श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
आठवाँ अध्याय 8/97–99 ]
श्रीराधाको नहीं देखकर समझ गई कि हमारी राधाको
लेकर ही कृष्ण अन्तर्धान हुए हैं। अतः वे युगलको
ढूँढनेमें व्यग्र हो गईं।
किन्तु जो गोपियाँ इस रहस्यको नहीं समझ पायीं,
वे श्रीकृष्णको ही खोजनेमें ही तत्पर थीं। खोजते-खोजते
उन्होंने श्रीकृष्णके चरण-चिह्न देखे, कुछ आगे बढ़नेपर
श्रीकृष्णके चरण-चिह्नोंके मध्य छोटे आकारवाले किसी
रमणीके पद-चिह्नोंको भी देखा। स्वपक्षा सखियाँ अन्तरङ्गा
होनेके कारण उन चरण-चिह्नोंको पहचान गईं, परन्तु
गम्भीरताके साथ चुप रहीं। विपक्षा चन्द्रावली आदि
दुःखसे अधीर होनेके कारण कुछ बोल नहीं सकीं।
तटस्था गोपियोंने इसका विचार नहीं किया कि श्रीकृष्णके
चरण-चिह्नोंके साथ किसी रमणीके भी चरण-चिह्न हैं,
वे भी चुप रहीं। प्रस्तुत श्लोक श्रीराधाकी सुहृत्-पक्षा
गोपियोंके द्वारा उच्चारित हुआ है। उनके कहनेका भाव
है—'गोविन्द इस रमणीके साथ रमण करनेके लिये उसे
अपने अङ्कमें वहन करके ले गये हैं। एक निकुञ्जसे
दूसरेमें प्रवेश करते हुए विलास कर रहे हैं। उन्होंने
पुष्पोंका चयन करके इस शृङ्गार-वटमें उस कान्ताका
केश-प्रसाधन किया।'
उधर वनप्रदेशमें चलते-चलते श्रीराधाने कहा—'बहुत
चलनेके कारण मैं थक गई हूँ, अब चल नहीं पा रही
हूँ।' श्रीकृष्ण बोले—'अन्य सब गोपियाँ यहींपर आनेवाली
हैं। तब हमारे निर्जन विहारमें बाधा पड़ जायेगी।'
श्रीराधाने कहा—'मुझे पहलेकी भाँति उठाकर ले चलो।'
श्रीकृष्णने कहा—'प्रिये! क्या तुम्हें किसी निभृत निकुञ्जमें
पुष्पोंकी शय्यापर ले चलूँ?' श्रीराधाने कहा—'जहाँ
तुम्हारा मन चाहे वहाँ ले चलो।' श्रीकृष्ण बोले—'अच्छा
प्रिये, तुम मेरे कन्धेपर चढ़ जाओ।' यह सुनकर जैसे
ही वे श्रीकृष्णके कन्धेपर चढ़ने लगीं, उसी क्षण
श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गये और श्रीराधा निरन्तर विलाप
करने लगीं—'हा नाथ! हा रमण! हा प्रेष्ठ! हा
महाभुज ! तुम कहाँ हो? कहाँ हो?' इसके पश्चात्
श्रीराधामें और विलाप करनेकी शक्ति भी नहीं रही और
वे विरहमें मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़ीं। श्रीकृष्णको
खोजते हुए अन्य गोपियाँ वहीं आ पहुँचीं। उन्होंने
विद्युतके समान उज्ज्वल कान्तियुक्त उस सखीको
भूमिपर पड़ा देखा। सखियाँ उच्च स्वरसे रोते-रोते
यत्नपूर्वक पंखा झलकर सेवाके द्वारा श्रीराधाको सचेत
करनेकी चेष्टा करने लगीं।
श्रीकृष्ण श्रीराधाको लेकर आये, उनका शृङ्गार
किया, अन्तमें उन्हें भी छोड़कर इसलिये चले गये कि
उन्होंने विचार किया—'राधाने मेरे साथ विलासरसमें
आपेसे बाहर होकर नायिकाके स्वधर्म वाम्यता और
लज्जाका विसर्जन कर दिया है। सुनायिकाएँ कभी भी
नायकको पुष्प-शय्यापर ले जानेकी सम्मति प्रदान नहीं
करतीं। यदि राधिकाने वाम्य-रूप स्वधर्मका परित्यागकर
दिया, तब मुझे भी नायकके कान्ताको अनुगमन
करनेके दाक्षिण-भावको त्यागकर वाम्य-भावको ग्रहण
करना चाहिये, अन्यथा यह रसजनक नहीं होगा। दोनों
ही वाम्य अथवा दाक्षिण हों, तो मिलन सुरस नहीं
होता। इसके अतिरिक्त गोपियोंने राधामें केवल मेरे
मिलन-जनित सौभाग्यका दर्शन किया है, जब वे
राधाकी तीव्र विरहमें उदित होनेवाली असाधारण दशाको
भी देखेंगी कि राधाका विरह-दुःख दावानलके समान
है और उनका विरह-दुःख एक दीप-शिखाके समान;
तब वे राधाके आनुगत्यको स्वीकार करेंगी। साथ ही
इसके द्वारा अन्य सभी गोपियोंकी ईर्ष्या भी दूर हो
जायेगी और सभीमें एक मतका स्थापन होगा।'
श्रीकृष्ण एक कार्यके द्वारा अनेक कार्य सम्पादन
करते हैं, यह उनकी परम चातुरी है। पक्षान्तरमें
श्रीकृष्णका विचार है—'मेरे द्वारा दिये गये विरहमें
राधाको देखकर सभी गोपियोंकी एक जैसी विरह-दशा
हो जायेगी तथा सभीका चित्त एक भावसे मुझमें
निविष्ट हो जायेगा। इस प्रकार रासलीला भी सार्थक
होगी।'”—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 97–99 ॥
। 273
[ 8/100-106 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
महाप्रभुका उल्लास और श्रीरायकी प्रशंसा करना :-
प्रभु कहे,–“आगे कह, शुनिते पाइ सुखे।
अपूर्वामृत-नदी बहे तोमार मुखे ॥ 100 ॥
अद्वितीया श्रीराधाके प्रति श्रीकृष्णका निरपेक्ष प्रेम :-
चुरि करि' राधाके निल गोपीगणेर डरे।
अन्यापेक्षा हैले प्रेमेर गाढ़ता ना स्फुरे ॥ 101 ॥
श्रीराधामें श्रीकृष्णका एकनिष्ठ प्रेम :-
राधा लागि' गोपीरे यदि साक्षात् करे त्याग।
तबे जानि,–राधाय कृष्णेर गाढ़-अनुराग ॥"102 ॥
अनुवाद-इस श्लोकको सुनकर महाप्रभु गद्गद हो
उठे और कहने लगे,–“आगे और कहो राय, मुझे यह
सुनकर बड़ा सुख प्राप्त हो रहा है। तुम्हारे मुखसे
अद्भुत, अनुपम, अमृतकी चमत्कारपूर्ण नदी प्रवाहित हो
रही है। श्रीकृष्ण अन्य गोपियोंके भयसे श्रीराधाको चोरी
करके ले गये। जहाँ अन्यापेक्षा है अर्थात् वे दूसरी
गोपियोंसे भी प्रेम करते हैं, वहाँ श्रीराधाके प्रेमकी
प्रगाढ़ता दूसरी गोपियोंसे अधिक प्रमाणित नहीं होती।
यदि श्रीकृष्ण समस्त गोपियोंके सम्मुख ही उन सबका
परित्यागकर श्रीराधाको अपने साथ ले जाते, तो समझा
जा सकता है कि श्रीकृष्णका श्रीराधाजीके प्रति
सर्वाधिक दृढ़ अनुराग था ॥ 100-102 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-रासलीलामें श्रीकृष्णने देखा, - अन्य
समस्त गोपियोंके साथ विराजमान राधिकाके साथ
निरपेक्ष प्रेम नहीं हुआ, अन्य गोपियोंकी अपेक्षाके
कारण प्रेमकी अति गाढ़ स्फूर्त्ति नहीं हुई, इसी कारण
श्रीकृष्ण गोपियोंके भयसे राधिकाको रासस्थलीसे चोरी
करके अन्य गोपियोंसे अलग होकर वहाँसे चले गये।
“कंसारिरपि” श्लोक (संख्या 105) यहाँ पर उदाहरणीय
है ॥ 101-102 ॥
श्रीराधामें श्रीकृष्णकी प्रीतिका निरुपमत्व :-
राय कहे,–“तबे शुन प्रेमेर महिमा।
त्रिजगते राधा-प्रेमेर नाहिक उपमा ॥ 103 ॥
सेवककी सेवा ग्रहण करनेके लिये उसके
दर्शन न होनेसे सेव्यका विलाप :-
गोपीगणेर रास-नृत्य-मण्डली छाड़िया।
राधा चाहि' वने फिरे विलाप करिया ॥ 104 ॥
अनुवाद-श्रीरायने कहा,-“तब राधाप्रेमकी महिमाको
सुनो। तीनों लोकोंमें श्रीमती राधारानीके प्रेमकी कोई
उपमा नहीं है। श्रीराधाके मान करके रास छोड़ जानेपर
श्रीकृष्ण गोपियोंकी रास-नृत्य-मण्डलीको छोड़कर श्रीराधाको
खोजनेके लिये विलाप करते हुए वनमें घूमने
लगे ॥ 103-104 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीराधिका रासमण्डलीमें गोपियोंकी
साधारण प्रेम-सुलभ ममताको देखकर कौटिल्यवामतासे
युक्त होकर रासमण्डलीको छोड़कर चली गयीं। श्रीकृष्णकी
इच्छा थी कि श्रीमती रासलीलाके रसकी पुष्टि करें,
किन्तु उनके भावमें श्रीकृष्ण खिन्न होकर विलाप
करते-करते श्रीमतीको ढूँढ़नेके लिये वनमें घूमने
लगे ॥ 104 ॥
श्रीराधा ही श्रीकृष्णप्रीति-सेवाकी मूर्ति :-
श्रीगीतगोविन्द (3/1)-
कंसारिरपि संसारवासनाबद्धशृङ्खलाम्।
राधामाधाय हृदये तत्याज व्रजसुन्दरीः ॥ 105 ॥
अनुवाद-कंसारि (श्रीकृष्ण) ने सम्पूर्ण साररूप
रासलीलाकी वासनाके बन्धनको दृढ़ करनेवाली शृङ्खलारूपी
रासक्रीड़ाकी परमाश्रया श्रीराधाको हृदयमें पूर्णरूपसे
धारण करके अन्य सभी गोपियोंको त्याग दिया ॥ 105 ॥
अनुभाष्य-आदिलीला 4/219 संख्या देखें ॥ 105 ॥
श्रीगीतगोविन्द (3/2)-
इतस्ततस्तामनुसृत्य राधिकामनङ्ग-
बाणव्रण-खिन्नमानसः ।
कृतानुतापः स कलिन्दनन्दिनी-
तटान्तकुञ्जे विषसाद माधवः ॥ 106 ॥
274 ।
आठवाँ अध्याय 8/102-107 ]
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥106॥
अमृतप्रवाह भाष्य—अनङ्ग बाणोंसे जर्जरित खिन्न
मनसे अपने द्वारा किये गये कार्यके लिये अनुताप
करते हुए, माधव कलिन्दनन्दिनी (यमुना)के तटपर
स्थित वनमें इधर-उधर राधिकाको ढूँढ़नेपर भी प्राप्त
नहीं कर पानेपर कुञ्जमें प्रवेश करके विषाद करने
लगे॥106॥
अनुभाष्य—
अनङ्गबाणव्रणखिन्नमानसः (कामशरव्रणेन खिन्नं मानसं यस्य
सः) माधवः इतस्ततः तां राधिकाम् अनुसृत्य (अन्विष्य)
कृतानुतापः (कृतः अनुष्ठितः अनु पश्चात् तापो येन सः
राधिकानादर-रूप-निजाचरितकर्मजन्य-शोकवशः सन्)
कलिन्दनन्दिनी तटान्त-कुञ्जे (यमुना तटप्रान्तस्थकुञ्जे) विषसाद
(विषण्णः अभूत्)।
श्लोक-भावानुवाद—कामबाणोंसे जर्जरित अपने द्वारा
किये गये श्रीराधिकाका अनादर रूप कार्यके लिये
शोकाकुल होकर माधव इधर-उधर श्रीराधिकाको ढूँढ़नेपर
भी नहीं प्राप्त कर पानेपर यमुना तटपर स्थित कुञ्जमें
प्रवेश करके विषाद करने लगे॥106॥
अमृतानुकणिका—'वासन्ती रासलीलाके मध्य श्रीराधाने
देखा श्रीकृष्ण समस्त गोपाङ्गनाओंके साथ समान स्नेह
करते हुए विहार कर रहे हैं। अपने प्रति विशिष्ट स्नेह
प्रदर्शित नहीं होनेके कारण वे प्रणय-कोपके आवेशमें
अन्यत्र एक कुञ्जमें जाकर छिप गयीं। श्रीकृष्ण
श्रीराधाको न देखकर विषादयुक्त हो गये। यद्यपि वहाँ
अनेकों व्रजसुन्दरियाँ उपस्थित थीं, किन्तु वे उनके प्रति
उदासीन हो गये। वे सोचने लगे—'मुझे अनेकों
गोपियोंके मध्य विलास करते देख, राधा मान करके
चली गयी। अपनेको अपराधी समझकर मैं उसे
रोकनेका साहस भी न कर सका। उसने अपने
आपको अनादृत और उपेक्षित समझा, किन्तु वही मेरे
हृदयमें प्रेयसीके रूपमें विराजमान है। विरह-तापमें वह
न जाने क्या करती होगी, न जाने क्या कहेगी? राधाके
