भारतकोश
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श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ
  • अयोध्याकाण्ड *

३५५

[वह कहने लगी—] हे माई! हमें कोई क्यों सीख देगा और मैं किसका बल पाकर गाल करूँगी (बढ़-बढ़कर बोलूँगी)। रामचन्द्रको छोड़कर आज और किसकी कुशल है, जिन्हें राजा युवराज-पद दे रहे हैं ॥ १ ॥

भयउ कौसिलहि बिधि अति दाहिन । देखत गरब रहत उर नाहिन ॥ देखहु कस न जाइ सब सोभा । जो अवलोकि मोर मनु छोभा ॥

आज कौसल्याको विधाता बहुत ही दाहिने (अनुकूल) हुए हैं; यह देखकर उनके हृदयमें गर्व समाता नहीं। तुम स्वयं जाकर सब शोभा क्यों नहीं देख लेतीं, जिसे देखकर मेरे मनमें श्लोभ हुआ है ॥ २ ॥

पूतु बिदेस न सोचु तुम्हारें । जानति हहु बस नाहु हमारें ॥ नीद बहुत प्रिय सेज तुराई । लखहु न भूप कपट चतुराई ॥

तुम्हारा पुत्र परदेशमें है, तुम्हें कुछ सोच नहीं। जानती हो कि स्वामी हमारे वशमें है। तुम्हें तो तोशक-पलंगपर पड़े-पड़े नींद लेना ही बहुत प्यारा लगता है, राजाकी कपटभरी चतुराई तुम नहीं देखतीं ॥ ३ ॥

सुनि प्रिय बचन मलिन मनु जानी । झुकी रानि अब रहु अरगानी ॥ पुनि अस कबहुँ कहसि घरफोरी । तब धरि जीभ कढ़ावउँ तोरी ॥

मन्थराके प्रिय वचन सुनकर किन्तु उसको मनकी मैली जानकर रानी झुककर (डॉटकर) बोली—बस, अब चुप रह घरफोड़ी करहींकी! जो फिर कभी ऐसा कहा तो तेरी जीभ पकड़कर निकलवा लूँगी ॥ ४ ॥

दो०—काने खोरे कूबरे कुटिल कुचाली जानि । तिय बिसेषि पुनि चेरि कहि भरतमातु मुसुकानि ॥ १४ ॥

कानों, लँगड़ों और कुबड़ोंको कुटिल और कुचाली जानना चाहिये। उनमें भी स्त्री और खासकर दासी! इतना कहकर भरतजीकी माता कैकेयी मुसकरा दीं ॥ १४ ॥

प्रियबादिनि सिख दीन्हिउँ तोही । सपनेहुँ तो पर कोपु न मोही ॥ सुदिनु सुमंगल दायकु सोई । तोर कहा फुर जेहि दिन होई ॥

[और फिर बोलीं—] हे प्रिय वचन कहनेवाली मन्थरा! मैंने तुझको यह सीख दी है (शिक्षाके लिये इतनी बात कही है)। मुझे तुझपर स्वप्नमें भी क्रोध नहीं है। सुन्दर मङ्गलदायक शुभ दिन वही होगा जिस दिन तेरा कहना सत्य होगा (अर्थात् श्रीरामका राज्यतिलक होगा) ॥ १ ॥

जेठ स्वामि सेवक लघु भाई । यह दिनकर कुल रीति सुहाई ॥ राम तिलकु जौँ साँचेहुँ काली । देउँ मागु मन भावत आली ॥

३५६

  • रामचरितमानस *

बड़ा भाई स्वामी और छोटा भाई सेवक होता है। यह सूर्यवंशकी सुहावनी रीति ही है। यदि सचमुच कल ही श्रीरामका तिलक है, तो हे सखी! तेरे मनको अच्छी लगे वही वस्तु माँग ले, मैं दूँगी ॥ २ ॥

कौसल्या सम सब महतारी । रामहि सहज सुभायँ पिआरी ॥ मो पर करहिं सनेहु बिसेषी । मैं करि प्रीति परीछा देखी ॥

रामको सहज स्वभावसे सब माताएँ कौसल्याके समान ही प्यारी हैं। मुझपर तो वे विशेष प्रेम करते हैं। मैंने उनकी प्रीतिकी परीक्षा करके देख ली है ॥ ३ ॥

जौं बिधि जनमु देड़ करि छोहू । होहुँ राम सिय पूत पुतोहू ॥ प्राण तें अधिक रामु प्रिय मोरें । तिन्ह कें तिलक छोभु कस तोरें ॥

जो विधाता कृपा करके जन्म दें तो [यह भी दें कि] श्रीरामचन्द्र पुत्र और सीता बहू हों। श्रीराम मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं। उनके तिलकसे (उनके तिलककी बात सुनकर) तुझे क्षोभ कैसा? ॥ ४ ॥

दो० — भरत सपथ तोहि सत्य कहु परिहरि कपट दुराउ ।

हरष समय बिसमउ करसि कारन मोहि सुनाउ ॥ १५ ॥

तुझे भरतकी सौगन्ध है, छल-कपट छोड़कर सच-सच कह। तू हर्षके समय विषाद कर रही है, मुझे इसका कारण सुना ॥ १५ ॥

एकहिं बार आस सब पूजी । अब कछु कहब जीभ करि दूजी ॥ फोरि जोगु कपारु अभागा । भलेउ कहत दुख रउरेहि लागा ॥

[मन्थराने कहा—] सारी आशाएँ तो एक ही बार कहनेमें पूरी हो गयीं। अब तो दूसरी जीभ लगाकर कुछ कहूँगी। मेरा अभागा कपाल तो फोड़ने ही योग्य है, जो अच्छी बात कहनेपर भी आपको दुःख होता है ॥ १ ॥

कहहिं झूठि फुरि बात बनाई । ते प्रिय तुम्हहि करुइ मैं माई ॥ हमहुँ कहबि अब ठकुरसोहाती । नाहिं त मौन रहब दिनु राती ॥

जो झूठी-सच्ची बातें बनाकर कहते हैं, हे माई! वे ही तुम्हें प्रिय हैं और मैं कड़वी लगती हूँ! अब मैं भी ठकुरसुहाती (मुँहदेखी) कहा करूँगी। नहीं तो दिन-रात चुप रहूँगी ॥ २ ॥

करि कुरुप बिधि परबस कीन्हा । बवा सो लुनिअ लहिअ जो दीन्हा ॥ कोउ नृप होउ हमहि का हानी । चेरि छाड़ि अब होब कि रानी ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

३५७

विधाताने कुरूप बनाकर मुझे परवश कर दिया! [दूसरेको क्या दोष] जो बोया सो काटती हूँ, दिया सो पाती हूँ। कोई भी राजा हो, हमारी क्या हानि है? दासी छोड़कर क्या अब मैं रानी होऊँगी! (अर्थात् रानी तो होनेसे रही) ॥ ३ ॥

जारे जोगु सुभाउ हमारा । अनभल देखि न जाइ तुम्हारा ॥ तातें कछुक बात अनुसारि । छमिअ देबि बड़ि चूक हमारी ॥

हमारा स्वभाव तो जलाने ही योग्य है। क्योंकि तुम्हारा अहित मुझसे देखा नहीं जाता। इसीलिये कुछ बात चलायी थी। किन्तु हे देवि! हमारी बड़ी भूल हुई, क्षमा करो ॥ ४ ॥

दो०—गूढ़ कपट प्रिय बचन सुनि तीय अधरबुधि रानि।

सुरमाया बस बैरिनिहि सुहृद जानि पतिआनि ॥ १६ ॥

आधाररहित (अस्थिर) बुद्धिकी स्त्री और देवताओंकी मायाके वशमें होनेके कारण रहस्ययुक्त कपटभरे प्रिय वचनोंको सुनकर रानी कैकेयीने बैरिन् मन्थराको अपनी सुहृद (अहैतुक हित करनेवाली) जानकर उसका विश्वास कर लिया ॥ १६ ॥

सादर पुनि पुनि पूँछति ओही । सबरी गान मूगी जनु मोही ॥ तसि मति फिरी अहइ जसि भाबी । रहसी चेरि घात जनु फाबी ॥

