भारतकोश
संग्रह पर लौटें

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

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आया न आपको। अब खामोश रहिये, और भुंभुलानेसे क्या फ़ायदा? आपने भुंभुलाकर, एक दिल न होकर, चुम्बनका सारा मज़ा मिट्टी कर दिया।

सारांश—जिस तरह चुम्बनके समय एक दिल न होनेसे चुम्बनका आनन्द नहीं आता; उसी तरह एक दिल हुए बिना समागम करनेसे समागमका कुछ भी आनन्द नहीं आता। वैसा समागम समागम नहीं—दो लाशोंका मिलना (Contact of two corpses) है।

समागमके समय दोनोंके दिलोंका एक होना बहुत ज़रूरी है; इसी ग़ज़से रतिशास्त्रके ज्ञाताओंने स्त्री-पुरुषोंके परस्पर काम जगानेकी अनेकों तरकोंबें लिखी हैं; क्योंकि बिना परस्पर काम जगाये कोई लाभ नहीं। स्त्रीके किस अङ्गमें किस दिन काम रहता है, अथवा स्त्री काममदसे किस वक्त या किस ऋतुमें मत-वाली होती है और वह काम किस तरह जगाया जाता है,—ये बातें चतुर पुरुषोंको जाननी चाहियें। काम जगानेकी सबसे अच्छी विधि चुम्बन करना अथवा स्तनोंके अगले भागों—बीठनियों, काली-काली घुण्डियोंको धीरे-धीरे मलना है। चुम्बन करते ही और बीठनियोंके धीरे-धीरे मलते ही, स्त्रीके नेत्र लाल हो जाते हैं, साँस गरम होकर बड़े जोरसे चलने लगता है और स्त्री सिस-कियाँ भरने लगती है। जब स्त्री सिसकियाँ भरने लगे और शर्म छोड़कर पुरुषसे छेड़-छाड़ करे, तब समझना चाहिये कि, काम चैतन्य हो गया। वही समय सुरत या मैथुनके लिये उत्तम है और

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वैसे समयमें ही गर्भ रह सकता है। जो पुरुष इस तरह काम चैतन्य करके काम-क्रीड़ा करता है, स्त्री उसकी क्रीत-दासी या ज़रूखरीद गुलाम हो जाती है। देखते हैं, बैल, ऊँट, घोड़े, और गधे प्रभृति पशु भी पहले चाट-चूमकर सम्भोग करते हैं, तब मनुष्योंमें तो उनसे कुछ विशेषता होनी ही चाहिये। परमात्माने उन्हें बुद्धि दी है और अनुभव की पुरुषोंने इस विषय पर “अनङ्ग-रङ्ग” “पञ्चशायक” “कोकशास्त्र” “लज्जतुल-निशा” प्रभृति अनेक ग्रन्थ लिखे हैं। शन्तरेको बन्दर बिना डोले खाता है और चतुर मनुष्य उसे डोलकर और उसका ज़ीरा निकालकर खाता है। प्रत्येक कामके करनेकी कुछ खास-खास तरकीबें हैं। तरकीबोंके साथ जो आनन्द आता है, वह बिना तरकीबोंके नहीं आता। *

हमें फिर कहना पड़ता है कि, बिना तरकीब जाने जो भी काम किये जाते हैं, उनमें सफलता नहीं होती। चतुरा और फूहड़ दोनों ही तरहकी स्त्रियाँ खाना पका लेती हैं, पर चतुराका बनाया हुआ खाना जैसा स्वाद और मज़ेदार होता है, वैसा फूहड़का नहीं होता। हाँ, पेट दोनों ही तरहके भोजनोंसे भर जाता है। चतुराके बनाये भोजनसे तबीयत जैसी खुश होती है, गँवारीके बनाये हुए से वैसी खुश नहीं होती। कामशास्त्रका अभ्यासी जिस तरह संभोग करता है, गँवार उस तरह कर

ॐ ये सब कोंक-सम्बन्धी विषय ज़ागर देखनेका शौक है; तो ज़ागर हमारी किसी “रूपाध्वर(ज्ञा)” देखे। (मूल्य ३) सजिन्द्र का ३॥)

