श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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दसवाँ अध्याय कथासार-महाप्रभुने जब दक्षिण भारतकी यात्राके लिये गये, तब उनके विषयमें श्रीसार्वभौमके साथ राजा प्रतापरुद्रकी बहुत बातचीत हुई। राजाने महाप्रभुके दर्शन करनेकी अभिलाषा प्रकट की। तब श्रीसार्वभौमने कहा था कि महाप्रभुके लौटकर आनेपर वे उनके साथ किसी प्रकारसे साक्षात्कार करा देंगे। महाप्रभु लौटकर आनेके बाद काशीमिश्रके घरमें रहने लगे। श्रीसार्वभौमने श्रीमहाप्रभुके साथ क्षेत्रवासी वैष्णवोंका परिचय करा दिया। श्रीरामानन्द रायके पिता श्रीभवानन्द रायने अपने पुत्र श्रीवाणीनाथ पट्टनायकको महाप्रभुको सौंप दिया। जब महाप्रभुने काला कृष्णदासके भट्टथारिसे मिलनके दोषको व्यक्त करके उसे विदायी देनेका प्रस्ताव रखा, तब श्रीनित्यानन्द प्रभु और अन्यान्य भक्तोंने युक्ति करके, उसके द्वारा श्रीनवद्वीपमें एवं गौड़देशमें सर्वत्र महाप्रभुके लौट आनेका संवाद भिजवाया। नवद्वीपादि स्थानोंपर संवाद पहुँचनेपर भक्त लोग महाप्रभुके दर्शनके लिये आनेके लिये तैयारी करने लगे। इसी समय श्रीपरमानन्दपुरीने नदीया-नगरमें आकर जब महाप्रभुके नीलाचलमें पहुँचनेका संवाद श्रवण किया, तब वे ब्राह्मण कमलाकान्तको साथ लेकर पुरुषोत्तम क्षेत्रमें महाप्रभुके पास पहुँचे। नवद्वीपवासी पुरुषोत्तम भट्टाचार्य वाराणसीमें 'चैतन्यानन्द' नामक गुरुसे संन्यास ग्रहण करके 'स्वरूप' नाम ग्रहण करके नीलाचलमें महाप्रभुके चरणोंमें उपस्थित हुए। श्रीईश्वरपुरीके अप्रकट होनेके बाद उनके सेवक 'गोविन्द' उनकी आज्ञासे महाप्रभुके पास आये। केशव-भारतीके सम्पर्कसे ब्रह्मानन्द-भारती महाप्रभुके पूजनीय थे; उनके उपस्थित होनेपर महाप्रभुने कृपा करके उनका चर्म्माम्बर (चमड़ेका वस्त्र) छुड़वाया। महाप्रभुके प्रभावसे ब्रह्मानन्दने महाप्रभुके माहात्म्यको जानकर उन्हें 'कृष्ण' मानकर स्वीकार किया। जब श्रीसार्वभौमने महाप्रभुको 'कृष्ण' कहकर निर्देश किया, तब महाप्रभुने उनकी बातको 'अतिस्तुति' कहकर उस बातका अनादर किया। (इसी बीच एकदिन) काशीश्वर गोस्वामी आकर उपस्थित हुए। इस अध्यायमें, समुद्रमें नद-नदी-मिलनकी भाँति महाप्रभुके साथ बहुतसे देशोंके भक्तोंके मिलनका वर्णन हुआ है। —(अमृतप्रवाहभाष्य) भक्तोंके जीवनधन श्रीगौरको प्रणाम :— तं वन्दे गौरजलदं स्वस्य यो दर्शनामृतैः। विच्छेदावग्रम्लान-भक्तशस्यान्यजीवयत् ॥ 1 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिन्होंने अपने दर्शनामृत-वर्षणके द्वारा विच्छेदरूप अकालके द्वारा मुरझाये हुए भक्तरूपी धान्योंको जीवित किया था, उन गौररूप मेघकी मैं वन्दना करता हूँ॥ 1 ॥ अनुभाष्य— यः (श्रीकृष्णचैतन्यदेवः) स्वस्य (निजश्रीमूर्त्तेः) दर्शना- मृतैः (निजदर्शनान्येव अमृ़तानि पीयूषाणि तैः) विच्छेदावग्रम्लानभक्तशस्यानि (विच्छेदः अनुपस्थितिजन्य-विरहः एव अवग्रहः वर्षणाभावः तेन म्लानानि भक्तरूप-शस्यानि) अजीवयत् (प्राणदानेन रक्षयामास) तं गौरजलदं (श्रीचैतन्यमेघम्) अहं वन्दे। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष देखें ॥ 1 ॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ 2 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, समस्त श्रीगौरभक्तवृन्दकी जय हो ॥ 2 ॥ । 405
[ 10/3-12 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला महाप्रभुके दक्षिण भ्रमणके समय राजाप्रतापरुद्र और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यका वार्त्तालाप :- पूर्वे यबे महाप्रभु चलिला दक्षिणे। प्रतापरुद्र राजा तब बोलाइल सार्वभौमे॥ ३॥ राजाके द्वारा महाप्रभुके परिचयकी जिज्ञासा और उनके दर्शनकी आकाङ्क्षा :- बसिते आसन दिल करि' नमस्कारे। महाप्रभुर वार्त्ता तब पुछिल ताँहारे॥ ४॥ “शुनिलाङ तोमार घरे एक महाशय। गौड़ हइते आइला, तेंहो-महा-कृपामय॥ ५॥ तोमारे बहु कृपा कैला, कहे सर्वजन। कृपा करि' कराह मोरे ताँहार दर्शन॥" ६॥ अनुवाद-महाप्रभु जब दक्षिण भारतकी यात्राके लिये चले गये, तब राजा प्रतापरुद्रने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको अपने महलमें बुलवाया था। उनके आनेपर महाराज प्रतापरुद्रने उन्हें प्रणाम किया और बैठनेके लिये आसन दिया। तब वे श्रीसार्वभौमसे महाप्रभुके सम्बन्धमें पूछने लगे,-“मैंने सुना है कि गौड़देशसे एक महापुरुष आये हैं और वे आपके घरमें रह रहे हैं। मैंने यह भी सुना है कि वे महा-कृपालु हैं और लोग कह रहे हैं कि उन्होंने आपपर बहुत कृपा की है। इसलिये आप कृपा करके मुझे भी उनके दर्शन करा दीजिये॥" ३-६॥ श्रीसार्वभौमके द्वारा महाप्रभुके आचरणका वर्णन :- भट्ट कहे,-“ये शुनिला सब सत्य हय। ताँर दर्शन तोमार घटन ना हय॥ ७॥ विरक्त संन्यासी तेंहो रहेन निर्जने। स्वप्नेह ना करेन तेंहो राजदरशने॥ ८॥ तथापि प्रकारे तोमा कराइताम दरशन। सम्प्रति करिला तेंहो दक्षिण गमन॥" ९॥ अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,-“आपने जो सुना है, वह सब सत्य है, परन्तु आपको उनके दर्शन नहीं मिलेंगे। यद्यपि वे एकान्तमें वास करनेवाले विरक्त संन्यासी हैं और वे स्वप्नमें भी राजाका दर्शन नहीं करते, तथापि मैं आपको किसी प्रकार उनका दर्शन कराता, परन्तु अभी तो वे दक्षिण भारतकी यात्रापर गये हुए हैं॥" ७-९॥ राजाके द्वारा महाप्रभुके पुरुषोत्तम परित्याग करनेके कारणकी जिज्ञासा :- राजा कहे, - "जगन्नाथ छाड़ि' केने गेला।" भट्ट कहे, - "महान्तेर एइ एक लीला ॥ १०॥ भट्टाचार्यका सद्-उत्तर :- तीर्थ पवित्र करिते करे तीर्थभ्रमण। सेइ छले निस्तारये सांसारिक जन॥ ११॥ अनुवाद-यह सुनकर राजाने कहा,-“वे श्रीजगन्नाथ पुरीको छोड़कर क्यों गये?" श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,-"महापुरुषोंकी यह एक लीला है, वे तीर्थोंको पवित्र करनेके उद्देश्यसे तीर्थोंमें भ्रमण करते हैं। इस बहानेसे वे तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए सांसारिक लोगोंका उद्धार कर रहे हैं॥ १०-११॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 8/39 संख्या देखें और (भाः 4/30/37)- “तेषां विचरतां पद्भ्यां तीर्थानां पावनेच्छया। भीतस्य किं न रोचेत तावकानां समागमः ॥" अर्थात् “प्रचेतागण श्रीजनार्दनसे बोले,-हे भगवन्! आपके भक्त सभी तीर्थोंको पवित्र करनेके लिये पैदल ही भ्रमण करते हैं। इसलिये संसारसे भयभीत किस व्यक्तिके लिये उनका समागम रुचिकर नहीं होगा?" ॥ १०-११॥ श्रीमद्भागवत (1/13/10)- भवद्विधा भागवतास्तीर्थभूताः स्वयं विभो। तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तःस्थेन गदाभृता॥ १२॥ अनुवाद-आपके जैसे भागवतजन स्वयं तीर्थस्वरूप हैं। आप लोग अपने अन्तःस्थित भगवान्की पवित्रताके 406 ।
दसवाँ अध्याय 10/12-20 ] बलसे पापियोंके पापोंसे मलिन सभी तीर्थोंको पवित्र करते हैं॥12॥ अनुभाष्य-आदिलीला 1/63 संख्या देखें॥12॥ दीनजनोंका उद्धार करना ही महान्त लोगोंका स्वभाव है, उसपर भी वे स्वेच्छामय परमेश्वर हैं :- वैष्णवेर हय एइ एक स्वभाव निश्चल। तेंहो जीव नहेन, हन स्वतन्त्र ईश्वर ॥”13 ॥ अनुवाद-वैष्णवोंका ऐसा ही निश्चल स्वभाव होता है और वे तो जीव नहीं, स्वतन्त्र ईश्वर हैं॥13॥ अमृतप्रवाह भाष्य-वैष्णवोंका यह एक अचल स्वभाव है—‘तीर्थोंको पवित्र करनेके लिये तीर्थभ्रमण और उसके छलसे सांसारिक लोगोंका उद्धार करना।' वास्तवमें श्रीकृष्णचैतन्य-‘जीव' नहीं हैं, वे-स्वतन्त्र ईश्वर हैं, तथापि उन्होंने गुप्तरूपसे भक्तावतार होकर वैष्णवों जैसा स्वभाव ग्रहण किया है॥"13॥ अनुभाष्य-श्रीभागवतगण तीर्थोंमें जाकर उन्हें पवित्र करते हैं और तीर्थमें जानेके बहानेसे तीर्थवासी सांसारिक लोगोंका उद्धार करते हैं—यही परदुःख-दुःखी (दूसरोंके दुःखमें दुःखी) शुद्धभक्तोंका नित्य स्वभाव है। किन्तु श्रीमहाप्रभु परतन्त्र भक्तरूपमें लीला करनेपर भी स्वयं स्वतन्त्र परमेश्वर हैं। 'निश्चल'–अचल, सनातन, नित्य ॥ 13 ॥ राजाके द्वारा भट्टाचार्यसे शिकायत :- राजा कहे,-"ताँरे तुमि याइते केने दिले? पाय पड़ि' यत्न करि' केने ना राखिले ? ॥" 