श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
२९० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कर्मोंमें भलाई-बुराईका जो बीज है ही नहीं; और जिसे मनुष्य उनमें अपनी ममत्व बुद्धिसे उत्पन्न किया करता है, उसका नाश करना मनुष्यके हाथमें है; और उसे जो कुछ जलाना है, वह यही वस्तु है। सब प्राणियोंके विषयमें समत्वबुद्धि रखकर अपने सब व्यापारोंके इस ममत्वबीजको जिसने जला (नष्ट कर) दिया है, वही धन्य है; वही कृतकृत्य और मुक्त है; सब कुछ करते रहने परभी उसके सब कर्म ज्ञानाग्निसे दग्ध समझे जाते हैं। (गीता ४.१९; १८.५६)। इस प्रकार कर्मोंका दग्ध होना मनकी निर्विषयतापर और ब्रह्मात्मैक्यके अनुभवपरही सर्वथा अवलंबित है। अतएव प्रकट है, कि जिस तरह आग कभीभी उत्पन्न करें; परंतु वह दहन करनेका अपना धर्म नहीं छोड़ती; उसी तरह ब्रह्मात्मैक्य-ज्ञानके होतेही उसके कर्मक्षय-रूप परिणामके होनेमें कालावधिकी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। ज्योंही ज्ञान हुआ, कि उसी क्षण कर्म-क्षय हो जाता है। परंतु अन्य सब कालोंसे मरण-काल इस संबंधमें अधिक महत्त्व का माना जाता है। क्योंकि यह मरण-काल आयुके बिलकुल अंतका काल है और इसके पूर्व किसी कालमें ब्रह्मज्ञान होनेसे अनारब्ध- संचितका यदि क्षय हो गया हो, तोभी प्रारब्ध नष्ट नहीं होता। इसलिये यदि यह ब्रह्मज्ञान अंततक एक समान स्थिर न रहे, तो प्रारब्ध-कर्मानुसार मृत्यु-काल- पर्यंत जो जो अच्छे या बुरे कर्म होंगे, वे सब सकाम हो जावेंगे; और उनका फल भोगनेके लिये फिरभी जन्म लेनाही पड़ेगा। इसमें संदेह नहीं, कि जो पूरा जीव- न्मुक्त हो जाता है, उसे यह भय कदापि नहीं रहता, परंतु जब इस विषयका शास्त्र- दृष्टिसे विचार करना हो, तब इस बातकाभी विचार अवश्य कर लेना पड़ता है, कि मृत्युके पहले जो ब्रह्म-ज्ञान हो गया था, वह कदाचित् मरण-कालतक स्थिर न रह सके। इसीलिये शास्त्रकार मृत्युसे पहलेके कालकी अपेक्षा मरण-कालहीको विशेष महत्त्वपूर्ण मानते हैं, और यह कहते हैं, कि उस समय यानी मृत्युके समय पूर्ण ब्रह्मात्मैक्य ज्ञानका अनुभव अवश्य होना चाहिये; नहीं तो मोक्ष नहीं होगा। इसी अभिप्रायसे उपनिषदोंके आधारपर गीतामें कहा गया है, कि “अंतकालमें अनन्यभावसे मेरा स्मरण करनेपर मनुष्य मुक्त होता है” (गीता ८.५)। इस सिद्धान्तके अनुसार कहना पड़ता है कि, यदि कोई दुराचारी मनुष्य अपनी सारी आयु दुराचरणमें व्यतीत करे और केवल अंत समयमें उसे ब्रह्मज्ञान हो जावे, तो वहभी मुक्त हो जाता है। इसपर कितनेही लोगोंका कहना है, कि यह बात युक्तिसंगत नहीं है। परंतु थोड़ा-सा विचार करनेपर मालूम होगा, कि यह बात अनुचित नहीं कही जा सकती - यह बिल्कुल सत्य और सयुक्तिक है। वस्तुतः यह संभव नहीं, कि जिसका माग जन्म दुराचारमें बीता हो, उमे केवल मृत्युसमयमेंही सुबुद्धि और ब्रह्म-ज्ञान हो जावे। अन्य सब बातोंके समानही ब्रह्म-निष्ठ होनेके लिये मनको आदत डालनी पड़ती है, और जिसे इस जन्ममें एक बारभी ब्रह्मात्मैक्य-ज्ञानका अनुभव नहीं हुआ है, उसे केवल मरण-कालमेंही उसका एकदम ज्ञान हो जाना परम दुर्घट या
कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २९१ असंभवही है । इसीलिये गीताका दूसरा महत्त्वपूर्ण कथन यह है कि मनको विषय- वासनारहित बनानेके लिये प्रत्येक मनुष्यको सदैव अभ्यास करते रहना चाहिये, जिसका फल यह होगा कि अंतकालमेंभी यही स्थिति बनी रहेगी; और मुक्तिभी अवश्य हो जायगी (गीता ८. ६, ७. तथा २. ७२) । परंतु शास्त्रकी छानबीन करनेके लिये मान लीजिये, कि पूर्व संस्कार आदि कारणोंसे किसी मनुष्यको केवल मृत्यु- समयमेंही एकाएक ब्रह्म-ज्ञान हो गया । निस्संदेह ऐसा उदाहरण लाखों या करोड़ों मनुष्योंमें एक-आधही मिल सकेगा । परंतु, चाहे ऐसा उदाहरण मिले या न मिले - इस विचारको एक ओर रखकर अब हमें यही देखना है, कि यदि ऐसी स्थिति प्राप्त हो जाय, तो आगे क्या होगा ? ज्ञान चाहे मरण-कालमेंही क्यों न हो; परंतु उससे मनुष्यके अनारब्ध-कार्य-संचितका क्षय होताही है; और इस जन्मके भोगसे आरब्ध-संचितका क्षय मृत्युके समय हो जाता है । इसलिये उसे कुछभी कर्म भोगना बाकी नहीं रह जाता है; और यही सिद्ध होता है, कि वह सब कर्मोंसे अर्थात् संसारचक्रसे मुक्त हो जाता है। यही सिद्धान्त गीताके इस वाक्यमें कहा गया है, “अपि चेत् सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ” (गीता ९. ३०) - यदि कोई बड़ा दुराचारी मनुष्यभी परमेश्वरका अनन्य भावसे स्मरण करेगा, तो वहभी मुक्त हो जायगा । और यह सिद्धान्त संसारके अन्य सब धर्मोंमेंभी ग्राह्य माना गया है । 'अनन्य भाव 'का यही अर्थ है, कि परमेश्वरमे मनुष्यकी चित्तवृत्ति पूर्ण रीतिसे लीन हो जावे । स्मरण रहे, कि मुँहसे तो 'राम राम' बड़बड़ाते रहें; और चित्त- वृत्ति दूसरीही ओर रहे; तो इसे अनन्य भाव नहीं कहेगा । सारांश, परमेश्वर- ज्ञानकी महिमाही ऐसा है, कि ज्योंही ज्ञानकी प्राप्ति हुई, त्योंही सब अनारब्ध- संचितका एकदम क्षय हो जाता है - यह अवस्था कभीभी प्राप्त हो, सदैव इष्टही है । परंतु यह अति आवश्यक बात है, कि कमसे कम मृत्युके समय यह स्थिर बनी रहें; या यदि पहले प्राप्त न हुई हो, तो कम-से-कम मृत्युके समय वह प्राप्त होवे । नहीं तो हमारे शास्त्रकारोंके कथनानुसार मृत्युके समय कुछ-न-कुछ वासना अवश्यही बाकी रह जायगी, जिससे पुनः जन्म लेना पड़ेगा और उसमे मोक्षभी नहीं मिलेगा । इसका विचार हो चुका, कि कर्मबंधन क्या है ? कर्मक्षय किसे कहते हैं ? वह कैसे और कब होता है ? अब प्रसंगानुसार इस बातकाभी कुछ विचार किया जायगा, कि जिनके कर्मफल नष्ट हो गये हैं, उनको और जिनके कर्मबंधन नहीं छूटे हैं, उनको मृत्युके अनंतर वैदिक धर्मके अनुसार कौन-सी गति मिलती है ? इसके संबंधमें उपनिषदोंमें बहुत चर्चा की गई है (छां. ४. १५; ५. १०; बृ. ६. २. २-१६; कौषी. १. २-३ ), और उसकी एकवाक्यता वेदान्तसूत्रके चौथे अध्यायके तीसरे पादमे की गई है । परंतु उस सब चर्चाको यहाँ बतलानेकी कोई आवश्यकता नहीं है । हमे केवल उन्ही दो मार्गोंका विचार करना है, जो भगवद्गीतामें (गीता ८. २३-२७) दिये गये हैं । वैदिक धर्मके ज्ञानकांड और कर्मकांड, ये दो प्रसिद्ध
२९२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र भेद है। कर्मकाण्डका मूल उद्देश्य यह है, कि सूर्य, अग्नि, इंद्र, वरुण, रुद्र, इत्यादि वैदिक देवताओंका यज्ञ-द्वारा पूजन किया जावे और उनके प्रसादसे इस लोकमें पुत्र- पौत्र आदि संतति तथा गौ, अश्व, धन, धान्य आदि संपत्ति प्राप्त कर ली जावे; और अंतमें मरनेपर सद्गति प्राप्त होवे। वर्तमान कालमें यह यज्ञ-याग आदि श्रौत धर्म प्रायः लुप्त हो गया है। इससे उक्त उद्देश्यको सिद्ध करनेके लिये लोग देवभक्ति तथा दानधर्म आदि शास्त्रोक्त पुण्यकर्म किया करते हैं। परंतु ऋग्वेदसे स्पष्टतया मालूम होता है, कि प्राचीन कालमें लोग - न केवल स्वार्थके लिये; बल्कि सर्व समाजके कल्याणके लियेभी - यज्ञ द्वाराही देवताओंकी आराधना किया करते थे। इस कामके लिये जिन इंद्र आदि देवताओंको अनुकूलताका संपादन करना आवश्यक है, उनकी स्तुतिमेही ऋग्वेदके सूक्त भरे पड़े हैं, और उनमें स्थल-स्थलपर ऐसी प्रार्थना की गई है, कि "हे देव हमें संतति और समृद्धि दो।" "हमें शतायु करो।" हमें, हमारे लड़कों-बच्चोंको और हमारे वीर-पुरुषोंको तथा हमारे जानवरोंको न मारो।