भारतकोश
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सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

ज्यायाः। तत्रैकदिश्यन्तरं यन्मितं तन्मितमेवान्यदिशीति तदैक्यम् । अन्यथा प्राक्परयोर्वल- नसमत्वानुपपत्तेरिति क्षितिः । अत्रान्येषां स्पष्टक्रान्तिज्ययोरन्तरं वलनं न । किंतु शरसंस्कृत- केवलक्रान्तिज्ययोरन्तरं ग्रहायनवलनमेव ग्रहान्मानार्धयुतग्रहाध्वकेवलाग्राशङ्कुतले प्रसाध्य भुजौ साध्यौ तयोरन्तरमाक्षवलनज्याग्रहबिम्बे इति ध्येयम् । नन्वेवं प्रत्येकं क्रान्तिज्ययोः साधनद्वारा तदन्तरसाधने गौरवमित्यत आह—अर्कदोरिति । अर्कस्य ग्रहोपलक्षणार्तसायन- ग्रहभुजज्यासाधने यद्भोग्यखण्डस्यान्तरं तेन गुणितं बिम्बमानकलानामर्धं पञ्चविंशतियुतशत- द्वयभक्तं यत्सिद्धं तत् चतुर्विंशत्यंशज्यया गुणितं त्रिज्यया भक्तमेवमुक्तप्रकारेण यत्फलं तत् पूर्वं प्रतिपादितम् । हि यतोऽन्तरं न क्रान्तिज्ययोरतों लाघवान्न गौरवमिति भावः ।

भावः । संशयापनोदार्थं तुल्यत्वे कारणमुच्यते । त्रिज्यया तुल्यया कोटिज्यया तत्त्वाश्विमितं भोग्यखण्डं तदेष्टग्रहकोटिज्यया किमित्यनुपातेन भोग्यखण्डानयनपूर्वकं तत्सू( प्र )कारानु- सरणे तत्त्वाश्वितुल्ययोर्गुणहरयोर्नाशादिष्टग्रहकोटिज्यया परमक्रान्तिज्यया गुण्या त्रिज्यया भाज्येति द्युज्यानुपातानङ्गीकारे ग्रहणाधिकारोक्तानयनं पर्यवसन्नमिति । अत्राशङ्कतलसंस्कारं विना भुजज्ञानासम्भवादुक्तदिशाऽऽक्षवलनानयनमशक्यमिति नोक्तमाचार्यैरिति ध्येयम् । ननूत्क्रमज्यानिरासोऽयमन्यथा वाऽथ कथ्यते इत्यनेनोत्क्रमज्यानिराकरणं प्रतिज्ञातम् । प्रति- पादितं च तदाद्ये तदन्तरं ग्रन्थे तत्क्रमज्यया वलनं कार्यमिति नोत्क्रमज्यानिरासोक्तिरतो विरोध इत्यतस्तदुत्तरमुपसंहारभूतमाह-अथेति । हे बालिशाः ! तत्त्वातत्त्वविवेकज्ञानशून्याः । अथ एतद्ग्रन्थभावनानन्तरम् । इदं वलनानयनम् । क्रमक्रान्तेः । भुजक्रमज्यानीतक्रमक्रान्ति- ज्यायाः सकाशादुत्पन्नं द्युज्यानुपाताङ्गीकारात् । अन्यथा विना तुल्यपदं क्रमक्रान्तेरित्यनु- पपन्नम् । द्वितीयान्तस्य कथनापत्तेः । वीक्ष्य सम्यग्ज्ञात्वा । भ्रान्तिम् । उत्क्रमज्यया वलनं कार्यं तत्क्रमज्ययेति बुद्धिभ्रमं संशयं त्यजत । दूरी कुरुत । तथा च क्रमज्याप्रतिपादने- नैवार्थसिद्धमुत्क्रमज्यानिवारणं तस्य क्रमज्याप्रतिपादनफलत्वादुत्क्रमज्यानिरासः प्रतिज्ञात इति भावः ।।७३।। ननु तथाऽपि ग्रहबिम्बसंबन्धेन वलनानयनग्रन्थे द्युज्यानुपाताङ्गीकारकारणं न दृश्यते इत्यतस्तमनुपातं समर्थयति । नामितमिति—यतः कारणाद्ग्रहबिम्बं नामितं याम्योत्तरयोर्नतं भवत्यतः सा सन्निभग्रहसंबन्धिनी समा । ध्रुवाभिमुखी क्रान्तिस्तिर्यक् भवति । तुकाराद्ध्रुवा- भिमुखी वस्तुभूता क्रान्तिरपि तिर्यक्त्वेन ध्रुवाभिमुखी न किन्तु कदम्बाभिमुखीति भासते इति सूचितम् । अतः कारणादत्र वलनानयने यो द्युज्यानुपातः क्रियते सोऽनुपातस्तस्तिर्य- क्करणाय । सन्निभग्रहक्रान्तिरूपाय न वलनस्य । तिर्यक्करणाय कदम्बाभिमुखीकरणाय निष्पन्न इत्यर्थः । ननु सदा क्रान्तेर्ध्रुवाभिमुखत्वेन नामितग्रहबिम्बे तत्तिर्यक्त्वं कथं भासता- मन्यथा विषुवत्क्रान्तिवृत्तान्तरस्य क्रान्तेर्व्याघातात्तस्यास्तदेकाभिमुखत्वादित्यत आह--छत्रव- दिति । यथाऽऽतपनिवारणं छत्रं स्वमस्तकोपरिस्थं तदा तत्स्वयाम्योत्तरानुसारमेव । यदा तु दण्डतिर्यक्करणेन छत्रं विदिक्षु नामितं तदा स्वयाम्योत्तराभ्यां छत्रयाम्योत्तरा तिरश्ची- नैवेति प्रत्यक्षम् । तथा कल्प्यमेषतुलादिग्रहे विषुवद्वृत्तस्थत्वेन तस्य कल्पितभूमध्यपूर्वापर- वृत्तस्थितं ग्रहबिम्बवृत्ते ध्रुवाभिमुखयाम्योत्तरं न भवत्यतस्तत्र बिम्बवृत्तनेम्यां विषुवत्क्रान्ति- प्रदेशयोरन्तरवलनं समं ध्रुवाभिमुखम् । बिम्बकेन्द्रभूगर्भान्तरसूत्रस्य दण्डानुकरणत्वात् । यदाऽन्यत्र राशौ तदा ग्रहबिम्बस्थलान्नामितमतोऽहोरात्रवृत्तक्रान्तिवृत्तान्तरं बिम्बनेम्यां नतत्वेन तिरश्चीनं न ध्रुवाभिमुखमन्यथा तिरश्चीनभानानुपपत्तेः । किंतु क्रान्तिवृत्ते ग्रहगम- नात्तद्याम्योत्तरकदम्बाभिमुखम् । ग्रहबिम्बवृत्ते नेम्यां क्रान्त्यन्तरेण यद्वलनमागतं तत्कोटि- रूपं ध्रुवाभिमुखम् । त(प्र)त्यक्षं तु तन्नेम्यां कदम्बाभिमुखं कर्णरूपमतस्तत्र भूगर्भग्रहबिम्ब- केन्द्रोत्तरसूत्रस्य त्रिज्यामितस्य तिर्यक्त्वात्त्रिज्या कर्णः द्युज्या कोटिः क्रान्तिज्या भुज इत्यु-

