श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
नन्वर्थतया निर्दिष्टस्य विभक्तिविपरिणाममात्रेणोभयाकांक्षा निवृत्तिसिद्धेः । एवं निश्चिते जीवत्वे “एतद्ब्रह्म” इत्युपसंहारस्य ब्रह्मपदमपि जीव पूजार्थं प्रयुक्तमित्यध्यवसीयत इति । “वह यज्ञ करेगा” इस श्रुति में जो उपासना विहित है, वह उपास्य सापेक्ष है, अन्य वाक्य में भी जो उपास्य ब्रह्म का उल्लेख मिलता है, उसका भी इससे सम्बन्ध है; ऐसा भी नहीं कह सकते । क्योंकि- प्रासंगिक वाक्य में “मनोमय” आदि गुण से, उपास्य के रूप का भली- भांति ज्ञान हो जाता है, इसलिए उसके जानने की आकांक्षा तो रहती नहीं । “मनोमय प्राणशरीर” इत्यादि वाक्यांश में उक्त तात्पर्य के प्रति- पादन के लिए, एकमात्र विभक्ति विपरिणाम से (अर्थात् प्रथमा के स्थान पर द्वितीया विभक्ति कर देने मात्र से) उपास्य, उपासना दोनों की आकांक्षा निवृत्ति हो जाती है । इस प्रकार जीवत्व के निश्चित हो जाने पर “यह ब्रह्म है” इस उपसंहार वाक्यांश में “ब्रह्म” शब्द जीववाची ही निश्चित होता है, जो कि—एकमात्र उत्कर्ष बतलाने के लिए प्रयोग किया गया है । एवं प्राप्ते ब्रूमः—सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात्—मनोमयत्वादिगुणकः परमात्मा । कुतः ? सर्वत्र—वेदांतेषु परस्मिन्नेव ब्रह्मणि प्रसिद्धस्य मनोमयत्वादेरुपदेशात् । प्रसिद्धं हि मनोमयत्वादि ब्रह्मणः । यथा— “मनोमयः प्राणशरीरनेता” स एषोऽन्तहृदय आकाश, तस्मिन्नयं पुरुषो मनोमयः अमृतोहिरण्मयः “हृदामनीषा मनसाऽभिकॢप्तो य एनं विदुरमृतास्ते भवंति” “न चक्षुषा गृह्यते नापिवाचा “मनसा तु विशुद्धेन’ तथा “प्राणस्य प्राणः” अथखलु प्राण एवं प्रज्ञात्मेदं शरीरं परिगृह्योथापयति “सर्वाणि हवा इमानि भूतानि प्राणमेवा- भिसंविशंति प्राणमभ्युज्जिहते” इत्यादिषु । मनोमयत्वं विशुद्धेन मनसा ग्राह्यत्वम् । प्राणशरीरत्वं–प्राणस्याप्याधारत्वं नियन्तृत्वं च । उक्त संशय पर सूत्रकार सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात् सूत्र का उपदेश करते हैं । अर्थात् मनोमयत्व आदि गुण वाला परमात्मा ही है, क्योंकि-
( ३६२ ) सभी वेदांत वाक्यों में मनोमयत्वादिका, परब्रह्म के लिए ही प्रसिद्ध प्रयोग किया गया है। मनोमयत्व आदि गुण ब्रह्म के लिए ही प्रसिद्ध हैं जैसे कि—"मनोमय परमात्मा ही प्राण और शरीर का परिचालक है" वही हृदयस्थ आकाश है, उसी से मनोमय, ज्योतिर्मय और अमृतमय यह पुरुष वर्त्तमान है" वह भक्ति और धृति संपन्न मन से ही ग्राह्य है" जो इस बात को जानता है वही मुक्त हो जाता है। "उसे नेत्र या वाणी से नहीं जान सकते" वह तो विशुद्ध मन से ही ग्राह्य है "जो कि प्राणों का प्राण है" प्रज्ञात्मक प्राण ही इस शरीर को ग्रहण कर परिचालित करता है। "ये सारे भूत, इस प्राण में ही लीन और प्राण से ही प्रकट होते हैं" इत्यादि । वस्तुतः विशुद्ध मन से ग्रहण करना ही मनोमयता है। प्राण शरीरत्व का तात्पर्य है प्राण की धारकता और नियामकता। एवं च सति—"एष मे आत्माऽन्तर्हृदय एतद् ब्रह्म" इति ब्रह्म शब्दोऽपि मुख्य एव भवति । "अप्राणो ह्यमनाः" इति मनआयत्तं ज्ञानं प्राणायतः स्थिति च ब्रह्मणो निषेधति । इस प्रकार "यह जो हृदयस्थ आत्मा है वही ब्रह्म है" इस वाक्य में ब्रह्म शब्द भी मुख्य ही सिद्ध होता है "अप्राण अमन" इत्यादि वाक्य ब्रह्म सम्बन्धी मन आयत्त ज्ञान और प्राणायत स्थिति का निषेध करता है । अथवा "सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत्" इत्यत्रैवोपासनं विधीयते-सर्वात्मकं ब्रह्म शान्तः सन्नुपासीतेति । "सक्रतुं कुर्वीत" इति तस्यैव गुणोपादनाथोऽनुवादः । उपादेयाश्च गुणामनीमयत्वादयः, यतस्सर्वात्मकंब्रह्म मनोमयत्वादि गुणकमुपा- सीतेति वाक्यार्थः। अथवा "यह सारा जगत ब्रह्म ही है, उन्हीं से उत्पन्न और उन्हीं में लीन हो जाता है, शान्तभाव से उनकी उपासना करो" इस वाक्य में, सर्वात्मक ब्रह्म की शान्तभाव से उपासना करनी चाहिए, ऐसा उपासना
का प्रकार बतलाया गया है। “वह क्रतु (चिन्तन) करता है' इत्यादि वाक्य उपास्य ब्रह्म के गुण प्रकाश का प्रतिपादक मात्र है। ब्रह्म के मनोमयत्व आदि गुण ही उपादेय हैं, सर्वात्मक ब्रह्म की मनोमयत्व आदि गुण विशिष्ट रूप से ही उपासना करनी चाहिए, यही युक्तियुक्त वाक्यार्थ है। तत्र संदेहः-किमिह ब्रह्मशब्देन प्रत्यगात्मा निर्दिश्यते उत परमात्मा-इति किं युक्तम् ? प्रत्यगात्मेति, कुतः ? तस्यैव सर्वपद सामानाधिकरण्यनिर्देशोपपत्तेः । सर्वशब्दनिर्दिष्टं हि ब्रह्मादि स्तम्बपर्यन्तं कृत्स्नं जगत् । ब्रह्मादि भावश्च प्रत्यगात्मनोऽनाद्य- विद्यामूलकर्मविशेषोपाधिकोविद्यत एव, परस्य तु ब्रह्मणस्सर्वज्ञस्य सर्वशक्ते रपहतपाप्मनो निरस्तसमस्ताविद्यादिदोषगंधस्य समस्त हेयाकर सर्वभावो नोपपद्यते । प्रत्यगात्मन्यपि क्वचिद् क्वचिद् ब्रह्मशब्दः प्रयुज्यते । अत एव परमात्मा परंब्रह्मेति परमेश्वरस्य क्वचित् सविशेषणो निर्देशः । प्रत्यगात्मनश्च निर्मुक्तोपाधेर्बृहत्वं च विद्यते “स चानन्त्याय कल्पते” इति श्रुतेः । अविदुषस्तस्यैव कर्म- ·निमित्त त्वाज्जन्मस्थितिलयानां तज्जलानिति हेतुनिर्देशोऽप्युपपद्यते । तदयमर्थः-अयं जीवात्मा स्वतोऽपरिच्छन्न स्वरूपत्वेन ब्रह्मभूतस्स- न्नाद्यविद्यया देवतिर्यङ्मनुष्यस्थावरात्मनाऽवतिष्ठते-इति । इस पर भी यह संशय तो शेष रही जाता है कि-ब्रह्म शब्द जीवात्मा वाची है अथवा परमात्मावाची । कह सकते हैं कि जीवात्मा वाची है, क्योंकि-सर्व शब्द के साथ प्रत्यक् शब्द का सामानाधिकरण्य हो संकता है। सर्व शब्द से ब्रह्म से लेकर स्तम्ब पर्यन्त संपूर्ण जगत का निर्देश किया गया है, अनादि अविद्या मूलक, विशेष कर्म निबंधक, जीव का ब्रह्मात्मभाव भी सर्व शब्द में निहित है। पर ब्रह्म में तो, सर्वज्ञ-सर्व शक्ति सम्पन्न-निष्पाप होने से अविद्या जन्य दोषों की गंध भी संभव नहीं है, इसलिए उसमें हेय कर्मों का सम्बन्ध सर्वथा असम्भव है। ankurnagpal108@gmail.com
( ३६४ ) जीवात्मा के लिए भी कही कहीं ब्रह्म शब्द का प्रयोग किया गया है। परमात्मा परमेश्वर को तो विशेषण युक्त “परब्रह्म” शब्द से ही स्मरण किया गया है। जीवात्मा भी जब कर्म बन्धन शून्य होता है तब उसमे भी बृहत्त्व रहता है। जैसा कि-“सचानन्त्याय कल्पते” इत्यादि श्रुति से ज्ञात होता है। जगत् का जन्म स्थिति और लय निश्चित ही कर्मजन्य है, अतः ज्ञानरहित जीवात्मा का ही “तज्जलानि” इत्यादि में निदर्श प्रतीत होता है। उक्त श्रुति का तात्पर्य है कि-जीवात्मा स्वभाव से अपरिच्छिन्न ब्रह्म स्वरूप है वह अनादि अविद्यावश, देवता मनुष्य पशु, पक्षी स्थावर आदि रूपों मे स्थित रहता है। अत्र प्रतिविधीयते-सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात्-सर्वत्र-“सर्वं खल्विदं” इति निर्दिष्टे सर्वस्मिन् जगति ब्रह्म शब्देन तदात्मतया विधीयमानं परंब्रह्मैऽव न प्रत्यगात्मा। कुतः ? प्रसिद्धोपदेशात् “तज्जलान्” इति हेतुतः “सर्वं खल्विदं ब्रह्मैऽव” इति प्रसिद्धवदुपदेश
( ३६५ ) उक्त संशय के निवारणार्थ सूत्रकार "सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात् सूत्र कहते हैं—जिसका तात्पर्य है कि-"सर्वं खल्विदं" इत्यादि श्रुति में जगद्- रूप से निर्दिष्ट ब्रह्म शब्द जीववाची नहीं है अपितु परमात्मावाची ही है। क्योंकि-प्रसिद्ध परब्रह्म का जैसा जगत् कर्त्ता का निर्देश किया गया है "उससे उत्पन्न और लीन होता है" ऐसा हेतु बतला कर "सारा जगत् ब्रह्म है" ऐसा परमात्मा सम्बन्धी प्रसिद्ध सा निर्देश है। ब्रह्म से उत्पन्न हीने से, ब्रह्म में लीन होने से, ब्रह्माधीन जीवन होने से ही यह सारा जगत ब्रह्मात्मक है, वेदांत वाक्यो में जगत का जन्म स्थिति और लय ब्रह्म में ही बतलाया गया है इसलिए उक्त प्रसंग में ब्रह्म ही जगत कर्त्ता प्रतीत होता है। जैसे कि "जिससे यह सारा भूत समुदाय उत्पन्न है, तथा जिससे जीवित है और लय होकर जिसमें प्रविष्ट होता है उसे जानो वही ब्रह्म है" ऐसा उपक्रम करते हुए "आनन्द को ही ब्रह्म जानो, आनन्द से ही यह सारा भूत समुदाय उत्पन्न होता है" इत्यादि से पूर्वोक्त निरवधि निरतिशय आनन्द सम्पन्न विपश्चित परब्रह्म में ही जगत की सृष्टि इत्यादि बतलाई गई है। तथा "वही कारण एव करणाधिपो के भी अधिपति हैं, जिनका कोई भी जनक या अधिपति नही है" इस वाक्य में इन्द्रियो के स्वामी जीव का अधिपति ब्रह्म को ही बतलाया गया है। इस प्रकार सर्वत्र परमात्मा की ही सर्व कारणता प्रसिद्ध है। अतः परब्रह्मणो जातत्वात्तस्मिन् प्रलीनत्वात्तेन प्राणनात्तदा- त्मकतया तादात्म्यमुपपन्नम् । अतः "सर्वं प्रकारं सर्वशरीरं सर्वा- त्मभूतं परंब्रह्म शांतोभूत्वोपासीतेति श्रुतेरेव परस्य ब्रह्मणः सर्वात्मकत्वमुपपाद्य तस्योपासनमुपदिशति । परंब्रह्म हि कारणावस्थं सूक्ष्मस्थूल चिदचिद्वस्तुशरीरतया सर्वदा सर्वात्मभूतम् । एवम्भूत- तादात्म्यस्य प्रतिपादने परस्यब्रह्मणः सकलहेयप्रत्यनीककल्याण गुणाकरत्व न विरुध्यते प्रकारभूत शरीरगतानां दोषाणां प्रकारिण्- यात्मन्य प्रसंगात्, प्रत्युत निरतिशयैश्वर्यापादनेन गुणायैव भवतीति पूर्वमेवोक्तम् । ankurnagpal108@gmail.com
