श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
[ 13/19-29 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य- 'साजनि'-सजावट। 'घाघर'–झाँझ; मर्यादाका पालन करते हुए पन्द्रह दिनों तक निर्जनमें 'किङ्किणी'–घुँघरु; 'क्वणित'–ध्वनि ॥ 19-21 ॥ महालक्ष्मीके साथ बिना किसी बाधाके क्रीड़ा की थी। श्रीजगन्नाथ, बलराम और सुभद्राका रथारोहण :- अब लक्ष्मीकी सम्मतिसे अनुराग मार्गके श्रीकृष्णमें लीलाय चड़िल ईश्वर रथेर उपर। ऐकान्तिक-निष्ठ भक्तोंको आनन्द देनेके लिये रथपर आर दुइ रथे चड़े सुभद्रा, हलधर ॥ 22 ॥ चढ़कर स्वच्छन्द विहारके लिये बाहर निकले। यह कहना अधिक होगा कि स्वकीयाभाव यहाँ शिथिल हो अनुवाद-रथयात्राकी लीला करनेके लिये श्रीजगन्नाथ जाता है। रथके जानेका मार्ग यमुनाके तटके समान रथके ऊपर चढ़ गये। श्रीसुभद्रा और हलधर श्रीबलराम सूक्ष्म सफेद बालूसे ढ़का हुआ था। मार्ग दोनों ओरसे अन्य दो रथोंपर चढ़े ॥ 22 ॥ वृन्दावनके समान उपवनोंसे घिरा था ॥ 23-25 ॥ अनवसरकालके पन्द्रह दिन लक्ष्मीके साथ श्रीजगन्नाथका विलास :- रथे चड़ि' जगन्नाथ करिला गमन। पञ्चदश दिन ईश्वर महालक्ष्मी लञा। दुइपार्श्वे देखि' चले आनन्दित-मन ॥ 26 ॥ ताँर सङ्गे क्रीड़ा कैल निभृते बसिया ॥ 23 ॥ अनुवाद-रथपर चढ़कर श्रीजगन्नाथ चलने लगे विलासके बाद लक्ष्मीकी सहमतिसे रथारोहण :- और दोनों ओरके दृश्यको देखकर उनका मन ताँहार सम्मति लञा भक्ते सुख दिते। आनन्दित हो रहा था ॥ 26 ॥ रथे चड़ि' बाहिर हैल विहार करिते ॥ 24 ॥ गौड़गणोंके द्वारा रथकी रस्सीको खींचना, स्वेच्छामय अनुवाद-स्नानयात्राके बाद पन्द्रह दिनों तक भगवान्की इच्छाके अनुसार रथका चलना :- श्रीजगन्नाथने महालक्ष्मीके साथ एकान्तमें रहकर लीला 'गौड़' सब रथ टाने करिया आनन्द। विहार किया। उसके बाद महालक्ष्मीकी अनुमति लेकर क्षणे शीघ्र चले रथ, क्षणे चले मन्द ॥ 27 ॥ श्रीजगन्नाथ भक्तोंको सुख प्रदान करनेके उद्देश्यसे रथपर क्षणे स्थिर हञा रहे, टानिेलेह ना चले। चढ़कर विहार करनेके लिये बाहर आ गये ॥ 23-24 ॥ ईश्वर-इच्छाय चले, ना चले कारो बले ॥ 28 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीजगन्नाथदेव, स्नानके बाद जिन पन्द्रह दिनों तक एकान्तमें रहते हैं, उस समयको अनुवाद-सब 'गौड़' बड़े आनन्दसे रथको खींच 'अनवसर' अथवा निभृत-काल कहते हैं। उसके बाद रहे थे। कभी रथ तेजीसे चलता, तो कभी धीरे चलता वे लक्ष्मीकी अनुमति लेकर रथमें गमन करते हैं॥ 23 ॥ और कभी स्थिर होकर एक स्थानपर खड़ा हो जाता और पूरा बल लगाकर खींचनेपर भी आगे नहीं बढ़ता। रथके जानेके मार्गका वर्णन :- श्रीजगन्नाथकी इच्छासे ही रथ चलता है, किसीके बलसे सूक्ष्म श्वेतबालु पथे पुलिनेर सम। नहीं ॥ 27-28 ॥ दुइदिके तोटा, सब-येन वृन्दावन ॥ 25 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'गौड़'–उड़ीसावासी ग्वालोंको 'गौड़' अनुवाद-रथके मार्गपर यमुना तटके समान सूक्ष्म कहते हैं ॥ 27 ॥ श्वेत बालू फैली हुई थी और मार्गके दोनों ओर सुन्दर महाप्रभुका भक्तोंको अपने हाथोंसे माला-चन्दन देना :- उद्यान थे-इन सबको देखकर ऐसा प्रतीत होता था तबे महाप्रभु सब लञा भक्तगण। मानो यह वृन्दावन है ॥ 25 ॥ स्वहस्ते पराइल सबे माल्य-चन्दन ॥ 29 ॥ अनुभाष्य-अनवसर-कालमें श्रीजगन्नाथदेवने पतिकी 500 ।
तेरहवाँ अध्याय 13/29-39 ] सर्वप्रथम गुरुवर्गोंका सम्मान :- परमानन्द पुरी, आर भारती ब्रह्मानन्द। श्रीहस्ते चन्दन पाञा बाड़िल आनन्द॥ 30 ॥ अद्वैत-आचार्य, आर प्रभु-नित्यानन्द। श्रीहस्त-स्पर्शे दुँहार हइल आनन्द॥ 31 ॥ प्रधान कीर्तनीया श्रीस्वरूप और श्रीवासका समादर :- कीर्त्तनीयागणे दिल माल्य-चन्दन। स्वरूप, श्रीवास, -याँहा मुख्य दुइजन ॥ 32 ॥ अनुवाद-जब रथ रुका हुआ था, तब महाप्रभुने सभी भक्तोंको एकत्रित करके अपने श्रीहस्तसे माला पहनायी और उन्हें चन्दन लगाया। महाप्रभुके श्रीहस्तसे माला-चन्दन प्राप्त करके श्रीपरमानन्द पुरी और श्रीब्रह्मानन्द भारतीका आनन्द बहुत अधिक बढ़ गया। श्रीअद्वैताचार्य और श्रीनित्यानन्द प्रभु भी महाप्रभुके श्रीहस्तका स्पर्श पाकर बहुत आनन्दित हुए। महाप्रभुने सभी कीर्तन करनेवालोंको भी माला-चन्दन प्रदान किये। उनमें श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीवास पण्डित मुख्य कीर्तनीया थे॥ 29-32 ॥ मृदङ्गवादक और गायकोंकी चार कीर्तन-मण्डलियाँ :- चारि सम्प्रदाये हैल चब्बिश गायन। दुइ दुइ मृदङ्ग करि' हैल अष्टजन ॥ 33 ॥ महाप्रभुके द्वारा कीर्तन-मण्डलीका विभाग :- तबे महाप्रभु मने विचार करिया। चारि सम्प्रदाय दिल गायन बाँटिया ॥ 34 ॥ अनुवाद-कीर्तन करनेवाली चार मण्डलियोंमें चौबीस गायक थे। प्रत्येक मण्डलीमें दो-दो मृदङ्ग बजानेवाले थे अर्थात् आठ लोग थे। तब महाप्रभुने मनमें विचार करके चौबीस गायकोंको चार मण्डलियोंमें बाँट दिया। इस प्रकार प्रत्येक मण्डलीमें छह-छह गायक और दो-दो मृदङ्ग बजानेवाले थे॥ 33-34 ॥ चार मण्डलियोंमें चार नर्तक :- नित्यानन्द, अद्वैत, हरिदास, वक्रेश्वरे। चारिजने आज्ञा दिल नृत्य करिबारे ॥ 35 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीअद्वैताचार्य, श्रीहरिदास ठाकुर और श्रीवक्रेश्वर पण्डितको एक-एक मण्डलीमें नृत्य करनेका आदेश दिया॥ 35 ॥ प्रथम मण्डलीमें श्रीस्वरूपही मूल गायक :- प्रथम-सम्प्रदाये कैल स्वरूप-प्रधान। आर पञ्चजन दिल ताँर पालिगान ॥ 36 ॥ श्रीस्वरूपके साथ पाँच भक्त उनके पीछे गानेवाले :- दामोदर, नारायण, दत्त गोविन्द। राघव पण्डित, आर श्रीगोविन्दानन्द ॥ 37 ॥ अनुवाद-प्रथम मण्डलीमें श्रीस्वरूप दामोदरको प्रधान कीर्तनीया बनाया और उन्हें पाँच लोग - श्रीदामोदर पण्डित, श्रीनारायण, श्रीगोविन्द दत्त, श्रीराघव पण्डित और श्रीगोविन्दानन्द, उनके पीछे गानेके लिये दिये॥ 36-37 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'पालिगान' - दोहराना ॥ 36 ॥ और श्रीअद्वैत ही नर्तक; दूसरी मण्डलीमें श्रीवास मूल गायक :- अद्वैतेरे नृत्य करिबारे आज्ञा दिल। श्रीवास-प्रधान आर सम्प्रदाय कैल ॥ 38 ॥ पाँच लोग पीछे गानेवाले, श्रीनिताइ-नर्तक :- गङ्गादास, हरिदास, श्रीमान्, शुभानन्द। श्रीराम पण्डित, ताँहा नाचे नित्यानन्द ॥ 39 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीअद्वैताचार्यको श्रीस्वरूप दामोदरकी मण्डलीमें नृत्य करनेका आदेश दिया और श्रीवास पण्डितको दूसरी मण्डलीका प्रधान कीर्तनीया नियुक्त किया। दूसरी मण्डलीमें श्रीवास पण्डितके पीछे गानेवाले श्रीगङ्गादास, श्रीहरिदास, श्रीमान्, श्रीशुभानन्द और श्रीराम पण्डित थे। उस मण्डलीमें नृत्य करनेवाले श्रीनित्यानन्द प्रभु थे॥ 38-39 ॥ । 501
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[ 13/33-48 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला तीसरी मण्डलीमें श्रीमुकुन्द मूल गायक, पाँच लोग पीछे गानेवाले, श्रीहरिदास ठाकुर ही नर्तक :- वासुदेव, गोपीनाथ, मुरारि याँहा गाय। मुकुन्द-प्रधान कैल आर सम्प्रदाय ॥ 40 ॥ श्रीकान्त, वल्लभसेन आर दुइ जन। हरिदास ठाकुर ताँहा करेन नर्त्तन ॥ 41 ॥ अनुवाद - तीसरी मण्डलीमें श्रीमुकुन्दको प्रधान कीर्तनीया नियुक्त किया और उनके सहायक गानेवाले श्रीवासुदेव, श्रीगोपीनाथ, श्रीमुरारि, श्रीकान्त तथा श्रीवल्लभसेन थे। इस मण्डलीमें श्रीहरिदास ठाकुर नर्तक थे ॥ 40-41 ॥ चौथी मण्डलीमें श्रीगोविन्द घोष ही मूल गायक, पाँच लोग पीछे गानेवाले, श्रीवक्रेश्वर नर्तक :- गोविन्द घोष-प्रधान कैल आर सम्प्रदाय। हरिदास, विष्णुदास, राघव, याँहा गाय ॥ 42 ॥ माधव, वासुदेव-घोष, - दुइ सहोदर। नृत्य करेन ताँहा पण्डित-वक्रेश्वर ॥ 43 ॥ अनुवाद - चौथी मण्डलीमें श्रीगोविन्दघोषको प्रधान कीर्तनीया बनाया और इसमें श्रीहरिदास, श्रीविष्णुदास, श्रीराघव, तथा दो भाई-श्रीमाधव और श्रीवासुदेव घोष, कुल मिलाकर पाँच सहायक गायक थे और श्रीवक्रेश्वर पण्डित नर्तक थे ॥ 42-43 ॥ रथके एक ओर कुलीनग्रामवासियोंका कीर्तन-दल :- कुलीन-ग्रामेर एक कीर्त्तनीया-समाज। ताँहा नृत्य करेन रामानन्द, सत्यराज ॥ 44 ॥ अनुवाद - कुलीन-ग्रामसे भी एक कीर्तनमण्डली आयी थी और महाप्रभुने उसमें श्रीरामानन्द वसु और श्रीसत्यराज खाँको नृत्य करनेके लिये नियुक्त किया ॥ 44 ॥ दूसरी ओर श्रीअद्वैताचार्यके अनुगतजन :- शान्तिपुरेर आचार्येर एक सम्प्रदाय। अच्युतानन्द नाचे तथा, आर सब गाय ॥ 45 ॥ अनुवाद - श्रीअद्वैताचार्यकी शान्तिपुरसे एक मण्डली आयी थी जिसमें श्रीअच्युतानन्द नृत्य कर रहे थे और अन्य सब गायक थे ॥ 45 ॥ रथके पीछे खण्डवासियोंके कीर्तनदलमें श्रीनरहरि और श्रीरघुनन्दन ही नर्तक :- खण्डेर सम्प्रदाय करे अन्यत्र कीर्त्तन। नरहरि नाचे ताँहा श्रीरघुनन्दन ॥ 46 ॥ अनुवाद - श्रीखण्डसे भी एक मण्डली आयी थी जो रथके पीछे अन्य स्थानपर कीर्तन कर रही थी। उसमें श्रीनरहरि और श्रीरघुनन्दन नृत्य कर रहे थे ॥ 46 ॥ सात सम्प्रदायोंके अवस्थानकी पुनः आलोचना :- जगन्नाथेर आगे चारिसम्प्रदाय गाय। दुइ पाशे दुइ, पाछे एक सम्प्रदाय ॥ 47 ॥ सात सम्प्रदाये बाजे चौद्द मादल। यार ध्वनि शुनि' हैल वैष्णव पागल ॥ 48 ॥ अनुवाद - श्रीजगन्नाथके आगे चार मण्डलियोंमें गान हो रहा था। रथके दोनों ओर एक-एक मण्डली और पीछे एक मण्डली थी। सात मण्डलियोंमें कुल चौदह मृदङ्ग बज रहे थे जिनकी ध्वनिको सुनकर वैष्णवगण आनन्दसे पागल हो रहे थे ॥ 47-48 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'सात सम्प्रदाय' - पूर्वोक्त चारों मण्डलियोंके साथ कुलीनग्रामकी मण्डली, शान्तिपुरकी मण्डली और श्रीखण्डकी मण्डली मिलाकर कुल सात मण्डलियाँ हुईं एवं दो-दो मृदङ्गके हिसाबसे चौदह मृदङ्गोंके साथ कीर्तन हुआ ॥ 48 ॥ अनुभाष्य - 'गायन' - गायक; सात-मण्डलयोंका क्रमपूर्वक विवरण इस प्रकार है- श्रीजगन्नाथके रथके आगे- (क) पहली मण्डलीके प्रधान (मूल) गायक-श्रीदामोदर स्वरूप; गायक (पीछे दोहरानेवाले) - 1) श्रीदामोदर पण्डित, 2) श्रीनारायण, 3) श्रीगोविन्द दत्त, 4) श्रीराघव पण्डित, 5) श्रीगोविन्दानन्द; 502 ।