14 ॥ अनुवाद-तब राजा प्रतापरुद्रने कहा, - "आपने उनको जाने क्यों दिया ? उनके चरणोंमें पड़कर आग्रह करके उन्हें रोक क्यों नहीं लिया ? ॥"14॥ राजाको वैधभक्तके भाँति श्रीभट्टाचार्यका उत्तर देना :- भट्टाचार्य कहे,- “तेंहो स्वयं ईश्वर स्वतन्त्र। साक्षात् श्रीकृष्ण, तेंहो नहे परतन्त्र ॥ 15 ॥ तथापि राखिते ताँरे महायत्न कैलुँ। ईश्वरेर स्वतन्त्र भाव, राखिते नारिलुँ ॥”16 ॥ अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने उत्तर दिया, - "वे स्वयं ईश्वर और परम स्वतन्त्र हैं। वे साक्षात् श्रीकृष्ण हैं, वे परतन्त्र नहीं हैं। तथापि मैंने उन्हें रोकनेका बहुत प्रयास किया, परन्तु भगवान्की अपनी स्वतन्त्र इच्छा है, मैं उन्हें रोक नहीं पाया ॥"15-16 ॥ महापण्डित भट्टाचार्यके वचनोंपर राजाका विश्वास :- राजा कहे,- "भट्ट, तुमि विज्ञशिरोमणि । तुमि ताँरे 'कृष्ण' कह, ताते सत्य मानि ॥ 17 ॥ राजाकी एक बार महाप्रभुके दर्शनकी आकाङ्क्षा :- पुनरपि इँहा ताँर हैले आगमन। एकबार देखि' करि सफल नयन ॥”18॥ अनुवाद-राजाने कहा, - "हे भट्टाचार्य ! आप विद्वानोंमें शिरोमणि हैं। आप उन्हें साक्षात् 'श्रीकृष्ण' कह रहे हैं, तो मैं इसे सत्य मानता हूँ। जब वे यहाँ लौटकर आयेंगे, तब उनका एकबार दर्शन करके मैं भी अपने नेत्रोंको सफल करना चाहता हूँ ॥"17-18 ॥ अनुभाष्य-महाजनके वाक्यमें विश्वास करनेसे राजाका मङ्गल और उनमें भक्तिका उदय हुआ॥ 17 ॥ महाप्रभुके शीघ्र आनेके समाचारका ज्ञापन और राजाको महाप्रभुके योग्य वास-स्थानके निर्देशका अनुरोध :- भट्टाचार्य कहे,- “तेंहो आसिबे अल्पकाले। रहिते ताँर एक स्थान चाहिये विरले ॥ 19 ॥ ठाकुरेर निकट, आर हइबे निर्जने। एमत निर्णय करि' देह' एक स्थाने ॥"20 ॥ अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा, - "वे शीघ्र ही लौट आयेंगे, किन्तु उनके रहनेके लिये एक एकान्त और शान्त स्थानकी आवश्यकता है। वह स्थान ठाकुरके (श्रीजगन्नाथके) मन्दिरके निकट हो और एकान्त भी हो, इस विषयपर विचार करके आप एक स्थानकी व्यवस्था कर दीजिये ॥"19-20 ॥ ॥ 407
[ 10/21–26 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला राजाके द्वारा काशीमिश्रके भवनका निर्देश :- राजा कहे,—“ऐछे काशीमिश्रेर भवन। ठाकुरेर निकट, हय परम निर्जन॥” २१॥ अनुवाद—राजाने कहा,—“ऐसा स्थान तो काशीमिश्रका घर है। वह श्रीजगन्नाथ-मन्दिरके निकट तथा अत्यन्त निर्जन-शान्त स्थान है॥” २१॥ अनुभाष्य—‘काशीमिश्रेर भवन’—श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्रमें मन्दिरसे कुछ दक्षिणकी ओर बालिसाहिके अन्तर्गत वर्तमान श्रीराधाकान्त मठ है; श्रीमन्महाप्रभु वहाँ वास करते थे। श्रीवक्रेश्वर पण्डितके शिष्य श्रीगोपालगुरु थे और उनके शिष्य श्रीध्यानचन्द्र गोस्वामीने वहाँ श्रीविग्रह स्थापित किये थे। वह स्थान श्रीजगन्नाथदेव-मन्दिरके निकटमें है और उस समय वह निर्जन स्थान था॥ २१॥ राजाकी महाप्रभुके दर्शनकी उत्कण्ठा :- एत कहि’ राजा रहे उत्कण्ठित हञा। भट्टाचार्य काशीमिश्रे कहिल आसिया॥ २२॥ अनुवाद—ऐसा कहकर राजा उत्कण्ठित होकर महाप्रभुके लौटनेकी प्रतीक्षा करने लगे। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने श्रीकाशीमिश्रके पास आकर उन्हें राजाकी इच्छा बतलायी॥ २२॥ काशीमिश्रको राजाका आदेश बताना और सुनकर मिश्रका आनन्द :- काशीमिश्र कहे,—“आमि बड़ भाग्यवान्। मोर गृहे ‘प्रभुपादेर’ हवे अवस्थान॥” २३॥ अनुवाद—यह सुनकर श्रीकाशीमिश्रने कहा,—“मैं बहुत भाग्यवान् हूँ। मेरे घरमें ‘प्रभुपाद’ (महाप्रभु) वास करेंगे॥” २३॥ अनुभाष्य—स्वयं भगवान् श्रीमन्महाप्रभुको उनके दासका अभिमान रखनेवाले जीवमात्र ही ‘प्रभुपाद’ कहकर पुकारते हैं। श्रीमन् नित्यानन्द प्रभु और श्रीमद् अद्वैत प्रभु—ये दोनों भी उसी प्रकार ‘प्रभुपाद’के नामसे कहे जाते हैं, क्योंकि सभी विषय-विग्रह विष्णुतत्त्व हैं एवं विष्णु ही जीवोंके नित्य प्रभु हैं। और भी, श्रीकृष्णतत्त्ववेत्ता आश्रय-विग्रह श्रीगुरुदेव भी लघु-शिष्यके लिये साक्षात् ‘कृष्णचैतन्य’ अथवा ‘हरि’ स्वरूप होनेके कारण ‘ॐ विष्णुपाद’ कहलाते हैं। श्रीगुरुदेवके अतिरिक्त अन्यान्य शुद्धभक्तों अथवा शुद्ध-वैष्णवोंको उनके सभी शिष्य-स्थानीय जीव ‘श्रीपाद’के नामसे बुलाते हैं। किन्तु श्रीगुरुदेव और वैष्णव एवं उनके द्वारा अङ्गीकार किये गये शिष्य, सभी एक-दूसरेको पूज्य-द्योतक ‘प्रभु’ शब्दके द्वारा सम्बोधन करते हैं। इसी सत् सिद्धान्तका प्रचुर व्यवहार भागवत, चैतन्यचरितामृत, चैतन्यभागवतादि प्रमाणिक ग्रन्थों और शुद्धभक्त-सम्प्रदायमें देखा जाता है। प्राकृत-सहजिया वैष्णव कहलाने योग्य नहीं हैं। उनके सम्प्रदायमें तथाकथित गोस्वामियों और उनके मूर्ख शिष्योंके द्वारा मुखसे अपनेको ‘वैष्णव-दासानुदास’, ‘वैष्णव-दासाभास’ कहना दीनताकी आड़में छल या कपटता है। उनका कहना है कि जात-गोस्वामी ही ‘प्रभुपाद’ कहलानेके अधिकारी हैं। जाति-बुद्धिकी प्रबलताके कारण वे यथार्थ श्रीकृष्णतत्त्वविद् गुरु अथवा वैष्णवोंमें मर्त्य-बुद्धि रखकर उनको ‘प्रभुपाद’ सम्बोधनके योग्य नहीं मानते,—यह उनके दुर्भाग्यका परिचायक और नरककी यात्राका सहायक मात्र है॥ २३॥ पुरीवासियोंकी महाप्रभुके दर्शनकी उत्कण्ठा :- एइमत पुरुषोत्तमवासी सर्वजन। प्रभुके मिलिते सबार उत्कण्ठित मन॥ २४॥ सेवाकी उत्कण्ठा ही भक्त और भगवान्के मिलनका सूत्र; महाप्रभुका दक्षिणसे आगमन :- सर्वलोकेर उत्कण्ठा यबे अत्यन्त बाड़िल। महाप्रभु दक्षिण हैते त्वराय आइल॥ २५॥ महाप्रभुके दर्शनके लिये सभीकी भट्टाचार्यसे प्रार्थना :- शुनि’ आनन्दित हैल सबाकार मन। सबे आसि’ सार्वभौमे कैल निवेदन॥ २६॥ 408 ।
दसवाँ अध्याय 10/24-36 ] “प्रभुर सहित आमा-सबार कराह दरशन। तोमार प्रसादे पाइ प्रभुर चरण॥” 27॥ अनुवाद—इस प्रकार पुरुषोत्तमवासी सभी लोगोंका मन महाप्रभुके दर्शन करनेके लिये उत्कण्ठित हो रहा था। जब सब लोगोंकी उत्कण्ठा बहुत बढ़ गयी, तब महाप्रभु दक्षिण भारतसे तुरन्त आ गये। महाप्रभुके आनेका समाचार सुनकर सभीका मन प्रसन्न हो गया। सब आकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यसे प्रार्थना करने लगे,—“हम सबको महाप्रभुके दर्शन कराइये। आपकी कृपासे ही हमें महाप्रभुके चरणकमलोंकी प्राप्ति हो सकती है॥” 24-27॥ काशीमिश्रके घरमें महाप्रभुके साथ मिलनेका सभीको आश्वासन :— भट्टाचार्य कहे,—“कालि काशीमिश्रेर घरे। प्रभु याइबेन ताँहा, मिला’ब सबारे॥” 28॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“कल महाप्रभु काशीमिश्रके घर जायेंगे। वहीं मैं आप सबको उनके दर्शन कराऊँगा॥” 28॥ दूसरे दिन महाप्रभुके द्वारा जगन्नाथ-दर्शन और पण्डागणोंके साथ मिलन :— आर दिन महाप्रभु भट्टाचार्येर सङ्गे। जगन्नाथ-दरशन कैल महारङ्गे॥ 29॥ महाप्रसाद दिया ताँहा मिलिला सेवकगण। महाप्रभु सबाकारे कैल आलिङ्गन॥ 30॥ अनुवाद—अगले दिन महाप्रभु श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके साथ बड़े आनन्दसे भगवान् श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन करने गये। श्रीजगन्नाथदेवके सेवकोंने महाप्रभुसे मिलकर उन्हें महाप्रसाद दिया और महाप्रभुने उन सबका आलिङ्गन किया॥ 29-30॥ भट्टाचार्यका महाप्रभुको काशी मिश्रके घरपर लाना :— दर्शन करि’ प्रभु चलिला बाहिरे। भट्टाचार्य आनिल ताँरे काशीमिश्र-घरे॥ 31॥ महाप्रभुके चरणोंमें काशीमिश्रका आत्मसमर्पण :— काशीमिश्र आसि’ पड़िल प्रभुर चरणे। गृह-सहित आत्मा ताँरे कैल निवेदने॥ 32॥ काशीमिश्रको चतुर्भुज-मूर्तिका दर्शन :— प्रभु चतुर्भुज-मूर्त्ति ताँरे देखाइल। आत्मसात् करि’ ताँरे आलिङ्गन कैल॥ 33॥ अनुवाद—भगवान् श्रीजगन्नाथका दर्शन करके महाप्रभु मन्दिरसे बाहर चले और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य उन्हें काशीमिश्रके घर ले आये। महाप्रभुको देखकर श्रीकाशीमिश्र उनके चरणोंमें गिर पड़े और उन्होंने घरके साथ-साथ अपने आपको भी महाप्रभुके श्रीचरणोंमें समर्पित कर दिया। महाप्रभुने श्रीकाशीमिश्रको अपने चतुर्भुज रूपका दर्शन कराया और उन्हें अपने दासके रूपमें स्वीकार करके उनका आलिङ्गन किया॥ 31-33॥ अमृतप्रवाह भाष्य—काशीमिश्रने अपना घर और सेवा करने योग्य अपना शरीर भी महाप्रभुको समर्पित कर दिया॥ 32॥ सभीके द्वारा आसन ग्रहण :— तबे महाप्रभु ताँहा बसिला आसने। चौदिके बसिला नित्यानन्दादि भक्तगणे॥ 34॥ अनुवाद—तब महाप्रभु वहाँ आसनपर बैठ गये और श्रीनित्यानन्द प्रभु आदि भक्तगण उनके चारों ओर बैठ गये॥ 34॥ योग्य वासस्थान-निर्वाचन देखकर महाप्रभुको आनन्द :— सुखी हैला देखि’ प्रभु वासार संस्थान। येइ वासाय हय प्रभुर सर्व-समाधान॥ 35॥ अनुवाद—महाप्रभु अपने रहनेके स्थानको देखकर बहुत प्रसन्न हुए, क्योंकि ऐसे स्थानपर उनकी आवश्यकता अनुसार सब व्यवस्था थी॥ 35॥ महाप्रभुको घर स्वीकार करनेकी प्रार्थना :— सार्वभौम कहे,—“प्रभु, योग्य तोमार वासा। तुमि अङ्गीकार कर,—काशीमिश्रेर आशा॥” 36॥ । 409
