संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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करेंगे। वे सब ओर घूम-घूमकर करोड़ों और अरबों पापियोंका वध करके उस धर्मका पालन करेंगे, जो वेदमूलक है। साधु पुरुषोंके लिये धर्मरूपी नौकाका निर्माण करके अनेक प्रकारकी लीलाएँ करनेके पश्चात् वे भगवान् 'कल्कि' परम धाममें पधारेंगे। राजन्! उसके बाद फिर सत्ययुगका आरम्भ होगा। प्रथम सत्ययुग, अन्तिम सत्ययुग तथा अट्ठाईसवाँ कलियुग ये अन्य युगोंसे कुछ विशिष्टता रखते हैं। शेष युगोंकी प्रवृत्ति औरोंके समान ही होती है। कलियुग बीतनेपर सत्ययुगके प्रारम्भमें राजा मरु (अथवा पुरु)-से सूर्यवंश, देवापिसे चन्द्रवंश तथा श्रुतदेवसे ब्राह्मणवंशकी परम्परा चालू होगी। राजन्! इस प्रकार चारों युगोंकी व्यवस्था बदलती रहती है। चारों युगोंमें वही लोग धन्य हैं, जो भगवान् शंकर और विष्णुका भजन करते हैं।
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त्रिदेवोंकी श्रेष्ठता और पापोंके भेद
करन्धमने पूछा—ब्रह्मन्! कोई भगवान् शिवकी, कोई विष्णुकी तथा कोई ब्रह्माजीकी शरण लेनेसे सर्वोत्कृष्ट मोक्षकी प्राप्ति बतलाते हैं; किंतु आप किससे मुक्ति मानते हैं?
महाकालने कहा—नरश्रेष्ठ! इन तीनों देवताओंकी महिमा अपार है। इस विषयमें बड़े-बड़े योगीश्वरोंका भी मन मोहित हो जाता है, फिर मेरी तो बात ही क्या है? कहते हैं, प्राचीन कालमें कभी नैमिषारण्यनिवासी मुनियोंको भी यह सन्देह हुआ था कि इन तीनों देवताओंमें कौन सबसे श्रेष्ठ है। तब वे ब्रह्मलोकमें गये। उसी समय भगवान् ब्रह्माने इस श्लोकका पाठ किया—
अनन्ताय नमस्तस्मै यस्यान्तो नोपलभ्यते।
महेशाय च द्वावेतौ मयि स्तां सुमुखौ सदा॥
'उन भगवान् अनन्तको नमस्कार है, जिनका कहीं अन्त नहीं मिलता तथा जो सबके महान् ईश्वर हैं, उन भगवान् शंकरको भी नमस्कार है। ये दोनों देवता सदा मुझपर प्रसन्न रहें।'
इस श्लोकके अनुसार भगवान् विष्णु और शंकरकी श्रेष्ठताका निश्चय करके वे सब मुनि क्षीरसागरको गये। वहाँ योगेश्वर भगवान् विष्णुने इस श्लोकका पाठ किया—
ब्रह्माणं सर्वभूतेषु परमं ब्रह्मरूपिणम्।
सदाशिवं च वन्दे तौ भवेतां मंगलाय मे॥
'मैं सम्पूर्ण भूतोंमें व्यापक परब्रह्मस्वरूप भगवान् ब्रह्मा और सदाशिवको प्रणाम करता हूँ। वे दोनों मेरे लिये मंगलकारी हों।'
यह श्लोक सुनकर उन ब्रह्मर्षियोंको बड़ा विस्मय हुआ। वे वहाँसे हटकर पुनः कैलासपर्वतपर गये। वहाँ उन्होंने देखा कि भगवान् शंकर गिरिराजनन्दिनी उमासे इस प्रकार कह रहे हैं—
एकादश्यां प्रनृत्यामि जागरे विष्णुसद्मनि।
सदा तपस्याञ्चरामि प्रीत्यर्थं हरिवेधसोः॥
'देवि! मैं भगवान् विष्णु और ब्रह्माजीकी प्रसन्नताके लिये भगवान् विष्णुके मन्दिरमें एकादशीको जागरणपूर्वक नृत्य करता हूँ तथा उन्हीं दोनोंकी प्रसन्नताके लिये सदा तपस्या किया करता हूँ।'
यह सुनकर वे मुनिलोग वहाँसे भी खिसक आये और आपसमें कहने लगे—जब ये तीनों देवता ही एक-दूसरेका पार नहीं पाते, तब उनके द्वारा उत्पन्न किये हुए महर्षियोंकी सन्तान-परम्परामें जन्म लेनेवाले हमलोगोंकी क्या गणना है? जो इन तीनोंमेंसे किसी एकको उत्तम, मध्यम या अधम बतलाते हैं, वे झूठ बोलनेवाले और पापात्मा हैं। उन्हें निश्चय ही नरकमें जाना पड़ता है। राजेन्द्र! नैमिषारण्यवासी तपस्वी मुनियोंने ऐसा ही निश्चय किया। यह सत्य ही है और मेरा भी यही स्पष्ट मत है। सहस्रों जप करनेवाले, सहस्रों वैष्णव तथा सहस्रों शैव ब्रह्मा, विष्णु और शिवका अनुगमन (आराधन) करके
त्रिदेवोंकी श्रेष्ठता
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अपनेको संसार-बन्धनसे मुक्त कर चुके हैं। इसलिये जिसका हार्दिक अनुराग जिस देवताके प्रति स्पष्टरूपसे प्रकट हो, वह उसीका भजन करे। इससे वह पापरहित हो सकता है, यही मेरा सर्वोत्तम मत है।१
करन्धमने पूछा—विप्रवर! वे कौनसे पाप हैं, जिनके द्वारा मोहित चित्तवाले मनुष्यका मन न तो देवतामें लगता है और न धर्ममें ही?
महाकालने कहा—राजन्! अपनी चित्तवृत्तियोंके भेदसे अधर्मके भेद जानने चाहिये। अधर्म तीन प्रकारके हैं—स्थूल, सूक्ष्म और अत्यन्त सूक्ष्म। ये ही अपने करोड़ों भेदोंके द्वारा अनेक प्रकारके हो जाते हैं। इनमेंसे जो स्थूल पापसमुदाय नरककी प्राप्ति करानेवाले हैं, उनका संक्षेपसे वर्णन किया जाता है। उन पापोंका अनुष्ठान मन, वाणी और कर्मोंद्वारा होता है। उनमेंसे मानसिक पापके चार भेद हैं,—पर-स्त्रीचिन्तन, दूसरोंके धन हड़प लेनेका संकल्प, अपने मनसे किसीका भी अनिष्टचिन्तन तथा न करनेयोग्य कार्योंके लिये मनमें आग्रह रखना। इसी प्रकार वाचिक पापकर्मके भी चार भेद हैं—असंगत वचन बोलना, झूठ बोलना, अप्रिय भाषण करना तथा दूसरोंकी निन्दा और चुगली करना। शारीरिक पापकर्म भी चार प्रकारके हैं—अभक्ष्य-भक्षण, हिंसा, मिथ्या भोगोंका सेवन तथा पराये धनका अपहरण।२ इस प्रकार मन, वाणी और शरीरसे होनेवाले ये बारह प्रकारके पाप-कर्म बताये गये। इनके भेदोंका पुनः वर्णन करूँगा, जिनका फल अनन्त है। जो संसार-समुद्रसे तारनेवाले महादेवजीसे द्वेष रखते हैं, वे महान् पातकोंसे युक्त होनेके कारण नरकाग्नियोंमें जलते हैं। निरन्तर फल देनेवाले छः महापातक बताये जाते हैं—(१) जो मन्दिर आदिमें भगवान् शंकरको देखकर न तो नमस्कार करते हैं और (२) न उनकी स्तुति ही करते हैं, (३) अपितु भगवान्के सामने निःशंक हो मनमानी चेष्टा करते हुए खड़े होते और क्रीडा-विलास आदि करते हैं, (४) भगवान् शिव तथा गुरुजनके समीप पूजा, नमस्कार आदि आवश्यक शिष्टाचारोंका पालन नहीं करते, (५) शिवशास्त्रोंमें बताये हुए सदाचारको नहीं मानते, (६) और शिवभक्तोंसे द्वेष रखते हैं। ये छहों प्रकारके मनुष्य महापातकी समझे जाते हैं। जो पापात्मा अपने गुरुका, कष्टमें पड़े हुए व्यक्तिका, असमर्थ पुरुषका, विदेश गये हुए व्यक्तिका तथा शत्रुओंद्वारा अपमानित मनुष्यका परित्याग करता है अथवा उनके स्त्री-पुत्र एवं मित्रोंकी अवहेलना करता है, उसका यह कृत्य गुरुनिन्दाके समान महापातक समझना चाहिये। ब्रह्महत्यारा, मदिरा पीनेवाला, (सुवर्णकी) चोरी करनेवाला, गुरु-पत्नीगामी—ये चार महापातकी हैं। जो इनके पास संसर्ग रखता है, वह पाँचवाँ महापातकी है।३ जो लोग क्रोधसे, द्वेषसे, भयसे अथवा लोभसे ब्राह्मणपर उसके मर्मको अत्यन्त पीड़ा पहुँचानेवाले महान् दोषका आरोप करते हैं, वे ब्रह्महत्यारे कहे गये हैं। जो याचना करनेवाले अकिंचन ब्राह्मणको बुलाकर पीछे 'नहीं है' ऐसा कहते हुए देना अस्वीकार कर देता है, वह भी ब्रह्महत्या करनेवाला माना गया है। जो सभामें उदासीनभावसे बैठे हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणको अपने विद्या-अभिमानसे निस्तेज करनेकी चेष्टा करता है, वह ब्राह्मणघाती बताया गया है। जो गुरुजनोंके साथ बलपूर्वक विरोध करके अपने झूठे गुणोंका बखान
१- तस्माद्यस्य मनोरागो यस्मिन् देवे भवेत्स्फुटम्। स तं भजेद्विपापः स्यान्ममेदं मतमुत्तमम्॥ (स्क० पु०, मा० कुमा० ३६। १४)
२- परस्त्रीद्रव्यसंकल्पश्चेतसानिष्टचिन्तनम् । अकार्याभिनिवेशश्च चतुर्थं कर्म मानसम्॥
असम्बद्धप्रलापित्वमसत्यं चाप्रियं च यत्। परोपवादं पैशुन्यं चतुर्था कर्म वाचिकम्॥
अभक्ष्यभक्षणं हिंसा मिथ्याकामस्य सेवनम्। परस्वानामुपादानं चतुर्था कर्म कायिकम्॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३६। १८–२०)
३- ब्रह्मघ्नश्च सुरापश्च स्तेयी च गुरुतल्पगः। महापातकिनस्त्वेते तत्संसर्गी च पञ्चमः॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३६। २८)
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * | १५९ ---|---
करते हुए अपने-आपको उत्कृष्ट सिद्ध करना चाहता है, उसे भी ब्रह्महत्यारा कहा गया है। भूख-प्याससे जिनके शरीरको संताप हो रहा है, अतएव जो भोजन करनेके इच्छुक हैं, ऐसे ब्राह्मणोंके भोजनमें जो विघ्न डालता है, उसे ब्राह्मणघाती कहते हैं। जो सबकी चुगली करता है, सब लोगोंके छिद्र ढूँढ़नेमें ही लगा रहता है, सबके मनमें उद्वेग पैदा करता है तथा जिसमें क्रूरता भरी हुई है, ऐसा मनुष्य ब्रह्महत्यारा माना गया है। जो प्याससे पीड़ित हो जल पीनेके लिये जलाशयपर जाती हुई गौओंके मार्गमें विघ्न उपस्थित करता है, उसे गोघाती कहते हैं। ब्राह्मणोंने न्यायपूर्वक जिस धनका उपार्जन किया है, उसे छल-बलसे हर लेना ब्रह्महत्याके समान माना गया है।
