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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ 20/21-33 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला “तोमार ठाञि जानि किछु द्रव्य आछय।” ईशान कहे, — “मोर ठाञि सात मोहर हय ॥” 24 ॥ अनुवाद—इतना कहकर जमींदारने उन्हें सम्मानपूर्वक रसोई बनानेके लिये चावल, दाल आदि दिये। श्रीसनातन गोस्वामीने पहले नदीमें जाकर स्नान किया। वे दो दिनसे उपवास कर रहे थे, इसलिये रसोई बनाकर उन्होंने भोजन ग्रहण किया। पूर्व-राजमन्त्री श्रीसनातनने अपने मनमें विचार किया, — 'इस जमींदारने मेरा इतना सम्मान क्यों किया?' यह सोचकर श्रीसनातन गोस्वामीने ईशानसे पूछा, — “मुझे लगता है कि तुम्हारे पास कोई मूल्यवान वस्तु है?” ईशानने कहा, — “मेरे पास स्वर्णकी सात मोहरें हैं॥” 21-24 ॥ अनुभाष्य—'दुइ उपवासे'—दो दिन उपवास करके। 'हय'—हैं; पश्चिम भारतकी हिन्दी-भाषामें "हैं' कहते हैं॥ 22-24 ॥ ईशानको डाँटना :— शुनि' सनातन तारे करिला भर्त्सन। “सङ्गे केने आनियाछ एइ काल-यम ?” ॥ 25 ॥ अनुवाद—यह सुनकर श्रीसनातन गोस्वामीने ईशानको डाँट लगायी और पूछा, — “इस मृत्यु-नादको साथमें क्यों लाये हो ?” ॥ 25 ॥ जमींदारको धन देना और सहायताकी प्रार्थना :— तबे सेइ सात मोहर हस्तेते करिया। भूञार काछे याञा कहे मोहर धरिया ॥ 26 ॥ “एइ सात सुवर्ण मोहर आछिल आमार। इहा लञा धर्म देखि' पर्वत कर पार ॥ 27 ॥ राजबन्दी आमि, गड़द्वार याइते ना पारि। पुण्य हबे, पर्वत आमा देह' पार करि ॥” 28 ॥ अनुवाद—तब उन सात मोहरोंको अपने हाथमें लेकर श्रीसनातन गोस्वामी जमींदारके पास गये। अपने हाथमें मोहरें दिखाकर कहा, — “मेरे पास ये सात स्वर्णकी मोहरें हैं, इन्हें आप ले लीजिये और अपना धर्म समझकर हमें पर्वत पार करा दीजिये। मैं एक (भागा हुआ) राजबन्दी हूँ, इसलिये किलोंके साथ राजमार्गसे नहीं जा सकता। आपका बहुत पुण्य होगा यदि आप हमें पर्वत पार करा देंगे॥” 25-28 ॥ जमींदारका हत्याके सङ्कल्पको छोड़ना; धन लेनेसे मना करना और सहायता करना स्वीकार :— भूञा हासि' कहे, — “आमि जानियाछि पहिले। अष्ट-मोहर हय तोमार सेवक-आँचले ॥ 29 ॥ तोमा मारि' मोहर लइताम आजिकार रात्र्ये। भाल हैल, कहिला तुमि, छुटिलाङ पाप हैते ॥ 30 ॥ सन्तुष्ट हइलाङ आमि, मोहर ना लइब। पुण्य लागि' पर्वत तोमा' पार करि' दिब ॥” 31 ॥ अनुवाद—जमींदारने हँसते हुए कहा, — “मुझे पहलेसे ही पता चल गया था कि आपके सेवकके आँचलमें आठ स्वर्ण मोहरें हैं। आप लोगोंको मारकर आज रात्रिमें मैं मोहरें ले लेता, अच्छा हुआ आपने स्वयं आकर ही बतला दिया, मैं पाप करनेसे बच गया। मैं आपके व्यवहारसे बहुत सन्तुष्ट हुआ हूँ, इसलिये मैं मोहरें नहीं लूँगा और पुण्य कार्य करते हुए आप लोगोंको पर्वत पार करा दूँ गा ॥ ” 29-31 ॥ गोसाञि कहे, — “केह द्रव्य लइबे आमा मारि' । आमार प्राण रक्षा कर द्रव्य अङ्गीकरि' ॥” 32 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने कहा, — “यदि आप इन्हें नहीं लेंगे, तो अन्य कोई हमें मारकर इन मोहरोंको ले लेगा, इसलिये आप ही इन मोहरोंको स्वीकार करके हमारे प्राणोंकी रक्षा करो ॥” 32 ॥ जमींदारकी श्रीसनातनको पर्वतको पार करनेमें सहायता :— तबे भूञा गोसाञिर सङ्गे चारि पाइक दिल। रात्र्ये रात्र्ये वनपथे पर्वत पार कैल ॥ 33 ॥ 224

बीसवाँ अध्याय 20/33-43 ] अनुवाद—तब जमींदारने श्रीसनातन गोस्वामीके साथ चार सेवक भेजे। रात-रातमें वनके मार्गसे उन्होंने पर्वत पार किया॥33॥ श्रीसनातनके द्वारा ईशानसे बचे हुए धनका पूछना और देशमें भेजना :— पार हञा गोसाञि तब पुछिला ईशाने। “जानि, —शेष द्रव्य किछु आछे तोमा-स्थाने ॥” 34॥ ईशान कहे, —“एक मोहर आछे अवशेष।” गोसाञि कहे, —“मोहर लञा याह' तुमि देश॥” 35॥ अनुवाद—पर्वतको पार करके श्रीसनातन गोस्वामीने ईशानसे पूछा,—“मैं जानता हूँ कि अभी भी कुछ मूल्यवान वस्तु तुम्हारे पास बची है।” ईशानने कहा,—“मेरे पास अब एक मोहर बची है।” श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,—“तुम मोहरको लेकर अपने घर लौट जाओ॥”34-35॥ अकिञ्चन, निसहाय श्रीसनातनका अकेले ही जाना :— तारे विदाय दिया गोसाञि चलिला एकला। हाते करोंया, छिड़ा कान्था, निर्भय हइला ॥ 36 ॥ अनुवाद—ईशानको विदायी देकर श्रीसनातन गोस्वामी अकेले चल दिये। अब उनके हाथमें जलका पात्र और कन्धेपर पुराने वस्त्रोंको जोड़कर बना कम्बल था। श्रीसनातन गोस्वामी अब निश्चिन्त हो गये॥36॥ हाजिपुरमें आगमन :— चलि' चलि' गोसाञि तब आइला हाजिपुरे। सन्ध्याकाले बसिला एक उद्यान-भितरे ॥ 37 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामी चलते-चलते हाजिपुर आ पहुँचे। वे सन्ध्याके समय वे एक उद्यानके अन्दर जाकर बैठे॥ 37॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'हाजिपुर'—गङ्गा-नदीके और गण्डक-नदके सङ्गम स्थलपर पटनाके दूसरी ओर हाजिपुर है॥ 37॥ वहाँ बहनोई राजसेवक श्रीकान्तके साथ भेंट :— सेइ हाजिपुरे रहे, —श्रीकान्त ताहार नाम। गोसाञिर भगिनीपति, करे राजकाम॥ 38॥ तिन लक्ष मुद्रा राजा दियाछे तार स्थाने। घोड़ा मूल्य लञा पाठाय पातसार स्थाने ॥ 39 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीके बहनोई श्रीकान्त हाजिपुरमें रहते थे और राजकार्य करते थे। बादशाहने उनके पास तीन लाख स्वर्ण मुद्राएँ भेजी थीं। उस धनसे वे घोड़ोंको खरीदकर बादशाहके पास भेजते थे॥ 38 ॥ श्रीसनातनके साथ वार्तालाप :— टुङ्गिर उपर बसि' सेइ गोसाञिरे देखिल। रात्र्ये एकजने-सङ्गे गोसाञि-पाश आइल ॥ 40 ॥ दुइजने मिलि' तथा इष्टगोष्ठी कैल। बन्धन-मोक्षण-कथा सकलि गोसाञि कहिल ॥ 41 ॥ अनुवाद—श्रीकान्त एक ऊँचे स्थानपर बैठे थे और वहींसे उन्होंने श्रीसनातन गोस्वामीको देखा। वे रात्रिके समय एक व्यक्तिको अपने साथ लेकर श्रीसनातन गोस्वामीके पास आये। श्रीकान्त और श्रीसनातन गोस्वामीने मिलकर वहींपर ही वार्तालाप किया। श्रीसनातन गोस्वामीने अपने कारागारसे छूटनेकी सारी बात उन्हें बतलायी ॥ 40-41 ॥ श्रीकान्तका श्रीसनातनको वहाँ रहनेके लिये अनुरोध :— तेंहो कहे,—“दिन-दुइ रह एइस्थाने। भद्र हओ, छाड़' एइ मलिन वसने ॥” 42 ॥ श्रीसनातनकी असम्मति और गङ्गा पार करानेका अनुरोध :— गोसाञि कहे, —“एकक्षण इहा ना रहिब। गङ्गा पार करि' देह', एक्षणे चलिब ॥” 43 ॥ अनुवाद—श्रीकान्तने कहा,—“आप दो दिन यहाँपर रहिये। इन मैले वस्त्रोंको त्यागकर सज्जन व्यक्तिकी । 225

[ 20/42-52 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला भाँति वस्त्र पहनो।” श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,-“मैं एक क्षण भी यहाँपर नहीं रहूँगा। आप मुझे गङ्गा पार करा दीजिये, मैं अभी चला जाऊँगा॥” 42-43 ॥ श्रीसनातनको ऊनी कम्बल देना और गङ्गा पार करवाना :- यत्न करि' तैं हो एक भोटकम्बल दिल। गङ्गा पार करि' दिल-गोसाञि चलिल ॥ 44 ॥ अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामीके मना करनेपर भी बहुत अनुरोध करके श्रीकान्तने उन्हें एक बहुत अच्छा ऊनी कम्बल दिया और गङ्गा पार करा दी। श्रीसनातन गोस्वामी आगे बढ़ चले ॥ 44 ॥ श्रीसनातनका काशीमें आगमन :- तबे वाराणसी गोसाञि आइला कतदिने। शुनि' आनन्दित हइला प्रभुर आगमने ॥ 45 ॥ अनुवाद-कुछ दिनोंमें श्रीसनातन गोस्वामी वाराणसी आ पहुँचे। महाप्रभुके वाराणसीमें आनेके विषयमें सुनकर उन्हें बहुत आनन्द हुआ॥ 45 ॥ श्रीचन्द्रशेखरके घरपर पहुँचना :- चन्द्रशेखरेर घरे आसि' द्वारेते बसिला। महाप्रभु जानि' चन्द्रशेखरे कहिला ॥ 46 ॥ बाहरी वेशके प्रति निरपेक्ष वास्तविक वैष्णव श्रीसनातनको लानेके लिये शेखरको आदेश :- “द्वारे एक 'वैष्णव' हय, बोलाह ताँहारे।” चन्द्रशेखर देखे, 'वैष्णव' नाहिक द्वारे ॥ 47 ॥ श्रीसनातनके बाहरी वैष्णव-वेशको नहीं देखनेपर लौटकर आना :- “द्वारेते वैष्णव नाहि”—प्रभुरे कहिल। 'केह हय?' करि' प्रभु ताहारे पुछिल ॥ 48 ॥ अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामी श्रीचन्द्रशेखरके घर पहुँचकर बाहर द्वारपर बैठ गये। श्रीसनातन गोस्वामीके आगमनको जानकर महाप्रभुने श्रीचन्द्रशेखरसे कहा, — “द्वारपर एक वैष्णव हैं, उन्हें बुलाकर ले आओ।” श्रीचन्द्रशेखरने जाकर देखा कि द्वारपर तो कोई 'वैष्णव' नहीं है। श्रीचन्द्रशेखरने आकर महाप्रभुसे कहा, – “द्वारपर तो कोई वैष्णव नहीं हैं।” महाप्रभुने उनसे पूछा, 'क्या कोई द्वारपर है?'॥ 46-48 ॥ दरवेश वेशधारी श्रीसनातनको लानेके लिये महाप्रभुका आदेश :- तैं हो कहे,- “एक 'दरवेश' आछे द्वारे।” 'ताँरे आन' प्रभुर वाक्ये कहिल आसि' ताँरे ॥ 49 ॥ श्रीचन्द्रशेखरका श्रीसनातनको 'दरवेश' कहकर सम्बोधन :- “प्रभु तोमाय बोलाय, आइस, दरवेश !” शुनि' आनन्दे सनातन करिला प्रवेश ॥ 50 ॥ श्रीसनातनको देखकर तेजीसे महाप्रभुका आगमन और आलिङ्गन :- ताँहारे अङ्गने देखि' प्रभु धाञा आइला। ताँरे आलिङ्गन करि' प्रेमाविष्ट हैला ॥ 51 ॥ अनुवाद-श्रीचन्द्रशेखरने कहा,-“द्वारपर एक 'फकीर' है।” महाप्रभुने कहा, - 'उन्हींको ले आओ।' श्रीचन्द्रशेखरने द्वारपर आकर श्रीसनातन गोस्वामीको महाप्रभुके ये वचन कहे, “हे फकीर ! आओ, महाप्रभु तुम्हें बुला रहे हैं।” श्रीचन्द्रशेखरकी बात सुनकर श्रीसनातन गोस्वामी बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने घरके अन्दर प्रवेश किया। श्रीसनातन गोस्वामीको आँगनमें देखकर महाप्रभु दौड़े हुए चले आये और उनको आलिङ्गन करके महाप्रभु प्रेममें आविष्ट हो गये ॥ 49-51 ॥ आलिङ्गनके फलस्वरूप श्रीसनातनमें प्रेम और उनकी दैन्य-उक्ति :- प्रभुस्पर्शे प्रेमाविष्ट हइला सनातन। 'मोरे ना छुइह'-कहे गद्गद-वचन ॥ 52 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके स्पर्शसे श्रीसनातन गोस्वामी भी प्रेममें आविष्ट हो गये। श्रीसनातन गोस्वामीने गद्गद वाणीसे कहा, - 'आप मुझे मत छुइये ॥ '52 ॥ 226 ।

