भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २५

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २५ “एवंविदि पापं कर्म न श्लिष्यते” | होता” “इस प्रकार जाननेवालेको ( छा० उ० ४ । १४ । ३ ) । | पापकर्मका संसर्ग नहीं होता”, “उसे “नैनं कृताकृते तपतः” ( बृ० | पुण्य-पाप सन्ताप नहीं दे सकते”, उ० ४ । ४ । २२) । “एवं | “इसी प्रकार इसके समस्त पाप नष्ट हास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते” | हो जाते हैं ।” ( छा०उ०५ । २४ । ३ ) । | लैङ्गे— | लिङ्गपुराणमें कहा है— “इसी “ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि | प्रकार ज्ञानाग्नि समस्त कर्मोंको भस्म भस्मसात्कुरुते तथा ॥ | कर देता है । इसमें सन्देह नहीं कि ज्ञानिनः सर्वकर्माणि | ज्ञानीके समस्त कर्म जीर्ण हो जाते जीर्यन्ते नात्र संशयः । | हैं, वह नाना प्रकारके पाप-पुण्योंसे क्रीडन्नपि न लिप्येत | क्रीडा करता हुआ भी उनसे लिप्त पापैर्नानाविधैरपि ॥” | नहीं होता ।” शिवधर्मोत्तरेऽपि— | शिवधर्मोत्तरमें भी कहा है— “तस्माज्ज्ञानासिना तूर्ण- | “अतः वह तुरन्त ही सकाम या मशेषं कर्मबन्धनम् । | निष्कामभावसे किये हुए सम्पूर्ण कामाकामकृतं छित्त्वा | कर्मबन्धनको ज्ञानरूप खड्गसे | काटकर शुद्ध हो अपने आत्मामें शुद्धश्चात्मनि तिष्ठति ॥ | स्थित हो जाता है । जिस प्रकार यथा वह्निर्महान्दीप्तः | अत्यन्त प्रज्वलित हुआ अग्नि सूखे शुष्कमाद्रं च निर्दहेत् । | और गीले सब प्रकारके इन्धनको | जला डालता है उसी प्रकार ज्ञानाग्नि तथा शुभाशुभं कर्म | एक क्षणमें ही समस्त शुभाशुभ ज्ञानाग्निर्दहते क्षणात् ॥ | कर्मोंको भस्म कर देता है । जिस पद्मपत्रं यथा तोयैः | प्रकार कमलका पत्ता अपने ऊपर | पड़े हुए जलसे भी लिप्त नहीं होता, स्वस्थैरपि न लिप्यते । | उसी प्रकार ज्ञानी प्रारब्धवश अपनेको शब्दादिविषयाम्भोभि- | प्राप्त हुए शब्दादि विषयरूप जलसे

२६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

२६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

स्तद्वज्ज्ञानी न लिप्यते ॥ लिप्त नहीं होता । जिस प्रकार यद्वन्मन्त्रबलोपेतः मन्त्रबलसे सम्पन्न हुआ पुरुष सर्पोंके क्रीडन्सर्पेर्न दश्यते । साथ खेलते रहनेपर भी उनके द्वारा क्रीडन्नपि न लिप्येत नहीं डसा जाता उसी प्रकार ज्ञानी तद्वदिन्द्रियपन्नगैः ॥ इन्द्रियरूप सर्पोंके साथ क्रीडा करते रहनेपर भी उनसे लिप्त नहीं होता । मन्त्रौषधिवलैैर्यद्व- जिस प्रकार खाया हुआ विष भी ज्जीर्यते भक्षितं विषम् । मन्त्र और ओषधिके सामर्थ्यसे पच तद्वत्सर्वाणि पापानि जाता है उसी प्रकार ज्ञानीके सारे जीर्यन्ते ज्ञानिनः क्षणात् ॥” पाप एक क्षणमें नष्ट हो जाते हैं ।” तथा च सूत्रकारः—“पुरुषा- तथा सूत्रकार भगवान् व्यासजीने [स्वाभिमतसूत्र-] र्थोऽतः शब्दादिति भी “पुरुषार्थोऽतः शब्दादिति [कृन्मतोपन्यासः] बादरायणः” ( ब्र० बादरायणः” इस सूत्रसे ज्ञानको ही सू० ३ । ४ । १) इति परमपुरुषार्थका हेतु बतलाकर फिर ज्ञानस्यैव परमपुरुषार्थहेतुत्वमभि- धाय “शेषत्वात्पुरुषार्थवादो ‘शेषत्वात्पुरुषार्थवादो यथान्येष्विति

१. स्वतन्त्र साधनभूत इस ( औपनिषद आत्मज्ञान ) से मोक्षरूप पुरुषार्थ सिद्ध होता है, क्योंकि इसमें [ ‘तरति शोकमात्मवित्’ इत्यादि ] श्रुति प्रमाण है— ऐसा बादरायणाचार्यका मत है। २. इस सूत्रका विशद अर्थ इस प्रकार है—जैसे ‘व्रीहिभिर्यजेत’ इस व्रीहियागमें करणभूत व्रीहिके साथ ही उसका प्रोक्षण आदि भी यज्ञका अङ्ग माना जाता है उसी प्रकार आत्मा कर्तृरूपसे यज्ञ आदि कर्मका अंग होनेके कारण उसका ज्ञान भी उस कर्मका अङ्ग ही है। अतः आत्मज्ञानके महान् फलको बतानेवाली ‘तरति शोकमात्मवित्’ इत्यादि श्रुति शेषत्वात्--यज्ञादि कर्मोंका अङ्ग होनेके कारण पुरुषार्थवाद है अर्थात् पुरुष [ आत्मा ] की प्रशंसाके लिये अर्थवाद- मात्र है; जिस प्रकार कि अन्यान्य द्रव्यसंस्कारसम्बन्धी कर्मोंमें फलश्रुति अर्थवाद मानी जाती है। उदाहरणके लिये निम्नाङ्कित श्रुति है—‘यस्य पर्णमयी जुहूर्भवति न स पापं श्लोकं शृणोति’ ( जिसकी पलाशकी ‘जुहू’ होती है वह कभी पापमय यशका श्रवण नहीं करता) यह फलश्रुति यज्ञसम्बन्धिनी जुहूसे सम्बन्ध रखनेवाले पलाशकी प्रशंसा करनेसे यज्ञकी ही अङ्गभूत है; अतः यज्ञशेष होनेसे अर्थवाद मानी

