सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

इक्कीसवाँ अध्याय 21/116-121 ]
अनुवाद-पतिव्रता स्त्रियोंकी उपास्य और
श्रीनारायणकी अत्यन्त प्रियतमा लक्ष्मी ही इस विषयमें
साक्षी हैं। उन लक्ष्मीने श्रीकृष्णके इसी माधुर्यके लोभसे
सब प्रकारके काम-भोगोंको छोड़कर व्रत धारण करके
तपस्या की थी॥ 116॥
अन्यान्य प्रकाश-विग्रहोंमें स्वेच्छाके अनुरूप प्रयोजनके
अनुसार अपने स्वतःसिद्ध माधुर्यके अंशका प्रकाश :-
सेइ त' माधुर्य-सार, अन्य-सिद्धि नाहि तार,
तिँहो-माधुर्यादि-गुणखनि।
आर सब प्रकाशे, ताँर दत्त गुण भासे,
याँहा यत प्रकाशे कार्य जानि ॥ 117 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 117 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-वह श्रीकृष्णमाधुर्य अनन्यसिद्ध
अर्थात् स्वयं सिद्ध है, वह और किसी गुणके द्वारा
सिद्ध नहीं होता। वह श्रीकृष्णमूर्ति अपने अन्य-अन्य
प्रकाशमें अर्थात् श्रीनारायणादि मूर्तियोंमें अपने प्रकाशके
द्वारा जो-जो कार्य होगा, उसके अनुरूप ऐश्वर्य-वीर्य
आदि गुण प्रकट कराती है ॥ 117 ॥
श्रीकृष्णमाधुर्य और गोपीप्रेम,
दोनों ही नित्य-नवनवायमान :-
गोपीभाव-दरपण, नव नव क्षणे क्षण,
तार आगे कृष्णेर माधुर्य।
दोंहे करे हुड़ाहूड़ि, बाड़े मुख नाहि मुड़ि,
नव नव दोंहार प्राचुर्य ॥ 118 ॥
अनुवाद-गोपियोंका भाव उस दर्पणके समान है,
जिसके आगे श्रीकृष्णका माधुर्य क्षण-क्षणमें नव-नवायमान
रूप धारण करता है। गोपियोंके भाव और श्रीकृष्णके
माधुर्य-दोनोंमें होड़ सी लग जाती है, दोनों ही बढ़ते
जाते हैं, कोई भी हार नहीं मानता, बल्कि दोनों ही
नव-नवायमान होकर बढ़ते ही जाते हैं ॥ 118 ॥
रागानुगा भक्तिके बिना श्रीकृष्णमाधुर्य सुदुर्लभ :-
कर्म, तप, योग, ज्ञान, विधि-भक्ति, जप, ध्यान,
इँहा हैते माधुर्य दुर्लभ।
केवल ये रागमार्गे, भजे कृष्णे अनुरागे,
तारे कृष्ण-माधुर्य सुलभ ॥ 119 ॥
अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 119 ॥
अनुभाष्य-कर्म, तप, योग, ज्ञान, वैधीभक्ति, जप,
ध्यानादि साधनोंके द्वारा माधुर्यकी प्राप्ति नहीं होती;
श्रीकृष्ण-माधुर्य केवलमात्र रागमार्गसे श्रीकृष्ण-नाम
भजनमें अनुरागयुक्त व्यक्तिके लिये ही सुलभ है॥ 119 ॥
स्वयं-भगवान् व्रजेन्द्रनन्दनसे ही अन्यान्य भगवत्ता :-
सेइरूप व्रजाश्रय, ऐश्वर्य-माधुर्यमय,
दिव्यगुणगण-रत्नालय।
आनेर वैभव-सत्ता, कृष्णदत्त भगवत्ता,
कृष्ण-सर्व-अंशी, सर्वाश्रय ॥ 120 ॥
अनुवाद-श्रीकृष्णका सर्वाकर्षक रूप केवल व्रजमें
ही विद्यमान है। वह रूप ऐश्वर्य-माधुर्यमय और दिव्य
गुणरूपी रत्नोंका भण्डार है। अन्यान्य भगवदावतारोंकी
वैभव-सत्ता और भगवत्ता श्रीकृष्णके द्वारा ही प्रदत्त है।
श्रीकृष्ण सबके अंशी और सबके आश्रय हैं॥ 120 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीनारायणादिकी जो वैभवसत्ता
है, उसे श्रीकृष्णके द्वारा प्रदत्त भगवत्ता ही जानना
होगा ॥ 120 ॥
श्रीकृष्ण-समस्त चिन्मय सद्गुणोंके समाश्रय :-
श्री, लज्जा, दया, कीर्त्ति, धैर्य, वैशारदी मति,
एइ सब कृष्णे प्रतिष्ठित।
सुशील, मृदु, वदान्य, कृष्ण बिना नाहि अन्य,
कृष्ण करे जगतेर हित ॥ 121 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 121 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीनारायणमें श्री, लज्जा, दया,
कीर्ति, धैर्य, वैशारदी (निपुण) मतिरूपी जो सब
। 315

[ 21/121-124 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
[बायाँ स्तम्भ]
उज्ज्वल गुण समूह दिखलायी देते हैं, वे सब श्रीकृष्णके
द्वारा उनमें प्रतिष्ठित हुए हैं। किन्तु सुशीलता, मृदुता
और वदान्यता—श्रीकृष्णके अतिरिक्त और किसी भी
प्रकाशमें दिखलायी नहीं पड़ती। [श्रीकृष्ण ही जगत्‌का
हित करते हैं।]॥ 121 ॥
श्रीकृष्णके रूप-माधुर्यका पान करनेके लिये
पलकरहित चक्षुओंकी आकाङ्क्षा :—
कृष्ण देखि' यत जन, कैल निमिषे निन्दन,
व्रजे विधि निन्दे गोपीगण॥”
सेइ सब श्लोक पड़ि', महाप्रभु अर्थ करि',
सुखे माधुर्य करे आस्वादन॥ 122 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्णके रूप माधुर्यको देखकर अनेक
लोगोंने अपनी पलकोंके झपकनेकी निन्दा की है।
ब्रजमें गोपियोंने तो पलकोंको बनानेवाले विधाता
(ब्रह्मा)की भी निन्दा की है।” महाप्रभु श्रीमद्भागवतके
ऐसे और भी श्लोकोंको पढ़कर और उनके अर्थोंको
प्रकाशित करके आनन्दपूर्वक श्रीकृष्णके माधुर्यका
आस्वादन करने लगे॥ 122 ॥
अनुभाष्य—'निमिषे निन्दन'—नेत्रको ढकनेवाले अङ्गको
'पलक' कहते हैं, नेत्रके ऊपर लगी होनेके कारण वह
देखनेमें बाधा देती है, इसलिये वह निन्दनीय है॥ 122 ॥
श्रीकृष्णके मुखकमलका मधुपान करनेसे जड़सुलभ तृप्ति
नहीं; प्रतिक्षण गोपियोंके आनन्दरूपी समुद्रकी वृद्धि :—
श्रीमद्भागवत (9/24/65)में—
“यस्याननं मकरकुण्डलचारुकर्ण-
भ्राजत्कपोलसुभगं सविलासहासम्।
नित्योत्सवं न ततृपुर्दृशिभिः पिबन्त्यो
नार्यो नराश्च मुदिताः कुपिता निमेेश्च॥ 123 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 123 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जिनके मुखचन्द्र, मकरकुण्डलसे
सुशोभित कर्ण (कान), शोभायमान कपोल (गाल),
[दायाँ स्तम्भ]
सौन्दर्य, विलासपूर्ण मुस्कराहट—इन समस्त नित्य
उत्सवोंको नेत्रोंके द्वारा पान करके नर-नारी परम
आनन्दित होते हैं और दर्शनमें बाधा देनेवाली नेत्रोंकी
पलकोंके प्रति क्रोधित होते हैं॥ 123 ॥
अनुभाष्य—श्रील शुकदेव महाराज परीक्षितको
यदुवंशका वर्णन करते-करते श्रीकृष्णके अवतारोंके
उद्देश्य और उनके सर्वलोक-मनोहर अतुल सुन्दर
रूप-माधुर्यका वर्णन कर रहे हैं—
यस्य (कृष्णस्य) मकरकुण्डलचारुकर्णभ्राजत्कपोलसुभगं
(मकरकुण्डलाभ्यां चारू शोभितौ कर्णौ ताभ्यां भ्राजन्तौ
समुज्ज्वलौ यौ कपोलौ गण्डदेशौ, ताभ्यां सुभगं कमनीयं)
सविलासहासं (सविलासः सलीलः हासः यस्मिन् तत्) नित्योत्सवं
(नित्यम् उत्सवः आनन्दः यस्मिन् तत्) आननं (मुखपद्मं)
नार्यः नराः दृशिभिः (नेत्रैः) पिबन्त्यः [अपि] न तु ततृपुः
(तृप्ताः) [निमेषोन्मेषमात्रव्यवधानमप्यसहमानास्तत्कर्तुः] निमेः
(विधातुः) कुपिताः (क्रुधाः च बभूवुः)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। पलक
झपकनेके समय दर्शनमें जो बाधा होती है, वह उनके
लिये असहनीय होती है॥ 123 ॥
श्रीमद्भागवत (10/31/15)में :—
अटति यद्भवानह्नि काननं
त्रुटिर्युगायते त्वामपश्यताम्।
कुटिलकुन्तलं श्रीमुखञ्च ते
जड़ उदीक्षतां पक्ष्मकृद्दृशाम्॥ 124 ॥
अनुवाद—गोपियाँ बोलीं,—“हे कृष्ण! दिनके समयमें
जब तुम वनमें चले जाते हो, तब तुम्हारे घुँघराले
केशोंसे सुशोभित श्रीमुखको न देखकर हमारा एक-एक
त्रुटिकाल भी युगके समान प्रतीत होता है। तुम्हारे
मुखारविन्दका दर्शन करानेवाले हमारे नेत्रोंपर जिस
विधाताने पलकोंकी सृष्टि की है, उसे हम मूर्ख मानती
हैं॥” 124 ॥
अनुभाष्य—आदिलीला 4/153 संख्या देखें॥ 124 ॥
316 |

