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श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

श्रीगणेशदेईरानी) (१०६ दई सेवा वाहि, और घर धन तिया दियौ, लियौ ब्रजवास, वाकी प्रीति सुनि लीजिये। ठाकुर विराजैं तहाँ, खेलैं सुत औरनि के, डारैं ईंटा खोहा, पर्यौ प्रभु पर खीझियै॥ दिये वे बिझारि, धर्यौ भोग पै न खात हरि, पूछी कही वेई आवैं, तबही तौ जीजियै। कह्यौ रिस भरि, धूरि नीकी भोर डारौं भरि, खावौ अब हा-हा करी, पायौ ल्याई रीझियै॥४१६॥ श्रीभक्तराज युवतीजनजी कलिजुग जुवतीजन भक्तराज, महिमा सब जानै जगत्॥ सीता झाली सुमति सोभा प्रभुता उमा भटियानी। गंगा गौरी कुँवरि उबीठा, गोपाली गनेसदे रानी॥ कला लखा कृतगढौ, मानमती सुचि सतिभामा। जमुना कोली रामा, मृगा देवादे भक्तन विश्रामा॥ जुग जेवा कीकी कमला, देवकी हीरा हरिचेरी पोखे भगत। कलिजुग जुवतीजन भक्तराज, महिमा सब जानै जगत्॥१०४॥ श्रीगणेशदेई रानीजी मधुकरसाह भूप भयौ देस ओड़छे कौ, रानी सो गनेसदेई काम बाँकौ कियौ है। आवैं बहु सन्त सेवा करत अनन्त भाँति, रह्यौ एक साधु, खान-पान सुख लियौ है॥ निपट अकेली देखि, बोल्यौ धन थैली कहाँ? होय तौ बताऊँ, सब तुम जानौ हियौ है। मारी जाँघ छुरी, लखि लोहू वेगि भागि गयौ, भयौ सोच जानै जिनि, राजा बन्द दियौ है॥४०७॥ बाँधि नीकी भाँति पौढ़ि, रही कही काहू सौं न, आयो ढिंग राजा, मति आवौ तिया धर्म है। बीते दिन तीन, जानी वेदन नवीन कछू, कहिये प्रवीन मोसौँ, खोलि सब मर्म है॥ टारी बार दोय चारि, नृप के विचार पर्यो, कर्यौ समाधान जिन, आनौ जिय भर्म है। फिर्यौ आस-पास भूमि, पर तन रास करी, भक्तिकौ प्रभाव छाँड़ि, तिया पति सर्म है॥४१८॥ हरि के सम्मत जे भगत, ते दासनि के दास॥ नरबाहन बाहन बरीस जापू जैमल बीदावत। जयन्त धारा रूपा अनुभई ऊदारावत।

गम्भीरे अर्जुन जनार्दन गोविन्द जीता। दामोदर साँपिले गदा ईश्वर हेमविदीता॥ मयानन्द महिमा अनन्त, गुढीले तुलसीदास। हरि के सम्मत जे, भगत, ते दासनि के दास॥१०५॥ श्रीनरबाहनजी रहैं भौगाँव नांव नरबाहन साधुसेवी, लूटि लई नाव, जाकी बन्दीखानै दियौ है। लौंड़ी आवै दैन कछू, खायवे को, आई दया, अति अकुलाई लै, उपाय यह कियौ है॥ बोलौ राधवल्लभ औ, लेवौ हरिवंश नाम, पूछै शिष्य नाम कहौ, पूछी नाम लियौ है। दई मँगवाय वस्तु, राखियो दुराय बात, आय दास भयौ, कही रीझि पद दियौ है॥४१६॥ श्रीमुख पूजा सन्त की, आपुन तें अधिकी कही॥ यहै वचन परमान, दास गाँवरी जटीयाने भाऊ। बूँदी बनियाँ राम, मँड़ौते मोहनवारी दाऊ॥ माड़ौठी जगदीसदास, लछमन चट्टूथावल भारी। सुनपथ में भगवान, सबै सलखान गुपाल उधारी॥ जोबनेर गोपाल के, भक्त इष्टा निर्वही। श्रीमुख पूजा सन्त की, आपुन तें अधिकी कही॥१०६॥ श्रीगोपालदास जोबनेरी जोबनेर वास, सो गोपाल भक्त-इष्ट ताकौं, कियौ निर्वाह बात, मोकौं लागी प्यारियै। भयौ हो विरक्त कोऊ कुल में प्रसंग सुन्यौ, आयौ यों परीच्छा लैन, द्वार पै विचारियै॥ आय पर्यौ पाँय, पाँय धारौ निज मन्दिर में, सुन्दरी न देखौं मुख, पन कैसे टारियै। चलो जिन टारौ तिया, रहैंगी किनारौ करि, चले सब छिपीं नेकु, देखी याकै मारियै॥४२०॥ एक पै तमाचो दियौ, दूसरे ने रोष कियौ, देवौ या कपोल पै यों, वानी कही प्यारी है। सुनि आँसू भरि आये, जाय लपटाये पाँय, कैसे कही जाय, यह रीति कछु न्यारी है॥ भक्त इष्ट सुन्यौ मेरे, बड़ौ अचरज भयौ, लई मैं परीच्छा, भई सिच्छ मोकौं भारी है। बोल्यौ अकुलाय, अजू पैयै कहाँ भाय ऐपै, साधु सुख पाय कहैं, यही मेरी ज्यारी है॥४२१॥

श्रीलाखाजी) (१११ श्रीलाखाजी परमहंस वंशानि में, भयौ विभागी बानरौ॥ मुरधरखण्ड निवास, भूप सब आज्ञाकारी। राम-नाम विश्वास, भक्त पद रज व्रतधारी। जगन्नाथ के द्वार, दँडौतनि प्रभु पै धायौ। दई दास की दादि, हुण्डी करि फेरि पठायौ॥ सुरधुनी ओघ संसर्ग तैं, नाम बदल कुच्छित नरौ। परमहंस वंशानि में, भयौ विभागी बानरौ॥१०७॥ लाखा नाम भक्त, वाकौ बानरौ बखान कियौ, कहै, जग डूब, जासौ मेरो सिरमौर है। करैं साधुसेवा बहु, पाक डारि मेवा, सन्त जेंवत अनन्त, सुख पावै कौर-कौर है॥ ऐसे में अकाल पर्यौ, आवैं धरि माल-जाल, कैसे प्रतिपाल करैं, ताकी और ठौर है। प्रभु जू स्वपन दियौ, कियौं में जतन एक, गाड़ी भरि गेहूँ भैंसि, आवै करौ गौर है॥४२२॥ गेहूँ कोठी डारि मुँह, मूँदि नीचे देवो खोलि, निकसै अतोल, पीसि रोटी लै बनाइयै। दूध जितौ होय, सो जमायके विलोय लीजै, दीजै यों चुपिरि संग, छाछ दै जिंवाइयै॥ खुलि गई आँखें, भाखैं तिया सौं जु आज्ञा दई, भई मनभाई, अजू हरिगुन गाइयै। भोर भयैं गाड़ी भैंसि, आई वही रीति करी, करी साधुसेवा नाना भाँतिन रिझाइयै॥४२३॥ आई कौन रीति, वाकी प्रीतिहूँ बखान कीजै, लीजै उरधारि, सार भक्ति निरधार है। रहै ढिंग गाँव, तहाँ सभा एक ठाव भई, टूटि गयौ भाई, सो उगाही कौ विचार है॥ बोलि उठ्यौ कोऊ, यों व्यौहार को तौ भार चुक्यौ, लीजियै सँभारि लाखा सन्त भवपार है।। लाज दबि तिन दिये, गेहूँ लै पचास मन, दई निज भैंसि सग सब सरदार है॥४२४॥ मारबाड़ देस तैं, चल्यौई साष्टांग किये, हिये जगन्नाथदेव, याही पन जाइयै। नेह भरि भारी, देह वारि फेरि डारी, कैसें करै तनधारी, नेकु श्रम मुरझाइयै॥ पहुँचौ निकट जाय, पालकी पठाइ दई, कहैं लाखा भक्त कौन? वेगि दै बताइयै। काहू कहि दियौ, जाय कर गहि लियौ, अजू! चलौ प्रभु पास इहि छिनहिं बुलाइयै॥४२५॥ कैसे चढौं पालकी में?, पन प्रतिपाल कीजै, दीजै मोकौं दान, यही भाँति जा निहारियै। बोले प्रभु कही यों, सुमिरनी बनाय ल्याये, अब पहिराय मोहिं सुनि उर धारियै॥

