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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

अध्याय ४ ] · ·शाङ्करभाष्यार्थ १८३

अध्याय ४ ] · ·शाङ्करभाष्यार्थ १८३ यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः— | परब्रह्ममें, जिसमें समस्त देवगण आश्रितास्तिष्ठन्ति । यस्तं | अधिष्ठित हैं—उसके आश्रयसे स्थित हैं परमात्मानं न वेद किमृचा | उस परमात्माको जो नहीं जानता करिष्यति ? य इत्तद्विदुस्त इमे | वह वेदसे क्या कर लेगा ? और जो समासते—कृतार्थास्तिष्ठन्ति ॥८॥ | उसे जानते हैं वे तो ये सम्यक् प्रकारसे रहते हैं अर्थात् कृतार्थ हुए स्थित हैं ॥ ८ ॥ मायोपाधिक ईश्वर ही सबका स्रष्टा है इदानीं तस्यैवाक्षरस्य मायोपाधिकं जगत्स्रष्टृत्वं तन्निमित्तत्वं च भेदेन दर्शयति— | अब श्रुति उस अक्षर परमात्माका ही मायारूप उपाधिके कारण जगत्स्रष्टृत्वं और जगन्निमित्तत्वं अलग-अलग दिखलाती है— छन्दांसि यज्ञाः क्रतवो व्रतानि भूतं भव्यं यच्च वेदा वदन्ति । अस्मान्मायी सृजते विश्वमेत- त्तस्मिंश्चान्यो मायया संनिरुद्धः ॥ ६ ॥ वेद, यज्ञ, क्रतु, व्रत, भूत, भविष्य और वर्तमान तथा और भी जो कुछ वेद बतलाते हैं वह सब मायावी ईश्वर इस अक्षरसे ही उत्पन्न करता है, और उस ( प्रपञ्च ) में ही मायासे अन्य-सा होकर बँधा हुआ है ॥ ९ ॥ छन्दांसीति । छन्दांसि ऋग्यजुःसामाथर्वाङ्गिरसाख्या वेदाः । | ‘छन्दांसि’ इत्यादि । ऋग्, यजुः, साम और अथर्वसंज्ञक वेद छन्द हैं, देवयज्ञादयो यूपसंबन्धरहितवि- | जिनमें यूपका सम्बन्ध नहीं होता वे देवयज्ञादि विहित कर्म यज्ञ कहलाते १. जगत्का उपादानकारणत्व । २. जगत्का निमित्तकारणत्व ।

१८४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४

१८४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४ हितक्रियाश्च यज्ञाः । ज्योतिष्टोमा- | हैं, ज्योतिष्टोमादि याग क्रतु हैं, तथा दयः क्रतवः । व्रतानि चान्द्रायणा- | चान्द्रायणादि व्रत हैं । भूत--जो दीनि । भूतमतीतम् । भव्यं | बीत चुका है, भव्य—जो होनेवाला भविष्यत् । यदिति तयोर्मध्य- | है । 'यत्' यह पद उनके मध्यवर्ती वर्ति वर्तमानं सूचयति । चशब्दः | वर्तमानका सूचक है और 'च' शब्द समुच्चयार्थः । यज्ञादिसाध्ये | सबका समुच्चय करनेके लिये है । कर्मणि प्रपञ्चे भूतादौ च वेदा | तात्पर्य यह है कि यज्ञादिसाध्य कर्म एव मानमित्येतत् । यच्छब्दः | और भूतादि प्रपञ्चमें वेद ही प्रमाण सर्वत्र संबध्यते । अस्मात्प्रकृता- | हैं । मूलमें 'यत्' शब्दका सबके दक्षरब्रह्मणः पूर्वोक्तं सर्वमुत्पद्यत | साथ सम्बन्ध है । इसका सम्बन्ध इति संबन्धः । | इस प्रकार है कि जो कुछ पहले अविकारिब्रह्मणः कथं प्रपञ्चो- | कहा गया है सब इस प्रकृत अक्षर पादानत्वम्? इत्यत आह-मायीति। | ब्रह्मसे ही उत्पन्न होता है । कूटस्थस्यापि स्वशक्तिवशात्सर्व- | अविकारी ब्रह्म किस प्रकार स्रष्टृत्वमुपपन्नमित्येतत् । विश्वं | प्रपञ्चका उपादान कारण हो सकता पूर्वोक्तप्रपञ्चं सृजत उत्पादयति। | है ? ऐसा प्रश्न होनेपर श्रुति कहती स्वमायया कल्पिते तस्मिन्भूता- | है—'मायी सृजते' इत्यादि। तात्पर्य दिप्रपञ्चे माययैवान्य इव संनि- | यह है कि कूटस्थ ब्रह्मका भी अपनी रुद्धः संबद्धोऽविद्यावशगो भूत्वा | शक्तिके द्वारा सबका रचयिता होना संसारसमुद्रे भ्रमतीत्यर्थः ॥ ९ ॥ | सम्भव ही है । वह विश्व अर्थात् | पूर्वोक्त प्रपञ्चको उत्पन्न करता है । | तथा अपनी मायासे कल्पित हुए उस | भूतादि प्रपञ्चमें वह मायासे ही अन्य- | सा होकर बँध गया है, अर्थात् | अविद्याके वशीभूत होकर संसार- | समुद्रमें भटकता रहता है ॥ ९ ॥

अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८५

अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८५

प्रकृति और परमेश्वरका स्वरूप तथा उनकी सर्वव्यापकता पूर्वोक्तायाः प्रकृतेर्मायात्वं पूर्वोक्त प्रकृति माया है और तदधिष्ठातृसच्चिदानन्दरूपब्रह्मण- उसका अधिष्ठाता सच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्म उस ( मायारूप ) उपाधिके स्तदुपाधिवशान्मायित्वं च चिद्रू- कारण मायावी है तथा उस चिद्रूप पस्य मायावशात्कल्पितावयव- ब्रह्मके मायाके कारण कल्पित हुए भूतैः कार्यकारणसंघातैः सर्वं अवयवरूप कार्य-कारणसंघातसे यह दिखायी देता हुआ भूर्लोकादि सम्पूर्ण भूरादीदं परिदृश्यमानं जगद्व्याप्तं जगत् व्याप्त है—इस आशयसे श्रुति चेत्याह— कहती है— मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् । तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत् ॥१०॥ प्रकृतिको तो माया जानना चाहिये और महेश्वरको मायावी । उसीके अवयवभूत [ कार्य-कारणसंघात ] से यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है ॥ १० ॥ मायां त्विति । जगत्प्रकृति- ‘मायां तु’ इत्यादि । पीछे जिसका जगत्की प्रकृति ( कारण ) त्वेनाधस्तात्सर्वत्र प्रतिपादिता रूपसे सर्वत्र प्रतिपादन किया गया प्रकृतिर्मायैवेति विद्याद्विजानी- है—वह प्रकृति माया ही है— ऐसा जाने । यहाँ ‘तु’ शब्द यात् । तुशब्दोऽवधारणार्थः । निश्चयार्थक है। जो महान् और ईश्वर महांश्चासावीश्वरश्चेति महेश्वरस्तं होनेके कारण महेश्वर है उसे मायावी —मायाको सत्ता-स्फूर्ति आदि मायिनं मायायाः सत्तास्फूर्त्यादि- देनेवाला तथा अधिष्ठानरूपसे उसे प्रेरित करनेवाला जानना चाहिये— प्रदं तथाधिष्ठानत्वेन प्रेरयितारमेव इस प्रकार इसका पूर्वोक्त ‘विद्यात्’ विद्यादिति पूर्वेण संबन्धः । तस्य क्रियासे सम्बन्ध है । उस प्रकृत