बार-बार रानी उससे आदरके साथ पूछ रही हैं, मानो भीलनीके गानसे हिरनी मोहित हो गयी हो। जैसी भावी (होनहार) है, वैसी ही बुद्धि भी फिर गयी। दासी अपना दाँव लगा जानकर हर्षित हुई ॥ १ ॥

तुम्ह पूँछहु मैं कहत डेराऊँ । धरेहु मोर घरफोरी नाऊँ ॥ सजि प्रतीति बहुबिधि गढ़ि छोली । अवध साढ़साती तब बोली ॥

तुम पूछती हो, किन्तु मैं कहते डरती हूँ। क्योंकि तुमने पहले ही मेरा नाम घरफोड़ी रख दिया है। बहुत तरहसे गढ़-छोलकर, खूब विश्वास जमाकर, तब वह अयोध्याकी साढ़साती (शनिकी साढ़े सात वर्षकी दशरूपी मन्थरा) बोली— ॥ २ ॥

प्रिय सिय रामु कहा तुम्ह रानी । रामहि तुम्ह प्रिय सो फुरि बानी ॥ रहा प्रथम अब ते दिन बीते । समउ फिरें रिपु होहिं पिरिते ॥

हे रानी! तुमने जो कहा कि मुझे सीता-राम प्रिय हैं और रामको तुम प्रिय हो, सो यह बात सच्ची है। परन्तु यह बात पहले थी, वे दिन अब बीत गये। समय फिर जानेपर मित्र भी शत्रु हो जाते हैं ॥ ३ ॥

भानु कमल कुल पोषनिहारा । बिनु जल जारि करइ सोइ छारा ॥ जरि तुम्हारि चह सवति उखारी । रूँधहु करि उपाउ बर बारी ॥

३५८

  • रामचरितमानस *

सूर्य कमलके कुलका पालन करनेवाला है, पर बिना जलके वही सूर्य उनको (कमलोंको) जलाकर भस्म कर देता है। सौत कौसल्या तुम्हारी जड़ उखाड़ना चाहती है। अतः उपायरूपी श्रेष्ठ बाड़ (घेरा) लगाकर उसे रूँध दो (सुरक्षित कर दो) ॥ ४ ॥

दो०—तुम्हहि न सोचु सोहाग बल निज बस जानहु राउ।

मन मलीन मुह मीठ नृपु राउर सरल सुभाउ ॥ १७ ॥

तुमको अपने सुहागके [झूठे] बलपर कुछ भी सोच नहीं है; राजाको अपने वशमें जानती हो। किन्तु राजा मनके मैले और मुँहके मीठे हैं ! और आपका सीधा स्वभाव है (आप कपट-चतुराई जानती ही नहीं) ॥ १७ ॥

चतुर गँभीर राम महतारी । बीचु पाइ निज बात सँवारी ॥ पठए भरतु भूप ननिअउरें । राम मातु मत जानब रउरें ॥

रामकी माता (कौसल्या) बड़ी चतुर और गम्भीर है (उसकी थाह कोई नहीं पाता)। उसने मौका पाकर अपनी बात बना ली। राजाने जो भरतको ननिहाल भेज दिया, उसमें आप बस रामकी माताकी ही सलाह समझिये ! ॥ १ ॥

सेवहिं सकल सवति मोहि नीकें । गरबित भरत मातु बल पी कें ॥ सालु तुम्हार कौसलिहि माई । कपट चतुर नहिं होइ जनाई ॥

[कौसल्या समझती है कि] और सब सौतें तो मेरी अच्छी तरह सेवा करती हैं, एक भरतकी माँ पतिके बलपर गर्वित रहती है ! इसीसे हे माई ! कौसल्याको तुम बहुत ही साल (खटक) रही हो। किन्तु वह कपट करनेमें चतुर है; अतः उसके हृदयका भाव जाननेमें नहीं आता (वह उसे चतुरतासे छिपाये रखती है) ॥ २ ॥

राजहि तुम्ह पर प्रेमु बिसेषी । सवति सुभाउ सकइ नहिं देखी ॥ रचि प्रपंचु भूपहि अपनाई । राम तिलक हित लगन धराई ॥

राजाका तुमपर विशेष प्रेम है। कौसल्या सौतके स्वभावसे उसे देख नहीं सकती। इसीलिये उसने जाल रचकर राजाको अपने वशमें करके [भरतकी अनुपस्थितिमें] रामके राजतिलकके लिये लग्न निश्चय करा लिया ॥ ३ ॥

यह कुल उचित राम कहुँ टीका । सबहि सोहाइ मोहि सुठि नीका ॥ आगिलि बात समुझि डरु मोही । देउ दैउ फिरि सो फलु ओही ॥

रामको तिलक हो, यह रघुकुलके उचित ही है और यह बात सभीको सुहाती है; और मुझे तो बहुत ही अच्छी लगती है। परन्तु मुझे तो आगेकी बात विचारकर डर लगता है। दैव उलटकर इसका फल उसी (कौसल्या) को दे ॥ ४ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

३५९

दो०— रचि पचि कोटिक कुटिलपन कीन्हैसि कपट प्रबोधु ।

कहिसि कथा सत सवति कै जेहि बिधि बाढ़ बिरोधु ॥ १८ ॥

इस तरह करोड़ों कुटिलपनकी बातें गढ़-छोलकर मन्थराने कैकेयीको उलटा-सीधा समझा दिया और सैकड़ों सौतोंकी कहानियाँ इस प्रकार [बना-बनाकर] कहीं जिस प्रकार विरोध बढे ॥ १८ ॥

भावी बस प्रतीति उर आई । पूँछ रानि पुनि सपथ देवाई ॥

का पूँछहु तुम्ह अबहूँ न जाना । निज हित अनहित पसु पहिचाना ॥

होनहारवश कैकेयीके मनमें विश्वास हो गया । रानी फिर सौगन्ध दिलाकर पूछने लगी । [मन्थरा बोली—] क्या पूछती हो ? अरे, तुमने अब भी नहीं समझा ? अपने भले-बुरेको (अथवा मित्र-शत्रुको) तो पशु भी पहचान लेते हैं ॥ १ ॥

भयउ पाखु दिन सजत समाजू । तुम्ह पाई सुधि मोहि सन आजू ॥

खाइअ पहिरिअ राज तुम्हारें । सत्य कहें नहिं दोषु हमारें ॥

पूरा पखवाड़ा बीत गया सामान सजते और तुमने खबर पायी है आज मुझसे ! मैं तुम्हारे राजमें खाती-पहनती हूँ, इसलिये सच कहनेमें मुझे कोई दोष नहीं है ॥ २ ॥

जों असत्य कछु कहब बनाई । तौ बिधि देइहि हमहि सजाई ॥

रामहि तिलक कालि जों भयऊ । तुम्ह कहूँ बिपति बीजु बिधि बयऊ ॥

यदि मैं कुछ बनाकर झूठ कहती होऊँगी तो विधाता मुझे दण्ड देगा । यदि कल रामको राजतिलक हो गया तो [समझ रखना कि] तुम्हारे लिये विधाताने विपत्तिका बीज बो दिया ॥ ३ ॥

रेख खँचाइ कहउँ बलु भाषी । भामिनि भइहु दूध कइ मारखी ॥

जों सुत सहित करहु सेवकाई । तौ घर रहहु न आन उपाई ॥

मैं यह बात लकीर खींचकर बलपूर्वक कहती हूँ, हे भामिनी ! तुम तो अब दूधकी मक्खी हो गयीं ! (जैसे दूधमें पड़ी हुई मक्खीको लोग निकालकर फेंक देते हैं, वैसे ही तुम्हें भी लोग घरसे निकाल बाहर करेंगे) जो पुत्रसहित [कौसल्याकी] चाकरी बजाओगी तो घरमें रह सकोगी ; [अन्यथा घरमें रहनेका] दूसरा उपाय नहीं ॥ ४ ॥

दो०— कद्रूँ बिनतहि दीन्ह दुखु तुम्हहि कौसिलाँ देब ।

भरतु बंदिगृह सेइहहिं लखनु राम के नेब ॥ १९ ॥

कद्रूने विनताको दुःख दिया था, तुम्हें कौसल्या देगी । भरत कारागारका सेवन करेंगे (जेलकी हवा खायेंगे) और लक्ष्मण रामके नायब (सहकारी) होंगे ॥ १९ ॥