११२) (श्री भक्तमाल) चले चढ़ि-बढ़ि, कियौ चाहैं यह जानी मैं तौ, पढ़ि-पढ़ि पोथी प्रेम मोपै बिसतारियै। जायकै निहारे, तन मन प्रान वारे, जगन्नाथ जू के प्यारे, नेकु ढिंग तें न टारियै।।४२६।। बेटी एक क्याँरी, ब्याहि देत न विचारी, मन, धन हरि साधुनि कौ, कैसे कै लगाइयै। कीजै वाकौ काज कही, जगन्नाथदेव जू ने, लीजै मोपै द्रव्य, उर नेकहूँ न आइयै।। विदा पै न भये, चले, दृग भरि लये गये, आगे नृप भक्त, मग चौकी अटकाइयै। दियौ है सुपन प्रभु, जिनि हठ करौ आजू, हुण्डी लिखि दई लई, बिनै कै जताइयै।।४२७।। हुण्डी सो हजार की यों, लैकै गृहद्वार आये, तामें ते लगायौ सौक, बेटी ब्याह कियौ है। और सब सन्तनि, बुलायकैँ खवाय दिये, लिये पग दास, सुखरासि पन लियौ है।। ऐसें ही बहुत दाम, वाही के निमित्त लै-लै, सन्त भुगताये अति हरषित हियौ है। चरित अपार, कछु मति अनुसार कह्यौ, लह्यौ जिन स्वाद, सो तौ पाय निधि जियौ है।।४२८।। मास परायण उन्नीसवाँ विश्राम श्रीनरसीजी जगत् विदित नरसी भगत, (जिन) गुज्जर धर पावन करी। महास्मारत लोग, भक्ति लौलेश न जानैं। माला मुद्रा देखि, तासु की निन्दा ठानैं।। ऐसे कुल उत्पन्न, भयौ भागौत सिरोमनि। ऊसर तें सर कियौ, खण्डदोषहिं खोयो जिनि।। बहुत ठौर परचै दियौ, रसरीति भक्ति हिरदै धरी। जगत् विदित नरसी भगत, (जिन) गुज्जर धर पावन करी।।१०८।। जूनागढ़ वास, पिता-माता तन नास भयौ, रहै एक भाई, औ भौजाई रिस भरी है। डोलत-फिरत आय, बोलत पियावौ नीर, भाभी पै न जानी पीर, बोली जरीबरी है।। आवत कमाये जल, प्याये बिन सरै कैसे?, पियौ यों जवाब दियौ, देह थरथरी है। निकसे विचारि कहूँ, दीजै तन डारि मानौ, शिव पै पुकार करी, रहे चित धरी है।।४२६।। बीते दिन सात, शिव धाम तें न जात, बार, परै काहू तुच्छ द्वार, सोऊ सुधि लेत है। इतनी विचारि, भूख-प्यास दई टारि, लियौ प्रगट सरूप धारि, भयौ हिये हेत है।। बोले वर माँग आजू, माँगिवौ न जानत हौं, तुम्हें जोई प्यारौ, सोई देवो चितचेत है। पर्यो सोच भारी, मेरी प्रान-प्यारी नारी, तासौं कहत डरत वेद, कहै नेति-नेति है।।४३०।।

श्रीनरसीजी) (११३ दियौं मैं वृकासुर को, वर डर भयौ तहाँ, वैसे डर कोटि-कोटि, यापै वारि डारे हैं। बालक न होय, यह पालक है लोकनि कौ, मन कौ विचार कहा, दीजै प्रान प्यारे है।। जोपै नहीं देत, मेरौ बोलिवो अचेत होत, दियौ निज हेत तन आलिन के धारे हैं। ल्याये वृन्दावन, रासमण्डल जटित मनि, प्रिया अनगन बीच, लाल जू निहारे हैं।। ४३१।। हीरनि खचित, रासमण्डल नचत दोऊ, रचित अपार नृत्य, गान तान न्यारियै। रूप उजियारी, चन्द चाँदनी न सम तारी, देत कर-तारी, लाल गति लेत प्यारियै।। ग्रीवा की ढुरनि, कर आँगुरी मुरनि, मुख मधुर सुरनि, सुनि श्रवन तपारियै। बजत मृदंग मुँहचंग, संग अंग-अंग, उठति तरंग, रंग, छबि जीय की ज्यारियै।। ४३२।। दई लै मसाल हाथ, निरखि निहाल भई, लाल डीठि परी कोऊ नई यह आई है। शिव सहचरी, रंग भरी अटकरी, बात, मृदु-मुसकात, नैन कोर में जताई है।। चाहै याहि टारौ, यह चाहै प्रान वारौं, तब स्याम ढिंग आय कही, नीके समुझाई है। जावौ यहै ध्यान करौ, करौ सुधि आऊँ जहाँ, आये निज ठौर, चटपटी-सी लगाई है।। ४३३।। कीनी ठौर न्यारी, विप्र सुता भई नारी, एक सुत उभै बारी, जग भक्ति बिसतारी है। आवै बहु सन्त, सुख देत है अनन्त, गुन गावत रिझावत औ सेवा विधि धारी है।। जिती द्विज जात, दुख भयौ अति गात, मान्‍यौ बड़ी उतपात, दोष करै न विचारी है। एतौ रूप सागर में, नागर मगन महां, सकै कहा करि, चहुँओर गिरिधारी है।। ४३४।। तीरथ करत साधु, आये, पुर पूछे कोऊ, हुण्डी लिखि देय हमें ? द्वारका सिधारिवे। जे वे रहे दूषि, कही जात ही भगावै भूषि, नरसी विदित शाह आगे दाम डारिवे। चरन पकरि गिरि, जावो जौ लिखावौ अहो, कहौ बार-बार सुनि, विनती न टारिवे। दियौ लै बताय घर, जाय वही रीति करी, भरी अँकवार मेरे, भाग कहा बारिवे।। ४३५।। सात सै रुपैया गनि ढेरी करि दई आगे, लागे पग देवौ लिखि, कही बार-बार है। जानी बहकाये प्रभु, दाम दै पठाये लिखी, किये मनभाये, शाह साँवल उदार है।। वाही हाथ दीजियै लै कीजिये निशंक काज, गये जदु राजधानी, पूछ्यो सौं बजार है। ढूँढ़ि फिरि हारे, भूख-प्यास मीड़ि डारे पुर, तजि भये न्यारे, दुख सागर अपार है।। ४३६।। शाह कौ सरूप करि, आये काँधे थैली धरि, कौन पास हुण्डी? दाम लीजियै गनायकै। बोलि उठे ढूँढ़ि हारे!, भले जू निहारे आजु, कही लाज हमें देत, मैं हूँ पाये आयकै।। मेरौ है इको सौ वास, जानै कोऊ हरिदास, लेवो सुखरासि, करो चीठी दीजै जायकै। धरे हैं रुपैया ढेर, लिख्यो करौ बेर-बेर, फेरि आय पाती दई, लई गरे लायकै।। ४३७।।

