये और संसारके भयसे मुझ अनाथकी रक्षा कीजिये ॥२२॥ हे शंकर ! यह भूमि और इस पर उत्पन्न होनेवाले वृक्षादि सब आपसे ही उत्पन्न हुए है यह सब नित्य तुमही में स्थित रहते है । हे शिवे ! अन्तमें यह सब तुम्हीमें स्थित हो जाते है ॥२३॥ ब्रह्मा, इन्द्र, एकादश, रुद्र, मरुद्गण, गन्धर्व, यक्ष, असुर, सिद्ध, गंगादि नदी, सागर यह सब हे शूल धारणकरनेवाले ! तुम्हारे मुखमें दीखते हैं ॥२४॥ हे चन्द्रमौले ! तुम्हारी मायासे कल्पित हुआ यह विश्व तुम्हारे ही स्वरूपमें प्रतीत होता है, इसे भ्रांतियुक्त होकर पुरुष इस प्रकारसे देखते है जिसप्रकारसे शुक्तिमें रजतका और रस्सीमें सर्पका भ्रम उत्पन्न होता है, वह भाँति वैसी नहीं है यह जैसी भ्रांति होती है वह पदार्थ अन्यत्र सिद्ध होता है और नही भी होता, जैसे शुक्तिमें रजतकी भाँति हुई । परन्तु रूपा पदार्थ दूसरे स्थानमें विद्यमान है, तैसे यह जगत् तुम्हारे स्वरूपसे बचकर अन्यत्र नही दीखता इसीसे लोक इसको शुक्तिका रजतेवत् भ्रम मानते है ॥२५॥ आप अपने तेजसे सब जगत् व्याप्त और प्रकाश करते हो । हे देवदेव ! आपके प्रकाश के बिना तो हज जगत् क्षणमात्रमें अदृश्य हो जाय ॥२६॥ जो पदार्थ थोडे आश्रयवाला है वह बडे पदार्थको धारण करनेमे समर्थ नही होता, जिसप्रकार एक अणु विंध्याचलको धारण नही कर सकता और तुम्हारे मुखमात्रमें यह सब जगत् दीखता है । यह सब आपकी माया है, वास्तविक नही ऐसा मुझे निश्चय है ॥२७॥ जिस प्रकारसे रज्जमें सर्प की भ्रांति भयदायक होती है, यद्यपि वहां वास्तवमें सर्प उत्पन्न नही होता और भ्रमके नाश होनेपर सबका नाशभी नही होता (यथार्थ ही है कि जो उत्पन्न नही हुआ उसका नाश होनेवाला नही) परन्तु यह भय देनेवाला होता है इसी प्रकार तुम्हारी मायासे जिसको अस्तित्व प्राप्त हुआ है, ऐसा यह जगत् मिथ्या भ्रांतिकै कार्य को सत्य उत्पन्न करता है ॥२८॥ जो यह तुम्हारा शरीर जगतका आधारभूत दीखता है यदि विचार दृष्टिसे देखा जाय तो भी यह अज्ञान दृष्टि की कल्पना है कारण कि तुम सच्चिदानन्दरूप और सर्वत्र पूर्ण हो ॥२९॥ ऐसा है तो कर्मकाण्डप्रतिपादक सर्व श्रुति व्यर्थ हुई, पर ऐसा नही । यज्ञ इष्टापूर्त दान अध्ययनादि कर्मोंका फल तुम कर्त्ताको देते हो, यह कर्मकाण्डपर विश्वास रखनेका प्रमाण है, परन्तु महापुण्योंके उदयसे जब ब्रह्मका साक्षात्कार होता है और यह सब प्रपंच तुमसे अभिन्न दीखने लगता है, तब तुम क्यों कर्मों का फल देते हो? अर्थात् नही देते तब कर्मकांडप्रतिपादक कथा असिद्ध हो जाती है ॥३०॥ ज्ञानहीन अविचारी पुरुष ही पूजा यज्ञ आदि बाह्य कर्मोंसे शिव संतुष्ट होते है ऐसा कहते है परन्तु यह ठीक नही कारण कि जो अमूर्त परिमाणरहित और अनन्त है उसको भोगकी इच्छा नही होती ॥३१॥ इसी प्रकार किंचित बेलपत्रवा चुल्लभर जल से प्रीतिसे आपको देता है वह प्रीतिसे स्वीकार करके आप उसे स्वराज्यपद देते हो यह भी माया से कल्पित है ऐसा मेरा निश्चय है ॥३२॥ तुमही एक पुराण पुरुष सम्पूर्ण दिशा बिदिशा और विश्वमें व्याप्त हो, इस जगत् के नाश होनेमें भी तुम्हारी हानि नही हो सकती, जिस प्रकार घटके नाश होनेसे घटमे व्यापी आकाशकी हानि नही हो सकती, इसी प्रकार जगत् के नाशसे तुम्हारी कुछ हानि नही ॥३३॥ जिस प्रकार आकाशमें एकही सूर्यका बिंब जल भरेहुए छोटे पात्रोमें अनेक बिंबत्वको प्राप्त होता है अर्थात् अनेकरूप दीखते है इसी प्रकारसे आप एके होकर भी सबके अन्त:करणमें अनेकरूपसे विराजते हो ॥३४॥ संसारके उत्पत्ति पालन और नाश होनेमे भी तुम्हारा कुछ कर्तव्य नही है केवल अनादि सिद्ध देहधारियोंके कर्मानुसार स्वप्नवत् तुम सब कार्य करते हो, जीव ईश्वरमें केवल बिम्ब और प्रतिबिंबकी समान अन्तर है ॥३५॥ हे शंभो ! स्थूल और सूक्ष्म दोनों जड़ देहोंमे आत्मतत्वके सिवाय दूसरा चैतन्य अंश नही है, हे पुरमथन ! सुख दुःख जो दोनों देहको होते है उनकी कहनेवाली श्रुति केवल आपमें आरोप करती है, वास्तविक नही ॥३६॥ हे भगवन् ! सच्चिदानन्दरूप समुद्रमें हंसरूप नीलकण्ठ कालस्वरूप भक्तजनोंके सम्पूर्ण पातक दूर करनेवाले और सबके साक्षी आपके वास्ते नमस्कार है ॥३७॥ सूत उवाच ।
सूतजी बोले, इस प्रकार विश्वेश्वरको प्रणाम कर, हाथ जोड़ विस्मित हो रामचन्द्र परमेश शिवजीसे बोले ॥३८॥ श्रीराम उवाच । श्रीरामचन्द्र बोले, हे विश्वात्मन् ! यह अपना विश्वरूप आप उपसंहार करिये । हे शंकर ! आपके अनुग्रहसे आपमें एकत्र स्थित सब जगतको देखकर मुझे प्रतीति हुई ॥३९॥ श्रीभगवानुवाच । श्रीभगवान बोले, हे महाभुज ! रामचन्द्र ! देखो मुझसे दूसरा कोई नही है । सूत उवाच । सूतजी बोले - ऐसा कहकर शिवजीने अपने देहमें से देवादिकों को गुप्त किया, अर्थात् विश्वरूप छिपा लिया ॥४०॥ आंख खोल फिर जो रामचन्द्र प्रसन्न होकर देखते है इतने ही समयमें पर्वत के श्रृंगपर व्याघ्रचर्मपर स्थित पंचमुख नीलकण्ठ त्रिलोचन शिवजीको देखा ॥४१॥ जो व्याघ्रचर्मका वस्त्र ओढे, शरीरमें विभूति लगाये है, सर्पके कंकण पहरे, नागका यज्ञोपवीत धारे ॥४२॥ व्याघ्रचर्मका ही वस्त्र ओढे बिजलीकी समान पीली जटा धारे इकले मस्तकपर चन्द्रमा धारे श्रेष्ठ भक्तोंके अभय देनेहारे ॥४३॥ चार भुजा शत्रुनाशक परशा धारण किये मृग हाथमें लिये सब जगत् के पति शिवजीको देख उनकी आज्ञामें मन लगाये प्रणाम करके रामचन्द्र स्थित हुए ॥४४॥ तब शिवजी रामचन्द्रसे बोले जो जो तुम्हारे पूछने की इच्छा है वह तुम सब पूछो । हे राम! मेरे सिवाय दूसरा कोई तुम्हारा गुरु नही है ॥४५॥ इति श्रीपद्मपुराणे उपरिभागे शिवगीतासूपनिषत्सु ब्रह्म० योगशास्त्रे शिवराघवसंवादे विश्वरूपदर्शनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७॥
अध्याय ८ श्रीरामचन्द्र बोले, पंचभूतके देहकी उत्पत्ति स्थिति नाश किस प्रकारसे होता है और इसका स्वरूप क्या है, हे भगवन्! विस्तारपूर्वक आप मुझसे कहिये ॥१॥ श्रीभगवान बोले - पृथ्वी आदि पंचभूतसे बना हुआ यह शरीर देह है, इसमें पृथ्वी प्रधान है और दूसरे चार इसमें मिले हुए अर्थात् सहकारी है ॥२॥ जरायुज, अंडज, स्वेदज और उद्भिज्ज यह पांचभौतिक देहके चार भेद है ॥३॥ और मानसिक उत्पत्ति जो कहाती है वह पांचवी है उसे दैवसर्ग कहते है, उन चारोंमें जरायुज प्रधान है, सो प्रथम उसीका वर्णन करते है ॥४॥ स्त्रीके रज पुरुषके बीजसे जरायुजकी उत्पत्ति होती है जिस समय ऋतुकालमें स्त्रीके गर्भाशयमें पुरुषका वीर्यप्रवेश होता है ॥५॥ स्त्रीका रज मिलित होता है तभी जरायुज की उत्पत्ति होती है । स्त्रीका रज अधिक होनेसे कन्या और वीर्य अधिक होनेसे पुरुषकी उत्पत्ति होती है ॥६॥ और शुक्र शोणितकी समान होने से नपुंसक होता है, जब स्त्री ऋतुस्नान कर चुके तब चौथे दिनसे सोलह रात्रितक ऋतुकालकी अवधि कही है ॥७॥ उसमें विषम दिन पांचवे सातवे नववें दिनमें स्त्री और युग्म दिनमें पुरुषकी उत्पत्ति होती है ॥८॥ जो सोलहवी रात्रिमें स्त्रीके गर्भ रहता है, तो चक्रवर्ती राजा उत्पन्न होता है इसमें संदेह नही ॥९॥