[ 10/36-43 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“प्रभो! यह निवासस्थान आपके योग्य है। कृपा करके इसे स्वीकार करके काशीमिश्रकी आशाको पूर्ण कीजिये॥” 36॥ अमृतप्रवाह भाष्य—काशीमिश्रकी यही आशा है कि आप उनके घरमें वास करे,—इसे आप कृपा करके स्वीकार कीजिये॥ 36॥ महाप्रभुके द्वारा अपने भक्तकी वश्यता-ज्ञापन :— प्रभु कहे,—“एइ देह तोमा-सबाकार। येइ तुमि कह, सेइ कर्त्तव्य आमार॥” 37॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“यह देह तो आप सबकी ही है। आप लोग जैसा कहेंगे, वैसा करना ही मेरा कर्त्तव्य है॥” 37॥ श्रीभट्टाचार्यके द्वारा महाप्रभुको पुरीवासी भक्तोंका परिचय प्रदान :— तबे सार्वभौम प्रभुर दक्षिण-पार्श्वे बसि'। मिलाइते लागिला सब पुरुषोत्तमवासी॥ 38॥ अनुवाद—तब श्रीसार्वभौम महाप्रभुके दाहिनी ओर बैठ गये और वे सब पुरुषोत्तमवासियोंको महाप्रभुसे मिलवाने लगे॥ 38॥ पुरीवासियोंके द्वारा महाप्रभुके दर्शनकी उत्कण्ठा-ज्ञापन और महाप्रभुकी कृपाके लिये प्रार्थना :— “एइ सब लोक, प्रभु, वैसे नीलाचले। उत्कण्ठित हञाछे सबे तोमा मिलिबारे॥ 39॥ महाप्रभुके दर्शनके लिये तृष्णासे युक्त पुरीवासी भक्त :— तृषित चातक यैछे करे हाहाकार। तैछे एइ सब, —सबे कर अङ्गीकार॥ 40॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“ये सब लोग नीलाचलमें रहते हैं और आपसे मिलनेके लिये बड़े ही उत्कण्ठित हैं। जैसे प्यासा चातक पानीके लिये हा-हाकार करता है, आपके दर्शनके बिना इनकी स्थिति भी वैसी है, आप इन्हें अङ्गीकार कीजिये॥ 39-40॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पाठान्तरमें—'तैछे एइ सब, सबा कर अङ्गीकार' अर्थात् जिस प्रकार प्यासा चातक जलके लिये हाहाकार करता है, उसी प्रकार ये सब उत्कलवासी आपके दर्शनोंके लिये प्यासे हैं; प्रभो! आप सभीको ही स्वीकार कीजिये॥ 40॥ (1) जनार्दन :— जगन्नाथ-सेवक एइ, नाम-जनार्द्दन। अनवसरे करे प्रभुर श्रीअङ्ग-सेवन॥ 41॥ अनुवाद—(भक्तोंसे परिचय कराते हुए श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य कह रहे हैं)—ये भगवान् श्रीजगन्नाथके सेवक हैं, इनका नाम जनार्दन है। अनवसरके समय ये श्रीजगन्नाथके श्रीविग्रहकी सेवा करते हैं॥ 41॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'अनवसरे'—स्नानयात्राके बादसे 'नवयौवन'-दर्शन तक अनवसर-काल है॥ 41॥ (2) कृष्णदास, (3) शिखि माहति :— कृष्णदास-नाम एइ सुवर्ण-वेत्रधारी। शिखि माहाति-नाम एइ लिखनाधिकारी॥ 42॥ अनुवाद—ये कृष्णदास हैं, ये स्वर्णकी छड़ी धारण करते हैं। और इनका नाम शिखि माहति है, ये लेखन अधिकारी हैं अर्थात् ये पञ्जिका आदि लिखनेका कार्य करते हैं॥ 42॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'लिखन अधिकारी'—मन्दिरके पद-प्राप्त कर्मचारी, जो मात्ला-पञ्जिका लिखते हैं॥ 42॥ अनुभाष्य—'शिखि माहाति'—अन्त्यलीला 2/105-106 संख्या और आदिलाला 10/137 संख्याका अनुभाष्य देखें॥ 42॥ (4) प्रद्युम्न मिश्र :— प्रद्युम्नमिश्र इँह वैष्णव प्रधान। जगन्नाथेर महा-सोयार इँह 'दास' नाम॥ 43॥ अनुवाद—ये वैष्णवोंमें प्रधान प्रद्युम्नमिश्र हैं। ये 410 ।
दसवाँ अध्याय 10/43-50 ] श्रीजगन्नाथके प्रधान रसोइया हैं और ये 'दास' नामसे भी जाने जाते हैं॥४३॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'महा-सोयार'—महासूपकार (प्रधान रसोइया), प्रधान पाककर्त्ता (प्रधान भोजन बनानेवाला), महानसाधिकारी अर्थात् रसोईका मालिक॥४३॥ अनुभाष्य—'प्रद्युम्नमिश्र'—अन्त्यलीला पाँचवाँ अध्याय देखें। ब्राह्मणोंके विष्णुदासयसूचक नामके बाद 'दास'-शब्दका व्यवहार चुल्लिभट्ट सम्मत है॥४३॥ (5) मुरारि माहाति :— मुरारि माहाति इँह—शिखि माहातिर भाइ। तोमार चरण बिना आर गति नाइ॥४४॥ अनुवाद—ये शिखि माहातिके भाई मुरारि माहाति हैं, आपके चरणकमल ही इनकी एकमात्र गति हैं॥४४॥ (6) चन्दनेश्वर, (7) सिंहेश्वर, (8) मुरारि, (9) विष्णुदास :— चन्दनेश्वर, सिंहेश्वर, मुरारि ब्राह्मण। विष्णुदास,—इँह ध्याये तोमार चरण॥४५॥ अनुवाद—ये चन्दनेश्वर, सिंहेश्वर, मुरारि ब्राह्मण और विष्णुदास हैं,—ये सदा आपके चरणकमलोंका ही ध्यान करते रहते हैं॥४५॥ (10) परमानन्द :— 'प्रहरराज' 'महापात्र' इँह महामति। परमानन्द महापात्र इँहार संहति॥४६॥ अनुवाद—ये परमानन्द प्रहरराज हैं, इन्हें महापात्र भी कहते हैं। ये बहुत बुद्धिमान हैं॥४६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'प्रहरराज'—पहराव (एक प्रहरके लिये राजा)॥४६॥ अनुभाष्य—'प्रहरराज'—उत्कलमें राजाओंमें यह नियम प्रचलित है कि मृत राजाकी मृत्यु और अन्त्येष्टिकालसे अगले उत्तराधिकारीके सिंहासन ग्रहण करने अथवा अभिषेकसे पहले तक एक प्रहर कालके लिये राजकुल-पुरोहितवंशका कोई व्यक्ति सिंहासनपर बैठकर राजदण्ड धारण करेगा, जिससे राज सिंहासन खाली न रहे। ये पुरोहितगण ही वंशावलीसे 'प्रहरराज'के नामसे प्रसिद्ध हैं॥४६॥ शुद्ध वैष्णव ही तीर्थोंके अलङ्कार :— ए-सब वैष्णव—एइ क्षेत्रेर भूषण। एकान्तभावे चिन्ते सबे तोमार चरण॥”४७॥ अनुवाद—ये सब वैष्णव इस श्रीजगन्नाथ पुरीके भूषणस्वरूप हैं। ये सब एकान्त भावसे आपके चरणकमलोंका ही चिन्तन करते हैं॥”४७॥ सभीका महाप्रभुको प्रणाम, महाप्रभुका आलिङ्गन :— तबे सबे भूमे पड़ि' दण्डवत् हञा। सबा आलिङ्गिला प्रभु प्रसाद करिया॥४८॥ अनुवाद—परिचय होनेके बाद सबने भूमिपर गिरकर महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम किया। महाप्रभुने कृपा करके उन सबको आलिङ्गन दान दिया॥४८॥ (11) चार पुत्रों-सहित भवानन्द-रायका परिचय-दान :— हेनकाले आइला तथा भवानन्द राय। चारिपुत्र-सङ्गे पड़े महाप्रभुर पाय॥४९॥ सार्वभौम कहे,—“एइ राय भवानन्द। इँहार प्रथम पुत्र—राय रामानन्द॥”५०॥ अनुवाद—उसी समय वहाँ श्रीभवानन्द राय अपने चार पुत्रोंके साथ आये और सभीने महाप्रभुके चरणोंमें गिरकर उन्हें प्रणाम किया। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“ये भवानन्द राय हैं। इनके प्रथम पुत्रका नाम राय रामानन्द है॥”४९-५०॥ अनुभाष्य—'चारिपुत्र'—श्रीरामानन्द रायके अतिरिक्त वाणीनाथ, गोपीनाथ, कलानिधि और सुधानिधि—नामक चार भाई॥४९॥ । 411