११४) (श्री भक्तमाल) देखि आये शाह ? दौरि मिले उतसाह अंग, वेऊ रंग बोरे, सन्त संग कौ प्रभाव है। हुण्डी लिखि दई दाम, लिये सो खवाय दिये, किये प्रभु पूरे काम, सन्तनि सौं भाव है।। सुता ससुरारि भयौ, छूछक विचारि सासु, देत बहु गारि, जाको निपट अभाव है।। पिता सौं पठाई, कहि छाती लै जराई इनि, जोपै कछु दियौ जाय, आवो यह दाव है।।४३८।। चले गाड़ी टूटी-सी, उभय बूढ़े बैल जोरि, पहुँचे नगर छोर, द्विज कही जायकै। सुनत ही आई देखि, मुँह पियराई फिरी, दाम नहीं एक, तुम कियौ कहा आयकै।। चिन्ता जिनि करौ जाय, सासु ढिंग धरौ लिखि, कागद में धरौ अति, उत्तम अघायकै। कही समझाय सुनि, निपट रिसाय उठी, कियौ परिहास लिख्यौ, गाँव खुनसायकै।।४३६।। कागद लै आई देखि, दूसरें फिराई पुनि, भूलै पै न पाई, जात पाथर लिखाये हैं। रहिवे कौं दई, ठौर फूटी ढही पौरि जाके, बैठे सिरमौर आय बहु सुख पाये हैं।। जल दै पठायौ, भलीभाँति कै औटायौ, भई बरषा सिरायौ, यों समोयकै अन्याये हैं। कोठरी सँवारि, आगे परदा सो दियौ डारि, लै बजाई तार, वेश अगनित आये हैं।।४४०।। गाँव पहिरायो, छबि छायौ जस गायो अहो, हाटक रजत उभै, पाथर हू आये हैं। रहि गई एक, भूले लिखत अनेक जहाँ, लेंहौं तांही पास, जापै सब मिलि पाये हैं।। विनती करत बेटी, दीजियै जू लाज रहे, दियौ मँगवाय हरि, फेरिकै बुलाये हैं। अँग न समात सुता, तात कौ निरखि रंग, संग चली आई, पति आदि बिसराये हैं।।।४४१॥ सुता हुतीं दोय भोय, भक्ति रही घर ही में, एक पति त्याग, एक पतिहू न कियौ है। पुर में फिरत उभै, गाइन सुचाइन सौं, धन सौं न भेंट, काहू नाम कहि दियौ है।। आई लगी गाइवे कौं, कही समझाय अहो, पायवे को नाहीं, कछु पावै दुख हियौ है। चाहौ हरिभक्ति तौ, मुँड़ायकै लड़ाय लीजै, कीजै बार दूर रहीं, प्रेमरस पियौ है।।४४२।। मिलीं उभै सुता, रंग झिली संग गायन वै, चायनि सौं नृत्य करै भायनि बतायकै। सालंग है नाम, मामा मण्डलीक मन्त्री रहै, कहै विपरीत बड़ी, राजा सौं सुनायकै।। बड़े-बड़े दण्डी, और पण्डित समाज कियौ, करौ वाकी भण्डी, देश दिजिये छुटायकै। आये चार चोबदार, चलौ जू विचार कीजै, भयौ दरबार हमें, दिये हैं पठायकै।।४४३।। चारौं तुम जावो टरि, भयौ हमें राजा डर, सकै कहा करि? अजू चलैं संग-संगहीं।। नाचत बजावत ये, चलीं ढिंग गावत, सुभावत मगन जानी, भीजि गईं रंगहीं।। आये वाही भाँति, सभा प्रभाहत भई तऊ, बोले कहा रीति यह, जुवती प्रसंगहीं?। कही भक्तिगन्ध, दूरि, पढ़े पोथी परी धूरि, श्रीशुक सराही तिया, माथुरनि भंगहीं।।४४४।।

श्रीनरसीजी) (११५)

बोलि उठ्यौ विप्र एक, छूतक प्रसंग देख्यौ कह्यौ, रसरंग भर्यौ, डर्यौ नृप पाँय में। कही जू विराजौ गाजौ, नित सुख साजौ जाय, किये हरि राय वश, भीजे रहौ भाय में।। धारौ उर और, सिरमौर प्रभु मन्दिर में, सुन्दर केदारौ राग, गावै भरे चाय में। स्याम कण्ठमाल टूटि, आवत रसाल हियें, देखि दुख पावैं परे, विमुख सुभाय में।।४४५।। नृपति सिखायौ जाय, वृथा जस छायौ काचे, सूत में पुहायौ हार, टूटै ख्यात करी है। माता हरिभक्त, भूप कही जिनि करौ कान, तऊ बानि राजस की, माया मति हरी है।। गयौ ढिंग मन्दिर के, सुन्दर मँगाय पाट, तागौ बटवाय करि, माला गुहि धरी है। प्रभु पहिराय कह्यौ, गाय अब जानि परै, भरै सुर राग और गायौ पै न परी है।।४४६।। विमुख प्रसन्न भये, तबतौ उराहने दये, नये-नये चोज हरि, सनमुख भाखिये। जाने ग्वालबाल एक, माल गहि रहे हिये, जिये लाग्यौ यही रूप, कहौ लाख लाखिये।। नारायन बड़े महा, अहो मेरे भाग लिख्यो, करै कौन दूरि, छबि पूरी अभिलाखिये। म्हारो कहा जाय, आय परसे कलंक तुम्हे, राखिये निशंक हार, भक्ति मारि नाखिये।।४४७।। रहै तहाँ शाह, किये उभै लै विवाह जाने, तिया एक भक्त कहै, हरि कौं दिखाइयै। नरसी कही ही भलै, सोई प्रभु वानी लई, साँच करि दई, गये राग छुटवाइयै।। बोले पट खोलि, दिये, किये दरसन ताने, ताने पट सोवै वह, कही देवौ भाइयै। लिये दाम, काम कियौ, कागद गहाय दियो, दियौ कछु खाइवे कौं पायौ लै भिंजाइयै।।४४८।। गहने धर्यौ हो राग, केदारौ सो शाह घर, धरि रूप नरसी कौ, जायकै छुटायौ है। कागद लै डार्यौ गोद, मोद भरि गाय उठे, आय झन्न-झन्न श्याम, हार पहिरायौ है।। भयौ जै-जैकार, नृप पाँय लपटाय गयौ, रहस्यौ हिये भाव, सो प्रभाव दरसायौ है। विमुख खिसाने भये, गये उठि नये नाहिं, बिन हरिकृपा भक्तिपन्थ जात पायौ है।।४४६।। करन सगाई आयो, पायो वर भायो नाहिं, घर-घर फिर्यो द्विज नरसी बतायौ है। आय सुख पाय, पूछ्यौ सुत सो दिखाय दियौ, कियौ लै तिलक मन, देखत चुरायौ है।। अजून हम लायक न, तुम सब लायक हौ, सायक सो छूट्यौ, जाय नाम लै सुनायौ है। सुनत ही माथौ फोरि, कहें तालकूटा वह, बाल, बोरि आये, जावो फेरि दुख छायौ है।।४५०।। काटिकै अँगूठा डारौ, तब सो उचारौ बात, मन में विचारौ, कियौ तिलक बनायकै। जाने सुता भाग ऐसे, रहे सोच पागि सब, आवै जब ब्याहिवे कौं, धन दै अघायकै।। लगन हूँ लिखि दियौ, दियौ द्विज आनि लियौ, डारि राख्यो कहूँ, गावैं ताल ए बजायकै। रहे दिन चार, पै विचार नहीं नेकु मन, आये श्री कृष्ण-रूक्मिनी जू, झूमि मिले धायकै।।४५१।।