१८६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४

१८६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४ ❦ ══════════════════════════════ ❦ प्रकृतस्य परमेश्वरस्य रज्ज्वाद्यधि- | परमेश्वरके, रज्जु आदि अधिष्ठानोंमें ष्ठानेषु कल्पितसर्पादिस्थानीयैः | कल्पित सर्पादिरूप मायिक अवयवोंसे मायिकैः स्वावयवैरध्यासद्वारेदं | अध्यासद्वारा यह भूर्लोकादि सम्पूर्ण भूरादि सर्वं व्याप्तमेव पूर्णमित्ये- | जगत् व्याप्त यानी पूर्ण है । यहाँ भी तत् । तुशब्दस्त्ववधारणार्थः॥१०॥ | 'तु' शब्द निश्चयार्थक ही है॥१०॥ ───────────ꕥꕥ─────────── कारण-ब्रह्मके साक्षात्कारसे परम शान्तिकी प्राप्ति मायातत्कार्यादियोनेः कूट- | माया और उसके कार्यादिका | मूलभूत कूटस्थ ब्रह्म अपने स्वतन्त्र- स्थस्य स्ववशतोऽधिष्ठातृत्वं विय- | रूपसे सबका अधिष्ठाता है तथा दादिकार्याणामुत्पत्तिहेतुत्वं तेनैव | आकाशादि कार्योंकी उत्पत्तिका हेतु | है और उस शुद्धस्वरूपसे ही उसके सर्वाधिष्ठातृत्वोपलक्षितसच्चिदान- | सर्वाधिष्ठातृत्वसे उपलक्षित होनेवाले | सच्चिदानन्दस्वरूपसे 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसा न्दवपुषा ब्रह्मास्मीत्येकत्वज्ञाना- | एकत्व-ज्ञान होनेसे मुक्ति होती है; न्मुक्तिं च दर्शयति— | यह बात श्रुति दिखलाती है— यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको यस्मिन्निदं स च वि चैति सर्वम् । तमीशानं वरदं देवमीड्यं निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति ॥११॥ जो अकेला ही प्रत्येक योनिका अधिष्ठाता है, जिसमें यह सब सम्यक् प्रकारसे लीन होता है और फिर विविधरूप हो जाता है उस सर्व- नियन्ता, वरदायक, स्तवनीय देवका साक्षात्कार करके साधक इस परम शान्तिको प्राप्त होता है ॥११॥

अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८७

अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८७ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰


[संस्कृत-शारीरकभाष्यम्]

यो योनिमिति । यो माया- विनिर्मुक्तआनन्दैकघनः परमेश्वरो योनिं योनिमिति वीप्सया मूल- प्रकृतिर्मायावान्तरप्रकृतयो विय- दादयश्च सूचितास्ताः प्रकृतीः सत्तास्फूर्तिप्रदत्वेनाधिष्ठाय तिष्ठ- त्यन्तर्यामिरूपेण । “य आकाशे तिष्ठन्” ( बृ० उ० ३ । ७ । १२ ) इत्यादि श्रुतेः । एको- ऽद्वितीयः । यस्मिन्मायाद्यधिष्ठात- रीश्वर इदं सर्वं जगदुपसंहारकाले समेति संगच्छते लयं प्राप्नोति । पुनः सृष्टिकाले विविधमेत्या- काशादिरूपेण नाना भवति । तं प्रकृतमधिष्ठातारमीशानं नियन्तारं वरदं मोक्षप्रदं देवं द्योतनात्मक- मीड्यं वेदादिभिः स्तुत्यं निचाय्य निश्चयेन ब्रह्माहमस्मीत्यपरोक्षी- कृत्य सुषुप्त्यादौ प्रत्यक्षीकृता या सर्वोपरमलक्षणा सर्वजनीना शान्तिः सेदमा दर्शिता तां प्रसिद्धामिमां शान्तिं सर्वदुःख- विनिर्मुक्तसुखैकतानस्वरूपां मुक्ति-


[हिन्दी-भाष्यार्थ]

‘यो योनिम्’ इत्यादि । जो मायातीत विशुद्धानन्दघन परमेश्वर योनि-योनिको—‘योनिं योनिम्’ इस द्विरुक्तिसे मूलप्रकृतिरूपा माया और अवान्तर प्रकृतिरूप आकाशादि—ये दोनों प्रकृतियाँ ( योनियाँ ) सूचित होती हैं उन दोनों प्रकारकी प्रकृतियोंको सत्ता-स्फूर्तिप्रदरूपसे अधिष्ठित करके अन्तर्यामीरूपसे स्थित है जैसा कि “जो आकाशमें स्थित है” इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध होता है । जो एक—अद्वितीय है । जिस मायादिके अधिष्ठाता ईश्वरमें यह सम्पूर्ण जगत् प्रलयकालमें संगत— लयको प्राप्त होता है और फिर सृष्टि- कालमें विविधताको प्राप्त होता अर्थात् आकाशादिरूपसे नानाकार हो जाता है उस प्रस्तुत अधिष्ठाता, ईशान— नियन्ता, वरद—मोक्षप्रद, देव— प्रकाशस्वरूप और ईड्य—वेदादि- द्वारा स्तुत्यको अनुभव कर ‘मैं ब्रह्म हूँ’ इस प्रकार निश्चयरूपसे प्रत्यक्ष कर सुषुप्ति आदिमें अनुभव की हुई जो सर्वोपरतिरूपा सर्वजनहितकारिणी शान्ति है वह यहाँ ‘इदम्’ शब्दसे— ‘इमाम्’ इस संकेतसे दिखायी गयी है, उस इस प्रसिद्ध शान्तिको अर्थात् सर्व- दुःखशून्यसुखैकतानतारूपा मुक्तिको