ऋतुमें स्नान करके जो स्त्री कामातुर हो जिस पुरुष का मुख देखती है, उसी आकृति का गर्भ होता है, इसी कारणसे स्त्री उस दिन स्वामी का मुख देखेँ ॥१०॥ स्त्रीके उदरमें एक पेशी चमडा निर्मित होता है उसे जरायु कहते है, जिस कारणसे शुक्र और शोणितका योग उसी गर्भमें होता है इसी कारणसे उसे जरायुज कहते है ॥११॥ सर्प और पक्षी आदि जीव अंडज कहलाते है, मशकादि स्वेदज कहलाते है, वृक्षगुल्मादि उद्भिज्ज कहाते है, और देवर्षि आदि मानसिक कहाते है ॥१२॥ अपने पूर्वजन्मके कर्मवशसे यह प्राणी स्त्रीके गर्भाशयमें प्राप्त होकर शुक्र शोणितके मिलनेसे प्रथममासमें शिथिल रहता है ॥१३॥ कछ दिनोंमें उसकी बुदबुदकी आकृति होने लगती है, कछ दिनोंमें जेरसी होती है, इस कारण उसमें दहीकी समान कुछ गाढापन आता है फिर कुछ दिन में उसकी पेशी (मांसपिंड) बनती है । इस प्रकार शुक्र शोणित संयोग होते हुए एकमास हो जाता है, दूसरे मासमेंमासपिंड बनता है ॥१४॥ तृतीयमासमें शिर, हाथ आदि उत्पन्न होते है, और जीवका आश्रय लिंगदेह चौथे महीनेमें उत्पन्न होता है ॥१५॥ तब यह गर्भ माताके उदरमें चलायमान होने लगता है । पुत्र दक्षिणपार्श्व और कन्या वामपार्श्वमें स्थित होती है ॥१६॥ और नपुंसक उदरके मध्यभागके स्थित होता है । इस कारण दक्षिणापार्श्वमें जन्म लेनेके अनन्तर होनेवाले श्मश्रु तथा दन्तादिको छोड़कर सब अंग प्रत्यंग के भाग ॥१७॥१८॥ एक साथ चौथे मासमें हो जाते है, पुरुषोंके गंभीरता स्थिरादि धर्म और स्त्रियों के चञ्चलतादि धर्म चौथेमासमें उत्पन्न हो जाते है जो सूक्ष्मरूपसे रहते है ॥१९॥ और नपुंसक गर्भके स्त्री पुरुषोंके मिले हुए धर्म गर्भमें उत्पन्न होते है और माताके हृदयमें सन्निकटही इसका हृदय होकर जिस वस्तुकी माताँ इच्छा करतीँ है उसी वस्तुकी यह इच्छा करता है इस कारण गर्भकी वृद्धिके निमित्त माताकी इच्छा पूर्ण करनी चाहिये और इसीसे गर्भवती स्त्रीकों दोहदवती अर्थात दो हृदयवाली कहते है ॥२०॥२१॥ और उसकी इच्छा पूर्ण न होने से गर्भमें निर्बलता, बुद्धिहीनता व्यंगतादि दोष हो जाते है । और माताका जिन विषयोंमें चित्त होता है उन विषयोंमें ही आर्त वह पुरुष होता हैं, इसलिये गर्भिणीकी इच्छा पूर्ण करे ॥२२॥ पांचवे महीनेसे चित्त बढ़ता है तथा मांस और रक्तकी पुष्टि होती है, छठे महीनेमें, अस्थि स्नायु और नख मस्तकके केश तथा शरीरके लोभ प्रगट होते है ॥२३॥ सातवें मासमें बल शरीरका वर्ण तथा सब अवयवोंकी पूर्णता होती है और वह गर्भका बालक घुटनोंमें कोनी धर हाथोंसे कान ढक ॥२४॥ और गर्भवाससे व्याकुल होकर भयभीत हुआसा स्थित होता है ॥२५॥ उस समय इसको अनेक जन्मो की सुधि हो जाती है तब बड़ा दुःखी होता है और हा! कष्टकी बात है ऐसे कहता हुआ दुःखी होता है अपने आत्माको शोचता है ॥२६॥ वह असह्य और मर्मभेदी यातना को प्राप्त होकर बारंबार कष्ट पाता है जिस प्रकार से तपायें रेतमें उसीको डाल दो उसको जो वेदना होती है ऐसी वेदनाको वह प्राप्त होता है और दुःख भोगता है ॥२७॥ गर्भवासके दुःख यह है प्रथम गर्भवासकी अग्निसे (जो जठराग्नि कहाती है) सन्तप्त होकर कहता है कि यह ज्वाला मुझको अत्यन्त पीडित करती है ॥२८॥ इसी प्रकार उदरके कीए जब काटते है तो विदित होता है कि इनके मुख कूटशाल्मलिके काटेकी समान तीक्ष्ण है और यह मुझको अत्यन्त पीड़ित करते है ॥२९॥ गर्भकी बड़ी भारी दुर्गन्ध और जठराग्निकी ज्वालासे जो मुझको दुःख प्राप्त हुआ है, उससे कुम्भीपाक नरकका दुःख कम है ॥३०॥ मवाद, रक्त, कफ, अमंगल, पदार्थही पान करने और वांति भक्षण करने को मिलती है, अशुचि पदार्थ मल मूत्रादिमें रहनेसे गर्भमें स्थित प्राणी कीड़ाही हो जाता है ॥३१॥ जो दुःख गर्भशय्यामें सोकर मैने पाया है यह दुःख सम्पूर्ण नरकोंमें भी पडकर प्राप्त नही होता ॥३२॥ इस प्रकार से पूर्वकालमें प्राप्त हुई अनेक प्रकारकी यातनाओंको स्मरण करता हुआ मुक्त होनेका उपाय सोचता यही अभ्यास करता रहता है ॥३३॥
आठवे महीनेमे त्वचा और श्रुति प्राप्त होती है । इसी प्रकार ओज इन्द्रियशक्ति और तेज शरीरके आरम्भ करनेहारे तथा धातुपरिणामसे होनेहारे हृदयकै तेज जो जीवनके मुख्य कारण है वह प्राप्त होते है ॥३४॥ कुछ समयतक अतिशय चंचल होनेके कारण किसी समय माताके हृदयमें चंचलरूपसे रहता है, कभी गर्भाशयमें चपलता कौ प्राप्त हो जाता है । इसी कारण अष्टम मासमें उत्पन्न हुआ बालक बहुत नही जीता कारण कि वह ओज और तेजसे हीन होता है ॥३५॥ फिर नौवें मासमें प्रसूतिका समय होता है परन्तु शीघ्र प्रसव होनेका प्रतिबंधक यह है कि, जो कुछ गर्भके प्रारब्ध कर्म हुए तो उसे और कुछै कालतक गर्भमें रहना पड़ता है ॥३६॥ माताकी एक रक्तवाहिनी नाडी नाबिचक्रकी एक नाडीसे मिली हुई है, उसीके द्वारा माताका भक्षण किया अन्न गर्भमें पहुँचता है, इस प्रकार माताके आहारसे पुष्टिको प्राप्त हो यह गर्भ उसीके द्वारा जीवित रहता है ॥३७॥ योनिचक्रमैं इसके सम्पूर्ण अंग अस्थियोंसे पिचकर व्यथित होते है, तब यह प्रथम कुक्षिसे निकलकर योनिए बाहर आता है, उस समय उसका शरीर मेदा रुधिर से लिप्त और जरायुसे आच्छादित रहता है ॥३८॥ यह प्राणी अत्यन्त दुःख से पीड़ित हो नीचेको मुखकर जैसेही योनिचक्रसे निकलता है वैसेही ऊंचे स्वरसे रोता है, इस प्रकार गर्भवास के यन्त्रसे निकलकर दुःखी भोगता है, कही सुख नही मिलता ॥३९॥ जन्म लेकर यह कुछ भी नही कर सकता, केवल मांसके पिंडकी समान पड़ा रहता है, तब इसके मातापिता दंड हाथमे लिये कुत्ते बिलावें तथा डाढवाले जन्तुओंसे इसकी रक्षा करते है ॥४०॥ उस समय यह ज्ञानशून्यही पिताकी ही समान राक्षसोको भी जानता है, पीनेको दुग्ध जानकर पीनेकी अभिलाषा करता है, तात्पर्य यह है कि बाल अवस्थाभी महाकष्टकारक है ॥४१॥ जबतक सुषुम्ना नाडी कफसे आच्छादित रहती है तबतक स्फुट अक्षर और वचन बोलनेको वह समर्थ नही होता ॥४२॥ इसी कारणसे यह गर्भमेभी नही रो सकता ॥४३॥ पीछे युवा अवस्थाके आनेसे कामदेवके ज्वरसे विह्वलहो अकस्मात ही कभी कुछ गाता है कभी अपना पराक्रम कहने लगता है ॥४४॥ कभी अभिमानसे वृक्षों पर चढता, कभी शान्त प्राणियोंको उद्वेजित करता, कभी काम क्रोधके मदसे अन्धा हो किसीको भी नही देखता ॥४५॥ अस्थि मांस और नाडी इनके सिवाय स्त्रीके मन्मथ स्थानमें और क्या है जिसमें कि मेंढकके फाड़े हुए पेटकी समान दुर्गन्ध आती है परन्तु तथापि उसमें आसक्त हुआ कामबाण से पीड़ित हो अपने आत्मा को अत्यंत जलाता है ॥४६॥ अस्थि मांस शिरा और त्वचा इसके सिवाय स्त्री के शरीर में और क्या है जो यह पुरुष स्त्रियोंमें आसक्त होकर मायसे मूढ़ होनेके कारण जगत् में कुछ भी नही देखता ॥