४. गौड़ीय, निम्बार्क एवं अन्य सम्प्रदाय के संत (चैतन्य, रूप-सनातन)

११९६) (श्री भक्तमाल ठौर-ठौर पकवान, होत तिया गान करै, घुरत निसान कान सुनिये न बात है। चित्रमुख किये, लै विचित्र पट्टरानी आप, घोरी रंग बोरी पै, चढ़ायौ सुत रात है।। करी सो ज्यौनार, तामें मानस अपार आये, द्विजनि विचारि, पोट बाँधी पै न मात है। मणिमय ही साज-बाज, गज रथ ऊँट कोर, झमकै किशोर आज, सजी यों बरात है।।४५२।। नरसी सौं कहें गहैं हाथ, तुम साथ चलौ, अन्तरिच्छ में हूँ चलौं, इति बात मानिये। कही अजू! जानौ तुम, मैं तो हिये आनौं यहैं, लहै सुख मन मेरो, फेंट ताल आनिये।। आप ही विचारि सब, भार सौं उठाइ लियो, दिया डेरा पुरी, समधी की पहिचानिये। मानस पठायौ, दिन आयौ पै न आये, अहो!, देखें छबि छाये, नर पूछैं जू बखानिये।।४५३।। नरसी बरात मत जानौ यह नरसी की नरसी न पावै ऐसी समझ अपार है। आयकै सुनाई सुधि-बुधि बिसराई अहो करत हँसाई बात भाखौ निरधार है।। गयौ जो सगाई करि दर वर आयौ द्विज अंग में न मात कैसे रंग बिसतार है। कही एक घास धनरासि सौं न पूजै किहूँ चहुँदिसि पूरि रही देखौ भक्तिसार है।।४५४।। चले अचरज मानि, देखि अभिमान गयौ, लयौ पाछौ ब्राह्मन को, हमें राखि लीजिये। जाइ गहि पाँय, रह्यौ, भाय भरि दया करौ, गये दृग भरै पाँव, परै कृपा कीजिये।। मिले भरि अँक लै, दिखायौ सो मयंक मुख, हूजिये निशंक इन्हे, भार सुता दीजिये। ब्याह करि आये, भक्तिभाव लपटाये सब, गाये गुण जाने, जेते सुनि-सुनि जीजिये।।४५५।। मास परायण बीसवाँ विश्राम श्रीयशोधरजी दिवदास वंश, जसोधर सदन, भई भक्ति अनपायनी।। सुत कलत्र सम्मत, सबै गोविन्द परायन। सेवत हरि हरिदास, द्रवत मुख राम रसायन।। सीतापति कौ सुजस, प्रथम ही गवन बखान्यौ। द्वै सुत दीजै मोहिं, कवित सबही जग जान्यौ।। गिरा गदित लीला मधुर, सन्तनि आनन्ददायिनी। दिवदास वंश, जसोधर सदन, भई भक्ति अनपायनी।।१०६।। नवाह परायण षष्ठ विश्राम

श्रीमाधवदासजी) (११७ श्रीनन्ददासजी (श्री) नन्ददास आनन्द निधि, रसिक सु प्रभु हित रँग मगे॥ लीला पद रस रीति, ग्रन्थ रचना में नागर। सरस उक्ति जुत जुक्ति, भक्तिरस गान उजागर॥ प्रचुर पयध लौं सुजस, रामपुर ग्राम निवासी। सकल सुकुल सम्बलित, भक्तपद रेनु उपासी॥ चन्द्रहास अग्रज सुहृद्, परम प्रेम पै में पगे। (श्री) नन्ददास आनन्द निधि, रसिक सु प्रभु हित रँग मगे॥ ११०॥ श्रीजनगोपालजी संसार सकल व्यापक भई, जकरी जन गोपाल की॥ भक्ति तेज अति भाल, सन्त मण्डल कौ मण्डन। बुधि प्रवेश भागौत, ग्रन्थि संशय कौ खण्डन॥ नरहड़ ग्राम निवास, देश बागड़ निस्तार्यौ। नवधा भजन प्रबोध, अनन्य दासन व्रत धार्यौ॥ भक्त कृपा बांछी, सदा पदरज राधा लाल की। संसार सकल व्यापक भई, जकरी जन गोपाल की॥१११॥ श्रीमाधवदाजी माधव दृढ़ महि ऊपरै, प्रचुर करी लोटन भगति॥ प्रसिद्ध प्रेम की राशि, गढ़ागढ़ परचौ दीयौ। ऊँचे तें भयौ पात, स्याम साँचौ पन कीयौ॥ सुत नाती पुनि, सदृश चलत ऊही परिपाटी। भक्तनि सौं अति प्रेम, नेम नहीं किहुँ अँग घाटी॥ नृत्य करत नहिं तन सँभार, समसर जनकन की सकति। माधव दृढ़ महि ऊपरै, प्रचुर करी लोटन भगति॥ ११२॥

११८) (श्री भक्तमाल गढ़ागढ़ पुर नाम, माधौ बढ़ि प्रेम भूमि, लोटैं जब नृत्य करैं, भूलैं सुधि अंग की। भूपति विमुख झूठ, जानिकै परीक्ष्ण लई, आनि तीन छाति पर, देखी गति रंग की।। नूपुरनि बाँधि नाचि, साँच सो दिखाय दियौ, गिर्यौ हू कराह मध्य, जियौ मति पंग की। बड़ौ त्रास भयौ नृप, दास बिसवास बढ़यौ, बढ़यौ उर भाव, रति न्यारी या प्रसंग की।।४५६।। श्रीअंगदजी अभिलाष भक्त अंगद कौ, पुरुषोत्तम पूरन कर्यौ।। नग अमोल इक ताहि, सबै भूपति मिलि जाचैं। साम दाम बहु करैं, दास नाहिन मत काचैं।। एक समै संकष्ट, लेय पानी महँ डार्यौ। प्रभो तिहारी वस्तु, वदन ते वचन उचार्यौ।। पाँच दोय सत कोस ते, हरि हीरा लै उर धर्यौ। अभिलाष भक्त अंगद कौ पुरुषोत्तम पूरन कर्यौ।।११३।। रायसेन गढ़ वास, नृप सो सिलाहदी जू, ताको यह काका रहे, अंगद विमुख है। ताकी नारी प्यारी, प्रभु साधुसेवा धारी उर, आये गुरू घर कहैं, कृष्ण कथा सुख है।। बैठे भौन कौन?, देखि कैसें मौन रह्यो जात?, बोल्यो तिया जात कहा, करौ नर रुख है। सुनि उठि गये, बधू अन्न-जल त्यागि दये, लये पाँव जाय, विषै वश भयौ दुख है।।४५७।। मुख न दिखावै याहि, देख्यो ही सुहावै कही, भावै सोई करौ, नेकु वदन दिखाइयै। मैं हूँ जल त्यागि दियौ, अन्न जात कापै लियौ, जीवौं तब नीके, जब आपु कछु खाइयै।। बोली मोसौ 'बोलौ, जिन छाँड़ौ तन याही छिन, पन साँचौ होतौ, तोपै सुनत समाइयै'। 'कहौ अब कीजै जोई, मेरी मति गई खोई', भोई उर दया, बात कहि समझाइयै।।४५८।। 'वेई गुरु करौ जाय, पाँयन में परौ' गयौ, चायनि लिवाय ल्यायौ, भयौ शिष्य दीन है। धारी उर माल, भाल तिलक बनाय कियौ, लियो सीत, प्रीति कोऊ उपजी नवीन है।। चढ़ी फौज संग चढ़यौ, बैरी पुर मारि बढ़यौ, कढ़यौ टोपी लैके हीरा सत एक पीन है। डारे सब बेंच पागपेच मध्य रख्यौ मुख्य, भाष्यौ 'सो अमोल करौं जगन्नाथ लीन है'।।४५६।। कानाकानी भई नृप बात सुनि लई कही, 'हीरा वह देव तोपै और माफ किये हैं'। आय समुझावैं बहु जुगति बनावैं याके, मन में न आवैं जाय सबै कहि दिये हैं।।