[ 10/51–61 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला महाप्रभुका आलिङ्गन और श्रीरामानन्द- महिमाका कीर्तन :– तबे महाप्रभु ताँरे कैल आलिङ्गन। स्तुति करि' कहे रामानन्द-विवरण॥ 51 ॥ “रामानन्द-हेन रत्न याँहार तनय। ताँहार महिमा लोके कहन ना जाय॥ 52 ॥ भवानन्द ही पाण्डु, उनके पाँच पुत्र ही पाँच-पाण्डव :– साक्षात् पाण्डु तुमि, तोमार पत्नी कुन्ती। पञ्चपाण्डव तोमार पञ्चपुत्र महामति॥” 53 ॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुने श्रीभवानन्द रायका आलिङ्गन किया और श्रीरामानन्द रायकी प्रशंसा करते हुए उनके बारेमें महाप्रभुने कहा, — “रामानन्द जैसा रत्न जिनका पुत्र हो, उनकी महिमाका जगत्में वर्णन नहीं किया जा सकता। आप साक्षात् महाराज पाण्डु हैं और आपकी पत्नी साक्षात् कुन्तीदेवी हैं। आपके पाँच बुद्धिमान पुत्र पाँच पाण्डव ही हैं॥” 51-53 ॥ भवानन्दकी दीनता; ईश्वरकी कृपा- जातिकुलसे निरपेक्ष :– राय कहे, —“आमि शूद्र, विषयी, अधम। तबु तुमि स्पर्श,—एइ ईश्वर-लक्षण॥ 54 ॥ भवानन्दका महाप्रभुके चरणोंमें सर्वस्व-अर्पण :– निज-गृह-वित्त-भृत्य-पञ्चपुत्र-सने। आत्म समर्पिलुँ आमि तोमार चरणे॥ 55 ॥ महाप्रभुके चरणोंमें वाणीनाथको अर्पण :– एइ वाणीनाथ रहिबे तोमार चरणे। यबे येइ आज्ञा, ताहा करिबे सेवने॥ 56 ॥ निजदास मानकर अङ्गीकार करनेके लिये भवानन्दकी महाप्रभुको प्रार्थना :– आत्मीय-ज्ञाने मोरे सङ्कोच ना करिबे। येइ यबे इच्छा, तबे सेइ आज्ञा दिबे॥” 57 ॥ अनुवाद—महाप्रभुसे अपनी प्रशंसा सुनकर श्रीभवानन्द रायने कहा, — “मैं तो एक शूद्र हूँ, जो विषयोंमें लिप्त है। मैं अधम व्यक्ति हूँ, तो भी आपने मुझे स्पर्श किया। यह आपके ईश्वर होनेका ही प्रमाण है। मैं अपने घर, धन, दासों और पाँचों पुत्रोंके साथ स्वयंको आपके चरणोंमें समर्पित करता हूँ। यह मेरा पुत्र वाणीनाथ सदा आपके श्रीचरणकमलोंमें ही रहेगा। आप इसे जब जो आदेश देंगे, उसी प्रकार आपकी सेवा करेगा। आप मुझे अपना समझकर किसी भी प्रकारका सङ्कोच नहीं कीजियेगा, जब जो इच्छा हो, तब वह आदेश कीजियेगा॥” 54-57 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अर्थात्, मुझे 'आत्मीय' (अपना) जानियेगा, —'आत्मीय' होनेके नाते कृपा कीजियेगा; किसी भी विषयमें सङ्कोच करनेकी आवश्यकता नहीं है॥ 57 ॥ महाप्रभुकी कृपा-वाणी और अङ्गीकार :– प्रभु कहे, —“कि सङ्कोच, तुमि नह पर। जन्मे जन्मे तुमि आमार सवंशे किङ्कर॥ 58 ॥ दिन-पाँच भितरे आसिबे रामानन्द। ताँर सङ्गे पूर्ण हबे आमार आनन्द॥” 59 ॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुने कहा, — “आप पराये तो नहीं हो, इसलिये आपसे कैसा सङ्कोच? आप तो वंशसहित जन्म-जन्मसे मेरे दास हो। पाँच-सात दिनोंमें रामानन्द भी यहाँ आ जायेंगे। उनके साथ रहकर मेरा आनन्द पूर्ण होगा॥” 58-59 ॥ एत बलि' प्रभु ताँरे कैल आलिङ्गन। ताँर पुत्र सब शिरे धरिल चरण॥ 60 ॥ वाणीनाथको अङ्गीकार :– तबे महाप्रभु ताँरे घरे पाठाइल। वाणीनाथ-पट्टनायके निकटे राखिल॥ 61 ॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभुने उनका आलिङ्गन किया और अपने चरणकमल उनके सभी पुत्रोंके सिरपर रखे। तब महाप्रभुने श्रीभवानन्द रायको उनके 412 ।
दसवाँ अध्याय 10/60-73 ] घर भेज दिया और वाणीनाथ पट्टनायकको अपने पास रख लिया॥ 60-61 ॥ अनुभाष्य - 'शिरो'- अपने-अपने मस्तकपर ॥ 60 ॥ भट्टाचार्य सब लोके विदाय कराइल। तबे प्रभु काला-कृष्णदासे बोलाइल ॥ 62 ॥ कृष्णदासके पूर्व आचरणका वर्णन :- प्रभु कहे, - “भट्टाचार्य, शुनह इँहार चरित। दक्षिण गियाछिल इँह आमार सहित ॥ 63 ॥ भट्टथारि-काछे गेला आमारे छाड़िया। भट्टथारि हैते इँहारे आनिलुँ उद्धारिया ॥ 64 ॥ महाप्रभुके द्वारा कृष्णदासका परित्याग :- एबे आमि इँहा आनि' करिलाङ विदाय। याँहा इच्छा, याह, आमा-सने नाहि आर दाय ॥” 65 ॥ अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने तब सब लोगोंको विदा किया। बादमें महाप्रभुने काला कृष्णदासको अपने पास बुलवा लिया। महाप्रभुने कहा, - “हे सार्वभौम भट्टाचार्य ! इसका (काला कृष्णदासका) चरित्र सुनो। यह मेरे साथ दक्षिण भारत गया था। वहाँ मुझे छोड़कर यह भट्टथारि लोगोंके पास चला गया था। मैं इसे भट्टथारि लोगोंके चङ्गलसे छुड़ाकर यहाँ लाया हूँ। मैं इसे यहाँ ले आया हूँ, अब इसके बाद मुझपर इसका कोई दायित्व नहीं है, इसलिये मैं इसे यहाँसे जानेके लिये कह रहा हूँ। अब यह जहाँ जाना चाहे, वहीं चला जाय ॥” 62-65 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला, 10/145 संख्या और मध्यलीला 7/39 संख्याका अनुभाष्य देखें ॥ 62 ॥ कृष्णदासका क्रन्दन :- एत शुनि' कृष्णदास कान्दिते लागिल। मध्याह्न करिते महाप्रभु चलि' गेल ॥ 66 ॥ अनुवाद- यह सुनकर कि महाप्रभुने उसका त्याग कर दिया है, कृष्णदास रोने लगा। किन्तु महाप्रभु उसको अनदेखा करके मध्याह्नके भोजनके लिये चले गये॥ 66 ॥ श्रीनित्यानन्दादिका कृष्णदासको नवद्वीप भेजनेका परामर्श :- नित्यानन्द, जगदानन्द, मुकुन्द, दामोदर। चारिजने युक्ति तबे करिला अन्तर ॥ 67 ॥ “गौड़देशे पाठाइते चाहि एकजने। 'आइ'के कहिबे याइ, प्रभुर आगमन ॥ 68 ॥ अद्वैत-श्रीवासादि यत भक्तगण। सबेइ आसिबे शुनि' प्रभुर आगमन ॥ 69 ॥ कृष्णदासको सान्त्वना :- एइ कृष्णदासे दिब गौड़े पाठञा।” एत कहि' तारे राखिलेन आश्वासिया ॥ 70 ॥ अनुवाद-तब श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीजगदानन्द, श्रीमुकुन्द और श्रीदामोदर, ये चारों गुप्तरूपसे कुछ योजनापर विचार करने लगे, - “हम एक व्यक्तिको गौड़देशमें भेजना चाहते हैं, जो जाकर शचीमाताको महाप्रभुके दक्षिण भारतसे लौटकर आनेका समाचार दे। श्रीअद्वैत-श्रीवासादि सभी भक्तगण महाप्रभुके आनेका समाचार सुनकर यहाँ आयेंगे। इस कार्यके लिये हम इस कृष्णदासको गौड़देश भेजेंगे।” यह विचार करके उन्होंने कृष्णदासको आश्वस्त करके रख लिया ॥ 67-70 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'अन्तर'- गुप्त अथवा दूर जाकर ॥ 67 ॥ महाप्रभुसे अनुमति ग्रहण :- आर दिने प्रभुस्थाने कैल निवेदन। “आज्ञा देह' गौड़-देशे पाठाइ एकजने ॥ 71 ॥ तोमार दक्षिण-गमन शुनि' शचि 'आइ'। अद्वैतादि भक्त सब आछे दुःख पाइ' ॥ 72 ॥ एकजन याइ' कहुक शुभ समाचार।” प्रभु कहे, - “सेइ कर, ये इच्छा तोमार ॥” 73 ॥ । 413
[ 10/71-86 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-अगले दिन सबने महाप्रभुसे निवेदन किया, - "यदि आपकी आज्ञा हो, तो हम एक व्यक्तिको गौड़देश भेज दें। आपके दक्षिण भारत जानेका समाचार सुनकर शचीमाता और श्रीअद्वैतादि सब भक्त बड़े दुःखी हो रहे हैं। इसलिये एक व्यक्ति जाकर उनको आपके लौट आनेका शुभ समाचार दे।" यह सुनकर महाप्रभुने कहा, - "जैसी आप सबकी इच्छा हो, वैसा ही कीजिये ॥" 71-73 ॥ महाप्रसादके साथ कृष्णदासको गौड़देशमें भेजना :- तबे सेइ कृष्णदासे गौड़े पाठाइल। वैष्णव-सबाके दिते महाप्रसाद दिल ॥ 74 ॥ अनुवाद-इस प्रकार काला कृष्णदासको गौड़देश भेज दिया। उसके साथ सभी वैष्णवोंको देनेके लिये प्रचुर मात्रामें श्रीजगन्नाथजीका महाप्रसाद भी भेजा ॥ 74 ॥ कृष्णदासकी गौड़यात्रा और नवद्वीपमें शचीमाताके साथ साक्षात्कार :- तबे गौड़देशे आइला काला-कृष्णदास। नवद्वीपे गेल तँह शची-आइ-पाश ॥ 75 ॥ प्रणाम करनेके बाद सभीको महाप्रभुका संवाद-वर्णन :- महाप्रसाद दिया ताँरे कैल नमस्कार। दक्षिण हैते आइला प्रभु, -कहे समाचार ॥ 76 ॥ अनुवाद-तब काला-कृष्णदास गौड़देशमें आकर सबसे पहले नवद्वीपमें शचीमाताके पास गया। शचीमाताको प्रणाम करके काला कृष्णदासने उन्हें प्रसाद दिया और साथ ही महाप्रभुके दक्षिण भारतसे आ जानेका समाचार सुनाया ॥ 75-76 ॥ महाप्रभुका संवाद सुनकर सभीको आनन्द :- शुनिया आनन्दित हैल शचीमातार मन। श्रीवासादि आर यत यत भक्तगण ॥ 77 ॥ शुनिया सबार हैल परम उल्लास। अद्वैत-आचार्य-गृहे गेला कृष्णदास ॥ 78 ॥ अनुवाद-यह शुभ समाचार सुनकर शचीमाताको बहुत आनन्द हुआ। श्रीवासादि तथा अन्यान्य जितने भी भक्त थे, सभीके हृदयमें इस समाचारको सुनकर उल्लास हो गया। तब कृष्णदास श्रीअद्वैताचार्यके घर गया ॥ 77-78 ॥ श्रीअद्वैतके घर जाकर महाप्रभुका संवाद-वर्णन :- आचार्येरे प्रसाद दिया करि' नमस्कार। सम्यक् कहिल महाप्रभुर समाचार ॥ 79 ॥ अनुवाद-काला कृष्णदासने श्रीअद्वैताचार्यको प्रणाम करके उन्हें प्रसाद दिया और फिर उन्होंने महाप्रभुका समस्त समाचार कह सुनाया ॥ 79 ॥ श्रीअद्वैताचार्यका आनन्द और अन्यान्य गौड़ीय भक्तोंका हर्षित होकर अद्वैतके पास जाना :- शुनि' आचार्य-गोसाञिर आनन्द हइल। प्रेमावेशे बहु नृत्य-गीत-हुँकार कैल ॥ 80 ॥ हरिदास ठाकुरेर हैल परम आनन्द। वासुदेव दत्त, गुप्त मुरारि, सेन शिवानन्द ॥ 81 ॥ आचार्यरत्न, आर पण्डित वक्रेश्वर। आचार्यनिधि, आर पण्डित गदाधर ॥ 82 ॥ श्रीराम पण्डित, आर पण्डित दामोदर। श्रीमान् पण्डित, आर विजय, श्रीधर ॥ 83 ॥ राघवपण्डित, आर आचार्य नन्दन। कतेक कहिब आर यत भक्तगण ॥ 84 ॥ शुनिया सबार हैल परम उल्लास। सबे मेलि' गेला श्रीअद्वैतेर पाश ॥ 85 ॥ आचार्येरे सबे कैल चरण वन्दन। आचार्य-गोँ साइ सबारे कैल आलिङ्गन ॥ 86 ॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य महाप्रभुके लौटनेका समाचार सुनकर बड़े आनन्दित हुए। वे प्रेमावेशमें बहुत देर तक नृत्य-गीत और हुँकार करते रहे। श्रीहरिदास ठाकुर भी समाचार सुनकर परम आनन्दित हुए। 414 ।