३६०

  • रामचरितमानस *

कैकयसुता सुनत कटु बानी । कहि न सकइ कछु सहमि सुखानी ॥ तन पसेउ कदली जिमि काँपी । कुबरीं दसन जीभ तब चाँपी ॥

कैकेयी मन्थराकी कड़वी वाणी सुनते ही डरकर सूख गयी, कुछ बोल नहीं सकती। शरीरमें पसीना हो आया और वह केलेकी तरह काँपने लगी। तब कुबरी (मन्थरा) ने अपनी जीभ दाँतों-तले दबायी (उसे भय हुआ कि कहीं भविष्यका अत्यन्त डरावना चित्र सुनकर कैकेयीके हृदयकी गति न रुक जाय; जिससे उलटा सारा काम ही बिगड़ जाय) ॥ १ ॥

कहि कहि कोटिक कपट कहानी । धीरजु धरहु प्रबोधिसि रानी ॥ फिरा करमु प्रिय लागि कुचाली । बकिहि सराहइ मनि मराली ॥

फिर कपटकी करोड़ों कहानियाँ कह-कहकर उसने रानीको खूब समझाया कि धीरज रखो! कैकेयीका भाग्य पलट गया, उसे कुचाल प्यारी लगी। वह बगुलीको हँसिनी मानकर (वैरिनको हित मानकर) उसकी सराहना करने लगी ॥ २ ॥

सुनु मंथरा बात फुरि तोरी । दहिनि आँखि नित फरकइ मोरी ॥ दिन प्रति देखउँ राति कुसपने । कहउँ न तोहि मोह बस अपने ॥

कैकेयीने कहा—मन्थरा! सुन, तेरी बात सत्य है। मेरी दाहिनी आँख नित्य फड़का करती है। मैं प्रतिदिन रातको बुरे स्वप्न देखती हूँ; किन्तु अपने अज्ञानवश तुझसे कहती नहीं ॥ ३ ॥

काह करौं सखि सूध सुभाऊ । दाहिन बाम न जानउँ काऊ ॥

सखी! क्या करूँ, मेरा तो सीधा स्वभाव है। मैं दायाँ-बायाँ कुछ भी नहीं जानती ॥ ४ ॥

दो० — अपने चलत न आजु लागि अनभल काहुक कीन्ह ।

केहिं अघ एकहि बार मोहि दैअँ दुसह दुखु दीन्ह ॥ २० ॥

अपनी चलते (जहाँतक मेरा वश चला) मैंने आजतक कभी किसीका बुरा नहीं किया। फिर न जाने किस पापसे दैवने मुझे एक ही साथ यह दुःसह दुःख दिया ॥ २० ॥

नैहर जनमु भरब बरु जाई । जिअत न करबि सवति सेवकाई ॥ अरि बस दैउ जिआवत जाही । मरनु नीक तेहि जीवन चाही ॥

मैं भले ही नैहर जाकर वहीं जीवन बिता दूँगी; पर जीते-जी सौतकी चाकरी नहीं करूँगी। दैव जिसको शत्रुके वशमें रखकर जिलाता है, उसके लिये तो जीनेकी अपेक्षा मरना ही अच्छा है ॥ १ ॥

दीन बचन कह बहुबिधि रानी । सुनि कुबरीं तियमाया ठानी ॥ अस कस कहहु मनि मन ऊना । सुखु सोहागु तुम्ह कहुं दिन दूना ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

३६१

रानीने बहुत प्रकारके दिन वचन कहे। उन्हें सुनकर कुबरीने त्रियाचरित्र फैलाया। [वह बोली—] तुम मनमें ग्लानि मानकर ऐसा क्यों कह रही हो, तुम्हारा सुख-सुहाग दिन-दिन दूना होगा ॥ २ ॥

जेहिं राउर अति अनभल ताका । सोड़ पाइहि यहु फलु परिपाका ॥ जब तें कुमत सुना मैं स्वामिनि । भूख न बासर नीद न जामिनि ॥

जिसने तुम्हारी बुराई चाही है, वही परिणाममें यह (बुराईरूप) फल पायेगी। हे स्वामिनि! मैंने जबसे यह कुमत सुना है, तबसे मुझे न तो दिनमें कुछ भूख लगती है और न रातमें नींद ही आती है ॥ ३ ॥

पूँछेउँ गुनिन्ह रेख तिन्ह खाँची । भरत भुआल होहिं यह साँची ॥ भामिनि करहु त कहौं उपाऊ । है तुम्हरीं सेवा बस राऊ ॥

मैंने ज्योतिषियोंसे पूछा, तो उन्होंने रेखा खींचकर (गणित करके अथवा निश्चयपूर्वक) कहा कि भरत राजा होंगे, यह सत्य बात है। हे भामिनि! तुम करो, तो उपाय मैं बताऊँ। राजा तुम्हारी सेवाके वशमें हैं ही ॥ ४ ॥

दो०—परउँ कूप तुअ बचन पर सकउँ पूत पति त्यागि ।

कहसि मोर दुखु देखि बड़ कसन कर बहित लागि ॥ २१ ॥

[कैकेयीने कहा—] मैं तेरे कहनेसे कुएँमें गिर सकती हूँ, पुत्र और पतिको भी छोड़ सकती हूँ। जब तू मेरा बड़ा भारी दुःख देखकर कुछ कहती है, तो भला मैं अपने हितके लिये उसे क्यों न करूँगी? ॥ २१ ॥

कुबरीं करि कबुली कैकेई । कपट छुरी उर पाहन टेई ॥ लखड़ न रानि निकट दुखु कैसैं । चरइ हरित तिन बलिपसु जैसैं ॥

कुबरीने कैकेयीको [सब तरहसे] कबूल करवाकर (अर्थात् बलिपशु बनाकर) कपटरूप छुरीको अपने [कठोर] हृदयरूपी पत्थरपर टेया (उसकी धारको तेज किया)। रानी कैकेयी अपने निकटके (शीघ्र आनेवाले) दुःखको कैसे नहीं देखती, जैसे बलिका पशु हरी-हरी घास चरता है [पर यह नहीं जानता कि मौत सिरपर नाच रही है] ॥ १ ॥

सुनत बात मृदु अंत कठोरी । देति मनहुं मधु माहुर घोरी ॥ कहड़ चेरि सुधि अहड़ कि नाहीं । स्वामिनि कहिहु कथा मोहि पाहीं ॥

मन्थराकी बातें सुननेमें तो कोमल हैं, पर परिणाममें कठोर (भयानक) हैं। मानो वह शहदमें घोलकर जहर पिला रही हो। दासी कहती है—हे स्वामिनि! तुमने मुझको एक कथा कही थी, उसकी याद है कि नहीं? ॥ २ ॥

३६२

  • रामचरितमानस *

दुइ बरदान भूप सन थाती । मागहु आजु जुड़ावहु छाती ॥ सुतहि राजु रामहि बनबासू । देहु लेहु सब सवति हुलासू ॥

तुम्हारे दो बरदान राजाके पास धरोहर हैं। आज उन्हें राजासे माँगकर अपनी छाती ठंडी करो। पुत्रको राज्य और रामको वनवास दो और सौतका सारा आनन्द तुम ले लो ॥ ३ ॥

भूपति राम सपथ जब करई । तब मागेहु जेहिं बचनु न टरई ॥ होइ अकाजु आजु निसि बीतें । बचनु मोर प्रिय मानेहु जी तें ॥

जब राजा रामकी सौगंध खा लें, तब वर माँगना, जिससे वचन न टलने पावे। आजकी रात बीत गयी, तो काम बिगड़ जायगा। मेरी बातको हृदयसे प्रिय [या प्राणोंसे भी प्यारी] समझना ॥ ४ ॥

दो०—बड़ कुघातु करि पातकिनि कहेसि कोपगूहँ जाहु ।

काजु सँवारेहु सजग सबु सहसा जनि पतिआहु ॥ २२ ॥

पापिनी मन्थराने बड़ी बुरी घात लगाकर कहा—कोपभवनमें जाओ। सब काम बड़ी सावधानीसे बनाना, राजापर सहसा विश्वास न कर लेना (उनकी बातोंमें न आ जाना) ॥ २२ ॥

कुबरिहि रानि प्रानप्रिय जानी । बार बार बड़ि बुद्धि बखानी ॥ तोहि सम हित न मोर संसारा । बहे जात कइ भइसि अधारा ॥