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७ यथा···" (ब्र० सू० ३।४।२) इत्यादिना कर्मापेक्षितकर्तृप्रति- पादकत्वेन विद्यायाः कर्मशेषत्व- माशङ्क्य "अधिकोपदेशात्तु बा- दरायणस्य···" (ब्र० सू० ३। ४।८) इत्यादिना कर्तृत्वादि- संसारधर्मरहितापहतपाप्मादिरूप- ब्रह्मोपदेशात्तद्विज्ञानपूर्विकां तु कर्माधिकारसिद्धिं त्वाशासानस्य कर्माधिकारहेतोः क्रियाकारकफल- लक्षणस्य समस्तस्य प्रपञ्चस्या- विद्याकृतस्य विद्यासामर्थ्यात्स्व- रूपोपमर्ददर्शनात्कर्माधिकारोच्छि- त्तिप्रसङ्गाद्भिन्नप्रकरणत्वाद्विन्न- कार्यत्वाच्च परस्परविकल्पः समु- जैमिनिः" इस सूत्रसे जैमिनिके मतानुसार कर्ममें अपेक्षित कर्ताका प्रतिपादन करनेवाली होनेसे विद्याके कर्मशेषत्वकी आशङ्का कर "अधिको- पदेशात्तु बादरायणस्यैवं तद्दर्शनात्" इस सूत्रसे यह बतलाया है कि विद्या कर्तृत्वादि सांसारिक धर्मोंसे रहित निष्पापादिरूप ब्रह्मका प्रतिपादन करती है, इसलिये जो पुरुष उसके ज्ञानपूर्वक कर्माधिकारकी सिद्धिकी आशा रखता है उसके कर्माधिकारके हेतुभूत अविद्याजनित क्रिया, कारक एवं फलरूप समस्त संसारके स्वरूपका विद्याके प्रभावसे विनाश देखा जानेके कारण कर्माधिकारके उच्छेदका प्रसंग उपस्थित होनेसे तथा कर्म और ज्ञानके भिन्न-भिन्न प्रकरण और भिन्न-भिन्न कार्य देखे जानेके कारण उनका आपसमें विकल्प, गयी है। ऐसा जैमिनिका मत है। अभिप्राय यह कि यज्ञादिका कर्ता और भोक्ता संसारी जीव ही शरीर छूटनेपर आत्मा या परात्मा शब्दसे कहा गया है। जो संसारी जीव है उसीके ज्ञानका महत्त्व वेदान्तमें बताया गया है। इस मतमें ईश्वरका अस्तित्व नहीं स्वीकार किया गया है। १. जैमिनिके पूर्वोक्त मतका खण्डन करते हुए कहते हैं—'अधिकोपदेशात्तु' इत्यादि। यदि कर्ता भोक्ता संसारी जीवका ही उपनिषद्की श्रुतियोंमें उपदेश किया गया होता तो उक्तरूपसे की हुई फलश्रुति अवश्य ही अर्थवाद हो सकती थी किन्तु वहाँ तो संसारी जीवकी अपेक्षा बहुत ही उत्कृष्ट असंसारी परमेश्वरका वेद्यरूपसे उपदेश किया गया है, इसलिये मुझ बादरायणका [ आत्मज्ञानसे मोक्षरूप पुरुषार्थकी सिद्धि होती है, इत्यादि ] पूर्वोक्त मत ज्यों-का-त्यों ठीक ही है; क्योंकि 'यः सर्वज्ञः सर्ववित्' इत्यादि श्रुतियोंमें उस उत्कृष्ट परमात्माके स्वरूपका उपदेश देखा जाता है।

२८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

२८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ च्चयोऽङ्गाङ्गिभावो वा नास्तीति प्रतिपाद्य “अत एव चाग्नीन्धना- द्यनपेक्षा” ( ब्र० सू० ३।४। २५) इति विद्याया एव परम- पुरुषार्थहेतुत्वादग्नीन्धनाद्याश्रम- कर्माणि विद्यायाः स्वार्थसिद्धौ नापेक्षितव्यानीति पूर्वोक्तस्याधि- करणस्य फलमुपसंहृत्यात्यन्तमे- वानपेक्षायां प्राप्तायां “सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत्” ( ब्र० सू० ३।४। २६ ) इति नात्य- न्तमनपेक्षा । उत्पन्ना हि विद्या फलसिद्धिं प्रति न किञ्चिदन्यद्- पेक्षते । उत्पत्तिं प्रत्यपेक्षत एव । समुच्चय अथवा अङ्गाङ्गिभाव कुछ भी नहीं हो सकता *-ऐसा प्रतिपादन करके “अतएव चाग्नीन्धनाद्यनपेक्षा” इस सूत्रसे 'विद्या ही परमपुरुषार्थकी हेतु होनेके कारण वह अपने प्रयोजनकी पूर्तिमें अग्नि-इन्धनादिसे निष्पन्न होने- वाले आश्रम-कर्मोंकी अपेक्षा नहीं रखती' इस प्रकार पूर्वोक्त अधिकरणके फलका उपसंहार कर ज्ञानप्राप्तिमें कर्मकी अत्यन्त अनपेक्षा प्राप्त होनेपर “सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत्” इस सूत्रसे यह बतलाया है कि कर्मकी बिल्कुल ही अपेक्षा न हो- ऐसी बात नहीं है, अपि तु विद्या उत्पन्न हो जानेपर ही अपने फलकी सिद्धिमें किसी वस्तुकी अपेक्षा नहीं रखती, अपनी उत्पत्तिमें तो उसे कर्मकी अपेक्षा है ही, क्योंकि

  • वेदमें कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड ये दोनों अलग-अलग हैं तथा ज्ञानसे मोक्ष और कर्मोंसे स्वर्गादिकी प्राप्ति होती है; इसलिये इनके फल भी अलग-अलग हैं । अतः इन दोनोंका परस्पर न तो विकल्प ( एक ही प्रयोजनके लिये दोनोंमेंसे किसी एकका अनुष्ठान ), न समुच्चय ( दोनोंका एक साथ अनुष्ठान ) और न अङ्गाङ्गिभाव ( एकका दूसरेके अन्तर्गत होना ) ही हो सकता है । १. [ क्योंकि ब्रह्मविद्या स्वतन्त्र पुरुषार्थरूप है ] इसीलिये उसमें अग्नि- इन्धन आदि [ आश्रमविहित कर्मों ] की अपेक्षा नहीं है । २. विद्या अपनी उत्पत्तिमें योग्यतावश सभी आश्रम-कर्मोंकी अपेक्षा रखती है। जैसे योग्यतानुसार अश्वका उपयोग होता है। इस विषयमें 'तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन' इत्यादि श्रुति प्रमाण है, [ अर्थात् जैसे घोड़ा रथमें ही जोता जाता है हलमें नहीं उसी प्रकार ] विद्या अपनी उत्पत्तिमें कर्मोंकी अपेक्षा रखती है;