श्रीचतुर्भुजजी नृपति) (११६ अंगद बहिन लागै वाकी भूवा पागै वासौं, 'देवो विष मारौ फिर तूही पग छिये हैं'। करत रसोई घोरि गरल मिलायो पाक, भोग हूँ लगायो 'अजू आवो' बोलि लिये हैं॥४६०॥ वाकी एक सुता संग लैवै बैठै जेंवन कौं, आई सो छिपाय कही 'जेंवौ कहूँ गई है'। जेंवत न बोधि हारी तब सो विचारी प्रीति, भीति रोय मिली गरें रीति कहि दई है॥ प्रभु लै जिवाये राँड-भाँड कै निकासि द्वार, दै करि किवार सब पायौ ओप नई है। वह दुख हियें रह्यौ कह्यौ कैसे जात काहू? बात सुनी नृपहूँ नै जैसी भाँति भई है॥४६१॥ चले नीलाचल हीरा जाय पहिराय आवैं, आय घेरि लीने नृप नरनि खिसायकै। कही डारि देवौ कै लराई सनमुख लेवौ, बस न हमारौ भूप आज्ञा आये धायकै॥ बोले 'नेकु रहौ मैं अन्हाय पकराय देत,' हेत मन और जल डार्यौ लै दिखायकै। 'वस्तु है तिहारी प्रभु लीजिये' उचारी यह, वानी लागी प्यारी उर धारी सुख पायकै॥४६२॥ ऐतौ घर आये वे तो जल मधि कूदि छाये, अति अकुलाये नेकु खोजहूँ न पायौ है। राजा चलि आयौ सब नीर कढ़वायौ कीच, देखि मुरझायौ दुखसागर अन्हायौ है॥ जगन्नाथदेव आज्ञा दई 'वाहि सुधि देवौ', आयकै सुनाई नर-तन बिसरायौ है। गयौ जाय देख्यौ उर पर जगमग रह्यौ, लह्यौ सुख नैननि कौ कापै जात गायौ है॥४६३॥ राजा हिय ताप भयौ दयौ अन्न त्यागि कह्यौ, आवै जोपै भाग मेरे ब्राह्मन पठाये हैं। धरनौ दे रहे कहे नृप के वचन सब, तब ह्वै दयाल आप पुर ढिंग आये हैं॥ भूप सुनि आगे आय पाँय लपटाय गयौ, लयौ उर लाय दृग नीर लै भिजाये हैं। राजा सरबसु दियौ जियो हरिभक्ति कियौ, हियो सरसायौ गुन जाने जिते गाये हैं॥४६४॥ श्रीचतुर्भुजजी नृपति चतुर्भुज नृपति की भक्ति को, कौन भूप सरवर करें॥ भक्त आगमन सुनत, सनमुख जोजन इक जाई। सदन आनि सत्कार, सदृश गोविन्द बड़ाई॥ पाद प्रछालन सुहथ, राय रानी मन साँचै। धूप दीप नैवेद्य, बहुरि तिन आगें नाचै॥ यह रीति करौलीधीश की, तन मन धन आगे धरैं। चतुर्भुज नृपति की भक्ति कौ कौन भूप सरवर करें॥११४॥

१२०) (श्री भक्तमाल पुर ढिंग चारों ओर चौकी राखी जोजन पै, जो जन ही आवैं तिन्हें ल्यावत लिवायकै। मालाधारी दास मानि आवै कोऊ द्वार जोपै, करै वही रीति सो सुनाई छप्पै गायकै। सुनी एक भूप भक्त निपट अनूप कथा, सबकों भण्डार खोलि देत बोल्यौ धायकै। पात्र औ अपात्र यों विचार ही जो नाहीं तौपै, कहा ऐसी बात? दई नेकु मैं उड़ायकै।।४६५।। भागवत गावै भक्तभूप एक विप्र तहाँ, बोलिकें सुनावै 'ऐसी मन जिन ल्याइयै'। पावै आशै कौन हृदय भौन में प्रवेश करि? भरि अनुराग कही उर मधि आइयै।। करी लै परीक्षा भाट विमुख पठाय दियौ, दियौ माला तिलक सो दास यों सुनाइयै। गयौ, गयौ भूलि फूलि कुल विसतार कियौ, लियौ पहिचानि अब जान कैसे पाइयै।।४६६।। बीते दिन बीस तीस आई वह सीख सुधि, कही हरिदास कोऊ आयौ यों सुनाइयै। बोले जू निशंक जावौ गावौ गुन गोविन्द के, आये घर मध्य भूप करी जैसी भाइयै।। भक्ति के प्रसंग कौ न रंग कहूँ नेकु जान्यौ, जान्यौ उनमान सौं परीक्षा मँगवाइयै। दियौ लै भण्डार खोलि लियौ मन मान्यौ दई, सम्पुट में कौड़ी डारि जरी लपटाइयै।।४६७।। आयौ वाही राजा पास सभा में प्रकास कियौ, लियौ धन दियौ पाछे सोई लै दिखायौ है। खोलिकै लपेटा मध्य सम्पुट निहारि कौड़ी, समुझि विचारै हारै मन में न आयौ है।। बड़ौ भागवत विप्र पण्डित प्रवीन महा, निसि रसलीन जानि आयकै बतायौ है। कर्यौ उनमान भक्ति मानिवौ प्रमान जरी, मूँदिकै पठाई ताहि गुन समझायौ है।।४६८।। राजा रीझि पाँव गहे कहे जू वचन नीके, ऐपै नेकु आप जाय तत्व याकौ ल्याइयै। आये दौर पाँव लपटाय भूप भाय भरे, परे प्रेमसागर में चरचा चलाइयै।। चलिवे न देत सुख देत चले लोल मन, खोलिकै भण्डार दियौ लियौ न रिझाइयै।। उभै सुवा सारौ कही एक करधारौ मेरे, दई अकुलाय लई मानौ निधि पाइयै।।४६६।। आयौ राजसभा बहु बातनि अखारौ जहाँ, बोलि उठी सारौ कृष्ण कहौ झारि डोरे हैं। पूछैं नृप कहौ अहो! लहौ सब याही सौं जू, पच्छी वा समाज रहै हरि प्रान प्यारे हैं।। कोटि-कोटि रसना बखानौं पै न पाऊँ पार सार सुनि भक्ति आय सीस पाँव धारे हैं। राखौ यह खग पगे रह्यौ तन मन स्याम अति अभिराम रीति मिले औ पधारे हैं।।४७०।। मास परायण इक्कीसवाँ विश्राम श्रीमीराजी लोकलाज कुल श्रृंखला, तजि मीरा गिरिधर भजी।। सदृश गोपिका प्रेम, प्रगट कलिजुगहिं दिखायौ। निरंकुश, अति निडर, रसिक जस रसना गायौ।।