माता-पिताका त्याग करना, झूठी गवाही देना, अपने मित्रका वध करना, अभक्ष्य-भक्षण करना, किसी स्वार्थवश वनजन्तुओंका वध करना, क्रोधमें आकर गाँव, वन और गोशालाओंमें आग लगा देना इत्यादि बड़े भयानक पाप मदिरापानके समान माने गये हैं। दरिद्र मनुष्योंका सर्वस्व हर लेना; मनुष्य, स्त्री, हाथी और घोड़ोंको चुरा लेना; गौ, भूमि, रत्न, सुवर्ण, ओषधियोंके रस, चन्दन, अगुरु, कपूर, कस्तूरी तथा रेशमी वस्त्रोंका अपहरण करना तथा हाथमें दी हुई धरोहरको हड़प लेना आदि पाप सुवर्णकी चोरीके समान माने गये हैं। पुत्र और मित्रकी स्त्रियों तथा बहिनोंके साथ सम्भोग करना, कन्याके साथ व्यभिचारका दुःसाहस करना, चाण्डालकी स्त्रियोंको अपने उपभोगमें लाना तथा अपने समान वर्णवाली स्त्रीके साथ भी व्यभिचार करना गुरुपत्नीगमनके समान माना गया है।
अहंकार, अधिक क्रोध, पाखण्ड, कृतघ्नता, अत्यन्त विषयासक्ति, कृपणता, शठता, ईर्ष्या तथा बिना किसी अपराधके ही पुत्र, मित्र, पत्नी, स्वामी और सेवकोंका परित्याग करना; साधु, बन्धु, तपस्वी, गाय, क्षत्रिय, वैश्य, स्त्री और शूद्रोंको मारना-पीटना, भगवान् शिवके आवास-स्थानपर लगे हुए वृक्षों और पुष्पवाटिका आदिको नष्ट करना, जो यज्ञके अधिकारी नहीं हैं, उनका यज्ञ कराना, जिनसे याचना करनी उचित नहीं, उनसे याचना करना; यज्ञ, बगीचा, पोखरा, पत्नी और सन्तानको बेचना; तीर्थयात्रा, उपवास, व्रत तथा मन्दिरनिर्माण आदिके पुण्योंका विक्रय करना; स्त्रीके धनसे जीविका चलाना, स्त्रियोंके अत्यन्त वशीभूत रहना, स्त्रियोंकी रक्षा न करना, ऋण न चुकाना, झूठ बोलकर जीविका चलाना, साध्वी कन्याकी बातोंमें दोष निकालना, विष तथा मारणयन्त्रोंका प्रयोग करना, किसीका मूलोच्छेद कर डालना, उच्चाटन एवं अभिचार कर्म करना, राग और द्वेषके कार्य करना, समयपर संस्कार न कराना, स्वीकार किये हुए व्रतका परित्याग करना, सब प्रकारके आहारोंका सेवन करना, असत्-शास्त्रोंके अनुसार चलना, सूखे तर्कका सहारा लेना; देवता, अग्नि, गुरु, साधु, गौ, ब्राह्मण, राजाओं तथा चक्रवर्ती नरेशोंकी उनके सामने या परोक्षमें निन्दा करना—ये सब उपपातक हैं। जिन्होंने श्राद्ध और देवयज्ञका परित्याग कर दिया है, अपने वर्णाश्रमोचित कर्मोंको सर्वथा छोड़ दिया है; जो दुराचारी, नास्तिक, पापी और सदा झूठ बोलनेवाले हैं; जो पर्वके समय अथवा दिनमें, जलमें, विपरीत योनिमें, पशु-योनिमें, रजस्वलाओंमें अथवा अयोनिमें मैथुन करता है; जो सबसे अप्रिय बोलते हैं, क्रूर हैं, प्रतिज्ञाको तोड़नेवाले हैं, तालाब और कुँओंको नष्ट करनेवाले हैं; जो रसका विक्रय करते हैं तथा एक ही पंक्तिमें बैठे हुए लोगोंको भोजन कराते समय पंक्ति-भेद करते हैं, वे लोग इन सभी पापोंके कारण उपपातकी माने गये हैं।
जो इनकी अपेक्षा कुछ न्यून श्रेणीके पापोंसे युक्त हैं, वे पापी कहलाते हैं। अब उनका वर्णन
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सुनो। जो गौ, ब्राह्मण, कन्या, स्वामी, मित्र तथा तपस्वीजनोंके कार्योंमें अन्तर डालते हैं, वे पापी माने गये हैं। जो दूसरोंकी सम्पत्तिसे जलते हैं, नीच जातिकी स्त्रीका सेवन करते हैं, गोशाला, अग्नि, जल, सड़क तथा वृक्षोंकी छायामें, वृक्षोंपर, बगीचों और मन्दिरोंमें जो लोग मल-मूत्र आदिका त्याग करते हैं, वे पापी हैं। मतवाले होकर किलकारियाँ भरते हैं; वंचकवेष, वंचनापूर्ण कार्य तथा वंचकोंके-से आचरण करते हैं; झूठ और कपटके ही व्यवहारमें लगे रहते हैं, कपटपूर्ण शासन करते हैं और कूटनीतिका आश्रय लेकर युद्ध करते हैं, वे सब पापी हैं। जो अपने सेवकोंके प्रति अत्यन्त निष्ठुर और पशुओंका दमन करनेवाला (उनके अण्डकोष छेदन करनेवाला) है; जो झूठी बातें बोलता और स्त्री, पुत्र, मित्र, बाल, वृद्ध, दुर्बल, रोगी, भृत्यवर्ग, अतिथिवर्ग तथा भाई-बन्धुओंको भूखे छोड़कर अकेला ही भोजन करता है; स्वयं तो मिठाई खाता और ब्राह्मणोंको दूसरी वस्तुएँ देता है, उसका पाक व्यर्थ जानना चाहिये, अर्थात् उसके किये हुए दान और यज्ञ आदिका कोई फल नहीं मिलता, वह ब्रह्मवादी विद्वानोंद्वारा निन्दित होता है। जो अजितेन्द्रिय मनुष्य स्वयं ही कोई नियम लेकर फिर उन्हें त्याग देते हैं, प्रतिदिन गौओंको मारते और उन्हें बार-बार त्रास देते हैं, जो दुर्बलोंका पोषण नहीं करते, पशुओंके ऊपर अधिक भार लादकर उन्हें पीड़ा देते हैं, उनकी पीठमें घाव हो जानेपर भी उन्हें सवारीमें जोतते हैं, उनको भोजन न देकर स्वयं खाते हैं और रोगी होनेपर भी उनकी दवा नहीं करते, वे सब पापी हैं। जो सामुद्रिक शास्त्रको जीविकाका साधन बनाता है, शूद्रकुलमें उत्पन्न स्त्रीको अपनी भार्या बनाकर रखता है और जो धर्मात्मा होनेका ढोंग रचता है, वे सब-के-सब पापी माने गये हैं। जो राजा शास्त्रीय आज्ञाका उल्लंघन करके प्रजासे मनमाना कर लेता है, सदा दण्ड देनेकी ही रुचि रखता है अथवा जो अपराधीको भी दण्ड देनेकी रुचि नहीं रखता तथा जिसके राज्यमें प्रजा घूस लेनेवाले अधिकारियों और चोरोंसे पीड़ित होती है, वह नरककी आगमें पकाया जाता है। जो चोरीसे दूर रहनेवालेको चोर समझता है और वास्तविक चोरको चोर नहीं मानता, वह आलस्यदोषसे दूषित तथा दुर्व्यसनोंमें आसक्त राजा नरकमें जाता है। १ पुराणवेत्ता विद्वान् इस प्रकारके और भी बहुत-से पाप बताते हैं। दूसरोंकी कोई भी वस्तु, वह सरसोंके बराबर भी छोटी क्यों न हो, अपहरण करनेपर मनुष्य पापी एवं नरकमें गिरनेका अधिकारी होता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। इस प्रकारके पाप बन जानेपर मनुष्य प्राणत्यागके पश्चात् नरकका कष्ट भोगनेके लिये पूर्वशरीरकी ही भाँति एक यातनादेह प्राप्त करता है। अतः नरकमें डालनेवाले इन तीनों ही प्रकारके पापकर्मों २को त्याग देना चाहिये और श्रद्धापूर्वक भगवान् सदाशिवकी शरण लेनी चाहिये। संसर्गवश, कौतूहलवश अथवा लोभसे भी भगवान् शंकरके प्रति किये हुए नमस्कार, स्तुति, पूजा तथा नाम-संकीर्तन कभी विफल नहीं होते।
१. यश्च शास्त्रमतिक्रम्य स्वेच्छया चाहरेत्करम्। सदा दण्डरुचिर्यश्च यो वा दण्डरुचिर्न हि॥
उत्कोचकैरधिकृतैस्तस्करैश्च प्रपीड्यते। यस्य राज्ञः प्रजा राष्ट्रे पच्यते नरकेषु सः॥
अचौरं चौरवत्पश्येच्चौरं वाचौररूपिणम्। आलस्योपहतो राजा व्यसनी नरकं व्रजेत्॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३६। ७२-७५)
२. स्थूल, सूक्ष्म और अत्यन्त सूक्ष्म अथवा महापातक, उपपातक तथा सामान्य पाप—ये ही त्रिविध पाप हैं।
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * । १६१
शिवपूजाकी विधि तथा सदाचारका निरूपण
करन्धम बोले—ब्रह्मन्! आप भगवान् शंकरकी पूजाका विधान संक्षेपसे बतानेकी कृपा करें, जिसका पालन करनेसे मनुष्य शिवके पूजनका पूरा फल प्राप्त कर सके।
महाकालने कहा—राजन्! सदा प्रातःकाल, मध्याह्नकाल और सायंकालमें भगवान् शंकरका भजन करे। उनके दर्शन और स्पर्शसे मनुष्य निश्चय ही कृतार्थ हो जाता है। पहले स्नान करे अथवा यदि रोग आदि संकटसे ग्रस्त हो, तो केवल भस्मस्नान करे अथवा कण्ठतक जलसे स्नान करे। यह भी सम्भव न हो, तो केवल मन्त्रस्नान ही कर ले। स्नानके पश्चात् ऊनी वस्त्र पहने अथवा श्वेत वस्त्र धारण करे या किसी रंगमें रँगा हुआ नवीन वस्त्र पहने। मैला अथवा सिला हुआ वस्त्र न धारण करे। धौत वस्त्रके अतिरिक्त उत्तरीय वस्त्र भी धारण करना चाहिये, अन्यथा उसके बिना पूजन निष्फल होता है। जो पुरुष ललाटमें, हृदयमें और दोनों कंधोंपर भस्मका त्रिपुण्ड्र धारण करके प्रसन्नतापूर्वक महादेवजीकी पूजा करता है, वह अल्पकालमें भगवान् शिवका दर्शन पाता है। उपासक अपने सब दोषोंको मनसे निकालकर भगवान् शिवके मन्दिरमें प्रवेश करे। प्रवेश करके पहले महादेवजीको प्रणाम करे। तदनन्तर मन्दिरके गर्भगृहमें प्रवेश करे, फिर हाथ-पैर धोकर मन-ही-मन भगवान्का चिन्तन करते हुए उनके श्रीविग्रहपर चढ़े हुए निर्माल्यको हटावे। जो भगवान् शिवके मन्दिरमें भक्तिपूर्वक मार्जन करने (झाडू देने)-का कार्य करता है, भगवान् शंकर भी उसके अन्तःकरणका मार्जन (शोधन) कर देते हैं। तत्पश्चात् स्वच्छ जलसे गडुवोंको भर ले। सभी गडुवे बराबर और सुन्दर होने चाहिये। उनमें कोई छेद न रहे, वे फूटे न हों, सबकी बनावट अच्छी हो, सभी वस्त्रसे छाने हुए जलसे परिपूर्ण हों, उन्हें चन्दन और धूपसे सुवासित किया गया हो; ‘ॐ नमः शिवाय’ इस षडक्षर मन्त्रका जप करते हुए उन गडुवोंको धोया गया, भरा गया और लाया गया हो, ऐसे एक सौ आठ गडुवोंका जुगाड़ कर ले। इतना न हो तो अट्ठाईस अथवा अठारह गडुवोंका प्रबन्ध करे। कम-से-कम चार गडुवे अवश्य रखे, इतनेसे कम न करे। दूध, दही, घी, शहद तथा ईखका रस—इन सब सामग्रियोंको एकत्र करके भगवान् शिवके वामभागमें रख दे। तदनन्तर बाहर निकलकर पहले प्रतिहारों (द्वारपालों)-की पूजा करे, उन सबके वाचक मन्त्र क्रमशः बतलाये जाते हैं— ‘ॐ गं गणपतये नमः, ॐ क्षं क्षेत्रपालाय नमः, ॐ गुं गुरुभ्यो नमः’ इन तीन मन्त्रोंसे आकाशमें पूजन-सामग्री समर्पित करे। तत्पश्चात् चारों दिशाओंमें क्रमशः कुलदेवता, नन्दी, महाकाल और धाता-विधाताकी पूजा करे, इनकी पूजाके मन्त्र इस प्रकार हैं— ‘ॐ कुं कुलदेवतायै नमः, ॐ नं नन्दिने नमः, ॐ मं महाकालाय नमः, ॐ धां धात्रे विधात्रे नमः।’