( ३६६ ) इस प्रकार परब्रह्म से उत्पन्न होने से, उन्ही में लीन होने से और उन्ही से प्राणित होने से जगत की तदात्मकता सिद्ध हो जाती है। इसी प्रकार “सर्व प्रकार, सर्व शरीर, सर्वात्मभूत परब्रह्म की शान्त रूप से उपासना करो” इत्यादि श्रुति परब्रह्म की सर्वात्मकता का उपपादन करके उनकी उपासना का उपदेश करती है। परब्रह्म ही, कारणावस्थ और कार्यावस्थ सूक्ष्म-स्थूल चेतन-जड़ शरीर धारण करने से सर्वात्मभूत हैं। ऐसे तादात्म्य प्रतिपादन से परब्रह्म के हेय और उत्तम गुणों में कोई विरुद्धता नहीं होती। उक्त शरीर उन्हीं के प्रकार अर्थात् विशेषण रूप हैं। विशेषणगत दोषराशि कभी प्रकारी विशेष्य में संभव नहीं है, अपितु वह अत्यधिक ऐश्वर्य शाली परमात्मा की गुण स्वरूप होगी; ऐसा हम पहिले ही कह चुके हैं। यदुक्तं जीवस्य सर्वतादात्म्यमुपपद्यत इति, तदसत्, जीवानां प्रतिशरीरं भिन्नानामन्यतादात्म्यासम्भवात् । मुक्तस्याप्यनवच्छिन्न- स्वरूपस्यापि जगत्तादात्म्यं जगज्जन्मस्थितिप्रलयकारणत्वनिमित्तं न संभवतीति “जगद्व्यापारवर्ज्यम् ” इत्यत्र वक्ष्यते । जीवकर्मनिमित्तत्वाज्जगज्जन्मस्थितिलयानां स एव कारण- मित्यपिन साधीयः, तत्कर्मनिमित्तत्वेऽपीश्वरस्यैव जगत्कारणत्वात् । अतः परमात्मैवाऽत्र ब्रह्मशब्दाभिधेयः । इममेव सूत्रार्थमभियुक्ता बहुमन्वते । यथाह वृत्तिकारः “सर्वं खल्विति सर्वात्मा ब्रह्मेशः” । जो यह कहते हैं कि—जीव का सबसे तादात्म्य हो सकता है यह कथन भी असंगत है, क्योंकि जीवों का अनेक शरीरों में आश्रय रहता है इसलिए उनमें परस्पर तादात्म्य कभी संभव नहीं है। मुक्तात्मा जीव का भी, जगत्जन्मस्थितिलयकारणत्व निमित्तक तादात्म्य संभव नहीं है, सूत्रकार “जगद्व्यापारवर्ज्यम्” सूत्र में मुक्तात्मा को जागतिक व्यापारों से रहित बतलाते हैं । जीव का कर्म ही, जगत की सृष्टि स्थिति और लय का निमित्त कारण होता है, वही जीव जगत का उपादान कारण भी हो, ऐसा संभव नहीं है। जीव के कर्मानुसार ईश्वर जगत की रचना करता है, अतएव
( ३६७ ) वही जगत का कारण है। उक्त प्रसंग में परमात्मा ही ब्रह्म शब्द से अभिधेय हैं। हमारे द्वारा किये गये इस सूत्रार्थ को ही विद्वज्जन मानेंगे, जैसा कि वृत्तिकार का भी मत है—“सर्वंखलु “इत्यादि में सर्वात्मा ईश ही ब्रह्म हैं”। विवक्षित गुणोपपत्तेश्च १।२।२॥ वक्ष्यमाणाश्च गुणाः परमात्मन्येवोपपद्यन्ते “मनोमयः प्राण- शरीरो भारूपः सत्यसंकल्पआकाशात्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः” इति । मनोमयःपरि- शुद्धेन ,मनसैकेन ग्राह्यः । विवेकविमोकादिसाधनसप्तकानुगृहीत परमात्मोपासन निर्मलीकृतेन हि मनसा गृह्यते । अनेन हेयप्रत्यनीक कल्याणैकतानतया सकलेतरविलक्षणस्वरूपतोच्यते, मलिनमनोभि- र्मलिनानामेव ग्राह्यत्वात् । प्राणशरीरः जगति सर्वेषां प्राणानां धारकः । प्राणो यस्य शरीरम् आधेयं विधेयं शेषभूतं च स प्राण शरीरः । आधेयत्वविधेयत्वशेषत्वानि शरोरशब्द प्रवृत्तिनिमित्तानी- त्युपपादयिष्यते । भारूपः = भास्वररूपः अप्राकृत स्वासाधारण निरतिशयकल्याण दिव्यरूपत्वेन निरतिशयदीप्तियुक्त इत्यर्थः सत्य संकल्पः = अप्रतिहत् संकल्पः । आकाशात्मा = आकाशवत्सूक्ष्म- स्वच्छस्वरूपः, सकलेतरकारणभूतस्याकाशस्याप्यात्मभूत इति वा आकाशात्मा स्वयं च प्रकाशते अन्यानपि प्रकाशयतीति वा अ्रकाशात्मा सर्वकर्मा = क्रियत इति कर्म, सर्वंजगद्यस्यकर्म, असौ सर्वकर्मा; सर्वा वा क्रिया यस्यासौ सर्वकर्मा । सर्वकामः = काम्यन्त इति कामाः, सर्वगंधः भोग्यभोगोपकरणादयः, ते परिशुद्धाः सर्वविधास्तस्य सन्ती- त्यर्थः । सर्वरसः = “अशब्दमस्पर्शम्” इत्यादिना प्राकृतगंधरसादिनिषे- धात् प्राकृताः स्वासाधारणनिरवद्याः निरतिशयाः कल्याणाः स्वभोग्य- भूताः सर्वविधा गन्धरसाः तस्य सन्तीत्यर्थः । सर्वमिदमभ्यात्तः = ankurnagpal108@gmail.com
( ३६८ ) उक्तंरसपर्यन्तं सर्वमिदं कल्याणगुणजातं स्वीकृतवान् । “अभ्यात्तः” इति “भुक्ताः ब्राह्मणाः” इतिवत् कर्त्तरिक्तः प्रतिपत्तव्यः । अवाकी = वाकः = उक्तिः, सोऽस्यनास्तीत्यवाकी । कुत इत्याह, अनादर इति, अवाप्तसमस्तकामत्वेनादर्तव्याभावादादर रहितः । अतएव अवाकी = अजल्पाकः, परिपूर्णैश्वर्याद्ब्रह्मादिस्तंबपर्यन्तं निखिलं जगत्तृणीकृत्य जोषमासीन इत्यर्थः । त एते विवक्षिताः गुणाः परमा- त्मन्येवोपपद्यन्ते । वेदांत वाक्यों में कहे गये गुण, परमात्मा के लिए ही उपयुक्त हैं । “मनोमय, प्राणशरीर, ज्योतिरूप, सत्यसंकल्प, आकाशात्मा सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगंध, सर्वरस, जगद्व्यापी, वाक्यहीन, अनादर” इत्यादि श्रुत्युक्त गुण, परमात्मा में ही समुचित रूप से घटते हैं । मनोमय का तात्पर्य है, एक मात्र शुद्ध मन से ही ग्राह्य अर्थात् विवेक, विमोक आदि सात साधनों से निर्मल मन से परमात्मा की उपासना संभव है । इससे ज्ञात होता है कि श्रेष्ठ गुणों के खान विलक्षण स्वरूप परमात्मा ही हो सकते हैं; मलिन मन से तो मलिन पदार्थों का ही ग्रहण हो सकता है । प्राण शरीर का अर्थ है संसार के समस्त प्राणों के धारक; प्राण जिसके आधेय-विधेय और शेषत्व का संपादन करे उसे प्राण शरीर कहते हैं । आधेयत्व, विधेयत्व और शेषत्व ही, “शरीर” शब्द के व्यवहार का निदान है, ऐसा आगे उपपादन करेंगे । भारूप का अर्थ है—उज्ज्वल- रूपसंपन्न, अर्थात् उनका अपना रूप, अप्राकृत-असाधारण और निरतिशय कल्याणमय होने से सर्वापेक्षा दीप्तियुक्त है । सत्यसंकल्प का तात्पर्य है अनिवार्य इच्छा । आकाशामा का तात्पर्य है—आकाश के समान सूक्ष्म स्वच्छ स्वरूप, अथवा अन्यान्य समस्त पदार्थों के कारण स्वरूप आकाश का अन्तर्यामी, अथवा जो स्वयं प्रकाशवान होते हुए अन्यों को प्रकाशित करता है । सर्वकर्मा का तात्पर्य है—जो किया जायें, ऐसा समस्त संसार रूप कर्मवाला अथवा समस्त क्रियायें ही जिसका कर्म है । सर्वकाम का तात्पर्य है—जिससे कामना होती है वे भोग्य पदार्थ और भोग के साधन काम्यपदार्थ तथा उनकी प्राप्ति की इच्छा को काम कहते हैं, उस परमात्मा के वे सारे काम्य विषय आसक्तिरहित होने से विशुद्ध हैं, ankurnagpal108@gmail.com
( ३६१ ) इसलिये वे सर्वकाम हैं। सर्वगंध सर्वरस का तात्पर्य है-“अशब्द अस्पर्शं” आदि वाक्य में प्राकृतगंध रस आदि का निषेध किया गया है, जिससे ज्ञात होता है कि उस परमात्मा में स्वतंत्र भोगोपयोगी निर्दोष, निस्सीम, कल्याणमय, अलौकिक, असाधारण अनोखे गंधरस आदि विद्यमान हैं। सर्वमिदमभ्यात्त का तात्पर्य है कि-उपर्युक्त सभी कल्याणमय गुणों से उद्भूत विशेषताओं को वह स्वेच्छा से स्वीकारते हैं। “भुक्ताः ब्राह्मणाः” वाक्य की तरह अभ्यात्त में भी कर्त्ता में क्तप्रत्यय है जिसका तात्पर्य होता है कि वे परमात्मा उक्त गुणों को स्वीकार कर तृप्त हैं। अवाकी का तात्पर्य है, वाणी की उक्ति अर्थात् उच्चारण का उनमें अभाव है। क्यों कि वे, अनादर अर्थात् संपूर्ण कामनाओं से तृप्त है, इसलिए उन्हें किसी भी पदार्थ की ओर आकर्षण नहीं है, इसलिए वह सभी के प्रति अनादर ( अभिलाषा युक्त प्राप्ति की उत्सुकता से रहित ) हैं। इसलिए वे ( अनिच्छुक होने से) चुप रहते हैं। परिपूर्ण ऐश्वर्य होने के कारण, ब्रह्मा से लेकर तृण पर्यन्त सारा जगत उनके लिए तृणवत ही है। इससे इसलिये वे सदा तुष्ट भाव से चुप रहते हैं। निश्चित होता है कि श्रुतियुक्त समस्त गुण, परमात्मा के लिए ही उपयुक्त हैं, ऐसा मानना चाहिए। अनुपपत्तेस्तु न शारीरः ।१।२।३॥ तमिमं गुणसागरं पर्यालोचयतां खद्योतकल्पस्य शरीरसंबंध- निबंधनापरिमितदुःखसंबंधयोग्यस्यबद्धमुक्तावस्थस्यजीवस्य प्रस्तुत- गुणलेशसंबंधगंधोऽपि नोपपद्यत, इति नास्मिन् प्रकरणे शारीर- परिग्रहशंका जायत इत्यर्थः। जिन्होंने, उन गुण सागर परमात्मा को शास्त्र पर्यालोचना से भलीभांति जान लिया है उनकी दृष्टि में, जुगनू के समान यदा कदा टिमटिमाने वाले, शरीर संबद्ध होने से अपरिमित दुःख भागी, बद्धमुक्त अवस्था वाले, जीवात्मा का उन गुणो से लेशमात्र सम्बन्ध हो भी सकता है, ऐसी तनिक भी संभावना नहीं रहती। इसलिए इस प्रसंग में शरीरी जीवात्मा का वर्णन है, ऐसी आशंका करना व्यर्थ है। ankurnagpal108@gmail.com
( ४०० ) कर्मकर्तृव्यपदेशाच्च ॥१।२।४॥ “एतमितः प्रेत्याभिसंभविताऽस्मि” इति प्राप्यतया परंब्रह्म व्यपदिश्यते, प्राप्तृतया च जीवः । अतः प्राप्ता जीव उपासकः प्राप्यंपरंब्रह्मोपास्यमिति प्राप्तुरन्यदेवेदमिति विज्ञायते । “शरीर से छूटने पर मैं इसी ब्रह्म को प्राप्त होऊँगा” इस वाक्य में प्राप्य रूप से परब्रह्म का तथा प्राप्त करने वाले जीव का स्पष्ट भिन्न निर्देश है । इससे समझना चाहिए कि प्राप्त करने वाला जीव उपासक तथा प्राप्य परब्रह्म उपास्य है जो कि प्रापक जीव से निश्चित ही भिन्न है । शब्दविशेषात् ॥१।२।५॥ “एष म आत्मान्तर्हृदये” इति शारीरः षष्ठ्या निर्दिष्टः उपास्यस्तु प्रथमया । एवं समानप्रकरणे वाजिनां च श्रुतौ शब्द विशेषः श्रूयते जीवपरयोः, यथा “ब्रीहिर्वा यवो वा श्यामाको वा श्यामाकतण्डुलो वा एवमयमन्तरात्मन् पुरुषो हिरण्मयो यथा ज्योतिर्धूमम्” इति । अत्र “अन्तरात्मन्” सप्तम्यन्तेन शारीरो निर्दिश्यते, “पुरुषो हिरण्मयः” इति प्रथमयोपास्यः । अतः पर एवो- पास्यः । “मेरे हृदय कमल के भीतर यह आत्मा” इत्यादि वाक्य में झरीरी को षष्ठी (संबंध कारक) तथा उपास्य (आत्मा) को प्रथमा (कर्त्ता कारक) दिखलाया गया है । इसी प्रकार के 'प्रकरण वाजसनेय में भी जीव और परमात्मा वाची शब्दों का विशेष उल्लेख मिलता है । जैसे कि— “सरसों, जव, श्यामाक तण्डुल से भी सूक्ष्म अन्तर्यामी पुरुष स्वर्ण के समान उद्दीप्त निधू'म ज्योतिस्वरूप है” इस वाक्य में सप्तम्यन्त “अन्तरात्मन” पद से झरीरी जीव को तथा प्रथमान्त “हिरण्मय पुरुष” पद से उपास्य परमात्मा का निर्देश है । इससे सिद्ध होता है कि परमात्मा ही उपास्य है । ankurnagpal108@gmail.com