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९

"विविदिषन्ति यज्ञेन" इति | "यज्ञके द्वारा आत्माको जानना श्रुतेरिति विविदिषासाधनत्वेन | चाहते हैं" इस श्रुतिसे वेदने कर्मणामुपयोगं दर्शितवान् । तथा | जिज्ञासाके साधनरूपसे कर्मोंका च "नाविशेषात्" (ब्र० सू० ३। | उपयोग दिखलाया है। तथा इसके आगे ४।१३) "स्तुतयेऽनुमतिर्वा" | "नाविशेषात्" और "स्तुतयेऽनु- (ब्र० सू० ३।४।१४) इति- | मतिर्वा" इन दो सूत्रोंद्वारा "कुर्वन्नेवेह सूत्रद्वयेन कुर्वन्नेवेतिमन्त्रस्यावि- | कर्माणि" इस श्रुतिके दो प्रकारसे द्वद्विषयत्वेन विद्यास्तुतित्वेन | अर्थ दिखलाये हैं—पहला यह कि चार्थद्वयं दर्शितवान् । अत उक्तेन | 'यह 'कुर्वन्नेवेह' इत्यादि मन्त्र अज्ञानी- प्रकारेण ज्ञानस्यैव मोक्षसाधन- | के लिये है।' तथा दूसरा अर्थ यह है त्वायुुक्तः परोपनिषदारम्भः । | कि यह मन्त्र विद्या (ज्ञान) की स्तुतिके लिये है। इसलिये उक्त प्रकारे ज्ञान ही मोक्षका साधन होनेके कारण आगेकी उपनिषद्को आरम्भ करना उचित ही है। ननु बन्धस्य मिथ्यात्वे सति | पूर्व०—यदि जीवका बन्धन ज्ञानादमृत- ज्ञाननिवर्त्यत्वेन | मिथ्या होता तो वह ज्ञानसे निवृत्त त्वेऽनुपपत्ति- | होनेयोग्य हो सकता था और दर्शनम् ज्ञानादमृतत्वं | ऐसी अवस्था में ज्ञानसे अमृतत्वकी स्यात् । न त्वेतदस्ति; प्रति- | प्राप्ति हो सकती थी; किन्तु ऐसी पन्नत्वाद्वाधाभावाद्युष्मदादिस्वरू- | बात है नहीं; क्योंकि बन्धन प्रत्यक्षसिद्ध है, इसका बाध नहीं होता और युष्मदस्मदादि (तू-मैं आदि) रूपसे प्रतीत

मोक्षरूप फलकी सिद्धिमें नहीं। १. [ 'विद्वान्' ऐसा ] विशेषण न होनेके कारण 'कुर्वन्नेवेह' इत्यादि वाक्य तत्त्वज्ञविषयक नहीं है। २. अथवा तत्त्वज्ञके लिये जो कर्मानुज्ञा है वह ज्ञानकी स्तुतिके लिये है। अर्थात् तत्त्वज्ञ होनेपर जीवनपर्यन्त कर्म करनेपर भी कर्मका लेप नहीं होता—ऐसा कहकर तत्त्वज्ञानकी स्तुति की गयी है।

३० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

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[शीर्षक / Header] ३० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १


[वाम स्तम्भ / Left Column - संस्कृत]

पत्वेनात्मनो विलक्षणत्वे सादृ- श्याद्यभावादध्यासासम्भवाच्च । उच्यते—न तावत्प्रतिपन्नत्वेन (उक्तस्यानुपपत्तिपरिहारः) सत्यत्वं वक्तुं शक्यते, प्रतिपत्तेः सत्यत्व- मिथ्यात्वयोः समानत्वात् । नापि बाधाभावात्सत्यत्वम्, विधिमुखेन कारणमुखेन च बाधसम्भवात् । तथाहि श्रुतिः— प्रपञ्चस्य मिथ्यात्वं मायाकार- णत्वं च दर्शयति “न तु तद्- द्वितीयमस्ति” ( बृ० उ० ४ । ३ । २३ ) । “एकत्वम्” “नास्ति द्वैतम् ।” “कुतो विदिते वेद्यं नास्ति” । “एकमेवाद्वितीयम्” ( छा० उ० ६ । २ । १ ) “वा- चारम्भणं विकारो नामधेयम्” ( छा० उ० ६ । १ । ४ ) । “एकमेव सत् ।” नेह नानास्ति किञ्चन” ( बृ० उ० ४ । ४ । १९ ) । “एक- धैवानुद्रष्टव्यम्” ( बृ० उ० ४ । ४ । २० ) । “मायां तु प्रकृतिं विद्यात्” ( श्वेता० उ० ४ । १०) “मायी सृजते विश्व- मेतत्” । (श्वेता० उ० ४।९) “इन्द्रो


[दक्षिण स्तम्भ / Right Column - हिन्दी व्याख्या]

होनेके कारण आत्माका स्वरूप सबसे विलक्षण है, अतः उससे किसीका सादृश्य न होनेके कारण उसमें किसी अन्य वस्तुका अध्यास होना भी सम्भव नहीं है । सिद्धान्ती-अच्छा, बतलाते हैं [ सुनो—] प्रत्यक्षसिद्ध होनेके कारण ही बन्धनकी सत्यता नहीं बतलायी जा सकती, क्योंकि प्रत्यक्षता तो सत्य और असत्य दोनों ही प्रकारकी वस्तुओंमें समान- रूपसे देखी जाती है । बाध न होनेके कारण भी इसकी सत्यता सिद्ध नहीं होती, क्योंकि शास्त्रविधि और कारणदृष्टिसे इसका बाध होना सम्भव है ही । जैसे कि “उसके सिवा दूसरा कोई नहीं है,” “एकत्व ही है,” “द्वैत नहीं है,” “क्योंकि ज्ञान हो जानेपर वेद्यका अभाव हो जाता है,” “एक ही अद्वितीय है,” “विकार वाणीसे आरम्भ होनेवाला नाममात्र है,” “एक ही सद्बस्तु है,” “यहाँ .नाना कुछ भी नहीं है,” “सबको एकरूप ही देखना चाहिये,” “प्रकृतिको माया समझो,” “मायावी परमात्मा इस सम्पूर्ण प्रपञ्चको रचता है,” “इन्द्र ( परमात्मा ) मायासे

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१

मायाभिः पुरुरूप ईयते" ( बृ० | अनेक रूप होकर चेष्टा करता है" उ० २।५।१९) इत्यादिभि- | इत्यादि वाक्योंद्वारा श्रुति प्रपञ्चका वाक्यैः । | मिथ्यात्व और मायामूलकत्व प्रदर्शित "अजोऽपि सन्नव्ययात्मा | करती है । [ श्रीमद्भगवद्गीतामें भूतानामीश्वरोऽपि सन् । | भगवान् भी कहते हैं— ] "मैं प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय | अजन्मा, अविनाशी और सम्पूर्ण संभवाम्यात्ममायया ॥" | प्राणियोंका प्रभु हूँ, तथापि अपनी ( गीता ४ । ६) | प्रकृतिका आश्रय लेकर अपनी "अविभक्तं च भूतेषु | मायासे ही जन्म लेता हूँ", "वह विभक्तमिव च स्थितम्।" | ज्ञेय प्रत्येक शरीरमें आकाशके (गीता १३। १६) | समान अविभक्त एवं एक है तो भी | समस्त प्राणियोंमें विभक्त हुआ-सा | स्थित है।" तथा च ब्राह्मे पुराणे— | ब्रह्मपुराणमें भी कहा है—"धर्म- "धर्माधर्मौ जन्ममृत्यू | अधर्म, जन्म-मृत्यु, सुख-दुःखकी सुखदुःखेषु कल्पना । | कल्पना, वर्णाश्रमविभाग तथा स्वर्ग वर्णाश्रमास्तथा वासः | या नरकमें रहना ये सब परमार्थ- स्वर्गो नरक एव च ॥ | स्वरूप पुरुषमें कहीं भी नहीं हैं । पुरुषस्य न सन्त्येते | जिस प्रकार मरुमरीचिकारूप मृग- परमार्थस्य कुत्रचित् । | तृष्णा जलवत् प्रतीत होती है, उसी दृश्यते च जगद्रूप- | प्रकार इस जगत्का असत्य स्वरूप मसत्यं सत्यवन्मृषा ॥ | ही व्यर्थ सत्य-सा दृष्टिगोचर हो रहा तोयवन्मृगतृष्णा तु | है। वास्तविक शुक्ति शुक्तिरूप ही है, यथा मरुमरीचिका । | किन्तु जैसे वह चाँदीके समान रौप्यवत्कीकसं भूतं | भासने लगती है, घरमें पड़ा हुआ कीकसं शुक्तिरेव च ॥ | रस्सीका टुकड़ा जैसे रात्रिके समय सर्पवद्रज्जुरखण्डश्च | सर्पवत् दिखायी देने लगता है, निशायां वेश्ममध्यगः । |