कुबरीको रानीने प्राणोंके समान प्रिय समझकर बार-बार उसकी बड़ी बुद्धिका बखान किया और बोली—संसारमें मेरा तेरे समान हितकारी और कोई नहीं है। तू मुझ बही जाती हुईके लिये सहारा हुई है ॥ १ ॥

जौं बिधि पुरब मनोरथु काली । करौं तोहि चख पूतरि आली ॥ बहुबिधि चेरिहि आदरु देई । कोपभवन गवनी कैकेई ॥

यदि विधाता कल मेरा मनोरथ पूरा कर दें तो हे सखी! मैं तुझे आँखोंकी पुतली बना लूँ। इस प्रकार दासीको बहुत तरहसे आदर देकर कैकेयी कोपभवनमें चली गयी ॥ २ ॥

बिपति बीजु बरषा रिनु चेरी । भुईं भइ कुमति कैकई केरी ॥ पाड़ कपट जलु अंकुर जामा । बर दोउ दल दुख फल परिनामा ॥

विपत्ति (कलह) बीज है, दासी वर्षा-ऋतु है, कैकेयीकी कुबुद्धि [उस बीजके बोनेके लिये] जमीन हो गयी। उसमें कपटरूपी जल पाकर अङ्कुर फूट निकला। दोनों बरदान उस अङ्कुरके दो पत्ते हैं और अन्तमें इसके दुःखरूपी फल होगा ॥ ३ ॥

कोप समाजु साजि सबु सोई । राजु करत निज कुमति बिगोई ॥ राउर नगर कोलाहलु होई । यह कुचालि कछु जान न कोई ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

३६३

कैकेयी कोपका सब साज सजकर [कोपभवनमें] जा सोयी। राज्य करती हुई वह अपनी दुष्ट बुद्धिसे नष्ट हो गयी। राजमहल और नगरमें धूम-धाम मच रही है। इस कुचालको कोई कुछ नहीं जानता ॥ ४ ॥

दो०—प्रमुदित पुर नर नारि सब सजहिं सुमंगलचार।

एक प्रबिसहिं एक निर्गमहिं भीर भूप दरबार ॥ २३ ॥

बड़े ही आनन्दित होकर नगरके सब स्त्री-पुरुष शुभ मङ्गलाचारके साज सज रहे हैं। कोई भीतर जाता है, कोई बाहर निकलता है; राजद्वारमें बड़ी भीड़ हो रही है ॥ २३ ॥

बाल सरखा सुनि हियँ हरषाहीं । मिलि दस पाँच राम पहिं जाहीं ॥ प्रभु आदरहिं प्रेमु पहिचानी । पूँछहिं कुसल खेम मृदु बानी ॥

श्रीरामचन्द्रजीके बालसरखा राजतिलकका समाचार सुनकर हृदयमें हर्षित होते हैं। वे दस-पाँच मिलकर श्रीरामचन्द्रजीके पास जाते हैं। प्रेम पहचानकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी उनका आदर करते हैं और कोमल वाणीसे कुशल-क्षेम पूछते हैं ॥ १ ॥

फिरहिं भवन प्रिय आयसु पाई । करत परसपर राम बड़ाई ॥ को रघुबीर सरिस संसारा । सीलु सनेहु निबाहनहारा ॥

अपने प्रिय सखा श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा पाकर वे आपसमें एक-दूसरेसे श्रीरामचन्द्रजीकी बड़ाई करते हुए घर लौटते हैं और कहते हैं—संसारमें श्रीरघुनाथजीके समान शील और स्नेहको निबाहनेवाला कौन है ? ॥ २ ॥

जेहिं जेहिं जोनि करम बस भ्रमहीं । तहँ तहँ ईसु देउ यह हमहीं ॥ सेवक हम स्वामी सियनाहू । होउ नात यह ओर निबाहू ॥

भगवान् हमें यही दें कि हम अपने कर्मवश भ्रमते हुए जिस-जिस योनिमें जन्में, वहाँ-वहाँ (उस-उस योनिमें) हम तो सेवक हों और सीतापति श्रीरामचन्द्रजी हमारे स्वामी हों और यह नाता अन्ततक निभ जाय ॥ ३ ॥

अस अभिलाषु नगर सब काहू । कैकयसुता हृदयँ अति दाहू ॥ को न कुसंगति पाइ नसाई । रहइ न नीच मतें चतुराई ॥

नगरमें सबकी ऐसी ही अभिलाषा है। परन्तु कैकेयीके हृदयमें बड़ी जलन हो रही है। कुसंगति पाकर कौन नष्ट नहीं होता। नीचके मतके अनुसार चलनेसे चतुराई नहीं रह जाती ॥ ४ ॥

दो०—साँझ समय सानंद नृपु गयउ कैकई गेहँ।

गवनु निठुरता निकट किय जनु धरि देह सनेहँ ॥ २४ ॥

३६४

  • रामचरितमानस *

सन्ध्याके समय राजा दशरथ आनन्दके साथ कैकेयीके महलमें गये। मानो साक्षात् स्नेह ही शरीर धारण कर निष्ठुरताके पास गया हो!॥ २४॥

कोपभवन सुनि सकुचेउ राऊ । भय बस अगहुड़ परड़ न पाऊ॥ सुरपति बसइ बाहँबल जाकें । नरपति सकल रहहिं रुख ताकें॥

कोपभवनका नाम सुनकर राजा सहम गये। डरके मारे उनका पाँव आगेको नहीं पड़ता। स्वयं देवराज इन्द्र जिनकी भुजाओंके बलपर [राक्षसोंसे निर्भय होकर] बसता है और सम्पूर्ण राजालोग जिनका रुख देखते रहते हैं, ॥ १ ॥

सो सुनि तिय रिस गयउ सुखाई । देखहु काम प्रताप बड़ाई॥ सूल कुलिस असि अँगवनिहारे । ते रतिनाथ सुमन सर मारे॥

वही राजा दशरथ स्त्रीका क्रोध सुनकर सूख गये। कामदेवका प्रताप और महिमा तो देखिये। जो त्रिशूल, वज्र और तलवार आदिकी चोट अपने अङ्गोंपर सहनेवाले हैं, वे रतिनाथ कामदेवके पुष्पबाणसे मारे गये ॥ २ ॥

सभय नरेसु प्रिया पहिं गयऊ । देखि दसा दुखु दारुन भयऊ॥ भूमि सयन पटु मोट पुराना । दिए डारि तन भूषन नाना॥

राजा डरते-डरते अपनी प्यारी कैकेयीके पास गये। उसकी दशा देखकर उन्हें बड़ा ही दुःख हुआ। कैकेयी जमीनपर पड़ी है। पुराना मोटा कपड़ा पहने हुए है। शरीरके नाना आभूषणोंको उतारकर फेंक दिया है ॥ ३ ॥

कुमतिहि कसि कुबेषता फाबी । अनअहिवातु सूच जनु भाबी॥ जाइ निकट नृपु कह मृदु बानी । प्रानप्रिया केहि हेतु रिसानी॥

उस दुर्बुद्धि कैकेयीको यह कुबेषता (बुरा वेष) कैसी फब रही है, मानो भावी विधवापनकी सूचना दे रही हो। राजा उसके पास जाकर कोमल वाणीसे बोले—हे प्राणप्रिये! किसलिये रिसाई (रूठी) हो? ॥ ४ ॥

छं०—केहि हेतु रानि रिसानि परसत पानि पतिहि नेवारई। मानहुँ सरोष भुअंग भामिनि बिषम भाँति निहारई॥ दोउ बासना रसना दसन बर मरम ठाहरु देखई। तुलसी नृपति भवतव्यता बस काम कौतुक लेखई॥

‘हे रानी! किसलिये रूठी हो?’ यह कहकर राजा उसे हाथसे स्पर्श करते हैं तो वह उनके हाथको [झटककर] हटा देती है और ऐसे देखती है मानो क्रोधमें भरी हुई नागिन क्रूर दृष्टिसे देख रही हो। दोनों [वरदानोंकी] वासनाएँ उस नागिनकी दो जीभें हैं और दोनों वरदान दाँत हैं; वह काटनेके लिये मर्मस्थान देख रही है। तुलसीदासजी कहते हैं कि राजा दशरथ होनहारके वशमें होकर इसे (इस प्रकार हाथ झटकने और नागिनकी भाँति देखनेको) कामदेवकी क्रीड़ा ही समझ रहे हैं।