दसवाँ अध्याय 10/80-93 ] श्रीवासुदेव दत्त, श्रीमुरारि गुप्त, श्रीशिवानन्द सेन, श्रीआचार्यरत्न, श्रीवक्रेश्वर पण्डित, श्रीआचार्यनिधि, श्रीगदाधर पण्डित, श्रीराम पण्डित, श्रीदामोदर पण्डित, श्रीमान् पण्डित, श्रीविजय, श्रीधर, श्रीराघवपण्डित और श्रीआचार्य नन्दन भी इस समाचारको सुनकर बड़े आनन्दित हुए। और कितने भक्तोंके नाम कहूँ, जिसने भी महाप्रभुके नीलाचल आनेका समाचार सुना, उसके मनमें परम उल्लास हुआ। सभी भक्त मिलकर श्रीअद्वैताचार्यके पास गये और उनके चरणकमलोंकी वन्दना की। श्रीअद्वैताचार्यने भी उन सबका आलिङ्गन किया॥ 80-86॥ अनुभाष्य—'आचार्यनिधि'—आदिलीला 10/14 संख्या देखें॥ 82॥ आनन्दसूचक महोत्सवका अनुष्ठान :— दिन दुइ-तिन आचार्य महोत्सव कैल। नीलाचल याइते आचार्य युक्ति दृढ़ कैल॥ 87॥ अनुवाद—इस शुभ समाचारको पाकर श्रीअद्वैताचार्यने दो-तीन दिन तक महोत्सव किया। तब श्रीअद्वैताचार्य आदि सबने नीलाचल जानेका दृढ़ निश्चय किया॥ 87॥ शचीमाताकी आज्ञा लेकर सभीकी पुरी-यात्रा :— सबे मेलि' नवद्वीपे एकत्र हञा। नीलाद्रि चलिल शचीमातार आज्ञा लञा॥ 88॥ अनुवाद—सभी भक्त नवद्वीपमें एकत्रित हुए और श्रीशचीमाताकी आज्ञा लेकर वे नीलाचलकी ओर चल दिये॥ 88॥ कुलीन ग्रामवासियोंका आगमन और मिलन :— प्रभुर समाचार शुनि' कुलीनग्रामवासी। सत्यराज-रामानन्द मिलिला सबे आसि' ॥ 89॥ अनुवाद—महाप्रभुका नीलाचल लौटनेका समाचार सभी कुलीनग्रामवासियोंने सुना। श्रीसत्यराज, श्रीरामार्नन्दादि सभी कुलीनग्रामवासी भी श्रीअद्वैताचार्य आदि भक्तोंके साथ नीलाचल जानेके लिये आकर मिले॥ 89॥ खण्डवासियोंका आगमन और मिलन :— मुकुन्द, नरहरि, रघुनन्दन खण्ड हैते। आचार्येर ठाञि आइला नीलाचल याइते॥ 90॥ अनुवाद—समाचार पाकर श्रीमुकुन्द, श्रीनरहरि और श्रीरघुनन्दनादि भी खण्डवासी नीलाचल जानेके लिये श्रीअद्वैताचार्यके घर आ गये॥ 90॥ अनुभाष्य—आदिलीला 10/78 संख्या देखें। श्रीखण्डवासी श्रीरघुनन्दनकी वंशप्रणालीके लिये मञ्जूषा- समाहृति संख्या पाँच देखें। इनमेंसे बहुतसे भक्तोंके नामके साथ 'आनन्द'-शब्द जोड़कर विभिन्न नाम हैं। साधारणतः 'आनन्द' शब्द जोड़कर ही इनका नाम पाठ करना चाहिये॥ 90॥ श्रीपरमानन्द पुरीका नवद्वीपमें आगमन :— सेकाले दक्षिण हैते परमानन्दपुरी। गङ्गातीरे-तीरे आइला नदीया-नगरी॥ 91॥ शचीमाताके घरमें श्रीपरमानन्दपुरीकी भिक्षा और वास :— आइर मन्दिरे सुखे करिला विश्राम। आइ ताँरे भिक्षा दिला करिया सम्मान॥ 92॥ अनुवाद—उसी समय श्रीपरमानन्दपुरी भी दक्षिण भारतसे गङ्गा-तटके साथ-साथ चलते हुए नदीया-नगरीमें पहुँचे। उन्होंने शचीमाताके घरपर आकर सुखपूर्वक विश्राम किया। शचीमाताने उन्हें सम्मानपूर्वक भोजन कराया॥ 91-92॥ अनुभाष्य—'आइर मन्दिरे'—श्रीमायापुरमें आर्या श्रीशचीमाताके घरमें॥ 92॥ श्रीपरमानन्द पुरीकी जगन्नाथपुरी जानेकी इच्छा :— प्रभुर आगमन तैंह ताँहाञि शुनिल। शीघ्र नीलाचल याइते ताँर इच्छा हैल॥ 93॥ अनुवाद—वहाँ उन्होंने महाप्रभुके दक्षिण भारतसे नीलाचल लौट आनेका समाचार सुना। उनकी भी शीघ्र ही नीलाचल जानेकी इच्छा हुई॥ 93॥ । 415
[ 10/93–104 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य—श्रीमहाप्रभु दक्षिण भारत भ्रमण करके नीलाचल लौट आये हैं,—यह संवाद अपने पूर्व परिचित कालाकृष्णदाससे श्रीमायापुरमें ही श्रीपरमानन्द पुरीको प्राप्त हुआ॥93॥ द्विज कमलाकान्तके साथ श्रीपरमानन्दपुरीका पुरी जाना :— प्रभुर एक भक्त—'द्विज कमलाकान्त' नाम। ताँरे लञा नीलाचले करिला प्रयाण॥94॥ महाप्रभुके साथ श्रीपरमानन्द पुरीका मिलन :— सत्वरे आसिया तँह मिलिला प्रभुरे। प्रभुर आनन्द हैल पाञा ताँहारे॥95॥ महाप्रभुका प्रणाम और श्रीपरमानन्दपुरीके द्वारा आलिङ्गन :— प्रेमावेशे कैल ताँर चरण वन्दन। तँह प्रेमावेशे कैल प्रभुरे आलिङ्गन॥96॥ अनुवाद—द्विज कमलाकान्त नामक महाप्रभुके एक भक्तको श्रीपरमानन्द पुरी साथ लेकर नीलाचलकी ओर चल दिये। शीघ्र ही नीलाचल पहुँचकर श्रीपरमानन्द पुरी महाप्रभुसे मिले। उनसे मिलकर महाप्रभुको भी बहुत आनन्द हुआ और प्रेमावेशमें आकर महाप्रभुने उनके चरणोंकी वन्दना की। श्रीपरमानन्दपुरीने भी प्रेमावेशमें महाप्रभुका आलिङ्गन किया॥94-96॥ महाप्रभु और पुरी, परस्परके प्रेमसे आकृष्ट होकर दोनोंकी ही नीलाचल-पुरीमें वास करनेकी इच्छाका प्रकाश :— प्रभु कहे,—“तोमा-सङ्गे रहिते वाञ्छा हय। मोरे कृपा करि' कर नीलाद्रि आश्रय॥”97॥ अनुवाद—महाप्रभु ने कहा,—“आपके साथ रहनेकी मेरी बहुत इच्छा है, मुझपर कृपा करनेके लिये आप नीलाचलमें ही रह जाइये॥”97॥ पुरी कहे,—“तोमा-सङ्गे रहिते वाञ्छा करि'। गौड़ हैते चलि' आइलाङ नीलाचल-पुरी॥98॥ श्रीपुरीके द्वारा शचीमाताका संवाद देना और भक्तोंके भावी-आगमनके संवादका ज्ञापन :— दक्षिण हैते शुनि' तोमार आगमन। शची आनन्दित, आर यत भक्तगण॥99॥ सबे आसितेछेन तोमारे देखिते। ताँ-सबार विलम्ब देखि' आइलाङ त्वरिते॥”100॥ अनुवाद—श्रीपरमानन्दपुरीने कहा,—“मेरी भी आपके साथ रहनेकी बहुत इच्छा है, इसलिये गौड़देशसे चलकर नीलाचल-पुरीमें आया हूँ। दक्षिण भारतसे आपके आगमनका समाचार सुनकर शचीमाता और सभी भक्त बड़े आनन्दित हुए हैं। सभी भक्त आपसे मिलनेके लिये जगन्नाथपुरी आ रहे हैं, परन्तु उनके आनेमें कुछ विलम्ब देखकर मैं शीघ्र ही चला आया॥”98-100॥ श्रीपरमानन्दपुरीको काशीमिश्रके घरमें वास-स्थानप्राप्ति :— काशीमिश्रेर आवासे निभृते एक घर। प्रभु ताँरे दिल, आर सेवार किङ्कर॥101॥ अनुवाद—श्रीकाशीमिश्रके घरमें एक एकान्त कमरा था, जिसे महाप्रभुने श्रीपरमानन्दपुरीको प्रदान किया और उनकी सेवाके लिये एक सेवक भी नियुक्त कर दिया॥101॥ श्रीदामोदर स्वरूपका आगमन और उनका वैशिष्ट्य :— आर दिने आइला स्वरूप दामोदर। प्रभुर अत्यन्त मर्मी, रसेर सागर॥102॥ उनके पूर्वाश्रमका परिचय :— 'पुरुषोत्तम आचार्य' ताँर नाम पूर्वाश्रमे। नवद्वीपे छिला तँह प्रभुर चरणे॥103॥ प्रभुर संन्यास देखि' उन्मत्त हञा। संन्यास ग्रहण कैल वाराणसी गिया॥104॥ अनुवाद—अगले दिन श्रीस्वरूप दामोदर भी श्रीजगन्नाथ पुरीमें आ गये। वे महाप्रभुके अन्तरङ्ग भक्त और रसके सागर हैं। उनके पूर्वाश्रमका नाम 'पुरुषोत्तम 416 ।
दसवाँ अध्याय 10/102-109 ] [बायाँ स्तम्भ] आचार्य' था और वे नवद्वीपमें महाप्रभुकी शरणमें ही रहते थे। जब महाप्रभुने संन्यास ग्रहण किया, तो वे भी संन्यास लेनेके लिये उन्मत्त हो गये। तब उन्होंने भी वाराणसीमें जाकर संन्यास ग्रहण किया॥ 102-104॥ अनुभाष्य- 'स्वरूप दामोदर'-वैदिक दशनामी संन्यासियोंमें श्रीशङ्कराचार्यके द्वारा प्रवर्तित जो विधि देखी जाती है, वह इस प्रकार है। 'तीर्थ' और 'आश्रम', इन दो उपाधियोंवाले एक-दण्डी संन्यासी उनसे संन्यास ग्रहणवालेको पहले नैष्ठिक-ब्रह्मचारियोंके विधानानुसार 'ब्रह्मचारी' नाम प्रदान करते हैं। नवद्वीपवासी श्रीपुरुषोत्तम आचार्यने संन्याससे पहले 'ब्रह्मचारी'-नाम 'दामोदर-स्वरूप' प्राप्त किया। संन्यासका योगपट्ट प्राप्त होनेपर नैष्ठिक-ब्रह्मचारी 'स्वरूप' उपाधिके बदले 'तीर्थ' संन्यास-उपाधि प्राप्त होती है॥ 102॥ संन्यास गुरुका आदेश :- 'चैत्यानन्द' गुरु ताँर आज्ञा दिलेन ताँरे। “वेदान्त पड़िया पड़ाओ समस्त लोकेरे ॥” 105 ॥ अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदरके गुरु 'श्रीचैत्यानन्द' थे। उन्होंने श्रीस्वरूप दामोदरको आज्ञा दी, - "तुम वेदान्त पढ़ो और सभी लोगोंको भी पढ़ाओ॥" 105॥ अनुभाष्य- 'चैत्यानन्द'- 'श्रीचैत्यानन्द भारती'- श्रीचैतन्यचन्द्रोदय-नाटककी टिप्पणी देखें॥ 105॥ श्रीदामोदर-स्वरूपका चरित्र :- परम विरक्त तेंह परम पण्डित। कायमने आश्रियाछे श्रीकृष्ण-चरित॥ 106 ॥ श्रीकृष्ण भजनके लिये ही उनके द्वारा संन्यास ग्रहण :- 'निश्चिन्ते कृष्ण भजिब' एइ त' कारणे। उन्मादे करिल तेंह संन्यास ग्रहणे ॥ 107 ॥ 'स्वरूप'-नामकरण :- संन्यास करिला शिखा-सूत्रत्याग-रूप। योगपट्ट ना निल, नाम हैल 'स्वरूप' ॥ 108 ॥ [दायाँ स्तम्भ] अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदर परम विरक्त तथा परम पण्डित भी थे। उन्होंने तन और मनसे श्रीकृष्णका ही आश्रय ग्रहण किया था। 'निश्चिन्त होकर श्रीकृष्णका भजन करूँगा' -इसी कारणसे उन्होंने उन्मादित होकर संन्यास ग्रहण किया था। उन्होंने संन्यास ग्रहण करके शिखा और यज्ञोपवीतका तो त्याग किया, किन्तु योगपट्ट अर्थात् गेरुए वस्त्रको स्वीकार नहीं किया। इसलिये उन्होंने संन्यासका नाम स्वीकार न करके अपने ब्रह्मचारी नाम 'स्वरूप' को ही धारण किये रखा ॥ 106-108 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-पुरुषोत्तमाचार्यने महाप्रभुके संन्यासको देखकर 'शिखासूत्रत्यागरूप संन्यास' ग्रहण किया। उनका संन्यास-नाम 'स्वरूप-दामोदर' हुआ। योगपट्ट लेनेकी जो प्रक्रिया है, उसे उन्होंने स्वीकार नहीं किया, क्योंकि उन्होंने संन्यास किसी प्रकारके आश्रमके अहङ्कारकी वृद्धि करनेके लिये नहीं लिया था। 'निश्चिन्त होकर श्रीकृष्ण-भजन करूँगा' -केवल इसी भावनासे संन्यासको स्वीकार किया था॥ 108 ॥ अनुभाष्य-श्रीकवि कर्णपूरने चैतन्यचन्द्रोदय-नाटकमें लिखा है- “समस्तहानाय तुरीयमाश्रमं जग्राह वैराग्यवशेन केवलम्। श्रीकृष्णपादाम्बुज-पराग-रागतस्तुच्छीचकारैणमहो वहन्नपि ॥” अर्थात् “केवल वैराग्यवशतः समस्त त्यागके उद्देश्यसे उन्होंने चतुर्थ आश्रम (संन्यास) ग्रहण किया। किन्तु श्रीकृष्ण-चरणकमलोंके परागमें अनुरागवशतः यह (संन्यास) वेश धारण करनेपर भी उसे तुच्छ ही माना।" अष्टश्राद्ध, विरजा-होम, शिखा-मण्डन, सूत्रत्याग आदि संन्यासके कृत्य समाप्त करके गुरु-आह्वान, योगपट्ट, संन्यास-नाम और दण्डादिको ग्रहण करनेकी अपेक्षा नहीं की, इसलिये उनका नैष्ठिक-ब्रह्मचर्यसूचक 'दामोदर स्वरूप' नाम ही रह गया ॥ 106-108 ॥ पुरीमें आगमन :- गुरु-ठाञि आज्ञा मागि' आइला नीलाचले। रात्रिदिने कृष्णप्रेम-आनन्द-विह्वले ॥ 109 ॥ । 417
[ 10/109-115 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला स्वरूप दामोदरका आचरण, उनका निर्जनमें वास :- पाण्डित्येर अवधि, वाक्य नाहि कारो सने। निर्जने रहये, लोक सब नाहि जाने॥110॥ महाप्रभुके द्वितीय विग्रह :- कृष्णरस-तत्त्ववेत्ता, देह—प्रेमरूप। साक्षात् महाप्रभुर द्वितीय स्वरूप॥111॥ अनुवाद—अपने संन्यासगुरुसे आज्ञा लेकर वे नीलाचल चले आये और रात-दिन श्रीकृष्णप्रेमके आनन्दमें विह्वल रहने लगे। श्रीस्वरूप दामोदर पाण्डित्यकी चरम सीमा थे, परन्तु वे किसीसे कोई बातचीत नहीं करते थे। वे एकान्त स्थानपर रहते थे और लोगोंको पता भी नहीं होता था कि वे कहाँ हैं। श्रीस्वरूप दामोदर श्रीकृष्णप्रेमके मूर्त्तरूप थे और श्रीकृष्णरस-तत्त्वके परम ज्ञाता थे। वे महाप्रभुके साक्षात् द्वितीय स्वरूप थे॥109-111॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'कृष्णरस-तत्त्ववेत्ता'—उनकी देह साक्षात् प्रेमरूप थी, उन्हें देखनेसे ही प्रतीत था, जैसे महाप्रभुका द्वितीय स्वरूप उदित हुआ है॥111॥ दामोदर-स्वरूप ही भक्तिरस-सिद्धान्तके एकमात्र परीक्षक :- ग्रन्थ, श्लोक, गीत केह प्रभु-पाशे आने। स्वरूप परीक्षा कैले, प्रभु ताहा सुने॥112॥ महाप्रभुका अप्रिय विषय :- भक्तिसिद्धान्त-विरुद्ध, आर रसाभास। शुनिले ना हय प्रभुर चित्तेर उल्ल़ास॥113॥ अनुवाद—कोई भी व्यक्ति यदि किसी भी प्रकारका ग्रन्थ, श्लोक अथवा गीत लिखकर महाप्रभुके पास सुनानेके लिये लाता, तो पहले श्रीस्वरूप दामोदर उसकी परीक्षा करते। यदि वह दोषरहित होता, तब उसे महाप्रभुको सुनानेकी अनुमति देते। भक्तिसिद्धान्त-विरुद्ध या रसाभास-दोषयुक्त श्लोक-गीतादि सुनकर महाप्रभुके चित्तमें प्रसन्नता नहीं होती थी॥112-113॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'भक्तिसिद्धान्त-विरुद्ध'—अचिन्त्य-भेदाभेद ही भक्ति सिद्धान्त है, इसके विरुद्ध जो कुछ भी है, वही 'भक्तिसिद्धान्त विरुद्ध' है। 'रसाभास' अर्थात् रस जैसा प्रतीत होता है, किन्तु रस नहीं है। इन दो प्रकारकी 'अभक्ति'से वैष्णवोंका दूर रहना कर्त्तव्य है। क्योंकि मायावादी भक्तिसिद्धान्त-विरुद्ध-वाक्य सुनते-सुनते जीवका पतन होता है। रसाभासकी विवेचना करते-करते जीव 'प्राकृत-सहजिया', 'बाउल' और 'जड़रसासक्त' हो जाता है। इन दोषोंसे जो दूषित हैं, उनके सङ्गका निषेध करनेके लिये श्रीमन्महाप्रभुने भक्तिसिद्धान्तविरुद्ध और रसाभासको दूर रखनेकी प्रथाका निर्देश किया है॥113॥ दामोदर-स्वरूपकी परीक्षामें उत्तीर्ण विषयोंमें ही महाप्रभुकी प्रसन्नता :- अतएव स्वरूप गोसाञि करे परीक्षण। शुद्ध हय यदि, प्रभुरे करा'न श्रवण॥114॥ अनुवाद—इसलिये श्रीस्वरूप गोस्वामी पहले परीक्षण करते और यदि वह शुद्ध होता, तभी उसे महाप्रभुको श्रवण कराते॥114॥ अनुभाष्य—जिनसे श्रीकृष्ण भजनमें बाधा पड़ती है, वे सब सिद्धान्त ही भक्तिविरुद्ध हैं, इसलिये अशुद्ध हैं। शुद्धभक्त वैसे सिद्धान्तोंका अनुमोदन नहीं करते। और वे ऐसे रसाभास-परायण भक्तिविरुद्ध सिद्धान्तवाले लोगोंको 'शुद्धभक्त'के रूपमें स्वीकार नहीं कर सकते। अशुद्ध सिद्धान्त अथवा रसाभाससे पुष्ट होकर बहुतसे कुमत जगत्में चल रहे हैं। साधारण व्यक्तियोंसे सम्मान पानेके लिये अनेक लोग ऐसे भक्तिविरोधी असत् सिद्धान्तोंका आदर करते हैं और साथ ही अपनेको श्रीगौरसुन्दरका भक्त भी कहते हैं। परन्तु श्रीदामोदर-स्वरूप गोस्वामी उन्हें 'गौड़ीय-वैष्णव'के रूपमें स्वीकार नहीं करते थे और श्रीमन्महाप्रभुके निकट नहीं जाने देते थे॥114॥ चण्डीदास, विद्यापति और जयदेवके पद गाकर महाप्रभुकी प्रसन्नताका वर्द्धन :- विद्यापति, चण्डीदास, श्रीगीतगोविन्द। एइ तिन गीते करा'न प्रभुर आनन्द॥115॥ 418 ।
दसवाँ अध्याय 10/115-119 ] अनुवाद—श्रीविद्यापति और श्रीचण्डीदासके पद एवं श्रीजयदेव गोस्वामीके द्वारा रचित श्रीगीतगोविन्दके श्लोकों-गीतोंका गान करके श्रीस्वरूप दामोदर महाप्रभुको आनन्द प्रदान करते थे॥ 115 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'विद्यापति'—मिथिला प्रान्तके प्राचीन वैष्णव कवि। 'चण्डीदास'—(वीरभूम-जिलेमें साकुल्लिलपुर थानेके अन्तर्गत) नानूर-ग्रामके प्राचीन बङ्गाली-वैष्णव-कवि। 'श्रीगीतगोविन्द'—श्रीजयदेवके द्वारा रचित कृष्णरसाश्रित संस्कृत गीत समूहसे परिपूर्ण सुप्रसिद्ध काव्य॥ 115 ॥ दामोदर-स्वरूपके गुण :— सङ्गीत-गन्धर्व-सम, शास्त्रे-बृहस्पति। दामोदर-सम आर नाहि महामति ॥ 116 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर सङ्गीतमें गन्धर्वके समान तथा शास्त्रोंके ज्ञानमें देवताओंके गुरु बृहस्पति के समान थे। श्रीस्वरूप दामोदरके समान महाबुद्धिमान और कोई नहीं था ॥ 116 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—स्वरूप गोस्वामी गीत-शास्त्र और साधारण-शास्त्रमें विशेष निपुण थे। श्रीमन्महाप्रभुने उन्हें गानविद्यामें निपुण देखकर पहले ही उन्हें 'दामोदर' नाम दिया था। 'दामोदर' नामके साथ संन्यास गुरुके द्वारा दिया 'स्वरूप' जुड़कर उनका नाम 'दामोदर-स्वरूप' हुआ था। 'संगीतदामोदर' नामक संगीत-शास्त्रका एक ग्रन्थ भी उन्होंने लिखा है॥ 116 ॥ सभी भक्तोंके ही प्रिय पात्र :— अद्वैत-नित्यानन्देर परम प्रियतम। श्रीवासादि भक्तगणेर हय प्राण-सम ॥ 117 ॥ स्वरूप दामोदरके महाप्रभुकी दयाके वैशिष्ट्य वर्णनकारी प्रणाम श्लोक :— सेइ दामोदर आसि' दण्डवत् हैला। चरणे धरिया श्लोक पड़िते लागिला ॥ 118 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर श्रीअद्वैताचार्य और श्रीनित्यानन्द प्रभुके परम प्रियतम तथा श्रीवासादि भक्तोंके प्राणोंके समान थे। वे श्रीस्वरूप दामोदरने महाप्रभुके चरणकमलोंमें दण्डवत् प्रणाम किया और उनके श्रीचरणोंको पकड़कर निम्नलिखित श्लोक पढ़ने लगे॥ 