इक्कीसवाँ अध्याय 21/125 ]
कामगायत्री-साक्षात् श्रीकृष्ण विग्रह, एक एक
अक्षर-एक-एक अङ्ग-प्रत्यङ्ग :-
[यथा राग:]
कामगायत्री-मन्त्ररूप, हय कृष्णेर स्वरूप,
सार्द्ध चब्बिश अक्षर तार हय।
से अक्षर 'चन्द्र' हय, कृष्ण करि' उदय,
त्रिजगत् कैला काममय ॥ 125 ॥
अनुवाद—कामगायत्री मन्त्र श्रीकृष्णका स्वरूप है।
इस मन्त्रराजमें साढ़े चौबीस अक्षर हैं और इस मन्त्रका
प्रत्येक अक्षर पूर्ण चन्द्र है। ये चन्द्रसमूह श्रीकृष्णको
उदित कराकर त्रिजगत्को प्रेममय बना देते हैं ॥ 125 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—कामगायत्री मन्त्र श्रीकृष्णस्वरूप
है। कामबीजको अर्द्ध (आधा) अक्षर माननेसे उसमें
साढ़े चौबीस अक्षर होते हैं ॥ 125 ॥
अनुभाष्य—'कामगायत्री'—मध्यलीला 8/137 संख्या
देखें। कामगायत्रीके साढ़े चौबीस अक्षर ही श्रीकृष्णके
अङ्गोंमें साढ़े चौबीस चन्द्र जैसे हैं और वे श्रीकृष्णस्वरूप
हैं, क्योंकि वे-सम्बन्ध, अभिधेय और प्रयोजन नामक
तीन तत्त्वोंसे युक्त हैं ॥ 125 ॥
अमृतानुकणा—"पद्मपुराणके सृष्टिखण्डमें ऐसा लिखा
है कि वेदमाता गायत्रीने भी गोपी जन्म लेकर
श्रीकृष्णका सङ्ग प्राप्त किया था। उसी समयसे उन्होंने
कामगायत्रीका रूप धारण कर लिया है। ×× कामगायत्री
निश्चय ही अनादि हैं। वे अनादि गायत्री पहले वेदमाता
गायत्रीके रूपमें प्रकट थीं। बादमें साधनके प्रभावसे और
अन्यान्य उपनिषदोंका सौभाग्य देखकर गोपालोपनिषद्के
साथ व्रजमें जन्म लिया। कामगायत्रीके रूपमें नित्य
होकर भी वे वेदमाता गायत्रीके रूपमें नित्य पृथक्
विराजमान हैं।" (जैवधर्म, 32वाँ अः)
श्रीश्रीमद् विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुरने 'मन्त्रार्थ-दीपिका'-
ग्रन्थमें साढ़े-चौबीस-अक्षरात्मक कामगायत्री-मन्त्रकी
व्याख्यासे सम्बन्धित एक विशेष घटनाका वर्णन किया
है, वह इस प्रकार है,—
“हे वैष्णवों ! मेरे इस 'कामगायत्री'की व्याख्याके
लिखनेका वृत्तान्त आप लोग श्रवण करो।
श्रीचैतन्यचरितामृतमें श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीने
प्राकृत वर्ण अनुसार कामगायत्रीकी वर्ण-संख्या साढ़े
चौबीस कहकर जो लिखा है, उस मतानुसार मैंने भी
वही लिखा है। वह जैसे,—
“कामगायत्री-मन्त्ररूप, हय कृष्णेर स्वरूप,
सार्द्ध-चब्बिश अक्षर तार हय।
से अक्षर 'चन्द्र' हय, कृष्ण करि' उदय,
त्रिजगत् कैला काममय ॥”
इस प्रमाणका अवलम्बन करके पूर्वमतके अनुसार
अनुक्रम संस्थापित हुआ है। किन्तु श्रीकृष्णदास कविराज
गोस्वामीने कामगायत्रीकी अक्षर संख्या 'पचीस' छोड़कर
किस प्रमाण अथवा किस अभिप्रायसे साढ़े चौबीस कही
है, वह मैं समझ नहीं पाया। अनेक शास्त्रोंको पढ़कर
अथवा श्रवण करके मैंने यह जाना कि शास्त्रोंके
विचारसे अर्द्ध-अक्षरकी सम्भावना नहीं है, इसलिये मैं
महा-सन्देहके सागरमें निमग्न हो गया था। यदि कोई
कहे कि मात्राहीन 'त'-कार (त्)—अर्द्ध-अक्षर है, तो
ऐसा होनेपर मात्राहीन अक्षर यहाँपर और भी हैं,
इसलिये ऐसा भी नहीं हो सकता। व्याकरण, पुराण,
आगम, नाट्य-अलङ्कारादि शास्त्रोंमें स्वरवर्ण-व्यञ्जनवर्णके
भेदसे पचास वर्णोंका ही उल्लेख है, किन्तु कहीं भी
अर्द्धाक्षरका कोई प्रमाण नहीं है। श्रीजीव गोस्वामीके
द्वारा रचित श्रीहरिनाममृत-व्याकरणमें “नारायणादुद्भूतोऽयं
वर्णक्रमः”-संज्ञापादमें स्वर-व्यञ्जनके प्रसङ्गमें पचास
अक्षरोंका ही उल्लेख है, इसी प्रकार अन्य व्याकरणोंमें
भी वही विचार है। और वृहन्नारदीय पुराणमें
श्रीराधिका-सहस्रनाम-स्तोत्रमें वृन्दावनेश्वरी श्रीराधिकाको
पचास-वर्णरूपिणी कहा गया है। इस प्रकार अन्य
शास्त्रोंमें भी और मातृकान्यास आदिमें भी मातृकादि-
प्रकरणमें कहीं भी मैंने अर्द्धाक्षरके साथ पचास वर्णक्रम
। 317

[ 21/125-126 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
नहीं देखा। ऐसा होनेपर क्या इन सब शास्त्रोंको श्रील
कविराज गोस्वामी नहीं जानते थे? यह भी सम्भव नहीं
है, क्योंकि वे भ्रम-प्रमादादि दोषोंसे सर्वथा रहित हैं,
यह सब जानते हैं।
पुनः यदि उक्त मन्त्रमें मात्राहीन 'त'-कार (अर्थात्
सबसे अन्तमें 'प्रचोदयात्'के 'त्') को अर्द्धाक्षर माना
जाय, तो क्या श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीने क्रमभङ्ग
करके (अर्द्धचन्द्र) लिखा है? क्योंकि उक्त वर्णक्रमानुसार
श्रीकृष्णके मुख-कपोल-चरणान्त इस क्रमसे सबसे
अन्तमें जो श्रीचरण हैं, उसको परित्याग करके उन्होंने
उन्होंने ललाटमें अर्द्धचन्द्र स्थापित किया है। वह
जैसे—श्रीचैतन्यचरितामृतमें मध्यलीलामें इक्कीसवें अध्यायमें
श्रीसनातन-शिक्षाके प्रसङ्गमें सम्बन्धतत्त्व विचारमें—
“सखि हे, कृष्णमुख-द्विजराज-राज।
कृष्णवपु-सिंहासने, वसि’ राज्यशासने,
करे सङ्गे चन्द्रेर समाज॥
दुइ गण्ड सुचिक्कण, जिनि’ मणि-सुदर्पण,
सेइ दुइ पूर्णचन्द्र जानि।
×× सब लोक करे आप्यायित॥”
इस रूपमें दो प्रकार अनुवादके द्वारा बहुत विचार
करनेपर भी मुझे कोई समाधान नहीं मिला। तब सब
उपाय छोड़कर, अन्न-जलादि त्यागकर, मैं मनमें दुःखी
होकर देहत्यागके अभिप्रायसे राधाकुण्डके तटपर आ
गया। जब मन्त्राक्षर नहीं जानता हूँ, तब मन्त्रदेवता
कैसे गोचर होंगे, इसलिये देह-त्याग करना ही कर्त्तव्य
है (मैंने यह निश्चय किया)।
उसके बाद रात्रिका द्वितीय प्रहर होनेपर तन्द्रा
आनेपर मैंने देखा कि श्रीवृषभानुनन्दिनी आकर कह
रही हैं,—'हे विश्वनाथ! हे हरिवल्लभ! तुम उठो।
श्रीकृष्णदास कविराजने जो कुछ लिखा है, वही सत्य
है। वह मेरी नर्मसखी है। मेरे अनुग्रहसे मेरे अन्तःकरणकी
सभी भावनाओंको जानते हैं। इसलिये उनके वचनोंमें
तनिक भी सन्देह मत करना। काम-गायत्री मेरी और
मेरे प्राणवल्लभकी उपासनाका मन्त्र है। हमलोग मन्त्राक्षरके
द्वारा भक्तोंके निकट प्रकाशित होते हैं। मेरे अनुग्रहके
बिना हम दोनोंको कोई भी जाननेमें समर्थ नहीं है।
‘वर्णागम-भास्वत्’ नामक ग्रन्थमें अर्द्धाक्षरका निरूपण
किया गया है, उसे देखकर ही श्रीकृष्णदास कविराजने
लिखा है, वह सुनो। उसके बाद तुम इस ग्रन्थको
देखकर सबके उपकारके लिये प्रमाण संग्रह करो।” यह
सुनकर मैं शीघ्रतासे उठ गया। जाग्रत होकर सन्देह दूर
होनेपर “हा राधे!” कहकर बार-बार विलाप करने
लगा। फिर उनके आदेशको हृदयमें धारण करके
उनकी आज्ञा पालनमें तत्पर हो गया। श्रीमती राधिकाने
अर्द्धाक्षर निर्णय करनेके विषयमें जो इङ्गित दिया
था— “व्यन्त-यकारोऽर्द्धाक्षरं ललाटेऽर्द्धचन्द्रबिम्बः तदितरं
पूर्णाक्षरं पूर्णचन्द्रः।” उसके अनुसार उक्त मन्त्रमें ‘वि’के
पूर्व जो ‘य’ है, वही अर्द्धाक्षर है (अर्थात् ‘कामदेवाय’-
पदके ‘य’-कारके बाद ‘विद्महे’-पदका ‘वि’-अक्षर है,
इसलिये उक्त ‘य’-कार अर्द्धाक्षर है)। वही ललाटमें
अर्द्धचन्द्र-स्वरूप है। उसके अतिरिक्त अन्य सभी
अक्षर पूर्णाक्षर या पूर्णचन्द्र हैं।
×בवर्णागम-भास्वत्’–का प्रमाण इस प्रकार
है— “विकारान्त-यकारेण अर्द्धाक्षरं प्रकीर्त्तितम्॥”125॥
श्रीकृष्णके साढ़े चौबीस अङ्ग-चन्द्रके
ऊपर श्रीमुखचन्द्रका राजत्व :—
सखि हे, कृष्ण मुख—द्विजराज-राज।
कृष्णवपु-सिंहासने, बसि’ राज्य-शासने,
करे सङ्गे चन्द्रेर समाज॥ 126॥ ध्रु॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 126॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'द्विजराज-राज'—चन्द्रोंका राजा।
[हे सखि,] वह श्रीकृष्णमुखचन्द्र राजा होकर, श्रीकृष्णशरीररूप
सिंहासनपर बैठकर, (अङ्ग-प्रत्यङ्गादि) चन्द्रोंका समाज
लेकर माधुर्य-राज्यपर शासन कर रहा है। कहाँ कौन
सा चन्द्र है, वह बादमें बतलाया जा रहा है॥ 126॥
अनुभाष्य—श्रीकृष्णमुखमण्डल-चन्द्र ही चन्द्रराज है;
318 ।