श्रीमीराजी) (१२१ दुष्टनि दोष विचारि, मृत्यु को, उद्यम कीयौ। बार न बाँकौ भयौ, गरल अमृत ज्यौं पीयौ॥ भक्ति निसान बजायकै, काहू ते नाहिन लजी। लोकलाज कुल शृंखला, तजि मीरा गिरिधर भजी।।११५।।

मेरतौ जनम भूमि, झूमि हित नैन लगे, पगे गिरिधारीलाल, पिता ही के धाम में। राना कै सगाई भई, करी ब्याह सामा नई, गई मति बूडि वा रँगीले घनस्याम में।। भाँवरैं परत मन, साँवरे सरूप माँझ, ताँवरैं-सी आवैं, चलिवे कौ पति ग्राम में। पूछैं पिता-माता पट, आभरन लीजियै जू, लोचन भरत नीर कहा काम दाम में ।।४७१।।

देवौ गिरिधारीलाल, जौ निहाल कियौ चाहौ, और धनमाल सब रखियै उठायकै। बेटी अति प्यारी, प्रीति रंग चढ़यौ भारी, रोय मिली महतारी, कही लीजियै लड़ायकै।। डोला पधराय, दृग-दृग सौं लगाय, चलीं सुख न समाय, चाय प्रानपति पायकै। पहुँचीं भवन सासु, देवी पै गवन कियौ, तिया अरू वर, गाँठजोरौ कर्यो भायकै।।४७२।।

देवी के पुजायवे कौं, कियौ ले उपाय सासु, वर पै पुजाइ, पुनि बधू पूजि भाखियै। बोली जू बिकायो माथौ, लाल गिरिधारी हाथ, और कौ न नवै एक, वही अभिलाखियै।। बढ़त सुहाग याके, पूजे ताते पूजा करो, करौ जिनि हठ, सीस पाँयनि पै राखियै। कही बार-बार, तुम यही निरधार जानौ, वही सुकुमार जापै, वारि फेरि नाखियै।।४७३।।

तबतौ खिसानी भई, अति जरि बरि गई, गई पति पास, यह बधू नहीं काम की। अबहीं जवाब दियौ, कियौ अपमान मेरो, आगे क्यौं प्रमान करै? भरै स्वांस चाम की।। राना सुनि कोप कर्यौ, धर्यौ हिये मारिवोई, दई ठौर न्यारी देखि, रीझी मति बाम की। लालनि लड़ावै, गुन गायकै मल्हावै, साधुसंग ही सुहावै, जिन्हें लागी चाह स्याम की।।४७४।।

आयकै ननन्द कहै, गहे किन चेत भाभी!, साधुनि सौं हेत में, कलंक लागै भारियै। राना देशपति लाजै, बाप कुल रीति जात, मानि लीजै बात, वेगि संग निरवारियै।। लागे प्रान साथ, सन्त पावत अनन्त सुख, जाको दुख होय ताको, नीके करि टारियै। सुनिकै कटोरा भरि, गरल पठाय दियौ, लियौ करि पान, रंग चढ़यौ यों निहारियै।।४७५।।

गरल पठायौ सो तौ, सीस लै चढ़ायौ संग, त्याग विष भारी, ताकी झार न सँभारी है। राना नै लगायौ चर, बैठे साधु ढिंग ढर, तबही खबर कर, मारौ यहै धारी है।।

१२२) (श्री भक्तमाल राजैं गिरिधारीलाल, तिनहीं सौं रंग जाल, बोलत हँसत ख्याल कान परी प्यारी है। जायकै सुनाई, भई अति चपलाई, आयौ लिये तरवार दै, किवार खोलि न्यारी है।।४७६।। जाके संग रंग भींजि, करत प्रसंग नाना, कहाँ वह नर गयौ, वेगि दै बताइयै। आगे ही विराजै कछू तोसों नहीं लाजै अभूँ, देखि सुख साजै, आँखें खोलि दरसाइयै।। भयौई खिसानौ, राना लिख्यौ चित्र भीत मानौ, उलटि पयानौ कियौ नेकु मन आइये। देख्यौ हूँ प्रभाव ऐपै, भाव में न भिद्यौ जाइ, बिना हरिकृपा कहो, कैसे करि पाइयै।।४७७।। विषई कुटिल एक, भेष धरि साधु लियौ, कियौ यों प्रसंग, मोसों अंग-संग कीजियै। आज्ञा मोकौं दई आप, लाल गिरिधारी अहो, सीस धरि लई करि, भोजन हूँ लीजिये।। सन्तनि समाज में, बिछाय सेज बोलि लियौ, शंक अब कौन की, निशंक रस भीजियै। सेत मुख भयौ, विषैभाव सब गयौ, नयौ पाँयन पै आय, मोकौं भक्तिदान दीजियै।।४७८।। रूप की निकाई भूप, अकबर भाई हिये, लिये, संग तानसेन देखिवे कौं आयो है। निरखि निहाल भयौ, छबि गिरिधारीलाल, पद सुखजाल एक, तबही चढ़ायो है।। वृन्दावन आई, जीव गुसाँई सौं मिलि झिली, तिया मुख देखिवे को, पन लै छुटायो है। देखि कुँज-कुँज, लाल प्यारी सुखपुंज भरी, धरी उर माँझ आय, देश वन गायो है।।४७६।। राना की मलीन मति, देखि बसी द्वारावति, रति गिरिधारीलाल, नित ही लड़ाइयै। लागी चटपटी भूप, भक्ति कौ सरूप जानि, अति दुख मानि, विप्र श्रेणी लै पठाइयै।। वेगि लैकेँ आवौ मोकौं, प्रान दै जिवावौ अहो, गये द्वार धरनौ दै, विनती सुनाइयै। सुनि विदा होन गई, राय रनछोर जू पै, छाँड़ौं राखौ हीन, लीन भई नहीं पाइयै।।४८०।। श्रीपृथ्वीराजजी आमेर नरेश आमेर अछत कूरम कौ, द्वारकानाथ दरसन दियौ।। श्रीकृष्णदास उपदेश, परमतत्त्व परचौ पायौ। निरगुन सगुन निरूप, तिमिर अज्ञान नसायौ।। काछ वाच निकलंक, मनौ गांगेय युधिष्ठिर। हरि पूजा प्रह्लाद, धर्मध्वज धारी जग पर।। पृथ्वीराज परचौ प्रगट, तन शंख चक्र मण्डित कियौ। आमेर अछत कूरम कौ, द्वारकानाथ दरसन दियौ।।११६।।