* ये'यज्ञ-याग तीनों वेदोंमें विहित हैं, इसलिये इस मार्गका पुराना नाम 'त्रयी धर्म' है; और ब्राह्मणग्रंथोंमें इन यज्ञोंकी विधियोंका विस्तृत वर्णन किया गया है, परंतु भिन्न भिन्न ब्राह्मणग्रंथोंमें यज्ञ करनेकी भिन्न भिन्न विधियां हैं। इससे आगे शंका होने लगी, कि कौन-सी विधि ग्राह्य है; तब इन परस्पर-विरुद्ध वाक्योंकी एकवाक्यता करनेके लिये जैमिनीने अर्थनिर्णायक नियमोंका संग्रह किया। जैमिनीके इन नियमोंकोही मीमांसासूत्र या पूर्वमीमांसा कहते हैं, और इसी कारणसे इस प्राचीन कर्मकांडको मीमांसामार्ग नाम मिला तथा हमनेभी इसी नामका इस ग्रंथमें कई बार उपयोग किया है, क्योंकि आजकल यही प्रचलित हो गया है। परंतु स्मरण रहे, कि यद्यपि 'मीमांसा' शब्दही आगे चलकर प्रचलित हो गया है, तथापि यज्ञ- यागादिका यह कर्म-मार्ग बहुत प्राचीन कालसे चलता आया है। यही कारण है, कि गीतामें 'मीमांसा' शब्द कहींभी नहीं आया है; किंतु उसके बदले 'त्रयी धर्म' (गीता ९. २०, २१) या 'त्रयी विद्या' ये नाम आये हैं। यज्ञयाग आदि श्रौतकर्म-प्रतिपादक ब्राह्मणग्रंथोंके बाद आरण्यक और उपनिषद्, ये वैदिक ग्रंथ बने। इनमें यह प्रतिपादन किया गया है, कि यज्ञ-याग आदि कर्म गौण हैं और ब्रह्मज्ञानही श्रेष्ठ है, इसलिये इनके धर्मको 'ज्ञानकांड' कहते हैं। परंतु भिन्न भिन्न उपनिषदोंमें भिन्न भिन्न विचार हैं। इसलिये उनकीभी एकवाक्यता करनेकी आवश्यकता हुई; और इस कार्यको बादरायणाचार्यने अपने वेदान्तसूत्रोंमें किया। इस ग्रंथको ब्रह्मसूत्र अथवा शारीरसूत्र या उत्तर-मीमांसा कहते हैं। इस प्रकार पूर्व-मीमांसा तथा उत्तर-मीमांसा, क्रमसे *ये मंत्र अनेक स्थलोंपर पाये जाते हैं; परंतु उन सबको न दे कर यहाँ केवल एकही मंत्र बतलाना बस होगा, कि जो बहुत प्रचलित है। वह यह है - "मा नस्तोके तनये मा न आयौ मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः। वीरान्मा नो रुद्र भामितो वधीर्हविष्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे" (ऋ. १. ११४. ८)।
कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २९३
- कर्मकांड तथा ज्ञानकांड-संबंधी आजके प्रधान ग्रंथ हैं। वस्तुतः ये दोनों ग्रंथ मूलमें मीमांसाहीके हैं-अर्थात् वैदिक वचनोंके अर्थकी चर्चा करनेके लियेही बनाये गये हैं। तथापि आजकल कर्मकांड-प्रतिपादकोंको केवल 'मीमांसक' और ज्ञानकांड प्रतिपादकोंको 'वेदान्ती' कहते हैं। कर्मकांडवालोंका अर्थात् मीमांसकोंका कहना है, कि श्रौतधर्ममें चातुर्मास्य, ज्योतिष्टोम प्रभृति यज्ञ-याग आदि कर्मही प्रधान हैं; और जो इन्हें करेगा, उसेही वेदोंकी आज्ञानुसार मोक्ष प्राप्त होगा। इन यज्ञ-याग आदि कर्मोंको कोईभी छोड़ नहीं सकता। यदि छोड़ देगा, तो समझना चाहिये, कि वह श्रौतधर्मसे वंचित हो गया। क्योंकि वैदिक यज्ञकी उत्पत्ति सृष्टिकी उत्पत्तिके साथही हुई है, और यह चक्र अनादि कालसे चलता आया है, कि मनुष्य यज्ञ करके देवताओंको तृप्त करे, तथा मनुष्यकी पर्जन्य आदि सब आवश्यकताओंको देवगण पूरा करें ! आजकल हमें इन विचारोंका कुछ महत्त्व मालूम नहीं होता, क्योंकि यज्ञ- यागरूपी श्रौतधर्म अब प्रचलित नहीं है। परंतु गीता-कालकी स्थिति भिन्न थी, इस- लिये भगवद्गीतामें (गीता ३. १६-२५) इस यज्ञचक्रका महत्त्व ऊपर कहे अनुसार बतलाया गया है। तथापि गीतासे यह स्पष्ट मालूम होता है, कि उस समयभी उप- निषदोंमें प्रतिपादित ज्ञानके कारण मोक्षदृष्टिसे इन कर्मोंको गौणता आ चुकी थी (गीता. २. ४१-४६)। यही गौणता अहिंसाधर्मका प्रचार होनेपर आगे अधिका- धिक बढ़ती गई। भागवत धर्ममें स्पष्टतया प्रतिपादन किया गया है, कि यज्ञ-याग वेदविहित हैं; तोभी उनके लिये पशु-वध नहीं करना चाहिये, धान्यसेही यज्ञ करना चाहिये (महा. शां. ३३६. १० और ३३७)। इस कारण (तथा कुछ अंशोंमें आगे जैनियोंकेभी ऐसेही प्रयत्न करनेके कारण), श्रौतयज्ञ-मार्गकी आजकल वह दशा हो गई है, कि काशीसरीखे बड़ेबड़े धर्मक्षेत्रोंमेंभी नित्य श्रौताग्निहोत्र पालन करनेवाले अग्निहोत्री बहुतही थोड़े दीख पड़ते हैं; और ज्योतिष्टोम आदि पशुयज्ञोंका होना तो दस-बीस वर्षोंमें कभी कभी सुन पड़ता है। तथापि श्रौतधर्मही सब वैदिक धर्मोंका मूल है; और इसीलिये उसके विषयमें इस समयभी आदरबुद्धि पाई जाती है, और जैमिनीके सूत्र अर्थनिर्णायक शास्त्रके तौरपर प्रमाण माने जाते हैं। यद्यपि श्रौत- यज्ञयाग आदि धर्म इस प्रकार शिथिल हो गया है, तोभी मन्वादि स्मृतियोंमें वर्णित दूसरे यज्ञ-जिन्हें पंचमहायज्ञ कहते हैं-अबतक प्रचलित हैं; और उनके संबंधमेंभी श्रौतयज्ञ-यागचक्र आदिकेही उक्त न्यायका उपयोग होता है। उदाहरणार्थ, मनु आदि स्मृतिकारोंने पाँच अहिंसात्मक तथा नित्य गृहयज्ञ बतलाये हैं-जैसे वेदाध्ययन ब्रह्मयज्ञ है, तर्पण पितृयज्ञ है, होम देवयज्ञ है, बलि भूतयज्ञ है और अतिथि-संतर्पण मनुष्ययज्ञ है; तथा गार्हस्थ्य धर्ममें यह कहा है, कि इन पाँच यज्ञोंके द्वारा क्रमानुसार ऋषियों, पितरों, देवताओं, प्राणियों तथा मनुष्योंको पहले तृप्त करके फिर किसी गृहस्थको स्वयं भोजन करना चाहिये (मनु. ३. ६८-१२३)। इन यज्ञोंके कर लेनेपर जो अन्न बच जाता है, उसको 'अमृत' कहते हैं, और पहले इन सब मनुष्योंके
२९४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र भोजन कर लेनेपर जो अन्न बचे उसे 'विघस' कहते हैं (मनु. ३. २८५) । यह 'अमृत' और 'विघस' अन्नही गृहस्थके लिये विहित एवं श्रेयस्कर है और ऐसा न करके जो कोई सिर्फ़ अपने पेटके लियेही भोजन पका खावे, तो वह अघ अर्थात् पापका भक्षण करता है; और उसे 'अघाशी' कहना चाहिये - इस प्रकार केवल मनुस्मृतिमेंही नहीं तो ऋग्वेद और गीतामेंभी कहा गया है, (ऋ. १०. ११७. ६; मनु. ३. ११८; गीता ३. १३) । इन स्मार्त पंचमहायज्ञोंके सिवा दान, सत्य, दया, अहिंसा आदि सर्वभूतहितप्रद अन्य धर्मभी उपनिषदों तथा स्मृतिग्रंथोंमें गृहस्थके लिये विहित माने गये हैं (तै. १. ११) । और उन्हींमें स्पष्ट उल्लेख किया गया है, कि कुटुंबकी वृद्धि करके वंशको स्थिर रखो - "प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः ।" ये सब कर्म एक प्रकारके यज्ञही माने जाते हैं; और ये कर्म करनेका कारण, तैत्तिरीय संहितामें यह बतलाया गया है, कि जन्मसेही ब्राह्मण अपनी पीठपर तीन प्रकारके ऋण ले आता है - पहला ऋषियोंका, दूसरा देवताओंका और तीसरा पितरोंका। इनमें ऋषियोंका ऋण वेदाभ्याससे, देवताओंका यज्ञसे और पितरोंका पुत्रोत्पत्तिसे चुकाना चाहिये, अन्यथा उसे सद्गति प्राप्त नहीं होगी, (तै. सं. ६. ३. १०. ५) ।* महाभारतके (मभा. आ. १३) आदिपर्वमें एक कथा है, कि जरत्कारू ऐसा आचरण न करके, विवाह करनेके पहलेही उग्र तपश्चर्या करने लगा; तब संतानक्षयके कारण उसके यायावर नामक पितर आकाशमें लटकते हुए उसे दीख पड़े; और फिर उनकी आज्ञासे उसने अपना विवाह किया। यह कोई नियम नहीं है, कि इन सब कर्मों या यज्ञोंको केवल ब्राह्मणही करें; वैदिक यज्ञ-यागोंको छोड़ अन्य सब कर्म यथाधिकार स्त्रियों और शूद्रोंके लियेभी विहित हैं, इसलिये स्मृतिकारोंकी कही गई चातुर्वर्ण्य-व्यवस्थाके अनुसार किये गये सब कर्म यज्ञही हैं - उदाहरणार्थ, क्षत्रियोंका युद्ध करनाभी एक यज्ञ है और यज्ञका यही व्यापक अर्थ इस प्रकरणमें विवक्षित है। मनुने कहा है, कि जो जिसके लिये विहित है, वही उसके लिये तप है (म. ११. २३६) ; और महाभारतमेंभी कहा है, कि :- आरंभयज्ञाः क्षत्रस्य हविर्यज्ञा विशः स्मृताः । परिचारयज्ञाः शूद्राश्च जपयज्ञा द्विजातयः ॥ "आरंभ (उद्योग), हवि, सेवा और जप ये चार यज्ञ क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और ब्राह्मण, इन चार वर्णोंके लिये यथानुक्रम विहित हैं, (मभा. शां. २३७. १२) । सारांश, इस सृष्टिके सब मनुष्यों और उनके कर्मोंको यज्ञहीके लिये ब्रह्मदेवने उत्पन्न किया है (मभा. अनु. ४८. ३; ; और गीता ३. १०; ४. ३२) । फलतः चातुर्वर्ण्य आदि सब शास्त्रोक्त कर्म एक प्रकारके यज्ञही हैं, यज्ञकर्त्ताओं या और प्रत्येक मनुष्य अपने * तैत्तिरीय संहिताका वचन है : "जायमानो वै ब्राह्मणस्त्रिभिर्ऋणवा जायते ब्रह्मचर्येणर्षिभ्यो यज्ञेन देवेभ्यः प्रजया पितृभ्य एष वा अनृणो यः पुत्री यज्वा ब्रह्मचारिवासीति ।"
कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २९५ अपने अधिकारके अनुसार इन यज्ञकों या शास्त्रोक्त कर्मों - धंधे, व्यवसाय या कर्तव्य व्यवहारको - न करे, तो सारे समाजकी हानि होगी और संभव है, कि अंतमें उसका नाशभी हो जावे । इसलिये ऐसे व्यापक अर्थसे सिद्ध होता है, कि लोकसंग्रहके लिये यज्ञकी सदैव आवश्यकता होती है। अब यह प्रश्न उठता है, कि यदि वेद और चातुर्वर्ण्य आदि स्मार्त-व्यवस्थाके अनुसार गृहस्थोंके लिये वही कर्मप्रधान वृत्ति विहित मानी गई है, कि जो केवल कर्ममय है, तो क्या इन सांसारिक कर्मोंको धर्मशास्त्रके अनुसार यथाविधि - अर्थात् नीतिसे और धर्मकी आज्ञानुसार करते रहनेसेही कोई मनुष्य जन्म-मरणके चक्करसे मुक्त हो जायगा ? और यदि कहा जाय कि वह मुक्त हो जाता है, तो फिर ज्ञानकी बड़ाई और योग्यताही क्या रही ? ज्ञानकांड अर्थात् उपनिषदोंका साफ़ यही कहना है, कि जब तक ब्रह्मात्मैक्य-ज्ञान होकर कर्मके विषयमें विरक्ति न हो जाय, तब तक नामरूपात्मक मायासे या जन्म-मरणके चक्करमे छुटकारा नहीं मिल सकता । और श्रौतस्मार्त-धर्मको देखो तो यही मालूम पड़ता है, कि प्रत्येक मनुष्यका गार्हस्थ्य- धर्म कर्मप्रधान या व्यापक अर्थमें यज्ञमय है। इसके अतिरिक्त वेदोंकाभी स्पष्ट कथन है, कि यज्ञार्थ किये गये कर्म बंधक नहीं होते; और यज्ञसेही स्वर्गप्राप्ति होती है। स्वर्गकी चर्चा छोड़ जाय; तोभी हम देखते हैं, कि ब्रह्मदेवहीने यह नियम बना दिया है, कि इंद्र आदि देवताओंके संतुष्ट हुए विना वर्षा नहीं होती; और यज्ञके विना देवतागणभी संतुष्ट नहीं होते। ऐसी अवस्थामें यज्ञ अर्थात् कर्म किये बिना मनुष्यकी भलाईभी कैसे होगी ? इस लोकके क्रमके विषयमें मनुस्मृति, महाभारत, उपनिषद् तथा गीतामेंभी कहा है, कि :- अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते । आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः ॥ “ यज्ञमें हवन किये गये सब द्रव्य अग्निद्वारा सूर्यको पहुंचते हैं, और सूर्यसे पर्जन्य और पर्जन्यसे अन्न तथा अन्नसे प्रजा उत्पन्न होती है” (मनु. ३. ७६; महा. शां. २६२. ११; मैत्र्यु. ६. ३७; गी. ३. १४) । और जब कि ये यज्ञ कर्मके द्वाराही होते हैं, तब कर्मको छोड़ देनेसे काम कैसे चलेगा ? यज्ञमय कर्मोंको छोड़ देनेसे संसारका चक्र बंद हो जायगा; और किसीको खानेकोभी नहीं मिलेगा । इसपर भागवतधर्म तथा गीताशास्त्रका उत्तर यह है, कि यज्ञ-याग आदि वैदिक कर्मोंको या अन्य किसीभी स्मार्त तथा व्यावहारिक यज्ञमय कर्मोंको छोड़ देनेका उपदेश हम नहीं करते । हम तो तुम्हारेही समान यहभी कहनेको तैयार हैं, कि जो यज्ञ-चक्र पूर्व-कालसे बराबर चलता आया है, उसके बंद हो जानेसे संसारका नाश हो जायगा । इसलिये हमारा यही सिद्धान्त है, कि इस कर्ममय यज्ञको कभी नहीं छोड़ना चाहिये (महा. शां. ३४०; गीता ३. १६) । परंतु ज्ञानकांडमें अर्थात् उपनिषदोंमेंही स्पष्टरूपसे कहा
२९६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र गया है, कि ज्ञान और वैराग्यसे कर्मक्षय हुए बिना मोक्ष नहीं मिल सकता, इसलिये इन दोनों सिद्धान्तोंका मेल करके हमारा अंतिम कथन यह है, कि सब कर्मोंको ज्ञानसे अर्थात् फलाशा छोड़कर निष्काम या विरक्त-बुद्धिसे करते रहना चाहिये । (गीता ३. १७, १९) । यदि तुम स्वर्गफलकी काम्य-बुद्धि मनमें रखकर ज्योतिष्टोम आदि यज्ञयाग करोगे, तो वेदोंमें कहे अनुसार स्वर्ग-फल तुम्हें निस्संदेह मिलेगा; क्योंकि वेदाज्ञा कभीभी झूठ नहीं हो सकती । परंतु स्वर्ग-फल नित्य अर्थात् हमेशा टिकने- वाला नहीं है । इसलिये उपनिषदोंमें कहा गया है (बृ. ४. ४. ६ ; वे. सू. ३. १. ८ ; मभा. वन. २६०. ३९ ) :- प्राप्यान्तं कर्मणस्तस्य यत्किञ्चेह करोत्ययम् । तस्माल्लोकात्पुनरेत्यस्मै लोकाय कर्मणे ॥ * “ इस लोकमें यज्ञ-याग आदि जो पुण्य-कर्म किये जाते हैं, उनका फल स्वर्गीय उप- भोगसे समाप्त हो जाता है; और तब यज्ञ करनेवाले कर्मकांडी मनुष्यको स्वर्गलोकसे इस कर्मलोक अर्थात् भूलोकमें फिरभी आना पड़ता है।” छांदोग्योपनिषद्में ( छां. ५. १०. ३-९ ) तो स्वर्गसे नीचे आनेका मार्गभी बतलाया गया है । भगवद्- गीतामें “ कामात्मानः स्वर्गपराः ” या “ त्रैगुण्यविषया वेदाः ” (गीता २. ४३, ४५) इस प्रकार जो कुछ गौणत्वसूचक वर्णन किया गया है, वह इन्हीं कर्मकांडी लोगोंको लक्ष्य करके कहा गया है और नौवें अध्यायमें फिरसे स्पष्टतया कहा गया है, कि “ गतागतं कामकामा लभन्ते ।” ( गीता ९. २१ ) – उन्हें स्वर्गलोक और इस लोकमें बार बार आना-जाना पड़ता है। यह आवागमन ज्ञानप्राप्तिके बिना रुक नहीं सकता और जब तक यह रुक नहीं सकता, तब तक आत्माको सच्चा समाधान, पूर्णावस्था या मोक्षभी नहीं मिल सकता । इसलिये गीताके समस्त उपदेशका सार यही है, कि यज्ञ-याग आदिकी कौन कहे ? – चातुर्वर्ण्यके सब कर्मोंकोभी तुम ब्रह्मात्मैक्यपर – ज्ञानसे तथा साम्यबुद्धिसे आसक्ति छोड़कर करते रहो, तो बस इस प्रकार कर्मचक्रको जारी रखकरभी तुम मुक्तही बने रहोगे ( गीता १८. ५, ६) । किसी देवताके नामसे तिल, चावल या किसी पशुको ‘ इदं अमुकदेवतायै न मम ’ कहकर अग्निमें हवन कर देनेसेही कुछ यज्ञ नहीं हो जाता । प्रत्यक्ष पशुको मारनेकी अपेक्षा प्रत्येक मनुष्यके शरीरमें काम-क्रोध आदि जो अनेक पशुवृत्तियाँ हैं, उनका साम्यबुद्धिरूप संयमाग्निमें होम करनाही अधिक श्रेयस्कर यज्ञ है ( गीता ४. ३३ ) । इसी अभिप्रायसे गीतामें तथा नारायणीय धर्ममें भगवान्ने कहा है, कि “ मैं यज्ञोंमें जपयज्ञ ” अर्थात् श्रेष्ठ हूँ ( गीता १०. २५, मभा. शां. ३. ३७) ।
- इस मंत्रके दूसरे चरणको पढ़ते समय ‘पुनरेति’ और ‘अस्मै’ ऐसा पदच्छेद करके पढ़ना चाहिये । तब इस चरणमें अक्षरोंकी कमी नहीं मालूम होगी । वैदिक ग्रंथोंको पढ़ते समय ऐसा बहुधा करना पड़ता है ।
कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २९७ मनुस्मृति ( मनु. २. ८७ ) मेंभी कहा गया है, कि ब्राह्मण और कुछ करे, या न करे, परंतु वह केवल जपसेही सिद्धि पा सकता है। अग्निमें आहुति डालते समय 'न मम' - यह वस्तु मेरी नहीं है - कहकर उस वस्तुसे अपनी ममत्व-बुद्धिका त्याग दिखलाया जाता है - यही यज्ञका मुख्य तत्त्व है ; और दान आदिक कर्मोंकाभी यही बीज है । इसलिये यज्ञ-याग या दानादि कर्मोंकी योग्यताभी यज्ञके बराबर है । अधिक क्या कहा जाय, जिनमें अपना तनिकभी स्वार्थ नही है, ऐसे कर्मोंको शुद्ध बुद्धिसे करनेपर वे यज्ञही कहे जा सकते हैं। यज्ञकी इस व्याख्याका स्वीकार करने- पर निर्मम या निष्काम बुद्धिसे किये गये सब कर्म, व्यापक अर्थमें, एक महायज्ञही होंगे । और द्रव्यमय यज्ञको लागू होनेवाला मीमांसकोंका यह न्याय, कि 'यथार्थ किये गये कोईभी कर्म बंधक नहीं होते, ' उन सब निष्काम कर्मोंके लियेभी उपयोगी हो जाता है। इन कर्मोंकी करते समय फलाशाभी छोड़ दी जाती है, जिसके कारण स्वर्गका आना-जानाभी छूट जाता है; और इन कर्मोंको करने परभी अंतमें मोक्ष-स्वरूपी सद्गति मिल जाती है ( गीता ३. ९ ) । सारांश यह है, कि संसार यज्ञमय या कर्म- मय है सही; परंतु कर्म करनेवालोंके दो वर्ग होते हैं। पहले वे जो शास्त्रोक्त रीतिसे, पर फलाशा रखकर कर्म किया करते हैं ( कर्मकांडी लोग ) ; और दूसरे वे जो ज्ञानमे या निष्काम बुद्धिमे केवल कर्तव्य समझकर कर्म किया करते हैं ( ज्ञानी लोग ) । इस संबंधमें गीताका यह सिद्धान्त है, कि कर्मकांडियोंको स्वर्गप्राप्तिरूप अनित्य फल मिलता है; और ज्ञानसे अर्थात् निष्काम बुद्धिसे कर्म करनेवाले ज्ञानी पुरुषोंको मोक्षरूपी नित्य फल मिलता है। मोक्षके लिये कर्मोंके छोड़ने गीतामें कहींभी नहीं बतलाया गया है। इसके विपरीत अठारहवें अध्यायके आरंभमें स्पष्ट- तया बतला पुरुषोंको मोक्षरूपि नित्य फल मिलता है। मोक्षके लिये कर्मोंके छोड़ने गीतामें कहींभी नहीं बतलाया गया है। इसके विपरीत अठरावें अध्यायके आरंभमें स्पष्टतया बतला दिया है, कि 'त्याग = छोड़ना' शब्दसे गीतामें कर्मत्याग कभीभी नही समझना चाहिये; किंतु उसका अर्थ 'फलत्याग' ही सर्वत्र विवक्षित है। इस प्रकार कर्मकांडियों और कर्मज्ञानियोंको भिन्न भिन्न फल मिलते हैं और उन्हें पाके, प्रत्येकको मृत्युके वाद भिन्न भिन्न लोकोंमें भिन्न भिन्न मार्गोंसे जाना पड़ता है। उन्हीं मार्गोंको क्रमसे 'पितृयान' और 'देवयान' कहते हैं। ( शां. १७. १७. १६ ) ; और उपनिषदोंके आधारसे गीताके आठवें अध्यायमें इन्हीं दोनों मार्गोंका वर्णन किया गया है। वह मनुष्य, जिसको ज्ञान हो गया है - और यह ज्ञान कम-से-कम अंतकालमें तो अवश्यही हो गया हो ( गीता २. ७२ ) - देहपात होनेके अनंतर और चितामें उसके शरीरके जल जानेपर, उस अग्निमे ज्योति ( ज्वाला ), दिवस, शुक्लपक्ष और उत्तरायणके छः महीने, इनमेंसे प्रयाण करता हुआ ब्रह्मपदको जा पहुँचता है; और वहाँ उसे मोक्ष प्राप्त होता है; जिसके कारण वह पुनः जन्म ले कर मृत्युलोकमें फिर नही लौटता। परंतु जो केवल कर्मकांडी है, अर्थात् जिसे ज्ञान
२९८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
नहीं है, वह उसी अग्निसे धुआँ, रात्रि, कृष्णपक्ष और दक्षिणायनके छः महीने इस क्रमसे प्रयाण करता हुआ चंद्रलोकको पहुँचता है; और अपने किये हुए सब पुण्यकर्मोंको भोग करके फिर इस लोकमें जन्म लेता है - इन दोनों मार्गोंमें यही भेद है (गीता ८. २३-२७) । 'ज्योति' (ज्वाला) शब्दके बदले उपनिषदोंमें 'अर्चिः' (ज्वाला) शब्दका प्रयोग किया गया है, जिससे पहले मार्गको 'अर्चिरादि' और दूसरेको, 'धूमादि' मार्गभी कहते हैं। हमारा उत्तरायण उत्तर ध्रुवस्थलमें रहनेवाले देवताओंका दिन है, और हमारा दक्षिणायन उनकी रात्रि है। इस परि- भाषापर ध्यान देनेसे मालूम हो जाता है, कि इन दो मार्गोंमेंसे पहला - अर्चिरादि (ज्योतिरादि) - मार्ग आरंभसे अंततक प्रकाशमय है; और दूसरा - धूमादि
- मार्ग अंधकारमय है। ज्ञान प्रकाशमय है; और परब्रह्म "ज्योतिषां ज्योतिः" (गीता १३. १७) - तेजोंका तेज है, इसलिये देहपात होनेके अनंतर, ज्ञानी पुरुषोंके मार्गका प्रकाशमय होना उचितही है, और गीतामें इन दो मार्गोंको 'शुक्ल' और 'कृष्ण' इसीलिये कहा है, कि उनकाभी अर्थ प्रकाशमय और अंधकारमय है। गीतामें उत्तरायणके बादके सोपानोंका वर्णन नहीं है। परंतु यास्कके निरुक्तमें उदगयनके बाद देवलोक, सूर्य, वैद्युत और मानस पुरुषका वर्णन है (निरुक्त. १४. ९)। और उपनिषदोंमें देवयानके विषयमें जो वर्णन है, उनकी एकवाक्यता करके वेदान्तसूत्रमें यह क्रम दिया है, कि उत्तरायणके बाद संवत्सर, वायुलोक, सूर्य, चंद्र, विद्युत्, वरुणलोक, इंद्रलोक, प्रजापतिलोक और अंतमें ब्रह्मलोक है (बृ. ५. १०; ६. २. १५; छां. ५. १०; कौषी. १. ३; वे. सू. ४. ३. १-६)। देवयान और पितृयाण मार्गोंके सोपानों या मुकामोंका वर्णन हो चुका। परंतु इनमें जो दिवस, शुक्लपक्ष, उत्तरायण इत्यादिके वर्णन हैं, उनका सामान्य अर्थ कालवाचक होता है। इसलिये सहजही यह प्रश्न उपस्थित होता है, कि क्या देवयान और पितृयाण मार्गोंका कालसे कुछ संबंध है? अथवा पहले कभी था, या नहीं? यद्यपि दिवस, रात्रि, शुक्लपक्ष इत्यादि शब्दोंका अर्थ कालवाचक है; तथापि अग्नि, ज्वाला, वायुलोक, विद्युत् आदि जो अन्य सोपान हैं, उनका अर्थ कालवाचक नहीं हो सकता। और यदि माना जाय, कि ज्ञानी पुरुषको, दिन अथवा रातके समय मरनेपर, भिन्न भिन्न गति मिलती है, तब तो ज्ञानका कुछ महत्त्वही नहीं रह जाता। इसलिये अग्नि, दिवस, उत्तरायण इत्यादि सभी शब्दोंको कालवाचक न मानकर वेदान्तसूत्रमें यह सिद्धान्त किया गया है, कि ये शब्द इनके अभिमानी देवताओंके लिये कल्पित किये गये हैं, जो ज्ञानी और कर्मकांडी पुरुषोंके आत्माको भिन्न भिन्न मार्गोंसे ब्रह्मलोक और चंद्रलोकमें ले जाते हैं (वे. सू. ४. २. १९-२१; ४. ३. ४)। परंतु इसमें संदेह है, कि भगवद्गीताको यह मत मान्य है या नहीं। क्योंकि उत्तरायणके बादके उन सोपानोंका - कि जो कालवाचक नहीं हैं - गीतामें वर्णन नहीं है। इतनाही नहीं; बल्कि इन मार्गोंको बतलानेके पहले भगवान्ने कालका
कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २९९ स्पष्ट उल्लेख इस प्रकार किया है, कि "मैं तुझे वह काल बतलाता हू कि जिस कालमें मरनेपर कर्मयोगी लौटकर आता है, या नहीं आता है" (गीता ८, २३) । और महाभारतमेंभी यह वर्णन पाया जाता है, कि जब भीष्म पितामह शरशय्यामें पड़े थे, तब वे शरीरत्याग करनेके लिये उत्तरायणकी - अर्थात् सूर्यके उत्तरकी ओर मुड़नेकी - प्रतीक्षा कर रहे थे (महा. भी. १२०; अनु. १६७) । इससे विदित होता है, कि दिवस, शुक्लपक्ष और उत्तरायण, ये कालही मृत्यु होनेके लिये कभी-न- कभी प्रशस्त माने जाते थे । ऋग्वेद (ऋ. १०. ८८. १५ और बृ. ६. २. १५) मेंभी देवयान और पितृयाण मार्गोंका जहाँपर वर्णन है, वहाँ कालवाचक अर्थही विवक्षित है। इससे तथा अन्य अनेक प्रमाणोंसे हमने यह निश्चय किया है कि, उत्तर गोलार्धके जिस स्थानमें सूर्य क्षितिजपर छः महीनेतक हमेशा दीख पड़ता है, उस स्थानमें अर्थात् उत्तर ध्रुवके पास या मेरुस्थानमें जब पहले वैदिक ऋषियोंकी बस्तीथी तभीसे छ. महीनेका उत्तरायणरूपी प्रकाशकाल मृत्यु होनेके लिये प्रशस्त माना गया होगा। इस विषयका विस्तृत विवेचन हमने अपने दूसरे ग्रंथमें किया है। कारण चाहे कुछभी हो, इसमें संदेह नहीं कि यह समझ बहुत प्राचीन कालसे चली आयी है; और यही समझ देवयान तथा पितृयाण मार्गोंमें प्रकटरूप, न हो, तोभी पर्यायसे - अंतर्भूत हो गई है। अधिक क्या कहें, हमें तो ऐसा मालूम होता है कि इन दोनों मार्गोंका मूल इस प्राचीन समझमेंही है। यदि ऐसा न माने, तो गीतामें देवयान और पितृयाणको लक्ष्य करके जो एक बार 'काल' (गीता ८. २३) और दूसरी बार 'गति' या 'सृति' अर्थात् मार्ग (गीता ८. २६, २७) कहा है, यानी इन दो भिन्न भिन्न अर्थोंके शब्दोंका जो प्रयोग किया गया है, उसकी कुछ उपपत्ति नहीं लगाई जा सकती । वेदान्तसूत्रके शांकरभाष्यमें देवयान और पितृयाणका कालवाचक अर्थ स्मार्त है, जो कर्मयोगके लियेही उपयुक्त होता है, और यह भेद करके, कि सच्चा ब्रह्मज्ञानी उपनिषदोंमें वर्णित श्रौत मार्गसे, अर्थात् देवताप्रयुक्त प्रकाशमय मार्गसेही, ब्रह्मलोकको जाता है; 'कालवाचक' तथा 'देवतावाचक' अर्थोंकी व्यवस्था की गई है (वे. सू. शां. भा. ४. २. १८-२१) । परंतु मूल सूत्रोंको देखनेसे ज्ञात होता है, कि कालकी अपेक्षा न रख उत्तरायणादि शब्दोंसे देवताओंको कल्पितकर देवयानका जो देवतावाचक अर्थ बादरायणाचार्यने निश्चित किया है, वही उनके मतानुसार सर्वत्र अभिप्रेत होगा; और यह माननाभी उचित नहीं है, कि गीतामें वर्णित मार्ग उपनिषदोंकी इस देवयान गतिको छोड़कर स्वतंत्र हो सकता है। परंतु यहाँ इतने गहरे पानीमें पैठनेकी कोई आवश्यकता नहीं है; क्योंकि यद्यपि इस विषयमें मतभेद हो, कि देवयान और पितृयाणके दिवस, रात्रि, उत्तरायण आदि शब्द ऐतिहासिक दृष्टिसे मूलारंभमें कालवाचकही थे या नहीं; तथापि यह बात निर्विवाद है, कि आगे यह कालवाचक अर्थ छोड़ दिया गया और अंतमें देवयान और पितृयाण, इन दोनों पदोंका यही अर्थ निश्चित तथा रूढ़ हो गया है, कि - कालकी अपेक्षा न रख चाहे कोई किसी