इस प्रकार बाहर पूजा करनेके पश्चात् भीतर प्रवेश करके शिवलिंगसे कुछ दक्षिण भागमें पवित्रतापूर्वक उत्तराभिमुख होकर बैठे। शरीरको समभावसे रखते हुए आसनपर आसीन हो क्षणभर भगवान्का ध्यान करे। कमलके आकारका सूर्यमण्डल है, उसके मध्यभागमें चन्द्रमण्डलकी स्थिति है, उसके भी मध्यभागमें अग्निमण्डल है जो धर्म* आदिसे घिरा हुआ है। इस प्रकार अग्निमण्डलका चिन्तन करके उसके मध्यभागमें विश्वरूप भगवान्
* धर्म, ज्ञान, वैराग्य तथा ऐश्वर्य।
१६२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
शंकरका भावनाद्वारा साक्षात्कार करे। भगवान् शिव अपनी वामा और ज्येष्ठा आदि शक्तियोंसे संयुक्त हैं। उनके पाँच मुख और दस भुजाएँ हैं, प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र शोभा पा रहे हैं, उनके मस्तक चन्द्रमासे विभूषित हैं, भगवान्के वामांगमें गिरिराजनन्दिनी भगवती उमा विराजमान हैं तथा सिद्धगण बारंबार उनकी स्तुति कर रहे हैं। इस प्रकार भगवान् शिवका ध्यान करे।
राजन्! ध्यानके पश्चात् शंकरजीकी सेवामें पाद्य और अर्घ्य निवेदन करे। जल, अक्षत, कुशा, चन्दन, पुष्प, सरसों, दूध, दही और मधु—ये अर्घ्यके नौ अंग बताये गये हैं; इन सबको एकत्र करके अर्घ्य देना चाहिये। तत्पश्चात् श्रद्धासे आर्द्रचित्त हो शिवलिंगको स्नान कराना आरम्भ करे। पहले गडुवा हाथमें लेकर स्नान करावे, आधे गडुवेसे शिवलिङ्गको पहले नहलावे, फिर हाथसे रगड़कर मैल साफ करे, पुन: गडुवेके समूचे जलसे स्नान करावे, स्नानके पश्चात् पूजन करे और धूप दे। इसके बाद भक्तिपूर्वक भगवान् शिवको प्रणाम करके मूलमन्त्रसे उन्हें स्नान करावे। 'ॐ हूं विश्वमूर्तये शिवाय नम:' यह द्वादशाक्षर मूलमन्त्र है। इसी मूलमन्त्रसे जल और धूपसे किये हुए पूजनके अतिरिक्त जल, दूध, दही, मधु, घृत और ईखके रसद्वारा पृथक्-पृथक् स्नान करावे। फिर सब गडुवोंके जलसे स्नान करावे। तदनन्तर गन्ध-द्रव्योंका लेपन करके श्रीविग्रहका रूखापन दूर करे। रूखापन दूर करके पुनः नहलावे और चन्दनका लेप करे। तत्पश्चात् भाँति-भाँतिके पुष्पोंसे पूजन करे। उसकी विधि सुनो। आधार-पीठके अग्निकोणवाले पायेमें 'ॐ धर्माय नमः' इस मन्त्रसे धर्मकी पूजा करे, नैर्ऋत्य कोणवाले पायेमें 'ॐ ज्ञानाय नमः' इस मन्त्रके द्वारा ज्ञानका पूजन करे; इसी प्रकार वायव्य कोणमें 'ॐ वैराग्याय नमः', ईशान कोणवाले पायेमें 'ॐ ऐश्वर्याय नमः', पूर्व दिशावाले पायेमें 'ॐ अधर्माय नमः', दक्षिणमें 'ॐ अज्ञानाय नमः', पश्चिममें 'ॐ अवैराग्याय नमः', उत्तरमें 'ॐ अनैश्वर्याय नमः'—इन मन्त्रोंद्वारा क्रमशः वैराग्य आदिकी पूजा करे। फिर कमलकी कर्णिकामें ही अनन्त आदिकी इन मन्त्रोंसे पूजा करे— ॐ अनन्ताय नमः, ॐ पद्माय नमः, ॐ अर्कमण्डलाय नमः, ॐ सोममण्डलाय नमः, ॐ वह्निमण्डलाय नमः, ॐ वामाज्येष्ठादिपञ्चमन्त्रशक्तिभ्यो नमः, ॐ परमप्रकृत्यै देव्यै नमः। इसके बाद ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव तथा सद्योजात नामक पाँच मुखोंवाले, रुद्र-साध्य-वसु-आदित्य तथा विश्वेदेवादि देवस्वरूप, अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज और जरायुजरूप स्थावर-जंगम मूर्ति परमेश्वर एवं विश्वमूर्ति शिवका नमस्कारपूर्वक पूजन करे। मन्त्र इस प्रकार है—
ॐ ईशान तत्पुरुषाघोरवामदेव-सद्योजातपञ्चवक्त्राय रुद्रसाध्यवस्वादित्य-विश्वेदेवादिदेवरूपायाण्डजस्वेदजोद्भिज्जजरायुज-रूपस्थावरजङ्गममूर्तये परमेश्वराय ॐ हूं विश्वमूर्तये शिवाय नमः।
तत्पश्चात् 'ॐ त्रिशूलधनुःखड्गपालकुठारेभ्यो नमः'—इस मन्त्रसे त्रिशूल आदिकी पूजा करे। तदनन्तर जलाधारके मुखभागमें 'ॐ चण्डीश्वराय नमः' इस मन्त्रके द्वारा चण्डीश्वरकी पूजा करे।
इस प्रकार विधिपूर्वक पूजन करके भगवान् शिवको अर्घ्य निवेदन करे। 'हे महादेवजी! जल, अक्षत, फूल और इन उत्तम फलोंसे युक्त यह अर्घ्य ग्रहण कीजिये, पूजाकी पूर्तिके लिये मैं इसे समर्पित करता हूँ।' इस प्रकार अर्घ्य देनेके पश्चात् यदि अपनेमें शक्ति हो तो धनके द्वारा भी भगवान्का पूजन करे। इसके बाद क्रमशः धूप, दीप और नैवेद्य निवेदन करे, घण्टा बजावे और आरती करे। देवाधिदेव महादेवजीके ऊपर शंख आदि वाद्योंकी ध्वनिके साथ आरती घुमानी चाहिये। जो देवाधिदेव
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १६३
त्रिशूलधारी भगवान् शिवकी आरतीका दर्शन करता है, वह समस्त पातकोंसे मुक्त हो जाता है। फिर जो स्वयं ही भगवान्की आरती उतारेगा, उसके लिये तो कहना ही क्या है। जो भगवान् शिवके समीप नृत्य, संगीत तथा वाद्य—इन तीनोंका आयोजन करता है, उसपर भगवान् शिव बहुत सन्तुष्ट होते हैं; क्योंकि गीत और वाद्यका फल अनन्त होता है। तदनन्तर अनेक प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा महादेवजीकी स्तुति करके दण्डकी भाँति पृथ्वीपर गिरकर प्रणाम करे और देवेश्वर शिवसे अपने अपराधोंके लिये क्षमा-प्रार्थना करते हुए कहे—‘भगवान्! मुझसे जो सुकृत अथवा दुष्कृत हुआ है उसके लिये आप क्षमा करें।’
जो इस प्रकार भगवान् शंकरका विशेषतः इस महाकाललिंगका पूजन करता है, वह अपने पिता, पितामह और प्रपितामहका सब पापोंसे उद्धार करके चिरकालतक रुद्रलोकमें निवास करता है। इस विधिसे भगवान् महेश्वरका उपासक होकर और सदाचारमें स्थित रहनेका व्रत लेकर जो मनुष्य बन्धनसे छूटनेके लिये तन्मय होकर भगवान् शिवका पूजन करता है, वह सब पापोंसे छूटकर शिवलोकमें जाता है। जो इस प्रकार भगवान् शंकरकी पूजा करता है, उसने मानो समस्त संसारको तृप्त कर दिया। किंतु राजन्! यह सब पूजन उसीका सफल होता है, जो कभी सदाचारका उल्लंघन नहीं करता है। आचारसे धर्म सफल होता है, आचारसे ही मनुष्य स्वर्गका सुख भोगता है, आचारसे आयु प्राप्त होती है तथा आचार अशुभ लक्षणोंको नष्ट कर देता है। जो इस जगत्में सदाचारका उल्लंघन करके स्वेच्छाचारपूर्ण बर्ताव करता है, उस मनुष्यके यज्ञ, दान और तप इस लोकमें कल्याणकारक नहीं होते।<sup>१</sup> अतः सदाचारका भी कुछ संक्षिप्त परिचय दूँगा, उसे सुनो। गृहस्थको धर्म, अर्थ और काम—इन तीनोंके साधनके लिये यत्न करना चाहिये। इनकी सिद्धि होनेपर गृहस्थ पुरुषके लिये इहलोक और परलोकमें भी सिद्धि प्राप्त होती है।
ब्राह्ममुहूर्तमें उठे। उठकर धर्म और अर्थका चिन्तन करे। तत्पश्चात् शय्यासे उठकर मलत्यागके बाद कुल्ला-दाँतून कर ले। फिर स्नान करके द्विज सन्ध्योपासना करे। विद्वान् द्विजको उचित है कि वह शान्तचित्त, संयमी तथा पवित्र होकर पूर्व-सन्ध्याकी उपासना उस समय प्रारम्भ करे जब कि प्रातःकाल आकाशके तारे अभी कुछ दिखायी देते हों तथा पश्चिम-सन्ध्या सूर्यास्त होनेसे पहले ही प्रारम्भ करे। इस प्रकार न्यायपूर्वक सन्ध्योपासना करता रहे। आपत्ति कालके सिवा कभी भी सन्ध्या-कर्मका परित्याग नहीं करना चाहिये। राजन्! झूठ, असत्-प्रलाप तथा कठोरभाषण सदाके लिये त्याग दे। दुष्ट पुरुषोंकी सेवा, नास्तिकवाद तथा असत्-शास्त्रोंको भी सदाके लिये छोड़ दे।<sup>२</sup> दर्पणमें मुँह देखना, दाँतून करना, बाल सँवारना और देवताओंकी पूजा करना—इन सब कार्योंको महर्षियोंने पूर्वाह्नमें
१- आचारात् फलते धर्मो ह्याचारात् स्वर्गमश्नुते। आचाराल्लभते चायुराचारो हन्त्यलक्षणम्॥
यज्ञदानतपांसीह पुरुषस्य न भूतये। भवन्ति यः सदाचारं समुल्लङ्घ्य प्रवर्तते॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३६। १२३—१२५)
२- ब्राह्मे मुहूर्ते बुध्येत धर्मार्थौ चापि चिन्तयेत्। समुत्थाय त्वथाचम्य दन्तधावनपूर्वकम्॥