बीसवाँ अध्याय 20/53-59 ] महाप्रभु और श्रीसनातन, दोनोंका ही प्रेम-क्रन्दन, श्रीचन्द्रशेखरका विस्मय :- दुइजने गलागलि रोदन अपार। देखि' चन्द्रशेखरेर हइल चमत्कार ॥ 53 ॥ अनुवाद—दोनों परस्पर गले लगकर बहुत रोने लगे। उन दोनोंकी ऐसी अवस्थाको देखकर श्रीचन्द्रशेखरको बहुत आश्चर्य हुआ ॥ 53 ॥ स्नेहपूर्वक श्रीसनातनको अपने निकट आसन देना :- तबे प्रभु ताँर हात धरि' लञा गेला। पिण्डार उपरे ताँरे आपन-पाश बसाइला ॥ 54 ॥ अपने हाथोंसे श्रीसनातनके अङ्गोंका मार्जन, श्रीसनातनका दीनतापूर्वक कहना :- श्रीहस्ते करेन ताँर अङ्ग सम्मार्जन। तँहो कहे, — “मोरे, प्रभु, ना कर स्पर्शन ॥” 55 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभु श्रीसनातनका हाथ पकड़कर उन्हें अपने साथ ले गये और उन्होंने श्रीसनातन गोस्वामीको अपने निकट चबूतरेपर बैठाया। महाप्रभु अपने श्रीहस्तकमलोंसे श्रीसनातन गोस्वामीके अङ्गोंका सम्मार्जन करने लगे। श्रीसनातन गोस्वामी कहने लगे, — “हे प्रभो, आप मुझे स्पर्श मत कीजिये ॥” 54-55 ॥ महाप्रभुके द्वारा उन्हें महाभागवतके लिये उचित गौरव देना :- प्रभु कहे, — “तोमा स्पर्शि आत्म पवित्रिते। भक्ति-बले पार तुमि ब्रह्माण्ड शोधिते ॥ 56 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, — “मैं तो अपनेको पवित्र करनेके लिये आपको स्पर्श कर रहा हूँ, क्योंकि आप अपनी भक्तिके बलसे ब्रह्माण्डको पवित्र कर सकते हैं ॥ 56 ॥ श्रीमद्भागवत (1/13/10)में— भवद्विधा भागवतास्तीर्थभूताः स्वयं प्रभो। तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तःस्थेन गदाभृता ॥ 57 ॥ अनुवाद—आपके जैसे भागवतजन स्वयं तीर्थस्वरूप हैं। आप लोग अपने अन्तःस्थित भगवान्की पवित्रताके बलसे पापियोंके पापोंके द्वारा मलिन सभी तीर्थोंको पवित्र करते हैं ॥ 57 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 1/63 संख्या देखें ॥ 57 ॥ हरिभक्तिविलास (10/91) में :- न मेऽभक्तश्चतुर्वेदी मद्भक्तः श्वपचः प्रियः। तस्मै देयं ततो ग्राह्यं स च पूज्यो यथा ह्यहम् ॥ 58 ॥ अनुवाद—चतुर्वेदपाठी अर्थात् चौबे ब्राह्मण होनेपर ही 'भक्त' होता है, ऐसा नहीं है। मेरा भक्त चण्डाल होनेपर भी मुझे प्रिय है; भक्त ही वास्तवमें दान-पात्र एवं ग्रहण-पात्र है; भक्तमात्र ही मेरे समान पूजनीय है ॥” 58 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 19/50 संख्या देखें ॥ 58 ॥ श्रीमद्भागवत (7/9/10) में— विप्राद्द्विषड्गुणयुतादरविन्दनाभ- पादारविन्दविमुखात् श्वपचं वरिष्ठम्। मन्ये तदर्पित-मनोवचनेहितार्थ- प्राणं पुनाति स कुलं न तु भूरिमानः ॥ 59 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 59 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णके चरणकमलोंसे विमुख बारह-गुणोंसे युक्त ब्राह्मणकी अपेक्षा भी जिसके मन, वचन, चेष्टा, अर्थ और प्राण श्रीकृष्णमें समर्पित हैं, ऐसे चण्डालको भी मैं श्रेष्ठ मानता हूँ; क्योंकि वह (चण्डाल कुलमें उत्पन्न भक्त) अपने कुलको पवित्र करता है, और अत्यधिक सम्मानसे युक्त ब्राह्मण वैसा नहीं कर सकता ॥ 59 ॥ अनुभाष्य—धर्मराज युधिष्ठिरको देवर्षि नारद भगवान् श्रीनृसिंहके द्वारा किये गये हिरण्यकशिपुके वध-वृत्तान्तके वर्णन-प्रसङ्गमें वधके बाद भक्त प्रह्लादके द्वारा किये गये भगवान् नृसिंहके स्तवका वर्णन कर रहे हैं, — । 227

[ 20/59-62 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला [बायाँ स्तम्भ] अरविन्दनाभपादारविन्दविमुखात् (पद्मनाभ-कृष्णस्य पादपद्मात् विमुखात्) द्विषड्गुणयुतात् (पूर्वश्लोकोक्ताः धनाभिजन-रूप- तपः-श्रुतौजस्तेजः-प्रभाव बल-पौरुष-बुद्धियोगाः इत्यादयः ये द्विष्ट् द्वादशगुणाः, यद्वा, “धर्मश्च सत्यञ्च दमस्तपश्च अमात्सर्यं ह्रीस्तितिक्षाऽनसूया। यज्ञश्च दानञ्च धृतिः श्रुतञ्च व्रतानि वै द्वादश ब्राह्मणस्य ॥” इति महाभारतीये-सनत्सुजातोक्ता द्वादश-गुणाः, यद्वा, “शमो दमस्तपः शौचं क्षान्त्यार्जव-विरक्तयः। ज्ञान-विज्ञान- सन्तोषाः सत्यास्तिक्ये द्विषड्गुणाः॥” इति मुक्ताफल-टीकोक्ता द्वादशगुणाः, तैः युक्तात्) विप्रात् अपि तदर्पितमनो-वचनेहितार्थप्राणं (तत् तस्मिन् अरविन्दनाभे कृष्णे अर्पिताः मनः वचनं ईहितं कर्म अर्थः प्राणश्च एते येन, तं) श्वपचं वरिष्ठं (श्रेष्ठम्) अहं मन्ये; [यतः] स (एवम्भूतः श्वपचः सर्वं) कुलं पुनाति, भूरिमानः (भूरिः मानः गर्वः यस्य स विप्रः) तु [आत्मानमपि] न [पुनाति, कुतः कुलम्? यतो भक्तिहीनस्य एते गुणाः गर्वायैव भवन्ति, न तु शुद्धये; अतो हीन इति भावः]। श्लोक-भावानुवाद-श्रीकृष्णके चरणकमलोंसे विमुख बारह-गुणोंसे (श्रीमद्भागवतमें “विप्राद्द्विषड्”-श्लोकके पूर्व श्लोकमें ये 'द्विष्ट्' अर्थात् बारह गुण कहे गये हैं-“धन, सत्कुलमें जन्म, सौन्दर्य, तपस्या, पाण्डित्य, इन्द्रिय-नैपुण्य, तेज, प्रताप, शारीरिक बल, पौरुष, बुद्धि और अष्टाङ्गयोग” आदि; अथवा महाभारतमें सनत्सुजातके द्वारा कथित बारह गुण-“धर्म, सत्य, दम, तप, मात्सर्यशून्यता, लज्जा, सहनशीलता, ईर्ष्याशून्यता, यज्ञ, दान, धैर्य, पाण्डित्य-ये ही ब्राह्मणके बारह व्रत हैं।” अथवा, 'मुक्ताफल'-टीकामें कहे गये बारह गुण, जैसे,- “शम, दम, तप, शौच, क्षमा, सरलता, विषय-विरक्ति, ज्ञान, विज्ञान, सन्तोष, सत्य, आस्तिकता-ये बारह गुण हैं।”) युक्त ब्राह्मणकी अपेक्षा भी जिसके मन, वचन, चेष्टा, अर्थ और प्राण श्रीकृष्णमें समर्पित हैं, ऐसे चण्डालको भी मैं श्रेष्ठ मानता हूँ; क्योंकि वह (चण्डाल कुलमें उत्पन्न भक्त) अपने कुलको पवित्र करता है। और अपने उच्चकुलका गर्व करनेवाला ब्राह्मण जब स्वयंको भी पवित्र नहीं कर सकता, [तब वह कुलको कैसे पवित्र करेगा? जो भक्तिहीन ऐसे गुणोंसे गर्वित होता है, वह शुद्ध नहीं है, इसलिये वह हीन है-यह भाव है] ॥ 59 ॥ [दायाँ स्तम्भ] भक्त-सेवामें लगनेसे ही सभी इन्द्रियोंकी सार्थकता :- तोमा देखि, तोमा स्पर्शि, गाइ तोमार गुण। सर्वेन्द्रिय-फल,-एइ शास्त्र-निरूपण॥ 60॥ अनुवाद-आपको देखना, आपको स्पर्श करना, आपके गुणोंका गान करना ही सभी इन्द्रियोंका फल है-शास्त्र यही निरूपण करते हैं॥ 60॥ जगत्में शुद्ध-भगवद्भक्त-सुदुर्लभ :- हरिभक्तिसुधोदय (13/2)में- अक्ष्णोः फलं त्वादृश-दर्शनं हि तनोः फलं त्वादृश-गात्रसङ्गः। जिह्वाफलं त्वादृश-कीर्त्तनं हि सुदुर्लभा भागवता हि लोके॥ 61॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 61॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे वैष्णव, तुम्हारे जैसे व्यक्तिका दर्शन करना ही नेत्रोंका फल है; तुम्हारे जैसे व्यक्तिकी देहको स्पर्श करना ही शरीरका फल है; तुम्हारे जैसे व्यक्तिके गुणोंका कीर्तन करना ही जिह्वाका फल है; क्योंकि, जगत्में भागवतजन ही सुदुर्लभ हैं॥”61॥ अनुभाष्य- त्वादृशदर्शनं (त्वादृशानां भवत्तुल्यानां भागवतानां श्रद्धापूर्वक-दर्शनं) अक्ष्णोः (चक्षुर्भ्यां वीक्षणकार्यस्य) फलं (तात्पर्यम्); त्वादृशगात्रसङ्गः (त्वादृशानां भक्तानां गात्रसङ्गः अङ्गस्पर्शः) तनोः (शरीरस्य धारणकार्यस्य) फलम्; त्वादृशकीर्त्तनं (त्वादृशानां भक्तानां गुणकीर्त्तनं) हि (एव) जिह्वाफलं (वाक्योच्चारणस्य प्रयोजनम्); [अतः] लोके (जगति) भागवताः (शुद्धभक्ताः) सुदुर्लभाः (सुदुरापाः) हि (एव)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 61॥ श्रीकृष्णकी अहैतुकी कृपाके माहात्म्यका वर्णन; महाप्रभु स्वयं ही श्रीसनातनके कारागारमें बन्द होने और वहाँसे छूटनेकी लीलाके अभिनयके मूल-सूत्रधार :- एत कहि' कहे प्रभु,-“शुन, सनातन। कृष्ण-बड़ दयामय, पतित-पावन॥ 62॥ 228 |

