श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
164 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 5/164 ]
इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे प्रद्युम्न-मिश्रोपाख्यानं वर्णन कर रहा है॥164॥
नाम पञ्चमः परिच्छेदः।
अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें प्रद्युम्न-मिश्र-उपाख्यान
कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका नामक पाँचवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।
छठा अध्याय
कथासार—महाप्रभुमें कृष्णप्रेमके तीव्र भावोंके
उदय होनेके समय श्रीस्वरूप और श्रीरामानन्द उन्हें
अनेक प्रकारसे सान्त्वना प्रदान करते थे। उसी समय
श्रीरघुनाथदास भी पुरीमें आ गये। श्रीरघुनाथदास बहुत
दिनोंसे महाप्रभुके चरणकमलोंका आश्रय करनेका प्रयत्न
कर रहे थे। महाप्रभु वृन्दावन जानेके छलसे जिस
समय शान्तिपुर गये, तब उनके चरणोंका आश्रय
करनेकी प्रार्थना करनेपर महाप्रभुने उन्हें [श्रीरघुनाथदासको]
युक्त-वैराग्यका आश्रय करनेका उपदेश दिया। उन्हीं
दिनों किसी म्लेच्छ-चौधरीने श्रीहिरण्यदासके प्रति ईर्ष्या
करके गौड़से वजीरको बुलवाया, श्रीहिरण्यदास वहाँसे
भाग गये। श्रीरघुनाथदासकी बुद्धिके बलसे श्रीहिरण्यदासका
वह सङ्कट दूर हो गया। श्रीरघुनाथदासने पाणिहाटी
जाकर श्रीनित्यानन्द प्रभुकी आज्ञासे चिड़वा-दहीका
महोत्सव किया। उस महोत्सवके अगले दिन श्रीनित्यानन्द
प्रभुने कृपा करके श्रीरघुनाथको श्रीचैतन्यचरण प्राप्त
करनेका आशीर्वाद दिया। उसके बाद रात्रिमें
श्रीवासुदेव-दत्तके अनुगृहीत और अपने गुरु एवं
पुरोहित श्रीयदुनन्दन आचार्यके श्रीरघुनाथके घरपर आनेसे
श्रीरघुनाथ उनके साथ कुछ दूरी तक जाकर वहाँसे
अकेले भाग गये। गुप्त मार्गसे जाकर बारह दिनोंमें
पुरुषोत्तम क्षेत्रमें पहुँचकर महाप्रभुके चरणकमलोंमें जाकर
पड़े। महाप्रभुने उन्हें 'स्वरूपके रघु' यह नाम देकर
श्रीस्वरूप गोस्वामीके हाथोंमें समर्पित किया। श्रीरघुनाथने
वहाँ पाँच दिन तक प्रसाद पाया और उसके बाद बहुत
दिनों तक सिंहद्वारपर अयाचक-वृत्तिका पालन किया।
बादमें छत्रमें महाप्रसाद माँगकर खाने लगे। श्रीरघुनाथके
पिताने [उनके पुरीमें होनेका] संवाद पाकर कुछ सेवक
और धन भेजा, किन्तु श्रीरघुनाथने उनसे कोई स्थूल
धन-जनादि ग्रहण नहीं किया। महाप्रभुने श्रीरघुनाथके
छत्रमें भिक्षा करनेकी बातको सुनकर उन्हें अपनी
गुञ्जामाला और गोवर्धन शिला प्रदान की। बादमें
श्रीदास गोस्वामीने मार्गमें फेंके गये बासी-सड़े हुए
प्रसादको धोकर खाना आरम्भ किया, उससे श्रीस्वरूप
और महाप्रभुने सन्तुष्ट होकर एकदिन उस प्रसादको
बलपूर्वक आस्वादन करके श्रीरघुनाथपर कृपा की।
—(अमृतप्रवाह भाष्य)
श्रीरघुनाथको श्रीस्वरूपके हाथोंमें अर्पण करनेके बाद
आत्मसात् करनेवाले श्रीगौरको प्रणाम :-
कृपागुणैर्यः कुगृहान्धकूपादुद्धृत्य भंग्या रघुनाथदासम्।
न्यस्य स्वरूपे विदधेऽन्तरङ्गं श्रीकृष्णचैतन्यममुं प्रपद्ये॥१॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥१॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जिन्होंने अपनी कृपारूपी रस्सीके
द्वारा श्रीरघुनाथदासका गृहरूपी अन्धकूपसे कुशलतासे
उद्धार करके उन्हें श्रीस्वरूपके निकट अर्पण करके
अपना अन्तरङ्ग भक्त बनाया था, मैं उन्हीं श्रीकृष्णचैतन्यके
चरणकमलोंमें शरणागत होता हूँ॥१॥
अनुभाष्य—
यः (चैतन्यदेवः) कृपागुणैः (अनुकम्पा-वितरणैः) कुगृहान्धकूपात्
(कु कुत्सितं पुंस्त्रीपुत्रादिकथाबहुलं गृहमेव अन्धकूपः
निर्गमनपथरहितः, तस्मात्) रघुनाथदासं (दासगोस्वामिनं) भंग्या
(कौशलेन) उद्धृत्य (उत्थाप्य) स्वरूपे (दामोदर-स्वरूप-गोस्वामिनि)
न्यस्य (समर्प्य) अन्तरङ्गं (निजजनं) विदधे (चकार), अमुं तं
श्रीकृष्णचैतन्यम् अहं प्रपद्ये (शरणं व्रजामि)।
श्लोक-भावानुवाद—जिन्होंने अनुकम्पा करके
श्रीदासगोस्वामीका गृहान्धकूपसे (निन्दित पुरुष-स्त्री-पुत्रादिकी
बातोंके आधिक्यवाले गृहरूपी अन्धकूप जिससे बाहर
निकलनेका मार्ग नहीं है, उससे) कुशलतापूर्वक उद्धार
करके श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीको समर्पित करके
अन्तरङ्ग-भक्त बनाया, उन श्रीकृष्णचैतन्यके मैं शरणागत
होता हूँ।
166 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/1-8 ]
श्रीरघुनाथदास गोस्वामी रचित विलापकुसुमाञ्जलि स्तवमें—
“यो मां दुस्तरनिर्जलमहाकूपादपारक्लमात् सद्यः
सान्द्रदयाम्बुधिः प्रकृतितः स्वैरीकृपारज्जुभिः।
उद्धृत्यात्मसरोजनिन्दिचरणप्रान्तं प्रपाद्य स्वयं
श्रीदामोदरसाच्चकार तमहं चैतन्यचन्द्रं भजे॥”
[अर्थात् “स्वभावतः घनीभूत दयाके सागर जिन्होंने
मुझे अत्यन्त क्लेशपूर्ण, बड़ी कठिनाईसे पार होनेवाले
गृहरूपी जलशून्य महाकूपसे स्वतन्त्र कृपारूपी रस्सीके
द्वारा उद्धार करके कमलकी शोभाको भी धिक्कार
देनेवाले अपने चरणोंमें आश्रय प्रदान करके बादमें
श्रीस्वरूप-दामोदर प्रभुके हाथोंमें समर्पित किया था, मैं
उन्हीं श्रीचैतन्यचन्द्रका भजन करता हूँ।"]॥1॥
जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द।
जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥2॥
अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो।
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो।
श्रीगौरभक्तवृन्दकी जय हो॥2॥
नीलाचलमें गौरलीला :-
एइमत गौरचन्द्र भक्तगण-सङ्गे।
नीलाचले नाना लीला करे नाना रङ्गे ॥3॥
अनुवाद-इस प्रकार श्रीगौरचन्द्र भक्तोंके साथ
नीलाचलमें अनेक प्रकारकी आनन्द प्रदान करनेवाली
लीलाएँ कर रहे थे॥3॥
अपने भक्तोंके कष्टकी आशङ्कासे अपने
कृष्ण-विरहरूपी दुःखका सङ्गोपन करना :-
यद्यपि अन्तरे कृष्णवियोग बाधये।
बाहिरे ना प्रकाशय भक्त-दुःख-भये ॥4॥
अनुवाद-यद्यपि कृष्ण-वियोग भीतरसे महाप्रभुके
हृदयको पीड़ित करता था, तथापि भक्तोंके दुःखके भयसे
उसे बाहरमें प्रकाशित नहीं करते थे॥4॥
सुतीव्र कृष्ण-विच्छेद-दुःखमें महाप्रभुकी अवर्णनीय व्याकुलता :-
उत्कट विरह-दुःख यबे बाहिराय।
तबे ये वैकल्य प्रभुर वर्णन ना याय॥5॥
अनुवाद-जब महाप्रभुके हृदयका तीव्र विरह-दुःख
बाहर निकलता, उस समय उनमें कैसी व्याकुलता
होती, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥5॥
विप्रलम्भ दशामें श्रीरायका कृष्णकथाका संलाप और
श्रीस्वरूपका गान ही महाप्रभुके लिये जीवन-स्वरूप :-
रामानन्देर कृष्णकथा, स्वरूपेर गान।
विरह-वेदनाव् प्रभुर राखये पराण ॥6॥
अनुवाद-महाप्रभुकी विरह-वेदनामें श्रीराम force-वेदनामें श्रीराम forceानन्द रायकी
श्रीकृष्णकथा तथा श्रीस्वरूप दामोदरका गान ही उनके
प्राणोंकी रक्षा करते थे॥6॥
अनेक लोगोंके साथ नाना प्रकारके कृष्ण-प्रसङ्गोंमें
विरहके गुरुत्वका कम होना, रात्रिमें निर्जनमें
कृष्णविरह-दुःखकी वृद्धि :-
दिने प्रभु नाना-सङ्गे हय अन्य मन।
रात्रिकाले बाड़े प्रभुर विरह-वेदन ॥7॥
अनुवाद-दिनके समय तो अनेक भक्तोंके साथ
मिलनेके कारण महाप्रभुका मन विरहसे कुछ हट जाता
था, किन्तु रात्रिके समय महाप्रभुकी विरह-वेदना बहुत
बढ़ जाती॥7॥
श्रीस्वरूप और श्रीरामरायके द्वारा उनके भावोंके उपयोगी
वचन और गानके द्वारा महाप्रभुको आश्वासन :-
ताँर सुखहेतु सङ्गे रहे दुइजना।
कृष्णरस-श्लोक-गीते करेन सान्त्वना ॥8॥
अनुवाद-महाप्रभुकी विरह-वेदनाको शान्त करनेके
लिये श्रीस्वरूप दामोदर तथा श्रीराम forceानन्द राय-दोनों
उनके साथ रहते और श्रीकृष्णरससे परिपूर्ण श्लोक एवं
गीत सुनाकर महाप्रभुको सान्त्वना प्रदान करते ॥8॥
[ 6/9-15 छठा अध्याय 167