सन्ध्यामुपासीत बुधः शान्तान्तः प्रयतः शुचिः। पूर्वा सन्ध्यां सनक्षत्रां पश्चिमां सदिवाकराम्॥
उपासीत यथान्यायं नैनां जह्यादनापदि। वर्जयेदनृतं चासत् प्रलापं परुषं तथा॥
असत्सेवामसद्वादस्त्वसच्छास्त्रं च पार्थिव।
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३६। १२७—१३०)
१६४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
करनेयोग्य बताया है। पलाशकी लकड़ीका आसन, खड़ाऊँ और दाँतून भी वर्जित हैं। विद्वान् पुरुष आसनको पैरसे न खींचे। एक ही साथ जल और अग्निको न ले जाय। गुरु, देवता तथा अग्निके सम्मुख पाँव न फैलावे। चौराहा, चैत्यवृक्ष, देवालय, संन्यासी, विद्यामें बढ़े हुए पुरुष, गुरु तथा वृद्धजन—इन सबको अपने दाहिने करके चलना चाहिये। धर्मज्ञ पुरुषको आहार, विहार और मैथुन ओटमें रहकर ही करने चाहिये। इसी प्रकार अपनी वाणी और बुद्धिकी शक्ति, तपस्या, जीविका तथा आयुको अत्यन्त गुप्त रखना चाहिये।^१ दिनमें उत्तर दिशाकी ओर मुँह करके मल और मूत्रका त्याग करना चाहिये तथा रातमें दक्षिण दिशाकी ओर मुँह करके करना चाहिये। ऐसा करनेसे आयु नहीं घटती। अग्नि, सूर्य, गौ, व्रतधारी पुरुष, चन्द्रमा और जलके सम्मुख तथा सन्ध्याके समय मल-मूत्र त्याग करनेवाले मनुष्यकी बुद्धि नष्ट होती है।^२ भोजन, शयन, स्नान, मल-मूत्रका त्याग तथा सड़कोंपर भ्रमण करनेपर दोनों हाथ, दोनों पैर और मुँह इन पाँचोंको भलीभाँति धोकर आचमन करे। नदीमें, श्मशान-भूमिमें, राखपर, गोबरपर, जोते-बोये हुए खेतमें तथा हरी-भरी घासवाली भूमिमें मल-मूत्रका त्याग न करे। बुद्धिमान् पुरुष कुएँ आदिसे निकाले हुए जलके द्वारा ही शौचक्रिया करे। जलके भीतरसे, देवस्थानसे, बाँबीसे और चूहोंके स्थानसे निकाली हुई तथा शौचावशिष्ट फेंकी हुई—इन पाँच प्रकारकी मिट्टियोंको त्याग दे। विद्वान् पुरुष हाथको उतना ही धोये जितनेसे मलकी गन्ध और लेप दूर हो जाय। अपने-आपको ताड़ना न दे, दुःखमें न डाले, दोनों हाथोंसे अपना सिर न खुजलावे, स्त्रीकी रक्षा करे, उसके प्रति अकारण ईर्ष्या छोड़ दे, भगवान् सूर्यको अर्घ्य दिये बिना कोई कर्म न करे, प्राणियोंसे द्रोह न करके मनमें भगवान् शंकरका चिन्तन करते हुए धनका उपार्जन करे। अत्यन्त कृपण न होवे, किसीके प्रति ईर्ष्या न रखे, कृतघ्न न होवे, दूसरोंसे द्रोह पैदा करनेवाले कार्यमें मन न लगावे, हाथ-पैरसे चंचल न हो, नेत्रोंसे भी चपलता न सूचित करे, सरल भावसे रहे, वाणीसे अथवा अंगोंकी चेष्टाओंसे भी अपनी चपलताका परिचय न दे, अशिष्ट पुरुषका संग न करे, व्यर्थ विवाद और अकारण वैर न करे, साम, दान और भेद—इन तीन उपायोंसे अपना मनोरथ सिद्ध करे। दण्डका आश्रय तो तभी लेना चाहिये जब उसके सिवा दूसरा कोई उपाय न रह जाय। फटा-टूटा आसन, टूटी खाट और फूटे बर्तनको त्याग दे। नृपश्रेष्ठ! अग्नि और शिवलिंग—इन दोनोंके बीचसे न निकले। दो अग्नि, दो ब्राह्मण, पति और पत्नी, सूर्य और चन्द्रमाकी प्रतिमा तथा भगवान् शंकर और नन्दिकेश्वर-वृषभ इनके बीचमें होकर न जाय; क्योंकि इनके बीचसे जानेवाला मनुष्य पापका भागी होता है। विद्वान् पुरुष एक वस्त्र धारण करके न तो भोजन करे, न अग्निमें आहुति दे, न ब्राह्मणोंकी पूजा करे और न देवताओंकी अर्चना ही करे। कूटना, पीसना,
१- पादौ प्रसारयेन्नैव गुरुदेवाग्निसम्मुखे। चतुष्पथं चैत्यतरुं देवागारं तथा यतिम्॥
विद्याधिकं गुरुं वृद्धं कुर्यादेतान् प्रदक्षिणान्।
आहारनीहारविहारयोगास्सुसंवृता धर्मविदानुकार्याः।
वाग्बुद्धिवीर्याणि तपस्तथैव दानायुषी गुप्ततमे च कार्ये॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३६। १३३–१३५)
२- उभे मूत्रपुरीषे तु दिवा कुर्यादुदङ्मुखः। दक्षिणाभिमुखो रात्रौ ह्येवमायुर्न रिष्यते॥
प्रत्यग्निं प्रतिसूर्यञ्च प्रतिगां व्रतिनं प्रति। प्रतिसोमोदकं सन्ध्यां प्रज्ञा नश्यति मेहतः॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३६। १३६-१३७)
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १६५
झाडू देना, पानी छानना, राँधना, भोजन करना, सोना, उठना, जाना, छींकना, कार्यारम्भ करना, कार्यको समाप्त करना, मुँहसे अप्रिय वचन निकल जाना, पीना, सूँघना, स्पर्श करना, सुनना, बोलनेकी इच्छा करना, मैथुन करना तथा शौच कर्म—इन बीस कार्योंके होते या करते समय जो सदा भगवान् शंकरका नाम स्मरण करता है, उसीको शिवभक्त जानना चाहिये; शेष दूसरे लोग नाममात्रके शिवभक्त कहे गये हैं। शिवजीको प्रत्येक कार्यमें स्मरण करनेवाला वह शिवभक्त निश्चय ही शिव-स्वरूप होकर अन्तमें शिवको ही प्राप्त होता है।
विद्वान् पुरुष परायी स्त्रीसे बातचीत न करे; यदि कभी आवश्यकतावश उनसे वार्तालाप करे तो माताजी ! बहिनजी ! बेटी ! अथवा आर्ये ! इस प्रकार सम्बोधन करके बोले। हाथ और मुँह जूठे हों तो कोई बात न करे और न किसी वस्तुका स्पर्श ही करे। उच्छिष्ट दशामें सूर्य, चन्द्रमा, तारे, देवता और अपने मस्तककी ओर देखना भी मना है। बहन, बेटी अथवा माताके साथ भी एकान्तमें न बैठे; क्योंकि इन्द्रिय-समुदाय दुर्जय होता है; उनसे विद्वान् पुरुष भी मोहमें पड़ जाते हैं।* यदि गुरुदेव घरपर आ जायँ तो उनके लिये स्वयं उठकर यत्नपूर्वक आसनकी व्यवस्था करे और चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम करे। विद्वान् मनुष्य उत्तर और पश्चिमकी ओर सिर करके कभी न सोवे। सिरहानेकी ओर दक्षिण दिशा अथवा पूर्वदिशाको रखकर शयन करना चाहिये। रजस्वला स्त्रीका दर्शन-स्पर्श न करे, उसके साथ बातचीत भी नहीं करनी चाहिये। जलके भीतर मल-मूत्र और मैथुन न करे। भगवान् शिवके भक्तको चाहिये कि वह अपने वैभवके अनुसार देवता, मनुष्य, ऋषि तथा पितरोंको उनका भाग समर्पित करके शेष अन्नका स्वयं भोजन करे। पवित्र हो आचमन करके पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके दोनों हाथोंको घुटनोंके भीतर रखकर मौन भावसे भोजन करे। उस समय भोजनमें ही मन लगाये रहे और अन्नके दोषकी चर्चा न करे। यदि वह अन्न किसी उच्छिष्ट आदि दोषसे दूषित हो गया हो तो उस दोषके प्रकट करनेमें कोई हानि नहीं है, ऐसे दोषके अतिरिक्त किसी अन्य दोषकी चर्चा नहीं करनी चाहिये। नग्न होकर न तो स्नान करे, न सोवे और न चले ही। यदि गुरुके द्वारा कोई अनुचित कार्य भी हो जाय, तो उसे अन्यत्र न कहे, वे क्रोधमें हों तो उन्हें मनावे। दूसरे लोगोंके मुखसे भी गुरुकी निन्दा न सुने। सैकड़ों कार्य छोड़कर भी धर्मकी कथा-वार्ता सुने। प्रतिदिन धर्म-चर्चा श्रवण करनेवाला मनुष्य अपने अन्तःकरणको उसी प्रकार शुद्ध कर लेता है, जैसे नित्यप्रति झाडू देने अथवा सफाई करनेसे घर और दर्पण स्वच्छ होते हैं। सायंकाल और प्रातःकाल अतिथिकी पूजा करके भोजन करना चाहिये। दोनों सन्ध्याओंके समय सोना, पढ़ना और भोजन करना निषिद्ध है। सन्ध्याकालमें मोहवश भोजन करनेवाला मनुष्य शराबीके तुल्य माना जाता है। स्नान करके मनुष्य अपने बालोंको न फटकारे। मार्गमें छींकने और थूकनेपर अपने दाहिने कानका स्पर्श करे तथा मन-ही-मन समस्त प्राणियोंसे इस अपराधके लिये क्षमा माँगे। नीलका रँगा हुआ वस्त्र न पहने, कपड़ेको उलटा करके न पहने, मलिन वस्त्र त्याज्य है तथा जिसके कोर या किनारा न हो, ऐसा वस्त्र भी धारण करनेयोग्य नहीं है।
हाथ, मुँह और दोनों पैर धोकर आसनपर बैठे। दोनों हाथ घुटनोंके भीतर रखकर तीन
* स्वस्रा दुहित्रा मात्रा वा नैकान्तासनमाचरेत्। दुर्जयो हीन्द्रियग्रामो मुह्यते पण्डितोऽपि सन्॥ (स्क० पु०, मा० कुमा० ३६।१५७)
१६६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