३७६ गोलाध्याये त्पन्नक्षेत्राकद्युज्याकोटौ त्रिज्याकर्णस्तदा क्रान्त्यन्तररूपवलनज्याकोटौ कः कर्ण इत्यनुपातेन कदम्बाभिमुखं कर्णरूपं वलनं भवतीति न किंचिद्विरुद्धमिति भावः ॥७४॥ अथाऽऽरब्धाधिकारो निरूपित इति फक्किकयाऽऽह - इति ग्रहणवासनेति । ग्रहणाधि- कारोक्तकठिनपदार्थानामुपपत्तिर्निरूपितेत्यर्थः । दैवज्ञवर्यगणसंततसेव्यपार्श्वश्रीरङ्गनाथगणकात्मजनिर्मितेऽस्मिन् । याता शिरोमणिमरीच्यभिधे समाप्तिं सूर्येन्दुपर्वगणितोक्तिसुवासनेयम् ॥ इति श्रीसकलगणकसार्वभौमरङ्गनाथगणकात्मजविश्वरूपापरनामकमुनीश्वरगणक- विरचिते सिद्धान्तशिरोमणिमरीचावुत्तराध्याये ग्रहणाधिकार- वासनाधिकारः संपूर्णः ॥ केदारदत्तः—ग्राह्य बिम्ब में, सूर्यग्रहण में सूर्य बिम्ब पर और चन्द्रग्रहण में चन्द्रबिम्ब पर ग्रहण का स्पर्श, मध्य, मोक्ष सम्मीलनोन्मीलनादि किस दिशा में किस बिन्दु पर होंगे— वलन गणित का साधन क्रम ज्या गणित से ही करना चाहिए । लल्लाचार्य तथा श्रीपति प्रभृति आचार्यों ने वलनगणित साधन में नत काल की क्रम ज्या की जगह नत काल उत्क्रम ज्या ग्रहण की है जो गोलज्ञान बहिर्भूत और युक्तिशून्य है । ग्रह बिम्ब का स्पर्शादि बिन्दु, बिम्ब के पूर्व पश्चिम आदि दिशा के किस बिन्दु से किधर वलयित है अर्थात् झुकाव है वह स्पार्शिक बिन्दु जो वलयित होता है उसी के गणित ज्ञान को वलन गणित कहा जाता है । विषुवद्वृत्त को समवृत्त मान कर याम्योत्तर वृत्तगत ग्रह से अयन वलन की उपपत्ति समझनी चाहिए । क्रान्तिवृत्त पर लम्बरूप कदम्बप्रोत वृत्त के उत्तर दक्षिण कदम्ब नामक दो पृष्ठीय केन्द्र होते हैं तथा विषुववृत्त के दो पृष्ठीय केन्द्र उत्तर दक्षिण ध्रुव भी प्रसिद्ध हैं । जिस समय मकरा'दि बिन्दु, याम्योत्तर वृत्त में रहेगा तो कदम्ब भी उस समय याम्योत्तर में रहने से उस समय ध्रुव और कदम्ब की एकवृत्तीय स्थिति से क्रान्ति विषुवद्वृत्त के अन्तर का अभाव गोलदर्शन से स्पष्ट है । उपपत्ति सहित व्याख्या—पुनः याम्योत्तर वृत्त का कुम्भादि स्थान राशि वृत्त के मध्य में कुम्भ राश्युदयासुमान = १९३५ ÷ ६० = ३२।१५ कालांशों से कदम्ब याम्योत्तर वृत्त सम्पात से ३२।१५ कालांशों में कुम्भादि बिन्दु पश्चिम दिशा में लम्बित रहेगा । क्योंकि कदम्ब ओर याम्योत्तर सूत्रों का अन्तर कोण ही वलन कहा गया है । उस कोण की ज्या उक्त अंशों की क्रमज्या ही होती है न कि उत्क्रम ज्या । ज्या चाप के मध्य में बाण रूप उत्क्रमज्या का इस स्थल पर बलन का मान कैसे कहा जावेगा ? क्योंकि क्रान्ति- मण्डल प्राची से विषुवन्मण्डल प्राची के अन्तराल के चाप का कोणमान कदम्ब सूत्र में ध्रुव और कदम्ब सूत्रों से उत्पन्न कोणमान ग्रह क्षितिज में अयनवलन हैं । वह क्रम ज्या ही होती है वह उत्क्रम ज्या कदापि नहीं होती है ।

ग्रहणवासना ३७७ लल्लाचार्य के वलन साधन गणित में नत की क्रम ज्या की जगह नत की उत्क्रम ज्या गणित साधन भ्रम का प्रकारान्तर (अन्य प्रकार) से निराकरण— अहोरात्रवृत्त क्रान्तिवृत्त सम्पात बिन्दु पर मुद्रिकाकार (अँगूठी की तरह) ग्रह बिम्ब के निवेशन स्थान पर अर्थात् बिम्ब की परिधि पर जहाँ अहोरात्रवृत्त लगता है वहाँ से क्रान्ति वृत्त दक्षिणोत्तर दिशा में जहाँ पर अन्तरित होता है वहाँ से पूर्वापर वृत्त ग्रह तक वलन होता है । इस स्थल पर, सूर्य की क्रान्ति में ग्रह बिम्बार्धककला युक्त सूर्यं की क्रान्तियों का जो अन्तर होता है उसे तत्कालीन क्रान्त्यन्तर समझिये । इसका साधन, सूर्य भुज साधनावसर पर जो भोग्य खण्ड होता है उस भोग्य खण्ड से गुणित बिम्बमानार्ध कला और २२५ से भाग देने पर सूर्य की तत्कालीन भुजज्याओं का अन्तर होता है । इसे अ मानिये तो स्फुट भोग्य खण्ड ज्ञान के लिये २२५ X अ यदि ───────────────── = स्फुट भोग्य खण्ड । त्रि तुल्य कोटि में स्फु भो. ख X बिम्बार्ध पुनः ────────────────────── = दोर्ज्यान्तर । २२५ स्फु भो खं बिम्बार्ध X २२५ = ────────────────────────── = दोर्ज्यान्तर २२५ त्रि स्फु भो ख X बिम्बार्ध ──────────────────────── = दोर्ज्यान्तर । त्रि अतः क्रान्ति साधन के लिये जिनज्या X दोर्ज्यान्तर ──────────────────────── = क्रान्त्यन्तर त्रि यह क्रान्त्यन्तर बिम्ब व्यासार्ध में है, अतः अनुपात से त्रिज्या व्यासार्ध वलन = जिनज्या X दोर्ज्यान्तर X त्रि दोर्ज्यान्तर X जिनांशज्या ─────────────────────────── = ─────────────────────────── त्रि X त्रि त्रि = क्रान्त्यन्तर यह क्रान्त्यन्तर बिम्ब व्यासार्ध में वलन ज्या का चाप वलन होता है । वलन ज्या X त्रि अनुपात से पुनः, ───────────────── बिम्ब व्यासार्ध वृत्त वलन ज्या में उत्थापन देने से दोर्ज्यान्तर X जिनांशज्या X त्रि ───────────────────────────────── = त्रि X बिम्ब व्यासार्ध

३७८ गोलाध्याये दोर्ज्यान्तर × जिनांश ज्या ------------------------- = कोटि क्रम ज्या का मान बिम्ब व्यासार्ध त्रिज्यावृत्त में वलन ज्या होती है । जब ग्रह विषुवद्वृत्तस्थ हो तो भूमध्य से खस्वस्तिकस्थ बिम्बकेन्द्रगत सूत्र = त्रिज्या सूत्र के शिर में स्थित बिम्ब चारों तरफ से छत्र की तरह नामित होता है । बिम्ब से त्रिज्या तुल्य दूरी पर वलन दान देना चाहिए । यदि मेषान्त में ग्रह हो तो मेषान्त क्रान्ति से खस्वस्तिक से उत्तर में ग्रह बिम्ब नत होता है, त्रिज्या सूत्र = कर्ण, बिम्ब मध्य से ध्रुव सूत्र गत सूत्र पर लम्ब = द्युज्या कोटि, क्रान्तिज्या = भुज बिम्बगत सूत्र कर्णकार होता है । त्रि × कोटि अन्तर ----------------- = अन्तर द्युज्या उत्थापन से, जिन ज्या × कोज्या

बिम्ब व्यास १/२ कोटिज्या × जिन ज्या ------------------- = वलन ज्या होती है । द्युज्या इसी युक्ति से अक्षांश की क्रमज्या से आक्षवलन साधन होता है । यथा—याम्योत्तरक्षितिज सम्पात का नाम सम स्थान । ध्रुव से २४° वृत्त से कृत वृत्त कदम्ब भ्रमवृत्त में कदम्ब स्थान । समस्थान से अक्षांश व्यासार्धेन क्रियमाण वृत्त का नाम अक्षभ्रमवृत्त । मध्याह्न में सूर्य से समस्थानगत सूत्र ध्रुव में होकर जावेगा । अतः विषुवत्समवृत्तो- परि एक याम्योत्तर वृत्त होने से आक्षवलनाभाव । यदि दिनार्ध से सूर्य नत है, समस्थान से सूर्य गत सूत्र का पूर्वापर वृत्त से जहाँ सम्पात वहाँ से खमध्य तक के अन्तरांश वही अंश समसूत्र और अक्षांश वृत्त तक में होते हैं । दोनों की ज्या भी समान होती है । क्षितिजस्थ सूर्य में क्षितिज ही समसूत्र होगा । ऐसी स्थिति में पूर्वापर और अक्ष वृत्त में नतांश=९०° अक्षांश वृत्त में ९० अक्षांशज्या = अक्ष ज्या । अनुपात से दिनार्ध तुल्य नत काल में ९०° तुल्य सममण्डलीय नतांश तो इष्ट नतांश में— ९०° × इष्ट नतांश ---------------- = नतांश क्रम ज्या इसके अक्षज्या वृत्त में परि- दिनार्ध णामन देने से नतांशक्रमज्या ९०° × अक्ष ज्या वृत्त ------------------------------ = वलन ज्या दिन × त्रिज्या यह द्युज्यावृत्त में प्राप्त होने से पुनः अनुपात से त्रिज्या वृत्त में परिणत करने से—