तेरहवाँ अध्याय 13/33-55 ] नर्तक—श्रीअद्वैताचार्य। (ख) दूसरी मण्डलीके मूल गायक—श्रीवास; पीछे दोहरानेवाले—1) श्रीगङ्गादास, 2) (बड़े?) श्रीहरिदास, 3) श्रीमान्, 4) श्रीशुभानन्द, 5) श्रीराम; नर्तक—श्रीनित्यानन्द प्रभु। (ग) तीसरी मण्डलीके मूल गायक—श्रीमुकुन्द; पीछे दोहरानेवाले—1) श्रीवासुदेव दत्त, 2) श्रीगोपीनाथ, 3) श्रीमुरारि, 4) श्रीकान्त, 5) श्रीवल्लभसेन; नर्तक—श्रीहरिदास ठाकुर। (घ) चौथी मण्डलीके मूल गायक—श्रीगोविन्द; पीछे दोहरानेवाले—1) (छोटा?) श्रीहरिदास, 2) श्रीविष्णुदास, 3) श्रीराघव, 4) श्रीमाधव, 5) श्रीवासुघोष; नर्तक—श्रीवक्रेश्वर। रथके बाँयी ओर (ङ) पाँचवीं मण्डलीके गायक—कुलीन ग्रामवासिगण; नर्तक—श्रीरामानन्द और श्रीसत्यराज। रथके दाँयी ओर—(च) छठी मण्डलीके गायक—श्रीअद्वैताचार्यके अनुगतजन; नर्तक—श्रीअच्युतानन्द। रथके पीछे—(छ) सातवीं मण्डलीके गायक—खण्डवासिगण; नर्तक—श्रीनरहरि और श्रीरघुनन्दन ॥ 33-48 ॥ महासंङ्कीर्त्तन-वर्णन :- वैष्णवेर मेघ घटाय हइल बाद्ल। कीर्त्तनानन्दे सब वर्षे नेत्र-जल ॥ 49 ॥ त्रिभुवन भरि' उठे कीर्त्तनेर ध्वनि। अन्य वाद्यादिर ध्वनि किछुइ ना शुनि ॥ 50 ॥ अनुवाद—सभी वैष्णव मेघकी घटाके समान एकत्रित होकर बादलकी भाँति छा गये और कीर्त्तनके आनन्दमें उनके नेत्रोंसे अश्रुओँकी वर्षा होने लगी। कीर्त्तनकी ध्वनिसे समस्त त्रिभुवन गूँजने लगा जिससे अन्य वाद्यों आदिकी ध्वनि कुछ भी सुनायी नहीं दे रही थी ॥ 49-50 ॥ महाप्रभुका आचरण :- सात ठाञि बुले प्रभु 'हरि' 'हरि' बलि'। 'जय जगन्नाथ', बलेन हस्तयुग तुलि' ॥ 51 ॥ अनुवाद—महाप्रभु अपने दोनों हाथोंको उठाकर 'हरि' 'हरि', 'जय जगन्नाथ' बोलते हुए सातों मण्डलियोंमें भ्रमण कर रहे थे ॥ 51 ॥ महाप्रभुका सात रूपोंमें प्रकाश :- आर एक शक्ति प्रभु करिल प्रकाश। एककाले सात ठाञि करिल विलास ॥ 52 ॥ सबे कहे,—'प्रभु आछेन मोर सम्प्रदाय। अन्य ठाञि नाहि या'न आमारे दयाय ॥ '53 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने एक ही समयमें सातों मण्डलियोंमें प्रकट होकर विलास करते हुए एक और शक्तिका प्रकाश किया। सब कहने लगे,—'महाप्रभु केवल हमारी मण्डलीमें हैं और अन्य मण्डलीमें नहीं जा रहे हैं। वे हमारे ऊपर ही कृपा वर्षण कर रहे हैं॥ '52-53 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिस प्रकार रासमें और महिषियोंके साथ विलासमें श्रीकृष्ण एक साथ 'अनेक' विग्रह होकर 'प्रकाशित' हुए थे, श्रीकृष्णचैतन्यने भी उसी प्रकार उसी शक्तिको प्रकाशित करके प्रत्येक मण्डलीमें स्वयंको 'प्रकाशित' किया था। प्रत्येक मण्डलीके लोग यह समझ रहे थे कि 'महाप्रभु हमारी मण्डलीमें ही हैं, दूसरी मण्डलीमें नहीं ॥ '52 ॥ महाप्रभुकी शक्ति, शुद्ध भक्तोंके ही दृष्टिगोचर :- केह लक्षिते नारे प्रभुर अचिन्त्यशक्ति। अन्तरङ्ग-भक्त जाने, याँर शुद्धभक्ति ॥ 54 ॥ अनुवाद—महाप्रभुकी अचिन्त्यशक्तिको कोई नहीं देख पाया। एकमात्र अन्तरङ्ग भक्त जिनमें शुद्धभक्ति है, वे ही इसे जान सके ॥ 54 ॥ कीर्त्तन-दर्शनसे श्रीजगन्नाथको आनन्द :- कीर्त्तन देखिया जगन्नाथ हरषित। सङ्कीर्त्तन देखे रथ करिया स्थगित ॥ 55 ॥ अनुवाद—कीर्त्तनको देखकर श्रीजगन्नाथ बहुत प्रसन्न हुए और वे अपने रथको स्थगित करके सङ्कीर्त्तन देखने लगे ॥ 55 ॥ । 503
[ 13/56-62 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला यह देखकर राजाको आश्चर्य :- प्रतापरुद्रेर हैल परम विस्मय। देखिते शरीर याँर हैल प्रेममय ॥ 56 ॥ श्रीकाशीमिश्रके समक्ष उस रहस्यका प्रकाश :- काशीमिश्रे कहे राजा प्रभुर महिमा। काशीमिश्र कहे,—'तोमार भाग्येर नाहि सीमा ॥ '57 ॥ अनुवाद-[महाप्रभुको सातों मण्डलियोंमें एक साथ देखकर] राजा प्रतापरुद्रको बहुत आश्चर्य हुआ और उनका शरीर श्रीकृष्ण-प्रेममय हो गया। राजा प्रतापरुद्रने श्रीकाशीमिश्रको महाप्रभुके एक साथ सात रूप धारण करनेकी महिमा बतलायी। श्रीकाशीमिश्रने कहा,—हे राजन्! आपके सौभाग्यकी तो सीमा नहीं है॥ '56-57 ॥ अनुवाद—राजा प्रतापरुद्रके द्वारा की गयी तुच्छ सेवाको देखकर महाप्रभु प्रसन्न हो गये थे, इसलिये उनकी कृपासे ही राजा उनके रहस्योंका दर्शन कर सके॥ 60 ॥ अनुभाष्य—'रहस्य-दर्शन'- श्रीजगन्नाथदेवने महाप्रभुके नृत्य-गीतादिके दर्शनसे विस्मित होकर अपने रथको स्थगित कर दिया। महाप्रभुने भी उनके सामने नृत्यादिके द्वारा श्रीजगन्नाथको आनन्द प्रदान किया। 'द्रष्टा' (श्रीजगन्नाथ) और 'दृश्य' (महाप्रभु)के यहाँ एक वस्तु होनेपर भी लीलाकी विचित्रताके कारण इस अद्भुत रहस्यका प्रकाश हुआ और महाप्रभुकी कृपासे राजा इसे समझ सके। सात-मण्डलियोंमें महाप्रभुकी एक साथ उपस्थिति भी जो रहस्योंमें एक और है, राजाने उसकी भी उपलब्धि की ॥ 60 ॥ श्रीसार्वभौमके साथ राजाका मूक सङ्केत :- सार्वभौम-सङ्गे राजा करे ठाराठारि। आर केह नाहि जाने चैतन्येर चुरि ॥ 58 ॥ कृपासे ही उनकी उपलब्धि, तर्कपन्थासे वे ब्रह्माके लिये भी अज्ञेय :- याँरे ताँर कृपा, सेइ जानिबारे पारे। कृपा बिना ब्रह्मादिक जानिबारे नारे ॥ 59 ॥ अनुवाद-राजा प्रतापरुद्र श्रीसार्वभौमको महाप्रभुकी इस लीलाको इङ्गित करने लगे। इन दोनोंके अतिरिक्त और कोई भी महाप्रभुकी इस लीलाको न जान सका। जिसपर महाप्रभुकी कृपा है, वही उन्हें जान सकता है। महाप्रभुकी कृपाके बिना ब्रह्मादि भी उन्हें नहीं जान सकते ॥ 58-59 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 6/82, 84, 86, 87, 89-91 संख्या देखें ॥ 59 ॥ राजाके प्रति सामनेसे वैराग्य, पीछेसे कृपा :- साक्षाते ना देय देखा, परोक्षे त' दया। के बुझिते पारे चैतन्यचन्द्रेर माया ॥ 61 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने राजाको साक्षात् दर्शन नहीं दिये, परन्तु परोक्ष रूपमें उनपर कृपा की। श्रीचैतन्यचन्द्रकी योगमायाको कौन जान सकता है ॥ 61 ॥ अनुभाष्य-प्रत्यक्षरूपमें आचार्यकी लीलाका अभिनय करनेवाले महाप्रभुकी 'राजा'-नामके प्रति बहुत घृणा थी, किन्तु परोक्षरूपसे उनके प्रति इतनी कृपा थी कि, राजा महाप्रभुकी कृपासे उनकी गूढ़लीलाके रहस्य तकको भी भेद करनेमें समर्थ हुए। वास्तवमें महाप्रभुकी यह कृपा और वञ्चना-लीला अर्थात् एक ही साथ उनकी ईश्वरकी और जीवके जैसी लीलाके तात्पर्यको उनके ऐकान्तिक भक्तोंके अतिरिक्त और कोई भी समझनेमें समर्थ नहीं है॥ 61 ॥ राजाकी दीन-सेवाके दर्शनसे महाप्रभुको सन्तोष :- राजार तुच्छ सेवा देखि' प्रभुर तुष्ट मन। सेइ त' प्रसादे पाइल 'रहस्य-दर्शन' ॥ 60 ॥ श्रीभट्ट और श्रीमिश्रको यह देखकर आश्चर्य :- सार्वभौम, काशीमिश्र, —दुइ महाशय। राजारे प्रसाद देखि' हइला विस्मय ॥ 62 ॥ 504 ।