विरहमें मुझे धन, जन, गोधन और गृह-सम्पदा आदि
सब कुछ तुच्छ प्रतीत होता है। मैं जब उससे मिलूँगा,
तब न जाने वह कोप तथा ईर्ष्याकी अभिव्यक्ति कैसे
करेगी? निर्दयी, निष्ठुर कहकर मुझपर अभियोग
लगायेगी, न जाने क्या-क्या कहेगी? यदि मैं जानता
कि राधे तुम कहाँ गयी हो, तो तुम्हारा पाद-स्पर्श
करके तुम्हें मना लेता, तुमसे क्षमा माँग लेता।' इस
प्रकार अनुतापयुक्त होकर श्रीकृष्ण श्रीराधाका इधर-उधर
अन्वेषण करने लगे और फिर उनके कहीं भी न
मिलनेपर विषादयुक्त हो गये। (इस रासमें श्रीकृष्ण उसी
प्रकार श्रीराधाको खोज रहे हैं, जिस प्रकार विरह-व्याकुल
होकर शारदीय रासमें गोपियोंने उन्हें खोज रहीं थी।)
अनङ्ग-बाणसे जर्जरित उनका हृदय श्रीराधाके
लिये अत्यन्त आकुल-व्याकुल हो गया; मनमें श्रीराधाकी
स्फूर्त्ति होने लगी—'हे राधे! मुझे दर्शन दो। मैं तुम्हारा
अतिप्रिय हूँ। तुम मेरी आँखोंसे ओझल मत होओ।
तुम्हारे विरहमें मैं काम-तापसे झुलस रहा हूँ, मुझे
दर्शन दो। मुझमें विरह-व्याधिकी यातना बढ़ती जा रही
है।'
'कंसारि'—अर्थात् श्रीकृष्ण जो कंसको परास्त करनेमें
समर्थ हैं, किन्तु श्रीराधाके प्रेमके द्वारा परास्त हो जाते
हैं। 'संसारवासनाबद्धशृङ्खला'—यहाँ संसार शब्द आनन्दमय,
भावमय मधुररसका वाचक है। मधुररसमें सतत रहनेवाली
वासना ही संसार-वासना है। श्रीकृष्णको अपने वशमें
बनाये रखनेके कारण रासमें श्रीराधा ही शृङ्खला हैं।
जब कोई विवेकी पुरुष तारतम्यके द्वारा किसी वस्तुकी
सर्वश्रेष्ठताको जान लेता है, तब वह अन्य वस्तुओंका
परित्याग कर देता है। उसी प्रकार श्रीराधाकी सर्वश्रेष्ठता
अनुभव करके श्रीकृष्णने अन्यान्य गोपियोंका परित्याग
कर दिया।"—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी॥102-106॥
उपरोक्त दोनों श्लोकोंका विचार :—
एइ दुइ श्लोकेर अर्थ विचारिले जानि।
विचारिते उठे येन अमृतेर खनि॥107॥
अनुवाद—इन दोनों श्लोकोंके अर्थका विचार
। 275
[ 8/107-115 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
करनेपर ही जाना जा सकता है कि श्रीराधाप्रेम तो
अमृतकी खान है ॥ 107 ॥
रासका वर्णन :-
शतकोटि गोपी-सङ्गे रास-विलास।
तार मध्ये एक-मूर्त्ये रहे राधा-पाश ॥ 108 ॥
श्रीराधिकाके श्रीकृष्णप्रेममें वामता-भावकी प्रधानता :-
साधारण-प्रेम देखि' सर्वत्र 'समता'।
राधार कुटिल-प्रेम हइल 'वामता' ॥ 109 ॥
अनुवाद—सौ-करोड़ गोपियोंके साथ रास-विलास
करते समय श्रीकृष्ण जिस प्रकार अपनी एक-एक
मूर्तिसे प्रत्येक गोपीके साथ विराज रहे थे, उसी प्रकार
उनमेंसे एक श्रीकृष्णमूर्ति श्रीराधाके पास भी विद्यमान
थी। अपने प्रति श्रीकृष्णका दूसरी गोपियोंके समान
साधारण प्रेम देखकर श्रीराधामें वाम्य-भाव उत्पन्न हो
गया, क्योंकि प्रेमका स्वभाव ही कुटिल होता है॥ 108-109 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—रासमण्डलमें दो-दो गोपियोंके
बीच एक मूर्ति श्रीकृष्ण एवं श्रीराधिकाके पार्श्वमें एक
मूर्ति श्रीकृष्ण—इस प्रकारसे प्रकाशित हुए थे। श्रीराधिकाने
उसमें अपने कुटिल-प्रेमकी 'वामता' प्रकाशित की ॥ 109 ॥
श्रीकृष्णप्रेमका कौटिल्य :-
उज्ज्वलनीलमणिके शृङ्गारभेद-कथनमें (102)—
अहेरिव गतिः प्रेम्णः स्वभावकुटिला भवेत्।
अतो हेतोरहेतोश्च यूनोर्मान उदञ्चति ॥ 110 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 110 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—(उज्ज्वलनीलमणिमें कहा गया
है)—सर्पके समान प्रेमकी भी स्वाभाविक कुटिल गति
होती है; इसी कारणसे युवक और युवतीमें 'अहेतु'
(बिना किसी कारणसे) और 'सहेतु' (किसी कारणसे)—इन
दो प्रकारका मान उदित होता है ॥ 110 ॥
अनुभाष्य—
अहेः (सर्पस्य) इव प्रेम्णः गतिः स्वभावकुटिला (निसर्गतः
वक्रा) भवेत्; अतः (अस्मात् कारणात्) हेतोः (कारणोदयात्)
अहेतोः च (कारणाभावदपि) यूनोः (कान्ताकान्तयोः) मानः
उदञ्चति (उदेति)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 110 ॥
श्रीराधाके रास परित्यागसे श्रीकृष्णका उनको ढूँढ़ना :-
क्रोध करि' रास छाड़ि' गेला मान करि'।
ताँरे ना देखिया व्याकुल हैल हरि ॥ 111 ॥
सम्यक् वासना कृष्णेर, इच्छा रासलीला।
रासलीला-वासनाते राधिका शृङ्खला ॥ 112 ॥
ताँहा बिना रासलीला नाहि ताँर चित्ते।
मण्डली छाड़िया गेला राधा अन्वेषिते ॥ 113 ॥
इतस्ततः भ्रमि' काँहा राधा ना पाञा।
विषाद करेन कामबाणे खिन्न हञा ॥ 114 ॥
श्रीकृष्णकामपूर्त्ति-विग्रह श्रीराधाका असमोर्ध्वत्व :-
शतकोटि-गोपीते नहे काम-निर्वापण।
ताहातेइ अनुमानि श्रीराधिकार गुण ॥” 115 ॥
अनुवाद—राधाजीको सहेतुक मान हो गया और वे
मान करके रासमण्डली छोड़कर चली गयीं। श्रीहरिने
जब उन्हें रासस्थलीमें नहीं देखा, तो वे व्याकुल हो
उठे। रासलीला ही श्रीकृष्णकी सम्पूर्णरूपसे सारभूता
इच्छा है अर्थात् प्रधान-वासना है। रासलीलाकी वासनाको
आबद्ध करनेके लिये राधाजी ही प्रधान शृङ्खला हैं।
श्रीराधाके बिना रासलीलामें श्रीकृष्णका चित्त नहीं
लगता, इसलिये वे रासमण्डलीको छोड़कर श्रीराधाको
ढूँढ़ने चले गये। इधर-उधर भ्रमण करनेपर भी जब
श्रीराधा नहीं मिली, तो श्रीकृष्ण कामबाणसे खिन्न होकर
विषाद करने लगे। रासस्थलीमें शतकोटि गोपियाँ भी
श्रीकृष्णके कामकी पूर्ति नहीं कर सकीं, इससे ही
राधाजीके गुणोंका अनुमान लगाया जा सकता
है॥” 111-115 ॥
अनुभाष्य—इसी अध्यायकी 104 संख्याका अमृतप्रवाह
भाष्य देखें ॥ 112-113 ॥
276 ।
आठवाँ अध्याय 8/97-126 ]
आदिलाला 4/68-97 और 122-143, 214-219, 239-262 संख्या देखें॥ 97-115 ॥
वक्ता श्रीरायके समक्ष श्रोतारूपी महाप्रभुका शिष्यत्व अभिमान :-
प्रभु कहे,—“ये लागि' आइलाम तोमा-स्थाने।
सेइ सब तत्त्ववस्तु हैल मोर ज्ञाने ॥ 116 ॥
अब महाप्रभुका श्रीकृष्णभजन-क्रमका श्रवण :-
एबे जानिलुँ साध्य-साधन-निर्णय।
आगे आर आछे किछु, शुनिते मन हय ॥ 117 ॥
अनुवाद—महाप्रभु बोले,-“राय! जिस कार्यके लिये मैं आपके पास आया था, उन सभी तत्त्व-वस्तुओंका ज्ञान मुझे आपसे प्राप्त हो गया। अब मैंने साध्य-साधन तत्त्वका निर्णय जान लिया। तथापि मुझे लगता है कि इससे भी आगे कुछ है, और उसे सुननेकी मेरे मनमें इच्छा है॥ 116-117 ॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 8/1 श्लोक देखें। 'साध्य-साधन-निर्णय'के पाठान्तरमें- 'सेव्य-साधन-निर्णय' ॥ 116-117 ॥
महाप्रभुका (1) श्रीकृष्ण, (2) श्रीराधा, (3) रस और (4) प्रेमके स्वरूप-तत्त्वका वर्णन करनेके लिये श्रीरायसे अनुरोध :-
'कृष्णेर-स्वरूप' कह 'राधार स्वरूप'।
'रस' - कोन् तत्त्व, 'प्रेम' - कोन् तत्त्वरूप ॥ 118 ॥
कृपा करि' एइ तत्त्व कह त' आमारे।
तोमा-बिना केह इहा निरूपिते नारे ॥” 119॥
अनुवाद—श्रीकृष्णका स्वरूप क्या है? इसे बताइये, श्रीराधाजीका स्वरूप भी कहिये, रसतत्त्व क्या है और प्रेमतत्त्वका स्वरूप क्या है? कृपा करके इन सब तत्त्वोंको मुझे बतलाइये, आपके अतिरिक्त इन तत्त्वोंका कोई भी निरूपण नहीं कर सकता॥”118-119 ॥
श्रीरायका अपनेको 'यन्त्र' और महाप्रभुको 'यन्त्री'-ज्ञान :-
राय कहे, —“इहा आमि किछुइ ना जानि।
तुमि येइ कहाओ, सेइ कहि वाणी ॥ 120 ॥
तोमार शिक्षाय पड़ि येन शुक-पाठ।
साक्षात् ईश्वर तुमि, के बुझे तोमार नाट ॥ 121 ॥
हृदये प्रेरण कर, जिह्वाय कहाओ वाणी।
कि कहिये भाल-मन्द, किछुइ ना जानि ॥”122 ॥
अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा, —“मैं इस विषयमें कुछ भी नहीं जानता हूँ। आप मुझसे जो कहलवाते हैं, मैं वही कह रहा हूँ। तोतेकी भाँति आपके द्वारा सिखाये गये विषयोंका ही पाठ कर रहा हूँ। आप तो साक्षात् ईश्वर हैं, आपके नाटकको भला कौन जान सकता है? भला है या बुरा है- मैं कुछ भी नहीं जानता, अन्तर्यामी रूपसे आप हृदयमें जो प्रेरणा करते हो, जिह्वासे उसी वाणीको कहलवा देते हो॥ 120-122 ॥
अपनेको 'श्रीकृष्ण-विमुख' और 'दीन' बतलाकर महाप्रभुके द्वारा श्रीरायको छलनेकी चेष्टा :-
प्रभु कहे,-“मायावादी आमि त' संन्यासी।
भक्तितत्त्व नाहि जानि, मायावादे भासि ॥ 123 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, —“मैं तो मायावादी संन्यासी हूँ। भक्तितत्त्वको मैं कैसे समझ सकता हूँ? मैं तो सदैव मायावादमें ही डूबा रहता हूँ ॥ 123 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीसार्वभौम और श्रीरामानन्दके वैशिष्ट्य और तारतम्यका वर्णन; श्रीसार्वभौम-ब्राह्मण और मुक्तिदाता; श्रीरामानन्द- श्रीकृष्ण-तत्त्वज्ञ और कीर्तनकारी आचार्य अथवा वैष्णव :-
सार्वभौम-सङ्गे मोर मन निर्मल हइल।
'कृष्णभक्ति-तत्त्व कह', ताँहारे पुछिल ॥ 124 ॥
तँहो कहे,—'आमि नाहि जानि कृष्णकथा।
सबे रामानन्द जाने, तँहो नाहि एथा ॥' 125 ॥
'वञ्चक'-लीलाभिनयकारी वैष्णव :-
तोमार ठाञि आइलाङ तोमार महिमा शुनिया।
तुमि मोरे स्तुति कर 'संन्यासी' जानिया ॥ 126 ॥
अनुवाद- श्रीसार्वभौमके सङ्गसे मेरा मन निर्मल हुआ था, इसलिये मैंने उनसे कृष्णभक्तितत्त्वके विषयमें
। 277
[ 8/124–127 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
पूछा था। किन्तु उन्होंने कहा, —'मैं श्रीकृष्णकथा नहीं
जानता हूँ, रामानन्दराय ही इस विषयमें सब कुछ
जानते हैं, परन्तु वे इस समय यहाँ नहीं हैं।' आपकी
महिमा सुनकर मैं आपके पास आया हूँ और आप
