संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
कदम्बमूलमें भगवान् गोविन्द झूला झूल रहे हैं।
- वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * | ३८७ ---|---
कर्पूरयुक्त सुगन्धित चूर्ण, अबीर, गुलाल आदि सब ओर बिखेरे। फिर दिव्य वस्त्र, दिव्य माल्य, दिव्य गन्ध और उत्तम धूप निवेदन करके चँवर डुलाने, गीत गाने और स्तुति-पाठ करने आदिके द्वारा भगवान्की पूजा करके धीरे-धीरे सात बार डोलामें विराजमान भगवान्को झुलावे। उस समय जो लोग भगवान् श्रीकृष्णजीके विग्रहका दर्शन करते हैं, उनकी निःसन्देह मुक्ति होती है और उनके ब्रह्महत्या आदि पाँच महापातकोंका भी नाश हो जाता है। हिंडोलेमें झूलते हुए भगवान्का दर्शन करके मनुष्य सम्पूर्ण पापों और आध्यात्मिक आदि तीनों तापोंसे भी छूट जाता है।
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भगवान्की द्वादशादित्य मूर्तियोंकी उपासना, दक्षके द्वारा भगवान्की आराधना और वर-प्राप्ति तथा विभिन्न विभूतियोंके रूपमें भगवान्की उपासनाका फल
जैमिनिजी कहते हैं—ब्राह्मणो! अनादिदेव भगवान् विष्णुकी जो बारह मूर्तियाँ हैं, उनका प्रतिमास पूजन करे। उनमेंसे एक-एक मूर्तिकी एक-एक मासमें प्रतिदिन पूजा करते हुए बारह महीनोंमें बारह मूर्तियोंकी पूजा सम्पन्न होती है। क्रमशः बारह पुष्पों और बारह फलोंसे पूजन करना चाहिये। अशोक, मल्लिका (बेला), पाटल, कदम्ब, कनेर, चमेली, मालती, शतदलकमल, नीलकमल, वासन्ती, कुन्द और पुन्नाग—इन पुष्पोंको भगवान्की प्रसन्नताके लिये क्रमशः एक-एक मासमें अर्पण करना चाहिये। अनार, नारियल, आम, कटहल, खजूर, ताल, प्राचीन आँवला, श्रीफल, नारंगी, सुपारी, करौदा और जायफल—इन बारह फलोंको भी क्रमशः एक-एक मासमें देना चाहिये। भक्ष्य, भोज्य, चोष्य, लेह्य और मधुर भोजन तथा आसन आदि उपचार समर्पित करके जगद्गुरु भगवान्की स्तुति करे—'हे सर्वव्यापी जगन्नाथ! आप भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों कालोंके स्वामी हैं। कमलनयन विष्णो! आप संसारसागरसे मेरी रक्षा कीजिये। मधुसूदन! आपने पूर्वकालमें अत्यन्त भयंकर तथा अवलम्बनरहित एकार्णवके जलमें सम्पूर्ण विश्वकी रक्षाके लिये मधु नामक दैत्यका वध किया था। इस समय मेरी रक्षा कीजिये। त्रिविक्रम! जिन्होंने तीन पग चलकर तीनों लोकोंको नाप लिया और दैत्योंकी विशाल सेनाका वध करके त्रिभुवनकी रक्षा की, उन आपके लिये नमस्कार है। जिन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदका ज्ञान अपने भीतर लिये हुए वामनरूप धारण करके अद्भुत रूपसे सबको मोहित कर लिया, उन मायावी भगवान् विष्णुको नमस्कार है। जो भक्तोंके लिये ही अपने हृदयमें लक्ष्मीजीको धारण करते हैं और उन्हें सम्पत्ति देते हैं, उन भगवान् श्रीधरको नमस्कार है। हृषीकेश! आप समस्त इन्द्रियोंके अधिष्ठाता, सबके स्वामी और सदा भक्तोंके सुखके एकमात्र हेतु हैं, आपको नमस्कार है। पद्मनाभ! आपके नाभिकमलसे यह चराचर जगत् उत्पन्न हुआ है। वह कमल ही विधाताका आसन है। आपको नमस्कार है। जिनके तीन गुणोंसे यह चराचर जगत् बँधा हुआ है, उन्हींको गोपीने अपने दाम (रस्सी)-से बाँध लिया, इसलिये दामोदर नाम धारण करनेवाले प्रभो! आपको नमस्कार है। जो जगत्के आदिकारण हैं और जिन्होंने ब्रह्माजीके रूपसे सम्पूर्ण भूतोंकी सृष्टि की, उन अचिन्त्य महिमावाले आप सर्वव्यापी नारायणको नमस्कार है। गोविन्द! आप ज्ञानियोंके लिये ज्ञानगम्य हैं और अशरणको शरण देनेवाले हैं, आपके प्रसादसे मेरा यह व्रत सम्पूर्ण हो।'
इस प्रकार प्रतिमास पूजाके अन्तमें इन स्तुतियोंद्वारा
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अतिशय भक्तिके साथ हाथ जोड़कर भगवान् जनार्दनकी प्रार्थना करनी चाहिये।
ब्राह्मणो! प्राचीन कालमें प्रजापति दक्षने मनुष्योंको आध्यात्मिक आदि पापोंसे अत्यन्त क्लेश उठाते देख वैशाख मासके शुक्ल पक्षमें तृतीयाको जगन्नाथजीके अंगमें चन्दनका लेप करके प्रसन्नतापूर्वक इस प्रकार स्तवन किया था—'देवदेव जगन्नाथ! आप सहज आनन्दसे परिपूर्ण एवं निर्मल हैं। परमेश्वर! संसारसागरमें डूबे हुए हम दुःखीयोंका उद्धार कीजिये। ये मनुष्य नाना प्रकारके संतापोंसे संतप्त हो रहे हैं। हे कृष्णमेघ! मुझपर कृपा करनेकी बुद्धिसे अपनी शुभ दृष्टिमयी सुधाधारासे इन सबको तृप्त कीजिये। जगदीश्वर! कलियुगके पापसे मोहित हुए मनुष्योंका उद्धार करनेके लिये ही इस नीलाचल-गुफामें आपका यह अवतार हुआ है। जय कृष्ण! जय ईशान! जय अक्षर! जय अविनाशी परमेश्वर! आप प्रसन्न होइये और इन दीन, मूढ एवं अज्ञानी मनुष्योंपर कृपा कीजिये।'
इस प्रकार स्तुति करके 'हे ईश्वर! प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये' ऐसा कहते हुए दक्ष प्रजापतिने जगन्नाथजीके चरणारविन्दोंमें दण्डवत्-प्रणाम किया। तब भगवान्ने स्पष्ट वाणीमें प्रजापतिसे कहा—'वत्स! उठो, मैंने तुम्हें दुर्लभ वर प्रदान किया। तुम्हारी जो अभिलाषा है, वह मेरे प्रसादसे निःसन्देह पूर्ण होगी। यह तो तुम जानते ही हो कि अल्प पुण्यवाले प्राणियोंको मेरा अनुग्रह दुर्लभ है, परंतु मेरे उत्सवसे मुझे सन्तुष्ट करके तुमने मेरी प्रार्थना की है, इसलिये मैं तुम्हें यह वर देता हूँ—'जो मनुष्य भक्तिपूर्वक अक्षय तृतीयाको इस अक्षय यात्राका दर्शन करते हैं, वे उस समय मनमें जो इच्छा करते हैं, उसीको प्राप्त कर लेते हैं।' जैसे चन्दनका लेप तापको हर लेता है, वैसे ही मेरा यह उत्सव तीनों तापोंका विनाश करनेवाला है। मैंने तुम्हारी बुद्धिको प्रेरित किया है, इसीलिये तुमने इस उत्सवको सम्पन्न किया है। मैंने दीनोंका उद्धार करनेके लिये मन-ही-मन यह संकल्प किया था, उसीके अनुसार तुम इस कार्यमें प्रवृत्त हुए हो। प्रजापते! तुमने जो अभिलाषा की है, वह सब मैं पूर्ण करूँगा। ये गुण्डिचा आदि बारह महायात्राएँ पवित्र करनेवाली मानी गयी हैं। इनमेंसे एक-एक यात्रा मुक्ति देनेवाली है और सब यात्राएँ तो धर्म, काम, अर्थ, मोक्ष चारों पुरुषार्थोंको प्राप्त करानेवाली हैं। जो भक्तिपूर्वक इनमेंसे एक यात्राका भी दर्शन करता है, वह उसी एकसे भवसागरको पार करके भगवान् विष्णुके धाममें जाता है।'
प्रजापति दक्षसे ऐसा कहकर भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये। तब श्रद्धालु दक्ष प्रजापतिने भगवान्की आज्ञासे एक वर्षतक नीलाचलपर निवास करके वहाँके सब बड़े-बड़े उत्सवोंका दर्शन किया। जो अल्पबुद्धिवाले मनुष्य हैं, उनमें भी भगवत् विश्वास बढ़ानेके लिये ये यात्राएँ बतायी गयी हैं। जिस किसी प्रकार भी जगन्नाथजीका दर्शन करनेपर वे निश्चय ही मोक्ष प्रदान करते हैं।
इस संसारमें जो समस्त चराचर विभूतियाँ हैं, वे सब भगवान् विष्णुकी ही हैं। विभूति
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और उसके दाता वे एक ही परमेश्वर हैं। जो मनुष्य जिस भावसे भगवान्की सेवा करता है, वह वैसा ही हो जाता है। भगवान्की इतनी ही महिमा है, इस प्रकार उसका माप नहीं किया जा सकता। जो जिस भावसे भगवान्की उपासना करता है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष— इन चारों पुरुषार्थोंकी प्राप्तिके लिये एक ही मार्ग है— दारुब्रह्म जगन्नाथजीकी उपासना। धर्मके स्वरूपका यथार्थ निश्चय करनेमें कोई भी समर्थ नहीं है। भगवान् विष्णु ही धर्म हैं। ये जनार्दन ही धर्म और जगत् दोनोंके स्वामी हैं। वे ही चतुर्विध पुरुषार्थस्वरूप हैं। उनमें जिसकी भक्ति स्थिर हो गयी है, वह सम्पूर्ण कामनाओंसे तृप्त होकर न कभी शोक करता है और न आकाङ्क्षा। इन्द्ररूपसे उपासना किये जानेपर वे ही भगवान् विष्णु त्रिलोकीका ऐश्वर्य प्रदान करते हैं। ब्रह्माजीके रूपमें ध्यान किये जानेपर वंशकी वृद्धि करते हैं, सनत्कुमारके रूपमें इनका चिन्तन किया जाय तो ये दीर्घ आयु प्रदान करते हैं। राजा पृथुके रूपमें भावना करनेपर जीविका और सम्पत्ति प्रदान करते हैं, बृहस्पतिके रूपमें भगवान्की उपासना की जाय तो वे गंगा आदि तीर्थोंका फल देते हैं। सूर्यरूपसे चिन्तन करनेपर वे अन्तःकरणके अज्ञानान्धकारका नाश करते हैं। चन्द्रमाके रूपमें श्रीहरिकी उपासना की जाय तो वे अनुपम सौभाग्य देते हैं। भगवान् वाणीके अधिपति हैं, इस रूपमें भावना करनेपर मनुष्य अष्टादश विद्याओंका तत्त्वज्ञ होता है। यज्ञेश्वर-स्वरूपमें चिन्तन करनेपर जगन्मय सनातन भगवान् अश्वमेध आदि यज्ञोंका फल देते हैं। कुबेररूपमें ध्यान किया जाय तो भगवान् अनुपम समृद्धि प्रदान करते हैं। इस प्रकार दीनों और अनाथोंपर अनुग्रह करनेके लिये दयासागर भगवान् काष्ठमय शरीर धारण करके नीलगिरिपर निवास करते हैं। ब्राह्मणो! तुम सब लोग वहाँ जाओ, एकाग्रचित्त होकर निवास करो और भगवान् लक्ष्मीपतिके युगल चरणारविन्दोंकी शरण लो।
## राजा इन्द्रद्युम्नका ब्रह्मलोकगमन, पुराण-श्रवणकी विधि और ग्रन्थका उपसंहार
मुनियोंने पूछा— भगवन्! विष्णुभक्त राजा इन्द्रद्युम्नने मन्दिरकी प्रतिष्ठाके पश्चात् कौन-सा कार्य किया?