इक्कीसवाँ अध्याय 21/126-131 ]
(1) मुखचन्द्र, (2) बायाँ कपोलचन्द्र, (3) दायाँ
कपोलचन्द्र, (4) चन्दनबिन्दुचन्द्र, (5-14) हाथोंके
नखचन्द्र, (15-24) पाँवोंके नखचन्द्र, (24 ½) ललाटका
अर्द्धचन्द्र;—इन साढ़े चौबीस चन्द्रोंके समाजको लेकर
श्रीकृष्णमुख-चन्द्रराजा श्रीकृष्ण देहरूप सिंहासनपर
बैठकर राजत्व कर रहा है ॥ 126 ॥
दुइ गण्ड सुचिक्वण, जिनि' मणि-सुदर्पण,
सेइ दुइ पूर्णचन्द्र जानि।
ललाटे अष्टमी-इन्दु, ताहाते चन्दन-बिन्दु,
सेह एक पूर्णचन्द्र मानि ॥ 127 ॥
करनख-चान्देर ठाट, वंशी-उपर करे नाट,
तार गीत मुरलीर तान।
पदनख-चन्द्रगण, तले करे नर्त्तन,
नूपुरेरे ध्वनि यार गान ॥ 128 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्णके दो अत्यन्त उज्ज्वल कपोल
दो पूर्ण चन्द्र हैं, ये चमकती मणियोंकी शोभाको भी
तिरस्कृत कर देनेवाले हैं। उनके ललाटपर अष्टमीका
चन्द्र अर्द्धचन्द्र और उसमें चन्दनका बिन्दु एक
पूर्णचन्द्र है। श्रीकृष्णके हाथोंके नख एक-एक पूर्ण चन्द्र
हैं और उनके हाथोंमें धारण की हुई वंशीके ऊपर वे
नृत्य करते हैं, उनका गीत ही मुरलीकी तान है। उनके
चरणोंके नख भी पूर्ण चन्द्र हैं और वे पृथ्वीपर नृत्य
करते हैं, तब नूपूरकी ध्वनि ही उनका गान है॥ 127-128 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'अष्टमी-इन्दु'—अर्द्धचन्द्र ॥ 127 ॥
अनुभाष्य—'ठाट'—स्थिति; 'नाट'—नाट्य ॥ 128 ॥
विलासमैं मत्त क्षत्रियकी भाँति श्रीकृष्णमुखकमल—
गोपियोंके चित्तको बींध देनेवाला :—
नाचे मकर-कुण्डल, नेत्र—लीला-कमल,
विलासी राजा सतत नाचाय।
भ्रू-धनु, नेत्र-बाण, धनुर्गुण-दुई काण,
नारीमन-लक्ष्य बिन्धे ताय ॥ 129 ॥
अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 129 ॥
अनुभाष्य—श्रीकृष्णमुखचन्द्र विलासी राजा है; वह
मुखचन्द्र मकर-कुण्डलों और नेत्रकमलोंको सदा नृत्य
कराता है। भौंहे-धनुषके समान हैं, नेत्र उसके बाण
हैं; दोनों कान-धनुषकी रस्सीसे बँधे हुए हैं; कानों तक
विस्तृत नेत्ररूपी बाणोंके द्वारा श्रीकृष्ण गोपनारियोंके
मनरूपी लक्ष्य-वस्तुको बींधते हैं ॥ 129 ॥
महादान्यरूपमें सबको अङ्ग-चन्द्रसमूहसे
अमृत-वितरण :—
एइ चान्देर बड़ नाट, पसारि' चान्देर हाट,
बिनिमूले बिलाय निजामृत।
काँहो स्मित-ज्योत्स्नामृते, काँहारे अधरामृते,
सब लोक करे आप्यायित ॥ 130 ॥
अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 130 ॥
अनुभाष्य—श्रीकृष्ण मुखचन्द्रका नाट्य (नृत्य)
सभीका ही अतिक्रम करता है और अन्य साढ़े तेईस
चन्द्ररूपी बिक्री किये जानेवाले द्रव्योंके द्वारा हाटका
विस्तार करके अपने अमृतको बिना मूल्यके वितरण
करता है। किसी ग्राहकको मधुर हास्यरूप ज्योत्स्नामृतके
द्वारा, किसी ग्राहकको अधरामृतके द्वारा और अन्यान्य
सभीको किसी अन्य प्रकारसे प्रसन्न करता है ॥ 130 ॥
कामक्रीड़ामत्त मुखचन्द्र-राजाके मन्त्री और
प्रमोदविलास-भवन आदिका वर्णन :—
विपुलायतारुण, मदन-मद-घूर्णन,
मन्त्री यार ए दुइ नयन।
लावण्य-केलि-सदन, जन-नेत्र-रसायन,
सुखमय गोविन्द-वदन ॥ 131 ॥
अनुवाद—लालिमायुक्त दो नयन जिनके कोर कानों
तक प्राय विस्तृत हैं, उस श्रीकृष्णमुखरूप राजाके मन्त्री
हैं और वे मदनके मदको नष्ट करते हैं। गोविन्दका
मुखकमल जो आनन्दसे परिपूर्ण है, वह लावण्यकी
। 319

[ 21/131-135 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
लीलाका वासस्थान है और वह सभीके नेत्रोंके लिये
रसायन स्वरूप है॥131॥
अमृतप्रवाह भाष्य-अति विस्तृत लालिमायुक्त दो
नयन-उन श्रीकृष्णमुखरूप राजाके मन्त्री हैं, वे मदनके
मदको नष्ट करते हैं॥131॥
श्रीकृष्णमुखचन्द्रके दर्शनसे गोपियोंकी नवनवायमान,
नित्य वर्द्धित होनेवाली, परम-चमत्कारमयी चिन्मयी अतृप्ति,
उसके लिये विधिकी निन्दा :-
याँर पुण्यपुञ्ज-फले, से मुख दर्शन मिले,
दुइ आँखि कि करिबे पाने?
द्विगुण बाड़े तृष्णा-लोभ, पिते नारे-मनःक्षोभ,
दुःखे करे विधिर निन्दने॥132॥
अनुवाद-अनुभाष्य देखें॥132॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'दुइ आँखि कि करिबे
पाने' -दर्शकके दो नेत्र किस प्रकार उस अमृतसमुद्रका
पान कर सकते हैं?॥132॥
अनुभाष्य-भक्तिजनित अनुष्ठानसे ही भक्ति-उन्मुखी
'सुकृति' उत्पन्न होती है। देखनेवाले व्यक्तिके दो नेत्रोंके
द्वारा ऐसे श्रीकृष्णमुखका कितना पान करना सम्भव
है? उसकी तृष्णा और लोभ दो गुणा वर्द्धित होनेपर
भी अभिलषित परिमाणके अनुसार पान नहीं कर
पानेपर अपनी अयोग्यता और अभावके कारण उसका
मन विशेषरूपसे क्षुब्ध होता है; द्रष्टा तब दुःखी चित्तसे
अपने सृष्टिकर्त्ताको दोष देता है॥132॥
विधि-श्रीकृष्णमाधुरी-रससे अनभिज्ञ :-
ना दिनेक लक्ष कोटि, सबे दिला आँखि दुटि,
ताते दिला निमिष-आच्छादन।
विधि-जड़ तपोधन, रसशून्य तार मन,
नाहि जाने योग्य सृजन॥133॥
अनुवाद-अनुभाष्य देखें॥133॥
अनुभाष्य-अतृप्त द्रष्टा तब खेदपूर्वक कहता
है,-मेरे लाख-करोड़ नेत्र नहीं है, केवलमात्र दो ही हैं
और वे भी पलकोंसे ढके हुए हैं। बीच-बीचमें जब
अति अल्प समयके लिये भी पलकें गिरती है, उस
समयमें भी पुनः श्रीकृष्ण-दर्शनमें बाधा होती है।
इसलिये शरीरका निर्माण-कर्त्ता ब्रह्मा अत्यन्त अज्ञानी
है और श्रीकृष्णदर्शनकी सेवाको छोड़कर तुच्छ तपस्यामें
रत होनेके कारण बिल्कुल भी 'रसज्ञ' नहीं है, सृष्टि
आदि शुष्क कार्योंको ही करनेवाला है-कहाँ किस
प्रकारका विधान करना उचित है, इस विषयमें वह
सम्पूर्ण रूपसे अनभिज्ञ है॥133॥
विधिको परामर्श और उपदेश-प्रदान :-
ये देखिबे कृष्णानन, तार करे द्वि-नयन,
विधि हञा हेन अविचार।
मोर यदि बोल धरे, कोटी आँखि तार करे,
तबे जानि योग्य सृष्टि तार॥134॥
अनुवाद-विधाताने विचारहीन होकर श्रीकृष्णमुखके
दर्शनके लिये भी सभीको केवल दो ही नेत्र दिये हैं।
आगे अनुभाष्य देखें॥134॥
अनुभाष्य-मेरे परामर्शको स्वीकार करके विधाता
यदि श्रीकृष्णमुखके दर्शन करनेवालेको करोड़ों नेत्र
प्रदान करे, तभी मैं उसको सृष्टि रचनाके विषयमें योग्य
समझूँगा॥134॥
श्रीकृष्णकी अङ्ग-माधुरी, मुख-माधुरी और हास्य-माधुरीमें
गोपीभावयुक्त महाप्रभुका लोभ :-
कृष्णाङ्ग-माधुर्य-सिन्धु, सुमधुर मुख-इन्दु,
अति-मधु स्मित-सुकिरण।
ए तिने लागिल मन, लोभे करे आस्वादन,
श्लोक पड़े, स्वहस्त-चालन॥135॥
अनुवाद-अनुभाष्य देखें॥135॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'ए तिने लागिल मन'-श्रीकृष्णके
अङ्गोंका माधुर्य मानो समुद्र है, उनका सुमधुर मुख
320 ।

इक्कीसवाँ अध्याय 21/135-137 ]
मानो समुद्रमेंसे उठा चन्द्र है और उनकी अति मधुर
मुस्कान मानो उस चन्द्रकी किरण है-इन तीनोंमें मन
लग गया ॥ 135 ॥
अनुभाष्य-साधारणतः प्रथम दृष्टिमें ही श्रीकृष्णके
अङ्गरूपी माधुर्य-समुद्रका दर्शन, विशेष द्वितीय-दृष्टिमें
अङ्ग-सिन्धुमें स्थित सुमधुर मुखचन्द्र और विशेषतः
तृतीय दर्शनमें मधुरसे भी अति मधुर मृदुहास्यरूपी
मुखचन्द्रकी किरण-इन तीनोंका माधुर्य महाप्रभुके
श्लोकके पाठ करनेके समय क्रमशः उदित होने लगा
एवं महाप्रभुके द्वारा अपने हाथोंको हिलाने रूपी विकार
दिखलायी दिया ॥ 135 ॥
गोपियोंके लिये श्रीकृष्णके अङ्ग, श्रीकृष्णका मुख और
श्रीकृष्णकी हास्य-माधुरीका तारतम्य :-
श्रीकृष्णकर्णामृत (92) में बिल्वमङ्गलवाक्य-
मधुरं मधुरं वपुरस्य विभो-
मधुरं मधुरं वदनं मधुरम्।
मधुगन्धि-मृदुस्मितमेतदहो
मधुरं मधुरं मधुरं मधुरम् ॥ 136 ॥
अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 136 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-इन श्रीकृष्णका शरीर मधुर है,
इनका मुख भी मधुर है और इनका मधु-सुगन्धयुक्त
मृदुहास्य और भी मधुर है; अहो ! इनका सब कुछ
ही मधुर है ॥ 136 ॥
अनुभाष्य-
अस्य विभोः (कृष्णस्य) वपुः (मूर्तिः अङ्गं वा) मधुरं
मधुरं (तादृश-स्वस्वरूपेतर-सर्वविग्रहाणां रूपतारतम्येन अतिमधुरम्);
[कृष्णस्य] वदनं (च) मधुरं मधुरं मधुरं (कृष्णाङ्ग-तारतम्येन
अतितरं मधुरम्); अहो, एतत् मधुगन्धि (मधुसुरभियुक्तं)
मृदु-स्मितं (मन्दहास्यं च) मधुरं मधुरं मधुरं मधुरं
(कृष्णदेह-कृष्णमुख-तारतम्येन अतितमं मधुरम्)।
श्लोक-भावानुवाद-इन श्रीकृष्णका शरीर और
उसके अङ्ग मधुरसे मधुर हैं अर्थात् अपनेसे अतिरिक्त
सभी विग्रहोंसे रूपके तारतम्यसे अति मधुर हैं। इनका
मुख मधुरसे मधुरसे भी मधुर है अर्थात् श्रीकृष्णके
समस्त अङ्गोंके तारतम्यसे अतितर मधुर है। और
अहो ! इनका मधु-सुगन्धयुक्त मृदुहास्य मधुरसे मधुरसे
मधुरसे भी मधुर है अर्थात् श्रीकृष्णके देह और
श्रीकृष्णके मुखके तारतम्यसे भी अतितम मधुर है।
अहो ! इनका सब कुछ ही मधुर है ॥ 136 ॥
गोपीभावमें निमग्न महाप्रभुकी श्रीकृष्णके माधुर्यके
आस्वादनमें नित्य बढ़नेवाली अतृप्ति :-
सनातन, कृष्णमाधुर्य-अमृतेर सिन्धु।
मोर मन-सन्निपाति, सब पिते करे मति,
दुर्देव, वैद्य ना देय एक बिन्दु ॥ 137 ॥ ध्रु॥
अनुवाद-हे सनातन ! श्रीकृष्णका माधुर्य अमृतका
सिन्धु है। मेरा मन सन्निपात रोगसे ग्रस्त होनेके कारण
उस सिन्धुका पूर्णरूपसे पान करनेकी इच्छा करता है।
किन्तु मेरा ऐसा दुर्भाग्य है कि वैद्य मुझे उसकी एक
बूँद भी पान नहीं करने देता ॥ 137 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-धातु (कफ, वात और पित्त) में
त्रिदोषके उत्पन्न होनेपर उसे 'सन्निपात' कहते हैं। मेरा
मन जबसे श्रीकृष्णके अङ्गके माधुर्य, श्रीकृष्णके मुखके
माधुर्य और श्रीकृष्णकी मुस्कानके माधुर्य-इन तीनोंका
आघात खाकर पीड़ित हो गया है, तबसे मेरा मन
सन्निपात-रोगसे ही पीड़ित हुआ है, इसमें सन्देह नहीं
है। वह उस-उस सौन्दर्य रससमुद्रके प्रति पिपासु होकर
दौड़ रहा है। साधारण सन्निपात-रोगका वैद्य जिस प्रकार
रोगीको एक बूँद भी जलका पान नहीं करने देता,
उसी प्रकार मेरे इस रोगके वैद्य श्रीकृष्णके अतिरिक्त
और कोई नहीं होनेपर भी वे अपने सौन्दर्यामृत-
समुद्रकी एक बूँदको भी मुझे पान नहीं करने
देते-यही दुःख (दुर्भाग्य) है ॥ 137 ॥
अनुभाष्य-विप्रलम्भ-रसमें गोपीभावमें विभावित
महाप्रभुकी श्रीकृष्ण-माधुर्य-आस्वादनकी प्यास इतनी
तीव्र है कि वे अपार श्रीकृष्ण माधुर्यका आस्वादन
करके भी अप्राकृत परम-चमत्कारमय उत्तरोत्तर वर्द्धनशील
। 321