बार आचमन करे, दो बार मुँह पोछे। फिर जलसे मुँह, आँख, कान, नाक तथा अपने मस्तकका स्पर्श करे। पुनः दो बार आचमन करके सब कर्म करे। छींक और थूक आनेपर, दाँतमें अन्न आदि लगे रहनेपर तथा पतितोंके साथ बातचीत करनेपर अवश्य आचमन करना चाहिये। विद्वान् पुरुषको सदा तीनों वेदोंका स्वाध्याय करना चाहिये तथा धर्मपूर्वक धनका उपार्जन करके आत्मकल्याणके लिये यत्नपूर्वक भगवान्का यजन करना चाहिये। बुद्धिमान् पुरुषको उचित है कि वह नीच श्रेणीके मनुष्योंके लिये भी कभी अनादरसूचक 'तू' का प्रयोग न करे। गुरुजनोंके लिये तू कह देना या उनका वध कर डालना दोनों बराबर है। सत्य बोले, मित्र-भावसे रहे, सदा ऐसी बात बोले जो दूसरोंको सान्त्वना देनेवाली हो। परलोकमें जो हितकर हो, उसी कार्यमें गम्भीर बुद्धिवाले पुरुषोंको अपना शरीर और मन लगाना चाहिये। स्वच्छ इन्द्रियोंवाले पुरुषोंको तीर्थस्नान, उपवास, व्रत, सत्पात्रको दिये गये दान, होम, जप, यज्ञ, शिव-पूजा तथा देवताओंकी विशेष पूजा आदिके द्वारा सदा अपने अन्तःकरणका शोधन करना चाहिये। राजन्! जिस कार्यको करते समय अपने आत्माको घृणा न हो तथा जो महात्मा पुरुषके लिये गोपनीय (छिपानेयोग्य) न हो, वह कार्य अनासक्तभावसे अवश्य करना चाहिये। यह मैंने तुमसे संक्षिप्तरूपमें सदाचारका किंचिन्मात्र वर्णन किया है। शेष बातें तुम्हें स्मृतियों और पुराणोंसे सुननी चाहिये। इस प्रकार भगवान् शिवकी प्रीतिके लिये धर्माचरण करनेवाले सद्गृहस्थको इहलोकमें धर्म, अर्थ और कामकी प्राप्ति होकर परलोकमें उसका परम कल्याण होता है।
**नारदजी कहते हैं—**अर्जुन! जब महाकालजी इस प्रकार भाँति-भाँतिके धर्मोंका उपदेश कर रहे थे, उस समय आकाशमें बड़ा भारी शब्द हुआ। तदनन्तर महाकाल भगवान् शिवके परमधामको चले गये। कुरुनन्दन! इस प्रकार इस महालिंगका आविर्भाव हुआ है। महाकालका यह कूप और सरोवर भी परम पवित्र एवं सिद्धिदायक है। कुन्तीनन्दन! जो मनुष्य यहाँ इस लिंगकी आराधनामें संलग्न होते हैं, महाकाल उन्हें अपने हृदयसे लगाकर भगवान् शिवकी सेवामें प्रस्तुत करते हैं। अर्जुन! इस प्रकार महीसागरसंगम तीर्थमें ये सात लिंग प्रकट हुए। जो श्रेष्ठ मानव इस प्रसंगको पढ़ते और सुनते हैं, वे भी धन्य हैं।
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नारदजीके द्वारा भगवान् वासुदेवकी स्थापना, ऐतरेयका अपनी मातासे संसारदुःखका वर्णन, भगवान्का प्रत्यक्ष प्रकट होकर ऐतरेयको वरदान देना तथा वासुदेवके ध्यानसे ऐतरेयकी मुक्ति
**नारदजी कहते हैं—**अर्जुन! तदनन्तर महीसागर-संगममें जब मैंने स्थानकी स्थापना कर ली, तब कालान्तरमें मन-ही-मन विचार किया कि यह तीर्थ भगवान् वासुदेवके बिना शोभा नहीं पा रहा है। ठीक उसी तरह, जैसे बिना सूर्यके संसार सुशोभित नहीं होता। भगवान् विष्णु भूषणके भी भूषण हैं। जिस तीर्थमें, जिस घरमें, जिस हृदयमें तथा जिस शास्त्रमें मेरे स्वामी भगवान् विष्णु नहीं हैं, वह सब असत् है। इसलिये वरदायक भगवान् पुरुषोत्तमको प्रसन्न करके सम्पूर्ण विश्वपर अनुग्रह करनेकी कामनासे इस तीर्थमें उन्हें साक्षात् कलासहित ले आऊँगा। ऐसा विचारकर मैं वहीं ठहर गया
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १६७
और ज्ञानयोगके द्वारा योगीश्वर श्रीहरिको सन्तुष्ट करनेके लिये सौ वर्षोंतक आराधना करता रहा। सम्पूर्ण इन्द्रियोंको अपने वशमें करके वासुदेवमय होकर सब प्राणियोंपर कृपा रखते हुए अष्टाक्षरमन्त्रके जपमें लगा रहा। इस प्रकार मेरे आराधना करनेपर गरुड़पर बैठे हुए भगवान् श्रीहरिने कोटि-कोटि गणोंके साथ आकर मुझे प्रत्यक्ष दर्शन दिया। तब मैंने श्रीहरिको विधिपूर्वक अर्घ्य दे, प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़े हुए कहा—'प्रभो! पूर्वकालमें
श्वेतद्वीप नामक धाममें मैंने आपके अजन्मा, सनातन, नर-नारायणात्मक स्वरूपका दर्शन किया है। जनार्दन! उसी रूपकी एक कला यहाँ स्थापित कीजिये। भगवन्! यदि आप प्रसन्न हैं तो मेरी यह प्रार्थना स्वीकार करें।' मेरे इस प्रकार प्रार्थना करनेपर भगवान् गरुड़ध्वजने कहा—'ब्रह्मपुत्र नारद! तुम्हारे हृदयमें जिस आकांक्षाका उदय हुआ है, वह उसी रूपमें पूर्ण हो। मुझे इस तीर्थमें सदैव निवास करना है।' यों कहकर श्रीविष्णु-प्रतिमामें अपनी कला स्थापित करके भगवान् विष्णु जब चले गये, तब मैंने सम्पूर्ण विश्वपर अनुग्रह करनेकी इच्छासे उनके श्रीअर्चाविग्रहकी स्थापना की। अतः साक्षात् श्वेतद्वीपनिवासी श्रीहरि यहाँ विराजमान हैं, जो कि सबसे वृद्ध हैं, अतः वे इस तीर्थमें वृद्ध वासुदेवके नामसे विख्यात हुए हैं।
कार्तिकमासके शुक्लपक्षमें जो कल्याणमयी एकादशी आती है, उस दिन झरने अथवा नदी आदिके जलमें विधिपूर्वक स्नान करके जो पुरुष पंचोपचारद्वारा भक्तिभावसे श्रीहरिका पूजन करता है तथा उपवास और जागरण करते हुए श्रीहरिके आगे संगीत एवं वाद्यका आयोजन करता है, अथवा दम्भ और क्रोध त्याग कर श्रीविष्णुकी महिमा एवं लीलाकी कथा कहता है तथा मन और इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए प्रसन्नचित्त हो यथाशक्ति दान देता है, वह ब्रह्महत्यारा क्यों न हो, अनेक जन्मोंकी समस्त पापराशिसे मुक्त हो जाता है। इसके सिवा वह अन्तमें गरुड़-सम्बन्धी विमानके द्वारा साक्षात् वैकुण्ठधामको प्राप्त होता है।
श्रद्धापूर्वक, प्रसन्नतापूर्वक, उत्साहके साथ, आन्तरिक अभिलाषासे, अहंकार छोड़कर, भगवान्को स्नान करा उन्हें धूप और चन्दन चढ़ाकर, पुष्प और नैवेद्य समर्पण करके, अर्घ्यदान देकर, प्रत्येक प्रहरमें अत्यन्त भक्तिभावसे भगवान्की आरती उतारकर, चँवर डुलानेका आनन्द लेते हुए, भेरी बजाते हुए, पुराण-कथा-श्रवणपूर्वक, भक्तियुक्त नृत्य करके, नींदसे दूर रहकर, क्षुधा-पिपासा तथा रसास्वादनकी इच्छासे रहित होकर, भगवच्चरणारविन्दोंकी सुगन्धको सूँघते हुए, भगवत्प्रिय रात्रि-संगीतका आयोजन करके, भगवत्तीर्थमें जाकर, प्राणायामपूर्वक, ब्रह्मचर्यके पालनपूर्वक, स्तोत्रपाठके साथ, भगवान्के चरणोदकको ग्रहण करते हुए, सत्यभाषणपूर्वक, सत्संगका लाभ उठाते हुए तथा पुण्यवार्ता (कथा-उपदेश आदि)-के सहित—इन पचीस विशेषताओंके साथ जो मनुष्य एकादशीकी
१६८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
रातमें भगवान्के समीप जागरण करता है, वह फिर इस भूमिमें जन्म नहीं लेता। पूर्वकालकी बात है। इस श्रेष्ठ तीर्थमें एक ऐतरेय नामक ब्राह्मण रहते थे। उन परम भाग्यशाली ब्राह्मण-देवताने यहीं भगवान् वासुदेवकी कृपासिद्धि प्राप्त की थी।
अर्जुनने पूछा—मुने! ऐतरेय किसके पुत्र थे? उनका निवास-स्थान कहाँ था? परम बुद्धिमान् ऐतरेयने किस प्रकार भगवान् वासुदेवके प्रसादसे सिद्धि प्राप्त की?
नारदजीने कहा—कुन्तीनन्दन! यहीं मेरे द्वारा स्थापित स्थानमें जो हारीत मुनि रहते थे, उन्हींके वंशमें एक श्रेष्ठ ब्राह्मण उत्पन्न हुए, जो माण्डूकि नामसे विख्यात थे। वे वेद-वेदांगोंके पारंगत पण्डित थे। उनके ‘इतरा' नामवाली पत्नी थी, जो नारीके समस्त सद्गुणोंसे सुशोभित थी। उसके गर्भसे जो पुत्र हुआ, उसीका नाम ‘ऐतरेय’ था। ऐतरेय बाल्यावस्थासे ही निरन्तर द्वादशाक्षर मन्त्र ( ॐ नमो भगवते वासुदेवाय )-का जप करता था, उसे पूर्वजन्ममें ही इस मन्त्रकी शिक्षा मिली थी। वह न तो किसीकी बात सुनता था न स्वयं कुछ बोलता था और न अध्ययन ही करता था। इससे सबको निश्चय हो गया कि यह बालक गूँगा है। पिताने अनेक उपायोंसे उसको समझाया—बोध कराया, परंतु उसने लौकिक व्यवहारमें कभी मन नहीं लगाया। यह देख पिताने भी यही निश्चय कर लिया कि यह सर्वथा जड़ है। तब उन्होंने पिंगा नामवाली दूसरी स्त्रीसे विवाह किया और उससे चार पुत्र उत्पन्न किये जो वेद-वेदांगोंके विद्वान् हुए।
ऐतरेय भी प्रतिदिन तीनों समय भगवान् वासुदेवके मन्दिरमें जाकर उस उत्तम मन्त्रका जप करने लगे। वे दूसरे किसी कार्यमें परिश्रम नहीं करते थे। एक दिन उनकी माता इतरा अपनी सौतके पुत्रोंकी योग्यता देखकर सन्तप्तचित्त हो अपने पुत्रसे बोली—‘अरे! तू तो मुझे क्लेश देनेके लिये ही पैदा हुआ! मेरे जन्म और जीवनको धिक्कार है! संसारमें उस नारीका जन्म निश्चय ही व्यर्थ है, जो पतिके द्वारा तिरस्कृत हो और जिसका पुत्र गुणवान् न हो। वत्स! मैं बड़ी खोटे भाग्यवाली हूँ, अतः महीसागरसंगममें डूब मरूँगी। मेरा मर जाना ही अच्छा है। जीवित रहनेमें मुझे क्या लाभ है? मेरे मर जानेपर तू भी भगवान्का महामौनी भक्त होकर दीर्घकालतक आनन्द भोगना।'