३२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

३२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ एक एवेन्दुद्वौं व्योम्नि | जिसके नेत्र तिमिररोगसे पीडित तिमिराहतचक्षुषः ॥ | हैं उस पुरुषको जैसे आकाशमें एक आकाशस्य घनीभावो | ही चन्द्रमा दो-सा दिखायी देने नीलत्वं स्निग्धता तथा । | लगता है और जिस प्रकार [ सर्वथा एकश्च सूर्यो बहुधा | शून्यस्वरूप ] आकाशमें घनीभाव, जलाधारेषु दृश्यते ॥ | नीलता और स्निग्धताकी प्रतीति आभाति परमात्मापि | होती है [ उसी प्रकार जगत्का रूप सर्वोपाधिषु संस्थितः । | मिथ्या होनेपर भी सत्य-सा जान द्वैतभ्रान्तिरविद्याख्या | पड़ता है ] । जैसे एक ही सूर्य जलके विकल्पो न च तत्तथा ॥ | अनेक आधारोंमें अनेक-सा दिखायी परत्र बन्धागारः स्या- | देता है उसी प्रकार समस्त उपाधियोंमें त्तेषामात्माभिमानिनाम् । | स्थित परमात्मा ही [ उन-उन आत्मभावनया भ्रान्त्या | रूपोंमें ] भास रहा है । यह देहं भावयतां सदा ॥ | अविद्यासंज्ञक द्वैतभ्रान्ति विकल्प ही आप्रज्ञमादिमध्यान्तै- | है, यह यथार्थ नहीं है । र्भ्रमभूतैस्त्रिभिः सदा । | "जो लोग भ्रान्तिवश सर्वदा जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तैस्तु | देहको ही आत्मा समझते हैं उन च्छादितं विश्वतैजसम् ॥ | देहाभिमानियोंका वह देह मरनेके स्वमायया स्वमात्मानं - | पश्चात् परलोकमें बन्धनका स्थान | होता है, [ अर्थात् उन्हें पुनः देह | धारण करना पड़ता है] । आदि, मध्य | और अन्तमें जो सर्वदा भ्रमरूप ही | हैं उन जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति | तीन अवस्थाओंसे ही विश्व, तैजस | और प्राज्ञ भी आच्छादित हैं । यह | जीव अपनी द्वैतरूप मायासे स्वयं ही

१. जिससे केवल शब्दका ही ज्ञान हो, किसी वस्तुका नहीं, उसे विकल्प कहते हैं; जैसे-आकाशकुसुम, शशशृङ्ग, वन्ध्यापुत्र आदि । इसी आशयका यह योगसूत्र है—'शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः' ( १ । ९ ) ।

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३

मोहयेद्द्वैतरूपया । | अपनेको मोहग्रस्त करता है और गुहागतं स्वमात्मानं | स्वयं ही अपने अन्तःकरणमें स्थित लभते च स्वयं हरिम् ॥ | अपने आत्मभूत श्रीहरिको प्राप्त व्योम्नि वज्रानलज्वाला- | करता है । जिस प्रकार आकाशमें कलापो विविधाकृतिः । | वज्राग्नि(बिजली)की अनेक प्रकारकी आभाति विष्णोः सृष्टिश्च | लपटें दिखायी देती हैं उसी प्रकार स्वभावो द्वैतविस्तरः ॥ | भगवान् विष्णुका स्वभाव ही शान्ते मनसि शान्तश्च | द्वैतविस्ताररूप सृष्टि होकर भास घोरे मूढे च तादृशः । | रहा है । सर्वत्र सर्वदा एकमात्र ईश्वरो दृश्यते नित्यं | भगवान् ही शान्त ( सात्त्विक ) सर्वत्र न तु तत्त्वतः ॥ | चित्तमें शान्तरूपसे और घोर (राजस) | तथा मूढ ( तामस ) चित्तमें घोर लोहमृत्पिण्डहेम्नां च | और मूढरूपसे दिखायी दे रहे हैं । विकारो न च विद्यते । | किन्तु तत्त्वतः वे वैसे नहीं हैं । चराचराणां भूतानां | द्वैतता न च सत्यतः ॥ | “लोहा, मृत्पिण्ड और सुवर्ण सर्वगे तु निराधारे | इनका भी विकार नहीं होता । चैतन्यात्मनि संस्थिता । | जितने चराचर भूत हैं उनका भेद अविद्या द्विगुणां सृष्टिं | वस्तुतः नहीं है । सर्वगत निराधार करोत्यात्मावलम्बनात् ॥ | चैतन्यात्मामें स्थित अविद्या ही सर्पस्य रज्जुता नास्ति | आत्माके आश्रयसे स्थूल-सूक्ष्म दोनों नास्ति रज्जौ भुजङ्गता । | प्रकारकी सृष्टि रचती है। जिस प्रकार उत्पत्तिनाशयोर्नास्ति | सर्पमें रज्जुत्व और रज्जुमें सर्पत्व कारणं जगतोऽपि च ॥ | नहीं है उसी प्रकार जगत्के उत्पत्ति लोकानां व्यवहारार्थ- | और नाशका भी कोई कारण नहीं मविद्येयं विनिर्मिता । | है। इस अविद्याकी रचना (कल्पना) | लोकव्यवहारके लिये ही हुई है।

३४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

३४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

एषा विमोहिनीत्युक्ता द्वैताद्वैतस्वरूपिणी ॥ अद्वैतं भावयेद्ब्रह्म सकलं निष्कलं सदा। आत्मज्ञः शोकसंततीर्णो न बिभेति कुतश्चन ॥ मृत्योः सकाशान्मरणा- दथवान्यकृताद्भयात् । न जायते न म्रियते न वध्यो न च घातकः ॥ न बद्धो बन्धकारी वा न मुक्तो न च मोक्षदः । पुरुषः परमात्मा तु यदतोऽन्यदसच्च तत् ॥ एवं बुद्ध्वा जगद्रूपं विष्णोर्मायामयं मृषा । भोगासङ्गाद्भवन्मुक्त- स्त्यक्त्वा सर्वविकल्पनाम् ॥ त्यक्तसर्वविकल्पश्च स्वात्मस्थं निश्चलं मनः । कृत्वा शान्तो भवेद्योगी दग्धेन्धन इवानलः॥ एषा चतुर्विंशतिभेदभिन्ना