( ४०१ ) इतश्च शारीरादन्यः—इसलिए भी जीव से परमात्मा भिन्न है कि— स्मृतेश्च ॥१।२।६। सर्वस्यचाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तःस्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च”— ‘यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्”—ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति, भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया, तमेव शरणं गच्छ” इति शारीरमुपासकं, परमात्मानं चोपास्यं स्मृतिर्दर्शयति । मैं सबके हृदय में प्रविष्ट हूं, मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (वितर्क) होते हैं” जो पुरुष मुझे पुरुषोत्तम जानता है, “अर्जुन ! ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में बैठकर यंत्र की तरह सभी प्राणियों को अपनी माया से घुमा रहा है—“उन्हीं की शरण में जाओ” इत्यादि श्रुति वाक्य भी, शरीरी जीवात्मा को उपासक तथा परमात्मा को उपास्य रूप से निर्देश करते हैं। अर्भकौकस्त्वात्तद्व्यपदेशाच्च नेतिचेन्न निचाय्यत्वादेवं व्योमवच्च । १।२।७॥ अल्पायतनत्वमर्भकौकस्त्वम्, तद्व्यपदेशः = अल्पत्वव्यपदेशः [L1
( ४०२ ) जानते हैं वह सर्वगत, अतिसूक्ष्म और अव्यय है" इत्यादि वाक्य से परमात्मा का अपरिच्छिन्नत्व ज्ञात होता है जीव का स्वरूप तो, आरा की अग्रिम सूक्ष्म धार के समान बतलाया गया है । नैतदेवम्-परमात्मैव हि अणीयानित्येवं निचाय्यत्वेन व्यप- दिश्यते, एवं निचाय्यत्वेन-एवं द्रष्टव्यत्वेन, एवमुपास्यत्वेनेति यावत् । न पुनरणीयस्त्वमेवास्यस्वरूपमिति, व्योमवच्चायं व्यपदिश्यते, स्वाभाविकमहत्वं चात्रैव व्यपदिश्यते-"ज्यायान्पृथिव्या ज्याया- नन्तरिक्षा ज्ज्यायान्दिवो ज्यायानेभ्योलोकेभ्यः" इति । अत उपासनार्त्थमेवाल्पत्वव्यपदेशः । जैसा अर्थ आप करते है वह नही है अपितु परमात्मा ही उपासना के लिए अणीयस रूप से बतलाए गये है। उन्हें अतिसूक्ष्म बतलाने का तात्पर्य है कि, उन्हे अत्यल्प रूप से देखने की चेष्टा करो अर्थात् उनके अणीयस रूप की उपासना करो। इसका यह अर्थ नहीं है कि वे अणीयस रूप वाले ही है इनकी आकाश की सी सूक्ष्मता बतलाई गई है अर्थात् वे सूक्ष्म आकाश की तरह सर्वगत है। परमात्मा की स्वाभाविक महत्ता इस प्रकार वर्णन की गई है- "वह पृथवी से महान् अन्तरिक्ष से महान् द्युलोक से महान् तथा इन समस्त लोकों से महान् है।" इससे सिद्ध होता है कि उपासना के लिए ही उनका अणीयस रूप बतलाया गया है। तथाहि-"सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शांत उपासीत्" इति सर्वोत्पत्तिप्रलयकारणत्वेन सर्वस्याऽत्मतयाऽनुप्रवेशकृतजोव- यितृत्वेन च सर्वात्मकं ब्रह्मोपासीतेत्युपासनं विधाय "अथखलु क्रतुमयः पुरुषो यथा क्रतुरस्मिंल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति" इति यथोपासनं प्राप्यसिद्धिमभिधाय "स क्रतुंकुर्वीत" इति गुणविधानार्थमुपासनमनूद्य "मनोमयः प्राणशरीरो अरूप. सत्यसंकल्प आकाशात्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगंधः सर्वरसः ankurnagpal108@gmail.com
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सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः" इति जगदैश्वर्यविशिष्टस्य स्वरूप- गुणांश्चोपादेयान् प्रतिपाद्य "एष म आत्माऽन्तर्हृदयेऽणीयान् व्रीहेर्वा यवाद् वा सर्षपाद्वा श्यामाकाद् वा श्यामाकतण्डुलाद् वा" इत्यु- पासकस्य हृदयेऽणीयस्त्वेन तदात्मतयोपास्यस्यपरमपुरुषस्योपास- नार्थमवस्थानमुक्त्वा 'एष म आत्माऽन्तर्हृदये ज्यायान् पृथिव्या ज्यायानन्तरिक्षज्ज्यायान् दिवो ज्यायानेभ्योलोकेभ्यः सर्वकर्मा सर्व- कामः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः" इत्यन्तर्हृदयेऽवस्थित- स्योपास्यमानस्य प्राप्याकारं निर्दिश्य—"एष म आत्माऽन्तर्हृदय एतद् ब्रह्म" एवम्भूतं परं ब्रह्म परमकारुण्येनास्मदुज्जिजीविषयाऽस्मद् हृदये सन्निहितमितीदमनुसंधानं विधाय "एतमितः प्रेत्याभिसंभा- विताऽस्मि" इति यथोपासनं प्राप्तिनिश्चयानुसंधानं च विधाय इति यस्य स्यादद्धा न विचिकित्साऽस्ति" इत्येवंविध प्राप्यप्राप्ति- निश्चयोपेतस्योपासकस्य प्राप्तौ न संशयोऽस्तीत्युपसंहृतम् । अतः उपासनार्थमर्भकौकस्त्वमणीयस्त्वं च । तथा—"सारा जगत ब्रह्म का ही रूप है, उसी में लीन हो जाता है, उस परमात्मा की शांतभाव से उपासना करनी चाहिए" वाक्य में, समस्त जगत की उत्पत्ति और प्रलय के कारण सबके आत्मस्वरूप और जीवान्तर्यामी जीवनधारक सर्वात्मक ब्रह्म की उपासना करनी चाहिए, ऐसा उपासना का स्वरूप बतलाकर—"पुरुष निश्चय ही क्रतुमय है, इस लोक में पुरुष जैसे निश्चय वाला होता है वैसा ही मरने पर भी होता है" इस प्रकार उपासना के अनुरूप प्राप्य फल की बात कहकर "इसलिए उस पुरुष को निश्चय करना चाहिए" ऐसा गुण विधान के लिए उपासना का अनुवाद करते हुए "वह ब्रह्म मनोमय प्राणशरीर प्रकाश स्वरूप सत्य- संकल्प आकाश शरीर सर्वकर्मा सर्वकाम सर्वगंध सर्वरस इस सारे जगत को सब ओर से व्याप्त करने वाला, वाणी रहित संभ्रम शून्य है" इत्यादि ब्रह्म के, जागतिक ऐश्वर्यों से विशिष्ट उपादेय स्वरूप गुणों का प्रतिपादन करके "हृदय कमल के भीतर यह आत्मा धान, जव, श्यामाक सरसों से