३०० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र समय मरे – यदि वह ज्ञानी हो तो अपने कर्मानुसार प्रकाशमय मार्गसे, और केवल कर्मकांडी हो तो अंधकारमय मार्गसे, परलोकको जाता है। चाहे फिर दिवस और उत्तरायण आदि शब्दोंसे बादरायणाचार्यके कथनानुसार देवता समझिये; या लक्षणासे प्रकाशमय मार्गके क्रमशः बढ़ते हुए सोपान समझिये; परंतु इससे इस सिद्धान्त में कुछ भेद नहीं होता, कि यहाँ देवयान और पितृयाण शब्दोंका रूढार्थ मार्गवाचक है। परंतु क्या देवयान और क्या पितृयाण, दोनों मार्ग शास्त्रोक्त अर्थात् पुण्यकर्म करनेवालेकोही प्राप्त हुआ करते हैं; क्योंकि पितृयाण यद्यपि देवयानसे नीचेकी श्रेणीका मार्ग है, तथापि वहभी चंद्रलोकको अर्थात् एक प्रकारके स्वर्गलोकहीको पहुँचानेवाला मार्ग है। इसलिये प्रकट है, कि वहाँ सुख भोगनेकी पात्रता होनेके लिये इस लोकमें कुछ न कुछ शास्त्रोक्त पुण्यकर्म अवश्यही करना पड़ता है (गीता ९. २०, २१)। अतः जो लोग थोड़ाभी शास्त्रोक्त पुण्यकर्म न करके संसारमें अपना समस्त जीवन पापाचरणमें बिता देते हैं, वे इन दोनोंमेंसे किसीभी मार्गसे नहीं जा सकते। इनके विषयमें उपनिषदोंमें स्पष्ट कहा गया है, कि ये लोग मरनेपर एकदम पशु-पक्षी आदि तिर्यक्-योनिमें जन्म लेते हैं और बारंबार यमलोक अर्थात् नरकमें जाते हैं। इसीको 'तीसरा' मार्ग कहते हैं। (छा. ५. १०. ८; कठ. २. ६. ७); और भगवद्गीतामेंभी कहा गया है, कि निपट पापी अर्थात् आसुरी पुरुषोंको यही-निरय-गति प्राप्त होती है (गीता १६. १९–२१; ९. १२.; वे. सू. ३. १. १२, १३; निरुक्त १४. ९)। ऊपर इस बातका विवेचन किया गया है, कि मरनेपर मनुष्यको उसके कर्मा- नुरूप वैदिक धर्मके प्राचीन परंपरानुसार तीन प्रकारकी गति किस क्रमसे प्राप्त होती है। इनमेंसे केवल देवयान मार्गही मोक्षदायक है; परंतु यह मोक्ष क्रम-क्रमसे अर्थात् एकके बाद एक, अर्चिरादि कई सोपान चढ़नेपर अंतमें मिलता है। इसलिये इस मार्गको 'क्रममुक्ति' कहते हैं। और देहपात होनेके अनंतर अर्थात् मृत्युके अनंतर ब्रह्मलोकमें जानेसे वहाँ अंतमें मुक्ति मिलती है; इसीलिये इसे 'विदेह-मुक्ति'भी कहते हैं। परंतु इन सब बातोंके अतिरिक्त शुद्ध अध्यात्मशास्त्रका यहभी कथन है, कि जिसके मनमें ब्रह्म और आत्माके एकत्वका पूर्ण साक्षात्कार नित्य जागृत है, उसे ब्रह्मप्राप्तिके लिये कहीं दूसरी जगह क्यों जाना पड़ेगा ? अथवा उसे मृत्यु-कालकीभी बाँट क्यों जोहनी पड़ेगी ? यह बात सच है, कि उपासनाके लिये स्वीकृत किये गये सूर्यादि प्रतीकोंको अर्थात् सगुण ब्रह्मकी उपासनासे जो ब्रह्मज्ञान होता है, वह पहले पहल कुछ अपूर्ण रहता हैं; क्योंकि उससे मनमें सूर्यलोक या ब्रह्मलोक इत्यादिकी कल्पनाएँ उत्पन्न हो जाती हैं और इनके मरण-समयमेंभी मनमें न्यूनाधिक परिमाणके बने रहनेकी संभावना होती हैं। अतएव यह कहना उचित है कि इस अपूर्णताको दूर करके मोक्षकी प्राप्तिके लिये ऐसे लोगोंको देवयान मार्गसेही जाना पड़ता है (वे. सू. ४. ३ १५)। क्योंकि अध्यात्मशास्त्रका यह अटल सिद्धान्त है,
कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य ३०१ कि मरण-समयमें जिसकी जैसी भावना या ऋतु हो, उसे वैसीही 'गति' मिलती है (छां. ३. १४. १); परंतु सगुण उपासना या अन्य किसी कारणसे जिसके मनमें अपने आत्मा और ब्रह्मके बीच कुछभी परदा या द्वैतभाव (तै. २. ७) शेष नहीं रह जाता, वह सदैव ब्रह्म-रूपीही है। अतएव प्रकट है, कि, ऐसे पुरुषको ब्रह्म-प्राप्तिके लिये किसी दूसरे स्थानमें जानेकी कोई आवश्यकता नहीं है। इसीलिये बृहदारण्यकमें याज्ञवल्क्यने जनकसे कहा है, कि जो पुरुष शुद्ध ब्रह्मज्ञानसे पूर्ण निष्काम हो गया हो – “न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति” – उसके प्राण दूसरे किसीभी स्थानमें नहीं जाते; किंतु वह नित्य ब्रह्मभूत है और ब्रह्ममेही लय पाता है (बृ. ४. ४. ६); और बृहदारण्यक तथा कठ, इन दोनों उपनिषदोंमें कहा गया है, कि ऐसा पुरुष “अत्र ब्रह्म समश्नुते” (कठ. ६. १४) – यहींका यहीं ब्रह्मका अनुभव करता है। इन्हीं श्रुतियोंके आधारपर शिवगीतामेंभी कहा गया है, कि मोक्षके लिये स्थानांतर करनेकी आवश्यकता नहीं होती। ब्रह्म कोई ऐसी वस्तु नहीं है, कि जो अमुक स्थानमें हो और अमुक स्थानमें न हो (छां. ७. २५; मुं. २. २. ११)। तो फिर पूर्ण ज्ञानी पुरुषको कभीभी पूर्ण ब्रह्म-प्राप्तिके लिये उत्तरायणसे सूर्यलोक आदि मार्गसे जानेकी आवश्यकता क्यों होनी चाहिये ? “ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति” (मुं. ३. २. ९) – जिसने ब्रह्मस्वरूपको पहचान लिया; वह तो स्वयं इस लोकमें था – यहींका यहीं, ब्रह्म – हो गया। क्योंकि किसी एकका दूसरेके पास जाना तभी हो सकता है, जब 'एक' और 'दूसरा' ऐसा स्थलकृत या कालकृत भेद शेष हो; और यह भेद तो अंतिम स्थितिमें अर्थात् अद्वैत तथा श्रेष्ठ ब्रह्मानुभवमें रहही नहीं सकता। इसलिये जिसके मनकी ऐसी नित्य स्थिति हो चुकी है, कि “यस्य सर्वमात्मैवाऽभूत्” बृ. २. ४. १४), या “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” (छां. ३. १४. १), अथवा मैंही ब्रह्म हूँ – “अहं ब्रह्माऽस्मि”(बृ. १. ४. १०), वह ब्रह्म- प्राप्तिके लिये और किस जगह जायेगा ? वह तो नित्य ब्रह्मभूतहो रहता है। पिछले प्रकरणके अंतमें जैसे हमने कहा है, वैसेही गीतामें परम ज्ञानी पुरुषोंका वर्णन इस प्रकार किया गया है, कि “अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्” (गीता ५. २६) – जिन्होंने द्वैतभावको छोड़कर आत्मस्वरूपको जान लिया है, उन्हें चाहे प्रारब्ध-कर्म-क्षयके लिये देहपात होनेकी राह देखनी पड़े, तोभी उन्हें मोक्ष-प्राप्तिके लिये कहींभी नहीं जाना पड़ता; क्योंकि ब्रह्मनिर्वाणरूप मोक्ष तो उनके सामने हाथ जोड़े खड़ा रहता है। अथवा “इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः” (गीता ५. १९)। – जिनके मनमें सर्वभूतांतर्गत ब्रह्मात्मैक्यरूपी साम्य प्रति- बिंबित हो गया है वे (देवयान मार्गकी अपेक्षा न रख) यहींके यहीं जन्म-मरणको जीत लेते हैं। अथवा “भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति” – जिसकी ज्ञानदृष्टिमें समस्त प्राणियोंकी भिन्नताका नाश हो चुका है और जिसे वे सब एकस्थ अर्थात् परमेश्वर- स्वरूप दीखने लगते हैं, वह 'ब्रह्म संपद्यते' – ब्रह्ममेंही मिल जाता है (गीता १३.