117-118 ॥ श्रीचैतन्यचन्द्रोदय-नाटक (8.14) श्लोक— हेलोद्भूल्लित-खेदया विशदया प्रोन्मीलदामोदया शाम्यच्छास्त्रविवादया रसदया चित्तार्पितोन्मादया। शश्वद्भक्तिविनोदया स-मदया माधुर्यमर्यादया श्रीचैतन्यदयानिधे, तव दया भूयादमन्दोदया ॥ 119 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 119 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे दयानिधे श्रीचैतन्य! जो अनायास ही समस्त खेद दूर करती है, जिसमें सम्पूर्ण निर्मलता है, जिसमें परमानन्द (अन्य सभी विषयोंको आच्छादित करके) प्रकाशित होता है, जिसके उदित होनेसे शास्त्र विवाद समाप्त हो जाते हैं, जो रसकी वर्षा करके चित्तको उन्मत्त बना देती है, जिसकी भक्तिविनोदनक्रिया सर्वदा शमता (स्थिरबुद्धि) दान करती है, माधुर्य मर्यादाके द्वारा आपकी अति विस्तृत वह शुभ प्रदान करनेवाली दया मेरे प्रति उदित हो ॥ 119 ॥ अनुभाष्य— हे दयानिधे श्रीचैतन्य, हेलोद्भूल्लितखेदया (हेलया अवहेलया उद्भूल्लितो दूरीकृतः खेदो मनस्तापो यया तया) विशदया (निर्मलतया सर्वप्रकाशिकया) प्रोन्मीलदामोदया (प्रकृष्टेन उन्मीलन् प्रकाशमानः आमोदः परमानन्दो यस्यां सा तया) शाम्यच्छास्त्रविवादया (शाम्यन् शास्त्राणां विवादः वादप्रतिवादो यस्यां सा तया) रसदया (मधुरादि-रसं ददातीति रसदा तया) चित्तार्पितोन्मादया (चित्ते अर्पितः उन्मादः देहादौ अनभिनिवेशः, यद्वा, प्रौढ़ानन्दापद्विरहादिजः हृद्भ्रमः, दिव्योन्मादः इत्यर्थः, यया सा तया) शश्वद्भक्तिविनोदया (शश्वत् निरन्तरं भक्तिं विनोदयति स्वभावेन प्रेरयति या तया) समदया (मदः अनङ्गविक्रियाभरजः विवेकहरः उल्लासः, तेन सहितया, 'शमदया' इति पाठे तु—कृष्णेतर-तृष्णया रहितया) माधुर्यमर्यादया (माधुर्याणां मर्यादा सीमा यस्यां सा तया—विशेषणे तृतीया) तव अमन्दोदया (मन्दः कुण्ठः तद्रहितः अमन्दः निःश्रेयसं, तस्य उदयो यस्यां सा) दया [मयि] भूयात् (भवतु)। । 419
[ 10/119-120 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्लोक-भावानुवाद—हे दयानिधे श्रीचैतन्य! जो अनायास ही समस्त खेद दूर करती है, जिसमें सम्पूर्ण निर्मलता है, जिसमें परमानन्द (अन्य सभी विषयोंको आच्छादित करके) प्रकाशित होता है, जिसके उदित होनेसे शास्त्रोंके वाद-प्रतिवाद समाप्त हो जाते हैं, जो (मधुरादि) रसकी वर्षा करके देहमें अभिनिवेशको दूर करके चित्तको (दिव्योन्माद अवस्था तक) उन्मत्त बना देती है, जिसकी भक्तिविनोदनक्रिया सर्वदा (समदया पाठसे) प्रणयोन्मत्त अथवा (शमदया पाठसे) श्रीकृष्णेतर-तृष्णा-रहित करती है, माधुर्य मर्यादाके द्वारा आपकी अति विस्तृत वह शुभ प्रदान करनेवाली दया मेरे प्रति उदित हो। औदार्यमय प्रेम विग्रह भगवान् श्रीचैतन्यचन्द्र तीन प्रकारसे अपनी करुणाको सुकृतिसम्पन्न जीवोंमें वितरण करते हैं। जीव सांसारिक अभावोंसे दुःखी होकर अनेक उपायोंके द्वारा क्लेश दूर करनेका प्रयास करनेपर भी सफल नहीं होते। भगवान्की दया जीवके प्रयासके द्वारा प्राप्त नहीं की जा सकती। भगवद्-कृपासे जीवके हृदयमें श्रीकृष्ण-चरणकमलकी गन्धका विकास होता है, उससे चित्तसे खेदरूपी धूलि अनायास ही उड़ जाती है, इसलिये हृदय निर्मल हो जाता है। तब हृदयमें श्रीकृष्णसेवाजनित परमानन्द प्रकाशित होता है। शास्त्रोंकी विभिन्न प्रकारकी व्याख्याओंसे विवाद चित्तमें उदित होकर अनेक वाद-प्रतिवाद करते हैं। भगवद्-कृपा प्राप्त करनेपर ही कृपा प्राप्त करनेवाला हृदय भगवद्-रसमें उन्मत्त हो जाता है। दूसरी ओर, श्रीकृष्णरस प्रदान करनेवाली मत्तता भी भगवद्-कृपाके बलसे ही उदित होती है, इसलिये शास्त्र-विवाद शान्त हो जाते हैं। माधुर्य-मर्यादा जीवको निरन्तर श्रीकृष्ण-चरणोंमें अवस्थित कराती है और सौभाग्यवान् जीव उस समयमें केवल प्रेमभक्तिसे ही प्रीति प्राप्त करता हैं। श्रीकृष्णकृपा-निर्मला, रसदा और स-मदा है। श्रीकृष्णकृपाके कारण हृदयके निर्मल होनेपर अभाव-जनित कोई खेदरूपी मल नहीं रहता। श्रीकृष्ण कृपावशतः रस प्राप्त करनेपर शास्त्र-विवाद शान्त होनेसे भक्तिसिद्धान्त सुदृढ़ होता है, इसलिये चित्त श्रीकृष्णप्रेममें उन्मत्त हो जाता है। श्रीकृष्णकृपाके कारण शमता (भगवन् निष्ठा बुद्धि) प्राप्त करके माधुर्य-गौरवमें निरन्तर भक्तिमें विनोदकी प्राप्ति होती है। जीव-पहले ईश्वरविमुख होता है और विषयोंमें फंसकर खिन्न रहता है। उसके बाद ईश्वरके अनुसन्धानमें लगता है और अन्तमें भगवान्की सेवामें रत होता है। भगवान्की दयासे पहले उसकी अनर्थ-निवृत्ति, उससे उत्पन्न हृदयकी निर्मलता एवं हृदयकी निर्मलताके परिणामसे श्रीकृष्ण-आमोदका विकास होता है। भगवान्की दयासे तब भक्तिसिद्धान्तकी प्राप्ति तथा फलस्वरूप रसोत्पत्तिसे प्रेमोन्मत्तताकी प्राप्ति होती है। भगवान्की दयासे अन्तमें भक्तिमें अनुरक्ति तथा उसके फलस्वरूप सर्वत्र भगवद्-लीलाकी स्फूर्तिकी प्राप्ति एवं स्फूर्तिसे माधुर्य-पराकाष्ठाकी प्राप्ति होती है। श्रीकृष्ण-कृपासे तृष्णासे मुक्त होकर श्रीकृष्णकीर्तन-सेवा (प्रचार) करते हुए भी जीवका श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्यत्र विराग हो सकता है अथवा उसे मुक्तिकी कामना हो सकती है। तब जीवके विषयी होनेपर भी श्रीकृष्णकृपाके बलसे श्रवण-मनोभिराम (कानों और मनको आनन्द देनेवाले) हरिगुणानुवादके फलसे उसका विषय-भोगका त्याग हो सकता है अथवा भवरोगकी औषधि प्राप्त करके मुक्तिकी कामनाका त्याग हो सकता है। तब श्रीकृष्णकी अनुभूति प्राप्तकर अन्तमें जीव शुद्धभक्तिमें अवस्थित हो सकता है। इसलिये सब समय भगवान्की दया ही आश्रय करने योग्य है ॥ 119 ॥ परस्परके स्पर्शसे महाप्रभु और स्वरूप दामोदरका प्रेम :- उठाञा महाप्रभु कैल आलिङ्गन। दुइजने प्रेमावेशे हैल अचेतन ॥ 120 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदरको उठाकर उनका आलिङ्गन किया और दोनों ही प्रेमावेशमें अचेतन हो गये॥ 120 ॥ 420 ।
दसवाँ अध्याय 10/121–133 ] स्थिर होकर गाढ़-प्रीतिसे भरकर महाप्रभुके द्वारा स्वरूप दामोदरका अभिनन्दन :- कतक्षणे दुइ जने स्थिर यबे हैला। तबे महाप्रभु ताँरे कहिते लागिला ॥ 121 ॥ “तुमि ये आसिबे, आजि स्वप्नेते देखिल। भाल हैल, अन्ध येन दुइ नेत्र पाइल ॥” 122 ॥ अनुवाद—कुछ देरके बाद जब दोनोंने धैर्य धारण किया, तब महाप्रभु श्रीस्वरूप दामोदरसे कहने लगे,—“मैंने स्वप्नमें देखा था कि आप आज आयेंगे। बहुत अच्छा हुआ, आपके आनेसे ऐसा आनन्द हो रहा है, मानो अन्धेको दो नेत्र मिल गये हों ॥” 121-122 ॥ स्वरूप दामोदरकी दीनतापूर्ण उक्ति :- स्वरूप कहे,—“प्रभु, मोर क्षम' अपराध। तोमा छाड़ि' अन्यत्र गेनु, करिनु प्रमाद ॥ 123 ॥ तोमार चरणे मोर नाहि प्रेम-लेश। तोमार छाड़ि' पापी मुञ्जि गेनु अन्य-देश ॥ 124 ॥ मुञ्जि तोमा छाड़िल, तुमि मोरे ना छाड़िला। कृपा-पाश गलाय बान्धि' चरणे आनिला ॥ 125 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,—“हे प्रभो! आप मेरे अपराधको क्षमा कीजिये। मैं प्रमादवशतः आपको छोड़कर कहीं और चला गया था। आपके चरणकमलोंमें मेरा लेशमात्र भी प्रेम नहीं है, तभी तो मेरे जैसा पापी व्यक्ति आपको छोड़कर किसी और स्थानपर चला गया था। मैंने आपको छोड़ा था, परन्तु आपने मुझे नहीं छोड़ा। अपने कृपारूपी पाशको मेरे गलेमें बाँधकर आप मुझे अपने श्रीचरणकमलोंके आश्रयमें ले आये हैं ॥” 123-125 ॥ निताइको प्रणाम और निताइके द्वारा आलिङ्गन :- तबे स्वरूप कैल निताइर चरण-वन्दन। नित्यानन्दप्रभु कैल प्रेम-आलिङ्गन ॥ 126 ॥ अन्यान्य सभी भक्तोंके साथ मिलन :- जगदानन्द, मुकुन्द, शङ्कर, सार्वभौम। सबा-सङ्गे यथायोग्य करिल मिलन ॥ 127 ॥ श्रीपरमानन्द पुरीकी वन्दना :- परमानन्द पुरीर कैल चरण वन्दन। पुरी-गोसाञि ताँरे कैल प्रेम-आलिङ्गन ॥ 128 ॥ अनुवाद—तब श्रीस्वरूप दामोदरने श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणकमलोंकी वन्दना की और श्रीनित्यानन्द प्रभुने उनका प्रेमपूर्वक आलिङ्गन किया। श्रीस्वरूप दामोदर श्रीजगदानन्द पण्डित, श्रीमुकुन्द, श्रीशङ्कर और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यसे यथोचित रूपसे मिले। श्रीस्वरूप दामोदरने श्रीपरमानन्द पुरीके चरणोंकी वन्दना की और पुरी गोस्वामीने प्रेमपूर्वक उनका आलिङ्गन किया ॥ 126-128 ॥ योग्य वासस्थान और एक सेवककी प्राप्ति :- महाप्रभु दिल ताँरे निभृते वासाघर। जलादि-परिचर्या लागि' दिल एक किङ्कर ॥ 129 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदरको एकान्तमें रहनेका कमरा दिया और जलादि सभी आवश्यकताओंके लिये एक सेवकको भी नियुक्त कर दिया ॥ 129 ॥ भक्तोंसे घिरे महाप्रभु :- आर दिन सार्वभौम-आदि भक्त-सङ्गे। बसिया आछेन महाप्रभु कृष्णकथा-रङ्गे ॥ 130 ॥ श्रीगोविन्दका आगमन और अपना परिचय देना :- हेनकाले गोविन्देर हैल आगमन। दण्डवत् करि' कहे विनय-वचन ॥ 131 ॥ “ईश्वरपुरीर भृत्य,—'गोविन्द' मोर नाम। पुरी-गोसाञिर आज्ञाय आइनु तोमार स्थान ॥ 132 ॥ सिद्धिप्राप्तिकाले गोसाञि आज्ञा कैल मोरे। कृष्णचैतन्य-निकटे याइ' सेविह ताँहारे ॥ 133 ॥ । 421