तेरहवाँ अध्याय 13/62–69 ] अनुवाद—राजापर महाप्रभुकी कृपाको देखकर श्रीसार्वभौम और श्रीकाशीमिश्र—ये दोनों महाशय भी आश्चर्यचकित हो गये॥62॥ स्वयं मूलगायक होकर सभी दलोंको नृत्यकी प्रेरणा :— एइमत लीला प्रभु कैल कतक्षण। आपने गायेन, नाचा’न निज-भक्तगण॥63॥ कीर्तनके बीचमें ऐश्वर्य-प्रकाश :— कभु एक मूर्ति, कभु हन बहु-मूर्ति। कार्य-अनुरूप प्रभु प्रकाशये शक्ति॥64॥ अधीनस्थ लीलाक्तिके द्वारा अपने प्रभुकी सेवा :— लीलावेशे प्रभुर नाहि निजानुसन्धान। इच्छा जानि’ ‘लीला शक्ति’ करे समाधान॥65॥ अनुवाद—महाप्रभुने कुछ समय तक इस प्रकार लीला की। वे स्वयं गान करके अपने भक्तोंको नचाने लगे। कभी महाप्रभु एक मूर्ति धारण करते, तो कभी अनेक, यह उनकी लीलाक्तिके द्वारा ही सम्पादित हो रहा था। लीलाके आवेशमें महाप्रभुको अपना भी अनुसन्धान नहीं था अर्थात् अपनेको भूल गये, इसलिये महाप्रभुकी इच्छा जानकर उनकी ‘लीलाशक्ति’ने ही सभी लीलाओंका समाधान किया॥63–65॥ अनुभाष्य—सात कीर्तन-मण्डलियोंमें स्वतन्त्र निरङ्कुश- इच्छामय महाप्रभु अपनी इच्छानुसार कभी एक मूर्ति, कभी अनेक मूर्तियाँ प्रकाश करके स्वयं नाचते, गाते एवं भक्तोंको नचाकर आनन्द आस्वादन करनेमें इतने मत्त थे कि उन्हें अपने स्वरूपके विषयमें अनुसन्धान अथवा लक्ष्य करनेका बिल्कुल भी अवसर नहीं मिला—मानो वे पूर्ण रूपसे आत्मविस्मृत हो गये थे। (उनकी अप्राकृत चिन्मय अनन्तलीलाके वैचित्र्यका अर्थात् चिद्विलासका, यह भी एक कार्य है); किन्तु इच्छामात्रसे ही स्वरूपशक्तिरूपिणी इच्छा-शक्तिने महाप्रभुके प्रकाश-विग्रहोंको प्रकटित करके अपने प्रभुकी सेवा की॥65॥ द्वापरमें रासलीलामें और महिषी-विवाहमें भी इसी प्रकारका प्रकाश :— पूर्वे यैछे रासादि-लीला कैल वृन्दावने। अलौकिक लीला गौर कैल क्षणे क्षणे॥66॥ “अप्राकृत वस्तु प्राकृत इन्द्रियोंके गोचर नहीं” :— भक्तगण अनुभवे, नाहि जाने आन। श्रीभागवत-शास्त्र ताहाते प्रमाण॥67॥ अनुवाद—पूर्वकाल अर्थात् द्वापरयुगमें जैसे वृन्दावनमें श्रीकृष्णने रासादि लीलाएँ की थीं, उसी प्रकार अब श्रीगौरहरिने क्षण-क्षणमें अलौकिक लीला की। श्रीभागवत- शास्त्र ही इस बातका प्रमाण है। इन अलौकिक लीलाओंको भक्तोंके अतिरिक्त अन्य कोई भी अनुभव नहीं कर सकता॥66–67॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णलीलामें जिस प्रकार रासस्थलीमें श्रीकृष्णका बहुत्व और महिषियोंके साथ विवाहके समय जिस प्रकार एक ही मूर्ति अनेक होकर प्रकट हुई थी, उसी प्रकार श्रीगौर-लीलामें सात भिन्न-भिन्न कीर्तन-मण्डलियोंके भक्तोंके निकट और प्रतापरुद्र आदि दर्शकोंके नेत्रोंके सामने भगवान् श्रीगौरसुन्दर अनेक मूर्तियोंमें प्रकट हुए। भक्तोंके अतिरिक्त उनकी लोकातीत लीला-दर्शनमें अन्योंका अधिकार नहीं होता। रासमें और महिषियोंके साथ विवाहमें श्रीकृष्णका एक साथ अनेक मूर्तियोंमें प्रकट होनेका प्रमाण श्रीमद्भागवतमें है॥67॥ महाप्रभुके नृत्यसे लोगोंका उद्धार :— एइमत महाप्रभु करे नृत्य-रङ्गे। भासाइल सब लोक प्रेमेर तरङ्गे॥68॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुने आनन्दपूर्वक नृत्य किया और सभी लोगोंको प्रेमकी तरङ्गोंमें डुबो दिया॥68॥ महाप्रभुके निजभक्तों सहित नृत्य और कीर्तनके बीचमें श्रीजगन्नाथका रथपर चढ़ना और गुण्डिचा गमन :— एइमत हैल कृष्णेर रथे आरोहण। तार आगे प्रभु नाचाइल भक्तगण॥69॥ । 505
[ 13/69-78 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला आगे शुन जगन्नाथेर गुण्डिचा-गमन। तार आगे प्रभु यैछे करिला नर्त्तन ॥ 70 ॥ एइमत कीर्त्तन प्रभु करिल कतक्षण। आपन-उद्योगे नाचाइल भक्तगण ॥ 71 ॥ अनुवाद-इस प्रकार श्रीजगन्नाथके द्वारा रथपर चढ़े और उनके आगे महाप्रभुने भक्तोंको नृत्य करवाया। अब श्रीजगन्नाथके गुण्डिचा मन्दिरकी ओर जानेका वृत्तान्त सुनो जब महाप्रभुने रथके आगे नृत्य किया था। इस प्रकार महाप्रभुने कुछ समय तक कीर्तन किया और अपने प्रयाससे सभी भक्तोंको नृत्य करनेके लिये प्रेरित किया ॥ 69-71 ॥ महाप्रभुकी नृत्य करनेकी इच्छासे नौ भक्तोंके साथ स्वरूपके कीर्तनदलका गठन :- आपनि नाचिते यबे प्रभुर मन हैल। सात सम्प्रदाय तबे एकत्र करिल ॥ 72 ॥ अनुवाद-जब महाप्रभुकी स्वयं नृत्य करनेकी इच्छा हुई, तब उन्होंने सातों मण्डलियोंको एकत्र कर लिया ॥ 72 ॥ श्रीवास, रामाइ, रघु, गोविन्द, मुकुन्द। हरिदास, गोविन्दानन्द, माधव, गोविन्द ॥ 73 ॥ उद्धण्ड-नृत्ये प्रभुर यबे हैल मन। स्वरूपेर सङ्गे दिल एइ नव जन ॥ 74 ॥ अनुवाद-जब महाप्रभुकी उद्धण्ड (बहुत उछल-कूदकर) नृत्य करनेकी इच्छा हुई, तब उन्होंने श्रीस्वरूप दामोदरके साथ गान करनेके लिये श्रीवास, श्रीरामाइ, श्रीरघु, श्रीगोविन्द, श्रीमुकुन्द, श्रीहरिदास, श्रीगोविन्दानन्द, श्रीमाधव तथा श्रीगोविन्द-इन नौ भक्तोंको दे दिया ॥ 73-74 ॥ अन्यान्य भक्तोंके द्वारा चारों ओर कीर्तन :- एइ दश जन प्रभुर सङ्गे गाय, धाय। आर सब सम्प्रदाय चारिदिके गाय ॥ 75 ॥ अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदरादि ये दस भक्त महाप्रभुके नृत्यमें गान करते हुए उनके साथ भाग भी रहे थे। चारों ओरसे सभी मण्डलियोंमें अन्यान्य भक्त भी गान कर रहे थे ॥ 75 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीजगन्नाथकी स्तुति :- दण्डवत् करि, प्रभु जुड़ि' दुइ हात। ऊर्ध्वमुखे स्तुति करे देखि' जगन्नाथ ॥ 76 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीजगन्नाथको दण्डवत् प्रणाम किया और फिर उठकर अपने दोनों हाथोंको जोड़कर उनको देखते हुए उनकी स्तुति करने लगे ॥ 76 ॥ विष्णुपुराण (1/19/65)- नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च। जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः ॥ 77 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 77 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-ब्रह्मण्यदेव, गो-ब्राह्मणके हितस्वरूप, जगत्के मङ्गलस्वरूप, श्रीकृष्णस्वरूप और श्रीगोविन्दस्वरूप, उन परमतत्त्वको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ 77 ॥ अनुभाष्य- गोब्राह्मणहिताय (गवादिसर्वमङ्गलाकरवस्तूनां शुभानुध्यायिने) ब्रह्मण्यदेवाय (ब्राह्मण्यानाम् उपास्याय) जगद्धिताय (लोककल्याणनिवासाय), गोविन्दाय कृष्णाय नमः नमः नमः (असकृत् प्रणतिः)। श्लोक-भावानुवाद-ब्राह्मणोंके उपास्य, गो-ब्राह्मण अर्थात् गौ आदि सर्वमङ्गलकारी वस्तुओंके हितस्वरूप, जगत्के मङ्गलस्वरूप, श्रीकृष्णस्वरूप और श्रीगोविन्दस्वरूप, उन परमतत्त्वको मैं बारम्बार प्रणाम करता हूँ ॥ 77 ॥ श्रीकुलशेखर-कृत मुकुन्दमाला-स्तोत्र- जयति जयति देवो देवकीनन्दनोऽसौ जयति जयति कृष्णो वृष्णिवंशप्रदीपः। जयति जयति मेघश्यामलः कोमलाङ्गो जयति जयति पृथ्वीभारनाशो मुकुन्दः ॥ 78 ॥ 506 ।
तेरहवाँ अध्याय 13/78-79 ] अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 78 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ये देवकीनन्दन-देवता जययुक्त हों; ये वृष्णिवंश-प्रदीप श्रीकृष्ण जययुक्त हों; ये नवजलधर-श्याम कोमलाङ्ग श्रीकृष्ण जययुक्त हों; पृथ्वीके भारनाशी मुकुन्द जययुक्त हों॥ 78 ॥ अनुभाष्य— असौ देवकीनन्दनः (इति प्रसिद्धः) देवः जयति जयति (सर्वोत्तमत्वेन वर्त्तते); वृष्णिवंशप्रदीपः (वृष्णीनां यदुनां वंशं कुलं प्रदीपयति यः सः वृष्णिकुलोज्ज्वलकारी) कृष्णः जयति जयति; मेघ-श्यामलः (नवघनश्यामलः इव वर्णः यस्य सः इन्द्रनीलघनश्यामः) कोमलाङ्गः (कोमलं—"यत्ते सुजात चरणाम्बुरुहम्" इत्यादि-श्लोकोदितं सुकोमलम् अङ्गं यस्य सः कृष्णः) जयति जयति; पृथ्वीभारनाशः (कृष्णभक्तार्दितधराभारक्लेश-नाशन- वीरः) मुकुन्दः (मुक्तिप्रदो हरिः) जयति जयति। श्लोक-भावानुवाद—ये देवकीनन्दन (इस नामसे प्रसिद्ध) देवता जययुक्त हों; ये वृष्णिकुलोज्ज्वलकारी श्रीकृष्ण जययुक्त हों; ये इन्द्रनीलघनश्याम कोमलाङ्ग (गोपीगीतमें 'यत्ते सुजात' आदि श्लोकोंमें वर्णित सुकोमल अङ्ग जिनके हैं, वे) श्रीकृष्ण जययुक्त हों; कृष्ण-भक्तोंके भारसे पीड़ित पृथ्वीके क्लेशका नाश करनेवाले मुकुन्द (मुक्ति प्रदान करनेवाले श्रीहरि) जययुक्त हों॥ 78 ॥ मधुर-हास्ययुक्त मुखके द्वारा व्रजपुरकी वनिताओंके कामको वर्द्धित करनेवाले श्रीकृष्णचन्द्र जययुक्त हों॥ 79 ॥ अनुभाष्य—महाभागवत श्रीशुकदेव दशम स्कन्धके अन्तमें संक्षेपमें श्रीकृष्णलीला वर्णन करते हुए श्रीकृष्णकी सर्वोत्तमता बतला रहे हैं— जननिवासः (जनेषु गोप-यादवादि-मध्येपु एव निवासो यस्य सः, यद्वा जनानां जीवानां यो निवासः आश्रयः, जीवेषु वा निवसति अन्तर्यामितया तथा सः) देवकीजन्मवादः (देवक्यां जन्म इति वादमात्रं यस्य सः, अथवा देवक्योर्नन्द-वसुदेवगृहिण्योर्जन्मैव वादः सिद्धान्तो यत्र सः, वस्तुतः अजन्मा) यदुवरपरिषत् (यदुवराः गोपाः व्रजस्थाः क्षत्रियाः पुरस्थाः च परिषत् सभा सेवरूपा यस्य सः) स्वैः दोर्भिः (इच्छामात्रेण निरसनसमर्थोऽपि क्रीडार्थं दोर्भिः दोस्तुल्यैः स्वभक्तजनैः अर्जुनादिभिर्वा) अधर्मं (धर्मप्रतिपक्षमसुरसंघम्) अस्यन् (क्षिपन्, दूरीकुर्वन्, निघ्नन्) स्थिरचरवृजिनघ्नः (स्थिरचराणां—स्थिराणां स्थावराणां चराणां जङ्गमानां, वृजिनं संसारदुःखं व्रजपुरस्थानां तेषां सेवकानां स्ववियोगदुःखं वा हन्ति यः सः) व्रजपुरवनितानां (व्रजवनितानां पुरवनितानाञ्च मथुरा-द्वारका-पुरस्यानुरागिणीनां तासां योषितां) कामदेवं (कामश्चासौ दीव्यतीति विजिगीषिते संसारमिति देवश्च, यद्वा, देवः अप्राकृतस्तत्स्वरूपभूतः तं स्वप्रकाशस्वरूपं) सुस्मितश्रीमुखेन (शोभनं स्मितं तदुपलक्षितं प्रसादविलासादिकं यत्र तेन स्वभावन एव श्रीमता शोभनहास्य-युतेन मुखेनैव) वर्द्धयन् (उद्दीपयन् सन्) [एवम्भूतः श्रीकृष्णः] जयति (सर्वोत्तमत्वेन वर्त्तते)। अप्राकृत नवीन कामदेवकी जय :— श्रीमद्भागवत (10/90/48)— जयति जननिवासो देवकीजन्मवादो यदुवरपरिषत् स्वैर्दोर्भिरस्यन्नधर्मम्। स्थिरचरवृजिनघ्नः सुस्मित-श्रीमुखेन व्रजपुरवनितानां वर्धयन् कामदेवम्॥ 