श्रीकृष्णके जैसे सुबल सखा हैं,
महाप्रभुके भी वैसे श्रीराम-राय :-
सुबल यैछे पूर्वे कृष्णसुखेर सहाय।
गौरसुखदान-हेतु तैछे राम-राय॥9॥
अनुवाद—श्रीकृष्णलीलाके समय जैसे सुबल सखा
उनकी श्रीराधासे विरहके समय उन्हें सुखी करनेके
लिये सहायता प्रदान करते थे, उसी प्रकार श्रीरामानन्द
राय श्रीगौरसुन्दरको सुखी करनेके लिये सहायता
करते॥9॥
श्रीराधाकी जैसे ललिता सखी, महाप्रभुके लिये
भी वैसे श्रीस्वरूप-दामोदर :-
पूर्वे यैछे राधार ललिता सहाय-प्रधान।
तैछे स्वरूप-गोसाञि राखे प्रभुर प्राण॥10॥
अनुवाद—पहले जैसे श्रीराधाकी विरह दशामें उनके
प्राणोंकी रक्षाके लिये श्रीललिता प्रधान सहायिका थीं,
उसी प्रकार श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी महाप्रभुके
प्राणोंकी रक्षा करते थे॥10॥
दोनों ही महाप्रभुके परमप्रेष्ठ अन्तरङ्ग :-
दुइ जनार सौभाग्य कहन ना याय।
प्रभुर 'अन्तरङ्ग' बलि' याँरे लोके गाय॥11॥
अनुवाद—श्रीरामानन्द राय तथा श्रीस्वरूप दामोदरके
सौभाग्यका वर्णन नहीं किया जा सकता। वे महाप्रभुके
अन्तरङ्गके रूपमें जगत्में प्रसिद्ध थे॥11॥
महाप्रभुके साथ श्रीरघुनाथके मिलनके
वृत्तान्तका वर्णन :-
एइमत विहरे गौर लञा भक्तगण।
रघुनाथ-मिलन एबे सुन, भक्तगण॥12॥
अनुवाद—इस प्रकार श्रीगौरसुन्दर अपने भक्तोंके
साथ विहार करते थे। हे भक्तों! अब महाप्रभुके साथ
श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके मिलनेका प्रसङ्ग सुनो॥12॥
पूर्वकालमें कानाइ-नाटशालासे पुरी लौटते समय मार्गमें
शान्तिपुरमें महाप्रभुके द्वारा श्रीरघुनाथको शिक्षा :-
पूर्वे शान्तिपुरे रघुनाथ यबे आइला।
महाप्रभु कृपा करि' ताँरे शिखाइला॥13॥
अनुवाद—पहले जब श्रीरघुनाथदास शान्तिपुरमें महाप्रभुके
दर्शनके लिये आये थे, तब महाप्रभुने उन्हें कृपा करके
शिक्षा प्रदान की थी॥13॥
महाप्रभुकी शिक्षाके अनुसार श्रीरघुनाथके द्वारा घरमें युक्त-
वैराग्यका आचरण, बाहरी रूपमें विषयीकी भाँति और
भीतरमें निर्विषय निष्किञ्चन और श्रीकृष्णके लिये
अखिल चेष्टासे युक्त :-
प्रभुर शिक्षाते तैं हो निज-घरे याय।
मर्कट-वैराग्य छाड़ि' हइला 'विषयी-प्राय'॥14॥
अनुवाद—महाप्रभुकी शिक्षानुसार श्रीरघुनाथदास अपने
घर लौट गये और वे मर्कट-वैराग्यको छोड़कर बाहरी
रूपसे विषयीकी भाँति व्यवहार करने लगे॥14॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'मर्कट-वैराग्य',—गृहस्थ व्यक्तिके
द्वारा वैरागीके वेषादिको धारण करके रहनेपर भी उसे
'मर्कट-वैरागी' कहते हैं॥14॥
अनुभाष्य—श्रीरघुनाथको शिक्षा,—मध्यलीला 16/238-243
संख्या देखें। लोगोंकी दृष्टिमें 'विषयी'के जैसे श्रीरघुनाथने
भोगोंमें आसक्त बन्दरके बाह्य-वैराग्यके प्रदर्शनकी रीतिका
अनुकरण सम्पूर्ण रूपसे त्याग दिया॥13-14॥
भितरे वैराग्य, बाहिरे करे सर्व कर्म।
देखिया त' माता-पितार आनन्दित मन॥15॥
अनुवाद—श्रीरघुनाथदास भीतरसे विरक्त थे, परन्तु
बाहरसे विषयी व्यक्तियोंकी भाँति सब कार्य करने लगे।
उनके ऐसे व्यवहारको देखकर उनके माता-पिताको
बहुत आनन्द हुआ॥15॥
अनुभाष्य—हृदयमें श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य विषयोंको
एकबार भी आवाहन नहीं करनेपर लोकदृष्टिमें सब
प्रकारके विषय-कार्य करने लगे॥15॥
168 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/16-22 ]
मथुरासे आये महाप्रभुका सङ्ग पानेके लिये प्रयास :-
'मथुरा हैते प्रभु आइला',—वार्त्ता यबे पाइला।
प्रभु-पाश चलिबारे उद्योग करिला ॥ 16 ॥
अनुवाद—'महाप्रभु मथुरासे लौट आये हैं',—
श्रीरघुनाथदासको जब यह समाचार मिला, तब वे
महाप्रभुके पास जानेका प्रयास करने लगे ॥ 16 ॥
सप्तग्रामके मुस्लिम चौधरी नवाबका वजीरकी
सहायतासे सप्तग्रामपर अधिकार :-
हेनकाले मुलुकेर एक म्लेच्छ अधिकारी।
सप्तग्राम-मुलुकेर से हय 'चौधुरी' ॥ 17 ॥
अनुवाद—उस समय उस प्रदेशमें एक मुसलमान
अधिकारी था। सप्तग्राम-प्रदेशका वह 'चौधुरी' था ॥ 17 ॥
अनुभाष्य—'चौधुरी',—जो प्रजासे उनके द्वारा देय
करमें-से एक चौथाई अपने भागको अपने पास रखकर
शेष धन भूमि-अधिकारीके पास खजानेमें जमा करते
हैं॥ 17 ॥
हिरण्यदास मुलुक निल 'मक्ररि' करिया।
तार अधिकार गेल, मरे से देखिया ॥ 18 ॥
अनुवाद—श्रीरघुनाथदासके ताऊ श्रीहिरण्यदासने राजासे
ताल-मेल करके सप्तग्राम-प्रदेशसे कर-संग्रहका अधिकार
स्थायीरूपसे अपने नामपर लिखवा लिया। मुसलमान
चौधुरीका अधिकार चले जानेपर वह श्रीहिरण्यदाससे
ईर्ष्या करने लगा ॥ 18 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'मक्ररि',—इजारा (पट्टा देना),
(स्थायीरूपसे) व्यवस्था ॥ 18 ॥
अनुभाष्य—श्रीहिरण्यदासने सप्तग्राम-प्रदेशके कर-संग्रह
और भुगतानके कार्यकी स्थायीरूपसे व्यवस्था कर ली;
उससे मुसलमान चौधुरीको प्राप्त होनेवाला अंश सम्पूर्ण
रूपसे समाप्त हो गया, ऐसा देखकर उसके हृदयमें
बहुत क्रोध हुआ ॥ 18 ॥
बार लक्ष देय राजाय, साधे बिश लक्ष।
से 'तुरुक्' किछु ना पाञा हैल प्रतिपक्ष ॥ 19 ॥
अनुवाद—श्रीहिरण्यदास बीस लाख मुद्राएँ एकत्रित
करके कर-रूपमें राजाको बारह लाख मुद्राएँ देते थे।
वह 'तुर्क' (मुस्लिम चौधुरी) कुछ भी नहीं प्राप्त
करनेके कारण श्रीहिरण्यदासका प्रतिद्वन्द्वी बन गया ॥ 19 ॥
अनुभाष्य—बीस लाख करमें-से राजाको एक
चौथाई भाग (पाँच लाख) छोड़कर पन्द्रह लाख जमा
करनेके बदले बारह लाख जमा करनेपर वह तुर्क
अर्थात् मुसलमान स्वयंको प्राप्त होने वाले लाभसे
वञ्चित होकर उनका विरोधी बन गया ॥ 19 ॥
हिरण्य-गोवर्धनका भाग जाना
और श्रीरघुनाथका बन्धन :-
राज-घरे कैफियत् दिया उजीरे आनिल।
हिरण्यदास पलाइल, रघुनाथे बान्धिल ॥ 20 ॥
अनुवाद—उस मुस्लिम चौधुरीने राज-खजानेमें यह
समस्त जानकारी दी और श्रीहिरण्यदासको पकड़नेके
लिये वह राजाके मन्त्रीको अपने साथ लेकर सप्तग्राममें
आया। श्रीहिरण्यदास तो घरसे भाग गये, इसलिये
उन्होंने श्रीरघुनाथदासको पकड़ लिया ॥ 20 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'कैफियत्',—विवरण-पत्र ॥ 20 ॥
श्रीरघुनाथको मुस्लिम-चौधुरीके द्वारा डराना :-
प्रतिदिन रघुनाथे करये भर्त्सना।
“बाप-ज्येठारे आन', नहे पाइबा यातना ॥ ”21 ॥
अनुवाद—मुस्लिम चौधुरी प्रतिदिन आकर
श्रीरघुनाथदासको डराता-धमकाता और उनसे
कहता,—“अपने पिता और ताऊको लेकर आओ
अन्यथा तुम्हें यातनाएँ भोगनी पड़ेंगी ॥ ”21 ॥
श्रीरघुनाथके मुखके दर्शनसे स्नेहसे
आर्द्रीचित्त होकर लौटना :-
मारिते आसिया यदि देखे रघुनाथे।
मन फिरि' याय, तबे ना पारे मारिते ॥ 22 ॥
[ 6/22-30
छठा अध्याय
169
अनुवाद—जब भी वह चौधरी पीटनेके निश्चयसे आता, श्रीरघुनाथको देखनेके साथ-ही-साथ उसका मन परिवर्तित हो जाता और वह उन्हें पीट नहीं पाता ॥ २२ ॥
बाहरमें रोष, अन्दरमें शङ्का :-
विशेषे कायस्थ-बुद्धये अन्तरे करे डर।
मुखे तर्जे गर्जे, मारिते सभय अन्तर ॥ २३ ॥
अनुवाद—श्रीरघुनाथ दासके कायस्थ होनेके कारण मुस्लिम चौधरी उनसे डरता था। वह मुखसे तो बहुत तर्जन-गर्जन करता था, किन्तु पीटनेसे डरता था ॥ २३ ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीरघुनाथ सम्माननीय और धनी व्यक्तिके पुत्र एवं पण्डित हैं, विशेषतः ब्राह्मणोंके अनुगत अति प्रधान कायस्थ वर्णमें उत्पन्न हुए हैं—यह जाननेके कारण म्लेच्छ चौधरी उन्हें मार नहीं पाता था। सत्ययुगसे ही यह जाना जाता है कि कायस्थगण—राजकर्मचारी होते हैं; क्षत्रियोंके समान ही उनका सम्मान होता है; जैसे, याज्ञवल्क्ये,—
“चाटतस्करदुर्वृत्तैर्महासाहसिकादिभिः।
पीड्यमाना प्रजा रक्षेत् कायस्थैश्च विशेषतः ॥”