१८८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४

१८८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४

मिति यावत् । गुरूपदिष्ट- | प्राप्त हो जाता है। तात्पर्य यह है कि तत्त्वमादिवाक्यजन्यसुतत्त्वज्ञानेना- | गुरुके उपदेश किये हुए 'तत्त्वमसि' आदि वाक्योंसे उत्पन्न होनेवाले विद्यातत्कार्यादिविश्वमायान्निवृत्त्या- | सम्यक्तत्त्वज्ञानसे अविद्या और उसके कार्यादिरूप सम्पूर्ण मायाके निवृत्त हो त्यन्तं पुनरावृत्तिरहितं यथा | जानेसे वह आत्यन्तिकी-जिससे कि वह पुनरावृत्तिशून्य हो जाता है ऐसी भवति तथैत्येकरसो भवती- | मुक्तिको प्राप्त हो जाता है; अर्थात् एकरस ( ब्रह्मस्वरूप ) हो जाता त्येतत् ॥११॥ | है ॥ ११ ॥

अखण्डज्ञानकी सिद्धिके लिये परमात्माकी प्रार्थना सूत्रात्मानं प्रत्यविरतमभि- | अब अखण्ड तत्त्वज्ञानकी सिद्धिके मुखतया वीक्षन्तं परमेश्वरं प्रत्य- | लिये श्रुति सूत्रात्माके प्रति निरन्तर खण्डिततत्त्वज्ञानसिद्धये प्रार्थना- | अभिमुख रहकर दृष्टिपात करनेवाले माह- | परमात्माकी प्रार्थना करती है-- यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः । हिरण्यगर्भं पश्यत जायमानं स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु ॥१२॥ जो रुद्र देवताओंकी उत्पत्ति और ऐश्वर्यप्राप्तिका हेतु, जगत्का स्वामी और सर्वज्ञ है तथा जिसने सबसे पहले हिरण्यगर्भको अपनेसे उत्पन्न देखा था वह हमें शुद्ध बुद्धिसे संयुक्त करे ॥ १२ ॥ यो देवानामिति । पूर्वमेवास्य | 'यो देवानाम्' इत्यादि । इसका अर्थ पहले (अध्याय ३ मन्त्र ४ में) प्रतिपादितोऽर्थः ॥१२॥ | ही कह दिया गया है ॥ १२ ॥

अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८९

ब्रह्मप्रमुखाणां देवानां स्वामि- | अब, ब्रह्मादि देवताओंके स्वामित्व, तामाकाशादिलोकाश्रयत्वं प्रमा- | आकाशादि लोकोंके आश्रयत्व, त्रादीनां नियन्तृत्वं बुद्धिशुद्धि- | प्रमातादिके नियन्तृत्व और बुद्धिकी द्वारा सम्यग्ज्ञानसिद्धयर्थं मुमु- | शुद्धिके द्वारा सम्यग्ज्ञानकी सिद्धिके क्षुभिः प्रार्थ्यमानत्वं च परमेश्वर- | लिये मुमुक्षुओं द्वारा प्रार्थनीयत्व आदि स्याह— | परमात्माके गुणोंका वर्णन करती है— यो देवानामधियो यस्मिँल्लोका अधिश्रिताः । य ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥१३॥ जो देवताओंका स्वामी है, जिसमें सम्पूर्ण लोक आश्रित हैं और जो इस द्विपद एवं चतुष्पद प्राणिवर्गका शासन करता है उस आनन्दस्वरूप देवकी हम हविके द्वारा परिचर्या (पूजा) करें ॥१३॥ यो देवानामधिय इति । यः | ‘यो देवानामधियः' इत्यादि । प्रकृतः परमेश्वरो देवानां ब्रह्मा- | जिसका यहाँ प्रसंग है ऐसा जो दीनामधिपः स्वामी यस्मिन् | परमेश्वर ब्रह्मादि देवताओंका अधि- परमेश्वरे सर्वकारणे भूरादयो | पति—स्वामी है, सबके कारणभूत लोका अधिश्रिता अध्युपरि श्रिता | जिस परमेश्वरमें भूर्लोकादि सम्पूर्ण अध्यस्ता इति यावत् । यः प्रकृतः | लोक अधिश्रित—अधि—ऊपर श्रित परमेश्वरोऽस्य द्विपदो मनुष्यादे- | अर्थात् अध्यस्त है तथा जो प्रकृत श्चतुष्पदः पश्वादेश्चेश ईष्टे । तका- | परमेश्वर इस मनुष्यादि द्विपद् ( दो रलोपश्चान्दसः । कस्मै काया- | पैरवाले ) और पशु आदि चतुष्पाद् नन्दरूपाय । स्मैभावोऽपि च्छा- | जीवसमुदायका शासन करता है । न्दसः । देवाय द्योतनात्मने | ‘ईशे’ इस क्रियापदमें तकारका लोप | वैदिक है। * उस क—आनन्दरूप— | मूलमें [ ‘क’ शब्दकी चतुर्थकि एक | वचनको] ‘स्मै’ आदेश वैदिक† है— | देव यानी द्योतनात्मक (प्रकाशस्वरूप)

  • वास्तवमें यह पद ईश्+ते=ईष्टे है । † क्योंकि सर्वनाम शब्दोंसे परे ‘ङे’ विभक्तिको ही ‘स्मै' आदेश होता है ।

१९० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४

१९० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४ तस्मै हविषा चरुपुरोडाशादि- | को हवि--चरु-पुरोडाशादि द्रव्यसे द्रव्येण विधेम परिचरेम । विधेः | विधेम-पूजें । परिचर्या (पूजा) ही | जिसका कर्म है ऐसे 'विध' धातुका परिचरणकर्मण एतद्रूपम् ॥१३॥ | यह रूप है* ॥१३॥ परमात्मज्ञानसे शान्ति-प्राप्ति एवं बन्धननाशका पुनः उपदेश परस्यातिसूक्ष्मत्वं जगच्चक्रे | यद्यपि परमात्माके अत्यन्त सूक्ष्मत्व, साक्षित्वेनावस्थितत्वं निखिल- | जगच्चक्रमें साक्षीरूपसे स्थित होने, जगत्स्रष्टृत्वं सर्वात्मकत्वं तत्ता- | सम्पूर्ण जगत्को रचने, सर्वरूप होने दात्म्याज्ञानां मुक्तिश्चेत्येत- | एवं उसके तादात्म्य-ज्ञानसे जीवोंकी द्बहुशोऽधस्तात्प्रतिपादितं यद्यपि | मुक्ति होनेका ऊपर अनेक प्रकारसे तथापि बुद्धिसौकर्यार्थं पुनरप्याह- | प्रतिपादन किया जा चुका है, तथापि | यह सब समझनेमें सुगमता हो जाय | -इसलिये श्रुति फिर भी कहती है- सूक्ष्मातिसूक्ष्मं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति ॥१४॥ सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, अविद्या और उसके कार्यरूप दुर्गम स्थानमें स्थित,† जगत्के रचयिता, अनेकरूप और संसारको एकमात्र भोग प्रदान करनेवाले शिवको जानकर जीव परम शान्ति प्राप्त करता है ॥१४॥