४७॥ एक समय प्राणपवन निर्गत हो जाने से भी मृगकेसे नेत्रवालीका यह देह व्यर्थता को प्राप्त होता है और पांच छः दिन बीतनेपर फिर वह देह दीखता भी नही ॥४८॥ इस प्रकार युवावस्थामैं दुःख भोगने उपरांत वृद्धावस्थाका दुःख प्रारंभ होता है तब यह महानिरादरके स्थान जराको प्राप्त होकर महादुःखी होता है, इसका हृदय कफसे व्याप्त हो जाता है और खाया हुआ अन्नभी जीर्ण नही होता ॥४९॥ दांत गिर पडते है, दृष्टि मंद हो जाती है, तथा अनेक प्रकारके रोग होनेके कारण कटु तिक्त कषाय औषधियोंका सेवन करता है वायुसे कमर टेढी हो जाती है, कटि गर्दन हाथ जंघा चरण यह निर्बल हो जाते है ॥५०॥ तब सहस्त्रों रोग इसके शरीरमें लिपट जाते है बंधु तिरस्कार करते है (दोहा-सींग झडे और खुर घिसे, पीठ बोझ नहि लेय । ऐसे बूढे बैलको, कौन बांध भुस देय) तबैं यह पवित्रतारहित ही मलसे व्याप्त शरीर हौनेके कारण नखशिखपर्यन्ते सब शरीरोंसे सन्तप्त होता है ॥५१॥ तथापि ईश्वरका ध्यान नही करता और शय्या श्रेष्ठ भोजन आदि दुर्लभ भोगोंका ध्यान करता हुआ स्थित होता है इसके हाथ पैर कांपने लगते है, सब इन्द्रियोंकी शक्ति कुंठित हो जाती है और कोई सामर्थ्य न रहनेके कारण बालक भी इसकी हँसी करते है ॥५२॥ फिर इसके आगे मरणकालके दुःखका तो कोई दृष्टान्त ही नही, दरिद्रादि पीड़ा रोगादि पीड़ा कितनी ही प्राप्त हो उसको कुछ न गिनकर एक मरणके भयसे सबही भयभीत होते है ॥५३॥ बंधुओंसे घिरे हुए प्राणी को मृत्यु ले जाती है जिस प्रकार समुद्रमें प्राप्त हुए सर्पको गरुड ले जाता है ॥५४॥ हा प्रिये! हा धन! हा पुत्रो! इस प्रकार दारुण विलाप करते हुए इस पुरुषको मृत्यु इस प्रकार ले जाता है जैसे सर्प
२. अध्याय ५-८: पिण्डोत्पत्ति, देह-स्वरूप व जीव-गति
मेंढकको ले जाता है ॥५५॥ सम्पूर्ण मर्मस्थानोंके टूटने और शरीरके अवयवोंकी संधियां भग्न होनेसे जो दुःख मरनेवाले को होता है वह मुमुक्षुओंको स्मरण करना चाहिये, इसके स्मरण करने से संसारसे वैराग्य होकर आवागमनसे छूटनेके निमित्त नारायणके चरणोंमें ध्यान लगेगा ॥५६॥ यमदूतोंके दृष्टि आकर्षण करने और चेतना लुप्त हो जाने से कालपाशमें बन्धेका कोई रक्षक नही होता ॥५७॥ तब यह अज्ञानसे युक्त हो महत् चित्तमे प्रवेश होने से नही बोलता और जब भार्या पुत्रादि जातिके लोग पुकारते है तो उत्तर न देकर दीन नेत्रोंसे देखने लगता है ॥५८॥ तब इस जीवको लोहनिर्मित कालपाशसे यमदूत खैंचते है एक ओरसे बंधुओंका स्नेह खेचता है तब यह कुछ नही कर सकता, तटस्थरूपसे देखता है ॥५९॥ हिचकी बढने और श्वास रुकने तथा तालुके सूखने से उस मृत्युके पकड़े हुएका कोई आश्रय नही होता ॥६०॥ संसाररूपी चक्रमें आरूढ हुआ यमदूतोंसे घिरा कालफांसीमें बंधा महादुःखी हो मै कहा जाऊँ इस प्रकारसे वह जीव विचार करता है ॥६१॥ क्या करूं, कहां जाऊ, क्या ग्रहण करूं, क्या त्याग दूँ इस प्रकार चिन्तन करता कर्तव्यतासे मूढ हो शीघ्रही प्राणोंको त्यागता है ॥६२॥ मार्ग में यमदूतोंसे घसीटा हुआ यातनाकी देहमें प्राप्त होकर यहांसे जाकर जिन जिन यमयातनाओंका दुःख भोगता है उन्हे कहने को कौन समर्थ है ॥६३॥ जिस शरीरको केशर कस्तूरी चन्दन कपूर आदि लगाकर सदा भूषित किया था जिसे अनेक गहनोंसे शोभित और वस्त्रोंसे आच्छादित किया था ॥६४॥ वह शरीर प्राणवायुके निर्गत होतेही छूनेके अयोग्य और देखनेको भी अयोग्य हो जाता है फिर कोई इसको क्षणमात्र न रखकर घरसे निकौलने लगते है ॥६५॥ तब यह शरीर काष्ठसे जलाकर क्षणमात्रमें भस्म कर दिया जाता है (फूलबोझा जिन शिर न संभारे, तिनके अंग काठ बह डारे ! शिरपीडा जिनकी नहिं हेरी, करत कपाल क्रिया तिनकेरी) अथवा शृगाल गृध्र कुत्ते कौए इसको खाजाते है फिर यह करोडों जन्मतकभी दृष्टिगोचर नही होता है ॥६६॥ जादूगरके समान उत्पन्न जादूंसरीके इस जगतमे मेरी माता मेरा पिता मेरे गुरुजन मेरे स्वजन ऐसी कौन प्रतिज्ञा करता है? जीव केवल कर्मोको ही लेकर परलोक में जाता है, जैसे मार्गमें पथिकोंके विश्रामके लिये छायाका कोई वृक्ष आ जाता है, ऐसा ही यह मृत्युलोक है ॥६७॥ जिस प्रकारसे पक्षी संध्याकालमें वृक्षपर आकर बसेरा लेते है और प्रातःकाल उठकर एक दूसरे को त्याग अपने अभिलषित देशों मे चले जाते है इसी प्रकारसे जाति अजातिके पुरुषोंका समागम है, कर्मानुसार अपने कुटुम्बादिमें जन्म लेकर स्थित होते है, कर्म समाप्त होते ही अपनी गति को प्राप्त होते है । इससे मनुष्योंकौ उचित है किं, प्राणियोंके समागमको पथिक समाजके समान जाने, यथा (या दुनियामें आयके, छांड देइ तू ऐंठ । लेना है सो लेइले, उठी जात है पैठ ) ॥६८॥ मृत्युके बीजसे जन्म और जन्मके बीजसे मृत्यु होती है अर्थात जो उत्पन्न हुआ है उसका अवश्य नाश होगा और नाश हुआ अवश्य जन्म लेगा, यह प्राणी इसी प्रकार घटीयन्त्रकी समान निरंतर भ्रमण करता रहता है ॥६९॥ हे रामचन्द्र! गर्भके वीर्यके प्राप्त होनेसे इस प्रकारसे प्राणीका जन्म और मृत्यु होती है यह महाव्याधि है, जीवन मरण दोनों मेंही महादुःख होता है, इस व्याधि को दूर करनेके निमित्त मेरे सिवाय दूसरी औषधि नही (नान्यपंथाः विद्यते अयनायेति श्रुतेः) इस कारण मेरा भजन करना योग्य है ॥७०॥ इति श्रीपद्मपुराणे शिवगीतासूपनिषत्सु० शिवराघवसंवादे पिण्डोत्पत्तिकथनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥८॥
अध्याय ९ श्रीभगवान बोले - हे राजन! तुम सावधान होकर सुनो, मै तुमसे देहका स्वरूप कहता हूँ, यह संसार मुझहीसे उत्पन्न होता है मुझही से धारण किया जाता है ॥१॥
और जिस प्रकार भ्रम निवृत होने से रजत सीपमें लय हो जाती है इसी प्रकार यह जगत् ज्ञानसे मुझमें लय हो जाता है, मै निर्मल पूर्ण सच्चिदानंदस्वरूप हूँ ॥२॥ मै संगरहित शुद्ध सनातन ब्रह्म हूँ, मै अनादिसिद्धि मायासे युक्त होकर जगतका अकारण होता हूँ ॥३॥ मेरी माया का वर्णन नही हो सकता, उसमे सत्त्व, रज, तम यह तीन गुण रहते है ॥४॥ सत्त्वगुण शुक्लवर्ण मनुष्योंको सुख और ज्ञानक देनेवाला है और रजोगुण का रक्तवर्ण है, यह चंचल और मनुष्यों को दुःख देनेवाला है ॥५॥ तम का कृष्ण वर्ण है, यह जड और सुख दुःखसे उदासीन रहता है, इसी कारण मेरे संयोग से वह त्रिगुणात्मिका माया ॥६॥ मेरे ही अधिष्ठानसे इस प्रकार जगत को रचना करके दिखाती है, जिस प्रकार अज्ञान शुक्ति में रजत और रस्सीमें सर्प दिखाइ देता है ॥७॥ मुझसे मायाके द्वारा आकाशादिकी उत्पत्ति होती है, मुझसे प्रथम आकाश, आकाशसे वायु, वायुसे अग्नि, अग्निसे जल, जलसे पृथिवी उत्पन्न होती है, उन्ही पांचोसे उत्पन्न हुआ यह सब देह पंचभूतात्मक कहाता है ॥८॥ पितामाताके भक्षण किये अन्नसे यह षट्कोशात्मक शरीर उत्पन्न होता है, जिसमें स्नायु अस्थि और मज्जा पिता के कोशसे उत्पन्न होते है ॥