श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
महाबली, महापराक्रमी और महातेजस्वी देवशत्रु थे॥ १० १/२ ॥
‘निश्चय ही ये श्रीरामचन्द्रजी महान् योगी एवं सनातन परमात्मा हैं। इनका आदि, मध्य और अन्त नहीं है। ये महान्से भी महान्, अज्ञानान्धकारसे परे तथा सबको धारण करनेवाले परमेश्वर हैं, जो अपने हाथमें शङ्ख, चक्र और गदा धारण करते हैं, जिनके वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न है, भगवती लक्ष्मी जिनका कभी साथ नहीं छोड़तीं, जिन्हें परास्त करना सर्वथा असम्भव है तथा जो नित्य स्थिर एवं सम्पूर्ण लोकोंके अधीश्वर हैं, उन सत्यपराक्रमी भगवान् विष्णुने ही समस्त लोकोंका हित करनेकी इच्छासे मनुष्यका रूप धारण करके वानररूपमें प्रकट हुए सम्पूर्ण देवताओंके साथ आकर राक्षसोंसहित आपका वध किया है; क्योंकि आप देवताओंके शत्रु और समस्त संसारके लिये भयंकर थे॥ ११—१४ १/२ ॥
‘नाथ! पहले आपने अपनी इन्द्रियोंको जीतकर ही तीनों लोकोंपर विजय पायी थी, उस वैरको याद रखती हुई-सी इन्द्रियोंने ही अब आपको परास्त किया है॥
‘जब मैंने सुना कि जनस्थानमें बहुतेरे राक्षसोंसे घिरे होनेपर भी आपके भाई खरको श्रीरामने मार डाला है, तभी मुझे विश्वास हो गया कि श्रीरामचन्द्रजी कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं॥ १६ १/२ ॥
‘जिस लङ्का नगरीमें देवताओंका भी प्रवेश होना कठिन था, वहीं जब हनुमान्जी बलपूर्वक घुस आये, उसी समय हमलोग भावी अनिष्टकी आशङ्कासे व्यथित हो उठी थीं॥ १७ १/२ ॥
‘मैंने बारम्बार कहा—प्राणनाथ! आप रघुनाथजीसे वैर-विरोध न कीजिये; परंतु आपने मेरी बात नहीं मानी। उसीका आज यह फल मिला है॥ १८ १/२ ॥
‘राक्षसराज! आपने अपने ऐश्वर्यका, शरीरका तथा स्वजनोंका विनाश करनेके लिये ही अकस्मात् सीताकी कामना की थी॥ १९ १/२ ॥
‘दुर्मते! भगवती सीता अरुन्धती और रोहिणीसे भी बढ़कर पतिव्रता हैं। वे वसुधाकी भी वसुधा और श्रीकी भी श्री हैं। अपने स्वामीके प्रति अनन्य अनुराग रखनेवाली और सबकी पूजनीया उन सीतादेवीका तिरस्कार करके आपने बड़ा अनुचित कार्य किया था॥
‘मेरे प्राणनाथ! सर्वाङ्गसुन्दरी शुभलक्षणा सीता निर्जन वनमें निवास करती थीं। आप छलसे उन्हें दुःखमें डालकर यहाँ हर लाये। यह आपके लिये बड़े कलङ्ककी बात हुई। मिथिलेशकुमारीके साथ समागमके लिये जो आपके मनमें कामना थी, उसे तो आप पा नहीं
सके, उलटे उन पतिव्रता देवीकी तपस्यासे जलकर भस्म हो गये। अवश्य ऐसी ही बात हुई है॥ २२-२३ ॥
‘तन्वङ्गी सीताका अपहरण करते समय ही आप जलकर राख नहीं हो गये—यही आश्चर्यकी बात है। आपकी जिस महिमासे इन्द्र और अग्नि आदि सम्पूर्ण देवता आपसे डरते थे, उसीने उस समय आपको दग्ध नहीं होने दिया॥ २४ ॥
‘प्राणवल्लभ! इसमें कोई संदेह नहीं कि समय आनेपर कर्ताको उसके पाप-कर्मका फल अवश्य मिलता है॥ २५ ॥
‘शुभकर्म करनेवालेको उत्तम फलकी प्राप्ति होती है और पापीको पापका फल—दुःख भोगना पड़ता है। विभीषणको अपने शुभ कर्मोंके कारण ही सुख प्राप्त हुआ है और आपको ऐसा दुःख भोगना पड़ा है॥ २६ ॥
‘आपके घरमें सीतादेवीसे भी अधिक सुन्दर रूपवाली दूसरी युवतियाँ मौजूद हैं; परंतु आप कामके वशीभूत हो मोहवश इस बातको समझ नहीं पाते थे॥
‘मिथिलेशकुमारी सीता न तो कुलमें, न रूपमें और न दाक्षिण्य आदि गुणोंमें ही मुझसे बढ़कर हैं। वे मेरे बराबर भी नहीं हैं; परंतु आप मोहवश इस बातकी ओर नहीं ध्यान देते थे॥ २८ ॥
‘संसारमें कभी किसी भी प्राणीकी मृत्यु अकारण नहीं होती है। इस नियमके अनुसार मिथिलेशकुमारी सीता आपकी मृत्युका कारण बन गयीं॥ २९ ॥
‘आपने सीताके कारण होनेवाली मृत्युको स्वयं ही दूरसे बुला लिया। मिथिलेशनन्दिनी सीता अब शोकरहित हो श्रीरामके साथ विहार करेंगी; परंतु मेरा पुण्य बहुत थोड़ा था, इसलिये वह जल्दी समाप्त हो गया और मैं शोकके घोर समुद्रमें गिर पड़ी॥ ३० १/२ ॥
‘वीर! जो मैं विचित्र वस्त्राभूषण धारण करके अनुपम शोभासे सम्पन्न हो मनके अनुरूप विमानद्वारा आपके साथ कैलास, मन्दराचल, मेरुपर्वत, चैत्ररथवन तथा सम्पूर्ण देवोद्यानोंमें विहार करती हुई नाना प्रकारके देशोंको देखती फिरती थी, वही मैं आज आपका वध हो जानेसे समस्त कामभोगोंसे वञ्चित हो गयी॥ ३१—३३ ॥
‘मैं वही रानी मन्दोदरी हूँ, किंतु आज दूसरी स्त्रीके समान हो गयी हूँ। राजाओंकी चञ्चल राजलक्ष्मीको धिक्कार है! हा राजन्! आपका जो सुकुमार मुखमण्डल सुन्दर भौंहों, मनोहर त्वचा
और ऊँची नासिकासे युक्त था, कान्ति, शोभा और तेजके द्वारा जो क्रमशः चन्द्रमा, सूर्य और कमलको लज्जित करता था, किरीटोंके समूह जिसे जगमग बनाये रहते थे, जिसके अधर ताँबेके समान लाल थे, जिसमें दीप्तिमान् कुण्डल दमकते रहते थे, पान-भूमिमें जिसके नेत्र नशेसे व्याकुल और चञ्चल देखे जाते थे, जो नाना प्रकारके गजरे धारण करता था, मनोहर और सुन्दर था तथा मुसकराकर मीठी-मीठी बातें किया करता था, वही आपका मुखारविन्द आज शोभा नहीं पा रहा है। प्रभो! वह श्रीरामके सायकोंसे विदीर्ण हो खूनकी धारासे रँग गया है। इसका मेदा और मस्तिष्क छिन्न-भिन्न हो गया है तथा रथकी धूलोंसे इसमें रूक्षता आ गयी है॥ ३४—३७ १/२ ॥