ग्रहणवासना ३७९ वलनज्या × त्रि ──────────────── , वलन ज्या का उत्थापन देने से द्युज्या नतांश क्रमज्या— अक्षज्या × त्रि ──────────────── द्यु × त्रि नतांश क्रम ज्या × अक्ष ज्या = ───────────────────────────── = स्थूलाक्षवलन ज्या होती है । द्यु अथवा—सत्रिभग्रहोपरिगत ध्रुवप्रोतनाडी वृत्तोत्पन्न कोण समकोण होता है । तथा क्रान्तिवृत्त नाड़ी वृत्तोत्पन्न कोण = जिनांश तुल्य । सत्रिभग्रह की ज्या = खेट कोटिज्या अतः प न स त्रिभुज में सत्रि ग्रज्या × जिनज्या ──────────────────────── सत्रिभग्रह की क्रान्ति ज्या यह क्रान्ति ज्या ध्रुव प्रोत वृत्त में त्रि होती है, किन्तु अपेक्षित है ग्रह क्षितिज वृत्त में । ग्रहोपरिगत ध्रुव प्रोत वृत्त में ९०-क्रान्ति का नाम 'द्युज्या चाप परिभाषया स्पष्ट है । ग्रह क्षितिज में द्युज्या का मान = ∢ ल त म सत्रिभग्रह भु = त प सत्रिभग्रक्रां ज्या × त्रि प त स त्रिभुज में ──────────────────────── = ग्रह क्षितिज में अयन वलन ज्या । सत्रि- द्युज्या भ क्रांज्या का उत्थापन देने से सत्रि ग्र-ज्या × जिन ज्या × त्रि खेट कोज्या × जिन ज्या ───────────────────────────────── = ───────────────────────── त्रि × द्यु द्यु सूक्ष्म आयन वलन ज्या उत्पन्न होती है । [चित्र में पाठ:] नाड़ीवृत्त, क्रान्ति वृत्त, ग्र, क· ग्रहो.ध्रु.प्रो., म, अयन प्रो. वृ., क त, प, सत्रि ग्रहो.ध्रु.प्रो., सत्रि·ग्र·

३८० गोलाध्याये आक्ष वलन के लिये— याम्योत्तर ध्रुव प्रोतवृत्तोत्पन्न कोण का मान = नतकाल की ज्या । = नतज्या । तथा याम्योत्तर समप्रोतवृत्तोत्पन्न कोण सममण्डलीय नतांश की ज्या = स० म० नत ज्या । समस्थान से ग्रह तक उपवृत्त व्यासार्ध की ज्या = उ० वृ० ज्या । समस्थान से अक्षांश मान से विधीयमान वृत्त = अक्षांशवृत्त की ज्या = ज्या अक्ष । ध्रुव से ग्रह तक लम्ब वृत्त में = ज्या लं० समम-नज्या × अक्षज्या अनुपात से -------------------------- = आक्ष वलन । ग्रह द्यु अक्षज्या × सम मण्डलीयनतज्या पुनः ---------------------------------- = द्युज्या वृत्त में अक्षज्या । त्रिज्या अक्षज्या × सम-नतज्या × त्रिज्या अक्षज्या × सम-नज्या उत्थापम से ------------------------------- = ----------------------- द्यु × त्रि द्यु सम म. न. ज्या ---------------- = आक्ष-व-ज्या द्यु अथवा भुजकोटि = उपवृत्त व्यासार्ध नतकालज्या × अक्षज्या अतः ----------------------------------- = आक्षवलन-ज्या उपपन्न होती है । उपवृत्त का सार्ध दृष्टान्त से उत्क्रम ज्या का निराकरण— जिस देश में वृषभान्त राशि के तुल्य अक्षांश २०°/३८' है उस देश में वृषभान्त का रवि बिम्ब मध्याह्न में खमध्य में स्थित होगा । निश्चय है कि उस समय क्रान्तिवृत्त का स्वरूप दृङ्-मण्डलाकार होगा । वृषान्त में ३ राशि जोड़ने से सत्रिग्रह सिंहान्त में होगा जो क्षितिज में रहेगा । सिंहान्त से पूर्वापर तक क्षितिज वृत्त में पूर्व स्वस्तिक से क्षितिजा- होरात्रवृत्त सम्पात तक सिंहान्त की अग्रा के तुल्य वलन यदि प्रत्यक्ष दृश्य है तो यह कैसे माना जाय कि सत्रिभगृह की क्रान्ति की उत्क्रम ज्या वलन होती है । आचार्य भास्कर के वलनायन प्रकार के अतिरिक्त कोई भी सिद्धान्त अन्य किसी प्रकार से भी यहाँ अग्रा के तुल्य वलन नहीं ला सकता । क्रमज्या गणित साधन प्रकार ही वलन साधन में सर्वथा उपयुक्त है आचार्य का यही भाव है । और एक महान उदाहरण— जिस देश में अक्षांश = ६६, उस देश में मेषराशि के साथ सभी राशियाँ क्षितिज में होती हैं अर्थात् उस देश में क्रान्ति वृत्त ही क्षितिज वृत्त हो जाता है । वहाँ पर मेष-वृष- मिथुनादि में स्थित सूर्य का परम वलन = त्रिज्या तुल्य होता है । क्योंकि क्रान्ति वृत्त से प्राची दिशा उत्तर को होती है ।

ग्रहणवासना ३८१ शराभाव की स्थिति में सूर्यग्रहण का स्पर्श दक्षिण दिशा से होता है और चन्द्रमा का ग्रहण स्पर्श उत्तर से होगा । इसलिये वहाँ त्रिज्या तुल्य वलन की अन्यथासिद्धि से क्रमज्या प्रकार से ही वलन गणित की साधना समीचीन होती है । तथा जिस देश में अक्षज्या = ३१।४० मेषादिगत सूर्य द्युज्या = ३४३८ चरासु = ०, क्षितिजस्थ सूर्य में नतघटिका = १५, आयनवलनज्या का चाप = २४° आक्षवलनांश = ६६ स्फुटवलन = ६६ + २४ = ९०° एवं वृषादि रवि की द्युज्या = ३३३६, चरज्यासु = १६७०, नतघटिका = १९।३८, आयन चापांश = ९०, एवं मिथुनादि सूर्य में द्युज्या = ३२१८, चरासु = ३४६५, नत- घटिका = २४।३७, आयनवलनांश = १२।३२, आक्ष वलन = ७७, स्फुट वलन = ९० यही सर्वत्र क्रमज्या प्रकार से ही सही सिद्ध होते हैं । इसी आशय को श्लोक से भी आचार्य ने “यत्खवस्वस्तिकगे खौ भवलये दृग्वृत्तवत्सं- स्थिते....व्यासार्धतुल्यं कथम्” स्पष्ट किया है ॥३०-७४॥ इति सिद्धान्तशिरोमणि ग्रहगोलाध्याय के ग्रहणवासनाध्यायः—९ की श्री पं० हरिदत्त ज्योतिर्विदात्मज पर्वतीय श्री केदारदत्त जोशी कृत “केदारदत्तः” हिन्दी व्याख्या सम्पन्न ।