९॥ त्वचा मांस और रुधिर यह माताके वीर्यसे उत्पन्न होते है इसी प्रकार मात और पिता सम्बन्धी षट्कोशात्मक देह में माता से उत्पन्न होने वाले, पिता से उत्पन्न होनेवाले, रजसे उत्पन्न होनेवाले तथा आत्मासे उत्पन्न होनेवाले, चार पदार्थ है ॥१०॥ उसमें रक्त, मेदा, मज्जा, प्लीहा, यकृत, गुदा, हृदय, नाभि इत्यादि मृदु पदार्थ मातासे उत्पन्न होते है ॥११॥ श्मश्रु, लोम, केश, स्नायु, शिरा, धमनी, नाड़ी, नख, दंत, वीर्य आदि स्थिर पदार्थ पिता के संबधसे होते है ॥१२॥ पुष्टता, वर्ण, तृप्ति, बल, अवयवोंकी दृढ़ता, अलोलुपता, उत्साह इत्यादि रजसे उत्पन्न होते है ॥१३॥ इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, धर्म, अधर्म, भावना, प्रयत्न, ज्ञान, आयुष्य, इन्द्रिय इत्यादि यह आत्मज अर्थात आत्मासे उत्पन्न हुए कहाते है ॥१४॥ श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा, और घ्राण यह पांच ज्ञानेन्द्रिय कहाते है ॥१५॥ क्रमसे ही शब्द, स्पर्श, रूप रस गन्ध, यह पांच इनके विषय है, वाणी, हाथ, पैर गुदा और उपस्थ यह पांच कर्मेन्द्रिय है ॥१६॥ बोलना, लेना, देना, चलना, मलविसर्जन और रति यह क्रमसे पांचो इन्द्रियोंके पांच कार्य और मन उभयात्मक है, मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त यह अन्तःकरणके चार भेद है ॥१७॥१८॥ सुख और दुःख यह मनका विषय है, स्मृति भय विकल्प इत्यादि मनके कर्म है और जो निश्चय करती है उसीको बुद्धि कँहते है और अहं, मम यह जो अहंकारात्मक मनकी वृत्ति है इसे ही चित्त कहते है ॥१९॥ यह अन्तःकरणभी सतोगुणादिके भेदसे तीन प्रकार का है, सत, रज, तम यह तीन गुण है, जब सतोगुण प्रधान होता है तब ॥२०॥ आस्तिक्य बुधि, स्वच्छता, धर्ममें रुचि इत्यादि सात्विक धर्म प्राप्त होते है और जब रजोगुण होता है तो काम क्रोध मद इत्यादि होते है ॥२१॥ तमोगुणकी प्रधानतामें निद्रा, आलस्य, प्रमाद, वंचना होती है, इन्द्रियों की प्रसन्नता, आरोग्य, आलस्य का न होना, यह गुण सत्त्वसे उत्पन्न होते है ॥२२॥ इन पांच महाभूतोंकी मात्रासे उत्पन्न हुआ यह देह उनके गुणों को धारण करता है, उनमें शब्द, श्रोत्र, इन्द्रिय, वाणी, कुशलतो, लघुता, धैर्य ॥२३॥ और यह बल सात गुण आकाशसे इस स्थूल देहमें प्राप्त होते है, स्पर्शगुण, त्वगिन्द्रिय, उत्क्षेपण (ऊपर को फेंकना) अवक्षेपण (नीचे को फेंकना) आकुंचक (संकोड़ना) प्रसारण (फैलना) गर्मन (चलना) यह पांच कर्म है ॥२४॥ प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान यह पांच प्राण है ॥२५॥ नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनंजय यह पांच उपप्राण कहाते है, यह एकही वायुके विकारको प्राप्त होने पर दश
नाम धर लिये है ॥२६॥ उसमें प्राणपवन मुख्य है जो नाभि से लेकर कंठतक स्थित रहता है, और नासिका नाभि तथा हृदयकमलमें गमन करता है ॥२७॥ शब्द के उच्चारण निशब्द निश्वास और श्वासादिकका यही कारण है ॥२८॥ गुद, लिंग, कटि, जंघा, उदर, नाभि, कंठ, अंडकोश, जोड़ोकी संधि और जंघाओंमें अपानवायु रहता है, उसका कर्म मूत्र और पुरीषका विसर्जन (त्याग) करना है ॥२९॥ नेत्र, कर्ण, पाव के घुटने, जिह्वा तथा नासिका इन पांच स्थानों में व्यानवायु रहता है, प्राणायाम रेचक, पूरक, कुंभक इसके कर्म है ॥३०॥ समानवायु सब शरीरमें व्याप्त होकर जठराग्निके सहित बहत्तर हजार नाड़ियोंके रन्ध्रमें संचार करता है ॥३१॥ भोजन किये और पिये हुए सम्पूर्ण रसों के देहकी पुष्टिके निमित्त लेकर चरण, हाथ और अंगकी संधियोंमे उदान वायू रहता है ॥३२॥ देहका उठाना, चलाना यह इसका कर्म कहा है, त्वचा, मांस रक्त अस्थि और स्नायु इन पांच धातुओंके आश्रय नागादि पांच उपप्राण रहते है ॥३३॥ डकार, हुचकी, यह नाग पवन का कर्म, पलक खोलना, लगाना, कटाक्ष, यह कुर्मका कर्म, भूख प्यास, छींकना, कृकलका³ कर्म, आलस्य निद्रा जंभाई देवदत्तका कर्म और शोक और हास्य धनंजय³ का कर्म है ॥३४॥ अग्निके धर्म चक्षु, कृष्ण, नील, शुक्ल इत्यादि रूप भोजनका पाक, स्वतःप्रकाश, क्रोध, तीक्ष्णपन, कृशता, ओज, इन्द्रियोंका तेज, संताप, शूरता ॥३५॥ और बुद्धि यह गुण तेजसे प्राप्त होते है, और रसनेन्द्रिय, रस शीत, चिकटापन, द्रवत्व पसीना और सम्पूर्ण अवयवोंमें कोमलता यह धर्म जल से उत्पन्न होते है ॥३६॥ घ्राणैन्द्रिय, गन्ध, स्थिरता, धैर्य, गुरुत्व यह धर्म पृथ्वीसे उत्पन्न होते है, त्वचा, रुधिर, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा और शुक्र यह सात धातु शरीरको धारण करते हैं ॥३७॥ पुरुषोंका भक्षण किया अन्न जठराग्निसे तीन भाग हो जाता है, तिसका स्थूल भाग मल, मध्यभाग मांस और सूक्ष्म भाग मन होता है, इससे मन अन्नमय कहाता है ॥३८॥ जलका स्थूलभाग मूत्र, मध्यभाग रक्त और कनिष्ठ भाग प्राण कहाता है इससे जलमय प्राण है ॥३९॥ तेजका स्थूलभाग अस्थि, मज्जा मध्यभाग और वाणी सूक्ष्मभाग है, आशय यह है कि अन्न, उदक और तेजरूप सर्व जगत है ॥४०॥ रक्तसे मांस उत्पन्न होता है, मांससे मेदा, मेदसे अस्थि और अस्थिसे मज्जा उत्पन्न होती है ॥४१॥ मांससेही नाडी उत्पन्न होती है, और मज्जासे वीर्य उत्पन्न होता है ॥४२॥ वात, पित्त, कफ यह तीन धातु शरीर में रहते है, शरीरमें दश अंजलि प्रमाण जल रहता है और नौ अञ्जलि रस अर्थात (अन्न) रहता है ॥४३॥ रक्त आठ अञ्जलि, विष्ठा सात अञ्जलि; कफ छः अञ्जलि, पित्त पांच अंजलि और मूत्र चार अञ्जलि रहता है ॥ ४४॥ वसा (चर्बी) तीन अंजलि, मेदा दो अञ्जलि, मज्जा एक अञ्जलि और वीर्य आधी अञ्जलि रहता है, इसी को बल कहते है ॥४५॥ शरीरमें अस्थि तीन सौ साठ, शंख, कपाल, रुचक, आस्तरण और नवक यह पांच प्रकार की अस्थि होती है ॥४६॥ शरीरमें दौ सौ दश २१० अस्थियोंकी सन्धि है, उनको रौरव प्रसर स्कन्दसेचन उलूखल ॥४७॥ समुद्ग मण्डक शंकावर्त और वायसतुण्डक यह आठ भेद अस्थियोंकी संधिके है ॥४८॥ साढ़े तीन करोड़ सब शरीरपर रोम है, और दाढ़ीके बाल तीन लाख है, हे दशरथकुमार ! इस प्रकार यह देहका रूप तुम्हरे प्रति वर्णन किया, इस देहकी समान निस्सार पदार्थ दूसरा त्रिलोकीमें कोई नही है ॥४९॥ इस देहको प्राप्त होकर पापबुद्धि पुरुष महाअभिमान करते है और अहंकाररूप पापसे मुख्यआनन्द मोक्षका कुछभी उपाय
नही करते, यह महाशोककी बात है ॥५०॥ इस कारण मुमुक्षुको वैराग्य दृढ होनेकी निमित्त यह स्वरूप जानना अवश्य है ॥५१॥ इति श्री पद्मपुराणे शिवगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे शिवराघवसंवादे देहस्वरूपनिर्णयो नाम नवमोध्यायः ॥९॥