मुझे संन्यासी जानकर मेरी ही स्तुति कर रहे
हैं॥ 124–126॥
अनुवाद—चाहे ब्राह्मण हों या संन्यासी हों, अथवा शूद्र ही क्यों न हों, जो कृष्णतत्त्वको जाननेवाले हैं, वे ही वास्तवमें गुरु हैं॥ 127॥
अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभुने कहा, —“मैंने ब्राह्मण घरमें जन्म ग्रहण करके संन्यास ग्रहण किया है। इसलिये शूद्र व्यक्तिसे धर्मकी शिक्षा ग्रहण करना मेरे लिये अनुचित है, ऐसा मत सोचना। क्योंकि वर्णाश्रमरूपी धर्मशिक्षा और दीक्षामें ही ब्राह्मण-गुरुकी आवश्यकता होती है। किन्तु 'श्रीकृष्णतत्त्व-ज्ञान' सभी जीवोंका परमार्थ है। इस तत्त्वज्ञानके गुरु होनेके अधिकारके विचारमें केवलमात्र यही सिद्धान्त है—ब्राह्मण ही हो अथवा शूद्रजातिका ही हो, गृहस्थ ही हो अथवा संन्यासी ही हो, श्रीकृष्णतत्त्वको जाननेवाला ही 'गुरु' हो सकता है। श्रीहरिभक्तिविलासमें जो यह कहा गया है कि उच्चवर्णमें योग्य पुरुषके होनेपर, हीनवर्णके व्यक्तिसे श्रीकृष्णमन्त्र लेना उचित नहीं है—वह लोक-अपेक्षा रखनेवाले वैष्णवोंके लिये है। अर्थात् जो संसारमें प्रचलित-विधिके मतानुसार उसमें थोड़ा-बहुत परमार्थको भी जोड़ना चाहते हैं, उनके लिये ही यह विधि है। परन्तु जो वैधी और रागानुगा भक्तिके तात्पर्यको जानकर विशुद्ध श्रीकृष्णभक्ति प्राप्त करनेकी इच्छा करते हैं, उनके लिये उपयुक्त श्रीकृष्णतत्त्व-वेत्ता जिस-किसी भी वर्ण अथवा जिस-किसी भी आश्रममें क्यों न पाया जाय, उन्हींको ही 'गुरु'के रूपमें वरण करना ही विधि है। श्रीहरिभक्तिविलासमें उद्धृत पद्मपुराणके वचन—
अनुभाष्य—अप्राकृत श्रीकृष्णप्रेमधनमें धनी गुरु-वैष्णवोंके लिये सांसारिक-सम्पत्तिका मूल्य अत्यन्त तुच्छ होता है। इसलिये गुरु-वैष्णवोंके पास अपने वास्तविक कल्याणके लिये शिष्य बननेके लिये आये व्यक्तिको इन सब लौकिक वस्तुओंके अभिमानको कभी भी प्रदर्शित नहीं करना चाहिये। जन्म, ऐश्वर्य, ज्ञान या बुद्धि और सौन्दर्यका अभिमान रखते हुए यदि कोई व्यक्ति वास्तवमें शरणागति, विनम्र जिज्ञासा और सेवाभावके बिना गुरु-वैष्णवोंके निकट आता है, तो वैष्णव भी उसको उसके द्वारा वाञ्छित बाहरी सम्मान देकर विदा कर देते हैं। वे उसे अब्राह्मण अथवा शूद्र समझकर कभी भी दिव्यज्ञान अर्थात् अप्राकृत श्रीकृष्णके सम्बन्धकी अनुभूति प्रदान नहीं करते। इसके फलस्वरूप वह व्यक्ति परमार्थ मार्गसे वञ्चित होकर नरकके पथपर ही अग्रसर होता है। श्रीगौरसुन्दर सांसारिक लोगोंकी दृष्टिमें वर्णाश्रम धर्मकी सर्वोत्कृष्ट अवस्था (ब्राह्मणवर्ण और संन्यासाश्रम) में स्थित थे। और श्रीरामानन्द उनकी अपेक्षा नीची अवस्था (शूद्रवर्ण और गृहस्थाश्रम) में थे। तो भी श्रीरामानन्दके सामने दीनता दिखलाते हुए महाप्रभुने कलिके प्रभावसे ग्रस्त, सांसारिक ज्ञानको ही सब कुछ समझनेवाले अज्ञानी जीवोंको अभिमानयुक्त दुर्बुद्धिसे सतर्क करनेके लिये जगद्गुरु आचार्यके रूपमें शिक्षा प्रदान की है॥ 126॥
“न शूद्रा भगवद्भक्तास्तेऽपि भागवतोत्तमाः।
सर्ववर्णेषु ते शूद्रा ये न भक्ता जनार्दने।
षट्कर्मनिपुणो विप्रो मन्त्रतन्त्र-विशारदः।
अवैष्णवो गुरुर्न स्याद्वैष्णवः श्वपचो गुरुः॥
महाकुल-प्रसूतोऽपि सर्वयज्ञेषुः दीक्षितः।
सहस्रशाखाध्यायी च न गुरुः स्यादवैष्णवः॥
विप्रक्षत्रियवैश्याश्च गुरवः शूद्रजन्मनाम्।
शूद्राश्च गुरवस्तेषां त्रयाणां भगवत्प्रियाः॥”
जिस किसी भी अवस्थामें क्यों न रहे, श्रीकृष्णतत्त्वको जानने वाला ही दिव्यज्ञानदाता :—
किवा विप्र, किवा न्यासी,, शूद्र केने नय।
येइ कृष्णतत्त्ववेत्ता, सेइ 'गुरु' हय ॥ 127॥
278 ।
“भगवद्भक्तिपरायण व्यक्ति कभी भी शूद्र नहीं
कहलाते, उनको 'भागवत' ही कहा जाता है। श्रीजनार्दनके
प्रति भक्ति न होनेपर कोई भी जाति क्यों न हो, उनकी
'शूद्र' कहकर ही गणना होती है। यजन, याजन,
अध्ययन, अध्यापन, दान और प्रतिग्रह—इन छह कर्मोंमें
निपुण एवं मन्त्र-तन्त्र विशारद ब्राह्मण भी अवैष्णव
होनेपर गुरु नहीं हो सकता, किन्तु चण्डाल कुलमें
जन्म ग्रहण करनेपर भी यदि कोई विष्णुभक्ति परायण
हो, तो वह गुरु होनेके योग्य है। सम्भ्रान्त कुलमें
उत्पन्न, सब यज्ञोंमें दीक्षित और सहस्रशाखाध्यायी
ब्राह्मण भी अवैष्णव होनेपर गुरु पदके योग्य नहीं है।
शूद्रकुलमें उत्पन्न व्यक्ति अपनेसे उन्नत ब्राह्मण, क्षत्रिय
और वैश्य जातिके किसी योग्य व्यक्तिको गुरुके रूपमें
ग्रहण कर सकते हैं—यही साधारण विधि है, किन्तु
भगवद्-प्रिय अर्थात् वैष्णवगण शूद्रकुलमें उत्पन्न होनेपर
भी उक्त तीनों वर्णों अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय और
वैश्य-कुलमें उत्पन्न व्यक्तियोंके श्रीगुरुदेव हो सकते
हैं॥” 127॥
अनुभाष्य—वर्णमें ब्राह्मण ही हो, अथवा क्षत्रिय-
वैश्य-शूद्र ही हो, आश्रममें संन्यासी हो अथवा
ब्रह्मचारी-वानप्रस्थ-गृहस्थ ही हो, जिस किसी वर्णमें
अथवा जिस किसी आश्रममें अवस्थित हो, श्रीकृष्ण-
तत्त्ववेत्ता ही गुरु अर्थात् वर्त्मप्रदर्शक, दीक्षागुरु अथवा
शिक्षागुरु हो सकते हैं। गुरुकी योग्यता केवलमात्र
श्रीकृष्णतत्त्वज्ञताके ऊपर ही निर्भर करती है,—वर्ण
अथवा आश्रमके ऊपर निर्भर नहीं करती। श्रीमहाप्रभुका
यह आदेश शास्त्रीय आदेशके विरुद्ध नहीं है। इस
तात्पर्यके अनुसार श्रीविश्वम्भर-महाप्रभु श्रीईश्वरपुरी
नामक संन्यासीसे, श्रीनित्यानन्द प्रभु माधवेन्द्रपुरी गोस्वामी
(मतान्तरमें श्रीमद् लक्ष्मीपति तीर्थ) नामक संन्यासीसे,
श्रीअद्वैताचार्य इन्हीं श्रीमाधवेन्द्रपुरी संन्यासीसे दीक्षित हुए
थे। श्रीरसिकानन्दने ब्राह्मणसे इतर अन्य कुलमें आविर्भूत
श्रीश्यामानन्द प्रभुसे, श्रीगङ्गानारायण चक्रवर्ती और
श्रीरामकृष्ण भट्टाचार्यने भी ब्राह्मणकुलके अतिरिक्त अन्य
किसी कुलमें आविर्भूत श्रील नरोत्तम-ठाकुरसे, काटोयाके
श्रीयदुनन्दन चक्रवर्ती श्रीदासगदाधरसे पाञ्चरात्रिक दीक्षामें
दीक्षित हुए थे। धर्म-नामक व्याध (शिकारी) आदि
अनेकानेक व्यक्तियोंकी शिक्षा-गुरु होनेमें बाधा नहीं
थी। महाभारतके स्पष्ट आदेशों और श्रीमद्भागवत
(7/11/32) श्लोकमें—
“यस्य यल्लक्षणं प्रोक्तं पुंसो वर्णाभिव्यञ्जकम्।
यदन्यत्रापि दृश्येत तत्तेनैव विनिर्दिशेत्॥”
“मनुष्योंमें वर्णको लक्षित करनेवाले जो समस्त
लक्षण बताये गये हैं, वे यदि दूसरे वर्णवालोंमें भी मिलें,
तो उन्हें भी उसी वर्णका समझना होगा। (केवल
जन्मके द्वारा वर्ण निरूपित नहीं होगा)।” इस वाक्यमें
'समझना होगा'—इस विधिलिङ्के प्रयोगसे अर्थात् इस
आदेशका पालन अनिवार्य है। इसलिये वैष्णव विचारानुसार
श्रीकृष्णतत्त्ववेत्ताकी वृत्तिमें ब्राह्मणता स्वाभाविक ही है।
इसलिये कलिमें जो प्रचलित विचार है कि जन्मके
बिना ब्राह्मणता नहीं हो सकती, उसके स्थानपर यह
स्वीकार करना होगा कि श्रीकृष्णतत्त्ववित् होनेपर
जन्मसे शूद्र भी शास्त्रीय ब्राह्मणता प्राप्त करके गुरु हो
सकते हैं—यही श्रीमहाप्रभुने सूक्ष्मरूपसे समझाया है।
जो श्रीकृष्णतत्त्ववित् वैदिक-वाजसनेय शाखाके अन्तर्गत
कात्यान-गृह्यसूत्रमें कहे सावित्र्य-संस्कारको (उपनयन
संस्कारको) ग्रहण नहीं करते, वे—एकायनशाखी (आदिलीला
भूमिका पृष्ठ संख्या xiv देखें) दीक्षित-ब्राह्मण ही हैं।
किन्तु अज्ञानी लोग अधिकतर उन्हें 'अच्युत ब्राह्मण'
(जो ब्राह्मणत्वसे कभी नहीं गिरते) न समझ पानेके
कारण नरकगामी होते हैं। इसलिये (जन्मसे ब्राह्मण नहीं
होनेपर भी) रसिकानन्द प्रभुके वंशमें, श्रीखण्डके
श्रीमुकुन्ददासके वंशमें, नवनीहोड़के वंशमें सावित्र्य
ब्राह्मण-संस्कार एवं जन्मसे ब्राह्मण लोगोंको शिष्य
बनाकर उनके आचार्यका कार्य बहुत समयसे चलता
हुआ आ रहा है। कई भजनानन्दी वैष्णव सावित्र्य-संस्कार
[ 8/127-134 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
ग्रहण नहीं करते, इसका तात्पर्य यह नहीं हैं कि गुरु
होनेके लिये सावित्र्य-संस्कार ही एकमात्र विधि है।
वैष्णवगण लक्षणोंके द्वारा वर्णका निर्णय करते हैं, किन्तु
अज्ञानी व्यक्ति वैसे लक्षणोंके द्वारा वर्ण निर्णय करनेमें
असमर्थ होते हैं, इसलिये श्रीमहाप्रभुने स्पष्टरूपसे ही
शास्त्रके तात्पर्यको समझा दिया। हरिभक्तिविलासमें संगृहीत
सिद्धान्त श्रीमहाप्रभुके अपने आदर्श-आचार और उपदेशोंके
साथ एक होनेपर भी अज्ञानी व्यक्तियोंको वे भिन्न प्रतीत
होते हैं। इस पयारमें कहे गये 'गुरु' शब्दसे उनके
विचारानुसार श्रवण-गुरु अथवा भजन-शिक्षागुरुको ही
लक्ष्य किया गया है, दीक्षा अथवा मन्त्रदाता गुरु नहीं।
क्योंकि उनके मतानुसार वंश-परिचय अर्थात् रक्त
अथवा शुक्र ही दिव्यज्ञान-दाताके अधिकारका निर्णय
और परिचय प्रदान करता है। इसलिये शुद्ध-आत्मवृत्ति
श्रीकृष्णभक्ति उनके मतानुसार निरपेक्ष या स्वतन्त्र नहीं
है, अर्थात् वह जन्म-कुलके अधीन है। विशेषतः
दीक्षागुरु अथवा मन्त्र-दाताका श्रेष्ठत्व और माहात्म्य
उनकी मूर्खतानुसार 'श्रवण गुरु' अथवा 'भजन-शिक्षा-गुरु'की
अपेक्षा अधिकतर है। इस सम्बन्धमें आदिलीला 1/47
संख्याका अनुभाष्य विशेष-रूपसे विचारणीय है। वास्तवमें
ऐसी धारणा उनके प्राकृत ज्ञानसे उत्पन्न अपराधका
फलमात्र है॥ 127 ॥
श्रीरायको राधाकृष्णके तत्त्वके वर्णनके लिये अनुरोध :—
'संन्यासी' बलिया मोरे ना करिह वञ्चन।
कृष्ण-राधा-तत्त्व कहि' पूर्ण कर मन॥"128 ॥
