सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
| ४७६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
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अन्ये तु भावनाप्रचयसाहित्ये सति बहिरसमर्थस्यापि मनसो नष्ट-वनितासाक्षात्कारजनकत्वदर्शनाद् निदिध्यासनसाहित्येन शब्दस्याप्यपरोक्षज्ञानजनकत्वं युक्तमिति दृष्टानुरोधेन समर्थयन्ते ।
विज्ञातृचिदभिन्नस्य विषयस्यापरोक्षतः ।
पारोक्ष्यासम्भवादन्ये प्राहुः शब्दापरोक्षताम् ॥ २३ ॥
कुछ लोग कहते हैं कि प्रमातृचैतन्यसे अभिन्न विषयका अपरोक्षत्व होनेसे और शब्दसे परोक्षज्ञानका सम्भव न होनेसे शब्दसे ही ब्रह्मका अपरोक्ष होता है ॥२३॥
अपरे तु अपरोक्षार्थविषयत्वं ज्ञानस्याऽपरोक्षत्वं नाम, अन्यानिरुक्तेः । अर्थापरोक्षत्वं तु नापरोक्षज्ञानविषयत्वम्, येनाऽन्योन्याश्रयो भवेत् । किन्तु तत्तत्पुरुषीयचैतन्याभेदः । अन्तःकरणतद्धर्माणां साक्षिणि कल्पिततया·
* कुछ लोग कहते हैं कि यद्यपि बाह्य पदार्थके ग्रहण करनेमें स्वतः मन असमर्थ है, तथापि भावनाधिक्यके सहकारसे वह अन्तःकरण विनष्ट वनिताके साक्षात्कारमें जैसे जनक देखा जाता है, वैसे ही निदिध्यासनके सहकारसे शब्द भी अपरोक्ष ज्ञानको उत्पन्न कर सकता है ।
† अन्य लोग कहते हैं कि ज्ञानका अपरोक्षत्व अपरोक्षार्थविषयत्व है, क्योंकि उसका ( अपरोक्षत्वका ) निर्वचन अन्य प्रकारसे नहीं हो सकता है । अर्थनिष्ठ अपरोक्षत्व अपरोक्षज्ञानविषयत्वरूप नहीं है, जिससे कि अन्योन्याश्रय हो, किन्तु तत्-तत् पुरुषोंके चैतन्यके साथ अभेद है, ‡ अन्तःकरणोंके धर्मोंकी
* शास्त्रप्रमाण कदाचित् न लिया जाय और केवल युक्तिके आधारपर ही विचार किया जाय, तो भी अपरोक्षज्ञानजनकत्व घट सकता है, ऐसा इस मतसे प्रतिपादन करते हैं ।
† अब शब्दमें परोक्षज्ञानजनकत्व हैं ही नहीं, अतः नित्य अपरोक्षब्रह्मके साक्षात्कारमें वेदान्तोंकी करणता अबाधित है, इस प्रकारके मतान्तरको कहते हैं ।
‡ तात्पर्य यह है कि अन्य प्रकारकी अनुपलब्धि होनेसे अर्थका अपरोक्षत्व यदि अपरोक्ष-ज्ञानविषयत्व माना जायगा, तो अन्योऽन्याश्रय होगा, क्योंकि अर्थके अपरोक्षत्वकाज्ञान होनेपर ज्ञानके अपरोक्षत्वका ज्ञान होगा और ज्ञानके अपरोक्षत्वका ज्ञान होनेपर अर्थ की अपरोक्षताका ज्ञान होगा, इसलिए अपरोक्षज्ञानविषयकत्वको अर्थका अपरोक्षत्व नहीं कह सकते हैं, किन्तु तत्-तत् प्रमातृचैतन्यसे अभिन्नत्व ही उन उन विषयोंका तत्-तत् प्रमाताके प्रति अपरोक्षत्व है । अर्थात् तत्-तत् प्रमातृचैतन्यसे अभिन्न अर्थविषयक ज्ञान ही तत्-तत् प्रमातृचैतन्याभिन्न विषयमें अपरोक्षज्ञान है । यदि शङ्का हो कि इस प्रकारके अर्थापरोक्षत्वका अनुगम नहीं हो सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अपरोक्षत्वकी जातिरूपता
ब्रह्मज्ञानकी शाब्द अपरोक्षता ] भाषानुवादसहित [ ४७७
तदभेदसत्त्वाद् । बाह्यचैतन्ये कल्पितानां घटादीनां बाह्यचैतन्ये वृत्तिकृततत्त्पुरुषीयचैतन्याभेदाभिव्यक्त्या तदभेदसत्त्वाच्च न क्वाप्यव्याप्तिः । न चान्तःकरणतद्धर्माणां ज्ञानादीनामिव धर्माधर्मसंस्काराणामपि साक्षिणि कल्पितत्वाविशेषाद् आपरोक्ष्यापत्तिः । तेषामनुद्भूतत्वाद् उद्भूतस्यैव जडस्य चैतन्याभेद आपरोक्ष्यमित्यभ्युपगमात् । एवं च सर्वदा सर्वपुरुषचैतन्याभिन्नत्वाद् ‘यत्साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म’ इति श्रुत्या स्वत एवाऽपरोक्षं
साक्षीमें कल्पना होनेके कारण साक्षी चैतन्यके साथ अभेद है ही + । बाह्य घटावच्छिन्न चैतन्यमें कल्पित घट आदिका बाह्य चैतन्यमें वृत्ति द्वारा × तत्-तत् पुरुषके चैतन्यके साथ अमेदाभिव्यक्तिसे तत्-तत् पुरुषके चैतन्यके साथ अभेद होनेसे कोई अनुपपत्ति नहीं है । यदि शङ्का हो कि अन्तःकरण और उसके ज्ञान आदि धर्मोंके समान धर्म, अधर्म और संस्कारोंकी भी साक्षीमें ही कल्पना होनेसे उनका भी आपरोक्ष्य (प्रत्यक्षत्व) प्रसक्त होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि धर्म आदिके अनुद्भूत होनेसे उद्भूत जड़ पदार्थका चैतन्यके साथ अभेद ही अर्थका अपरोक्षत्व है, * ऐसा स्वीकार किया गया है । इस अवस्थामें सदा सब पुरुषोंके चैतन्यके साथ अभेद होनेसे ‘यत् साक्षादपरोक्षात् ब्रह्म’ (साक्षात् अपरोक्ष ही ब्रह्म है) इस श्रुतिके अनुसार ब्रह्म स्वतः अपरोक्ष
और उपाधिरूपताका पूर्वमें ही निरास किया गया है, इसलिए उसका यदि अननुगम हो, तो भी कोई हानि नहीं है ।
+ साक्षीशब्दसे विवक्षित प्रमातृचैतन्यके साथ अभेद है, यह भाव है, अर्थापरोक्षत्वके निर्वचनमें कल्पितावशिष्ट साधारण अभेदका प्रवेश होनेसे प्रमातृचैतन्य और जड़का वास्तविक अभेद न होनेपर भी ‘जडं यत्’ इस प्रतीतिसे कल्पित अभेदके होनेसे दोष नहीं है, यह तात्पर्य है ।
× बाह्यविषयावच्छिन्न चैतन्यमें चक्षुरादिद्वारा निर्गतवृत्तिका संसर्ग होनेपर वृत्ति और वृत्तिमान्का अभेद सिद्ध होगा, इससे वृत्तिमान् अन्तःकरणके साथ भी संसर्ग प्राप्त होगा, इसलिए वृत्तिसे संसृष्ट बाह्य चैतन्य ही अन्तःकरणके सम्बन्धसे तत्-तत्पुरुषीय चैतन्य होगा, अतः इसी प्रकारके बाह्यचैतन्यमें वृत्तिकृत तत्-तत्पुरुषीय चैतन्याभेदकी अभिव्यक्ति भी होती है, यह भाव है ।
***** अर्थात् तद्भूतत्वे सति प्रमातृचैतन्याभिन्नत्वम् अर्थापरोक्षत्वम्, अर्थात् उद्भूत होकर प्रमातृचैतन्यके साथ जो अभिन्न हो, वही अर्थापरोक्षत्व है, उद्भूतत्व है, फलके बलसे कल्पित स्वभावविशेष, वह उद्भूतत्व धर्म आदिमें नहीं है और घट आदिमें है, यह समाधानका तात्पर्य है ।
| ४७८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीये परिच्छेद |
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ब्रह्मेति अपरोक्षार्थविषयत्वात् शाब्दस्यापि ब्रह्मज्ञानस्याऽपरोक्षत्ववाचो- युक्तिर्युक्तेत्याहुः ।
अद्वैतविद्याचार्यास्तु स्वसुखज्ञानसङ्ग्रहात् ।
आपरोक्ष्यं स्फुरचित्त्वं तदभेदात्तु तद्भाजि ॥ २४ ॥
अद्वैतविद्याचार्य कहते हैं कि स्वरूपसुखके अपरोक्षज्ञानका संग्रह करनेके लिए प्रकाशमान चैतन्यत्व ही अपरोक्षत्व है और चैतन्यके साथ अभेद होनेसे अर्थमें भी अपरोक्षत्व रह सकता है ॥२४॥
अद्वैतविद्याचार्यास्तु नापरोक्षार्थविषयत्वं ज्ञानस्याऽऽपरोक्ष्यम्, स्वरू- पसुखापरोक्षरूपस्वरूपज्ञानाऽव्यापनात् स्वविषयत्वलक्षणस्वप्रमाणत्वनिषेधात् । किन्तु यथा तत्तदर्थस्य स्वव्यवहारानुकूलचैतन्याऽभेदोऽर्थापरोक्ष्यम्,
ही है । इसलिए अपरोक्ष अर्थको विषय करनेवाला होनेसे शब्दजन्य ब्रह्म-ज्ञानमें भी अपरोक्षत्वका कथन युक्ति-युक्त है ।
† अद्वैतविद्याचार्य कहते हैं कि ज्ञानका अपरोक्षत्व अपरोक्षार्थविषयत्व नहीं है, क्योंकि स्वविषयत्वलक्षण स्वप्रकाशत्वका निषेध होनेसे स्वरूपसुखके अपरोक्षरूप स्वरूपज्ञानमें उक्त लक्षण अव्याप्त होगा, किन्तु जैसे तत्-तत् अर्थोका अपने व्यवहारानुकूल चैतन्यके साथ अभेद ही अर्थका आपरोक्ष्य है ‡
