सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
२२ | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| किं शीतांशुम (प्रं.राघव ३ २३) १३६।४५ | किरति मिहिरे वि ३३६।४० | कुञ्चिताधरपुटेन पूर २२१।१२१ |
| किंशुककलिका (शां.प ३७९४) ३३१।११ | किसलयमिव मुग्ध(उत्तर ३ ५) २७५।२४ | कुटिला लक्ष्मीर्यत्र प्रभ ६२।१० |
| किंशुक किं शु २४२।१६७ | किसलयानि कुत (भोज.२०६) २१२।३४ | कुटुम्बचिन्ताकुलि ३६७।२५ |
| किंशुकक्षितिरुहा ३३२।७२ | कीटगृहं कुटि (शा प १११५) ०१८।७६ | कुठत्वमायाति गुण. (सूक्ति. १) ३३१२१ |
| किंशुके किं शुक (शा प.१३७०) ७१।१२ | कीटोऽपि सुमन (हि प्र ४६) ८६।११ | कुत कुवलयं कर्णे (कुव १) ३१२।५ |
| किंशुके शुक मा २२७।१८२ | कीटैकिं स्यान्न मत्स्या १९८।७ | कुत प्रेमलवोऽप्य २७७।१७ |
| किं स्याद्राखान् २७।२०९ | कीदृक्तोय दुस्तर २०१।७० | कुत सेवाविही (हि २ २९) १४९।२७६ |
| किं स्याद्विशेषानि २००।४८ | कीदृक्प्रतार्दींपर्वतं २०१।७१ | कुत आगल घटते ६४।५ |
| किं स्वप्न किमु २८७।१० | कीदृक्षं समिति बल २०१-६ | कुत्र विधेयो यत्नो १७०।७६४ |
| किं हारै किमु क (राजेन्द्र ७४) २९।२० | कीदृक्ष सक्लजनो २०१।७४ | कुत्र विधेयो वास १७०।७६५ |
| कितव प्रपञ्चिता सा २८८।१८ | कीदृक्षा गिरिशतनु १९७।२७ | कुत्र श्री स्थिरता २०४।११४ |
| कितवा यं प्र (शा प १३३३) १४५।१३४ | कीदृक्सेना भवति र २०१।७२ | कुत्रायासी किमिद ३५४।८० |
| किमकरवमहं हरि २०१।६७ | कीदृग्गृहं याम्यगृहं २००।५० | कुत्रायोध्या क रा (हनु ६ ३७) १५।१३१ |
| किमकारि न कार्पण्यं ९६।२ | कीदृग्वन स्यान्न भ २००।५१ | कुत्रोदयोदयाचलस्य १९८।३८ |
| किमकारि मन्दमति २९१।६ | कीदृग्दत्तमत्तंगज १९७।३५ | कुदेश च कुत्र (चा नी ३०) १६१।३७७ |
| किमञ्जारवद्रां खुरै १२४।६ | कीदृश वद महन्थ २००।५४ | कुदेशमासाद्य (चा नी.९५) १७५।९१५ |
| किमत्र चित्रं यदि (विक्रम १३८) ४५।३४ | कीदृश हृदयहारि २०१।५६ | कुप्तेनसुप्रीनयनाश्र १९०।७४ |
| किमधिकमस्य (सां.द.१०.७२) २१६।१० | कीदृशी निरयभूरने २०१।५७ | कुन्दकुसुममुं पश्य १८७।१६ |
| किमनन्ततया ख्यातं १९९।२६ | कीर नीरसकरीरण २२७।१८५ | कुन्दकुड्मलमुपास्य २२३।७० |
| किमपि कान्तभु (शा प ३७४९) ३२८।९ | कीर्णा रेजे सा(शिशु.१८.७९) ३०१।१०८ | कुन्द दन्तैर्मुख निग २७९।६६ |
| किमपि किमपि(मालती.८.१३) ३०६।३१ | कीर्ति प्रवरसेनस्य (सूक्ति ४ ६२) ३५।२४ | कुन्दे कदम्बे कुमु २३९।१०३ |
| किमपेक्ष्य फलं (किरात २ २१) ४८।१५१ | कीर्ति श्रीनरसिंह १९६।५४ | कुपात्रदानाच्च भ १७३।८५० |
| किमप्यसा (शा प १४००) १४२।१७० | कीर्ति श्रीरघुवंश १९९।१,४ | कुपितापि मनः पति ३३३।८३ |
| किमप्यस्ति स्व (हि २ ५३) १६३।४७७ | कीर्ति श्रीरघुवंश रत्न १९९।२९ | कुपितासि यदा (सा.द १० ६४) ३००।२ |
| किमलम्बताम्ब (शिशु ९.२०) २९७।१६ | कीर्ति स्वर्गतरङ्गिणी १३९।८ | कुपुत्रे ना (भा १२ ५२२७) ३९३।६३७ |
| किमव्यतयता ख्यात १९९।२१ | कीर्ति स्वर्गतरङ्गिणी (पद्यस ४) ११४।१४ | कुप्यताशुभच (किरात ९ ५३) ३१५।४५ |
| किमशक्यं बु(पञ्चत १ १९३) २८३।२५५ | कीर्तिस्तव क्षितिप ५३।५२१ | कुप्यल्लोकेशबाहुप्रक ३२६।३४ |
| किमसि विमला (शा प १९५४) २२०।५ | कीर्तिस्ते दयिता १२२।१८३ | कुप्वोः क्रप्वौ च शेषो ४२।३ |
| किमस्ति यमुनानद्या २००।३९ | कीति मृणालकम १७६।९६१ | कुबेरगुप्ता दिशमुष्ण ३३१।२२ |
| किमस्य रोम्णा क (नैषध १ २१) २५२।२ | कीर्तिर्नृत्यति नर्तकीव ८७।३५ | कुब्जस्य कीटखातस्य (सु ३१६६)६६।२३ |
| किमहं वदामि खल (रसगगाधर) २४८।७७ | कीतौ व्याप्तिमवेल्य १९९।१३० | कुभार्या च (भा १२ ५२२६) ३९४।६८० |
| किमान्द्यत्वगुरुत्वा (शा प ४७९) ८१।७ | कीर्त्यास्य चन्द्रकरको १३९।५ | कुभोज्येन दिनं (शा प १४९२) १५४।५८ |
| किमाराध्यं (सा द १० ८१) १६८।६६४ | कीलालै कुङ्कुमाना(सुधा ल ८) ३२८।२५ | कुमारसंभवं दृष्ट्वा १८८।३२ |
| किमासेव्यं (का प्र १०.५२१) १७७।९८४ | कुक्कुटे कुर्वति क्राण ३२३।२ | कुमुदकमनी (का प्र १० ४६१) ३१३।४६ |
| किमिच्छति नर २००।३५ | कुक्षे पूल्यै यवनवित ९९।१६ | कुमुदवनमप (शिशु ११ ६४) ३२३।३२ |
| किमिति कृशासि कृ (रसगगाधर) ३५४।७१ | कुग्रामवास कुल (पद्यस १०) १७३।८७६ | कुमुदशबलै (शा प ९५१) २३४।१३० |
| किमिति सखे परदेशे ३३०।१ | कुङ्कुमपङ्केनाङ्कित (भर्तृ स ११७) २५३।१३ | कुमुदान्येव श(अ शा ५ २८) ३९३।६३४ |
| किमिन्दु किं पद्म २५४।३७ | कुचफलश्लेषव्वलाना (रसगगाधर) १३५।८ | कुमुदेष्वधिक भा (शा प ३६४३) २९७।२ |
| किमिवाखिल (शिशु १६ ३१) ४९।१५४ | कुचकुम्भौ स (शा प ३३५१) २६७।३२५ | कुम्भ परिमितमम्भ ९०।११ |
| किमिष्टमन्न खरसू १७३।८६१ | कुचदुर्गराजधान्यो २६७।३४६ | कुम्भो सदम्भो २६४।२५९ |
| किमिह बहुभिरु (सु ३४५३) २५२।५२ | कुचद्वये चकोराक्षी २६४।२५५ | कुरङ्गा. कल्या (शान्ति.२.१८) ३६८।४९ |
| किमुत्तीर्णा पन्था ३५६।२५ | कुचाभ्या भाखन्ती २५४।३५ | कुरङ्गाक्ष्या वेणी सुभ १२४।८ |
| कियती पञ्चसहस्त्री ७०।२३ | कुचावस्या काम २६५।२९१ | कुरङ्गीणा यूथं नि २३०।३४ |
| कियन्मात्रं जलं वि (भोज.१८५) २०५।२ | कुचेलिनं (चा नी १५ ४) ३८५।३१९ | कुरङ्गीवाङ्गानि स्ति(सूक्ति ५१.१५) ३१०।३ |
| किरति प्रकरं गवा २१०।१४ | कुचौ तु परिचर्चि ३७८।२१६ |
संस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः २३
| कुरबक कुचा (शा प १०९९) १३२।१७ | कूजितानि कलयन्व ३३२।७४ | कृतोपकार प्रियब (सु १९००) २९३।८ |
| कुह गम्भीराशयता (सूक्ति ३० १) २१८.४ | कूटसाक्षी मृषावा (शा प ७०७) १५४।४९ | कृत्यं किमस्य ३८४।३०५ |
| कुर्मे किल्विष (रागत ४ ६२६) ३९३।६६३ | कूपाम्भासि पिबन्तु २१४।७३ | कृत्वा कार्णाटक्रान्ता ३२६।३५ |
| कुर्यान्न परदारेच्छा १५४।६३ | कूपे पानमथोसु (शा प ८५९) २१३।६३ | कृत्वा दीनेनि (सा द ३ १८४) ३६९।८७ |
| कुर्यान्नीचजना (शा प १५१४) १५७।६९ | कूपोदकं वटच्छा (चा नी ९६) १६२।४२१ | कृत्वापि कोशपान (सु ७०५) २२२।५१ |
| कुर्वेड्योत्लावि (शिशु १८ ४४) १३०।८० | कूर्म पातालगङ्गाप (भोज २२७) ११७।९८ | कृत्वापि येन लज्जा (सु ४०१) ५८।१८५ |
| कुर्वता मुकुलि (शिशु १० ३०) ३१५।३३ | कूर्म पादो (सूक्ति ९७ ४७) १२२।१६२ | कृत्वा प्रवृद्ध (प्र राघव २ ३०) २०५।५१ |
| कुर्वते स्वमुखेनैव बहु ५५।५५ | कूर्मो मूलवदालवालव (हनु ६ ३) २१।८५ | कृत्वा मेरमुलूख (हनु १४ ८५) १३६।५२ |
| कुर्वन्ति तावत्प्र (पञ्च १ २५७) ३४९।६८ | कूष्माण्डीफलव २४०।१२६ | कृत्वा विग्रहशत्रु (सु २१९०) ३११।२३ |
| कुर्वन्तु नाम (सूक्ति ३३ ३७) २४१।१४४ | कृच्छ्रानुवृत्तयोऽपि ७६।२ | कृत्वा शस्त्रवि (शान्ति १ १०) ३७५।२२८ |
| कुर्वन्नपि व्यलीका (हि २ १३२) १६४।४८५ | कृच्छ्रेण कापि (सूक्ति ४९ २५) २७३।८ | कृत्वोपकार यस्तस्मा (सु ७७७) ७१।३० |
| कुर्वेनानुमपुष्टे सुख ३२५।६७ | कृच्छ्रेणामेव्यमध्ये (भर्तृ ३ ३८) ८९।६ | कृपण स्ववधूमग्न ७१।१६ |
| कुल वृत्त च (काम नी ५ ६०) ३८४।२८६ | कृत च गर्वाभिमु १०५।११२ | कृपणसमृद्धीनामपि (सु ४८४) ७२।३६ |
| कुलगुरुरबलाना (शा प ३०७७) २५०।१६ | कृत पुरुषशब्दे (किरात. १८ ७२) ७७।३ | कृपणेन शवेनेव (शा प ३८८) ७१।८ |
| कुलपतनं जनगर्हा (पञ्च १ १८७) ३५२।९ | कृत वपुषि भूषण (कुव ५२) ३५९।९० | कृपणेन समो दाता (कविता २९) ७१।१ |
| कुलशीलगुणो (चा नी १०२) १४२।१९ | कृतककृतकैर्मायाशा (सु १६८८) १०९।५ | कृपाणकिरणानलं १३१।११२ |
| कुलशैलदल पूर्णसुवर्ण (सु १३) १७।२ | कृतकान्तकेलिकुतुक १७।३ | कृपाणीय काण १२४।९ |
| कुलाचला यस्य महीं २०।६९ | कृतकृत्यस्य नृत्य (हि ४ ११) १४८।२४६ | कृमयो भस्म (शा प ४१४१) ३७१।११६ |
| कुलीना रूपवत्यश्च ३४९।४२ | कृतकोवे यस्मिन्भ्रमर २१।९५ | कृमिकुलचित्तं (भर्तृ २ ९) १७७।९९७ |
| कुलीने सह सप (चा नी ५८) १६२।३८९ | कृतघ्नस्य शिशुघ्न (सु २९८९) १६५।५५९ | कृमिभिः क्षत ३७२।१३८ |
| कुले कलङ्क कत्र १७५।२२३ | कृतचङ्क्रमणे गणेपु ८९।११ | कृश काण (सु ३३९०) ३७१।१३२ |