अर्थात् “राजाका धर्म यह है कि दुष्ट लोगोंके हाथोंसे प्रजाकी रक्षा करेंगे, और यदि उनके प्रधान कर्मचारी राजवल्लभ कायस्थगण प्रजापर अत्याचार करें, तो उसका भी विशेष रूपसे विचार करेंगे। क्योंकि राजाके प्रधान कर्मचारीके द्वारा किसी प्रकारका अत्याचार करनेपर राजाके विशेष ध्यान नहीं देनेपर उससे प्रजाकी रक्षा नहीं होगी ॥” २३ ॥
मधुर-भाषी, सम्मान प्रदान करनेवाले श्रीरघुनाथकी मुस्लिम चौधरीके प्रति सविनय उक्ति :-
तबे रघुनाथ किछु चिन्तिला उपाय।
विनति करिया कहे सेइ म्लेच्छ-पाय ॥ २४ ॥
“आमार पिता, ज्येठा हय तोमार दुइ भाइ।
भाई-भाइये तोमरा कलह कर सर्वदाइ ॥ २५ ॥
कभु कलह, कभु प्रीति—इहार निश्चय नाइ।
कालि पुनः तिन भाइ हइबा एक-ठानि ॥ २६ ॥
आमि यैछे पितार, तैछे तोमार बालक।
आमि तोमार पाल्य, तुमि आमार पालक ॥ २७ ॥
पालक हञा पाल्येरे ताड़िते ना युयाय।
तुमि सर्वशास्त्र जान ‘जिन्दापीर’-प्राय ॥” २८ ॥
अनुवाद—श्रीरघुनाथ दासने उस मुस्लिम चौधरीकी धमकियोंसे बचनेका उपाय सोचा और उसके चरणोंमें विनती करते हुए कहा,—“मेरे पिता और ताऊ—आपके दो भाई हैं। भाई-भाईके बीचमें सदैव झगड़ा होता रहता है। कभी झगड़ा करते हैं और कभी प्रीति करते हैं—यह निश्चित नहीं है कि कब यह बदलता है। मुझे विश्वास है कि कल आप तीनों भाई फिरसे एक साथ हो जाओगे। मैं जैसे अपने पिताका पुत्र हूँ, उसी प्रकार आपका भी पुत्र हूँ। मैं आपका पाल्य हूँ और आप मेरे पालक हैं। पालक होकर पाल्यको इस प्रकारसे दण्डित करना उचित नहीं है। आप तो समस्त शास्त्रोंमें निपुण और जिन्दापीरके समान हैं ॥” २४-२८ ॥
मुस्लिम चौधरीकी श्रीरघुनाथके प्रति स्नेह-आर्द्रता :-
एत शुनि' सेइ म्लेच्छेर मन आर्द्र हैल।
दाड़ि बहि' अश्रु पड़े, काँदिते लागिल ॥ २९ ॥
अनुवाद—श्रीरघुनाथदासके इन वचनोंको सुनकर उस म्लेच्छ चौधरीका हृदय पिघल गया। वह रोने लगा, उसके नेत्रोंसे अश्रु निकलकर उसकी दाढ़ीके ऊपरसे प्रवाहित होने लगे ॥ २९ ॥
म्लेच्छ बले,—“आजि हैते तुमि—मोर ‘पुत्र’।
आजि छोड़ाइमु तोमा' करि' एक सूत्र ॥” ३० ॥
अनुवाद—म्लेच्छ चौधरीने कहा,—“आजसे तुम मेरे पुत्र हो। मैं आज ही कोई उपाय करके तुम्हें छुड़ाऊँगा ॥” ३० ॥
अनुभाष्य—'सूत्र',—चलती भाषामें 'छुता' (छल) ॥ ३० ॥
170 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/31–40 ]
वजीरको बतलाकर श्रीरघुनाथका बन्धन-खोलना :-
उजिरे कहिया रघुनाथे छाड़ाइल।
प्रीति करि' रघुनाथे कहिते लागिल ॥ 31 ॥
श्रीहिरण्यदासकी स्वार्थपरायणता और धनके लोभके
कारण लोभी मुस्लिम चौधरीके द्वारा भर्त्सना :-
“तोमार ज्येठा निर्बुद्धि अष्टलक्ष खाय।
आमि—भागी, आमारे किछु दिवारे युयाय ॥ 32 ॥
श्रीरघुनाथके प्रति स्नेह-आर्द्रताके कारण
दोनोंका मिलन करवाना :-
याह तुमि, तोमार ज्येठारे मिलाह आमारे।
ये-मते भाल हय करुन, भार दिलुँ तोरे ॥” 33 ॥
अनुवाद—उस म्लेच्छ चौधरीने वजीरको कहकर श्रीरघुनाथ दासको छुड़वाया और उन्हें बहुत प्यारसे कहने लगा, —“तुम्हारे ताऊ मन्दबुद्धि हैं, वह अकेले आठ लाख मुद्राएँ खा रहे हैं। मैं भी तो उसका भागीदार हूँ, उसमें-से कुछ तो मुझे भी देना चाहिये। अब तुम जाकर अपने ताऊसे मुझे मिलवानेका प्रबन्ध करो। वे जिस प्रकारसे उचित हो, वैसा करें। मैं इसका सारा दायित्व उनके ऊपर छोड़ रहा हूँ॥” 31–33 ॥
रघुनाथ आसि' तबे ज्येठारे मिलाइल।
म्लेच्छ-सहित वश कैला—सब शान्त हैल ॥ 34 ॥
अनुवाद—श्रीरघुनाथ दासने छूटकर अपने ताऊजीको मुस्लिम चौधरीसे मिलवाया। इस प्रकार श्रीरघुनाथ दासने उन दोनोंका समझौता करवा दिया और सब कुछ शान्त हो गया ॥ 34 ॥
इस प्रकार वर्षके अन्तमें पुनः भागनेका प्रयास :-
एइमत रघुनाथेर वत्सरेक गेल।
द्वितीय वत्सरे पलाइते मन कैल ॥ 35 ॥
अनुवाद—इस प्रकार ज़मीनदारीका कार्य कुशलतासे सम्भालते श्रीरघुनाथ दासका एक वर्ष व्यतीत हो गया। दूसरे वर्ष उन्होंने घर छोड़कर जानेका विचार बनाया ॥ 35 ॥
रात्रिमें भागना, मार्गमें पकड़े जाना और घरमें लाना :-
रात्रे उठि' एकेला चलिला पालाञा।
दूर हैते पिता ताँरे आनिल धरिया ॥ 36 ॥
अनुवाद—एक रात श्रीरघुनाथ दास उठकर अकेले घरसे निकल पड़े और घरसे दूर चले गये, किन्तु उनके पिताजी उन्हें वहाँसे भी पकड़कर ले आये ॥ 36 ॥
पुनः पुनः भागना और पकड़े जानेपर बाँधे जाना :-
एइमते बारे बारे पलाय, धरि' आने।
तबे ताँर माता कहे ताँर पिता-सने ॥ 37 ॥
पुत्रके बन्धनके लिये पत्नीके द्वारा अनुरोध
करनेपर श्रीगोवर्धनदासकी उक्ति :-
“पुत्र ‘बातुल’ हइल, राखह बान्धिया।”
ताँर पिता कहे तारे निर्विण्ण हञा ॥ 38 ॥
अनुवाद—इस प्रकार श्रीरघुनाथ दास बार बार घरसे भाग जाते और उनके पिता उन्हें पकड़कर ले आते। तब श्रीरघुनाथदासकी माताने उनके पितासे कहा, —“हमारा पुत्र पागल हो गया है, आप उसे बाँधकर रखो।” श्रीरघुनाथदासके पिताने दुःखित होकर उनसे कहा— ॥ 37–38 ॥
अनुभाष्य—'निर्विण्ण',—कातर अथवा दुःखित ॥ 38 ॥
“इन्द्रसम ऐश्वर्य, स्त्री अप्सरा-सम।
ए सब बान्धिते नारिलेक याँर मन ॥ 39 ॥
देहके जनक अथवा शौक्र जन्मदाता पिता जीवके प्रारब्ध-
अप्रारब्ध कर्मनाशक नित्यप्रभु अथवा ईश्वर नहीं :-
दड़िर बन्धने ताँरे राखिबा केमते?
जन्मदाता पिता नारे ‘प्रारब्ध’ खण्डाइते ॥ 40 ॥
अनुवाद— “इन्द्रके समान ऐश्वर्य और अप्सराके समान स्त्री—ये सब भी जिसके मनको नहीं बाँध सके, तो फिर उसे रस्सीके बन्धनमें बाँधकर कैसे रखोगी? जन्मदाता पिता भी पुत्रके प्रारब्धको नहीं मिटा सकता ॥ 39–40 ॥
[ 6/40-49 छठा अध्याय 171
अमृतप्रवाह भाष्य—'प्रारब्ध'—पूर्व जन्मोंके वे सब
कर्म, जो फलोन्मुखी हुए हैं॥40॥
श्रीचैतन्यमें आविष्ट सेवक ही मुक्त अथवा अप्राकृत :-
चैतन्यचन्द्रेर कृपा हञाछे इँहारे।
चैतन्यप्रभुर 'बातुल' के राखिते पारे??"41॥
अनुवाद—इसपर श्रीचैतन्यचन्द्रकी कृपा हुई है।
श्रीचैतन्य महाप्रभुके लिये 'पागल' व्यक्तिको कौन
बाँधकर रख सकता है?"41॥
श्रीनित्यानन्दप्रभुके पाणिहाटीमें आनेपर
श्रीरघुनाथके द्वारा उनके चरण-दर्शन :-
तबे रघुनाथ किछु विचारिला मने।
नित्यानन्द-गोसाञिर पाश चलिला आर दिने॥42॥
अनुवाद—तब श्रीरघुनाथदासने मनमें कुछ विचार
किया और अगले दिन वे श्रीनित्यानन्द-गोसाईंके
दर्शनके लिये चल दिये॥42॥
श्रीनित्यानन्दप्रभुके साथ बहुतसे सेवक
और कीर्त्तन-गान करनेवाले :-
पाणिहाटि-ग्रामे पाइला प्रभुर दरशन।
कीर्त्तनीया सेवक सङ्गे आर बहुजन॥43॥
अनुवाद—श्रीरघुनाथदासको पाणिहाटि-ग्राममें श्रीनित्यानन्द
प्रभुके दर्शन हुए। श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ कीर्त्तन
करनेवाले और अन्यान्य बहुतसे सेवक थे॥43॥
गङ्गाके तटपर वृक्षके नीचे बने चबूतरेपर श्रीनित्यानन्द
प्रभु एवं उनके सङ्गिगणोंका नीचे बैठना :-
गङ्गातीरे वृक्ष-मूले पिण्डार उपरे।
बसियाछेन प्रभु—येन सूर्योदय करे॥44॥
अनुवाद—गङ्गाके तटपर वृक्षके नीचे बने चबूतरेपर
बैठे हुए श्रीनित्यानन्द प्रभुका ऐसा तेज था मानो सूर्य
उदित हुए हों॥44॥
श्रीनित्यानन्दके दर्शनसे श्रीरघुनाथका
विस्मय और दण्डवत् प्रणाम :-
तले-उपरे बहुभक्त हञाछे वेष्टित।
देखि' प्रभुर प्रभाव, रघुनाथ-विस्मित॥45॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु चबूतरेके चारों ओर
भूमिपर बैठे हुए बहुतसे भक्तोंसे घिरे हुए थे। श्रीनित्यानन्द
प्रभुके प्रभावको देखकर श्रीरघुनाथदास विस्मित हो
गये॥45॥
दण्डवत् हञा पड़िला कतदूरे।
सेवक कहे,—'रघुनाथ दण्डवत् करे॥'46॥
अनुवाद—श्रीरघुनाथदासने बहुत दूरसे ही श्रीनित्यानन्द
प्रभुको दण्डवत् प्रणाम किया। श्रीनित्यानन्द प्रभुके
सेवकने कहा,—'रघुनाथ आपको दण्डवत् प्रणाम कर