यह द्वैताद्वैतस्वरूपिणी है और [ संसारको मोहित करनेवाली होनेसे ] 'विमोहिनी' कही गयी है। आत्मज्ञानीको चाहिये कि वह सर्वदा पूर्ण परब्रह्मका निष्कल और अद्वैतरूपसे चिन्तन करे। इससे वह शोकसे पार होकर किसीसे भय नहीं करता। उसे मृत्युकी सन्निधिसे, मरनेसे अथवा किसी अन्य कारणसे होनेवाले भयसे भी डर नहीं लगता। "परमपुरुष परमात्मा न जन्म लेता है, न मरता है, न मारा जा सकता है, न मारनेवाला है, न बद्ध है, न बन्धनमें डालनेवाला है, न मुक्त है और न मुक्ति देनेवाला है। उससे भिन्न जो कुछ है वह असत् है। इस प्रकार भगवान् विष्णुके विश्वरूपको मायामय और मिथ्या समझकर सब प्रकारकी कल्पनाको त्यागकर भोगोंकी आसक्तिसे मुक्त हो जाय। इस प्रकार समस्त विकल्पोंसे छूटकर मनको आत्मस्थ, निश्चल और शान्त करके योगी जिसका ईंधन जल चुका है ऐसे [ धूमरहित ] अग्निके समान हो जाता है। "यह चौबीस भेदोंवाली मायो॑


१. मायाके चौबीस भेद इस प्रकार हैं—एक प्रकृति (त्रिगुणात्मिका मूल प्रकृति), सात प्रकृति-विकृति (महत्तत्त्व, अहंकार और पाँच तन्मात्राएँ) और सोलह विकृति (दश इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच भूत)।

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५ माया परा प्रकृतिस्तत्तत्समुत्थौ । │ जगत्की मूल कारण है। उसीसे कामक्रोधौ लोभमोहौ भयं च │ काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, विषाद, विषादशोकौ च विकल्पजालम्॥ │ शोक तथा अन्य विकल्पजाल उत्पन्न हुए धर्माधर्मौ सुखदुःखे च सृष्टि- │ हैं। और उसीसे धर्म-अधर्म, सुख-दुःख र्विनाशपाकौ नरके गतिश्च। │ और सृष्टि-विनाशरूप परिणाम, नरकमें वासः स्वर्गे जातयश्चाश्रमाश्च │ जाना, स्वर्गमें रहना, जाति, आश्रम, रागद्वेषौ विविधा व्याधयश्च॥ │ राग, द्वेष, तरह-तरहकी व्याधियाँ, कौमारतारुण्यजरावियोग- │ कुमारावस्था, तरुणता, वृद्धावस्था, संयोगभोगानशनव्रतानि । │ वियोग, संयोग, भोग, उपवास और इतीदमीदृग्विद्यं निधाय │ व्रत प्रकट हुए हैं। इन सबको तूष्णीमासीनः सुमतिं विविद्धि॥” │ इस प्रकार [ प्रकृतिका ही विकार ] │ जाननेवाला पुरुष इन्हें प्रकृतिमें │ स्थापित कर मौनभावसे स्थित रहता │ है। उसे ही तुम शुभ मतिवाला │ जानो।” तथा च श्रीविष्णुधर्मे षड- │ तथा श्रीविष्णुधर्मोत्तरपुराणके ध्यायाम्— │ अन्तर्गत षडध्यायीमें भी कहा “अनादिसम्बन्धवत्या │ है—“यह क्षेत्रज्ञ अपनेमें क्षेत्रज्ञोऽयमविद्यया । │ अनादिकालसे सम्बद्ध हुई अविद्यासे युक्तः पश्यति भेदेन │ युक्त होकर अपने अन्तःकरणमें स्थित ब्रह्म तत्त्वात्मनि स्थितम्॥ │ ब्रह्मको भेदरूपसे देखता है। जबतक पश्यत्यात्मानमन्यञ्च │ जीव परमात्मासे भिन्न अपनेको तथा यावद्वै परमात्मनः। │ अन्य जीवोंको देखता है तबतक वह तावत्संस्राम्यते जन्तु- │ अपने कर्मोंद्वारा मोहित होकर संसारमें र्मोहितो निजकर्मणा ॥ │ भटकाया जाता है। जब इसके सम्पूर्ण संक्षीणाशेषकर्मा तु │ कर्म क्षीण हो जाते हैं तो यह शुद्ध परं ब्रह्म प्रपश्यति । │ परब्रह्मको अपनेसे अभिन्नरूपसे

३६ श्वेताश्वतरोपनिषद् '[ अध्याय १

३६ श्वेताश्वतरोपनिषद् '[ अध्याय १ अभेदेनात्मनः शुद्धं | देखता है, और शुद्ध हो जानेके शुद्धत्वादक्षयो भवेत् ॥ | कारण यह अक्षय हो जाता है । अविद्या च क्रियाः सर्वा | समस्त कर्म अविद्यारूप हैं और ज्ञान विद्या ज्ञानं प्रचक्षते । | विद्या कहलाता है । कर्मसे जीवको कर्मणा जायते जन्तु- | जन्म लेना पड़ता है और ज्ञानसे वह र्विद्यया च विमुच्यते ॥ | मुक्त हो जाता है । अद्वैत ही परमार्थ अद्वैतं परमार्थो हि | है और द्वैत उससे भिन्न (अपरमार्थ) द्वैतं तद्भिन्न उच्यते । | कहा जाता है । हे राजन् ! पशु, पशुतिर्यङ्मनुष्याख्यं | तिर्यक्, मनुष्य और नारकी जीव— तथैव नृप नारकम् ॥ | यह चार प्रकारका भेद मिथ्या ज्ञानके चतुर्विधोऽपि भेदोऽयं | ही कारण है । मैं अन्य हूँ, यह अन्य मिथ्याज्ञाननिबन्धनः । | है और ये सब अन्य हैं—यही द्वैत अहमन्योऽपरश्चाय- | कहलानेवाला अज्ञान है । अब ममी चात्र तथापरे ॥ | अद्वैतके विषयमें श्रवण करो । अज्ञानमेतद्द्वैताख्य- | "अद्वैततत्त्व मैं-मेरा, तू-तेरा आदि मद्वैतं श्रूयतां परम् । | बुद्धिसे रहित, निर्विकल्प, निर्विकार मम त्वहमिति प्रज्ञा- | और अनिर्वचनीयरूपसे अनुभूत वियुक्तमविकल्पवत् ॥ | होता है । द्वैत मनोवृत्तिरूप है, अविकार्यमनाख्येय- | परमार्थतः अद्वैत ही तो है; अतः मद्वैतमनुभूयते । | धर्माधर्मरूप निमित्तके कारण उत्पन्न मनोवृत्तिमयं द्वैत- | हुई मनकी वृत्तियोंका निरोध करना मद्वैतं परमार्थतः ॥ | चाहिये । उनका निरोध हो जानेपर मनसो वृत्तयस्तस्मा- | द्वैतकी सिद्धि नहीं होती । द्धर्माधर्मनिमित्तजाः । | यह जो कुछ चराचर जगत् निरोद्धव्यास्तन्निरोधे | है सब मनका दृश्यमात्र है । द्वैतं नैवोपपद्यते ॥ | मनोदृष्टमिदं सर्वं | यत्किञ्चित्सचराचरम् । |