  • यद्यपि 'विध विधाने' (तुदा० पर० सेट् ) धातुसे विधि लिङ्के उत्तम पुरुषके बहुवचनमें 'विधेम' रूप बनता है। तथापि विधानका तात्पर्य परिचर्या (पूजा) में ही है—ऐसा मान लेनेसे अर्थ ठीक हो जाता है। अथवा 'धातु' के अनेक अर्थ होते हैं इस न्यायसे भी परिचर्या अर्थ ठीक ही है। † 'कलिल' शब्दके अर्थमें टीकाकारोंका मतभेद है। प्रस्तुत अर्थ शाङ्कर- भाष्यके अनुसार है। विज्ञानभगवान्ने भी यही अर्थ किया है। नारायणतीर्थ 'कलिलस्य मध्ये' का अर्थ 'तमसो मध्ये'—'अज्ञानके मध्यमें' करते हैं तथा शङ्करा- नन्दजी इस शब्दकी व्याख्या इस प्रकार करते हैं— 'नारीवीर्येण संगतं पौरुषं

अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९१

अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९१

[संस्कृत-भाष्यम्] सूक्ष्मेति । पृथिव्याद्यव्याकृ- तान्तमुत्तरोत्तरं सूक्ष्मसूक्ष्मतरमपे- क्ष्येश्वरस्य तदपेक्षया सूक्ष्मतमत्व- माह—सूक्ष्मातिसूक्ष्ममिति । कलिलस्याविद्यातत्कार्यात्मकदुर्ग- स्य गहनस्य मध्ये । शेषं व्या- ख्यातम् ॥१४॥

[भाषार्थ] 'सूक्ष्मातिसूक्ष्मम्' इत्यादि । 'सूक्ष्मातिसूक्ष्मम्' इस पदसे श्रुति पृथिवीसे लेकर अव्याकृतपर्यन्त जो उत्तरोत्तर सूक्ष्म और सूक्ष्मतर हैं उनकी अपेक्षा भी ईश्वरकी सूक्ष्मतमता बतलाती है । कलिलके मध्यमें अर्थात् अविद्या और उसके कार्यरूप दुर्ग-- गहन [ स्थान ] के मध्यमें । शेष अंशकी पहले व्याख्या हो चुकी है ॥१४॥

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[अवतरणिका] [संस्कृत] परस्य साक्षिरूपेणावस्थितत्वं सनकादिभिर्ब्रह्मादिदेवैश्चाधिकारिपुरुषैरप्यात्मतया प्राप्यत्वं साधनचतुष्टयादियुतास्मदादीनां मोक्षसिद्धिं चाह— [हिन्दी] अब परमात्माके साक्षिरूपसे स्थित होने, सनकादि और ब्रह्मादि देवताओं एवं अधिकारी पुरुषोंद्वारा आत्मस्वरूपसे प्राप्तव्य होने तथा साधनचतुष्टयादिसे सम्पन्न होनेपर हम लोगोंको भी मोक्ष प्राप्त होनेका प्रतिपादन किया जाता है--

[मूल मन्त्र] स एव काले भुवनस्य गोप्ता विश्वाधिपः सर्वभूतेषु गूढः । यस्मिन्युक्ता ब्रह्मर्षयो देवताश्च तमेवं ज्ञात्वा मृत्युपाशांश्छिनत्ति ॥१५॥

[मन्त्रार्थ] वही अतीत कल्पोंमें विश्वका रक्षक था, वही विश्वका स्वामी और सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित है । [ ऐसे ] जिस परमात्मामें ब्रह्मर्षि और देवगण


[पाद-टिप्पणी] वीर्यमल्पकालस्थं कलिलमित्युच्यते । 'अथवा जगदारम्भकाणामपां बुद्बुदस्य पूर्वा- वस्था कलिलमित्युच्यते । फेनिलान्युदकानीत्यर्थः' अर्थात् स्त्रीके रजसे मिला हुआ पुरुषका वीर्य कुछ काल स्थित रहनेपर 'कलिल' कहा जाता है । अथवा जगत्की रचना करनेवाले जलके बुलबुलेकी पूर्वावस्था 'कलिल' कही जाती है अर्थात् फेनयुक्त जल ।

१९२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४

१९२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४ ꕥꕥꕥꕥꕥꕥꕥꕥꕥꕥꕥꕥꕥꕥ अभिन्नरूपसे स्थित हैं उसे इस प्रकार जानकर पुरुष मृत्युके पाशोंको काट डालता है ॥१५॥ स एवेति । स एव प्रकृतः | 'स एव' इत्यादि । वह प्रकृत कालेऽतीतकल्पेषु जीवसञ्चित- | परमेश्वर ही कालमें—अतीत कल्पों- में अर्थात् जीवोंके सञ्चित कर्मोंके कर्मपरिपाकसमये भुवनस्य गोप्ता | फलोन्मुख होते समय भुवनका गोप्ता तत्तत्कर्मानुगुणतया रक्षिता । | यानी विभिन्न जीवोंके कर्मानुसार उनका रक्षक था। वह विश्वाधिप— विश्वाधिपः विश्वस्य स्वामी । सर्व- | विश्वका स्वामी, समस्त भूतोंमें गूढ भूतेषु गूढो ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तेषु | अर्थात् ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त साक्षिमात्रतयावस्थितः । यस्मिं- | समस्त प्राणियोंमें साक्षीरूपसे स्थित है। श्चिद्घनानन्दवपुषि परे युक्ता | जिस चिद्घनानन्दविग्रह परमात्मामें युक्त—ऐक्यभावको प्राप्त हैं; कौन ? ऐक्यं प्राप्ताः । ते के ? ब्रह्मर्षयः | सनकादि ब्रह्मर्षि और ब्रह्मादि सनकादयः । देवता ब्रह्मादयः । | देवगण । उसी ईश्वरको जानकर तमेवेश्वरं ज्ञात्वा ब्रह्माहमस्मीत्य- | अर्थात् 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकार साक्षात्कार कर [ पुरुष ] मृत्युके परोक्षीकृत्य मृत्युपाशान् मृत्यु- | पाशोंको काट डालता है । अविद्या रविद्या तमो रूपादयश्च पाशाः | अर्थात् तम ही मृत्यु है तथा रूपादि विषय पाश हैं, क्योंकि उनमें ही पाश्यन्त इति पाशास्तान् “मृत्युर्वै | जीव पाशित ( बद्ध ) होते हैं, अतः तमः” (बृ० उ० १ । ३ । २८) | वे पाश हैं; श्रुति कहती है—"अज्ञान इति श्रुतेः । तत्कार्यकाम- | मृत्यु ही है।” उस ( अज्ञान ) कर्मच्छिनत्ति नाशयति । ऐक्य- | के कार्य काम और कर्मादिको काट डालता यानी नष्ट कर देता है; रूपस्वप्रकाशाग्निना दहतीत्यर्थः | अर्थात् ऐक्यरूप स्वप्रकाशाग्निसे भस्म ॥ १५ ॥ | कर देता है ॥ १५ ॥ ─━⊱༻☬༺⊰━─

[अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९३

[अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९३


(बाएँ) परस्यात्यन्तातिसूक्ष्मतमत्वमा- (दाएँ) अब श्रुति परमात्माका अत्यधिक (बाएँ) नन्दातिशयवत्त्वं निर्दोषवत्त्वं (दाएँ) सूक्ष्मतम, अतिशय आनन्दवान् और (बाएँ) जीवेष्वतिसूक्ष्मतया स्वरूपेणा- (दाएँ) निर्दोष होना, जीवोंमें अत्यन्त सूक्ष्म- (बाएँ) वस्थितत्वं सर्वस्यापि सत्तादि- (दाएँ) रूपसे स्थित होना, सबको सत्तास्फूर्ति (बाएँ) प्रदतया व्यापित्वं तदेकत्वज्ञानात् (दाएँ) देनेवाला होनेसे व्यापक होना तथा (बाएँ) पाशहानिं च दर्शयति— (दाएँ) उसके एकत्वज्ञानसे बन्धनका नाश होना दिखलाती है—


घृतात्परं मण्डमिवातिसूक्ष्मं ज्ञात्वा शिवं सर्वभूतेषु गूढम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥१६॥

घृतके ऊपर रहनेवाले उसके सार भागके समान अत्यन्त सूक्ष्म शिवको भूतोंमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित जानकर तथा विश्वके एकमात्र भोगप्रद उस देवका साक्षात्कार कर पुरुष समस्त बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है ॥१६॥


(बाएँ) घृतादिति । घृतोपरि विद्य- (दाएँ) 'घृतात्' इत्यादि । जिस प्रकार (बाएँ) मानं मण्डं सारस्तद्वतामतिप्रीति- (दाएँ) घृतके ऊपर रहनेवाला मण्ड— (दाएँ) उसका सारभाग घृतवालोंकी अत्यन्त (बाएँ) विषयो यथा तथा मुमुक्षूणामति- (दाएँ) प्रीतिका विषय होता है उसी प्रकार (दाएँ) परमात्मा मुमुक्षुओंको साररूप (बाएँ) साररूपानन्दप्रदत्वेन निरतिशय- (दाएँ) अत्यन्त आनन्द प्रदान करनेके (दाएँ) कारण उनकी निरतिशय प्रीतिका (बाएँ) प्रीतिविषयः परमात्मा तद्वद् (दाएँ) विषय है । उस घृतके सारके समान (बाएँ) घृतसारवदानन्दरूपेणात्यन्तसूक्ष्मं (दाएँ) आनन्दरूपसे अत्यन्त सूक्ष्म शिवको, (दाएँ) 'शिव' शब्दकी व्याख्या पहले की (बाएँ) ज्ञात्वा शिवमित्येतद्व्याख्यातम्। (दाएँ) जा चुकी है, समस्त भूतोंमें—ब्रह्मासे (बाएँ) सर्वभूतेषु गूढं ब्रह्मादिस्तम्ब- (दाएँ) लेकर स्तम्बपर्यन्त समस्त जीवोंमें

१९४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [अध्याय ४

१९४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [अध्याय ४ ❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦ पर्यन्तेषु जन्तुषु कर्मफलभोग- | गूढ जानकर कर्मफलभोगके साक्षी- | रूपसे प्रत्यक्षतया वर्तमान रहते साक्षित्वेन प्रत्यक्षतया वर्तमान- | हुए भी उन (काम-कर्मादि) के | द्वारा उसका ईश्वरत्व तिरस्कृत हो मपि तैस्तिरस्कृतेश्वरभावम्। उत्त- | गया है [ इसलिये उसे गूढ कहा | जाता है]। उत्तरार्धकी व्याख्या रार्धं व्याख्यातम् ॥१६॥ | की जा चुकी है ॥१६॥

परमात्मसाक्षात्कारके साधन निर्भेदसुखैकतानात्मनो विश्व- | अब भेदशून्य सुखैकरस आत्माके | विश्वकर्तृत्व एवं विश्वव्यापित्वका तथा कृत्त्वं तद्व्यापित्वं संन्यासिभि- | संन्यासियोंद्वारा प्राप्तव्य मोक्ष- राप्तव्यमोक्षरूपत्वं चाह— | स्वरूपताका वर्णन करते हैं-- एष देवो विश्वकर्मा महात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः । हृदा मनीषा मनसाभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥१७॥ यह सर्वव्यापी देव जगत्कर्ता और सर्वदा समस्त जीवोंके हृदयमें स्थित है। यह प्रपञ्चनिषेधके उपदेश, आत्मानात्मविवेक-बुद्धि और एकत्वज्ञानके द्वारा प्रकाशित होता है, इसे जो जानते हैं वे अमर हो जाते हैं ॥१७॥ एष इति । एष प्रकृतो देवो | 'एष देवो' इत्यादि । यह प्रकृत | देव—द्योतनात्मक परमात्मा विश्वकर्मा द्योतनात्मको विश्वकर्मा। महदादि | है। महदादि विश्व कर्म, है, यह | किया जाता है इसलिये कर्म है; विश्वं कर्म क्रियत इति कर्म माया- | मायाके संसर्गवश विश्वरूप कार्य | इसीका है इसलिये यह विश्वकर्मा वेशाद्विश्वरूपं कार्यमस्येति विश्व- |

अध्याय ४ ]        शाङ्करभाष्यार्थ        १९५


[मूल/संस्कृत भाष्य]