  • अयोध्याकाण्ड *

३६५

सो० — बार बार कह राउ सुमुखि सुलोचनि पिकबचनि ।

कारन मोहि सुनाउ गजगामिनि निज कोप कर ॥ २५ ॥

राजा बार-बार कह रहे हैं—हे सुमुखी! हे सुलोचनी! हे कोकिलबयनी! हे गजगामिनी! मुझे अपने क्रोधका कारण तो सुना ॥ २५ ॥

अनहित तोर प्रिया केईं कीन्हा । केहि दुइ सिर केहि जमु चह लीन्हा ॥ कहु केहि रंकहि करौं नरेसू । कहु केहि नृपहि निकासौं देसू ॥

हे प्रिये! किसने तेरा अनिष्ट किया? किसके दो सिर हैं? यमराज किसको लेना (अपने लोकको ले जाना) चाहते हैं ? कह, किस कंगालको राजा कर दूँ या किस राजाको देशसे निकाल दूँ ॥ १ ॥

सकउँ तोर अरि अमरउ मारी । काह कीट बपुरे नर नारी ॥ जानसि मोर सुभाउ बरोरू । मनु तव आनन चंद चकोरू ॥

तेरा शत्रु अमर (देवता) भी हो, तो मैं उसे भी मार सकता हूँ। बेचारे कीड़े-मकोड़े-सरीखे नर-नारी तो चीज ही क्या हैं। हे सुन्दरि! तू तो मेरा स्वभाव जानती ही है कि मेरा मन सदा तेरे मुखरूपी चन्द्रमाका चकोर है ॥ २ ॥

प्रिया प्रान सुत सरबसु मोरें । परिजन प्रजा सकल बस तोरें ॥ जौं कछु कहौं कपटु करि तोही । भामिनि राम सपथ सत मोही ॥

हे प्रिये! मेरी प्रजा, कुटुम्बी, सर्वस्व (सम्पत्ति), पुत्र, यहाँतक कि मेरे प्राण भी, ये सब तेरे वशमें (अधीन) हैं। यदि मैं तुझसे कुछ कपट करके कहता होऊँ तो हे भामिनी! मुझे सौ बार रामकी सौगंध है ॥ ३ ॥

बिहसि मागु मनभावति बाता । भूषन सजहि मनोहर गाता ॥ घरी कुघरी समुझि जियँ देखू । बेगि प्रिया परिहरहि कुबेष् ॥

तू हँसकर (प्रसन्नतापूर्वक) अपनी मनचाही बात माँग ले और अपने मनोहर अंगोंको आभूषणोंसे सजा। मौका-बेमौका तो मनमें विचारकर देख। हे प्रिये! जल्दी इस बुरे वेषको त्याग दे ॥ ४ ॥

दो० — यह सुनि मन गुनि सपथ बड़ि बिहसि उठी मतिमंद ।

भूषन सजति बिलोकि मृगु मनहुँ किरातिनि फंद ॥ २६ ॥

यह सुनकर और मनमें रामजीकी बड़ी सौगन्धको विचारकर मन्दबुद्धि कैकेयी हँसती हुई उठी और गहने पहनने लगी; मानो कोई भीलनी मृगको देखकर फंद तैयार कर रही हो! ॥ २६ ॥

३६६

  • रामचरितमानस *

पुनि कह राउ सुहद जियँ जानी । प्रेम पुलकि मृदु मंजुल बानी ॥ भामिनि भयउ तोर मनभावा । घर घर नगर अनंद बधावा ॥

अपने जीमें कैकेयीको सुहद जानकर राजा दशरथजी प्रेमसे पुलकित होकर कोमल और सुन्दर वाणीसे फिर बोले—हे भामिनि! तेरा मनचीता हो गया। नगरमें घर-घर आनन्दके बधावे बज रहे हैं ॥ १ ॥

रामहि देउँ कालि जुबराजू । सजहि सुलोचनि मंगल साजू ॥ दलकि उठेउ सुनि हदउ कठोरु । जनु छुइ गयउ पाक बरतोरु ॥

मैं कल ही रामको युवराज-पद दे रहा हूँ। इसलिये हे सुनयनी! तू मङ्गल-साज सज। यह सुनते ही उसका कठोर हृदय दलक उठा (फटने लगा)। मानो पका हुआ बालतोड़ (फोड़ा) छू गया हो ॥ २ ॥

ऐसिउ पीर बिहसि तेहिं गोई । चोर नारि जिमि प्रगटि न रोई ॥ लखहिं न भूप कपट चतुराई । कोटि कुटिल मनि गुरु पढ़ाई ॥

ऐसी भारी पीड़ाको भी उसने हँसकर छिपा लिया, जैसे चोरकी स्त्री प्रकट होकर नहीं रोती (जिसमें उसका भेद न खुल जाय)। राजा उसकी कपट-चतुराईको नहीं लख रहे हैं। क्योंकि वह करोड़ों कुटिलोंकी शिरोमणि गुरु मन्थराकी पढ़ायी हुई है ॥ ३ ॥

जद्यपि नीति निपुन नरनाहू । नारिचरित जलनिधि अवगाहू ॥ कपट सनेहु बढाइ बहोरी । बोली बिहसि नयन मुहु मोरी ॥

जद्यपि राजा नीतिमें निपुण हैं; परन्तु त्रियाचरित्र अथाह समुद्र है। फिर वह कपटयुक्त प्रेम बढ़ाकर (ऊपरसे प्रेम दिखाकर) नेत्र और मुँह मोड़कर हँसती हुई बोली— ॥ ४ ॥

दो०—मागु मागु पै कहहु पिय कबहुँ न देहु न लेहु। देन कहेहु बरदान दुइ तेउ पावत संदेहु ॥ २७ ॥

हे प्रियतम! आप माँग-माँग तो कहा करते हैं, पर देते-लेते कभी कुछ भी नहीं। आपने दो बरदान देनेको कहा था, उनके भी मिलनेमें सन्देह है ॥ २७ ॥

जानेउँ मरमु राउ हँसि कहई । तुम्हि कोहाब परम प्रिय अहई ॥ थाती राखि न मागिहु काऊ । बिसरि गयउ मोहि भोर सुभाऊ ॥

राजाने हँसकर कहा कि अब मैं तुम्हारा मर्म (मतलब) समझा। मान करना तुम्हें परम प्रिय है। तुमने उन वरोंको थाती (धरोहर) रखकर फिर कभी माँगा ही नहीं और मेरा भूलनेका स्वभाव होनेसे मुझे भी वह प्रसङ्ग याद नहीं रहा ॥ १ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

३६७

झूठेहूँ हमहि दोषु जनि देहू । दुइ कै चारि मागि मकु लेहू ॥ रघुकुल रीति सदा चलि आई । प्रान जाहूँ बरु बचनु न जाई ॥

मुझे झूठ-मूठ दोष मत दो । चाहे दोके बदले चार माँग लो । रघुकुलमें सदासे यही रीति चली आयी है कि प्राण भले ही चले जायँ, पर वचन नहीं जाता ॥ २ ॥

नहि असत्य सम पातक पुंजा । गिरि सम होहिं कि कोटिक गुंजा ॥ सत्यमूल सब सुकृत सुहाए । बेद पुरान बिदित मनु गाए ॥

असत्यके समान पापोंका समूह भी नहीं है । क्या करोड़ों घुँघचियाँ मिलकर भी कहीं पहाड़के समान हो सकती हैं । 'सत्य' ही समस्त उत्तम सुकृतों (पुण्यों)-की जड़ है । यह बात वेद-पुराणोंमें प्रसिद्ध है और मनुजीने भी यही कहा है ॥ ३ ॥

तेहि पर राम सपथ करि आई । सुकृत सनेह अवधि रघुराई ॥ बात दृढ़ाइ कुमति हँसि बोली । कुमत कुबिहग कुलह जनु खोली ॥

उसपर मेरे द्वारा श्रीरामजीकी शपथ करनेमें आ गयी (मुँहसे निकल पड़ी) । श्रीरघुनाथजी मेरे सुकृत (पुण्य) और स्नेहकी सीमा हैं । इस प्रकार बात पक्की करके दुर्बुद्धि कैकेयी हँसकर बोली, मानो उसने कुमत (बुरे विचार) रूपी दुष्ट पक्षी (बाज)-[को छोड़नेके लिये उस]-की कुलही (आँखोंपरकी टोपी) खोल दी ॥ ४ ॥