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नहीं सकता । हाँ, सन्तान दोनोंके ही हो जाती है । चतुराके बनाये हुए भोजन खानेसे रस ठीक बनता है और किसी तरहका रोग नहीं होता ; क्योंकि वह आसानीसे पच जाता है ; पर गँवारीकी मोटी-मोटी कच्ची या जली हुई रोटियोंसे अजीर्ण होता, पेटमें पीड़ा होती और पाक ठीक न होनेसे रस भी ठीक तौरसे नहीं बनता ; इसलिये बल बढ़नेके बजाय उल्टा घटता है । कामशास्त्रका अभ्यासी जो संभोग करता है, उससे स्त्री-पुरुष दोनोंको परमानन्दकी प्राप्ति होती है ; बल घटने नहीं पाता और रोग पास फटकने की हिम्मत नहीं करते । सन्तान भी सुन्दर, रूपवान, बलवान और विद्वान् तथा बुद्धिमान् होती है । किन्तु गँवार, अनजान होनेकी वजहसे, संभोगमें ऐसे काम कर बैठता है, कि जिनसे दिनरात उसका बल क्षीण होता ; प्रमेह, सोड़ाक, नपुंसकता और उपदंश आदि रोग पैदा हो जाते ; तथा जो औलाद पैदा होती है, वह भी गँवार, मूर्ख, मातापिताकी आज्ञा न माननेवाली, कुरूप और असमयमें ही मरजानेवाली पैदा होती है । इसलिये बिना कामशास्त्रका अभ्यास किये स्त्री-भोग करना, अपने जीवन को खराब करना और मृत्युको न्यौता देकर बुलाना है । किसी कविने कहा है :—

दाम्पत्यसुखसिद्धयर्थं कामशास्त्रं समभ्यसेत् । तदभ्यासादनिर्याच्यममन्दानन्दमश्नुते ।

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कामशास्त्रविहीनांनां रतिः पाशविकी मता । तदभ्यासाच्च सौख्यस्यात् केवलं दुःखमाप्नुयात् ॥

अर्थात् स्त्रीपुरुषका सुख भोगनेके लिए कामशास्त्रका अभ्यास करना जरूरी है। कामशास्त्रके अभ्याससे ही अनिर्वचनीय उत्तम आनन्द मिलता है। कामशास्त्रके बिना जाने-पढ़े जो भोग किया जाता है, वह तो पशुओंका सा सम्भोग है। वैसे सम्भोगसे सुखके बजाय दुःख ही होता है ; यानी सुख नहीं होता, केवल दुःख होता है।

और भी कहा है :—

रतिशास्त्रपरिज्ञान विमूढा ये नराधमाः ।

रतिं स्वरतिहीनायां विधिसन्ति गतायुषः ॥

श्रवश्यं मर्यां तेषां भवेदिति विनिश्चितम् ।

अतोऽपि रतिशास्त्रस्यज्ञानमावश्यकं मतम् ॥

जो गतायु नीच नराधम, कामशास्त्र न जाननेकी वजहसे, अपने तर्ह न चाहनेवाली स्त्रीसे सम्भोग करते या करना चाहते हैं, उनकी उम्र कम हो जाती है यानी वे निश्चय ही असमयमें इस दुनियासे कूच कर जाते हैं, मर जाते हैं ; इसलिये रतिशास्त्रका ज्ञान होना परमावश्यक है।

कामशास्त्रसे किन-किन बातोंका ज्ञान होता है ?

किं दाम्पत्यसुखं लोके कानि तत्साधनानिच

कुमारी परिणीता तु कीदृशी सुखदा भवेत् ॥

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के च विलम्भयोगायास्तासामिह सुखावहाः, प्रमदानां कथञ्चापि मदविद्रावरां भवेत् ॥ कथं नष्टोऽनुरागश्च प्रत्यानेयोमनीषिभिः ॥

बन्ध्यायां मृतत्सायां वात्मजातिः कथं भवेत् सतीनां वनितानाञ्च लक्षणानीह कानि च । पुंश्चलीनान्तु नारीणां परिज्ञानं कथं भवेत् ॥