अथोदयास्तवासना । तत्राऽऽदावुदये च दृक्कर्मकारणमाह— क्रान्तिवृत्तग्रहस्थानचिह्नं यदा स्यात्कुजे नो तदा खेचरोऽयं यतः । स्वेषणोत्क्षिप्यते नाम्यते वा कुजात् तेन दृक्कर्म खेटोदयास्ते कृतम् ॥१॥ नैव बाणः कुजेऽसौ कदम्बोन्मुखस्तत्समूत्क्षेपणं नमनं च द्विधा । आयनं चाक्षजं तेन कर्मद्वयं तत्प्रपञ्चः पुनः संविविच्योच्यते ॥२॥ वा० भा०—स्पष्टार्थम् ॥१॥२॥ मरीचिः—अत्रावसरसंगत्या किं दृक्कर्म तथोदयास्तमययोरित्याद्यवशिष्टप्रश्नस्यो- त्तरभूत आरब्धोऽधिकारो व्याख्यायते । तत्र ग्रहणाधिकारोत्तराधिकाराणां पाताधिकार- व्यतिरिक्तानां सर्वस्वभूतस्य दृक्कर्मण उत्पत्तिकारणं किं दृक्कर्मेति प्रश्नोत्तरभूतं स्रग्वि- ण्याऽऽह—क्रान्तिवृत्तग्रहेति । तेन कारणेन । खेटोदयास्ते ग्रहस्य क्षितिजासक्तिस्यपोदयास्त- काल्योः । क्षितिजासक्तिलक्षणेनोदयास्तयोरेकत्वादेकवचनमिति ध्येयम् । दृक्कर्म । ग्रहच्छा- याञ्चकारोक्तं कृतम् । ग्रहे संस्कृतम् । सूचितं कारणमाह—क्रान्तिवृत्तेत्यादि । यतो यत्कारणात् । यस्मिन्काले । क्रान्तिवृत्तग्रहस्थानचिह्नं क्रान्तिवृत्ते यत्र प्रदेशे ग्रहस्थानं तत्र बिम्बाभावात्कल्पितचिह्नं कुजे स्वदेशभूगर्भक्षितिजवृत्ते । समसूत्रतया सक्तं स्यात् । तस्मिन्काले । खेचरो ग्रहः । अयं बिम्बात्मकः । क्षितिजवृत्ते सक्तो न स्यात् । तथा च यदा ग्रहबिम्बं क्षितिजे भवति तदा तद्राश्यादिभोगचिह्नं क्रान्तिवृत्तस्थं न लगति । किंतु तत्प्रागपरभागो लगतीत्युदयास्तलग्नज्ञानार्थं ग्रहे दृक्कर्मसंस्करणमत एवोदयास्तकालयोर्नान्य- त्रेति भावः । ननु सूर्योदये सूर्यतुल्यलग्नस्यान्यथानुपपत्त्या यदा क्षितिजे सूर्यो लगति तदा क्रान्तिवृत्तस्थचिह्नमपीति कल्पनाद्ग्रहत्वाविशेषादितरेषामपीदं तुल्यमिति कथमेतदित्यत आह—स्वेषणेति । स्वचिह्नक्षितिजासक्तिकृत्तिके ग्रहबिम्बं स्वेषुणा क्षितिजात् । उत्क्षिप्यते । ऊर्ध्वप्रवहमार्गे त्यज्यते । नाम्यते । अधस्त्यज्यते । वाकारः कालान्तरविषयव्यवस्थाथकः । अन्यथोन्नामननामने विरुद्धत्वादेककालासंभवे कथं स्याताम् । तथा च सूर्यस्य तथात्वेऽपि चन्द्रादीनां विक्षिप्त(प्र)तया न तथात्रस्थानमेकरूपमिति भावः ॥१॥ ननु शरसत्त्वात्क्षितिजे यत्र ग्रहचिह्नस्थानं सक्तं तत्र ग्रहबिम्बं सक्तं मा भवतु । परं तु ग्रहचिह्नसक्तक्षितिजप्रदेशातद्वृत्त एव शरान्तरेण ग्रहबिम्बं सक्तं कुतो नेत्यतस्तदुत्तरं द्विधेति प्रश्नोत्तरं वदंस्तत्र विस्तृतविचारं स्रग्विण्या प्रतिजानीते—नैव बाण इति । ग्रह- विक्षेपः क्षितिजवृत्ते न भवति । एवकारादुन्मण्डले निरक्षक्षितिजत्वान्न भवतीति शरस्य

उदयास्तवासना ३८३

समध्रुवाभिमुखत्वासंभवादिति ध्येयम् । कुत इत्यतः कारणमाह-असाविति । ग्रहशरः कदम्बोन्मुखः क्रान्तिवृत्ताद्विक्षेपवृत्तावधि दक्षिणोत्तरान्तरस्य क्रान्तिवृत्तयाम्योत्तराभिमुखस्य शरत्वात् । अत एव ग्रहबिम्बनामनोन्नामने द्विधोत्पन्ने इत्याह—तदिति । तस्य ग्रहबिम्बस्य उन्नामनं नामनम् । चः समुच्चये । क्षितिजात् । द्विप्रकारेण संभवति । तथा हि—उद्- वृत्ताद्ग्रहबिम्बमुन्नामितं नामितं च भवति । स्वक्षितिजवृत्ताच्च नामितमुन्नामितं च भव- तीति । ताभ्यां दृक्कर्मद्वयमुत्पन्नमित्याह—आयनमिति । तेन । उन्नामननामनयोः प्रत्येकं द्वित्वोत्पन्नत्वेनेत्यर्थः । कर्मद्वयं दृक्कर्मणो द्वैविध्यं सिद्धम् । ते संज्ञया विभजते — आयन- मिति । उद्वृत्तादुन्नामननामनाभ्यामुत्पन्नं दृक्कर्म आयनदृक्कर्म । क्षितिजादुन्नामननाम- नाभ्यामुत्पन्नं दृक्कर्म आक्षदृक्कर्म । क्षितिजस्याक्षांशसंबन्धात् । चः समुच्चये । नन्वनयो- र्विवेकैन स्वरूपं न निरूपितमित्यत आह—तत्प्रपञ्च इति । तयोरायनाक्षदृक्कर्मणोः प्रपञ्चः स्वरूपगणितादिविचारः पुनर्विशेषतया संविविच्य भिन्नभिन्नतया तद्विचारं निश्चित्य मया उच्यते प्रतिपाद्यते ॥२॥ केदारदत्तः—ग्रह बिम्बदर्शन कब और कैसे होता है— क्रान्तिवृत्त में जिस समय ग्रह स्थान की राश्यादि क्षितिज में उदित होती है तो उस समय ग्रहबिम्ब क्षितिज में नहीं रहता । ग्रह अपने शराग्र में कदम्बवृत्ताभिमुख है, इस- लिये ग्रह स्थान के उदय शर से पहिले या बाद में आयन और आक्ष संस्कारों से संस्कृत ग्रह की स्थानीय राश्यादि जनित काल (समय) के पूर्व या पश्चात् में ग्रह बिम्ब का क्षितिज में दर्शन होता है । इसलिये यहाँ पर भी ग्रह स्थानीय राश्यादि बिन्दु में पुनः आयन और आक्ष दृक्कर्म संस्कार आवश्यक हो जाते हैं। क्योंकि दक्षिणोत्तर गमन सम्बन्ध से ग्रह बिम्ब क्षितिज के नीचे या क्षितिज के ऊपर रहेगा, भले ही ग्रह स्थान गणित से क्षितिज में है, किन्तु दर्शन तो ग्रह बिम्ब का ही अपेक्षित है । उपपत्तिः—यतः ग्रहबिम्बोपरिगत कदम्ब प्रोतवृत्त का क्रान्तिवृत्त के साथ जो सम्पात है वही ग्रह का राश्यादि स्थान है । स्थान के उदय के साथ ग्रह का उदय नहीं होगा क्योंकि ग्रह शराग्र में अपने विमण्डल में कदम्बाभिमुख है, यदि क्षितिजवृत्त कदम्बाभिमुख होता तो भी ग्रह का स्थान और ग्रह बिम्ब का एक समयावच्छेदेन उदय होना निश्चित है । जैसे क्षेत्र दर्शन से । विमण्डलस्थ ग्रह बिम्ब पर कदम्ब प्रोतवृत्त क्रान्ति वृत्त के साथ क्षितिजस्थ स्था, बिन्दु पर संयोग हो रहा है, अर्थात् ग्रह स्थान क्षितिज में होने से दृष्टिगत है, तो ग्रह बिम्ब, जो क्षितिज के नीचे ग्रह बिन्दु है अभी उदित नहीं हुआ है । क्योंकि ग्रह बिम्ब स्था वि; शराग्र में अभी नमित है । इसलिये स्था बिन्दु के उदय होने के पूर्व या पश्चात् में अर्द्धोदित ग्र बिंदु दृश्य होगा । इसलिए नमित ग्रह की क्षेत्रादि समुत्पन्ना

': स्त स्त द् दि ? Wait, let's zoom in on "स्तस्तद्दशादिषुणा": Letters: १. स ् त = स्त २. स ् त = स्त ३. द्द with ि ? No, look at: Is it "स्तस्तद्दिगादिषुणा"? Wait, look at the fourth character: It has a loop like 'ग'? Wait, let's look at Bhaskara's original Sanskrit shloka! Let's recall the shloka from Goladhyaya: "क्षितिजे वलने ये स्तस्तद्दिग्बाणेन संगुणः" ? No, here it is: "क्षितिजे वलने ये स्तस्तद्..." Wait! "क्षितिजे वलने ये स्तस्तद्दिशादिषुणा ग्रहः ।" -> Wait, "दिश" (direction) + "इषुणा" (by the latitude)? No, "तद्दिशा" (in that direction) + "इषुणा"? Wait, look at: "तद्दिशा" -> तद् + दिशा = तद्दिशा! Wait, in "तद्दिशा", 'दि' has an 'i' matra, 'शा' has 'ा'! Let's look at the image: There is: त द् दि - wait, does 'द' have an 'i' matra? Look at the arch: There is an arch over 'द्द'! It goes