† पूर्वोक्त ज्ञानापरोक्षत्व और अर्थापरोक्षत्वका अन्य प्रकारसे निर्वचन करते हैं, तात्पर्य यह है कि स्वरूपसुखके अपरोक्षरूप स्वरूपज्ञानमें अपरोक्षार्थविषयकत्वके न होनेसे अपरोक्षार्थविषयकत्वरूप अपरोक्षत्वकी उसमें अवस्थिति नहीं होगी, यदि कहा जाय, कि आत्मस्वरूप सुखानुभव साक्षिचैतन्यात्मक है, इसलिए उसके स्वप्रकाश होनेसे और स्वप्रकाशत्वके स्वविषयकत्वरूप होनेसे स्वरूपसुखविषयकत्वरूप अपरोक्षत्व रह सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि एक ही चैतन्यमें विषयविषयीभाव लक्षण सम्बन्ध नहीं हो सकता है, क्योंकि सम्बन्ध दो में रहता है, अतः उक्त लक्षणोंमें अव्याप्ति ही है ।
‡ अपने व्यवहारके अनुकूल चैतन्यके साथ अभिन्नत्व ही अर्थका अपरोक्षत्व है, अन्तःकरण और उसके धर्मोका अपने व्यवहारमें अनुकूल साक्षिचैतन्यके साथ अभेद है, क्योंकि साक्षिचैतन्यमें उनका अध्यास है, वैसे ही घट आदिका भी उनके व्यवहारमें अनुकूल घटाकार-वृत्तिसे उपहित घटादिके अधिष्ठान चैतन्यके साथ अभेद है, वैसे ब्रह्मका भी अपने व्यवहारमें अनुकूल स्वविषयक वृत्तिसे उपहित साक्षिचैतन्यके साथ अभेद है, इसलिए कहीं-पर भी अव्याप्ति नहीं है । घट आदि अर्थोकी चैतन्यमें ही कल्पना होनेसे चैतन्यके साथ अभेद तो है, परन्तु अपरोक्षत्व सदा नहीं है, इसलिए स्वव्यवहारानुकूल विशेषण दिया
महाज्ञानकी शाब्द अपरोक्षता ] | भाषानुवादसहित | ४७९
एवं तत्तद्व्यवहारानुकूलचैतन्यस्य तत्तदर्थाभेदो । तथा च चैतन्यधर्म एवाऽऽपरोक्ष्यम्, न त्वनुमितित्वादिवद् अन्तःकरणवृत्तिधर्मः । अत एव सुखादिप्रकाशरूपे साक्षिणि स्वरूपसुखप्रकाशरूपे चैतन्ये चाऽऽपरोक्ष्यम् । न च घटाद्यैन्द्रियकवृत्तौ तदनुभवविरोधः । अनुभवस्य वृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यगतापरोक्ष्यविषयत्वोपपत्तेः ।
ननूक्तं ज्ञानार्थयोरापरोक्ष्यं हृदयादिगोचरशाब्दवृत्तिशाब्दविषययोर-
वैसे ही तत्-तत् व्यवहारके अनुकूल चैतन्यके साथ तत्-तत् अर्थोंका अभेद ज्ञानका अपरोक्षत्व है । इस परिस्थितिमें अर्थात् चैतन्यके ही तत्-तत् व्यवहारमें अनुकूलत्वेन विवक्षित होनेपर, अपरोक्षत्व चैतन्यका ही धर्म है, अनुमितित्व आदिके समान अन्तःकरणकी वृत्तिका धर्म नहीं है*, इससे अर्थात् अपरोक्षत्वके चैतन्यधर्म होनेसे सुख आदिके प्रकाशरूप साक्षीमें और स्वरूपसुखप्रकाशरूप चैतन्यमें अपरोक्षत्व हो सकता है । यदि शङ्का हो कि ज्ञानापरोक्षत्वको चैतन्य धर्म माना जाय, तो घटादि विषयाकारवृत्तिमें अपरोक्षत्वव्यवहार विरुद्ध होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त अनुभवकी—वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यमें रहनेवाले अपरोक्षत्वको विषय मान करके भी—उपपत्ति हो सकती है ।
यदि शङ्का † हो कि ज्ञान और अर्थके आपरोक्ष्यकी हृदय आदिविषयक
गया है, घट आदि विषयक वृत्तिकी अवस्था में ही घट आदि अधिष्ठानभूत चैतन्य उनके व्यवहारमें अनुकूल होता है, सर्वदा नहीं होता, इसलिए अतिप्रसङ्ग नहीं है, यह भाव है ।
* यदि अपरोक्षत्वको वृत्तिधर्म माना जायगा, तो सुख, दुःख आदि पदार्थों की अपरोक्षवृत्तिका अङ्गीकार न होनेसे और सुखादिके अवभासक साक्षिचैतन्यमें अपरोक्षत्वरूप वृत्तिधर्मके न होनेसे सुख आदिका अपरोक्षत्वानुभव विरुद्ध होगा, इसलिए अपरोक्षत्वको ज्ञानका ही धर्म मानना चाहिए, वृत्तिका नहीं, यह तात्पर्य है । अपरोक्षत्वका परिष्कृत लक्षण यह हुआ—तत्तदर्थव्यवहारानुकूलत्वे सति तत्तदर्थाभिन्नत्वम् अर्थात् उन उन पदार्थोंके व्यवहारमें अनुकूल होकर उन उन पदार्थोंसे जो अभिन्नत्व है, वह ज्ञानापरोक्षत्व है । वह्निविषयक अनुमित्यात्मक वृत्तिसे उपहित जीव चैतन्यमें भी जो वह्निव्यवहारका अनुकूल है, सत्यन्त अर्थात् तत्-तदर्थव्यवहारानुकूलत्व है, अतः उसमें अतिव्याप्तिवारण करनेके लिए विशेष्य दल है । घटादिविषयक ज्ञानके अभावकालमें भी घटावच्छिन्न चैतन्यमें घटाद्यर्थाभिन्नत्व है, इसलिए उसके वारणके लिए विशेषण दल है, यह भाव है ।
† शङ्काका तात्पर्य यह है कि अन्तःकरणमें उत्पद्यमान सारे शरीरमें व्याप्त होनेवाली हृदय, नाड़ी और धर्म आदिको विषय करनेवाली शाब्दवृत्ति दैवयोगसे कदाचित् हृदय,
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तिप्रसक्तम् । तत्र दैवात् कदाचित् वृत्तिविषयसंसर्गे सति वृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यस्य विषयावच्छिन्नचैतन्यस्य चाऽभेदाभिव्यक्तेरवर्जनीयत्वादिति चेद्,* न; परोक्षवृत्तेर्विषयावच्छिन्नचैतन्यगताज्ञाननिवर्तनाक्षमतया तत्राऽज्ञानेनाऽऽवृतस्य विषयचैतन्यस्याऽनावृतेन वृत्त्यवच्छिन्नसाक्षिचैतन्येनाऽभेदाभिव्यक्तेरभावादापरोक्ष्याप्रसक्तेः। अत एव जीवस्य संसारदशायां वस्तुतस्सत्यपि ब्रह्माभेदे न तदापरोक्ष्यम् , अज्ञानावरणकृतभेदसत्त्वात् । न चैवं ब्रह्मणो
शब्दवृत्ति और शाब्दज्ञान विषयमें अतिव्याप्ति होगी, क्योंकि उस स्थलमें दैवसे कदाचित् वृत्ति और विषयका परस्पर संसर्ग होनेसे वृत्तिसे अवच्छिन्न चैतन्य और विषयसे अवच्छिन्न चैतन्यकी अभेदाभिव्यक्ति अवश्य हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है ‡, क्योंकि परोक्षवृत्ति विषयावच्छिन्न चैतन्यमें रहनेवाले अज्ञानकी निवृत्ति नहीं कर सकती है, इसलिए उक्त स्थलमें अज्ञानसे आवृत विषय चैतन्यका अनावृत वृत्त्यवच्छिन्न साक्षिरूप चैतन्यके साथ अभेदकी अभिव्यक्ति नहीं हो सकती है, इससे अपरोक्षत्वकी प्रसक्ति नहीं हो सकती है । इसीसे संसारदशामें ब्रह्मके साथ जीवका अभेद है, तो भी उसका प्रत्यक्ष नहीं होता है, क्योंकि अज्ञानके आवरणसे भेद है* ।
नाडी आदिसे अवच्छिन्न अन्तःकरणके प्रदेशमें उत्पन्न हो, तो हृदय आदिरूप विषयसे अवच्छिन्न चैतन्यका और हृदय आदिविषयक शाब्दवृत्तिसे अवच्छिन्न चैतन्यका परस्पर अवश्य अभेद अभिव्यक्त होगा, क्योंकि घटादिस्थलमें वृत्तिका विषयके साथ सम्बन्ध होनेपर वृत्त्यवच्छिन्न और विषयावच्छिन्न चैतन्यकी अभेदाभिव्यक्ति मानी गई है। इस अवस्थामें हृदय आदिविषयक शाब्द और अनुमिति आदिवृत्तिसे अवच्छिन्न चैतन्यरूप परोक्ष ज्ञानमें, जो कि हृदय आदि अर्थोंसे अभिन्न है और उनके व्यवहारमें अनुकूल है, ज्ञानके अपरोक्षत्वरूप लक्षणकी अतिव्याप्ति अवश्य हो सकती है, अतः तथाकथित ज्ञानका अपरोक्षत्व असिद्ध है।
‡ समाधानका तात्पर्य यह है कि जिन चैतन्योंका परस्पर अभेद विवक्षित है उनका अनावृतत्व भी अपेक्षित है, क्योंकि उनमें से एक भी चैतन्य यदि आवृत हो, तो उनका अभेद अभिव्यक्त नहीं हो सकता है, इसलिए हृदय आदि विषयको अवगाहन करनेवाली शाब्दवृत्ति स्थलमें उक्त लक्षणकी अतिव्याप्ति नहीं हो सकती है ।