[ 21/137-141 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

[बायाँ स्तम्भ]

अतृप्तिके कारण प्रबल आवेग और उत्कण्ठावशतः
सामान्य परिमाणमें भी श्रीकृष्णके माधुर्यका आस्वादन
नहीं कर पा रहे हैं, ऐसा कहकर खेद और आक्षेप
कर रहे हैं॥137॥

श्रीकृष्णके अङ्ग-मधुर, श्रीकृष्णका मुख-मधुरतर,
श्रीकृष्णका हास्य-मधुरतम :-
कृष्णाङ्ग-लावण्यपूर, मधुर हैते सुमधुर,
ताते सेइ मुख सुधाकर।
मधुर हैते सुमधुर, ताहा हइते सुमधुर,
ताँर येइ स्मित ज्योत्स्ना-भर॥138॥

अनुवाद—श्रीकृष्णका कलेवर तो लावण्यका धाम
है और वह मधुरसे भी सुमधुर है। उनका मुखचन्द्र
तो उससे भी अधिक मधुरसे भी सुमधुर है। और
उनके मुखचन्द्रपर उससे भी अति सुमधुर उनकी
मन्द-मुस्कान है जो चाँदनीके समान है॥138॥

अनुभाष्य—'ताँर'—श्रीकृष्णमुखचन्द्रका; 'स्मित
ज्योत्स्ना-भर'—श्रीकृष्णके मुखपर मन्द-मुस्कान जैसे
गोपियोंको आह्लाद प्रदान करनेवाली चन्द्रिकाका पूर्ण
आलोक (प्रकाश) है॥138॥

समस्त त्रिभुवन ही-उस हास्यचन्द्रिकाके
आलोकमें स्नान किया हुआ :-
मधुर हैते सुमधुर, ताहा हैते सुमधुर,
ताहा हैते अति सुमधुर।
आपनार एककणे, व्यापे सब त्रिभुवने,
दशदिक् व्यापे यार पूर॥139॥

अनुवाद—वह मन्द-मुस्कान मधुरसे भी सुमधुर,
उससे भी सुमधुर, उससे भी अति सुमधुर है। अपने
केवलमात्र एक ही कणसे सम्पूर्ण त्रिभुवनोंमें व्याप्त
होकर दसों-दिशाओंको अपने आलोकसे प्रकाशित कर
देती है॥139॥

अनुभाष्य—यद्यपि श्रीमुखके एक ओर वह मुस्कान
दिखलायी देती है, तथापि गोलोक, परव्योम और


[दायाँ स्तम्भ]

देवीधाम उससे व्याप्त होकर दसों दिशाओंमें प्रकाश भर
जाता है॥139॥

श्रीकृष्णके क्रीड़ाविग्रहकी वेणु-माधुरीसे त्रिभुवन उन्मत्त :-
स्मित-किरण-सुकर्पूर, पैशे अधर-मधुरे,
सेइ मधु माताय त्रिभुवने।
वंशीछिद्र आकाशे, तार गुण शब्दे पैशे,
ध्वनिरूपे पाञा परिणामे॥140॥

अनुवाद—वह मन्द-हास्य-किरण उत्तम कर्पूरकी
भाँति है जो अधरोंकी मधुरतामें प्रवेश कर जाती है।
फिर वह मधुरता वंशीके छिद्रोंसे ध्वनिके रूपमें परिणत
होकर आकाशके व्याप्त हो जाती है॥140॥

अनुभाष्य—'स्मितकिरण-सुकर्पूर'—मन्द हास्य-किरण
रूपी कर्पूरसे। 'पैशे'—प्रवेश करती है॥140॥

श्रीकृष्णकी वंशी-ब्रह्माण्ड, परव्योम और गोलोकके
समस्त शुद्धसत्त्वकी, विशेषतः शृङ्गार-रसके
आश्रित जनोंकी उन्मादिनी :-
से ध्वनि चौदिके धाय, अण्ड भेदि' वैकुण्ठे याय,
बले पैशे जगतेर काणे।
सबा मातोयाल करि', बलात्कारे आने धरि',
विशेषतः युवतीर गणे॥141॥

अनुवाद—वह वंशीध्वनि चारों दिशाओंमें प्रसारित
होने लगती है। यद्यपि श्रीकृष्ण इस ब्रह्माण्डमें वंशीवादन
कर रहे होते हैं, तथापि उनकी वंशीध्वनि ब्रह्माण्डको
भेद करके वैकुण्ठमें प्रवेश करके बलपूर्वक सभी
लोगोंके कानोंमें प्रवेश कर जाती है और उन्हें मत्त कर
देती है। विशेषतः वह ध्वनि गोलोक-वृन्दावनमें प्रवेश
करके व्रजाङ्गनाओंके मनको आकर्षित करके उन्हें
जबरदस्ती वहाँ ले जाती है जहाँ श्रीकृष्ण वंशीवादन
कर रहे हैं॥141॥

अनुभाष्य—'अण्ड भेदि''—ब्रह्माण्डरूपी प्राकृत-राज्यको
भेद करके अप्राकृत वैकुण्ठमें जाती है और बलपूर्वक
गोपीजन-जगत्के अर्थात् गोपियोंके कानोंमें प्रवेश करती
है॥141॥

322

इक्कीसवाँ अध्याय 21/142-145 ]
वेणु-माधुरीका प्रभाव :-
ध्वनि-बड़ उद्धत, पतिव्रतार भाङ्गे व्रत,
पति-कोल हैते टानि' आने।
वैकुण्ठेर लक्ष्मीगणे, येइ करे आकर्षणे,
तार आगे केबा गोपीगणे ॥ 142 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्णकी वेणुकी ध्वनि बहुत अभिमानी है, वह पतिव्रता-स्त्रियों तकके व्रतको भङ्ग करा देती है। वह ध्वनि उन्हें पतियोंकी गोदसे भी खींचकर ले आती है। उसमें इतना सामर्थ्य है कि वह वैकुण्ठकी लक्ष्मियों तकको भी आकर्षित कर लेती है, तब गोपियोंके विषयमें क्या कहें? ॥ 142 ॥
नीवि खसाय पति-आगे, गृहधर्म कराय त्यागे,
बले धरि' आने कृष्णस्थाने।
लोकधर्म, लज्जा, भय, सब ज्ञान लुप्त हय,
ऐछे नाचाय सब नारीगणे ॥ 143 ॥
अनुवाद—वंशीकी ध्वनि पतियोंके सामने ही गोपियोंके नाड़ेको ढीला कर देती है, गोपियोंके गृह-धर्मका त्याग कराकर उन्हें बलपूर्वक पकड़कर उस स्थानपर ले आती है, जहाँपर श्रीकृष्ण विराजमान होते हैं। उन गोपियोंका लोकधर्म, लज्जा, भयादिका सब ज्ञान लुप्त हो जाता है। श्रीकृष्णकी वंशीध्वनि समस्त नारियोंको अपने इशारोंपर नचाती है॥ 143 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'नीवि'—लहँगेको कमरसे बाँधने वाली डोरी॥ 143 ॥
श्रीकृष्णके अतिरिक्त सभी शब्दोंको स्तम्भित करनेवाली :-
काणेर भितर वासा करे, आपने ताँहा सदा स्फुरे,
अन्य शब्द ना देय प्रवेशिते।
आन कथा ना सुने काण, आन बुझिते बोलय आन,
एइ कृष्णेर वंशीर चरिते॥ 144 ॥
अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥ 144 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'काणेर भितर वासा करे'—'हम गोपियाँ हैं, हमारे कानके भीतर वंशीध्वनि वास करती है अर्थात् सदा कानमें लगी ही रहती है॥' 144 ॥
अनुभाष्य—श्रीकृष्णकी वंशीध्वनि गोपियोंके कानोंमें आवास बनाकर स्वयं ही ध्वनिकी स्फूर्तिसे गोपियोंको उन्मत्त प्राय बनाकर रखती है, तब गोपियोंके कानमें अन्य कोई शब्द प्रवेश नहीं कर पाता और उनका मन कहीं और होनेके कारण वे ठीक-ठीक उत्तर नहीं दे पातीं। श्रीकृष्णकी वंशीध्वनिका ऐसा प्रभाव है कि वह गोपियोंके मनको सम्पूर्ण रूपसे श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य विषयोंसे दूर कर देती है॥ 144 ॥
इक्कीसवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
महाप्रभुका बाह्य दशामें आना, अमानी और मानद-धर्म :-
पुनः कहे बाह्यज्ञाने, आन कहिते कहिलुँ आने,
कृष्ण-कृपा तोमार उपरे।
मोर चित्त-भ्रम करि', निजेश्वर्य-माधुरी,
मोर मुखे शुनाय तोमारे ॥ 145 ॥
अनुवाद—कुछ बाह्यज्ञान होनेपर महाप्रभु पुनः कहने लगे—मैं क्या कहते-कहते क्या कह गया? हे सनातन! तुमपर श्रीकृष्णकी कृपा है, इसलिये उन्होंने ही मेरे चित्तको भ्रमित कराके, अपने ऐश्वर्य और माधुर्यकी कथाको मेरे मुखके माध्यमसे तुम्हें सुनाया है॥ 145 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—इस प्रेमके आवेशमें श्रीकृष्णतत्त्व बोलते-बोलते बाह्यज्ञान शून्य होकर महाप्रभुने जिस रससन्दर्भको प्रकाशित किया, यह स्थान उसका वर्णन-स्थल नहीं है। इसलिये वे कह रहे हैं,—"मैं एक विषयमें बोलते हुए अन्य विषयको बोलने लगा, श्रीकृष्णने कृपा करके मेरे चित्तमें भ्रम उत्पन्न कराके अपनी ऐश्वर्य-माधुरी तुम्हें श्रवण करायी है॥ 145 ॥
इक्कीसवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
। 323