तासां विचेष्टितेभ्यश्च ह्यात्मानं रचयेत् कथम् कथं शरीरं सुरतायासितन्तु विलासिनाम् । नवयौवनकालीन-सुरतत्त्वमतां बजेत् ॥

ग्रेच्छावद्भिर्भिषग्वयैः प्रत्यहं सुपरीक्षिताः । गर्भसन्धारणोपायः के भवेयुः सुखप्रदाः ॥

इत्येवमादयोऽवरं ज्ञातव्या विषयाश्च ये । तानविज्ञाय मृद्धात्मा कथं रतिसुखं लभेत् ॥

रति शास्त्रसे नीचे लिखी हुई बातोंका ज्ञान होता है :—

(१) स्त्री पुरुषका सुख कैसा होता है, और उस सुखके भोगनेके क्या-क्या उपाय या तरीके हैं ।

(२) कैसी कन्यासे शादी करनी चाहिये, जिससे सच्चा दाम्पत्य-सुख मिले ।

(३) विवाह करके लार्ड हुई स्त्रीमें कैसे विश्वास उत्पादन करना चाहिये, ताकि संसारमें सुख मिले ।

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(४) स्त्रियोंका मद्द कैसे उतारा जाता है अथवा उनके मद्द-भञ्जन करनेके क्या उपाय ह। वे कैसे द्रवित की जा सकती हैं।

(५) रुटी हुई स्त्री किस तरह मनानी चाहिये ; यानी मानिनीके मान मोचनके क्या तरीक़े हैं।

(६) जिसके सन्तान नहीं होती या हो-होकर मर जाती है, उसके औलाद् कैसे हो सकती है।

(७) सती या पतिव्रता स्त्रियोंके क्या लक्षण हैं, अर्थात् पतिव्रताओंकी क्या पहचान है।

(८) पुंश्चली या व्यभिचारिणी स्त्रियोंके क्या लक्षण हैं, और उन दुष्टाओंकी कुत्सेष्टाओंसे पुरुष अपनी रक्षा कैसे कर सकता है।

(९) अति संभोग प्रभृतिसे बलहीन हुआ शरीर फिरसे कैसे बलवान हो सकता है, फिरसे नयी जवानी कैसे आ सकती है वगैरः वगैरः।

(१०) गर्भ धारण करनेके क्या उपाय हैं और सुवेद्य गर्भ न रहनेके कारणोंको कैसे जान सकते हैं इत्यादि।

जो पुरुष इन अवश्यमेव जाननेयोग्य विषयोंको नहीं जानते, उन्हें स्त्री-संभोगका सुख कैसे मिल सकता है ?

सारे कामशास्त्रका निचोड़ नीचेके दो श्लोकोंमें है और उसी एक बातके लिए “काम शास्त्र” जैसा बड़ा ग्रन्थ रचा गया है :—

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यद्यप्यए गुणाधिको निगदितः कामोऽङ्गानां सदा । नो याति द्रवतां तथापि ऋटिति व्यायामिनां संगमे ॥ प्रागेव पुंसः सुरते न याववारी द्रवेदभोगफलं न तावत् । अतो दुष्टैः कामकलाप्रवीणैः कार्यः प्रयत्नो वनित्ताद्रवत्वे ॥

अर्थात्—यद्यपि स्त्रीमें पुरुषकी अपेक्षा सदा अठ गुणा काम कहा गया है, तोभी वह पुरुषसङ्गमसे जल्दी स्वखलित नहीं होती। संभोग करनेसे अगर स्त्री पहले स्वखलित न हो, तो संभोग करना बेकार हुआ, उसका कोई फल न हुआ। इसलिए, कामकला जाननेवाले चतुर पुरुषको स्त्रीके द्रवित * करनेकी चेष्टामें कोई उपाय उठा न रखना चाहिये।