| कुलोद्भूत (काम नी १० ३८) ३८७।३९९ | कृतदुरितनिराकरण ४२।३ | कृशा केनासि त्वं (सु १३२६) ३०५।१ |
| कुल्याम्भोभि पवनच १४१।५ | कृतवलिभ्रमे (शिशु ११ १४) ३२३।२८ | कृशाङ्ग्या कुच २६४।२४१ |
| कुविन्दस्त्वं ताव (क प्र ७ १७३) १३५।३० | कृतनिश्चयिनो (पञ्च १ १८७) १६५।५२२ | कृशासीत्यालीना (सु १३२५) ३०५।२ |
| कुशल तस्या जीवति (कुव १४९) २८८।२० | कृतमद निगद (शिशु ६ ५०) ३४५।३८ | कृषिका रूप ३८६।३८२ |
| कुशला शब्दवार्ताया ९८।५ | कृतमनुमत दृ (नधी ३ २४) ३६६।८ | कृष्टा केशेषु (वेणी ५ ३०) ३६१।५१ |
| कुसुम कार्मुकका २३२।६७ | कृतमन्दपदन्न्यासा ३०।१६ | कृष्ण वपुर्वह्रतु (सु ७६६) २२८।२१३ |
| कुसुम कोशा (शा प ११३५) २४३।२११ | कृतमपि महोपकार (रसगङ्गाधर) ५६।११८ | कृष्णत्वं (शा प १२३९) १०८।१९९ |
| कुसुम पतदेत्य ना २०१।६३ | कृतवानन (किरात १० २६) १६१।३६९ | कृष्णं त्वं नव (शा प १३०) २३१।४९ |
| कुसुमजन्म ततो ३३१।३६ | कृतविद्योऽपि (काम नी ४ ४६) २८७।४२५ | कृष्णं त्वं (बिल्वमङ्गल) २३१।४८ |
| कुसुमनगवना (किरात १० ३१) ३३२।३६ | कृतवैरे न विश्वास ३८७।४१९ | कृष्णमुखी न १८४।२५ |
| कुसुमपरिमलेनामो ३२६।१९ | कृतशतमसत्सु (हि २ १६६) १७०।७७३ | कृष्णवर्णहृदयं ३०४।१४४ |
| कुसुममेव न केवल ३३२।४१ | कृतस्य करणं (नीतिसार १८) १६०।३०० | कृष्णवर्त्मनि गुणा ९५।१२ |
| कुसुमयनफलिनीर २४७।७ | कृतान्तपाशव (पञ्च २ ७) १५७।१९१ | कृष्णश्टिङ्गवकनीनिके ३१०।५ |
| कुसुमशयन न प्रत्य २७९।७२ | कृतान्तस्य दूती जरा ९५।१३ | कृष्णा ते कच २९१।७ |
| कुसुमशयनेऽप्य (शा प ३४७६) २८९।६३ | कृतापचारोऽपि (शिशु २ ८४) १४७।१८६ | कृष्णांर्जुनातुर (शा प ३६५५) ३१२।२ |
| कुसुमशरविलास भङ्गु ५।४१ | कृतार्थं स्वामि (वृ चा २ ३६) १५६।१४० | कृष्णेनाम्ब गतेन (औचित्य १६) २४।१६४ |
| कुसुमसुकुमार (शा प ३७९७) ३३३।१०२ | कृतावधान जि (किरात ४ ३३) ३४४।२५ | कृष्णो गोरसचौर्य २३१।४५ |
| कुसुमस्तवकस्येव द्वयी (हि १ १३२) ७९।४ | कृतिनामकृती कथं १७५।२३० | केका कर्णा (शा प ८२८) २२७।१७८ |
| कुसुमस्तवकान् (शा प १००९) २३८।७९ | कृतिनोऽपि प्रती (कविता ३४) ३८६।२७२ | केकाभि कल ३०९।१६ |
| कुसुमादपि स्मितह २८८।३१ | कृते च रेणुका कृत्या ९८।७ | केविचित्तस्य २६०।११७ |
| कुसुमायुधकोदण्डे २६४।२३० | कृतेऽप्याज्ञाभङ्गे कथ ३०६।४६ | केचिदज्ञानतो (सु २७८४) १५३।१४ |
| कुसुमितलता (का प्र १० ४७३) २७५।१३ | कृते प्रतिकृतिं (पञ्च ५ ८०) १६५।५४६ | केचिद्भग्ना १२८।३३ |
| कुस्थानस्य प्रवेशेव गुग् ८६।३ | कृतो दूरादेव स्मि (अमरु १४) ३०६।४१ | केचिद्बद्धा १९३।२८८ |
| कूजन्ति कोकिला (सु. १६८६) १९६।१५ | केचिद्दन्दन्ति ३७५।२४२ | |
| केचिल्लोचन २३७।५३ |
२४ | सुभाषीतरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| केतकीकुसुमं भृङ्ग (सु ७२४) ८१।८ | कैलासीयेति १३७।७० | कोल केलिमलं २३०।३६ |
| केतक्य कटु २२४।१११ | कैलासीयेति कैरवी १३६।५३ | कोलाकृतिरपा १८८।३५ |
| केदारभाजा (नैषध ७ ३५) २५९।८८ | कैवर्तकर्कशकर ९२।७५ | को लानो १८०।१०४५ |
| केदारे कीटशो २००।४१ | कोक स्तोक ३२०।५० | कोलाहले काककुलस्य ८६।४ |
| केनचिन्मधुर (शिशु १० ५४) ३१७।१६ | कोकानाकुलयं ३०२।१०७ | को वीरस्य मन (हि १ १७५) ७८।११ |
| केनाजितानि नय ५०।१९९ | कोकानुद्ग्रीवयन्तः ३२५।६८ | कोशमूलो हि(का नी १३ ३३)३९४।७०३ |
| केनात्र चम्प (शा प १००३) २३८।६७ | कोकिल कल (शा प ८४१) २२५।१२५ | कोशद्वद्धमियं (कुव. ६७) ३९३।६४२ |
| केनादिष्टौ कमल ५५।२३० | कोकिलश्रूतशि (सु १६४३) ३८४।२७८ | कोषः स्फीत (सु १५२३) २६३।२०२ |
| केनाप्यर्थं (शान्ति २ २) ३७५।२४४ | कोकिलाना (चा नी ३.९) १६३।३८० | कोऽहं कौ (शा प १४०४) १५३।४२३ |
| के नाम न विन (पच ४ ५४) ३४९।२६ | कोकिलो (सा द १० ५९) २२५।१२२ | कोऽहं ब्रूहि (महा ना २) ३६२।३५ |
| केनासीन (शा प १११०) २१८।७० | कोटरान्त स्थितो(सु. १६९७) ९०।४ | को हि तुला (शा प ११९६) २४८।७१ |
| केऽपि स्वभाव ७२।३९ | कोदिद्वयस्य २४८।७५ | कौटिल्यं कच(का.प्र १०.५२३)३१२।२४ |
| के प्रवीणा १९९।१८ | कोऽतिभार (चा नी ७३) १६३।४०४ | कौन्तेयस्य सहा २३१।४२ |
| के भूषयन्ति १९७।१९ | कोऽत्र भूमि (सा द.१० ५१) २९४।२१ | कौप वारि (शा प ९३३) २३२।८८ |
| केयं भाग्यवती २४१।६० | कोऽत्रेत्यह (का नी २२) १४५।१३७ | कौपीनं धृतवान्ह ९८।३ |
| केयं मूर्त्यन्धकारे (सूक्ति ९९ २) ८१।०४ | कोदण्डं न १०८।२०९ | कौपीन शत ३७१।१११ |
| केयं श्यामोपल (प्र.राघव.२ ७) २७३।१९ | कोदण्डस्तव १०८।२०६ | कौपे पयसि (शा प ९३२) २३१।६१ |
| केयूरं न करे २५८।५१ | कोदण्डो २९०।७८ | कौमुदीव तुहिना (कुव ९१) ११५।४३ |
| केयूरा न विभूष (भर्तृ २ १६) ८५।१४ | को दुःखी सर्व १९९।१४ | कौर्म संकोच (हि ३ ४८) १५०।३१६ |
| केयूरीकृतकङ्कणीकृत(सूक्ति ५४.१०)७।८२ | को दुराव्यस्य १९८।२ | कौ विख्याता १९९।२२ |
| केलिः प्रदहति (पच १ १८६) ३५२।१४ | को देश कानि ३६।१७ | कौ शंकरस्य वल २०२।८८ |
| केलिं कुरुष्व परि (सु ६२३) २३१।६८ | को वन्द्यो (हि प्र २१) ९०।५ | कौशेयं कृमिजं (पच १ १०३) ८२।४८ |
| केलिचलाङ्गुलिल १४।१० | को धर्मो (हि २ १४९) १७०।७६९ | कौस्तुभमुरसि (शा प १२०३) २४८।८७ |
| केलीकौतुक २५६।५४ | को नयति जग २००।४७ | क्रतौ विवाहे (हि ३ १२४) १५२।३९९ |
| केवल व्यमन(पच २ १५५) १६५।५३९ | को न याति (भर्तृ २.१०५) १५६।५५६ | क्रमसरलित २७९।६० |
| के वा न सन्ति (चात ३) ३८५।३३७ | को नाम नानुवर्तेत ६५।७ | क्रमोद्गता (नैषध ७ ९७) २६९।४०२ |
| केश. काश (सा द १० ५) ३७१।१२७ | को निर्दग्धत्रिपुर ९९।३३ | क्रयविक्रय (शा प ४०३५) ३६४।२१ |
| केशः कुन्द ३५५।१० | कोऽन्धो योऽ १७०।७६३ | क्रव्यात्पूगे (शिशु १८ ७८) ५३०।१०७ |
| केशालुञ्चनसाम्ये ३६४।६ | कोप चम्पक २३८।७० | क्रान्तकान्तवदन (शिशु १० ३) ३१४।६ |
| केशव पतितं (शा प ५२७) १८६।१ | कोऽपवाद (किरात ११ २५)१६१।३६८ | क्रामन्त्य अत्त (ध्वन्या ३) १३२।२९ |
| केशाः सयमिन (भर्तृ १ १२) ३१४।६९ | कोपप्रसाद (पच.१ ३७) १४८।२४७ | क्रियते धवल (शिशु १६ ४६)१७५।९२९ |
| केशानाकुलय (सु १८४८) ३४८।१८ | कोपवलयुन (शिशु १० ३९) ३१५।३२ | क्रीडन्मन्दरकन्दरो ७।८६ |
| केशान्धकारा (नैषध ७ २३) २५८।४० | कोपस्त्वया (अमरु.११३) ३१३।५१ | क्रीडन्माणव (प्र.राघव ७ ८०) १४२।१३ |
| केशान्बामकरा २५८।३७ | कोपात्किंचिदु (शृङ्गारति १ २७) ३१०।५ | क्रीडाकारि तडाग २३१।२९१ |
| केशौ कोमल (शा प ३४५८) २७७।५६ | कोपातकोमललोल (अमरु ९) ३१०।८ | क्रीडामिन्नहिरण्य ९६।११ |
| केषांचिद्वदला २३५।१४७ | कोपो यत्र भुकुटि (अमरु. ३८) ३०९।६ | क्रीडासु च (शा प १५६८) १४३।४१ |
| केषांचिद्रावि शुक (सु १४३) ३९।२२ | कोऽध्यन्य (शा प १२२२) १०२।१४ | क्रुद्धस्य दन्तिन १२८।१६ |
| केषांचिन्निजवेश्म ९५।१२६ | कोऽप्येष (शा प ३९७६) ३६०।२४ | क्रुद्धोलूकनखप्र (सु ७१७) २२२।३९ |
| केसरदुमतलेषु २०१।५८ | को मायति मक्र २००।४५ | क्रुद्धार स्मर (का प्र.७.२२५) २६।२०२ |
| के स्थिरा. के १९८।९ | को मोहाय २०३।१०६ | क्रोडं तातस्य ३।३१ |
| कैलासस्य प्रथ (का प्र ५.१०१७) १३६।३४ | कोऽयं कोप ३०७।५३ | क्रोधैर्हृदैष्टिपातै ८।१०२ |
| कैलासाद्रावुदस्ते ७।१०१ | कोऽयं द्वारि हरि. (सु १०४) २४१।५६ | क्रोधो मूलम् (वृ.चा २ १३) १६०।३१३ |
| कैलासायितमद्रि (सु २००२) २०६।९६ | कोऽयं भ्रान्ति (मङ्कट ९९) २१५।१३ | क्रोधो हि शत्रुः १७३।८८० |
| कैलासालयभाल (का प्र ४.६४) १२।३९ | कोऽर्थान्निद्रा (पच १ १५७) १७८।१०११ | क्रोशान्त. शिशाव ८९।३ |
सस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः २५
| क्रौञ्च क्रीडतु (शा प ११२७) २९९।८ | क्षणमयमपुवि (शिशु ११ ४८) ३२७।१७ | क्षुद्राः सन्त्रास (सु २२८३) ३६१।४९ |
| केशत्यागकृते ३७६।२५६ | क्षणाहप्रबोवमायाति ९।५२ | क्षुद्रो द्रवैस्य कटुना ५७।१४९ |