[ 21/146-149 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
गोपीभावमें आविष्ट महाप्रभुकी श्रीकृष्णमाधुर्यमें ग्रस्त अपने
चित्तकी वश्यता और सौभाग्यको बतलाना :-
आमि त' बाउल, आन कहिते आन कहि।
कृष्णेर माधुर्यस्रोते आमि याइ बहि' ॥ 146 ॥
अनुवाद—मैं तो पागल (उन्मत्त) हूँ, एक प्रसङ्ग
कहते-कहते अन्य प्रसङ्ग कहने लग गया हूँ। ऐसा
इसलिये हुआ क्योंकि मैं तो श्रीकृष्णके माधुर्य-स्रोतमें
बहता जा रहा हूँ॥" 146 ॥
महाप्रभुका क्षणकालके लिये मौनभाव :-
तबे महाप्रभु क्षणेक मौन करि' रहे।
मने एक करि' पुनः सनातने कहे॥ 147 ॥
अनुवाद—तब महाप्रभु एक क्षण तक मौन रहे।
मनको स्थिर करके पुनः वे श्रीसनातन गोस्वामीसे कहने
लगे॥ 147 ॥
श्रीकृष्णमाधुर्य-श्रवण करनेवालेका श्रीकृष्णप्रेमरूपी
सुखमें निमज्जित होना :-
कृष्णेर माधुरी आर महाप्रभुर मुखे।
इहा येइ सुने, सेइ भासे प्रेमसुखे॥ 148 ॥
अनुवाद—इस अध्यायमें वर्णित श्रीकृष्णकी माधुरी,
और उसपर वह महाप्रभुके श्रीमुखसे निःसृत हुई है,
इसलिये इसे जो भी श्रवण करता है, वह प्रेमानन्दमें
निमज्जित हो जाता है॥ 148॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 149 ॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे सम्बन्धतत्त्वविचारे
श्रीकृष्णैश्वर्यमाधुर्यवर्णनं नाम एकविंशः परिच्छेदः।
अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी
कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका
वर्णन कर रहा है॥ 149 ॥
श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें सम्बन्धतत्त्वविचारमें
श्रीकृष्णैश्वर्यमाधुर्यवर्णन-नामक इक्कीसवें अध्यायका
अनुवाद समाप्त।
324 ।

। 325

श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
326 ।

बाइसवाँ अध्याय
कथासार-इस बाइसवें अध्यायमें श्रीमन्महाप्रभुने
अभिधेय-तत्त्वका वर्णन किया है। महाप्रभुने सर्वप्रथम
जीवका तत्त्व, बादमें भक्तिकी श्रेष्ठता और
केवल-ज्ञानयोगादिकी अकर्मण्यता एवं भक्ति ही समस्त
जीवोंका कर्त्तव्य है, इन सबकी व्याख्या की तथा
ज्ञानियोंका मुक्त होनेका अभिमान वृथा है, उसे भी
दिखलाया। भुक्ति-मुक्ति-सिद्धिकी कामनाओंका परित्याग
करके शुद्ध भक्तियोगसे अभीष्ट अथवा प्रयोजनादि सब
कुछ सिद्ध होता है। यद्यपि किसी व्यक्तिके भजनकालमें
वे सब कामनाएँ अज्ञानतावशतः कुछ जुड़ी रहती हैं,
तथापि श्रीकृष्ण उन्हें दूर करके उस व्यक्तिको शुद्धभक्ति
प्रदान करते हैं। महाजनोंकी कृपाके बिना भक्तिका
उदय नहीं होता, इसलिये साधुसङ्ग ही आवश्यक
कर्त्तव्य है। श्रद्धा ही अनन्यभक्तिमें अधिकार प्रदान
करती है। इसके बाद महाप्रभुने उसका और अनन्यभक्तोंके
वर्गोंके भेद एवं वैष्णवोंके सभी स्वभावोंका वर्णन
किया। स्त्रीसङ्ग और अभक्त-सङ्ग ही असत्सङ्ग है।
इन दोनोंका परित्याग करके, वर्णाश्रमकी आसक्तिको
छोड़कर श्रीकृष्णके शरणागत होना चाहिये। शरणागतिके
छः लक्षणोंकी भी व्याख्या हुई है। साधनभक्ति-वैधी
और रागानुगाके भेदसे दो प्रकारकी है। वैधीभक्तिके
चौंसठ अङ्ग ही प्रधान हैं; उनमेंसे अन्तिम पाँच अङ्ग
ही अत्यन्त बलवान हैं। भक्तिके एक अङ्ग अथवा
अनेक अङ्गोंके साधनसे भी फल प्राप्त होता है।
ज्ञान-वैराग्य-योगादि कभी भी भक्तिके अङ्ग नहीं है;
अहिंसा, यम, नियमादिके लिये कोई पृथक् चेष्टा नहीं
करनी पड़ती; वे भक्तिके साथ-साथ ही रहते हैं।
रागानुगा भक्ति-रागात्मिका-भक्तिकी ही अनुगामिनी है।
ब्रजवासियोंकी रागात्मिका भक्ति ही मुख्य है। रागात्मिका
भक्तिके लक्षण बतलाकर महाप्रभुने उसके बाद
रागानुगा-भक्तिके साधन-लक्षणोंको बतलाया।
-(अमृतप्रवाह भाष्य)
कलियुग पावनावतारी प्रेमदाता महाप्रभुको प्रणाम :-
वन्दे श्रीकृष्णचैतन्यदेवं तं करुणार्णवम्।
कलावप्यतिगूढेयं भक्तिर्येन प्रकाशिता ॥ 1 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-जिनके द्वारा कलिकालमें भी
अतिगूढ़ भक्ति प्रकाशित हुई है, उन करुणाके सागर
श्रीकृष्णचैतन्यदेवकी मैं वन्दना करता हूँ॥ 1 ॥
अनुभाष्य-
कलौ (धर्मरहिते तर्काश्रितविवादमये युगे) अपि येन (महाप्रभुणा)
अतिगूढ़ा (धर्मबहुले सत्यत्रेताद्वापरयुगे सद्धर्मज्ञैरप्यज्ञाता) इयं
भक्तिः (हेतुरहिता कृष्णसेवा) प्रकाशिता (साधार‍ण्ये प्रचारिता),
तं करुणार्णवं (जीवदयासागरं) श्रीकृष्णचैतन्यदेवम् अहं वन्दे।
श्लोक-भावानुवाद-धर्मरहित तर्कप्रधान विवादमय
कलियुगमें भी जिन्होंने अतिगूढ़ अर्थात् जो धर्मप्रधान
सत्य-त्रेता-द्वापर युगमें केवल सद्धर्मको जाननेवालोंको
ही ज्ञात थी, ऐसी अहैतुकी श्रीकृष्णसेवा लक्षणमयी
भक्तिका साधारण जीवोंमें प्रचार किया, उन जीवोंके प्रति
दयाके सागर श्रीकृष्णचैतन्यदेवकी मैं वन्दना करता
हूँ॥ 1 ॥
जय जय श्रीकृष्णचैतन्य नित्यानन्द।
जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ 2 ॥
अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, श्रीनित्यानन्द
। 327

[ 22/2-7 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, सभी गौरभक्तोंकी जय हो॥२॥
समस्त वेदशास्त्रोंमें श्रीकृष्ण ही 'सम्बन्ध'रूपमें निरूपित :-
'एइ त' कहिलुँ सम्बन्ध-तत्त्वेर विचार।
वेदशास्त्रे उपदेशे, कृष्ण—एक सार॥३॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,–“अब तक मैंने तुम्हें सम्बन्ध-तत्त्वके विचारको बतलाया है। वेदशास्त्रोंका यही उपदेश है कि श्रीकृष्ण ही एकमात्र सार हैं॥३॥
श्रीसनातन-शिक्षा—(२) अभिधेय (श्रीकृष्णभक्ति)-वर्णन; अभिधेय ही सम्बन्ध और प्रयोजन-प्रदाता :-
एबे कहि, शुन, अभिधेय-लक्षण।
याहा हैते पाइ—कृष्ण, कृष्णप्रेमधन॥४॥
अनुवाद—हे सनातन, अब मैं उस अभिधेय-लक्षणके विषयमें बतलाता हूँ, जिससे श्रीकृष्ण और श्रीकृष्णप्रेमधनकी प्राप्ति होती है॥४॥
श्रीकृष्णभक्ति ही अभिधेय :-
कृष्णभक्ति—अभिधेय, सर्वशास्त्रे कय।
अतएव मुनिगण करियाछे निश्चय॥५॥
अनुवाद—सभी शास्त्र श्रीकृष्णभक्तिको ही अभिधेय (लक्ष्य प्राप्तिका उपाय) बतलाते हैं। इसलिये सभी मुनियोंने भी यही निर्धारित किया है॥५॥
श्रुति-स्मृति-पुराण-पञ्चरात्रमें श्रीकृष्णभक्तिको ही विधिके अनुरूप 'अभिधेय' कहा है :-
मुनिवाक्य—
श्रुतिर्माता पृष्टा दिशति भवदाराधनविधिं
यथा मातुर्वाणी स्मृतिरपि तथा वक्ति भगिनी।
पुराणाद्या ये वा सहजनिवहास्ते तदनुगा
अतः सत्यं ज्ञातं मुरहर भवानेव शरणम्॥६॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥६॥
अमृतप्रवाह भाष्य—माता-स्वरूप श्रुतिसे जिज्ञासा करनेपर वे आपकी आराधनाकी विधिका उपदेश देती हैं, स्मृति भी बहन-स्वरूप होकर उसी प्रकार उपदेश देती हैं; पुराणादि भी भाईके रूपमें श्रुतिमाताके अनुगत होकर वही कहते हैं। इसलिये हे मुरहर (मुरारि)! आप ही एकमात्र शरण हैं, इसे मैंने सत्यरूपमें जान लिया है॥६॥
अनुभाष्य—
माता (मातृवत् हिताभिलाषिणी जीवपालयित्री) श्रुतिः पृष्टा (जिज्ञासिता सती) भवदाराधनविधिं (कृष्णसेवां) दिशति (आज्ञापयति); यथा मातुः (श्रुतेः) वाणी (कथा), तथा भगिनी (श्रुतिमातृ-लाल्या) स्मृतिः अपि वक्ति (प्रकाशयति, कृष्णभक्तिं कथयति); पुराणाद्याः (पुराणागमादयः) ये वा सहजनिवहाः (सहोदराः), ते (अपि) तदनुगाः (मातृभगिन्योः अनुगामिनः सन्तः कृष्णभक्त्युपदेशपराः); अतः हे मुरहर (मुरारे,) भवान् एव [मम] शरणम् [इति] सत्यं [मया] ज्ञातम्।
श्लोक-भावानुवाद—हिताभिलाषिणी माताके समान जीवोंका पालन करनेवाली श्रुति जिज्ञासा करनेपर श्रीकृष्णसेवाकी ही आज्ञा देती हैं। श्रुति-माताके द्वारा लालित स्मृतिरूपी बहन भी माताकी वाणीकी भाँति श्रीकृष्णभक्तिकी बात कहती हैं। पुराण-आगमादि भी भ्राताकी भाँति माता और बहनके अनुगामी होकर श्रीकृष्णभक्तिका ही उपदेश देते हैं। इसलिये हे मुरारि! आप ही मेरी शरण हैं, इसे मैंने सत्यरूपमें जान लिया है॥६॥
श्रीकृष्ण और स्वरूपशक्ति एकात्मा होनेपर भी विलासके लिये परस्पर आलिङ्गित :-
अद्वयज्ञान-तत्त्व कृष्ण—स्वयं भगवान्।
'स्वरूप-शक्ति'-रूपे ताँर हय अवस्थान॥७॥
अनुवाद—अद्वयज्ञान-तत्त्व श्रीकृष्ण ही स्वयं भगवान् हैं। अद्वय अर्थात् श्रीकृष्ण और उनकी शक्तिमें भेद नहीं होनेके कारण श्रीकृष्ण अपनेसे अभिन्न स्वरूप-शक्तिके रूपमें भी अवस्थान करते हैं॥७॥
अनुभाष्य—श्रीकृष्ण-अद्वयज्ञान-तत्त्व हैं। शक्ति और
328 ।