‘हाय! मुझ मन्दभागिनीने कभी जिसके विषयमें सोचातक नहीं था, वही मुझे वैधव्यका दुःख प्रदान करनेवाली अन्तिम अवस्था (मृत्यु) आपको प्राप्त हो गयी॥ ३८ १/२ ॥
‘दानवराज मय मेरे पिता, राक्षसराज रावण मेरे पति और इन्द्रपर भी विजय प्राप्त करनेवाला इन्द्रजित् मेरा पुत्र है—यह सोचकर मैं अत्यन्त गर्वसे भरी रहती थी॥
‘मेरी यह दृढ़ धारणा बनी हुई थी कि मेरे रक्षक ऐसे लोग हैं जो दर्पसे भरे हुए शत्रुओंको मथ डालनेमें समर्थ, क्रूर, विख्यात बल और पौरुषसे सम्पन्न तथा किसीसे भी भयभीत नहीं होनेवाले हैं॥ ४० १/२ ॥
‘राक्षसशिरोमणियो! ऐसे प्रभावशाली तुमलोगोंको यह मनुष्यसे अज्ञात भय किस प्रकार प्राप्त हुआ?॥
‘जो चिकने इन्द्रनील-मणिके समान श्याम, ऊँचे शैल-शिखरके समान विशाल तथा केयूर, अङ्गद, नीलम और मोतियोंके हार एवं फूलोंकी मालाओंसे सुसज्जित होनेके कारण अत्यन्त प्रकाशमान दिखायी देता था, विहारस्थलोंमें अधिक कान्तिमान् तथा संग्राम-भूमियोंमें अतिशय दीप्तिमान् प्रतीत होता था और आभूषणोंकी प्रभासे जिसकी विद्युन्मालामण्डित मेघकी-सी शोभा होती थी, वही आपका शरीर आज अनेक तीखे बाणोंसे भरा हुआ है; अतः यद्यपि आजसे फिर इसका स्पर्श मेरे लिये दुर्लभ हो जायगा, तथापि इन बाणोंके कारण मैं इसका आलिङ्गन नहीं कर पाती हूँ॥ ४२—४४ १/२ ॥
‘राजन्! जैसे साहीकी देह काँटोंसे भरी होती है, उसी प्रकार आपके शरीरमें इतने बाण लगे हैं कि कहीं एक अंगुल भी जगह नहीं रह गयी है। वे सभी बाण मर्म-स्थानोंमें धँस गये हैं और उनसे शरीरका स्नायु-बन्धन छिन्न-भिन्न हो गया है। इस अवस्थामें पृथ्वीपर पड़ा हुआ आपका
यह श्याम शरीर, जिसपर रक्तकी अरुण छटा छा रही है, वज्रकी मारसे चूर-चूर होकर बिखरे हुए पर्वतके समान जान पड़ता है॥
‘नाथ! यह स्वप्न है या सत्य। हाय! आप श्रीरामके हाथसे कैसे मारे गये? आप तो मृत्युकी भी मृत्यु थे; फिर स्वयं ही मृत्युके अधीन कैसे हो गये?॥
‘आपने तीनों लोकोंकी सम्पत्तिका उपभोग किया और त्रिलोकीके प्राणियोंको महान् उद्वेगमें डाल दिया था। आप लोकपालोंपर भी विजय पा चुके थे। आपने कैलास-पर्वतके साथ ही भगवान् शङ्करको भी उठा लिया था तथा बड़े-बड़े अभिमानी वीरोंको युद्धमें बंदी बनाकर अपने पराक्रमको प्रकट किया था॥ ४८-४९॥
‘आपने समस्त संसारको क्षोभमें डाला, साधु पुरुषोंकी हिंसा की और शत्रुओंके समीप बलपूर्वक अहंकारपूर्ण बातें कहीं॥ ५०॥
‘भयानक पराक्रम करनेवाले विपक्षियोंको मारकर अपने पक्षके लोगों और सेवकोंकी रक्षा की। दानवोंके सरदारों और हजारों यक्षोंको भी मौतके घाट उतारा॥ ५१॥
‘आपने समराङ्गणमें निवातकवच नामक दानवोंका भी दमन किया, बहुत-से यज्ञ नष्ट कर डाले तथा आत्मीय जनोंकी सदा ही रक्षा की॥ ५२॥
‘आप धर्मकी व्यवस्थाको तोड़नेवाले तथा संग्राममें मायाकी सृष्टि करनेवाले थे। देवताओं, असुरों और मनुष्योंकी कन्याओंको इधर-उधरसे हर लाते थे॥ ५३॥
‘आप शत्रुकी स्त्रियोंको शोक प्रदान करनेवाले, स्वजनोंके नेता, लङ्कापुरीके रक्षक, भयानक कर्म करनेवाले तथा हम सब लोगोंको कामोपभोगका सुख देनेवाले थे। ऐसे प्रभावशाली तथा रथियोंमें श्रेष्ठ अपने प्रियतम पतिको श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा धराशायी किया गया देखकर भी जो मैं अबतक इस शरीरको धारण कर रही हूँ, प्रियतमके मारे जानेपर भी जी रही हूँ—यह मेरी पाषाणहृदयताका परिचायक है॥ ५४-५५ १/२॥
‘राक्षसराज! आप तो बहुमूल्य पलंगोंपर शयन करते थे, फिर यहाँ धरतीपर धूलिमें लिपटे हुए क्यों सो रहे हैं?॥ ५६ १/२॥
‘जब लक्ष्मणने युद्धमें मेरे बेटे इन्द्रजित्को मारा था, उस समय मुझे गहरा आघात पहुँचा था और आज आपका वध होनेसे तो मैं मार ही डाली गयी॥ ५७ १/२॥
‘अब मैं बन्धुजनोंसे हीन, आप-जैसे स्वामीसे रहित तथा कामभोगोंसे वञ्चित होकर अनन्त वर्षोंतक शोकमें ही डूबी रहूँगी॥ ५८ १/२ ॥
‘राजन्! आज आप जिस अत्यन्त दुर्गम एवं विशाल मार्गपर गये हैं, वहीं मुझ दुखियाको भी ले चलिये। मैं आपके बिना जीवित नहीं रह सकूँगी॥
‘हाय! मुझ असहायाको यहीं छोड़कर आप क्यों अन्यत्र चले जाना चाहते हैं? मैं दीन अभागिनी होकर आपके लिये रो रही हूँ। आप मुझसे बोलते क्यों नहीं?॥ ६० १/२ ॥
‘प्रभो! आज मेरे मुँहपर घूँघट नहीं है। मैं नगरद्वार से पैदल ही चलकर यहाँ आयी हूँ। इस दशामें मुझे देखकर आप क्रोध क्यों नहीं करते हैं?॥ ६१ १/२ ॥
‘आप अपनी स्त्रियोंसे बड़ा प्रेम करते थे। आज आपकी सभी स्त्रियाँ लाज छोड़कर, परदा हटाकर बाहर निकल आयी हैं। इन्हें देखकर आपको क्रोध क्यों नहीं होता?॥ ६२ १/२ ॥
‘नाथ! आपकी क्रीडासहचरी यह मन्दोदरी आज अनाथ होकर विलाप कर रही है। आप इसे आश्वासन क्यों नहीं देते अथवा अधिक आदर क्यों नहीं करते?॥
‘राजन्! आपने बहुत-सी कुलललनाओंको, जो गुरुजनोंकी सेवामें लगी रहनेवाली, धर्मपरायणा तथा पतिव्रता थीं, विधवा बनाया और उनका अपमान किया था; अतः उस समय उन्होंने शोकसे संतप्त होकर आपको शाप दे दिया था, उसीका यह फल है कि आपको शत्रु एवं मृत्युके अधीन होना पड़ा है॥ ६४-६५ १/२ ॥