अध्याय १० श्रीरामचन्द्र बोले- हे भगवन् ! इस देहमें यह जीव कहां वर्तमान है यह कहांसे उत्पन्न होता है और इसका क्या स्वरूप है सो आप कहिये ॥१॥ देहान्तमें यह कहां जाता है और जाकर कहां स्थित होता है और फिर देहमें किस प्रकार आता है वा नही आता सो आप कहिये ॥२॥ श्रीभगवानु उवाच । श्रीभगवान बोले- हे महाभाग! बहुत अच्छी बात पूछी है जो गुप्तसे भी गुप्त है, जिसे इन्द्रादि देवता और ऋषिभी कठिनतासे नही जान सकते ॥३॥ हे रघुनन्दन! मै भी यह किसी दूसरेसे नही कहना चाहता परन्तु तुम्हारी भक्तिसे प्रसन्न होकर मै कहता हूँ ॥४॥ मै ही सत्यस्वरूप ज्ञानस्वरूप अनन्त परमानन्द परमात्मा परज्योति मायासे मोहित जीवोंको न दीखनेहारा, संसारका कारण नित्य विशुद्ध, सम्पूर्णका आत्मा, सर्वान्तर्यामी, निःसंग, क्रियारहित, सब धर्मोंसे परे मनसे भी परे हूँ ॥५॥६॥ मुझे कोई इन्द्रिय नही ग्रहण कर सकती, मै संपूर्णका ग्रहन करनेहारा हूँ, मै सम्पूर्ण लोकका ज्ञाता हूँ और मुझे कोई नही जानता ॥७॥ मै संपूर्ण विकारोंसे रहित हूँ, बाल्य यौवनादि परिणाम आदि विकारभी मुझमें नही है, जहां मनके सहित जाकर वाणी निवृत्ते होजाती है ॥८॥ उस आनन्दब्रह्म मुझको प्राप्त होकर यह प्राणी फिर कहींसे भी भयको प्राप्त नही होता है ॥९॥ जो सम्पूर्ण प्राणियोंको मुझमें देखता है और मुझे संपूर्ण प्राणियोंमें देखता है, वह निन्दारहित हो जाता है ॥१०॥ जिसको संपूर्ण (भूत) प्राणी आत्मारूप दीखते है उस सर्वत्र एकरूप देखनेवालेको शोक और मोह नही होता ॥११॥ यह संपूर्ण भूतोमें गुप्तरूप आत्मा प्रकाशित नही होता, परन्तु संपूर्णमें वर्तमान है, सूक्ष्मदशी श्रवण मनन, निदिध्यासन साधना करनेवाले पुरुषोंको अग्रबुद्धिसे दीखता है, दूसरे मनुष्योंको नही देखता है ॥१२॥ अनादि मायासे युक्त निर्विकार अविनाशी एक मै ही नामरूप रहित ब्रह्म जगत्का कर्ता परमेश्वर हूँ ॥१३॥ जिस प्रकार अविद्याके साक्षीभूत ज्ञानपर स्वप्नमें त्रिलोकी की कल्पना की जाती है इसी प्रकार मुझमें यह सब जगत् उत्पन्न हो दीखता. स्थिति पाता और लय हो जाता है ॥१४॥ अनेक प्रकारकी अविद्याके आश्रय होकर जीवरूपसे भी मै ही निवास करता हूँ, पांच कर्मेन्द्रिय और पांच ज्ञानेन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त यह चारो ॥१५॥ पंचप्राण यह सब मिलकर लिंगशरीरको उत्पन्न करते है, उसी लिंगशरीर में अविद्यायुक्त यह चैतन्य का प्रतिबिम्ब पडता है, उसीको व्यवहारमें जीव क्षेत्रज्ञ और पुरुष कहते है ॥१६॥१७॥ वही जीव अनादि कालसे पुण्य पापसे निर्मित हुए स्थावर जंगमादि देहोंमे वास कर शुभाशुभ कर्मका फल भोक्ता है उसीको परलोकगति होती, तथा वही जाग्रत् स्वप्न सुषुप्ति इन अवस्थाओंका भोक्ता है ॥१८॥ जैसे दर्पणके मलिन होनेमें मुखभी मलीन देखता है, इसी प्रकार अन्तःकरणके दोषोंसे आत्मा विकारी दीखता है ॥१९॥ अंतःकरण और जीव इन दोनोंके परस्पर अध्यासके कारण और एकभावका अभिमान करनेसे परमात्माभी दुःखीसा प्रतीत होता है, वास्तव में सब दुःखका धर्म अन्तःकरणमें है जीवमें नही परन्तु जिस प्रकार चन्द्रमाका प्रतिबिम्बं जलमे पडनेसे वह जलके चलायमान होनेसे चलायमान विदित होता है इसी प्रकार अन्तःकरणके सुख दुःख होनेसे वही जीवमें
आरोपण किये जाते है ॥२०॥ जिस प्रकार कि मारवाडदेशमें दोपहरके समय सूर्यकी किरण रेतमें पडकर जलरूपसे प्रतीत होती है, उसमें केवल अज्ञानसे जाना जाता है, वो जलरूप नही, वास्तवमें संतापही करनेवाली है ॥२१॥ इसी प्रकार आत्माभी निर्लेप है, परन्तु वह मूढ बुद्धिवालोंको अविद्या और अपने दोषके कारण कर्ता भोक्ता प्रतीत होता है ॥२२॥ इस अन्नमय पिंडके स्थूल देहमें हृदय के विषय जीव स्थित रहता है और नखके अग्रभाग से लेकर शिखापर्यन्त व्याप्त हो रहा है, सो तू सावधान होकर सुन, वही यह जीव मै 'मनुष्य' मै 'ब्राह्मण' इत्यादि अभिमान करता हुआ इस मांसपिंडमें स्थित है ॥२३॥ नाभिसे ऊपर और कंठ से नीचे अवकाशके स्थान को व्याप्त करके सदा स्थित रहता है, इतनेही स्थानके बीचमें हृदय है जिसका स्वरूप डंडी सहित कमलकलीके समान है ॥२४॥ उसका मुख नीचेको है, उसमें सूक्ष्म और सुन्दर एक छिद्र है, उसीको दहराकाश कहते है, उसमें जीव रहता है ॥२५॥ केशके अग्रभाग का सौवाँ भागकर फिर उसका भी सौवाँ भाग करके जो प्रमाण किया जाय वही सूक्ष्मता जीवकी जाननी वस्तुतः तो जीवके स्वरूपका प्रमाण नही है कि ऐसा है, और इतना है ॥२६॥ जिस प्रकार कदंबके फूलको मध्ययायी चारों और केशर होती है, इसी प्रकारसे हृदय स्थानसे सहस्त्रों नाडी निर्गत हुई है जो शरीर भरमें व्याप्ते है ॥२७॥ वे हित और बलको देती है इस कारण उनकी हित संज्ञा है योगियोंने उन नाडियों की संख्या बहत्तर सहस्त्र कही है ॥ २८॥ जिस प्रकार सूर्यसे किरण निर्गत होती है, इसी प्रकारसे वे नाडी हृदयसे निकली है, उनमें एकसौ एक मुख्यनाडियोंने संपूर्ण शरीरको वेष्टित कर दिया है ॥२९॥ और प्रत्येक इन्द्रियोमें दश दश नाडी है उन्हीके द्वारा विषयोंका अनुभव होता है, यह नाडिही सुख दुःख जाग्रत् स्वप्नादिके साक्षातका कारण है ॥३०॥ जिस प्रकार नदी जलको बहाती है इसी प्रकार नाड़ी सुख दुःखरूपकर्म फलको बहाती है । इन १०१ नाडियोंमें से एक नाडी ऊपर अनन्तनाम बहाती है ब्रह्मरंध्र तक पहुंच गई है ॥३१॥ जो अनन्त अर्थात् सुषुम्नानाम नाडी है उसमे प्राप्त होकर यह जीव मुक्त हो जाता है, जिस समय वह अन्तःकरण कामादि दोषशून्य होता है, उस समय यत्न करनेसे योगीका आत्मा इस नाडीमें प्राप्त होता है, परन्तु उस समय सद्गुरुकी कृपा और पूर्णज्ञानकी आवश्यकता है, कारण कि, ज्ञानद्वारा मुक्ति प्राप्त होती है ॥३२॥ जिस प्रकारसे राहु अदृश्य रहकर भी चन्द्रमण्डलमें दीखता है । इसी प्रकार सर्वत्र रहनेवाला आत्मा लिंग देहमें ही प्रतीत होता है ॥३३॥ जिस प्रकार घटके ले जानेसे घटाकाश भी लेकर जाया जाता है, इसी प्रकार सर्वत्र व्यापकभी जीवात्मा लिंगदेहमें ही प्रतीत होता है ॥३४॥ यद्यपि वह सर्वत्र पूर्ण और निश्चल है, परन्तु वह जाग्रत् अवस्थामें घटादि पदार्थोंका चैतन्य प्रतिबिंबयुक्त होनेसे अन्तःकरण वृत्तिसे व्याप्त होकर चंचलसा दीखता है ॥३५॥ जिस प्रकारसे सूर्य दशो दिशाओंको व्याप्त करता है इसी प्रकार निष्क्रिय और सर्व पदार्थोंमें व्याप्त लिंगदेहके सम्बन्धसे उत्पन्न हुई अन्तःकरणकी वृत्ति नाडियो द्वारा बाहर जाकर विषयोंमें प्राप्त हो उन्हे प्रकाश करती है ॥३६॥ अपने किये उन उन कर्मोंके अनुसार जाग्रतादि अवस्थामें सुख दुःखका साक्षात्कार जीव करता रहता है, सम्पूर्ण वृत्ति लिंगशरीर से उठती है, जब तक मोक्ष न हो तब तक लिंगे शरीरका नाश नही होता ॥३७॥ जिस समय ज्ञानद्वारा जीव और ब्रह्मका भेद मिट जायगा और अविद्यासहित इस लिंग शरीरका नाश हो जायगा उस समय केवल आत्माका अनुभवमात्र 'अहं ब्रह्मास्मि' इस स्वरूपमें स्थिरे होने से ही मुक्त होता है ॥३८॥ जिस प्रकार घटके उत्पन्न होते ही घटाकाश उसमे प्राप्त हो जाता है और उसके नष्ट होनेसे वह अपने स्वरूपमें अवस्थान करता है, इसी प्रकार मायाके नष्ट होनेसे आत्मा अपने स्वरूपमें अवस्थान करता है ॥३९॥ जब जाग्रत् अवस्थामें भोग देनेवाले कर्मोंका क्षय होकर स्वप्नकालमे भोग देनेवाले कर्म जाग्रत समयके देह गेहादि विषयके साक्षात करनेवाले ज्ञानको छिपाकर जब जाग्रत होते है तब (यह जीव क्रिडा करो) इस प्रकारसे परमेश्वरकी इच्छासे पूर्व अनुभव किया हुआ स्वप्नसमयके विषय का जाग्रत होनेपर यह मायावी अविद्योपाधि जीव माया कीनिद्रा के योगसे जाग्रत अवस्थामें भी स्वप्नसे भिन्नस्वरूप अवस्थाकी ओर देखता है ॥४०॥४१॥