79 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 79 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जननिवास, देवकीजन्मवाद (देवकीके गर्भसे जन्म ग्रहण करनेवालेके रूपमें विख्यात), यदुओंके सभापति, अपनी भुजाओंके द्वारा अधर्मका नाश करनेवाले, स्थावर-जङ्गमके पापोंको हरण करनेवाले, श्लोक-भावानुवाद—जननिवास (जिनका निवास गोप-यादवोंके मध्य है अथवा जीवोंके जो आश्रय हैं अथवा जीवोंके अन्तर्यामी रूपमें जो निवास करते हैं), देवकीजन्मवाद (यह तो केवल प्रसिद्धि मात्र है अथवा देवकी शब्दका अर्थ है—नन्द और वसुदेव, दोनोंकी पत्नियाँ—यशोदा और देवकी, उनसे उनका जन्म होना एक सिद्धान्त है, वस्तुतः वे अजन्मा ही हैं), यदुओंके सभापति (व्रजमें स्थित गोप और मथुरा-द्वारकामें स्थित क्षत्रिय श्रीकृष्णके सभा अर्थात् सेवरूप हैं), इच्छामात्रसे अधर्मको दूर करनेवाले अथवा क्रीड़ार्थ अपनी भुजा-तुल्य भक्तमण्डलीके द्वारा या अर्जुन आदिके द्वारा धर्म विरोधी । 507
[ 13/79-80 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला असुरसमूहको उखाड़ फेंकनेवाले, स्थावर और जङ्गम जनोंके संसार-दुःखको तथा व्रज और पुरवासी सेवकोंके वियोग दुःखको नष्ट करनेवाले, व्रज और पुरकी अनुरागिनी स्त्रियोंके कामदेवको (जो अभिलाषा रूप है तथा संसारको जीतनेकी इच्छावाला होनेके कारण देवरूप है अथवा 'देव' जो अप्राकृत तत्त्वस्वरूपभूत अर्थात् स्वप्रकाश है, उसको) सुस्मितश्रीमुख (जिस मुखमें शोभन-स्मित तथा उपलक्षणके द्वारा प्रसन्नता और विलासादि भी विराजमान हैं, ऐसे स्वाभाविक शोभायुक्त हास्यवाले मुख) के द्वारा वर्धित करनेवाले श्रीकृष्ण सर्वोत्तम रूपमें जययुक्त अथवा विराजमान हों॥ 79 ॥ अहं-पदार्थ कहलानेवाले जीवात्माका स्वरूप :- पद्यावली (74) अङ्कमें उद्धृत श्रीकृष्णचैतन्योक्त श्लोक- नाहं विप्रो न च नरपतिर्नापि वैश्यो न शूद्रो नाहं वर्णी न च गृहपतिर्नो वनस्थो यतिर्वा। किन्तु प्रोद्यन्निखिलपरमानन्दपूर्णामृताब्धे- र्गोपीभर्तुः पदकमलयोर्दासदासानुदासः॥ 80 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 80 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मैं ब्राह्मण नहीं हूँ, क्षत्रिय-राजा नहीं हूँ, वैश्य अथवा शूद्र नहीं हूँ, अथवा ब्रह्मचारी नहीं हूँ, गृहस्थ नहीं हूँ, वानप्रस्थ नहीं हूँ, संन्यासी भी नहीं हूँ, किन्तु उन्मीलित (अर्थात् नित्य स्वप्रकाशमान) निखिल परमानन्दसे पूर्ण अमृतसमुद्ररूप 'श्रीकृष्णके चरणकमलोंके दासोंका दास' कहकर अपना परिचय देता हूँ॥ 80 ॥ अनुभाष्य- अहं (जीवात्मस्वरूपः) विप्रः (प्राकृतबुद्ध्या शौक्र-सावित्र्य- दैक्ष-त्रिविध-जन्माभिमानी ब्राह्मणः) न (न अस्मि), नरपतिः (क्षत्रियः) च न, वैश्यः न, शूद्रः च न (नाहं वर्णाभिमानीत्यर्थः); [पुनः] अहं (जीवः) वर्णी (ब्रह्मचारी) न, गृहपतिः (गृहस्थः) च न, वनस्थः (वानप्रस्थः) न, यतिः (तुर्याश्रमी संन्यासी वा) न (नास्मि-नाहं आश्रमाभिमानीत्यर्थः)। किन्तु [कोऽहमिति चेत्? तत्राह-अहं जीवस्वरूपः] प्रोद्यन्निखिल-परमानन्द-पूर्णामृताब्धेः (प्रकृष्टरूपेण उद्यन् उदयमाविष्कुर्वन् प्रकाशमान इति यावत्, यः निखिलः परमानन्दः, तेन एव पूर्णः अमृताब्धिः तस्य) गोपीभर्तुः (गोपीजनवल्लभस्य तस्यैव स्वयंभगवत्तयाः स्वयंरूपत्वाद्वा) पदकमलयोः (पादपङ्कजयोः) दासदासानुदासः (वैष्णवदास्यानुदास्ये संप्रतिष्ठितः त्रिगुणातीतः कृष्णदासः)। श्लोक-भावानुवाद-मैं (जीवात्मस्वरूप) प्राकृत बुद्धिसे शौक्र, सावित्र्य और दैक्ष, इन तीन प्रकारके जन्माभिमानी ब्राह्मण नहीं हूँ, क्षत्रिय नहीं हूँ, वैश्य अथवा शूद्र भी नहीं हूँ (वर्णाभिमानी नहीं हूँ-यह अर्थ है), अथवा मैं (जीव) ब्रह्मचारी नहीं हूँ, गृहस्थ नहीं हूँ, वानप्रस्थ नहीं हूँ, चतुर्थाश्रमी संन्यासी भी नहीं हूँ (आश्रमाभिमानी नहीं हूँ), किन्तु [मैं कौन हूँ, तभी कहा है-मैं जीवस्वरूप] प्रकृष्टरूपसे प्रकाशमान निखिल परमानन्दसे पूर्ण अमृतसमुद्ररूप स्वयंरूप स्वयं-भगवान् गोपीजनवल्लभके चरणकमलोंके दासोंका दास अर्थात् वैष्णवोंके दासानुदास्यमें प्रतिष्ठित त्रिगुणातीत कृष्णदास हूँ॥ 80 ॥ अमृतानुकणा-श्रुतियोंमें भूतशुद्धिके लिये जो मन्त्र कहे गये हैं, उनमेंसे आचार्य श्रीशङ्करके द्वारा प्रवर्तित मायावाद शास्त्रमें जो एक महावाक्य कहकर निर्धारित हुआ है, उस "अहं ब्रह्मास्मि” (बृहदारण्यक)-मन्त्रका विद्वत्-रूढ़िवृत्ति-गत अर्थ भगवान् श्रीगौरसुन्दरने स्वयं रचित “नाहं विप्रः” श्लोकमें सुन्दर रूपसे स्पष्ट किया है। अर्चनसे पूर्व जिसमें अर्चाकी अधिष्ठान सेवनोपयोगी रूपमें परिणत होता है, उसके लिये ही भूतशुद्धिकी आवश्यकता है। क्योंकि, 'नादेवो देवमर्चयेत्'-अदेव व्यक्तिका देवता-अर्चनमें अधिकार नहीं है। “देवं भूत्वा देवं यजेत्"-देवत्व लाभ करके ही देवता यजनकी विधि है। इसलिये लोकातीत भगवद्-नामवतार या अर्चारवतारके प्रति अपनी सेवाकी वृत्ति प्रकाश करनेसे पहले साधक जीवको अपने अलौकिक स्वरूप-सम्बन्धमें अवस्थित होना होगा, अन्यथा लौकिक धर्म-अर्थ-काम- मोक्ष-वासनारूप पिशाचीके द्वारा आक्रान्त होकर वे सेवाधिकारसे च्युत हो जायेंगे-यही भूतशुद्धिका तात्पर्य 508 ।
तेरहवाँ अध्याय [right-aligned: 13/80 ]
है। किन्तु शङ्कराचार्यके अनुगत जनोंके द्वारा 'अहं ब्रह्मास्मि'-मन्त्रके द्वारा मुक्तिस्पृहा-रूप पिशाचीको आह्वान करनेपर भूतशुद्धि वहाँसे बहुत दूरीपर ही अवरुद्ध हो जाती है। “ज्ञानी जीवन्मुक्तदशा पाइनु करि माने। वस्तुतः बुद्धि शुद्ध नहे कृष्णभक्ति बिने॥” (चैःचः मध्यलीला 22/29)। उनका जो ब्रह्मध्यान है, वह ब्रह्म (?) होकर स्वयं ब्रह्मका परित्याग करनेके लिये ही है, ब्रह्म-पूजनके उद्देश्यसे नहीं है। किन्तु श्रुतियोंमें कहा गया है,—“ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति”–ब्रह्म होकर ही ब्रह्मकी प्राप्ति होती है; “सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता”—वह मुक्तात्मा सर्वज्ञ ब्रह्मके साथ समस्त सेवाभिलाष उपभोग करती है। श्रीमद्भगवद्गीता कहती है,—“ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति। समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभेत् पराम्।” श्रीमद्भागवतमें सर्ववेदान्तके साररूपमें जीवका परिचय व्यक्त करते हुए कहा गया है,—“सर्ववेदान्तसारं यद्ब्रह्मात्मैकत्वलक्षणम्” (भाः 12/13/12)। ब्रह्ममें जो लक्षण हैं, जीवात्मामें वही लक्षण वर्तमान हैं—दोनों सजातीय समतात्पर्यपर न होनेसे अद्वयज्ञान सिद्ध नहीं होता। (इस प्राकृत) भेद-जगत्में जो अवस्था है, यदि ज्ञेय पदार्थ (अद्वयज्ञान तत्त्व) भी उस प्रकार भेदजातीय हो, तब अद्वयज्ञानमें भी जड़भोग या त्यागमूलक चिन्त्य द्वैतवादकी तुच्छता आकर उपस्थित होगी। 'वे मेरे नित्य चेतनमय, आनन्दमय, ज्ञानमय प्रभु हैं, मैं उनके आनन्दका विधान करनेवाला चित्कण पदार्थ हूँ, उनसे पृथक् मेरा अवस्थान ही माया, अविद्या है'—यही ब्रह्मके साथ जीवका एकत्वका लक्षण है। इस स्थानपर ही अद्वयज्ञान प्रतिष्ठित होकर ब्रह्मके साथ जीवके नित्य सेव्य-सेवक, व्यापक-व्याप्य सम्बन्धको स्थापित करके जीवको परंब्रह्मके सान्निध्यमें लाता है—“ब्रह्म मां परमं प्रापुः” (भाः 11/12/13)। श्रुतिमें कथित उस 'अहं ब्रह्मास्मि'-मन्त्रमें जीवका जो स्वरूप-विज्ञान ग्रथित होकर रहता है, उसे ही “वेदान्तकृद्-वेदविदेव चाहम्” (गीः 15/15) अर्थात् मूल वेदान्तकारी और समस्त वेदोंके तात्पर्यको जाननेवाले भगवान् श्रीगौरसुन्दरने प्रकाश किया है—'अहं गोपीभर्तुः पदकमलयोर्दासदासानुदासोऽस्मि'—मैं गोपीनाथ श्रीकृष्णके चरणकमलयुगलके आश्रित दासके दासका अनुदास हूँ। 'मुकुन्दपदवीं' अर्थात् श्रीकृष्णके चरणकमल जिन्हें श्रुतियाँ विशेषरूपसे ढूँढ़ती रहती हैं और वे ही वेदान्तका एकमात्र चरम प्रतिपाद्य विषय हैं। महा-महा-वेदान्तिकोंमें भी अग्रगणीय, विशुद्ध-चेतनमें अवस्थिता, परमसिद्धा गोपियाँ सभी चिद्-इन्द्रियोंके द्वारा उस मुकुन्दपदवीकी ही सर्वोन्नत-रसमें (शृङ्गार-रसमें) सेवामें निमग्न हैं। परंब्रह्म श्रीकृष्ण स्वयं अखिल परमानन्द-अमृतसिन्धु होनेपर भी गोपियाँ उनके सर्व आनन्दका स्रोत हैं। श्रीकृष्ण सभीको उनके भजनके अनुरूप प्रतिदान देनेमें समर्थ होनेपर भी गोपियोंकी प्रीतिके अनुरूप प्रतिदानमें समर्थ नहीं हैं। गोपियोंके तुल्य अन्य कोई श्रीकृष्णके मर्मज्ञ भी नहीं हैं। तटस्था शक्तिसे उत्पन्न, बालके अग्रभागके दस हजारवें भागके जितने परिमाणके अणुचेतन पदार्थ जीवके आत्मगत विचारसे विविध रसोंमें अनेक प्रकारके परिचय सम्भव हैं। परन्तु समस्त गोपियोंमें सर्वश्रेष्ठा, मूल ह्लादिनी-स्वरूपिणी, परा ब्रह्मस्वरूपा, स्वरूपशक्ति श्रीवार्षभानवीके (श्रीराधाके) प्रियतमके दासदासानुदास रूपमें अपनेको सम्बन्धित करनेपर, जीव सर्व शिरोमणिरूपमें दैदीप्यमान होकर ब्रह्मा-शिवादिके भी वन्दनीयरूपमें परिगणित होते हैं। यही 'अहं ब्रह्मास्मि'-मन्त्रकी स्वरूपावधि (स्वरूपकी सीमा) है। उस आत्मजगत्में अविमिश्र-चेतनराज्यमें सभी कुछ चेतनमय हैं—उसमें अचेतनता, अनित्यता, तुच्छता, असम्पूर्णता या अभावका कोई स्थान नहीं है। दूसरी ओर यह अनात्म जगत्-मिश्रित चेतनराज्य है अर्थात् इस जड़ जगत्में चेतन आत्माएँ भी विद्यमान हैं। यहाँ जड़ जगत्में चेतनके विकासके लिये नित्यता, सम्पूर्णता, अकपटता, अव्यभिचारिता, ईशता, निर्गुणता, अविमिश्रता आदिकी अवस्थिति नहीं है—“नासतो विद्यते भावो