अनुवाद—मुझे 'संन्यासी' समझकर मेरी वञ्चना
मत कीजिये। श्रीकृष्ण और श्रीराधातत्त्वोंका वर्णन
करके मेरे मनोरथको पूर्ण करो॥"128 ॥
महाप्रभुकी मायाके द्वारा महामहासूरिगण भी मुग्ध, किन्तु
वास्तविक तत्त्वको जाननेवाले श्रीरामानन्द धीर-स्थिर :—
यद्यपि राय—प्रेमी, महाभागवते।
ताँर मन कृष्णमाया नारे आच्छादिते ॥ 129 ॥
महाप्रभुकी इच्छाशक्तिसे चालित सेवकका चलन—
मायादास्य नहीं है, वह महाप्रभुकी इच्छाशक्तिका
प्रभुत्व और श्रीरायके वश्यत्वका ज्ञापक :—
तथापि प्रभुर इच्छा—परम प्रबल।
जानिलेह रायेर मन हैल टलमल ॥ 130 ॥
राय कहे,—“आमि—नट, तुमि—सूत्रधार।
येइ मत नाचाओ, सेइ मत चाहि नाचिबार ॥ 131 ॥
मोर जिह्वा—वीणायन्त्र, तुमि—वीणाधारी।
तोमार मने येइ उठे, ताहाइ उच्चारि ॥ 132 ॥
अनुवाद—यद्यपि श्रीरामानन्द राय श्रीकृष्ण-प्रेमी
महाभागवत हैं और श्रीकृष्णकी माया उनके मनको
आच्छादित नहीं कर सकती, तथापि महाप्रभुकी इच्छा
परम प्रबल है, इसलिये श्रीरामानन्द रायका मन
महाप्रभुके स्वरूपको जानते हुए भी चञ्चल हो गया।
श्रीरायने कहा,—“मैं तो एक नट हूँ और आप सूत्रधार
हो। आप जैसे मुझे नचाएँगे, मैं वैसे ही नाचूँगा। मेरी
जिह्वा तो वीणा-यन्त्र है और आप वीणा बजानेवाले
हैं। आपके मनमें जो श्रवण करनेकी इच्छा होती है,
मैं वही कहता हूँ॥ 129-132 ॥
अनुभाष्य—आदिलीला 3/85-89 संख्या देखें।
'सूत्रधार'—“वर्त्तनीयतया सूत्रं प्रथमं येन सूच्यते। रङ्गभूमिं
समाक्रम्य सूत्रधारः स उच्यते॥”
“नाटकमें प्रयोग होनेवाली सभी वस्तुओंको सर्वप्रथम
जिसके द्वारा रङ्गभूमिमें आकर सूचित किया जाता है,
उसे 'सूत्रधार' कहते हैं।” वह नाटककी प्रस्तावनाको
प्रस्तुत करनेवाला प्रधान नट है॥ 131 ॥
(1) श्रीकृष्णतत्त्व-वर्णनारम्भ; श्रीकृष्णका स्वरूप-परिचय :—
परम ईश्वर कृष्ण—स्वयं भगवान्।
सर्व-अवतारी, सर्वकारण-प्रधान ॥ 133 ॥
अनन्त वैकुण्ठ, आर अनन्त अवतार।
अनन्त ब्रह्माण्ड इँहा,—सबार आधार ॥ 134 ॥
280
आठवाँ अध्याय 8/133-137 ]
सच्चिदानन्द-तनु, व्रजेन्द्रनन्दन।
सर्वैश्वर्य-सर्वशक्ति-सर्वरस-पूर्ण ॥ 135 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्ण ही परम ईश्वर और स्वयं
भगवान् हैं। वे सभी अवतारोंके अंशी अर्थात् मूल हैं
और सभी कारणोंके प्रधान कारण हैं। श्रीकृष्ण अनन्त
वैकुण्ठ, अनन्त अवतार एवं अनन्त ब्रह्माण्डोंके भी
आधार स्वरूप हैं। वे सत्-चित्-आनन्दमय विग्रह हैं,
तो भी वे महाराज नन्दके पुत्र हैं। वे समस्त ऐश्वर्योंके,
समस्त शक्तियोंके ईश हैं और वे समस्त रसोंसे
परिपूर्णतम रसस्वरूप हैं ॥ 133-135 ॥
ब्रह्मसंहिता (5/1) :—
ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः।
अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम् ॥ 136 ॥
अनुवाद—सत्, चित् और आनन्दमय विग्रह श्रीकृष्ण
ही सर्वेश्वरेश्वर हैं। वे स्वयंरूप, अनादि, किन्तु सबके
आदि हैं। वे गोविन्द हैं तथा समस्त कारणोंके
कारणभूत मूल कारण हैं ॥ 136 ॥
अनुभाष्य—आदिलीला 2/107 संख्या देखें ॥ 136 ॥
व्रजमें नित्यसेवित मदनमोहन-विग्रह :—
वृन्दावने 'अप्राकृत नवीन मदन'।
कामगायत्री, कामबीजे याँर उपासन ॥ 137 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्ण वृन्दावनमें अप्राकृत नवीन मदन
हैं। कामगायत्री और कामबीजके द्वारा उनकी उपासना
होती है ॥ 137 ॥
अनुभाष्य—'वृन्दावन'—ब्रह्मसंहितामें पाँचवें अध्यायका
56वाँ श्लोक—
“श्रियः कान्ताः कान्तः परमपुरुषः कल्पतरवो द्रुमा
भूमिश्चिन्तामणिगणमयी तोयममृतम्।
कथा गानं नाट्यं गमनमपि वंशी प्रियसखी
चिदानन्दं ज्योतिः परमपि तदास्वाद्यमपि च॥
स यत्र क्षीराब्धिः स्रवति सुरभीभ्यश्च सुमहान्
निमेषाद्र्धाख्यो वा व्रजति न हि यत्रापि समयः।
भजे श्वेतद्वीपं तमहमिह गोलोकमिति
यं विदन्तस्ते सन्तः क्षितिविरलचाराः कतिपये ॥”
“अप्राकृत वृन्दावनमें सब कुछ ही चिन्मय है;
अप्राकृत लक्ष्मियाँ अथवा गोपियाँ—कान्ता हैं, परम
पुरुष श्रीकृष्ण—सभीके कान्त हैं, वहाँके वृक्ष—कल्पवृक्ष
हैं, भूमि—चिन्तामणियोंसे युक्त है, पानी—अमृत है,
बोलना—गान है, चलना—नृत्य है, वंशी—प्रियसखी है,
चन्द्र-सूर्यादिरूप ज्योतिर्मय पदार्थ—चिदानन्दमय हैं। वह
अप्राकृत चिन्मय भाव ही आस्वाद्य अथवा अनुशीलनीय
है। वहाँ चिन्मय गैयाओंके दूधसे क्षीरसमुद्र प्रवाहित हो
रहा है, वहाँका पलक झपकनेके समयका आधा भाग
भी नित्यकाल ही है अथवा वहाँ काल वृथा ही व्यतीत
होकर दूसरे कालमें नहीं बदलता। इस प्रपञ्चमें उदित
वृन्दावन-धाम जिसको कुछ दुर्लभ श्रीकृष्णतत्त्व जाननेवाले
साधु 'गोलोक' नामसे जानते हैं—उस श्वेतद्वीपका मैं
भजन करता हूँ।” जड़बुद्धि और जड़ेन्द्रियोंके द्वारा
प्राप्त सांसारिक ज्ञानसे वृन्दावनका दर्शन नहीं होता,
क्योंकि अप्राकृत वृन्दावन—अप्राकृत श्रीकृष्णलीलाका
अप्राकृत स्थान है। श्रील नरोत्तम दास ठाकुरने अपने
द्वारा रचित 'प्रार्थना' नामक ग्रन्थमें कहा है,—
“आर कबॆ निताइचाँद करुणा करिबे।
संसार-वासना मोर कबॆ तुच्छ हबे॥
विषय छाड़िया कबॆ शुद्ध हबे मन।
कबॆ हाम हेरब श्रीवृन्दावन॥
रूप-रघुनाथ-पदे हइबे आकुति।
कबॆ हाम बुझब श्रीयुगल-पिरीति॥”
“कब श्रीनित्यानन्द प्रभुकी कृपासे मेरे हृदयसे
सांसारिक वासनाएँ दूर होंगी? विषयोंका परित्यागकर
मेरा मन कब शुद्ध होगा, जिससे कि मैं श्रीवृन्दावनधामके
चिन्मय स्वरूपका दर्शन करूँगा। कब श्रीरूप गोस्वामी
और श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके चरणोंमें मेरी प्रीति होगी
कि मैं उनकी कृपासे श्रीराधाकृष्णयुगलकी प्रीतिको जान
पाऊँगा।”
मध्यलीला 14/219-226 संख्या देखें।
। 281
[ 8/137 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
'अप्राकृत नवीनमदन'—जड़ अथवा प्राकृत और
उसके विपरीत चिन्मय अथवा अप्राकृत, दोनों अवस्थाओंमें
ही 'काम' विद्यमान है। जड़ काम कालके द्वारा क्षुब्ध
होता है अर्थात् प्रकाशित होनेके समय ही इसकी
अनुभूति होती है एवं थोड़ी ही देरमें यह मलिन होकर
फिर रहता नहीं है। और अप्राकृत काम—नित्य
नवनवायमान अर्थात् कालके द्वारा इसकी समाप्ति नहीं
होती, यह सदैव उज्ज्वल रहता है। जड़ेन्द्रियोंके द्वारा
ग्रहण किया जा सकने वाला काम—जड़-देह-मनोवृत्ति
एवं इन्द्रिय-भोगमें लगे प्रत्येक श्रीकृष्ण विमुख जीवके
भौतिक देहजनित स्वभावमें वर्तमान है, किन्तु वह
केवल तात्कालिक मात्र है। और चिद्-इन्द्रियोंके सेव्य
मदन—मन्मथमन्मथ श्रीकृष्णचन्द्र हैं, वे—नित्य नवीन
और स्वयंसुरूप-विग्रह हैं।
'काम-गायत्री'—'गायन्तं त्रायते यस्मात् गायत्री त्वं
ततः स्मृता।' 'जो वस्तु गान करनेवालेका त्राण (रक्षा
या उद्धार) करती है अथवा गानके द्वारा त्राण कराती
है।' मध्यलीला 21/125 संख्या—
'कामगायत्री मन्त्ररूप, हय कृष्णस्वरूप,
सार्द्ध चब्बिश अक्षर तार हय।
से अक्षर-चन्द्र हय, कृष्ण करि' उदय,
त्रिजगत् कैल काममय।”
“मन्तरूप कामगायत्री श्रीकृष्णका स्वरूप है।
कामगायत्रीमें साढ़े चौबीस अक्षर होते हैं। ये अक्षर
चन्द्ररूप हैं जो श्रीकृष्णमें उदित होकर त्रिभुवनको
काममय कर देते हैं।”
“क्लीं कामदेवाय विद्महे पुष्पबाणाय धीमहि तन्नोऽनङ्गः
प्रचोदयात् ॥”
कामदेव (187 संख्या देखें) अथवा मदनमोहन-कृष्ण
ही सम्बन्ध-अधिदेवता, पुष्पबाण अथवा गोविन्द ही
अभिधेय-अधिदेवता और अनङ्ग अथवा गोपीजनवल्लभ
ही प्रयोजन-अधिदेवता हैं। कामगायत्री—अप्राकृत है।
अप्राकृत-अनुभूतिसे अप्राकृत-वचनोंके द्वारा साधक
श्रीकृष्णकी उपासना करते हैं।
ब्रह्मसंहिता 5/27-28 श्लोक—
“अथ वेणु-निनादस्य त्रयीमूर्तिमयी गतिः।
स्फुरन्ती प्रविवेशाशु मुखाब्जानि स्वयम्भुवः।
गायत्रीं गायतस्तस्मादधिगत्य सरोजजः॥
संस्कृतश्चादिगुरुणा द्विजतामगमत्ततः॥
त्रया प्रबुद्धोऽथ विधिर्विज्ञाततत्त्वसागरः।
तुष्टाव वेदसारेण स्तोत्रेणानेन केशवम् ॥”
“अनन्तर श्रीकृष्णकी वंशीध्वनिकी त्रयीमूर्तिमयी
गति (वेदमाता त्रि-अष्टाक्षरी—त्रिविध अर्थात् सम्बन्धभिधेय-
प्रयोजनात्मिका) प्रकाशित होकर स्वयंभू ब्रह्माके मुखकमलमें
सहसा प्रविष्ट हुई। पद्मयोनि ब्रह्माने वेणुगीतसे निकली
गायत्री-दीक्षा प्राप्त करके आदिगुरु श्रीकृष्णके द्वारा
द्विज-संस्कार प्राप्त किया (श्रीजीव गोस्वामी प्रभुकी
टीका देखें)। त्रयीमयी अर्थात् सम्बन्ध, अभिधेय और
प्रयोजन-विशिष्टा गायत्रीके स्मरणके द्वारा जागरित होकर
ब्रह्मा तत्त्वसमुद्रमें निष्णात (प्रवीण) हो गये अर्थात्
उन्होंने अभिज्ञता प्राप्त की एवं उसी वेदसार-स्तोत्रके
द्वारा केशवकी सेवा करके उनकी कृपा प्राप्त की।
'कामबीज'—अप्राकृत 'क्लीं'। ब्रह्मसंहिताका 5/3
श्लोक—
“प्रेमानन्द-महानन्द-रसेनावास्थितं हि यत्।
ज्योतिरूपेण मनुना काम-बीजेन सङ्गतम् ॥”
“अप्राकृत कामबीजसे युक्त अप्राकृत काम-गायत्रीके
द्वारा अप्राकृत नित्य नवीन मदनमोहन-विग्रहकी अप्राकृत
उपासना होती है।” जैसे, गोपालतापनी उपनिषद्में कहा
गया है-(पूर्व विभाग श्लोक-13 पृष्ठ 22)
“तस्य पुनरासनं जलभूमीन्दु-सम्पातकामादि-कृष्णायेत्येकं पदं
गोविन्दायेति द्वितीयं गोपीजनेति तृतीयं वल्लभायेति तुरीयं स्वाहेति
पञ्चममिति पञ्चपदीं जपन् पञ्चाङ्गं द्यावाभूमी सूर्यचन्द्रमसौ साग्नी
तद्रूपतया ब्रह्म सम्पद्यते ब्रह्म सम्पद्यते इति।”
अर्थात् “ध्यानके अनन्तर उन श्रीकृष्ण नामक