बीसवाँ अध्याय 20/62-70 ] महारौरव हैते तोमाय करिला उद्धार। कृपार समुद्र कृष्ण गम्भीर अपार ॥"63॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभुने आगे कहा,—“हे सनातन ! सुनो, भगवान् श्रीकृष्ण बहुत ही दयामय और पतित-पावन हैं। उन्होंने महारौरव-नरकसे तुम्हारा उद्धार किया है। कृपाके समुद्र श्रीकृष्ण अपार और गम्भीर हैं॥"62-63॥ अनुभाष्य—'महा-रौरव'-जीविकाके उद्देश्यसे जन्तुओंका वध करनेवाले 'महारौरव' नामक नरकको प्राप्त करते हैं (भाः 5/26/10-12 श्लोक देखें) ॥ 63 ॥ श्रीसनातनका महाप्रभुको श्रीकृष्णसे अभिन्न मानना :— सनातन कहे, – “कृष्ण आमि नाहि जानि। आमार उद्धार-हेतु तोमार कृपा मानि ॥ "64॥ महाप्रभुके प्रश्नके उत्तरमें अपने वृत्तान्तका वर्णन :— 'केमने छुटिला' बलि प्रभु प्रश्न कैला। आद्योपान्त सब कथा तँहो शुनाइला ॥ 65 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरूप और श्रीअनुपमका संवाद देना :— प्रभु कहे, – “तोमार दुइ भाइ प्रयागे मिलिला। रूप, अनुपम, – दुँहे वृन्दावन गेला ॥"66॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,- "मैं श्रीकृष्णको नहीं जानता हूँ। मैं तो आपकी कृपाको अपने उद्धारका कारण मानता हूँ।" 'आप कैसे छूटे'—यह कहकर महाप्रभुने प्रश्न किया और श्रीसनातन गोस्वामीने आरम्भसे अन्त तकका सब वृत्तान्त कह सुनाया। महाप्रभुने कहा, – “तुम्हारे दोनों भाई रूप और अनुपम, मुझसे प्रयागमें मिले थे। वहाँसे वे दोनों वृन्दावन गये हैं॥"64-66 ॥ श्रीतपनमिश्र और श्रीचन्द्रशेखरके साथ श्रीसनातनका मिलन :— तपनमिश्रेरे आर चन्द्रशेखरेरे। प्रभु-आज्ञाय सनातन मिलिला दोँ हारे ॥ 67 ॥ अनुवाद—महाप्रभुकी आज्ञासे श्रीसनातन गोस्वामी श्रीतपनमिश्र और श्रीचन्द्रशेखरसे मिले ॥ 67 ॥ श्रीसनातनको श्रीतपनमिश्रका निमन्त्रण, श्रीसनातनको मुण्डन करानेके लिये महाप्रभुकी आज्ञा :— तपनमिश्र तबे ताँरे कैला निमन्त्रण। प्रभु कहे, – “क्षौर कराह, याह, सनातन ॥” 68 ॥ अनुवाद—श्रीतपनमिश्रने श्रीसनातन गोस्वामीको निमन्त्रण दिया। महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीसे कहा,— “हे सनातन, जाओ और मुण्डन करवाकर आओ॥"68 ॥ श्रीचन्द्रशेखरको श्रीसनातनके अवैष्णव-वेशको त्याग कराके वैष्णवोचित वेश धारण करानेकी आज्ञा :— चन्द्रशेखरेरे प्रभु कहे बोलाञा। “एइ वेश दूर कर, याह इँहारे लञा ॥" 69 ॥ भद्र कराञा ताँरे गङ्गास्नान कराइल। शेखर आनिया ताँरे नूतन वस्त्र दिल ॥ 70 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीचन्द्रशेखरको बुलाकर कहा,—“आप सनातनको अपने साथ ले जाकर इनके इस वेशको दूर करो।" श्रीचन्द्रशेखरने श्रीसनातनका मुण्डन कराके उन्हें गङ्गास्नान कराया और उन्हें नये वस्त्र लाकर दिये ॥ 69-70 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'भद्र कराञा'-मुण्डन करवाकर अर्थात् दरवेशी दाड़ी और बालोंका मुण्डन करवाकर सुवैष्णव जैसा वेश धारण कराया ॥ 70 ॥ अमृतानुकणा—महाप्रभुकी कृपा पानेकी इच्छुक श्रीसनातनने जब महाप्रभुकी मधुर मूर्तिके दर्शन किये, उस समय श्रीसनातनकी दाड़ी-मूँछ थी। वह दाड़ी-मूँछ ही बाउल-वैष्णवोंके दाड़ी-मूँछ रखनेका एकमात्र प्रमाण है। किन्तु महाप्रभुने श्रीसनातनको देखकर प्रेमालिङ्गन करके तुरन्त उनका मुण्डन करवाया था। इसलिये बाउल-वैष्णवोंका अकाट्य प्रमाण उसी समय ही नाईके उस्तरेके द्वारा काटा गया था। अब सभी अवश्य ही । 229

[ 20/68-78 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला यह स्वीकार करेंगे कि बाउल-लोग कभी भी श्रीचैतन्य-सम्प्रदायके वैष्णव नहीं कहला सकते। श्रीसनातनको 'फकीर' कहकर उल्लेख करनेसे साँई, दरवेश, चरणपाली, दुलालचाँदी आदि अधिकांश लोग मुसलमानके फकीर-वेशको धारण करके उनके जैसे आचार-व्यवहार करते हैं और स्वयंको चैतन्य-सम्प्रदाय-वैष्णव कहकर अपना परिचय देते हैं। यदि कोई उनसे पूछे कि तुम लोग प्रायः मुसलमानके फकीरका वेश धारण और उनके जैसा आचार-व्यवहार भी करते हो और चैतन्य-सम्प्रदाय-वैष्णव कहकर अपना परिचय देते हो, इसका क्या प्रमाण है? इस प्रश्नके उत्तरमें वे कहते हैं कि इसका प्रमाण श्रीसनातन गोस्वामी हैं, वे फकीर थे। किन्तु जब महाप्रभुने श्रीसनातनके दाड़ी-मूँछ और सिरके केश मुण्डन करवाकर वैष्णव-वेश धारण करवाया था, तब उस स्थानपर ही साँई, दरवेश, चरणपाली, दुलालचाँदी आदिका प्रमाण परिसमाप्त हो गया है। इस कारण साँई, दरवेशादि लोगोंका चैतन्य-सम्प्रदाय-वैष्णव होना तो दूर रहे, अपितु उनको एक प्रकार मोहम्मद-सम्प्रदाय ही कहा जाना चाहिये। (—जगद्गुरु श्रीश्रील भक्तिविनोद ठाकुर-कृत 'श्रीश्रीसनातन गोस्वामी प्रभु' प्रबन्ध। श्रीगौड़ीय-पत्रिका, 7वाँ वर्ष, 4र्थ संख्या) ॥ 68-69 ॥ श्रीचन्द्रशेखरके द्वारा दिये नये वस्त्रोंको पहननेमें श्रीसनातनकी असम्मति :— सेइ वस्त्र सनातन ना कैल अङ्गीकार। शुनिया प्रभुर मने आनन्द अपार ॥ 71 ॥ अनुवाद—श्रीचन्द्रशेखरके द्वारा लाये गये उन नये वस्त्रोंको श्रीसनातनने स्वीकार नहीं किया। इस बातको सुनकर महाप्रभुके मनमें अपार आनन्द हुआ॥ 71 ॥ दोपहरमें श्रीतपनमिश्रके घरमें महाप्रभुका भोजन, श्रीसनातनको महाप्रभुके उच्छिष्टकी प्राप्ति :— मध्याह्न करिया प्रभु गेला भिक्षा करिवारे। सनातने लञा गेला तपनमिश्रेर घरे ॥ 72 ॥ अनुवाद—दोपहरका स्नान करनेके बाद महाप्रभु श्रीसनातन गोस्वामीको अपने साथ लेकर भोजनके लिये श्रीतपन मिश्रके घरपर गये॥ 72 ॥ पादप्रक्षालन करि' भिक्षाते बसिला। “सनातने भिक्षा देह”—मिश्ररे कहिला ॥ 73 ॥ अनुवाद—चरणोंको धोनेके बाद महाप्रभु भोजनके लिये बैठे। महाप्रभुने श्रीतपनमिश्रसे कहा, —“सनातनको भोजन प्रदान करो॥”73 ॥ मिश्र कहे, —“सनातनेर किछु कृत्य आछे। तुमि भिक्षा कर, प्रसाद ताँरे दिब पाछे॥” 74 ॥ अनुवाद—श्रीतपनमिश्रने कहा, —“सनातनका अभी कुछ कार्य बाकी है। आप भोजन ग्रहण कीजिये, मैं उन्हें बादमें प्रसाद दूँगा॥”74 ॥ भिक्षा करि' महाप्रभु विश्राम करिला। मिश्र प्रभुर शेषपात्र सनातने दिला ॥ 75 ॥ अनुवाद—भोजन करनेके बाद महाप्रभुने थोड़ा विश्राम किया। श्रीतपनमिश्रने महाप्रभुका उच्छिष्ट प्रसाद श्रीसनातन गोस्वामीको दिया॥ 75 ॥ मिश्रके द्वारा दिये नये वस्त्रोंको पहननेमें श्रीसनातनकी आपत्ति :— मिश्र सनातने दिला नूतन वसन। वस्त्र नाहि निला, तेँहो करे निवेदन ॥ 76 ॥ वैष्णव-उच्छिष्ट पुराने वस्त्र-ग्रहण करनेकी श्रीसनातनकी इच्छा :— “मोरे वस्त्र दिते यदि तोमार हय मन। निज परिधान एक देह' पुरातन॥” 77 ॥ एक वस्त्रको दो टुकड़ोंमें बाँटकर बहिर्वास और उसके उपयोगी डोर-कौपीन बनाना :— तबे मिश्र पुरातन एक धुति दिला। तेँहो दुइ बहिर्वास-कौपीन करिला ॥ 78 ॥ 230

यहाँ पृष्ठ का संपूर्ण पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति प्रस्तुत है:

बीसवाँ अध्याय 20/76-81 ] अनुवाद—श्रीतपनमिश्रने श्रीसनातन गोस्वामीको एक नया वस्त्र दिया, परन्तु उन्होंने वह वस्त्र नहीं लिया। उन्होंने श्रीतपनमिश्रसे निवेदन किया, — “यदि आपकी मुझे वस्त्र देनेकी इच्छा ही है, तो फिर मुझे अपना पहना हुआ एक पुराना वस्त्र दीजिये।” तब श्रीतपनमिश्रने श्रीसनातन गोस्वामीको अपनी व्यवहार की गयी एक पुरानी धोती दी। श्रीसनातन गोस्वामीने उस धोतीको फाड़कर उसमेंसे ही दो बहिर्वास और दो डोर-कौपीन बनाये॥ 76-78 ॥ अमृतानुकणा—इस जगत्में अपनी इन्द्रियोंके द्वारा प्राप्त ज्ञानको श्रेष्ठ माननेवालोंके लिये वर्ण-चिह्न और आश्रम-चिह्नकी व्यवस्था पूर्ण रूपसे अनावश्यक नहीं है। तो भी बहुत बार ऐसे लोग चिह्नमात्र देखनेसे धोखा खा जाते हैं। जिस प्रकार सिंदूर वर्णके मेषोंको देखकर गाय आदि पशु भयभीत हो जाते हैं, उसी प्रकार ये लोग वैष्णवोंके बाह्य चिह्नोंसे धोखा खाकर लज्जित होते हैं। इसलिये इनकी अन्तर्मुखी-प्रवृत्ति नहीं होनेके कारण इस प्रकारका अपमान अवश्यम्भावी है।” “गौड़ीय-वैष्णव परमहंस हो सकते हैं, परन्तु उनके वेशको देखकर कि वे वैष्णव अथवा अवैष्णव हैं, ऐसा कोई निर्णय नहीं कर सकता। श्रीसनातन गोस्वामीके वेशमें वर्णाश्रमके चिह्न नहीं थे, और श्रीप्रबोधानन्द सरस्वती गोस्वामीके वेशमें गेरुए वस्त्र और त्रिदण्ड देखा जाता है। श्रीपरमानन्द पुरी, श्रीईश्वरपुरी आदिके वेशमें एक दण्ड और गेरुए वस्त्र दिखायी देते हैं। (इसलिये) त्रिदण्डी और एकदण्डी या निर्दण्डी (बिना दण्डके), सभी गौड़ीय वैष्णव हो सकते हैं। वे कर्म-त्रिदण्ड, ज्ञान-त्रिदण्ड और भक्ति-निर्दण्ड आदि आश्रम-चिह्न परित्याग करनेके लिये वेश ले सकते हैं। और वर्णाश्रममें अवस्थित गौड़ीय वैष्णवोंका भी अभाव नहीं है। वे अपने वर्णचिह्न और आश्रमवेशको रखकर भी गौड़ीय वैष्णव हो सकते हैं। और भक्तचिह्न धारण करके किसीको कोई वर्णाश्रममें अवस्थित होनेमें बाधा नहीं दे सकता। गेरुए-वस्त्रके माहात्म्यका और त्रिदण्डके माहात्म्यका शास्त्रोंमें प्रचुर परिमाणमें उल्लेख किया गया है। परन्तु चिह्नके द्वारा और वेशग्रहणकी रीतिको देखकर गौड़ीय-वैष्णवको निर्देश नहीं कर सकते। हरिभजनमें निष्कपटता ही वैष्णव-परिचयका एकमात्र निर्देश है। जो लोग कर्मकाण्डको वैष्णवके कन्धेपर मढ़कर वैष्णवको कर्मी या ज्ञानीमात्र जानते हैं, वे सुविचार करनेमें असमर्थ और वैष्णवविरोधी हैं। लँगोट-बाह्य-वस्त्रादि दिखाकर जो वैष्णवताको लज्जित करते हैं और भजनको लक्ष्य नहीं करके 'नवमीमें लौकी खाना मना है' आदि नियमोंको ही वैष्णवाचार कहकर सिद्ध करनेमें व्यस्त हैं। वे श्रीमद्भागवतके विचारके अनुसार 'त्रिधातुके (कफ-वात-पित्तके) शरीर'को लेकर ही प्रमत्त हैं, इसलिये वैष्णव-वेशको स्थिर करते हुए (वे) लोकदृष्टिके अनुगमनसे वैष्णवोंको पहचाननेमें असमर्थ हैं। [—जगद्गुरु श्रीमद्भक्तिसिद्धान्त सरस्वती प्रभुपाद-कृत 'गौड़ीयका वेश' प्रबन्ध। (साप्ताहिक 'गौड़ीय' 2रा वर्ष, श्रीगौड़ीय-पत्रिका 17वाँ वर्ष)] ॥ 78 ॥ महाराष्ट्र महाराष्ट्र सेइ विप्र ताँरे कैल महा-निमन्त्रणे ॥ 79 ॥ काशीमें रहते समय श्रीसनातनको ब्राह्मणके द्वारा प्रतिदिन अपने घरमें निमन्त्रण :— “सनातन, तुमि यावत् काशीते रहिबा। तावत् आमार घरे भिक्षा ये करिबा ॥” 80 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने महाराष्ट्र गोस्वामीसे मिलवाया। उस ब्राह्मणने श्रीसनातन गोस्वामीको लम्बा निमन्त्रण दिया, — “हे सनातन ! आप जब तक काशीमें रहोगे, तब तक मेरे घरपर ही भोजन ग्रहण करना ॥” 79-80 ॥ श्रीसनातनके द्वारा स्थूल भिक्षामें असम्मति, माधुकरी-भिक्षाकी इच्छा :— सनातन कहे, — “आमि माधुकरी करिब। ब्राह्मणेर घरे केने एकत्र भिक्षा लब?” ॥ 81 ॥ । 231