नारदजी कहते हैं—माताकी यह बात सुनकर ऐतरेय ठाठाकर हँस पड़े। वे बड़े धर्मज्ञ थे। उन्होंने दो घड़ी भगवान्का ध्यान करके माताके चरणोंमें प्रणाम किया और कहा—‘माँ! तुम झूठे मोहमें पड़ी हुई हो। अज्ञानको ही ज्ञान मान बैठी हो। शुभे! जो शोचनीय नहीं है, उसीके लिये तुम शोक करती हो और जो वास्तवमें शोचनीय है उसके लिये तुम्हारे मनमें तनिक भी शोक नहीं होता। यह संसार मिथ्या है। इसमें तुम इस शरीरके लिये क्यों चिन्तित एवं मोहित हो रही हो? यह तो मूर्खोंका काम है! तुम-जैसी विदुषी स्त्रियोंको यह शोभा नहीं देता! संसारमें सारतत्त्व तो कुछ और ही है, किंतु अज्ञानसे मोहित मनुष्य किसी और ही असार वस्तुको सार समझते हैं। तुम इस मानव-शरीरको यदि सार मानती हो तो लो, इसकी भी असारता सुनो। यह जो मानव-शरीर है, यह गर्भसे लेकर मृत्युपर्यन्त सदा अत्यन्त कष्टप्रद है। यह शरीर एक प्रकारका घर है। हड्डियोंका समूह ही इसके भारको सँभालनेवाला खम्भा है। नाडीजालरूपी रस्सियोंसे ही इसे बाँधा गया है। रक्त और मांसरूपी मिट्टीसे इसको लीपा गया है। विष्ठा और मूत्ररूपी द्रव्योंके संग्रहका यह पात्र है। केश और रोमरूपी तृणसे इसको छाया गया है। सुन्दर रंगकी त्वचासे इसके ऊपर रंग किया गया है। मुख ही इसका प्रधान द्वार है। दो आँख, दो कान और दो नाकके छिद्र—ये ही छः इसकी खिड़कियाँ हैं। दोनों ओष्ठ ही इसके द्वारको ढकनेवाले किंवाड़ हैं। दाँत ही अर्गला (किंवाड़
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १६९
बंद करनेवाली किल्ली) हैं। नाड़ी और पसीने ही नाली और जलप्रवाह हैं। यह सदा कालकी मुखाग्निमें स्थित है। ऐसे इस देहरूपी गेहमें जीव नामवाला गृहस्थ निवास करता है। इस घरमें त्रिगुणमयी प्रकृति ही उसकी पत्नी है तथा क्रोध, अहंकार, काम, ईर्ष्या और लोभ आदि ही उक्त गृहस्थकी सन्तान हैं। हाय ! कितने कष्टकी बात है कि जीव इस देह-गेहकी मोहमायासे मूढ होकर तदनुकूल बर्ताव करता है। उसका जिस-जिस विषयमें जैसे मोह होता है, वह सब बताता हूँ, सुनो। जैसे पर्वतसे झरने गिरते रहते हैं, उसी प्रकार शरीरसे भी कफ और मूत्र आदि बहते रहते हैं, उसी देहके लिये जीव मोहित होता है। विष्ठा और मूत्रसे भरे हुए चर्मपात्रकी भाँति यह शरीर समस्त अपवित्र वस्तुओंका भण्डार है और इसका एक प्रदेश (एक अंश) भी पवित्र नहीं है। अपने शरीरसे निकले हुए मल-मूत्र आदिके जो प्रवाह हैं, उनका स्पर्श हो जानेपर मिट्टी और जलसे हाथ शुद्ध किया जाता है; तथापि उन्हीं अपवित्र वस्तुओंके भण्डाररूप इस देहसे न जाने क्यों मनुष्यको वैराग्य नहीं होता? सुगन्धित तेल और जल आदिके द्वारा यत्नपूर्वक भलीभाँति संस्कार (सफाई) करनेपर भी यह शरीर अपनी स्वाभाविक अपवित्रताको नहीं छोड़ता है; ठीक उसी तरह, जैसे कुत्तेकी टेढ़ी पूँछको कितना ही सीधा किया जाय, वह अपना टेढ़ापन नहीं छोड़ पाती। अपनी देहकी अपवित्र गन्धसे जो मनुष्य विरक्त नहीं होता, उसे वैराग्यके लिये अन्य किस साधनका उपदेश दिया जाय? दुर्गन्ध तथा मल-मूत्रके लेपको दूर करनेके लिये ही शारीरिक शुद्धिका विधान किया गया है। इन दोनों (गन्ध और लेप)-का निवारण हो जानेके पश्चात् आन्तरिक भावकी शुद्धि होनेसे मनुष्य शुद्ध होता है। भाव-शुद्धि ही सबसे बढ़कर पवित्रता है। वही सब कर्मोंमें प्रमाणभूत है। आलिंगन पत्नीका भी किया जाता है और पुत्रीका भी, परंतु दोनोंमें भावका महान् अन्तर है। प्यारी पत्नीका आलिंगन किसी और भावसे किया जाता है एवं पुत्रीका दूसरे भावसे। एक ही स्त्रीके स्तनोंको पुत्र दूसरे भावसे स्मरण करता है और पति दूसरे भावसे। अतः अपने चित्तको ही शुद्ध करना चाहिये। बाह्यशुद्धिके दूसरे-दूसरे साधनोंसे क्या लेना है? भावदृष्टिसे जिसका अन्तःकरण अत्यन्त शुद्ध है, वह स्वर्ग और मोक्षको भी प्राप्त कर लेता है।
ज्ञानरूपी निर्मल जल तथा वैराग्यरूपी मृत्तिकासे ही पुरुषके अविद्या एवं रागमय मल-मूत्रके लेप और दुर्गन्धका शोधन होता है। इस प्रकार इस शरीरको स्वभावतः अशुद्ध माना गया है। जैसे केलेके वृक्षमें केवल वल्कल ही सार है, उसी प्रकार इस देहमें केवल त्वचामात्र सार है, वास्तवमें तो यह सर्वथा निःसार है। जो बुद्धिमान् अपने शरीरको इस प्रकार दोषयुक्त जानकर उदासीन हो जाता है—उसकी ओरसे अनुराग शिथिल कर लेता है—वही इस संसार-बन्धनसे छूटकर निकल पाता है। किंतु जो दृढ़तापूर्वक इस शरीरको पकड़े हुए रहता है—इसका मोह नहीं छोड़ता, वह संसारमें ही पड़ा रह जाता है। इस प्रकार यह मानव-जन्म लोगोंके अज्ञानदोषसे तथा नाना कर्मवशात् दुःखस्वरूप और महान् कष्टप्रद बताया गया है। जैसे बड़े भारी पर्वतसे दबा हुआ कोई प्राणी बड़े कष्टसे पीड़ित रहता है, उसी प्रकार गर्भकी झिल्लीमें बँधा हुआ मनुष्य महान् कष्टसे वहाँ ठहर पाता है। जैसे समुद्रमें गिरा हुआ कोई मनुष्य अत्यन्त व्याकुल होकर बड़े भारी दुःखसे घिर जाता है, उसी प्रकार गर्भगत जलसे भीगे हुए अंगोंवाला गर्भस्थ शिशु अत्यन्त व्याकुल रहता है। जैसे किसीको लोहेके घड़ेमें रखकर आगसे पकाया जाता है, वैसे ही गर्भरूपी घटमें डाला हुआ जीव जठरानलकी आँचसे पकता रहता है। यदि आगके समान दहकती हुई सुइयोंसे
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किसीको निरन्तर छेदा जाय तो उसे जितनी पीड़ा हो सकती है, उससे आठ गुनी पीड़ा गर्भमें भोगनी पड़ती है। इस प्रकार स्थावर-जंगम सभी प्राणियोंको अपने-अपने गर्भके अनुरूप यह महान् गर्भ-दुःख प्राप्त होता है; ऐसा कहा गया है।
गर्भमें स्थित होनेपर सभीको अपने पूर्वजन्मोंका स्मरण हो आता है। उस समय जीव इस प्रकार सोचता है—'अहो! मैं मरकर पुनः उत्पन्न हुआ और उत्पन्न होकर पुनः मृत्युको प्राप्त हुआ। जन्म ले-लेकर मैंने सहस्रों योनियोंका दर्शन किया है। इस समय जन्म धारण करते ही मेरे पूर्वसंस्कार जाग उठे हैं; अतः अब मैं ऐसे कल्याणकारी साधनका अनुष्ठान करूँगा, जिससे पुनः मेरा गर्भवास न हो। संसार-बन्धनको दूर करनेवाले भगवदीय तत्त्वज्ञानका मैं चिन्तन करूँगा।' इस प्रकार उस दुःखसे छूटनेके उपायपर विचार करता हुआ गर्भस्थ जीव चिन्तामग्न रहता है। जब उसका जन्म होने लगता है, उस समय तो उसे गर्भकी अपेक्षा भी कोटिगुना अधिक दुःख होता है। गर्भवासके समय जो सद्बुद्धि जाग्रत् हुई रहती है, वह जन्म हो जानेपर नष्ट हो जाती है। बाहरकी हवा लगते ही मूढ़ता आ जाती है। मोहग्रस्त होनेपर शीघ्र ही उसकी स्मरणशक्तिका नाश हो जाता है। स्मरणशक्ति नष्ट होनेपर पूर्वकर्मवशात् जीवका पुनः उसी जन्म (-के शरीर आदि)-में अनुराग हो जाता है। इस प्रकार राग और मोहके वशीभूत हुआ वह संसारमें न करनेयोग्य पापादि कर्मोंमें लग जाता है। उनमें फँसकर न तो वह अपनेको जानता है, न दूसरोंको जानता है और न किसी देवताको ही कुछ समझता है। अपने परम कल्याणकी बाततक नहीं सुनता। आँख रहते हुए भी नहीं देखता। समतल मार्गपर धीरे-धीरे चलते हुए भी वह पग-पगपर लड़खड़ाता है। विद्वानोंके समझानेपर भी, बुद्धि रहते हुए भी वह नहीं समझ पाता, इसीलिये राग और मोहके वशीभूत होकर संसारमें क्लेश उठाता रहता है। जन्म लेनेपर गर्भकालमें जाग्रत् हुई पूर्वजन्मकी स्मृति अथवा गर्भके दुःखोंकी स्मृति नहीं रहती, इसलिये महर्षियोंने गर्भदुःखका निरूपण करनेके लिये शास्त्रोंका प्रतिपादन किया है। वे शास्त्र स्वर्ग और मोक्षके उत्तम साधन हैं। सब कार्यों और प्रयोजनोंको सिद्ध करनेवाले इस शास्त्रज्ञानके रहते हुए भी लोग उससे अपने कल्याणका साधन नहीं करते। यह अत्यन्त अद्भुत बात है।
बाल्यावस्थामें इन्द्रियोंकी वृत्तियाँ अव्यक्त रहती हैं, इसलिये जीव उस समयके महान् दुःखको बतानेकी इच्छा होनेपर भी बता नहीं सकता और न उस दुःखके निवारणके लिये कुछ कर ही सकता है। फिर जब दाँत उठने लगता है तब उसे महान् कष्ट भोगना पड़ता है। मौल रोग (सिरदर्द), नाना प्रकारके बालरोग तथा पूतना आदि बालग्रह आदिसे भी बालकको बड़ी पीड़ा होती है। भूख-प्यासकी पीड़ासे उसके सब अंग व्याकुल रहते हैं तथा वह कहीं खाट आदिपर पड़ा हुआ रोता
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रहता है। इसके बाद जब वह कुछ बड़ा होता है, तब अक्षरोंके अध्ययन आदिसे और गुरुके शासनसे उसको महान् दुःख होता है।
युवावस्थामें रागोन्मत्त पुरुषकी सम्पूर्ण इन्द्रिय-वृत्तियाँ काम तथा रागकी पीड़ासे सदा मतवाली रहती हैं। अतः उसे भी कहाँसे सुख प्राप्त हो सकता है। मोहवश पुरुषको यदि कहीं अनुराग हो जाता है तो ईर्ष्याके कारण उसे बड़ा भारी दुःख होता है। जो उन्मत्त और क्रोधी है उसका कहीं भी राग होना केवल दुःखका ही कारण है। रातमें कामाग्निजनित खेदसे पुरुषको निद्रा नहीं आती। दिनमें भी द्रव्योपार्जनकी चिन्ता लगी रहनेके कारण उसे सुख नहीं मिल सकता। स्त्रियाँ सब दोषोंका आश्रय हैं; यह बात भलीभाँति जान लेनेपर भी जो लोग उनमें मैथुनसे सुख मानते हैं, उनका वह सुख मल-मूत्र-त्यागके सदृश ही माना गया है। सम्मान अपमानसे, प्रियजनोंका संयोग वियोगसे तथा जवानी वृद्धावस्थासे ग्रस्त है। निर्विघ्न सुख कहाँ है?