ॐ द्रवित और स्वखलित शब्द ऐसे हैं, जिनके कहने और लिखनेमें, श्राज-कलः संस्कृतका शब्दिक प्रचार न होनेसे, लज्जा नहीं मालूम होती, अश्लीलताका उतना दोष नहीं आता। यद्यपि एटीकेट ( Etiquette ) यानी शब्द, आदाब या सौजन्य-शिष्टाचार हमें इतनेसे भी रोक्ता है, पर हमने अपने अल्प शिक्षित भाइयोंकी खातिरसे २६, २६, २७ और २६ वें श्लोकोंकी टीका-टिप्पणियोंमें एटीकेटका उतना ध्यान नहीं रखा है। जहाँ तक हमसे बना है वहाँतक हरेक बात खोलकर लिखी है और अपने तर्क कानूनी पेचोंसे भी बचाया है। हम जानबूझकर कोई भी काम ऐसा नहीं करना चाहते, जिससे कानून भंग हो और सरकार नाराज हो। राजाको खुश रखनेमें ही उल्लंघान्त है।

दूक कामशास्त्रका विषय बहुत बड़ा है। उस पर बड़े-बड़े ग्रन्थ अंगरेज़ी और संस्कृत प्रभृति भाषाओंमें लिखे हुए हैं। हमने भी कामशास्त्रको जानने बोरय सभी बातें अपनी बनाई “स्वास्थ्यरक्षा” अथम संस्करण और

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दोहा ।

नारि समागम कामफल, दुहुनहि चित इक होय ।

जो कहँ होय विभिन्ता, शव-संगम-सम जोय ॥२६॥

सार—सम्भोग-कालमें, स्त्री-पुरुषके एक-दिल होनेमें ही आनन्द है ।

“चिकित्साचन्द्रोदय” जीथे और पाँचवें भागोंमें लिखी है। हमने काम-शास्त्र पढ़नेकी जरूरत यहाँ समझा दी है। जो लोग कामशास्त्र और वैद्यकशास्त्र नहीं पढ़ते, उनका इस दुनियामें ध्यान और मनुष्य-बोला धारण करना बुधा है। कामशास्त्र और वैद्यकशास्त्रमें कुछ फ़र्क नहीं। सच पढ़ो तो कामशास्त्र वैद्यकशास्त्रका ही एक अंग है। लोग पहले शिकायत किया करते थे कि कामशास्त्र और वैद्यकशास्त्र सरल खोद्य हिन्दीमें नहीं—इस लिये पढ़ें तो क्या पढ़ें। उन्हींकी शिकायत रफा करनेके लिये हमने समस्त व्यायुर्वेद ग्रन्थोंका नवनीत एक ग्रन्थमें इकट्ठा किया है और उस ग्रन्थका नाम रखा है, “चिकित्साचन्द्रोदय”। इस ग्रन्थके सात भाग हैं। हमारी रायमें वे सातों ही भाग हर मनुष्यको आद्योपास्त पढ़ लेने चाहियें। जिस दिन भारतका प्रत्येक स्त्री-पुरुष उन सातों भागोंको पढ़-पढ़ कर गृहस्थाश्रममें प्रवेश करेगा, उस दिनका भारत—और ही भारत होगा।

हमारी दयामय न्यायशीला ब्रिटिश सरकार किसीको कामशास्त्र पढ़नेसे मना नहीं करती। अगर ऐसा होता, तो Sexual Intercourse विषय पर अंगरेजोंमें अनेकों ग्रन्थ न निकल जाते और उन्हें अंगरेज नरनारी न पढ़ते। सरकार चाहती है, उसकी प्रजा अश्लील और गन्दी पुस्तकें, जिनमें नंगी तस्वीरें हों, पास न रखे। पर बफ़सोस है कि, आजकलके नासमक नौजवान उन्हींकी खोज में पागलकी तरह अपना धन और समय

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29. It is only when both the man and the woman are of the same mind that the sexual pleasures are the greatest. If their minds are diverted, then the intercourse is like that of inanimate bodies.