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७ मनसो ह्यमनीभावे- मनका अमनीभाव ( नाश ) हो ऽद्वैतभावं तदाप्नुयात् ॥ जानेपर यह अद्वैतभावको प्राप्त हो कर्मणां भावना येयं जाता है । यह जो कर्मोंकी भावना है सा ब्रह्मपरिपन्थिनी । वह ब्रह्मानुभवमें विघ्नरूप है, क्योंकि कर्मभावनया तुल्यं कर्मोंकी भावनाके अनुकूल ही विज्ञानमुपजायते ॥ विज्ञान प्राप्त होता है । विज्ञान तो तादृग्भवति विज्ञप्ति- वैसा ही होता है जैसी कि भावना र्यादृशी खलु भावना । होती है । अतः भावनाका नाश क्षये तस्याः परं ब्रह्म हो जानेपर परब्रह्मका स्वयं ही स्वयमेव प्रकाशते ॥ अनुभव होने लगता है । हे राजन् ! परात्मनोर्मनुष्येन्द्र आत्मा और परब्रह्मका जो विभाग है विभागोऽज्ञानकल्पितः । वह अज्ञानकल्पित ही है । इसीसे क्षये तस्यात्मपरयो- उसका क्षय हो जानेपर फिर आत्मा रविभागोऽत एव हि ॥ और परब्रह्मका अभेद ही निश्चित आत्मा क्षेत्रज्ञसंज्ञो हि होता है । क्षेत्रज्ञसंज्ञक आत्मा प्रकृतिके संयुक्तः प्राकृतैर्गुणैः । गुणोंसे युक्त है, वही उनसे रहित तैरेव विगतः शुद्धः होकर शुद्ध होनेपर परमात्मा परमात्मा निगद्यते ॥” कहलाता है ।” तथा च श्रीविष्णुपुराणे— ऐसा ही श्रीविष्णुपुराणमें भी कहा “परमात्मा त्वमेवैको है—“हे जगत्पते ! तुम्हीं एकमात्र नान्योऽस्ति जगतः पते । परमात्मा हो; तुमसे भिन्न और कुछ भी तवैष महिमा येन नहीं है । जिससे यह चराचर जगत् व्याप्तमेतच्चराचरम् ॥ व्याप्त है वह यह तुम्हारी ही यदेतद्दृश्यते मूर्त्त- महिमा है । यह जो कुछ मूर्त्त जगत् मेतज्ज्ञानात्मनस्तव । दिखायी देता है ज्ञानस्वरूप आपका ही भ्रान्तिज्ञानेन पश्यन्ति रूप है । असंयमी लोग अपने भ्रमपूर्ण जगद्रूपमयोगिनः ॥ ज्ञानके अनुसार इसे जगद्रूप देखते हैं।

३८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

३८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

ज्ञानस्वरूपमखिलं | इस सम्पूर्ण ज्ञानस्वरूप जगत्‌को जगदेतद्बुद्धयः । | अर्थस्वरूप देखनेवाले बुद्धिहीन अर्थस्वरूपं पश्यन्तो | पुरुषोंको मोहरूप महासागरमें भ्राम्यन्ते मोहसंप्लवे ॥ | भटकना पड़ता है । किन्तु जो ये तु ज्ञानविदः शुद्ध- | शुद्धचित्त ज्ञानीलोग हैं वे इस चेतसस्तेऽखिलं जगत् । | सम्पूर्ण जगत्‌को आप परमात्माका ज्ञानात्मकं प्रपश्यन्ति | ज्ञानमय स्वरूप ही देखते हैं ।” त्वद्रूपं पारमेश्वरम् ॥” | “जिसका ऐसा निश्चय है कि 'मैं (१।४।३८-४१) | तथा यह सम्पूर्ण जगत् जनार्दन “अहं हरिः सर्वमिदं जनार्दनो | श्रीहरि ही हैं उनसे भिन्न कोई भी नान्यत्ततः कारणकार्यजातम् । | कार्य-कारणवर्ग नहीं है, उस पुरुषको ईदृङ्मनो यस्य न तस्य भूयो | फिर सांसारिक राग-द्वेषादि द्वन्द्वरूप भवोद्भवा द्वन्द्वगदा भवन्ति ॥” | रोग नहीं होते ।” (१।२२।८७) | “ज्ञानस्वरूपमत्यन्तं | “जो परमार्थतः ( वास्तवमें ) निर्मलं परमार्थतः । | अत्यन्त निर्मल ज्ञानस्वरूप परमात्मा है तदेवार्थस्वरूपेण | वही अज्ञान-दृष्टिसे विभिन्न पदार्थोंके भ्रान्तिदर्शनतः स्थितम् ॥” | रूपमें प्रतीत हो रहा है ।” “वे विश्व- (१।२।६) | मूर्ति भगवान् ज्ञानस्वरूप हैं, पदार्थाकार “ज्ञानस्वरूपो भगवान्यतोऽसा- | नहीं हैं, इसलिये इन पर्वत, समुद्र वशेषमूर्तिर्न तु वस्तुभूतः । | और पृथिवी आदि विभिन्न पदार्थोंको ततो हि शैलाब्धिधरादिभेदा- | तुम विज्ञानका ही विलास जानो ।” ञ्जानीहि विज्ञानविजृम्भितानि ॥ | “हे द्विज ! क्या घट-पटादि कोई भी (२।१२।३९) | ऐसी वस्तु है जो आदि, मध्य और वस्त्वस्ति किं कुत्राचिदादिमध्य- | अन्तसे रहित एवं सर्वदा एक रूपमें पर्यन्तहीनं सततैकरूपम् । | ही रहनेवाली हो । पृथिवीपर जो यच्चान्यथात्वं द्विज याति भूमौ | वस्तु बदलती रहती है, पूर्ववत् नहीं

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९

न तत्तथा तत्र कुतो हि तत्त्वम् ॥ | रहती, उसमें वास्तविकता कैसे हो मही घटत्वं घटतः कपालिका | सकती है ? देखो, मृत्तिका ही घटरूप कपालिकाचूर्णरजस्ततोऽणुः । | हो जाती है, फिर वही घटसे कपाल, जनैः स्वकर्मस्तिमितआत्मनिश्चयै- | कपालसे चूर्ण रज और रजसे अणु- रालक्ष्यते ब्रूहि किमत्र वस्तु ॥ | रूप हो जाती है। फिर बताओ तो तस्मान्न विज्ञानमृतेऽस्ति किञ्चि- | सही, अपने कर्मके वशीभूत हो त्क्वचित्कदाचिद्द्विज वस्तुजातम्। | आत्मनिश्चयको भूले हुए मनुष्य इसमें विज्ञानमेकं निजकर्मभेद- | कौन-सी सत्य वस्तु देखते हैं ? अतः विभिन्नचित्तैर्बहुधाभ्युपेतम् ॥ | हे द्विज ! विज्ञानके सिवा कभी कहीं ज्ञानं विशुद्धं विमलं विशोक- | कोई भी पदार्थसमूह नहीं है। मशेषलोभादिनिरस्तसङ्गम् । | अपने-अपने कर्मोंके कारण विभिन्न एकं सदैकं परमः परेशः | चित्तवृत्तियोंसे युक्त पुरुषोंको एक स वासुदेवो न यतोऽन्यदस्ति ॥ | विज्ञान ही विभिन्नरूपसे प्रतीत हो सद्भाव एवं भवतो मयोक्तो | रहा है। राग-द्वेषादि मलसे रहित, ज्ञानं तथा सत्यमसत्यमन्यत् । | शोकशून्य, लोभादि सम्पूर्ण दोषोंसे एतन्तु यत्संव्यवहारभूतं | वर्जित, सदा एकरस एवं असंग एकमात्र तत्रापि चोक्तं भुवनाश्रितं ते ॥" | विशुद्ध विज्ञान ही वह सर्वश्रेष्ठ परमेश्वर (२।१२। ४१-४५) | वासुदेव है; उससे भिन्न और कुछ "अविद्यासंचितं कर्म | भी नहीं है। इस प्रकार मैंने तुम्हारे तच्चाशेषेषु जन्तुषु ॥ | प्रति परमार्थका निरूपण किया। आत्मा शुद्धोऽक्षरः शान्तो | बस, एक ज्ञान ही सत्य है, और निर्गुणः प्रकृतेः परः । | सब मिथ्या है। उसके सिवा यह जो | व्यावहारिक सत्य है उस त्रिभुवनके | विषयमें भी वर्णन कर दिया।" | "कर्म अविद्याजनित है और वह | सभी जीवोंमें विद्यमान है; किन्तु | आत्मा शुद्ध, निर्विकार, शान्त, | निर्गुण और प्रकृतिसे अतीत है।

४० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

४० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

प्रवृद्ध्यपचयौ न स्त सम्पूर्ण प्राणियोंमें विद्यमान उस एक एकस्याखिलजन्तुषु ॥" आत्माके वृद्धि और क्षय नहीं होते।" (२।१३।७०-७१) "यत्त कालान्तरेणापि हे राजन् ! जो कालान्तरमें भी नान्यसंज्ञामुपैति वै। परिणामादिके कारण होनेवाली किसी परिणामादिसंभूतां अन्य संज्ञाको प्राप्त नहीं होती वही तद्वस्तु नृप तच्च किम् ॥" परमार्थ वस्तु है। ऐसी वस्तु [आत्माके (२।१३।१००) "यद्यन्योऽस्ति परः कोऽपि सिवा ] और क्या है ? हे नृपश्रेष्ठ ! मत्तः पार्थिवसत्तम । यदि मुझसे भिन्न कोई और पदार्थ तदैषोऽहमयं चान्यो होता तो यह, मैं, अमुक, अन्य वक्तुमेवमपीष्यते ॥ आदि भी कहना ठीक हो सकता यदा समस्तदेहेषु था। जब कि सम्पूर्ण शरीरोंमें एक पुमानेकेको व्यवस्थितः। ही पुरुष स्थित है तो 'आप कौन हैं ?' तदा हि को भवान्सोऽह- 'मैं वह हूँ' इत्यादि वाक्य वञ्चनामात्त्र मित्येतद्विप्रलम्भनम् ॥ हैं ! तुम राजा हो, यह पालकी है, त्वं राजा शिविका चेयं हम तुम्हारे सामने चलनेवाले वाहक वयं वाहाः पुरःसराः । अयं च भवतो लोको हैं और ये तुम्हारे परिजन हैं— न सदेतत्तवोच्यते ॥" यह तुम ठीक नहीं कहते।" (२।१३। ९०-९२) "वस्तु राजेति यल्लोके "व्यवहारमें जो वस्तु राजा है, जो यच्च राजभटात्मकम् । राजसेवकादि हैं और जिसे राजत्व तथान्ये च नृपत्वं च कहते हैं तथा इनके सिवा जो अन्य तत्तत्सङ्कल्पनामयम् ॥" पदार्थ हैं वे सब सङ्कल्पमय ही हैं।" (२।१३।९९) "अनाशो परमार्थश्च "अविनाशी परमार्थतत्त्वकी उपलब्धि प्राज्ञैरभ्युपगम्यते ।" (२।१४। २४) तो ज्ञानियोंको ही होती है।"

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१ "परमार्थस्तु भूपाल "राजन् ! तुम मुझसे संक्षेपमें संक्षेपाच्छ्रूयतां मम ॥ परमार्थतत्त्व श्रवण करो । सर्वव्यापी, एको व्यापी समः शुद्धो सर्वत्र समभावसे स्थित, शुद्ध, निर्गुण, निर्गुणः प्रकृतेः परः । प्रकृतिसे अतीत, जन्म और वृद्धि जन्मवृद्ध्यादिरहित आदिसे रहित, सर्वगत एवं अविनाशी आत्मा सर्वगतोऽव्ययः ॥ आत्मा एक है । वह परम ज्ञानमय परज्ञानमयः सद्भि- है । हे राजन् ! उस प्रभुका र्नामजात्यादिभिः प्रभुः। वास्तविक नाम एवं जाति आदि- न योगवान्न युक्तोऽभू- से संयोग न तो है, न हुआ न्नैव पार्थिव योक्ष्यते ॥ है और न कभी होगा ही । तस्यात्मपरदेहेषु उसका अपने और दूसरोंके देहों- संयोगो ह्येक एव यत् । के साथ एक ही संयोग है । विज्ञानं परमार्थोऽसौ इस प्रकारका जो विशेष ज्ञान द्वैतिनोऽतथ्यदर्शिनः ॥" है वही परमार्थ है । द्वैतवादी तो (२।१४।२८-३१) अपरमार्थदर्शी हैं । हे विद्वन् ! इस "एवमेकमिदं विद्ब- प्रकार यह सारा जगत् वासुदेवसंज्ञक न्भेदि सकलं जगत् । परमात्माका एक अभिन्न स्वरूप वासुदेवाभिधेयस्य ही है ।" स्वरूपं परमात्मनः ॥" "[गुरुवर ऋभुके] इस उपदेशसे (२।१५।३५) निदाघ भी अद्वैतपरायण हो गया; "निदाघोऽप्युपदेशेन और तब वह समस्त प्राणियोंको तेनाद्वैतपरोऽभवत् ॥ आत्माके साथ अभेदरूपसे देखने सर्वभूतान्यभेदेन लगा तथा उसे ब्रह्मका साक्षात्कार हो स ददर्श तदात्मनः । गया । हे द्विज ! इससे उसने उत्कृष्ट तथा ब्रह्म ततो मुक्ति- मोक्षपद प्राप्त कर लिया । जिस प्रकार मवाप परमां द्विजः ॥ एक ही आकाश सफेद और नीले आदि सितनीलादिभेदेन भेदसे विभिन्न प्रकारका दिखायी यथैकं दृश्यते नभः ।

४२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

४२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

[वाम भाग]

भ्रान्तदृष्टिभिरात्मापि तथैकः सन्पृथक्पृथक् ॥” ( २ । १६ । १९-२० ) “एकः समस्तं यदिहास्ति किञ्चि- त्तदच्युतो नास्ति परततोऽन्यत् । सोऽहं स च त्वं स च सर्वमेत- दात्मस्वरूपं त्यज भेदमोहम् ॥ इतीरितस्तेन स राजवर्य- स्तत्याज भेदं परमार्थदृष्टिः । स चापि जातिस्मरणात्प्रबोध- स्तत्रैव जन्मन्यपवर्गमाप ॥” ( २ । १६ । २२—२४ )

तथा लैङ्गे— “तस्मादज्ञानमूलो हि संसारः सर्वदेहिनाम् । परतन्त्रे स्वतन्त्रे च भिदाभावाद्दिचारतः ॥ एकत्वमपि नास्त्येव द्वैतं तत्र कुतोऽस्त्यहो । एकं नास्त्यथ मर्त्यं च कुतो मृतसमुद्भवः ॥ नान्तःप्रज्ञो बहिष्प्रज्ञो न चोभयत एव च ।