दो०—भूप मनोरथ सुभग बनु सुख सुबिहंग समाजु । भिल्लिन जिमि छाड़न चहति बचनु भयंकरु बाजु ॥ २८ ॥

राजाका मनोरथ सुन्दर वन है, सुख सुन्दर पक्षियोंका समुदाय है । उसपर भीलनीकी तरह कैकेयी अपना वचनरूपी भयंकर बाज छोड़ना चाहती है ॥ २८ ॥

मासपारायण, तेरहवाँ विश्राम

सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का । देहु एक बर भरतहि टीका ॥ मागउँ दूसर बर कर जोरी । पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी ॥

[वह बोली—] हे प्राणप्यारे ! सुनिये, मेरे मनको भानेवाला एक वर तो दीजिये, भरतको राजतिलक; और हे नाथ ! दूसरा वर भी मैं हाथ जोड़कर माँगती हूँ, मेरा मनोरथ पूरा कीजिये— ॥ १ ॥

तापस बेष बिसेषि उदासी । चौदह बरिस रामु बनबासी ॥ सुनि मृदु बचन भूप हियँ सोकू । ससि कर छुअत बिकल जिमि कोकू ॥

३६८

  • रामचरितमानस *

तपस्वियोंके वेषमें विशेष उदासीन भावसे (राज्य और कुटुम्ब आदिकी ओरसे भलीभाँति उदासीन होकर विरक्त मुनियोंकी भाँति) राम चौदह वर्षतक वनमें निवास करें। कैकेयीके कोमल (विनययुक्त) वचन सुनकर राजाके हृदयमें ऐसा शोक हुआ जैसे चन्द्रमाकी किरणोंके स्पर्शसे चकवा विकल हो जाता है ॥ २ ॥

गयउ सहमि नहिं कछु कहि आवा । जनु सचान बन झपटेउ लावा ॥ बिबरन भयउ निपट नरपालू । दामिनि हनेउ मनहुँ तरु तालू ॥

राजा सहम गये, उनसे कुछ कहते न बना, मानो बाज वनमें बटेरपर झपटा हो। राजाका रंग बिलकुल उड़ गया, मानो ताड़के पेड़को बिजलीने मारा हो (जैसे ताड़के पेड़पर बिजली गिरनेसे वह झूलसकर बदरंगा हो जाता है, वही हाल राजाका हुआ) ॥ ३ ॥

माथें हाथ मूदि दोउ लोचन । तनु धरि सोचु लाग जनु सोचन ॥ मोर मनोरथु सुरतरु फूला । फरत करिनि जिमि हतेउ समूला ॥

माथेपर हाथ रखकर, दोनों नेत्र बंद करके राजा ऐसे सोच करने लगे, मानो साक्षात् सोच ही शरीर धारणकर सोच कर रहा हो। [वे सोचते हैं—हाय!] मेरा मनोरथरूपी कल्पवृक्ष फूल चुका था, परन्तु फलते समय कैकेयीने हथिनीकी तरह उसे जड़समेत उखाड़कर नष्ट कर डाला ॥ ४ ॥

अवध उजारि कीन्हि कैकेई । दीन्हिसि अचल बिपति कै नेई ॥

कैकेयीने अयोध्याको उजाड़ कर दिया और विपत्तिकी अचल (सुदृढ़) नींव डाल दी ॥ ५ ॥

दो०—कवनें अवसर का भयउ गयउँ नारि बिस्वास ।

जोग सिद्धि फल समय जिमि जतिहि अविद्या नास ॥ २९ ॥

किस अवसरपर क्या हो गया! स्त्रीका विश्वास करके मैं वैसे ही मारा गया, जैसे योगकी सिद्धिरूपी फल मिलनेके समय योगीको अविद्या नष्ट कर देती है ॥ २९ ॥

एहि बिधि राउ मनहिं मन झाँखा । देखि कुभाँति कुमति मन माखा ॥

भरतु कि राउर पूत न होंही । आनेहु मोल बेसाहि कि मोही ॥

इस प्रकार राजा मन-ही-मन झाँख रहे हैं। राजाका ऐसा बुरा हाल देखकर दुर्बुद्धि कैकेयी मनमें बुरी तरहसे क्रोधित हुई। [और बोली—] क्या भरत आपके पुत्र नहीं हैं ? क्या मुझे आप दाम देकर खरीद लाये हैं ? (क्या मैं आपकी विवाहिता पत्नी नहीं हूँ?) ॥ ११ ॥

जो सुनि सरु अस लाग तुम्हारें । काहे न बोलहु बचनु सँभारें ॥

देहु उत्तरु अनु करहु कि नाही । सत्यसंध तुम्ह रघुकुल माहीं ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

३६१

जो मेरा वचन सुनते ही आपको बाण-सा लगा तो आप सोच-समझकर बात क्यों नहीं कहते? उत्तर दीजिये—हाँ कीजिये, नहीं तो नहीं कर दीजिये। आप स्तुवशमें सत्य प्रतिज्ञावाले [प्रसिद्ध] हैं॥२॥

देन कहेहु अब जनि बरु देहू । तजहु सत्य जग अपजसु लेहू॥ सत्य सराहि कहेहु बरु देना । जानेहु लेइहि मागि चबेना॥

आपने ही वर देनेको कहा था, अब भले ही न दीजिये। सत्यको छोड़ दीजिये और जगत्में अपयश लीजिये। सत्यकी बड़ी सराहना करके वर देनेको कहा था। समझा था कि यह चबेना ही माँग लेगी॥३॥

सिबि दधीचि बलि जो कछु भाषा । तनु धनु तजेउ बचन पनु राखा॥ अति कटु बचन कहति कैकेई । मानहुँ लोन जरे पर देई॥

राजा शिबि, दधीचि और बलिनो जो कुछ कहा, शरीर और धन त्यागकर भी उन्होंने अपने वचनकी प्रतिज्ञाको निबाहा। कैकेयी बहुत ही कड़वे वचन कह रही है, मानो जलेपर नमक छिड़क रही हो॥४॥

दो०—धरम धुरंधर धीर धरि नयन उघारे रायँ।

सिरु धुनि लीन्हि उसास असि मारेसि मोहि कुठार्यँ॥३०॥

धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले राजा दशरथने धीरज धरकर नेत्र खोले और सिर धुनकर तथा लंबी साँस लेकर इस प्रकार कहा कि इसने मुझे बड़े कुठौर मारा (ऐसी कठिन परिस्थिति उत्पन्न कर दी, जिससे बच निकलना कठिन हो गया)॥३०॥

आगें दीखि जरत रिस भारी । मनहुँ रोष तरवारि उघारी॥ मूठि कुबुद्धि धार निठुराई । धरी कूबरीं सान बनाई॥

प्रचण्ड क्रोधसे जलती हुई कैकेयी सामने इस प्रकार दिखायी पड़ी, मानो क्रोधरूपी तलवार नंगी (म्यानसे बाहर) खड़ी हो। कुबुद्धि उस तलवारकी मूठ है, निष्ठरता धार है और वह कुबरी (मन्थरा) रूपी सानपर धरकर तेज की हुई है॥१॥

लखी महीप कराल कठोरा । सत्य कि जीवनु लेइहि मोरा॥ बोले राउ कठिन करि छाती । बानी सबिनय तासु सोहाती॥

राजाने देखा कि यह (तलवार) बड़ी ही भयानक और कठोर है [और सोचा—] क्या सत्य ही यह मेरा जीवन लेगी? राजा अपनी छाती कड़ी करके, बहुत ही नम्रताके साथ उसे(कैकेयीको)प्रिय लगनेवाली वाणी बोले—॥२॥

प्रिया बचन कस कहसि कुभाँती । भीर प्रतीति प्रीति करि हाँती॥ मोरें भरतु रामु दुइ आँखी । सत्य कहउँ करि संकरु सारखी॥

३७०

  • रामचरितमानस *

हे प्रिये! हे भीरु! विश्वास और प्रेमको नष्ट करके ऐसे बुरी तरहके वचन कैसे कह रही हो। मेरे तो भरत और रामचन्द्र दो आँखें (अर्थात् एक-से) हैं; यह मैं शङ्करजीकी साक्षी देकर सत्य कहता हूँ ॥ ३ ॥