| क गन्तासि भ्रा (शान्तिश १ १७)७४।३४ | क्षतातकिल (रघु २ ५३) १५१।३७७ | क्षुद्रोऽपि तनुते तात ८७।१८ |
| क च ननु जनका ९२।६४ | क्षते प्रहारा (पञ्च ४ ६३) १७३।८४४ | क्षुम्पत्प्रत्यर्थिनृपुथ्वी १२२।१६९ |
| क्वचिच्चारुचा १०१।१२ | क्षत्रियस्यो (सूक्ति ९० ३७) १५०।३२१ | क्षेत्रग्राम (प्र ३५) ३७९।८२ |
| क्वचिज्झिल्ल्रीनाद (सु ७२३) २२५।१४० | क्षन्तव्यो मन्द १६६।५६६ | क्षोणी क सहते २०४।१२० |
| क्वचित्कन्था (शा प ४०९८) ३६८।३९ | क्षपा क्षामी (सूक्ति ६१ १८) ३४१।५५ | क्षोणीकाम निजा ११५।३६ |
| क्वचित्कार्यञ्चाञ्ची ५५।७२ | क्षमातुल्यं तपो १६६।६०० | क्षोणीक्राम निजाम् ११५।३७ |
| क्वचित्कृष्णार्जुन २६०।९८ | क्षमा बलमशक्ताना (वृ चा १३ २२)८२।३ | क्षोणी यस्य हिरण्मयी २१५।४ |
| क्वचित्क्वचिदयं २२३।४४ | क्षमा क्षत्रौ च (हि २ १८०) १६४।४९५ | क्षोणीपर्यटनं ३७५।२२९ |
| क्वचित्ताम्बू (अमरु १०७) ३२८।१४ | क्षमाशास्त्रं करे यस्य (वृ चा ३ ३०)८३।१ | क्षोणीपाल त्वदरि १३२।२५ |
| क्वचित्पाणिप्राप्तं ९३।८७ | क्षययुक्तमपि (किरात ० ११) १५१।३८९ | क्षोणीगाश्रयि(भर्तृ स ४७०)१८०।१०४९ |
| क्वचित्पोषोऽपि मित्र ५४।९ | क्षान्त न (भर्तृ स २३६) ३७४।२१९ | क्षोमं वत्ते (शा प ३२८३) २५६।४० |
| क्वचित्पुत्रभ्रष्टै (भर्तृ म ८९) २५३।२९ | क्षान्तिश्चेद (भर्तृ २ १८) १७८।१०१९ | क्ष्वेदाभि क(महावीर ६ ७७) १३१।१९९ |
| क्वचिद्भूमौ शय्या (सु २९४०) ८०।३५ | क्षामक्षामकपोल २७७।५९ | क्ष्वेलातर्जितसिंह १४१।४ |
| क्वचिद्दुष्ट क्वचि (नीतिसार ९) १५७।१७४ | क्षाम गात्रमतीव २८६।२७ | ख |
| क्वचिद्दिद्रोही (भर्तृ २.५१) ८९।५ | क्षार जलं वारि ४९।१७५ | खचितमपि मायावी (सु ३३८) ५६।८४ |
| क्वचिल्लसद्ग (शिशु १७ ५६) १२७।५ | क्षार वारि न २३५।१ | खड्गा नितान्त (सु २३५६) ३६४।४२ |
| क तिष्ठतस्ते पितरौ ४।३० | क्षारो वारिनिधि ५३।२६५ | खड्गनिर्लूनम् (कुमार १६ २६) १२८।११ |
| क दोषोऽत्र मया (सु १४१) ३९।२० | क्षितिप किमपि १३९।६ | खड्गमूलं भवेद्राज्य १५९।२८४ |
| क नु कुलमकलङ्क (भोज ३०४) ९२।६५ | क्षिपसि (सा द १० ५१) ३७३।१७१ | खड्गवारि भवत १२४।२ |
| क पिशुनस्य गति (सु ४३२) ५९।२१९ | क्षिपेदाक्य (शा प १५१२) १५४।६७ | खड्गहस्तोऽरिमा २०८।३४ |
| क प्रस्थितासि (अमरु ७१) २९८।१४ | क्षितो हस्तावलम्ब (अमरु २) ८।१०९ | खड्गा शोणितस (कुमार १६ १५) १२७।७ |
| क यासि (शा प ७४) २३।३४० | क्षिप्रमायमना (हि.२ ९५) १६६।१४४ | खड्गा रुधिरसलिता(कुमार १६ ७) १२७।५ |
| क रुजा हृदय २८२।१२७ | क्षीण क्षीण समी (सु ५४६) २०९।५ | खड्गालक्ष्मीस्तथा (नकुल) १४३।५८ |
| क वन तरु (सा द १० ७०) ९२।६६ | क्षीण (सु १६११) ३०५।११ | खड्गास्तिष्ठन्तु (सु ०२५२) ३६०।४ |
| क वसति लघु १९७।३२ | क्षीणयाव (किरात ९ ६२) ३१६।५४ | खङ्गेन शितधारेण १२८।२२ |
| क वाम्भोद्यौ २१८।७९ | क्षीणांशु (शा प ३७१४) ३०७।५६ | खङ्गेनामूलतो (कुमार १६ ३९) १२८।१७ |
| क स दशरथ (पञ्च ३ २५३)३८४।२७९ | क्षीणो रवि (पञ्च ५ ९०) ३९४।६७९ | खण्डितानेत्ररुञ्जालि २७।१ |
| क्वाकार्यं (विक्रमोर्व ४ ३४) २८१।११३ | क्षीबतासुप (शिशु २० ३४) ३१५।३७ | खद्योतास्तरला भवन्ति २४५।२४१ |
| क्वापि गत २२९।२३६ | क्षीरक्षालितपाश्च ११४।२१ | खद्योतो द्योतते (शा प ७३८) २०९।२ |
| केदानी दर्पितास्ते (सु ५८) १९।४० | क्षीरसागर (शा प ३५१५) २७३।२ | खनन्नाखुबिलं (पञ्च.३ १६) २२९।५ |
| केन्दोर्मण्डलमम्बुधि ८८।२ | क्षीरान्व्हेर्लहरीषु ३०२।१०१ | खर श्वानं गजं मत्तं १५५।९९ |
| कैतद्कारविन्दं ३७२।१३७ | क्षीरिण्य स (मृच्छ १० ६०)३९४।७०६ | खरनखरविमुक्ता (सु ६०५) २४८।९४ |
| कैतनमार्तण्ड ३०३।१२१ | क्षीरेणारमगतो (भर्तृ २ ६७) ८८।२० | खर्वग्रन्थिविमुक्तसंधि २०१।६२ |
| क्षणं सरलवीक्षणं २५६।३९ | क्षीरोदन्व (नैषध १२.७४) ११०।२४१ | खल करोति दुर्यु (हनु १३ ११) ५५।५४ |
| क्षणं कान्ता (सूक्ति अनु ३३) १३२।२० | क्षीरोदीयन्ति १३८।७५ | खल सज्जनकार्पास ५५।६० |
| क्षणं बालो भूत्वा (सु ३१३९) ३६८।३८ | क्षुत्क्षामा शिशव ६७।६६ | खल सर्षपमात्राणि (शा १ ३०६९) ५४।१ |
| क्षण मूच्छमिति २८९।६२ | क्षुत्क्षामाभर्कसञ्च १०१।१ | खल सत्क्रिय (शा प ३७६) ५४।२६ |
| क्षणक्षयिणि साप (सु २९९) ४६।६३ | क्षुत्क्षामोऽपि (सु ६१४) २३०।४० | खल सुजनपैशून्ये (सु ३३५) ५६।८१ |
| क्षणदासाव (का प ४.८२) १०३।७४ | क्षुत्तृडाशा कुद्र ७६।१४ | खलसख्य प्राज्ञात्तुर ४८।१३१ |
| क्षणदृष्टनष्ट (शा प ७६७) २११।१४ | क्षुद्रा सन्ति (शा प ७७३) २३०।३७ | खलाना कण्टकाना (चा नी १५.३) ५४।६ |
| क्षणमपि विरह. (शा प ३४८२) २८८।३५ | क्षुद्रा सन्ति (सु. २८५) ५२।२५७ | खलाना धनुषा (वृ चा १४ ८५) ५४।१२ |
| क्षणमप्यनु (भोज २४२) १०२।४७ | खलास्तु कुशला (रसगगाधर) ५४।३६ |
४ सुभा०अनु०
२६ | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां ---|---|--- खलेन वनमत्तेन (सु ३३९) ५६।८५ | गणिकागणकौ समान ४४।२ | गन्ध सुवर्णे (चा.नी ९ ३) १७३।८५३ खलेषु मत्सु निर्याता (सु ३४५) ५६।८८ | गणेश स्तौति १६०।३०९ | गन्धमुद्धत (किरात ९ ३१) ३००।४६ खलो न साधुता याति ५४।२९ | गणेश्वरकवेर्वचोविरच ३५।८ | गन्धर्वनगरा (शा प ४१२३) ३७२।१५२ खलोल्लापा सोटा (सु ३२६१) ७७।४३ | गण्डभित्तिषु (शिशु १० ३) ३१५।३४ | गन्धवाह गहनानि २१४।६ खल्वाटो दिवसेश्व (सु ३१४१) ९४।११४ | गण्डस्थलील (आसी प्र) २।२१ | गन्धाप्यसौ (पद्म सू १९) ३८३।२६६ खाटीच्छाशिपलेह १९३।९२ | गण्डस्थले हि मद २३१।७२ | गन्वाढ्या नवमल्लि (भ्रमराष्टक २) ७५।१८ ख्याति कूर्गति(का प्र १० १०३) ३१७।३ | घण्टाभोगे विहरति(कुव १४४) ११७।४४ | गन्धैराढ्या जगति २२३।९१ खिन्नं चापि सुभाष ३९।२१ | गण्डे पाण्डौ २७६।४३ | गभीरनाभिहद (लक्ष्मीधर) २६७।३५३ खिन्नालसनयनान्त ३२१।३ | गण्डौ पाण्डिमसा १०७।१८६ | गमनमलस शून्या(मालती १ २०) २७४।४ खिन्नोऽसि मुञ्च (कुव ९०) २२१।१० | गतक्लेशायासा २०३।१०२ | गम्भीरनाभि (शा प ३३४८) २६७।३५३ खेलत्खञ्जननेत्रया २७४।३० | गतं तत्ताराध्यं तरु (भर्तृ स ४७८) ७६।४१ | गम्यतामुपगते (किरात ९ ४) २९६।४ ख्यातः शक्रो (पद्यस ६३) १८०।१०५५ | गत तद्गाम्भीर्य (सु ७०७) २२१।२५ | गम्यते यदि (चा नी ७ १७) २३०।२३ ख्यातस्त्व फलवृष्टि १८३।५१ | गत कामक (काव्या २ २४८) ३६७।१४ | गरलद्रुम कन्दमिन्दु २८४।१० ख्याता नराविपतय (सु १६०) ३३।३८ | गत कालो (शान्ति ४.१५) ३६८।५१ | गरीय सौर (सूक्ति ३३ ३३) २४०।१३३ ख्याता वय (शा प ३६९६) ३००।६८ | गत कालो (शान्ति ४ १३) ३६८।५० | गरीयस प्रचुर (शिशु १७ ५४) १२७।३ ख्यातिं गमयति (सु १५४) ३०।१५ | गतप्राया रात्रि (सु १६१२) ३०६।४२ | गर्जति वारिदपटले ३४०।१२ ख्याति यत्र गुणा (सु २८४) ५३।२७२ | गत्या पुर (शिशु ९ २) २९४।३१ | गर्जद्भीमभुजङ्गभीषण ७।८७ ग | गतवति दिननाथे २९५।५६ | गर्जन्नम्बु ददाति २१३।६८ गगनविपिनसिंह ३०१।७४ | गतवलयराजत (शिशु ९ ८) २९४।३६ | गर्जन्हरि (भट्टि २ ९) २०७।१ गङ्गा च धारयति ६५।१३ | गतश्रीर्गणका (शा प १३१८) १५५।९३ | गर्ज वा वर्ष (मृच्छ ५ ३१) २९८।४ गङ्गातरगकणशीकर (भर्तृ ३ २५) ९७।८ | गतसारेऽत्र संसारे ३६७।२० | गर्जसि मेघ न (चातका ४) २१२।३२ गङ्गातीरे हिम (भर्तृ ३.९२) २६९।६५ | गताः केचित्प्रबोधाय ३६४।११ | गर्जितबधिरी (शा प ८६०) २१२।३१ गङ्गादीना सकल २३५।१५९ | गतागतकुतूहलं ३५१।३४ | गर्जितमाकर्ण्य २३०।२० गङ्गा पाप शशी ता (भर्तृ स ४७६) ४५।६ | गता गीता नाश ९९।२४ | गर्जित्वा मेघ (शा प ५९६) २०७।१५ गङ्गाम्भसि सुरत्राण १२६।२९ | गतानुगतिको (हि १ १०) १६३।४३५ | गर्दभ पटहो १६५।५६४ गङ्गावारिभिरुक्षिता ९।१२२ | गता सा कि स्थानं १९१।८२ | गर्भग्रन्थिषु वी (सूक्ति ५०.५) ३३३।१०१ गङ्गासागरसङ्गमे १३७।६१ | गतास्तातभ्रातृ (राघवदेव) ३६८।४१ | गर्वं नोद्वहते न (भर्तृ स ४८२) ५३।२६८ गङ्गीयत्यसिताषगा १०९।२२३ | गतास्ते दिवसा यत्र २४८।८४ | गर्वं मा कुरु २४०।१२७ गङ्गीयत्यसिताषगा १३६।५४ | गते तस्मिन्थानौ (मल्लट १२) २०९।