युवावस्थाका शरीर एक दिन जरा अवस्थासे जर्जर कर दिया जानेपर सम्पूर्ण कार्योंके लिये असमर्थ हो जाता है। उसके बदनमें झुर्रियाँ पड़ जाती हैं, सिरके बाल सफेद हो जाते हैं और शरीर बहुत ढीला-ढाला हो जाता है। स्त्री और पुरुषका वही रूप, जो जवानीके दिनोंमें एक-दूसरेका आधार था, जराग्रस्त हो जानेपर दोनोंमेंसे किसीको भी प्रिय नहीं लगता। बुढ़ापेसे दबा हुआ पुरुष असमर्थ होनेके कारण पत्नी-पुत्र आदि बन्धु-बान्धवों तथा दुराचारी सेवकोंद्वारा भी अपमानित होता है। वृद्धावस्थामें रोगातुर पुरुष धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका साधन करनेमें असमर्थ हो जाता है; इसलिये युवावस्थामें ही धर्मका आचरण करना चाहिये।
वात, पित्त और कफकी विषमता ही व्याधि कहलाती है। इस शरीरको वात आदिका समूह बताया गया है। इसलिये अपना यह शरीर व्याधिमय है; ऐसा जानना चाहिये। इस शरीरमें अनेक प्रकारके रोगोंद्वारा बहुतेरे दुःख प्रवेश कर जाते हैं। उनका पता अपने-आपको भी नहीं लगता, फिर दूसरोंको तो लग ही कैसे सकता है। इस देहमें एक सौ एक व्याधियाँ स्थित हैं। इनमेंसे एक व्याधि तो कालके साथ रहती है और शेष आगन्तुक मानी गयी हैं। जो आगन्तुक बतायी गयी हैं, वे तो दवा करनेसे तथा जप, होम और दानसे शान्त हो जाती हैं; परन्तु मृत्युरूप व्याधि कभी शान्त नहीं होती। नाना प्रकारकी व्याधियाँ, सर्प आदि प्राणी, विष और अभिचार (पुरश्चरण)—ये सब देहधारियोंकी मृत्युके द्वार बताये गये हैं। यदि जीवका काल आ पहुँचा है, तो सर्प और रोग आदिसे पीड़ित होनेपर उसे धन्वन्तरि भी जीवित नहीं रख सकते। कालसे पीड़ित मनुष्यको औषध, तपस्या, दान, मित्र तथा बन्धु-बान्धव—कोई भी बचा नहीं सकते। रसायन, तपस्या, जप, योग, सिद्ध-महात्मा तथा पण्डित—ये सब मिलकर भी कालजनित मृत्युको नहीं टाल सकते। समस्त प्राणियोंके लिये मृत्युके समान कोई दुःख नहीं है, मृत्युके समान कोई भय नहीं है तथा मृत्युके समान कोई त्रास नहीं है। सती भार्या, उत्तम पुत्र, श्रेष्ठ मित्र, राज्य, ऐश्वर्य और सुख—ये सभी स्नेहपाशमें बँधे हुए हैं। मृत्यु इन सबका उच्छेद कर डालती है। माँ! क्या तुम नहीं देखती कि हजारों मनुष्योंमेंसे पाँच भी शायद ही ऐसे होंगे, जो पूरे सौ वर्षोंतक जीनेवाले हों। कोई-ही-कोई अस्सी वर्ष और सत्तर वर्षकी अवस्थामें मरते हैं। प्रायः साठ वर्षतककी ही लोगोंकी परमायु हो गयी है; किंतु वह भी सबके लिये निश्चित नहीं है। जिस देहधारीको अपने पूर्वकर्मानुसार जितनी आयु प्राप्त होती है, उसका आधा भाग तो मृत्युरूपिणी रात्रि हर लेती है। बाल्यावस्था, अबोधावस्था तथा वृद्धावस्थाके
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द्वारा बीस वर्ष और व्यतीत हो जाते हैं—जो धर्म, अर्थ और काम—किसीके भी उपयोगमें नहीं आते। शेष आयुका आधा भाग मनुष्यपर आनेवाले बहुत-से भय तथा अनेक प्रकारके रोग और शोक आदि हर लेते हैं। इन सबसे जो शेष रह जाता है, वही मनुष्यका जीवन है।
इस जीवनकी समाप्ति होनेपर मनुष्य अत्यन्त भयंकर मृत्युको प्राप्त होता है। मृत्युके बाद वह पुनः करोड़ों योनियोंमें जन्म ग्रहण करता है। कर्मोंकी गणनाके अनुसार देह-भेदसे जो जीवका एक शरीरसे वियोग होता है, उसे 'मृत्यु' नाम दिया गया है, वास्तवमें उससे जीवका विनाश नहीं होता। मृत्युके समय महान् मोहको प्राप्त हुए जीवके मर्मस्थान जब विदीर्ण होने लगते हैं, उस दशामें उसे जो बड़ा भारी कष्ट भोगना पड़ता है, उसकी इस संसारमें कहीं उपमा नहीं है। जैसे साँप मेंढकको निगल जाता है, उसी प्रकार मृत्यु जब मनुष्यको निगलने लगती है, उस समय वह हा तात! हा मातः! हा कान्ते! इत्यादि रूपसे पुकारता हुआ अत्यन्त दुःखी हो-होकर रोता है। भाई-बन्धुओंसे साथ छूट रहा है, प्रेमीजन उसे चारों ओरसे घेरकर खड़े हैं। वह सूखते हुए मुखसे गरम-गरम लंबी साँस खींचता है। चारपाईपर चारों ओर बार-बार करवट बदलता है। पीड़ासे मोहित होकर बड़े वेगसे इधर-उधर हाथ फेंकता है। खाटसे भूमिपर और भूमिसे खाटपर तथा फिर भूमिपर आना चाहता है। उसके वस्त्र खुल गये हैं, लज्जा छूट चुकी है, विष्ठा और मूत्रमें सना हुआ है। कण्ठ, ओष्ठ और तालू सूख जानेके कारण बार-बार पानी माँगता है। अपने धन-वैभवके लिये इस बातकी चिन्ता करता है कि मेरे मर जानेपर ये किसके हाथमें पड़ेंगे। पुनः कालपाशसे खींचे जानेपर उसका गला घुरघुराने लगता है और पार्श्ववर्ती लोगोंके देखते-देखते मृत्युको प्राप्त हो जाता है। जैसे तृणजलौका जलमें बहते हुए तिनकेके अन्ततक पहुँचकर जब दूसरा तिनका थाम लेती है, तब पहलेको छोड़ देती है। उसी प्रकार जीव एक देहसे दूसरी देहमें क्रमशः प्रवेश करता है। भावी शरीरमें अंशतः प्रवेश करके पूर्वशरीरका त्याग करता है।
विवेकी पुरुषके लिये किसीसे कुछ माँगना मृत्युसे भी अधिक दुःखदायी होता है। मृत्युका दुःख तो क्षणभरमें समाप्त हो जाता है, परंतु याचनाजनित दुःखका कभी अन्त नहीं होता। मैंने तो इस समय यह अनुभव किया है कि मृत मनुष्य जीवित रहकर याचना करनेवालेकी अपेक्षा श्रेष्ठ है; क्योंकि अब वह फिर दूसरे किसीके सामने हाथ नहीं फैला सकता। तृष्णा ही लघुताका कारण है। आदिमें दुःख है, मध्यमें दुःख है तथा अन्तमें भी दारुण दुःख प्राप्त होता है। दुःखोंकी यह परंपरा समस्त प्राणियोंको स्वभावतः प्राप्त होती है। क्षुधाको सब रोगोंसे महान् रोग माना गया है। वह अन्नरूपी ओषधिका लेप करनेसे कुछ क्षणोंके लिये शान्त हो जाती है। क्षुधारूपी व्याधिकी तीव्र वेदना सम्पूर्ण बलका उच्छेद करनेवाली है। जैसे अन्य रोगोंसे लोग मरते हैं, उसी प्रकार क्षुधासे पीड़ित होनेपर भी मनुष्यकी मृत्यु हो जाती है। (यदि कहें धन-धान्यसम्पन्न राजा सुखी होंगे तो यह भी ठीक नहीं।) राजाको केवल यह अभिमान ही होता है कि मेरे घरमें इतना वैभव शोभा पा रहा है। वास्तवमें तो उनका सारा आभरण भाररूप है, समस्त आलेपन-द्रव्य मलमूत्र है, सम्पूर्ण संगीत-राग प्रलापमात्र है तथा नृत्य आदि भी पागलोंकी-सी चेष्टा है। विचार-दृष्टिसे देखनेपर इन राज्यभोगोंके द्वारा राजाओंको सुख कहाँ मिलता है? क्योंकि वे लोग तो एक-दूसरेको जीतनेके लिये सदा ही चिन्तित रहते हैं। प्रायः राज्यलक्ष्मीके मदसे उन्मत्त होनेके कारण नहुष आदि महाराज स्वर्गका साम्राज्य पाकर भी वहाँसे नीचे गिर गये हैं। राजलक्ष्मी अथवा धन-
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ऐश्वर्यसे भला कौन सुख पाता है? मनुष्य स्वर्गलोकमें जो पुण्यफल भोगते हैं, वह अपने मूलधनको गँवाकर ही भोगते हैं; क्योंकि वहाँ वे दूसरा नवीन कर्म नहीं कर सकते। यही स्वर्गमें अत्यन्त भयंकर दोष है। जैसे वृक्षकी जड़ काट देनेपर वह विवश होकर पृथ्वीपर गिर पड़ता है, उसी प्रकार पुण्यरूपी मूलका क्षय हो जानेपर स्वर्गवासी जीव पुनः पृथ्वीपर गिर पड़ते हैं। इस तरह विचारपूर्वक देखा जाय तो स्वर्गमें भी देवताओंको कोई सुख नहीं है। नरकमें गये हुए पापी जीवोंका दुःख तो प्रसिद्ध ही है—उनका क्या वर्णन किया जाय। स्थावर-योनिमें पड़े हुए जीवोंको भी बहुत दुःख भोगने पड़ते हैं। दावानलसे जलना, पाला पड़नेसे गलना, धूप और हवासे सूखना, कुल्हाड़ीसे काटा जाना, उनके वल्कलों (छिलकों)-का उतारा जाना, प्रचण्ड आँधीके वेगसे पत्तों, डालियों और फलोंका गिराया जाना तथा हाथियों और अन्य जंगली जन्तुओंद्वारा कुचला जाना आदि उनके लिये महान् दुःख हैं।
सर्पों और बिच्छुओंको प्यास और भूखका कष्ट रहता है, उन्हें क्रोधका भी दारुण दुःख सहन करना पड़ता है। संसारमें प्रायः दुष्ट साँप-बिच्छुओंको मारा जाता है, उन्हें जालमें फँसाकर बंद रखा जाता है। माताजी! इस प्रकार उस योनिके जीवोंको बारंबार कष्ट उठाना पड़ता है। कीड़े आदिका अकस्मात् जन्म होता है और अचानक ही उनकी मौत भी हो जाती है; अतः उनका दुःख भी कम नहीं है। मृगों और पक्षियोंको वर्षा, सर्दी और धूपका महान् कष्ट तो है ही, भूख-प्यासके भारी दुःखसे भी मृग सदा संत्रस्त रहते हैं। पशु-समूहके जो दुःख हैं, उन्हें भी सुन लो। भूख-प्यास तथा सर्दी-गरमी आदिका कष्ट सहना, मारा जाना, बन्धनमें डाला जाना और डंडे आदिसे पीटा जाना, नाकका छेदा जाना, चाबुक और अंकुशकी मार पड़ना आदि उनके महान् क्लेश हैं। इनके अतिरिक्त बोझ ढोनेका भी उन्हें बड़ा भारी कष्ट है। कार्यकी शिक्षा देते समय भी उन्हें मारा-पीटा जाता है, फिर युद्ध आदिकी पीड़ा भी सहनी पड़ती है। अपने झुंडसे जो उनका वियोग होता है और वे वनसे जो अन्यत्र लाये जाते हैं—यह सब कष्ट अलग हैं।