परब्रह्मका सन्तोष उत्पादन करेंगे। जल, भूमि, ई, इन्दु
आदिके सम्मिलनसे उत्पन्न जो (क्लीं) कामबीज है,
उसको आरम्भमें रखकर पाँच पदोंवाले अठारह अक्षरके
282 ।
आठवाँ अध्याय 8/137-139 ]
गोपालमन्त्रके जपके द्वारा परब्रह्म श्रीकृष्णके सन्तोषका
विधान होता है। पाँच पद इस प्रकार हैं—क्लीं
आरम्भमें रखकर कृष्णाय यह एक पद है, गोविन्दाय
दूसरा पद है, गोपीजन तीसरा पद है, वल्लभाय चौथा
पद है, स्वाहा पाँचवाँ पद है, यह पञ्चपदात्मक मन्त्र
है। इसकी उपासनाका फल कह रहे हैं। पञ्चपदी
जपशील पुरुष द्यावा, भूमि, अग्नि, सूर्य और चन्द्र, इन
पञ्चाङ्गरूप नारायणात्मक परब्रह्मको पञ्चाङ्ग ब्रह्मस्वरूप
होकर प्राप्त होते हैं।”
श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुरकी टीका—
“जलं ककारः तद्वाचित्वात्, भूमिर्लकारः लकार-बीजत्वात्,
तथा ई-दीर्घ ईकारः अग्निः कृतसन्धित्वात्, इन्दुरनुस्वारः
तदाकारत्वात्। तेषां सम्पातो मिलनं तेन जातं यत् कामबीजं
तदादिकं कृष्णायेत्येकपदमित्यर्थः।”
अर्थात् ‘क्लीं’ यह बीज—जल (क-कार), भूमि
(ल-कार), ई (दीर्घ ईकार वा अग्नि) एवं इन्दु
(अनुस्वार) इनके सम्मिलनसे प्रकटित है। इस क्लीं-बीजको
आदिमें (प्रारम्भमें) जोड़कर श्रीकृष्णमन्त्रसे श्रीकृष्ण-नामक
परब्रह्मको रसन अर्थात् सन्तुष्ट करनेवाली उपासना हुई
है।
आदिलीला 5/212-214, 219, 221-222 संख्या
देखें॥ 137॥
श्रीकृष्ण-माधुर्यकी आकर्षण-शक्ति :—
पुरुष, योषित्, किंवा स्थावर-जङ्गम।
सर्व-चित्ताकर्षक, साक्षात् मन्मथ-मदन ॥ 138 ॥
अनुवाद—पुरुष हो या फिर स्त्री, स्थावर (वृक्षादि
स्थिर) हो या फिर जङ्गम (चलनेवाले प्राणी), श्रीकृष्ण
सबके चित्तको आकर्षित करनेवाले हैं। वे मन्मथ
(सबके मनको मथ डालनेवाले कामदेव) के मनको
मथनेवाले साक्षात् मन्मथ-मदन हैं॥ 138 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—चिन्मयधामरूप वृन्दावनमें श्रीकृष्ण
प्रकृतिसे अतीत अभिनव-मदनस्वरूपमें विराजमान हैं।
‘मदन’-शब्दसे सामान्यतः सभी जड़ीय कवि जो अर्थ
करते हैं, वह प्राकृत-जगत्में माँसपिण्डोंको परस्पर
आकर्षित करनेवाला, अत्यन्त प्राकृत और हेय (तुच्छ)
कामतत्त्व है। सभी जीव जड़बद्ध होकर देहमें
आत्म-अभिमान करके उस कामकी अधीनताको स्वीकार
करते हैं। श्रीकृष्ण-सम्बन्धतत्त्व जाननेपर जीवकी अप्राकृत
चिन्मय अवस्थामें अवस्थिति होती है। वह अवस्था दो
प्रकारकी है—‘स्वरूपगत’ और ‘वस्तुगत’। तत्त्वकी प्रतीति
हो गयी है, किन्तु ‘वस्तुतः’ अभी भी जड़सम्बन्ध दूर
नहीं हुआ, ऐसी अवस्थामें चिन्मय-तत्त्वका थोड़ा-बहुत
उदय होनेपर ‘स्वरूपगतः’ वृन्दावनमें अवस्थिति होती है,
किन्तु ‘वस्तुतः’ नहीं होती। श्रीकृष्णकी इच्छासे स्थूल
और लिङ्गमय जड़तत्त्वके साथ सम्बन्धरहित होनेपर ही
‘वस्तुतः’ वृन्दावनमें अवस्थिति होती है। स्वरूप-अवस्थितिमें
साधना है, उस समय चिन्मयी कामगायत्री और चिन्मय
कामबीजसे श्रीकृष्णकी उपासना होती है। पुरुष अथवा
स्त्री, स्थावर अथवा जङ्गम, सभीको ही वे सर्वचित्ताकर्षक
मन्मथ-मन्मथस्वरूप श्रीकृष्ण आकर्षित करते हैं।
‘कामगायत्री’—साढ़े चौबीस अक्षरका एक विशेष
वेदमन्त्र है। ‘कामबीज’—श्रीकृष्णकी उपासनामें जिस
बीजका जप होता है, वही॥ 137-138॥
अनुभाष्य—आदिलीला 4/147-148 संख्या देखें॥ 138॥
श्रीमद्भागवत (10/32/2) :—
तासामाविरभूच्छौरिः स्मयमानमुखाम्बुजः।
पीताम्बरधरः स्रग्वी साक्षान्मन्मथ-मन्मथः ॥ 139 ॥
अनुवाद—उसी समय उन रोदनकारी व्रजदेवियोंके
बीचमें शूरवंशके शिरोमणि श्रीकृष्ण प्रकट हो गये।
उनका मुखकमल मन्द-मन्द मुस्कानसे खिला हुआ था,
वे गलेमें वनमाला और शरीरपर पीताम्बर धारण किये
हुए थे। उनका वह रूप-सौन्दर्य सबके मनको मथ
डालनेवाले साक्षात् कामदेवके मनको भी मथनेवाला
था॥ 139 ॥
अनुभाष्य—आदिलीला 5/214 संख्या देखें॥ 139 ॥
। 283
[ 8/140–143 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
नाना-भक्तेर रसामृत नानाविध हय।
सेइ सब रसामृतेर 'विषय' 'आश्रय' ॥ 140 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 140 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—पूर्वकथित पाँच प्रकारके
रसामृत-उपासनामें भक्त ही उस रसके 'आश्रय' और
उपास्य श्रीकृष्ण ही उस रसके 'विषय' हैं॥ 140 ॥
अनुभाष्य—'विषय'—श्रीकृष्ण। 'आश्रय'—रसाश्रित
भक्त ॥ 140 ॥
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 141 ॥
श्रीकृष्णके माधुर्यसे स्वयं श्रीकृष्ण ही मुग्ध :—
शृङ्गार-रसराजमय-मूर्त्तिधर।
अतएव आत्मपर्यन्त-सर्व-चित्त-हर ॥ 142 ॥
अनुवाद—समस्त रसोंमें शृङ्गाररस सर्वोपरि है,
रसराज है और श्रीकृष्ण इसके मूर्त्तिमान विग्रह हैं।
इसलिये उनका यह रूप सभीके चित्तको तो हरण
करता ही है, उनके स्वयंके चित्तको भी हरण कर लेता
है॥ 142 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'शृङ्गार'—रसराज; 'तन्मय-
मूर्त्तिधर'—श्रीकृष्ण; इस कारणसे श्रीकृष्णका श्रीरूप स्वयं
श्रीकृष्ण तकके भी चित्तका हरण करता है ॥ 142 ॥
अनुभाष्य—आदिलीला 4/144 और 222 संख्या
देखें ॥ 142 ॥
वार्षभानवी-दयितकी जय :—
भक्तिरसामृतसिन्धु (1/1/1)—
अखिलरसामृतमूर्त्तिः प्रसूमर-
रुचिरुद्ध-तारका-पालिः।
कलित-श्यामा-ललितो
राधाप्रेयान् विधुर्जयति ॥ 141 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 141 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—(भक्तिरसामृतसिन्धुमें)
अखिलरसामृतमूर्त्ति, वर्धनशीलकान्तिके द्वारा तारका-पाली
नामक दो सखियोंको अवरुद्ध करनेवाले, श्यामा और
ललितासखीको वशमें करनेवाले, राधाजीके अत्यन्त
प्रिय, ऐसे श्रीकृष्णचन्द्र जययुक्त हों। तात्पर्य यह है,—जो
उनका जिस रसमें भी भजन करता है, श्रीकृष्ण उस
रसामृतकी मूर्ति होनेपर भी श्रीराधिकाके रसके ही
एकमात्र परम विषय हैं॥ 141 ॥
अनुभाष्य—
अखिलरसामृतमूर्त्तिः (अखिलाः शान्ताद्याः पञ्च मुख्यरसाः
हास्याद्याः सप्त गौणरसाश्च यस्मिन् तदेव अमृतं परमानन्द एव
मूर्त्तिः यस्य सः) प्रसूमर-रुचिरुद्ध-तारका-पालिः (प्रसूमराभिः
प्रसरणशीलाभिः रुचिभिः कान्तिभिः रुद्धे वशीकृते तारका-पाली
येन सः) कलित-श्यामा-ललितः (कलिते आत्मसात्कृते
श्यामा च ललिता च येन् सः) राधाप्रेयान् (राधायाः प्रेयान्
प्रियतमः) विधुः (कृष्णचन्द्रः) जयति।
व्रजसुन्दरियोंके साथ नित्यविलासी श्रीकृष्ण :—
श्रीगीतगोविन्द (1/11)—
विश्वेषामनुरञ्जनेन जनयन्नानन्दमिन्दीवर-
श्रेणीश्यामलकोमलैरुपिनयन्नङ्गैरनङ्गोत्सवम्।
स्वच्छन्दं व्रजसुन्दरीभिरभितः प्रत्यङ्गमालिङ्गितः
शृङ्गारः सखि मूर्त्तिमानिव मधौ मुग्धो हरिः क्रीड़ति॥ 143 ॥
अनुवाद—हे सखि ! इस वसन्तकालमें विलासरसमें
उन्मत्त श्रीकृष्ण मूर्त्तिमान शृङ्गाररसस्वरूप होकर विहार
कर रहे हैं। वे इन्दीवर कमलसे भी अतीव अभिराम
कोमल श्यामल अङ्गोंसे कन्दर्प महोत्सवका सम्पादन
कर रहे हैं। गोपियोंकी जितनी भी अभिलाषाएँ हैं, उससे
भी कहीं अधिक उनकी उन्मत्त लालसाओंको अति
अनुरागके साथ तृप्त कर रहे हैं, परन्तु व्रजसुन्दरियाँ
विपरीत रतिरसमें आविष्ट हो विवश होकर उनके
प्रत्येक अङ्ग-प्रत्यङ्गका सम्यक् एवं स्वतन्त्र रूपसे
आलिङ्गन कर रही हैं॥ 143 ॥
284 ।
आठवाँ अध्याय 8/143-146 ]
अनुभाष्य—आदिलीला 4/224 संख्या देखें ॥ 143 ॥
श्रीकृष्णका रूप-माधुर्य नारायण और
लक्ष्मीको भी आकर्षित करता है :-
लक्ष्मीकान्तादि अवतारेर हरे मन।
लक्ष्मी-आदि नारीगणेर करे आकर्षण ॥ 144 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्णका रूप-माधुर्य लक्ष्मीकान्तादि
(श्रीनारायणादि) सभी भगवत्-अवतारों और
भगवत्-स्वरूपोंकी कान्ताएँ लक्ष्मी आदि नारियों, सभीके
मनको आकर्षित करनेवाला है ॥ 144 ॥
अनुभाष्य—आदिलीला 5/223 और मध्यलीला
9/111-156 संख्या देखें ॥ 144 ॥
श्रीमद्भागवत (10/89/58) :—
द्विजात्मजा मे युवयोर्दिदृक्षुणा,
मयोपनीता भुवि धर्मगुप्तये।
कलावतीर्णाववनेर्भरासुरान्,
हत्वेह भूयस्त्वरयेतमन्ति मे ॥ 145 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 145 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—भूमा पुरुषने कहा, - हे कृष्ण-
अर्जुन! आप लोगोंके दर्शनोंकी इच्छासे मैं ब्राह्मण-
कुमारोंको यहाँ लाया हूँ। आप लोग जगत्में धर्मकी
रक्षाके लिये कलाके साथ अवतीर्ण हुए हो और अब
पृथ्वीके भार-स्वरूप असुरोंको मारकर पुनः शीघ्र
आगमन करो।'
तात्पर्य यह है, - भूमापुरुष श्रीलक्ष्मीकान्तने श्रीकृष्णके
माधुर्यसे मुग्ध होकर उनके रूपके दर्शनकी इच्छा
होनेपर ब्राह्मण-कुमारोंको अपहरण करनेके छलसे
श्रीकृष्णके दर्शन प्राप्त किये ॥ 145 ॥
अनुभाष्य—द्वारकामें ब्राह्मणकुमारकी अकाल-मृत्युके
हाथसे रक्षा करनेके लिये प्रतिज्ञाबद्ध अर्जुनकी चेष्टाको
विफल होते देखकर श्रीकृष्ण अर्जुनको साथ लेकर
ब्राह्मणकुमारको दिखानेके लिये ब्रह्माण्डके बाहर प्रकृतिके
परिणामस्वरूप, भीषण अन्धकारको सुदर्शन-चक्रके प्रभावसे
पार करके बहुत विशाल जलके बीचमें 'महाकालपुर'में
पहुँचे। वहाँ सहस्र फणवाले अनन्तके ऊपर शयन
करनेवाले शेषशायीके दर्शन करके जब उन्होंने अभिवादन
किया, तब परमेष्ठीपति भगवान् शेषशायीने श्रीकृष्ण-
अर्जुनको कहा—
धर्मगुप्तये (धर्मसंरक्षणाय) कलावतीर्णौ (कलाभिः सर्वाभिः