१२ | गर्वग्रन्थिथलगुर्ज्जर ११२।२७८ गङ्गेवाघविनाशिनी ८७।३४ | गतेनापि न (शा प ४१२६) ३७२।१५३ | गर्वायसे विक्रञ्चक्रोर २३८।७४ गङ्गोत्तुङ्गतारङ्गरि ३७१।११० | गतेऽपि वयसि (सु २६४५) १५३।६ | गर्वाविशविशाल १२०।१३९ गच्छ गच्छसि (काव्या २ १४१) ३३०।१ | गते प्रेमानन्धे (अमरु ४३) ३८७।७ | गलत्स्नेहा (शा प ३४७७) २८९।५८ गच्छति न तृप्तिमेतत् २७३।४ | गते मुखच्छद (शिशु १७ ६७) १२७।१६ | गलिता (शा प ४११७) ३७२।१४७ गच्छन्ति काजि (शा प ५५१) १९८।४१ | गतेर्भङ्ग खरो हीनो ७३।९ | गले पाशस्ती (शा प ९३१) २३२।७६ गच्छामीति मयो ३२१।२२ | गते शोको न(चा नी १३ २) १५९।२७७ | गवादीना पयोऽन्ये (सु ८५४) ४५।५ गच्छाम्यच्युत (कुव १५५) २४१।५४ | गते सुहृदि शत्रुता (सु ३२०३) ६७।५३ | गवार्थे ब्राह्मणा ३८३।२६७ गजकदम्बक (शिशु ६ २६) ३४१।३२ | गतै सहावै (किरात ८ २९) ३३८।७४ | गवाशनाना स शृणोति ८७।२३ गजपतिद्वयसीर (शिशु ६ ५५) ३४६।१६ | गतोऽस्मि तीर (नीतिप्र ७) २१७।४५ | गवीशपत्रो नगजार्र्ति १३।५ गजभुजंगमयोरपि (भर्तृ २ ८७) ९२।६८ | गत्वा द्वारवती (सूक्ति ८९ २) ३६५।४८ | गाङ्गमम्बु (काव्यप १० १३८) २२१।१२ गजव्रजाक्रमण (शिशु १७ ६५) १२७।१४ | गत्वा नूनं (शिशु १८ ६३) १३०।९३ | गाङ्गयामुनयोगेन तुत्य १३।२ गजस्य पङ्कमग्नस्य २३१।५५ | गदोदन्ता दन्ता ७६।४० | गाजीजह्नालुद्दीन ११३।४ गजाननाय महसे २।३ | गन्तव्या राजसभा १५१।३६४ | गाढ गुणवती १५७।२०७ गणयति (सु २३०२) ४४।१, ३६४।२४ | गन्तु प्रिये वदति ३२९।१० | गाढं प्रौढाङ्गनाभि २९५।७२ गणयन्ति नापशब्द (सु १५२) ३७।१० | गन्तु सत्वर (सु १७१२) ३३९।१२० | गाढकान्तदशन (सा द ४ ९) १०४।८५ | गन्तुर्विवक्षुदये (व्यक्ति.३७ ३) ३२९।८ | गाढालिङ्गन (अमरु ४०) ३१६।७५
सस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः
२७
| श्लोकांश / विषय | संदर्भ | श्लोकांश / विषय | संदर्भ | श्लोकांश / विषय | संदर्भ |
|---|---|---|---|---|---|
| गाढालिङ्गन (शृङ्गारति २१) | ३१।१३९ | गुणवद्भि सह सगम | ६२।१२ | गुरुतरकल नूपू (शिशु ७ १८) | २६९।४२५ |
| गाढाश्लेषनिपीडना (सु २०८२) | ३२९।४३ | गुणवन्त (शा प ३०३) | ८२।३४ | गुरुतामुपयाति यन्मृ(शा प ३९८) | ७३।२६ |
| गाढाश्लेषविशीर्ण (अमरु ७४) | ३२९।२२ | गुणवानपि नोप | १७५।९३४ | गुरुत्रासादासादितभ | ३२८।२ |
| गात्रं कण्टक (शा प १०४२) | २४२।१६१ | गुणवान्सुचिरस्थायी (दृ श ६५) | ८२।३० | गुरुपत्न्या निशावी (कथाणंव) | १५०।१७५ |
| गात्रं ते (शा प ८८०) | २२८।२१४ | गुणा कुर्वन्ति (शा प २९०) | ८१।१ | गुरुभिर्द्विजाती (वृ चा ११ ८) | १६९।७१५ |
| गात्रं सकुचितं (शा प ४१६१) | ९६।१६ | गुणा सर्वत्र (चा नी १६ ७) | ८१।५ | गुरुरपि लघूपनीतो | ८७।२२ |
| गानान्धैस्तु परं पारं | ८४।२ | गुणागारे गौरे यशसि | १३९।७ | गुरुरेक कविरेक सदसि | १०१।६ |
| गान्धर्वं गन्ध (भर्तृ स ४८५) | १५९।२६६ | गुणा गुणज्ञेषु (गुणरत्न ५) | ८२।४० | गुरुनयं भार (शा प ९६६) | २३४।१४४ |
| गान्धारा गुप्तदारा | १२६।२१ | गुणानर्चन्ति जन्तूना (दृ.श ८४) | ८२।२८ | गुरुशुश्रूषया वि (विक्रम १२८) | १५९।१५७ |
| गाम्भीर्येण (काव्या २ ८५) | १२०।१४७ | गुणाना सा (सु ४५१) | ६०।२५३ | गुरुषु मिलितेषु | २४७।६८ |
| गायति गीते शसति | २८८।११ | गुणानामज्ञाता प्रचुरधन | ८२।४५ | गुरुसमीरसमीरितभू | १२९।५१ |
| गायति हसति (शा प ५७९) | २०८।३० | गुणानामज्ञानादनु | २४६।३३ | गुरुस्कुर्वन्ति ते (किरात ११ ६४) | ७९।१३ |
| गायन्तीना गोपसीम | २२।१२३ | गुणानामन्तर (दृ श २२) | १६८।६७२ | गुरो सुता मि (पच २ ११४) | १६५।५३० |
| गायन्तु (सु २४१४) | ११८।१९९ | गुणानामेव (स क ४ १२५) | २३४।१४० | गुरोरधीताखिलवैद्यविद्या | ४३।१ |
| गावो गन्धेन (विक्रम ११७) | ३८३।२६८ | गुणान्भूषयते रूप | १५९।२५९ | गुरोरप्यवलिप्त(भा १ ५५९५) | १६७।६३४ |
| गाहन्ता महिषा (अ शा २ ६) | १४।१९ | गुणापवादेन (किरात १४ १२) | ५९।२२३ | गुरोगिर पञ्च दिना (लटक २ १४) | ४३।२ |
| गिरयो गुरवस्तेभ्यो | ४७।१०५ | गुणायन्ते (गुणरत्न ६) | ५१।२३६ | गुह्यमैथुनध (चा नी ६.१९) | १६२।४०२ |
| गिरयोऽप्यनुन्नति | १०३।७६ | गुणालयोऽप्य (पच १ ४१५) | १४९।३०२ | गूढालिङ्गनगण्डचुम्बन | २९२।३१ |
| गिरा देवी वीणागुण | ३५।१५ | गुणाश्रयं (हि २ ११७) | ३४९।६२ | गृध्राकारोऽपि (पच १ ३२५) | १५०।३४३ |
| गिरिगहरेषु गुरुगर्व | २३१।६७ | गुणिगणगण (हि १ १०८) | ४०।२६ | गृहमध्यस्य खा (पच २ १५४) | ७१।२७ |
| गिरिर्महानिगिरेरब्धि (कुव १०८) | ७६।१३ | गुणिने समीपवर्ती (सु २४७) | ४८।१४५ | गृहिणी सचिव (रघु.८ ६७) | ३६२।१५ |
| गिरौ मयूरा (नीतिसार १) | १७३।८६६ | गुणिन जनमा (शा प २९६) | ६२।२ | गृहीत ताम्बूल (शा प.३४७५) | ३८९।५७ |
| गीतं कोकिल ते | ९४।१०५ | गुणिना गुणेषु | ५६।१२१ | गृहीता पाणिभि(कुमार १६ १४) | १२७।६ |
| गीतशास्त्रविनो (शा प २०२) | १५३।२३ | गुणिना निर्गुणाना | १५६।१६० | गृहे जानुचर कल्या | ८९।२ |
| गीतान्तरेषु (कुमार ३ ३८) | ३३१।३३ | गुणिनामपि निरूप (वासव ८) | ४८।११८ | गृहेश्वरी (स्कान्द मा कौ १४) | ३८९।४८१ |
| गीत्वा किमपि (शा प ५२२) | १८५।३० | गुणिनेि गुणज्ञो रमते (सु २५३) | ८१।३५ | गृहन्तु सर्वे यदि वा (कुव ७३) | ३८।१९ |
| गीयन्ते यदि पन्न | १३७।६५ | गुणिनोऽपि हि | ८१।२४ | गेह दुर्गतबन्धुभि | ५३।२७५ |
| गीर्भिर्गुरुणा परु (रसगगाधर) | १७३।८६० | गुणी गुण वेत्ति (गुणरत्न ४) | १७५।९२७ | गेहादङ्गणमङ्ग (शा प ३४७८) | २८९।६७ |
| गीर्वाणा प्रतियन्ति | ३६५।८ | गुणेन स्पृहणीय (गुणरत्न १३) | ८१।१८ | गेहे गेहे सुभग | ११९।१२७ |
| गुजति मञ्जु मिलिन्दे (रसगगाधर) | २३९।८१ | गुणेषु क्रियता (शा प २९८) | ८१।१२ | गैरिकमन शिलादि | १९६।१३ |
| गुञ्जन्ति प्रतिकुञ्ज | २८५।३९ | गुणेषु यत्न (मृच्छ ४ २३) | ८२।४१ | गोकर्णं गाहमाना | ३४२।८० |
| गुणं पृच्छख मा | १६७।६४५ | गुणेष्वेव हि (मृच्छ ४ ०२) | ८१।१० | गोकर्णराडाभरणं य | १९०।६५ |
| गुण आकर्षणयोग्यो | ८२।३२ | गुणे पूजा (दृ श ७१) | ८१।२६ | गोगजवाहनभोजन | १९०।६३ |
| गुणग्रामाभिसंवादि(प्र राघव १ ५) | ४५।११ | गुणे सर्वज्ञक (चा नी १६ १०) | ८१।११ | गोत्रस्थिति न मुञ्च (शा प २४१) | ४६।४८ |
| गुणदोषावनिधि(हि २ १४३) | १६४।४८९ | गुणैस्तुङ्गता (चा नी १६ ६) | ८१।१६ | गोत्राचारविचारपा | ११६।६० |
| गुणदोषावशास्त्रज्ञ (सु ३४९) | ५६।९१ | गुणैर्गौरवमायाति (शा प २९९) | ८१।१३ | गोत्रे साक्षादज(सूक्ति ७४ १२) | ३१३।५९ |
| गुणदोषौ बुधो (कुव ६) | ३८।१० | गुणो गुणान्तरा (चा नी ५ ६९) | ८१।२५ | गोनासाय नियोजिता (विद्ध १ ३) | १२।३३ |
| गुणभेदविदग्रिम | १०४।९१ | गुणो दूषणता या (शा प.३०४) | ८१।१५ | गोपायन्ती विर(शा प ३४२१) | २८६।१५ |
| गुणमधिगतमपि | १६९।७३१ | गुणोऽपि दोषता याति | ९१।२५ | गोपालेन प्रजा(पच १ २४१) | १४९।२९१ |
| गुणयुक्तोऽपि पूर्णोऽपि | ८१।२० | गुणोऽपि नून दोषाय | ४६।५१ | गोपालो नैव गोपा (शा.प ५१६) | १८४।३ |
| गुणयुक्तोऽप्यधो (शा प ३४४) | ८१।२३ | गुणो भूष्यते (चा नी ८ १४) | १७७।६४६ | गोभि क्रीडितवान्कृष्ण | ६२।४ |
| गुणराणिमहाभार (सु २१६) | ४६।७३ | गुम्फ पङ्कजकुञ्जलयुति | ३१।४७ | गोभिर्विप्रैश्च वेदैश्च | ८३।३ |
| गुणवज्जनसंपर्कार्याति (सु २१८) | ८१।२ | गुरु प्रयोजनोद्देशा | १६९।७१४ | गोवर्धनोद्धरणहृष्ट (सु ३४) | २२।१२८ |
| गुणवतस्तव हार न | २४६।२५ | गुरुणा स्तनभारे(सूक्ति.५४.९४) | २७०।३ | गोष्ठेषु तिष्ठति पतिर्व | ३५२।३१ |
| गुणवद्गुणवद्वा (भर्तृ २.९७) | ९३।८२ | गौरमुग्धवनिताव | २६८।३६७ |
| २८ | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां |
|---|
| गौरव प्राप्यते दा (सूक्ति.१८६.३) ६९।७ | घनैर्विलोक्य (कुमार १४ ३५) १२८।३९ | चण्डीजङ्घाकाण्ड ११।८ |
| गौराङ्ग्या भुजला २६४।२३६ | घनोद्यमे गाढतमेऽ ३४०।१८ | चण्डीशचूडाम(सा द ७ १२) २८२।१४४ |