३०२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र ३०)। गीताका जो वचन ऊपर दिया गया है, कि "देवयान और पितृयाण मार्गोंको तत्त्वतः जाननेवाला कर्मयोगी मोहको प्राप्त नहीं होता" (गीता ८. २१); उसमेंभी "तत्त्वतः जाननेवाला" पदका अर्थ "परमावधिके ब्रह्मस्वरूपको पहचाननेवाला" ही विवक्षित है (भागवत ७. १५. ५६)। यही पूर्ण ब्रह्मभूत या परमावधिकी ब्राह्मी स्थिति है; और श्रीमच्छंकराचार्यने अपने शारीरक भाष्यमें (वे. सू. ३. ४. १४) प्रतिपादन किया है, कि यही अध्यात्मज्ञानकी अत्यंत परा- काष्ठा या पूर्णावस्था है। यदि कहा जाय, कि ऐसी स्थिति प्राप्त होनेके लिये मनुष्यको एक प्रकारसे परमेश्वरही हो जाना पड़ता है, तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। और फिर यह कहनेकी आवश्यकता नहीं, कि इस रीतिसे जो पुरुष ब्रह्मभूत हो जाते हैं, कर्मसृष्टिके सब विधि-निषेधोंकी अवस्थासेभी परे रहते हैं; क्योंकि उनका ब्रह्मज्ञान सदैव जागृत रहता है और इसलिये जो कुछ वे किया करते हैं, वह हमेशाही शुद्ध और निष्काम बुद्धिसेही प्रेरित अतएव पाप-पुण्यसे अलिप्त रहता है। इस स्थितिकी प्राप्ति हो जानेपर ब्रह्मप्राप्तिके लिये किसी अन्य स्थानमें जानेकी, अथवा देहपात होनेकी, अर्थात् मरनेकीभी कोई आवश्यकता नहीं रहती, इसलिये ऐसे स्थितप्रज्ञ ब्रह्मनिष्ठ पुरुषको 'जीवन्मुक्त' कहते हैं (यो. ३. ०)। यद्यपि बौद्ध धर्मके लोग ब्रह्म या आत्माको नहीं मानते, तथापि उन्हें यह बात पूर्णतया मान्य है, कि मनुष्यका परम साध्य जीवन्मुक्तकी यह निष्काम अवस्थाही है; और इसी तत्त्वका संग्रह उन्होंने, कुछ शब्दभेदसे, अपने धर्ममें किया है (परिशिष्ट प्रकरण देखो) बहुतेरे लोगोंका कथन है, कि पराकाष्ठाके निष्कामत्वकी इस अवस्थामें और सांसारिक कर्मोंमें निमग्नकेही परस्पर-विरोध है; इसलिये जिसे यह अवस्था प्राप्त होती है, उसके सब कर्म आपही आप छूट जाते हैं और वह संन्यासी हो जाता है। परंतु गीताको यह मत मान्य नहीं है; और उसका यही सिद्धान्त है, कि स्वयं परमेश्वर जिस प्रकार कर्म करता है, उसी प्रकार जीवन्मुक्तके लियेभी- निष्काम बुद्धिसे लोकसंग्रहके निमित्त- मृत्युपर्यंत सब व्यवहारोंको करते रहनाही अधिक श्रेयस्कर है; क्योंकि निष्कामत्व और कर्ममें कोई विरोध नहीं है। यह बात अगले प्रकरणके निरूपणमें स्पष्ट हो जायगी। गीताका यह तत्त्व योगवासिष्ठ (यो. ६. उ. १९९) मेंभी स्वीकृत किया गया है!
ग्यारहवाँ प्रकरण संन्यास और कर्मयोग संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ । तयोस्तु कर्मसंन्यासात् कर्मयोगो विशिष्यते ॥ *
- गीता ५. २ पिछले प्रकरणमें इस बातका विस्तृत विचार किया गया है, कि अनादि कर्मके चक्करोंसे छूटनेके लिये प्राणिमात्रमें एकत्वसे रहनेवाले परब्रह्मका अनुभवात्मक ज्ञान होनाही एकमात्र उपाय है; और यह विचारभी किया गया है, कि इस अमृत ब्रह्मका ज्ञान संपादन करनेके लिये मनुष्य स्वतंत्र है या नहीं, एवं इस ज्ञानकी प्राप्तिके लिये मायासृष्टिके अनित्य व्यवहार अथवा कर्म वह किस प्रकार करे । अंतमें यह सिद्ध किया है, कि बंधन कुछ कर्मका धर्म या गुण नही है; किंतु मनका है। इसलिये व्यावहारिक कर्मोंके फलके बारेमें जो अपनी आसक्ति होती है, उसे इंद्रिय-निग्रहसे धीरे धीरे घटा कर, शुद्ध अर्थात् निष्काम बुद्धिसे कर्म करते रहनेपर, कुछ समयके बाद साम्यबुद्धिरूप आत्मज्ञान देहेंद्रियोंमें समा जाता है; और अंतमें पूर्ण सिद्धि प्राप्त हो जाती है । इस प्रकार इस बातका निर्णय हो गया, कि मोक्षरूपी परम साध्य अथवा आध्यात्मिक पूर्णावस्थाकी प्राप्तिके लिये किस साधन या उपायका अवलंबन करना चाहिये । इस प्रकारके बर्तावसे, अर्थात् यथाशक्ति और यथाधिकार निष्काम कर्म करनेसे, जब कर्मका बंधन छूट जाय तथा चित्तशुद्धि द्वारा अंतमें पूर्ण ब्रह्मज्ञान प्राप्त हो जाय; तब यह महत्त्वका प्रश्न उपस्थित होता है, कि अब आगे अर्थात् सिद्धावस्था में ज्ञानी और स्थितप्रज्ञ पुरुष कर्मही करता रहे, अथवा प्राप्य वस्तुको पा कर कृतकृत्य हो, माया-सृष्टिके सब व्यवहारोंको निरर्थक और ज्ञानविरुद्ध समझ कर, एकदम उनका त्याग कर दे ? क्योंकि सब कर्मोंको बिलकुल छोड़ देना (कर्म- संन्यास), या उन्हें निष्काम बुद्धिसे मृत्यपर्यंत करते जाना (कर्मयोग), ये दोनों
- “संन्यास और कर्मयोग, दोनों निःश्रेयस्कर अर्थात् मोक्षदायक हैं; परंतु इन दोनोंमें कर्मसंन्यासकी अपेक्षा कर्मयोगही अधिक श्रेष्ठ है।” दूसरे चरणके 'कर्म-संन्यास' पदसे प्रकट होता है, कि पहले चरणके, संन्यास शब्दका क्या अर्थ करना चाहिये । गणेश-गीताके चौथे अध्यायके आरंभमें गीताके ये प्रश्नोत्तर लिये गये हैं । वहाँ यह श्लोक थोड़े शब्दभेदसे इस प्रकार आया है - “क्रियायोगो वियोगश्चाप्युभौ मोक्षस्य साधने । तयोर्मध्ये क्रियायोगस्त्यागात्तस्य विशिष्यते ॥”
३०४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
पक्ष तर्कदृष्टिसे इस स्थानपर संभव होते हैं। और इनमेंसे जो पक्ष श्रेष्ठ सिद्ध होगा, उसीकी ओर ध्यान दे कर पहलेसे (अर्थात् साधनावस्थासेही) बर्ताव करना सुविधाजनक होगा, इसलिये उक्त दोनों पक्षोंके तारतम्यका विचार किये बिना कर्म और अकर्मका कोईभी आध्यात्मिक विवेचन पूरा नहीं हो सकता। अर्जुनसे सिर्फ़ यह कह देनेसे काम नहीं चल सकता था, कि पूर्ण ब्रह्मज्ञान प्राप्त हो जानेपर कर्मोंका करना और न करना एक-सा है (गीता ३. १८); क्योंकि समस्त व्यव- हारोंमें कर्मकी अपेक्षा बुद्धिकी श्रेष्ठता होनेके कारण, ज्ञानसे जिसकी बुद्धि समस्त भूतोंमें सम हो गई है, उसे आगे किसीभी कर्मके शुभाशुभत्वका लेप नहीं लगता (गीता ४. २०, २१)। भगवानका तो उसे यही निश्चित उपदेश था कि – युद्धही कर – युध्यस्व ! (गीता २. १८); और इस खरे तथा स्पष्ट उपदेशके समर्थनमें ज्ञान हो जानेपर “लड़ाई करे तो अच्छा, न करे तोभी अच्छा;” ऐसी संदिग्ध उप- पत्तिकी अपेक्षा और दूसरे कुछ सबल कारणोंका बतलाना आवश्यक था। और तो क्या, गीताशास्त्रकी प्रवृत्ति यह बतलानेके लियेही हुई है, कि किसी कर्मका भयंकर परिणाम दृष्टिके सामने देखते रहनेपरभी बुद्धिमान् पुरुष उसेही क्यों करे। गीताकी यही तो विशेषता है। यदि यह सत्य है, कि कर्मसे जंतु बँधता है और ज्ञानसे मुक्त होता है, तो ज्ञानी पुरुषको कर्म करनाही क्यों चाहिये ? कर्म-क्षयका अर्थ कर्मोंका छोड़ना नहीं है; केवल फलाशा छोड़ देनेसेही कर्मका क्षय हो जाता है, सब कर्मोंको छोड़ देना शक्य नहीं है; इत्यादि सिद्धान्त यद्यपि सत्य हों, तथापि इससे भली भाँति यह सिद्ध नहीं होता, कि जितने कर्म छूट सकें, उतनेभी क्यों न छोड़े जायें। और न्यायसे देखने परभी, यही अर्थ निष्पन्न होता है; क्योंकि गीतामेंही कहा है, कि चारों ओर पानीही पानी हो जाने पर जिस प्रकार फिर कोई उसके लिये कुएँकी खोज नहीं करता, उसी प्रकार कर्मोंसे सिद्ध होनेवाली ज्ञानप्राप्ति हो चुकनेपर ज्ञानी पुरुषको कर्मकी कुछभी अपेक्षा नहीं रहती (गीता २. ४६)। इसीलिये तीसरे अध्यायके आरंभमें अर्जुनने श्रीकृष्णसे प्रथम यही पूछा है, कि आपके मतमें यदि कर्मकी अपेक्षा निष्काम अथवा साम्यबुद्धि श्रेष्ठ है, तो स्थितप्रज्ञके समान मैंभी अपनी बुद्धिको शुद्ध किये लेता हूँ – बस, तब फिरभी लड़ाईके इस घोर कर्ममें मुझे क्यों फँसाते हो ? (गीता ३. १) इस प्रश्नकाभी उत्तर देते हुए भगवान् ने “कर्म किसीकेभी छूट नहीं सकते” इत्यादि कारण बतला कर, चौथे अध्यायमें कर्मका समर्थन किया है। परन्तु सांख्य (संन्यास) और कर्मयोग, दोनोंही मार्ग यदि शास्त्रोंमें बतलाये गये हैं, तो यही कहना पड़ेगा, कि ज्ञानकी प्राप्ति हो जानेपर, इनमेंसे जिसे जो मार्ग अच्छा लगे, उसे वह स्वीकार कर ले। ऐसी दशामें, पाँचवें अध्यायके आरंभमें अर्जुनने फिर प्रार्थना की, कि गोलमाल करके दोनों मार्ग मुझे न बतलाइये; निश्चयपूर्वक मुझे एकही बात बतलाइये, कि इन दोनोंमेंसे अधिक श्रेष्ठ कौन है (गीता ५. १)। यदि ज्ञानोत्तर कर्म करना या न करना एकही सा है, तो फिर मैं अपनी इच्छासे जो