‘महाराज! पतिव्रताओंके आँसू इस पृथ्वीपर व्यर्थ नहीं गिरते, यह कहावत आपके ऊपर प्रायः ठीक-ठीक घटी है॥ ६६ १/२ ॥
‘राजन्! आप तो अपने तेजसे तीनों लोकोंको आक्रान्त करके अपनेको बड़ा शूरवीर मानते थे; फिर भी परायी स्त्रीको चुरानेका यह नीच काम आपने कैसे किया?॥ ६७ १/२ ॥
‘मायामय मृगके बहाने श्रीरामको आश्रमसे दूर हटाया और लक्ष्मणको भी अलग किया। उसके बाद आप श्रीरामपत्नी सीताको चुराकर यहाँ ले आये; यह कितनी बड़ी कायरता है॥ ६८ १/२ ॥
‘युद्धमें कभी आपने कायरता दिखायी हो, यह मुझे याद नहीं पड़ता; परंतु भाग्यके फेरसे उस दिन सीताका हरण करते समय निश्चय ही आपमें कायरता आ गयी थी, जो आपके निकट
विनाशकी सूचना दे रही थी॥ ६९ १/२ ॥
‘महाबाहो! मेरे देवर विभीषण सत्यवादी, भूत और भविष्यके ज्ञाता तथा वर्तमानको भी समझनेमें कुशल हैं। उन्होंने हरकर लायी हुई मिथिलेशकुमारी सीताको देखकर मन-ही-मन कुछ विचार किया और अन्तमें लम्बी साँस छोड़कर कहा—अब प्रधान-प्रधान राक्षसोंके विनाशका समय उपस्थित हो गया है। उनकी यह बात ठीक निकली॥ ७०-७१ १/२ ॥
‘काम और क्रोधसे उत्पन्न आपके आसक्तिविषयक दोषके कारण यह सारा ऐश्वर्य नष्ट हो गया और जड़मूलका नाश करनेवाला यह महान् अनर्थ प्राप्त हुआ। आज आपने समस्त राक्षसकुलको अनाथ कर दिया॥
‘आप अपने बल और पुरुषार्थके लिये विख्यात थे, अतः आपके लिये शोक करना मेरे लिये उचित नहीं है, तथापि स्त्रीस्वभावके कारण मेरे हृदयमें दीनता आ गयी है॥ ७४ ॥
‘आप अपना पुण्य और पाप साथ लेकर अपनी वीरोचित गतिको प्राप्त हुए हैं। आपके विनाशसे मैं महान् दुःखमें पड़ गयी हूँ; इसलिये बारम्बार अपने ही लिये शोक करती हूँ॥ ७५ ॥
‘महाराज दशानन! हित चाहनेवाले सुहृदों तथा बन्धुओंने जो आपसे सम्पूर्णतः हितकी बातें कही थीं, उन्हें आपने अनसुनी कर दिया॥ ७६ ॥
‘विभीषणका कथन भी युक्ति और प्रयोजनसे पूर्ण था। विधिपूर्वक आपके सामने प्रस्तुत किया गया था। वह कल्याणकारी तो था ही, बहुत ही सौम्य भाषामें कहा गया था; किंतु उस युक्तियुक्त बातको भी आपने नहीं माना॥ ७७ ॥
‘आप अपने बलके घमंडमें मतवाले हो रहे थे; अतः मारीच, कुम्भकर्ण तथा मेरे पिताकी कही हुई बात भी आपने नहीं मानी। उसीका यह ऐसा फल आपको प्राप्त हुआ है॥ ७८ ॥
‘प्राणनाथ! आपका नील मेघके समान श्याम वर्ण है। आप शरीरपर पीत वस्त्र और बाँहोंमें सुन्दर बाजूबंद धारण करनेवाले हैं। आज खूनसे लथपथ हो अपने शरीरको सब ओर छितराकर यहाँ क्यों सो रहे हैं?॥
‘मैं शोकसे पीड़ित हो रही हूँ और आप गहरी नींदमें सोये हुए पुरुषकी भाँति मेरी बातका जवाब नहीं दे रहे हैं। नाथ! ऐसा क्यों हो रहा है?॥ ७९ १/२ ॥
‘मैं महान् पराक्रमी, युद्धकुशल और समरभूमिसे पीछे न हटनेवाले सुमाली नामक राक्षसकी दौहित्री (नतिनी) हूँ। आप मुझसे बोलते क्यों नहीं हैं॥ ८० १/२ ॥
‘राक्षसराज! उठिये, उठिये। श्रीरामके द्वारा आपका नूतन पराभव किया गया है तो भी आप सो कैसे रहे हैं? आज ही ये सूर्यकी किरणें लङ्कामें निर्भय होकर प्रविष्ट हुई हैं॥ ८१ १/२ ॥
‘वीरवर! आप समरभूमिमें जिस सूर्यतुल्य तेजस्वी परिघके द्वारा शत्रुओंका संहार किया करते थे, वज्रधारी इन्द्रके वज्रकी भाँति जो सदा आपके द्वारा पूजित हुआ था, रणभूमिमें बहुसंख्यक शत्रुओंके प्राण लेनेवाला था और जिसे सोनेकी जालीसे विभूषित किया गया था, आपका वह परिघ श्रीरामके बाणोंसे सहस्रों टुकड़ोंमें विभक्त होकर इधर-उधर बिखरा पड़ा है॥ ८२-८३ १/२ ॥
‘प्राणनाथ! आप अपनी प्यारी पत्नीकी भाँति रणभूमिका आलिङ्गन करके क्यों सो रहे हैं और किस कारणसे मुझे अप्रिय-सी मानकर मुझसे बोलनातक नहीं चाहते हैं?॥ ८४ १/२ ॥
‘आपकी मृत्यु हो जानेपर भी मेरे शोकपीड़ित हृदयके हजारों टुकड़े नहीं हो जाते; अतः मुझ पाषाणहृदया नारीको धिक्कार है’॥ ८५ १/२ ॥
इस प्रकार विलाप करती हुई मन्दोदरीके नेत्रोंमें आँसू भरे हुए थे। उसका हृदय स्नेहसे द्रवीभूत हो रहा था। वह रोती-रोती सहसा मूर्च्छित हो गयी और उसी अवस्थामें रावणकी छातीपर गिर पड़ी। रावणके वक्षःस्थलपर मन्दोदरीकी वैसी ही शोभा हो रही थी, जैसे संध्याकी लालीसे रँगे हुए बादलमें दीप्तिमती विद्युत् चमक रही हो॥ ८६-८७ १/२ ॥
उसकी सौतें भी शोकसे अत्यन्त आतुर हो रही थीं, उन्होंने उसे उस अवस्थामें देखकर उठाया और स्वयं भी रोते-रोते जोर-जोरसे विलाप करती हुई मन्दोदरीको धीरज बँधाया॥ ८८ १/२ ॥
वे बोलीं—‘महारानी! क्या आप नहीं जानतीं कि संसारका स्वरूप अस्थिर है। दशा बदल जानेपर राजाओंकी लक्ष्मी स्थिर नहीं रहती’॥ ८९ १/२ ॥
उनके ऐसा कहनेपर मन्दोदरी फूट-फूटकर रोने लगी। उस समय उसके दोनों स्तन और उज्ज्वल मुख आँसुओंसे नहा उठे थे॥ ९० १/२ ॥
इसी समय श्रीरामचन्द्रजीने विभीषणसे कहा— ‘इन स्त्रियोंको धैर्य बँधाओ और अपने भाईका दाहसंस्कार करो’॥ ९१ १/२ ॥