| गौरीक्षण भूवरजा १९०।६९ | घनोऽय चेदभ्रेदुपरि २७६।३५ | चतुर सृजत (शा प १४९३) ३४८।१० |
| गौरी चम्पककलि(शा प ८१६) २२३।४८ | घर्मार्ति न तथा सु (हि १.९७) ५३।२६१ | चतुरङ्गबलो राजा ४४।१ |
| गौरीचुम्बनचञ्चल (लटक १ १) ७।८८ | घासग्रास गृहाण (शा प ९२८) २३३।९७ | चतुर्थैऽहि ह्ला (शा प ३७५८) ३५१।३३ |
| गौरीतनुर्नयनमायत ३६५।४४ | घूर्णन्ते तूर्णमेतत्कु १२६।२४ | चतुर्मुखो न च ब्रह्मा १८५।२४ |
| गौरीनखरसादृश्य(शा प ५३५) १९४।१८ | घृतकुम्भसमा (पञ्च सू ५४) १६२।४०८ | चतुर्ष्वपि समुद्रे (शा प ४०२४) ३६२।३ |
| गौरीपतेर्गरीयो गरल ४७।१५ | घृत न श्रूयते कर्णे १८१।१४ | चत्वार प्रथयन्तु (प्र राघव १ १)१५।३२ |
| गौरीव पत्या सु(नैषध ७ ८३)२६५।३४९ | घृतलवणतेलतण्डुल (सु ३१८८) ६६।३९ | चत्वारो धनदा(भर्तृ स ४९०)१५६।१६४ |
| गौर्गौ कामदुघा १६६।६०८ | घृष्टं घृष्टं पुनरपि पु ५१।२२९ | चत्वारो वयम् (वेणी १.२५) ३६१।४४ |
| ग्रन्थिमुद्ग्रथयि (शिशु १० ६३) ३१५।२४ | घ्रात तालफला(सूक्ति ९७ ७२)१३२।३५ | चत्वार्याहु (भा २ २२७०) ३८०।१४५ |
| ग्रसति कोऽपि विमो २७८।३५ | घ्रात्वा श्रोणीम (शा प ५८६) २०७।१८ | चन्दन शीतलं लोके ८६।६ |
| ग्रसमानमिवौजसा (किरात ११ ५३) ७७।४ | च | चन्दन स्तनतटे (शा प ३७३९) ३२८।७ |
| ग्रामतरुण तरु (काव्याल ७ ३९)३५१।२० | चकितहरिणलो(का प्र १० ८७)३५०।४२ | चन्दने विषधरा (भल्लट ३२) २४२।१६५ |
| ग्रामाणासुपशल्य (शा प ९१३) २३०।४२ | चकोरनेत्रेण दृगु (नैषध ७ ३२) २५९।८६ | चन्द्र समाश्रयति २१०।२९ |
| ग्रामेऽस्मिन्पथि (अमरु १३१) ३७३।९२ | चकोराणा चन्द्र १०६।१५५ | चन्द्र चन्दनकर्द (सूक्ति.४४ ९) २९०।८२ |
| ग्रामेस्मिन्प्रस्तर (कुव.१४९) ३५४।६७ | चक्रे सेव्यं नृ (शा प १३७८) १४६।१६१ | चन्द्रं चन्द्रार्धचूड ११४।२८ |
| ग्रावाणो मणयो (भल्लट ५०) २१६।२६ | चक्र पप्रच्छ पा (शा प १२६१)११४।२६ | चन्द्रं कलङ्करहित २६२।१८६ |
| ग्रासादर्थमपि ग्रास (पञ्च २.७३) ६९।६ | चक्रवरोऽपि सुरत्व ७६।३२ | चन्द्र क्षयी प्रकृति(विक्रम ९३) ५०।१९४ |
| ग्रासाद्गलितसि (शा प १२०८) २३१।५७ | चक्र ब्रूहि विभो गदे १५।३८ | चन्द्रकान्तगलदम्बुना ३२३।७ |
| ग्रीवाद्धतैर्वावड(नैषध ७ ६६) २६६।३०६ | चक्राङ्गो विरही (शा.प ३५९५) २९६।१० | चन्द्रपादजनित (कुमार ८ ६७) २९९।३० |
| ग्रीवाभङ्गाभिराम (अ शा १ ७) २०७।७ | चक्रीकृतभुजलता २६९।४२६ | चन्द्रबिम्बरविविम्ब ३४०।३ |
| ग्रीवास्तम्भभृत (शा प २०७) ४१।६५ | चक्री चकारपङ्क्तिं (सूर्यशतक.७१)२७।१४ | चन्द्रखण्डकरायते (शृङ्गारति १६) २७४।८ |
| ग्रीष्मादित्यकरप्र (शा प ५८८) २०८।२७ | चक्री त्रिशूली न हरो १८५।३५ | चन्द्रश्चन्दनमिन्दुरि १३७।५९ |
| ग्रीष्मे ग्रीष्मतरै २९१।४२ | चकुरेव लल (शिशु १० ६६) ३१७।२७ | चन्द्रादित्योरिनेत्र १७।१३ |
| ग्रीष्मोष्मप्लोष(श प ३८५५) ३४०।१२९ | चक्रे चण्डरुचा समं ३४६।३२ | चन्द्राद्भूत्यकमण्डलो १३७।६० |
| ग्लानिच्छेदि क्षुत्प्र १३०।१०६ | चक्रेण विश्व यु(नैषध ७ ८९) २६८।३७८ | चन्द्राधिकैतन्मु(नैषध ७ ४४)२६१।१५६ |
| घ | चक्षु पूत न्य (शा प ४५५१)१५६।१४१ | चन्द्राननार्यदेहाय ३।४ |
| घट भिन्यात्पट(शा प १४६८) १५४।५० | चक्षु प्रीत्या (सूक्ति ७५ १०) २९५।१२२ | चन्द्रायते शुक्(काव्याल ८ २८)३४४।१६ |
| घटन विघटनमयवा (सु २३९७)७०।२८ | चक्षुर्जाड्यमपैतु ३०७।५८ | चन्द्रे शीतलवल्यली ३४६।२० |
| घटमानकोककुचमाम् ३२७।६ | चक्षुर्मेचकसम्बुज २७२।५७ | चन्द्रो जड कदलि २५३।२२ |
| घटितमिवाञ्जन (सा द १० ४५) २९७।६ | चक्षुर्लुप्तमपीकणं (सूक्ति ५८.७) ३११।२५ | चन्द्रोदये चन्दनमङ्ग २९८।११ |
| घटीयन्त्रायते हारी २६६।३०० | चञ्चच्चन्दनखाग्रभेदवि १९।५० | चन्द्रो द्वादश भास्कर २९२।३५ |
| घटो जन्मस्थानं (शा प ५०५) ५२।२५४ | चञ्चच्चन्द्रिकचन्द्रचारु ६।७४ | चन्द्रोऽनेन कलङ्कि १२२।१७४ |
| घण्टानादो नि (शिशु १८ १०) १२९।५७ | चञ्च्चेलाव्रला (शा प ३९२६) ३४७।४२ | चपलतस्तरङ्गै (शा प १०९२) २१६।२१ |
| घण्टारवै रौद्रत(कुमार १४ ४७)१२९।४८ | चञ्चत्कर्पूरचौरा(शा प.३८१२) ३२७।३९ | चपलबृदये कि (अमरु ५६) ३०८।११ |
| घनघनमपि दृष्ट्वा (शा.प ३५७३)३०९।१ | चञ्चत्काञ्चनशैलाव २६५।२७० | चरणकमलदासस्त्वे ३०६।३४ |
| घनघनाघनकान्ति १९५।०४ | चञ्चद्देवेन्द्रकुञ्जरथलि १०।१६० | चरणकमल तदीय २६९।४०९ |
| घनतरघनवृन्दच्छादिते ३४१।५० | चञ्चद्रादशमील (शा प ५३२) १९१।८६ | चरणपतनप्रत्याख्या(अमरु ५०) ३५०।५० |
| घनतरघनवृन्दच्छा ३४१।५१ | चञ्चद्धुजभ्रमितच (वेणी १ २१) ३६७।३ | चरमगिरिकुरङ्गी (सूक्ति ८२ २५) ३२२।७ |
| घनतरतिमिरघुणो(सूक्ति ६१ १३) २९९।१ | चञ्चरीक चतुरोऽसि २२३।६७ | चरमगिरिनिकुञ्जमु २९७।२२ |
| घनसन्तमसमली (भल्लट. १८) २२९।२३५ | चञ्चल वसु (किरात १३ ५३) १५१।३९३ | चराचरजगत्स्फार (रसगङ्गाधर) १।८ |
| घनसमयमहीभृत्प ३४१।४९ | चटचटिति चर्म (शा प.१२६) १९।४८ | चरेद्धीमानकण्टको १५०।३३८ |
| घनसमये शिखिषु २००।४२ | चण्डचाणूरदोर्द (सु ३३) २२।१०५ | चर्मखण्ड द्विधा(भर्तृ.३ १७) ३७१।१२३ |
संस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः
| चलं वित्तं चलं चित्त ९८।५ | चित्रं नर्तनमम्बरे १८४।७० | चेतोभुवश्चापवति २५०।१० |
| चल चेत पुमा ३५७।५५ | चित्र महानेत्र बना (रसगङ्गाधर) ३६३।१२ | चेतोहरा (शा प ४१३०) ३७३।१७४ |
| चलत्कर्णानिलोद्भूत (शा प ५७) २।६ | चित्राभिरस्योपरि (शिशु ३ ४) १२३।३ | चेत्पोरादपि शङ्कसे ३५३।५० |
| चलत्कामिनमोनी (शा प ३२९०) २५७।४ | चित्राय त्वयि चिन्ति २९१।९२ | चेलाञ्चलेन (शा प ३९१०) ३४५।५३ |
| चलत्तरङ्गरङ्गाया गङ्गा १८१।११ | चित्रास्वातीगता १६६।२८५ | चोलं नीलनिचोल ३५९।९३ |
| चलत्येकेन पादे (शा प १४६३) १५४।३५ | चित्राखादक (पंच १ ४१६) १४९।३०३ | चोलाङ्गनाकुचनि ३२५।११ |
| चलद्दूलोत्कादशनाक्षि ३४०।१ | चित्रोत्कीर्णाद (शा प ३४९४) २८९।५० | चोली चोली न तु कल १२५।९ |
| चलद्भङ्गीमिवा (रसगङ्गाधर) २६२।१६१ | चिन्तनीया हि (शा प १४४०) १५३।१७ | च्युता दन्ता (शा प ४२३) ७६।६ |
| चलन्ति गिरय कामं ७७।२ | चिन्ता मुञ्च गृ (शा प ०५४) २३४।१३४ | च्युतामिन्दोर्लेखा (शा प ९६) ५।४८ |
| चलन्ति येषा (शा प १५७१) १४३।४३ | चिन्तागम्भीरकू ११२।२७९ | च्युतोऽप्युद्गच्छति (सु ०२३) ४६।७६ |
| चलापाङ्गा दृ (अ शा १ २०) २८३।१६० | चिन्ताचक्रिणि हन्त ७९।७ | छ |
| चलेषु स्वामिचित्तेषु ९७।२ | चिन्ता जरा म (चा नी १२ ५) १५५।८२ | छत्रवारी न राजासौ १८४।१२ |
| चाञ्चल्य चरणौ विहा २५७।५९ | चिन्ताभि (सा द ३ २०८) २८६।२८ | छत्र सैन्युरजोभरेण ११७।९१ |
| चाञ्चल्यमुच्चै श्रवसस्तु ६३।२३ | चिन्तामोहविनिश्च (अमरु ८७) ३२९।२३ | छन्न कार्यमुपक्षि (मृच्छ ९ ३) १३९।५ |
| चाटतस्क (याज्ञ स्मृ १ ३३६) १४९।२९९ | चिन्तासक्तनिम (मृच्छ ९ १४) १०१।१४ | छादयित्वात्मभावं (प्र भ १६) ३८६।३६४ |
| चाण्डाल पक्षिणा १५९।२८० | चिन्तासहस्रे (शौन नी ११५) ३८९।४७८ | छादित कथ (शिशु १० १९) ३१५।२२ |
| चाण्डालश्च दरिद्रश्च ६५।६ | चिन्त्यते नय ए (दृ श ७) १५०।३५५ | छाया प्रकुर्व्वन्ति (शा प ११२३) २१९।७ |
| चातकः खलुमा (शा.प ७७०) २११।२ | चिन्वच्चोरचिक्की (शा प ३६०८) २९७।३३ | छायाफलाने (शा प १०२०) २२०।५ |
| चातक धूमसमू (शा प ८५७) २२६।१५१ | चिर ध्याता रामा ३७४।२१५ | छायाभि प्रथम २३६।२५ |
| चातकश्चिचतुरा (पूर्वचातका २) ४९।१६० | चिरमपि क (किरात १०.४८) २८८।३७ | छायामन्यस्य कुर्वन्ति (विक्रम.६५) २३६।४ |
| चातकस्य खलु (शा प ८५४) २१२।२५ | चिरमाविष्कृतप्रीतिभी ११।७ | छायावन्तो गत (शा प ९७८) ४५।७ |
| चातुर्य्यैककचिह्न २६३।२०६ | चिररतिपरिखेद (शिशु ११ १३) ३२२।३ | छाया वियोगिवनि ३३६।१७ |
| चादय इति यत्र २००।४३ | चिरविरहिणो रत्यु (अमरु.४४) ३१९।३५ | छाया संश्रयते तलं (कुव ५८) ३३७।५१ |
| चान्द्री लेखा (प्र राघव ६ ३) १९८।१००६ | चिरशान्तो दूरादह २३०।१२० | छायासुसमृग (पंच २ २) २३६।१९ |