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प्रणयमधुराः प्रेमोद्गाढा रसादलसास्तथा

भण्डितिमधुरा मुग्धप्रायाः प्रकाशितसंमदाः ॥

प्रकृतिमुग्धा विश्वम्भाहोः स्मरोदयदायिनो

रहसि किमपि स्वैरालापा हरन्ति मृगीदशाम् ॥ २० ॥

मृगनयनी कामिनियोंके प्रणय-प्रीतिसे मधुर, प्रेम-रससे पगे, कामकी अधिकतासे मन्दे, सुननेमें आनन्दप्रद, प्रायः अस्पष्ट और समझमें न आने योग्य, सहज-सुन्दर, विश्वासयोग्य और

बर्बाद करते हैं। आजकलके दगाबाज़ विज्ञापनबाज़ोंकी रंगीन बातोंमें आकर बी० पो० पर बी० पी० भँगाते और पीछे पुरुषोंको कामकी न पाकर रोते और पछुवाते हैं। हमारे भोले-भाले पाठक “सचित्र कोकयास्त्र”का विज्ञापन पढ़ते ही आडर दे देते हैं। पर इतना नहीं समझते, कि आसनोंको तन्नों देकर कोकको कौन छापनेकी हिम्मत कर सकता है ? जैससे किते भय नहीं है ? इसलिये हम फिर कहते हैं कि, आप चाहीस रुपये खर्च करके “चिकित्सा-चन्द्रोदय” सात भाग और “स्वास्थ्य रत्ना” देखें—आपको सम्पूर्ण आयुर्वेद और कामयास्त्रका ज्ञान हो जायगा। इस शास्त्रको पढ़ना आपका कर्तव्य है, धर्म है, यही हमारे मुनियोंको और यही पाश्चात्य विद्वानोंको राय है। देखिये डॉक्टर गन साहब कहते हैं—It is, therefore, every individual's duty to study the laws of his being, and to conform to

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कामोद्दीपन करनेवाले वचन, यदि स्वच्छन्दतापूर्वक एकान्तमें कहे जायें, तो, निश्चय ही, सुननेवालेके मनको हर लेते हैं ॥३०॥

खुलासा—कुटुम्बनयनी तर्षणियोंकी प्रेम-रस से पगी हुई मधुर-मधुर बातें रसिक पुरुषोंके कानोंमें अमृत सा ढालती है। मुभायें हुए पुष्प-रूपी प्राणोंको खिलाती है, सारी इन्द्रियोंको प्रसन्न करती और मनमें रसायनका काम करती है। लेकिन जब वे एकान्त-स्थलमें स्वच्छन्दतापूर्वक कही जाती हैं, तब तो और भी गूजब करती हैं। जिनसे ये कही जाती हैं, वे बात कहने-वाल्त्रियोंके कीत-दास ही हो जाते हैं।

कोई प्रेमी अपनी प्रेमिकाकी मीठी-मीठी बातें सुनकर महाकवि अकबरके शब्दोंमें कहता है—

बनोगे खुसरवे इकलीमें दिल, शीरीजँबाँ होकर ।

जहाँगीरी करेगी यह अदा, नूरजहाँ होकर ॥

मीठी-मीठी बातें करनेसे तुम संसारके सभी लोगोंके दिलोंकी रानी हो जाओगी। तुम्हारा यह गुण—मधुर भाषण नूरजहाँकी तरह सारे संसारको फतह करेगा।

them. Ignorance, or inattention on this subject, is sin, and injurious consequences of such a course make out a case of gradual suicide. चिकित्सा-शास्त्र और काम-शास्त्र पढ़ना हरेक मनुष्यका धर्म है। जो इन्हें नहीं पढ़ते वे पाप करते हैं और अन्तमें आत्महत्या आदि करके वे मौत मरते हैं।

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दोहा ।

प्रणय-मधुर आलस भरे, सरस सनेह समेत ।

मृगनैन के ये वचन, हरत चित्तकों लेत ॥३०॥

सार—सुनयनाओंकी मधुर-मधुर बातोंमें जादूकी सी शक्ति होती है । उनकी अमृत-भरी बातों पर कामी पुरुष लहू हो जाते हैं ।

30. Ladies with beautiful eyes always attract the mind by their unrestrained conversation which is sweet because of softness, full of love, very pleasing to the ear on account of delicacy, gives rise to joy, is naturally soothing and confiding and which arouses passions.