यह सुनकर बुद्धिमान् विभीषणने (श्रीरामका अभिप्राय जाननेके उद्देश्यसे) बुद्धिसे सोच-विचारकर उनसे यह धर्म और अर्थसे युक्त विनयपूर्ण तथा हितकर बात कही—॥ ९२ १/२ ॥
‘भगवन्! जिसने धर्म और सदाचारका त्याग कर दिया था, जो क्रूर, निर्दयी, असत्यवादी तथा परायी स्त्रीका स्पर्श करनेवाला था, उसका दाहसंस्कार करना मैं उचित नहीं समझता हूँ॥ ९३ १/२ ॥
‘सबके अहितमें संलग्न रहनेवाला यह रावण भाईके रूपमें मेरा शत्रु था। यद्यपि ज्येष्ठ होनेसे गुरुजनोचित गौरवके कारण वह मेरा पूज्य था, तथापि वह मुझसे सत्कार पानेयोग्य नहीं है॥ ९४ १/२ ॥
‘श्रीराम! मेरी यह बात सुनकर संसारके मनुष्य मुझे क्रूर अवश्य कहेंगे; परंतु जब रावणके दुर्गुणोंको भी सुनेंगे, तब सब लोग मेरे इस विचारको उचित ही बतायेंगे’॥ ९५ १/२ ॥
यह सुनकर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी बड़े प्रसन्न हुए। वे बातचीत करनेमें बड़े प्रवीण थे; अतः बातोंका अभिप्राय समझनेवाले विभीषणसे इस प्रकार बोले— ॥ ९६ १/२ ॥
‘राक्षसराज! मुझे तुम्हारा भी प्रिय करना है, क्योंकि तुम्हारे ही प्रभावसे मेरी जीत हुई है। अवश्य ही मुझे तुमसे उचित बात कहनी चाहिये; अतः सुनो॥
‘यह निशाचर भले ही अधर्मी और असत्यवादी रहा हो; परंतु संग्राममें सदा ही तेजस्वी, बलवान् तथा शूरवीर रहा है॥ ९८ १/२ ॥
‘सुना जाता है—इन्द्र आदि देवता भी इसे परास्त नहीं कर सके थे। समस्त लोकोंको रुलानेवाला रावण बल-पराक्रमसे सम्पन्न तथा महामनस्वी था॥ ९९ १/२ ॥
‘वैर मरनेतक ही रहता है। मरनेके बाद उसका अन्त हो जाता है। अब हमारा प्रयोजन भी सिद्ध हो चुका है, अतः इस समय जैसे यह तुम्हारा भाई है, वैसे ही मेरा भी है; इसलिये इसका दाहसंस्कार करो॥ १०० १/२ ॥
‘महाबाहो! धर्मके अनुसार रावण तुम्हारी ओरसे शीघ्र ही विधिपूर्वक दाहसंस्कार प्राप्त करनेके योग्य है। ऐसा करनेसे तुम यशके भागी होओगे’॥ १०१ १/२ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके इस वचनको सुनकर विभीषण युद्धमें मारे गये अपने भाई रावणके दाहसंस्कारकी शीघ्रतापूर्वक तैयारी करने लगे॥ १०२ १/२ ॥
राक्षसराज विभीषणने लङ्कापुरीमें प्रवेश करके रावणके अग्निहोत्रको शीघ्र ही विधिपूर्वक समाप्त किया॥
इसके बाद शकट, लकड़ी, अग्निहोत्रकी अग्नियां, यज्ञ करानेवाले पुरोहित, चन्दनकाष्ठ, अन्य विविध प्रकारकी लकड़ियां, सुगन्धित अगर, अन्यान्य सुन्दर गन्धयुक्त पदार्थ, मणि, मोती और मूँगा—इन सब वस्तुओंको उन्होंने एकत्र किया॥ १०४-१०५ १/२ ॥
फिर दो ही घड़ीमें राक्षसोंसे घिरे हुए वे शीघ्र वहाँसे चले आये। तदनन्तर माल्यवान्के साथ मिलकर उन्होंने दाहसंस्कारकी तैयारीका सारा कार्य पूर्ण किया॥
भाँति-भाँतिके वाद्यघोषोंद्वारा स्तुति करनेवाले मागधोंने जिसका अभिनन्दन किया था, राक्षसराज रावणके उस शवको रेशमी वस्त्रसे ढककर उसे सोनेके दिव्य विमानमें रखनेके पश्चात् राक्षसजातीय ब्राह्मण वहाँ नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए खड़े हो गये॥ १०७-१०८ ॥
उस शिबिकाको विचित्र पताकाओं तथा फूलोंसे सजाया गया था। जिससे वह विचित्र शोभा धारण करती थी। विभीषण आदि राक्षस उसे कंधेपर उठाकर तथा अन्य सब लोग हाथमें सूखे काठ लिये दक्षिण दिशामें श्मशानभूमिकी ओर चले॥ १०९ १/२ ॥
यजुर्वेदीय याजकोंद्वारा ढोयी जाती हुई त्रिविध अग्नियां प्रज्वलित हो उठीं। वे सब कुण्डमें रखी हुई थीं और पुरोहितगण उन्हें लेकर शवके आगे-आगे चल रहे थे॥
अन्तःपुरकी सारी स्त्रियाँ रोती हुई तुरंत ही शवके पीछे-पीछे चल पड़ीं। वे सब ओर लड़खड़ाती चलती थीं॥ १११ १/२ ॥
आगे जाकर रावणके विमानको एक पवित्र स्थानमें रखकर अत्यन्त दुःखी हुए विभीषण आदि राक्षसोंने मलय-चन्दनकाष्ठ, पद्मक, उशीर (खस) तथा अन्य प्रकारके चन्दनोंद्वारा वेदोक्त विधिसे चिता बनायी और उसके ऊपर रंकु नामक मृगका चर्म बिछाया॥
उसके ऊपर राक्षसराजके शवको सुलाकर उन्होंने उत्तम विधिसे उसका पितृमेध (दाहसंस्कार) किया। उन्होंने चिताके दक्षिण-पूर्वमें वेदी बनाकर उसपर यथास्थान अग्निको स्थापित किया था। फिर दधिमिश्रित घीसे भरी हुई स्रुवा रावणके कंधेपर रखी। इसके बाद पैरोंपर शकट और जाँघोंपर उलूखल रखा॥ ११४-११५ ॥
तथा काष्ठके सभी पात्र, अरणि, उत्तरारणि और मूसल आदिको भी यथास्थान रख दिया॥ ११६ ॥
वेदोक्त विधि और महर्षियोंद्वारा रचित कल्पसूत्रोंमें बतायी गयी प्रणालीसे वहाँ सारा कार्य हुआ। राक्षसोंने (राक्षसोंकी रीति के अनुसार) मेध्य पशुका हनन करके राजा रावणकी
चितापर फैलाये हुए मृगचर्मको घीसे तर कर दिया, फिर रावणके शवको चन्दन और फूलोंसे अलंकृत करके वे राक्षस मन-ही-मन दुःखका अनुभव करने लगे॥ ११७-११८ ॥
फिर विभीषणके साथ अन्यान्य राक्षसोंने भी चितापर नाना प्रकारके वस्त्र और लावा बिखेरे। उस समय उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह चली॥ ११९ ॥
तदनन्तर विभीषणने चितामें विधिके अनुसार आग लगायी। उसके बाद स्नान करके भीगे वस्त्र पहने हुए ही उन्होंने तिल, कुश और जलके द्वारा विधिवत् रावणको जलाञ्जलि दी। तत्पश्चात् रावणकी स्त्रियोंको बारम्बार सान्त्वना देकर उनसे घर चलनेके लिये अनुनय-विनय की॥ १२०-१२१ ॥