दुर्भिक्ष, दुर्भाग्यका प्रकोप, मूर्खता, दरिद्रता, नीच-ऊँचका भाव, मृत्यु, राष्ट्रविप्लव (एक राज्यका नाश करके दूसरे राज्यकी स्थापना), पारस्परिक अपमानका दुःख, आपसमें एक-दूसरेसे धन-वैभव या मान-प्रतिष्ठामें बढ़ जानेका कष्ट, अपनी प्रभुताका सदा स्थिर न रहना, ऊँचे चढ़े हुए लोगोंका नीचे गिराया जाना इत्यादि महान् दुःखोंसे यह सम्पूर्ण चराचर जगत् व्याप्त है। जैसे इस कंधेका भार उस कंधेपर कर देनेको मनुष्य विश्राम समझता है, उसी प्रकार इस लोकमें एक दुःख दूसरे दुःखसे ही शान्त होता है। अतः एक-दूसरेसे ऊँची स्थितिमें स्थित हुए इस सम्पूर्ण जगत्को दुःखोंसे भरा हुआ जानकर उसकी ओरसे अत्यन्त उद्विग्न हो जाना चाहिये। उद्वेगसे वैराग्य होता है, वैराग्यसे ज्ञान प्रकट होता है तथा ज्ञानसे परमात्मा विष्णुको जानकर मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर लेता है।
माँ! जैसे कौओंके अपवित्र स्थानमें विशुद्ध राजहंस नहीं रह सकता, उसी प्रकार ऐसे दुःखमय संसारमें मैं तो कभी रम नहीं सकता। मैया! जहाँ रहकर मैं बिना किसी विघ्न-बाधाके आनन्दपूर्वक रह सकता हूँ, वह स्थान भी बताता हूँ, सुनो। अविद्यारूपी वन तो बड़ा भयंकर है। उसमें नाना प्रकारके कर्ममय बड़े-बड़े वृक्ष खड़े हैं। वहाँ संकल्पोंके डाँस और मच्छर बहुत हैं। शोक और हर्ष ही वहाँकी सर्दी और धूप हैं। उस वनमें मोहका घना अन्धकार छाया रहता है। वहाँ
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लोभरूपी साँप और बिच्छू रहते हैं। विषयोंके अनेक मार्गोंसे वह प्रदेश व्याप्त है। काम और क्रोधरूपी बधिक तथा लुटेरे उसमें सदा डेरा डाले रहते हैं। उस महादुःखमय विशाल वनको लाँघकर अब मैं एक ऐसे महान् विपिनमें प्रवेश कर चुका हूँ, जहाँ पहुँचकर उसके तत्त्वको जाननेवाले ज्ञानी पुरुष न शोक करते हैं, न हर्ष। वहाँ किसीसे भय नहीं है, किसीको भी भय नहीं है। उस विद्यारूपी वनमें सात बड़े भारी वृक्ष हैं। वहाँ सात ही पर्वत हैं, जिन्होंने तीनों लोकोंको धारण कर रखा है। सात ही हृद (कुण्ड) हैं और सात ही नदियाँ हैं, जो सदा ब्रह्मरूप जल बहाया करती हैं। तेज, अभयदान, अद्रोह, कौशल (दक्षता), अचपलता, अक्रोध और प्रिय वचन बोलना—ये ही सात पर्वत उस विद्यावनमें स्थित हैं। दृढ-निश्चय, सबके साथ समता, मन और इन्द्रियोंका संयम, गुणसंचय, ममताका अभाव, तपस्या तथा सन्तोष—ये सात हृद हैं। भगवान्के गुणोंका विशेष ज्ञान होनेसे जो उनके प्रति भक्ति होती है, वह विद्या-वनकी पहली नदी है। वैराग्य दूसरी, ममताका त्याग तीसरी, भगवदाराधन चौथी, भगवदर्पण पाँचवीं, ब्रह्मैकत्वबोध छठी तथा सिद्धि सातवीं नदी है। ये ही सात नदियाँ वहाँ स्थित बतायी गयी हैं। वैकुण्ठ धामके निकट इन सातों नदियोंका संगम होता है। जो आत्मतृप्त, शान्त तथा जितेन्द्रिय होते हैं, वे ही महात्मा उस मार्गसे परात्पर ब्रह्मको प्राप्त होते हैं। कोई श्रेष्ठ ज्ञानीजन उन वृक्षोंको प्राप्त करते हैं, कोई पर्वतोंको, कोई हृदोंको तथा कोई उन सात सरिताओंको ही प्राप्त होते हैं।
माँ! मैं ग्रहण किये हुए व्रतको धारण करनेकी इच्छा रखकर यहाँ ब्रह्मचर्यका आचरण करता हूँ। इस ब्रह्मचर्यमें ब्रह्म ही समिधा, ब्रह्म ही अग्नि तथा ब्रह्म ही कुशास्तरण हैं। जल भी ब्रह्म हैं और गुरु भी ब्रह्म ही हैं—यही मेरा ब्रह्मचर्य है। विद्वान् पुरुष इसीको सूक्ष्म ब्रह्मचर्य मानते हैं। माता! अब मेरे गुरुका परिचय सुनो, जिन्होंने मुझे विद्या प्रदान की है। एक ही शिक्षक है, दूसरा कोई शिक्षक नहीं है। हृदयमें विराजमान अन्तर्यामी पुरुष ही शिक्षक होकर शिक्षा देता है। उसीसे प्रेरित होकर मैं झरनेसे बहकर जानेवाले जलकी भाँति जहाँ जिस कार्यमें नियुक्त होता हूँ, वहाँ वैसा ही करता हूँ। एक ही गुरु हैं, उनके सिवा दूसरा कोई गुरु नहीं है। जो हृदयमें विराजमान हैं, वे ही गुरु हैं, उनको मैं प्रणाम करता हूँ। उन्हीं गुरुस्वरूप भगवान् मुकुन्दकी अवहेलना करके सम्पूर्ण दानव पराभवको प्राप्त हुए हैं।* एक ही बन्धु है, उसके सिवा दूसरा बन्धु नहीं है। जो हृदयमें विराजमान है, वह परमात्मा ही बन्धु है, मैं उसे नमस्कार करता हूँ। उसीसे शिक्षा प्राप्त करके सात बन्धुमान् भाई सप्तर्षि आकाशमें प्रकाशित हो रहे हैं। ऐसे ही ब्रह्मचर्यका भलीभाँति सेवन करना चाहिये। अब मेरा गार्हस्थ्य कैसा है, यह भी सुन लो। माताजी! प्रकृति ही मेरी पत्नी है, किन्तु मैं कभी उसका चिन्तन नहीं करता; वही सदा मेरा चिन्तन किया करती है। वह मेरे सब प्रयोजनोंको सिद्ध करनेवाली है। नासिका, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कान, मन तथा बुद्धि—यह सात प्रकारकी अग्नि सदा मेरी अग्निशालामें प्रज्वलित होती रहती हैं। गन्ध, रस, रूप, शब्द, स्पर्श, मन्तव्य और बोधव्य—ये ही सात मेरी समिधाएँ हैं। होता भी नारायण हैं और ध्यानसे साक्षात् नारायण ही उपस्थित हो उस हविष्यका उपयोग भी करते हैं। ऐसे यज्ञद्वारा मैं अपनी इस गृहस्थीमें उन परमेश्वर विष्णुका यजन (आराधन) करता हूँ। किसी भी वस्तुकी कामना नहीं रखता, तथापि मेरे सम्पूर्ण काम स्वतः सिद्ध हैं। मैं
* एको गुरुर्नास्ति ततो द्वितीयो यो हृद्गतस्तमहं वै नमामि।
पञ्चावमन्यैव गुरुं मुकुन्दं पराभूता दानवास्सर्व एव॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३७। ६२)
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सांसारिक सम्पूर्ण दोषोंसे द्वेष नहीं करता, तथापि कोई भी दोष मुझमें प्रकट नहीं होता! जैसे कमलके पत्तेपर जलकी बूँदका लेप नहीं होता, उसी प्रकार मेरा स्वभाव राग-द्वेष आदिसे लिप्त नहीं होता। मैं नित्य हूँ, बहुतोंके स्वभावोंका साक्षी हूँ, अनित्य भोग मुझपर अपना प्रभाव नहीं डाल सकते। जैसे सूर्यकी किरणें आकाशमें लिप्त नहीं होतीं, वैसे ही मेरे भगवदर्थ किये गये निष्काम कर्मोंमें भोगसमूह नहीं लिप्त होते (मेरे कर्मोंका फल भोग-सामग्रीके रूपमें नहीं उपस्थित होता, वे कर्म तो भगवत्प्राप्ति करानेवाले होते हैं), माता! ऐसे मुझ पुत्रसे तुम दुःखी न होओ। मैं तुम्हें उस पदपर पहुँचाऊँगा, जहाँ सैकड़ों यज्ञ करके भी पहुँचना असम्भव है।'
अपने पुत्रकी यह बात सुनकर इतराको बड़ा विस्मय हुआ। वह सोचने लगी, 'अहो! यदि मेरा पुत्र ऐसा दृढ़निष्ठावाला विद्वान् है, तब तो संसारमें जब इसकी ख्याति होगी, उस समय मेरा भी महान् यश फैलेगा।' माता इस प्रकारकी बातें सोच ही रही थी कि शंख-चक्र-गदाधारी भगवान् विष्णु उस अर्चा-विग्रहसे साक्षात् प्रकट हो गये। वे उस द्विजपुत्रकी बातोंसे अत्यन्त प्रसन्न थे। भगवान्की दिव्य कान्ति करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान थी। वे अपनी प्रभासे सम्पूर्ण जगत्को उद्भासित कर रहे थे। भगवान्को देखते ही ऐतरेय धरतीपर दण्डकी भाँति पड़ गये। उनके शरीरमें रोमांच हो आया। नेत्रोंसे प्रेमके आँसू बहने लगे। वाणी गद्गद हो गयी। बुद्धिमान् ऐतरेयने मस्तकपर अंजलि बाँधकर भगवान्का इस प्रकार स्तवन प्रारम्भ किया—
"आप भगवान् वासुदेवका हम ध्यान और नमस्कार करते हैं। आप ही प्रद्युम्न, अनिरुद्ध तथा संकर्षण हैं, आपको नमस्कार है। आप केवल विज्ञानस्वरूप तथा परमानन्दमूर्ति हैं, आपको नमस्कार है। आप आत्माराम, शान्त तथा आप समस्त इन्द्रियोंके स्वामी (हृषीकेश) हैं, सबसे महान् तथा अनन्त शक्तियोंसे सम्पन्न हैं; आपको नमस्कार है। मनसहित वाणीके थककर निवृत्त हो जानेपर जो एकमात्र अपनी कृपासे ही सुलभ होनेवाले हैं, नाम और रूपसे रहित चैतन्यघन ही जिनका स्वरूप है, वे सत् और असत्से परे विराजमान परमात्मा हम सबकी रक्षा करें। आप परम सत्य तथा निर्मल हैं, हम आपकी उपासना करते हैं। जो षड्विध ऐश्वर्यसे युक्त परम पुरुष महानुभाव एवं समस्त महाविभूतियोंके अधिपति हैं, उन भगवान्को नमस्कार है। परमेष्ठिन्! आप सबसे उत्कृष्ट हैं, सम्पूर्ण भक्तसमुदाय आपके युगल चरणारविन्दोंकी बड़े लाड़-प्यारसे सेवा करते हैं। आपको नमस्कार है। अग्नि आपका मुख है, पृथ्वी आपके दोनों चरण हैं, आकाश मस्तक है, चन्द्रमा और सूर्य दोनों नेत्र हैं, सम्पूर्ण लोक आपका शरीर है तथा चारों दिशाएँ आपकी चार भुजाएँ हैं। भगवन्! आपको नमस्कार है। हे स्तुति करनेयोग्य परमात्मन्! हे नाथ! इस पृथ्वीपर कोई भी ऐसे प्रदेश नहीं हैं, जिनमें मेरा जन्म न हुआ हो, जहाँ मेरी मृत्यु न हुई हो। मैं समझता हूँ, यदि मेरे माता-पिताओंकी गणना की जाय, तो यह विशाल पृथ्वी परमाणुओंकी स्थितिमें पहुँच जायगी—असंख्य जन्मोंके मेरे माता-पिताओंकी गणना करनेके लिये पृथ्वीके परमाणु बराबर टुकड़े करने पड़ेंगे। देवदेव! मेरे जो मित्र, शत्रु, अनुजीवी तथा भाई-बन्धु इस संसारमें हो गये हैं, उन सबकी गणना करनेमें मैं सर्वथा असमर्थ हूँ। नाथ! मैंने अपना मन बार-बार आपके चरणोंमें समर्पित किया, परंतु मेरा दुर्जय शत्रु काम अपने क्रोध आदि सहायकोंके द्वारा उसे हठात् अपने वशमें कर लेता है। भगवन्! अब आप ही बताइये, ऐसी दशामें मैं क्या करूँ? सर्वव्यापी परमेश्वर! मैं बहुत ही पीड़ित हूँ। संसाररूपी गड्ढेमें गिरे हुए इस दीनपर आप दया कीजिये। दुर्गतिमें पड़ा