जैमिनिजी बोले— साक्षात् ब्रह्मस्वरूप जगन्नाथजीसे वरदान पाकर नरश्रेष्ठ इन्द्रद्युम्नने अपनेको कृतार्थ माना। भगवान्की आज्ञाके अनुसार उन्होंने पुण्य एवं मोक्ष प्रदान करनेवाली सम्पूर्ण यात्राएँ करवायीं। अनेक प्रकारके उपचारोंसे जगद्गुरु श्रीहरिकी नाना प्रकारसे पूजा की और राजा गाल श्वेतको भगवान्की आज्ञा भलीभाँति समझाकर धर्म और न्यायसे युक्त यह वचन कहा— 'राजन्! तुम बहुश्रुत विद्वान् हो, धर्ममें तुम्हारी निष्ठा है, भगवान्में भी मन, वाणी और क्रियाद्वारा तुम्हारी बड़ी भक्ति है। भगवान् श्रीहरि किसी एकके उपदेशके लिये अनुशासन नहीं करते हैं, ये समस्त चराचरके गुरु हैं और सम्पूर्ण विश्व इनका शिष्य है। मुझपर अनुग्रह करनेके लक्ष्यसे अवतीर्ण हुए भगवान् जगन्नाथ यहाँ दीन-दुःखियोंके उद्धारके लिये सदैव निवास करेंगे। तुम भक्ति और श्रद्धाके साथ इनकी आज्ञाके पालनमें लगे रहो। ये साधारण काष्ठकी प्रतिमा हैं— ऐसी व्यावहारिक बुद्धिसे इन्हें न देखो, ये साक्षात् जगदीश्वर हैं। इनके मन्दिर-प्रवेश-कालमें तीनों लोकोंके निवासी इस पृथ्वीपर
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आ गये थे, यह तो तुमने प्रत्यक्ष देखा है। ब्रह्मा आदि सब देवता एक ही साथ यहाँ पधारे थे। काष्ठस्वरूप धारण करनेवाले ये साक्षात् चराचरमय विष्णु हैं। इन्हें पृथ्वीपर प्राप्त कल्पवृक्ष समझो। ये सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाले हैं। इनकी उपासना करके जो जैसी कामना रखता है, वैसा फल प्राप्त कर लेता है। ये अन्धकारसे परे अनिर्वचनीय ज्योतिस्वरूप हैं। यतिजन बहुधा प्रयत्न करके भी इन्हें यथार्थरूपसे नहीं जान पाते। नैष्ठिक ब्रह्मचर्यका पालन करनेवाले, शुद्ध धर्मनिष्ठ यतियों तथा अनन्यभक्तिसे युक्त योगियोंके एक ही मार्ग भगवान् श्रीहरि हैं। जैसे संतप्त मनुष्य ग्रीष्म-ऋतुमें शीतल एवं गहरे जलाशयमें गोता लगाकर बड़े सन्तोषका अनुभव करता है उसी प्रकार इन करुणासागर भगवान् पुरुषोत्तमके प्राप्त होनेपर मनुष्य त्रिविध तापजनित दुःखको त्याग देता है। शरणमें आये हुए दीनजनोंका जैसा उपकार ये भगवान् विष्णु करते हैं, वैसा माता, पिता, मित्र, पत्नी और पुत्र कोई भी नहीं कर सकता। अतः भोग और मोक्ष दोनों फलोंको देनेवाले इन जगदीश्वरका तुम सेवन करो और पुरवासियों तथा प्रजाओंके द्वारा भगवान्की विभिन्न यात्राओंको भलीभाँति सम्पन्न करते रहो। नृपश्रेष्ठ! सभी राजाओंके लिये धर्मका मार्ग एक-सा ही है। किसी पूर्वपुरुषने उसे चलाया है और पीछे होनेवाले लोग उसका पालन करते हैं। राजेन्द्र! श्रेष्ठ उपचारों और समृद्धियोंद्वारा तीनों समय भगवान् नृसिंहका भजन-पूजन करो, इससे तुम्हें परम शान्ति प्राप्त होगी। अपनी कृतिकी अपेक्षा दूसरेकी कृतिका संरक्षण करना श्रेष्ठ बताया गया है। जो दूसरेके दिये हुए दानकी रक्षा करता है, उसके लिये वह अपने दिये हुए दानसे उत्तम है।'
यह सुनकर नृपश्रेष्ठ श्वेतने राजा इन्द्रद्युम्नके आदेशको गुणयुक्त मालाकी भाँति शिरोधार्य किया। राजर्षि इन्द्रद्युम्न भी भगवान् पुरुषोत्तमको प्रसन्न करके नारदजीके साथ ब्रह्मलोक चले गये।
ब्राह्मणो! यह मैंने तुमसे पुरुषोत्तमक्षेत्रके उत्तम माहात्म्यका वर्णन किया। वहाँ नित्य निवास करनेवाले दारुब्रह्म जगन्नाथजीके माहात्म्यको जो भक्तिपूर्वक श्रवण करता है, उसे अनेक अश्वमेध यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। स्वामिकार्तिकेयजीके बताये हुए अर्द्धोदययोगकी अपेक्षा इस विष्णु-माहात्म्यके कीर्तनका पुण्य अधिक है। जो प्रतिदिन प्रातःकाल इसको सुनता है उसके लिये यह धन, यश, आयु, पुण्य तथा सन्तानकी वृद्धि करनेवाला है। स्वर्गमें प्रतिष्ठारूप फल देता और सब पापोंका नाश करता है।
पुराण-श्रवणके आरम्भमें अपने वैभवके अनुसार तैयारी करनी चाहिये। पहले संकल्प करके पुराण-पाठ श्रवण करनेके लिये अति सुन्दर आभूषणों तथा वस्त्र, चन्दन और माला आदिके द्वारा विधिपूर्वक ब्राह्मणका वरण करे। वह ब्राह्मण शुद्ध कुलमें उत्पन्न हो, किसी अंगसे हीन न हो, शान्त स्वभाववाला हो, अपनी ही शाखाको माननेवाला और अपना पुरोहित हो तथा सब शास्त्रोंके अर्थको यथार्थरूपसे जाननेवाला हो। वरण किये हुए ब्राह्मणको उत्तम आसनपर बिठाकर उसके गलेमें माला पहना दे और मस्तकपर भी पुष्पगर्भ माला रखे। चन्दनसे ब्राह्मणके ललाटमें लेप करे। उस समय वह ब्राह्मण व्यासके समान मान्य होता है। उसी ब्राह्मणके द्वारा विष्णुस्वरूप पुस्तकपर श्रीखण्ड, अगरु आदि पुष्पों और नाना प्रकारके रुचिर उपचारोंसे व्यास-पूजन करावे। कथा सुननेके लिये आने-जानेवाले लोगोंके बैठनेके निमित्त यथायोग्य आसन बनवाकर रखे। स्वयं उत्तम आसनपर बैठकर उत्कण्ठित चित्तसे कथा सुने
- वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३९१
अथवा झाड़-बुहारकर शुद्ध किये हुए स्थानमें सबके साथ बैठे। व्यासके आगे ऊँचे आसनपर न बैठे। स्नान करके दो शुद्ध वस्त्र धारण करे। आचमन करके शरीरमें यथास्थान तिलक करे और प्रसन्नतापूर्वक मनसे भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए कथामें विश्वास करे। पुराण, ब्राह्मण, देवता, मन्त्र, कर्म, तीर्थ तथा बड़े-बूढ़ोंके वचनमें विश्वास फलदायक होता है। सब पुण्य विश्वासका कारण है। पुराण-श्रवणके समय पाखण्डी आदिसे बातचीत, व्यर्थकी बकवाद और सब प्रकारकी चिन्ताओंका प्रयत्नपूर्वक त्याग करे। इसी विधिसे प्रतिदिन प्रसन्नतापूर्वक कथा सुने। पाठ समाप्त होनेपर बारंबार करताल आदि बजाकर 'जय कृष्ण! जगन्नाथ! हरे!' इत्यादि नामोंका कीर्तन करे। कीर्तन इतने उच्चस्वरसे होना चाहिये कि आकाशमें उसकी ध्वनि गूँज उठे। इस प्रकार भगवान् विष्णुकी प्रीति के लिये प्रतिदिन कीर्तन करना चाहिये। तदनन्तर ग्रन्थ समाप्त होनेपर भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके लिये बड़ी भक्तिके साथ वस्त्र, माला, चन्दन और आभूषण आदिकी विशेष व्यवस्था करके व्याससदृश माननीय आचार्यको विभूषित करे और अपनी शक्तिके अनुसार विधिपूर्वक दक्षिणा दे। दक्षिणा ऐसी देनी चाहिये जिससे आचार्यको सन्तोष हो जाय। शान्तिकर्म, पौष्टिककर्म, व्रतबन्ध, विवाह आदि कर्म, मोक्षसाधक कर्म, पुराण-श्रवण, यज्ञादिका अनुष्ठान, दान और अनेक प्रकारके व्रत—ये यदि दक्षिणाहीन हों तो निष्फल हो जाते हैं। तत्पश्चात् यथाशक्ति तैयार कराये हुए अन्नसे ब्राह्मणोंको भोजन करावे। मुनिवरो! इस प्रकार तुमलोगोंसे पुराण-श्रवणकी यह सांगोपांग विधि बतायी गयी।
मुनि बोले—अहो! हमारा महान् सौभाग्य है कि पापराशिका विनाश करनेवाला यह पुराण-श्रवणका फल हमने आपके मुखारविन्दसे सुना। मुने! इस समय इसके फलकी प्राप्तिके लिये हम आपको यथाशक्ति दक्षिणा देते हैं, इसे आप प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण करें। यह कह उन अकिंचन मुनियोंने समिधा, कुशा, फूल, फल और अक्षत आदि जैमिनिजीको देकर बड़े हर्षके साथ पुरुषोत्तमक्षेत्रको प्रस्थान किया।
॥ उत्कलखण्ड या पुरुषोत्तमक्षेत्र-माहात्म्य संपूर्ण ॥
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बदरिकाश्रम-माहात्म्य
## सब तीर्थोंका संक्षिप्त माहात्म्य तथा बदरीक्षेत्रकी विस्तृत महिमाका उपक्रम
**शौनकजी बोले—**समस्त धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ और सम्पूर्ण शास्त्रोंके तत्त्वज्ञ पुराणपरिनिष्ठित सूतजी ! सब धर्मोंसे रहित भयंकर कलियुग प्राप्त होनेपर मनुष्य दुष्कर्ममें प्रवृत्त हो सब धर्मोंका त्याग कर देते हैं, उनकी आयु बहुत थोड़ी होती है, उनकी प्राणशक्ति, बल, पराक्रम, तपस्या और कर्मानुष्ठान सब अत्यन्त क्षीण हो जाते हैं। वे सब अधर्मपरायण और वेदशास्त्रसे दूर होते हैं; तीर्थयात्रा, तपस्या, दान और भगवान् विष्णुकी भक्तिका उनमें अभाव-सा होता है। ऐसे क्षुद्र मनुष्योंका थोड़े प्रयाससे किस प्रकार उद्धार हो सकता है ?