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नाभावो विद्यते सतः।" (गीता 2/16)। इसलिये इस ब्रह्माण्डगत सभी स्थूल-सूक्ष्मभाव चिद्-अचिद्-मिश्र होनेके कारण विद्वेष, अचेतनता, असम्पूर्णतासे रहित नहीं हो सकते। इसलिये श्रीचैतन्य महाप्रभुने उस सब स्थूल-सूक्ष्मभावोंको त्याग करनेका उपदेश दिया है,-'मैं ब्राह्मण नहीं, क्षत्रिय नहीं, वैश्य नहीं या शूद्र भी नहीं हूँ, अथवा आश्रम विचारसे मैं ब्रह्मचारी नहीं, गृहस्थ नहीं, वानप्रस्थ या संन्यासी भी नहीं हूँ।' "अहङ्कारविमूढात्मा कर्त्ताहमिति मन्यते" (गीता 3/43)-अशुद्ध अहङ्कारके द्वारा जीव विवेकरहित हो जाता है और 'मैं ही कर्त्ता हूँ'-इस अभिमानसे अपनी सुविधानुसार कभी भोगी और कभी त्यागी हो जाता है। उस अशुद्ध अहङ्कारवशतः वर्णाश्रम-विचारसे या 'जन्म-ऐश्वर्य-श्रुत-श्री' के परिमापसे जीवके समस्त अभिमान नितान्त जड़ीय अथवा अचिद्मिश्र, कुण्ठायुक्त हैं। इसलिये उन-उन अभिमानोंके वशवर्ती होकर सम्पूर्ण-चेतनराज्य-वैकुण्ठमें अभियान सम्भव नहीं होता। जीवके शुद्ध-अहङ्कारमें स्वयंको अद्वयज्ञान-परतत्त्वका सेवक मानकर जो केवल उनके दासके दासका दास अभिमान है, वह किसी प्रकारसे जड़ीय दीनता नहीं है। इस जगत्में दीनताका कारण दूर होनेपर दम्भ (घमण्ड) आकर उपस्थित हो जाता है, इसलिये वह दीनता दम्भका ही दूसरा रूप है। मायाके सङ्गसे 'अशुद्ध-अहङ्कार'-ग्रस्त जीव 'अहं ब्रह्मास्मि'-मन्त्रसे स्वयंको ब्रह्मके प्रतियोगी रूपमें ध्यान करके केवल दम्भमात्रको ही सञ्चय करता है। इस प्रकार वह भगवद्-चरणकमलोंमें अपराध करता रहता है और उसके फलस्वरूप उसका अधःपतन अनिवार्य हो जाता है। किन्तु “गोपीभर्तुः पदकमलयोर्दासदासानुदासः” या सम्राट कुलशेखर-रचित 'त्वद्भृत्य-भृत्य-परिचारक- भृत्यभृत्य-भृत्य भृत्य इति मां स्मर लोकनाथ"-इस रूपसे जो आत्मगत क्षुद्रातिक्षुद्र-अभिमान है, वह इस जगत्में तृणके भीतर जो सर्वापेक्षा क्षुद्र होनेका अभिमान निहित है, उससे भी अतीत है। वही आत्मगत दैन्य शुद्धभक्तिके अनुभाव-रूपमें मात्र प्रकाशित होता है और वह भक्तिका सम्वर्धन करते-करते उत्तरोत्तर वर्धित होकर श्रीकृष्णका आकर्षण करता है। तब दैन्यका कारण दूरीभूत होनेपर भी वह दैन्य नवनवायमान होकर श्रीकृष्ण-प्रीति उत्पादक विभूषणमें परिणत होता है॥ 80 ॥ महाप्रभुका अनुगमन करके भक्तोंका भगवान्को प्रणाम :- एत पड़ि' पुनरपि करिल प्रणाम। जोड़हाते भक्तगण वन्दे भगवान्॥ 81 ॥ अनुवाद-इन सब श्लोकोंको पढ़कर महाप्रभुने पुनः श्रीजगन्नाथको प्रणाम किया और समस्त भक्तोंने भी अपने हाथ जोड़कर श्रीजगन्नाथकी वन्दना की ॥ 81 ॥ महाप्रभुके उद्दण्ड नृत्यका वर्णन :- उद्दण्ड नृत्य प्रभु करिया हुँकार। चक्र-भ्रमि भ्रमे यैछे अलात-आकार ॥ 82 ॥ नृत्ये प्रभुर् याँहा याँहा पड़े पदतल। ससागर-शैल मही करे टलमल ॥ 83 ॥ अनुवाद-महाप्रभु हुँकार करते हुए ऊँचा-ऊँचा कूदकर नृत्य करते हुए चक्रकी भाँति गोल परिधिमें घूमने लगे, इस प्रकार वे अलातचक्रकी भाँति दिखने लगे। नृत्य करते समय महाप्रभुके चरण जहाँ-जहाँ पड़ते, पर्वत और सागर सहित पृथ्वी टलमल करने लगती ॥ 82-83 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'चक्र-भ्रमि भ्रमे यैछे अलात- आकार'-जलते हुए अङ्गारेके चक्रके समान महाप्रभु चक्रमें भ्रमण करनेवाले जैसे घूमने लगे ॥ 82 ॥ अनुभाष्य-अलातचक्र अर्थात् जलते हुए अङ्गारेको बहुत तेजीसे घुमानेपर वह जैसे एक पूरे जलते हुए चक्रकी भाँति प्रतीत होता है, किन्तु वह वास्तवमें जलता हुआ चक्र नहीं होता, उसी प्रकार महाप्रभु उद्दण्ड नृत्य करते-करते 'एक'-विग्रह होनेपर भी सर्वत्र 'व्यापक' रूपमें दिखलायी दिये थे॥ 82 ॥ 510 ।
तेरहवाँ अध्याय 13/84-93 ] महाप्रभुके अष्टसात्त्विक विकार :- स्तम्भ, स्वेद, पुलक, अश्रु, कम्प, वैवर्ण्य। नाना भावे विवशता, गर्व, हर्ष, दैन्य ॥ 84 ॥ आछाड़ खाञा पड़े भूमे गड़ि' याय। सुवर्ण-पर्वत यैछे भूमेते लोटाय ॥ 85 ॥ अनुवाद-नृत्य करते हुए महाप्रभुके शरीरमें स्तम्भ, स्वेद, पुलक, अश्रु, कम्प, वैवर्ण्य, विवशता, गर्व, हर्ष और दैन्य आदि प्रेमके विकार और भाव उदित हो रहे थे। पछाड़ खाकर जब महाप्रभु भूमिपर गिरकर लोट-पोट करने लगते, तो ऐसा प्रतीत होता मानो कोई सोनेका पर्वत भूमिपर लोट-पोट खा रहा हो ॥ 84-85 ॥ निताइके द्वारा रक्षा करनेकी चेष्टा :- नित्यानन्दप्रभु दुइ हात प्रसारिया। प्रभुरे धरिते चाहे आसपास धाञा ॥ 86 ॥ महाप्रभुके पीछे हरिध्वनिमें रत श्रीअद्वैत :- प्रभु-पाछे बुले आचार्य करिया हुँकार। 'हरिबोल' 'हरिबोल' बोले बार बार ॥ 87 ॥ अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभु अपने दोनों हाथोंको पसारकर महाप्रभुको पकड़नेके लिये उनके आस-पास भाग रहे थे। श्रीअद्वैताचार्य महाप्रभुके पीछे-पीछे चलते हुए बार-बार उच्च स्वरसे 'हरिबोल' 'हरिबोल' बोलते हुए हुँकार कर रहे थे ॥ 86-87 ॥ महाप्रभुको लोगोंके स्पर्शसे रक्षाके लिये तीन दलोंके द्वारा घेरेका गठन :- लोक निवारिते हैल तिन मण्डल। प्रथम-मण्डले नित्यानन्द महाबल ॥ 88 ॥ काशीश्वर मुकुन्दादि यत भक्तगण। हाताहाति करि' हैल द्वितीय आवरण ॥ 89 ॥ बाहिरे प्रतापरुद्र लञा पात्रगण। मण्डल हञा करे लोक निवारण ॥ 90 ॥ अनुवाद-लोगोंकी भीड़को महाप्रभुसे दूर रखनेके लिये उन्होंने तीन चक्र (घेरे) बनाये। भीतरवाले पहले चक्रमें महाबलवान् श्रीनित्यानन्द प्रभु (बलके अधिष्ठात्री देवता श्रीबलदेव प्रभु) रक्षा कर रहे थे। उसके बाहर श्रीकाशीश्वर और श्रीमुकुन्दादि सब भक्तोंने अपने हाथोंको दोनों ओर फैलाकर दूसरे भक्तोंके हाथोंको पकड़कर दूसरा आवरण बनाया। सबसे बाहरी अर्थात् तीसरे चक्रमें राजा प्रतापरुद्रने अपने सैनिकोंको लेकर एक चक्र बनाकर लोगोंको रोक दिया ॥ 88-90 ॥ अनुभाष्य- 'महाबल'-श्रीबलदेव। 'तिनमण्डल'-लोगोंके द्वारा रौंदनेसे बचानेके लिये महाप्रभुको केन्द्रमें रखकर भक्तोंने चक्रके आकारमें उन्हें चारों ओरसे घेरकर तीन वृत्त (घेरे) बनाये। पहले-घेरेमें-अन्यान्य भक्तोंके साथ श्रीनित्यानन्द प्रभु थे, पहले घेरेको केन्द्रमें रखकर पुनः चक्राकारमें श्रीकाशीश्वर और श्रीमुकुन्दादिने दूसरा घेरा बनाया तथा दूसरे घेरेको केन्द्रमें रखकर अपने लोगोंके द्वारा आवृत करके राजा प्रतापरुद्रने तीसरा घेरा बनाया। तीसरे घेरेके द्वारा आवरण करके दूसरे, पहले और उसके भीतर श्रीमन्महाप्रभुको लोगोंकी भीड़से स्वतन्त्र कर दिया। इसका उद्देश्य यह था कि लोगोंकी भीड़से तीसरे घेरेके टूट जानेपर दूसरा और उसके भी उसी प्रकारसे टूट जानेपर पहला घेरा महाप्रभुकी रक्षाके कार्यमें आयेगा ॥ 88 ॥ हरिचन्दनके साथ राजाका महाप्रभुके नृत्यका दर्शन :- हरिचन्दनेर स्कन्धे हस्त आलम्बिया। प्रभुर नृत्य देखे राजा आविष्ट हञा ॥ 91 ॥ राजाके सामने श्रीवासकी महाप्रभु-नृत्य-दर्शन-सेवा :- हेनकाले श्रीनिवास प्रेमाविष्ट-मन। राजार आगे रहिं' देखे प्रभुर नर्त्तन ॥ 92 ॥ राजाको बिना बाधाके दर्शनका सुयोग देनेके लिये श्रीवासको हरिचन्दनकी नम्रभावसे हटानेकी चेष्टा :- राजार आगे हरिचन्दन देखे श्रीनिवास। हस्ते ताँरे स्पर्श कहे,-'हओ एकपाश ॥ '93 ॥ । 511