रहा है॥'46॥
अन्तरङ्ग और निजजन मानकर श्रीरघुनाथके
प्रति श्रीनित्यानन्द प्रभुकी कृपा :-
शुनि' प्रभु कहे,—"चोरा दिलि दरशन।
आय, आय, आजि तोर करिमु दण्डन॥"47॥
अनुवाद—यह सुनकर श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा,—'हे
चोर, आज तुम दिखायी दिये हो। आओ, आओ, आज
मैं तुम्हें दण्ड दूँगा॥"47॥
श्रीरघुनाथके सिरपर अपने चरण रखकर कृपा :-
प्रभु बोलाय, तेंहो निकटे ना करे गमन।
आकर्षिया ताँर माथे धरिला चरण॥48॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु श्रीरघुनाथदासको बुला
रहे थे, परन्तु वे उनके निकट नहीं जा रहे थे।
श्रीनित्यानन्द प्रभुने उन्हें बलपूर्वक अपनी ओर खींचकर
उनके सिरपर अपने चरणकमल रख दिये॥48॥
श्रीनित्यानन्दकी अहैतुकी दया :-
कौतुकी नित्यानन्द सहजे दयामय।
रघुनाथे कहे किछु हञा सदय॥49॥
172 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/49-58 ]
अपने भक्तोंके भोजन करानेके लिये श्रीरघुनाथको
आदेशरूपी दण्ड देना; अर्थात् दण्ड-महोत्सव-लीलाके द्वारा
धनवान भोगी विषयीका नित्यानन्दगणों अर्थात् शुद्धभक्तोंकी
सेवासे ही कंजूसिरूपी अनर्थका नाश और नित्यमङ्गल
उदयरूपी शिक्षा प्रदान करना :-
“निकटे ना आइस, चोरा, भाग' दूरे दूरे।
आजि लाग् पाञाछि, दण्डिमु तोमारे ॥ 50 ॥
दधि, चिड़ा भक्षण कराह मोर गणे।”
शुनि' आनन्द हैल रघुनाथेर मने ॥ 51 ॥
अनुवाद—कौतुक करनेवाले श्रीनित्यानन्द प्रभु स्वभावसे
ही दयामय हैं। सदय होकर उन्होंने श्रीरघुनाथसे
कहा,—“ओ चोर! तुम निकटमें नहीं आ रहे हो,
दूर-दूर भागते रहते हो। किन्तु आज तुम पकड़में आ
गये हो, मैं तुम्हें दण्ड दूँगा। तुम दही और चिड़वा
लाकर मेरे भक्तोंको खिलाओ।” श्रीनित्यानन्द प्रभुके
वचन सुनकर श्रीरघुनाथदासके हृदयमें बहुत आनन्द
हुआ ॥ 49-51 ॥
अनुभाष्य—'लाग्',—स्पर्श, साक्षात्कार, सन्धान,
सङ्ग ॥ 50 ॥
अपने गाँवसे चिड़ा-महोत्सवके लिये द्रव्यादि मँगावाना :-
सेइक्षणे निज-लोक पाठाइला ग्रामे ।
भक्ष्यद्रव्य लोक सब ग्राम हैते आने ॥ 52 ॥
अनुवाद—श्रीरघुनाथदासने उसी समय अपने सेवकोंको
सारी खाद्य-सामग्री लेकर वहाँ लानेके लिये गाँवमें
भेजा ॥ 52 ॥
चिड़ा, दधि, दुग्ध, सन्देश, आर चिनि, कला।
सब द्रव्य आनाञा चौदिके धरिला ॥ 53 ॥
अनुवाद—श्रीरघुनाथदासने चिड़वा, दही, दूध, सन्देश,
चीनी और केला—इन सब सामग्रियोंको मँगवाकर चारों
ओर रख दिया ॥ 53 ॥
महोत्सव-वर्णन :-
'महोत्सव'-नाम शुनि' ब्राह्मण-सज्जन।
आसिते लागिल लोक असंख्य-गणन ॥ 54 ॥
अनुवाद—'महोत्सव'का नाम सुनकर ब्राह्मण और
सज्जन व्यक्ति वहाँपर आने लगे। इस प्रकार वहाँ
असंख्य लोग एकत्रित हो गये ॥ 54 ॥
आर ग्रामान्तर हैते सामग्री आनिल।
शत दुइ-चारि होल्ना आनाइल ॥ 55 ॥
अनुवाद—लोगोंकी इतनी बड़ी संख्या देखकर
श्रीरघुनाथ दासने अन्य-अन्य गाँवोंसे भी खाद्य-सामग्री
मँगवायी। उन्होंने दो-चार सौ मिट्टीके बने पात्र भी
मँगवाये ॥ 55 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'होल्ना',—मिट्टीके विशेष पात्र
(माल्सा अर्थात् मिट्टीके छोटे पात्र) ॥ 55 ॥
बड़ बड़ मृत्कुण्डिका आनाइल पाँच साते।
एक विप्र प्रभु लागि' चिड़ा भिजाय ताते ॥ 56 ॥
अनुवाद—उन्होंने पाँच-सात बड़ी-बड़ी मिट्टीकी
बनी हाण्डियाँ भी मँगवायी। एक ब्राह्मण उन हाण्डियोंमें
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी प्रसन्नताके लिये चिड़वा भिगोने
लगे ॥ 56 ॥
एक-ठाञि तप्त-दुग्धे चिड़ा भिजाञा।
अर्द्धेक छानिल दधि, चिनि, कला दिया ॥ 57 ॥
अनुवाद—एक स्थानपर उन हाण्डियोंमें गर्म दूधमें
चिड़वा भिगोया गया। उसमें-से आधे चिड़वेमें दही,
चीनी तथा केला मिलाया गया ॥ 57 ॥
अर्द्धेक घनावृत-दुग्धेते छानिल।
चाँपाकला, चिनि, घृत, कर्पूर ताते दिल ॥ 58 ॥
अनुवाद—बचे हुए आधे चिड़वेको घने दूधमें मिला
दिया। फिर उसमें चाँपाकलाके नामसे प्रसिद्ध विशेष
[ 6/58-66 छठा अध्याय 173
केले, चीनी, घी और कर्पूरको भी मिला दिया॥ 58 ॥
प्रभुका चबूतरेके ऊपर बैठना :-
धूति परि' प्रभु यदि पिण्डाते बसिला।
सातकुण्डी विप्र ताँर आगेते धरिला ॥ 59 ॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु जब नयी धोती पहनकर चबूतरेपर बैठे, तब ब्राह्मणने सात बड़ी हाण्डियाँ उनके सामने रख दीं ॥ 59 ॥
वटवृक्षके नीचे चबूतरेके ऊपर प्रभुके सङ्गी भक्तोंका बैठना :-
चबुतरा-उपरे यत प्रभुर निजगणे।
बड़ बड़ लोक बसिला मण्डली-रचने ॥ 60 ॥
श्रीनित्यानन्दप्रभुके गणोंका बैठना :-
रामदास, सुन्दरानन्द, दास-गदाधर।
मुरारि, कमलाकर, सदाशिव, पुरन्दर ॥ 61 ॥
धनञ्जय, जगदीश, परमेश्वर-दास।
महेश, गौरीदास, होड़-कृष्णदास ॥ 62 ॥
उद्धारण आदि यत, आर निजजन।
उपरे बसिला सब, के करे गणन?? 63 ॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके अपने अन्तरङ्ग भक्त श्रीरामदास, श्रीसुन्दरानन्द, श्रीदास-गदाधर, श्रीमुरारि, श्रीकमलाकर, श्रीसदाशिव, श्रीपुरन्दर, श्रीधनञ्जय, श्रीजगदीश, श्रीपरमेश्वर दास, श्रीमहेश, श्रीगौरीदास, श्रीहोड़ कृष्णदास और श्रीउद्धारण दत्त आदि श्रीनित्यानन्द प्रभुके चारों ओर मण्डली बनाकर चबूतरेपर ही बैठ गये। चबूतरेपर बैठनेवाले जितने सब भक्त थे उनकी कौन गणना कर सकता है ? 60-63 ॥
अनुभाष्य— 'चबूतरा',—आङ्गन, ड्योढ़ी, घरकी भूमिके अन्यान्य स्थानोंसे संलग्न ऊँचा स्थान। 'रामदास',—अभिरामठाकुर (गोपाल), आदुलीला 10/116 और 118 संख्या एवं आदुलीला 11/13 और 16 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'सुन्दरानन्द',—आदुलीला 11/23 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'दास-गदाधर',—आदुलीला 10/53 संख्याका अनुभाष्य और आदुलीला 11/13, 14, 17 संख्या देखें। 'मुरारि',—इस स्थानपर मुरारि-चैतन्यदास (नित्यानन्द-गण, इसलिये 'मुरारि गुप्त' नहीं)—आदुलीला 11/20 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'कमलाकर',—आदुलीला 11/24 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'सदाशिव',—आदुलीला 11/38 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'पुरन्दर',—आदुलीला 11/28 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'धनञ्जय',—आदुलीला 11/31 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'जगदीश',—आदुलीला 11/30 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'परमेश्वर-दास',—आदुलीला 11/29 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'महेश',—आदुलीला 11/32 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'गौरीदास',—आदुलीला 11/26 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'कृष्णदास होड़',—आदुलीला 11/47 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'उद्धारण',—आदुलीला 11/41 संख्याका अनुभाष्य देखें॥ 60-63 ॥
वैष्णवोंमें जातिबुद्धि रहित ब्राह्मणोंके द्वारा महाप्रसादका सम्मान :-
शुनि' पण्डित भट्टाचार्य यत विप्र आइला।
मान्य करि' प्रभु सबारे उपरे बसाइला ॥ 64 ॥
अनुवाद—महोत्सवकी बात सुनकर पण्डित, भट्टाचार्य आदि जितने ब्राह्मण आये, श्रीनित्यानन्द प्रभुने उन सबको सम्मानपूर्वक ऊपर चबूतरेपर बैठाया ॥ 64 ॥
दुइ दुइ मृत्कुण्डिका सबार आगे दिल।
एके दुग्ध-चिड़ा, आरे दधि-चिड़ा कैल ॥ 65 ॥
अनुवाद—दो-दो मिट्टीके पात्र सबके आगे रखे गये। एक पात्रमें घने दूधमें मिलाया गया चिड़वा और दूसरेमें दही आदिमें मिलाया गया चिड़वा परोसा गया ॥ 65 ॥
आर यत लोक सब चौतरा-तलाने।
मण्डली-बन्धे बसिला, तार ना हय गणने ॥ 66 ॥