उत्क्रमेणोन्नताद्यच्च तद्ग्रहोदयलग्नकम् । उक्तव्यत्ययतः प्रत्यगस्तलग्नं सषड्ग्रहात् ॥७॥ शरे महति भानां तु चरार्धं मध्यमापमात् । शरस्फुटात् तथा कृत्वा तच्चापैक्यान्तरासुभिः ॥८॥ विभिन्नैकदिशोर्विद्यादक्षजेन नतोन्नतम् । आयनाक्षजयोर्योगवियोगाल्लग्नमुक्तवत् ॥९॥ वा० भा०—अत्र गोले यथोक्तं क्रान्तिमण्डले विमण्डले च ग्रहं दत्त्वा विमण्डलस्थग्रहोपरि द्युज्यावृत्ते च बद्धे यथेयं दृक्कर्मोपपत्तिः सुखेन बालैरपि बुध्यते तथाऽयं सूत्रपाठः कृतोऽतः सुगमा । तथा ग्रहच्छायाधिकार इयमुपपत्तिः सम्यक् कथितैव ॥३॥४॥५॥६॥७॥८॥९॥ मरीचिः—अथ प्रतिज्ञातमनुष्टुभाऽऽह—क्षितिजे वलने इति । ग्रहचिह्नोदयकाले इत्यर्थः । ये । आयनाक्षसंज्ञे यन्मिते वलने भवतः तद्वशात् तदुभयवलनानुरोधेन विक्षेपेण दक्षिणेन क्षितिजात् ग्रहबिम्बं नाम्यते । सौम्येन विक्षेपेण । तथा वलनद्वयानुरोधादुन्नाम्यते । उदयलग्नार्थं दृक्कर्मकरणात्क्षितिजे इत्युक्तम् । अन्यकाले तत्साधनस्य वैयर्थ्यादिति ध्येयम् । उत्तरवलने कदम्बयोर्दक्षिणोत्तरयोः क्रमेण दक्षिणोत्तरध्रुवाभ्यामध ऊर्ध्वं संभवात्स्वसभाभ्यां च सुतरां संभवाद्विक्षेपाग्रस्थग्रहबिम्बस्य कदम्बोन्मुखत्वेन स्वक्षितिजादुत्तरदक्षिणशरक्रमेणो- न्नामननामने भवत इति तात्पर्यम् ॥३॥ अथ दक्षिणवलने पश्चिमक्षितिजे च विशेषं दृक्कर्मकालानानयनं त्रैराशिकपुरःसरं ताभ्यां ग्रहोदयकालिकलग्नज्ञानं ग्रहास्तकालिकलग्नज्ञानं चानुष्टुप्‌चतुष्केणाऽऽह–तद्व्यस्तमिति । तत्पूर्वश्लोकोक्तं दक्षिणवलने व्यस्तं विपरीतं ज्ञेयम् । आयनवलने दक्षिणे याम्यशरेण ग्रह उद्‌वृत्तादुन्नाम्यते । सौम्यशरेण ग्रहबिम्बं नाम्यते । दक्षिणोत्तरध्रुवाभ्यां क्रमेण दक्षिणोत्तर- कदम्बयोरूर्ध्वाधःस्थत्वात् । आक्षवलने दक्षिणे तु याम्यशरेण स्वक्षितिजादुद्वृत्तस्थग्रह उन्ना- म्यते इति शब्दार्थलभ्यम् । न गोलस्थितिलभ्यम् । समाभ्यां ध्रुवयोर्नियतत्वाद्विक्षिणोत्तर- ध्रुवयोः क्रमेण समाभ्यामुच्चावचत्वाभावात् । अतोऽस्मात् । उक्तात् । पश्चिमक्षितिजे व्यस्तं विपरीतं ज्ञेयम् । उक्तस्य पूर्वक्षितिजविषयत्वात् । अपिः समुच्चये । तथा चाऽऽयन- वलने उत्तरे यदुक्तं दक्षिणशरेण ग्रह उद्‌वृत्तान्नाम्यते उत्तरशरेणोन्नाम्यते इति तत्पूर्व- कपाले । पश्चिमे तु याम्यशरेणोन्नाम्यते । सौम्यशरेणोन्ना (ण ना) म्यते । प्रवहभ्रमेण कदम्बयोर्विपरीतस्थितेः संभवात् । आक्षवलने उत्तरे क्षितिजादुद्वृत्तग्रहो याम्यशरेण नाम्यते । सौम्यशरेणोन्नाम्यते इति पूर्वकपाले । पश्चिमे च याम्यशरेणोन्नाम्यते सौम्य- शरेण नाम्यते इति शब्दलभ्यम् । न गोलस्थित्या । एवं दक्षिणायनवलने यदुक्तं तत्पूर्व- कपाले । पश्चिमे तु तद्विपरीतम् । याम्यशरेणोद्वृत्ताद्ग्रहो नाम्यते सौम्यशरेणोन्नाम्यते २५

३८६ गोलाध्याये इति श्लोकोक्तम् । दक्षिणाक्षवलने शब्दलभ्यं पूर्वकपाले । तत्पश्चिमकपाले विपरीतं श्लोकोक्तं गोलस्थितिसिद्धम् । तेन स्वक्षितिजादुद्वृत्तस्थो ग्रहो दक्षिणोत्तरशरयोर्नामितो- न्नामितो भवतीति तात्पर्यम् । अथोद्वृत्तान्नतोन्नतग्रहस्य तदन्तरकालानयनार्थमनुपातमाह- आयनमिति । आयनवलनज्यया भुजस्त्रिज्या कर्णः षष्टिः, अस्फुटशरः कर्णः स्फुटशरः कोटिः । तन्मूलयोरन्तरे द्युरात्रवृत्त इति क्षेत्रद्वयस्य च्छायाधिकारव्याख्याने प्रतिपादितत्वा- त्त्रिज्यया श्रुत्या । आयनम् । आयनवलनज्यया भुजश्चेद्यदि स्यात्तदाऽस्पष्टेन कदम्बाभिमुखेन शरेण कर्णेन किं भुजमानं लभ्यमित्यनुपातेन द्युरात्रवृत्ते तदन्तरालप्रदेशज्या । एवं स्वक्षिति- जादुद्वृत्तस्थनतोन्नतग्रहस्य तदन्तरकालानयनार्थमनुपातमाह-लम्बज्ययेति । लम्बज्यया कोटिः, त्रिज्या कर्णः । अक्षवलनज्या भुज इति च्छायाधिकारव्याख्यायां स्वल्पान्तरेण क्षितिजेऽक्षक्षेत्रस्य प्रतिपादितत्वाल्लम्बज्यया कोट्या । अक्षंजं वलनम् । अक्षवलनज्या भुज- श्चेद्यदि स्यात्तदाऽस्फुटेषुणा ध्रुवाभिमुखशरमितक्रान्तिज्याकोट्या किं भुजमानं लभ्यमित्यनु- पातेन द्युरात्रवृत्ते कुज्या । अस्यास्तत्रैवाक्षदृक्कलासु ज्यात्वप्रतिपादनात् । अथ तद्धनुर्ज्ञानार्थं तच्चापकरणमशक्यं त्रिज्यानुरुद्धज्यायास्तत्संभवादित्यत आह-इतीति । पूर्वोक्तानुपाताभ्यां त्रैराशिकात् । प्रमाणमिच्छा च समानजाती आद्यन्तयोः स्तः फलमन्यजातिः । मध्ये तदिच्छाहतमाद्यहृतस्यादिच्छाफलमित्युक्तानुपातविधेरागते फले त्रिज्यया गुणिते द्युज्यया भक्ते तयोः फलयोर्धनुषी तयोरैक्यम् । अन्तरम् । द्वयोरुन्नतत्वेन नतत्वेन वैकजातित्वे योगः । वैजात्येऽन्तरम् । अधिकशेषवशान्नतोन्नतसंबन्धि ज्ञेयम् । तत्तुल्यासुभिः स्वभूगर्भक्षितिजात् । ग्रहो बिम्बात्मकः स्वक्रान्तिवृत्तस्थचिह्नक्षितिजसंयोगकाले । नत उन्नतो वा भवति । तथा च द्युज्यानुपातेन तयोस्त्रिज्यानुरुद्धत्वात्तच्चापे सुशके । एतेनैव स्वक्षितिजाद्ग्रहबिम्बमुन्नतं नतं कियद्भिरसुभिर्भवतीत्याशङ्काऽपास्तेति भावः । उदयकालिकलग्नसाधनमाह-तैरिति । नतात्खेटात् । नतग्रहबिम्बस्य क्रान्तिवृत्तस्थराश्यादिभोगादित्यर्थः । तैः पूर्वोत्पन्नैर्नतासुभिः क्रमात् । क्रमलग्नप्रकारेण । यल्लग्नं सूक्ष्मं जायते । उन्नताद्ग्रहात् । उन्नतग्रहबिम्बस्य क्रान्तिवृत्तस्थराश्यादिभोगादित्यर्थः । पूर्वोत्पन्नोन्नतासुभिरुत्क्रमेण । विलोमलग्नसाधन- प्रकारेण यल्लग्नं भवति तद्ग्रहोदयकालिकं लग्नं ज्ञेयम् । नतोन्नतग्रहस्य तत्कालादग्रिम- पूर्वकाले क्षितिजसंलग्नतासंभवात्क्रमविलोमलग्नाभ्यां ग्रहप्रवहभ्रमहेतुकग्रहबिम्बोदयकालिक- क्षितिजसंलग्नक्रान्तिवृत्तप्रदेशज्ञानक्रान्तिवृत्तस्थग्रहचिह्नाद् भवत्येवेत्युपपत्तिः सुगमा । छायाधिकारे व्यक्ता च । अथ ग्रहास्तकालिकलग्नसाधनमाह-उक्तव्यत्ययत इति । प्रत्यक् । पश्चिमक्षितिजादुक्तदिशा ग्रहबिम्बस्य साधितनतोन्नतकालादित्यर्थः । उक्तात् । नतोन्नतका- लक्रमेण क्रमविलोमलग्नसाधनात् । व्यत्ययो विपरीतम् । नतोन्नतकालक्रमसिद्धविलोमक्रम- लग्नसाधनं तेनेत्यर्थः सषड्ग्रहात् । षड्राशियुक्तग्रहाद्यल्लग्नं तद्ग्रहास्तकालिकं लग्नं ज्ञेयम् । पूर्वक्षितिजात्पश्चिमक्षितिजे विपरीतत्वाद्व्यक्तोपपत्तिश्छायाधिकारे प्रतिपादिता । इदं दृक्कर्मगणितजातं तत्रैव विस्तरेण सवासनं व्याख्यातमतोऽत्र मूलानुरोधात्संक्षेपेण व्याख्यातमिति मन्तव्यम् ॥४॥५॥६॥७॥