| चापाचार्य्यस्त्रिपुर (बालरामायण) ३६०।३४ | चिरादक्ष्णोर्जा ११५।२९ | छित्त्वा पाशम (पच २ ८८) ९४।१०६ |
| चामरे श्रीक (शा प १४१३) १४५।१०७ | चिराद्यत्कौतुकाविष्टं १०१।२ | छिद्रान्वेषण (शा प ३६१९) ३५७।३३ |
| चारुता परदारार्थं ५६।९५ | चिराय सत्सगमङ्गु (सु ०६२) ४९।१८५ | छिन्न सुनिश्चितै २४२।२०२ |
| चारुता वपुर (शिशु १०.३३) ३१५।३६ | चिरेण मित्र संधी १६६।५८२ | छिन्नेऽपि (शा प ३९८९) ३६०।१६ |
| चारूनू पुरसणत्कृ (शा प ३६८९) ३१८।८ | चीत्कारैरनाश्यन्त १४३।४७ | छिन्नोऽपि रोहति (भर्तृ सं २४६) ४७।९३ |
| चिकीर्षितं वि (भा ५ १०८९) ३९४।६९९ | चीराणि कि पथि (भर्तृ म ४९७) ७५।१५ | छेत्ति ब्रह्माशिरो (शा प ११६१) २७५।६ |
| चिकुरप्रकरा जय (नैषध २ २०) २५७।१९ | चुम्बनेषु परिव (रघु १९ २७) ३१८।६ | छेदश्चन्दनचूत (नीतिसार ६) १७८।१०१६ |
| चिता प्रज्वलिता दृष्ट्वा ४४।३ | चुम्बन्तो गण्ड (शा प ३९४५) ३४८।१९ | ज |
| चिता दहति निर्जी (प्र म.१७) ३९४।६७० | चुलुकयसि चन्द्रदी २८३।१६३ | जगति जयि (मालती १ ३९) २७९।६९ |
| चित्तनिर्वृतिनिधायि ३१६।६३ | चुलीसीमनि (शा प ३९४१) ३४८।१५ | जयति नैशमशी (शिशु ६ ४३) ३४४।३१ |
| चित्तभूवित्तभूमत्त ३७४।२१३ | चूडापीडकपालसङ्क (मालती.१.१) ९।१२१ | जगति विदितमेत २४८।८३ |
| चित्तायत्तं धातुब १७१।८१५ | चूडापीडाभिराम १२५।१८ | जगतप्रसूति (किरात ४ ३२) ३४४।२४ |
| चित्ते निवेश्य परि (अ शा २.९) २५३।२१ | चूडारत्नमपानिधि २९१।९७ | जगतिसुक्ष्माप्रलय (सु ४) ४।३२ |
| चित्ते भ्रान्तिर्जायते १००।६ | चूडारत्नै स्फुरद्भिर्वि २९८।४० | जगदिव बहुलातपा २९४।४७ |
| चित्रं कनकलताया ३६३।७ | चूडाशीतकरस्तनवय ९।१२५ | जगद्द्द्मूमू (नैषध ७ १००) २६९।४१४ |
| चित्र कनकलताया ३६३।११ | चूतश्रेणीपरि (शा प ३८१२) ३२६।२७ | जगन्नेत्रानन्दं वद २६३।१९६ |
| चित्रं चि (का.प्र १०.५३६) १७१।१५८ | चूताङ्कुरास्वादक (कुमार ३ ३२) ३३१।२९ | जगौ विवाहावसरे ३३१।१९ |
| चित्रं तपति राजेन्द्र (कुव ७९) १३३।१ | चूताना चिर (अ शा ६ ४) ३३३।९४ | जग्ध्वा माषमयान ३६५।५४ |
| चित्रं न तयदय (शा प.११४५) २२०।७ | चेत कर्षन्ति (शा प ३९१०) ३४५।४७ | जघान बाणैर्दश ३१३।४२ |
| चेत प्रसादनजनन (सु १६१) ४०।५१ | जङ्घाकाण्डोरु (का प्र. ७ १५०) १३१।५० |
| ३० | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां |
|---|
| स्तम्भ १ | स्तम्भ २ | स्तम्भ ३ |
|---|---|---|
| जङ्गे तदीये (शा प ३३५८) २६९।३९९ | जयश्रिय कृपाणीय ११५।३२ | जाता शुद्धकुले १८४।३९ |
| जटा नेयं वेणीकृत (कुव २९) २८५।४४ | जयश्री (गीत ११ ०० ४) २३।१३८ | जातिमात्रेण किं (हि १ ५८) १६३।४४३ |
| जटाभाभि (का प्र १०.१४०) ३०१।८१ | जये च लभते (हि.२ १७२) १४७।२२० | जातियांतु रसातल (भर्तृ स २५) ६४।१५ |
| जठरज्वलनज्वलता २२९।१८ | जये वरीया (शा प ३०८५) २५१।३४ | जातिस्तस्य न २२८।२३० |
| जडास्त (शा प ४१७५) ३७५।२३८ | जरठ इव मरालो ३२।२६ | जाते जगति ३५।१९ |
| जडे प्रभवति (सु २९२) १८८।६॥३ | जरःशृग (म क ७ ६२) ७०।१४ | जातेति कन्या महती ९०।१ |
| जडेषु जानप्रतिभाभि ४०।३१ | जरा हरु हर (भा प १३४१) १७५।१३३ | जातोऽह ३७१।१०६ |
| जन जनपदा नित्य (हि २ ७८) १४५।१४१ | जरीज़म्भन्न्रौद्रद्य ३४६।२७ | जायन्त्याय च दुर्भु(भर्तृ स १०९) ३५५।९ |
| जनक सानुविशेषा २३७।४५ | जर्जरनॄणा (आ प ८९६) २२९।२३४ | जात्युत्कृष्टस्य हि ८१।२२ |
| जननी जन्म १५७।७० | जलद ममुद्रसेवा २१२।१९ | जानन्ति (शा प १४४८) १५३।२४ |
| जनयन्त्यर्जने दुख (हि १ १८४) ६८।८ | जलदपङ्क्ति (शिशु ६ ३१) ३४१।३७ | जानन्ति हि गुणा १५५।१२२ |
| जनस्थाने भ्रान्त (हनु १० २४) ७३।३३ | जलवर जल (शा प ७६९) २११।१५ | जानन्नपि (पच ४.३७) १६०।३३५ |
| जनि सरोऽङ्गादपि २४४।२२० | जलवर निर्ल (मृच्छ ५ २८) २९८।७ | जानाति वि (भा प १०७५) ३९३।६४३ |
| जनिता चोपने(चा नी ५ १२) १६५।५४२ | जलनिधौ जनन २७५।७७ | जानामि नागेन्द्र तव ८६।१२ |
| जनो दुर्लक्ष्यो (शा प ३६१८) ३५६।२६ | जलविन्दुनि (चा नी १२ १०) १५६।५५३ | जानीमस्तव गौरि २८६।३० |
| जन्तोर्निरुपभोगस्य (दृ श ३४) १६८।६८७ | जलग्नोत्पत्तित्कृते २८५।१७ | जानीमहे (सा द १० ६३) २७३।५ |
| जन्म क्षीरनिधौ २११।४६ | जलमसिषिंप श(हि १ १६५) १५३।४५७ | जानीमो वदन २७२।७४ |
| जन्म क्षीरमहार्णवे २११।३८ | जलरेखा खल(वृ.चा १७ ९) ३९३।६६६ | जानीमो वयमासनस्य २७२।७५ |
| जन्मनि केशबहु (हि १.१८६) १६३।४६३ | जलबिललितवस्त्र ३३९।११५ | जानीयात्सगरे (चा नी १ ११) १५५।९८ |
| जन्म ब्रह्मकुलेऽप्रजो ९४।११९ | जलसेकेन वर्धन्ते ८०।२५ | जानुभ्यामुपविश्य ५८।३३२ |
| जन्मस्थान न (शा प १२०२) २४७।६१ | जलाद्रीं शष्पा । ३३६।२३ | जानुस्थापितदर्पणं २५८।३६ |
| जन्मान्तरीण (सा द १०.०६) ११।५ | जलाहुती(कथा मा १२ ४२) ३८७।३९५ | जाने कोप (शा प ३४५४) २८०।८९ |
| जन्माभूदुदधौ २३७।३७ | जले तैल खले (चा नी १४ ५) १५६।१३८ | जानेऽति (नैषध ७ ३९) २६१।१५१ |
| जन्मिनोऽस्य(किरात ११ ३०) १६१।३७३ | जलाकयो (काशीखण्ड३८ ८५) ३८८।२८४ | जाने युष्मत्प्रयाणे १२६।२३ |
| जन्मेन्दोरमले (वेणी. ६ ७) ३६१।३६ | जलौका के(काशीखण्ड३६ ८६) ३८४।२८५ | जाने रात्रिशु २६७।३४५ |
| जन्मैव मास्तु यदि ३५२।३० | जत्पन्ति मार्य (चा ना १६ २) ३४८।५ | जाने खन्न्र (म क ५ १६९) २८१।१९९ |
| जन्मैव (शा प ४१४९) ३७४।२०५ | जद्यो हि ससे (वानराष्टक ८) १७४।८९७ | जामाता जठर १५७।१६९ |
| जम्बीर वा कमल २६५।२९२ | जहाति सहसासन ७२।५७ | जामाता पुरुषोत्तमो ९४।१०२ |
| जम्बीरश्रियमति (रसगङ्गाधर) २६५।२८९ | जहीहि कोप (किरात ८ ८) ३०८।९ | जायन्ते नव सौ १९३।९४ |
| जम्बुद्वीपगृह १२२।१८६ | जहीहि गुरुगर्जिन २३२।७९ | जालान्तरप्रेषित (रघु ७ ९) १२६।३५ |
| जम्बूफलानि पक्वानि १८१।२२ | जाग्रत (शा प ३३६१) २६९।४०४ | जाल्मो गुरु २३४।१४१ |
| जम्भारातीभ (सूर्यशतक १ २) २७।११ | जाड्य धियो हरति (भर्तृ स ४२) ८७।२९ | जाह्नवी मूर्ध्नि पादे वा १३।१ |
| जम्भारिरेव (शा पू ११६९) २८५।१० | जाड्य हीमति (भर्तृ स २४) ६१।२६३ | जिप्रत्याननमिन्दु २७१।५६ |
| जयति जटाकिजल्कं ४।२२ | जात कूर्म स (भर्तृ स २४८) ९८।११ | जितरोषतया (शिशु १६ २६) ४९।१५६ |
| जयति परिमुषित ९।१३५ | जात केलिकलावती २३८।६० | जितेन्दुपुद्गलावण्य २६२।१६० |
| जयति प्रियापदान्ते ४।१८ | जात सूर्यकुले पिता(धर्मवि १०) ९३।१०१ | जितेन्द्रियत (का प्र १० १३९) १०३।६१ |
| जयति मनसिज २५०।१ | जात स्तम न २२०।१० | जितेन्द्रिय (किरात ?) १७३।८६९ |
| जयति ललाटस्फाल ९।१३८ | जानमात्र न (पच १ २५६) १७७।१९६ | जिते लक्ष्मीमृते १५०।३५१ |
| जयति स नाभि (वेणि [पा १] १०) १७।६ | जानश्च नाम न विन ७०।३५ | जिह्वो लोके कथ ६१।२५८ |
| जयति स भग (वेणी [पा] १.२) १४।४ | जास्तस्ते निशि ३५६।१६ | जिह्वादूषितसत्पात्र ५५।७९ |
| जयत्युपेन्द्र स चकार १७।१७ | जाता पक्क (मुरारि) ३२५।५५ | जिहायाश्छेदन (शा प ४०३१) ३६३।१ |
| जयन्ति जगता मातु १६९।१ | जाता प्रासादपत्री २९८।२१ | जिहे लोचन (शातिश ४ १२) २७४।१०० |
| जयन्ति जितमत्सरा ५२।२५५ | जाता नोक्त (अमरु ८८) ३११।३२ | जिह्वारलोल्यप्रस (पच २ ३) १६४।५२० |
| जयन्ति ते पञ्चमनाद ३२।३० | जाता लता हि शाले (कुव ८२) ३६३।९ | जिह्वैकव सतामुखे ८३।४ |
| जयन्ति ते सुकृ (शा.प.१६६) ३२।१ | जाता शिखण्डिनी ३५।२७ |
सस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः । ३१
| जीयादम्बुवितनयावर(कुव १२१) १४।१३ | झ | तद्वितथमवा (शिशु ११.३३) ३०९।२ |
| जीयासु शकुलाकृते (शाप ८१) १७।७ | झगिति जग (प्र राघव १ ११) ११९।१२५ | तदाखण्डलाशा २५१।८० |
| जीर्णमन्त्रं प्रशं (मा ५ १०५०) १६२।८१० | झञ्झानिलोऽपि ३२५।१३ | तदा तदङ्गस्य (शाप ३३७९) २७०।२९ |
| जीर्णा तरि सरि २८६।४१ | झग्झर्णितकङ्कण १३१।११३ | तदात्वप्रोन्मीलन्म २५५।३२ |
| जीर्णेऽप्युत्कटकालकूट (हनु ९ ३६) ६।७८ | ट | तदात्वज्ञाताना (शा प.३८३४) ३३६।२२ |