174 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/66-76 ]
अनुवाद-चबूतरेके चारों ओर भूमिपर मण्डली
बनाकर जितने लोग बैठे थे, उनकी भी गणना नहीं
की जा सकती॥ 66 ॥
एकेक जनारे दुइ दुइ होल्ना दिल।
दधि-चिड़ा, दुग्ध-चिड़ा, दुइते भिजाइल॥ 67 ॥
अनुवाद-प्रत्येक व्यक्तिको दो-दो मिट्टीके पात्र दिये
गये। उनमेंसे एकमें दहीमें भिगोया चिड़वा और दूसरेमें
घने दूधमें भिगोया चिड़वा था॥ 67 ॥
कोन कोन विप्र उपरे स्थान ना पाञा।
दुइ होल्नाय चिड़ा भिजाय गङ्गातीरे गिया॥ 68 ॥
अनुवाद-कुछ-कुछ ब्राह्मण चबूतरेके ऊपर स्थान
नहीं मिलनेपर दोनों मिट्टीके पात्रोंको लेकर गङ्गाके
तटपर चले गये और वहीं चिड़वेको भिगोने लगे॥ 68 ॥
तीरे स्थान ना पाञा आर कत जन।
जले नामि' दधि-चिड़ा करये भक्षण॥ 69 ॥
अनुवाद-और कितने ही लोगोंको गङ्गाके तटपर
भी स्थान नहीं मिला, इसलिये वे गङ्गाके जलमें खड़े
होकर दही-चिड़वा आदि खाने लगे॥ 69 ॥
केह उपरे, केह तले, केह गङ्गातीरे।
बिशजन तिन-ठाञि परिवेषन करे॥ 70 ॥
अनुवाद-कोई चबूतरेके ऊपर, कोई चबूतरेके
नीचे भूमिपर, कोई गङ्गाके तटपर बैठा हुआ था। तीनों
स्थानोंपर बैठे इन सभी व्यक्तियोंको बीस जन भोजन
परिवेषण करने (परोसने) लगे॥ 70 ॥
प्रसादके साथ श्रीराघव-पण्डितका वहाँ आगमन :-
हेनकाले आइला तथा राघव पण्डित।
हासिते लागिला देखि' हञा विस्मित॥ 71 ॥
अनुवाद-उसी समय श्रीराघव पण्डित वहाँपर आ
गये। उस महोत्सवको देखकर वे आश्चर्यचकित होकर
हँसने लगे॥ 71 ॥
सर्वप्रथम श्रीनित्यानन्दको, बादमें भक्तोंको प्रसाद-प्रदान :-
नि-सकड़ि नानामत प्रसाद आनिला।
प्रभुरे आगे दिया भक्तगणे बाँटि दिला॥ 72 ॥
अनुवाद-श्रीराघव पण्डित अनेक प्रकारका नि-सकड़ि
प्रसाद लेकर आये। उन्होंने पहले एक भाग श्रीनित्यानन्दके
आगे रखा और बचा हुआ अन्य भक्तोंमें बाँट
दिया॥ 72 ॥
अनुभाष्य-'नि-सकड़ि', -जो सकड़ि (अन्नके स्पर्शसे
अपवित्र) नहीं है॥ 72 ॥
भोजन करनेके लिये श्रीनित्यानन्द प्रभुसे अनुरोध :-
प्रभुरे कहे, - "तोमा लागि' भोग लागाइल।
तुमि इँहा उत्सव कर, घरे प्रसाद रहिल॥" 73 ॥
अनुवाद-श्रीराघव पण्डितने श्रीनित्यानन्द प्रभुसे
कहा, - "मैंने आपके लिये घरमें भोग लगाया है और
आप यहाँपर उत्सव कर रहे हैं। आपके लिये घरमें
प्रसाद रखा हुआ है॥" 73 ॥
श्रीनित्यानन्द प्रभुको गोपाभिमानमें व्रजलीलाका उद्दीपन :-
प्रभु कहे, - "ए द्रव्य दिने करिये भोजन।
रात्र्ये तोमार घरे प्रसाद करिमु भक्षण॥ 74 ॥
सखाओंके साथ यमुना तटपर पुलिन-भोजन-आनन्द :-
गोप-जाति आमि बहु गोपगण-सङ्गे।
आमि सुख पाइ एइ पुलिनभोजन-रङ्गे॥" 75 ॥
अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा, - "मुझे अभी
दिनमें यह सब खाने दो, रात्रिके समय तुम्हारे घरपर
प्रसाद ग्रहण करूँगा। मैं गोप-जातिका हूँ तथा मेरे साथ
बहुतसे गोप हैं। मुझे इन सबके साथ नदीके तटपर
पुलिन भोजन करनेमें बहुत आनन्द होता है॥" 74-75 ॥
श्रीराघवका भी वहाँ भोजन करना :-
राघवे बसाइा दुइ कुण्डी देओयाइला।
राघव द्विविध चिड़ा ताते भिजाइला॥ 76 ॥
अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभुने श्रीराघव पण्डितको
[ 6/76-85 छठा अध्याय 175
बैठाया और उन्हें दो मिट्टीके पात्र दिलवाये। श्रीराघव
पण्डितने दो प्रकारका चिड़वा उनमें भिगोया॥ 76॥
महाप्रभुको महोत्सवके बीचमें ध्यानके माध्यमसे लाना :-
सकल-लोकेर चिड़ा पूर्ण यबे हइल।
ध्याने तबे प्रभु महाप्रभुरे आनिल ॥ 77 ॥
अनुवाद-जब समस्त भक्तोंमें चिड़वा वितरित हो
गया, तब श्रीनित्यानन्द प्रभु ध्यानमें महाप्रभुको वहाँपर
ले आये ॥ 77 ॥
महाप्रभुके सङ्गमें श्रीनित्यानन्द प्रभुका भोगका दर्शन :-
महाप्रभु आइला देखि' निताइ उठिला ।
ताँरे लञा सबार चिड़ा देखिते लागिला ॥ 78 ॥
अनुवाद-महाप्रभुको आये देखकर श्रीनित्यानन्द
प्रभु उठकर खड़े हो गये। महाप्रभुको अपने साथ लेकर
वे सभीको दिये गये चिड़वाको देखने लगे ॥ 78 ॥
महाप्रभुके मुखमें एक-एक ग्रास-प्रदान :-
सकल कुण्डीर, होल्नार चिड़ार एक एक ग्रास।
महाप्रभुर मुखे देन करि' परिहास ॥ 79 ॥
अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभुने सभी मिट्टीके बने
पात्रोंमें-से एक-एक ग्रास लिया और परिहास करते हुए
उन्हें महाप्रभुके मुखमें दे दिया ॥ 79 ॥
महाप्रभुके द्वारा भी श्रीनिताइके मुखमें एकग्रास प्रदान :-
हासि' महाप्रभु आर एक ग्रास लञा।
ताँर मुखे दिया खाओयाय हासिया हासिया ॥ 80 ॥
अनुवाद-मुस्कुराते हुए महाप्रभुने भी एक अन्य
ग्रास लेकर हँसते-हँसते श्रीनित्यानन्द प्रभुके मुखमें
देकर उन्हें खिला दिया ॥ 80 ॥
भक्तोंके चारों ओर श्रीनिताइके द्वारा
भ्रमणके आनन्दका दर्शन :-
एइमत निताइ बुले सकल मण्डले।
दाण्डञा रङ्ग देखे वैष्णव-सकले ॥ 81 ॥
अनुवाद-इस प्रकार श्रीनित्यानन्द प्रभुने सभी
मण्डलियोंमें भ्रमण किया और सभी वैष्णव खड़े होकर
इस आनन्दोत्सवको देख रहे थे ॥ 81 ॥
दोनोंका आनन्द-किसीके लिये अदृश्य,
सुकृतिसम्पन्न किसीके लिये दृश्य :-
कि करिया बेड़ाय, -इहा केह नाहि जाने।
महाप्रभुर दर्शन पाय कोन भाग्यवाने ॥ 82 ॥
अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभु किसलिये भ्रमण कर
रहे थे, -इसे कोई भी नहीं जानता था। किसी-किसी
सौभाग्यशाली व्यक्तिको ही महाप्रभुके दर्शन हो रहे
थे॥ 82 ॥
महाप्रभुके लिये दो पात्रोंमें दूध-चिड़ा
और दो पात्रोंमें दही-चिड़ा :-
तबे हासि' नित्यानन्द बसिला आसने।
चारि कुण्डी आरोया चिड़ा राखिला दाहिने ॥ 83 ॥
अनुवाद-तब श्रीनित्यानन्द प्रभु मुस्कुराकर अपने
आसनपर बैठ गये, उन्होंने चार हाण्डियोंमें आरोया-चिड़वा
डालकर अपनी दायीं ओर रख दिया ॥ 83 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'आरोया-चिड़ा', - धानको उबालनेके
बदले धूपमें तपाकर प्राप्त चावलोंका चिड़वा ॥ 83 ॥
महाप्रभु और श्रीनित्यानन्दप्रभुका भोजन :-
आसन दिया महाप्रभुरे ताँहा बसाइला।
दुइ भाइ तबे चिड़ा खाइते लागिला ॥ 84 ॥
अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभुने वहाँपर महाप्रभुको
आसन देकर बैठाया। तब दोनों भाई चिड़वा खाने
लगे ॥ 84 ॥
श्रीनिताइका भावावेश :-
देखि' नित्यानन्दप्रभु आनन्दित हैला।
कत कत भावावेश प्रकाश करिला ॥ 85 ॥
अनुवाद-महाप्रभुको अपने साथ खाते देखकर
176 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/85–93 ]
श्रीनित्यानन्द प्रभु बहुत आनन्दित हुए और उन्होंने
अनेक भावावेशोंको प्रकाशित किया ॥ 85 ॥
हरिध्वनिके साथ भोजनका आदेश :-
आज्ञा दिला, —'हरि बलि' करह भोजन'।
'हरि' 'हरि'-ध्वनि उठि' भरिल भुवन ॥ 86 ॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने सभीको आज्ञा दी, —'हरि
बोलते हुए भोजन करो।' सभी भक्तोंकी ऐसी समवेत
'हरि' 'हरि' ध्वनि उठी कि उससे सारा ब्रह्माण्ड भर
गया ॥ 86 ॥
वैष्णवोंका भोजन और व्रजके पुलिनभोजनका उद्दीपन :-
'हरि' 'हरि' बलि' वैष्णव करये भोजन।
पुलिन-भोजन सबार हइल स्मरण ॥ 87 ॥
अनुवाद—समस्त वैष्णव 'हरि' 'हरि' बोलते हुए
भोजन करने लगे, तो उन सबको व्रजमें श्रीकृष्ण और
श्रीबलरामका सखाओंके साथ पुलिन-भोजनका स्मरण
हो आया ॥ 87 ॥
श्रीरघुनाथके ऊपर दोनों प्रभुओंकी कृपा :-
नित्यानन्द, महाप्रभु—कृपालु, उदार।
रघुनाथेर भाग्ये एत कैला अङ्गीकार ॥ 88 ॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु और महाप्रभु नितान्त
कृपालु और उदार हैं। यह तो श्रीरघुनाथदासका सौभाग्य
था कि उन दोनोंने उनके द्वारा प्रदत्त चिड़वा आदि
अङ्गीकार किया ॥ 88 ॥
श्रीनित्यानन्दके प्रेमके वशीभूत महाप्रभु :-
नित्यानन्द-प्रभाव-कृपा जानिबे कोन् जन?