उदयस्तवासना ३८७ ननु स्पष्टेषुरक्षवलनेन हतो विभक्तो लम्बज्ययेत्यनेन ग्रहच्छायाधिकारे आक्षदृक्कर्मणः स्थूलं प्रकारान्तरमुक्तं तत्कथमत्र स्वरूपनिरूपणे वक्तुमुचितम् । सूक्ष्मप्रकारनिरूपणस्य तत्रोचितत्वादतोऽनुष्टुब्भ्यामाह—शरे महतीति । महति शरे संनिवेशितानां भानां नक्षत्राणाम् । महाशरसंबन्धिनक्षत्राणामित्यर्थः । तुकाराद्वक्ष्यमाणाक्षदृक्कलास्वानयनप्रकारे- णाऽऽक्षदृगसवः साध्याः । न पूर्वोक्तप्रकारेण । ग्रहाणामल्पशरनक्षत्राणां च स्वल्पशरत्वा- त्पूर्वोक्तप्रकारेणापि सुखार्थं साध्या इत्यर्थः । अत एव चन्द्रपरमशराधिकशरत्वं महत्त्वं शरस्येति केचित् । तदाह—चरार्धमिति । मध्यमापमात् । नक्षत्रोक्तध्रुवकात्साधितायाः सूर्यवत्क्रान्तिज्याया इत्यर्थः । शरस्फुटात् । शरसंस्कृतक्रान्त्यंशरूपस्पष्टक्रान्तेर्ज्यायाः पृथक् ।

३८८ गोलाध्याये पुनरनुपात से त्रिज्यावृत्तीय वलन अ × त्रि क × त्रि ---------- तथा ---------- = क द्यु द्यु दोनों का संस्कार स्पष्ट वलन काल होता है । संस्कार = स्पष्ट वलन उक्त भाँति संस्कार से लब्ध प्राणों (असुओं) से क्षितिजस्थ ग्रह स्थान से ग्रहबिम्ब नत या उन्नत रहता है । सूर्य स्पष्ट = सू । इष्टकाल = स्पष्ट वलनासु से नत ग्रह से जो क्रम लग्न, और उन्नत ग्रह से जो उत्क्रम लग्न होती है वही ग्रहोदय लग्न होती है । इस क्रम का व्यस्त गणित, सू + ६ राशि से जो लग्न वह पश्चिमस्थ ग्रहबिम्ब दर्शनार्थ होता है । ग्रहों के लघु शर में उक्त गणित ठीक हो जाता है । यदि शर अधिक है तो मध्यम क्रान्ति से शर को स्पष्ट शर बना कर उक्त गणित करना चाहिए । तद्वशेन साधित आयनांश व वलनासुओं से ग्रह स्थान से ग्रह बिम्ब को नतोन्नत समझ कर आयनाक्ष वलन के योग वियोग संस्कृत काल में उक्तवत् लग्न साधन द्वारा ग्रह बिम्ब दर्शन समय ज्ञात करना चाहिए ॥३-९॥ अथ शरस्य स्पष्टीकरणमाह— सत्रिराशिग्रहद्युज्यानिघ्नस्त्रिज्योद्धृतः शरः । स्फुटोऽसौ क्रान्तिसंस्कारे दृक्कर्मण्यक्षजे तथा ॥१०॥ वा० भा०—अयं संक्षिप्तो गौणप्रकारः । मुख्यस्तु पूर्वं व्याख्यात एव । तथाऽपीह युक्तिमात्रमुच्यते । विषुवद्वृत्तात्क्रान्तिर्ध्रुवाभिमुखी । क्रान्त्यग्राच्छरः कदम्बाभिमुखः । कथं तेन तिर्यक्स्थेन सा संस्कार्या । अतः क्रान्त्यग्रे यद्द्युज्या- वृत्तं तस्य शराग्रस्य च यदन्तरमृजु तेन संस्कृता सती स्फुटा भवति । तच्चान्तरं कोटिरूपम् । शरः कर्णरूपः । तद्वर्गान्तरपदं द्युज्यावृत्ते भुजः । एतत्त्र्यस्रं दिग्व- लनजत्र्यस्रसंभवम् । तत्र सत्रिराशिग्रहक्रान्तिः कदम्बध्रुवसूत्रयोरन्तरम् । तज्ज्या भुजः । तद्द्युज्या कोटिस्त्रिज्या कर्णः । यदि त्रिज्ययेयं कोटिस्तदा शरेण केत्युप-

तत्त्वात्त्रिज्यानुरुद्धमत् क्रान्तिवृत्तस्थग्रहचिह्नादासन्नध्रुवस्य द्युज्याचापांशान्तरितत्वाद्ध्रु- वाभिमुखतदन्तरसिद्धयर्थं द्युज्यापरिणतः शरः स्फुटो भवतीति तात्पर्यम् । न चैवं सत्रिरा- शिग्रहद्युज्यानुपातोक्तितः कथमुपपन्नेति वाच्यम् । ग्रहच्छायाधिकारे त्रिज्यावर्गादित्याद्युक्त- स्पष्टशर साधनस्योपपत्तावायनवलनज्याभुजा । स्त्रिज्याकर्णस्तद्वर्गान्तरपदं ध्रुवाभिमुखा यष्टिः कोटिरिति क्षेत्रादायनावलनस्य प्राचीनमते सत्रिभग्रहक्रान्तितुल्यत्वात्तज्ज्यावर्गोनत्रिज्यावर्ग- पदरूपयष्टेः सत्रिभग्रहद्युज्यात्मकत्वादुक्तमुपपन्नमिति प्रतिपादनात् । ततः किमाशङ्काया उत्तरालाभादत आह—असाविति । स्पष्टशरः क्रान्तिसंस्कारे । क्रान्तिसंस्कारार्थं स्पष्ट- क्रान्तिसिद्धयर्थमिति यावत् । अक्षजे दृक्कर्मणि । आक्षदृक्कलासाधनार्थम् । तथा उपयुक्तः । क्रान्तिध्रुवाभिमुखत्वा