| जीर्णोऽपि क्रमही २२९।६ | टिड्डाण्डद्वयसङ्क्रुद्धोऽसि ७२।१ | तदा मुग्धं वक्रं २७९।७६ |
| जीवञ्जीवयति हि यो ७०।२५ | ढ | तदा रम्या (किरात.११ २८) १६०।३७१ |
| जीवति (शाप ३७५५) ३६०।१९ | ढक्कामाहत्य मद ३५१।२४ | तदीयजघनाभोग २६८।३८४ |
| जीवनग्रहणे नम्रा (कुव २५) ५५।५१ | त | तदीयत्रिवलीमार्ग २६७।३३० |
| जीवन्त मृत (वृचा १३ ९) ३९२।६६७ | त वन्दे पद्मद्मद्मान (शाप ८५) १६।१ | तदेवाजिह्माक्ष (शाप ३५३८) ३१०।१५ |
| जीवन्तोऽपि (पच १२८९) १५५।१२३ | त एव पदविन्यासास्ता २०।६ | तदेवास्य पर मित्र यत्र ८८।९ |
| जीवन्त्यर्थक्षये ६६।३१ | त एवामी वाणान्तदपि ०३।९३ | तदोजसस्तद्यशस (नैषध १.१४) १३९।४ |
| जीवन्नेव (शाप ३१६७) ३६०।१४ | तक्षकस्य विषं (वानी १७८) ५४।३८ | तद्वृह यत्र वमति १६६।५७४ |
| जीवन्नपि न तत्कर्तुं ५६।११० | तटमुपगतं पद्मे ३४८।१९९ | तद्दिव्यमव्यय वाम ३।३ |
| जीवाकृतिं स चक्रे १३९।१२४ | तटस्थै ख्यापिता (वृश ६२) १६८।६९६ | तद्भोजन (वृ चा १५८) ३८७।३८६ |
| जीवामीति (शाप ३४४२) २८७।७ | तटिनि चिराय विचा २१८।१ | तद्गेदोऽन्तरक्षत २९५।६५ |
| जीवितं तदपि १७१।८१० | तडिन्मालालोलं (शातिश ६२) २६८।८७ | तद्व प्रमाष्टुं विपद प्र ११।१४ |
| जीवित इव कण्ठगते ४।२९ | तल्लेखेखा नेय (प्रराघव १३५) २७३।१६ | तद्वक्ता सदसि ब्रवीतु ८६।१५ |
| जीवेति प्रब्रुव (पच १५४) १४८।२६१ | तत कुमुद (भा द्रोण ८४०८) २९९।१ | तद्वक्त्र नेत्रपद्मं २६९।४२१ |
| जीवेन तुलितं प्रेम २७५।२ | तत कोकवधू (शाप ३७३३) ३२७।१ | तद्वक्तं यदि(बालरामा २ १७८) २७१।५१ |
| जुम्भाबर्जरडिम्ब (मालती ९ १६) १४०।४ | तत परामर्शविरुद्ध ३६५।२ | तद्वकाभिमुख (अमरु ११) ३०९।१२ |
| जुम्भा निष्ठीवन १५०।३२९ | ततश्चामिज्ञाय (अमरू ५२) ३५७।५४ | तद्विच्छेदकृशस्य २८२।१४२ |
| जुम्भारम्भप्रवित (वेणी २ ८) ३२४।४४ | ततोऽरुणपरि (वाल्मीकि) ३२३।१ | तद्वियोगसमुत्थेन २७७।७ |
| जुम्भाविस्तृतवक्त्रपङ्कज १७।१० | तत्कार्क त्वयि २२८।२०८ | तनुता तनुता नीता २०५।३ |
| जेतुं यस्त्रिपुरं हरेण २।२५ | तत्कालारभटीविजृम्भण ६।७३ | तनुत्यजा वर्मभृ (रघु ७ ४८) १२८।३१ |
| ज्ञातं ज्ञाति (शाप ३६१६) ३६३।५४ | तर्किं कामपि (गीत ७ १४ १) ३५८।७५ | तनुत्राण तनुत्राण (दश ४ २८) १२७।१ |
| ज्ञाता मैत्री सहज ३५३।४० | तर्किं काव्यमनल्पपीत ३२।४ | तनुह्हाणि (शिशु ६.४५) ३४४।३३ |
| ज्ञातिभिर्विन्ध्यते (गुणारत्नावली १२) २९।५ | तर्किं स्मरसि न २२५।१२६ | तनुग्ना इव ककुभ २९७।४ |
| ज्ञातु वपु परि ३७९।८५ | तत्कुचौ चरत २९४।२६१ | तनुस्पर्शादस्या २५४।३८ |
| ज्ञानं सतां (भर्तृ ३८३) ३८६।३८५ | तत्कृत यन्न (शाप १२४९) १२२।१७८ | तनोतु ते यस्य फणी १९६।९ |
| ज्ञानविद्याविहीनस्य ३९।१२ | तत्तद्दिग्जैत्रयात्रोद्धुर १२६।२० | तन्त्रावाप (शिशु २ ८८) १४७।११० |
| ज्ञानाब्धिश्चिरचण ४२।४ | तत्तद्ददत्यपि (शाप ३५३६) ३५७।४७ | तन्त्रातुन्दिलशोण ३२२।३० |
| ज्याकृष्टिबद्वखटका (अमरु १) ११।१९ | तत्तस्या कमनीय २५६।५३ | तन्नास्ति (शाप ३६९४) ३२०।१२ |
| ज्याघात का(प राघव ३ १०) ११४।२७ | तत्तादृक्तृणपुलकोप १४।१८ | तन्नितम्बस्य (शाप ३३५२) २६८।३७१ |
| ज्यायासम (मा १३ २६१०, १६०।३३९ | तत्तेजस्तरपेर्निदाघ २७१।१४९ | तन्मङ्गलं ३८५।३१५ |
| ज्योति शास्त्रमहोदधौ ४४।६ | तत्त्वं किमपि (रसगङ्गाधर) ३२।१६ | तन्मूलं गुरुताया (शाप ३२०) ७५।१३ |
| ज्योतिस्तमोहरमलोचन ३।१० | तत्र मित्र न (हि १ १०६) १६७।६३१ | तन्वङ्गया (शाप ३३४०) २६४।२४८ |
| ज्योत्स्नाचय पय (साद ७८) २९९।७ | तत्पादनखरखाना २६९।४२० | तन्वङ्गया गुरु (अमरू.९६) २७६।५० |
| ज्योत्स्नाभस्मच्छुरणध (कुव ५४) २९६।६ | तथा न पूर्वं (किरात ८ ४१) ३३८।८४ | तन्वन्ती तिमिरद्युति ११६।६१ |
| ज्योत्स्ना (काप्र १०४७२) २९१।९४ | तथा पौरस्त्याया ३०१।८२ | तन्वि त्वद्वदन(प्र राघव ७ ६५) ३१३।७८ |
| ज्योत्स्नी श्यामलि २८०।९९ | तयारिभिर्न व्यथते ५९।२२२ | तन्वी चारुपयोधरा १८६।१४ |
| ज्योत्स्नेव (काप्र १०४११) २५१।१८४ | तथ्य पथ्य सहेतु ८५।१७ | तन्वीमुज्झित (शाप १२७२) १३२।३० |
| ज्वलति चलिते १७०।७४८ | तदङ्गमपि नाम २८०।८८ | तन्वी शरत्त्रिपथ (अमरु १३५) २७१।३८ |
| ज्वलतु (मालती २२) २८४।२४ | तदपकृत विधि ४८।१९६ | तन्वी श्यामा २७१।४९ |
| ज्वलितं न (किरात २२०) ८०।३२ | तन्वी सा यदि २८०।९६ |
३२ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| तप सीमा मुक्ति (प्र भ १०) | ३८३।२४२ | तव तन्वि तरुणपुण्या | ३१८।५ | ताडिता अपि (पच ४ ५६) | ३४९।२८ |
| तपति तनुगात्रि (अ शा ३ १३) | २९१।५ | तव नित्यमुत्सव | १०५।१३४ | ताडितोऽपि (पच १ ९७) | १४४।८९ |
| तपनस्तपति स्म | ३४७।६ | तव निर्वेणीदृष्टणं | १०३।५१ | तात क्षीर (शा प १११७) | २१८।८० |
| तपखिनोऽप्यन्त | २०२।८३ | तव विरहमसहमाना | २८८।१२ | तात त्वं निजकर्म | ३६३।४० |
| तपस्वी का गतोऽवस्था | ११।६ | तव विरहे मलय | २८८।२५ | तातं तत्तातात कनय | ७।९८ |
| तपापाये गोदापरतट | १८४।४६ | तव विरहे विबुवदना | २८७।५ | तातार्थमन्त्रिसुत | १५२।४०७ |
| तप्तं केर्न तपोभि | २११।२४ | तव विरहे हरिणाक्षी | २८८।२३ | तातेन कथितं पुत्र | १८८।३९ |
| तप्ता गामिव सस्रुषु | १२५।११ | तव सा कथासु (शिशु ० ६४) | २८८।२८ | तादृक्सप्तसमुद्रमुद्रित | ६।८० |
| तप्ता मही विरहिणा | ३३६।१६ | तवाग्रतो वीर | १०४।१०९ | तादृग्दण्डविवर्ते | १३३।४० |
| तप्ते मङ्गाविरह (अमरु ८६) | २७८।३७ | तवाङ्गने सुन्दर (शा प १२६५) | ११६।६२ | तादृग्धीर्धविरित्रि (भाव १ ८) | १३४।१८ |
| तम स्तोम (शा प ३५२१) | २७१।४३ | तवानन सुन्दरि फुल्ल | ३१२।३९ | तादृशी जायते (चा नी ६ ६) | ९१।२१ |
| तम स्तोम भृश | २५७।६ | तवारिनारीनयनाम्बु | १३३।५ | तानि तानि कमलानि | २१९।४ |
| तम स्तोम सोमं | ३२०।१५ | तवाद्ववादिन क्लीबं | १५०।३४६ | तानि प्राब्धि | २६३।२०४ |
| तमद्दढे (शिशु ३ ६०) | १२२।४ | तवाहवे (का प्र १० ४५६) | १०४।९५ | तानि स्पर्श (गीत ० ७ १५) | २८०।९७ |
| तमसि वर। (शा प ४०४७) | ३६४।२८ | तवेद पश्यन्त्या (गीत ८ १८ १) | ३०९।४ | तानीन्द्रियाण्य (पच ५ २८) | ६५।१६ |
| तमांसि ध्वसन्ते | ५२।२४७ | तवैतद्वाचि (शा प ८८२) | २२५।११६ | तापं लुम्पसि | २१३।७१ |
| तमाखुपत्रं राजेन्द्र | १००।१ | तवैव प्रावीण्यं जलद | २१३।५५ | तापनैरिव तेजो | २९३।२ |
| तमृषिं मनुष्यलोक | ३६।४९ | तवैष विन्दु (शा प ३३१०) | २६१।१३७ | तापापहे (शा प ११६८) | ६३।२७ |
| तमोगगविनाशिनी | ३।१२ | तवोपकोष्ठस्थित | २६५।२८२ | तापो नापगत (शा प ९२३) | २३२।८४ |
| तमोभि पीयन्ते | ३२४।३८ | तस्करस्य कुतो (वृ चा ९ ११) | १६८।३९१ | तापोऽम्म प्रसर्र्तं | २९०।८३ |
| तया गाढ मुक्तो | २७९।७५ | तस्करेभ्यो (हि २ १०९) | ७४।२०७ | तामनङ्गजय (का प्र ७ ३२२) | २७३।७ |
| तरङ्गय दृशो (विद्ध ३ २७) | ३०६।३८ | तस्मात्सभ्य (शा प १३४६) | १४६।१५१ | तामिन्दुसुन्दर (मालती १ २१) | २७८।४७ |
| तरत्तरलतृष्णेन | ३७४।२०६ | तस्मात्सर्वप्रयत्नेन (पव ४ ५०) | ३४८।२५ | ताम्बूलं (शा प १४१६) | ३८५।३२५ |
| तरुकुलसुषमापहरां | २१५।२ | तस्मान्महीपतीनाम | ३६४।३१ | ताम्बूलरागोऽश्वर | ३१२।३६ |
| तरुणतरणि (शा प ३८३९) | ३३६।३९ | तस्मिन्गताद्र्धाभावे | ५८।१९७ | ताम्बूलाक्त दशन | ३५३।३९ |
| तरुणतमालकोमल | ३०४।१६१ | तस्मिन्वन्धुशरे स्मरे | २८०।९८ | ताम्बूलेन विना | १०२।४९ |
| तरुणा दिवाकरमयूख | ३२३।९ | तस्मिन्युद्धे (शा प ४०१९) | ३६३।१ | तारतारतरैरूत्त (शा प ५४४) | २०५।२ |
| तरुणिमनि (का प्र ४ ११०) | २७०।१७ | तस्या सुननुमरस्या | २७८।२४ | तारल्य मुखमेलने | ३५८।६२ |
| तरुणिमनि कृ (का प्र.१० ९०) | २५१।३२ | तस्या कचभरव्याजा | २५७।६ | ताराक्षतान्य्रवि | ३०१।७० |
| तरुणिमसमा (नीतिस ७७) | ३८७।४१६ | तस्या कि मुख | २८२।११७ | तारागणश्चन्द्रमस | २९०।१८ |