**सूतजी बोले—**महाभाग शौनक ! तुम्हें साधुवाद है, तुम सदा दूसरोंके हितमें तत्पर रहते हो, भगवान् विष्णुकी भक्तिमें आसक्त होनेके कारण तुम्हारे मनका मल धुल गया है। संसारमें साधुपुरुषोंका संग दुर्लभ है। वह देहाभिमानी अजितात्मा पुरुषोंकी संचित पापराशिको हर लेता है और अधिक पुण्यके कारण उन्हें उत्तम गति प्रदान करता है। तीनों लोकोंके मनुष्योंके लिये सत्संग दुर्लभ है, वह कर्मपाशसे पीड़ित मनुष्योंकी हृदय-ग्रन्थि (आन्तरिक बन्धन)-को दूर करता है, बहुत कम बोलनेवाले और एकमात्र भगवान्का भजन करनेवाले लोगोंको उच्चपद प्रदान करता है और जन्म-मृत्युके चक्रसे थके हुए मानवोंको चिर-विश्रामकी प्राप्ति करानेका कारण होता है\*। शौनकजी ! यही प्रश्न पूर्वकालमें परम सुन्दर कैलाश-पर्वतके शिखरपर श्रोता ऋषियोंके समक्ष सत्पुरुषोंका कल्याण करनेके लिये स्वामिकार्तिकेयजीने भगवान् शंकरके आगे उपस्थित किया था।
**तब श्रीमहादेवजीने कहा—**षडानन ! परमार्थके पथपर चलनेवाले पुरुषोंको वैकुण्ठधामका निवास प्रदान करनेवाले बहुत-से तीर्थ और क्षेत्र हैं। कोई कामनाके अनुसार फल देनेवाले हैं और कोई मोक्षदायक हैं। गंगा, गोदावरी, नर्मदा, तपती, यमुना, क्षिप्रा, पुण्यमयी गौतमी, कौशिकी, कावेरी, ताम्रपर्णी, चन्द्रभागा, महेन्द्रजा, चित्रोत्पला, वेत्रवती, सरयू, चर्मण्वती, शतद्रु, पयस्विनी, गण्डकी, बाहुदा, सिन्धु और सरस्वती—ये सब पवित्र नदियाँ हैं और बार-बार सेवन करनेपर भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाली हैं। अयोध्या, द्वारका, काशी, मथुरा, अवन्ती, कुरुक्षेत्र, रामतीर्थ, कांची, पुरुषोत्तमक्षेत्र, पुष्करक्षेत्र, दर्दुरक्षेत्र, वाराहक्षेत्र तथा बदरी नामक महापुण्यमय क्षेत्र, जो सब मनोरथोंका साधक है, ये सभी उत्तम तीर्थ हैं। मुक्तिकी एक साधन अयोध्यापुरीका विधिपूर्वक दर्शन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके धाममें जाते हैं। भाँति-भाँतिसे भगवान् विष्णुकी सेवापूर्वक पूजन, नृत्य और कीर्तन
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\* हरति हृदयबन्धं कर्मपाशार्दितानां वितरति पदमुच्चैरल्पजल्पैकभाजाम्।
जननमरणकर्मश्रान्तविश्रान्तिहेतुस्त्रिजगति मनुजानां दुर्लभः सत्प्रसंगः॥
(स्क० पु० वै० बद० १। १२)
- वैष्णवखण्ड-बदरिकाश्रम-माहात्म्य * ३९३
करनेवाले पुरुष घर त्यागकर श्रीहरिका चिन्तन करनेसे गृहकी आसक्ति तथा मृत्युके पराक्रमपर विजय पा जाते हैं। द्वारकामें साक्षात् भगवान् श्रीहरि विराजमान हैं, वे अपने निवास-मन्दिरको कभी नहीं छोड़ते। षडानन ! गोमतीमें स्नान करके भगवान् श्रीकृष्णके मुखारविन्दका दर्शन करनेसे बिना ज्ञानके ही मनुष्यकी मुक्ति हो जाती है।
असी और वरुणाके बीचमें पाँच कोसतक वाराणसीक्षेत्र है। वहाँ मणिकर्णिका, ज्ञानवापी, विष्णुपादोदक और पंचनद कुण्ड (पंचगंगा)-में स्नान करके मनुष्य पुनः माताके स्तनोंका दूध नहीं पीता है। किसी प्रसंगसे भी काशीमें विश्वनाथजीका दर्शन करके मनुष्यको जन्म-मृत्युरहित मुक्ति प्राप्त होती है। कार्तिकेय ! तपस्या और उपवासमें लगा हुआ मनुष्य मथुरापुरीमें जन्मस्थानपर जाकर सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। विश्रामतीर्थमें विधिपूर्वक स्नान करके तिलसहित जलसे तर्पण करे तो मनुष्य अपने पितरोंका नरकसे उद्धार करके स्वयं विष्णुलोकको जाता है। अवन्तीपुरीमें वैशाखमास आनेपर मनुष्य क्षिप्राके जलमें विधिपूर्वक स्नान करके कोटि तीर्थमें गोता लगावे और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन कराकर महाकालेश्वर शिवका दर्शन करे तो सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। कुरुक्षेत्र तथा रामतीर्थमें सूर्यग्रहणके अवसरपर यथाशक्ति सुवर्णदान करनेसे मनुष्य मोक्षका भागी होता है। हरिक्षेत्रमें पादोदक तीर्थके जलमें स्नान करके श्रीहरिका दर्शन करनेसे पुरुष सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके साथ आनन्द भोगता है। विष्णुकांचीमें साक्षात् भगवान् विष्णु और शिवकांचीमें साक्षात् भगवान् शिव निवास करते हैं। दोनोंमें कोई भेद न होनेके कारण दोनोंकी ही भक्तिसे मुक्ति हाथमें आ जाती है, भेदबुद्धि पैदा करनेसे मनुष्योंकी निन्दित गति होती है। पुरुषोत्तमक्षेत्रमें मार्कण्डेय-सरोवरके जलमें स्नान करके एक बार जगन्नाथजीका दर्शन कर लेनेसे मनुष्य ज्ञान अथवा योगके बिना भी पुनः माताके स्तनोंका दूध नहीं पीता। रोहिणिक्षेत्रके अन्तर्गत समुद्रमें तथा इन्द्रद्युम्न-सरोवरमें स्नान करके भगवान् विष्णुके प्रसादको खाकर मनुष्य वैकुण्ठधाममें स्थान पाता है। कार्तिकी पूर्णिमाको पुष्करतीर्थमें स्नान करके दक्षिणासहित श्राद्ध एवं भक्तिपूर्वक ब्राह्मण-भोजन कराकर मनुष्य ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है। माघ मासमें भक्तिभावसे त्रिवेणीसंगममें स्नान करके मनुष्य उस पुण्यको प्राप्त करता है, जो बदरीतीर्थके कीर्तनसे प्राप्त होता है।
भगवान् विष्णुका बदरी नामक क्षेत्र तीनों लोकोंमें दुर्लभ है, उसके स्मरणमात्रसे महापातकी मनुष्य भी तत्काल पापरहित होकर मृत्युके पश्चात् मोक्षके भागी होते हैं। स्वर्ग, पृथ्वी तथा रसातलमें बहुत-से तीर्थ हैं, परंतु बदरी तीर्थके समान दूसरा कोई तीर्थ न हुआ है, न होगा। कार्तिकेय ! तप, योग और समाधिसे तथा सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह बदरीक्षेत्रके भलीभाँति दर्शनमात्रसे मिल जाता है।
बदरीक्षेत्रकी महिमा—अग्निदेवके सर्वभक्षणरूप दोषका निवारण
स्कन्दने पूछा—यह क्षेत्र कैसे उत्पन्न हुआ ? किन लोगोंने इसका सेवन किया है तथा इस क्षेत्रके अधिपति कौन हैं? यह सब बातें मुझे विस्तारपूर्वक बताइये।
३९४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
भगवान् शिवने कहा—यह बदरीक्षेत्र अनादिसिद्ध है। जैसे वेद भगवान्के शरीर हैं, उसी प्रकार यह भी है। इस क्षेत्रके अधिपति साक्षात् भगवान् नारायण हैं। नारद आदि महर्षियोंने इस तीर्थका सेवन किया है। काशीमें, श्रीपर्वतके शिखरपर तथा कैलाशमें पार्वतीसहित मेरी जैसी प्रीति है उससे अनन्तगुनी अधिक बदरीक्षेत्रमें है। अन्य तीर्थोंमें स्वधर्मका विधिपूर्वक पालन करते हुए मृत्यु होनेसे मुक्ति होती है; परंतु बदरीक्षेत्रके दर्शनमात्रसे ही मुक्ति मनुष्योंके हाथ आ जाती है। जहाँ भगवान् नारायणके चरणोंका सान्निध्य है, जहाँ साक्षात् अग्निदेवका निवास है और केदाररूपसे मेरा लिंग प्रतिष्ठित है, वह सब बदरीक्षेत्रके अन्तर्गत है। केदारके दर्शन, स्पर्श तथा भक्तिभावसे पूजन करनेपर कोटि-कोटि जन्मोंका पाप तत्काल भस्म हो जाता है। उस क्षेत्रमें विशेषतः मैं अपनी सम्पूर्ण कलासे स्थित रहता हूँ। वहाँ मेरे श्रीविग्रहमें पंद्रहों कलाएँ विद्यमान हैं। वहाँ कोमल कमलकी-सी कान्तिसे सुशोभित मुखकमलवाले शिवभक्त दोनों हाथ जोड़े मुझ महादेवकी ओर ही दृष्टि लगाये प्रदोषकालमें मेरी ही उपासना करते हैं। हाथमें जपमाल तथा मनमें शान्ति और सन्तोष धारण किये प्रतिदिन मेरी वन्दना और प्रार्थना करनेवाले मेरे भक्त सदा मेरे चरणोंके चिन्तनसे विज्ञानस्वरूप हो हृदयस्थित कामको नष्ट करके सर्वतोभावसे निरन्तर मेरा भजन करते हैं। काशीमें मरे हुए पुरुषोंको तारकब्रह्म मुक्ति देनेवाला होता है, परंतु केदारक्षेत्रमें मेरे लिंगके पूजनसे मनुष्योंकी मुक्ति हो जाती है। श्रीनारायणके चरणोंके समीप प्रकाशमान अग्नितीर्थका तथा मेरे केदारसंज्ञक महालिंगका दर्शन करके मनुष्य पुनर्जन्मका भागी नहीं होता।
पूर्वकालमें ऊर्ध्वरेता (नैष्ठिक ब्रह्मचर्यका पालन करनेवाले) ऋषियोंका समुदाय प्रयागमें एकत्र हुआ था। जहाँ भगवती गंगा यमुनाके साथ मिली हैं और जहाँ त्रिभुवनविख्यात दशाश्वमेध नामक तीर्थ है, वहाँ भगवान् अग्निदेवने ऋषियोंके आगे उपस्थित हो विनीतभावसे पूछा—'आपलोगोंकी एक दृष्टि और एक ज्ञान है; आप सभी ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, दीनोंके लिये करुणासे भरे हुए आर्द्रहृदय और दयालु हैं। आप लोगोंको यहाँ उपस्थित देखकर मैं पूछता हूँ—सब प्रकारकी दूषित वस्तुओंके भक्षणजनक पातकसे मेरा अन्तःकरण लिप्त हो गया है। ब्रह्मज्ञानियो! बताइये मेरा उद्धार कैसे होगा?'