[ 20/81-89 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,—“मैं माधुकरी करूँगा। ब्राह्मणके घरमें पूरा भोजन क्यों ग्रहण करूँगा?”॥81॥

अमृताणुकणिका—भ्रमर पुष्पोंसे मधु ग्रहण करता है, इसलिये उसे मधुकर कहते हैं। वह एक ही पुष्पसे मधु नहीं ग्रहण करता, अपितु अनेक पुष्पोंसे मधु संग्रह करता है। श्रीसनातन गोस्वामीका विचार था कि यदि वे प्रतिदिन एक ही ब्राह्मणके घरमें पूरा भोजन करेंगे तो उन ब्राह्मणको कष्ट होगा। इसलिये उन्होंने कहा कि वे अपने शरीर निर्वाहके लिये जितना आवश्यक है, उतना भोजन अल्प मात्रामें दो-तीन ब्राह्मणोंके घरसे भिक्षा करेंगे॥81॥

श्रीसनातनके युक्त वैराग्यसे महाप्रभुको आनन्द :— सनातनेर वैराग्ये प्रभुर आनन्द अपार। भोटकम्बल-पाने प्रभु चाहे बारे बार ॥82॥

अनुवाद—महाप्रभु श्रीसनातन गोस्वामीके वैराग्यको देखकर बहुत प्रसन्न थे, परन्तु वे बार-बार उनके बहुमूल्य कम्बलकी ओर देखते थे॥82॥

बहुमूल्य कम्बल महाप्रभुको पसन्द नहीं, ऐसा जानकर पुराने-फटे कपड़ोंसे बनी गुदड़ी-ग्रहण :— सनातन जानिल एइ प्रभुरे ना भाय। भोट त्याग परिवारे चिन्तिला उपाय ॥83॥

अनुवाद—महाप्रभुके बार-बार कम्बलको देखनेसे श्रीसनातन गोस्वामी समझ गये कि यह कम्बल उन्हें अच्छा नहीं लग रहा है। श्रीसनातन गोस्वामीने तब उस कम्बलको त्याग करनेके उपायपर विचार किया॥83॥

एत चिन्ति' गेला गङ्गाय मध्याह्न करिते। एक गौड़ीया दियाछे कान्था धुञा शुक्लाइते ॥84॥

अनुवाद—उपायका विचार करके श्रीसनातन गोस्वामी गङ्गामें दोपहरका स्नान करनेके लिये गये। वहाँ उन्होंने देखा कि एक गौड़ीयने अपने पुराने वस्त्रोंसे बने कम्बलको (गुदड़ीको) धोकर धूपमें सुखानेके लिये डाल रखा था॥84॥

तारे कहे,—“ओरे भाइ, कर उपकारे। एइ भोट लञा एइ काँथा देह' मोरे ॥”85॥

अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने उस गौड़ीयसे कहा,—“हे भाई, मुझपर उपकार करो। इस ऊनी कम्बलको लेकर मुझे अपनी यह गुदड़ी दे दो॥”85॥

सेइ कहे,—“रहस्य कर प्रामाणिक हञा? बहुमूल्य भोट दिबा केने काँथा लञा?”॥86॥

अनुवाद—उस गौड़ीयने कहा,—“आप सज्जन व्यक्ति होकर भी मुझसे परिहास कर रहे हैं? आप किसलिये बहुमूल्य कम्बल देकर बदलेमें गुदड़ी लेंगे?”॥86॥

अनुभाष्य—'प्रामाणिक'—आदर्श विचार-चरित्रवाला, पण्डित ॥ 86 ॥

तेंहो कहे,—“रहस्य नहे, कहि सत्यवाणी। भोट लह, तुमि देह' मोरे काँथाखानि ॥”87॥

अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,—“मैं परिहास नहीं कर रहा, मैं सत्य कह रहा हूँ। इस ऊनी कम्बलको लेकर तुम मुझे यह गुदड़ी दे दो॥”87॥

एत बलि' काँथा लइल, भोट ताँरे दिया। गोसाञिर ठाँइ आइला काँथा गले दिया ॥88॥

अनुवाद—यह कहकर श्रीसनातन गोस्वामीने उसे बहुमूल्य ऊनी कम्बल देकर गुदड़ी ले ली। फिर उस गुदड़ीको अपनी कन्धोंपर लपेटकर वे महाप्रभुके पास आये॥ 88॥

महाप्रभुके द्वारा बहुमूल्य कम्बलके विषयमें पूछना, श्रीसनातनके द्वारा पूरी घटनाका वर्णन :— प्रभु कहे,—“तोमार भोटकम्बल कोथा गेल?” प्रभुपदे सब कथा गोसाञि कहिल ॥ 89 ॥

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बीसवाँ अध्याय 20/89-97 ] अनुवाद—महाप्रभुने पूछा, - "तुम्हारा बहुमूल्य कम्बल कहाँ गया?" श्रीसनातन गोस्वामीने महाप्रभुको पूरी बात बतायी ॥ 89 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्णकृपा-माहात्म्यका वर्णन :- प्रभु कहे, - "इहा आमि करियाछि विचार । विषय-रोग खण्डाइल कृष्ण ये तोमार ॥ 90 ॥ से केने राखिबे तोमार शेष विषय-भोग ? रोग खण्डि' सद्यैद्य ना राखे शेष रोग ॥ 91 ॥ आचार और प्रचारमें परस्पर सामञ्जस्य रखनेका उपदेश :- तिन मुद्रार भोट गाय, माधुकरी ग्रास । धर्महानि हय, लोके करे उपहास ॥ "92॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, - "मैंने विचार किया है कि श्रीकृष्णने तुम्हारे विषय-रोगको दूर कर दिया है। तब वे तुम्हारे अन्तिम विषय-भोगको क्यों छोड़ देंगे? जैसे एक अच्छा वैद्य रोगको दूर करके उसका लेशमात्र भी शरीरमें शेष नहीं रहने देता। तीन मुद्राओं मूल्यका महँगा कम्बल शरीरपर धारण करके भोजनके लिये माधुकरी करना परस्पर विरोधी कार्य हैं। इससे धर्मकी हानि होती है और लोग भी उपहास करेंगे॥"90-92॥ श्रीसनातनके द्वारा महाप्रभु-कृपा-माहात्म्यकी प्रशंसा :- गोसाञि कहे, - "ये खण्डिल कुविषय-भोग। ताँर इच्छाय गेल मोर शेष विषय-रोग ॥ "93 ॥ अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामीने कहा, - "जिन्होंने मेरी पापमय जीवनसे रक्षा की है, उन्हींकी इच्छासे मेरी अन्तिम विषय-आसक्ति भी दूर हो गई है॥"93॥ अनुभाष्य- 'कुविषय-भोग' - पाप-विषय-सेवा ॥ 93 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनमें शक्ति-सञ्चार :- प्रसन्न हुआ प्रभु ताँरे कृपा कैल। ताँर कृपाय प्रश्न करिते ताँर शक्ति हैल ॥ 94 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने प्रसन्न होकर उनपर कृपा की। महाप्रभुकी कृपासे उनमें प्रश्न करनेकी शक्ति आयी ॥ 94 ॥ पहले महाप्रभुकी शक्तिके बलसे श्रीरायके द्वारा महाप्रभुके प्रश्नोंके उत्तर देनेका सामर्थ्य :- पूर्वे यैछे राय-पाशे प्रभु प्रश्न कैला। ताँर शक्त्ये रामानन्द ताँर उत्तर दिला ॥ 95 ॥ अनुवाद-पहले (गोदावरीके तटपर) जैसे श्रीरामानन्द रायसे महाप्रभुने प्रश्न पूछे थे और उनकी शक्तिसे श्रीरामानन्द रायने उनके उत्तर दिये थे ॥ 95 ॥ उसी प्रकार महाप्रभुकी शक्तिके सञ्चारके बलसे श्रीसनातनके प्रश्न, और स्वयं महाप्रभुका उत्तर देना :- इहाँ प्रभुर शक्त्ये प्रश्न करे सनातन। आपने महाप्रभु करे 'तत्त्व'-निरूपण ॥ 96 ॥ अनुवाद-यहाँपर महाप्रभुकी शक्तिसे श्रीसनातन गोस्वामी प्रश्न कर रहे थे और स्वयं महाप्रभु 'तत्त्व'का निरूपण कर रहे थे॥96 ॥ श्रीसनातनको स्वयं महाप्रभुके द्वारा सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजन तत्त्वको बतलाना :- (ग्रन्थकार-वाक्य-) कृष्णस्वरूपमाधुर्यैश्वर्यभक्तिरसाश्रयम्। तत्त्वं सनातनायेशः कृपयोपदिदेश सः ॥ 97 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 97 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभुने कृपापूर्वक श्रीसनातनको श्रीकृष्णके स्वरूप-माधुर्य, उनके स्वरूप-ऐश्वर्य और भक्तिरसाश्रय-रूप तत्त्वका उपदेश दिया ॥ 97 ॥ अनुभाष्य- स ईशः (महाप्रभुः) कृपया (अतुल-करुणया) सनातनाय (सनातन-गोस्वामिने) कृष्णस्वरूपमाधुर्यैश्वर्यभक्तिरसाश्रयं (कृष्णस्य स्वरूपं सर्वेश्वरेश्वरेश्वर-सच्चिदानन्दघनात्मक-किशोर-शेखर- यशोदानन्दनत्वं, माधुर्यम् असमोर्ध्वतया सर्वमनोहरं स्वाभाविक-रूपगुणलीलादिसौष्ठवं, ऐश्वर्यम् असमोर्द्धानन्त- । 233