( ४०४ ) भी सूक्ष्म है" इत्यादि में बतलाया गया कि उपास्य परंपुरुष अतिसूक्ष्म उपासक के हृदय में अभिन्नभाव से स्थित हैं ऐसा निश्चित करके "हृदय कमल में स्थित वह आत्मा, पृथिवी, अंतरिक्ष, द्युलोक तथा इन सभी लोकों से महान् है जो कि—सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगंध, सर्वरस सारे जगत को व्याप्त करने वाला, वाक्यरहित, भ्रमशून्य है।" इत्यादि उस हृदस्थ उपास्यमान परमेश्वर के प्राप्य रूप का वर्णन करके—"मेरे अन्तहृदय में जो आत्मा है वही ब्रह्म है" ऐसी करुणावरुणालय, हमारे उद्धार के लिए तत्पर हृदयस्थित परमात्मा के अनुसंधान की अनिवार्यता बतलाकर "इस शरीर को छोड़कर जाने पर उन्हीं को प्राप्त होऊँगा" इत्यादि उपासना के अनुरूप फलावाप्ति विषयक निश्चित नियम बतलाकर "इत्यादि प्राप्य प्राप्ति निश्चय संबंधी सिद्धान्त निर्णय से उपासक को परब्रह्म की प्राप्ति में कोई संदेह नहीं रह जाता; " ऐसा प्रकरण का उपसंहार किया जाता है। उपर्युक्त प्रकरण की पर्यालोचना से सिद्ध होता है कि—उपासना के लिए ही अल्पायतनत्व और अणीयत्व का प्रतिपादन किया गया है [स्वरूप निरूपण के लिए नहीं]। संभोगप्राप्तिरिति चेन्न वैशेष्यात् ॥१।२।८॥ जीवस्येव परस्यापि ब्रह्मणः शरीरान्तर्वर्त्तित्वमभ्युपगतं चेत्— तद्वदेव शरीरसंबंधप्रयुक्तसुखदुःखोपभोगप्राप्तिरिति चेत्तन्न, हेतु वैशेष्यात्—नहि शरीरान्तर्वर्तित्वमेव सुखदुःखोपभोग हेतुः, अपितु पुण्यपापरूपकर्मपरवशतत्वम्, तत्त्वपहतपाप्मनः परमात्मनो न संभवति । तथा च श्रुतिः “तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति” इति । यदि यह कहें कि—जीव की तरह परब्रह्म की भी यदि शरीर में उपस्थिति मानेंगे तो शरीर संबंध होने से जीव की तरह ही, उनमें भी सुखदुःखात्मक भोग घटित होंगे। सो ऐसा संभव नहीं होगा, क्योंकि दोनों में भोग के कारण की भिन्नता रहती है। शरीर में रहना ही भोग का कारण हो ऐसा कोई आवश्यक नहीं है, अपितु पुण्य पाप रूप कर्म परवशता, भोग का कारण है, जो कि निष्पाप परमात्मा में संभव नहीं ankurnagpal108@gmail.com
( ४०५ ) है। जैसा कि--श्रुति वाक्य भी है--उन दोनो में एक वृक्ष के कर्मरूप फलों का स्वाद लेकर उपभोग करता है, दूसरा केवल देखता मात्र है।" २ अधिकरण:— यदि परमात्मा न भोक्ता, एवं तर्हि सर्वत्र भोक्तृतया प्रतीय- मानो जीव एव स्यादित्याशंक्याह-- यदि परमात्मा भोक्ता नहीं है तो क्या हर जगह जीवात्मा ही भोक्ता कहा गया है ? इस शंका का उत्तर देते हैं— अत्ता चराचरग्रहणात् १।२।९।। कठवल्लीष्वाम्नायते “यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः, मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः” इति । अत्रौदनोपसेचन सूचितोऽत्ता कि जीव एव, उत परमात्मेति संदिह्यते । कियुक्तम् जीव इति । कुतः ? भोक्तृत्वस्य कर्मनिमित्तत्वाज्जीवस्यैवतत्सं- भवात् । कठोपनिषद् में कहा गया है कि—‘धर्मशील ब्राह्मण और धर्म रक्षक क्षत्रिय दोनों जिसके भोज्य बन जाते हैं, सबको मारने वाला काल भी भोज्य का उपसेचन ( चटनी ) बन जाता है, ऐसे की महिमा को कौन जान सकता है?' इस प्रकरण में भोज्य और उपसेचन का भोक्ता कौन है, जीवात्मा या परमात्मा ? कह सकते हैं कि जीवात्मा, क्योंकि निमित्तक भोक्तृत्व जीव में ही संभव हो सकता है। अत्रोच्यते—अत्ता चराचर ग्रहणात्—अत्तापरमात्मैव कुतः ? चराचर ग्रहणात्—चराचरस्य कृत्स्नस्यात्तृत्वं हि तस्यैव संभवति न चेदं कर्मनिमित्तभोक्तृत्वं, अपि तु जगज्जन्मस्थितिलयहेतु भूतस्यपरस्यब्रह्मणोविष्णोः संहर्तृत्वम् “सोऽध्वनः परमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्” इत्यत्रैव दर्शनात् । तथा च “मृत्युर्यस्योप- सेचनं “इति वचनात् “ब्रह्म च क्षत्रं च” इति कृत्स्नं चराचरं
( ४०६ ) जगदिहादनीयौदनत्वेन गृह्यते । उपसेचनं हि नाम स्वयमद्यमानं सदन्यस्यादनहेतुः । अत उपसेचनत्वेन मृत्योरप्यद्यमानत्वात्तदुपसिच्य- मानस्यकृत्स्नस्य ब्रह्मक्षत्रपूर्वकस्य जगतश्चराचरस्यादनमत्र विवक्षितमिति गम्यते । ईदृशंचादनमुपसंहार एव । तस्मादीदृशं जगदुपसंहारित्वरूपं भोक्तृत्वं परमात्मन एव । उक्त संशय पर सूत्रकार कहते है कि--अत्ता परमात्मा ही हैं, क्योकि- इस प्रसंग मे चराचर सभी को भोज्य कहा गया है, चराचर जगत के भोजन करने की क्षमता परमात्मा में ही हो सकती है । यहाँ कर्म निमित्तक भोक्तृत्व की चर्चा नही है, अपितु जगत के जन्म स्थिति और लय के एकमात्र कारण परब्रह्म विष्णु के संहारक शक्ति निमित्तक भोक्तृत्व का प्रसंग है । “वह संसार मार्ग के पार जाकर