इतनेमें ही सब मुनियोंमें श्रेष्ठ व्यासजी गंगामें स्नान करके वहाँ आ पहुँचे और इस प्रकार बोले—'अग्निदेव! आपके सर्वभक्षणरूप पापकी निवृत्तिके लिये एक श्रेष्ठ उपाय है। आप बदरीक्षेत्रकी शरण लीजिये, जहाँ देवताओंके देवता साक्षात् भगवान् जनार्दन विराजमान हैं, जो सबके पापोंका नाश करनेवाले हैं। वहाँ गंगाजीके जलमें स्नान करके भगवान्की परिक्रमा और दण्डवत्-प्रणाम करनेसे सब पापोंका क्षय हो जाता है।'
तब अग्निदेव उत्तराभिमुख होकर गन्धमादन-पर्वतपर आये और बदरीतीर्थमें पहुँचकर गंगाजीके
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जलमें स्नान करके भगवान् नारायणके आश्रमपर गये। वहाँ भगवान्को प्रणाम करके उन्होंने भक्तिपूर्वक स्तवन किया। 'जो विशुद्ध विज्ञानघन-स्वरूप पुराणपुरुष सनातन प्रजापतियोंके पति, सबके गुरु, एक होते हुए भी अनेक रूपोंको धारण करनेवाले और सम्पूर्ण जगत्के एकमात्र स्वामी हैं, शेषनागकी शय्यापर शयन करनेवाले उन शुद्धबुद्धि नारायणको मैं नमस्कार करता हूँ। जो अपनी मायामयी शक्तिका आश्रय लेकर संसारकी सृष्टि करनेके उद्देश्यसे रजोगुणसे युक्त ब्रह्माका रूप धारण करते हैं, सत्त्वगुणसे युक्त होकर इस जगत्की रक्षामें कारण बनते हैं और तमोगुणसे संयुक्त हो इस विश्वके भयंकर संहारकारी रुद्र बने हुए हैं, उन त्रिविध रूपधारी भगवान्की मैं स्तुति करता हूँ। जो अविद्यासे मोहितचित्त सम्पूर्ण विश्वके रूपमें प्रकट हुआ है और विद्यासे समस्त त्रिलोकीमें एक ही रूपसे व्याप्त हो रहा है, विद्याका आश्रय लेनेसे जिसे सर्वज्ञ और ईश्वर कहते हैं, उस परमेश्वरकी मैं शरण लेता हूँ। जिन्होंने भक्तोंकी इच्छासे अपने दिव्य स्वरूपको प्रकट किया है, योगनिद्राको स्वीकार करके शेषनागकी विशाल शय्यापर अपनेको अर्पित कर रखा है, जो रेशमी पीताम्बर धारण करते हैं और आठ प्रकारकी विचित्र शक्तियोंसे सम्पन्न हैं, उन भगवान् विष्णुकी मैं स्तुति करता हूँ।'
इस प्रकार स्तुति किये जानेपर सर्वान्तर्यामी भगवान् नारायण प्रसन्न होकर पवित्रताकी इच्छा रखनेवाले अग्निदेवसे मधुर वाणीमें बोले—'अनघ! तुम्हारा कल्याण हो, तुम कोई वर माँगो। मैं तुम्हें वर देनेके लिये आया हूँ। मैं तुम्हारी इस स्तुति और विनयसे बहुत प्रसन्न हूँ।'
अग्नि बोले—प्रभो! मैं जिस उद्देश्यसे आया हूँ वह सब आपको ज्ञात है। तथापि कहता हूँ और इस रूपमें आप जगदीश्वरकी आज्ञाका पालन करता हूँ। मुझे सर्वभक्षी तो होना ही पड़ता है, किंतु मेरे इस दोषका निवारण कैसे हो, यही सोचकर मुझे अत्यन्त भय हो रहा है।
भगवान् नारायणने कहा—इस क्षेत्रका दर्शन करनेमात्रसे किसी भी प्राणीका पाप नहीं रह जाता। मेरे प्रसादसे तुममें कभी पातकका सम्पर्क न होगा।
तबसे लेकर सब दोषोंसे रहित भूतात्मा अग्निदेव यहाँ अपनी कलासे विराजमान हैं। जो प्रातःकाल उठकर पवित्र भावसे इस प्रसंगको सुनता और सुनाता है, वह निश्चय ही अग्नितीर्थमें स्नान करनेका फल पाता है।
बदरीक्षेत्रकी पाँच शिलाओंमेंसे नारदशिला और मार्कण्डेयशिलाका माहात्म्य
महादेवजी कहते हैं—स्कन्द ! जो महापातकी और अतिपातकी हैं, वे भी अग्नितीर्थमें स्नान करनेमात्रसे पवित्र हो जाते हैं। जैसे अत्यन्त मलिन सोना आगमें तपानेसे शुद्ध हो जाता है, उसी प्रकार देहधारी प्राणी अग्नितीर्थमें आकर पापमुक्त हो जाता है। जो पाँच प्रकारके महापातक करनेवाले हैं, वे भी इस तीर्थमें स्नान करके प्राणायाम और जप करनेसे शुद्ध हो जाते हैं, ऐसा मेरा मत है। यहाँ जो पाँच शिलाएँ हैं, उनमें सदा भगवान् विष्णुकी स्थिति है, वहींपर सब पापोंका नाश करनेवाला अग्नितीर्थ है।
स्कन्दने पूछा—पिताजी! वहाँ कैसी पाँच शिलाएँ हैं और किसने उनका निर्माण किया है? ये सब बातें पूर्णतः बतलानेकी कृपा करें।
भगवान् शिवने कहा—बेटा! वहाँ नारदी, नारसिंही, वाराही, गारुड़ी और मार्कण्डेयी—
३९६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
ये पाँच शिलाएँ विख्यात हैं, जो सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि करनेवाली हैं। एक समय भगवान् नारदने एक शिलापर बैठकर वायु पीकर रहते हुए महाविष्णुका दर्शन करनेके लिये अत्यन्त कठोर तपस्या की। वे साठ हजार वर्षोंतक वृक्षकी भाँति स्थिरभावसे उस शिलापर विराजमान रहे। तदनन्तर भगवान् विष्णु ब्राह्मणका रूप धारण करके कृपापूर्वक उनके सामने गये और उन मुनिश्रेष्ठ नारदसे इस प्रकार बोले—'मुने! बताओ, तुम क्या चाहते हो?'
नारदजीने कहा—आप कौन हैं? इस निर्जन वनमें आपके दर्शनसे मेरे मनमें बड़ी प्रसन्नता हो रही है।
नारदजीके ऐसा कहनेपर भगवान् विष्णुने कृपा करके उन्हें अपने दिव्य स्वरूपका दर्शन कराया। उनके हाथोंमें शंख, चक्र, गदा आदि आयुध शोभा पा रहे थे। वे पीताम्बरसे सुशोभित और कमलोंकी मालासे विभूषित थे। लक्ष्मीका निर्मल निवासभूत भगवान्का वक्ष श्रीवत्सचिह्न तथा कौस्तुभमणिकी प्रभासे प्रकाशमान था। सुनन्द आदि पार्षद भगवान् जनार्दनकी स्तुति कर रहे थे। उन्हें देखकर नारदजीके शरीरमें नूतन प्राण-सा आ गया। वे सहसा खड़े हो गये और हाथ जोड़कर बार-बार नमस्कार करते हुए जगदीश्वरोंके भी ईश्वर श्रीविष्णुकी स्तुति करने लगे—'जो सबके साक्षी और सम्पूर्ण जगत्के अधीश्वर हैं, जिन्होंने भक्तोंकी इच्छासे दिव्य देह धारण किया है, जो शरणागतोंके लिये दयाके महासागर हैं, वे पावन दिव्यमूर्तिधारी भगवान् श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों। जो सम्पूर्ण जगत्के हितके लिये और साधुपुरुषोंके मनको सन्तुष्ट और उनका कल्याण करनेके लिये शीघ्र ही अपनी उत्तम कलाओंद्द्वारा दिव्य देह धारणकर प्रसन्नतापूर्वक दिव्यलीला और हास्यपूर्ण दृष्टि प्रकट करते हैं, सत्त्वगुणका समुदाय ही जिनका स्वरूप है, वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों। जिनके चरणारविन्दोंका अर्चन करनेसे निर्मल चित्त हुए मनुष्य ज्ञानरूपी खड्गसे संसारबन्धनके मूल हेतुओंको काट डालते हैं और खेदरहित हो जिनके स्वरूपभूत ब्रह्मानन्दकी उपलब्धि कर लेते हैं, दीनोंपर दयार्द्रचित्त रहनेवाले वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों। जिनका अनुसरण करनेवाले देवता विपत्तियोंके समुद्रको भी बछड़ेके खुरके समान लाँघकर निर्भय हो स्वर्गमें निवास करते हैं, वे सर्वभूतात्मा हैं। प्रभो! आप वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्धस्वरूप विष्णुको बार-बार नमस्कार है। जनार्दन! आज आपके दर्शनसे मेरा जीवन धन्य हो गया, मेरी तपस्या फलवती हुई और मेरा ज्ञान भी सफल हो गया।'
श्रीभगवान् बोले—नारद! तुम्हारी इस तपस्या और स्तुतिसे मैं प्रसन्न हूँ। तीनों लोकोंमें तुमसे बढ़कर दूसरा कोई मेरा भक्त नहीं है। तुम्हारा कल्याण हो, तुम कोई वर माँगो।
नारदजीने कहा—देव! यदि आप मुझे वर देते हैं तो एक तो अपने चरणकमलोंमें अविचल भक्ति दीजिये। मेरी शिलाके समीप रहना आप कभी न छोड़िये, यह दूसरा वर है; और मेरे इस तीर्थके दर्शन, स्पर्श, स्नान और आचमन करनेवाला मनुष्य पुनः संसारमें शरीर न धारण करे, यह मेरा तीसरा वर है।
श्रीभगवान् बोले—'एवमस्तु'। मैं तुम्हारे स्नेहवश समस्त चराचर जीवोंको मुक्ति देनेके लिये तुम्हारे तीर्थमें निवास करूँगा।
ऐसा कहकर भगवान् विष्णु वहीं अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर नारदजी भी कुछ दिनोंतक बदरीक्षेत्रमें निवास करके मथुरापुरीको चले गये।
स्कन्दने कहा—भगवन्! अब मुझे मार्कण्डेय-शिलाकी महिमा बताइये।
भगवान् शिव बोले—पहले त्रेतायुगके अन्तमें मार्कण्डेयजी तीर्थयात्राका परिश्रम उठाते हुए मथुरामें आये। वहाँ उन्हें नारदजीका दर्शन हुआ। मार्कण्डेयजीने
- वैष्णवखण्ड-बदरिकाश्रम-माहात्म्य * ३९७