[ 20/97-103 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला स्वाभाविकप्रभुत्वं, भक्तिरसश्च, तेषाम् आश्रयं- 'दशमे दशमं लक्ष्यमाश्रिताश्रय-विग्रहम्' इति वचनोद्दिष्टं वस्तु तत् एव) तत्त्वम् (अद्वयज्ञानम्) उपदिदेश (उपदिष्टवान्)। श्लोक-भावानुवाद-भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभुने अतुल-करुणापूर्वक श्रीसनातन-गोस्वामीको श्रीकृष्णके स्वरूपके (सर्वेश्वरेश्वरेश्वर सच्चिदानन्दघन किशोरशेखर यशोदानन्दनस्वरूप), माधुर्यके (असमोध्र्व सर्वमनोहर स्वाभाविक-रूपगुणलीलादिके परम सौन्दर्ययुक्त), ऐश्वर्यके (असमोध्र्व अनन्त स्वाभाविक प्रभुता), भक्तिरसके एवं उसके आश्रयके ("दशम स्कन्धमें भागवतके दशम लक्षण आश्रय-विग्रह" - इस वचनके द्वारा उद्दिष्ट वस्तुके भी) तत्त्वका (अद्वयज्ञानका) उपदेश दिया॥ 97 ॥ 'सनातनशिक्षा'का वर्णन आरम्भ; दीनतापूर्वक प्रणिपात- परिप्रश्न और सेवापूर्वक लोक-शिक्षाके लिये नित्यसिद्ध श्रीसनातनके द्वारा बद्धजीवका अभिनय करते हुए शिष्यकी भाँति कीर्तन-विग्रह जगद्गुरु महाप्रभुसे तत्त्व-जिज्ञासा :- तबे सनातन प्रभुर चरणे धरिया। दैन्य विनति करे दन्ते तृण लञा ॥ 98 ॥ “नीच जाति, नीच सङ्गी, पतित अधम। कुविषय-कूपे पड़ि' गोङाइनु जनम ! ॥ 99 ॥ आपनार हिताहित किछुइ ना जानि ! ग्राम्य-व्यवहारे पण्डित, ताइ सत्य मानि ॥ 100 ॥ कृपा करि' यदि मोरे करियाछ उद्धार। आपन-कृपाते कह 'कर्त्तव्य' आमार ॥ 101 ॥ जीवके स्वरूप और बन्धनसे उत्पन्न दुःखके कारणकी जिज्ञासा :- के आमि, केने आमाय जारे तापत्रय। इहा नाहि जानि-केमने 'हित' हय ॥ 102 ॥ 'साध्य', 'साधन'-तत्त्व पुछिते ना जानि। कृपा करि' सब तत्त्व कह त' आपनि ॥" 103 ॥ अनुवाद-तब श्रीसनातन गोस्वामीने दाँतोमें तिनका दबाकर महाप्रभुके चरणोंको पकड़कर दीनतापूर्वक विनती करते हुए कहा, - "मैं नीच जातिका, नीच लोगोंका सङ्ग करनेवाला, अधम-पतित हूँ। पापरूपी कुएँमें पड़े रहकर ही मैंने अपना जन्म गँवा दिया है। मैं अपने हित और अहितके विषयमें कुछ भी नहीं जानता हूँ। लोग मुझे लौकिक व्यवहारमें पण्डित मानते हैं और मैं भी इसे सत्य मानता हूँ। आपने अपनी अहैतुकी कृपासे मेरा उद्धार किया है। अब स्वयं अपनी अहैतुकी कृपासे मुझे मेरे कर्त्तव्यसे भी अवगत कराइये। मैं कौन हूँ, मुझे (आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक) तीन ताप क्यों जलाते हैं? मैं यह नहीं जानता हूँ कि मेरा कल्याण कैसे होगा? मैं 'साध्य' और 'साधन-तत्त्व'के विषयमें पूछना भी नहीं जानता हूँ। इसलिये कृपा करके आप स्वयं ही मुझे सभी तत्त्वोंके विषयमें बतलाइये॥" 98-103 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीसनातनने जिज्ञासा की,-"मैं कौन हूँ? आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक-ये तीन ताप मुझे क्यों जला रहे हैं और मेरा कल्याण किस प्रकार होगा? मैं साध्य-साधन तत्त्वकी जिज्ञासा करनेमें असमर्थ हूँ, आप कृपा करके मुझे मेरे जानने योग्य विषय बतलाइये ॥ 102-103 ॥ अनुभाष्य- 'ग्राम्य-व्यवहार' -स्त्री-पुरुषगत लौकिक- व्यवहार। 'तापत्रय'-(1) आध्यात्मिक, (2) आधिभौतिक और (3) आधिदैविक-ये तीन प्रकारके दुःख हैं। (1) आध्यात्मिक ताप दो प्रकारके हैं-(क) शारीरिक, जैसे-ज्वर आदि रोग; (ख) मानसिक, जैसे-प्रिय आदिका वियोग। (2) आधिभौतिक ताप चार प्रकारके हैं-(क) जरायुज-प्राणियोंसे (गर्भसे उत्पन्न मनुष्य-पशु आदिसे) ताप (ख) अण्डज-प्राणियोंसे (अण्डेसे उत्पन्न कीट-पक्षी आदिसे) ताप; (ग) स्वेदज-प्राणियोंसे (शरीरके स्त्रावसे उत्पन्न जीवाणुओंसे) ताप; (घ) उद्भिज्ज-प्राणियोंसे (पृथ्वीसे उत्पन्न वृक्षादिसे) ताप; (3) आधिदैविक ताप अर्थात् वरदेवता जैसे इन्द्रादिसे उत्पन्न ताप-शीत, 234 |

बीसवाँ अध्याय 20/102-109 ] वज्रपात आदि और अपदेवता जैसे हिंसक स्वभाववाले यक्ष-पिशाचादिसे अशुभजनक कष्टादि-ताप ॥ 102 ॥ श्रीसनातनको नित्यसिद्ध जानकर केवल बद्धजीवोंके मङ्गलके उद्देश्यसे महाप्रभुके द्वारा उत्तर देना :- प्रभु कहे,-“कृष्ण-कृपा तोमाते पूर्ण हय। सब तत्त्व जान, तोमार नाहि तापत्रय ॥ 104 ॥ कृष्णभक्ति धर तुमि, जान तत्त्वभाव। जानिं दार्ढ्य लागि' पुछे, - साधुर स्वभाव ॥ 105 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा,- “तुमपर भगवान् श्रीकृष्णकी पूर्ण कृपा है, इसलिये तुम सभी तत्त्वोंको जानते हो और तुम्हारे लिये तीनों तापोंका अस्तित्व ही नहीं है। तुम श्रीकृष्णभक्तिको धारण करते हो और सभी तत्त्वोंको भी जानते हो। किन्तु जाननेपर भी दृढ़ताके लिये पूछना साधुका स्वभाव होता है॥ 104-105 ॥ तत्त्व-जिज्ञासाकी ऐकान्तिक आवश्यकता, उसीसे ही अभीष्टसिद्धि :- भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/103) में उद्धृत नारदजीके वचन :- सद्धर्मस्यावबोधाय येषां निर्बन्धिनी मतिः। अचिरादेव सर्वार्थः सिद्ध्यत्येषामभीप्सितः ॥ 106 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 106 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-सद्धर्मको उदित करानेके लिये जिनकी दृढ़ मति है, उनकी शीघ्र ही अभिलषित सर्वार्थ-सिद्धि होती है॥ 106 ॥ अनुभाष्य- सद्धर्मस्य (नित्योपादेय-भागवतधर्मस्य) अवबोधाय (तत्त्वज्ञानाय, तत्त्वं जिज्ञासितुमित्यर्थः) येषां (भक्त्युन्मुख-सुकृतिवतां पुंसां) निर्बन्धिनी (अचञ्चला) मतिः (रुचिः बुद्धर्वा) (वर्त्तते), एषां (शुद्धचित्तानां निर्मलचेतसाम्) अभीप्सितः (प्रार्थितः) सर्वार्थः (साध्यः) अचिरात् (शीघ्रम्) एव सिद्ध्यति (सफलो भवति)। श्लोक-भावानुवाद-भागवतधर्मके तत्त्वको जाननेके जिज्ञासु जिन सुकृतिवान् व्यक्तियोंकी अचलबुद्धि होती है, ऐसे निर्मल चित्तवालोंको उनके द्वारा प्रार्थित साध्य-प्राप्तिमें शीघ्र सफलता मिलती है ॥ 106 ॥ महाप्रभुका श्रीसनातनको आचार्यरूपमें अङ्गीकार करना :- योग्यपात्र हओ तुमि भक्ति प्रवर्त्ताइते। क्रमे सब तत्त्व शुन, कहिये तोमाते ॥ 107 ॥ अनुवाद-तुम भक्तिका प्रवर्तन (प्रचार) करनेके लिये योग्यपात्र हो। क्रमशः तुम सब तत्त्वोंको सुनो, मैं तुम्हें सब बतला रहा हूँ॥ 107 ॥ श्रीश्रीसनातन-शिक्षारम्भ; (क-1) सर्वप्रथम जीवके स्वरूपका विचार :- जीवेर 'स्वरूप' हय-कृष्णेर 'नित्यदास'। कृष्णेर 'तटस्था-शक्ति', 'भेदाभेद-प्रकाश' ॥ 108 ॥ सूर्याशु-किरण, येन अग्निज्वालाचय। स्वाभाविक कृष्णेर तिनप्रकार 'शक्ति' हय ॥ 109 ॥ अनुवाद-जीव श्रीकृष्णका 'नित्यदास' है, यही जीवका स्वरूप है, क्योंकि वह श्रीकृष्णकी तटस्था-शक्ति और उनका भेदाभेद-प्रकाश है। जीव सूर्य-स्वरूप श्रीकृष्णका किरण-कण है अथवा वह प्रज्ज्वलित अग्निरूपी श्रीकृष्णकी चिङ्गारीके जैसा है। श्रीकृष्णकी स्वाभाविक तीन प्रकारकी शक्तियाँ हैं॥ 108-109 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-“मैं कौन हूँ?” इन प्रश्नके उत्तरमें महाप्रभुने कहा,- “तुम-जीव हो। क्या तुम जड़से उत्पन्न यह शरीर हो? ऐसा नहीं है। अथवा तुम मन-बुद्धि-अहङ्कारस्वरूप लिङ्ग-शरीर हो? वह भी नहीं है। तुम स्वरूपतः श्रीकृष्णके नित्यदास हो। तुम श्रीकृष्णकी तटस्थाशक्ति हो अर्थात् श्रीकृष्णके चिद्- जगत् और मायिक जगत्,-इन दोनोंके बीचकी सीमापर (तटपर) स्थित होनेके कारण तुम्हारा दोनों जगत्से सम्बन्ध है, तुम-तटस्था-शक्ति हो। श्रीकृष्णके साथ तुम्हारा भेदाभेद-प्रकाशरूप दोनों प्रकारका 'सम्बन्ध' है। । 235

[ 20/108-114 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला चिन्मयधर्मके सम्बन्धसे तुम—श्रीकृष्णके अभेद-प्रकाश हो और अणुचैतन्य-धर्मके कारण बृहद्-चैतन्य श्रीकृष्णके भेद-प्रकाश हो। (श्रीकृष्णके साथ तुम्हारा) भेद और अभेद-युगपत् (एक ही समयमें) सिद्ध है। जीवके तटस्थ-स्वभावसे ही यह युगपत् भेदाभेद प्रकाश सिद्ध हुआ है। जीव सूर्यस्वरूप श्रीकृष्णका किरण-कण है; अथवा प्रज्वलित अग्निरूप श्रीकृष्णकी असंख्य चिङ्गारियाँ जीवसमूहका उदाहरण-स्थल है॥108-109॥ अनुभाष्य—आदिलीला 2/96 संख्या देखें॥108-109॥ विष्णुका सर्वव्यापिनी शक्तिके द्वारा लीला-विलास :- विष्णुपुराण (1/22/53)में— एकदेशस्थितस्याग्नेर्ज्योत्स्ना विस्तारिणी यथा। परस्य ब्रह्मणः शक्तिस्तथैदमखिलं जगत्॥110॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥110॥ अमृतप्रवाह भाष्य—एक स्थानपर स्थित अग्निका प्रकाश अथवा आलोक जिस प्रकार विस्तृत होता है, परब्रह्मकी शक्ति भी अखिल जगत्में उसी प्रकार व्याप्त है॥110॥ अनुभाष्य— यथा एकदेशस्थितस्य (निर्दिष्टस्थानाधिष्ठितस्य) अग्नेः ज्योत्स्ना (प्रभा) विस्तारिणी (व्यापिनी), तथा इदम् अखिलं (सर्वं चिदचिन्मयं) जगत् परस्य ब्रह्मणः (कृष्णस्य) शक्तिः। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥110॥ (क-2) श्रीकृष्णकी शक्तिका विचार :- कृष्णेर स्वाभाविक तिनशक्ति परिणति। चिच्छक्ति, जीवशक्ति, आर मायाशक्ति॥111॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी स्वाभाविक शक्तिकी तीन परिणति हैं-चित्-शक्ति, जीवशक्ति और मायाशक्ति॥111॥ तीन प्रकारकी शक्ति :- विष्णुपुराण (6/7/61)में— विष्णुशक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथापरा। अविद्या-कर्मसंज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते॥112॥ अनुवाद—विष्णुशक्ति-परा, क्षेत्रज्ञा और अविद्या नामक तीन प्रकारकी है। विष्णुकी पराशक्ति ही 'चित्-शक्ति' है, क्षेत्रज्ञा-शक्ति ही जीवशक्ति है (जिसे मायारूपी 'अविद्या'से 'अपरा' अर्थात् भिन्ना कहा गया है) और कर्म नामक अविद्या-शक्तिका नाम 'माया' है॥112॥ अनुभाष्य—आदिलीला 7/119 संख्या देखें॥112॥ (1) अन्तरङ्गा स्वरूपशक्ति अकाट्य-भावसे शक्तिमानकी आश्रित :- विष्णुपुराण (1/3/2)में— शक्तयः सर्वभावानामिन्त्यज्ञानगोचराः। यतोऽतो ब्रह्मणस्तास्तु सर्गाद्या भावशक्तयः। भवन्ति तपतां श्रेष्ठ पावकस्य यथोष्णता॥113॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥113॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सभी भावोंकी अचिन्त्यज्ञानसे गोचर समस्त शक्तियाँ ब्रह्ममें विद्यमान हैं; इस कारणसे ब्रह्मकी वे समस्त शक्तियाँ सृष्टि आदि भावशक्तिके रूपमें क्रिया करती हैं। हे तापस-श्रेष्ठ, अग्निका जिस प्रकार गर्मी प्रदान करनेवाला धर्म स्वतःसिद्ध है, उसी प्रकार सभी शक्तियाँ भी ब्रह्मका स्वतःसिद्ध धर्म हैं॥113॥ अनुभाष्य— हे तपतां (तापसानां) श्रेष्ठ, यथा पावकस्य (अग्नेः) उष्णता (दाहकत्वादिशक्तिः) [अस्ति, तथा] यतः (ब्रह्मणः) एव सर्वभावानाम् अचिन्त्यज्ञानगोचराः (मानवबुद्धेः अगोचराः) अतः तु [एव] ताः (तथाविधाः) सर्गाद्याः (चित्सर्गाद्याः) [अविच्छेद्यरूपेण] ब्रह्मणः शक्तयः [नित्यप्रकटिताः] भवन्ति। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥113॥ (2) तटस्था जीवशक्ति :- विष्णुपुराण (6/7/62-63)में— यया क्षेत्रज्ञशक्तिः सा वेष्टिता नृप सर्वगा। संसारतापानखिलानवाप्नोत्यत्र सन्ततान्॥114॥ 236 |