घटपटादि विषय, बुद्धि आदि इन्द्रिय और स्वप्नसमयके भोग देनेवाले पदार्थ की समान सब सृष्टि अन्तःकरणने कल्पना करी है, जिस प्रकार इकला मनुष्य स्वप्न में अनेक मनुष्य देखता, भोग भोगता और संसार की सब रचना भिन्न भिन्न जानता है, यथार्थ में एकही है, इसी प्रकार वास्तविक आत्मा है, परन्तु अन्तःकरणकी कल्पना से यह जगत् अनेक भावसे दीखता है ॥४२॥ इन सबको देखनेहारा स्वयंज्योति आत्मा साक्षीरूपसे सबमे वर्तमान है ॥४३॥ इस अवस्थामें अन्तःकरणादि सर्व पदार्थों की वासना भावनासे की हुई असत्य होनेसे वह वासनारूपी ही है और परमात्मा उसही स्थानमें वासनामात्र से साक्षी है ॥४४॥ जिस प्रकार जाग्रत् अवस्थामें कर्ता कर्म किया इत्यादि संपूर्ण कारणोंसे युक्त व्यवहार चलता है इसी प्रकार पूर्व जन्मके किये कर्मोकी प्रेरणासे वासनारूप प्रपंच है परन्तु जाग्रत् अवस्थामें प्रपंचका व्यवहार समर्थ होता है और स्वप्ने अवस्थामें कल्पित है यही इसमें भेद है ॥४५॥ सम्पूर्ण बुद्धि वृत्तिका साक्षी आत्मा स्वयंही प्रकाश करता है, उस साक्षीका जो वासनामात्र साक्षीपना है उसे स्वप्न कहते है ॥४६॥ बाल्य अवस्थामें जाग्रत् जो कर्म स्तनपान कन्दुकक्रीडा आदि किये है, उस समय उसीकी वासना हृदयमें प्रबल रहती है, इस कारण वे ही स्वप्न दीखते है ॥४७॥ और तरुण अवस्थामें इन्द्रिय अपने व्यापारमें कुशल हो जाती है यह प्राणी अनेक व्यापारमें व्यग्र हो जाता है, अध्ययन, कृषि, व्यापार आदिकी वासना हृदयमें अत्यन्त दृढ हो जाती है, इस कारण तद्रूप ही स्वप्न देखता है ॥४८॥ और जो वृद्धावस्थामें परलोक जानेके निमित्त दान धर्म विद्यादि दान ऐसे उत्तम कर्म करते है उनके हृदयमे यह वासना दृढ हो जाती है तो प्रायः यहभी इसी प्रकार के स्वप्ने देखा करते है, कि हमने दान किया, इस प्रकार लोककी प्राप्ति हुई ॥४९॥ जिस प्रकारसे श्येन पक्षी आकाशमें भ्रमण करते २ जब थक जाता है, तब विश्रामका और कोई उपाय नही देखकर निज पंखो को सकोडकर अपने घोसलेमे विश्राम लेता है ॥५०॥ इसी प्रकार जाग्रत और स्वप्न अवस्थामें विचरनेसे जब आत्मा शांत होता है तब संपूर्ण इन्द्रियोंके शिथिल होने से सब साधनाओंको लयकर देता है अर्थात संपूर्ण इन्द्रियोंके व्यापारको समाप्तकर निद्रित हो जाता है ॥५१॥ नाडियोंके मार्गसे इन्द्रियकी वासना को आकर्षणकर जाग्रत और स्वप्न अवस्थाके सब कार्य समाप्तकर आत्मा लीन हो जाता है ॥५२॥ जिस समय यह मायासे आच्छादित चैतन्य अव्याकृत स्वरूपमें लय होता है, उस समय सम्पूर्ण प्रपंच लय हो जाता है, परन्तु यह लय आत्यंतिक नही है, इसमें केवल कार्यरूपका नाश होता है कारण रूपवासना बनी रहती है ॥५३॥ जिस पुरुषकी किसी स्त्री को अत्यंत इच्छा हो, और वह उसे प्राप्त हो जाय उसके सम्भोगसे जो सुख हो जाता है उसकी ³ सीमा है परन्तु उससे कही अधिक सुख निद्रा अवस्थामें जीवको आनन्दमय कोशमें प्राप्त होनेसे होता है जब जीवको बाह्य विषयका ज्ञान नही होता, वह अन्तर अर्थात् मोक्षकी अवस्थाकी समान जिसमें विषयवासना अत्यन्त निवृत्त होती है, निवृत्त वासनावाला भी नही होता ॥५४॥ निद्रावस्थामें जीवात्मा जब ईश्वरको प्राप्त होता है तब जाग्रत आदि अवस्थामें जैसे ईश्वर से भिन्न रहता है तैसा भी भिन्न रहता है, तब भी भेद नही जाता ऐसा होनेसे ही वह उस समय दुःख रहित होता है, क्योकि कारणात्मामें उसका साम्य माना जाता है एकत्व पाता है, इस कारण औपचारिक है ॥५५॥ जो भी उस अवस्थामें अविद्याकी सूक्ष्मत्व वृत्ति आनेसे जैसे सुख अनुभव करता है उस सुखको जैसे, 'सुखमहमस्वाप्सम् अर्थात् मै सुखसे सोआ' 'नकिंचिदवेदिषम' 'और दूसरा कुछ भी न जाना केवल अज्ञानका ही अनुभव किया ॥५६॥ परन्तु यह अज्ञानभी साक्षी आदिकी वृत्तिसे अनुभव किया जाता है, कि सुखसे सोया यदि साक्षी न हो तो सुखसे सोनेकी स्मृति किसी प्रकार नही हो सकती, क्योंकी गाढ निद्रामें सोते समंय तो उसे सुखका अनुभव होता नही, उसके पश्चात जाग्रत होकर साक्षीके द्वारा जानता है ॥५७॥ जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति यह तीन अवस्था जैसी इस लोककी है तैसी देवलोक की है, सुषुप्तिके अन्तमें जब जाग्रत अवस्था आती है तो ³ अपने कारणरूप जीवके प्रारब्धके कर्मसे फिर इन्द्रिये इस प्रकार जाग ³ उठती है जिस प्रकार अग्निसे विस्फुलिंग (चिनगारियां) उठने लगती है इसी प्रकार सूक्ष्मरूपमें लीन हुई इन्द्रियमे उठती है ॥५८॥ जिस प्रकार जलभरा हुआ घडा जलमें डुबादो और यदि उसे फिर निकालो तो वह उस जल से भराही आताहै इसी प्रकार से यह जीवात्मा इन्द्रिये आदि सहित कारणमें लयको प्राप्त हो उन इन्द्रियों सहित ही जाग्रत अवस्थाको प्राप्त होता है ॥५९॥
विज्ञानात्मा (जीव) कारणात्मा (ईश्वर) यह दोनों वास्तवमें एकही रूप है परन्तु अविद्याके प्रपंच से उनमें भेद प्रतीत होता है, जब यह अविद्या नष्ट होजाय तो ऐसा नही होता उस समय दोनों एकरूप हो जाते है ॥६०॥ जिस प्रकार से एक ही सूर्य जलादि पदार्थों से प्रतिबिंबित होनेसे अनेकरूप दीखता है और जलके चलायमान होनेसे सूर्यादिमें ही चञ्चलता प्रतीत होती है, इसी प्रकार कूटस्थ एक (जीवात्मा) ईश्वर एकही है, और अनेक देहोंमे प्रतिबिम्बित जीवरूपसे प्रविष्ट होकर अनेकरूप और गमनागमनादिरूपसे दीखता है ॥६१॥ आत्मा देहादि उपाधिसे रहित स्वप्रकाश है, परन्तु स्वरूपकी स्मृति लोप करनेवाली मायाने विस्मृति को प्राप्त कर दिया है, इससे सब प्रपंच इस में अज्ञानसे विदित होता है, कारण कि, यह माया तो (अघटितघटनापटीयसी) न होनेवाली बातको भी करके दिखा देती है । माया के योग से आत्मामें कितने ही विरुद्ध कर्म दीखे परन्तु मायाके दूर होते ही जीव ईश्वर और निर्विकार हो जाता है, हे दशरथकुमार! यह तुमसे जीवका स्वरूप वर्णन किया ॥६२॥६३॥ इति श्रीपद्मपुराणे उपरिभागे शिवगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे शिवराघवसंवादे जीवस्वरूपकथनं नाम दशमोऽध्यायैः ॥१०॥