चाहे तो कर्म करूँगा, नहीं तो न करूँगा । यदि कर्म करनाही उत्तम पक्ष हो, तो मुझे उसका कारण समझाइये; तभी मैं आपके कथनानुसार आचरण करूँगा । अर्जुनका यह प्रश्न कुछ अपूर्व नहीं है । योगवासिष्ठमें ( यो. वा. ५. ५६. ६ ) श्रीरामचन्द्रने वसिष्ठसे और गणेशगीता ( ग. गी. ४. १ ) में वरेण्य राजाने गणेशजीसे यही प्रश्न किया है । केवल हमारेही यहाँ नहीं, वरन् यूरोपमें- जहाँ तत्त्वज्ञानके विचार पहले पहल शुरू हुए थे, उस ग्रीस देशमेंभी - प्राचीन कालमे यह प्रश्न उपस्थित हुआ था - यह बात अरिस्टाटलके ग्रंथसे प्रकट होती है । इस प्रसिद्ध यूनानी ज्ञानी पुरुषने अपने नीतिशास्त्रसंबंधी ग्रंथके अंत ( १०. ७, ८ ) में यही प्रश्न उपस्थित किया है और प्रथम अपना यह मत प्रकट किया है, कि संसारके या राजनैतिक मामलोंमें जीवन बितानेकी अपेक्षा ज्ञानी पुरुषको शांतिमे तत्त्वके विचारमें जीवन बितानाही सच्चा और पूर्ण आनंददायक है । तोभी उसके अनंतर लिखे, अपने राजधर्मसंबंधी ग्रंथ ( ७. २, ३ ) में अरिस्टाटलही लिखता है, कि “ कुछ ज्ञानी पुरुष तत्त्व-विचारमें, तो कुछ राजनैतिक कार्योंमें निमग्न दीख पड़ते है; और यदि पूछा जाय कि इन दोनों मार्गोंमेंसे कौन-सा बहुत अच्छा है, तो यही कहना पड़ेगा, कि प्रत्येक मार्ग अंशतः सच्चा है । तथापि, कर्मकी अपेक्षा अकर्मको अच्छा कहना भूल है । * क्योंकि, यह कहनेमें कोई हानि नहीं, कि आनंदभी तो एक कर्मही है; और सच्ची श्रेयःप्राप्तिभी अनेक अंशोंमें ज्ञानयुक्त तथा नीतियुक्त कर्मोंमेंही है - दो स्थानोंपर अरिस्टाटलके भिन्न भिन्न मतोंको देखकर, गीताके इस स्पष्ट कथनका महत्त्व पाठकोंके ध्यानमें आ जावेगा, कि “कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः” ( गीता ३. ८ ) - अकर्मकी अपेक्षा कर्म श्रेष्ठ है । गत शताब्द्दीका प्रसिद्ध फ्रेंच पंडित आगस्टस् कोंट अपने आधिभौतिक तत्त्वज्ञानमें कहता है - “ यह कहना भ्रांतिमूलक है, कि तत्त्वविचारहीमें निमग्न रह कर जीवन बिताना श्रेयस्कर है । और जो तत्त्वज्ञ पुरुष इस ढंगके आयुष्य क्रमको अंगीकार करता है और अपने हाथसे होने योग्य लोगोंका कल्याण करना छोड़ देता है, उसके विषयमे यही कहना चाहिये, कि वह अपने प्राप्त साधनोंका दुरुपयोग करता है । ” इसके विपरीत जर्मन तत्त्ववेत्ता शोपेनहरने कहा है, कि संसारके समस्त व्यवहार - यहाँतक कि जीवित रहनाभी - दुःखमय है; इसलिये तत्त्वज्ञान प्राप्तकर इन सब कर्मोंका, जितनी जल्दी हो सके, नाश करनाही इस संसारमे मनुष्यका सच्चा कर्तव्य है । कोंट सन १८५७ में और शोपेनहर सन १८६० में संसारसे विदा हुए । शोपेनहरका पंथ जर्मनीमें हार्टमेनने जारी रखा है । कहना नहीं होगा, कि स्पेन्सर और मिल प्रभृति अंग्रेज तत्त्वशास्त्रज्ञोंके मत कोंटके जैसे हैं ।
- “ And it is equally a mistake to place inactivity above action, for happiness is activity, and the actions of the just and wise are the realization of much that is noble. ” ( Aristotle's politics, trans. by Jowett, Vol. I, p. 212. The Italics are ours. ) गी. र. २०
३०६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र परंतु इन सबके आगे बढ़कर, हालहीके जमानेके आधिभौतिक जर्मन पंडित नित्शेने, अपने ग्रंथोंमें, कर्म छोड़नेवालोंपर ऐसे तीव्र कटाक्ष किये हैं, कि वह कर्मसंन्यास- पक्षवालोंके लिये 'मूर्ख-शिरोमणि' शब्दसे अधिक सौम्य शब्दका उपयोग करही नहीं सका है।* यूरोपमें अरिस्टाटलसे लेकर अबतक जिस प्रकार इस संबंधमें दो पक्ष हैं, उसी प्रकार भारतीय वैदिक धर्ममेंभी प्राचीन कालसे लेकर अबतक इस संबंधके दो संप्रदाय एकसे चले आ रहे हैं (मभा. शां. ३४९. ७)। इनमेंसे एकको संन्यास-मार्ग, सांख्य-निष्ठा या केवल सांख्य अथवा - ज्ञानमेंही नित्य निमग्न रहनेके कारण - ज्ञान-निष्ठाभी कहते हैं; और दूसरेको कर्मयोग, अथवा संक्षेपमें केवल योग या कर्म-निष्ठा कहते हैं। हम तीसरे प्रकरणमेंही कह चुके हैं, कि यहाँ 'सांख्य' और 'योग' शब्दोंसे तात्पर्य क्रमशः कापिल-सांख्य और पातंजल योगसे नहीं है; परंतु 'संन्यास' शब्दभी कुछ संदिग्ध है, इसलिये उसके अर्थका कुछ अधिक विवरण करना यहाँ आवश्यक है। 'संन्यास' शब्दका सिर्फ 'विवाह न करना' और यदि किया हो, तो "बाल-बच्चोंको छोड़ भगवे कपडे रंग लेना' अथवा 'केवल चौथे आश्रमका ग्रहण करना" इतनाही अर्थ यहाँ विवक्षित नहीं है। क्योंकि विवाह न करन परभी भीष्मपितामह मरते दमतक राज्यकार्योंके उद्योगमें लगे रहे; और श्रीमत् शंकराचार्यने ब्रह्मचर्यसे एकदम चौथा आश्रम ग्रहण कर, या महाराष्ट्र देशमें -श्रीसमर्थ रामदासने मृत्यूपर्यंत ब्रह्मचारी-गोस्वामी-रहकर, ज्ञानप्रचार करके संसारके उद्धारार्थ कर्म किये हैं। यहाँ पर मुख्य प्रश्न यही है, कि ज्ञानोत्तर संसारके व्यवहार केवल कर्तव्य समझकर लोक-कल्याणके लिये किये जावें अथवा मिथ्या समझ कर एकदम छोड़ दिये जावें ? इन व्यवहारों या कर्मोंको करनेवाला कर्मयोगी कहलाता है, फिर चाहे वह ब्याहा हो या क्वाँरा, भगवे कपड़े पहने या सफ़ेद । हाँ, यहभी कहा जा सकता है, कि ऐसे काम करनेके लिये विवाह न करना, भगवे कपड़े * कर्मयोग और कर्मत्याग (सांख्य या संन्यास), इन्हीं दो मार्गोंको सलीने अपने Pessimism नामक ग्रंथमें क्रमसे Optimism और Pessimism नाम दिये हैं; पर हमारी रायमें ये नाम ठीक नहीं हैं। Pessimism शब्दका अर्थ "उदास, निराशावादी या रोती सूरत" होता है। परंतु संसारको अनित्य समझ कर उसे छोड़ देनेवाले (संन्यासी) आनंदी रहते हैं और वे लोग संसारको आनंदसेही छोड़ते हैं; इसलिये हमारी रायमें, उनको Pessimist कहना ठीक नहीं हैं। इसके बदले कर्मयोगको Energism और सांख्य या संन्यास मार्गको Quietism कहना अधिक प्रशस्त होगा। वैदिक धर्मके अनुसार दोनों मार्गोंमें ब्रह्मज्ञान एकही-सा है, इसलिये दोनोंका आनंद और शांतिभी एकही-सी है। हम ऐसा भेद नहीं करते, कि एक मार्ग आनंदमय है और दूसरा दुःखमय है, अथवा एक आशावादी है, और दूसरा निराशावादी।
संन्यास और कर्मयोग ३०७ पहनना अथवा बस्तीसे बाहर विरक्त हो कर रहनाही कभी कभी विशेष मुभीतेका होता है। क्योंकि फिर कुटुंबके भरण-पोषणकी झंझट अपने पीछे न रहनेके कारण, अपना सारा समय और परिश्रम लोक-कार्योंमें लगा देनेके लिये कुछभी अड़चन नहीं रहती। ऐसे पुरुष भेषसे संन्यासी हों, तो भी वे तत्त्वदृष्टिसे कर्मयोगीही हैं। परंतु विपरीत पक्षमें – अर्थात् जो लोग इस संसारके समस्त व्यवहारोंको निस्सार समझ उनका त्याग करके चुपचाप बैठे रहते हैं – उन्हींको संन्यासी कहना चाहिये, फिर चाहे उन्होंने प्रत्यक्ष चौथा आश्रम ग्रहण किया हो या न किया हो। सारांश, गीताका कटाक्ष भगवे अथवा सफ़ेद कपड़ोंपर अथवा विवाह या ब्रह्मचर्यपर नहीं है; प्रत्युत इसी एक बातपर नज़र रखकर गीतामें संन्यास और कर्मयोग, इन दोनों मार्गोंका त्रिभेद किया गया है, कि ज्ञानी पुरुष जगत्के व्यवहार करता है या नहीं ? शेष बातें गीताधर्ममें तो महत्त्वकी नहीं हैं। संन्यास या चतुर्थाश्रम शब्दोंकी अपेक्षा कर्मसंन्यास अथवा कर्मत्याग, ये शब्द यहाँ अधिक अन्वर्थक और निःसंदिग्ध हैं। परंतु इन दोनोंकी अपेक्षा केवल संन्यास शब्दके व्यवहारकीही अधिक रीतिके कारण उसके पारिभाषिक अर्थका यहाँ विवरण किया गया है। जिन्हें इस संसारके व्यवहार निःसार प्रतीत होते हैं, वे उससे निवृत्त हो अरण्यमें जाकर स्मृतिधर्मा- नुसार चतुर्थाश्रममें प्रवेश करते हैं, इससे कर्मत्यागके इस मार्गको संन्यास कहते हैं। परंतु इसमें प्रधान भाग कर्मत्यागही है, गेरुए कपड़े