बाइसवाँ अध्याय 22/7-15 ]
शक्तिमान्-अभेद-तत्त्व हैं। 'शक्ति'-शब्दसे भूलकर भी
किसीको जीवके स्वरूपका आवृत करनेवाली मायाशक्तिको
नहीं समझना चाहिये। जो शक्ति श्रीकृष्ण-स्वरूपकी
सेवामें ही केवलमात्र नियुक्त है, वह स्वरूपशक्ति उस
मायाशक्तिसे पृथक् है। स्वरूपशक्ति और स्वरूपशक्तिमान्
श्रीकृष्ण अभिन्न रूपमें अवस्थित हैं॥7॥
असंख्य वैकुण्ठोंमें स्वांश विष्णुरूपमें और ब्रह्माण्डोंमें
जीवरूपमें लीला-विलास :-
स्वांश-विभिन्नांश-रूपे हञा विस्तार।
अनन्त वैकुण्ठ-ब्रह्माण्डे करेन विहार॥8॥
अनुवाद-श्रीकृष्ण स्वांश और विभिन्नांश रूपमें
अपना विस्तार करके असंख्य वैकुण्ठों एवं ब्रह्माण्डोंमें
विहार करते हैं॥8॥
स्वांश-विलास चतुर्व्यूह और अवतारगण-श्रीकृष्णस्वरूप या
शक्तिमान् हैं; जीव-विभिन्नांश या शक्तितत्त्व हैं :-
स्वांश-विस्तार-चतुर्व्यूह, अवतारगण।
विभिन्नांश जीव-ताँर शक्तिते गणन॥9॥
अनुवाद-श्रीकृष्ण स्वांशका विस्तार चतुर्व्यूह और
अवतारोंके रूपमें करते हैं। विभिन्नांश जीवोंकी गणना
श्रीकृष्णकी शक्तिके रूपमें होती है॥9॥
दो प्रकारके जीव :-
सेइ विभिन्नांश जीव-दुइ त' प्रकार।
एक-'नित्यमुक्त', एक- 'नित्य-संसार' ॥10॥
अनुवाद-वे विभिन्नांश जीव दो प्रकारके हैं।
एक-'नित्यमुक्त' और दूसरे 'नित्य-संसार' अर्थात्
नित्यबद्ध हैं॥10॥
(1) नित्यमुक्तका चरित्र :-
'नित्यमुक्त'-नित्य कृष्णचरणे उन्मुख।
'कृष्ण-पारिषद' नाम, भुञ्जे सेवा-सुख॥11॥
अनुवाद-'नित्यमुक्त' जीव सदा श्रीकृष्णके उन्मुख
रहकर उनके श्रीचरणोंकी सेवा करते हैं, वे श्रीकृष्णके
परिकर कहलाते हैं और वे सेवारूपी सुखका आस्वादन
करते हैं॥11॥
(2) नित्यबद्ध जीवका चरित्र :-
'नित्यबद्ध' - कृष्ण हैते नित्य-बहिर्मुख।
'नित्यसंसार', भुञ्जे नरकादि-दुःख॥12॥
अनुवाद-'नित्यबद्ध' जीव श्रीकृष्णसे अनादिकालसे
बहिर्मुख हैं। इसलिये वे 'नित्यसंसार' अर्थात् भोक्ताभिमानसे
सदा संसारमें ही बद्ध हैं और अपने कर्मोंके फलस्वरूप
नरकादि दुःखोंका भोग करते हैं॥12॥
श्रीकृष्ण-विमुखताका फल अथवा दण्ड :-
सेइ दोषे माया-पिशाची दण्ड करे तारे।
आध्यात्मिकादि तापत्रय तारे जारि' मारे॥13॥
काम-क्रोधेर दास हञा तार लाथि खाय।
भ्रमिते भ्रमिते यदि साधु-वैद्य पाय॥14॥
उद्धारका उपाय :-
ताँर उपदेश-मन्त्रे पिशाची पलाय।
कृष्णभक्ति पाय, तबे कृष्ण-निकट याय॥15॥
अनुवाद-श्रीकृष्णसे बहिर्मुखतारूपी दोषके कारण
माया-पिशाची बद्धजीवोंको दण्डित करती है। वह उन्हें
आध्यात्मिकादि (देह और मनके द्वारा प्रदत्त, दूसरे
प्राणियोंके द्वारा प्रदत्त और दैविक प्रकोपके द्वारा प्रदत्त)
तीन प्रकारके तापोंमें झुलसाकर कष्ट प्रदान करती है।
बद्धजीव कामका दास बनकर और जब काम पूर्तिमें
बाधा आती है, तब उससे उत्पन्न क्रोधका दास बनकर
मायाकी ठोकरें खाता है। इस प्रकार ठोकरें खाते-खाते
यदि उसे साधुरूपी वैद्यकी प्राप्ति होती है, तब साधुके
उपदेशरूपी मन्त्रके द्वारा माया-पिशाची दूर भाग जाती
है और वह जीव श्रीकृष्णभक्तिको प्राप्त करता है।
भक्तिके प्रभावसे तब वह श्रीकृष्णके निकट पहुँच जाता
है॥13-15॥
। 329

[ 22/8-18 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

अमृतप्रवाह भाष्य—'स्वांश-रूपे'—अर्थात् चतुर्व्यूह हुई) और मेरी लज्जाकी भी उपशान्ति नहीं हुई। हे
और उनके अवतारोंके रूपमें। स्वांश-अवस्थामें यदुपते! अन्तमें मैं उन्हें परित्याग करके सद्बुद्धि प्राप्त
श्रीकृष्णका स्व-स्वरूपत्व सर्वत्र लक्षित होता है। करके आपके अभयचरणोंमें शरणागत हुआ हूँ, आप
जीव—उनके विभिन्नांश रूप हैं। जीव भी श्रीकृष्णकी अब मुझे अपने दासके रूपमें नियुक्त करो॥16॥
शक्तिरूपमें गिने जाते हैं। जीव दो प्रकारके हैं—नित्यमुक्त अनुभाष्य—
और नित्यसंसार (बद्ध)। नित्यमुक्त जीवोंने कभी भी कामादीनां (कामक्रोधलोभमोहमदमात्सर्यादीनां) दुर्निदेशाः (दुष्टाः
मायाके सम्बन्धका आस्वादन नहीं किया। वे श्रीकृष्णके आदेशाः) कतिधा (प्रकाराः) मया कति न पालिताः (अपि
चिन्मय धाममें श्रीकृष्णचरणोंके उन्मुख रहकर तु पालिता एव); तेषां (कामादिरिपूणां) मयि करुणा (दया)
'श्रीकृष्ण-पार्षद'-नामसे जाने जाते हैं और श्रीकृष्णसेवा- न, त्रपा (ममापि लज्जा) न, उपशान्तिः (मम तद्विसर्जनेच्छापि)
सुख ही उनका भोग है। नित्यबद्ध सभी जीव श्रीकृष्णसे न च जाता। अथ (अनन्तरं) हे यदुपते, साम्प्रतम् (इदानीं)
नित्य बहिर्मुख रहकर संसारमें स्वर्ग-नरकादि सुख- तान् (कामादीन्) उत्सृज्य (रिपु-पारवश्यं त्यक्त्वा) लब्धबुद्धिः
दुःखका भोग करते हैं। श्रीकृष्ण-बहिर्मुखता दोषके लिये (अभिज्ञः सन्) अभयम् (अकुतोभयं) त्वां शरणम् आयातः
माया-पिशाची उन्हें स्थूल और सूक्ष्म आवरणमें बाँधकर (प्राप्तः); माम् आत्मदास्ये (निजकैङ्कर्ये) नियुङ्क्ष्व (नियोजय)।
दण्ड प्रदान करती है अर्थात् आध्यात्मिकादि तीन श्लोक-भावानुवाद—काम-क्रोध-लोभ-मोह-मद-
प्रकारके ताप उन्हें बहुत ही जर्जरित करते हैं। वे मात्सर्य आदिके कितने दुष्ट आदेशोंका मैंने कितनी
काम-क्रोधादि छः तरङ्गोंके वशीभूत होकर मायारूपी प्रकारसे पालन किया है, तो भी वे मेरे प्रति दया नहीं
पिशाचीकी लातें खाते रहते हैं—यही जीवोंका रोग है। करते और [निर्लज्जकी भाँति उनकी सेवा करते हुए]
संसारमें इस प्रकार ऊपर-नीचे (स्वर्ग-नरकमें) भ्रमण न ही मेरी लज्जा त्याग करनेकी इच्छा होती है। हे
करते-करते जीव यदि कभी साधुरूपी वैद्यको प्राप्त यदुपते! अन्तमें अब मैं उन कामादि शत्रुओंकी
करता है, तब उनके उपदेशरूपी मन्त्रसे माया-पिशाची वश्यताको त्यागकर सद्बुद्धि प्राप्त करके आपके
भाग जाती है और जीव भी श्रीकृष्णभक्ति प्राप्त करके अभयचरणोंकी शरणमें आया हूँ, कृपा मुझे अपने
श्रीकृष्णके निकट पहुँच जाता है॥8-15॥ दासके रूपमें नियुक्त कीजिये॥16॥