भगवान विष्णु के सुप्रसिद्ध परमपद को प्राप्त हो जाता है” इत्यादि वाक्य उक्त तथ्य की ही पुष्टि करते हैं । “मृत्युर्यस्योपसेचनम्” तथा “ब्रह्म च क्षत्रं च” इत्यादि वाक्यांश से चराचर संपूर्ण जगत की भोज्यता ज्ञात होती है । स्वयं स्वतंत्र भोज्य होने के साथ ही जो अन्य भोज्य पदार्थों का सहायक भोज्य होता है उसे उपसेचन कहते हैं, उपसेचन रूप से जो मृत्यु का वर्णन किया गया है उसका तात्पर्य है कि--मृत्युमय ब्राह्मण क्षत्रिय आदि सारा जगत उस परमात्मा का भोज्य है। इस प्रकार यहाँ भोजन का अर्थ, संहार के अतिरिक्त, कुछ और नही है । इससे जगत की उपसंहारा- त्मक भोक्तृता परमात्मा की ही निश्चित होती है । प्रकरणाच्च १।२।१० । प्रकरणं चेदं परस्यैव ब्रह्मणः “महान्तं विभुमात्मानं मत्वाधीरो न शोचति” नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन, यमेवैषवृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्” इति हि प्रकृतम् । “क इत्था वेद यत्र सः” इत्यपि हि तत् प्रसादात् ऋते तस्य दुखबोधत्वमेव पूर्वंप्रस्तुतं प्रत्यभिज्ञायते । ankurnagpal108@gmail.com
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उक्त प्रकरण परब्रह्म संबंधी ही है, जैसा कि--“धीर व्यक्ति इन महत् विभु आत्मा को जानकर शोक नहीं करता,”--इन परमात्मा को शास्त्र ज्ञान प्रवचन या मेधा से नहीं जाना जा सकता, वे ही जिसे वरण करते हैं, वही उन्हें पा सकता है, वे उसके समक्ष अपना रूप प्रकट कर देते हैं ।” इत्यादि “वह कहाँ है उसे कौन जानता है ?” इत्यादि वाक्य भी उनकी दुर्बोधता और कृपापेक्षा का ज्ञापन करते हैं ।
अथस्यात्--नायं ब्रह्मक्षत्रौदनसूचितः पुरुषोऽपहतपाप्मा पर- मात्मा, अनन्तरं “ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्यलोके गुहांप्रविष्टौ परमे परार्ध्ये, छायातपौ ब्रह्मविदोवदंति पंचाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः “इति कर्मफलभोक्तुरेव सद्वितीयस्याभिधानात् । द्वितीयश्च प्राणौ बुद्धिर्वा स्यात् । ऋतपानं हि कर्मफल भोग एव, स च परमात्मनो न संभवति, बुद्धिप्राणयोस्तु भोक्तृजीवस्योपकरणभूतयोर्य- थाकथंचित्पानेऽन्वयस्संभवतीति तयोरन्यतरेण सद्वितीयो जीव एव प्रतिपाद्यते, तदेकप्रकरणात्वात् पूर्वप्रस्तुतोऽत्ताऽपि स एव भवितु- मर्हति-इति । तत्रोच्यते--
शंका होती है कि--ब्रह्मक्षत्र भोज्य रूप से जिस भोक्ता के कहे गए हैं वह निष्पाप परमात्मा नहीं है । क्योंकि--जिस प्रकरण में ओदन रूप ब्रह्म क्षत्र का वर्णन है, उसी में आगे “शुभ कर्मों के फलस्वरूप मनुष्य शरीर में, परब्रह्म के उत्तम निवास स्थान बुद्धि रूपी गुहा में छिपे हुए सत्य का पान करने वाले छाया और धूप के समान दो परस्पर भिन्न हैं, ऐसा ब्रह्म वेत्ता ज्ञानी पुरुष कहते हैं, तथा तीन बार नाचिकेत अग्नि का चयन करने वाले पंचाग्नि संपन्न गृहस्थ भी ऐसा ही कहते हैं” इस प्रकार द्वितीय कर्मफल भोक्ता का वर्णन है; द्वितीय प्राण या बुद्धि हो सकते हैं । ऋतपान का अर्थ, कर्मफल का भोग ही है, जो कि—परमात्मा में संभव नहीं है । बुद्धि और प्राण भोक्ता जीव के सहायक उपकरण हैं, प्राण को यदि मुख्य प्राण मानें तो जीव ही द्वितीय स्थानीय होता है और उसे ही भोक्ता कहा गया है । एक ही प्रकरण में जिस प्रसंग की
( ४०८ ) प्रस्तावना की जाती है, उसे ही आगे समर्थन किया जाता है । इसलिए जीव ही भोक्ता हो सकता है । इस शंका का समाधान करते हैं— गुहांप्रविष्टावात्मानौ हि तद्दर्शनात् ॥१।२।११॥ न प्राणजीवौ बुद्धिजीवौ वा गुहां प्रविष्टावृतं पिबन्तावित्युच्येते अपि तु जीवपरमात्मानौ हि तथाव्यपदिश्येते । कुत ? तद्दर्शनात् । अस्मिन् प्रकरणे जीवपरयोरेव गुहाप्रवेश व्यपदेशो दृश्यते । पर- मात्मानस्तावत् “तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम्, अध्यात्मयोगाधिगमेन देवंमत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति” इति । जीवस्यापि—“या प्राणेन सम्भवत्यदितिर्देवतामयी, गुहां प्रविश्य तिष्ठन्ती या भूतेभिर्व्यजायत” इति । कर्मफलान्यत्तीत्यदितिर्जीव उच्यते । प्राणेन सम्भवति-प्राणेन सहवर्त्तते । देवतामयी-इन्द्रियाधीन भोगा। गुहां प्रविश्य तिष्ठन्ती-हृदयपुण्डरीकोदरवर्त्तिनो । भूतेभि- व्यंजायत्-पृथिव्यादिभिर्भूतैस्सहिता देवादिरूपेण विविधा जायते । एवं च सति “ऋतं पिबन्तौ” इति व्यपदेशः “छत्रिणोगच्छन्ति” इतिवत् प्रतिपत्तव्यः । यद् वा प्रयोज्यप्रयोजकरूपेण कर्तृत्वं जीव- परयोरुपपद्यते । उक्त प्रकरण में प्राण-जीव या बुद्धि जीव की गुहा में बैठने की बात नहीं है अपितु जीव और परमात्मा के प्रवेश की बात है । इस प्रकरण में जीव और परमात्मा का ही प्रसंग चल रहा है । प्रसंग के पूर्वभाग में परमात्मा का वर्णन जैसे— “जो योगमाया के पर्दे में छिपा हुआ, सर्वव्यापी, सबकी हृदय गुहा में स्थित, संसार रूप गहन वन में रहने वाले, सनातन, कठिनता से देखे जाने वाले परमात्मा देव को शुद्ध बुद्धि युक्त साधक, अध्यात्मयोग की प्राप्ति द्वारा समझकर हर्ष शोक को छोड़ देते हैं ।” प्रकरण के उत्तर भाग में जीव का वर्णन जैसे--“जो देवतामयी अदिति प्राणों के सहित उत्पन्न होती है या जो प्राणियों के सहित उत्पन्न होती है, हृदयरूपी गुहा में प्रवेश करके वही रहती है ।” ankurnagpal108@gmail.com