नहीं। यद्यपि इस प्रकार इन दोनों पक्षोंका प्रचार है, कि पूर्ण ज्ञान होनेपर आगे कर्म करें ( कर्मयोग ) या कर्म छोड़ दें, ( कर्मसंन्यास ), तथापि गीताके सांप्रदायिक टीकाकारोंने अब यहाँ यह प्रश्न छेड़ा है, कि क्या अंतमें मोक्षप्राप्ति करा देनेके लिये दोनों मार्ग स्वतंत्र अर्थात् एक-से समर्थ हैं? अथवा कर्मयोग केवल पूर्वांग यानी पहली सीढ़ी है; और अंतमें मोक्षकी प्राप्तिके लिये कर्म छोड़ कर संन्यासही लेना चाहिये ? गीताके दूसरे और तीसरे अध्यायोंमें जो वर्णन है, उससे जान पड़ता है, कि ये दोनों मार्ग स्वतंत्र हैं। परंतु जिन टीकाकारोंका यह मत है, कि संन्यास आश्रमको अंगीकार कर समस्त सांसारिक कर्मोंको छोड़े बिना कभीभी मोक्ष नहीं मिल कि सकता – और जो लोग इसी बुद्धिसे गीताकी टीका करनेमें प्रवृत्त हुए हैं, यही मत गीतामें प्रतिपादित किया गया है – वे गीताका यह तात्पर्य निकालते हैं, कि “कर्मयोग स्वतंत्र रीतिसे मोक्षप्राप्तिका मार्ग नहीं है, पहले चित्तकी शुद्धिके लिये कर्मकर अंतमें संन्यासही लेना चाहिये; संन्यासही अंतिम अर्थात् मुख्य निष्ठा है।” परंतु इस अर्थको स्वीकारकर लेनेसे भगवानने जो यह कहा है, कि “सांख्य ( संन्यास ) और योग ( कर्मयोग ) ये द्विविध अर्थात् दो प्रकार की निष्ठाएँ इस संसारमें हैं” ( गीता ३. ३.), उस द्विविध पदका स्वारस्य सर्वथा नष्ट हो जाता है। 'कर्मयोग' शब्दके तीन अर्थ हो सकते हैं – (१) पहला अर्थ यह है, कि ज्ञान हो या न हो; चातुर्वर्ण्यके यज्ञयाग आदि कर्म अथवा श्रुति-स्मृति-वर्णित
३०८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कर्म करनेसेही मोक्ष मिलता है। परंतु मीमांसकोंका यह पक्ष गीताको मान्य नहीं है (गीता २. ४२)। (२) दूसरा अर्थ यह है, कि चित्तशुद्धिके लिये कर्म करनेकी (कर्मयोग) आवश्यकता है, इसलिये केवल चित्तशुद्धिके निमित्तही कर्म करना। इस अर्थके अनुसार कर्मयोग संन्यासमार्गका पूर्वांग हो जाता है; परंतु यह गीतामें वर्णित कर्मयोग नहीं है। (३) जो जानता है, कि अपने आत्माका कल्याण किसमें है, वह ज्ञानी पुरुष स्वधर्मोक्त युद्धादि सांसारिक कर्म मृत्युपर्यंत करे या न करे? यही गीताका मुख्य प्रश्न है और उसका उत्तर यही है, कि ज्ञानी पुरुषकोभी चातुर्वर्ण्यमें सब कर्म निष्काम बुद्धिसे करनेही चाहिये (गीता ३. २५)। यही 'कर्मयोग' शब्दका तीसरा अर्थ है; और गीतामें यही कर्मयोग प्रतिपादित किया गया है। यह कर्मयोग संन्यासमार्गका पूर्वांग कदापि नहीं हो सकता, क्योंकि इस मार्गमें कर्म कभी छूटते ही नहीं। अब प्रश्न है केवल मोक्ष-प्राप्तिके विषयका। इसपर गीतामें स्पष्ट कहा है, कि ज्ञानप्राप्तिके हो जानेसे निष्काम कर्म बंधक नहीं हो सकते; प्रत्युत संन्याससे जो मोक्ष प्राप्त करना है वही इस कर्मयोगसेभी प्राप्त होता है (गीता ५. ५)। इसलिये गीताका कर्मयोग संन्यासमार्गका पूर्वांग नहीं है, किंतु ज्ञानोत्तर ये दोनों मार्ग मोक्षदृष्टिसे स्वतंत्र अर्थात् तुल्यबल हैं (गीता ५. २) – गीताके “लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा” (गीता ३. ३) वाक्यका यही अर्थ करना चाहिये और इसी हेतु भगवान्ने अगले चरणमें – "ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेण योगिनाम्" – इस प्रकार, इन दोनों मार्गोंका पृथक् पृथक् स्पष्टीकरण किया है और आगे चलकर तेरहवें अध्यायके : “अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेण चापरे ” (गीता १३. २४) इस श्लोकके – 'अन्ये' (एक) और 'अपरे' (दूसरे) – ये पद उक्त दोनों मार्गोंको स्वतंत्र माने बिना अन्वर्थक नहीं हो सकते। इसके सिवा जिस नारायणीय धर्मका प्रवृत्तिमार्ग (योग) गीतामें प्रतिपादित है, महाभारतमें उसका इतिहास देखनेसे यही सिद्धान्त दृढ़ होता है। सृष्टीके आरंभमें भगवान्ने हिरण्य- गर्भ अर्थात् ब्रह्माको सृष्टि-रचनेकी आज्ञा दी, तब इनसे मरीचि आदि सात मानस- पुत्र हुए। सृष्टिधर्मको अच्छे प्रकार, आरंभके लिये उन्होंने योग अर्थात् कर्म- मय प्रवृत्तिमार्गका अवलंबन किया। ब्रह्माके सनत्कुमार और कपिल प्रभृति दूसरे सात मानसपुत्रोंने उत्पन्न होतेही निवृत्तिमार्ग अर्थात् सांख्यका अवलंबन किया – इस प्रकार इन दोनों मार्गोंकी उत्पत्ति बतलाकर आगे स्पष्ट कहा है, कि ये दोनों मार्ग मोक्षदृष्टिसे तुल्यबल अर्थात् वासुदेवस्वरूपी एकही परमेश्वरकी प्राप्ति करा देनेवाले, भिन्न भिन्न और स्वतंत्र हैं (महा. शा. ३४८. ३८; ३४९. ६३-७३)। इसी प्रकार यहभी भेद किया गया है कि योग अर्थात् प्रवृत्तिमार्गके प्रवर्तक हिरण्यगर्भ हैं, और सांख्यमार्गके मूल प्रवर्तक कपिल हैं; परंतु यह कहीं नहीं कहा है, कि आगे हिरण्यगर्भने कर्मोंका त्यागकर दिया। इसके विपरीत ऐसा वर्णन है, कि भगवान्ने सृष्टिके व्यवहार अच्छी तरहसे चलते रहनेके लिये कर्मरूपी यज्ञचक्रको उत्पन्न
संन्यास और कर्मयोग ३०९ किया; और हिरण्यगर्भसे तथा अन्य देवताओंसे कहा, कि इसे निरंतर जारी रखो (मभा. शां. ३४०. ४४-७५; ३३९. ६६, ६७ देखो) ; इससे निर्विवाद सिद्ध होता है, कि सांख्य और योग ये दोनों मार्ग आरंभसेही स्वतंत्र हैं। इससे यहभी दीख पड़ता है कि गीताके सांप्रदायिक टीकाकारोंने कर्मयोग-मार्गको गौणत्व देनेका जो प्रयत्न किया है, वह केवल सांप्रदायिक आग्रहका परिणाम है। और इन टीकाओंमें स्थान स्थान पर यह जो तुर्रा लगा रहता है, कि कर्मयोग, ज्ञानप्राप्ति अथवा संन्यासका केवल साधनमात्र है, वह इनकी मनगढ़ंत है। वास्तवमें गीताका सच्चा भावार्थ वैसा नहीं है। गीतापर जो संन्यासमार्गीय टीकाएँ हैं, उनमें हमारे मतसे यही मुख्य दोष है। और टीकाकारोंके इस सांप्रदायिक आग्रहसे छूटे बिना गीताके वास्तविक रहस्यका बोध हो जाना कभी संभव नहीं है। यदि यह निश्चय करें, कि कर्मसंन्यास और कर्मयोग, दोनों स्वतंत्र रीतिसे मोक्षदायक हैं - एक दूसरेका पूर्वांग नहीं - तोभी पूरा निर्वाह नहीं होता। क्योंकि, यदि दोनों मार्ग एकहीसे मोक्षदायक हैं, तो कहना पड़ेगा, कि इनमेंसे जो मार्ग हमें पसंद होगा, उसे हम स्वीकार करें। और फिर यह सिद्ध न हो कर - कि अर्जुनको युद्धही करना चाहिये, - ये दोनों पक्ष संभव होते हैं, कि भगवान्के उपदेशसे परमे- श्वरका ज्ञान होनेपरभी, चाहे वह अपनी रुचिके अनुसार युद्ध करे अथवा लड़ना- मरना छोड़कर संन्यास ग्रहणकर ले। इसीलिये अर्जुनने स्वाभाविक रीतिमे यह सरल प्रश्न किया है, कि "इन दोनों मार्गोंमेंसे जो अधिक प्रशस्त हो, वह एकही मार्ग निश्चय करके मुझे बतलाओ", (गीता ५. १) जिससे उसके अनुसार आचरण करनेमे कोई गड़बड़ न हो। गीताके पाँचवें अध्यायके आरंभमें अर्जुनके इस प्रकार प्रश्नकर चुकनेपर अगले श्लोकमेंही भगवान्ने उसका स्पष्ट उत्तर दिया है, कि "संन्यास और कर्मयोग ये दोनों मार्ग निःश्रेयस्कर अर्थात् मोक्षदायक हैं; अथवा मोक्षदृष्टिसे एकसी योग्यताके हैं; तोभी इन दोनोंमें कर्मयोगकी श्रेष्ठता या योग्यता विशेष है ( विशिष्यते )" (गीता. ५. २); और यही श्लोक हमने इस प्रकरणके आरंभमें लिखा है। कर्मयोगकी श्रेष्ठताके संबंधमें गीतामें यह एकही वचन नहीं है, किंतु ऐसे अनेक वचन हैं, जैसे - "तस्माद्योगाय युज्यस्व" (गीता. २. ५०) - इसलिये तू कर्मयोगकाही स्वीकार कर। "मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि" (गीता २. ४७) कर्म न करनेका आग्रह मत कर। यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन । कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥ कर्मोंको छोड़नेके झगड़ेमें न पड़कर "इंद्रियोंको मनमे रोककर अनासक्त बुद्धिके द्वारा कर्मेंद्रियोंसे कर्म करनेवालेकी योग्यता 'विशिष्यते' अर्थात् विशेष है" (गीता ३. ७) । क्योंकि, कभी क्यों न हो, "कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः" अकर्मकी - अपेक्षा