अध्याय ११ जीवकी देहान्तरगरि ओर परलोकगति लिंग देहके कारण होती है यह बात संक्षेपसे कहकर अब विस्तारसे वर्णन करते हुए श्रीभगवान बोले-हे नृपश्रेष्ठ! उस जीवकी देहान्तरगति और परलोकगति मैं तुमसे वर्णन करता हूं, सावधान होकर सुनो ॥१॥ इस स्थूलदेहसे जो कुछ भोजन किया जाता और पिया जाता है उसीके कारण लिंग और स्थूल देह में सम्बन्ध उत्पन्न होता है, उसीसे जीवन धारण होता है ॥२॥ जिस समय व्याधि वा जरा अवस्थासे कफ प्रबल होता है तब जाठरानल के मंद होने से भोजन किया हुआ अन्न अच्छी तरह नही पचता है ॥३॥ जब भोजन किये हुए रसके न प्राप्त होनेसे शीघ्र ही धातु सूख जाते है, और भोजन किये तथा पान किए रससे ही शरीरमें जाठराग्निके दीप्त रहते जो अन्न भक्षण किया जातो है, वह रसरूप होकर शरीर को पुष्ट करता है ॥४॥ उस समय प्राणवायु वह सम्पूर्ण रस लेकर सब धातुओं में पहुंचाता है इसी कारण से यह समान वायु कहाता है और वृद्धावस्थामें वह रस उत्पन्न नही होता इस कारण शरीरके बंधन जो दृढ़तासे परस्पर संघट्ट है शिथिल हो जाते है ॥५॥ जिस प्रकार कि, आम्र फल पककर अपने भारसे आपही शीघ्र पतित हो जाता है, इसी प्रकार शरीरके शिथिल होनेसे लिंगशरीरका स्थूल से वियोग हो जाता है ॥६॥ सम्पूर्ण इन्द्रियोकी वासना, आध्यात्मिक-जीवसम्बन्धी बुद्धि और ज्ञानेन्द्रियादि आधिभौतिक-प्राप्त होनेवाले देहके कारणभूत सूक्ष्म रूपवाले कर्म यह तीनों आकर्षित होकर हृदयकमलमें एकता को प्राप्त होते है ॥७॥ तब मुख्य प्राणवायु शेष नौ वायुओंसे संयुक्त होकर ऊर्ध्वश्वासरूपी हो जाता है, और फिर वे सब एक होकर जीवात्मा से संयुक्त होते है ॥८॥ विद्या, कर्म और वासनासे युक्त हो यह जीव अपने कर्मसे नाडीमार्गका आश्रयकरके नेत्रमार्ग अथवा ब्रह्मरंधके द्वारा बहिर्गत होता है ॥९॥ जिस प्रकारसे घडेको इस देशसे दूसरे स्थानमें ले जाते है परन्तु वह आकाशासे पूर्ण हो जाता है, जहां घट जायगा उसी उसी स्थानमें घटाकाशभी जायगा इसी प्रकार से जहाँ जहाँ लिंगशरीर गमन करतो है उसी उसी स्थानमें जीव होता है ॥ १०॥११॥ और कर्मानुसार दूसरे देहको प्राप्त होता है, जिस प्रकार नदीका मच्छ कभी इस किनारे और कभी दूसरे किनारे जाता है, इसी प्रकारसे यह मोक्ष न होनेतक अनेक योनियोंमे भ्रमण करता रहता है ॥१२॥ जो पापी है उनको यमदूत ले जाते है यह यातना देहका जो नरक दुःख भोगनेके लिये दी जाती है, उसको आश्रय करके केवल नरकों ही को भोगता है ॥१३॥ और जिन्होंने सदा इष्ट (यज्ञादि) पूत- (वापीकूपतडागादि निर्माण करना) कर्म किये है, वह पितृलोकको गमन करते है, यमदूत उन्हे पितृलोकको प्राप्त करते है ॥१४॥
उस मार्गका क्रम यह है कि, धूम फिर रात्रिअभिमानी देवता के निकट फिर कृष्णपक्षाभिमानी देवता के निकट फिर दक्षिणायन अभिमानी देवता के निकट फिर वहांसे पितृलोकमें जाता है, पितृलोकसे आगे चन्द्रलोकको प्राप्त हो दिव्य देह पाकर महालक्ष्मीका भोग करता है ॥१५॥ वहां यह चन्द्रमाकीही समान होकर कर्मकी फलकी अवधितक चन्द्रलोकमें वास करता है, जब पुण्य फल समाप्त हो जाता है तो जिस क्रमसे इस लोकमें गमन हुआ था उसी क्रमसे इस लोकमें फिर आता है ॥१६॥ चन्द्रलोकसे चलते समय उस शरीरको छोड़ यह आकाशरूप होकर आकाशसे वायुमें और वायुसे जलमें आता है ॥१७॥ जलसे मेघोंमें प्राप्त होकर फिर यह वर्षाद्वारा पृथ्वीपर पतित होता है, फिर अनेक कर्मके वश होकर भक्षण योग्य अन्नमें प्राप्त होता है ॥१८॥ और कितने एक शरीरप्राप्तिके निमित्त मनुष्यादि योनिमें प्राप्त होते है और कितने एक कर्म और ज्ञानके तारतम्यसेस्थावरत्व को प्राप्त हो जाते है ॥१९॥ जो जीव अन्नमें प्राप्त हुए है, उस अन्नको स्त्री पुरुष भक्षण करते है उससे स्त्री और पुरुषोंका रज और शुक्र होकर उन दोनोंके संयोगसे वह गर्भरूप धारण करते है ॥२०॥ यही जीव कर्मके अनुसार स्त्री, पुरुष और नपुंसक होता है, इस प्रकारसे इस जीवकी इस लोकमें गति और परलोकगति होती है अब इसकी मुक्तिका वर्णन करता हूँ ॥२१॥ जो शमदमादिसाधनसम्पन्न सदा अपने वर्णाश्रमके कर्म करते और फलकी आकांक्षा न करके ईश्वरापण कर देते है वह मनुष्य देवयानमार्गसे ब्रह्मलोकपर्यन्त गमन करते है ॥२२॥ वह प्रथम ज्योतिमें प्राप्त हो पीछे दिन और फिर शुक्लपक्षाभिमानी देवताके निकट जाता है फिर उत्तरायणको प्राप्त होकर संवत्सरके निकट गमन करता है ॥२३॥ फिर सूर्यलोकको प्राप्त होता है, चन्द्रलोकसे भी ऊपर विद्युत लोकको प्राप्त होता है फिर उससे आगे कोई एक पुरुष दिव्य देहको प्राप्त हो ब्रह्मलोकको जाता है, और वहांसे येंहां नहीं आता है ॥२४॥ ब्रह्मलोकमें प्राप्त होकर दिव्य देहके आश्रित हो यह जीव रहता है, उस दिव्य देहसे ब्रह्मलोकमें अनेक प्रकारके मन इच्छित भोगोंको भोगता हुआ बहुत कालतक उस स्थानमें वासकर ब्रह्माके साथ मुक्त हो जाता है है उसकी फिर आवृत्ति नही होती ॥२५॥२६॥ जिस प्रकारसे स्वप्नमें देखी हुई सृष्टि जाग्रत होतेही लय हो जाती है इसी प्रकारसे ब्रह्मज्ञान प्राप्त होनेसे यह सब सृष्टि लय हो जाती है और जिन्होने केवल पापही किये है और उपासना तथा पुण्यकर्मसे रहित उनकी तीसरी गति अर्थात नरक होता है ॥२७॥२८॥ वे अनेक प्रकारके रौरव, महारौरव, घोर नरकोंको भोगकर पीछे शेष कर्मोके अनुसार क्षुद्र जन्तुओंके शरीरको प्राप्त होते है ॥२९॥ पृथ्वीमें लीख, मच्छर, डांश आदिका जन्म लेता है, इस प्रकारसे जीवकी गति तुमसे वर्णन की अब और क्या सुनने की इच्छा है ॥३०॥ श्रीराम उवाच । रामचन्द्र बोले, हे भगवन् ! आपने उपासना और कर्मफलसे अनेक प्रकारसे चन्द्रलोक और ब्रह्मलोककी प्राप्ति वर्णन की सो यथार्थ है ॥३१॥ गन्धर्वादि लोक और इन्द्रादि लोकोंमे किस प्रकारसे भोग प्राप्त होते है कोई देवता कोई इन्द्र और कोई गन्धर्व होता है ॥३२॥ हे शंकर! यह कर्मका फल है वा उपासनाका फल है सो कृपा करके वर्णन कीजिये, इसमें मुझे बड़ा सन्देह है ॥३३॥ श्रीभगवानुवाच । शिवजी बोले, उपासना और शुभकर्म, इन दोनोंहीके योगसे फल प्राप्त होता है, वह हम वर्णन करते है, जो मनुष्य युवा सुन्दर शूर नीरोग और बलवान हो ॥३४॥ वह यदि सप्तद्वीपयुक्त पृथ्वीको निष्कंटक भोग करता हो उसका नाम मानुषानन्द है यह आनन्द साधारण मनुष्योंको देह प्राप्त होनेवाले आनन्दसे सौ गुणा अधिक है ॥३५॥ जो मनुष्य तप आदिसे संयुक्त हो वह गन्धर्व होता है मनुष्योंके आनन्दसे सौगुणा आनन्द गन्धर्वोको प्राप्त होता है ॥