अवसि दूतु मैं पठइब प्राता । ऐहहिं बेगि सुनत दोउ भाता ॥ सुदिन सोधि सबु साजु सजाई । देउँ भरत कहूँ राजु बजाई ॥

मैं अवश्य सबेरे ही दूत भेजूँगा। दोनों भाई (भरत-शत्रुघ्न) सुनते ही तुरंत आ जायँगे। अच्छा दिन (शुभ मुहूर्त) शोधवाकर, सब तैयारी करके डंका बजाकर मैं भरतको राज्य दे दूँगा ॥ ४ ॥

दो०—लोभु न रामहि राजु कर बहुत भरत पर प्रीति।

मैं बड़ छोट बिचारि जियँ करत रहेउँ नृपनीति ॥ ३१ ॥

रामको राज्यका लोभ नहीं है और भरतपर उनका बड़ा ही प्रेम है। मैं ही अपने मनमें बड़े-छोटेका विचार करके राजनीतिका पालन कर रहा था (बड़ेको राजतिलक देने जा रहा था) ॥ ३१ ॥

राम सपथ सत कहउँ सुभाऊ । राममातु कछु कहेउ न काऊ ॥ मैं सबु कीन्ह तोहि बिनु पूछें । तेहि तें परेउ मनोरथु छूछें ॥

रामकी सौ बार सौगंध खाकर मैं स्वभावसे ही कहता हूँ कि रामकी माता (कौसल्या)-ने [इस विषयमें] मुझसे कभी कुछ नहीं कहा। अवश्य ही मैंने तुमसे बिना पूछे यह सब किया। इसीसे मेरा मनोरथ खाली गया ॥ १ ॥

रिस परिहरु अब मंगल साजू । कछु दिन गऐं भरत जुबराजू ॥ एकहि बात मोहि दुखु लाग। बर दूसर असमंजस मागा ॥

अब क्रोध छोड़ दे और मङ्गल साज सज। कुछ ही दिनों बाद भरत युवराज हो जायँगे। एक ही बातका मुझे दुःख लगा कि तूने दूसरा वरदान बड़ी अड़चनका माँगा ॥ २ ॥

अजहूँ हदउ जरत तेहि आँचा । रिस परिहास कि साँचेहूँ साँचा ॥ कहु तजि रोषु राम अपराधू । सबु कोउ कहइ रामु सुठि साधू ॥

उसकी आँचसे अब भी मेरा हृदय जल रहा है। यह दिल्लगीमें, क्रोधमें अथवा सचमुच ही (वास्तवमें) सच्चा है? क्रोधको त्यागकर रामका अपराध तो बता। सब कोई तो कहते हैं कि राम बड़े ही साधु हैं ॥ ३ ॥

तुहूँ सराहसि करसि सनेहू । अब सुनि मोहि भयउ संदेहू ॥ जासु सुभाउ अरिहि अनुकूला । सो किमि करिहि मातु प्रतिकूला ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

३७१

तू स्वयं भी रामकी सराहना करती और उनपर स्नेह किया करती थी। अब यह सुनकर मुझे सन्देह हो गया है [कि तुम्हारी प्रशंसा और स्नेह कहीं झूठे तो न थे ?] जिसका स्वभाव शत्रुको भी अनुकूल है, वह माताके प्रतिकूल आचरण क्यों कर करेगा ? ॥ ४ ॥

दो०—प्रिया हास रिस परिहरहि मागु बिचारि बिबेकु ।

जेहिं देखौं अब नयन भरि भरत राज अभिषेकु ॥ ३२ ॥

हे प्रिये ! हँसी और क्रोध छोड़ दे और विवेक (उचित-अनुचित) विचारकर वर माँग, जिससे अब मैं नेत्र भरकर भरतका राज्याभिषेक देख सकूँ ॥ ३२ ॥

जिए मीन बरु बारि बिहीना । मनि बिनु फनिकु जिए दुख दीना ॥

कहउँ सुभाउ न छलु मन माहीं । जीवनु मोर राम बिनु नाहीं ॥

मछली चाहे बिना पानीके जीती रहे और सौंप भी चाहे बिना मणिके दीन-दुखी होकर जीता रहे। परन्तु मैं स्वभावसे ही कहता हूँ, मनमें [जरा भी] छल रखकर नहीं कि मेरा जीवन रामके बिना नहीं है ॥ १ ॥

समुझि देखु जियँ प्रिया प्रबीना । जीवनु राम दरस आधीना ॥

सुनि मृदु बचन कुमति अति जरई । मनहुँ अनल आहुति घृत परई ॥

हे चतुर प्रिये ! जीमें समझ देख, मेरा जीवन श्रीरामके दर्शनके अधीन है। राजाके कोमल वचन सुनकर दुर्बुद्धि कैकेयी अत्यन्त जल रही है। मानो अग्रिममें घीकी आहुतियाँ पड़ रही हैं ॥ २ ॥

कहइ करहु किन कोटि उपाया । इहाँ न लागिहि राउरि माया ॥

देहु कि लेहु अजसु करि नाहीं । मोहि न बहुत प्रपंच सोहाहीं ॥

[कैकेयी कहती है—] आप करोड़ों उपाय क्यों न करें, यहाँ आपकी माया (चालबाजी) नहीं लगेगी। या तो मैंने जो माँगा है सो दीजिये, नहीं तो 'नाहीं' करके अपयश लीजिये। मुझे बहुत प्रपञ्च (बखेड़े) नहीं सुहाते ॥ ३ ॥

रामु साधु तुम्ह साधु सयाने । राममातु भलि सब पहिचाने ॥

जस कौसिलाँ मोर भल ताका । तस फलु उन्हहि देउँ करि साका ॥

राम साधु हैं, आप सयाने साधु हैं और रामकी माता भी भली हैं; मैंने सबको पहचान लिया है। कौसल्याने मेरा जैसा भला चाहा है, मैं भी साका करके (याद रखनेयोग्य) उन्हें वैसा ही फल दूँगी ॥ ४ ॥

दो०—होत प्रातु मुनिबेष धरि जौं न रामु बन जाहिं ।

मोर मरनु राउर अजस नृप समुझिअ मन माहिं ॥ ३३ ॥

सबेरा होते ही मुनिका वेष धारणकर यदि राम वनको नहीं जाते, तो हे राजन् ! मनमें [निश्चय] समझ लीजिये कि मेरा मरना होगा और आपका अपयश ! ॥ ३३ ॥

३७२

  • रामचरितमानस *

अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी । मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी ॥ पाप पहार प्रगट भइ सोई । भरी क्रोध जल जाइ न जोई ॥

ऐसा कहकर कुटिल कैकेयी उठ खड़ी हुई, मानो क्रोधकी नदी उमड़ी हो। वह नदी पापरूपी पहाड़से प्रकट हुई है और क्रोधरूपी जलसे भरी है; [ऐसी भयानक है कि] देखी नहीं जाती! ॥ १ ॥

दोउ बर कूल कठिन हठ धारा । भवँर कूबरी बचन प्रचारा ॥ ढाहत भूपरूप तरु मूला । चली बिपति बारिधि अनुकूला ॥

दोनों वरदान उस नदीके दो किनारे हैं, कैकेयीका कठिन हठ ही उसकी [तीव्र] धारा है और कुबरी (मन्थरा)-के वचनोंकी प्रेरणा ही भँवर है। [वह क्रोधरूपी नदी] राजा दशरथरूपी वृक्षको जड़-मूलसे ढहाती हुई विपत्तिरूपी समुद्रकी ओर [सीधी] चली हैं ॥ २ ॥

लखी नरेस बात फुरि साँची । तिय मिस मीचु सीस पर नाची ॥ गहि पद बिनय कीन्ह बैठारी । जनि दिनकर कुल होसि कुठारी ॥

राजाने समझ लिया कि बात सचमुच (वास्तवमें) सच्ची है, स्त्रीके बहाने मेरी मृत्यु ही सिरपर नाच रही है। [तदनन्तर राजाने कैकेयीके] चरण पकड़कर उसे बिठाकर विनती की कि तू सूर्यकुल-[रूपी वृक्ष] के लिये कुल्हाड़ी मत बन ॥ ३ ॥