* तात्पर्य यह है कि अभेदाभिव्यक्तिमें ही अपरोक्षत्वप्रयोजकताका अङ्गीकार होनेसे तत्त्वसाक्षात्कारके पूर्वकालमें ब्रह्मका अपने व्यवहारमें अनुकूल जीव चैतन्यके साथ अभेद होनेपर भी अभेदाभिव्यक्ति न होनेसे ब्रह्मका अपरोक्षत्व नहीं होता है ।
ब्रह्मज्ञानके शाब्दापरोक्षत्वका विचार ] भाषाअनुवादसहित ४८१
जीवापरोक्ष्यासम्भवादसर्वज्ञत्वापत्तिः, अज्ञानस्य ईश्वरं प्रत्यनावारकतया तं <sup>*</sup>प्रति जीवभेदानापादनात् । यद् अज्ञानं यं प्रत्यावरकम्, तस्य तं प्रत्येव स्वाश्रयभेदापादकत्वात् । अत एव चैत्रज्ञानेन तस्य घटाज्ञाने निवृत्ते अनिवृत्तं मैत्राज्ञानं मैत्रं प्रत्येव विषयचैतन्यस्य भेदापादकमिति न चैत्रस्य
यदि शङ्का हो कि अज्ञानकृत भेदके अभेदाभिव्यक्तिका प्रतिबन्धक होनेपर ब्रह्मको जीवका प्रत्यक्ष न होनेसे ईश्वरमें असर्वज्ञत्वकी प्रसक्ति <sup>*</sup> होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि <sup>†</sup> ईश्वरके प्रति अज्ञान आवरण नहीं करता है, अतः ईश्वरके प्रति जीवके भेदका वह अज्ञान आपादन नहीं करता है, क्योंकि जो अज्ञान <sup>‡</sup> जिसके प्रति आवरण करता हो वह उसीके प्रति अपने आश्रयके भेदका आपादन करता है। इसीसे <sup>×</sup> चैत्रके ज्ञानसे उसके घटाज्ञानके निवृत्त-होनेपर भी अनिवृत्त मैत्रका अज्ञान मैत्रके प्रति विषयचैतन्यके भेदका आपादक
<sup>*</sup> शङ्काका तात्पर्य यह है कि 'जीवका मैं साक्षात्कार करता हूँ' जीव मुझे अपरोक्ष है, इत्यादि जीवविषयक व्यवहारमें अनुकूल जो ब्रह्मका ज्ञान है, वह मायावृत्तिसे उपहित नहीं है, किन्तु ब्रह्मचैतन्य ही है, इस परिस्थितिमें ब्रह्मकर्तृक व्यवहारके विषयीभूत जीवका और ब्रह्मकर्तृक व्यवहारमें अनुकूल उक्त ब्रह्मचैतन्यका परस्पर अभेद होनेपर भी अभेदकी अभिव्यक्ति नहीं होनेसे ब्रह्मके प्रति जीव अपरोक्ष नहीं होगा, इसलिए ब्रह्मको सर्वज्ञत्व नहीं होगा, यदि कहा जाय कि ब्रह्मके जीवविषयक परोक्षज्ञानसे ही सर्वज्ञत्वकी उपपत्ति हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ईश्वरके परोक्षज्ञानका अङ्गीकार नहीं है ।
<sup>†</sup> जो अज्ञान है, वह जीवधर्मिक ब्रह्मप्रतियोगिक भेदका प्रयोजक है, क्योंकि जीवको ही 'मैं ब्रह्म नहीं हूँ' इस प्रकार अनुभव होता है, इसलिए ब्रह्मधर्मिक जीवप्रति-योगिक भेदका अज्ञान प्रयोजक नहीं है, क्योंकि 'मैं (ब्रह्म) जीव नहीं हूँ' इस प्रकारके ब्रह्मके अनुभवमें प्रमाण नहीं है । इस अवस्थामें ब्रह्मके प्रति जीवकी ब्रह्मके साथ अभेदाव्यक्तिमें प्रतिबन्धक अज्ञानकृत भेदके न होनेसे उक्त दोष नहीं है, इस अभिप्रायसे उक्त आक्षेपका परिहार करते हैं । और दूसरी बात यह भी है कि 'मैं अज्ञानी हूँ' इस प्रकार ईश्वरको अनुभव भी नहीं होता है, अतः ईश्वरके प्रति जीवका आवारक भी अज्ञान नहीं होता है ।
<sup>‡</sup> अर्थात् जिस जीवके प्रति जो अज्ञान विषयचैतन्यका आवारक है, उसी जीवके प्रति वह अज्ञान अपने आश्रयभूत विषयचैतन्यप्रतियोगिक भेदका प्रयोजक होता है, यह भाव है ।
<sup>×</sup> प्रकृतमें भाव यह है कि जैसे घटावच्छिन्न चैतन्यमें चैत्रके प्रति घटावच्छिन्न चैतन्यका आवारक अज्ञान रहता है, वैसे ही मैत्रके प्रति भी घटचैतन्यका आवारक अज्ञान भी उसमें रहता है । इससे चैत्रीय घटके ज्ञानसे चैत्रीय घटाज्ञानके—जो कि अपने आश्रय विषयचैतन्यके भेदका आपादक है—निवृत्त होनेपर भी चैत्रीय घटज्ञानसे अनिवृत्त घटचैतन्यमें रहनेवाला मैत्रके प्रति
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घटापरोक्ष्यानुभवानुपपत्तिरपि । नन्वेवं वृत्तिविषयचैतन्याभेदाभिव्यक्ति- लक्षणस्याऽपरोक्ष्यस्य स्वविषयचैतन्यगताज्ञाननिवृत्तिप्रयोज्यत्वे तस्याज्ञा- ननिवृत्तिप्रयोजकत्वायोगाद् ज्ञानमात्रमज्ञाननिवर्तकं भवेदिति चेद्, न; 'यद् ज्ञानमुत्पद्यमानं स्वकारणमहिम्ना विषयसंसृष्टमेवोत्पद्यते, तदेवा- ज्ञाननिवर्तकम्' इति विशेपणाद्, ऐन्द्रियकज्ञानानां तथात्वात् । एवं च शब्दादुत्पद्यमानमपि ब्रह्मज्ञानं सर्वोपादानभूतस्वविषयब्रह्मसंसृष्टमेव
है, इसलिए चैत्रको घटके अपरोक्षत्वका अनुभव भी नहीं होता है । ❊यदि शङ्का हो कि ऐसा माननेपर अर्थात् वृत्त्यवच्छिन्न और विषयावच्छिन्न चैतन्यके अभेदकी अभिव्यक्तिरूप अपरोक्षत्वके अपने विषयमें रहनेवाले अज्ञानकी निवृत्तिसे प्रयोज्य होनेपर उसमें अज्ञाननिवृत्तिकी प्रयोजकताका अभाव होनेसे ज्ञानमात्र ही अज्ञानका निवर्तक प्रसक्त होगा ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जो उत्पद्यमान ज्ञान अपने कारणकी सामर्थ्यसे विषयसंसृष्ट ही उत्पन्न होता है, वही अज्ञानका निवर्तक होता है, ऐसा विशेषण होनेसे इन्द्रियजन्य ज्ञान ही अज्ञानके निवर्तक होते हैं, सब ज्ञान नहीं । इसी प्रकार शब्दसे उत्पद्यमान ब्रह्मज्ञान भी सबके प्रति उपादानभूत अपने विषयरूप ब्रह्मसे संसृष्ट ही उत्पन्न
घटावारक अज्ञान मैत्रके प्रति ही स्वाश्रयभूत घटचैतन्यप्रतियोगिक भेदका आपादक होगा, मैत्रका अज्ञान चैत्रके प्रति घटावच्छिन्न चैतन्यका अनावारक है, तथापि चैत्रके प्रति स्वाश्रय- भूत घटावच्छिन्न चैतन्यप्रतियोगिक भेदका आपादक नहीं है, इस अवस्था में चैत्रके घटज्ञानसे चैत्रके अज्ञानकी निवृत्ति होनेसे तत्कृत भेदकी निवृत्ति होनेपर भी चैत्र और घटावच्छिन्न चैतन्यका परस्पर मैत्राज्ञानकृत भेद होनेसे अभेदकी अभिव्यक्ति नहीं है, अतः चैत्रको घटके अपरोक्षत्वका अनुभव अनुपपन्न ही होगा, इससे मैत्रका अज्ञान मैत्रके प्रति जैसे स्वाश्रय चैतन्यका भेदापादक है, वैसे चैत्रके प्रति स्वाश्रयचैतन्यप्रतियोगिक भेदका आपादक नहीं है, क्योंकि चैत्रके प्रति स्वाश्रय चैतन्यका आवारक नहीं है, ऐसा कहना होगा, इसलिए उक्त व्यवस्थाकी सिद्धि होगी ।
* तात्पर्य यह है कि 'अपरोक्षज्ञान अज्ञानका निवर्तक होता है' इस प्रकारसे ज्ञानके अज्ञान- निवर्तकत्वमें अपरोक्षत्वको प्रयोजक नहीं मान सकते हैं, क्योंकि ज्ञानगत अपरोक्षत्व अज्ञानकी निवृत्तिके अधीन है, यदि कहो कि ज्ञानगत अपरोक्षत्व अज्ञाननिवृत्तिका प्रयोजक नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेसे ज्ञानमात्रमें अज्ञाननिवर्तकत्वकी प्रसक्ति होनेसे परोक्षज्ञानमें भी अज्ञाननिवर्तकत्वकी प्रसक्ति होगी, इस अभिप्रायसे इस ग्रन्थसे शङ्का करते हैं ।
ब्रह्मज्ञानके शाब्दापरोक्षत्वका विचार ] भाषानुवादसहितं ४८३
उत्पद्यत इति तस्याऽज्ञाननिवर्तकत्वमज्ञाननिवृत्तौ तन्मूलभेदप्रविलयादा-*परोक्ष्यं चेत्युपपद्यतेतराम् ।
नन्वध्ययनकालेऽपि शब्दात् स्यादपरोक्षधीः ।
सत्ताधृतिर्विचाराच्चेन्मननादिश्रमो वृथा ॥ २५ ॥
मैवं पुन्दोषशान्त्यर्थं मननादेर्विधानतः ।
तत्तत्संसृष्टवृत्त्येत्थं तदज्ञाननिवर्हणम् ॥ २६ ॥