बीसवाँ अध्याय 20/114-118 ]

तया तिरोहितत्वाच्च शक्तिः क्षेत्रज्ञ-संज्ञिता। सर्वभूतेषु भूपाल तारतम्येन वर्त्तते॥ 115॥ अनुवाद—क्षेत्रज्ञ-शक्ति ही जीवशक्ति है; वह जीवशक्ति सर्वज्ञ होनेपर भी मायावृत्तिरूप अविद्याके द्वारा आवृत्त होकर संसारके समस्त तापोंको नित्य भोग करती है। और, वही 'क्षेत्रज्ञ'-नामक शक्ति अविद्या- कुण्ठासे आवृत्त होकर, हे भूपाल, सभी जीवोंमें तारतम्यके सहित वर्तमान रहती है। तात्पर्य यह है, भगवान्‌की चिद्-शक्ति-सर्वश्रेष्ठा, जीवशक्ति-मध्यमा और अविद्या-कर्म कहलानेवाली मायाशक्ति-अधमा है। जीवशक्ति मायाके द्वारा आवृत्त होकर अर्थात् चिद्- शक्तिकी वृत्तिसे दूर होकर संसारके तापोंको भोगती है। वह चिद्-शक्तिसे दूर रहते हुए अपने द्वारा किये हुए कर्मोंके चक्रमें प्रवेश करके ऊँची-नीची अवस्थाएँ प्राप्त करती है॥114-115॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 6/155-156 संख्या देखें॥114-115॥ (3) बहिरङ्गा मायाशक्ति :— श्रीमद्भगवद्गीता (7/5)में— अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्। जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥ 116॥ अनुवाद—[आठ भेदोंवाली जड़ा प्रकृतिसे] श्रेष्ठ जीवस्वरूपा मेरी एक अन्य प्रकृति जानो जिसके द्वारा यह जगत् अपने कर्मके द्वारा भोगनेके लिये गृहीत होता है॥ 116॥ अनुभाष्य—आदिलीला 7/118 संख्या देखें॥116॥ (ख) विरूप-विचार; बद्धजीवका भवरोग और उसके फलस्वरूप दुर्दशा और सजा :— कृष्ण भुलि' सेइ जीव—अनादि बहिर्मुख। अतएव माया तारे देय संसार-दुःख॥ 117॥ अनुवाद—श्रीकृष्णको भूलनेके कारण ही जीव अनादिकालसे श्रीकृष्णसे बहिर्मुख हुआ है, इसलिये माया उसे संसाररूपी दुःख प्रदान करती है॥117॥

अमृतप्रवाह भाष्य—मैं श्रीकृष्णका नित्यदास हूँ,—इस बातको भूल जानेसे ही जीवका मायाबन्धन है। तटस्थशक्तिरूप जीवकी चिद्-जगत् और मायिक जगत्‌के सन्धिःसीमापर रहनेके समय मायाभोगकी वासना करनेके कारण उसका मायामें प्रवेश हुआ है। मायामें प्रवेश करनेसे ही मायिक-कालकी गणना है। उस काल गणनासे पहले ही बहिर्मुखता होनेके कारण उसे 'अनादि' कहा जाता है; क्योंकि वह मायिक-कालसे पहले हुआ है॥117॥

कभु स्वर्गे उठाय, कभु नरके डुबाय। दण्ड्यजने राजा येन नदीते चुबाय॥ 118॥ अनुवाद—जैसे कभी राजा अपराधी व्यक्तिको दण्ड देनेके लिये उसे नदीमें डुबोने और पुनः उसे थोड़ी देरके लिये बाहर निकालनेका आदेश देता है जिससे वह मरे नहीं, उसी प्रकार माया जीवको उठाकर कभी तो स्वर्गमें ले जाती है और कभी उसे नरकमें डुबोती है॥118॥ अनुभाष्य—नित्यमुक्त जीव कभी भी श्रीकृष्णको नहीं भूलते, वे अनादिकालसे श्रीकृष्णोन्मुख रहकर हरिसेवारूपी अपनी नित्यवृत्तिमें स्थित रहते हैं। किन्तु जो सब जीव अपने श्रीकृष्ण-सेवाधिकारको भूलकर अनादिकालसे अपने कर्मफलोंसे उत्पन्न भोगवासनाके कारण मायाका अनुशीलन करके स्वयंको कर्मफलका भोक्ता मानते हैं, उनके कर्मफल-भोगका निर्णय मायाके द्वारा होता है। राजाके पुरस्कार और दण्डकी भाँति बद्धजीव भी मायाके द्वारा पुण्यकर्मके प्रभावसे स्वर्गमें देवताके पदपर आरूढ़ होकर सुख भोग करता है, पुनः पापके फलसे नरकादिमें क्लेश प्राप्त करता है॥118॥ अमृताणुकणिका—राजा जो अपराधी व्यक्तिको दण्ड देता है, वह केवल उसे दुःख भोग करानेके लिये नहीं होता। उस दुःख भोगका मुख्य उद्देश्य अपराधी व्यक्तिकी अपराध करनेकी वृत्तिको दूर करना होता है

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[ 20/118-119 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला जिससे वह भविष्यमें अपराध करके दण्डका भागी न हो। इसलिये उद्देश्यके प्रति लक्ष्य करनेपर यह समझा जा सकता है कि राजाका दण्ड देना भी उस अपराधीके प्रति करुणा है। श्रीकृष्णको भूलकर जीव सुखकी आशासे इस जगत्में आता है। परन्तु (गीता 8/15)में भगवान् श्रीकृष्णने इस जगत्को 'दुःखालयमशाश्वतम्' कहा है। यहाँ जो सुख प्रतीत होता है, वह भी दुःखसे मिश्रित होता है और परिणाममें दुःख ही होता है। (गीता 9/20-21)में भगवान्ने कहा है,-'ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्॥ ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति। अर्थात् अनेक पुण्य कर्मोंके फलस्वरूप जीव स्वर्गको प्राप्त करता है। वहाँ सुखभोग करनेपर पुण्य क्षीण होनेपर जीव पुनः मृत्युलोकमें पतित होता है।' इस प्रकार स्वर्गभोग भी नश्वर और अन्ततः दुःखपूर्ण है। अपने प्रयासोंसे जीव जन्म-मृत्युके हाथोंसे छुटकारा नहीं पा सकता, तब वह यह समझ जाता है कि सुखकी आशासे इस जगत्में आकर उसने बहुत बड़ी भूल की है। तब वह समझ सकता है कि कृष्ण- विमुखता ही उसकी मूल भूल है और भाग्यवशतः तब जीव कृष्णोन्मुख होनेकी चेष्टा कर सकता है। इसी उद्देश्यसे ही माया जीवको दुःख प्रदान करती है॥118॥ (ग) बद्धजीवका रोग; उसका उपाय और चिकित्सा अर्थात् पथ्य एवं औषधिके सेवनकी विधि :- श्रीमद्भागवत (11/2/37)में- भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्या- दीशादपेतस्य विपर्ययोऽस्मृतिः। तन्माययातो बुध आभजेत्तं भक्त्यैकयेशं गुरुदेवतात्मा॥ 119॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 119॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णसे इतर (अन्य) जो माया है, उसमें अभिनिविष्ट जीवमें 'भय' उपस्थित होता है और उन ईश्वरसे बहिर्मुख होनेके कारण मायाजनित विपरीत स्मृति होती है; इसी कारण पण्डित व्यक्ति गुरुको 'देवता' और 'आत्म'-स्वरूप मानकर अनन्य- भक्तिके साथ उन परमेश्वरका भजन करेंगे॥119॥ अनुभाष्य-द्वारकापुरीमें श्रीवसुदेवकी जिज्ञासा करने पर देवर्षि नारदने भागवत-धर्मके वर्णनके प्रसङ्गमें विदेहराज निमि और नवयोगेन्द्रके संवादका वर्णन किया; राजा निमिके यज्ञमें नवयोगेन्द्रके आनेपर राजा निमिने उनसे भागवत-धर्मका वर्णन करनेकी प्रार्थना की, नवयोगेन्द्रोंमें एक 'कवि' ऋषि सर्वप्रथम भागवत धर्मके लक्षण बतलाकर बद्धजीवकी दुरावस्था और भगवद्भजनकी कर्त्तव्यताका उपदेश कर रहे हैं,- [यतः] ईशात् (भगवतः कृष्णात्) अपेतस्य (विमुखस्य बद्धजीवस्य) तन्मायया (तस्य भगवतः कृष्णस्य मायया बहिरङ्गशक्त्या) अस्मृतिः (भगवतः स्वरूपस्य असफूर्तिः धारणाभावः इत्यर्थः) [ततः] विपर्ययः (मायाकृत-कर्मफल-भोगपराभिमानः- स्वरूपस्मरणात् देहोऽस्मीति विवर्त्तमूल-बुद्धिवैपरीत्यमित्यर्थः) [ततः] द्वितीयाभिनिवेशतः (निज-भोगज-कल्पनात्-स्वरूपात् अन्यस्मिन् वस्तुनि देहादौ आवेशतः, स च देहाहङ्कारतः, स च स्वरूपामस्मरणात्) भयं (देहद्रविण-सुहृन्निमित्तं संसृतिः आशङ्काः वा) स्यात् (भवति)। अतः बुध (कृष्णोन्मुखो बुद्धिमान् जीवः) तम् (ईशम् अधोक्षजम् एव) गुरुदेवतात्मा (गुरुः एव देवता ईश्वरः, आत्मा प्रेष्ठश्च यस्य तथादृष्टिः सन्) एकया (केवलया अव्यभिचारिण्या एकान्तिक्या) भक्त्या (इतरज्ञान- कर्ममार्गानुसरणत्यागेन) आभजेत् (सम्यक् सेवेत)। श्लोक-भावानुवाद-जब भगवान् श्रीकृष्णसे विमुख बद्धजीवको भगवान् श्रीकृष्णकी माया (बहिरङ्गाशक्ति) के द्वारा भगवद् स्वरूपकी स्मृतिका अभाव होता है, तब उसे मायाकृत कर्मफलके भोक्ताके अभिमानसे और स्वरूपकी विस्मृतिसे मैं यह देह हूँ, ऐसी विपरीत बुद्धि होती है और तब द्वितीय-अभिनिवेश अर्थात् अपनेको भोक्ता मानकर अपने स्वरूपसे अन्य वस्तु-देहमें आवेश होनेके कारण देहमें आत्मबुद्धिके अहङ्कार और स्वरूपकी विस्मृतिके कारण देह-धन-सुहृदसे बिछुड़नेका 238 |

भय होता है। इसलिये श्रीकृष्ण-उन्मुख बुद्धिमान् जीव गुरुदेवको आराध्य-देवता और प्रियतम जानकर भगवान्की ऐकान्तिक भक्तिके द्वारा (श्रीकृष्णसे अतिरिक्त ज्ञान- कर्ममार्गके अनुसरणको त्यागकर) सम्यक्रूपसे सेवा करेंगे ॥ 119 ॥