महाप्रभु आनि' कराय पुलिन-भोजन ॥ 89 ॥
अनुवाद—उन श्रीनित्यानन्द प्रभुके प्रभाव और
उनकी कृपाको कौन जान सकता है? उन्होंने महाप्रभुको
लाकर पुलिन-भोजन कराया ॥ 89 ॥
अभिराम-ठाकुरादिको गोपभावसे यमुनातटपर
पुलिन-भोजनका उद्दीपन :-
श्रीरामदासादि गोप प्रेमाविष्ट हैला।
गङ्गातीरे 'यमुना-पुलिन'-ज्ञान कैला ॥ 90 ॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके पार्षद श्रीरामदासादि
गोप प्रेममें आविष्ट हो गये, उन्होंने गङ्गाके तटको
यमुनाका पुलिन समझा ॥ 90 ॥
द्रव्य-विक्रयी व्यक्तियोंका अपनी वस्तुओंको बेचनेके लिये
आना, बिक्रीमके द्वारा अर्थ-लाभ, पुन: बेची गयी
वस्तुओंके प्रसाद बननेके बाद उनका भोजन :-
महोत्सव शुनि' पसारि' नाना-ग्राम हैते।
चिड़ा, दधि, सन्देश, कला आनिल बेचिते ॥ 91 ॥
अनुवाद—महोत्सवकी बात सुनकर अनेक गाँवोंसे
पंसारी लोग चिड़वा, दूध, सन्देश तथा केला बेचनेके
लिये ले आये ॥ 91 ॥
अनुभाष्य—'पसारि',—वस्तुएँ अथवा समान बेचनेवाले,
दुकानदार ॥ 91 ॥
यत द्रव्य लञा आइसे, सब मूल्य करि' लय।
तार द्रव्य मूल्य दिया ताहारे खाओयाय ॥ 92 ॥
अनुवाद—पंसारी लोग जितना सामान लेकर आये,
श्रीरघुनाथदासने उनका मूल्य तय कर लिया। फिर उन
सबका मूल्य देकर उनसे सब कुछ खरीद लिया और
बादमें उन्हीं पंसारी लोगोंको ही वही वस्तुएँ खिला
दीं ॥ 92 ॥
आनेवाले सभी व्यक्तियोंके द्वारा ही भोजन :-
कौतुक देखिते आइल यत यत जन।
सेइ चिड़ा, दधि, कला करिल भक्षण ॥ 93 ॥
अनुवाद—इस कौतुकको देखनेके लिये जितने भी
लोग आये, उन्हें भी चिड़वा, दही तथा केला आदि
वितरित किया गया और उन्होंने भी इन सबको
खाया ॥ 93 ॥
[ 6/94-103 छठा अध्याय 177
आचमनके बाद श्रीनिताइके द्वारा
श्रीरघुनाथको भुक्तावशेष-प्रदान :-
भोजन करि' नित्यानन्द आचमन कैला।
चारि कुण्डीर अवशेष रघुनाथे दिला॥ 94॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने भोजन करनेके पश्चात्
आचमन किया और चारों हाण्डियोंमें बचा हुआ भोजन
श्रीरघुनाथको दे दिया॥ 94॥
भक्तोंमें प्रसादका वितरण :-
आर तिन कुण्डिकाय अवशेष छिल।
ग्रासे-ग्रासे करि' विप्र सब भक्ते दिल॥ 95॥
अनुवाद—अन्य तीन हाण्डियोंमें भी चिड़वा-दही
आदि बचा हुआ था। एक ब्राह्मणने उनमेंसे एक-एक
ग्रास सभी भक्तोंमें बाँट दिया॥ 95॥
चन्दन-ताम्बूलके द्वारा प्रभुकी सेवा :-
पुष्पमाला विप्र आनि' प्रभु-गले दिल।
चन्दन आनिया प्रभुर सर्वाङ्गे लेपिल॥ 96॥
अनुवाद—तब एक ब्राह्मणने पुष्पमाला लाकर
श्रीनित्यानन्द प्रभुके गलेमें पहनायी और चन्दन लाकर
श्रीनित्यानन्द प्रभुके समस्त अङ्गोंपर उसका लेपन
किया॥ 96॥
सेवक ताम्बूल लञा करे समर्पण।
हासिया हासिया प्रभु करये चर्वण॥ 97॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके एक सेवकने ताम्बुल
लाकर उन्हें समर्पित किया। श्रीनित्यानन्द प्रभु मुस्कुराते
हुए उसको चबाने लगे॥ 97॥
सभी भक्तोंको उनके अवशेषकी प्राप्ति :-
माला-चन्दन-ताम्बूल शेष ये आछिल।
श्रीहस्ते प्रभु सबाकारे बाँटि' दिल॥ 98॥
अनुवाद—जितना माला-चन्दन तथा ताम्बुल बचा
हुआ था, श्रीनित्यानन्द प्रभुने स्वयं अपने हाथोंसे उसे
समस्त भक्तोंमें बाँट दिया॥ 98॥
प्रभुके अवशेषको प्राप्त करनेपर श्रीरघुनाथको आनन्द :-
आनन्दित रघुनाथ प्रभुर 'शेष' पाञा।
आपणार गण-सह खाइला बाँटिया॥ 99॥
अनुवाद—श्रीरघुनाथदास श्रीनित्यानन्द प्रभुके उच्छिष्ट
प्रसादको प्राप्त करके बहुत आनन्दित हुए और उन्होंने
उसे अपने साथियोंके साथ मिल-बाँटकर खाया॥ 99॥
इसलिये ही चिड़ा-दधि-महोत्सव-संज्ञा :-
एइ त' कहिलुँ नित्यानन्देर विहार।
'चिड़ा-दधि-महोत्सव'-नामे ख्याति यार॥ 100॥
अनुवाद—इस प्रकार मैंने श्रीनित्यानन्द प्रभुके
विहारका वर्णन किया, जिसकी 'चिड़ा-दधि-महोत्सव'के
नामसे ख्याति है॥ 100॥
सन्ध्याके समय राघव-मन्दिरमें कीर्त्तन :-
प्रभु विश्राम कैला, यदि दिन-शेष हैल।
राघव-मन्दिरे तबे कीर्त्तन आरम्भिल॥ 101॥
अनुवाद—चिड़ा-दधि-महोत्सवके समाप्त होनेपर
श्रीनित्यानन्द प्रभुने कुछ समय विश्राम किया। जब
सन्ध्याका समय हुआ, तब श्रीनित्यानन्द प्रभु श्रीराघव
पण्डितके घरमें पहुँचे और कीर्तन आरम्भ किया॥ 101॥
कीर्त्तनमें श्रीनित्यानन्द प्रभुका नृत्य :-
भक्त सब नाचाञा नित्यानन्द-राय।
शेषे नृत्य करे प्रेमे जगत् भासाय॥ 102॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने कीर्तनमें पहले सभी
भक्तोंको नचाया और अन्तमें उन्होंने स्वयं भी नृत्य
किया तथा इस प्रकार सम्पूर्ण जगत्को प्रेममें निमग्न
कर दिया॥ 102॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीनित्यानन्दके नृत्यका दर्शन :-
महाप्रभु ताँर नृत्य करेन दरशन।
सबे नित्यानन्द देखे, ना देखे अन्यजन॥ 103॥
अनुवाद—महाप्रभु भी श्रीनित्यानन्द प्रभुके नृत्यको
178 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/103-112 ]
देख रहे थे। इसे केवल श्रीनित्यानन्द प्रभु ही देख पा रहे थे, अन्य कोई भी नहीं॥ 103 ॥
महाप्रभुके नृत्यकी ही श्रीनित्यानन्दके अनुपम नृत्यके साथ एकमात्र तुलना :-
नित्यानन्देर नृत्य, —येन ताँहार नर्त्तने।
उपमा दिवार नाहि ए-तिन भुवने ॥ 104 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके नृत्यके समान ही श्रीनित्यानन्द प्रभुके नृत्यकी उपमा देनेके लिये त्रिभुवनमें कुछ भी नहीं है ॥ 104 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीनित्यानन्दप्रभुके नृत्यके माधुर्यका दर्शन :-
नृत्येर माधुरी केबा वर्णिवारे पारे।
महाप्रभु आइसे सेइ नृत्य देखिबारे ॥ 105 ॥
अनुवाद—जिसे देखनेके लिये स्वयं महाप्रभु आते हैं, ऐसे श्रीनित्यानन्द प्रभुके नृत्यकी माधुरीका कौन वर्णन कर सकता है ॥ 105 ॥
नृत्यके कारण विश्राम करनेके बाद श्रीनिताइका अपने भक्तों सहित श्रीराघवके घरमें रात्रि-भोजन :-
नृत्य करि' प्रभु यबे विश्राम करिला।
भोजनेर लागि' पण्डित निवेदन कैला ॥ 106 ॥
अनुवाद—नृत्य करनेके पश्चात् जब श्रीनित्यानन्द प्रभुने विश्राम कर लिया, तब श्रीराघव पण्डितने आकर उन्हें भोजन करनेके लिये निवेदन किया ॥ 106 ॥
श्रीनिताइके दायीं ओर महाप्रभुके भोजन करनेके लिये आसन :-
भोजने बसिला प्रभु निजगण लञा।
महाप्रभुर आसन डाहिने पातिया ॥ 107 ॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु अपने गणोंके साथ भोजन करनेके लिये बैठे और उन्होंने अपनी दायीं ओर महाप्रभुके लिये आसन बिछाया ॥ 107 ॥
महाप्रभुको उसपर बैठे देखकर श्रीराघवको हर्ष :-
महाप्रभु आसि' सेइ आसने बसिल।
देखि' राघवरे मने आनन्द बाड़िल ॥ 108 ॥
अनुवाद—महाप्रभु आकर उस आसनपर बैठ गये। यह देखकर श्रीराघव पण्डितके मनमें आनन्द बढ़ने लगा ॥ 108 ॥
सर्वप्रथम दोनों प्रभु, बादमें भक्तोंके द्वारा प्रसाद-सेवन :-
दुइभाइ-आगे प्रसाद आनिया धरिला।
सकल वैष्णवे पिछे परिवेशान कैला ॥ 109 ॥
अनुवाद—श्रीराघव पण्डितने दोनों भाइयोंके सामने प्रसाद लाकर सजाया और बादमें उन्होंने समस्त वैष्णवोंको भी प्रसाद परोसा ॥ 109 ॥
श्रीराघवके घरमें प्रसादकी विचित्रताका वर्णन :-
नानाप्रकार पिठा, पायस, दिव्य शाल्य-अन्न।
अमृत निन्दये ऐछे विविध व्यञ्जन ॥ 110 ॥
अनुवाद—उस प्रसादमें अनेक प्रकारके पीठा-पाना, खीर, दिव्य शाल्य-चावलादि अनेक प्रकारके व्यञ्जन अमृतके स्वादको भी पराभूत करनेवाले थे ॥ 110 ॥
श्रीराघवके घरमें प्रस्तुत नैवेद्यादि-महाप्रभुको नित्यप्रिय :-
राघव-ठाकुरेर प्रसाद अमृतेर सार।
महाप्रभु याहा खाइते आइसे बार बार ॥ 111 ॥
अनुवाद—श्रीराघव पण्डितके द्वारा निवेदित प्रसाद अमृतका सार स्वरूप होता था। उसे खानेके लिये महाप्रभु बारम्बार उनके घरपर आते थे ॥ 111 ॥
महाप्रभुके उद्देश्यसे प्रतिदिन पृथक् भोग और महाप्रभुके द्वारा उसको ग्रहण करना :-
पाक करि' राघव यबे भोग लागाय।
महाप्रभुर लागि' भोग पृथक् बाड़य ॥ 112 ॥
अनुवाद—रसोई बनानेके बाद जब श्रीराघव पण्डित भोग लगाते, तो वे महाप्रभुके लिये अलगसे भोग लगाते थे ॥ 112 ॥
[ 6/113-121 छठा अध्याय 179