कर्मा । महांश्चासावात्मेति महात्मा सर्वव्यापोत्यर्थः । सदा सर्वदा जनानां हृदये परमे व्योम्नि हृदा- काशे जलाद्युपाधिषु सूर्यप्रति- विम्बवन्निविष्टः सम्यक्स्थित इत्येतत् । स एव साक्षिरूपेण हृदा ‘हृञ् हरणे’ इति स्मरणाद्धर- तीति हृत्तेन हृदा नेति नेतीति निषेधोपदेशेन मनीषायां पुरुषा- र्थोऽयमपुरुषार्थोऽयमात्मायमना- त्मेत्येतया विवेकबुद्ध्या मनसा विचारसाध्यैकत्वज्ञानेन चाभि- कॢप्तः प्रकाशितोऽखण्डैकरसत्वे- नाभिव्यक्त इत्येतत् । ये जनाः साधनचतुष्टयसंपन्नाः संन्यासिन एतत्तत्त्वमस्यादि- वाक्यप्रतिपाद्यैकरूपमखण्डैकरस- मिति यावद्विदुर्ब्रह्माहमस्मीत्य- परोक्षीकुर्युस्ते यथोक्तज्ञानिनो- ऽमृता भवन्त्यमरणधर्माणः पुनरा- वृत्तिरहिता भवन्तीत्यर्थः ॥१७॥


[भाष्यार्थ / हिन्दी अनुवाद]

है । तथा महान् और आत्मा होनेके कारण यह महात्मा अर्थात् सर्वव्यापी है । यह सर्वदा जीवोंके हृदय— परव्योम यानी हृदयाकाशमें जलादि उपाधियोंमें सूर्यप्रतिबिम्बके समान निविष्ट अर्थात् सम्यक्रूपसे स्थित है ! वही साक्षिरूपसे हृदा—‘हृञ् हरणे’ ( ‘हृ’ धातु हरणार्थक है ) ऐसी [ धातुसूत्ररूप ] स्मृति होनेके कारण जो हरण करे उसका नाम हृत् है उसके द्वारा यानी ‘नेति- नेति’ इत्यादि निषेधोपदेशसे, मनीषा —‘यह पुरुषार्थ है और यह अपुरुषार्थ है, यह आत्मा है और यह अनात्मा है’ इस प्रकारकी विवेकबुद्धिसे तथा मनसा—विचार- साध्य एकत्वज्ञानसे अभिकॢप्त— प्रकाशित होता—यानी अखण्डैक- रसस्वरूपसे अभिव्यक्त होता है । जो जन अर्थात् साधनचतुष्टय- सम्पन्न संन्यासिगण इसे ‘यह ‘तत्त्व- मसि’ आदि वाक्योंसे प्रतिपादित अखण्डैकरसरूप है’ इस प्रकार जानते हैं अर्थात् ‘मैं ब्रह्म हूँ’ इस प्रकार इसका साक्षात्कार करते हैं वे इस तरह बतलाये हुए ज्ञानीलोग अमृत—अमरणधर्मा अर्थात् पुनरा- वृत्तिशून्य हो जाते हैं ॥ १७ ॥

१९६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४

१९६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४

ज्ञानसे द्वैत-निवृत्तिका उपदेश

कालत्रयेऽपि मुक्तौ प्रलयादौ | तीनों ही कालमें तथा मुक्ति और च परमात्मा कूटस्थ इति निश्चया- | प्रलय आदिमें भी परमात्मा कूटस्थ | ही है—ऐसा निश्चय होनेसे जाग्रत् जाग्रत्स्वप्नयोरपि भ्रान्त्या सद्द्वि- | और स्वप्नमें भी भ्रान्तिसे ही द्वैत- | प्रतीति होती है; वस्तुतः तो तीयत्वावभासः । वस्तुतस्तु सदा | सर्वदा अभेद ही है—यह बात श्रुति निर्भेद एवेत्याह— | बतलाती है—

यदातमस्तन्न दिवा न रात्रि- र्नसन चासञ्छिव एव केवलः । तदक्षरं तत्सवितुर्वरेण्यं प्रज्ञा च तस्मात्प्रसृता पुराणी ॥१८॥

जिस समय अज्ञान नहीं रहता उस समय न दिन रहता है न रात्रि और न सत् रहता है न असत्, एकमात्र शिव रह जाता है; वह अविनाशी और आदित्यमण्डलाभिमानी देवका भजनीय है तथा उसीसे पुरातन प्रज्ञा (गुरुपरम्परागत ज्ञान) का प्रसार हुआ है ॥१८॥

यदेति । यदा यस्यामवस्था- | 'यदा' इत्यादि । जिस अवस्थामें | अतम—जिसमें तम (अज्ञान) यामतमो न तमोऽस्येत्यतमस्तत्त्व- | नहीं है ऐसा अतम रहता है मादिवाक्यजन्यज्ञानेन दीपस्था- | अर्थात् जब दीपकरूप तत्त्वमस्यादि- | वाक्यजनित ज्ञानसे अविद्या दग्ध नीयेन दग्धाविद्या तत्कार्यरूपतम- | हो जाती है, क्योंकि वह अपने | कार्यरूप तमवाली है, उस समय स्कत्वात्तदा तत्काले न दिवा | न दिन—दिनका आरोप होता दीवारोपोऽपि नास्ति न रात्रिस्त- | है और न रात्रि—रात्रिका ही

अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९७

अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९७

दारोपोऽपि नास्तीति सर्वत्रा- | आरोप होता है—इस प्रकार 'आरोप' नुषङ्गः । न सन्सत्तारोपोऽपि । | शब्दका सबके साथ सम्बन्ध लगाना चाहिये । नासन्नभावारोपोऽपि । | और न सत्—सत्ताका आरोप रहता है न असत्—अभाव- तर्हि तत्त्वं सर्वत्र शून्यमेव | का आरोप ही रहता है । जातमिति बौद्धमताविशेषमाश- | तब तो सर्वत्र शून्य ही तत्त्व रहा—इस प्रकार बौद्धमतके सादृश्य- ङ्कयाह—शिव एवेति । शिव | की आशङ्का करके श्रुति कहती है —'शिव एव' इत्यादि । उस समय एव शुद्धस्वभावो न शून्यमिति | शिव यानी शुद्धस्वभाव परमात्मा ही रहता है, शून्य नहीं रहता—यह अर्थ निपातार्थः । केवलोऽविद्यावि- | निपातसे ध्वनित होता है । वह केवल अर्थात् अविद्यारूप विकल्पसे रहित, कल्पशून्यः । तदक्षरं तदुक्तस्वरूपं | अक्षर—उसके स्वरूपका क्षय नहीं होता इसलिये अक्षर यानी नित्य, तत् न क्षरतीत्यक्षरं नित्यं तत्तत्पद- | —तत्पदका लक्ष्यार्थ तथा सविता —आदित्यमण्डलाभिमानी देवताका लक्ष्यं सवितुरादित्यमण्डलाभि- | वरेण्य—वरणीय यानी सम्यक् प्रकार- से भजनीय है । उस शुद्धत्वके हेतुसे मानिनो वरेण्यं संभजनीयम् । | प्रज्ञा--गुरुके उपदेशसे 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यसे उत्पन्न होनेवाली बुद्धि प्रज्ञा गुरुपदेशातत्त्वमादिवाक्यजा | प्रसृत हुई है अर्थात् नित्य पदार्थके विवेकादिसे सम्पन्न संन्यासियोंमें बुद्धिः, चकार एवकारार्थः, | पूर्णत्वरूपसे व्याप्त हुई है । वह पुराणी यानी ब्रह्मासे आरम्भ करके परम्परासे तस्माच्छुद्धत्वहेतोः प्रसृता नित्य- | प्राप्त हुई है अर्थात् अनादिसिद्धा है । यहाँ चकार एवके अर्थमें है ॥१८॥ विवेकादिमत्सु संन्यासिषु व्याप्ता पूर्णत्वाकारेण पुराणी ब्रह्माण- मारभ्य परम्परया प्राप्तानादि- सिद्धा ॥१८॥