शक्तिभिः अवतीर्णौ प्रकटौ) युवयोः दिदृक्षुणा (दर्शनेच्छुना) मे
(मम) भुवि (महाकालपुरे) द्विजात्मजाः (विप्रकुमाराः) मया
उपनीताः (आनीताः); भूयः पुनरपि अवनेः (पृथिव्याः)
भरासुरान् (भारभूतान् विष्णु-विरोधि-दैत्यान्) हत्वा इह (अत्र)
मे अन्ति (समीपं) त्वरया (शीघ्रमेव) इतम् (आगच्छतम्)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 145 ॥
श्रीमद्भागवत (10/16/36) :—
कस्यानुभावोऽस्य न देव विद्महे
तवाङ्घ्रिरेणुस्पर्शाधिकारः।
यद्वाञ्छया श्रीर्ललनाचरत्तपो विहाय
कामान् सुचिरं धृतव्रता ॥ 146 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 146 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—हे देव! जिनकी चरणरजको
प्राप्त करनेकी वासनासे लक्ष्मीने बहुत समय तक
समस्त प्रकारके विषय-भोगोंका परित्याग करके दृढ़व्रत
धारण करके तपस्या की थी, उस चरणरजको इस
कालिय-नागने किस सुकृतिके द्वारा लाभ करनेका
अधिकार प्राप्त किया, उसे हम नहीं जानती ॥ 146 ॥
अनुभाष्य—कालिय-नाग जब श्रीकृष्णके चरणकमलोंके
प्रहारसे मूर्च्छित हो गया और उसके फण टूट गये थे,
तब श्रीकृष्णका स्तव करते हुए नागपत्नियोंने कहा—
यद्वाञ्छया (यत् यस्य पादपद्मरेणुस्पर्शाधिकारस्य वाञ्छया
इच्छया) श्रीः (ब्रह्मादिसेव्या लक्ष्मीः) ललना (उत्तमा स्त्री
अस्मद्-गरीयसी) [अपि सर्वान्] कामान् विहाय धृतव्रता
(व्रतनिष्ठा तपस्विनी सती) सुचिरं तपः अचरत्, अस्य
(सर्पयोनि-लब्धजीवस्यापि कालियस्य) तव अङ्घ्रिरेणुस्पर्शाधिकारः
। 285
[ 8/124-148 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
(तादृशदुर्लभपदरजःस्पर्शने अधिकारः सामर्थ्यं) कस्य (सुकृतस्य)
अनुभावः (फलं),—[वयम् एतत्] न विद्महे (जानीमः)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 146॥
अपने माधुर्यके द्वारा श्रीकृष्ण स्वयं ही मुग्ध :-
आपन-माधुर्ये हरे आपनार मन।
आपना आपनि चाहे करिते आलिङ्गन ॥ 147॥
अनुवाद—श्रीकृष्णका ऐसा अनुपम माधुर्य है कि
वह उनके स्वयंके मनका हरण कर लेता है और वे
स्वयं ही स्वयंका आलिङ्गन करना चाहते हैं॥ 147॥
अनुभाष्य—आदिलीला 4/148-158 संख्या देखें॥ 147॥
श्रीराधिकाकी भाँति अपने माधुर्यको आस्वादन
करनेकी स्वयंकी ही व्यग्रता :—
श्रीललितमाधव (8/34)—
अपरिकलितपूर्वः कश्चमत्कारकारी
स्फुरति मम गरीयानेष माधुर्यपूरः।
अयमहमपि हन्त प्रेक्ष्य यं लुब्धचेताः
सरभसमुपभोक्तुं कामये राधिकेव ॥ 148॥
अनुवाद—श्रीकृष्ण बोले—“अहो ! यह प्रगाढ़
माधुर्य-चमत्कारकारी अनिर्वचनीय चित्रित श्रेष्ठ पुरुष
कौन है? इनपर दृष्टि पड़ते ही मैं क्षुब्धचित्तसे इन्हें
देखता ही जा रहा हूँ और राधिकाकी भाँति इनका
बलपूर्वक आलिङ्गन करनेकी इच्छा हो रही है॥”148॥
अनुभाष्य—आदिलीला 4/146 संख्या देखें ॥ 148॥
अमृताणुकणिका—“श्रीकृष्णका नित्य विग्रह
सच्चिदानन्दमय है। सामान्य रूपमें भगवान्के छह
प्रकारके ऐश्वर्य हैं। (विष्णुपुराण 6/5/47)—‘ऐश्वर्यस्य
समग्रस्य...’—अपार ऐश्वर्य, असीम वीर्य (पराक्रम),
अनन्त यश, अपूर्व श्री (शोभा), पूर्णज्ञान (सर्वज्ञता)
तथा पूर्ण वैराग्य—ये भगवान्के स्वरूपगत गुण हैं।
श्रीकृष्ण चिन्मय जगत्के सूर्य-स्वरूप प्रकाशमान
तथा चन्द्रस्वरूप आनन्द-विस्तारक हैं। श्रीकृष्णका
स्वरूप नित्य-सिद्ध है; उनका वह स्वरूप, उनका धाम,
उपकरण, परिकरवृन्द और उनके लीला-विलास सभी
चिन्मय, नित्य, परम उपादेय, निर्दोष और परम विशुद्ध
हैं। माधुर्य प्रधान प्रकाश ब्रजधाममें श्रीकृष्ण नित्य
ब्रजलीला विलासी हैं।
‘वृन्दावने अप्राकृत नवीन मदन’—श्रीकृष्ण वृन्दावनमें
अप्राकृत नवीन मदन हैं। एक है—‘प्राकृत मदन’
अथवा कामवेग। यह मायाकी एक वृत्ति है, जो मनमें
उदित होकर समस्त इन्द्रियोंको क्षुब्ध कर देता है। पूर्व
जन्मके संस्कारों, मायिक वस्तुओंके सङ्गके कारण
इसका प्रकाश होता है। यह विषयोंकी ओर ही दौड़ता
है और अपने सुखके लिये होता है; यह नरककी ओर
ले जाता है। दूसरा होता है—‘अप्राकृत मदन अथवा
काम’, यह स्वरूपशक्तिकी ह्लादिनी-संवित् वृत्तिसे निर्मित
है और इसका उद्गम श्रीकृष्णसे है, अतः यह श्रीकृष्ण
तक पहुँचाता है। अप्राकृत कामका अर्थ है स्वसुखरहित
श्रीकृष्णसेवाकी वासना। ब्रजमें गोपियोंका प्रेम ही ‘काम’
नामसे जाना जाता है, क्योंकि अप्राकृत कामके विषय
सच्चिदानन्द स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण हैं। वहाँ काम और
प्रेम एक ही तात्पर्यमय है।
श्रीकृष्णका अनुपम अलौकिक मदन-मोहन रूप
पुरुष, स्त्री, किम्वा स्थावर-जङ्गम, समस्त सृष्टिके
मनको आकर्षित करनेवाला है। श्रीरूप गोस्वामीने
श्रीभक्ति-रसामृतसिन्धु श्लोक (2/1/23-43) ‘अयं नेता
सुरम्याङ्गः ...गोविन्दस्य चतुष्टयम्’ में श्रीकृष्णके असंख्य
गुणोंमेंसे चौंसठ गुणोंका निरूपण किया है, जो केवल
दिग्दर्शन मात्र है, जैसे—नायक शिरोमणि श्रीकृष्णके अङ्ग
अत्यन्त सुरम्य हैं अर्थात् इनका अङ्गसन्निवेश अतिशय
रमणीय है, वे सर्वसुलक्षणयुक्त हैं; रुचिर हैं अर्थात्
इनका सौन्दर्य नेत्रोंको आनन्द देनेवाला है; तेजसान्वित
अर्थात् वे अतिशय प्रभावयुक्त हैं; बलीयान् अर्थात्
अतिशय बलवान हैं; ‘वयसान्वितः’ अर्थात् उनकी
नानाविध विलासमय नवकिशोर अवस्था है।
श्रीकृष्णमें किशोर अवस्थाका उदय आठ वर्षमें
होने लगता है। इसके पूर्व उन्होंने आदि-कैशोरमें
286 ।
आठवाँ अध्याय 8/124-148 ]
कलिय-दमन लीला की और मध्य कैशोरमें गोवर्धन-धारण
लीला की। उनकी इन दोनों ही लीलाओंमें अपूर्व
पराक्रमका प्रदर्शन है, जिसने व्रज-वल्लभीयोंके हृदयमें
अपूर्व रसका सञ्चार करके उनके हृदयके प्रेमको पुष्ट
और वर्धित किया। क्योंकि वीर-रस सदैव शृङ्गाररसका
पोषक होकर रहता है। श्रीकृष्णमें पूर्ण कैशोरका उदय
नवम वर्षमें होता है। इसी अवस्थाको सफल करते हुए
वे रासलीलादि सम्पन्न करते हैं।
श्रीकृष्णके चौंसठ गुणोंमेंसे पचास गुण भगवान्के
अनुगृहीत पुरुषोंमें बिन्दु-बिन्दु रूपमें पाये जाते हैं।
साधारण व्यक्तियोंमें भी इनके बिन्दुका आभास-मात्र
जानना चाहिये। इनके अतिरिक्त पाँच गुण सदाशिव
आदिमें आंशिक रूपमें तथा अन्य पाँच गुण श्रीनारायणमें
भी प्रकाशित होते हैं। किन्तु श्रीकृष्णमें ये सभी गुण
परिपूर्णतम मात्रामें नित्यकाल विराजमान रहते हैं। इनके
अतिरिक्त चार असाधारण गुण-लीला-
माधुरी, रूप-माधुरी, प्रेम-माधुरी और वेणु-माधुरी केवल
ब्रजविलासी व्रजेन्द्रनन्दन-श्रीकृष्णमें ही पाये जाते हैं।
श्रीकृष्णके ये चार असाधारण गुण अन्य किसी
भगवत्-स्वरूपमें नहीं होते, यहाँ तक कि मधुरेश और
द्वारकाधीश श्रीकृष्णमें भी ये नहीं होते। इसी कारण
श्रीनारायण या अन्य भगवत्-स्वरूपोंमें अभेद होते हुए
भी रसके उत्कर्षमें व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण सर्वोपरि हैं।
- 'लीला माधुर्य'—श्रीकृष्णकी प्रत्येक लीला अद्भुत
दिव्यातिदिव्य रस-प्रवाही है। रसिकशेखर रसस्वरूप
श्रीकृष्ण अपनी समस्त लीलाओंमें रासलीलाका ही
सर्वाधिक रूपमें आस्वादन करते हैं। श्रीबृहद्वामन
पुराणमें श्रीकृष्णके वचन-
“सन्ति यद्यपि मे प्राज्या लीलास्तास्ता मनोहराः।
न हि जाने स्मृते रासे मनो मे कीदृशं भवेत् ॥ ”
अर्थात् “यद्यपि मेरी अनेक प्रकारकी मनोहारी
प्रचुर लीलाएँ विद्यमान हैं, तो भी रासलीलाका स्मरण
करते ही मेरा मन जिस प्रकार भावापन्न होता है, उसे
मैं व्यक्त नहीं कर सकता।” - 'प्रेम माधुर्य' - श्रीकृष्ण अपने सभी रसाश्रित
प्रेमीजनोंको अपने प्रेमसे मण्डित करते हैं। इस विषयमें
सखाओंके प्रेमका वर्णन भागवत (10/12/11) - 'इत्थं
सतां...', आदि श्लोकोंमें देखा जाता है। व्रजके
गोप-बालकोंका नित्यसिद्ध निर्मल सख्य-प्रेम जगत्में
अतुलनीय है। श्रीकृष्ण भी इनके प्रेमके अधीन होकर
अनेक प्रकारके क्रीड़ा-रसका आस्वादन करते हैं।
खेलमें हार जानेपर श्रीकृष्ण सखाओंको कन्धेपर
बैठाकर ले जाते हैं और कभी उनका जूठा खाते हैं,
जिसे देखकर ब्रह्माजी भी मोहित हो जाते हैं।
वात्सल्य रसके प्रेमीजनों यथा श्रीनन्द-यशोदा
आदिके प्रेम और भाग्यकी महिमा भागवतके
(10/14/32)-'अहो भाग्यमहो...', (10/9/20)- 'नेमं विरिञ्चो
न भवो...' आदि श्लोकोंमें वर्णित है। श्रीनन्दादि
व्रजवासियोंके धन्य भाग्य हैं, क्योंकि परमानन्दस्वरूप
परंब्रह्म श्रीकृष्ण उनके सगे-सम्बन्धी और सुहृद् हैं।
अपने प्रति चमत्कारमय असाधारण वात्सल्य प्रेमके
कारण श्रीकृष्ण माता यशोदाकी डाँट-डपट सुनते हैं
और उनके द्वारा रस्सीसे भी बँध जाते हैं। ऐसा
सौभाग्य शिव, ब्रह्मा और यहाँ तक कि लक्ष्मीको भी
नहीं प्राप्त हुआ है।
श्रीकृष्णप्रेममें आविष्ट गोपियोंने गोपीगीतके श्लोक
(10/31/15)में कहा है- “अटति यद्भवानह्नि.....” अर्थात्
हे प्रियतम ! दिनके समय जब तुम वनमें विहारके लिये
चले जाते हो, तब तुम्हारे अदर्शनसे हमें आधे क्षणका
समय भी युगके समान प्रतीत होता है। संध्याके समय
तुम्हारे लौटनेपर हम घुँघराले केशोंसे सुशोभित तुम्हारा
परम सुन्दर मुख निहारने लगती हैं। उस समय
पलकोंका गिरना भी हमारे लिये असहनीय हो जाता
है और हमें ऐसा जान पड़ता है कि नेत्रोंपर पलकें
बनानेवाला विधाता मूर्ख है।
उद्धवजी भी गोपियोंके असाधारण प्रेमको देखकर
आश्चर्यचकित होकर 'नायं श्रियोऽङ्ग' आदि श्लोकोंमें