[ 10/130-140 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अपने गुरुभ्राता श्रीकाशीश्वरकी बादमें महाप्रभुका उचित उत्तर-दान—ईश्वर या शक्तिशालीका आनेकी सम्भावनाको बताना :— आचरण; स्नेह-कृपा और मर्यादाका वैशिष्ट्य :— काशीश्वर आसिबेन सब तीर्थ देखिया। प्रभु कहे,—“ईश्वर हय परम स्वतन्त्र। प्रभु-आज्ञाय मुञि आइनु तोमा-पदे धाञा॥” 134॥ ईश्वरेर कृपा नहे वेद-परतन्त्र॥ 137॥ अनुवाद—अगले दिन श्रीसार्वभौमादि भक्तोंके साथ ईश्वरेर कृपा जाति-कुल नाहि माने। महाप्रभु जब बैठकर श्रीकृष्णकथाका आस्वादन कर रहे विदुरेर घरे कृष्ण करिला भोजने॥ 138॥ थे, तभी श्रीगोविन्द वहाँ आ गये। उन्होंने महाप्रभुको स्नेह-सेवापेक्षा मात्र श्रीकृष्ण-कृपार। दण्डवत् प्रणाम करके विनयपूर्वक कहा,—“मैं श्रीईश्वरपुरीका स्नेहवश हञा करे स्वतन्त्र आचार॥ 139॥ दास हूँ, मेरा नाम ‘गोविन्द’ है। मैं उनकी आज्ञासे मर्यादा हैते कोटि सुख स्नेह-आचरणे। आपके पास आया हूँ। अप्रकट होनेके समय उन्होंने परमानन्द हय यार नाम-श्रवणे॥” 140॥ मुझे आदेश दिया था कि मैं आपके पास आकर आपकी सेवा करूँ। श्रीकाशीश्वर भी तीर्थोंका दर्शन अनुवाद—महाप्रभुने उत्तर दिया,—“ईश्वर परम स्वतन्त्र करके यहाँ आयेंगे। मैं तो प्रभुके आदेशानुसार सीधा हैं, इसलिये उनकी कृपा भी वेदोंके अधीन नहीं है। आपके चरणोंमें तुरन्त उपस्थित हुआ हूँ॥”130-134॥ ईश्वरकी कृपामें जाति-कुलादिका भेद-भाव नहीं है। अमृतप्रवाह भाष्य— ‘काशीश्वर और गोविन्द’,—ये जैसे विदुरके शूद्र होनेपर उनके घरमें श्रीकृष्णने भोजन दोनों ही श्रीईश्वरपुरीके साथ रहते थे। श्रीकाशीश्वर किया था। श्रीकृष्णकी कृपा स्नेहपूर्वक की गयी सेवाकी अन्यान्य तीर्थ भ्रमण करके महाप्रभुके पास बादमें ही अपेक्षा करती है। और उसी स्नेहके वशीभूत होकर आयेंगे। श्रीगोविन्दने श्रीईश्वरपुरीकी सिद्धि-प्राप्ति (अप्रकट श्रीकृष्ण स्वतन्त्र आचरण करते हैं। मर्यादापूर्ण आचरणकी होने)के तुरन्त बाद ही महाप्रभुके चरणोंका आश्रय अपेक्षा स्नेहपूर्ण आचरणमें करोड़ो गुणा अधिक आनन्द किया था॥134॥ होता है। भक्तको भगवान्के नाम सुनने मात्रसे ही महाप्रभुकी दीनता :— परमानन्दकी प्राप्ति होती है॥”137-140॥ गोसाञि कहिल,—“पुरीश्वर वात्सल्य करे मोरे। अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णकृपा और किसीकी कृपा करि' मोर ठाञि पाठाइला तोमारे॥” 135॥ अपेक्षा नहीं रखती, केवल स्नेहसेवाकी ही अपेक्षा अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“श्रीईश्वरपुरी पादका मेरे करती है। सेवा दो प्रकारकी है—स्नेह-सेवा ओर प्रति वात्सल्य स्नेह था, इसलिये उन्होंने कृपा करके मर्यादा-सेवा। जहाँ स्नेह-सेवा होती है, वहींपर ही आपको मेरे पास भेजा है॥”135॥ केवल श्रीकृष्णकृपा होती है। जहाँ मर्यादा-सेवा होती है, गोविन्दके सम्बन्धमें श्रीसार्वभौमका प्रश्न :— वहाँ श्रीकृष्णकृपा सहज नहीं है; कृपामें जाति-कुलका एत शुनि' सार्वभौम प्रभुरे पुछिल। विचार नहीं रहता॥139॥ “पुरी-गोसाञि शूद्र-सेवक काँहे त' राखिल॥” 136॥ अनुभाष्य—‘श्रीईश्वर पुरी’—श्रीमध्व-वैष्णव-संन्यासी थे। उन्होंने शूद्रवंशमें जन्में दीक्षित-ब्राह्मण गोविन्दको अनुवाद—यह सुनकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने ‘सेवक’-रूपमें किस प्रकार अपना शिष्य बनाया था?—यही महाप्रभुसे पूछा,—“श्रीईश्वरपुरीने शूद्रको सेवक क्यों श्रीसार्वभौमके प्रश्नका कारण था। स्मृतिके मतानुसार— रखा था?॥”136॥ ब्राह्मणके अतिरिक्त अन्य वर्णके किसी व्यक्तिको शिष्य 422 ।
दसवाँ अध्याय 10/137-145 ] अथवा सेवकरूपमें ग्रहण करनेपर ब्राह्मण-गुरुका पतन हो जाता है। श्रीईश्वरपुरीने सदाचार सम्पन्न होकर भी स्मृतिमें निर्धारित आदेशका किस प्रकार उल्लङ्घन किया ? उसके उत्तरमें महाप्रभुने कहा, — 'मेरे गुरुदेव - ईश्वर' अर्थात् जगत्के प्रभु हैं, इसलिये वे साधारण जीवोंके नियामक स्मृतिशास्त्रके अधीन नहीं है। ईश्वर अर्थात् समर्थवान् गुरुदेवकी कृपा कभी भी वैदिक-शासनके अधीन नहीं है।" परमेश्वर जगद्गुरु श्रीकृष्णने जाति-कुलके लौकिक विचारको छोड़कर विदुरके घरमें भोजन किया था। मेरे प्रभु श्रीईश्वरपुरीने कृपा करके गोविन्दके शौक्र- जन्मादिका विचार नहीं किया, क्योंकि वे जानते हैं कि वैष्णव-दीक्षाके द्वारा वह स्वतः ही ब्राह्मण हो जायेगा। इसलिये उन्होंने गोविन्दको दीक्षा प्रदान करके 'सेवक'के रूपमें ग्रहण किया था ॥ 137-138 ॥ श्रीगोविन्दका आलिङ्गन, श्रीगोविन्दके द्वारा सब भक्तोंके चरणोंकी वन्दना :- एत बलि' गोविन्दे कैल आलिङ्गन। गोविन्द करिल सबार चरण वन्दन ॥ 141 ॥ अनुवाद—इतना कहकर महाप्रभुने श्रीगोविन्दका आलिङ्गन किया। श्रीगोविन्दने महाप्रभु और सभी भक्तोंके चरणोंकी वन्दना की ॥ 141 ॥ महाप्रभुकी भट्टाचार्यसे जिज्ञासा - गुरुसेवकसे सेवा ग्रहण करना उचित है या अनुचित :- प्रभु कहे,—“भट्टाचार्य, करह विचार। गुरुर किङ्कर हय मान्य आपनार ॥ 142 ॥ ताँहारे आपन-सेवा कराइते ना युयाय। गुरु-आज्ञा दियाछेन, कि करि उपाय ॥” 143 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यसे कहा,— “भट्टाचार्य ! कृपया इस बातपर विचार कीजिये कि गुरुदेवका सेवक (गोविन्द) मेरे लिये पूजनीय है। इससे अपनी व्यक्तिगत सेवा कराना उचित नहीं है, किन्तु श्रीगुरुदेवने ऐसा आदेश दिया है। तब ऐसी परिस्थितिमें मुझे क्या करना चाहिये ? ॥” 142-143 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'गुरुर किङ्कर' - गुरुका सेवक सहज ही सम्माननीय, उसे अपनी सेवा करने देना उचित नहीं है ॥ 142-143 ॥ अनुभाष्य-गुरुका प्रत्येक सेवक ही अन्यान्य प्रत्येक शिष्यके लिये ही सम्माननीय है। उसे अपनी सेवामें नियुक्त करना उचित नहीं होनेपर भी गुरुके आदेशको पालन करनेके लिये उसे स्वीकार किस प्रकारसे किया जाय, इस विषयमें विचार करो ॥ 142-143 ॥ श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यका उत्तर,— गुरु-आज्ञा अवश्य ही पालनीय- भट्ट कहे,—“गुरुर आज्ञा हय बलवान् । गुरु-आज्ञा ना लङ्घिये, शास्त्र-प्रमाण ॥” 144 ॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“गुरुकी आज्ञा अत्यन्त बलवान् होती है। गुरुकी आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं करना चाहिये, शास्त्र ही इस विषयमें प्रमाण हैं॥” 144 ॥ गुरु-आज्ञा पालनका पौराणिक दृष्टान्त :- रघुवंश (14/46) – स शुश्रुवान्मातरि भार्गवेण पितुर्नियोगात् प्रहृतं द्विषद्वत्। प्रत्यग्रहीदग्रजशासनं तदाज्ञा गुरूणां ह्यविचारणीया ॥ 145 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 145 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - पिताकी आज्ञासे परशुरामजीने अपनी माता (रेणुका) का शत्रु की भाँति वध किया था, —यह सुनकर लक्ष्मणजीने ज्येष्ठ भ्राता श्रीरामचन्द्रकी आज्ञाको ग्रहण किया था; क्योंकि गुरुवर्गोंकी आज्ञा-अविचारणीया होती है ॥ 145 ॥ अनुभाष्य- भार्गवेण (जामदग्न्येन) पितुर्नियोगात् (जामदग्न्यादेशेन) मातरि । 423