३९० गोलाध्याये स्वल्पान्तरत्वेऽपि पदार्थतत्त्वनिरूपणात्मकसिद्धान्तग्रन्थे स्पष्टशरकथनं तेषामप्यावश्य- कमन्यथा तदुच्छेदापत्तिरत आह-स्थित्यर्थेति । हि । यतः । स्थित्यर्धपरिलेखादौ । मध्यस्फुटस्थित्यर्धानयने ग्रहणपरिलेखाक्रियायाम् । आदिपदाद्ग्रासेष्टग्रासानयनार्यनदृक्कमी- दीनां संग्रहः । गणितागतः कदम्बाभिमुखः शरः । एवकारात्स्फुटशरमिति स्फुटशरस्य निरासः । उपयुक्तः । तथा चोक्तं बहुस्थलेषु कदम्बाभिमुखशरस्य वस्तुभूतत्वाद्ध्रुवाभि- मुखस्पष्टशरस्य क्रान्तिसंस्काराक्षदृक्कर्मणोरेव वस्तुभूतत्वादबहूपयोगात्स्पष्टशरानुक्तिः । स्वल्पान्तरेणापि गणितक्रियालाघवसंभवादिति भावः ॥११॥ ननु ब्रह्मगुप्तादिसिद्धान्ते स्फुटशरकथनाभावाद्ब्रह्मगुप्तोक्तनक्षत्रशरा अस्फुटास्त्व- दुक्तनक्षत्रस्फुटशरतुल्याः कथं संभवन्ति । किंचिदप्यन्तरसंभवपत्तेरतोऽनुष्टुभाऽऽह- नक्षत्राणामिति । ब्रह्मगुप्तादिभिर्नक्षत्राणां स्थिरत्वात्पूर्वगतेरभावाद्ये शराः पठिताः । ते । स्फुटाः । ध्रुवाभिमुखाः । एवकारात्तेषां कदम्बाभिमुखत्वं निरस्तम् । तथा च मदुक्तनक्षत्र- स्पष्टशराणां ब्रह्मगुप्तोक्तनक्षत्रशरतुल्यत्वे क्षतिर्नेति भावः । ननु नक्षत्रध्रुवाणामायनदृक्कर्म- संस्कारनिमित्तं मध्यमशराः कदम्बाभिमुखा अपि पृथक्कि तैर्नोक्ता अतः आह-दृक्कर्म- णेति । एषां नक्षत्राणाम् । ध्रुवाः । आयनेन दृक्कर्मणा संस्कृताः सन्तः सिद्धा एव । चका- रात्स्थिरत्वादित्यर्थः । तथा । ब्रह्मगुप्तादिभिः पठिताः । तथा च नक्षत्राणामायनदृक्कर्म पुनःसंस्कारस्यानुचितत्वात्तदुपजीव्यकदम्बाभिमुखशरकथनं व्यर्थमेवेत्युपेक्षितम् । नक्षत्रस्पष्ट- क्रान्त्यर्थमाक्षदृक्कर्मार्थं च स्पष्टशरस्यैवोपयोगादिति भावः ॥१२॥ केदारदत्तः- ब्रह्मगुप्ताचार्य ने शर को स्फुटता नहीं की—मध्यम और स्पष्ट शर में अत्यन्त अल्प अन्तर पड़ने से आचार्य ब्रह्मगुप्त ने कदम्बप्रोतीय शर की स्पष्टता नहीं की है । ग्रहण की स्पर्श मोक्ष आदि स्थिति में भी गणितागत कदम्बाभिमुख शर को ही ग्रहण किया है । तथा नक्षत्रों की स्थिर स्थिति होने से नक्षत्रों का भी ध्रुवप्रोतीय शर ब्रह्मगुप्त ने पढ़ा है । कदम्बध्रुव के अत्यल्पान्तरित दूरी से फल में स्वल्पान्तर दोष को दोष नहीं माना जाता है ॥११॥१२॥ यहाँ पर आचार्य भास्कर की ब्रह्मगुप्ताचार्य पर विशेष आस्था स्पष्ट हो रही है । अथ सद् दूषणानुपहसन्नाह— क्रान्तिसूत्रे शरं केचिन्मन्यन्ते ते कुबुद्धयः । यद्येवमायनं तैश्च दृक्कर्मान्यैश्च किं कृतम् ॥१३॥ किं स्पष्टे वालने सूत्रे दत्तो मध्यशरश्च तैः । कोटिवद्वालनात्सूत्रात्स्पर्शमुक्तिक्षरौ च किम् ॥१४॥

उदयास्तवासना ३९१ किंच कृत्वा शरं कोटिं स्थित्यर्धानयनं कृतम् । तादृक् चेत्स शरस्तेन नानुपातेन सिध्यति ॥१५॥ वा० भा०—यदि क्रान्तिसूत्रे शरस्तदा ध्रुवाभिमुखः स्यात्। निरक्षदेशे क्षितिजस्थो ध्रुवः। ध्रुवाभिमुखशराग्रस्थो ग्रहः क्षितिजं न त्यजति। नामनोन्ना- मना भावात्। किं तत्राऽऽयनदृक्कर्मणा। अथवाऽऽचार्यैः कृतं ये न मन्यन्ते तैरपि कृतं भ्रान्तत्वात् तथा परिलेखे बिम्बमध्यात्स्पष्टवलनाग्रोपरिगतं सूत्रं क्रान्तिवृत्तप्राची। तस्याः कोटिवच्छरः किं दत्तः। तत्पक्षे ध्रुवसूत्रे नेयः शेषं स्पष्टम् ॥१२॥१४॥१५॥ मरीचिः—अथ ब्रह्मगुप्ताद्युक्तस्पष्टशरानयने स्वल्पान्तरसमाधानासहिष्णूनां ब्रह्मगुप्ता- नुसारिणां केषाञ्चित्समाधानमनूद्यानुष्टुभा दूषयति—क्रान्तिसूत्र इति। ये केचिद्ब्रह्मगुप्ता- नुसारिणो मद्युक्तस्पष्टशरानयनासहिष्णवः क्रान्तिसूत्रे। विषुवद्वृत्ताद्ध्रुवाभिमुखे सूत्रे। न तु क्रान्तिवृत्तात्कदम्बाभिमुखसूत्रे। मतभेदानुपपत्तेः। शरम्। अनुपातागतम्। ब्रह्म- गुप्तादिसंमतं मन्यन्ते। यथा विषुवद्वृत्तात्क्रान्तिवृत्तपर्यन्तं ध्रुवाभिमुखी क्रान्तिस्तथा क्रान्तिवृत्ताद्विक्षेपवृत्तपर्यन्तमन्तरं शरो ध्रुवाभिमुखो गणितागत इत्यङ्गीकुर्वन्ति। तेन च मद्युक्तत्समाधानस्पष्टशरसाधने न युक्ते इति द्योतयन्ति। कुबुद्धयः। अल्पबुद्धयः। पदार्थ- तत्त्वाज्ञाः। तथा च तदुक्तमतत्त्वान्नाऽङ्गीकार्यमिति भावः। ननु त्वया पूर्वग्रन्थे वस्तु- तत्त्वाप्रतिपादनं मत्वा स्वल्पान्तरमित्यवस्तुभूतं समाधानमुक्तं तैश्च तदुक्तस्य वस्तुतत्त्वेन प्रतिपादनाद्दोषामसङ्गात्प्रत्युत त्वदुक्तस्पष्टशरानयनस्य तदुक्त्या व्यर्थत्वाच्चेति कथं ते कुबुद्धय इत्यतो दूषणमाह—यदीति। एवं तदुक्तं सम्यक्। यदि चेदङ्गीक्रियते। चकार- स्तह्यर्थः। अन्यैः। ब्रह्मगुप्तादिभिः। चकारादार्षोक्तमायनं दृक्कर्म। कृतं स्वग्रन्थे उक्तं तैः तादृशसमाधानकर्तृभिः किं किमर्थमङ्गी क्रियते इत्यर्थः। तन्मते आयनदृक्कर्माङ्गी- करणमयुक्तम्। उन्मण्डले ग्रहचिह्नसबन्धिक्राले शरस्य ग्रहाभिमुखत्वादग्रहबिम्बसंबन्धेन ततस्तस्य नमनोन्नामनाभावादायनदृक्कर्मानुत्पत्तितस्ततो ब्रह्मगुप्तादिग्रन्थे शरस्य ध्रुवाभिमुख- त्वेनानुक्तितद्दर्शनान्मदुक्ततदाशयेनाऽऽयनदृक्कर्मप्रतिपादनमविरुद्धमन्यथा तत्प्रतिपादनानुप- पत्तेरिति भावः ॥ १३ ॥ ननु ग्रहचिह्नाद्यद्ग्रहबिम्बस्य ध्रुवाभिमुखशरांग्रे स्थित्यभावात्कदम्बाभिमुखशरांग्रे सत्त्वात्संपातग्रहचिह्नादनुपातानीतःशरस्याऽऽयनग्रहचिह्नध्रुवाभिमुखस्याग्रे ग्रहबिम्बसद्भावा- भ्युपगमान्मन्मतेऽप्युक्तमायनदृक्कर्मविरुद्धम् । न चैवं ग्रहचिह्नग्रहबिम्बान्तरकदम्बाभिमुख- शरेणैवाऽऽयनदृक्कर्मोत्पत्तेर्गणितागतशरादुक्तं तत्साधनमसङ्गतमिति वाच्यम् । स्वल्पान्तर- त्वादित्यस्वरसाद्दूषणान्तरमनुष्टुभाऽऽह—किं स्पष्ट इति । तैः । ब्रह्मगुप्तानीतशरं ध्रुवाभिमुखत्वेन ¸मन्यमानैरित्यर्थः । स्पष्टवलने सूत्रे ग्रहणपरिलेखे मानैक्यखण्डवृत्ते ब्रह्मशरदिक् चिह्नाद्दक्षिणोत्तररेखातोऽर्धज्याकारेण मध्यकालिकमानैक्यखण्डवृत्तपरिणतस्प-