( ४०६ ) इत्यादि में अदिति का तात्पर्य है, कर्मफलों को भोगने वाली, इस व्याख्या के अनुसार अदिति शब्द जीव वाची ही है। प्राणेन संभवति का तात्पर्य है, प्राण के साथ व्यवहार करना। देवतामयी का तात्पर्य है—इन्द्रियाधीन भोग। “गुहां प्रविश्य तिष्ठंती” का अर्थ है हृदयकमल के अन्दर रहने वाली। “भूतेभिर्व्यजायत” का अर्थ है—पृथिवी आदि भूतों के साथ देवादि अनेक आकृतियों को धारण करने वाली। इसी प्रकार “ऋतं पिबन्तौ” का अर्थ “छत्रिणो गच्छन्ति” की तरह जानना चाहिए [जैसे कि छाता लगाकर जाते हुए झुंड को देखकर कहा जाता है कि छाते वाले जा रहे हैं, वस्तुतः छाता एक ही के सर पर होता है पर प्रयोग सभी के लिए होता है. वैसे ही गुहा में जीवात्मा परमात्मा दोनों हैं, जीवात्मा ही केवल ऋतदान करता है, परन्तु प्रयोग दोनों के लिए किया गया है] अथवा प्रयोजक परमात्मा और प्रयोज्य जीवात्मा है, ऐसा मान कर ही दोनों को भोक्ता कहा गया है [अर्थात् परमात्मा की प्रेरणा से ही जीवात्मा भोग करता है, इसलिए दोनों को ही भोक्ता कह दिया गया] विशेषणाच्च ।१।२।१२॥ अस्मिन् प्रकरणे जीवपरमात्मानावेवोपास्यत्वोपासकत्वप्राप्यत्व- प्राप्तृत्वविशिष्टौ सर्वत्र प्रतिपाद्येते । तथाहि–“ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति” इति । ब्रह्मजज्ञो जीवः ब्रह्मणोजातत्वात् ज्ञत्वाच्च, तं देवमीडं विदित्वा–जीवात्मानमुपासकं ब्रह्मात्मकत्वेनावगम्येत्यर्थः । तथा–“यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत्परम्, अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतं शकेमहि” इत्युपास्यः परमात्मोच्यते । नाचिकेतं नाचिकेतस्य कर्मणः प्राप्यमित्यर्थः । “आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरंरथमेव च” इत्यादिनोपासको जीव उच्यते । तथा–“विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः, सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्” इति प्राप्यप्राप्तारावभिधीयेते जीवपरमात्मानौ । इहापि “छायातपौ” इत्यज्ञत्वसर्वज्ञत्वाभ्यांतावेव विशिष्य व्यपदिश्येते । ankurnagpal108@gmail.com
( ४१० ) इस प्रकरण मे जीवात्मा और परमात्मा का उपास्य उपासक तथा प्राप्य प्रापक विशिष्ट रूप से सर्वत्र प्रतिपादन किया गया है। जैसा कि— “ब्रह्मोपासको से स्तवनीय परमात्मा को जानकर निष्कामभाव से उपासना करने वाला अत्यत शांति प्राप्त करता है” इस श्रुति से ज्ञात होता है। ब्रह्मजज्ञ का अर्थ है जीव, ब्रह्म से उत्पन्न होने अथवा ब्रह्म को जानने से ब्रह्मजज्ञ है। स्तवनीय उस देव को जानकर का तात्पर्य है जीवात्मा उपासक भाव से ब्रह्म स्वरूप को जानकर। तथा—“जो उपासकों के लिए सेतु के समान ( विभिन्न प्रकार के फल दाता ) हैं और जो भवसागर से पार होने के इच्छुको को अभय देने वाले हैं उन नाचिकेत कर्मलभ्य अक्षर ब्रह्म को हम जानने मे समर्थ हो सकते हैं ।” इस वाक्य मे परमात्मा को उपास्य बतलाया गया है। नाचिकेत का तात्पर्य है नाचिकेत कर्म के फलस्वरूप प्राप्त। “आत्मा को रथी तथा शरीर को रथ जानो” इत्यादि मे जीव को उपासक बतलाया गया है। तथा—“विज्ञान ( बुद्धि ) जिसका सारथी, तथा मन जिसकी लगाम है ऐसा मनुष्य विष्णू के परपद मार्ग को सरलता से प्राप्त कर लेता है ।” इत्यादि में जीवात्मा परमात्मा को प्राप्य प्रापक रूप से बतलाया गया है। इसी प्रकार “छायातपौ” इत्यादि मे अनभिज्ञ जीवात्मा तथा सर्वज्ञ परमात्मा का विशिष्ट उल्लेख है। अथस्यात्—“येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये अस्तीत्येके नायम- स्तीति चैके” इति जीवस्वरूपयाथात्म्यप्रश्नोपक्रमत्वात्सर्वमिदं प्रकरणं जीवपरं इति प्रतीयते। नैतदेवम्, न हि जीवस्य देहाति- रिक्तस्यास्तित्वनास्तित्वशंकायाऽयं प्रश्नः, तथासति पूर्वावरद्वयवर- णानुपपत्तेः। तथा हि पितुः सर्ववेदसदक्षिणक्रतुसमाप्तिवेलायां दीय- मानं दक्षिणावैगुण्येन क्रतुवैगुण्यं मन्यमानेन कुमारेण नचिकेतसा आस्तिकाग्रेसरेण स्वात्मदानेनापि पितुः क्रतुसाद्गुण्यमिच्छता “कस्मै मां दास्यसि” इत्यसकृत्पितरं पृष्टवतास्वनिर्बन्धरुष्टपितृ- वचनान्मृत्युसदनं प्रविष्टेन स्वसदनात्प्रोषुषि यमे तद्दर्शनात्तत्र तिस्रो रात्रीरुपोषुषा स्वोपवासभीततत्प्रतिविधानप्रवृत्तमृत्युप्रदत्ते