यदि शङ्का हो कि अध्ययनकालमें भी वेदान्तशब्दसे अपरोक्ष ज्ञानके होनेसे विचार व्यर्थ है, यदि कहें कि ब्रह्मसत्ताके निश्चयात्मक ज्ञानके लिए उसकी आवश्यकता है, तो मनन आदिकी निरर्थकता होगी, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि पुरुषदोषकी निवृत्ति करनेके लिए मनन आदिका विधान होनेसे तत्-तत् अर्थोंसे संसृष्ट वृत्तिसे तत्तद्विषयक अज्ञानकी निवृत्ति होती है ॥ २५ ॥ २६ ॥
नन्वेवमध्ययनगृहीतवेदान्तजन्येनापि तज्ज्ञानेन मूलाज्ञाननिवृत्त्यापरोक्ष्यं किं न स्यात् । न च तत्सत्तानिश्चयरूपत्वाभावाद् नाज्ञान-निवर्तकमिति वाच्यम्, तथाऽपि कृतश्रवणस्य निर्विचिकित्सशाब्दज्ञानेन तन्निवृत्त्या मननादिवैयर्थ्यापत्तिरिति चेद्, न; सत्यपि श्रवणाद् निर्विचिकित्सज्ञाने चित्तविक्षेपदोषेण प्रतिबन्धाद् अज्ञानानिवृत्त्या तन्निराकरणे होता है, इसलिए उसमें अज्ञानकी निवर्तकता है और अज्ञानकी निवृत्तिहोनेसे तन्मूलक भेदका विनाश होनेसे अपरोक्षत्वकी भी उपपत्ति हो सकती है ।
यदि शङ्का हो कि ऐसा होनेपर अध्ययनसे सम्पादित वेदान्तसे उत्पन्न ब्रह्मज्ञानसे भी मूलभूत अज्ञानकी निवृत्ति होनेसे अपरोक्षत्व क्यों नहीं होता ? यदि कहो कि विचारके पूर्व अध्ययनगृहीत वेदान्तजन्य ज्ञान सत्तानिश्चयात्मक नहीं है, अतः अज्ञानका निवर्तक नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि निवर्तक ज्ञानमें सत्तानिश्चयरूपत्व विशेषण देनेपर भी कृतश्रवण पुरुषको सत्तानिश्चयात्मक शाब्दज्ञान होनेसे उसीसे अज्ञानकी निवृत्ति हो सकती है, फिर मनन आदि निरर्थक प्रसक्त होंगे, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि श्रवणसे सत्तानिश्चयात्मक ज्ञानके होनेपर भी चित्तके विक्षेपात्मक दोषसे प्रतिबन्ध होनेके कारण अज्ञानकी निवृत्ति नहीं होती है, अतः उसके (अज्ञानके) निराकरण
* अर्थात् जो ज्ञान नियमतः विषयसंसृष्टरूपसे उत्पन्न हो, वही ज्ञान अज्ञानका निवर्तक होता है, ऐसे नियमका अङ्गीकार करनेसे, यह भाव है ।
४८४ • सिद्धान्तलेशसंग्रहे [ तृतीय परिच्छेद
मनननिदिध्यासननियमविध्यर्थानुष्ठानस्याऽर्थवत्त्वाद्, भवान्तरीयमननाद्यनुष्ठाननिरस्तचित्तविक्षेपस्य उपदेशमात्राद् ब्रह्मापरोक्ष्यस्य इष्यमाणत्वाच्चेत्याहुः ॥ १० ॥
नन्वेवं वृत्त्यभिव्यक्तचिदंशे विषयैक्यतः ।
श्रवणादिमतो नश्येन्मूलाज्ञानं घटेक्षणात् ॥ २७ ॥
अब शङ्का होती है कि वृत्तिसे अभिव्यक्त चैतन्यांशमें विषयका ऐक्य होनेसे श्रवणादिसे युक्त पुरुषको घटके ज्ञानसे भी मूलाज्ञानका विनाश होना चाहिए ॥२७॥
अथैवमपि कृतनिदिध्यासनस्य वेदान्तजन्यब्रह्मज्ञानेनेव घटादिज्ञानेनाऽपि ब्रह्माज्ञाननिवृत्तिः किं न स्यात् । न च तस्य ब्रह्माविषयत्वाद् न ततो ब्रह्माज्ञाननिवृत्तिरिति वाच्यम्, 'घटस्सन्' इत्यादिवुद्धिवृत्तेः सद्रूप-
करनेके लिए मनन और निदिध्यासनकी नियमविधिसे प्राप्त अर्थके अनुष्ठानकी अवश्य अपेक्षा है, और जन्मान्तरीय † मनन आदिके अनुष्ठानसे जिसके चित्तकी अस्थिरता ( विक्षेप ) निवृत्ति हुई है, ऐसे पुरुषको केवल उपदेशमात्रसे भी ब्रह्मापरोक्ष इष्ट ही है ॥१०॥
* अब शङ्का होती है कि विक्षेपदोषकी निवृत्तिके लिए मनन आदिकी अपेक्षा होनेपर भी जिसने निदिध्यासन किया है, ऐसे पुरुषको वेदान्तोंसे उत्पन्न ब्रह्मज्ञानसे जैसे ब्रह्मविषयक अज्ञानकी निवृत्ति होती है, वैसे ही उसके घटादिज्ञानसे भी अज्ञानकी निवृत्ति क्यों नहीं होती है ? यदि कहो कि घटविषयक ज्ञान ब्रह्मविषयक नहीं है, अतः वह ब्रह्माज्ञानका निवर्तक नहीं है, तो यह भी
† तात्पर्य यह है कि यदि मनन आदिका प्रयोजन विक्षेपशब्दसे कहलानेवाले असम्भावना, विपरीत भावना आदिकी निवृत्ति है, तो जिस अधिकारी पुरुषका जन्मान्तरीय मनन आदिके सहित श्रवणके अनुष्ठानसे समस्त विक्षेपदोष निवृत्त हो गया है, उस पुरुषको उपदेशमात्रसे भी सत्तानिश्चयात्मक और अप्रतिबद्ध ब्रह्मज्ञान उत्पन्न होता है, इसलिए उसको इस जन्ममें 'श्रवण, मनन, आदिके अनुष्ठानके विना भी मूलाज्ञानकी निवृत्ति और ब्रह्मका अपरोक्षज्ञान हो सकता है,' इसलिए उक्त पुरुषको श्रवणादिके अनुष्ठानके विना ही यदि ब्रह्मज्ञान माना जाय, तो भी कोई हानि नहीं है ।
* शङ्काका अभिप्राय यह है कि जिसने निदिध्यासन किया है, ऐसे पुरुषको ब्रह्मज्ञानसे जैसे मूलाज्ञानकी निवृत्ति होती है, वैसे ही घटज्ञानसे भी मूल अज्ञानकी निवृत्ति होनी चाहिए, क्योंकि घटादिवृत्ति भी मूलाज्ञानके विषयभूत चैतन्यको ही विषय करती है ।
अज्ञानके निवर्त्तकका निरूपण] भाषानुवादसहित ४८५
ब्रह्मविषयत्वोपगमात् । न च तत्र घटाद्याकारवृत्त्या तदज्ञाननिवृत्तौ स्वतः स्फुरणादेव तदवच्छिन्नं चैतन्यं सदिति प्रकाशते, न तस्य घटाद्याकारवृत्तिविषयत्वमिति वाच्यम्, तदभावे घटविषयं ज्ञानं तदवच्छिन्नचैतन्यविषयमज्ञानमिति भिन्नविषयेण ज्ञानेन तदज्ञाननिवृत्तेरयोगाद्, जडे आवरणकृत्याभावेन घटस्याऽज्ञानाविषयत्वात् । न च घटादिवृत्तेस्तदवच्छिन्नचैतन्यविषयत्वेऽपि अखण्डानन्दाकारत्वाभावाद् न ततो मूलाज्ञाननिवृत्तिरिति वाच्यम्, वेदान्तजन्यसाक्षात्कारेऽपि तदभावात् । न हि
युक्त नहीं है, क्योंकि 'घटः सन्' ( घट सत् है ) इत्यादि अन्तःकरणकी वृत्तिको भी सद्रूप ब्रह्मविषयक माना गया है। यदि शङ्का हो कि घटादिस्थलमें घटाकारवृत्तिसे घटाज्ञानकी निवृत्ति होनेपर स्वतः स्फुरणसे ही घटावच्छिन्न चैतन्यका सद्रूपसे प्रकाश होता है, अतः ब्रह्ममें घटाकारवृत्तिविषयता नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि चैतन्यको यदि घटादिवृत्तिका विषय न माना जाय, तो ज्ञान घटविषयक होगा और अज्ञान घटावच्छिन्नचैतन्यविषयक होगा, इसलिए भिन्नविषयक ज्ञानसे घटाज्ञानकी निवृत्ति नहीं होगी, और जड़में † आवरण कार्यका अभाव होनेके कारण घट अज्ञानका विषय ही नहीं होगा। यदि शङ्का हो कि घटादिके आकारमें परिणत वृत्ति घटाद्यवच्छिन्न चैतन्यको अवश्य विषय करती है, तथापि वह अखण्ड आनन्दाकार नहीं है, इसलिए घटज्ञानसे मूलाज्ञानकी निवृत्ति नहीं होती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि वेदान्तजन्य साक्षात्कारमें भी अनवच्छिन्नानन्दाकारत्व नहीं भासता है, अतः उससे भी मूलाज्ञानकी निवृत्ति नहीं होगी, क्योंकि वेदान्तज्ञानमें अखण्डत्व ( अनवच्छिन्नत्व ) या आनन्दाकारत्व कोई धर्म है ही नहीं। यदि वेदान्तजन्य ज्ञानमें
† यदि शङ्का हो कि केवल घटविषयक ज्ञानसे घटावच्छिन्न चैतन्यविषयक अज्ञानकी निवृत्ति नहीं हो सकती है, क्योंकि ज्ञान और अज्ञान समानविषयक नहीं हैं, अतः घटज्ञानके साथ अज्ञानकी समानविषयकता लानेके लिए अज्ञानको भी केवल घटादि जड़विषयक मानना चाहिए, इसपर 'जडे आवरणकृत्याभावेन' इससे पूर्वपक्षी कहता है कि जड़में तो स्वतः जड़त्व हेतुसे प्रमाणकी अप्रवृत्तिदशामें अप्रकाशकी उपपत्ति हो सकती है, फिर जड़के अप्रकाशके लिए आवरणकी कल्पना व्यर्थ है, इस अवस्थामें वेदान्तजन्य ज्ञानके समान घटादिज्ञान भी ब्रह्मचैतन्यविषयक होनेसे मूलाज्ञानका समानविषयक है, अतः उससे भी अज्ञानकी निवृत्तिका प्रसङ्ग आ सकता है, यह भाव है।