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आवासः कियतां गंगे पापहारिणि वारिणि ।

स्तनमभ्ये तरुणया वा मनोहारिणि हारिणि ॥३१॥

या तो पाप-ताप नाशनी गंगाके किनारों पर ही बसना चाहिये, या मनोहर हार पड़ने हुए तरुणी स्त्रियोंके स्तनोंके मध्यमें ही बसना चाहिये ॥३१॥

खुलासा—दो में से एक काम करना चाहिये—या तो पाप-हारिणी गङ्गाके किनारे बैठकर शंकरका भजन करना चाहिये या मोतियोंके हार धारण करनेवाली हृदयहारिणी कामिनियोंके कठोर कुच सेवन करने चाहिये ।

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इस जगत्में, कामी पुरुषोंके लिये नवयुवतियोंके कठोर कुव- युगल और सघन स्पर्श जड़ूओसे बढ़कर सुखदायी और दूसरा पदार्थ नहीं है ; इसलिये वे उन्हींका सेवन कर अपना मनुष्य- जन्म सुफल करें । पर जिन्हें इस संसारको असारता और बन्ध- लताका ज्ञान हो गया है, जिन्हें रूप-यौवनकी अनित्यताका हाल मालूम हो गया है, और इसलिये कामिनियोंसे घृणा हो गई है, उन्हें सब द्विविधा त्याग, कहीं निजें और रमणीक स्थानमें, गङ्गा के तट पर पर्णकुटी बना, शिव-शिव रटना चाहिये । कामिनियों के भोगनेसे यहाँ अपूर्व सुखकी प्राप्ति होगी, पर परलोकमें दुःखों का सामना करना पड़ेगा ; मगर सबको तज, गङ्गा किनारे जा, हर भजन करनेसे यहाँ भी सुख-शान्ति मिलेगी और वहाँ भी । पाठकोंके समक्ष दोनों राहें हैं । अब उन्हें जौनसी राह पसन्द हो उसे ही चुन लें । त्रिशङ्कु की तरह बीचमें लटकना और—

इधरके रहे न उधरके रहे ।

खुदा ही मिला न विसाले सनम ॥

वाली कहावत चरितार्थ करना भला नहीं ।

दोहा ।

वास कीजिये गंग तट, पाप निवारत बारि ।

‘के कामिनि कुच युगलको, सेवन कहु बिचारि ॥३१॥

सार—गङ्गा-तट पर बसना और कामिनि-

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योंके कठोर कुचों का सेवन करना—ये दो ही काम जगत्में मुख्य हैं । विचारवान विचारकर, इनमें से किसी एक को चुन लें ।

31. Let one take rest either on the bank of the river Ganges whose water clears away the sin or between the breasts of a woman which are very attracting and where the breast-chain is lying.

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प्रियपुरतो युवतीनां तावत्पद्मातनोतु ह्दि मानः ।

भवति न यावच्चन्दनतत्पुरभिर्भुसुनिर्मलः पवनः ॥३२॥

मानिनी कामिनीयोंके हृदयोंमें अपने प्यारोंके प्रति मान तभीतक ठहरता है, जबतक चन्दनके वृक्षोंकी सुगन्धसे पूर्ण मलयाचलका वायु नहीं चलता ॥३२॥

खुलासा—मानिनीके मनमें उसी समय तक मान रहता है, और उसी समय तक उसकी भुकुटियाँ टेढ़ी रहती हैं, जब तक कि चन्दनके वृक्षोंकी सुगन्धसे मिला हुआ वायु उनके कोमल शरीरोंमें नहीं लगता ।

आमकी मनोहर मञ्जरियाँ, सुविमल चन्द्रमा, कोकिल, भौर और मलय-पवन तथा वसन्त—ये सब कामदेवके साथी और उसके अस्त्र-शस्त्र हैं । वह इन्हींसे त्रिलोकीको वशमें करता है ।

मानिनी कैसी ही कठोर क्यों न हो, किसी तरह मनाने न मनती हो ; तोभी वह कोयलके कुहुकने, मलयपवनके चलने या