उनकी महिमाका गान कर रहे हैं।
। 287
[ 8/124-148 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
3) 'वेणु माधुर्य'—
भागवत (10/35/15)—'सवनशस्तदुपधार्य सुरेशा:'—
“श्रीकृष्णकी मधुर वंशीध्वनिको सुनकर इन्द्र, शिव,
ब्रह्मादि स्वयं सुपण्डित होते हुए भी राग, ताल,
स्वरादिके तत्त्व निर्णय करनेमें असमर्थ हो जाते हैं और
मोहको प्राप्त होकर अपनी गर्दन झुकाकर तन्मय हो
जाते हैं।”
श्रीकृष्णकी सर्वाकर्षिणी वेणु-ध्वनि सुनकर गोपियाँ
उन्मत्त होकर लोक-लज्जा, धैर्य, मर्यादा आदि सबको
जलाञ्जली देकर अपने घरोंसे निकल पड़ती हैं।
वेणुनादके द्वारा अपहृत चित्तके कारण वे गृहकार्योंको
अथवा शृङ्गारादिको अधूरा छोड़कर, वस्त्रोंको उल्टा-सीधा
धारणकर तथा उन्मादग्रस्त होकर श्रीकृष्ण जहाँ वेणु
वादन कर रहे हैं, उधर द्रुत गतिसे चल पड़ती हैं।
और भी, वाम्य-स्वभाववाली मानिनियोंके दुर्जय मानको
वंशी ही भङ्ग करनेमें समर्थ है। इस प्रकार व्रजमें वंशी
श्रीकृष्णके अनेक कार्य सिद्ध करनेके कारण
सर्वकार्य-साधिका है।
4) 'रूप माधुर्य'—
भागवत (3/2/12)में उद्धवजीके विदुरसे कहे
वचन—'यन्मर्त्यलीलौपयिकं...' अर्थात् 'श्रीकृष्णकी यह
दिव्य मूर्ति इतनी रमणीय है कि इसे देखकर श्रीकृष्ण
स्वयं भी विस्मित हो जाते हैं। यह श्रीविग्रह सौन्दर्यकी
पराकाष्ठा-स्वरूप तथा समस्त भूषणोंका भूषण-स्वरूप
है अर्थात् समस्त लौकिक दृश्योंसे अलौकिक और
अलौकिक दृश्योंसे परम लौकिक है।'
श्रीकृष्णका विग्रह गोलोकका नित्यधन है। इस
प्रपञ्चात्मक जगत्में उन्होंने अपनी उस मूर्तिको योगमायाके
प्रभावके द्वारा प्रकट किया है। उनका यह दिव्य विग्रह
मर्त्यजगत्के लिये उपयोगी है।
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्त्ती ठाकुरने अपनी टीकामें
कहा है कि 'मर्त्यजगत्के लिये उपयोगी', ऐसा माननेसे
श्रीविग्रहका अपकर्ष नहीं होता। वास्तवमें वैकुण्ठलीलाके
स्वरूपोंसे भी इस जगत्में प्रकाशित श्रीविग्रहका अत्यधिक
उत्कर्ष ही है। इसलिये कह रहे हैं-'स्वयोगमायाबलं'
अर्थात् योगमायाने कुछ ऐश्वर्य या माधुर्यको गोपन
करके इसे प्रकाशित नहीं किया, अपितु सबकुछ ही
इस श्रीविग्रहमें संयोजित हुआ है। अधिक क्या
वैकुण्ठमें भी इस प्रकारका सामर्थ्य योगमायाके द्वारा
प्रदर्शित नहीं हुआ है।
गोपियोंकी उक्ति भागवत (10/29/40) 'का स्त्र्यङ्ग
ते कलपदायत' अर्थात् 'हे कृष्ण! तीनों लोकोंमें ऐसी
कौन-सी रमणी है, जो मधुर-मधुर पद और आरोह-अवरोह
क्रमसे विविध प्रकारकी मूर्च्छनाओंसे युक्त तुम्हारी
वंशीकी तानको सुनकर तथा त्रिभुवनके सौभाग्यरूप
तुम्हारे इस त्रिभङ्ग-ललित श्यामसुन्दर रूपको अपने
नेत्रोंसे निहारकर सर्वथा मोहित होकर अपनी आर्य-मर्यादासे
विचलित न हो जाय-नारीधर्म और लोक लज्जाको
त्यागकर तुममें अनुरक्त न हो जाय? स्त्रियोंकी बात
ही क्या है, तुम्हारा त्रिभुवन-मोहन रूप तथा मुरली
सङ्गीत ऐसा मोहक है कि इसे देख-सुनकर गौएँ, पक्षी,
वृक्ष और मृग आदि प्राणी भी परमानन्दसे पुलकित हो
जाते हैं।'
श्रीकृष्णमें विरुद्ध धर्माश्रयका गुण होनेके कारण
श्रीकृष्णमें धीरोदात्त, धीरललित, धीरप्रशान्त और
धीरोद्धत्त-चारों प्रकारका नायकत्व है। लीलाशक्ति
श्रीकृष्णकी इच्छानुसार इन्हें प्रकट करती है। (भःरःसिः
1/1/1)—
“अखिलरसामृतमूर्तिः प्रसृमररुचिरुद्धतारकापालिः।
कलितश्यामा-ललितो राधाप्रेयान् विधुर्जयति॥
“श्रीकृष्णचन्द्र अखिल रसामृतमूर्ति हैं, समस्त द्वादश
रसोंके विषय हैं, परम सुन्दर हैं, मन्मथके भी मनको
मथनेवाले हैं तथा इनकी रुचि अर्थात् कान्ति, सौन्दर्य,
गुणावली, रूपछटा, प्रभा व्याप्त होकर तारका और
पाली नामक साधारणी गोपियोंको, (सुहृत्-पक्षा) श्यामा
और (स्वपक्षा) ललिता आदि प्रमुख गोपियोंको भी
वशीभूत कर लेती है। श्रीकृष्ण श्रीराधासे अत्यन्त प्रेम
करते हैं, ऐसे श्रीराधाके प्रियतम श्रीकृष्ण जययुक्त हों।”
288 ।
आठवाँ अध्याय 8/124-148 ]
इस श्लोकमें श्रीरूप गोस्वामीने श्रीराधाकी सखियों
ललिता और श्यामाके नाम दिये हैं। श्रीराधाके साथ
श्रीकृष्णके स्वच्छन्द विहारमें इनके द्वारा रसपुष्टिका
योगदान होता है। ये दोनों ही यूथेश्वरियाँ हैं।
श्रीकृष्ण वृन्दावनमें अप्राकृत नवीन मदन हैं और
उनकी उपासना कामगायत्री और कामबीजके द्वारा होती
है। 'कम' धातुसे काम शब्दकी निष्पत्ति होती है।
कामका अर्थ है—जिसकी कामना की जाय, अभिलाषा
की जाय। श्रीकृष्णकी ही कामना सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि
वे अतिशय रूपवान हैं, अत्यन्त मधुर हैं, उनका यह
सौन्दर्य और माधुर्य क्षण-क्षणमें नित्य नवीन अनुभव
होता है। अतः वे अप्राकृत नवीन मदन हैं, उनका यह
स्वरूप प्रकृतिसे अतीत है। यह अप्राकृत मदन स्वरूप
उपासकोंके हृदयमें तीव्र कामना उत्पन्न करके उन्हें मत्त
कर देता है। श्रीकृष्ण परम करुण और रसिकशेखर
हैं। वे रस स्वरूप हैं। रस शब्दके दो अर्थ होते
हैं—आस्वाद्य 'रस' और रस-आस्वादक 'रसिक'। वे
रस-रूपमें आस्वाद्य हैं और रसिक-रूपमें वे आस्वादक
हैं। उसी 'रसस्वरूप' रूपमें श्रीकृष्णको प्राप्त करनेके
लिये कामबीज और कामगायत्रीके द्वारा उनकी उपासना
की जाती है। कामगायत्री श्रीकृष्णका ही स्वरूप है। इस
रसमय ब्रह्मकी उपासना कामबीजयुक्त कृष्णमन्त्र 'गोपालमन्त्र'
और कामगायत्रीके द्वारा ही सिद्ध होती है। बीजयुक्त
होनेपर ही मन्त्र सम्पूर्ण होता है।
कामबीज, 'क्लीं'—यह आदि एकाक्षर बीज या
कामबीज है। श्रीबृहद्गौतमीय तन्त्र तथा उपनिषदोंमें
इसका अर्थ इस प्रकार है। श्रीभगवान्ने 'क्लीं'—इस
कामबीजके द्वारा इस जगत्की सृष्टि की। इस बीजके
अन्तर्गत 'क'-कारसे जल, 'ल'-कारसे भूमि, 'ई'-कारसे
अग्नि तथा नाद अर्थात् चन्द्रसे वायु एवं बिन्दुसे
आकाश उत्पन्न हुआ है। इसलिये कामबीजात्मक मन्त्र
ही समस्त प्राणियोंका मूल कारण है।
रागमार्गके अनुसार मन्त्रार्थ—'क'-कारसे सच्चिदानन्द-
विग्रह परम पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण, 'ल'-कारसे
श्रीराधाकृष्णके प्रेम-जनित परमानन्द सुख-समुद्र, 'ई'-कारसे
नित्य वृन्दावनेश्वरी सर्वप्रेयसी शिरोमणि परमा प्रकृति
श्रीराधा तथा चन्द्रबिन्दुसे श्रीराधाकृष्णका परस्पर चुम्बनानन्द
माधुर्य।
कृष्णमन्त्र या गोपाल-मन्त्र पाँच भागोंमें विभक्त
है—
- 'कृष्णाय'—श्रीकृष्ण अपनी वेणु, रूप, लीला
आदिके अतुलनीय माधुर्य प्रवाहसे त्रिजगत्के
स्थावर-जङ्गमादि सबके चित्तको आकर्षित करते हैं।
इस प्रकार श्रीकृष्णके भुवनमोहन स्वरूपके साथ
साधकका सम्बन्ध होता है। - 'गोविन्दाय'—श्रीकृष्ण नन्द-गोकुलमें मनोहर
नवजलधरवर्ण श्यामसुन्दर रूपमें अपनी मधुर लीलाका
विस्तार करते हैं। नयन, कर्ण आदि समस्त इन्द्रियों
और हृदयको उल्लसित करनेवाले गोविन्दकी साधक
अपनी समस्त इन्द्रियोंके द्वारा आराधना करता है,
अर्थात् अभिधेय तत्त्वमें प्रतिष्ठित होता है। - 'गोपीजन'—'गोपी' श्रीकृष्णकी एक विशेष ह्लादिनी
शक्ति है। यह भक्तोंको प्रेम प्रदानकर उनका पालन-पोषण
करती हैं। श्रीराधा ही ह्लादिनी शक्ति-स्वरूपिणी हैं।
इसलिये 'गोपी' शब्दसे मूलप्रकृति श्रीराधा तथा 'जन'
शब्दसे श्रीराधाकी कायव्यूहरूपा ललिता, विशाखा आदि
सखियोंका बोध होता है। - 'वल्लभाय'—जो सर्वश्रेष्ठ नायकके रूपमें गोपियोंके
साथ परम मधुर लीला-विलास करते हैं, वे ही
गोपीजनवल्लभ श्रीराधिका और उनकी सखियोंके प्राणप्रियतम
हैं। गोपीजनवल्लभ ही इस मन्त्रके प्रयोजन-तत्त्व हैं। - 'स्वाहा'—यह श्रीकृष्णकी स्वरूपभूता चिद् शक्ति
योगमाया हैं, जो भक्तोंको श्रीकृष्णके पादपद्मोंमें समर्पण
करती हैं। 'स्वाहा' पदके उच्चारणसे ही श्रीराधाकृष्ण
युगलमें सम्पूर्ण रूपसे आत्मसमर्पण होता है।
'कामगायत्री'—यह ब्रह्म गायत्रीका ही सिद्ध स्वरूप
परिपक्व फल है। यह श्रीकृष्णका ही स्वरूप है और
रसमय ब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाला है। इसे कृष्णगायत्री
। 289
[ 8/124–152 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
न कहकर कामगायत्री इसलिये कहा गया, क्योंकि इसमें
सम्मिलित 'काम' नाम केवल मधुर भावमें ही ग्रहण
किया जाता है। श्रीकृष्णकी सर्वोत्कृष्ट अवस्थाका नाम
'काम' है। वही कामदेव अनङ्गके रूपमें हैं।
कामगायत्रीमें साढ़े चौबीस अक्षर हैं, जो श्रीकृष्णके
अङ्गोंमें साढ़े चौबीस चन्द्रोंको लक्ष्य करते हैं, यथा—एक
मुखचन्द्र, दो गण्ड(कपोल), एक चन्दन बिन्दु, अर्धचन्द्र
ललाट तथा बीस चन्द्र हस्त तथा पदके नख। उनका
ललाट केशोंसे आधा ढका हुआ होता है, इसलिये उसे
अष्टमीका अर्धचन्द्र कहा गया है। काम गायत्रीमें 'वि'के
पूर्व जो 'य' है, वही अर्धाक्षर माना गया है और
ललाटकी स्थिति भी मन्त्रमें इसी स्थानपर है। श्रीकृष्णके
विषयमें अर्धचन्द्र भी पूर्ण ही है, क्योंकि श्रीकृष्ण
अखण्ड हैं। श्रुतिके 'ॐ पूर्णमदं' श्लोकके अनुसार
श्रीकृष्णका एक अंश और कला भी परिपूर्ण है।
श्रीकृष्णके अङ्ग-स्थित ये चन्द्र उदित होकर त्रिजगत्को
काममय करते हैं, सबके हृदयमें श्रीकृष्णसेवा सुख
वासनाका उद्दीपन कराते हैं।
कामगायत्री सभी गायत्रियोंमें सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि
उसमें जो ध्यान और प्रार्थना है वह सम्पूर्ण रूपसे
चिद्-विलासमय है, जो अन्य किसी गायत्रीमें नहीं है।