(घ) चिच्छक्तिमान् परमेश्वरके अवरोह अथवा अवतारका वर्णन; मायाको जीतनेका एकमात्र उपाय :- साधु-शास्त्र-कृपाय यदि कृष्णोन्मुख हय। सेइ जीव निस्तारे, माया ताहारे छाड़य ॥ 120 ॥ अनुवाद-साधु और शास्त्रकी कृपासे जीव जब श्रीकृष्णोन्मुख होता है, तब उस जीवका उद्धार होता है और माया उसे छोड़ देती है ॥ 120 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णबहिर्मुखतासे ही जीवका पतन होता है-यह साधु और शास्त्रकी कृपासे ही जाना जाता है। इसे जानकर जो जीव पुनः श्रीकृष्णोन्मुख होता है, उसका ही उद्धार होता है और माया उसे अपने चङ्गलसे मुक्त कर देती है ॥ 120 ॥ अनुभाष्य-श्रीकृष्ण-विमुख रहकर जीव संसारमें सुखभोगमें व्यस्त हो जाता है। वैष्णवकी कृपा और शास्त्रके अनुग्रहसे जीव कर्मफलभोग-वासनासे मुक्त होकर जब श्रीकृष्ण-सेवोन्मुख होता है, तब वह भोग करने अथवा मुक्त होनेकी पिपासासे छुटकारा प्राप्त करता है। श्रीकृष्णसेवा-परायण बुद्धि होनेसे विषयभोग- वासनारूपी माया उसे छोड़ देती है। श्रीकृष्ण-सेवोन्मुख होनेपर तब जीव पुनः अहंग्रहोपासनामें मत्त होकर मुक्तिकामी ज्ञानी अथवा विषय-भोगवासनासे फलभोगकामी होकर श्रीकृष्णसे भिन्न वस्तुओंमें आबद्ध नहीं होता, अपितु मायाके चङ्गलसे छुटकारा प्राप्त करता है ॥ 120 ॥

एकमात्र श्रीकृष्णके शरणागत भक्त ही मायाको जीतनेवाले :- श्रीमद्भगवद्गीता (7/14)में- दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ 121 ॥

अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 121 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मेरी इस त्रिगुणमयी मायासे अत्यन्त कष्टसे पार हुआ जाता है; जो मेरे शरणागत होते हैं, वे ही केवल इस मायासे पार हो सकते हैं ॥ 121 ॥ अनुभाष्य- एषा मम (परमेश्वरस्य) दैवी (अलौकिकी वैष्णवी) गुणमयी (सत्त्वरजस्तमोमयी) माया (बहिरङ्गा शक्तिः) दुरत्यया (भुक्तिमुक्तिवासनाबद्धजीवानां दुरतिक्रमा) हि (एव); मां (स्वरूपशक्तियुक्तं स्वयं भगवन्तं कृष्णं) ये (जनाः) प्रपद्यन्ते (सर्वात्मना आश्रयं कुर्वन्ति), ते (एव) एतां मायां (जीवविमोहिनीं प्रकृतिं) तरन्ति (अतिक्रामन्ति पराजयन्ते)। श्लोक-भावानुवाद-भुक्ति-मुक्तिकी वासनासे बद्ध जीवोंके लिये मुझ परमेश्वरकी इस अलौकिकी वैष्णवी (सत्त्व-रज-तमकी) त्रिगुणमयी बहिरङ्गा शक्तिका अतिक्रम करना अति दुष्कर है, किन्तु जो स्वरूपशक्तियुक्त स्वयं मुझ कृष्णका सभी प्रकारसे आश्रय ग्रहण करते हैं, वे इस जीव-विमोहिनी प्रकृतिको जय कर लेते हैं ॥ 121 ॥

जीवके प्रति अहैतुकी-कृपामय अधोक्षज विष्णुके द्वारा अपने अवतारका प्राकट्य :- मायामुग्ध जीवेर नाहि कृष्णस्मृति-ज्ञान। जीवेरे कृपाय कैला कृष्ण वेद-पुराण ॥ 122 ॥ अनुवाद-मायामुग्ध जीवको श्रीकृष्णका स्मृतिरूपी ज्ञान नहीं रहता, जीवपर कृपा करके ही श्रीकृष्णने वेदों और पुराणोंको प्रकाशित किया है ॥ 122 ॥ अनुभाष्य-मायामुग्ध जीव प्रतिक्षण प्रत्येक विषयमें स्वरूपविभ्रमके कारण अपने भोगफलको प्राप्त करनेमें लगे रहते हैं। कभी तो वे मायाबद्ध-बुद्धिसे फलभोगकी कामनासे छूटनेकी इच्छा करते हैं, कभी वे फलकामी बनकर अनित्य भोगोंका बहुत आदर करते हैं; दोनों अवस्थाओंमें ही, मायासे ढके होनेके कारण उनके श्रीकृष्ण-स्मरणका अभाव लक्षित होता है। इसलिये परमकरुणामय श्रीकृष्णने ऐसे भ्रान्तबुद्धि कुविचारपरायण

[ 20/122-128 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला और भोगपरायण व्यक्तियोंका अमङ्गलसे उद्धार करनेके लिये वेद-पुराणादि प्रकाशित किये हैं॥122॥ श्रीकृष्ण ही तीन प्रकाशोंसे श्रीकृष्णज्ञान देनेवालेके रूपमें अवतीर्ण—(1) वेद अथवा वेदान्त-भाष्य श्रीमद्भागवत, (2) भागवत-श्रेष्ठ गुरु, (3) अन्तर्यामी :— 'शास्त्र'-'गुरु'-'आत्म'-रूपे आपनेरे जानान। 'कृष्ण मोर प्रभु, त्राता'—जीवेर हय ज्ञान ॥123॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण 'शास्त्र', 'गुरु' और 'अन्तर्यामी'के रूपमें जीवको अपने तत्त्वसे अवगत कराते हैं। श्रीकृष्णका ज्ञान होनेपर जीव यह समझ पाता है कि 'श्रीकृष्ण ही मेरे स्वामी और मेरी रक्षा करनेवाले हैं'॥'123॥ अनुभाष्य—शास्त्र, गुरु और चैत्यगुरु—इन तीन रूपोंमें भगवान् उदित होकर बद्धजीवके हृदयमें 'जीवके प्रभु' अथवा 'जीवोंके उद्धार-कर्त्ता' आदि भावोंको प्रकाशित करा देते हैं॥123॥ (ङ) ईश्वर-विश्वासी मात्रको ही वेदके अपौरुषेय-ज्ञानके कारण ग्रन्थकारके द्वारा पूर्वोक्त तीन प्रकारके प्रमाणोंमेंसे सर्व-प्रत्यक्षीभूत वेद अथवा श्रुतिकी सहायतासे अपने वक्तव्य एकमात्र शुद्धभक्तिके श्रेष्ठ-अभिधेय होनेका संस्थापन; शास्त्रोंमें प्रतिपादित तीन प्रकारके अन्वेषणीय तत्त्व अथवा ब्रह्मवस्तु :— वेदशास्त्र कहे—'सम्बन्ध', 'अभिधेय', 'प्रयोजन'। 'कृष्ण'—प्राप्य-सम्बन्ध, 'भक्ति'—प्राप्येर साधन ॥124॥ श्रीकृष्ण ही सम्बन्ध, शुद्धभक्ति ही अभिधेय, प्रेम ही प्रयोजन :— अभिधेय-नाम—'भक्ति', 'प्रेम'—प्रयोजन। पुरुषार्थ-शिरोमणि—प्रेम महाधन ॥125॥ साधनभक्तिके साध्य प्रेमकी चेष्टा :— कृष्णमाधुर्य-सेवा-प्राप्त्येर कारण। कृष्णे सेवा करे, कृष्णरस-आस्वादन ॥ 126 ॥ अनुवाद—वेदशास्त्र 'सम्बन्ध', 'अभिधेय' और 'प्रयोजन'के विषयमें बतलाते हैं। जीवके प्राप्य श्रीकृष्ण ही 'सम्बन्ध' हैं, प्राप्य श्रीकृष्णसेवाका साधन ही भक्ति अथवा 'अभिधेय' है, और पुरुषार्थ-शिरोमणि महाधन स्वरूप प्रेम ही 'प्रयोजन' है। जीव जब श्रीकृष्णमाधुर्यके आनन्दको अनुभव करता है, तब वह श्रीकृष्णकी सेवा करता है। उस सेवाके द्वारा वह श्रीकृष्णरसका आस्वादन करता है॥124-126॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जीव मायामुग्ध होकर श्रीकृष्णस्मृति-ज्ञानसे वञ्चित हो गये हैं, ऐसा देखकर अपार-करुणामय श्रीकृष्ण वेद-पुराण-शास्त्रोंको प्रकाशित करके उन शास्त्रोंके रूपमें, शास्त्रोंके अर्थ-प्रदर्शक गुरुरूपमें और अन्तर्यामी आत्मारूपमें जीवको अपने तत्त्वसे अवगत कराते हैं। सभी वेदशास्त्रोंमें सम्बन्ध- ज्ञान, अभिधेय-ज्ञान और प्रयोजन-ज्ञानकी शिक्षा है। जीवके प्राप्य श्रीकृष्ण जो तत्त्व हैं, वे सम्बन्धज्ञानसे प्राप्त होते हैं। उन श्रीकृष्णको प्राप्त करनेके साधनका नाम—'भक्ति' है; उसे 'अभिधेय' कहते हैं। श्रीकृष्ण- प्राप्तिमें 'प्रेम' नामक एक विचित्र कार्य है, उसका नाम 'प्रयोजन' है॥123-125॥ अनुभाष्य—वेदशास्त्रोंमें 'सम्बन्ध', 'अभिधेय' और 'प्रयोजन'—ये तीन विषय कहे गये हैं। शुद्धजीवके प्राप्य श्रीकृष्ण ही 'सम्बन्ध' हैं; प्राप्य श्रीकृष्णसेवाका साधन ही 'अभिधेय' है; और धर्म-अर्थ-कामभोग और भोगरहित 'मोक्ष'—इन चारों पुरुषार्थोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ महान्धनरूप प्राप्य श्रीकृष्णप्रेम ही 'प्रयोजन' है॥125॥ चार प्रकारके अभिधेयोंमेंसे सभी शास्त्रोंमें एकमात्र शुद्धभक्तिके ही निर्विघ्न और अनायास प्राप्त होनेका वर्णन; उपमा—सर्वज्ञ अथवा सिद्ध महाजनोंका उपदेश :— इहाते दृष्टान्त—यैछे दरिद्रेर घरे। 'सर्वज्ञ' आसिं दुःख देखि' पुछये ताहारे ॥ 127 ॥ जीवका नित्यसिद्धभाव श्रीकृष्णप्रेम :— 'तुमि केने एत दुःखी, तोमार आछे पितृधन। तोमारे ना कहिल, अन्यत्र छाड़िल जीवन ॥'128॥ अनुवाद—इसका दृष्टान्त—जैसे किसी दरिद्र व्यक्तिके 240 ।

बीसवाँ अध्याय 20/127-132 ] घरमें एक ज्योतिषीने आकर उसके दुःखको देखकर उससे पूछा, - 'तुम इतने दुःखी क्यों हो? तुम्हारे पिताने तुम्हारे लिये बहुत धन छोड़ा है। परन्तु तुम्हारे पिताने अन्य किसी स्थानपर शरीर छोड़ा था, इसलिये वे तुम्हें धनके विषयमें बतला नहीं पाये।' 127-128 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जीवकी श्रीकृष्ण-बहिर्मुखताके कारण उसकी स्वरूपस्मृतिके लुप्त होनेपर श्रीकृष्णने वेद-पुराणादिका प्रवर्त्तन करके स्वयंको प्रकाशित किया है। 'दरिद्र और ज्योतिषीकी कथा'—उसकी उपमा है॥ 127 ॥ अनुभाष्य- 'सर्वज्ञ'-भाः 5/5/10-13 माध्व-भाष्य देखें ॥ 127 ॥ अमृताणुकणा-छान्दोग्योपनिषद् (8वाँ प्रपाठक)- “त इमे सत्याः कामा अनृतापिधानास्तेषां सत्यानां सतामनृतमपिधानं xx अथ ये चास्येह जीवा ये च प्रेतामच्चान्यदिच्छन्न लभते सर्वं तदत्र गत्वा विन्दतेऽत्र ह्यस्यैते सत्याः कामा अनृतापिधानाः। तद् यथापि हिरण्यनिधिं निहितमक्षेत्रज्ञा उपर्युपरि सञ्चरन्तो न विन्देयुरेवमेवेमाः सर्वाः प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्त्यनृतेन हि प्रत्यूढाः।” अर्थात् “इस जगत्में ये सब सत्यकामनाएँ आत्मामें विद्यमान रहनेपर भी अविद्यारूप असत्यके आवरणमें आवृत हैं। किन्तु आत्मदर्शी व्यक्ति सत्यकाम होकर इस लोकमें स्थित, परलोकमें स्थित अथवा अन्य जो कुछ दुर्लभ है, उन सबको हृदयाकाशमें गमनके द्वारा प्राप्त करता है। जैसे, पृथ्वीमें छिपे स्वर्ण आदि गुप्तधनके सम्बन्धमें अज्ञ व्यक्ति उस भूमिके ऊपर बार-बार विचरण करनेपर भी उसे प्राप्त नहीं कर सकता, वैसे ही सभी प्राणी अज्ञानके कारण हृदयमें अवस्थित ब्रह्मवस्तुको प्राप्त नहीं कर सकते।” 'सर्वज्ञ'-(भःरःसिः 2/1/182)- “परचित्तस्थितं देशकालाद्यन्तरितं तथा। यो जानाति समस्तार्थं स सर्वज्ञो निगद्यते॥” अर्थात् “जो दूसरोंके हृदयकी बात और देश- कालादिकी ढकी हुई सभी बातोंको जानता है, उसको सर्वज्ञ कहते हैं॥" 127-128 ॥ साध्य-प्रेमके साधनभूत भक्तिकी अवश्य-कर्त्तव्यता; शास्त्रमें इसीका ही विधान :- सर्वज्ञेर वाक्ये करे धनेर उद्देशे। ऐछे वेद-पुराण जीवे 'कृष्ण' उपदेशे॥ 129 ॥ अनुवाद-उपरोक्त दृष्टान्तमें ज्योतिषीके वचन जैसे धनके विषयमें निर्देश करते हैं, उसी प्रकार वेद-पुराण जीवको 'श्रीकृष्ण'के विषयमें बतलाते हैं॥ 129 ॥ जीवोंके नित्य सम्बन्धी श्रीकृष्ण ही सभी शास्त्रोंके उद्दिष्ट :- सर्वज्ञेर वाक्ये मूलधन अनुबन्ध। सर्वशास्त्रे उपदेशे, 'श्रीकृष्ण' - सम्बन्ध ॥ 130 ॥ अनुवाद-ज्योतिषीके वचनोंसे जिस प्रकार दरिद्र व्यक्तिको अपने धनके विषयमें पता चल जाता है, उसी प्रकार सभी शास्त्रोंके उपदेशोंसे जीवको श्रीकृष्णसे अपने सम्बन्धके विषयमें पता चल जाता है॥ 130 ॥ नित्यसिद्ध भावका प्राकट्य ही बद्धजीवका साधन :- 'बापेर धन आछे' - जाने, धन नाहि पाय। सर्वज्ञ कहे तारे प्राप्तिर उपाय ॥ 131 ॥ अनुवाद - 'पिताके द्वारा छोड़ा गया धन है' - ज्योतिषीके वचनानुसार दरिद्र व्यक्तिको इसे जानकर भी उस धनकी प्राप्ति नहीं होती। ज्योतिषी ही उसे प्राप्तिका उपाय भी बतलाता है॥ 131 ॥ अभक्ति-मार्ग-(1) भोगकी प्राप्तिके लिये कर्ममार्गमें विपत्तिकी आशङ्का :- 'एइ स्थाने आछे धन' - बलि' दक्षिणे खुदिबे। 'भीमरुल-वरुली' उठिबे, धन ना पाइबे ॥ 132 ॥ अनुवाद - 'इस स्थानपर धन है'-यह बताकर ज्योतिषीने कहा-यदि तुम दक्षिण भागमें खोदोगे, तो । 241