| ४८६ | सिद्धान्तलेशसंग्रहं | [ तृतीय परिच्छेद |
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तत्राऽखण्डत्वमानन्दत्वं वा कश्चिदस्ति प्रकारः । वेदान्तानां संसर्गागोचर-प्रमाजनकत्वलक्षणाखण्डार्थत्वहानापत्तेः । न च वेदान्तजन्यज्ञानादेव तन्निवृत्तिनियम इति वाच्यम्, क्लृप्तसाज्ञाननिवर्तकत्वप्रयोजकस्य रूपस्य ज्ञानान्तरेऽपि सद्भावे तथा नियन्तुमशक्यत्वात् । न च घटाद्याकारवृत्ति-विषयस्याऽवच्छिन्नचैतन्यस्याऽपि कल्पितत्वेन यन्मूलाज्ञानविषयभूतं सत्य-मनवच्छिन्नं चैतन्यम्, तद्विषयत्वाभावाद् घटादिवृत्तीनां निवर्त्यत्वाभि-
अखण्डत्व, आनन्दत्वादि माने जाँय, तो संसर्गाविषयकप्रमाजनकत्वरूप अखण्डार्थत्वका व्याघात होगा । यदि शङ्का हो कि वेदान्तजन्य ज्ञानसे ही मूलाज्ञानकी निवृत्ति होती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अज्ञाननिवर्तकत्वमें प्रयोजकीभूत क्लृप्त स्वरूपका अन्यज्ञानमें भी अवस्थान होनेसे वैसा नियम कर ही * नहीं सकते हैं । यदि शङ्का हो कि घटाद्याकारवृत्तिके विषय अवच्छिन्न चैतन्यके कल्पित होनेसे सत्य अनवच्छिन्न चैतन्य उसका विषय नहीं है, अतः घटादि वृत्तियोंमें निवर्त्यत्वरूपसे अभिमत अज्ञानसमानविषयत्वरूप क्लृप्त प्रयोजक ही नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उसमें अर्थात् अवच्छिन्न चैतन्यमें †
* वेदान्तजन्य ज्ञानमें क्लृप्त मूलाज्ञानसमानविषयकत्वरूप सत्तानिश्चयत्वरूप अप्रतिबद्धत्वात्मक जो मूलाज्ञाननिवर्तकत्वरूप प्रयोजकत्व है, वह निदिध्यासनके परिपाककालमें चक्षु आदिसे उत्पन्न होनेवाली घटादि वृत्तिमें भी है, अतः वेदान्तजन्य ज्ञानसे ही मूलाज्ञानकी निवृत्ति होती है, घटादि ज्ञानसे नहीं होती है, इस प्रकार नियमन नहीं कर सकते हैं, क्योंकि सत्तानिश्चयत्वके समान वेदान्तजन्यत्वको प्रयोजकके विशेषण करनेमें गौरव है, यह भाव है ।
† अवच्छेद्य चैतन्यांश भी, जो कि घटादिवृत्तिका विषय है, अकल्पित मूलाज्ञानका विषयीभूत ब्रह्मचैतन्यात्मक ही है, अतः घटाद्यवच्छिन्न चैतन्यविषयक वृत्तिमें भी—निवर्त्यत्वेन अभिमत जो अज्ञान है, उसका समानविषयकत्वरूप वेदान्तजन्य ज्ञानमें क्लृप्त—प्रयोजक है, तात्पर्य यह है कि घटाद्यवच्छिन्न चैतन्य कल्पित है, इसमें चैतन्यको अकल्पित मानने पर यह दोष है, यदि कल्पित मानेंगे, तो घट आदिके समान उक्त अवच्छिन्न चैतन्य जड़ ही होगा, इस परिस्थितिमें उसके अज्ञानविषयत्व न होनेसे अवस्थारूप अज्ञानके प्रति मूलाज्ञानका विषयभूत ब्रह्मचैतन्य ही विषय कहना होगा, क्योंकि निर्विषयक अज्ञान नहीं होता, इस अवस्थामें ब्रह्मचैतन्यविषयक अवस्थारूप अज्ञानके निवर्तकत्वकी उपपत्तिके लिए घटादिवृत्तियोंमें भी मूलाज्ञानविषय ब्रह्मचैतन्यविषयकत्व मानना पड़ेगा, क्योंकि घटादिवृत्तियोंके सत्यब्रह्मविषयक न होनेसे अवस्थारूप अज्ञानके साथ समानविषयकत्वके न होनेसे आवृत्तियोंमें अवस्थारूप अज्ञाननिवर्तकत्वकी प्रसक्ति नहीं होगी ।
अज्ञानके निवर्त्तकका निरूपण] भाषानुवादसहित ४८७
मताज्ञानसमानविषयत्वलक्षणं क्लृप्तं प्रयोजकमेव नाऽस्तीति वाच्यम्; तत्राऽवच्छेदकांशस्य कल्पितत्वेऽप्यवच्छेद्यांशस्याऽकल्पितमूलाज्ञानविषयचैतन्यरूपत्वात्, तस्य कल्पितत्वे घटवज्जडतया अवस्थाऽज्ञानं प्रत्यपि विषयत्वायोगाेनावस्थाऽज्ञानस्य मूलाज्ञानविषयाकल्पितचैतन्यविषयत्वस्य वक्तव्यतया तन्निवर्तकघटादिज्ञानस्याऽपि तद्विषयत्वावश्यम्भावेन तत्पक्षेऽपि ततो मूलाज्ञाननिवृत्तिप्रसङ्गस्याऽपरिहारात् ।
नैषमत्राहुराचार्या न सन्दृश इति श्रुतेः ।
चित् चक्षुराद्ययोग्यैव चिद्द्वाराऽस्त्यावृतिर्जडे ॥ २८ ॥
उक्त पूर्वपक्षके उत्तरमें आचार्य कहते हैं कि 'न सन्दृशे' इस श्रुतिसे ब्रह्मचैतन्य चक्षु आदिका अयोग्य ही है । जड़में चैतन्य द्वारा अज्ञानका आवरण होता है ॥ २८ ॥
अत्राऽऽहुराचार्याः—न चैतन्यं चक्षुरादिजन्यवृत्तिविषयः ।
अवच्छेदक अंशके कल्पित होने पर भी अवच्छेद्य अंश मूलाज्ञानका विषयीभूत अकल्पित ब्रह्मचैतन्यात्मक है, यदि अवच्छेद्य अंशको कल्पित माना जाय, तो घटके समान जड़ होनेसे अवस्थारूप अज्ञानके प्रति भी वह विषय नहीं हो सकता है, इसलिए अवस्थारूप अज्ञानको भी मूलभूत अज्ञानका विषयभूत अकल्पित चैतन्यविषयकं कहना होगा, इससे अवस्थारूप अज्ञानके निवर्तक घटादिज्ञानमें भी मूलाज्ञानका विषयीभूत ब्रह्मचैतन्यविषयकत्व अवश्य प्रसक्त होगा, अतः अवच्छेद्यांशके कल्पितत्वपक्षमें भी घटादिज्ञानसे मूलाज्ञानकी निवृत्तिका प्रसङ्ग हटा नहीं सकते हैं ।
इस विषयमें आचार्य कहते हैं कि * चक्षु आदिसे उत्पन्न हुई
* पूर्वोक्त आक्षेपकर्ताका भाव यही सिद्ध होता है कि घटादिज्ञान भी मूलाज्ञानका निवर्तक होगा, क्योंकि वह भी चैतन्यविषयक है, जैसे कि वेदान्तजन्यज्ञान चैतन्यविषयक होता है । परन्तु इस अनुमानमें हेतुकी सिद्धि नहीं है, इस अभिप्रायसे उक्त पूर्वपक्षका परिहार करते हैं, अर्थात् चक्षु आदिसे उत्पन्न होनेवाला विज्ञान यदि आत्माको विषय करनेवाला है, तो उससे मूलाज्ञानकी निवृत्तिका प्रसङ्ग आ सकता है, परन्तु चक्षुरादिजन्यज्ञान वेदान्तजन्यज्ञानके समान आत्माको विषय करनेवाला है ही नहीं, अतः उक्त अतिप्रसङ्ग नहीं है, इसमें प्रमाण भी 'न सन्दृशे' इत्यादि श्रुति है, इस श्रुतिका तात्पर्य यही है कि चक्षु आदि इन्द्रियोंकी सामर्थ्य पटादि जड़ पदार्थोंके अवगाहन करनेमें ही है, आत्माके अवगाहन करनेमें नहीं, इससे परमाणु आदिके ग्रहणमें जैसे चक्षुकी योग्यता नहीं है, वैसे आत्माके ग्रहणमें भी इसकी सामर्थ्य
| ४८८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
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‘न सन्दृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम् ।
पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयंभूस्तस्मात् पराङ् पश्यति नान्तरात्मन्’ ॥
इत्यादिश्रुत्या तस्य परमाण्वादिवत् चक्षुराद्ययोग्यत्वोपदेशाद्, ‘औ-
पनिषदम्’ इति विशेषणाच्च । न च—
‘सर्वप्रत्ययवेद्ये वा ब्रह्मरूपे व्यवस्थिते’ ।
इत्यादिवार्त्तिकविरोधः ; तस्य घटाद्याकारवृत्त्युदये सति आवरणा-
भिभवात् स्वप्रभं सद्रूपं ब्रह्म ‘घटस्सन्’ इति घटवद् व्यवहार्यं भवतीत्यौ-
वृत्तिका विषय चैतन्य नहीं है, क्योंकि ‘न सन्दृशे०’ (आत्माका स्वरूप चक्षुके योग्य नहीं है, इसलिए आत्माको कोई भी चक्षुसे नहीं देखता है, इन्द्रियाँ ईश्वरसे जड़ अर्थोंके ग्रहण करनेके लिए ही बनाई गई है, अतः बाह्य पदार्थोंका ही इन्द्रियाँ ग्रहण करती हैं, अन्तरात्माका—चैतन्यका—ग्रहण नहीं करती हैं) इत्यादि श्रुतिसे परमात्माको परमाणु आदिके समान चक्षुका अयोग्य ही बतलाया है और ‘औपनिषदम्’ (केवल उपनिषत्प्रमाणसे गम्य) ऐसा आत्मामें विशेषण भी दिया गया है ।