इस गायत्रीमें श्रीगोपीजनवल्लभके परिपूर्ण ध्यानके पश्चात्
उनकी लीलाकी स्फूर्ति और उस अप्राकृत अनङ्गको
प्राप्त करनेकी प्रार्थना होती है। व्रजगोपियोंसे परिवेष्ठित
श्रीमती राधिकाके सङ्ग लीलाविलासी नवीन मदन
श्रीकृष्णको सुख देनेकी कामनामें तन्मय हो जाना ही
कामबीज उपासनाका तात्पर्य है।
गोपाल-मन्त्रके कृष्ण, गोविन्द और गोपीजनवल्लभ
कामगायत्रीमें इस प्रकार अवस्थित हैं—'कृष्ण'—कामदेव,
'गोविन्द'—पुष्पबाण और 'गोपीजनवल्लभ'—अनङ्ग।
कामबीजके अन्तर्गत पञ्चाक्षर ही श्रीकृष्णके पञ्चबाण
हैं। श्रीकृष्णकी सेवाके लिये बलवती वासना ही
पञ्चबाणकी क्रिया है। रूप, रस, शब्द, गन्ध, स्पर्शके
द्वारा आस्वादन ही पुष्पबाण हैं। श्रीकृष्ण ही साक्षात्
मन्मथ-मन्मथ अनङ्ग हैं। वे अपनी कन्दर्परूप लीलाको
प्रकट करके त्रिभुवनको जय करते हैं।
साधकगण कामगायत्री उपासनाके द्वारा व्रजमें विराजित
श्रीराधाकृष्णका सेवासुख लाभ करते हैं।”—श्रीभक्तिवेदान्त
नारायण गोस्वामी ॥ 124-148 ॥
(2) श्रीराधिकाके तत्त्वका वर्णन आरम्भ :—
एइ त' संक्षेपे कहिल कृष्णेर स्वरूप।
एबे संक्षेपे कहि राधा-तत्त्वरूप ॥ 149 ॥
श्रीकृष्णकी तीन शक्तियाँ :—
कृष्णेर अनन्त-शक्ति, ताते तिन-प्रधान।
'चिच्छक्ति', 'मायाशक्ति', 'जीवशक्ति'—नाम ॥ 150 ॥
'अन्तरङ्गा', 'बहिरङ्गा', 'तटस्था' कहि यारे।
अन्तरङ्गा 'स्वरूप शक्ति'—सबार उपरे ॥ 151 ॥
अनुवाद—(श्रीरामानन्द रायने कहा—) इस प्रकार
संक्षेपमें मैंने श्रीकृष्णके स्वरूपका वर्णन किया। अब
श्रीराधा-तत्त्वका स्वरूप संक्षेपमें सुनिये। श्रीकृष्णकी
अनन्त शक्तियाँ हैं, उनमेंसे तीन शक्तियाँ प्रधान
हैं—'चित्-शक्ति', 'मायाशक्ति' और 'जीवशक्ति'। इन्हें
क्रमशः 'अन्तरङ्गा', 'बहिरङ्गा' और 'तटस्था' भी कहते
हैं। इन सभीमें अन्तरङ्गा अर्थात् 'स्वरूप शक्ति' प्रधान
है॥ 149-151 ॥
अनुभाष्य—आदिलीला 2/101-103 संख्या, 5/42,
45, 57-58 संख्या देखें ॥ 151 ॥
विष्णुपुराण (6/7/61) :—
विष्णुशक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथापरा।
अविद्या कर्मसंज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते ॥ 152 ॥
अनुवाद—विष्णुशक्ति—परा, क्षेत्रज्ञा और अविद्या
नामक, तीन प्रकारकी है। विष्णुकी पराशक्ति ही
'चित्-शक्ति' है, क्षेत्रज्ञा-शक्ति ही जीवशक्ति है (जिसको
मायारूपा 'अविद्या' से 'अपरा' अर्थात् भिन्ना कहा गया
है) और कर्म नामक अविद्या-शक्तिका नाम 'माया'
है॥ 152 ॥
290 ।
आठवाँ अध्याय 8/152-161 ]
अनुभाष्य-आदिलीला 7/119 संख्या देखें ॥ 152 ॥
श्रीकृष्णके स्वरूपसे अभिन्न स्वरूपशक्ति :-
सच्चिदानन्दमय कृष्णेर स्वरूप।
अतएव स्वरूप-शक्ति हय तिन रूप ॥ 153 ॥
स्वरूपशक्तिके तीन रूप :-
आनन्दांशे 'ह्लादिनी', सदंशे 'सन्धिनी'।
चिदंशे 'सम्वित्', यारे ज्ञान करि' मानि ॥ 154 ॥
अनुवाद-श्रीकृष्णका स्वरूप सच्चिदानन्दमय (सत्,
चित् और आनन्दमय) है, इसलिये उनकी स्वरूपशक्तिके
भी तीन रूप हैं। वह स्वरूप-शक्ति आनन्द-अंशसे
'ह्लादिनी', सत्-अंशसे 'सन्धिनी' और चित्-अंशसे
'सम्वित्', जिसको ज्ञान भी कहा जाता है, -इन तीन
रूपोंको धारण करती है ॥ 153-154 ॥
विष्णुपुराण (1/12/69) :-
ह्लादिनी सन्धिनी सम्वित् त्वय्येका सर्वसंश्रये।
ह्लादतापकरी मिश्रा त्वयि नो गुणवर्जिते ॥ 155 ॥
अनुवाद-हे भगवन्! आप सभीके आश्रय और
निर्गुण हैं। आपमें स्थित त्रिविधरूप शक्ति 'ह्लादिनी',
'सन्धिनी' और 'सम्वित्', तीनों चिन्मय हैं। मायाके
वशमें होने योग्य चित्-कण जीव जब मायामें आविष्ट
होकर मायाके तीन गुणोंका आश्रय करते हुए जिस
अवस्थाको प्राप्त करते हैं, उस अवस्थामें वह शक्ति
'ह्लादकारी', 'तापकरी' और 'मिश्रा'-इन तीन प्रकारके
भावोंको प्राप्त करती है। किन्तु सभी गुणोंसे अतीत
आपमें यह शक्ति निर्मल और निर्गुणस्वरूपमें एकाकार
होकर रहती है ॥ 155 ॥
अनुभाष्य-आदिलीला 4/61-63 संख्या
देखें ॥ 153-155 ॥
ह्लादिनी-संज्ञाका कारण और कार्य :-
कृष्णेके आह्लादे, ता'ते नाम- 'आह्लादिनी'।
सेइ शक्ति-द्वारे सुख आस्वादे आपनि ॥ 156 ॥
सुखरूप कृष्ण करे सुख आस्वादन।
भक्तगणे सुख दिते 'ह्लादिनी'-कारण ॥ 157 ॥
अनुवाद-जो शक्ति श्रीकृष्णको आनन्द प्रदान
करती है, उसका नाम 'आह्लादिनी' है। उस शक्तिके
द्वारा श्रीकृष्ण स्वयं सुखका आस्वादन करते हैं। स्वयं
सुखरूप होनेपर भी श्रीकृष्ण ह्लादिनी-शक्तिके द्वारा सभी
प्रकारके सुखोंका आस्वादन करते हैं और वे भक्तोंको
भी ह्लादिनी-शक्तिके द्वारा सुख प्रदान करते हैं ॥ 156-157 ॥
अनुभाष्य-आदिलीला 4/59-60 संख्या
देखें ॥ 156-157 ॥
ह्लादिनी और श्रीराधिका :-
ह्लादिनीर सार अंश, तार 'प्रेम' नाम।
आनन्दचिन्मयरूप रसेर आख्यान ॥ 158 ॥
प्रेमेर परम-सार 'महाभाव' जानि।
सेइ महाभावरूपा राधा-ठाकुराणी ॥ 159 ॥
अनुवाद-ह्लादिनीके सार अंशका नाम 'प्रेम' है।
प्रेमकी व्याख्या करनेपर इसे आनन्दचिन्मयरस भी कहा
जाता है। प्रेमका परम सार 'महाभाव' है, वही
महाभावरूपा श्रीराधा-ठाकुरानी हैं ॥ 158-159 ॥
उज्ज्वलनीलमणिमें राधा-चन्द्रावलीके
तारतम्य-वर्णनमें (4/3) -
तयोरप्युभयोर्मध्ये राधिका सर्वथाधिका।
महाभावस्वरूपेयं गुणैरतिवरीयसी ॥ 160 ॥
अनुवाद-श्रीराधा और श्रीचन्द्रावलीके मध्यमें भी
श्रीराधा ही सभी प्रकारसे श्रेष्ठा हैं। वे महाभावस्वरूपिणी
हैं अर्थात् उनका विग्रह महाभावमय हैं, क्योंकि वे
ह्लादिनी शक्तिकी सारांश हैं और गुणोंमें भी अत्यन्त
श्रेष्ठा हैं ॥ 160 ॥
श्रीराधाका 'स्वरूप' और 'देह' एक ही वस्तु,
वह सम्पूर्ण श्रीकृष्णप्रेममय :-
प्रेमेर 'स्वरूप'-'देह'-प्रेमेर भावित।
'कृष्णेर प्रेयसी-श्रेष्ठ' जगते विदित ॥ 161 ॥
। 291
[ 8/147-164 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद-श्रीराधाजीकी देह प्रेम-स्वरूप है अर्थात्
वह प्रेमसे ही गठित है। श्रीकृष्णकी समस्त प्रेयसियोंमें
वे श्रेष्ठतमा हैं, यह बात सारा जगत् जानता है॥161॥
अमृतप्रवाह भाष्य-यहाँ आदिलीलाके चौथे अध्याय
पर ठीकसे विचार करनेपर यह सब विषय अच्छेसे
समझ आ जायेंगे॥ 147-161॥
ब्रह्मसंहिता (5/37) :-
आनन्दचिन्मयरस-प्रतिभाविताभि-
स्ताभिर्य एव निजरूपतया कलाभिः।
गोलोक एव निवसत्यखिलात्मभूतो
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥ 162॥
अनुवाद-आनन्द चिन्मयरसके द्वारा प्रतिभाविता,
अपने चित्-रूपके अनुरूपा, चिन्मयरसस्वरूपा, चौंसठ
कलाओंसे युक्ता, ह्लादिनीशक्तिस्वरूपा श्रीराधा और उनकी
कायव्यूहस्वरूपा सखियोंके साथ जो अखिलात्मभूत
गोविन्द अपने गोलोकधाममें निवास करते हैं, ऐसे
आदिपुरुष श्रीगोविन्दका मैं भजन करता हूँ॥162॥
अनुभाष्य-आदिलीला 4/68-72 संख्या
देखें॥158-162॥
श्रीराधा श्रीकृष्णकी वाञ्छाको पूर्ण करनेवाली,
अष्टसखियाँ-उनकी कायव्यूह :-
सेइ महाभाव हय 'चिन्तामणि-सार'।
कृष्ण-वाञ्छा पूर्ण करे एइ कार्य ताँर ॥ 163 ॥
'महाभाव-चिन्तामणि' राधार स्वरूप।
ललितादि सखी-ताँर कायव्यूहरूप ॥ 164 ॥
अनुवाद-यही महाभाव चिन्तामणिका सार है;
श्रीकृष्णकी समस्त वाञ्छाओंको पूर्ण करना ही इसका
कार्य है। 'महाभाव-चिन्तामणि' श्रीराधाजीका स्वरूप है
और श्रीललिता आदि सखियाँ उनकी कायव्यूहरूपा
हैं॥163-164॥
अनुभाष्य-आदिलीला 4/79, 87 और 94 संख्या
तथा 5/213 और 215 संख्या देखें॥163-164॥
अमृताणुकणिका-“(उःनीः 14/156-157)-
“मुकुन्दमहिषीवृन्दैरप्यसावतिदुर्लभः ।
व्रजदेव्येकसंवेद्यो महाभावाख्ययोच्यते ॥ 156 ॥
वरामृतस्वरूपश्रीः स्वं स्वरूपं मनो नयेत् ॥ 157 ॥”
अर्थात् रुक्मिणी आदि महिषियोंमें भी महाभाव
अत्यन्त सुदुर्लभ है, यह केवलमात्र श्रीराधा आदि
व्रजदेवियोंके द्वारा अनुभूत है। शृङ्गाररसमें श्रीनन्दनन्दन
विषय-तत्त्वकी और श्रीराधा आश्रय-तत्त्वकी चरम
सीमा हैं। उनका अनुराग ही स्थायीभाव है। अनुराग
ही चरमावस्थामें यावदाश्रयवृत्तिके रूपमें स्वसंवेद्य दशाको
प्राप्त होनेपर 'महाभाव' कहलाता है। महाभाव श्रेष्ठ
अमृतके समान स्वरूप-सम्पत्ति धारणकर चित्तको अपना
स्वरूप प्राप्त कराता है। माधुर्य ही इसकी स्वरूपगत
सम्पत्ति है। यह अतुलनीय माधुर्यमय है।
महाभाव रूढ़ और अधिरूढ़के भेदसे दो प्रकारका
होता है। रूढ़ महाभावमें संयोग और वियोगमें निमेषकालकी
भी असहिष्णुता, निकटवर्ती जनसमूहका हृदय विलोडन,
कल्प-क्षणत्व (मिलनमें एक कल्प भी एक क्षणके
समान प्रतीत होना), श्रीकृष्णके सुखमें आर्त्तिकी आशङ्कासे
खिन्नता, मोहादिके असद्भावमें भी आत्म-विस्मृति,
क्षण-कल्पत्व (वियोगमें एक क्षण भी एक कल्पके
समान लगना) आदि अनुभाव हैं।
जिस समय उक्त अनुभावसमूह रूढ़भावमें कहे गये
अनुभावोंसे भी उत्तरोत्तर किसी विशेष दशाको प्राप्त
होते हैं, उसे अधिरूढ़ महाभाव कहते हैं। यह अधिरूढ़
महाभाव भी मोदन और मादन दो प्रकारका होता है।
जिस अधिरूढ़ महाभावमें नायिका और नायकके
स्तम्भादि सात्त्विक भावसमूह अतिशय उद्दीप्त रूपमें
प्रकाशित होते हैं, उसे मोदन कहते हैं। मोदन ही विरह
अवस्थामें मोहन कहलाता है। मोहन-भावयुक्त प्रेयसीके
प्रभावसे ब्रह्माण्डके सभी लोग क्षुब्ध हो जाते हैं और
पशु-पक्षी भी रोदन करने लगते हैं। यहाँ तक कि
सत्यभामादि महिषियोंके द्वारा आलिङ्गित होनेपर भी
द्वारकेश श्रीकृष्ण श्रीराधाकी मोहन अवस्थाका श्रवण
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