नारदजीका पूजन और उन्हें प्रणाम किया। तब उन्होंने जहाँ साक्षात् नारायण विद्यमान हैं, उस बदरीक्षेत्रका माहात्म्य इस प्रकार बताया—'साधो! बदरीतीर्थ महाक्षेत्र है, वहाँ भगवान् विष्णुका नित्यनिवास है। तुम वहीं जाओ वहाँ तुम्हें साक्षात् श्रीहरिका दर्शन होगा।' यह सुनकर मार्कण्डेयजीको बड़ा विस्मय हुआ। वे विशालापुरी (बदरिकाश्रम)-में आये और वहाँ स्नान करके शिलापर बैठकर परम उत्तम अष्टाक्षर (ॐ नमो नारायणाय) मन्त्रका जप करने लगे। तीन राततक जप करनेके बाद भगवान् जनार्दन उनपर प्रसन्न हुए और उन्हें शंख, चक्र, गदा, पद्म और वनमाला आदिसे विभूषित स्वरूपका दर्शन कराया। उन्हें देखकर मार्कण्डेयजी सहसा उठे और प्रणाम करके प्रेमसे गद्गदवाणीमें उनकी स्तुति करने लगे।
मार्कण्डेयजी बोले—परमेश्वर! इस अशाश्वत (क्षणभंगुर) संसारमें आपके युगल चरणारविन्द ही सार हैं। संसारी मनुष्योंका उद्धार कैसे हो? अच्युत! मैं आध्यात्मिक आदि तीनों तापोंसे अत्यन्त थका हुआ हूँ, अनेक प्रकारके बढ़े हुए अज्ञानसे आच्छादित होकर संसाररूपी कुहरेमें भटक रहा हूँ, कृपया मेरा उद्धार कीजिये। करुणासागर! अनेक प्रकारके योनियन्त्रोंमें दबकर निकलनेसे प्राप्त हुई गर्भवासजनित शारीरिक वेदनाको मैं कितनी ही बार पा चुका हूँ, अब मेरी रक्षा कीजिये। जरा, मृत्यु और बाल्यावस्था आदिके दुःखोंसे भरे हुए संसारसे मैं बहुत पीड़ित हूँ तथापि इस दुःखके समुद्रमें मेरी सुखबुद्धि हो रही है; दयासिन्धो! मेरी रक्षा कीजिये। कभी मैं कीटयोनिमें पड़ा, कभी स्वेदज जीवके रूपमें जन्म लिया, कभी उद्भिज्ज योनिमें आया और कभी सौभाग्यवश मनुष्य-शरीरको भी प्राप्त हुआ। सब योनियोंमें जन्म लेकर विपत्ति भोग चुका हूँ, अब सर्वथा निस्तेज और अनाथ हूँ। अच्युत! कृपा करके अपनी शरणमें आये हुए मुझ सेवकका उद्धार कीजिये।
बुद्धिमान् मार्कण्डेयजीके द्वारा ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीविष्णुने प्रसन्न होकर कहा—'ब्रह्मर्षे! मुझसे कोई वर माँगो।' मार्कण्डेयजीने कहा—'भगवन्! दीनवत्सल! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो अपने पूजन और दर्शनमें मुझे अविचल भक्ति दीजिये। साथ ही, मैं चाहता हूँ इस शिलापर आपका निवास बराबर बना रहे। यही मेरे लिये वर है।' 'बहुत अच्छा' कहकर भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर मार्कण्डेयजी अत्यन्त प्रसन्न हो अपने पिताके आश्रमपर चले गये। जो मनुष्य इस प्रसंगको सुनता और सुनाता है, उसे भगवान् गोविन्दकी प्राप्ति होती है।
## गरुड़शिला, वाराहीशिला और नारसिंहीशिलाकी उत्पत्ति और महिमा
भगवान् शिव कहते हैं—कश्यपजीसे विनताके गर्भसे दो महाबली और महापराक्रमी पुत्र हुए, जिनका नाम था गरुड़ और अरुण। इनमेंसे अरुण तो सूर्यके सारथि हुए और गरुड़ने भगवान् विष्णुका वाहन होनेकी अभिलाषासे बदरीक्षेत्रके दक्षिण भागमें गन्धमादनके शिखरपर तपस्या प्रारम्भ की। वे फल-मूल और जलका आहार करते, द्वन्द्वोंको धैर्यपूर्वक सहते और जप करनेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ होकर एक पैरसे पृथ्वीपर खड़े हो जप करते थे। भगवान्के दर्शनकी लालसासे उन्होंने बहुत वर्षोंतक तपस्या की। तब साक्षात् भगवान् विष्णु पीताम्बर धारण करके अपने शंख, चक्र आदि आयुधोंसे युक्त हो, पूर्व दिशामें उदित होनेवाले पूर्ण चन्द्रमाकी भाँति गरुड़के सामने प्रकट हुए और मेघके समान गम्भीर शब्द करते हुए बोले। तथापि गरुड़की बाह्य वृत्ति नहीं हुई। तब उन्होंने अपना श्रेष्ठ शंख बजाया, पर उससे भी
३९८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
महात्मा गरुड़का ध्यान नहीं टूटा। तब भगवान् श्वासके साथ गरुड़के भीतर प्रवेश करके उनमें बहिर्मुखवृत्ति पैदा करते हुए पुनः बाहर आकर प्रकट हो गये। उस समय भगवान् विष्णुको अपने सामने देखकर गरुड़ निर्भय हो गये। उनके सम्पूर्ण शरीरमें रोमांच हो आया और उन्होंने हाथ जोड़कर भगवान्की स्तुति प्रारम्भ की—'भगवन्! तीनों लोकोंमें निवास करनेवाले देहधारियोंका अन्तःकरण आपका निवासस्थान है, आपकी जय हो, जय हो। आप अपने गुणोंसे समग्र पापराशिका विनाश करते हैं, सम्पूर्ण देहवृन्द आपके युगल चरणारविन्दोंकी मनोहर सुगन्धका अभिवन्दन करते हैं, आप असंख्य शत्रुओंके समूहका विनाश करनेवाले हैं। आपके सिंहासनपर जो कमल है, वह प्रणाम करनेवाले समस्त देवताओं और असुरोंके अतिशय प्रकाशमान कोटि-कोटि किरीटोंसे सुशोभित होता है। आप अपने भक्तोंके हृदयमें फैली हुई अज्ञानमय अनन्त अन्धकारराशिका चन्द्रमाकी भाँति निवारण करते हैं। आपके मनोहर चरण आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक तीनों प्रकारके सन्तापसमूहका अपहरण करनेवाले हैं। संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और संहाररूपी लीलाविलाससे विलसित जो आपकी ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूपी त्रिविध मूर्ति है, उसकी कीर्तिमयी प्रभासे सम्पूर्ण जगत्समुदाय प्रकाशित होता है, ठीक उसी प्रकार, जैसे सूर्य अपनी किरणोंसे समस्त विश्वको प्रकाशित करते हैं। आप अपने भक्तजनोंके हृदयकमलमें भ्रमरकी भाँति शोभा पाते हैं। अपने ज्ञानमें आयी हुई सम्पूर्ण वेदविद्यासे आपका मानस सदैव प्रकाशमान रहता है। जो मुनिजन आपके भक्त हैं, वे आपके चरणोंकी सदा वन्दना किया करते हैं तथा आपके चरणनखोंके प्रक्षालनसे प्रकट हुई गंगाके जलसे अपनेको पवित्र करनेवाले देवता और मुनि आपकी चरणरेणुको हृदयसे प्रणाम करते हैं और उसीको आपकी प्रसन्नताका सार मानते हैं। जगदीश्वर! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। जो आठ शक्तियोंके साथ विराजमान हैं, जिनके गलेमें वनमाला शोभा दे रही है, जो पीताम्बर और पुष्पोंकी मालासे शोभायमान हैं, जिनके चरण कमलवनसे सुशोभित होते हैं तथा जिनकी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ सतत सावधान रहती हैं वे भगवान् विष्णु मेरी रक्षा करें! चल, अचल, त्रिविध तापकी शान्तिके लिये जो चन्द्रमाके समान हैं, देदीप्यमान सूर्यके सदृश जिनकी कान्ति है, जिन्होंने एक होकर भी अनेक रूप धारण कर रखे हैं, वे परम बुद्धिमान् श्रीहरि मेरी रक्षा करें। जो भक्तोंके चिन्तनके लिये नूतन अवताररूप धारण किया करते हैं, जो वैदिकमार्गमें चलनेवालोंका अनेक प्रकारसे हित किया करते हैं, जिन परमेश्वरकी यही (लोकहित साधन) रीति है तथा जो समस्त गुणोंसे शोभा पाते हैं, प्रेम और भक्तिसे सम्पन्न पुरुषोंको ही जिनकी उपलब्धि होती है और अपने सेवकोंको देखनेमात्रसे ही जिनके हृदयमें करुणा उमड़ आती है, वे भगवान् विष्णु समस्त संसारकी रक्षा करें। ये ही भगवान् अपने हाथमें दण्ड लेकर स्वेच्छाचारी मनुष्योंका यमराजकी भाँति शासन करते हैं और ये ही अपने बताये हुए नियमोंमें संलग्न रहनेवाले महापुरुषोंका पालन करनेके लिये सदा अनुकूल बनकर शोभा पाते हैं। ये भगवान् श्रीहरि हमारे सम्पूर्ण दुःखोंका निवारण करनेवाले हों।'
महात्मा गरुड़के इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् विष्णुने वहाँ त्रिपथगामिनी गंगाको बुलाया। तब उस पर्वतके ऊपर साक्षात् पंचमुखी गंगा प्रकट हुईं। उन्हींके जलसे गरुड़जीने भगवान्को पाद्यार्घ्य दिया। फिर वर माँगनेके लिये भगवान्के प्रेरित करनेपर गरुड़जीने कहा—'भगवन्! मैं एकमात्र
- वैष्णवखण्ड-बदरिकाश्रम-माहात्म्य * ३९९
आपका वाहन होऊँ और आपके प्रसादसे देवता और दैत्योंमेंसे कोई भी बल, वीर्य एवं पराक्रमद्वारा मुझे जीत न सके। यह शिला मेरे नामसे विख्यात होकर समस्त पापोंका अपहरण करनेवाली हो तथा इसके स्मरणसे मनुष्योंको कभी विषजनित व्याधि न हो।' तदनन्तर 'बहुत अच्छा' कहकर भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये।
स्कन्दने कहा—भगवन्! अब वाराहीशिलाका माहात्म्य बतलाइये।
भगवान् शिव बोले—रसातलसे पृथ्वीका उद्धार करके और युद्धमें हिरण्याक्ष नामक दैत्यको मारकर भगवान् वाराह बदरीक्षेत्रमें आये तथा प्रलयकालकी समाप्तितक वहीं बने रहे। वाराहजीने शिलाके रूपमें ही वहाँ निवास किया।
स्कन्दने कहा—प्रभो! अब नारसिंहीशिलाका माहात्म्य कहिये।