‘महलमें चलो’ यह विभीषणका आदेश सुनकर वे सारी स्त्रियाँ नगरमें चली गयीं। स्त्रियोंके पुरीमें प्रवेश कर जानेपर राक्षसराज विभीषण श्रीरामचन्द्रजीके पास आकर विनीतभावसे खड़े हो गये॥ १२२ ॥
श्रीराम भी लक्ष्मण, सुग्रीव तथा समस्त सेनाके साथ शत्रु्का वध करके बहुत प्रसन्न थे। ठीक उसी तरह, जैसे वज्रधारी इन्द्र वृत्रासुरको मारकर प्रसन्नताका अनुभव करने लगे थे॥ १२३ ॥
तदनन्तर इन्द्रके दिये हुए धनुष, बाण और विशाल कवचको त्यागकर तथा शत्रु्का दमन कर देनेके कारण रोषको भी छोड़कर शत्रुसूदन श्रीरामने शान्तभाव धारण कर लिया॥ १२४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ ग्यारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १११॥
एक सौ बारहवाँ सर्ग
एक सौ बारहवाँ सर्ग
विभीषणका राज्याभिषेक और श्रीरघुनाथजीका हनुमान्जीके द्वारा सीताके पास संदेश भेजना
देवता, गन्धर्व और दानवगण रावण-वधका दृश्य देखकर उसीकी शुभ चर्चा करते हुए अपने-अपने विमानसे यथास्थान लौट गये॥ १ ॥
रावणके भयंकर वध, श्रीरघुनाथजीके पराक्रम, वानरोंके उत्तम युद्ध, सुग्रीवकी मन्त्रणा, लक्ष्मण और हनुमान्जीकी श्रीरामके प्रति भक्ति, उन दोनोंके पराक्रम, सीताके पातिव्रत्य तथा हनुमान्जीके पुरुषार्थकी बातें कहते हुए वे महाभाग देवता आदि जैसे आये थे, उसी तरह प्रसन्नतापूर्वक चले गये॥ २-३ १/२ ॥
इसके बाद महाबाहु भगवान् श्रीरामने इन्द्रके दिये हुए दिव्य रथको, जो अग्निके समान देदीप्यमान था, ले जानेकी आज्ञा देकर मातलिका बड़ा सम्मान किया॥ ४ १/२ ॥
तब इन्द्रसारथि मातलि श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञासे उस दिव्य रथपर बैठकर पुनः दिव्य लोकको ही चले गये॥ ५ १/२ ॥
मातलिके रथसहित देवलोकको चले जानेपर रथियोंमें श्रेष्ठ श्रीरामने बड़ी प्रसन्नताके साथ सुग्रीवको हृदयसे लगा लिया॥ ६ १/२ ॥
सुग्रीवका आलिङ्गन करनेके पश्चात् जब उन्होंने लक्ष्मणकी ओर दृष्टि डाली, तब लक्ष्मणने उनके चरणोंमें प्रणाम किया। फिर वानरसैनिकोंसे सम्मानित हो वे सेनाकी छावनीपर लौट आये॥ ७ १/२ ॥
वहाँ आकर रघुनाथजीने अपने समीप खड़े हुए बल एवं उद्दीप्त तेजसे सम्पन्न सुमित्रानन्दन लक्ष्मणसे कहा— ‘सौम्य! अब तुम लङ्कामें जाकर इन विभीषणका राज्याभिषेक करो; क्योंकि ये मेरे प्रेमी, भक्त तथा पहले उपकार करनेवाले हैं॥ ८-९ १/२ ॥
‘सौम्य! यह मेरी बड़ी इच्छा है कि रावणके छोटे भाई इन विभीषणको मैं लङ्काके राज्यपर अभिषिक्त देखूँ’॥
महात्मा श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर सुमित्राकुमार लक्ष्मणको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने ‘बहुत अच्छा’ कहकर सोनेका घड़ा हाथमें लिया और उसे वानरयूथ पतियोंके हाथमें
देकर उन महान् शक्तिशाली तथा मनके समान वेगवाले वानरोंको समुद्रका जल ले आनेकी आज्ञा दी॥ ११-१२ १/२ ॥
वे मनके समान वेगशाली श्रेष्ठ वानर तुरंत ही गये और समुद्रसे जल लेकर लौट आये॥ १३ १/२ ॥
तदनन्तर लक्ष्मणने एक घट जल लेकर उसे उत्तम आसनपर स्थापित कर दिया और उस घटके जलसे विभीषणका वेदोक्त विधिके अनुसार लङ्काके राजपदपर अभिषेक किया। यह अभिषेक श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञासे हुआ था। उस समय राक्षसोंके बीचमें सुहृदोंसे घिरे हुए विभीषण राजसिंहासनपर विराजमान थे। लक्ष्मणके बाद सभी राक्षसों और वानरोंने भी उनका अभिषेक किया॥
वे अत्यन्त प्रसन्न होकर श्रीरामकी ही स्तुति करने लगे। राक्षसराज विभीषणको लङ्काके राज्यपर अभिषिक्त देख उनके मन्त्री और प्रेमी राक्षस बहुत प्रसन्न हुए। साथ ही लक्ष्मणसहित श्रीरघुनाथजीको भी बड़ी प्रसन्नता हुई॥ १७-१८ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके दिये हुए उस विशाल राज्यको पाकर विभीषण अपनी प्रजाको सान्त्वना दे श्रीरामचन्द्रजीके पास आये॥ १९ ॥
उस समय हर्षसे भरे हुए नगरनिवासी निशाचर विभीषणको अर्पित करनेके लिये दही, अक्षत, मिठाई, लावा और फूल लाये॥ २० ॥
दुर्धर्ष पराक्रमी विभीषणने वे सब मङ्गलजनक माङ्गलिक वस्तुएँ लेकर श्रीराम और लक्ष्मणको भेंट की॥ २१ ॥
श्रीरघुनाथजीने विभीषणको कृतकार्य एवं सफलमनोरथ देख उनकी प्रसन्नताके लिये ही उन सब माङ्गलिक वस्तुओंको ले लिया॥ २२ ॥
तत्पश्चात् उन्होंने हाथ जोड़कर विनीतभावसे खड़े हुए पर्वताकार वीर वानर हनुमान्जीसे कहा— ॥ २३ ॥
‘सौम्य! तुम इन महाराज विभीषणकी आज्ञा ले लङ्कानगरीमें प्रवेश करके मिथिलेशकुमारी सीतासे उनका कुशल-समाचार पूछो॥ २४ ॥
‘साथ ही उन विदेहराजकुमारीसे सुग्रीव और लक्ष्मणसहित मेरा कुशल-समाचार निवेदन करो। वक्ताओंमें श्रेष्ठ हरीश्वर! तुम वैदेहीको यह प्रिय समाचार सुना दो कि रावण युद्धमें मारा
गया। तत्पश्चात् उनका संदेश लेकर लौट आओ'॥ २५-२६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ बारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११२ ॥
एक सौ तेरहवाँ सर्ग