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घटाओंके छा जानेसे शीघ्र ही मान छोड़, अपने प्रीतमकी गोदमें आ जाती है। जो कामिनी पुरुषकी अनेक तरहकी खुशामदोंसे भी राजी न होती हो, वह मलयपवन प्रभृतिकी मददसे सहजमें राजी हो जाती है। कविने ठीक कहा है कि, मानिनीका मान तभी तक है, जब तक मलयाचलकी हवा नहीं चलती। उसके चलते ही मानिनी आप खुशामद करने लगती है; क्योंकि वसन्त में मलयाचलकी ओरकी हवा चलती है और वह स्त्रियोंके दिलोंमें बड़ी गुदगुदी पैदा करती है। इसीसे आयुर्वेद-आचार्योंने वसन्त में रात-दिन स्त्री-पुरुषोंके अङ्गमें कामदेवका रहना लिखा है। इस मौसममें, मनहूससे मनहूसका भी काम जाग उठता है और रुटी हुई * स्त्रियाँ सहजमें मन जाती हैं।

❁ कामशास्त्रमें स्त्रीके नाराज या उदासीन रहनेके सम्बन्धमें लिखा है— कार्पण्यादतिमानरोगविरहोद्योगादि पारुष्यतो, मालिन्यासममञ्जतादि भयतः शोकाहृद्भिद्रादिपि। भर्तृषां तनुतादिभिश्च वपुषः काठिन्यतःशंकता, ह्योषाणाञ्च वृथा प्रयाति वनितावैराग्यमुच्यैः सदा ॥

पतिकी प्रत्यन्त कंजूसी, पतिका त्रिषादा प्यार करके सिर पर चढ़ो लेना, पतिका सदा रोगी बना रहना, पतिका मिलह या पुरुषार्थाहीन होना; पतिका उग्र, यौवन, विद्या, बुद्धि और कुल-शौल आदिमें पत्नीके समान न होना; पतिकी मूर्खता, पति और सास-सखर आदिका प्रत्यन्त भय, शोक, दरिद्रता, पतिके शरीरको सख्खो और कठोरता, पतिका अधिक शंकायुत रहना और व्यभिचार या झिगालेकी भूटी बुद्धमत लगाना—प्रवृत्ति

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दोहा ।

तबही लों मन मान यह, तब ही लों भ्रमंग ।

जों लौँ चन्दनसे मिल्यो, पवन न परसत भ्रंग ॥३२॥

सार—मलयपवनके चलते ही मानिनी स्त्रियाँ आप ही सीधी हो जाती हैं ।

32. The pride of a woman before her lover remains only so long as the pure spring air bearing the sweet smell of sandal does not touch her body,

कार्यात्ति स्त्रियां अपने पतिपूर्ति अकृसर विरक्त, उदासीन, नाराज् वा असन्तुष्ट रहती है । जिन पुरुषोंको स्त्री-मूलकी झरत हो, उन्हें उपरोक्त कारण यथासाध्य दूर करनेकी चेष्टा करनी चाहिये । ऐसा करने से ही स्त्री वाहने लगेगी ।

ऋतु-वर्णन

वसन्त-महिमा ।

परिमलभृतो वाताः शाखा नवांकुरकोटयो ।

मधुरविरुतोत्कण्ठा वावः प्रियाः पिकपञ्चिणाम् ॥

विरलसुरतस्वेदोद्गारा वृषवृदनेन्दवः ।

प्रसरति मधौ राच्यां जातो न कस्य गुणोदयः ॥३३॥

जबकि सुगन्धयुक्त पवन चला करती है, इक्षुओंकी शाखाओंमें नये-नये अंकुर निकलते हैं, कोकिला मदमत्त या उत्कण्ठित होकर मधुर कलरव करती है, स्त्रियोंके मुखचन्द्र पर मैथुनके परिश्रमसे निकले हुए पसीनोंकी हलकी-हलकी धारें मजा देने लगती हैं, उस वसन्तकी रातमें, किसे काम पीड़ित नहीं करता ? ॥३३॥

खुलासा—वसन्त कामदेवका साथी और ऋतुओंका राजा

❖ मधौ—चैत्र । चैत वसन्तके दो महिनेंमेंसे एकका नाम है, पर यह— यह सारे ही वसन्तके मौसमके लिए इस्तेमाल किया गया है ।