भगवान् शिव बोले—भगवान् नृसिंह अपने नखोंके अग्रभागसे ही लीलापूर्वक हिरण्यकशिपुका वध करके प्रलयकालकी अग्निके समान उद्दीप्त दिखायी देने लगे। तब दयालु देवताओंने आकर और दूर ही खड़े रहकर लीलासे अवतार-विग्रह धारण करनेवाले भगवान् विष्णुका स्तवन किया। तब अपने तेजसे समस्त देवताओं और असुरोंको भी व्याप्त करनेवाले भयानक पराक्रमी नृसिंहजी प्रसन्न होकर बोले—'देवताओ! तुमलोग मुझसे कोई वर माँगो जो तुम्हारी शान्ति और सुखका एकमात्र साधन हो।' उस समय देवताओंके स्वामी ब्रह्माजीने कहा—'भगवान् नृसिंह! आपका यह अत्यन्त उग्ररूप समस्त देहधारियोंको भयभीत करनेवाला है, अतः इसको समेट लीजिये।' उनकी प्रार्थनाके अनुसार दिव्य रूप धारण करके भगवान्ने फिर कहा—'देवताओ! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ, बोलो तुम्हारा कौन-सा कार्य करूँ?' देवता बोले—'हमारा अभीष्ट वर यही है कि आप मनको प्रसन्न करनेवाले परम शान्त चतुर्भुजरूपसे ही हमें दर्शन दिया करें।' तब भगवान् उन्हें दिव्यदृष्टिसे देखकर विशालापुरी (बदरिकाश्रम)-को चले गये। तदनन्तर देवताओंका भय शान्त हो गया और उन्होंने जलके मध्यमें विराजमान भगवान् विष्णुका दर्शन, नमस्कार और परिक्रमा करके उन्हींमें अपना मन लगाकर अपने-अपने लोकको प्रस्थान किया। तत्पश्चात् अतिशय भक्तिभारसे नम्र तपस्वी ऋषि आये और अत्यन्त अद्भुत पराक्रमवाले भगवान् नृसिंहका दर्शन करके उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगे—'सम्पूर्ण विश्वके स्वामी जगदीश्वर! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। विश्वको अभय प्रदान करनेवाले विश्वमूर्ते! आप कृपाके समुद्र हैं, आपके चरणकमल सेवन करनेयोग्य तीर्थरूप हैं। लक्ष्मीपते! हमपर दया कीजिये। भक्तकी इच्छाके अनुसार विचित्र शरीर धारण करनेवाले विश्वमुख! विश्वभावन! आप प्रसन्न होइये।' तब भगवान् नृसिंहने प्रसन्न होकर ऋषियोंसे कहा—'वर माँगो।' ऋषि बोले—'जगदीश्वर! यदि आप प्रसन्न हों तो कृपा करके कभी बदरीक्षेत्रका त्याग न करें, यही हमारा अभीष्ट वर है।' भगवान्ने 'एवमस्तु' कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। उसके बाद सब ऋषि अपने-अपने आश्रमको चले गये और भगवान् नृसिंह भी शिलारूप हो गये। जो तीन उपवास करके वहाँ भगवान् नृसिंहके जप और ध्यानमें तत्पर होता है, वह साक्षात् नृसिंहरूपधारी भगवान्का दर्शन पाता है। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक इस प्रसंगको सुनता और सुनाता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो वैकुण्ठमें निवास करता है।
$\sim\sim\circ\sim\sim$
४०० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
बदरीक्षेत्र और वहाँ भगवान्के प्रसाद-ग्रहणकी विशेष महिमा
स्कन्दने पूछा—प्रभो! भगवान् विष्णु वहाँ किसलिये निवास करते हैं? उनके दर्शन और स्पर्श आदिसे किस पुण्य और किस फलकी प्राप्ति होती है?
भगवान् शिव बोले—पहले सत्ययुगके आदिमें भगवान् विष्णु सब प्राणियोंका हित करनेके लिये मूर्तिमान् होकर रहते थे। त्रेतायुगमें ऋषिगणोंको केवल योगाभ्याससे दृष्टिगोचर होते थे। द्वापर आनेपर भगवान् सर्वथा दुर्लभ हो गये, उनका दर्शन कठिन हो गया। तब देवता और मुनि बृहस्पतिजीको आगे करके ब्रह्माजीके लोकमें गये और उन्हें प्रणाम करके बोले—‘पितामह! आपको नमस्कार है। आप समस्त जगत्के आश्रय और शरणागतोंके दुःख दूर करनेवाले हैं। सुरेश्वर! आपका हृदय करुणासे भरा हुआ है। जबसे द्वापर आया है, विशाल बुद्धिवाले भगवान् विष्णु विशालापुरी (बदरिकाश्रम)-में नहीं दिखायी देते हैं। इसका क्या कारण है, बतलाइये?’
ब्रह्माजी बोले—देवताओ! मैं इस बातको नहीं जानता। आज तुम्हारे ही मुँहसे इसको सुना है। आओ, हमलोग क्षीरसमुद्रके तटपर चलें।
ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर देवता और तपोधन मुनि उन्हें आगे करके गये और क्षीरसागरपर पहुँचकर विचित्र पद एवं अर्थवाली वाणीद्वारा देवाधिदेव जगदीश्वर विष्णुकी स्तुति करने लगे। ब्रह्माजी बोले—‘समस्त प्राणियोंकी हृदयगुफामें निवास करनेवाले पुरुषाध्यक्ष! आपको नमस्कार है। वासुदेव! आप सबके आधार हैं, संसारकी उत्पत्तिके कारण हैं और यह समस्त जगत् आपका स्वरूप है। आप ही सम्पूर्ण भूतोंके हेतु, पति और आश्रय हैं। एकमात्र सुन्दर पुरुषोत्तम! आप अपनी मायाशक्तिका आश्रय लेकर विचरते हैं। आप एक होकर भी अनेक रूपोंमें व्यक्त होते हैं, सर्वत्र व्यापक होनेपर भी दयावश भक्तोंके हृदयकमलमें भ्रमरकी भाँति विराजते हैं और उन्हें नाना प्रकारसे आनन्द देते हैं, आप जगदीश्वर विष्णुको मैं प्रणाम करता हूँ। जिनके नामोंकी सुधाका रस एक बार भी पी लेनेपर मनुष्य मोक्षसुखको तिनकेकी भाँति ठुकरा देता है, उन भगवान् विष्णुका मैं भजन करता हूँ।’
इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् विष्णु क्षीरसागरसे ऊपर उठे। उन्हें केवल ब्रह्माजी देख सके, अन्य लोगोंने न तो उन्हें देखा और न जाना ही। भगवान्ने जो कुछ कहा, उसे ब्रह्माजीने सुना और भगवान्को प्रणाम करके देवताओंको समझाया—‘देवताओ! सब लोगोंकी बुद्धि खोटी हो गयी, यह देखकर भगवान् उनकी दृष्टिसे छिप गये हैं।’ यह सुनकर सब देवता स्वर्गलोकको चले गये। तब मैंने संन्यासीका रूप धारण करके नारदतीर्थसे भगवान् विष्णुको उठाया और समस्त लोकोंके हितकी इच्छासे विशालापुरीमें स्थापित कर दिया। उनके दर्शनमात्रसे बड़े-बड़े पातक क्षणभरमें नष्ट हो जाते हैं। षडानन! बदरीतीर्थके स्वामी भगवान् श्रीहरिका दर्शन करके मनुष्य धर्म और अधर्मपर विजय पाकर अनायास ही मोक्ष पा जाते हैं। बदरीतीर्थमें साक्षात् भगवान् नारायण निवास करते हैं। कलिकालको पाकर जिन्हें मोक्ष प्राप्त करनेकी इच्छा हो, उन्हें बदरीक्षेत्रका दर्शन अवश्य करना चाहिये; क्योंकि वहाँ ज्ञान और योगसाधनके बिना ही केवल एक जन्ममें मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर लेता है। जैसे दीपकको देखनेसे अन्धकारकी बाधा नहीं रहती, वैसे ही बदरीक्षेत्रका दर्शन कर लेनेपर मनुष्यको जन्म-मृत्युका भय नहीं रह सकता। भगवान् बदरीनाथको मैं प्रणाम करता हूँ। बदरीक्षेत्रमें पग-पगपर भगवान्
* वैष्णवखण्ड-बदरिकाश्रम-माहात्म्य * ४०१
विष्णुकी प्रदक्षिणा होती है। षडानन! बदरीक्षेत्रमें भगवान् विष्णुके प्रसादका एक दाना भी मिल जाय तो वह भोजन करनेपर समस्त पापोंको उसी प्रकार शुद्ध करता है जैसे भूसीकी आग सोनेको तपाकर शुद्ध करती है। भगवान् विष्णु नारद आदि ऋषियोंके साथ जिस अन्नको ग्रहण करते हैं वह प्रसाद अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये सबको बिना विचारे भोजन करना चाहिये। भगवान्का प्रसाद ग्रहण करनेके लिये देवता भी बदरीक्षेत्रमें आते हैं और भगवान्के भोजन कर लेनेके बाद प्रसाद लेकर अपने लोकको लौट जाते हैं। इसी प्रकार प्रह्लाद आदि भक्त वह प्रसाद लेकर भगवान्के धाममें जाते हैं। बचपन, जवानी और बुढ़ापेमें जान-बूझकर भी जो पाप किया गया है वह बदरीक्षेत्रमें जाकर भगवान् विष्णुका प्रसाद भक्षण करनेपर नष्ट हो जाता है। जिस पापके लिये प्राणोंका अन्त कर देना ही प्रायश्चित्त बतलाया गया है वह भी बदरीक्षेत्रमें भगवान् विष्णुका प्रसाद खानेसे निवृत्त हो जाता है। बदरीक्षेत्रमें भगवान् विष्णुका प्रसाद भक्षण करनेसे मनुष्य भगवान्की सालोक्य मुक्तिको पाता है। जिसके हृदयमें भगवान् विष्णुका रूप, मुखमें भगवान्का नाम, पेटमें श्रीहरिका प्रसाद और मस्तकपर निर्माल्यसहित भगवान्का चरणामृत है, वह विष्णुस्वरूप ही है। ब्रह्महत्या, मदिरापान, चोरी और गुरुपत्नीगमन—ये महापाप बदरीक्षेत्रमें भगवान् विष्णुका प्रसाद ग्रहण करनेसे नष्ट हो जाते हैं। पृथ्वीमें जो तीर्थ, व्रत और नियम हैं, उनसे भी शीघ्र बदरीक्षेत्रमें भगवान्का चरणामृत पवित्र करनेवाला है। यदि बदरीक्षेत्रमें मनुष्यको एक बूँद भी भगवान्का चरणामृत मिल जाय तो उसको क्या दुर्लभ है? प्रायश्चित्त तभीतक गर्जना करते हैं जबतक बदरीक्षेत्रमें भगवान्का चरणामृत नहीं मिल जाता है। जिन मनुष्योंको अनायास ही मोक्षके मार्गपर जानेकी इच्छा हो, उन्हें प्रयत्नपूर्वक बदरीक्षेत्रमें भगवान् विष्णुके प्रसादका भक्षण करना चाहिये। जो मनुष्य बदरीक्षेत्रमें दिये हुए दानको ग्रहण करते हैं वे पापी जन्म-मरणरूप संसारके भागी होते हैं। उनको कभी यात्राका फल नहीं मिलता। बदरीक्षेत्रमें संन्यासियोंको भोजन देनेसे अपराधी भी भगवान्को प्रिय हो जाता है। विष्णुके समान कोई देवता नहीं, विशालाके समान कोई पुरी नहीं, संन्यासीके समान कोई सेवाका पात्र नहीं और ऋषितीर्थ (बदरीक्षेत्र)-के समान कोई तीर्थ नहीं है*। संन्यासियोंको यहाँ विशेष फलकी प्राप्ति बतायी गयी है। दस बार वेदान्तश्रवणसे जो पुण्य कहा गया है, वह बदरीतीर्थके दर्शनमात्रसे संन्यासियोंको प्राप्त हो जाता है। ज्ञानी, अज्ञानी, संन्यासी अथवा व्रतपरायण सभी पुरुषोंको अभीष्ट फलकी प्राप्तिके लिये बदरीक्षेत्रका अवश्य दर्शन करना चाहिये।