प्रतिदिन महाप्रभु करेन भोजन।
मध्ये मध्ये प्रभु ताँरे देन दरशन ॥ 113 ॥
अनुवाद—महाप्रभु प्रतिदिन श्रीराघव पण्डितके घरपर
भोजन करते और बीच-बीचमें उनको अपने दर्शन
देते॥ 113 ॥
श्रीराघवके द्वारा दोनों प्रभुओंके भोजनका सम्पादन :—
दुइ भाइरे राघव आनि’ परिवेशे।
यत्न करि’ खाओयाय, ना रहे अवशेषे ॥ 114 ॥
अनुवाद—श्रीराघव पण्डित दोनों भाइयोंको (महाप्रभु
और श्रीनित्यानन्द प्रभुको) बुलाकर परोसते और बहुत
प्रीतिसे उन्हें खिलाते। इसलिये दोनों भाई सब कुछ खा
लेते और कुछ भी अवशेष नहीं बचता॥ 114 ॥
दोनों प्रभुओंके द्वारा सम्पूर्णरूपसे बहुत
प्रकारके विचित्र प्रसादका सेवन :—
कत उपहार आने, हेन नाहि जानि।
राघवेर घरे रान्धे राधा-ठाकुराणी ॥ 115 ॥
अनुवाद—वे कितने प्रकारके व्यञ्जन-पकवानादि
लेकर आते उसे कोई भी नहीं जान सकता। वास्तवमें
श्रीराघव पण्डितके घरपर स्वयं श्रीराधा-ठाकुराणी ही
भोजन पकाती थीं॥ 115 ॥
श्रीराघवके घरमें स्वयं श्रीराधिकाका श्रीकृष्णके उद्देश्यसे
अमृतको भी निन्दित करनेवाले भोजन बनाना :—
दुर्वासार ठाञि तैं हो पाञाछेन वर।
अमृत हइते पाक ताँर अधिक मधुर ॥ 116 ॥
अनुवाद—श्रीराधा-ठाकुराणीको दुर्वासा ऋषिसे वरदान
मिला था कि उनके द्वारा बनायी गयी भोजन सामग्री
अमृतसे भी अधिक मधुर होगी॥ 116 ॥
दोनों प्रभुओंको उनके भोजनको खानेमें आनन्द :—
सुगन्धि सुन्दर प्रसाद—माधुर्येर सार।
दुइ भाइ ताहा खाञा सन्तोष अपार ॥ 117 ॥
अनुवाद—श्रीराघव पण्डितके द्वारा परोसा गया
सुगन्धित सुन्दर प्रसाद माधुर्यका सार था, दोनों भाई
उसे खाकर अत्यन्त सन्तुष्ट होते ॥ 117 ॥
सभी भक्तोंका बैठना, श्रीरघुनाथको भोजनके लिये
अनुरोध, श्रीरघुनाथके द्वारा बादमें बैठना स्वीकार :—
भोजने बसिते रघुनाथे कहे सर्वजन।
पण्डित कहे,—“इँह पाछे करिबे भोजन ॥” 118 ॥
अनुवाद—सभी भक्तोंने श्रीरघुनाथको भी बैठकर
भोजन करनेके लिये कहा। किन्तु श्रीराघव पण्डितने
उनसे कहा,—“यह बादमें भोजन करेगा॥” 118 ॥
भक्तोंका गले तक भरकर भोजन और आचमन :—
भक्तगण आकण्ठ भरिया करिल भोजन।
‘हरि’ ध्वनि करि’ उठि’ कैला आचमन ॥ 119 ॥
अनुवाद—सभी भक्तोंने गले तक भरकर भोजन
किया तथा ‘हरि’ ध्वनि करते हुए उठकर आचमन
किया॥ 119 ॥
आचमनके बाद दोनों प्रभुओंको
माला तथा चन्दन पहनाना :—
भोजन करि’ दुइ भाइ कैला आचमन।
राघव आनि’ पराइला माल्य-चन्दन ॥ 120 ॥
अनुवाद—दोनों भाइयोंने भी भोजन करके आचमन
किया। श्रीराघव पण्डितने लाकर उन दोनोंको माला
पहनायी और चन्दन लगाया॥ 120 ॥
दोनों प्रभुओंके द्वारा ताम्बूल-खाना;
सभीको अवशेषकी प्राप्ति :—
बिड़ा खाओयाइला, कैला चरण-वन्दन।
भक्तगणे दिला बिड़ा, माल्य-चन्दन ॥ 121 ॥
अनुवाद—श्रीराघव पण्डितने दोनों भाइयोंको ताम्बूल
खिलाया और उनके चरणोंकी वन्दना की। उन्होंने
उपस्थित भक्तोंको भी ताम्बूल तथा माला-चन्दन आदि
प्रदान किया॥ 121 ॥
अनुभाष्य—‘बिड़ा’,—सजाया हुआ ताम्बूल, पानका
बीड़ा॥ 121 ॥
180 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/122-133 ]
स्नेहकृपामय श्रीराघवके द्वारा श्रीरघुनाथको दोनों
प्रभुओंका उच्छिष्ट-पात्र प्रदान :-
राघवेर कृपा रघुनाथेर उपरे।
दुइ भाइएर अवशिष्ट पात्र दिला ताँरे॥ 122॥
महाप्रभुके उच्छिष्टके सेवनसे ही
श्रीरघुनाथका गृहत्याग-सामर्थ्य :-
कहिला,—“चैतन्य-प्रभु करियाछेन भोजन।
ताँर शेष पाइले, तोमार खण्डिबे बन्धन॥” 123॥
अनुवाद—स्नेहकृपामय श्रीराघव पण्डितने श्रीरघुनाथको
दोनों भाइयोंका उच्छिष्ट पात्र देकर कहा,—“श्रीचैतन्य
महाप्रभुने भोजन किया है, उनका उच्छिष्ट पानेसे
तुम्हारा संसारका बन्धन कट जायेगा॥” 122-123॥
भगवान्के अवस्थान और स्वभावका निर्णय :-
भक्त-चित्ते भक्त-गृहे सदा अवस्थान।
कभु गुप्त, कभु व्यक्त, स्वतन्त्र भगवान्॥ 124॥
अनुवाद—भगवान् भक्तके चित्तमें अथवा भक्तके
घरमें सदा वास करते हैं। कभी यह गुप्तरूपसे और
कभी व्यक्तरूपसे होता है, क्योंकि भगवान् स्वतन्त्र
हैं॥ 124॥
महाप्रभुके विभु होनेमें संशय करनेवालोंका विनाश :-
सर्वत्र 'व्यापक' प्रभुर सदा सर्वत्र वास।
इहाते संशय यार, सेइ याय नाश॥ 125॥
अनुवाद—सर्वत्र व्यापक महाप्रभुका सदा सभी
स्थानोंपर वास होता है। इसमें जिसे संशय होता है,
उसका सर्वनाश हो जाता है॥ 125॥
अगले दिन प्रातः स्नानके बाद वृक्षके नीचे बैठे
श्रीनिताइके निकट श्रीरघुनाथके द्वारा श्रीचैतन्यचरणकी
प्राप्तिके लिये निवेदन :-
प्राते नित्यानन्द गङ्गास्नान करिया।
सेइ वृक्षमूले बसिला निजगण लञा॥ 126॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु प्रातःकालमें गङ्गास्नान
करके अपने गणोंके साथ उसी वृक्षके नीचे बैठ
गये॥ 126॥
रघुनाथ आसि' कैला चरण-वन्दन।
राघवपण्डित-द्वारा कैला निवेदन॥ 127॥
“अधम पामर मुइ हीन जीवाधम!
मोर इच्छा हय—पाङ चैतन्यचरण॥ 128॥
वामन हञा चान्द धरिबारे चाय।
अनेक यत्न कैनु, ताते कभु सिद्ध नय॥ 129॥
यतबार पलाइ आमि गृहादि छाड़िया।
पिता, माता—दुइ मोरे राखये बान्धिया॥ 130॥
श्रीनित्यानन्द (गुरु)-कृपाके बिना श्रीचैतन्यपद-
प्राप्ति असम्भव, उनकी कृपासे अयोग्यमें
भी उनकी प्राप्तिकी योग्यता :-
तोमार कृपा बिना केह 'चैतन्य' ना पाय।
तुमि कृपा कैले ताँरे अधमेह पाय॥ 131॥
श्रीनित्यानन्द (गुरु)के चरणोंमें श्रीचैतन्यचरण प्राप्त
करनेके लिये कृपा-भिक्षाकी कर्त्तव्यता :-
अयोग्य मुइ निवेदन करिते करि भय।
मोरे 'चैतन्य' देह' गोसाञि हञा सदय॥ 132॥
मोर माथे पद धरि' करह प्रसाद।
'निर्विघ्ने चैतन्य पाङ'—कर आशीर्वाद॥” 133॥
अनुवाद—श्रीरघुनाथने आकर श्रीनित्यानन्द प्रभुके
चरणोंकी वन्दना की और उन्होंने श्रीराघव पण्डितके
माध्यमसे श्रीनित्यानन्द प्रभुको निवेदन किया,—“मैं
अधम, पापी, निराश्रय और अधम जीव हूँ। मेरी इच्छा
होती है कि मैं श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंका
आश्रय प्राप्त करूँ। बौने व्यक्तिकी चन्द्रको पकड़नेकी
इच्छा करने जैसे मैंने भी अनेक प्रयत्न किये, किन्तु
उसमें कभी भी सफल नहीं हो पाया। मैंने जितनी बार
भी घर आदि छोड़कर भागनेका प्रयास किया, मेरे
माता-पिता—दोनोंने मुझे पकड़कर बाँधकर रख दिया।
आपकी कृपाके बिना किसीको भी श्रीचैतन्य महाप्रभुकी
[ 6/127-143 छठा अध्याय 181
प्राप्ति नहीं होती। किन्तु यदि आप कृपा करें तो अधम
व्यक्तिको भी महाप्रभुके चरणकमलोंका आश्रय प्राप्त हो
जाता है। मैं अयोग्य हूँ, इसलिये आपसे निवेदन
करनेमें भी भय करता हूँ कि हे गोसाईं! आप मेरे
प्रति विशेषरूपसे दयावान् होकर मुझे श्रीचैतन्यदेवके
चरणकमलोंमें आश्रय प्रदान कीजिये। मेरे सिरपर अपने
चरणकमल रखकर मुझपर कृपा कीजिये कि मैं
निर्विघ्न रूपसे श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंका आश्रय
प्राप्त करूँ॥” 127-133॥
श्रीरघुनाथकी श्रीचैतन्यचरण प्राप्त करनेकी व्याकुलताको
देखकर उन्हें कृपाशीर्वाद प्रदान करनेके लिये श्रीनित्यानन्द
प्रभुके द्वारा शुद्धभक्तोंके निकट आवेदन :-
शुनि' हासि कहे प्रभु सब भक्तगणे।
“इँहार विषयसुख—इन्द्रसुख-समे॥ 134॥
चैतन्य-कृपाते से नाहि भाय मने।
सबे आशीर्वाद कर—पाउक चैतन्य-चरणे॥ 135॥
श्रीकृष्ण-चरणकमलोंकी गन्धकी
महिमा और आकर्षण-शक्ति :-
कृष्णपादपद्म-गन्ध येइ जन पाय।
ब्रह्मलोक-आदि सुख ताँरे नाहि भाय॥” 136॥
अनुवाद—श्रीरघुनाथके निवेदनको सुनकर श्रीनित्यानन्द
प्रभु मुस्कुराये और उन्होंने सभी भक्तोंसे
कहा,—“रघुनाथदासके पास इन्द्रके समान सांसारिक
विषय सुख हैं, किन्तु श्रीचैतन्य महाप्रभुकी कृपासे वे
सब सुख इसके मनको नहीं भाते। इसलिये आप सभी
इसे आशीर्वाद दीजिये कि इसे श्रीचैतन्य महाप्रभुके
चरणकमलोंका आश्रय प्राप्त हो। जिन्हें श्रीकृष्णके
चरणकमलोंकी सुगन्धकी प्राप्ति होती है, उन्हें ब्रह्मलोकादिके
सुख भी नहीं भाते॥” 134-136॥
श्रीमद्भागवत (5/14/43) में—
यो दुस्त्यजान् दारसुतान् सुहृद्राज्यं हृदिस्पृशः।
जहौ युवैव मलवदुत्तमःश्लोकलालसः॥ 137॥
अनुवाद—भरत महाराजने उत्तमःश्लोक श्रीकृष्णको