[दक्षिण भाग]

देता है उसी प्रकार जिनकी दृष्टि भ्रमग्रस्त है उन लोगोंको आत्मा एक होनेपर भी पृथक्-पृथक् दिखायी देता है।” “इस जगत्में जो कुछ है वह सब एकमात्र श्रीहरि ही है; उनसे भिन्न और कुछ भी नहीं है। वही मैं हूँ, वही तुम हो और यह सारा जगत् भी आत्मस्वरूप श्रीहरि ही है। तुम भेदभ्रमको छोड़ दो। उस (अवधूत) के ऐसा कहनेपर उस सौवीरनरेशने परमार्थदृष्टिसे सम्पन्न हो भेदबुद्धि छोड़ दी, और उस ब्राह्मणने भी पूर्वजन्मका स्मरण रहनेसे तत्त्वज्ञान प्राप्त कर उसी जन्ममें मोक्षपद प्राप्त कर लिया।”

तथा लिङ्गपुराणमें कहा है— “अतः समस्त प्राणियोंको यह संसार अज्ञानके ही कारण प्राप्त हुआ है; क्योंकि विचार करनेपर स्वतन्त्र परमात्मा और परतन्त्र जीवमें कोई भेद नहीं है। अहो ! जब उसमें एकत्व भी नहीं है तो द्वैत कहाँसे हो सकता है? जब एक नहीं और कोई मर्त्य (मरणधर्मा) भी नहीं तो मृत्यु कहाँसे हो सकती है? वह न अन्तःप्रज्ञ (भीतरकी जाननेवाला) हैं, न बहिष्प्रज्ञ (बाहरकी जानने- वाला) है, न दोनों ओरकी जानने-

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३ [ वाम स्तम्भ ] न प्रज्ञानघनस्त्वेवं न प्रज्ञोऽप्रज्ञ एव सः ॥ विदिते नास्ति वेद्यं च निर्वाणं परमार्थतः । अज्ञानतिमिरात्सर्वं नात्र कार्या विचारणा ॥ ज्ञानं च बन्धनं चैव मोक्षो नाप्यात्मनो द्विजाः। न ह्येषा प्रकृतिर्जीवो विकृतिश्च विकारतः । विकारो नैव मायैषा सदसद्व्यक्तिवर्जिता ॥” तथाह भगवान्पाराशरः— “अस्माद्वि जायते विश्व- मत्रैव प्रविलीयते । स मायी मायया बद्धः करोति विविधास्तनूः ॥ न चात्रैवं संसरति न च संसारयेत्परम् । न कर्ता नैव भोक्ता च न च प्रकृतिपूरुषौ ॥ न माया नैव च प्राण- श्चैतन्यं परमार्थतः । [ दक्षिण स्तम्भ ] वाला है और न प्रज्ञानघन है। इसीलिये वह न प्रज्ञ (प्रकृष्ट ज्ञानवान्) है और न अप्रज्ञ ( ज्ञानहीन ) ही है। ज्ञान हो जानेपर तो कोई ज्ञेय ही नहीं रहता; अतः परमार्थतः निर्वाणस्वरूप ही है। सब कुछ अज्ञानान्धकारके ही कारण है। इसमें किसी प्रकारका विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। हे द्विजगण ! आत्माका न ज्ञान होता है, न बन्धन होता है और न मोक्ष ही होता है। जीव न तो यह प्रकृति है, न विकृति है और न इनका विकार ही है, क्योंकि ये सब विकारी हैं। यह सब तो सत्-असत्‌से विलक्षण माया ही है।” तथा भगवान् पराशर कहते हैं— “इसीसे विश्व उत्पन्न होता है और इसीमें लीन हो जाता है। वह मायामय मायासे बँधकर स्वयं ही अनेक प्रकारके शरीर धारण कर लेता है। किन्तु इस प्रकार न तो वह स्वयं संसारको प्राप्त होता है और न किसी अन्यको ही संसारमें प्रवृत्त करता है क्योंकि वह न कर्ता है, न भोक्ता है, न प्रकृति या पुरुष है, न माया है और न प्राण है; वस्तुतः वह तो चैतन्य है। अतः

४३ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

४३ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

तस्मादज्ञानमूलो हि | समस्त प्राणियोंको अज्ञानके कारण संसारः सर्वदेहिनाम् ॥ | ही संसारकी प्राप्ति हुई है । आत्मा नित्यः सर्वगतो ह्यात्मा | तो नित्य, सर्वगत, कूटस्थ और कूटस्थो दोषवर्जितः । | निर्दोष है । वह एक अपनी एकः स भिद्यते शक्त्या | मायाशक्तिके द्वारा ही भेदको प्राप्त मायया न स्वभावतः ॥ | होता है, स्वरूपतः नहीं । अतः तस्मादद्वैतमेवाहु- | मुनियोंने परमार्थतः अद्वैत ही बतलाया र्मुनयः परमार्थतः । | है; विद्वानोंने इस जगत्‌को ज्ञानस्वरूप ज्ञानस्वरूपमेवाहु- | ही कहा है । जिनकी दृष्टि दूषित है र्जगदेतद्विचक्षणाः ॥ | वे अन्यलोग ही अज्ञानवश इसे अर्थस्वरूपमज्ञाना- | परमार्थस्वरूप समझते हैं । चैतन्य त्पश्यन्त्यन्ये कुदृष्टयः । | आत्मा तो स्वभावतः कूटस्थ, निर्गुण कूटस्थो निर्गुणो व्यापी | और सर्वव्यापक है । भ्रान्तिदर्शी चैतन्यात्मा स्वभावतः ॥ | लोगोंको ही वह पदार्थाकार प्रतीत दृश्यते ह्यर्थरूपेण | होता है । जिस समय पुरुष आत्माका पुरुषैर्भ्रान्तदर्शिभिः । | परमार्थरूपसे साक्षात्कार करता है यदा पश्यति चात्मानं | और इस द्वैतप्रपञ्चको मायामात्र केवलं परमार्थतः ॥ | समझता है उसी समय उसे शान्ति मायामात्रमिदं द्वैतं | प्राप्त होती है । अतः केवल विज्ञान तदा भवति निर्वृतः । | ही है, प्रपञ्च या संसार नहीं है ।” तस्माद्विज्ञानमेवास्ति न प्रपञ्चो न संसृतिः ॥” एवं श्रुत्यादिना नामादिकारणो- | इस प्रकार श्रुति आदिके द्वारा [प्रपञ्चस्य] पन्यासमुखेन स्व- | नामादिके कारणोंका दिग्दर्शन कराने- [मिथ्यात्वम्] रूपेण च बाधित- | से तथा स्वरूपतः बाधित होनेके त्वात्प्रपञ्चस्य मिथ्यात्वमवगम्यते । | कारण प्रपञ्चका मिथ्यात्व जाना जाता अस्थूलादिलक्षणस्य ब्रह्मण- | है। ब्रह्म अस्थूलादि लक्षणोंवाला है, स्तद्विपरीतस्थूलाकारो मिथ्या | अतः उससे विपरीत स्थूलाकार