कपालतीर्थ, ब्रह्मतीर्थ और वसुधारातीर्थकी महिमा
स्कन्द बोले— महेश्वर! जहाँ आपके हाथसे कपाल गिरा है, कृपया उस तीर्थका माहात्म्य बतलाइये।
भगवान् शिवने कहा— वत्स! वह अत्यन्त गोपनीय तीर्थ है। देवता और असुर सभी वहाँ मस्तक झुकाते हैं। ब्रह्महत्यारा मनुष्य भी वहाँ स्नान करनेमात्रसे शुद्ध हो जाता है। पापमोचन कपालतीर्थमें पाँच तीर्थ हैं। उनमें किया हुआ स्नान, तप और दान सब अक्षय होता है। वहाँ विधिपूर्वक पिण्डदान देकर पितरोंको नरकसे
* न विष्णुसदृशो देवो न विशालासमा पुरी। न भिक्षुसदृशं पात्रमृषितीर्थसमं न हि॥ (स्क० पु० वै० ब० ५। ५८)
४०२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
उद्धार करे। यह पितृतीर्थ कहा गया है। वहाँ तिलसे तर्पण करनेपर पितर उत्तम स्वर्गलोकको जाते हैं। जो मनुष्य एकाग्रचित्त हो स्थिरतापूर्वक वहाँ एक दिन और एक रात जपमें लगा रहता है, उसके महान् मनोरथकी सिद्धि तत्काल हो जाती है। स्वामिकार्तिकेयने पूछा—पिताजी! ब्रह्मतीर्थ कहाँ है और उसका कैसा फल बताया गया है? भगवान् शिवने कहा—एक समय भगवान् विष्णुकी नाभिसे निकले हुए कमलपर प्रजापति ब्रह्माजी विराजमान थे। उसी समय मधु और कैटभ नामक दैत्य ब्रह्माजीसे वेदोंको चुराकर चल दिये। तब ब्रह्माजीने भगवान् विष्णुके द्वारा प्रतिपालित बदरीतीर्थमें आकर उन्हें प्रणाम किया और उन सनातन भगवान्की स्तुति की। तब भगवान् श्रीहरि हयग्रीव अवतार धारण करके एक कुण्डसे प्रकट हुए। उनके हाथोंमें शंख, चक्र आदि आयुध शोभा पा रहे थे। उनकी कटिमें पीताम्बर सुशोभित था। श्रीअंगोंकी कान्ति श्वेत थी। वे चार भुजाधारी भगवान् हयग्रीव दर्पपूर्ण दृष्टिसे सब ओर देख रहे थे। उनका स्वरूप अद्भुत था, नेत्रोंसे कठोरता प्रकट हो रही थी। उनकी गर्दनके चंचल बालोंसे टकराकर मेघोंकी घटा छिन्न-भिन्न हो जाती थी। वे अपने दिव्य तेजसे समस्त ज्योतिर्मय ग्रहोंकी प्रभाको तिरस्कृत कर रहे थे। भगवान् बड़ी कृपा करके इस अद्भुत रूपमें ब्रह्माजीके आगे खड़े हुए। उन्हें देखकर ब्रह्माजीभी आश्चर्यचकित हो उठे। उनके नेत्रोंमें प्रसन्नता छा गयी और वे प्रणाम करके भगवान्की स्तुति करने लगे। ब्रह्माजी बोले—जिनकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ है, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है। लक्ष्मीजीके आश्रयभूत नारायण! आपको नमस्कार है। लक्ष्मीनिकास! विशाल वनमाला धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। विज्ञानस्वरूप! आपको नमस्कार है। सबकी हृदयगुफामें निवास करनेवाले आपको नमस्कार है। जो समस्त इन्द्रियोंके स्वामी और परम शान्त हैं उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है। अपने भक्तोंकी रक्षाके लिये शरीर धारण करनेवाले भगवान् शार्ङ्गपाणिको नमस्कार है। अनन्त क्लेशोंका नाश करनेवाले गदाधारी ब्रह्मको नमस्कार है। संसारकी विविध असार वस्तुओंसे निवृत्त करनेके लिये कर्म करनेवाले भगवान्को नमस्कार है। समस्त जीवोंके रक्षक विजयशील विष्णुको नमस्कार है। विश्वम्भर! समस्त गुणवृत्तियोंसे निवृत्त होनेवाले आपको नमस्कार है। देवताओं और असुरोंके श्रेष्ठतम अवलम्बन! सांसारिक विषयोंसे निवृत्ति और समस्त विश्वकी रक्षा—ये दोनों आपकी कीर्तियाँ हैं। आपको नमस्कार है। सबके हृदयमें रहनेवाले सर्वज्ञ महेश्वर श्रीविष्णुकी ब्रह्माजीने जब इस प्रकार स्तुति की, तब वे शीघ्र ही वहाँ गये और उन दोनों दैत्योंको बाँधकर उन्होंने लीलापूर्वक उन्हें मार डाला। तत्पश्चात् वेदोंको लेकर वे ब्रह्माजीके समीप आये और ब्रह्माजीको देकर स्वरूपमें स्थित हो गये। तबसे ब्रह्माद्वारा प्रकट किया हुआ वह तीर्थ तीनों लोकोंमें ब्रह्मकुण्डके नामसे विख्यात हुआ। उसके दर्शनमात्रसे महापातकी मनुष्य भी पापरहित हो तत्काल ब्रह्मलोकमें चले जाते हैं। जो लोग यहाँ स्नान और व्रत करते हैं, वे ब्रह्मलोकको भी लाँघकर विष्णुलोकमें जाते हैं। स्कन्दने पूछा—वेदोंको पाकर ब्रह्माजीने क्या किया? श्रीमहादेवजी बोले—वत्स! बदरिकाश्रमतीर्थ देखकर चारों वेद ब्रह्माजीके साथ जाना नहीं चाहते थे। तब सिद्धोंके समझानेपर वेदोंने दो स्वरूप धारण किये। द्रवरूपसे तो वे बदरिकाश्रमतीर्थमें रह गये और ज्ञानरूपसे ब्रह्माजीके साथ गये। तब ब्रह्माजीने (वेदोंके अनुसार) विधिपूर्वक तीनों लोकोंको रचा। (इस ओर) ब्रह्मकुण्डमें, जहाँ द्रवरूपी वेद स्थित हैं, किये हुए स्नान, दान
- वैष्णवखण्ड-बदरिकाश्रम-माहात्म्य * ४०३
और तप प्रलयकालतक नष्ट नहीं होते। फलस्वरूपसे वैदिक ज्ञानकी अभिलाषा रखकर जो मनुष्य वहाँ तीन उपवास करते हैं, वे चारों वेदोंकी व्याख्या करनेवाले होते हैं। वेदतीर्थसे उत्तर जलरूपा सरस्वती हैं जो अपने नामका जप करनेपर मनुष्योंकी जड़ताका नाश करती हैं। सरस्वतीके जलमें स्थित होकर एकाग्रचित्तसे जो जप करता है, उसका मन्त्र कभी खण्डित नहीं होता। जगदीश्वर विष्णुने तीनों लोकोंका हित करनेके लिये वाग्वैभव प्रदान करनेवाली सरस्वती नदीका विधिपूर्वक यहाँ स्थापन किया है। इस तीर्थके दर्शन, स्पर्श, स्नान, पूजन, स्तुति और प्रणाम करनेसे मनुष्यके कुलमें कभी सरस्वतीसे बिछोह नहीं होता। सरस्वतीके दक्षिण भागमें द्रवाधारा नामसे प्रसिद्ध इन्द्रपद तीर्थ है, जहाँ इन्द्रने तपस्या की थी। प्रत्येक मासके शुक्लपक्षमें त्रयोदशी तिथिको इन्द्रको सन्तुष्ट करनेवाले उस तीर्थमें स्नान करके दो उपवास और भगवान् विष्णुका पूजन करनेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो इन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। वहीं मानसोद्भेद तीर्थ है जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। वह सब जीवोंके लिये दुर्लभ है। वहाँ जो महर्षि हैं, वे हृदयग्रन्थिका भेदन करते हैं, सब संशयोंको काटते हैं और कर्मबन्धनको क्षीण कर डालते हैं। इसीलिये उस तीर्थका नाम मानसोद्भेद है। यदि भाग्यवश मनुष्य वहाँ एक बूंद भी जल पा जाय तो तत्काल उसकी मुक्ति हो जाती है। जो मनके विषयोंको जीत चुके हैं, जिनकी बुद्धि अत्यन्त तीक्ष्ण है और जो फल, मूल एवं जलका आहार करके रहते हैं, ऐसे महर्षिगण यहाँकी पर्वतीय गुफाओंमें निवास करते हैं। ये मुनि फलाहार, शुद्ध वायुसेवन, गुफाका निवास, झरनोंके जलमें स्नान तथा आश्रमधर्मका पालन करते हैं और वल्कल या ऊर्णामय उत्तम वस्त्र धारण करके तीनों समयके स्नानसे दुर्जय इन्द्रियोंके पराक्रमपर भी विजय पा चुके हैं। यहाँपर बिना इच्छाके भी मुक्ति होती है। यदि कोई प्रमादवश किसी वस्तुकी कामना करता है तो उस कामनाके अनुसार फल भोग लेनेपर फिर उसकी मुक्ति होती ही है। मानसोद्भेदतीर्थसे पश्चिम वसुधारा नामसे प्रसिद्ध एक मनोहर तीर्थ है। कहते हैं कि त्रिलोकीमें बदरिकाश्रम सब तीर्थोंसे श्रेष्ठ है, यह बात नारदजीके मुँहसे सुनकर सभी वसु वहाँ गये। उन्होंने पत्ते चबाकर और जल पीकर वहाँ बड़ी कठोर तपस्या की। इससे उन्हें भगवान्का दर्शन प्राप्त हुआ और वे आनन्दमें डूब गये। इस प्रकार नारायणदेवका दर्शन करके उनसे मनोरम वरदानके रूपमें हरिभक्ति, सुख और ऐश्वर्य पाकर वे बहुत प्रसन्न हुए। इस वसुतीर्थमें स्नान और आचमन करके भगवान् जनार्दनका पूजन करनेसे मनुष्य इहलोकमें सुख भोगता और अन्तमें परमपदको प्राप्त होता है। यहाँ पुण्यात्मा पुरुषोंको जलके मध्यसे ज्योति निकलती दिखायी देती है, जिसे देखकर मनुष्य फिर गर्भवासमें नहीं आता। यहाँ तीन दिनतक पवित्र हो उपवास और भक्तिपूर्वक भगवान् जनार्दनकी पूजा करनेसे साधुपुरुष सिद्धोंका दर्शन पाते हैं। जो लोभी और चंचल हैं, जो सत्य नहीं बोलते, परिहासके व्याजसे पराये धन और परायी स्त्रीको कपटसे ग्रहण करना चाहते हैं, जिन्होंने सत्कर्मोंका त्याग कर दिया है, जो अशान्त और अपवित्र रहते हैं, ऐसे मलिनचित्त मानवोंको यहाँ कोई फल नहीं मिलता। जो साधनसंलग्न, शान्त, एकाकी और विधिमार्गका पालन करनेवाले हैं, उनके द्वारा यथाशक्ति किये हुए जप, तप, होम, दान और व्रत आदि कर्म यहाँ अक्षय फल देनेवाले होते हैं। जो मनुष्य भक्तिभावसे विभूषित हो इस पुण्यतीर्थके विषयको पढ़ते-पढ़ाते एवं प्रकाशित करते हैं, वे भगवान् विष्णुके कल्याणमय धाममें जाते हैं।