[ 13/91-106 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला सेवारत श्रीवासका पुनः पुनः सेवामें विघ्नहेतु क्रोध :- नृत्यावेशे श्रीनिवास किछुइ ना जाने। बार बार ठेले, तँहो क्रोध हैल मने ॥ 94 ॥ हरिचन्दनको थप्पड़ मारना और उसके फलस्वरूप हरिचन्दनका क्रोधित होना :- चापड़ मारिया तारे कैल निवारण। चापड़ खाञा क्रु अनुवाद-हरिचन्दनके कन्धेपर हाथ रखकर राजा प्रतापरुद्र महाप्रभुके नृत्यको देखकर उसमें आविष्ट हो रहे थे। उस समय श्रीवास पण्डित भी राजाके आगे खड़े होकर महाप्रभुके नृत्यको देखकर प्रेममें आविष्ट हो रहे थे। राजाके आगे श्रीवास पण्डितको देखकर हरिचन्दनने उन्हें अपने हाथके स्पर्शसे एक तरफ हटाते हुए कहा, - 'आप एक ओर हो जाइये।' परन्तु श्रीवास पण्डित तो महाप्रभुके नृत्यको देखनेमें इतने आविष्ट थे कि उन्हें कुछ भी पता नहीं चला। हरिचन्दनके द्वारा बार-बार ठेले जानेपर उनको क्रोध आ गया और हरिचन्दनको थप्पड़ मारकर उसे ठेलनेके लिये मना किया। थप्पड़ खाकर हरिचन्दनको भी क्रोध आ गया ॥ 91-95 ॥ अनुभाष्य - 'तारे'-हरिचन्दनको ॥ 95 ॥ हरिचन्दनको राजाके द्वारा मना करना :- क्रु आपनि प्रतापरुद्र निवारिल तारे ॥ 96 ॥ वैष्णवके द्वारा अपमान या आघात भी सौभाग्यसूचक :- “भाग्यवान् तुमि - इँहार हस्त-स्पर्श पाइला। आमार भाग्ये नाहि, तुमि कृतार्थ हैला ॥" 97 ॥ अनुवाद-हरिचन्दन क्रोधमें आकर श्रीवास पण्डितको कुछ कहना ही चाहता था, परन्तु स्वयं राजा प्रतापरुद्रने उसे यह कहकर रोक दिया, - "तुम बहुत भाग्यवान् हो जो तुमने इनके हाथोंका स्पर्श प्राप्त किया। मेरा ऐसा सौभाग्य नहीं है, तुम कृतार्थ हो गये हो ॥" 96-97 ॥ अनुभाष्य - 'ताँरे' - श्रीवासको ॥ 96 ॥ अपलक नेत्रोंसे निश्चलभावसे श्रीजगन्नाथको महाप्रभुके नृत्यका दर्शन करनेसे परमानन्द :- प्रभुर नृत्य देखि' लोके हैल चमत्कार। अन्य आछुक, जगन्नाथेर आनन्द अपार ॥ 98 ॥ रथ स्थिर कैल, आगे ना करे गमन। अनिमिष-नेत्रे करे नृत्य दरशन ॥ 99 ॥ महाप्रभुके नृत्य-दर्शनसे सुभद्रा एवं बलराम भी हर्षित :- सुभद्रा-बलरामेर हृदये उल्लास। नृत्य देखि' दुइ जनार श्रीमुखेते हास ॥ 100 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके नृत्यको देखकर लोग आश्चर्यचकित हो गये और यहाँ तक कि स्वयं श्रीजगन्नाथको भी अपार आनन्द हुआ। श्रीजगन्नाथने अपने रथको स्थिर कर दिया और वे अपलक-नेत्रोंसे महाप्रभुका नृत्य देखने लगे। श्रीसुभद्रा और श्रीबलरामके हृदयमें भी उल्लास हो रहा था और महाप्रभुका नृत्य देखकर उन दोनोंके मुखपर मुस्कुराहट छा गयी ॥ 98-100 ॥ अष्टसात्त्विक-भावसमूह सुशोभित महाप्रभुका रूप और लीला :- उद्दण्ड नृत्ये प्रभुर अद्भुत विकार। अष्टसात्त्विक-भाव उदय समकाल ॥ 101 ॥ माँस व्रण-सम रोमवृन्द पुलकित। शिमुलीर वृक्ष येन कण्टक-वेष्टित ॥ 102 ॥ एक एक दन्तेर कम्प देखिते लागे भय। लोके जाने, दन्त सब खसिया पड़य ॥ 103 ॥ सर्वाङ्गे प्रस्वेद, ताते रक्तोद्गम। 'जज गग' 'जज गग'-गद्गद-वचन ॥ 104 ॥ जलयन्त्र-धारा यैछे बहे अश्रुजल। आश-पाशे लोक यत भिजिल सकल ॥ 105 ॥ देहकान्ति गौरवर्ण देखिये अरुण। कभु कान्ति देखि' येन मल्लिका-पुष्पसम ॥ 106 ॥ 512 ।
तेरहवाँ अध्याय 13/101-113 ] कभु स्तम्भ, कभु प्रभु भूमिते लोटाय। शुष्ककाष्ठसम पद-हस्त ना चलय ॥ 107 ॥ कभु भूमे पड़े, कभु श्वास हय हीन। याहा देखि' भक्तगणेर प्राण हय क्षीण ॥ 108 ॥ अनुवाद-उद्दण्ड नृत्य करते हुए महाप्रभुके शरीरमें अद्भुत विकार होने लगे और आठों सात्त्विक भाव एक साथ उदय हो गये। उनकी रोमावली पुलकित होकर खड़ी हो गयी और उसकी जड़ें फूल गयीं, उनके शरीरको देखकर ऐसा लगता था जैसे रुईके वृक्षमें चारों ओर काँटे हों। उनका एक-एक दाँत कटकटा रहा था और लोंगोंको भय लग रहा था मानो उनके सभी दाँत टूटकर गिर पड़ेंगे। सभी अङ्गोंसे पसीना निकलकर बह रहा था और साथ ही रक्त भी निकलने लगा। गद्गद् वाणीसे वे जगन्नाथ न बोलकर केवल 'जज गग' 'जज गग' ही बोल पा रहे थे। पिचकारीकी धारके समान महाप्रभुके नेत्रोंसे अश्रु बह रहे थे और आस-पास खड़े लोग उन अश्रुओंकी धारामें भीग रहे थे। वैवर्ण्यके कारण महाप्रभुकी गौरवर्ण (पीतवर्ण) देहकान्ति कभी अरुणवर्ण की और कभी मल्लिकाके पुष्पोंकी भाँति शुक्लवर्ण दिखायी देने लगती। कभी तो महाप्रभु चलते-चलते स्तम्भित हो जाते और कभी भूमिपर लोटने लगते। कभी उनके हाथ-पैर सूखी लकड़ीकी भाँति हो जाते जिससे वे हिल-डुल भी नहीं पाते। कभी वे भूमिपर गिर पड़ते और कभी श्वासहीन हो जाते जिसे देखकर भक्तोंके प्राण निकलनेवाले हो जाते ॥ 101-108 ॥ अनुभाष्य-महाप्रभुके शरीरमें एक ही समयमें आठों प्रकारके सात्त्विक भावोंका उदय हो रहा था। महाप्रभुके रोम पुलकित होनेपर लोमकूपका माँस रोमाञ्चके कारण घाव या फोड़े जैसा दीखने लगा। 'जज गग' - 'जगन्नाथ' बोलते हुए उच्चारण करते हुए महाप्रभुके मुखसे इस प्रकार अस्फुट-शब्द ही निकल रहे थे। 'जल-यन्त्र'-पिचकारी, अथवा जल-सींचनेवाला यन्त्र अथवा फव्वारा ॥ 101-105 ॥ महाप्रभुके मुखचन्द्रसे फेनामृत-धारा :- कभु नेत्रे-नासाय जल, मुखे पड़े फेन। अमृतेर धारा चन्द्रबिम्बे बहे येन ॥ 109 ॥ शुभानन्दके द्वारा पान :- सेइ फेन लञा शुभानन्द कैल पान। कृष्णप्रेमरसिक तेंहो महाभाग्यवान् ॥ 110 ॥ अनुवाद-कभी महाप्रभुके नेत्रों और कभी नाकसे जल निकलने लगता और कभी मुखचन्द्रसे फेन निकलता जिसे देखकर ऐसा लगता मानो चन्द्रमासे अमृतकी धारा बह रही हो। महाप्रभुके मुखचन्द्रसे निकली हुई फेनको श्रीशुभानन्दने पान कर लिया, क्योंकि वे महाभाग्यवान् श्रीकृष्णप्रेम रसके रसिक थे ॥ 109-110 ॥ अनुभाष्य- 'शुभानन्द'-आदिलीला 10/110 संख्या और मध्यलीला 13/39 संख्या देखें ॥ 110 ॥ नृत्यके अन्तमें महाप्रभुके द्वारा कान्तके साथ कान्ताके मिलनका गीत-श्रवण :- एइमत ताण्डव-नृत्य कैल कतक्षण। भाव-विशेषे प्रभुर प्रवेशिल मन ॥ 111 ॥ ताण्डव-नृत्य छाड़ि' स्वरूपेरे आज्ञा दिल। हृदय जानिया स्वरूप गाइते लागिल ॥ 112 ॥ श्रीस्वरूप दामोदरका गीत :- तथाहि पदम्- “सेइ त' पराण-नाथ पाइनु। याहा लागि' मदन-दहने झुरि' गेनु ॥” 113 ॥ ध्रु ॥ अनुवाद-इस प्रकार कुछ समय तक ताण्डव-नृत्य (अकेले पुरुषके द्वारा नृत्य) करते हुए महाप्रभुके मनमें विशेष भाव उदित हुआ। तब उन्होंने ताण्डव-नृत्यको रोककर श्रीस्वरूप दामोदरको गान करनेके लिये आदेश दिया। श्रीस्वरूप दामोदर महाप्रभुके हृदयके भावोंको । 513
[ 13/111-119 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला जानकर गान करने लगे, — “मैंने उन्हीं प्राणनाथको पा लिया है, जिनके विरहमें मैं कामाग्निकी ज्वालामें जलकर म्लान हो रही थी॥” 111-113॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ताण्डव-नृत्य छोड़कर महाप्रभुके हृदयमें कुरुक्षेत्र-मिलनमें श्रीराधाके भाव उदित हुए थे। बहुत दिनोंके विरहके बाद, यह गीत स्वाभाविक रूपमें आकर उपस्थित हुआ॥ 113॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 1/53-56 संख्या देखें॥ 113॥ गीत श्रवण करनेसे महाप्रभुका नृत्य :— एइ धुया उच्चैःस्वरे गाय दामोदर। आनन्दे मधुर नृत्य करेन ईश्वर॥ 114॥ श्रीजगन्नाथका महाप्रभुके पीछे-पीछे चलना :— धीरे धीरे जगन्नाथ करेन गमन। आगे नृत्य करि' चलेन शचीर नन्दन॥ 115॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर इस पदका बार-बार उच्च स्वरसे गान करने लगे और महाप्रभु आनन्दपूर्वक उस गानकी लयके साथ नृत्य करने लगे। श्रीजगन्नाथका रथ धीरे-धीरे चलने लगा और शचीनन्दन श्रीगौरहरि उसके आगे नृत्य करते हुए चलने लगे॥ 114-115॥ सभी भक्तोंका श्रीजगन्नाथकी ओर मुख करके नृत्य और कीर्तन :— जगन्नाथे नेत्र दिया सबे नाचे, गाय। कीर्त्तनीया सह प्रभु पाछे पाछे याय॥ 116॥ अनुवाद—नृत्य एवं गान करते हुए सभी भक्त श्रीजगन्नाथको ही देख रहे थे। महाप्रभु तब कीर्तन करनेवाले भक्तोंके साथ यात्रामें सबसे पीछेकी ओर गये॥ 116॥ बहुत समयके विरहके बाद श्रीराधाभावमें भावित महाप्रभुका प्रियतम श्रीकृष्णके साथ मिलन :— जगन्नाथ-मग्न प्रभुर नयन-हृदय। श्रीहस्तयुगे करे गीतेर अभिनय॥ 117॥ श्रीराधाभाव-सुवलित महाप्रभुमें ही श्रीकृष्णकी अपेक्षा अधिक प्रेम :— गौर यदि पाछे चले, श्याम हय स्थिरे। गौर आगे चले, श्याम चले धीरे धीरे॥ 118॥ एइमत गौर-श्यामे, दोँहे ठेलाठेलि। स्वरथे श्यामरे राखे गौर महाबली॥ 119॥ अनुवाद—महाप्रभुके नेत्र और हृदय श्रीजगन्नाथमें निमग्न थे और गीतके भावोंके अनुरूप वे अपने दोनों श्रीहस्तकमलोंको चलाते हुए अभिनय करने लगे। जब श्रीगौरसुन्दर रथके पीछे चलते, तब श्यामसुन्दर (श्रीजगन्नाथ) रुक जाते और यदि श्रीगौरसुन्दर रथके आगे चलते, तो श्यामसुन्दर उनके नृत्यको देखते हुए धीरे-धीरे चलने लगते। इस प्रकार श्रीगौरसुन्दर एवं श्रीश्यामसुन्दर, दोनोंमें परस्पर खींचातानी हो रही थी। महाबली श्रीगौरसुन्दरने अपने प्रेमके द्वारा रथपर चढ़े हुए श्रीश्यामसुन्दरको वशीभूत कर रखा था॥ 117-119॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिस समय श्रीगौरचन्द्र गीतका अभिनय करते-करते (रथ के) पीछे चले जाते, तब श्रीजगन्नाथ स्थिर हो जाते; श्रीगौरचन्द्र जब आगे चलते, तब श्रीजगन्नाथ धीरे-धीरे आगे बढ़ते॥ 118॥ अनुभाष्य—श्रीमहाप्रभुका भाव यह है—ब्रजेन्द्रनन्दन गोकुलवासिनियोंको छोड़कर द्वारका लीलामें मत्त हो गये थे, बादमें कुरुक्षेत्र मिलनमें उनका सङ्ग प्राप्त किया। यहाँपर, ब्रजेन्द्रनन्दनरूप श्रीजगन्नाथदेवको राधाभावमें विभावित श्रीगौरसुन्दर ऐश्वर्यलीला-क्षेत्र श्रीक्षेत्र-नीलाचलसे माधुर्य- लीलाभूमि गुण्डिचाकी ओर आकर्षण करके ले जा रहे हैं। श्रीराधा और गोपियोंके भावमें विभावित श्रीगौरहरिका रथके पीछे जानेका उद्देश्य यह था कि व्रजेन्द्रनन्दनने व्रजके भावोंको भूलकर उनका (श्रीराधादि गोपियोंका) अनादर किया है, तथापि उनकी चेष्टासे फिरसे श्रीकृष्णमें व्रजकी माधुरीके उदित होनेके कारण ऐश्वर्यलीलासे माधुर्यलीलाके उत्कर्षकी उपलब्धि होनेपर ही श्रीकृष्णकी रथ-विजय है। वास्तवमें श्रीराधादि 514 ।