शरणागतकी प्रार्थना :- भक्ति ही निरपेक्ष अभिधेय और
भक्तिरसामृतसिन्धु (3/2/25)— कर्मज्ञानयोगादि भक्ति-सापेक्ष :-
कामादीनां कति न कतिधा पालिता दुर्निदेशा- कृष्णभक्ति हय अभिधेय-प्रधान।
स्तेषां जाता मयि न करुणा न त्रपा नोपशान्तिः। भक्तिमुख-निरीक्षक कर्म-योग-ज्ञान॥17॥
उत्सृज्यैतानथ यदुपते साम्प्रतं लब्धबुद्धि- भक्तिके आश्रयके बिना कर्मज्ञानयोगादिकी निष्फलता :-
स्त्वामायातः शरणमभयं मां नियुङ्क्ष्वात्मदास्ये॥16॥ एइ सब साधनेर अति तुच्छ बल।
कृष्णभक्ति बिना ताहा दिते नारे फल॥18॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥16॥
अमृतप्रवाह भाष्य—हे भगवन्, कामादिके कितने ही अनुवाद—श्रीकृष्णभक्ति ही प्रधान अभिधेय है।
प्रकारके दुष्ट आदेशोंका ही मैंने (कितनी प्रकारसे) कर्म-योग-ज्ञान संसारसे मुक्तिके उपाय हैं, परन्तु फल
पालन किया है। तथापि मेरे प्रति उनकी करुणा (नहीं देनेमें ये सब भक्तिपर निर्भर करते हैं। इस सब
साधनोंका बल अति तुच्छ है और भक्तिके बिना ये

330 ।

बाईसवाँ अध्याय 22/17-20 ]
स्वतन्त्ररूपसे फल देनेमें असमर्थ हैं॥17-18॥
अमृतप्रवाह भाष्य—शास्त्रोंमें अनेक स्थानोंपर कर्मको, अनेक स्थानोंपर योगको और अनेक स्थानोंपर ज्ञानको ‘अभिधेय’ कहकर वर्णन किया गया है; तथापि सर्वत्र भक्तिको ही सर्वप्रधान ‘नित्य अभिधेय’ कहा गया है। इसका तात्पर्य यह है कि श्रीकृष्णभक्ति ही परमपुरुषार्थ (प्रेम)को प्राप्त करनेका एकमात्र प्रधान अर्थात् 'साक्षात्' अभिधेय है; कर्म, योग और ज्ञानको जो अभिधेय रूपमें कहा है, वह—'गौण' है; क्योंकि, भक्तिके मुखकी अपेक्षा करके ही वे जो कुछ भी फलादि प्रदान कर सकते हैं। भक्तिके आश्रयके बिना कर्म, योग और ज्ञान कोई भी फल नहीं दे सकते। भक्तिका आश्रय प्राप्त करनेपर ही कर्म और हठ-योग भुक्ति-फल एवं ज्ञान और राजयोग मुक्ति और सिद्धि-फल दे सकते हैं॥17-18॥
भक्तिविहीन शुष्कज्ञान या निष्काम कर्म भी व्यर्थ :—
श्रीमद्भागवत (1/5/12)में—
नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाव-वर्जितं
न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम्।
कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरे
ना चार्पितं कर्म यदप्यकारणम्॥19॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥19॥
अमृतप्रवाह भाष्य—नैष्कर्म्यरूपी निर्मलज्ञान ही जब अच्युत भक्तिसे वर्जित होनेपर शोभा नहीं पाता, तब सदैव अभद्र (अशुभ) स्वभाववाले कर्म ईश्वरमें अर्पित नहीं होनेपर निष्काम होनेपर भी किस प्रकार शोभा पा सकते हैं?॥19॥
अनुभाष्य—श्रीव्यासदेवके द्वारा बहुत तप-अनुष्ठान और सभी शास्त्रोंका प्रणयन आदि करनेपर भी उनका चित्त प्रसन्न नहीं हुआ और वे सरस्वती नदीके तटपर अप्रसन्न चित्तसे मन-ही-मनमें अनेक प्रकारके तर्क-वितर्क और खेद कर रहे थे, तब उनके अन्तर्यामी गुरुदेव श्रीनारद गोस्वामी वहाँ आकर उपस्थित हुए। व्यासदेवने उनसे अपनी आत्माकी प्रसन्नताके अभावके कारणकी जिज्ञासा की, तब श्रीनारद कर्म और ज्ञान आदि सभी मार्गोंकी अपेक्षा शुद्ध हरिभक्तिके माहात्म्यका वर्णन कर रहे हैं—
अच्युतभाववर्जितम् (अच्युते कृष्णे भाववर्जितम् अनुकूलानुशीलनविहीनं चेत्) निरञ्जनं (निरुपाधिकं निर्मलमिति यावत्) नैष्कर्म्य (फलभोगराहित्यम् अपि) ज्ञानम् अलम् (अत्यर्थं) न शोभते (सम्यक् मोक्षाय न कल्पते); पुनः तथा शश्वत् (सर्वसमये साधनकाले प्राप्तिकाले च अतएव) अभद्रं (दुःखात्मकं) यत् च अकारणं कर्म (प्रवृत्तिपरं काम्य यद्यपि निवृत्तिपरम् अकाम्यं तच्चापि कर्म) ईश्वरे (विष्णौ) न अर्पितं (नोद्दिष्टं सत्) कुतः [शोभते? नैव हीति भावः]।
श्लोक-भावानुवाद—श्रीकृष्णके अनुकूल अनुशीलनसे विहीन फलभोगरहित निर्मलज्ञान ही जब शोभा नहीं पाता, तब जो सदैव (अर्थात् साधनकाल और फलप्राप्तिकाल, दोनोंमें) दुःख प्रदान करनेवाला है, वह कर्म विष्णुमें अर्पित नहीं होनेपर निष्काम होनेपर भी किस प्रकार शोभा पा सकता है? अर्थात् नहीं पा सकता—यह भाव है॥ ॥19॥
श्रीकृष्णको अर्पित किये बिना समस्त प्रकारके कर्मकाण्ड—संसारजनक :—
श्रीमद्भागवत (2/4/17)में—
तपस्विनो दानपरा यशस्विनो
मनस्विनो मन्त्रविदः सुमङ्गलाः।
क्षेमं न विन्दन्ति बिना यदर्पणं
तस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नमः॥20॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥20॥
अमृतप्रवाह भाष्य—सभी तपस्वी, सभी दान-परायण व्यक्ति, सभी यशस्वी व्यक्ति, मनस्वी व्यक्ति, वेदोंके मन्त्रोंको जाननेवाले सभी व्यक्ति, उनके द्वारा किये गये वे कर्म सुमङ्गल होनेपर भी, जिन्हें अर्पण नहीं करनेसे कुछ भी मङ्गल प्राप्त नहीं कर सकते, उन सुभद्रश्रवा
। 331

[ 22/20-22 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
(मङ्गलकीर्तिवाले) भगवान्‌को पुनः पुनः नमस्कार करता
हूँ॥ 20 ॥
अनुभाष्य—परीक्षितके द्वारा मायाधीश श्रीहरिकी सृष्टि
आदि लीलाके सम्बन्धमें जिज्ञासा करनेपर, श्रीशुकदेव
श्रीहरि और उनकी सेवाके माहात्म्यका वर्णन कर रहे
हैं—
तपस्विनः (तपोनिरताः ज्ञानिनः) दानपराः (वदान्याः) यशस्विनः
(कीर्त्तिमन्तः) मनस्विनः (योगिनः) मन्त्रविदः (निगमागमविदः)
सुमङ्गलाः (सदाचाराः) यदर्पणं (यस्मिन् श्रीहरौ पूर्वोक्त-
तपादिना स्व-स्व-प्राप्यफलसमर्पणं) बिना (ऋते) क्षेमं (कल्याणं)
न विन्दन्ति (न प्राप्नुवन्ति), तस्मै सुभद्रश्रवसे (मङ्गलकीर्त्तिविग्रहाय
भगवते श्रीहरये) नमो नमः।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 20 ॥
भक्तिविहीन ज्ञान मुक्तिप्रद नहीं; मुक्ति-भक्तिकी दासी :-
केवल ज्ञान 'मुक्ति' दिते नारे भक्ति बिना।
कृष्णोन्मुखे सेइ मुक्ति हय ज्ञान बिना॥ 21 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 21 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-“ज्ञानतः सुलभा मुक्तिः”-इस
शास्त्रवचनसे जाना जाता है कि ज्ञान ही मुक्ति दे
सकता है, किन्तु उसमें एक गूढ़ बात यह है कि
भक्तिके आश्रयसे ही ज्ञान मुक्ति दिया करता है।
पक्षान्तरमें, श्रीकृष्णोन्मुखी भक्तिके उदित होनेपर किसी
भी प्रकारकी ज्ञानकी चेष्टा नहीं करनेपर भी मुक्ति स्वयं
ही उपस्थित होती है॥ 21 ॥
अनुभाष्य-केवल-ज्ञान अर्थात् भक्तिरहित सम्विद्
वृत्तिका अनुभव जीवको जड़-बन्धनसे मुक्त नहीं करा
सकता। ब्रह्मको जाननेके लिये जीव कितना ही
(संसारकी सभी वस्तुओंको नकारते हुए) यह ब्रह्म नहीं
है, यह ब्रह्म नहीं है क्यों न करे, उसमें श्रीकृष्ण-स्वरूपकी
अज्ञानताके कारण अहंग्रहोपासना (जिसकी मैं उपासना
कर रहा हूँ, मैं वही हूँ, यह बुद्धि) ही प्रबल हो जाती
है और वह अधःपतित हो जाता है। ज्ञानानुशीलन नहीं
करनेपर भी श्रीकृष्णकी सेवामें तत्पर होनेपर वह जीव
ज्ञानके फल जड़-बन्धनसे मुक्ति प्राप्त करके श्रीकृष्णके
स्वरूपके अनुभवको प्राप्त करता है। श्रीकृष्णकर्णामृतमें-
“भक्तिस्त्वयि स्थिरतरा भगवन् यदि
स्याद्देवेन न फलति दिव्य-किशोरमूर्त्तिः।
मुक्तिः स्वयं मुकुलिताञ्जलिः सेवतेऽस्मान्
धर्मार्थकामगतयः समय-प्रतीक्षाः॥”
[अर्थात् “हे भगवन्! आपमें यदि हमारी अचला
भक्ति रहे, तब आपकी अप्राकृत किशोरमूर्ति स्वतः ही
हमारे हृदयमें उदित होती है। उस समय मुक्ति स्वयं
हाथ जोड़कर हमारी सेवामें रत होती है और धर्म, अर्थ
और काम भी सेवाके लिये आदेशके समयकी प्रतीक्षा
करते हैं।”]॥ 21 ॥
भक्तिमार्गमें ही एकमात्र नित्य कल्याण, उसके अतिरिक्त
शुष्क ज्ञानसे वृथा परिश्रम ही सार (फल) :-
श्रीमद्भागवत (10/14/4)में—
श्रेयःसृतिं भक्तिमुदस्य ते विभो
क्लिश्यन्ति ये केवलबोधलब्धये।
तेषामसौ क्लेशल एव शिष्यते
नान्यद् यथा स्थूलतुषावघातिनाम्॥ 22 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 22 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-हे विभो! आपमें भक्ति ही
कल्याणका पथ है, उसे परित्याग करके जो सब व्यक्ति
केवल ज्ञान प्राप्तिके लिये अर्थात् 'मैं ब्रह्म' हूँ, इसको
ही स्थिर रूपमें जाननेके लिये अनेक प्रकारके कष्ट
स्वीकार करते हैं, खाली भूसीको पीसनेवालोंको जिस
प्रकार चावल नहीं मिलते, उसी प्रकार, उन्हें अन्तमें
क्लेशमात्र ही प्राप्त होता है॥ 22 ॥
अनुभाष्य-बछड़ोंको हरण करनेके फलस्वरूप
श्रीकृष्णके द्वारा ब्रह्माके अभिमानके चूर्ण होनेपर ब्रह्मा
श्रीकृष्णके एकान्त शरणागत होकर स्तव कर रहे हैं-
हे विभो (भगवन्), ये (जनाः आरोहवादि-तर्कपन्थिनः)
श्रेयःसृतिं (श्रेयसां अभ्युदयापवर्गलक्षणानां सृतिं सरणं मार्गभूतां)
ते (तव) भक्तिं (शुद्धभजनम्) उदस्य (त्यक्त्वा) केवलबोधलब्धये
332 |