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४०४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
पंचतीर्थ, सोमतीर्थ, द्वादशादित्यतीर्थ, चतुःस्रोततीर्थ, सत्यपदतीर्थ तथा नर-नारायणाश्रमकी महिमा
भगवान् शिवजी कहते हैं— वहाँसे नैर्ऋत्य कोणमें पाँच धाराएँ गिरती हैं, उन्हें द्रवरूपमें पाँच तीर्थ जानो, जिनके नाम इस प्रकार हैं— प्रभास, पुष्कर, गया, नैमिष और कुरुक्षेत्र। उनमें विधिपूर्वक स्नान और नित्यकर्म करके पवित्र हुआ मनुष्य उन-उन तीर्थोंका फल पाता और अन्तमें परम पदको प्राप्त होता है। उन तीर्थोंमें भगवान् विष्णुकी पूजा करके मानव इस लोकमें बहुत सुख भोगता और अन्तमें विष्णुका सालोक्य प्राप्त करता है। उसके बाद सोमकुण्ड नामक निर्मल तीर्थ हैं, जहाँ चन्द्रमाने तपस्या की है। पूर्वकालमें अत्रिकुमार चन्द्रमा जब युवावस्थाको प्राप्त हुए, तब उन्होंने गन्धर्वोंसे स्वर्गवासियोंके सुखकी बार-बार प्रशंसा सुनकर अपने पितासे पूछा कि 'स्वर्गीय सुख कैसे मिलता है।' अत्रिने कहा—'बेटा! तपस्या, यम और नियमोंके द्वारा भगवान् विष्णुकी आराधना की जाय तो साधुपुरुषोंके लिये इहलोक और परलोकमें कौन-सी वस्तु दुर्लभ है?' तदनन्तर नारदजीसे यह सुनकर कि 'बदरीक्षेत्र अत्यन्त निर्मल है' वे अपने पिताको प्रणाम करके उत्तर दिशाको गये। बदरीतीर्थमें पहुँचकर उन्होंने पवित्र फलोंसे भगवान् विष्णुका पूजन किया और परम उत्तम अष्टाक्षर 'ॐ नमो नारायणाय' मन्त्रका जप प्रारम्भ किया। दीर्घकालतक जप-तप करनेके पश्चात् भक्तवत्सल भगवान् प्रसन्न होकर चन्द्रमासे बोले—'सुव्रत! कोई वर माँगो'। तब चन्द्रमाने उठकर बार-बार प्रणाम करके कहा—'भगवन्! मैं आपके प्रसादसे ग्रह, नक्षत्र, तारा, ओषधिवर्ग तथा सम्पूर्ण ब्राह्मणोंका राजा होना चाहता हूँ।'
श्रीभगवान् बोले— वत्स! तुमने दुर्लभ वर माँगा है तथापि तुम्हें देता हूँ—ऐसा ही होगा।
तब सम्पूर्ण देवताओंगोने आकर राजा सोमका विधिपूर्वक अभिषेक किया। उसके बाद वे उज्ज्वल रथके द्वारा स्वर्गको चले गये। तबसे वह तीर्थ सोमकुण्डके नामसे प्रसिद्ध हुआ, जिसके दर्शनमात्रसे मनुष्य निष्पाप हो जाते हैं। उसमें आचमन करनेसे निन्दित मनुष्य भी चन्द्रलोकमें जाते हैं और वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करनेवाला पुरुष चन्द्रलोकको भेदकर विष्णुलोकको प्राप्त होता है। वहाँ तीन राततक भगवान् विष्णुकी पूजा करके जप करनेवाले पुरुषको विशेषरूपसे मन्त्रसिद्धि प्राप्त होती है। मनुष्य मन, वाणी और क्रियाद्वारा जो पाप करता है वह सब वहाँ सोमकुण्डके दर्शनसे नष्ट हो जाता है। वहाँसे आगे द्वादशादित्य नामक तीर्थ है जहाँ तपस्या करके कश्यपजीके पुत्रने सूर्यकी पदवी प्राप्त की है। वहाँ प्रत्येक रविवारको सप्तमी तिथिमें अथवा संक्रान्तिके अवसरपर विधिपूर्वक स्नान करनेमात्रसे मनुष्य सात जन्मोंके पापसे मुक्त हो जाता है। महान् रोगसे पीड़ित पुरुष यदि यहाँ स्नान करके जल पीकर पवित्र हो तो शीघ्र ही वह रोगसे छुटकारा पा जाता है। इसके सिवा वहाँ चतुःस्रोत नामक तीर्थ है। उस वैष्णवक्षेत्रमें भगवान्की आज्ञाके अनुसार धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—ये चारों पुरुषार्थ द्रवरूप होकर स्थित हैं जो सब प्राणियोंकी मुक्तिके हेतु हैं। पूर्व आदि दिशाओंमें क्रमशः उनकी स्थिति है अर्थात् पूर्वमें धर्म, दक्षिणमें अर्थ, पश्चिममें काम और उत्तरमें मोक्ष नामक स्रोत है। ये धर्मप्रधान पुरुषोंकी भाँति मूर्तिमान् होकर स्थित हैं। जो क्रमशः विद्यमान उन चारों
- वैष्णवखण्ड-बदरिकाश्रम-माहात्म्य * \hfill ४०५
तीर्थोंका सेवन करते हैं, उन्हें सदैव प्रसन्नता प्राप्त होती है। पूर्वोपार्जित पुण्यपुंजके प्रभावसे श्रेष्ठ जन्म पाकर जो मनुष्य साधनमें प्रवृत्त हैं वे उन चारों पुरुषार्थोंको देखते हैं और जो ग्राम्यवधुओंके क्रीडामृग—विषयभोगोंमें आसक्त हैं वे उन पुरुषार्थोंका दर्शन नहीं कर पाते।
उसके बाद सत्यपद नामक तीर्थ है जो त्रिकोणाकार कुण्डके रूपमें विद्यमान है। वह सब पापोंका नाश करनेवाला है। एकादशी तिथिको उस पावन तीर्थमें साक्षात् भगवान् विष्णु पधारते हैं। तत्पश्चात् ऋषि, मुनि, तपस्वी उस कुण्डमें स्नान करनेके लिये आते हैं। उस तीर्थके दर्शनसे बड़े-बड़े पातक भाग जाते हैं। उसमें स्नान करके बुद्धिमान् पुरुष सत्यलोकको प्राप्त होता है और वहाँसे उसका मोक्ष हो जाता है। जो वहाँ एक दिन और एक रात उपवास करके भगवान् जनार्दनकी यथाशक्ति पूजा करता है वह जीवन्मुक्तिका भागी होता है। त्रिकोण आकृतिसे सुशोभित सत्यपदतीर्थ सब पापोंसे मुक्ति चाहनेवाले पुरुषोंके द्वारा प्रयत्नपूर्वक दर्शन करनेयोग्य है। वहाँ जप, तप, हरिस्तोत्र, पूजा, स्तुति और प्रणाम करनेवाले पुरुषोंकी महिमाका वर्णन ब्रह्माजी भी नहीं कर सकते।
तदनन्तर अत्यन्त निर्मल भगवान् नर-नारायणका आश्रम है। वहाँका स्वच्छ जल दो प्रकारका दिखायी देता है। उन दोनों जलोंके सेवनसे उन दोनों नर और नारायणके प्रति प्रीति होती है, यह निश्चय किया गया है। वहाँ स्नान और यत्नपूर्वक भगवान्का पूजन करनेसे मनुष्य तत्काल सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। धर्मकी पत्नी मूर्तिसे भगवान्का नर और नारायणके रूपमें अवतार हुआ। वे दोनों माता-पिताकी आज्ञा लेकर तपस्याके लिये गये और नर-नारायण नामवाले दोनों पर्वतोंके बीच तपस्याकी साक्षात् मूर्तिके समान स्थित हो गये। उस तीर्थमें स्नान करके भगवान् विष्णुका पूजन करनेसे मनुष्य नरसे नारायण हो जाता है। वहाँ प्राणियोंका कल्याण करनेवाले साक्षात् भगवान् नारायण तपोमूर्ति होकर स्थित हैं। वहाँ वायु श्रीलक्ष्मीपतिके चरणारविन्दोंसे प्राप्त होनेवाली सुगन्ध लेकर बहती है, जिसका स्पर्श होनेसे कलियुगके पापसे आतुर हुए मनुष्योंका पाप नष्ट हो जाता है। उस तीर्थमें जाकर मुनियोंकी बुद्धि बाह्य पदार्थोंको नहीं देखती, केवल भगवच्चरणारविन्दोंके चिन्तनमें संलग्न रहती है और वहाँ विराजमान साक्षात् भगवान् विष्णु क्रमशः वहाँकी यात्रा करनेवाले पुरुषोंको अपना पद प्रदान करते हैं। उस नारायणगिरिपर सब पापोंका नाश करनेवाले बहुत-से तीर्थ हैं जिन्हें मैं जानता हूँ, साधारण मनुष्य नहीं जानते। उसके दक्षिण भागमें जगदीश्वर विष्णुके अस्त्र विद्यमान हैं, जिनके दर्शनसे मनुष्य अस्त्र-शस्त्रोंके भयका भागी नहीं होता। जो एकाग्रचित्त हो भक्तिपूर्वक इस माहात्म्यको सुनता अथवा सुनाता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुका सालोक्य प्राप्त करता है।
मेरूतीर्थ, लोकपालतीर्थ, दण्डपुष्करिणी, गंगासंगम तथा धर्मक्षेत्र आदिका माहात्म्य और ग्रन्थका उपसंहार
| **भगवान् शिव कहते हैं—**ब्रह्मकुण्डसे दक्षिण नरका निवासभूत महान् पर्वत है। जहाँ भगवान् | श्रीहरिने लोकसुन्दर मेरुपर्वतको स्थापित किया है। जब भगवान्का निवास विशालापुरीमें हुआ, |