एक सौ तेरहवाँ सर्ग
हनुमान्जीका सीताजीसे बातचीत करके लौटना और उनका संदेश श्रीरामको सुनाना
भगवान् श्रीरामका यह आदेश पाकर पवनपुत्र हनुमान्जीने निशाचरोंसे सम्मानित होते हुए लङ्कापुरीमें प्रवेश किया॥ १ ॥
पुरीमें प्रवेश करके उन्होंने विभीषणसे आज्ञा माँगी। उनकी आज्ञा मिल जानेपर हनुमान्जी अशोकवाटिकामें गये॥ २ ॥
अशोकवाटिकामें प्रवेश करके न्यायानुसार उन्होंने सीताजीको अपने आगमनकी सूचना दी। तत्पश्चात् निकट जाकर उनका दर्शन किया। वे स्नान आदिसे हीन होनेके कारण कुछ मलिन दिखायी देती थीं और सशङ्क हुईं रोहिणीके समान जान पड़ती थीं॥ ३ ॥
सीताजी आनन्दशून्य हो वृक्षके नीचे राक्षसियोंसे घिरी बैठी थीं। हनुमान्जीने शान्त और विनीतभावसे सामने जाकर उन्हें प्रणाम किया। प्रणाम करके वे चुपचाप खड़े हो गये॥ ४ ॥
महाबली हनुमान्को आया देख देवी सीता उन्हें पहचानकर मन-ही-मन प्रसन्न हुईं; किंतु कुछ बोल न सकीं। चुपचाप बैठी रहीं॥ ५ ॥
सीताके मुखपर सौम्यभाव लक्षित हो रहा था। उसे देखकर कपिश्रेष्ठ हनुमान्ने श्रीरामचन्द्रजीकी कही हुईं सब बातोंको उनसे कहना आरम्भ किया—॥ ६ ॥
‘विदेहनन्दिनि! श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण और सुग्रीवके साथ सकुशल हैं। अपने शत्रु का वध करके सफलमनोरथ हुए उन शत्रुविजयी श्रीरामने आपकी कुशल पूछी है॥
‘देवि! विभीषणकी सहायता पाकर वानरों और लक्ष्मणसहित श्रीरामने बल-विक्रमसम्पन्न रावणको युद्धमें मार डाला है॥ ८ ॥
‘धर्मको जाननेवाली देवि सीते! मैं आपको यह प्रिय संवाद सुनाता हूँ और अधिक-से-अधिक प्रसन्न देखना चाहता हूँ। आपके पातिव्रत्य-धर्मके प्रभावसे ही युद्धमें श्रीरामने यह महान् विजय प्राप्त की है। अब आप चिन्ता छोड़कर स्वस्थ हो जायँ। हमलोगोंका शत्रु रावण मारा गया और लङ्का भगवान् श्रीरामके अधीन हो गयी॥ ९-१० ॥
‘श्रीरामने आपको यह संदेश दिया है—‘देवि! मैंने तुम्हारे उद्धारके लिये जो प्रतिज्ञा की थी, उसके लिये निद्रा त्यागकर अथक प्रयत्न किया और समुद्रमें पुल बाँधकर रावणवधके द्वारा
उस प्रतिज्ञाको पूर्ण किया॥ ११ ॥
‘अब तुम अपनेको रावणके घरमें वर्तमान समझकर भयभीत न होना; क्योंकि लङ्काका सारा ऐश्वर्य विभीषणके अधीन कर दिया गया है। अब तुम अपने ही घरमें हो। ऐसा जानकर निश्चिन्त होकर धैर्य धारण करो। देवि! ये विभीषण भी हर्षसे भरकर आपके दर्शनके लिये उत्कण्ठित हो अभी यहाँ आ रहे हैं’॥ १२-१३ ॥
हनुमान्जीके इस प्रकार कहनेपर चन्द्रमुखी सीतादेवीको बड़ा हर्ष हुआ। हर्षसे उनका गला भर आया और वे कुछ बोल न सकीं॥ १४ ॥
सीताजीको मौन देख कपिवर हनुमान्जी बोले— ‘देवि! आप क्या सोच रही हैं? मुझसे बोलती क्यों नहीं’॥ १५ ॥
हनुमान्जीके इस प्रकार पूछनेपर धर्मपरायणा सीतादेवी अत्यन्त प्रसन्न हो आनन्दके आँसू बहाती हुईं गद्गद वाणीमें बोलीं— ॥ १६ ॥
‘अपने स्वामीकी विजयसे सम्बन्ध रखनेवाला यह प्रिय संवाद सुनकर मैं आनन्दविभोर हो गयी थी; इसलिये कुछ देरतक मेरे मुँहसे बात नहीं निकल सकी है॥ १७ ॥
‘वानरवीर! ऐसा प्रिय समाचार सुनानेके कारण मैं तुम्हें कुछ पुरस्कार देना चाहती हूँ; किंतु बहुत सोचनेपर भी मुझे इसके योग्य कोई वस्तु दिखायी नहीं देती॥ १८ ॥
‘सौम्य वानरवीर! इस भूमण्डलमें मैं कोई ऐसी वस्तु नहीं देखती, जो इस प्रिय संवादके अनुरूप हो और जिसे तुम्हें देकर मैं संतुष्ट हो सकूँ॥ १९ ॥
‘सोना, चाँदी, नाना प्रकारके रत्न अथवा तीनों लोकोंका राज्य भी इस प्रिय समाचारकी बराबरी नहीं कर सकता’॥ २० ॥
विदेहनन्दिनीके ऐसा कहनेपर वानरवीर हनुमान्जीको बड़ा हर्ष हुआ। वे सीताजीके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गये और इस प्रकार बोले— ॥ २१ ॥
‘पतिकी विजय चाहनेवाली और पतिके ही प्रिय एवं हितमें सदा संलग्न रहनेवाली सती-साध्वी देवि! आपके ही मुँहसे ऐसा स्नेहपूर्ण वचन निकल सकता है (आपके इस वचनसे मैं सब कुछ पा गया)॥ २२ ॥
‘सौम्ये! आपका यह वचन सारगर्भित और स्नेहयुक्त है, अतः भाँति-भाँतिकी रत्नराशि और देवताओंके राज्यसे भी बढ़कर है॥ २३ ॥
‘मैं जब यह देखता हूँ कि श्रीरामचन्द्रजी अपने शत्रु का वध करके विजयी हो गये और स्वयं सकुशल हैं, तब मैं यह अनुभव करता हूँ कि मेरे सारे प्रयोजन सिद्ध हो गये—देवताओंके राज्य आदि सभी उत्कृष्ट गुणोंसे युक्त पदार्थ मुझे मिल गये’॥ २४ ॥
उनकी बात सुनकर मिथिलेशकुमारी जानकीने उन पवनकुमारसे यह परम सुन्दर वचन कहा —॥ २५ ॥
‘वीरवर! तुम्हारी वाणी उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न, माधुर्य गुणसे भूषित तथा बुद्धिके आठ* अङ्गों (गुणों)-से अलंकृत है। ऐसी वाणी केवल तुम्हीं बोल सकते हो॥ २६ ॥
‘तुम वायुदेवताके प्रशंसनीय पुत्र तथा परम धर्मात्मा हो। शारीरिक बल, शूरता, शास्त्रज्ञान, मानसिक बल, पराक्रम, उत्तम दक्षता, तेज, क्षमा, धैर्य, स्थिरता, विनय तथा अन्य बहुत-से सुन्दर गुण केवल तुम्हींमें एक साथ विद्यमान हैं, इसमें संशय नहीं है’॥ २७-२८ ॥
तदनन्तर सीताके सामने बिना किसी घबराहटके हाथ जोड़कर विनीतभावसे खड़े हुए हनुमान्जी पुनः हर्षपूर्वक उनसे बोले—॥ २९ ॥