१९८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४ ब्रह्मके अनुपम एवं इन्द्रियातीत स्वरूपका वर्णन कूटस्थस्य ब्रह्मण ऊर्ध्वादिषु अब श्रुति यह बतलाती है कि दिक्षु केनाप्यपरिग्राह्यत्वमद्वितीय- कूटस्थ ब्रह्म ऊर्ध्वादि दिशाओंमें किसी- से भी ग्राह्य नहीं है, अद्वितीय होनेके त्वात्केनाप्यतुलितत्वं कालदिगा- कारण कोई उसके समान नहीं है, तथा वह काल-दिगादिसे अनवच्छिन्न द्यनवच्छिन्नयशःस्वरूपत्वं चाह— यशःस्वरूप है— नैनमूर्ध्वं न तिर्यञ्चं न मध्ये परिजग्रभत् । न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः ॥१९॥ उसे ऊपरसे, इधर-उधरसे अथवा मध्यमें भी कोई ग्रहण नहीं कर सकता । जिसका नाम महद्यश है ऐसे उस ब्रह्मकी कोई उपमा भी नहीं है ॥१९॥ नैनमिति । एनं प्रकृतमपरि- ‘नैनम्’ इत्यादि । अपरिच्छिन्न, च्छिन्नरूपत्वान्निरंशत्वान्निरवयव- निरंश और निरवयव होनेके कारण त्वाच्चोर्ध्वादिषु दिक्षु कश्चिदपि इस प्रकृत ब्रह्मको ऊर्ध्वादि दिशाओंमें न परिजग्रभत्परिग्रहीतुं न शक्नु- कोई ग्रहण करनेमें समर्थ नहीं है । यात् । तस्य तस्यैवेश्वरस्याखण्ड- अखण्डानन्दानुभवरूप होनेसे उसके सुखानुभवत्वादेतादृशद्वितीयाभा- समान कोई दूसरा न होनेसे उस वात्प्रतिमोपमा नास्ति । यस्य ईश्वरकी कोई प्रतिमा—उपमा नहीं नाम महद्यशो यस्येश्वरस्य नामा- है । जिसका नाम महद्यश है अर्थात् भिधानं महद्दिगाद्यनवच्छिन्नं जिस ईश्वरका नाम—अभिधान महत् सर्वत्र परिपूर्णं यशः कीर्तिः॥१९॥ —दिगादिसे अपरिमित यानी सर्वत्र पूर्ण यश—कीर्ति है* ॥१९॥

  • अर्थात् 'वह दिगाद्यनवच्छिन्न कीर्तिवाला' है ।

अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९९

अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९९ ❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦ ईशस्येन्द्रियाद्यविषयतां प्रत्य- | अब श्रुति ईश्वरकी इन्द्रियादिकी ग्रूपतां तदैक्यज्ञानान्मोक्षतां | अविषयता, प्रत्यग्रूपता और उसके | साथ आत्माके एकत्वका ज्ञान होनेसे चाह— | मोक्षप्राप्तिका वर्णन करती है— न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम् । हृदा हृदिस्थं मनसा य एन- मेवं विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥२०॥ इसका स्वरूप नेत्रादिसे ग्रहण करनेयोग्य स्थानमें नहीं है, इसे कोई भी नेत्रद्वारा नहीं देख सकता। जो इस हृदयस्थित परमात्माको शुद्ध बुद्धि यानी मनसे इस प्रकार जान लेते हैं वे अमर हो जाते हैं ॥२०॥ न संदृश इति । अस्य प्रकृते- | 'न संदृशे' इत्यादि । इस प्रकृत श्वरस्य रूपं स्वरूपं रूपाादिरहितं | ईश्वरका रूप अर्थात् रूपाादिरहित निर्विशेषं खप्रकाशारखण्डसुखानु- | निर्विशेष स्वप्रकाश अखण्डानन्दा- भवं संदृशे चक्षुरादिग्रहणयोग्य- | नुभवमय स्वरूप संदृश—नेत्रादि प्रदेशे न तिष्ठति तद्विषयो न | इन्द्रियोंसे ग्रहण करनेयोग्य प्रदेशमें भवतीत्येतत् । इन्द्रियागोचरत्वा- | स्थित नहीं है, अर्थात् यह उनका द्वेवैनं प्रकृतं चक्षुरित्युपलक्षणम् । | विषय नहीं होता । इन्द्रियोंका विषय | न होनेसे ही इस प्रकृत परमात्माको सर्वेन्द्रियैरपि कश्चन कोऽपि न | कोई भी नेत्रसे—नेत्र यहाँ समस्त | इन्द्रियोंको उपलक्षित करता है, अतः पश्यति तद्विषयतया ग्रहीतुं न | किसी भी इन्द्रियसे नहीं देख सकता | अर्थात् इसे इन्द्रियोंके विषयरूपसे शक्नुयात् । "यच्चक्षुषा न पश्यति | ग्रहण नहीं कर सकता । "जिसे कोई | नेत्रद्वारा नहीं देख सकता अपि तु