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हैं। इस ऋतुमें सुगन्धि-मिश्रित पवन चलने लगते हैं। शाखा-प्रशाखाओंमें नवीन पत्राङ्कुर शोभा देने लगते हैं। चारों ओर फूल खिलते हैं। कोकिला मधुर कलरव करती है। साँभ सुहावनी और दिन रमणीय होने लगते हैं। स्त्रियाँ अनुरागिनी होने लगती हैं। बहुत क्या—इस ऋतुमें सभी पदार्थोंमें मनोहरता आ जाती है।

हम अपने पाठकोंके मनोरञ्जनार्थ महाकवि कालिदास-विरचित “ऋतुसंहार”से चन्द सुन्दर-सुन्दर पद्य उद्धृत करते हैं :—

आकम्पितानि हृद्यानि मनस्विनीनां वतिः प्रफुल्ल सहकार कृताधिवासेः । सम्भावितम्परभृतस्य मदाकुलस्य श्रोत्रप्रियैर्मधुकस्य च गीतनादैः ॥

इस ऋतुमें बौर हुए आमके वृक्षोंकी सुगन्धसे सुगन्धित वायुने धीरज धरनेवाली कामिनियोंके हृदयोंमें भी खलबली मचा दी है। मदोन्मत्त कोकिलोंकी कुहुक और भौरोंके मधुर गुञ्जारसे चारों दिशाए भर गयी हैं।

औरभी :—

पुस्कोकिलश्चूतरसेन मत्तः प्रियामुखं चुम्बति सादरोयम् । गुञ्जद्द्विरेफोऽप्ययमन्मुखस्यः प्रियं प्रियायाः प्रकरोति चाटुम् ॥

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आमके रससे मतवाला हुआ कोकिल, सादर, अपनी प्यारी का मुख चूम रहा है। गूँजता हुआ भौरा भी कमल पर बैठ कर अपनी प्यारीकी खूशामद कर रहा है।

औरभी :—

तन्नि पायङ्नि मदालसानि

मुहुर्मुहुर्जुम्भणतपरणि ।

अगान्यनेगः प्रमदानस्य

करोति लावययरसोत्सुकानि ॥

इस श्रुतुमें मीनकेतन—कामदेव, स्त्रियोंके नाज़ुक, गौर, मतवाले और बारम्बार जम्हाइयाँ लेते हुए अङ्गोंको श्रद्धार-रसमें मद्य कर देता है।

बहुत लिखनेको हमारे पास स्थानका अभाव है, इसलिये इतना ही यथेष्ट होगा। बसन्तमें नामर्द भी मर्द हो जाता है। स्त्रियोंको तो इतना मद छ़ा जाता है कि, वे सीना उभार कर और अकड़ कर चलती हैं। रसीले और छेले-छबीले पतियोंके पास रहने पर भी नहीं दबतीं ; बल्कि उत्कण्ठित ही रहा करती हैं।

छप्पय ।

चले सुगन्धित पवन, फूल चहुँ दिशियें फूले ।

बोलत पिक मृदु बचन, काम-शर उरमें शूले ॥

मुकुलित मञ्जरी आम, करै उत्कर्षटा-भारी ।

रतिश्रम स्वेदित बदन, चन्द्रसम श्रद्धुत नारी ॥

This is a high-contrast, black and white photograph of a blank, aged page from a book. The paper is off-white with visible signs of aging, including yellowing, foxing, and small dark spots. The left edge shows the binding structure, with several small, dark marks indicating where the page was attached. On the right side, a person's hand is visible, with the thumb and part of the index finger holding the page. The background to the right of the hand is dark and indistinct.

शृङ्गारशतक

शत्रुराज वसन्त कोकिल के मधुर-मधुर भङ्कार और भलय पवन से विरही स्त्री-पुरुषों के प्राणान्तर करता है। इस चित्र में यह दिखलाया गया है कि, कामिनी का पति घर में नहीं है, विदेश में है। उधर से वसन्त की श्रवाई होगई है, वृत्तों में नये-नये पत्र आ गये हैं, कोकिलकुंडक नहीं है ; अतः विरह-वेदना से व्याकुल कामिनी मन मलीन किये गई है।

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