‘देवि! यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं इन समस्त राक्षसियोंको, जो पहले आपको बहुत डराती-धमकाती रही हैं, मार डालना चाहता हूँ॥ ३० ॥
‘आप-जैसी पतिव्रता देवी अशोकवाटिका में बैठकर क्लेश भोग रही थीं और ये भयंकर रूप एवं आचारसे युक्त अत्यन्त क्रूर दृष्टिवाली विकरालमुखी क्रूर राक्षसियाँ आपको बारम्बार कठोर वचनोंद्वारा डाँटती-फटकारती रहती थीं। रावणकी आज्ञासे ये जैसी-जैसी बातें आपको सुनाती थीं, उन सबको मैंने यहाँ रहकर सुना है॥ ३१-३२ ॥
‘ये सब-की-सब विकराल, विकट आकारवाली, क्रूर और अत्यन्त दारुण हैं। इनके नेत्रों और केशोंसे भी क्रूरता टपकती है। मैं तरह-तरहके आघातोंद्वारा इन सबका वध कर डालना चाहता हूँ॥ ३३ ॥
‘मेरी इच्छा है कि मुक्कों, लातों, विशाल भुजाओं—थप्पड़ों, पिण्डलियों और घुटनोंकी मारसे इन्हें घायल करके इनके दाँत तोड़ दूँ, इनकी नाक और कान काट लूँ तथा इनके सिरके बाल नोचूँ। यशस्विनि! इस तरह बहुत-से प्रहारोंद्वारा इन सबको पीटकर क्रूरतापूर्ण बातें करनेवाली इन अप्रियकारिणी राक्षसियोंको पटक-पटककर मार डालूँ। जिन-जिन भयानक रूपवाली राक्षसियोंने पहले आपको डाँट बतायी है, उन सबको मैं अभी मौतके घाट उतार दूँगा। इसके लिये आप मुझे केवल वर (आज्ञा) दे दें’॥ ३४—३६ १/२ ॥
हनुमान्जीके ऐसा कहनेपर करुणामय स्वभाववाली दीनवत्सला सीताने मन-ही-मन बहुत कुछ सोचविचार करके उनसे इस प्रकार कहा— ॥ ३७ १/२ ॥
‘कपिश्रेष्ठ! ये बेचारी राजाके आश्रयमें रहनेके कारण पराधीन थीं। दूसरोंकी आज्ञासे ही सब कुछ करती थीं, अतः स्वामीकी आज्ञाका पालन करनेवाली इन दासियोंपर कौन क्रोध करेगा? मेरा भाग्य ही अच्छा नहीं था तथा मेरे पूर्वजन्मके दुष्कर्म अपना फल देने लगे थे, इसीसे मुझे यह सब कष्ट प्राप्त हुआ है; क्योंकि सभी प्राणी अपने किये हुए शुभाशुभ कर्मोंका ही फल भोगते हैं, अतः महाबाहो! तुम इन्हें मारनेकी बात न कहो। मेरे लिये दैवका ही ऐसा विधान था॥ ३८—४० ॥
‘मुझे अपने पूर्वकर्मजनित दशाके योगसे यह सारा दुःख निश्चितरूपसे भोगना ही था; इसलिये रावणकी दासियोंका यदि कुछ अपराध हो भी तो उसे मैं क्षमा करती हूँ; क्योंकि इनके प्रति दयाके उद्रेकसे मैं दुर्बल हो रही हूँ॥ ४१ ॥
‘पवनकुमार! उस राक्षसकी आज्ञासे ही ये मुझे धमकाया करती थीं। जबसे वह मारा गया है, तबसे ये बेचारी मुझे कुछ नहीं कहती हैं। इन्होंने डराना-धमकाना छोड़ दिया है॥ ४२ ॥
‘वानरवीर! इस विषयमें एक पुराना धर्मसम्मत श्लोक है, जिसे किसी व्याघ्रके निकट एक रीछने कहा था*। वह श्लोक मैं बता रही हूँ' सुनो॥ ४३ ॥
‘श्रेष्ठ पुरुष दूसरेकी बुराऽइ करनेवाले पापियोंके पापकर्मको नहीं अपनाते हैं—बदलेमें उनके साथ स्वयं भी पापपूर्ण बर्ताव नहीं करना चाहते हैं, अतः अपनी प्रतिज्ञा एवं सदाचारकी रक्षा ही करनी चाहिये; क्योंकि साधुपुरुष अपने उत्तम चरित्रसे ही विभूषित होते हैं। सदाचार ही उनका आभूषण है' ॥ ४४ ॥
‘श्रेष्ठ पुरुषको चाहिये कि कोऽइ पापी हों या पुण्यात्मा अथवा वे वधके योग्य अपराध करनेवाले ही क्यों न हों, उन सबपर दया करें; क्योंकि ऐसा कोऽइ भी प्राणी नहीं है, जिससे कभी अपराध होता ही न हो॥ ४५ ॥
‘जो लोगोंकी हिंसामें ही रमते और सदा पापका ही आचरण करते हैं, उन क्रूर स्वभाववाले पापियोंका भी कभी अमङ्गल नहीं करना चाहिये’॥ ४६ ॥
सीताजीके ऐसा कहनेपर बातचीत करनेमें कुशल हनुमान्जीने उन सती-साध्वी श्रीरामपत्नीको इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ ४७ ॥
‘देवि! आप श्रीरामकी धर्मपत्नी हैं; अतः आपका ऐसे सद्गुणोंसे सम्पन्न होना उचित ही है। अब आप अपनी ओरसे मुझे कोर्इ संदेश दें। मैं श्रीरघुनाथजीके पास जाऊँगा’॥ ४८ ॥
हनुमान्जीके ऐसा कहनेपर विदेहनन्दिनी जनकराजकिशोरी बोलीं—‘मैं अपने भक्तवत्सल स्वामीका दर्शन करना चाहती हूँ’॥ ४९ ॥
सीताजीकी यह बात सुनकर परम बुद्धिमान् पवनकुमार हनुमान्जी उन मिथिलेशकुमारीका हर्ष बढ़ाते हुए इस प्रकार बोले—॥ ५० ॥
‘देवि! जैसे शची देवराज इन्द्रका दर्शन करती हैं, उसी प्रकार आप पूर्णचन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाले उन श्रीराम और लक्ष्मणको आज देखेंगी, जिनके मित्र विद्यमान हैं और शत्रु मारे जा चुके हैं’॥ ५१ ॥
साक्षात् लक्ष्मीकी भाँति सुशोभित होनेवाली सीतादेवीसे ऐसा कहकर महातेजस्वी हनुमान्जी उस स्थानपर लौट आये, जहाँ श्रीरघुनाथजी विराजमान थे॥ ५२ ॥
वहाँसे लौटते ही कपिवर हनुमान्जीने देवराज इन्द्रके तुल्य तेजस्वी श्रीरघुनाथजीसे जनकराजकिशोरी सीताजीका दिया हुआ उत्तर क्रमशः कह सुनाया॥ ५३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ तेरहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११३ ॥
* शुश्रूषा श्रवणं चैव ग्रहणं धारणं तथा। ऊहापोहोऽर्थविज्ञानं तत्त्वज्ञानं च धीगुणाः॥
सुननेकी इच्छा, सुनना, ग्रहण करना, स्मरण रखना, ऊहा (तर्क-वितर्क), अपोह (सिद्धान्तका निश्चय), अर्थका ज्ञान होना तथा तत्त्वको समझना—ये आठ बुद्धिके गुण हैं।