२०० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४

२०० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४ येन चक्षूंषि पश्यति" (के० उ० | जिसकी सत्तासे नेत्र देखता है" १।६) इत्यादिश्रुतेः । हृदा | इत्यादि श्रुति इसमें प्रमाण है । जो शुद्धबुद्धयैतद्व्याख्यातं मनसेति | साधनचतुष्टयादिसम्पन्न संन्यासी यानी हृदिस्थं हृदाकाशगुहास्थं प्रत्य- | योग्य अधिकारी हृदयस्थित—हृदया- क्तया तत्रावस्थितं ये साधन- | काशरूप गुहामें स्थित अर्थात् वहाँ चतुष्टयादियुक्ताः संन्यासिनो | प्रत्यक्रूपसे विद्यमान इस प्रकृत योग्याधिकारिण एनं प्रकृतं ब्रह्मा- | ब्रह्मरूप आत्माको हृदय—शुद्धबुद्धि- त्मानमेवमित्थं ब्रह्माहमस्मीत्य- | से, इसीकी व्याख्या करके कहते हैं परोक्षेण विदुर्जानान्ति तेऽपरोक्षी- | 'मनसे' इस प्रकार प्रत्यक्षरूपसे जानते करणमहिम्नामृता भवन्त्यमरण- | हैं कि 'मैं ब्रह्म हूँ' वे उस साक्षात्कार- धर्माणो भवन्ति । मरणहेत्वविद्या- | की महिमासे अमृत—अमरणधर्मा देस्तत्त्वज्ञानाग्निना दग्धत्वात्पुन- | हो जाते हैं । तात्पर्य यह है कि र्देहान्तरं न भजन्तीत्यर्थः ॥२०॥ | मरणके हेतुभूत अज्ञानादिका तत्त्व- ज्ञानरूप अग्निसे दाह हो जानेके कारण वे पुनः अन्य देह धारण नहीं करते ॥२०॥ परमेश्वरका स्तवन इदानीं तत्प्रसादादेवेष्टप्राप्ति- | अब यह मानकर कि उसीकी परिहाराविति मत्वा तमेव परमेश्वरं | कृपासे इष्टप्राप्ति और अनिष्टनिवृत्ति हो सकती हैं दो मन्त्रोंसे उस परमे- प्रार्थयते मन्त्रद्वयेन— | श्वरकी ही स्तुति करते हैं— अजात इत्येवं कश्चिद्भीरुः प्रपद्यते । रुद्र यत्ते दक्षिणं मुखं तेन मां पाहि नित्यम् ॥२१॥ हे रुद्र ! तुम अजन्मा हो, इसलिये कोई [मुझ-जैसा] संसारभयसे कातर पुरुष तुम्हारी शरण लेता है [और कहता है कि] तुम्हारा जो दक्षिण मुख है उससे मेरी सर्वदा रक्षा करो ॥ २१ ॥

अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०१

अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०१ ꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤ अजात इति । इतिशब्दो | 'अजातः' इत्यादि । मूलमें 'इति' हेत्वर्थः । यस्मात्त्वमेवाजातो ज- | शब्द हेतुवाचक है । क्योंकि तुम्हीं न्मजराशनायापिपासाधर्मवर्जितः । | अजात यानी जन्म, जरा, क्षुधा, इतरत्सर्वं विनाशि दुःखान्वितम्, | पिपासादि धर्मोंसे रहित हो, और सब तस्माज्जन्मजरामरणाशनायापिपा- | तो नाशवान् एवं दुःखी हैं, इसलिये जो साशोकमोहान्वितात्संसाराद्भीरु- | जन्म-जरा-मरण, क्षुधा-पिपासा एवं र्भीतः सन्कश्चिदेक एव परतन्त्र- | शोक-मोहादिपूर्ण संसारसे डरा हुआ है स्त्वामेव शरणं प्रपद्ये मादृशो वा | ऐसा कोई एक मैं परतन्त्र जीव कश्चित्प्रपद्यत इति प्रथमपुरुष- | तुम्हारी ही शरण लेता हूँ; अथवा मन्वधीयते । हे रुद्र यत्ते दक्षिणं | कोई मुझ-जैसा शरण लेता है— मुखमुत्साहजननं ध्यातॄणामाह्लाद- | इस आशयसे इस क्रियाका प्रथम करम् । अथवा दक्षिणस्यां दिशि | पुरुषसे सम्बन्ध किया जा सकता भवं दक्षिणं मुखं तेन मां पाहि | है । अतः हे रुद्र ! तुम्हारा जो नित्यं सर्वदा ॥२१॥ | उत्साहजनक दक्षिण मुख है, | जो ध्यान करनेपर आनन्द पैदा | करनेवाला है अथवा दक्षिण दिशामें | होनेके कारण जो दक्षिण मुख है | उससे तुम नित्य—सर्वदा मेरी रक्षा | करो ॥२१॥ ———•••——— किञ्च— | तथा— मा नस्तोके तनये मा न आयुषि मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः । वीरान्मा नो रुद्र भामितो वधी- र्हविष्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे ॥२२॥ हे रुद्र ! तुम कुपित होकर हमारे पुत्र, पौत्र, आयु, गौ और अश्वोंमें क्षय न करना और हमारे वीर सेवकोंका भी वध न करना । हम हव्य- सामग्रीसे युक्त होकर सर्वदा ही तुम्हारा आवाहन करते हैं ॥२२॥

२०२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४

२०२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४

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मा न इति । मा रीरिष इति | ‘मा नः’ इत्यादि । ‘मा रीरिषः’ सर्वत्र संबध्यते । मा रीरिषः । | इस क्रियापदका सबके साथ सम्बन्ध रेषणं मरणं विनाशं मा कार्षीः । | है । मा रीरिषः-रेषण—मरण यानी नोऽस्माकं तोके पुत्रे तनये | विनाश न करो । हमारे ‘तोके’—पुत्रमें, पौत्रे न आयुषि मा नो | ‘तनये’—पौत्रमें, आयुमें तथा गौ और गोषु मा नोऽश्वेषु शरीरिषु । | अश्व आदि शरीरधारियोंमें भी क्षय न ये चास्माकं वीरा विक्रामन्तो | करो । हमारे जो वीर—विक्रमशील भृत्यास्तान्हे रुद्र भामितः क्रोधितः | सेवक हैं, हे रुद्र ! तुम क्रोधित होकर सन्मा वधीः । कस्मात् ? यस्मा- | उनका भी वध न करो । क्यों ? द्धविष्मन्तो हविषा युक्ताः सदम् | क्योंकि हम हविष्मान्—हविसे युक्त इत् त्वा हवामहे सदैव रक्षणार्थ- | होकर सदा ही तुम्हारा आवाहन माह्वयाम इत्यर्थः ॥२२॥ | करते हैं अर्थात् तुम्हें रक्षाके लिये | सर्वदा ही पुकारते हैं ॥२२॥

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इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यपरमहंसपरिव्राजकाचार्य- श्रीमच्छङ्करभगवत्प्रणीते श्वेताश्वतरोपनिषद्भाष्ये चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