ष्टवलनं दत्त्वा तदग्रसंबन्धिमानैक्यखण्डपरिधिप्रदेशाद्ग्राह्यवृत्तकेन्द्रपर्यन्तं या रेखा तत्रे- त्यर्थः । मध्यशरः । मध्यग्रहणकालिकशरः किमर्थं दत्तः । त्वन्मते तथा शरदानमसंगतम् । मध्यकालिकवलनाग्रसूत्रस्य क्रान्तिवृत्तयाम्योत्तररूपत्वेन कदम्बाभिमुखत्वादुक्तशरस्य ध्रुवाभिमुखस्य तत्र दानासम्भवात् । ग्राह्यकेन्द्राद्ध्रुवाभिमुखसूत्रकल्पनेन तद्दानकथनापत्ते- श्चेति भावः । चकारादुक्तायनदृक्कर्मसमर्थने आयनदृक्कर्मसाधनार्थं शरस्य त्वया स्वल्पा- न्तरत्वं मयाऽऽक्षदृक्कर्मणेति प्रतिबन्द्याः सत्त्वेऽप्येतद्दूषणं हठाद्दृत्तं प्रतिबन्ध्या अनुत्तर- त्वादिति सूचितम् । द्वितीयं दूषणमाह—कोटिवदिति । वलनात्सूत्रात् । चकारः स्पर्श- मोक्षकालिकवलनसंबन्धिग्राह्यकेन्द्राभिमुखरेखाद्वयादिति व्यवस्थार्थकः । स्पर्शमोक्षकालिक- शरौ । क्रमेण कोटिवदर्थज्याकारेण कुतो दत्तौ । त्वन्मते तथा तद्दानमनुचितम् । तद्वलनाग्र- सूत्रस्य क्रान्तिवृत्तानुकारत्वात्तद्दक्षिणोत्तरार्धज्यारेखायाः कदम्बाभिमुखत्वेनोक्तशरदानानु- पपत्तेः । वलनसूत्राद्ध्रुवाभिमुखत्वेन कल्पितऋजुरेखाकारेण तद्दानकथनापत्तेश्चेति भावः । ग्रहणपरिलेषोक्तशरदानकथनानुपपत्तिरूपत्वेन श्लोकार्थस्य फलितत्वाच्छ्लोकोक्तदूषण- मेकमेव । न तु द्वयं त्रयं वेति ध्येयम् ॥ १४ ॥ ननु ग्रहणस्य प्रत्यक्षत्वेन तत्संनिवेशस्य तत्त्वात्परिलेषस्य स्थूलत्वेनोपेक्षाविषयत्वा- दित्यस्वरसादाह--किंच कृत्वेति । शरं ब्रह्मगुप्तोक्तं कोटिं कृत्वा कल्पयित्वा चक रा- त्कोटेर्भुजकर्णसापेक्षत्वात्स्पर्शमोक्षकालिकशरमूलमध्यकल्पितशरमूलयोरन्तरं क्रान्तिवृत्तस्थं भुजं, मानैक्यखण्डं कर्णमिति क्षेत्रं कल्पयित्बेत्यर्थः । अत एव शरस्य कोटित्वदानं पूर्वश्लो- कोक्तं स्थित्यर्धानयनं कुत उक्तम् । भुजस्य क्रान्तिवृत्तस्थत्वात्तद्याम्योत्तरान्तररूपकदम्बा- भिमुखशरस्य भुजत्वसम्भवादुक्तशरस्य भवन्मते ध्रुवाभिमुखत्वेन भुजत्वासंभवादुक्तं स्थित्य- र्धानयनमुपपन्नमिति भावः । न च क्रान्तिसंस्काराक्षदृक्कर्मभिन्नस्थले त्वदुक्तशरस्य स्थूलत्वे- ऽपि स्वल्पान्तरेणाङ्गीकारस्तत्र तु तस्य सूक्ष्मत्वमेवेति वाच्यम् । बहुषु स्थलेषु सान्तरत्व- कल्पनापेक्षया स्थलद्वये सान्तरत्वकल्पनस्य लघूभूतत्वान्मदुक्तसमाधानस्यैव युक्तत्वात् । ननु स्वतन्त्रस्य नियोगादर्हत्वात्तद्गौरवमेवाङ्गीकृतम् । बहुषु स्थलेषु वस्तुभूतत्वकल्पना- पेक्षया स्थलद्वये तत्कल्पनस्य लघुभूतत्वेन च मदुक्तमेव साधनं युक्तं विनिगमनाविरहादि- त्यस्वरसाद्दृढं दूषणमाह--तादृगिति । शरो ब्रह्मगुप्तसंमतो ॰गणितागतश्चेद्यदि तादृग् ध्रुवाभिमुखोऽङ्गीक्रियते । तर्हि सः । ध्रुवाभिमुखशरः । तेन । उक्तेन । अनुपातेन न सिध्यति । सिद्धो न भवतीत्यर्थः । चेदित्यनेन ब्रह्मगुप्तशरस्य कदम्बाभिमुखत्वेन उक्ता- नयनं सुपपन्नमिति सूचितम् । तथा च गोलयन्त्रस्थध्रुवद्वयप्रोतस्थलवृत्तेन ग्रहबिम्बवेधादव- गतध्रुवाभिमुखशरेण गणितानीतशरस्य तुल्यत्वानियमदर्शनादत एव क्रान्तिवृत्ताच्छरस्य याम्योत्तरत्वादुक्तानुपातेन कदम्बाभिमुखत्वसिद्धौ बाधकाभावः । ग्रहपातयोः क्रान्तिवृत्त- स्थत्वादिति भावः ॥ १५ ॥ केदारदत्तः—क्रान्तिसूत्र में शरकल्पना सदोष है-- कुछ आचार्य शर की सत्ता ध्रुवाभिमुख ध्रुव प्रोत में मानते हैं । यदि शर की

कल्पना ध्रुवाभिमुख की जाती है तो शराग्रस्थित ग्रह क्षितिज से नमित और उन्नमित ही होगा तो वहाँ आयनदृक्कर्म ही अनावश्यक है तो वे आचार्य दृश्यग्रह साधन में आयन- दृकर्म गणित का उपयोग क्यों करते हैं ? अर्थात् उन आचार्यों पर भास्कर का सही आक्षेप है । तथा परिलेख में बिम्ब मध्य से स्पष्ट वलनोपरि गत सूत्र क्रान्तिवृत्त प्राची होती है । तो उसमें कोटि की तरह शर दान की क्या आवश्यकता थी, उन्हें तो यह शर दान संस्कार भी ध्रुव सूत्र में ही करना चाहिये था, ऐसी स्थिति में शर को मान कर स्थित्यर्धानयन जो किया गया वह तो ध्रुवाभिमुख शर मानने से कैसे स्पर्श मोक्षादि स्थिति ठीक होगी या होती हैं ? ॥१३॥१४॥१५॥ अथोत्क्रमज्यानिवृत्तिमाह- दृष्टिकर्म वलनं च केनचिद्भ्रान्तितः कथितमुत्क्रमज्यया । तत्कृतं तदनुगैस्ततोऽपरैरन्धपूरुषपरम्परोपमैः ॥ १६ ॥ ब्रह्मगुप्तकृतिरत्र सुन्दरी साऽन्यथा तदनुगैर्विचार्यते । नोद्धता