यदि शङ्का हो कि ‘सर्वप्रत्ययवेद्ये०’ (सब प्रत्ययोंमें वेद्यरूपसे व्यवस्थित ब्रह्मरूप वस्तुमें) इत्यादि वार्त्तिकके साथ विरोध होगा? नहीं, नहीं होगा, क्योंकि उस वार्त्तिकवचनका तात्पर्य यह है—घटाद्याकारवृत्तिके उदित होने पर आवरणके विनष्ट होनेसे स्वप्रकाश सद्रूप ब्रह्म ‘घटः सन्’ इस प्रकार घटके समान व्यवहृत किया जाता है, इसलिए वह गौणरूपसे .वृत्तिसे वेद्य है*।
नहीं है, अतः पूर्वोक्त प्रसङ्ग अनुचित है, यदि ‘सर्वप्रत्ययवेद्ये’ इत्यादि वार्त्तिकके आधारपर शंका की जाय कि सभी घटादिज्ञानोंमें ब्रह्मका प्रकाश होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त श्रुतिके जबरदस्त प्रमाण होनेसे उक्त वार्त्तिक गौणार्थक है, अर्थात् जैसे घटमें घटविषयक वृत्तिके अधीन व्यवहारकी विषयता है, वैसे ही घट आदिका अधिष्ठानभूत सद्रूप ब्रह्म भी घटादिके आकारमें परिणत अन्तःकरणकी वृत्तिके अधीन व्यवहारका विषय है, इसलिए ‘सद्रूप ब्रह्म घटादिज्ञानसे वेद्य है’ इस प्रकारका औपचारिक व्यवहार होता है । यदि शङ्का हो कि परोक्षवृत्तियोंमें आवरणाभिभावकत्वका अभाव होनेसे वहां पर उक्त व्यवस्था नहीं घट सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त वार्त्तिकमें उक्त प्रत्ययशब्दका अर्थ है—आवरणाभिभावक वृत्ति, अतः पूर्वोक्त आक्षेप सर्वथा अनुपपन्न है, यह समझना चाहिए ।
* इसका प्रकृतमें तात्पर्य यह है कि उक्त प्रकारसे घटादि वृत्तिको यदि चैतन्यविषयक न माना जाय, तो घटज्ञानसे घटावच्छिन्न चैतन्यावारक अज्ञानकी निवृत्ति नहीं होगी, क्योंकि समानविषयक
अज्ञानके निवर्तकका निरूपण ] भाषानुवादसहित ४८९
पचारिकघटादिवृत्तिवेद्यत्वपरत्वात् । आवरणाभिभावकत्वं च घटादिज्ञा- नस्य घटादिविषयत्वादेव उपपन्नम्, घटादेरप्यज्ञानविषयत्वाद् 'घटं न जानामि' 'घटज्ञानेन घटाज्ञानं नष्टम्' इति अवस्थाऽज्ञानस्य घटादिविषय- त्वानुभवात् । न च तत्राऽऽवरणकृत्याभावादज्ञानाङ्गीकारो न युक्तः, तद्भा- सकस्य तदवच्छिन्नचैतन्यस्याऽऽवरणादेव तदप्रकाशोपपत्तेरिति वाच्यम् , उक्तभङ्ग्या जडस्य साक्षादज्ञानविषयत्वप्रतिषेधेऽपि जडावच्छिन्नचैतन्य-
घटादिज्ञानमें आवरणका अभिभावकत्व तो घटादिविषयत्वकी शक्ति होनेसे ही उपपन्न है, क्योंकि घट आदि भी अज्ञानका विषय होता है, कारण कि 'मैं घटको नहीं जानता हूँ' 'घटके ज्ञानसे घटका अज्ञान नष्ट हुआ' इस प्रकार अवस्थारूप अज्ञान घट आदिको विषय करनेवाला है, ऐसा अनुभव होता है। यदि शङ्का हो कि घटादि जड़ वस्तुओंमें आवरणरूप कार्य न होनेसे अज्ञानका अङ्गीकार युक्त नहीं है, † क्योंकि जड़वस्तुके अवभासक जड़ावच्छिन्न चैतन्यके आवरणसे ही जड़के अप्रकाशकी उपपत्ति हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त प्रणालीसे ‡ अर्थात् 'जड़में आवरणकार्य न होनेसे अज्ञानका अङ्गीकार युक्त
ज्ञानाज्ञानका परस्पर विरोध है, असमानविषयकका नहीं है, इसपर 'आवरणाभिभावकत्व'का निर्वचन करते हैं, अर्थात् अनुभवके अनुसार अज्ञानका विषय जड़ भी होता है, क्योंकि 'मैं घटको नहीं जानता हूँ' ऐसी लोकप्रसिद्धप्रतीति अबाधितरूपसे हुआ करती है, अतः उक्त अतिप्रसङ्ग नहीं है, यह भाव है ।
† तात्पर्य यह है कि अज्ञानाश्रय जड़ नहीं हो सकता है, क्योंकि जड़में आवरण ही नहीं है, कारण कि आवरणका कोई कार्य जड़ वस्तुमें देखा नहीं जाता । 'मैं घटको नहीं जानता हूँ' इस प्रकारकी प्रतीति घट और घटाधिष्ठान चैतन्यके परस्पर तादात्म्य होनेसे उपपन्न हो सकती है। यदि शङ्का हो कि जड़में यदि आवरण नहीं है, तो उसका सर्वदा प्रकाश होना चाहिए, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि घट आदिके प्रकाशक चैतन्यका उसके साथ सम्बन्ध नहीं है, अतः उसका प्रकाश नहीं होता है। आवरणके वलसे प्रकाश नहीं होता यह वात नहीं है। यदि कहो कि चैतन्यमें जड़का अध्यास होनेसे सर्वदा चैतन्यके साथ सम्बन्ध है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उस चैतन्यके आवरणसे घटका भी अप्रकाश हो सकता है, अतः जड़में अज्ञान क्यों माना जाय ? यह पूर्वपक्षीका मन्तव्य है ।
‡ समाधानका तात्पर्य यह है कि 'तत्रावरणकृत्याभावात्' इत्यादि ग्रन्थसे साक्षात् अज्ञान- विषयत्वका निषेध होनेपर भी, अनुभवके आधारपर परम्परया अज्ञानविषयता जड़में मानी जाती है, अतः साक्षात् या परम्परया जो अज्ञानका विषय है, तद्विषयक ज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति होती है, इस प्रकार निवर्त्य-निवर्तक-भावका निर्वचन करनेसे सब दोषोंका निरास हो सकता है, इसी भावको 'उक्तभङ्ग्या' इत्यादि ग्रन्थसे कहते हैं ।,
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| ४९० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
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प्रकाशस्याऽज्ञानेनाऽऽवरणम्, ततो नित्यचैतन्यप्रकाशसंसर्गेऽपि जडस्य 'नास्ति', 'न प्रकाशते' इत्यादिव्यवहारयोग्यत्वमिति परम्परया अज्ञान-विषयत्वाभ्युपगमात् साक्षात् परम्परया वा यदज्ञानावरणीयम्, तद्विषय-त्वस्यैव ज्ञानस्य तदज्ञाननिवर्तकत्वप्रयोजकशरीरे निवेशात् । न चैवं घटा-दीनामुक्तरीत्या मूलाज्ञानविषयत्वमपीति घटादिसाक्षात्कारादेव मूला-ज्ञाननिवृत्त्यापातः, फलबलात्तदज्ञानकार्यातिरिक्ततद्विषयविषयकत्वस्यैव तन्निवर्तकत्वे तन्त्रत्वात् ।
नहीं है' इत्यादि वाक्यसे जड़में साक्षात् अज्ञानविषयताका निषेध करनेपर भी जड़ावच्छिन्न चैतन्यके प्रकाशका अज्ञानसे आवरण है, इससे नित्य चैतन्य प्रकाशका सम्बन्ध होनेपर भी जड़में 'नहीं है, प्रकाशित नहीं है' इस प्रकारका व्यवहारयोग्यतारूप आवरण है' इस प्रकार परम्परासे जड़में अज्ञानकी विषयताका स्वीकार होनेसे साक्षात् या परम्परासे जो अज्ञानसे आवृत है तद्विषयकत्वका ही ज्ञानके (तद्) अज्ञाननिवर्तकत्वप्रयोजक शरीरमें निवेश करना चाहिए । यदि शङ्का हो कि उक्त रीतिसे * घट आदि भी मूलाज्ञानके विषय हैं, इसलिए घट आदिके साक्षात्कारसे मूलाज्ञानकी निवृत्तिका प्रसङ्ग होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि फलके बलसे† अज्ञाननिवर्तकत्वमें अज्ञानकार्या-तिरिक्ततद्विषयकत्व ही प्रयोजक है।
* शङ्काका तात्पर्य यह है कि जैसे अवस्थारूप अज्ञानके प्रति परम्परासे विषयीभूत जड़ पदार्थके साक्षात्कारसे घटाद्यवच्छिन्न चैतन्यनिष्ठ अवस्थारूप अज्ञानकी निवृत्ति होती है, वैसे ही मूलाज्ञानमें परम्परया विषयीभूत जड़के साक्षात्कारसे भी ब्रह्मचैतन्यनिष्ठ मूला-ज्ञानकी निवृत्ति प्रसक्त होगी।
† समाधानका तात्पर्य यह है कि उक्त आपत्ति नहीं हो सकती है, अर्थात् घटसाक्षा-त्कारसे ब्रह्मचैतन्यनिष्ठ अज्ञानकी निवृत्ति नहीं हो सकती है, क्योंकि घट आदिका साक्षात्कार होनेपर भी मूलाज्ञानकी निवृत्ति नहीं होती है, यह अनुभव है, इससे मूलाज्ञान और मूलाज्ञानके कार्यसे अतिरिक्त जो मूलाज्ञानका विषयीभूत चैतन्यमात्र है, तद्विषयक ज्ञान ही मूलाज्ञानका निवर्तक है, ऐसी कल्पना की जायगी, इसलिए घटादिज्ञानके उक्त अज्ञानतत्कार्यातिरिक्त-चैतन्यमात्र विषय न होनेसे उससे मूलाज्ञानकी निवृत्ति प्रसक्त नहीं होगी।