तेरहवाँ अध्याय 13/118-124 ] ब्रजजनोंके प्रति आन्तरिक सौहार्दके वशीभूत होकर ही श्रीकृष्ण जा रहे हैं, अथवा उनका इसके अतिरिक्त कोई और उद्देश्य है, इस विषयमें सन्देहको दूर करनेके लिये श्रीमन्महाप्रभु रथके पीछेकी ओर चले गये। महाप्रभुके हृदयके भावको जानकर श्रीजगन्नाथदेव भी रुककर उनकी प्रतीक्षा करने लगे। विशेषतः, वृन्दावनेश्वरीके अभावमें व्रजभावके सौन्दर्यकी सम्भावना नहीं है। श्रीजगन्नाथको प्रतीक्षा करते देख गोपीभावके सामर्थ्यको समझकर श्रीगौरसुन्दरके उत्साहित होकर आगे बढ़नेपर श्रीजगन्नाथदेव भी लज्जित होकर धीरे-धीरे उनका अनुगमन करने लगे। श्रीराधादि-गोपीभावमें भावुक श्रीगौरका अनुगमन और श्रीगौरके लिये प्रतीक्षा करनेकी योग्यता श्रीजगन्नाथदेवमें ही देखी जाती है, इसलिये श्रीजगन्नाथके प्रति महाप्रभुके भाव और महाप्रभुके प्रति श्रीजगन्नाथके भाव, —दोनोंके इस प्रकारके भावोंकी ठेला-ठेलीमें या युद्धमें श्रीराधाभाव-विभावित महाप्रभु अथवा उनका प्रेम ही अधिक बलवान् है॥ 118-119 ॥ विरहके अन्तमें मिलन-स्थलीकी स्मृतिका द्योतक श्लोक-पाठ :- नाचिते नाचिते प्रभुर हैला भावान्तर। हस्त तुलि' श्लोक पड़े करि' उच्चैःस्वर ॥ 120 ॥ अनुवाद-नृत्य करते-करते महाप्रभुका भावान्तर हुआ और वे अपने हाथोंको ऊपर उठाकर उच्च स्वरसे एक श्लोक पढ़ने लगे॥ 120 ॥ काव्यप्रकाशमें (1/4), साहित्यदर्पणमें (1/10); पद्यावलीमें (382) :- यः कौमारहरः स एव हि वरस्ता एव चैत्रक्षपा- स्ते चोन्मीलितमालतीसुरभयः प्रौढ़ाः कदम्बानिलाः। सा चैवास्मि तथापि तत्र सुरतव्यापारलीलाविधौ रेवा-रोधसि वेतसीतरुतले चेतः समुत्कण्ठते ॥ 121 ॥ अनुवाद-एक नायिका अपनी एक सखीसे कहती है,- "जिसने कौमारावस्थामें मेरे चित्तका हरण किया था, अब वही मेरा वर है अर्थात् वैवाहिक पति है। उसके साथ कौमारावस्थामें प्रथम मिलनके समय जो चैत्रमाहकी ज्योत्स्नामयी रात्रि थी, अब भी वही चैत्रमाहका ज्योत्स्नामय रात्रिकाल है। प्रथम मिलनके समयकी भाँति खिली हुई मालती पुष्पोंकी भीनी-भीनी मधुर सुगन्धयुक्त वायु अब भी कदम्ब वनकी ओरसे प्रवाहित हो रही है; मैं भी वही हूँ; फिर भी उसी रेवा नदीके किनारे निर्जन सुशीतल प्रदेशमें बेंतके वृक्षके नीचे प्रथम मिलनके समयवाली सुरत-व्यापारलीला अर्थात् प्रेममय विहारके लिये मेरा मन उत्कण्ठित हो रहा है।" 121 ॥ महाप्रभुके हृदयके भावोंके रसज्ञ श्रीस्वरूप :- एइ श्लोक महाप्रभु पड़े बार बार। स्वरूप बिना अर्थ केह ना जाने इहार ॥ 122 ॥ अनुवाद-महाप्रभु बार-बार इस श्लोकको पढ़ रहे थे, परन्तु श्रीस्वरूप दामोदरके अतिरिक्त कोई भी इसके अर्थ (आन्तरिक भाव) को नहीं जानता था ॥ 122 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 1/58-59 संख्या देखें ॥ 121-122 ॥ इस श्लोकके अर्थकी मध्यलीलाके पहले अध्यायमें व्याख्या :- एइ श्लोकार्थ पूर्वे करियाछि व्याख्यान। श्लोकेर भावार्थ करि संक्षेपे आख्यान ॥ 123 ॥ अनुवाद- (ग्रन्थकार कह रहे हैं) - इस श्लोकके अर्थकी मैंने पहले व्याख्या की थी। अब संक्षेपमें ही इस श्लोकके भावोंको व्यक्त कर रहा हूँ॥ 123 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 1/53, 77-80, 82-84 संख्या देखें ॥ 123 ॥ बहुत समयके विरहके बाद कुरुक्षेत्रमें श्रीकृष्णके साथ गोपियोंका मिलन :- पूर्वे यैछे कुरुक्षेत्रे सब गोपीगण। कृष्णेर दर्शन पाञा आनन्दित मन ॥ 124 ॥ । 515
[ 13/124-135 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीजगन्नाथ-दर्शनसे भी महाप्रभुका वैसा ही गोपी-भाव :- जगन्नाथ देखि' प्रभुर से भाव उठिल। सेइ भावाविष्ट हञा धुया गाओयाइल॥ 125 ॥ अनुवाद—पहले जैसे कुरुक्षेत्रमें सभी गोपियाँ श्रीकृष्णका दर्शन पाकर आनन्दित हो गयीं थीं, श्रीजगन्नाथको देखकर महाप्रभुमें भी वही भाव उदित हुआ। उसी भावमें आविष्ट होकर महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदरसे उस पदका बार-बार गान करवाया था॥ 124-125 ॥ राजवेशधारी श्रीकृष्णके प्रति गोपवधू श्रीमती राधिकाकी उक्ति :- अवशेषे राधा कृष्णे करे निवेदन। 'सेइ तुमि, सेइ आमि, सेइ नव सङ्गम॥ 126 ॥ तथापि आमार मन हरे वृन्दावन। वृन्दावने उदय कराओ आपन-चरण॥ 127 ॥ इँहा लोकारण्य, हाती, घोड़ा, रथध्वनि। ताँहा पुष्पारण्य, भृङ्ग-पिक-नाद शुनि॥ 128 ॥ एइ राजवेश, सङ्गे सब क्षत्रियगण। ताँहा गोपवेश, सङ्गे मुरली-वादन॥ 129 ॥ व्रजे तोमार सङ्गे येइ सुख-आस्वादन। सेइ सुखसमुद्ररे इँहा नाहि एक कण॥ 130 ॥ आमा लञा पुनः लीला करह वृन्दावने। तबे आमार मनोवाञ्छा हय त' पूरणे॥' 131 ॥ अनुवाद—अन्तमें श्रीमती राधिका श्रीकृष्णसे इस प्रकार निवेदन करने लगीं,—'आप भी वही हैं, मैं भी वही हूँ और हमारा मिलन भी नवनवायमान जैसा ही है। तथापि मेरे मनको तो वृन्दावनकी स्मृति हरण कर रही है, अतः आप वृन्दावनमें अपने चरण धरो अर्थात् वृन्दावनमें प्रवेश करो। यहाँपर लोगोंकी भीड़, हाथियों, घोड़ों और रथोंका कोलाहल है, परन्तु वृन्दावनमें पुष्पोंके वन तथा भ्रमर और कोयल की मधुर ध्वनि सुनायी देती है। यहाँ आपका राजवेश है और साथमें योद्धा भी हैं और वृन्दावनमें आपका गोपवेश होता है और वहाँ आप मुरलीवादन करते हैं। [इस स्थानपर रणभूमिका परिवेश है, प्रेमरसास्वादनके अनुकूल वातावरण नहीं है]। इसलिये व्रजमें आपके साथ जो सुखका आस्वादन है, उस सुख-समुद्रका यहाँ एक कण भी नहीं है। मुझे साथ लेकर पुनः उसी वृन्दावनमें आप लीला कीजिये, तभी मेरी मनोवाञ्छा पूर्ण होगी॥ 126-131 ॥ प्रथम अध्यायमें सूत्र-वर्णनके बीचमें यह वर्णित :— भागवते आछे यैछे राधिका-वचन। पूर्वे ताहा सूत्रमध्ये करियाछि वर्णन॥ 132 ॥ अनुवाद—(ग्रन्थकार कह रहे हैं—) भागवतमें जैसे श्रीमती राधिकाके वचन वर्णित हैं, उन्हीं वचनोंका मैंने पहले श्रीचैतन्यलीलाके सूत्ररूप वर्णनमें (मध्यलीलाके पहले अध्यायमें) उल्लेख किया है॥ 132 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 1/81 संख्या, 13/136 संख्या देखें॥ 132 ॥ भागवतके इन श्लोकोंका अर्थ श्रीस्वरूप और श्रीरूपके अतिरिक्त अन्योंके लिये अज्ञेय :- सेइ भावावेशे प्रभु पड़े आर श्लोक। सेइ सब श्लोकेर अर्थ नाहि बुझे लोक॥ 133 ॥ स्वरूप-गोसाञि जाने, ना कहे अर्थ तार। श्रीरूप-गोसाञि कैल से अर्थ प्रचार॥ 134 ॥ अनुवाद—श्रीमती राधिकाके भावावेशमें महाप्रभुने और कई श्लोक पढ़े। इन सब श्लोकोंके अर्थको साधारण लोग नहीं समझ सकते। यद्यपि श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी उन श्लोकोंके अर्थको जानते थे, तथापि उन्होंने किसीको भी उन्हें प्रकाशित नहीं किया। श्रीरूप गोस्वामीने ही उनके अर्थका प्रचार किया॥ 133-134 ॥ नृत्यके बीचमें नित्य-आस्वादित श्लोकोंका उच्चारण :— स्वरूप सङ्गे यार अर्थ करे आस्वादन। नृत्यमध्ये सेइ श्लोक करेन पठन॥ 135 ॥ 516 ।