[ 20/132-135 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ततैये और मधुमक्खियाँ निकलेंगे और तुम्हें धनकी प्राप्ति नहीं होगी॥ 132 ॥ (2) विभूति-सिद्धिकी प्राप्तिके लिये योगमार्गमें विपत्तिकी आशङ्का :- 'पश्चिमे' खुदिबे, ताहा 'यक्ष' एक हय। से विघ्न करिबे,—धने हात ना पड़य ॥ 133 ॥ अनुवाद—यदि तुम पश्चिम भागमें खोदोगे, तो वहाँ एक यक्ष है, वह ऐसी बाधा उत्पन्न करेगा, जिससे धन तुम्हारे हाथ नहीं लगेगा ॥ 133 ॥ (3) सायुज्य प्राप्तिके लिये ज्ञान-मार्गमें विपत्तिकी आशङ्का :- 'उत्तरे' खुदिले आछे कृष्ण-'अजगरें'। धन नाहि पाबे, खुदिते गिलिबे सबारे ॥ 134 ॥ अनुवाद—उत्तर भागमें खोदनेपर देखोगे कि वहाँ काले रङ्गका अजगर है। तुम्हें धन तो मिलेगा नहीं, अपितु वही अजगर ही खोदनेवालेको निगल जायेगा ॥ 134 ॥ पूर्व अथवा पुराण अथवा नित्य शाश्वत धन श्रीकृष्णभक्ति ही एकमात्र विपत्ति-रहित :- पूर्वादिके ताते माटी अल्प खुदिते। धनेर झारि पड़िबेक तोमार हातेते ॥ 135 ॥ अनुवाद—पूर्व दिशामें थोड़ी सी मिट्टी खोदनेपर ही धनकी मटकी तुम्हारे हाथ लगेगी ॥ 135 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—वेद और पुराण शास्त्रोंमें अनेक प्रकारके उपायोंकी बात स्थान-स्थानपर लिखी है; उसमें किसी ओर ततैय्यारूप कर्मकाण्ड, किसी ओर ज्ञान- काण्डरूपी यक्ष, किसी ओर काले रङ्गका अजगर-रूपी योगगत कैवल्य, पुनः किसी ओर रक्षित धनका पात्र बहुत कम परिश्रमसे ही हाथमें आ जाता है। इसलिये वेदशास्त्रोंने कहा है कि कर्म, ज्ञान और योगको परित्यागकर भक्तिपथसे श्रीकृष्णकी प्राप्ति होती है ॥ 135 ॥ अनुभाष्य—'उपमेय',—जैसे, पूर्वदिशामें—श्रीकृष्णभक्ति, दक्षिणदिशामें—कर्मकाण्ड, पश्चिमदिशामें—सिद्धिकाण्ड (मतान्तरमें ज्ञानकाण्ड), उत्तरदिशामें—ज्ञानकाण्ड (मतान्तरमें योगकाण्ड)। और इनके 'उपमान',—जैसे, पूर्वदिशामें—पितृधन, दक्षिणदिशामें—ततैये और मधुमक्खी, पश्चिमदिशामें—यक्ष, उत्तरदिशामें—काला अजगर। दक्षिणा-मार्गीय साधन ही फलभोगपरक कर्मकाण्ड है; यमके द्वारा दण्डनीय 'दक्षिणा' ग्रहण करके फलका आरोप करते हैं। इस कर्ममार्गमें जीव भोगवासनारूपी ततैये, मधुमक्खी आदिके द्वारा डंक मारे जानेपर कष्ट प्राप्त करते हैं, इससे उनके भोगकी आशा पूर्ण नहीं होती, केवल उत्तरोत्तर वर्धित ही होती है। उत्तरा-मार्गीय साधन ही सिद्धिवाञ्छा-परायण योगमार्ग है; उसमें कैवल्यरूपी काले रङ्गका अजगर-सर्प शुद्धजीवकी सत्ताको ग्रास कर लेता है। किसीके मतानुसार, उत्तरा-मार्गीय साधन ही निष्काम-ज्ञानमार्ग है, वहाँ शुद्धजीवकी सत्ताको ब्रह्मसायुज्यरूपी काले सर्पने ग्रास कर रखा है। यक्ष धनका रक्षक है, धनको प्रदान करनेवाला नहीं। यक्षसे प्रार्थना करनेवालोंका विनाशके अतिरिक्त धनकी प्राप्ति दुराशामात्र है, अर्थात् धनके लोभसे प्रलोभित करके यक्ष अन्तमें धन पानेके अभिलाषी व्यक्तिका विनाश करनेवाला है; वास्तवमें ज्ञानमार्गमें अथवा योगमार्गमें सायुज्य अथवा कैवल्य, दोनों ही जीवकी सत्ताके संहारक हैं। श्रीकृष्णभक्ति ही बद्धजीवका 'पूर्व' अर्थात् सिद्धधन है। उसे प्राप्त करके शुद्धजीव नित्यकालके लिये धनी हो जाता है। भक्तिधन-हीन व्यक्ति जड़ीय नश्वर अभावोंसे ग्रस्त होकर कभी तो कर्मरूपी ततैयेके डंकसे छटपट करता है, धन प्राप्त नहीं करता; पुनः कभी श्रीकृष्णकी तरफ पीठ करके अहंग्रोपासनामें अथवा कैवल्यके साधनमें व्यस्त होकर योगरूपी यक्षके द्वारा प्रेमधनसे वञ्चित होता है; पुनः उत्तरमें अर्थात् 242 ।

शुद्धजीवसत्तासे रहित सायुज्य अथवा कैवल्यरूपी सर्पके मुखमें गिरकर भी धन प्राप्त नहीं करता ॥ 132-135 ॥

शुद्धभक्तिके बलसे श्रीकृष्णप्रेमकी प्राप्ति ही सभी शास्त्रोंका तात्पर्य :- ऐछे शास्त्र कहे, - कर्म, ज्ञान, योग त्यजि'। 'भक्त्ये' कृष्ण वश हय, भक्त्ये ताँरे भजि ॥ 136 ॥

अनुवाद-इसी प्रकार शास्त्र कहते हैं, -कर्म, ज्ञान और योगको त्यागकर भक्तिके द्वारा श्रीकृष्णका भजन करना चाहिये जिसके द्वारा श्रीकृष्ण वशीभूत हो जाते हैं ॥ 136 ॥

भगवान् भक्तके लिये ही प्राप्य; भक्तिके बलसे ही अशुद्ध भी पवित्र :- श्रीमद्भागवत (11/14/20-21) में- न साधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव। न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता ॥ 137 ॥

अनुवाद-हे उद्धव ! मेरी प्रति की गयी प्रबला भक्ति जिस प्रकार मुझे वशीभूत कर सकती है, अष्टाङ्ग-योग, अभेद-ब्रह्मवादरूप सांख्यज्ञान, ब्राह्मणोंका स्वशाखा-अध्ययनरूप स्वाध्याय, सब प्रकारकी तपस्या और त्यागरूप संन्यासादिके द्वारा मुझे वैसा वशीभूत नहीं किया जा सकता ॥ 137 ॥

अनुभाष्य-आदिलीला 17/76 संख्या देखें ॥ 137 ॥

भक्त्याहमेकया ग्राह्यः श्रद्धयात्मा प्रियः सताम्। भक्तिः पुनाति मन्निष्ठा श्वपाकानपि सम्भवात् ॥ 138 ॥

अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 138 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य-साधुओंका प्रिय मैं, अनन्य श्रद्धासे उत्पन्न भक्तिके द्वारा ही प्राप्त होता हूँ। भक्ति ही मुझमें निष्ठा रखनेवाले चण्डालका भी जन्मदोषसे उद्धार करती है ॥ 138 ॥

अनुभाष्य-उद्धवजीके प्रश्नके उत्तरमें श्रीकृष्णकी उक्ति,-

सतां (नित्यसेवकानां सज्जनानां) प्रियः (सेव्यः) आत्मा (प्रेष्ठः) अहम् (स्वयं भगवान् कृष्णः) एकया (अव्यभिचारिण्या, अहैतुक्या) श्रद्धया (श्रद्धापूर्वकिया) भक्त्या ग्राह्यः (साध्यः, प्राप्यः, लभ्यः इत्यर्थः); मन्निष्ठा (कृष्णैकसेवनधर्म-तत्परा) भक्तिः श्वपाकान् (नीचकुलोद्द्भवान् जनान्) अपि सम्भवात् (प्राक्तन-दुष्कृति-जनित-शौक्र-जाति-दोषात्) पुनाति।

श्लोक-भावानुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 138 ॥

सभी शास्त्रोंमें श्रीकृष्णप्राप्तिके साधन- 'भक्ति' को ही अभिधेय होनेका गान :- अतएव 'भक्ति'-कृष्णप्राप्तयेर उपाय। 'अभिधेय' बलि' तारे सर्वशास्त्रे गाय ॥ 139 ॥

अनुवाद-इसलिये भक्ति ही श्रीकृष्ण-प्राप्तिका उपाय है। सभी शास्त्र इसी 'भक्ति'को ही 'अभिधेय' कहकर वर्णन करते हैं ॥ 139 ॥

दृष्टान्त :- धन पाइले यैछे सुखभोग-फल पाय। सुखभोग हैते दुःख आपनि पलाय ॥ 140 ॥

सम्बन्धयुक्त सेवाके फलसे श्रीकृष्णप्रीतकी वृद्धि; उसके साथ-ही-साथ मुक्ति अथवा अनर्थ-निवृत्ति :- तैछे भक्ति-फले कृष्णे प्रेम उपजाय। प्रेमे कृष्णास्वाद हैले भव नाश पाय ॥ 141 ॥

अनुवाद-धन प्राप्त होनेसे जैसे सुखभोगरूप फलकी प्राप्ति होती है और सुखभोगसे दुःख अपने आप ही दूर हो जाते हैं। इसी प्रकार भक्तिके फलसे श्रीकृष्णके प्रति प्रेम उत्पन्न होता है और प्रेममें श्रीकृष्णआस्वादन होनेपर भवनाश (पुनः जन्म-मृत्युके चक्रका नाश) हो जाता है ॥ 140-141 ॥

श्रीकृष्णप्रीतिमूलक सेवाका मुख्य फल - श्रीकृष्णप्रेमानन्दकी प्राप्ति, गौणफल - विमुखताका दूर होना और मुक्ति :- दारिद्रय-नाश, भवक्षय,-प्रेमेर 'फल' नय। प्रेमसुख-भोग-मुख्य प्रयोजन हय ॥ 142 ॥