मागु माथ अबहीं देउँ तोही । राम बिरहँ जनि मारसि मोही ॥ राखु राम कहुँ जेहि तेहि भाँती । नाहिं त जरिहि जनम भरि छाती ॥

तू मेरा मस्तक माँग ले, मैं तुझे अभी दे दूँ। पर रामके विरहमें मुझे मत मार। जिस किसी प्रकारसे हो तू रामको रख ले। नहीं तो जन्मभर तेरी छाती जलेगी ॥ ४ ॥

दो०—देखी व्याधि असाध नृपु परेउ धरनि धुनि माथ ।

कहत परम आरत बचन राम राम रघुनाथ ॥ ३४ ॥

राजाने देखा कि रोग असाध्य है, तब वे अत्यन्त आर्तवाणीसे 'हा राम! हा राम! हा रघुनाथ!' कहते हुए सिर पीटकर जमीनपर गिर पड़े ॥ ३४ ॥

व्याकुल राउ सिथिल सब गाता । करिनि कलपतरु मनहुँ निपाता ॥ कंटु सूख मुख आव न बानी । जनु पाठीनु दीन बिनु पानी ॥

राजा व्याकुल हो गये, उनका सारा शरीर शिथिल पड़ गया, मानो हथिनीने कल्पवृक्षको उखाड़ फेंका हो। कण्ठ सूख गया, मुखसे बात नहीं निकलती, मानो पानीके बिना पहिना नामक मछली तड़प रही हो ॥ १ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

३७३

पुनि कह कटु कठोर कैकेई । मनहुँ घाय महँ माहुर देई ॥ जौ अंतहुँ अस करतबु रहेऊ । मागु मागु तुम्ह केहिँ बल कहेऊ ॥

कैकेयी फिर कड़वे और कठोर वचन बोली, मानो घावमें जहर भर रही हो। [कहती है—] जो अन्तमें ऐसा ही करना था, तो आपने 'माँग, माँग' किस बलपर कहा था ॥ २ ॥

दुइ कि होइ एक समय भुआला । हँसब ठठाइ फुलाउब गाला ॥ दानि कहाउब अरु कूपनाई । होइ कि खेम कुसल रौताई ॥

हे राजा! ठहाका मारकर हँसना और गाल फुलाना—क्या ये दोनों एक साथ हो सकते हैं? दानी भी कहाना और कंजूसी भी करना। क्या रजपूतीमें क्षेम-कुशल भी रह सकती है? (लड़ाईमें बहादुरी भी दिखावें और कहीं चोट भी न लगे!) ॥ ३ ॥

छाड़हु बचनु कि धीरजु धरहू । जनि अबला जिमि करुना करहू ॥ तनु तिय तनय धामु धनु धरनी । सत्यसंध कहँ तून सम बरनी ॥

या तो वचन (प्रतिज्ञा) ही छोड़ दीजिये या धैर्य धारण कीजिये। यों असहाय स्त्रीकी भाँति रोइये-पीटिये नहीं। सत्यव्रतीके लिये तो शरीर, स्त्री, पुत्र, घर, धन और पृथ्वी—सब तिनकेके बराबर कहे गये हैं ॥ ४ ॥

दो०—मरम बचन सुनि राउ कह कहु कछु दोषु न तोर । लागेउ तोहि पिसाच जिमि कालु कहावत मोर ॥ ३५ ॥

कैकेयीके मर्मभेदी वचन सुनकर राजाने कहा कि तू जो चाहे कह, तेरा कुछ भी दोष नहीं है। मेरा काल तुझे मानो पिशाच होकर लग गया है, वही तुझसे यह सब कहला रहा है ॥ ३५ ॥

चहत न भरत भूपतहि भोरें । बिधि बस कुमति बसी जिय तोरें ॥ सो सबु मोर पाप परिनामू । भयउ कुठाहर जेहिँ बिधि बामू ॥

भरत तो भूलकर भी राजपद नहीं चाहते। होनहारवश तेरे ही जीमें कुमति आ बसी। यह सब मेरे पापोंका परिणाम है, जिससे कुसमयमें (बेमौके) विधाता विपरीत हो गया ॥ १ ॥

सुबस बसिहि फिरि अवध सुहाई । सब गुन धाम राम प्रभुताई ॥ करिहिं भाइ सकल सेवकाई । होइहि तिहुँ पुर राम बड़ाई ॥

[तेरी उजाड़ी हुई] यह सुन्दर अयोध्या फिर भलीभाँति बसेगी और समस्त गुणोंके धाम श्रीरामकी प्रभुता भी होगी। सब भाई उनकी सेवा करेंगे और तीनों लोकोंमें श्रीरामकी बड़ाई होगी ॥ २ ॥

तोर कलंकु मोर पछिताऊ । मुएहुँ न मिटिहि न जाइहि काऊ ॥ अब तोहि नीक लाग करु सोई । लोचन ओट बैठु मुहु गोई ॥

३७४

  • रामचरितमानस *

केवल तेरा कलंक और मेरा पछतावा मरनेपर भी नहीं मिटेगा, यह किसी तरह नहीं जायगा। अब तुझे जो अच्छा लगे वही कर। मुँह छिपाकर मेरी आँखोंकी ओट जा बैठ (अर्थात् मेरे सामनेसे हट जा, मुझे मुँह न दिखा) ॥ ३ ॥

जब लगि जिऔँ कहउँ कर जोरी । तब लगि जनि कछु कहसि बहोरी ॥ फिरि पछितैहसि अंत अभागी । मारसि गाड़ नहारू लागी ॥

मैं हाथ जोड़कर कहता हूँ कि जबतक मैं जीता रहूँ, तबतक फिर कुछ न कहना (अर्थात् मुझसे न बोलना)। अरी अभागिनी! फिर तू अन्तमें पछतायेगी जो तू नहारू (ताँत) के लिये गायको मार रही है ॥ ४ ॥

दो०—परेउ राउ कहि कोटि बिधि काहे करसि निदानु । कपट सयानि न कहति कछु जागति मनहुँ मसानु ॥ ३६ ॥

राजा करोड़ों प्रकारसे (बहुत तरहसे) समझाकर [और यह कहकर] कि तू क्यों सर्वनाश कर रही है, पृथ्वीपर गिर पड़े। पर कपट करनेमें चतुर कैकेयी कुछ बोलती नहीं, मानो [मौन होकर] मसान जगा रही हो (शमशानमें बैठकर प्रेतमन्त्र सिद्ध कर रही हो) ॥ ३६ ॥

राम राम रट बिकल भुआलू । जनु बिनु पंख बिहंग बेहालू ॥ हृदयँ मनाव भोरु जनि होई । रामहि जाड़ कहै जनि कोई ॥

राजा 'राम-राम' रट रहे हैं और ऐसे व्याकुल हैं, जैसे कोई पक्षी पंखके बिना बेहाल हो। वे अपने हृदयमें मनाते हैं कि सबेरा न हो, और कोई जाकर श्रीरामचन्द्रजीसे यह बात न कहे ॥ १ ॥

उदउ करहु जनि रबि रघुकुल गुर । अवध बिलोकि सूल होइहि उर ॥ भूप प्रीति कैकड़ कठिनाई । उभय अवधि बिधि रची बनाई ॥

हे रघुकुलके गुरु (बड़ेरे मूलपुरुष) सूर्यभगवान्! आप अपना उदय न करें। अयोध्याको [बेहाल] देखकर आपके हृदयमें बड़ी पीड़ा होगी। राजाकी प्रीति और कैकेयीकी निष्कृता दोनोंको ब्रह्मणे सीमातक रचकर बनाया है (अर्थात् राजा प्रेमकी सीमा हैं और कैकेयी निष्कृताकी) ॥ २ ॥

बिलपत नृपहि भयउ भिनुसारा । बीना बेनु संख धुनि द्वारा ॥ पढ़हिं भाट गुन गावहिं गायक । सुनत नृपहि जनु लागहिं सायक ॥

विलाप करते-करते ही राजाको सबेरा हो गया। राजद्वारपर वीणा, बाँसुरी और शंखकी ध्वनि होने लगी। भाटलोग विरुदावली पढ़ रहे हैं और गवैये गुणोंका गान कर रहे हैं। सुननेपर राजाको वे बाण-जैसे लगते हैं ॥ ३ ॥