३६॥ इसी प्रकारसे ऊपर ऊपर पितृलोक देवादिलोकमें उत्तरोत्तर सौगुणा आनन्द बढता जाता है ॥३७॥ तिनमें भी देवता, देवतासे इन्द्र, इन्द्रसे बृहस्पति, बृहस्पतिसे ब्रह्मदेव, ब्रह्मदेवसे ब्रह्मानंद उत्तरोत्तर सौ २ गुणा अधिक है ॥३८॥ ज्ञानके आनंदसे अधिक आनंद तो देवलोकमें भी नही है, कारण कि, ज्ञानीको किस वस्तुकी अपेक्षा नही है कहींसे भय नहीं है, जो ब्राह्मण क्षत्रियादि वेदवेदांगके पारगामी निष्पाप और निष्काम है, और भगवँत् की उपासना करनेवाले है ॥ ३९॥ वह अनुक्रमसे उत्तर उत्तर आनंदको प्राप्त होते है परन्तु हे दशरथकुमार! यह जो कुछ आनंद है सौ आत्मज्ञानकी बराबर नही है इससे आत्मज्ञानका अनुष्ठान करना उचित है ॥४०॥ जो ब्राह्मण ब्रह्मदेवता है उसे कर्मउपासनासे कुछ प्रयोजन नही है न उसकी कर्मसे कुछ वृद्धि और न करनेसे कुछ हानि भी नही, जो शास्त्रने विहित कर्मोंका विधान और निषिध कर्मोंका निषेध किया है, वह कँवल जब तक ज्ञान नही तभीतक है, ज्ञान होने पर कुछ नही, और यदि ज्ञानी लोकस्थापनके निमित्त करे तो भी कुछ हानि नही ॥४१॥ इस कारणसे ज्ञानवान ब्राह्मण सबसे श्रेष्ठ है, जो कोई पुण्यवान ज्ञानी जानकर कर्म करता है उसके पुण्यका फल अक्षय होता है ॥४२॥ जिस फलको मनुष्य करोड ब्राह्मणके भोजन करानेसे प्राप्त होता है वह फल एक ज्ञानीके भोजन कराने से प्राप्त होजाता है ॥४३॥ जो वस्तु ज्ञानिजनों को दिया जाता है वह करोडगुण मिलती है और जो मनुष्योंमें अधम ज्ञानीकी निन्दा करता है वह क्षयरोगकौ प्राप्त होकर मृतक हो जाता है कारण कि, ज्ञानी साक्षात् ईश्वर है ॥४४॥ हे रामचन्द्र! जो निर्गुण को कठिन समझते है वह पहले सगुण उपासना करे, किसीभी सगुण उपासना करनेवाले की अधोगति नही होती, इस कारण सगुणरूपकी ही उपासना करके सुखी हो ॥४५॥ इति श्रीपद्मपुराणे उपरिभागे शिवगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे शिवराघवसंवादे जीवगत्यादिनिरूपणं नामैकादशोऽध्यायः ॥११॥
अध्याय १२ श्रीरामचंद्र बोले, दे देवदेव! महेश्वर आपको नमस्कार है आप उपासना की विधि और उसका देशकाल वर्णन कीजिये, कि किस समय किस प्रकार उपासना की जाय ॥१॥ ईश्वर उवाच । हे भगवन ! हमारे ऊपर आपकी कृपा होय तो उपासनाका अंग और नियम कहो, फिर शिवजी बोले हे राम! मै तुमसे उपासनाकी विधि और उसका देश काल कहता हूँ तुम मन लगाकर सुनो । जितने देवता है यह सब मेरे ही रूप है वास्तवमें मुझसे भिन्न नही ॥२॥३॥ जो दूसरे देवताओंके भक्त है, और श्रद्धापूर्वक उनका पूजन करते है, हे राजन!! वे पुरुष मेआ ही भेदबुद्धिसे यजन करने वाले है ॥४॥ जिस कारण कि, इस सम्पूर्ण संसारमें मेरे सिवाय और कुछ नही है, इसीसे मै सब क्रियाका भोक्ता और सबका फल देनेवाला हूँ ॥५॥ जो पुरुष विष्णु, शिव, गणेशादि जिस भावसे मेरी उपासना करते है, उसी भावनाके अनुसार उसी देवताके रूपसे मै उन्हें वांछित फलँ देता हूँ ॥६॥ विधिसे अविधिसे किसी प्रकारसे हो जो मेरी उपासना करते है उनको मै प्रसन्न होकर फल देता हूँ, इसमें कोई संदेह नही ॥७॥ यद्यपि वह दुराचारी है परन्तु वह अनन्य होकर मेरा भजन करता है उस पुरुषको साधुही मानना चाहिये, और पुण्यवान है यह भक्तिकी महिमा दिखाई है परन्तु यह निश्चय जानना चाहिये कि अनन्यभक्तिवाला किसी प्रकार
दुराचारी नही हो सकता, कारण कि अनन्य भक्तिका और स्थानमें मन नही जाता ॥८॥ जो एकनिष्ठबुद्धि होकर जीवात्मा परमात्माको एकही रूप जानता है, अर्थात् जीवरूपभी मेरेको ही जानता है और अनन्य बुद्धिसे मेरा भजन करता है उसको पाप स्पर्श नही करता बहुत क्या उसे ब्रह्महत्याभी स्पर्श नही करती ॥९॥ उपासनाकी विधि चार प्रकारकी है संपत्, आरोप, संवर्ग और अध्यास ॥१०॥ अल्प वस्तुकाभी गुणयोगसे मन की वृत्तिसे अनन्त गुणोंकी भावनासे चिंतन करना जैसे कि, मूर्तिमें अनंत गुणविशिष्ट शिव तथा ³विष्णुका ध्यान करना इसका नाम संपत है ³॥११॥ एक देश वा अंगमें सम्पूर्ण उपास्य वस्तु का आरोप करके जो उपासना करनी है उसे आरोप कहते है, जैसे ओंकारकी उद्गीथसाम रूप से उपासना की जाती है ॥१२॥ आरोप और अध्यास इनका स्वरूप बहुधा एकसा है, भेद इतनाही है कि बुद्धिपूर्वक किसी एक वस्तुमें विवक्षित धर्मका आरोप करके उसकी उपासना करना, ³जैसे स्त्रीपर अग्निका आरोप (अर्थात् ³) स्त्रीको अग्निरूप मानना यह अध्यास है ॥ १३॥ कर्मयोगसे उपासना करने का नाम संवर्ग है अर्थात् सम्पूर्ण भूतोंको उपासनाके योगसे वशमें करना, जैसे प्रलय कालमें संवर्त नामक, वायु अपनी शक्तिसे सब भूतोंको वश करती है ॥१४॥ गुरुसे प्राप्त हुए ज्ञानसे देवतामें और अपनेमें भेद न मानना और अन्तःकरणसे देवताके समीप प्राप्त होना और अन्त:करणसे ³ही सब पूजन कल्पित करना, इसका नाम अंतरग उपासना है, और इसके उपरांत दूसरी विधिसे बहिरंग उपासना कहाती है ॥१५॥ तब इस प्रकार किसी की उपासना करनी और कहां तक करनी किसी भी देवताकी उपासना करते हुए, ध्यानसे उस देवताके स्वरूपका जो ज्ञान होता है उस ज्ञानको विजातीय ज्ञानसे शिवका ध्यान करते हुए कामिनी के ध्यानसे-मध्यमें विच्छिन्न न होकर व्यवधानरहित ज्ञानपरम्परासे-निदिध्यासना करके ध्यानयोग्य देवताओंमें अपनी बुद्धि लगाकर एकरूपका साक्षात् होने तक उपासना करता रहे ॥१६॥ संपादादि जो चार उपासना वर्णन की है, यह दृढ बुद्धिकी उपासना तथा उपासनाकी परम अवधि है और सगुण उपासना इस प्रकार है कि, मूर्तिकी उपासना करनेके समय ³उसके प्रत्येक अंगोंमें अक्षय दृष्टि लगाकर उपासना करनी, इस उपासनाके अंगोको श्रवण करो ॥१७॥ उपासनोके योग्य देशोंका कथन करते है कि, तीर्थ और क्षेत्रादिकोंमें ही जानेसे उपासना होगी यह विचार न करे, क्षेत्रादिकोंमें जानेकी श्रद्धा त्याग दे, और जहां अपना चित्त स्वच्छ और एकाग्रतायुक्त होय तहां ही सुखसे बैठकर उपासना करे ॥१८॥ कम्बल मृदुकुपास वस्त्र अथवा मृगचर्मपर स्थित होकर एकान्त देशमें स्थितहो समान ग्रीवा और शरीरको सरल करेंगे ॥ १९॥ विधिपूर्वक भस्म धारणकर और सम्पूर्ण इन्द्रियोंको रोककर तथा भक्तिपूर्वक अपने गुरुको प्रणाम करके, ज्ञानशास्त्रद्वारा ज्ञानकी प्राप्तिके निमित्त भक्तिसे प्राणायाम करे ॥२०॥ जिसका अन्तःकरण मूढ और विवेकशून्य है उसकी इन्द्रियें दुष्ट घोडोंकी समान है, अर्थात् जैसे दुष्ट घोड़ा सारथीके वशमें नही आता तैसे ³दुष्ट इन्द्रिय वाले उन्हे वश नही कर सकते ॥२१॥ और जो ज्ञानसम्पन्न है उनके यत्न करने से सम्पूर्ण इन्द्रिये मनके सहित वशमें हो जाती है, जिस प्रकार सुशिक्षित अश्व सारथीके वशमें हो जाता है ॥२२॥ और जो विवेकशून्य चंचलचित्त बाह्य और अन्तर शौचसे हीन और अनुभवज्ञानरहित है वे उस स्थानको नही प्राप्त होते परन्तु निरंतर संसारमें ही भ्रमण करते है ॥२३॥ और जो ज्ञानी स्थिरचित्त बाह्य आभ्यन्तर पवित्रतासे युक्त है वे उस स्थानको प्राप्त होते है जहांसे फिर आना नही होता (न स पुनरावर्तते २) यह श्रुतिमें लिखा है ॥२४॥ जिसका विज्ञानरूपी सारथी मनरूपी लगाम धारण किये है, इन्द्रियरूपी घोड़े जुते शरीररूपी रथमे जो बैठा है वह संसाररूपी मार्गसे पारहो परमपद (मोक्ष) स्थानपर पहुँच जाता है ॥२५॥ हृदयकमल कामादिदोष रहित शमदमादिगुणसम्पन्न स्वच्छ और शोकरहित करके उसमें मेरा ध्यान करना उचित है ॥ २६॥ जो अचिन्त्यस्वरूप सीमारहित है, जिससे श्रेष्ठ कोई दूसरा नही है, जो नाशरहित कल्याणस्वरूप आदिअन्तशून्य प्रशांत और सबका कारण है ॥२७॥