*पहलेकी बात है—एक बाघने किसी व्याधका पीछा किया। व्याध भागकर एक वृक्षपर चढ़ गया। उस वृक्षपर पहलेसे ही कोर्इ रीछ बैठा हुआ था। बाघ वृक्षकी जड़के पास पहुँचकर पेड़पर बैठे हुए रीछसे बोला—‘हम और तुम दोनों ही वनके जीव हैं। यह व्याध हम दोनोंका ही शत्रु है; अतः तुम इसे वृक्षसे नीचे गिरा दो।’ रीछने उत्तर दिया—‘यह व्याध मेरे निवासस्थानपर आकर एक प्रकारसे मेरी शरण ले चुका है, इसलिये मैं इसे नीचे नहीं गिराऊँगा। यदि गिरा दूँ तो धर्मकी हानि होगी।’ ऐसा कहकर रीछ सो गया। तब बाघने व्याधसे कहा—‘देखो, इस सोये हुए रीछको नीचे गिरा दो। मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा।’ उसके ऐसा कहनेपर व्याधने उस रीछको धक्का दे दिया; परंतु रीछ अभ्यासवश दूसरी डाल पकड़कर गिरनेसे बच गया। तब बाघने रीछसे कहा—‘यह व्याध तुमको गिराना चाहता था; अतः अपराधी है। इसलिये अब इसको नीचे ढकेल दो।’ बाघके इस प्रकार बारम्बार उकसानेपर भी रीछने उस व्याधको नहीं गिराया और ‘न परः पापमादत्ते’ इस श्लोकका गान करके उसे मुँहतोड़ उत्तर दे दिया। यह प्राचीन कथा है। (रामायणभूषण-टीकासे)
एक सौ चौदहवाँ सर्ग
एक सौ चौदहवाँ सर्ग
श्रीरामकी आज्ञासे विभीषणका सीताको उनके समीप लाना और सीताका प्रियतमके मुखचन्द्रका दर्शन करना
तदनन्तर परम बुद्धिमान् वानरवीर हनुमान्जीने सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ कमलनयन श्रीरामको प्रणाम करके कहा— ॥ १ ॥
‘भगवन्! जिनके लिये इन युद्ध आदि कर्मोंका सारा उद्योग आरम्भ किया गया था, उन शोकसंतप्त मिथिलेशकुमारी सीतादेवीको आप दर्शन दें॥ २ ॥
‘वे शोकमें डूबी रहती हैं। उनके नेत्र आँसुओंसे भरे हुए हैं। आपकी विजयका समाचार सुनकर वे मिथिलेशकुमारी आपका दर्शन करना चाहती हैं॥ ३ ॥
‘पहली बार जो मैं आपका संदेश लेकर आया था, तभीसे उनका मेरे ऊपर विश्वास हो गया है कि यह मेरे स्वामीका आत्मीय जन है। उसी विश्वाससे युक्त हो उन्होंने नेत्रोंमें आँसू भरकर मुझसे कहा है कि मैं प्राणनाथका दर्शन करना चाहती हूँ’॥ ४ ॥
हनुमान्जीके ऐसा कहनेपर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी सहसा ध्यानस्थ हो गये। उनकी आँखें डबडबा आयीं और वे लम्बी साँस खींचकर भूमिकी ओर देखते हुए पास ही खड़े मेघके समान श्याम कान्तिवाले विभीषणसे बोले— ॥ ५-६ ॥
‘तुम विदेहनन्दिनी सीताको मस्तकपरसे स्नान कराकर दिव्य अङ्गराग तथा दिव्य आभूषणोंसे विभूषित करके शीघ्र मेरे पास ले आओ’ ॥ ७ ॥
श्रीरामके ऐसा कहनेपर विभीषण बड़ी उतावलीके साथ अन्तःपुरमें गये और पहले अपनी स्त्रियोंको भेजकर उन्होंने सीताको अपने आनेकी खबर दी॥ ८ ॥
इसके बाद श्रीमान् राक्षसराज विभीषणने स्वयं ही जाकर महाभाग सीताका दर्शन किया और मस्तकपर अञ्जलि बाँध विनीतभावसे कहा— ॥ ९ ॥
‘विदेहराजकुमारी! आप स्नान करके दिव्य अङ्गराग तथा दिव्य वस्त्राभूषणोंसे भूषित होकर सवारीपर बैठिये। आपका कल्याण हो। आपके स्वामी आपको देखना चाहते हैं’॥ १० ॥
उनके ऐसा कहनेपर वैदेहीने विभीषणको उत्तर दिया— ‘राक्षसराज! मैं बिना स्नान किये ही अभी पतिदेवका दर्शन करना चाहती हूँ’॥ ११ ॥
सीताकी यह बात सुनकर विभीषण बोले— 'देवि! आपके पतिदेव श्रीरामचन्द्रजीने जैसी आज्ञा दी है, आपको वैसा ही करना चाहिये'॥ १२ ॥
उनका यह वचन सुनकर पतिभक्तिसे सुरक्षित तथा पतिको ही देवता माननेवाली सती-साध्वी मिथिलेशकुमारी सीताने ‘बहुत अच्छा’ कहकर स्वामीकी आज्ञा शिरोधार्य कर ली॥ १३ ॥
तत्पश्चात् विदेहकुमारीने सिरसे स्नान करके सुन्दर शृङ्गार किया तथा बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण पहनकर वे चलनेको तैयार हो गयीं॥ १४ ॥
तब विभीषण बहुमूल्य वस्त्रोंसे आवृत्त दीप्तिमती सीतादेवीको शिबिकामें बिठाकर भगवान् श्रीरामके पास ले आये। उस समय बहुत-से निशाचर चारों ओरसे घेरकर उनकी रक्षा कर रहे थे॥ १५ ॥
भगवान् श्रीराम ध्यानस्थ हैं, यह जानकर भी विभीषण उनके पास गये और उन्हें प्रणाम करके प्रसन्नतापूर्वक बोले— ‘प्रभो! सीतादेवी आ गयी हैं’॥ १६ ॥
राक्षसके घरमें बहुत दिनोंतक निवास करनेके बाद आज सीताजी आयी हैं, यह सोच उनके आगमनका समाचार सुनकर शत्रुसूदन श्रीरघुनाथजीको एक ही समय रोष, हर्ष और दुःख प्राप्त हुआ॥ १७ ॥
तदनन्तर ‘सीता सवारीपर आयी हैं’ इस बातपर तर्क-वितर्कपूर्ण विचार करके श्रीरघुनाथजीको प्रसन्नता नहीं हुई। वे विभीषणसे इस प्रकार बोले— ॥ १८ ॥
‘सदा मेरी विजयके लिये तत्पर रहनेवाले सौम्य राक्षसराज! तुम विदेहकुमारीसे कहो, वे शीघ्र मेरे पास आयें’॥ १९ ॥
श्रीरघुनाथजीकी यह बात सुनकर धर्मज्ञ विभीषणने तुरंत वहाँसे दूसरे लोगोंको हटाना प्रारम्भ किया॥ २० ॥
पगड़ी बाँधे और अङ्गा पहिने हुए बहुत-से सिपाही हाथोंमें झाँझकी तरह बजती हुई छड़ी लिये उन वानरयोद्धाओंको हटाते हुए चारों ओर घूमने लगे॥ २१ ॥
उनके द्वारा हटाये जाते हुए रीछों, वानरों और राक्षसोंके समुदाय अन्ततोगत्वा दूर जाकर खड़े हो गये॥