अज्ञानके निवर्तकका निरूपण ] भाषानुवादसहितं ४९१
मूलाज्ञानस्याऽविषयो जड एवाऽथवाऽन्यथा ।
चक्षुषा सौरभं भायाद् वृत्तिव्यक्ताचिदन्वयात् ॥ २९ ॥
अथवा मूलाज्ञानका ही जड़ विषय नहीं होता है, अवस्थाऽज्ञानका तो तत्तत् जड़ ही विषय होता है, यदि ऐसा न माना जाय, तो चक्षुसे चन्दनखण्डवृत्ति सौगन्ध्यका भी प्रत्यक्ष होने लगेगा, क्योंकि चन्दनाकार वृत्तिसे अभिव्यक्त चैतन्यका उसमें भी अन्वय है ॥ २९ ॥
अथवा मूलाज्ञानस्यैव जडं न विषयः । अवस्थाऽज्ञानानां त्ववच्छिन्नचैतन्याश्रितानां तत्तज्जडमेव विषयः । अन्यथा चाक्षुषवृत्त्या चन्दनखण्डचैतन्याभिव्यक्तौ तत्संसर्गिणो गन्धस्याप्यापरोक्ष्यापत्तेः । तदनभिव्यक्तौ चन्दनतद्रूपयोरप्यप्रकाशापत्तेः । न च चाक्षुषवृत्त्या चन्दनतद्रूपावच्छिन्नचैतन्योरभिव्यक्त्या तयोः प्रकाशः, गन्धाकारवृत्त्यभावेन गन्धावच्छिन्नचैतन्यस्यानभिव्यक्त्या तस्याप्रकाशश्चेति वाच्यम्, चैतन्यस्य
अथवा ‡ मूलाज्ञानका ही जड़ विषय नहीं होता है । अवच्छिन्नचैतन्यमें आश्रित अवस्थारूप अज्ञानोंके तो तत्-तत् जड़ पदार्थ ही विषय होते हैं । यदि जड़ अनावृत माना जाय, तो चक्षुरिन्द्रियजन्य वृत्तिसे चन्दनखण्डावच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यक्ति होनेपर चन्दनखण्डके साथ सम्बन्ध रखनेवाले गन्धका भी अपरोक्ष अनुभव हो जायगा । यदि चन्दनखण्डावच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यक्ति न मानी जाय, तो चन्दन और चन्दनके रूपका भी प्रकाश नहीं होगा । यदि शङ्का की जाय कि चाक्षुषवृत्तिसे चन्दन और उसके रूपसे अवच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यक्ति होनेसे उनका प्रकाश होता है, और गन्धाकार वृत्तिके न होनेसे गन्धावच्छिन्न
‡ जड़मात्रविषयक वृत्तिसे अवच्छिन्न चैतन्यके आवारक अज्ञानका विनाश कैसे होता है, क्योंकि वे भिन्नविषयक हैं, इस प्रकारकी शङ्काके होनेपर अवस्थारूप अज्ञान अवच्छिन्न चैतन्यके आवरण द्वारा जड़को भी आवृत्त करता है, अतः जड़मात्रविषयक वृत्ति भी अवस्थारूप अज्ञानको निवृत्ति कर सकती है, ऐसा समाधान किया गया है। अब उक्त शङ्काका प्रकारान्तरसे भी 'अथवा' इत्यादि ग्रन्थसे समाधान करते हैं, इस पक्षमें जितने जड़ पदार्थ हैं, वे सबके सब मूलाज्ञानके विषय नहीं हैं, तथापि अवस्थारूप अज्ञानके विषय हैं, क्योंकि 'मैं घटको नहीं जानता हूँ' इस प्रकार भी प्रतीति होती है, यदि जड़ अवस्थारूप अज्ञानका विषय न माना जाय, तो चन्दनके टुकड़ेके आकारमें परिणत चाक्षुषवृत्तिसे अभिव्यक्त चैतन्यसे चन्दनमें रहनेवाले गन्धका भी प्रकाश होने लगेगा, अतः तत्-तत् जड़ पदार्थोंको अवश्य अवस्थारूप अज्ञानोंसे आवृत्त मानना चाहिए, इसीसे 'जड़ अज्ञानका विषय नहीं होता' इस सिद्धान्तके साथ विरोध भी नहीं है, क्योंकि यह सिद्धान्त मूलाज्ञानमात्रविषयक है, यह भाव है।
| ४९२ | सिद्धान्तलेशसंग्रहे | [ तृतीय परिच्छेद |
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द्विगुणीकृत्य वृत्त्ययोगेन चैकद्रव्यगुणानां स्वाश्रये सर्वत्र व्याप्य वर्तमानानां पृथक् पृथक् गगनावच्छेदकत्वस्येव चैतन्यावच्छेदकत्वस्याप्यसम्भवात्, तेषां स्वाश्रयद्रव्यावच्छिन्नचैतन्येनैव शुक्तीदंमंशावच्छिन्नचैतन्येन शुक्तिरजतवत् प्रकाश्यतया तस्याभिव्यक्तौ गन्धस्यापि प्रकाशस्य, अनभिव्यक्तौ रजतादेरप्यप्रकाशस्य चापत्तेः । न च गन्धाकारवृत्त्युपरक्ते एव चैतन्ये गन्धः प्रकाशते इति नियमः, प्रकाशसंसर्गस्यैव प्रकाशमानशब्दार्थत्वेनाऽसत्यामपि तदाकारवृत्तावनावृतप्रकाशसंसर्गे
चैतन्यकी अभिव्यक्ति न होनेके कारण गन्धका प्रकाश नहीं होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि चैतन्यकी द्विगुणित * वृत्तिके न होनेसे तथा अपने आश्रयमें व्याप्यवृत्तित्वरूपसे वर्तमान एक द्रव्यमें अवस्थित गुणों का गगनावच्छेदकत्वके समान पृथक्-पृथक् चैतन्यावच्छेदत्वका भी सम्भव न होनेसे जैसे शुक्तिके इदमंशावच्छिन्न चैतन्यसे शुक्तिरजतका † प्रकाश होता है, वैसे ही उन गुणोंका भी अपने आश्रय द्रव्यावच्छिन्न चैतन्यसे ही प्रकाश होता है, इससे द्रव्यावच्छिन्न चैतन्यके अभिव्यक्त होनेपर गन्धका प्रकाश भी प्रसक्त होगा, और यदि उक्त चैतन्यकी अभिव्यक्ति न मानी जाय, तो रजत आदिका भी प्रकाश नहीं होगा । यदि शङ्का हो कि गन्धाकार वृत्तिसे उपरक्त चैतन्यके प्रकाशित होनेसे ही गन्धका प्रकाश होता है, यह नियम है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रकाशसंसर्गके ही प्रकाशमानशब्दका अर्थ
* तात्पर्य यह है कि चैतन्य निरवयव है, इसलिए निरवयव चैतन्यमें द्रव्यावच्छेदेन एक और गुणावच्छेदेन दूसरी वृत्ति नहीं हो सकती है, और एक ही द्रव्यमें गन्ध आदि गुणोंका प्रदेशके भेदसे यदि अवस्थान माना जाय, तो एक द्रव्यमें गन्धादिके भेदसे चैतन्यका भी भेद प्रसक्त होगा, परन्तु गन्ध आदि गुण अव्याप्यवृत्ति नहीं हैं, किन्तु व्याप्यवृत्ति हैं, अतः उक्त शङ्का भी नहीं हो सकती है । और घट आदि द्रव्य गगनके अवच्छेदक होते हैं, इससे उनके भेदसे गगनका भेद होता है, परन्तु गन्ध गगनका अवच्छेदक नहीं होता, वैसे ही गन्ध चैतन्यका भी अवच्छेदक नहीं होता । जिससे कि गन्धादिके भेदसे चैतन्यका भी भेद प्रसक्त हो ।
† अर्थात् शुक्तिके इदमंशावच्छिन्न चैतन्यमें रजतका अध्यास होनेसे रजतका शुक्तिके इदमंशावच्छिन्न चैतन्यसे अवभास होता है, उससे अतिरिक्त चैतन्यसे अवभास नहीं होता है, वैसे ही द्रव्यावच्छिन्न चैतन्यमें कल्पितरूप आदिका भी द्रव्यावच्छिन्न चैतन्यसे भी अवभास होता है, यह भाव है।
अज्ञानके निवर्त्तकका निरूपण] भाषानुवादसहित ४९३
अप्रकाशमानत्वकल्पनस्य विरुद्धत्वात् । अभिव्यक्तस्य गन्धोपादानचैतन्यस्य गन्धासंसर्गोक्त्यसम्भवात् । तस्माद् यथा चैत्रस्य घटवृत्तौ तं प्रत्यावरकस्यैवाज्ञानस्य निवृत्तिरिति तस्यैव विषयप्रकाशो, नान्यस्य, तथा तत्तद्विपयाकारवृत्त्या तत्तदावरकाज्ञानस्यैव निवृत्तेर्न विषयान्तरस्यापरोक्ष्यम्, 'अनावृतार्थस्यैव संविद्भेदाद् आपरोक्ष्यम्' इत्यभ्युपगमादिति । प्रमातृभेदेनेव विषयभेदेनाप्येकत्र चैतन्ये अवस्थाऽज्ञानभेदस्य वक्तव्यतया अवस्थाऽज्ञानानां तत्तज्जडविषयकत्वमिति घटादिवृत्तीनां