श्रीपृथ्वीराज जी) (१२३ श्रीपृथ्वीराजजी पृथ्वीराज राजा चल्यौ, द्वारका श्रीस्वामी संग, अति रसरंग भर्यौ, आज्ञा प्रभु पाई है। सुनिकै दीवान, दुख मानि निसि कान लग्यौ, कही पग्यो साधुसेवा, भक्ति घर छाई है।। देखियै निहारिकै, विचार कीजै इच्छा जोई, लीजै नहीं साथ, जावो बात ले दुराई है। आयौ भोर भूप, हाथ जोरि करि ठाढ़ौ रह्यौ, कह्यौ रहौ देस सो, निदेस न सुहाई है।।४८१।। द्वारावतीनाथ देखौं, गोमती स्नान करौं, धरौं भुज छाप आप, मन अभिलाखियै। चिन्ता जिनि कीजै, तीनों बात इहाँ लीजै अजू, दीजै जोई आज्ञा सोई, सिर धरि राखियै। आये पहुँचाय दूर, नैन जल पूरि बहै, दहै उर भारी, कहाँ संग रस चाखियै। बीते दिन दोय, निसि रहे हुते सोइ, भोइ गई भक्ति गिरा, आय वानी मधु, भाखियै।।४८२।। अहो पृथ्वीराज कही, स्वामी ही सी वानी लही, आयौ उठि दौरि, वाही ठौर प्रभु देखे हैं। घूम्यौ कह्यौ कान, धरौ गोमती स्नान करौ, सुनिकै अन्हह्यौ पुनि, वे न कहूँ पेखे हैं।। शंख चक्र आदि छाप, तन सब व्यापि गई, भई यों अबार रानी, आय अबरेखे हैं। बोले रह्यौ नीर में, सरीर लै सनाथ कीजै, लीजै नाथ हियैं निज, भाग करि लेखे हैं।।४८३।। भयौ जब भोर, पुर बड़ौ भक्ति शोर पर्यौ, पर्यौ आनि दरसन, भई भीर भारी है। आये बहु सन्त औ महन्त बड़े-बड़े धाये, अति सुख पाये देह, रचना निहारी है।। नाना भेंट आवैं हित, महिमा सुनावैं राजा, सुनत लजावैं जानी, कृपा वनवारी है। मन्दिर करायौ, प्रभुरूप पधरायौ सब, जग जस गायौ कथा, मोकौं लागी प्यारी है।।४८४।। विप्र दृगहीन सो, अनाथ बैजनाथ द्वार पर्यौ, चख चाहै मास, केतिक बिहाने हैं। आज्ञा बार दोय चार, भई ये न फेरि होहिं, याको हठसार देखि, शिव पिघलाने हैं।। पृथ्वीराज अंग के, अँगोछा सौं अँगोछौ जाय, आयकै सुनाई द्विज, गौरव डेराने हैं। नयौ मँगवाय तन, छ्वाय दियौ छ्वायौ नैन, खुले चैन, भयौ जन लखि सरसाने हैं।।४८५।। भक्तनि कौ आदर अधिक, राजवंश में इन कियौ।। लघु मधुरा मेरता, भक्त अति जैमल पोषे। टोड़े भजन निधान, रामचन्द्र हरिजन तोषे।। अभैराम एक रसहिं, नेम नींवा के भारी। करमशील सुरतान भगवान्, बीरम भूपति व्रतधारी।।

१२४) (श्री भक्तमाल ईश्वर अखैराज रायमल, कन्हर मधुकर नृप सरबसु दियौ। भक्तनि कौ आदर अधिक, राजवंश में इन कियौ।।११७।। श्रीजयमलजी मेरतें बसत भूप भक्ति को सरूप जानै, जैमल अनूप जाकी कथा कहि आये हैं। करी साधुसेवा, रीति प्रीति की प्रतीति भई, नई एक सुनौ हरि कैसे कै लड़ाये हैं।। नीचे मान मन्दिर सो सुन्दर विचारी बात, छत पर बँगल़ा के, चित्र लै बनाये हैं। विविध बिछौना सेज, राजत उड़ौना पानदान धरि सोंना, जरी परदा सिंवाये हैं।।४८६।। ताकी दारु सीढ़ी करि, रचना उतारि धरें, भरें दूरि चौकी आप, भाव स्वच्छताई है। मानसी विचारें, लाल सेज पग धारें, पान खात लै उगार डारैं, पौढ़े सुखदाई है।। तिया हू न भेद जानै सो निसेनी धरी वानै, देखिकै किसोर सोयौ, फिरी भोर आई है। पति को सुनाई भई, अति मनभाई वाकौ, खीझि डरपाई जानी, भाग अधिकाई है।।४८७।। श्रीमद्युकरशाहजी मधुकरशाह नाम, कियौ लै सफल जातें, भेष गुनसार ग्रहै, तजत असार है। ओड़छे कौ भूप, भक्तभूप सुखरूप भयौ, लयौ पन भारी जाके और न विचार है।। कण्ठी धरि आवै कोय, धोय पग पीवै सदा, भाई दूखि खर गर, डार्यौ माल भार है। पाँव परछाल कही, आज जू निहाल किये, हिये द्रब्ये दुष्ट, पाँव गहे दृग धार है।।४८८।। सप्ताह परायण पांचवा विश्राम श्रीखेमालरत्नजी खेमालरतन राठौर के, अटल भक्ति आई सदन।। रैना पर गुण राम, भजन भागौत उजागर। प्रेमी परम किशोर, उदर राजत रतनाकर।। हरिदासन के दास, दसा ऊँची ध्वज धारी। निर्भय अननि उदार, रसिक जस रसना भारी।। दशधा सम्पति सन्त बल, सदा रहत प्रफुलित वदन। खेमालरतन राठौर के, अटल भक्ति आई सदन।।११८।।

श्रीरामरयन जी की धर्मपत्नी) (१२५ श्रीरामरयनजी कलिजुग भक्ति करी कमान, रामरैन कैं रिजु करी। अजर धर्म आचर्यौ, लोक हित, मनौ नीलकंठ। निन्दकजन अनिराय, कहा महिमा जानैगो भूसठ॥ विदित गान्धर्वी ब्याह, कियौ दुसकन्त प्रमानै। भरत पुत्र भागौत, सुमुख शुकदेव बखानै॥ और भूप कोउ छ्वै सकै, दृष्टि जाय नाहिन धरी। कलियुग भक्ति करी कमान, रामरैन कैं रिजु करी।।११६।। पूनौँ में प्रकास भयौ, शरद् समाज रास, विविध विलास, नृत्य रागरंग भारी है। बैठे रस भीजे दोऊ, बोल्यो राम राजा रीझि, भेंट कहा कीजै, विप्र कही जोई प्यारी है।। प्यार को विचारै न, निहारै कहूँ नैकु छटा, सुता रुपघटा, अनुरूप सेवा ज्यारी है। रही सभा सोचि, आप जायके लिवाय ल्याये, भेष सौं दिवाये फेरे, सम्पति लै बारी है।।४८६।। श्रीरामरयनजी की धर्मपत्नी हरि गुरु हरिदासनि सौं, रामघरनि साँची रही।। आरज कौ उपदेश, सुनौ उर नीके धार्यौ। नवधा दशधा प्रीति, आन सबै धर्म बिसार्यौ।। अच्युतकुल अनुराग, प्रगट पुरूषारथ जान्यौ। सारासार विवेक, बात तीनौं मन मान्यौ।। दासत्व अनन्य उदारता, सन्तनि मुख राजा कही। हरि गुरु हरिदासनि सौं, रामघरनि साँची रही।।१२०।। आये मधुपुरी राजा, राम अभिराम दोऊ, दाम पै न राख्यो, साधु विप्र भुगताये हैं। ऐसे ये उदार राह, खरच सँभार नाहिं, चलिवो विचार भयौ, चूरा दीठि आये हैं।। मुद्रा सत पाँच मोल, खोलि तिया आगे, धरे दीजै बेंचि गये, नाभा कर पहिराये हैं। पति को बुलाइ कही, नीके देखि रीझे भीजे, काढ़िकै करज पुर, आये दै पठाये हैं।।४६०।। मास परायण बाईसवाँ विश्राम