प्राप्त करनेकी लालसासे युवावस्थामें ही हृदयग्राहिणी
पत्नी, पुत्र, सुहृत् और राज्यादिका मलकी भाँति
परित्याग किया था;—यही जातभाव व्यक्तिकी विरक्तिका
लक्षण है॥ 137॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 23/24 संख्या देखें॥ 137॥
श्रीरघुनाथके सिरपर चरण रखकर श्रीनित्यानन्दप्रभुके द्वारा
उनकी महाप्रभुकी कृपाकी प्राप्तिका वर्णन :-
तबे रघुनाथे प्रभु निकटे बोलाइला।
ताँर माथे पद धरि' कहिते लागिला॥ 138॥
“तुमि कराइला एइ पुलिन-भोजन।
तोमाय कृपा करि' गौर कैला आगमन॥ 139॥
कृपा करि' कैला चिड़ा-दुग्ध भोजन।
नृत्य देखि' रात्र्ये कैला प्रसाद-भक्षण॥ 140॥
श्रीरघुनाथके प्रति कृपापूर्वक श्रीगौरका आविर्भाव और
भोजनके फलसे श्रीरघुनाथका विघ्न-नाश :-
तोमा उद्धारिते गौर आइला आपने।
छुटिल तोमार यत विघ्नादि-बन्धने॥ 141॥
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी भविष्यवाणी :-
स्वरूपेर स्थाने तोमा करिबे समर्पणे।
'अन्तरङ्ग' भृत्य बलि' राखिबे चरणे॥ 142॥
निर्विघ्न श्रीचैतन्यचरण प्राप्तिका आशीर्वाद प्रदान :-
निश्चिन्त हञा याह आपन-भवन।
अचिरे निर्विघ्ने पाबे चैतन्य-चरण॥” 143॥
अनुवाद—तब श्रीनित्यानन्द प्रभुने श्रीरघुनाथदासको
अपने निकट बुलाया और उनके सिरपर अपने
चरणकमल रखकर उनसे कहने लगे,—“तुमने जो यह
पुलिन-भोजन करवाया, श्रीगौरसुन्दर यहाँ तुम्हारे ऊपर
कृपा प्रदर्शित करनेके लिये आये थे। श्रीगौरसुन्दरने
तुमपर कृपा करके दूध-चिड़वेका भोजन भी किया।
रात्रिके समयमें भक्तोंके नृत्यको देखकर उन्होंने प्रसाद
भी ग्रहण किया। श्रीगौरसुन्दर स्वयं तुम्हारा उद्धार
182 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/138-152 ]
करनेके लिये आये थे, अब समझ लो कि तुम्हारी जो
भी विघ्न-बाधाएँ थीं, वे सब दूर हो गयी हैं। महाप्रभु
तुम्हें स्वरूप दामोदरको समर्पित कर देंगे और तुम्हें
अपना अन्तरङ्ग सेवक कहकर अपने चरणकमलोंमें
स्थान देंगे। तुम निश्चिन्त होकर अपने घर लौट
जाओ। अतिशीघ्र निर्विघ्न ही तुम्हें श्रीचैतन्य महाप्रभुके
चरणकमलोंके आश्रयकी प्राप्ति होगी॥” 138-143॥
भक्तोंके द्वारा श्रीरघुनाथको आशीर्वाद दिलवाना;
श्रीरघुनाथके द्वारा भक्तोंके चरणोंकी वन्दना :—
सब भक्तद्वारे ताँरे आशीर्वाद कराइला।
ताँ-सबार चरण रघुनाथ वन्दिला॥ 144॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने समस्त भक्तोंके द्वारा
श्रीरघुनाथदासको आशीर्वाद दिलवाया और श्रीरघुनाथदासने
भी समस्त भक्तोंके चरणोंकी वन्दना की॥ 144॥
श्रीराघवके साथ गुप्त स्थानपर परामर्श :—
प्रभु-आज्ञा लञा वैष्णवेर आज्ञा लइला।
राघव-सहिते निभृते युक्ति करिला॥ 145॥
अनुवाद—श्रीरघुनाथदासने श्रीनित्यानन्द प्रभुसे आज्ञा
लेनेके पश्चात् उपस्थित समस्त वैष्णवोंसे आज्ञा ली
तथा उन्होंने श्रीराघव पण्डितके साथ एकान्तमें कुछ
परामर्श किया॥ 145॥
प्रभुके भण्डारीके हाथमें प्रणामीके रूपमें धन-प्रदान :—
युक्ति करि' शत मुद्रा, सोणा तोला-साते।
निभृते दिला प्रभुर भाण्डारीर हाते॥ 146॥
इस बातको प्रभुके निकट गुप्त रखनेका अनुरोध :—
ताँरे निषेधिला,—“प्रभुरे एबे ना कहिबा।
निज-घरे याबेन यबे, तबे निवेदिबा॥” 147॥
अनुवाद—श्रीराघव पण्डितसे परामर्श करनेके उपरान्त
श्रीरघुनाथने श्रीनित्यानन्द प्रभुके भण्डारीको एकान्तमें
एक सौ स्वर्णकी मुद्राएँ तथा सात तोला सोना दिया
और उनसे कहा,—“आप अभी यह बात श्रीनित्यानन्द
प्रभुको मत बतलाना। जब वे अपने वासस्थानपर पहुँच
जायेंगे, तभी उन्हें इस विषयमें बतलाना॥” 146-147॥
श्रीराघवके द्वारा श्रीरघुनाथको अपने गृहमें स्थापित विग्रहोंके
दर्शन कराके यथोचित सम्मान प्रदान :—
तबे राघव पण्डित ताँरे घरे लञा गेला।
ठाकुर दर्शन कराञा माला-चन्दन दिला॥ 148॥
वैष्णव-चरण-पूजाके योग्य आदर्शको दिखलाकर
श्रीरघुनाथके द्वारा धनी विषयी लोगोंको शिक्षा-प्रदान :—
अनेक 'प्रसाद' दिला पथे खाइबारे।
तबे पुनः रघुनाथ कहे पण्डितेरे॥ 149॥
“प्रभुर सङ्गे यत महान्त, भृत्य, आश्रित जन।
पूजिते चाहिये आमि सबार चरण॥ 150॥
बिश, पञ्चाश, दश, बार, पञ्चदश, द्वय।
मुद्रा देह' विचारिया योग्य यत हय॥” 151॥
अनुवाद—तब श्रीराघव पण्डित श्रीरघुनाथदासको
अपने घरमें ले गये और उन्हें अपने घरमें सेवित
श्रीठाकुरजीके दर्शन करवाकर माला और चन्दन प्रदान
किया। उन्होंने श्रीरघुनाथदासको मार्गमें खानेके लिये
बहुत प्रसाद दिया। तब श्रीरघुनाथदासने पुनः श्रीराघव
पण्डितसे कहा,—“श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ जितने भी
महान् भक्त, उनके सेवक और आश्रित जन हैं, मैं उन
सबके भी चरणोंकी पूजा करना चाहता हूँ। आप
विचार करके उन सबके अधिकारके अनुसार बीस,
पन्द्रह, बारह, दस अथवा पाँच—जितनी मुद्राएँ उचित
समझें, वे उन्हें दे दीजिये॥” 148-151॥
सभीको अभिनन्दन पत्र और प्रणामी-प्रदान :—
सब लेखा करिया राघव-पाश दिला।
याँर नामे यत राघव चिठि लेखाइला॥ 152॥
अनुवाद—तब श्रीरघुनाथदासने कुल प्रणामीका
लेखा-जोखा करके श्रीराघव पण्डितको प्रदान किया
और उसके अनुसार श्रीराघव पण्डितने किस भक्तको
[ 6/152-160 छठा अध्याय 183
कितनी प्रणामी प्रदान करनी चाहिये, इस विषयमें अपना
विचार लिखवाया ॥152॥
एकशत मुद्रा आर सोणा तोला-द्वय।
पण्डितेर आगे दिल करिया विनय ॥153॥
अनुवाद—श्रीरघुनाथदासने विनयपूर्वक श्रीराघव पण्डितके
सामने एक सौ स्वर्ण मुद्राएँ और दो तोला सोना रख
दिया ॥153॥
श्रीनिताइकी कृपा प्राप्त करके श्रीराघवको प्रणाम करनेके
बाद श्रीरघुनाथका अपने घरपर आगमन :-
ताँर पदधूलि लञा स्वगृहे आइला।
नित्यानन्द-कृपा पाञा कृतार्थ मानिला ॥154॥
अनुवाद—श्रीरघुनाथदास श्रीराघव पण्डितके
चरणकमलोंकी धूलिको लेकर अपने घरमें लौट आये।
श्रीरघुनाथदास श्रीनित्यानन्द प्रभुकी कृपाको प्राप्त करके
स्वयंको कृतार्थ मानने लगे॥154॥
तबसे घरके बाहरी स्थानपर ही रहना :-
सेइ हैते अभ्यन्तरे ना करेन गमन।
बाहिरे दुर्गामण्डपे करेन शयन ॥155॥
अनुवाद—उस दिनसे वे अपने घरके भीतर अपने
शयन-कक्षमें नहीं जाते थे। अपितु वे घरके बाहर
दुर्गा-मण्डपमें ही सो जाते॥155॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'अभ्यन्तर',—भीतरवाले
कक्ष॥155॥
पहरा देनेवाले रक्षक :-
ताँहा जागि' रहे सब रक्षकगण।
पलाइते करेन नाना उपाय चिन्तन ॥156॥
अनुवाद—दुर्गा-मण्डपके बाहर रक्षा-कर्मचारी जागकर
पहरा देते थे। श्रीरघुनाथदास अपने घरसे भागनेके
अनेक उपायोंकी चिन्ता करते॥156॥
महाप्रभुके दर्शनोंके लिये वर्षाकालमें
गौड़ीय-भक्तोंकी पुरी-यात्रा :-
हेनकाले गौड़देशेर सब भक्तगण।
प्रभुरे देखिते नीलाचले करिला गमन ॥157॥
अनुवाद—उस समय गौड़देशके सभी भक्त महाप्रभुके
दर्शनोंके लिये नीलाचलकी ओर चल पड़े॥157॥
सबके समक्ष गौड़ीय भक्तोंके साथ जानेसे पकड़े जानेकी
आशङ्कासे पुरी यात्राके लिये असमर्थता :-
ताँ-सबार सङ्गे रघुनाथ याइते ना पारे।
प्रसिद्ध प्रकट सङ्ग, तबहि धरा पड़े॥158॥
अनुवाद—उन सबके साथ तो श्रीरघुनाथदास जा
नहीं सकते थे, क्योंकि गौड़ीय भक्तोंकी यात्रा इतनी
प्रसिद्ध थी कि वे अनायास ही पकड़े जाते॥158॥
अमृतप्रवाह भाष्य—गौरभक्त जब नीलाचल जाते,
तब उनका सङ्ग सब लोगोंमें प्रसिद्ध और प्रकट हो
जाता। उनके साथ जानेसे बादमें पिता पकड़कर ले
आयेंगे, इसी भयसे वे उनके साथ नहीं जा सकते
थे॥158॥
श्रीरघुनाथके महाप्रभुके साथ मिलनके वृत्तान्तका
वर्णन; श्रीरघुनाथके सौभाग्यका दिन :-
एइमत चिन्तिते दैवे एकदिने।
बाहिरे देवीमण्डपे करियाछेन शयने ॥159॥
रात्रिके अन्तिम-भागमें गुरु
श्रीयदुनन्दनके साथ साक्षात्कार :-
दण्ड-चारि रात्रि यबे आछे अवशेष।
यदुनन्दन-आचार्य तबे करिला प्रवेश ॥160॥
अनुवाद—इस प्रकार श्रीरघुनाथदास घरसे भागनेके
उपायकी चिन्ता करते रहते। एक दिन जब वे अपने
घरके बाहरमें बने दुर्गामण्डपमें सो रहे थे और रात्रि
समाप्त होनेमें चार दण्ड समय रह गया था, उस समय
दैवयोगसे श्रीयदुनन्दन आचार्यने उनके घरमें प्रवेश
किया॥159-160॥