होनेसे गन्धाकार वृत्तिके न होनेपर भी अनावृत प्रकाशके संसर्गसे अप्रकाशमानत्वकी कल्पना हो ही नहीं सकती है, कारण कि अभिव्यक्त गन्धोपादान चैतन्य गन्धका संसर्गी नहीं है, इत्याकारक उक्तिका असम्भव ही है । इससे जैसे चैत्रकी घटाकार वृत्ति होनेपर चैत्रके प्रति आवारण करनेवाले अज्ञानकी ही निवृत्ति होती है, इससे चैत्रको ही घटका प्रकाश होता है, अन्यको नहीं होता, वैसे ही तत्-तत् विषयाकार वृत्तिसे तत्-तत् विषयोंके आवारक अज्ञानकी ही निवृत्ति होती है, अतः अन्य विषयोंके अपरोक्षत्वकी प्रसक्ति नहीं है, क्योंकि अनावृत अर्थ ही चैतन्यसे अभिन्न होनेसे अपरोक्ष होता है, ऐसा सिद्धान्त है *। प्रमातृचैतन्यके भेदसे जैसे एक विषयमें अनेक अज्ञान माने जाते हैं † वैसे ही विषयके भेदसे भी एक चैतन्यमें अवस्थारूप अज्ञानोंका भेद कहना होगा, इससे अवस्थारूप अज्ञान
* तात्पर्य यह है कि जड़में आवरणकी सिद्धि होनेसे जैसे चैत्रके घटविषयक अज्ञानकी निवृत्ति चैत्रके घटविषयक ज्ञानसे ही होती है, अन्यके ज्ञानसे नहीं होती, वैसे ही गुण और गुणीका तादात्म्य होनेपर भी भेदके भी अवस्थित होनेसे चन्दनविषयक चाक्षुषवृत्तिसे गन्धविषयक अपरोक्ष ज्ञानकी प्रसक्ति नहीं होती, क्योंकि जो अज्ञानकृत आवरणसे रहित अर्थ होता है, वही चैतन्यसे अभिन्न होता है, यह नियम है ।
† तात्पर्य यह है कि जैसे एक ही विषयमें चैत्र, मैत्र, देवदत्त आदि अनेक प्रमाताओंके भेदसे अज्ञान अनेक हैं, वैसे ही एक ही चन्दनादिविषयावच्छिन्न चैतन्यमें गन्ध आदि विषयोंके भी भेदसे अज्ञान अनेक हैं, अतः चन्दनकी अपरोक्षतादशामें गन्धका अवभास न होनेके कारण उस कालमें गन्ध आदिमें आवरण है, यह अवश्य मानना होगा, इसलिए चन्दनके चाक्षुष प्रत्यक्षकालमें गन्धका प्रत्यक्ष नहीं होता है ।
| ४९४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह : | [तृतीय परिच्छेद] |
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नावस्थाऽज्ञाननिवर्तकत्वे काचिदनुपपत्तिः । न वा मूलाज्ञाननिवर्तकत्वापत्तिः ।
साक्षिणः स्वप्रकाशत्वान्नाहंवृत्त्याऽपि तत्क्षयः ।
तथा कालादिवैशिष्ट्यगोचरप्रत्यभिज्ञया ॥ ३० ॥
साक्षीके स्वप्रकाश होनेसे अहंवृत्तिसे भी मूलाज्ञानका नाश नहीं होता है, तथा काल आदिसे सम्बन्धका अवगाहन करनेवाली प्रत्यभिज्ञासे भी मूलाज्ञानका विनाश नहीं होता है ॥ ३० ॥
न चैवमपि जीवविषयाया अहमाकारवृत्तेर्मूलाज्ञाननिवर्तकत्वापत्तिः ।
तत्-तत् जड़विषयक है, अतः घटादिवृत्तियोंके अवस्थारूप अज्ञाननिवर्तकत्वमें ‡ कोई अनुपपत्ति नहीं है, और घटादि वृत्तियोंके अथवा मूलाज्ञान निवर्तकत्वकी भी प्रसक्ति नहीं है, क्योंकि वे चैतन्यविषयक नहीं हैं ।
यदि शङ्का हो कि ऐसा * माननेपर भी अहमाकार वृत्तिमें मूलाज्ञान निवर्तकत्वकी प्रसक्ति होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अहमाकार
‡ तात्पर्य यह है कि घटादिवृत्तियोंके चैतन्यविषयक न होनेसे ज्ञान और अज्ञानमें परस्परविरोधप्रयोजक समानविषयकत्व नहीं है, क्योंकि घटादिवृत्तियाँ केवल जड़पदार्थ-विषयक है और अज्ञान केवल चैतन्यविषयक है, इसी प्रकार जड़में आवरण माननेपर भी अपसिद्धान्तकी आपत्ति नहीं हो सकती है, क्योंकि जड़में आवरणका अनभ्युपगम मूलाज्ञान-विषयक है । वैसे तत्-तत् जड़ पदार्थोंके आवारक अज्ञान यदि अनेक माने जायें, तो भी उनके एकत्वसिद्धान्तका विरोध नहीं है, क्योंकि वस्तुतः वह एक ही है, इसी अभिप्रायसे कोई आपत्ति नहीं है, ऐसा कहते हैं, घटादिवृत्तियाँ मूलाज्ञानविषयभूतब्रह्मविषयक नहीं हैं, अतः घटादिवृत्तियोंमें अज्ञाननिवर्तकत्व नहीं हैं, अतः पूर्वपक्षियोंका मत सर्वथा अनुपपन्न है । इसलिए ब्रह्मचैतन्यमें सर्वप्रत्ययवेद्यत्वप्रतिपादक पूर्वमें उदाहृत वार्त्तिकवाक्यकी भी उपपत्ति हो सकती है ।
* घटादिवृत्तियोंके चैतन्यविषयक न होनेपर भी अहंशब्दका अर्थभूत जो जीव है, वह चित् और अचित्से सम्पृक्त है, इससे अहंवृत्तिके चैतन्यविषयक होनेसे उससे अज्ञानकी निवृत्ति हो सकती है, यह पूर्वपक्षीका तात्पर्य है, इसपर सिद्धान्तीका कहना है कि स्वप्रकाश होनेके कारण प्रकाशमान चैतन्यमें चित्तादात्म्यरूपसे अध्यस्यमान अचिदंशमात्रका ही अवगाहन करनेसे अहमाकार वृत्ति भी चैतन्यावगाहिनी नहीं है । अन्यथा केवल उपनिषद्गम्यत्वका विरोध प्रसक्त होगा । इसी प्रकार 'जिस मैंने स्वप्नमें श्रीकृष्णका अनुभव किया, वही मैं जागरणमें उसका स्मरण करता हूँ' इत्यादि प्रत्यभिज्ञा भी जैसे 'अहम्' इत्याकारक वृत्ति स्वप्रकाश चैतन्यमें अन्तःकरणतादात्म्यका अवगाहन करती है, वैसे ही . तत्तादिविशिष्टका भी अवगाहन करती है, स्वप्रकाश चैतन्यका अवगाहन नहीं करती है, यह भाव है ।
अज्ञानके निवर्त्तकका निरूपण] भाषानुवादसहित ४९५
तस्याः स्वयंप्रकाशमानचित्संवलिताचिदंशमात्रविषयत्वात् । ‘सोऽहम्’ इति प्रत्यभिज्ञाया अपि स्वयम्प्रकाशचैतन्ये अन्तःकरणवैशिष्ट्येन सह पूर्वापरकालवैशिष्ट्यमात्रविषयत्वेन चैतन्यविषयत्वाभावादिति ।
केचिच्छ्रोतव्यनियमाद्दृष्टदोषक्षयान्वितम् ।
वाक्यजं ज्ञानमेवाहुर्मूलाज्ञाननिवर्हणम् ॥ ३१ ॥
कुछ लोग कहते हैं कि श्रोतव्यवाक्यनियमजन्य अदृष्टसे जन्य दोषके विनाशसे युक्त तत्त्वमस्यादि वाक्यजन्य ज्ञान ही मूलाज्ञानका विनाशक है ॥ ३१ ॥
केचित्तु घटादिवृत्तीनां तत्तदवच्छिन्नचैतन्यविषयत्वमभ्युपगम्य—
‘सर्वमानप्रसक्तौ च सर्वमानफलाश्रयात् ।
श्रोतव्येति वचः प्राह वेदान्तावरुरुत्सया ॥’
इति वार्त्तिकोक्तेः श्रोतव्यवाक्यार्थवेदान्तनियमविध्यनुसारेण वेदान्तजन्य-
वृत्ति स्वयंप्रकाशमान चित्संवलित अचिदंशमात्रका ही अवगाहन करती है, और ‘सोऽहम्’ (वही मैं हूँ) इस प्रकारकी प्रत्यभिज्ञा भी स्वयंप्रकाशमान चैतन्यमें अन्तःकरणके सम्बन्धके साथ पूर्वापरकालके सम्बन्धमात्रको विषय करती है, अतः वह भी चैतन्यविषयक नहीं है ।
कुछ † लोग घटादि वृत्तियोंमें तत्-तत् विषयोंसे अवच्छिन्न चैतन्य-विषयकत्वका अङ्गीकार करके ‡ ‘सर्वमानप्रसक्तौ च०’ (सभी प्रमाणोंके चैतन्यविषयक होनेसे ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति सम्पूर्ण प्रमाणोंकी कारणता प्रसक्त होनेसे वेदान्तोंकी नियमेच्छासे ‘श्रोतव्यः’ यह वाक्य ‘वेदान्तोंका ही विचार करना चाहिए’ ऐसा प्रतिपादन करता है) इस प्रकारकी वार्त्तिकोक्तिसे
† घटादिविषयक वृत्तियोंके चैतन्यविषयक होनेसे वेदान्तजन्य ज्ञानके समान उनसे भी मूलाज्ञानकी निवृत्ति प्रसक्त होगी, ऐसा पूर्वपक्ष करके उसके समाधानमें हेत्वसिद्धिप्रयुक्त अतिप्रसङ्ग पूर्वमें दिखलाया गया है, अब उन वृत्तियोंको यदि चैतन्यविषयक माना जाय, तो भी कोई हानि नहीं है, इस प्रकार ‘केचित्तु’ मत कहते हैं ।
‡ इसमें यदि शङ्का की जाय कि चैतन्यको चक्षु आदिसे जन्य वृत्तिका विषय यदि माना जाय, तो चैतन्यमें चक्षु आदि इन्द्रियोंसे जन्य वृत्ति विषयताका श्रुतियोंसे जो निषेध किया गया है, उनके साथ विरोध होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उन श्रुतियोंसे चक्षुरादिजन्य-वृत्तियोंमें निरुपाधिक चैतन्यविषयकत्वका निषेध किया गया है, इसलिए अवच्छिन्नचैतन्यको विषय माननेमें कोई विरोध नहीं है ।