१२६) (श्री भक्तमाल श्रीकिशोरसिंहजी अभिलाष उभै खैमाल का, ते किशोर पूरा किया ।। पाँयनि नूपुर बाँधि, नृत्य नगधर हित नाच्यौ। राम कलस मन रली, सीस तातें नहीं बाच्यौ ।। वानी विमल उदार, भक्ति महिमा विस्तारी। प्रेमपुंज सुठि सील, विनय सन्तनि रुचिकारी ।। सृष्टि सराह्रै राम सुव, लघु वयस लछन आरज लिया। अभिलाष उभै खैमाल का, ते किशोर पूरा किया ।।१२१।। खेमालरतन तन, त्याग समैं अश्रुपात, बात सुत पूछैं, अजू नीकें खोलि दीजिये। कीजै पुण्य दान बहुँ, सम्पति अमान भरी, धरी हिये दोई सोई, कही सुनि लीजिये ।। विविध बड़ाई में, समाई मति भई पै नं, नित ही विचार अब, मन पर खीजिये। नीर भरि घट सीस, धरिकै न ल्यायो और, नूपुरन बाँधि नृत्य, कियौ नाँहि छीजिये ।।४६१।। रहे चुपचाप सबै, जानी, काम आप ही कौ, बोल्यौ, यों किसोर नाती, आज्ञा मोकौं दीजियै। यही नित करौं, नहीं टरौं जौलौं जीवै तन, मन में हुलास उठि, छाती लाय जीजियै ।। बहु सुख पाये, पाये वैसे ही निवाहे, पन, गाये गुन लाल प्यारी, अति मति भीजियै। भक्ति विस्तार कियौ, वयस लघु भीज्यौ हियौ, दियौ सनमान सन्तसभा सब रीझियै ।।४६२।। श्रीहरीदासजी खेमालरतन राठौर की, सुफल बेलि मिठी फली ।। हरीदास हरिभक्त, भक्ति मन्दिर कौ कलसौ। भजन भाव परिपक्व, हृदै भागीरथि जल सौ ।। त्रिधा भाँति अति अनन्य, राम की रीति निबाही। हरि गुरु हरिबल भाँति, तिनहिं सेवा दृढ़ साही ।। पूरन इन्दु प्रमुदित उदधि, त्यों दास देखि बाढ़े रली। खेमालरतन राठौर की, सुफल बेलि मीठी फली ।। १२२ ।।

श्रीकृष्णदासजी चालक) (१२७ श्रीचतुर्भुजदासजी कीर्तननिष्ठ (श्री) हरिवंश चरनबल चतुर्भुज, गौंड़ देश तीरथ कियौ ।। गायौ भक्ति प्रताप, सबहिं दासत्व दृढ़ायौ। राधावल्लभ भजन, अनन्यता वर्ग बढ़ायौ ।। मुरलीधर की छाप, कवित अति ही निर्दूषन। भक्तिनि की अँघ्रिरेनु, वहै धारी सिर भूषन ।। सत्संग महा आनन्द में , प्रेम रहत भीज्यो हियौ। (श्री) हरिवंश चरनबल चतुर्भुज , गौंड़ देश तीरथ कियौ ।।१२३ ।। गौंड़वाने देश, भक्ति लेशहूँ न दीखै कहूँ, मानुस कौं मारि, इष्टदेव कौं चढ़ायौ है। तहाँ जाय देवता कौं, मन्त्र लै सुनायौ कान, लियौ उन मानि, गाँव सुपन सुनायौ है।। स्वामी चतुर्भुज जू के, वेगि तुम दास होहु, नातौ होय नास, सब गाँव भज्यौ आयौ है। ऐसे शिष्य किये, मालाकण्ठी पाय जिये, पाँव लिये मन दिये, औ अनन्त सुख पायौ है।।४६३।। भोग लै लगावैं नाना, सन्तनि लड़वैं कथा, भागवत गावैं, भावभक्ति बिसतारियै। भज्यौ धन लैके कोऊ, धनी पाछै पर्यो सोऊ, आनिकै दबायौ बैठि, रह्यौ न निहारियै।। निकसी पुरान बात, करै नयाँ गात दिच्छा-सिच्छा सुनि शिष्य, भयौ गह्यौ यों पुकारियै। कहै या जनम मैं न, लियौं कछू दियौ फारौ, हाथ लै उबार्यौ, प्रभु रीति लगी प्यारियै।।४६४।। राजा झूठ मानि कह्यौ, करो बिन प्रान याकौं, साधु ये विराजमान, लै कलंक दियौ है। चले ठौर मारिवे कौं, धारिवे कौं सकै कैसे, नैन भरि आये नीर, बोल्यौ धन लियौ है।। कहै नृप साँचो ह्वैकै, झूठौ जिन हूजै सन्त,-महिमा अनन्त कही, स्वामी ऐसो कियौ है। भूप सुनि आयौ, उपदेस मन भायौ, शिष्य भयौ नयौ तन, पायौ भीजि गयौ हियौ है।।४६५।। पकि रह्यौ खेत, सन्त आय करि तोरी लेत, जिते रखवारे, मुख सेत शोर कियौ है। कह्यौ स्वामी नाम सुन्यौ, कही बड़ौ काम भयौ, यह तौ हमारौ सोई, आप सुनि लियौ है।। लैकै मिष्टान आय, सुमुख बखान कीनौ, लीनौ अपनाय, आज भीज्यौ मेरौ हियौ है। लै गये लिवाय नाना, भोजन कराय भक्ति, चरचा चलाय, चाय हित रस पियौ है।।४६६।। श्रीकृष्णदासजी चालक चालक की चरचरी चहुँदिसि, उदधि अन्त लौं अनुसरी।।

१२८) (श्री भक्तमाल सक्रकोप सुठि चरित, प्रसिध पुनि पंचाध्यायी। कृष्ण रुक्मिनी केलि, रुचिर भोजन विधि गाई।। गिरिराजधरन की छाप, गिरा जलधर ज्यौं गाजै। सन्त सिखण्डी खण्ड, हृदै आनन्द के काजै।। जाड़ा हरन जग जाड़ता, कृष्णदास देही धरी। चालक की चरचरी चहुँदिसि, उदधि अन्त लौं अनुसरी ।।१२४।। श्रीसन्तदासजी विमलानन्द प्रबोध वंश, सन्तदास सींवा धरम।। गोपीनाथ पद राग, भोग छप्पन भुंजाये। पृथु पद्धति अनुसार, देव दम्पति दुलराये।। भगवत् भक्त समान, ठौर द्वै कौ बल गायौ। कवित सूर सौं मिलत, भेद कछु जात न पायौ।। जन्म कर्म लीला जुगति, रहसि भक्ति भेदी मरम। विमलानन्द प्रबोध वंश, सन्तदास सींवा धरम।। १२५।। बसत निवाई ग्राम, स्याम सौं लगाई मति, ऐसी मन आई, भोग छप्पन लगाये हैं। प्रीति की सचाई यह, जग में दिखाई सेवैं, जगन्नाथदेव आप, रुचि सौं जिंवाये हैं।। राजा कौं सुपन दियौ, नाम लै प्रगट कियौ, सन्त ही के गृह में तौं, जेवौं यों रिझाये हैं। भक्ति के अधीन सब, जानत प्रवीनजन, ऐसे हैं रंगीन लाल, ठौर-ठौर गाये हैं।। ४६७।। श्रीसूरदासजी-मदनमोहन (श्री) मदनमोहन सूरदास की, नाम श्रृंखला जूरी अटल ।। गान काव्य गुणराशि, सुहृद् सहचरि अवतारी। राधाकृष्ण उपास्य, रहसि सुख के अधिकारी।। नवरस मुख्य सिंगार, विविध भाँतिन करि गायौ। वदन उच्चरित बेर, सहस पावनि ह्वै धायौ।।