बाइसवाँ अध्याय 22/22-28 ]
(भक्तिरहितज्ञानमात्र-प्राप्तये) क्लिश्यन्ति (वैराग्यतपः-क्लेशादिकं
स्वीकुर्वन्ति), तेषां (निर्भेद-ब्रह्मवादि-शुष्क-ज्ञानिनां) यथा
स्थूलतुषावघातिनां (शस्यानन्तःकणहीनान् स्थूल-धान्याभासान् तुषान्
अवघ्नतां यथा व्यर्थश्रमः एव भवति, तथा) असौ
(शास्त्राभ्यास-षट्क-साधनादिजनितः) क्लेशालः (क्लेशः व्यर्थश्रमः)
एव शिष्यते (अवशिष्यते) न अन्यत् (तेषां न किञ्चित्
तदितरं फलम्—तेषां ज्ञानप्राप्तिरपि दुर्लभा एवेत्यर्थः) ।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 22 ॥
भगवान्के शरणागतकी ही मायासे मुक्ति :-
श्रीमद्भगवद्गीता (7/14)में—
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ 23 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 23 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—यह माया मेरी ही शक्ति है,
इसलिये दुर्बल जीवके लिये स्वभावतः ही इसका
अतिक्रम करना अति कठिन है। जो मेरे भगवत्-
स्वरूपकी शरणागति स्वीकार करते हैं, केवल वे ही
इस माया समुद्रसे पार हो सकते हैं ॥ 23 ॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 20/121 संख्या देखें ॥ 23 ॥
जीवके संसार-बन्धनका कारण :-
‘कृष्ण-नित्यदास’—जीव, ताहा भुलि’ गेल।
एइ दोषे माया तार गिलाय बान्धिल ॥ 24 ॥
अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 24 ॥
अनुभाष्य—'जीव श्रीकृष्णका नित्यदास है'—इस
सत्यको भूलनेके कारण ही मायाने जीवको अनेक
प्रकारसे लुब्ध और विमोहित करके तीन गुणोंकी बेड़ीसे
उसके गलेको बाँध रखा है। इस कारण बद्धजीवका
भोगवासनारूपी मायिक-बेड़ीके बन्धनसे छूट पाना
कठिन है ॥ 24 ॥
उद्धार और प्रयोजनकी प्राप्तिका एकमात्र उपाय :-
ताते कृष्ण भजे, करे गुरुर सेवन।
मायाजाल छुटे, पाय कृष्णेर चरण ॥ 25 ॥
अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 25 ॥
अनुभाष्य—गुरुसेवा और श्रीकृष्णभजनके बलसे ही
बद्धजीव मायाजालसे मुक्त होकर श्रीकृष्णके चरणकमलोंको
प्राप्त करता है ॥ 25 ॥
भक्तिविहीन वर्णाश्रमधर्मके पालनसे नरककी प्राप्ति :-
चारि वर्णाश्रमी यदि कृष्ण नाहि भजे।
स्वकर्म करिते से रौरवे पड़ि’ मजे ॥ 26 ॥
अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 26 ॥
अनुभाष्य—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र अपने-
अपने वर्ण धर्मका भली-भाँति पालन करनेपर भी,
अथवा ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी अपने-
अपने आश्रमधर्मका भली-भाँति पालन करनेपर भी
यदि वे श्रीकृष्णभजन नहीं करते, तब वे लौकिक
अभिमानके कारण उच्च अवस्था प्राप्त करनेपर भी
अन्तमें पुण्यके क्षय होनेपर रौरव नामक नरकमें
अवश्य ही पतित होते हैं। अप्राकृत भक्तिके अनुशीलनके
अतिरिक्त विषयी वर्णाश्रमीका कोई भी मङ्गल नहीं हो
सकता ॥ 26 ॥
दैववर्णाश्रम-धर्मकी उत्पत्ति :-
श्रीमद्भागवत (11/5/2-3)में—
मुखबाहूरुपादेभ्यः पुरुषस्याश्रमैः सह।
चत्वारो जज्ञिरे वर्णा गुणैर्विप्रादयः पृथक् ॥ 27 ॥
भक्तिके प्रतिकूल आसुरी-वर्णाश्रमीको नरककी प्राप्ति :-
य एषां पुरुषं साक्षादात्मप्रभवमीश्वरम्।
न भजन्त्यवजानन्ति स्थानाद्भ्रष्टाः पतन्त्यधः ॥ 28 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 27-28 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—ब्रह्माके मुखसे 'ब्राह्मण', भुजासे
'क्षत्रिय', जङ्घासे 'वैश्य' और पैरोंसे 'शूद्र'—ये चार वर्ण
पृथक् पृथक् आश्रमोंके साथ और अपने वर्णगत गुणोंके
साथ उत्पन्न हुए थे। इन चारों वर्णाश्रमियोंमेंसे जो अपने
प्रभु भगवान् विष्णुका साक्षात् भजन नहीं करके,
अपने-अपने वर्णाश्रमके अहङ्कारके कारण उनके भजनमें
। 333

[ 22/27-30 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अवज्ञा करते हैं, वे अपने स्थानसे भ्रष्ट होकर
अधःपतित हो जाते हैं॥27-28॥
अनुभाष्य-श्रीनारद श्रीवसुदेवको श्रीभागवत धर्मका
वर्णन करते हुए विदेहराज निमि और नवयोगेन्द्र-संवादका
वर्णन कर रहे हैं; 'हरिभजन विमुख गोदास (इन्द्रियोंके
दास)की क्या गति होती है?'-महाराज निमिके इस
प्रश्नके उत्तरमें नवयोगेन्द्रोंमेंसे एक चमस ऋषि निम्नलिखित
दो श्लोकोंमें भक्तिके अनुकूल दैव-वर्णाश्रम-सृष्टि और
उसके व्यभिचारीकी दुरावस्थाका वर्णन कर रहे हैं-
पुरुषस्य (भगवतः वैराजस्य ब्रह्मणः) मुखबाहूरुपादेभ्यः गुणैः
(सत्त्वरजस्तमोगुणैः) आश्रमैः (ब्रह्मचारिगृहस्थवानप्रस्थ-
भिक्षुकाक्रमचतुष्टयैः) सह पृथक् विप्रादयः (ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्राः)
चत्वारः वर्णाः जज्ञिरे।
एषां (विप्रक्षत्रियवैश्यशूद्राणां ब्रह्मचारिगृहस्थवानप्रस्थयतीनां
मध्ये) ये (जनाः) साक्षात् आत्मप्रभवम् (आत्मनः प्रभवः
जन्म प्राकट्यं वा, यस्मात् तम्) ईश्वरम् [अज्ञात्वा कृतघ्नाः
सन्तः] न भजन्ति, अवजानन्ति (ज्ञात्वापि वर्णाश्रम-
मर्यादा-मदभरेण कृष्णभजनस्यावश्यकता नास्तीति मन्यमानाः
द्विषन्ति), [ते हरि-गुरु-वैष्णव-सेवा-विहीनाः] स्थानात्
(स्व-स्व-वर्णाश्रमात्) भ्रष्टाः (सन्तः) अधःपतन्ति (निरयं
यान्ति); [यतः प्राकृतवर्णाश्रमधर्मः अनित्यः कालक्षुब्धश्च
तात्कालिक-फलोपयोगी असच्छब्द-वाच्यश्च]।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। [जो
प्राकृतवर्णाश्रमधर्म है, वह केवल अनित्य और
क्षणिक-फलकी प्राप्तिके लिये उपयोगी है, अतः उसे
असत्-धर्म ही कहा जायेगा।]॥ 27-28॥
भक्ति-रहित मुक्ताभिमानी ज्ञानी भी अशुद्ध-मनोधर्मी,
शुद्धभक्त ही निर्मल आत्मधर्मी :-
ज्ञानी जीवन्मुक्तदशा पाइनु करि' माने।
वस्तुतः बुद्धि 'शुद्ध' नहे कृष्णभक्ति बिने॥29॥
अनुवाद-अनुभाष्य देखें॥29॥
अमृतप्रवाह भाष्य-मायावादादि मतावलम्बी व्यक्ति
आपने आपको 'ज्ञानी' कहते हैं, किन्तु वास्तवमें
श्रीकृष्णभक्तिके बिना बुद्धि शुद्ध नहीं होती॥ 29 ॥
अनुभाष्य-यद्यपि ज्ञानी मान सकते हैं, - 'मैं
जीवनकालमें ही संसार-बन्धनसे मुक्त हो गया हूँ',
तथापि श्रीकृष्णभक्तिके अतिरिक्त अहंग्रहोपासनासे बुद्धि
शुद्ध नहीं हो सकती। क्योंकि मुक्तिकामी व्यक्ति जीवित
अवस्थामें अपने आपको बद्ध जानकर उससे मुक्त
और मुक्त-अवस्था जानकर उसके अतिरिक्त दृश्य
वस्तुओंमें बद्ध मानता है, इसलिये वह ऐसे अनित्य
भावसमूहके हाथोंसे मुक्त नहीं हो पाता॥ 29 ॥
श्रीकृष्णभक्तिरहित शुष्कज्ञानीको अधोगतिकी प्राप्ति :-
श्रीमद्भागवत (10/2/32) में-
येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिनस्त्वय्य-
स्तभावादविशुद्धबुद्धयः।
आरुह्य कृच्छ्रे
पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः॥30॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 30 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-हे कमलनयन, जो 'मैं विमुक्त
हो गया हूँ, ऐसा कहकर अभिमान करते हैं, वे आपमें
भक्तिरहित होनेके कारण अशुद्ध बुद्धिवाले हैं। वे बहुत
कष्ट करके मायासे अतीत परमपद ब्रह्म तक आरोहण
करके भी भगवद्भक्तिके अनादरके कारण अधःपतित
होते हैं॥ 30॥
अनुभाष्य-कंसके कारागारमें बद्ध देवकीके गर्भमें
आविर्भूत होनेपर ब्रह्मादि देवता 'गर्भस्तोत्र'-नामसे प्रसिद्ध
स्तवसे भगवान्की स्तुति कर रहे हैं-
हे अरविन्दाक्ष, (पद्मपलाशलोचन,) अन्ये (अभक्ताः जनाः)
ये विमुक्तमानिनः (विमुक्ताः-ज्ञानिनः वयमिति मन्यमानाः)
त्वयि (भगवति) अस्तभावात् (अस्तः निरस्तः अतएव असन्
यः भावः तस्मात्, भक्तेरभावात् तदनुशीलनराहित्यात्)
अविशुद्धबुद्धयः (न विशुद्धा बुद्धिः येषां ते तथा, मुक्तिपिशाचीं
बहुमन्यमानाः ज्ञानजनित-कैतव-कल्मषकषाय-दुष्टमतयः इत्यर्थः)
कृच्छ्र
स्वामिचरणाः, मोक्षपीठादव्यवहितप्रदेशम्) आरुह्य (अधिरुह्य)
अनादृतयुष्मदङ्घ्रयः (न आदृतौ युष्मदङ्घ्री यैः ते, तव
पादपद्मानित्यसेवयाः अनादरेण अपराधवशात् कृष्णकृपारज्जुविच्छिन्नाः
334 ।