तेरहवाँ अध्याय 13/133-140 ] अनुवाद—महाप्रभु श्रीस्वरूप दामोदरके साथ जिन श्लोकोंके भावोंका आस्वादन करते थे, उन्हीं श्लोकोंका नृत्य करते हुए पाठ करते ॥ 135 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 1/59-60, 69-72 और 76-84 संख्या देखें ॥ 133-135 ॥ गोपियोंकी अपने घरमें श्रीकृष्णको पानेकी आकाङ्क्षा :- श्रीमद्भागवत (10/82/48)— आहुश्च ते नलिन-नाभ पदारविन्दं योगेश्वरैर्हृदि विचिन्त्यमगाधबोधैः। संसारकूपपतितोत्तरणावलम्बं गेहं जुषामपि मनस्युदियात् सदा नः ॥ 136 ॥ अनुवाद—[इसका शाब्दिक अर्थ है]—गोपियोंने कहा,—“प्रिय प्रभो! आपकी नाभि कमल-पुष्पके समान है। संसारकूपमें पतित जीवोंके लिये आपके चरणकमल ही एकमात्र आश्रय हैं। बड़े-बड़े ज्ञानी और योगी भी आपके चरणकमलोंकी आराधना करते हैं। वे ध्यानमें उनके दर्शनोंकी अभिलाषा रखते हैं, परन्तु यदा-कदा ही वे उनके दर्शन पाते हैं। यद्यपि हम गृह-शृंखलामें आबद्ध साधारण जीव हैं, किन्तु आपसे प्रार्थना करती हैं कि आपके ये चरणकमल हमारे हृदयमें भी उदित हों ॥” 136 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 1/81 संख्या देखें ॥ 136 ॥ कृष्णेन्द्रिय-प्रीतिवाञ्छामय शुद्ध हृदयरूपी वृन्दावनमें ही श्रीकृष्णके उदय होनेकी योग्यता :- “अन्येर हृदय—मन, मोर मन—वृन्दावन, 'मने' 'वने' एक करि' जानि। ताँहा तोमार पदद्वय, कराह यदि उदय, तबे तोमार पूर्ण कृपा मानि ॥ 137 ॥ अनुवाद—श्रीमती राधारानीके भावोंमें विभावित होकर महाप्रभु श्रीजगन्नाथसे कह रहे हैं,—“संसारके लोगोंका मन ही हृदय है, परन्तु मेरा मन और वृन्दावन एक है, क्योंकि मेरा मन वृन्दावनसे कभी पृथक् नहीं होता। मेरा मन वृन्दावन है, जहाँ आप परम सुख अनुभव करते हो। वृन्दावनका आनन्द लेनेके लिये आप अपने चरणकमल मेरे मनरूपी वृन्दावनमें रखोगे, तो मैं इसे आपकी पूर्ण कृपा मानूँगी ॥ 137 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अन्य लोगोंका मन ही हृदय है, किन्तु मेरा मन वृन्दावनसे पृथक् नहीं है। मैं मन और वृन्दावनको 'एक' ही जानती हूँ ॥ 137 ॥ अनुभाष्य—प्राकृत मानव सङ्कल्प और विकल्पात्मक धर्मसे युक्त हृदयको 'मन' मानता है। प्राकृत-भोगबुद्धि परित्याग करके मैं अपने श्रीकृष्ण-सेवापरायण चित्तको ही श्रीराधाकृष्णकी विहार भूमि 'वृन्दावन' मानती हूँ। प्राकृत-विषय-चेष्टारहित मनको वृन्दावनसे 'अभिन्न' मानती हूँ ॥ 137 ॥ शुद्ध हृदयमें श्रीकृष्णसङ्ग-लालसा :- प्राणनाथ, शुन मोर निवेदन। व्रज—आमार सदन, ताँहा तोमार सङ्गम, ना पाइले ना रहे जीवन ॥ 138 ॥ ध्रु ॥ अनुवाद—हे प्राणनाथ ! मेरा एक निवेदन सुनिये। व्रज मेरा घर है, वहाँ आपका सङ्ग प्राप्त नहीं करनेपर मेरा जीवन नहीं रहेगा ॥ 138 ॥ कृष्णेन्द्रिय प्रीतिवाञ्छामें ऐश्वर्यसूचक ज्ञान शिथिल :- पूर्वे उद्धव-द्वारे, एबे साक्षात् आमारे, योग-ज्ञाने कहिला उपाय। तुमि-विदग्ध, कृपामय, जानह आमार हृदय, मोरे ऐछे कहिते ना युयाय ॥ 139 ॥ ऐकान्तिक कृष्णप्रेममें उसके अतिरिक्त अन्य अभिनिवेश असम्भव :- चित्त काढ़ि तोमा हैते, विषये चाहि लगाइते, यत्न करि, नारि काढ़िबारे। तारे ध्यान शिक्षा कराह, लोक हासाञा मार, स्थानास्थान ना कर विचारे ॥ 140 ॥ । 517
[ 13/139-146 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ऐश्वर्य ज्ञानके अभ्यासमें गोपियोंकी विरक्ति :- नहे गोपी योगेश्वर, पदकमल तोमार, ध्यान करि' पाइबे सन्तोष। तोमार वाक्य-परिपाटी, तार मध्ये कुटिनाटी, शुनि' गोपीर आरो बाढ़े रोष ॥ 141 ॥ कृष्णविरहके ग्राससे ही उद्धारकी गोपियोंकी इच्छा, अपने संसार-बन्धनसे मुक्त होनेकी इच्छा नहीं :- देह-स्मृति नाहि यार, संसार-कूप काँहा तार, ताहा हैते ना चाहे उद्धार। विरह-समुद्र-जले, काम-तिमिङ्गिल गिले, गोपीगणे नेह' तार पार ॥ 142 ॥ व्रजलीला और स्वजनोंको भूलनेके कारण श्रीकृष्णको उलाहना देना :- वृन्दावन, गोवर्धन, यमुना-पुलिन, वन, सेइ कुञ्जे रासादिक लीला। सेइ व्रजेर जनगण, माता, पिता, बन्धुगण, बड़ चित्र, केमने पासरिला ॥ 143 ॥ श्रीकृष्णकी व्रजकी विस्मृतिको देखकर प्रियतमको दोष न देकर अपने भाग्यको धिक्कार :- विदग्ध, मृदु, सद्गुण, सुशील, स्निग्ध, करुण, तुमि, तोमार नाहि दोषाभास। तबे ये तोमार मन, नाहि स्मरे व्रजजन, से-आमार दुर्दैव-विलास ॥ 144 ॥ यशोदाका दुःख बतलाकर आवेदनके द्वारा श्रीकृष्णकी करुणाको उदित करानेकी चेष्टा; श्रीकृष्णके विरहकी अपेक्षा व्रजवासियोंकी मृत्युकी कामना :- ना देखि आपन-दुःख, देखि' व्रजेश्वरी-मुख, व्रजजनेर हृदय विदरे। किवा मार' व्रजवासी, किवा जीयाओ व्रजे आसि', केन जीयाओ दुःख सहाइबारे ? ॥ 145 ॥ श्रीकृष्णकी ऐश्वर्यलीलामें व्रजवासियोंकी अरुचि, फिर भी व्रजके त्याग और श्रीकृष्णके विरहमें मृतप्राय :- तोमार ये अन्यवेश, अन्य सङ्ग, अन्य देश, व्रजजने कभु नाहि भाय। व्रजभूमि छाड़िते नारे, तोमा ना देखिले मरे, व्रजजनेर कि हबे उपाय ? ॥ 146 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 139-146 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे कृष्ण! तुम जब मथुरामें थे, तब उद्धवके माध्यमसे 'ज्ञानयोग'का उपदेश भेजकर कि ज्ञानयोगसे तुम्हें प्राप्त किया जा सकता है, यह बात तुमने कही थी। अब इस कुरुक्षेत्रमें साक्षात् मिलन होनेपर भी उसी प्रकार 'ज्ञानयोग' बतला रहे हो। मेरा हृदय-प्रेममय है, इसमें ज्ञानयोगका स्थान नहीं है। ऐसा जाननेपर भी तुम्हारा इस प्रकार उपदेश देना उचित नहीं है। मैं तुमसे चित्त हटाकर विषयमें लगानेकी इच्छा करनेपर भी वैसा नहीं कर पाती। इसलिये तुम्हारे प्रति ऐसी अनुरक्ति ही जब मेरा स्वभाव है, तब मुझे ध्यानकी शिक्षा देना-केवल लोकहास्य मात्र है; इसलिये तुमने स्थान-अस्थानका विचार नहीं किया है। गोपियाँ कोई योगेश्वर नहीं है कि तुम्हारे चरणकमलोंका ध्यान करके आनन्द प्राप्त करेंगी। तुम्हारे वचनोंकी परिपाटी उचित होनेपर भी गोपियोंको (अपने) ध्यानके विषयमें शिक्षा देना-केवल कुटिनाटी (कपटता मात्र) है। इस (ध्यानकी शिक्षाकी आवश्यकताको) सुनकर गोपियोंमें अधिक अभिमान उत्पन्न होता है। गोपियोंकी स्वाभाविक रूपसे ही जब देहकी स्मृति नहीं है, तब 'संसार-कूप'के नामपर तो उनका कुछ है ही नहीं। इसलिये मुक्तिजनक ध्यानकी पद्धति उनके लिये विफल (मात्र) है। तुम्हारे विरह-समुद्रमें पड़ी हुई गोपियोंको केवल तुम्हारी सेवा-कामरूपी तिमिङ्गल (बहुत बड़ी विशेष मछली) निगल रही है, उससे अर्थात् उस विरहसे उनका उद्धार करो। आश्चर्यकी बात यह है कि, तुम अपने उन व्रजजनों अर्थात् माता, पिता, बन्धुओंको कैसे भूल गये? तुम विशुद्ध पुरुष, मृदु, सद्गुणोंके द्वारा सदैव सुशील, स्निग्ध, करुण हो, इसलिये तुम्हारे ऐसे व्यवहारमें दोषाभास भी नहीं है। फिर भी तुम व्रजजनोंको अब 518 ।
तेरहवाँ अध्याय 13/139-149 ] स्मरण नहीं करते हो, वह केवल हमारा ही दुर्दैवविलास श्रीकृष्णको व्रजमें आनेके लिये कातर होकर आवेदन :- (दुर्भाग्यका खेल) है। मैं अपने दुःखको नहीं देख रही तुमि—व्रजेर जीवन, व्रजराजेर प्राणधन, हूँ, (किन्तु सत्य तो यह है कि), ब्रजेश्वरी यशोदाका तुमि—व्रजेर सकल सम्पद्। दुःख देखकर व्रजवासियोंका हृदय वास्तवमें फट जाता कृपार्द्र तोमार मन, आसि' जीयाओ व्रजजन, है। तुम व्रजवासियोंको विरहके द्वारा कभी तो मरे हुए व्रजे उदय कराओ निज-पद ॥ 147 ॥ जैसा बना देते हो, कभी मिलनके द्वारा जीवित करते अनुवाद—हे कृष्ण! तुम व्रजके जीवन हो। व्रजराज हो,—किसलिये यह दुःख सहन करनेके लिये जीवित नन्द महाराजके प्राणधन हो। तुम तो समस्त व्रजकी रखते हो, इस विषयमें कुछ नहीं कह सकती। तुम्हारा एकमात्र सम्पत्ति हो। तुम्हारा मन कृपासे द्रवीभूत रहता यह माथुर राजवेशादि धारण करना, व्रजसे पृथक् है। तुम व्रजमें आकर व्रजवासियोंको सञ्जीवित करो। स्थानपर वास और महिषियोंका सङ्ग, यह व्रजवासियोंको कृपाकर व्रजमें पदार्पण करो ॥ 147 ॥ बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता। व्रजवासियोंकी यही श्रीकृष्णकी लज्जा, व्याकुलता एवं एक विचित्र बात है कि, वे व्रजभूमिको छोड़कर अन्यत्र श्रीराधाको सान्त्वना :- नहीं जा सकते, और दूसरी ओर, तुम्हें नहीं देखनेपर शुनिया राधिका-वाणी, व्रजप्रेम मने जानि, मर भी रहे हैं, इसलिये व्रजवासियोंके लिये क्या उपाय भावे व्याकुलित देह-मन। होगा, उसे तुम ही जानते हो ॥ 139-146 ॥ व्रजलोकेर प्रेम शुनि', आपनाके 'ऋणी' मानि', अनुभाष्य— 'उद्धव-द्वारे'—भाः दशम स्कन्ध, 47वाँ करे कृष्ण ताँरे आश्वासन ॥ 148 ॥ अध्याय देखें। श्रीकृष्णका सहैतुक प्रत्युत्तर :- 'विषय'—श्रीकृष्णसे भिन्न वस्तु अथवा कार्य। 'प्राणप्रिये, शून, मोर ए सत्य-वचन। 'कुटिनाटी'—कपटता। तोमा-सबार स्मरणे, झुरों मुञि रात्रिदिने, देहस्मृति या देहमें अभिनिवेश होनेसे 'संसार' होता मोर दुःख ना जाने कोन जन ॥ 149 ॥ ध्रु ॥ है—भाः 11/2/37, 11/3/6 आदि असंख्य भागवतके अनुवाद—श्रीमती राधिकाके वचन सुनकर श्रीकृष्णके श्लोक इसके प्रमाण हैं, अधिकताके भयसे वे यहाँ मनमें व्रजवासियोंके प्रति प्रेम जाग्रत हो उठा और उद्धृत नहीं किये जा रहे हैं। गोपियों (एवं सिद्ध उनके देह तथा मन व्याकुल हो गये। अपने प्रति महाभागवत अथवा परमहंसोंकी भी) देहस्मृति नहीं होती, व्रजवासियोंके प्रेमके विषयमें सुनकर वे स्वयंको ऋणी भाः 10/29/30, 33-34, 11/30/43, 10/32/22, 11/35/19 मानने लगे। तब श्रीकृष्ण श्रीमती राधिकाको आश्वासन आदि श्लोक देखें। देते हुए कहने लगे,—हे प्राणप्रिय राधिके! मैं सत्य 'काम'—भःरःसिः पूर्व विभाग, साधनभक्ति लहरीमें वचन कह रहा हूँ। तुम सबको स्मरण करके मैं गौतमीयतन्त्र-वाक्य—आदिलीला 4/162-214 संख्या एवं रात-दिन रोता हूँ। मेरे दुःखको कोई भी नहीं मध्यलीला 8/207-218 संख्या देखें। जानता ॥ 148-49 ॥ 'तिमिङ्गिल'—बड़ी व्हेल-मछलीको भी निगलनेमें अमृतप्रवाह भाष्य— 'झुरों'—रोता रहता हूँ॥ 149 ॥ जो समर्थ है, ऐसा बहुत बड़ा जलचर जन्तु। अनुभाष्य— 'ऋणी'—आदिलीला 4/179-180 संख्या 'नेह'—ले जाओ। देखें ॥ 148 ॥ 'तार'—विरह-समुद्रका ॥ 139-142 ॥ । 519