| तरुण्यालिङ्गित क(शा प ५२०) | १८४।८ | तस्या पद्म (शा प ३३५५) | २६८।३८२ | ताराधिनाथमभिजित्य | १२३।६ |
| तरुमूलयुगेन (नैषध २ ३७) | २६९।३९१ | तस्या (गीत १२ २३ ४) | ३२८।१७ | तारानायकशेखरा (रसगगाधर) | ६।८१ |
| तरुमूलादिषु (शा प९२१) | ४७।८८ | तस्या पादनख (बिल्हण) | २६९।४१९ | तारापते कुमुदिनी | २८२।१४५ |
| तरौ तीरो दूते (शा प ८०३) | २२१।२४ | तस्या प्रविष्टा (कुमार १ ३८) | २२९।२४८ | ताराविष्णूरणत्वित् | १९८।४४ |
| तर्कै तर्केशवक्त्रवाक्य | ३४।६१ | तस्या शलाका (कुमार १ ४७) | २५८।५७ | तारुण्य तरुणी | १७९।१०३४ |
| तर्केषु कर्कशतरा | ३३।३७ | तस्या श्रवणमार्गेण | २५९।६७ | तालं प्रभु स्यादनु | २६५।२७६ |
| तर्तु पर्वतसनिभेन | १८४।६६ | तस्या सान्द्र (अमरु २६) | ३११।२६ | तालीतरोरसु (शा प १०२५) | २४१।१३५ |
| तल्वेक्ष्यते (भा १२.४।४८) | ३८८।४३४ | तस्या महा (शा प ३४७९) | २८८।४० | तालीदलं (शा प ३३०७) | २६०।१२५ |
| तल्पीकृताहिरगणित | १६।४ | तस्या मुखस्याति (हर्ष) | २६२।१७९ | तावका कति न | १०४।८७ |
| तल्पे प्रभुरिव | ३५१।२३ | तस्यास्तुङ्गस्तन | २६४।२६३ | तावच्चकोरचरणा | २२५।१३५ |
| तल्पोपान्तमुपेयुषि | ३५८।६६ | तस्येवाभ्युदयो (शा प ७३९) | २०९।३ | तावज्जन्माति (पच १ २८८) | ९७।८ |
| तव करकमलस्था स्फा | ३।११ | ता जानीया परिमित | ३५९।८३ | तावतकर्णाध्वयाता | ९।१३४ |
| तव कुवलयाक्षि | ३१२।३१ | ता हेमचम्पकरुचिं | २७८।५२ | तावकविविहंगाना (शा प १८७) | ३६१।३५ |
| तव कुसुम (अ शा २.३) | २८२।१३६ | तादृङ्मस्या (शा प ३३०८) | २६१।१३२ | तावतकुलश्रीमर्यादा | ३५०।८ |
सस्थाननिर्देशानुक्रमकोशः ३३
| प्रथम स्तम्भ | द्वितीय स्तम्भ | तृतीय स्तम्भ |
|---|---|---|
| तावत्कोकिल (भामिनी.अ ६) २२५।१२७ | तुङ्गात्मना तुङ्गतरा (सु २५९) ४९।१६४ | तृष्णे देवि नम (पच ५.७७) ७६।८ |
| तावत्सप्तसमुद्र (शा.प.१०९७) ७।९६ | तुङ्गाभोगे स्तन २६६।३२१ | ते कौपीन (शा प १२२४) १०८।१९४ |
| तावत्सन्ति सहाया (सु ३१८३) ६६।३७ | तुच्छान्तरराध्यास १०४।१०७ | ते क्षत्रिया (शा प ३९७९) ३६०।२१ |
| तावत्सर्वगुणालय ७४।४१ | तुभ्य दासेर (सूक्ति २४ १) २३४।१२६ | ते चापि (मा १२ १२५४२) ३८०।४०६ |
| तावत्स्यात्सर्वं (पच २ १५०) १६५।५३४ | तुरगशतसहस्रं गो(पद्मप्रसङ्ग १४) ६९।२६ | तेज क्षमा (शिशु २.८३) १४७।१८५ |
| तावत्स्यात्सु (पच ५.६२) ३४९।३३ | तुरङ्गसादिनं श(कुमार १६ ४३)१२८।२० | तेजस्विनि (शा प १३३९) ७९।९ |
| तावदाश्रीयते (किरात ११ ६१) ७९।११ | तुरङ्गी तुरगःरू(कुमार १६ ४१)१२८।१९ | तेजस्विमध्य (शिशु २ ५१) ७८।६ |
| तावदेव कृतिना (भर्तृ स.७७) २५१।३३ | तुलाधारो वाता १०६।१६२ | तेजांसि यस्य प्रथमं २२७।३ |
| तावदेव विदुषा २५१।३१ | तुलामारुह्य रवेिणा (सु २४०८)१०१।११ | नेजोजहीने महीपाले ७९।१० |
| तावद्गर्जन्ति (सु ५८८) २३५।१६१ | तुल्य परोपतापित्व ४६।६६ | ते तीक्ष्णदुर्जंन ३६८।३५ |
| तावद्गर्जन्ति (शा प १५७४) १४३।४९ | तुल्यं भूमृति (शा प १२०४) ९४।११२ | ते ते चातकपोतका २१३।७० |
| तावद्गुणा गुरुत्वं च (सु.३२५२) ७६।२६ | तुल्यरूपमसि (किरात ९ ६१) ३१६।५३ | ते दह्निमात्र (का प्र ६ १४०) ५९।२३४ |
| तावद्व्याद्धि (हि १ ५७) १६४।५०० | तुल्यवर्णच्छद (भोज २६९) २२८।२०५ | ते धन्या पुण्यभाजस्ते ७५।९ |
| तावद्विद्यानवद्या गुणगण ८९।४ | तुल्यार्थं (पञ्च १ २७१) १४६।१५६ | ते धन्यास्ते (पच १ २८५) ३२।९ |
| तावन्महता महती ७३।२५ | तुल्येऽपराधे (शिशु २ ४९) ७८।४ | तेऽनन्तवाङ्मयमहा (सु १८२) ३३।२९ |
| तावन्महत्त्वं (भर्तृ स २५१) १६६।५९४ | तुषारधवल स्फूर्ज १९५।२ | तेनाधीत श्रुत तेन ७६।११ |
| तावन्मौनेन (वृ चा १४ १८) २२५।१२१ | तुष्यन्ति भोजनै(चा नी.६ ९)१५९।२७२ | ते पिबन्त. (मा ३ १२८५७)३९३।६५२ |
| तास्तु वाच सभायोग्या (प्र भ ८) ८४।१ | तुष्यन्तु मे छिद्रम २८७।३ | ते भूमिपतयो जयन्ति ३४।५५ |
| तिग्मरुचिप्रतापो(का प्र ४ ५५)१०३।७२ | तूणीरबन्वपरिणद्ध १२७।१८ | ते मीमांसाशास्त्रलोक ४३।१ |
| तिमिरेऽपि दूरदृश्या ३५२।१८ | तूणेव मधुमासे १९४।३५ | ते मूर्खेतरा लोके (सु ४८३) ७२।४५ |
| तिरोहितान्तानि (किरात ८ ४७)३३८।९० | तूर्णं चाहं वरं मन्ये नरा ७४।४ | ते वन्द्यास्ते कृति (भोज १२१) ४८।१३६ |
| तिर्यक्कण्ठ (गीत ३ ७ १६) २५१।७० | तूर्णं ब्रह्मविद (चा नी ५ १४)१६७।६३३ | ते साधवो भुवन (पद्म उ ३७ ७) ५०।२१३ |
| तिर्यक्त्वं भजतु ६३।३५ | तृणमुखमपि न २३३।१०० | तै सर्वैज्ञीभवद ३०१।९० |
| तिलार्धं स्वीय (चाणक्य ६६) ३९४।६८९ | तृणादपि लघुस्तूल (शा प ४००) ७३।५ | तोयं निर्मथितं घृताय ४१।६९ |
| तिष्ठता तपसि पु (किरात.१३ ४४) ८३।१ | तृणानि नोन्मू (पच १ १३३)१७४।९०७ | तोयानामधिपति २१६।१५ |
| तिष्ठार्जुनार्थ सङ्ग्रामे १८१।५ | तृणानि भूमि (पच १ १८४) १६३।४४४ | तोयैरल्पैरपि (भामिनी अ २८) २४७।४७ |
| तीक्ष्णं रविस्त (शा प ३९०७) ३४५।३९ | तृणैरावेष्ट्यते रज्जु १४४।८४ | त्यक्त जन्म (सु ६५४) २३३।११८ |
| तीक्ष्णधारेण खड्गेन ७३।१५ | तृणोल्कया (मा ५ १२३०) ३८८।४३७ | त्यक्तप्राणं (शिशु १८.६१) १३०।९१ |
| तीक्ष्णाग्रहेतिहतिभिः १४३।५६ | तृप्तियोग (शिशु २ ३६) १४६।१८३ | त्यक्तो विन्ध्यगिरि २७०।९३ |
| तीक्ष्णादुद्विजते मृदौ(मुद्रा ३ ५) ६३।३२ | तृप्त्यर्थं भोजनं १६६।५९८ | त्यक्त्वापि निज ५६।११७ |
| तीक्ष्णा नारुंतुदा (शिशु २ १०९) ८५।२ | तृप्त्या नद्य कमल २१३।५८ | त्यक्त्वा युवा ६४।१४ |
| तीक्ष्णोपायप्रान्तगम्योऽपि ३९४।६८३ | तृषा धराया (शा प १०८८) २१६।१२ | त्यक्तवालसान् ३८५।३१७ |
| तीरस्थलीबर्हिभि (रघु १६ ६४) ३३७।६५ | तृषार्ते सारङ्गे (शा प १२०५)५२।२४४ | त्यज किंशुक २४२।१६८ |
| तीरात्तीरमुपैति (शा.प ३५९७)२९६।११ | तृषा शुष्य (शा प ४१४८) ३७१।१३१ | त्यज चक्रवाकि २२७।१७९ |
| तीर्थसेवनमौ (राजत ६ ३०९)३८०।४२४ | तृष्णाखनिरगाधे(सूक्ति १२६ २) ७५।२३ | त्यजत मानम (रघु ९ ४७) ३३२।५७ |
| तीर्थस्थित (राजत ५ ३०४)३९४।६७४ | तृष्णा चेह परित्यज्य (हि १.१९०)७५।३ | त्यजति च गुणा ५७।१५० |
| तीर्थनामवलोकनं परि ९८।६ | तृष्णा छिन्धि भज(भर्तृ स.४४)५३।२७३ | त्यजति (शा प १५४५) १६९।७२८ |
| तीव्रे तपसि (शा प.१५१६) १५४।७१ | तृष्णापहारी विमले १०२।२२ | त्यज निज (शा प.११०४) २१८।६९ |
| तीव्रो निदाघस (शा प ९७५) २३६।८ | तृष्णाकोल (रसगगाधर) २६१।१०१ | त्यजन्ति मित्राणि (वृ चा १५.५) ६४।१० |
| तीव्रोऽयं नितरा २३७।३० | तृष्णा हि चेत्परित्य (हि १.१९०)७६।१८ | त्यजसि यदपि १३५।२४ |
| तीव्रोष्णदुंविषहवीर्य ७९।१९ | तृष्णे कृष्णेऽपि ते ७५।२ | त्यजेत सचयास्त(मा.३ ९४) ३८८।४३२ |
| तुङ्गत्वमितरा (शिशु २ ४८) ७९।१५ | तृष्णे त्वमपि (शा प ४२४) ७५।७ | त्यजेल्लघुधातौं १७२।८३८ |
| तुङ्गब्रह्माण्डसिंहासन १३८।८९ | तृष्णे देवि (शा प ४२०) ७५।१ | त्यजेत्स्वामिनमप्यु १५७।२०२ |
| ५ सुभा०अनु० | त्यजेदेकं (चा.नी.२.१०) १५३।३३ |
| सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां || | :--- | :--- | :--- | | ३४ |||
| त्यजेद्धर्मं दया (वृ चा ४.१६) ३८८।४३१ | त्वत्कीर्तिराजहंस्या १३४।७ | त्वय्यागते किमिति (कुव २०) १२५।७ |
| त्याग एको गुण श्लाघ्य ६।४ | त्वत्कीर्तिर्धनिका १२१।१५४ | त्वा चित्तेन (गीत ११.२२ १) ३०८।१९ |
| त्यागभोगविहीनेन (शा प ३८५) ७१।५ | त्वत्खङ्गखण्डित (रसगगाधर) ११४।२४ | त्वा पातु नीलन २२।१२६ |
| त्यागो गुणो गुण(विक्रम १९६)३८३।२६९ | त्वत्खड्गाघातजात १३४।२८ | त्वामजनीयति २८८।४४ |
| त्यागो गुणो वित्तवता (सु ५०८) ७०।१८ | त्वत्तेज प्रतिभाम १३७।५८ | त्वाम (गीत पा १२ २४ ९) २५१।७७ |
| त्याज्यं न धैर्यं(पच १ २१६)१७२।८४१ | त्वत्पत्रमुक्तविशि १३०।१०९ | त्वामयमाबद्धाञ्जलि (दशकु उ २) ३०५।९ |
| त्याज्यं सुखं (प्रव २९) ३८३।२७० | त्वत्प्रतापतपनातपतस १३२।६ | त्वामालिख्य (मेघ २ ४४) २९२।५४ |
| त्रयोऽप्यन्यत्रयो (शा प १७४) २५।२० | त्वत्प्रतापानर्घहेम १३३।४ | त्वामुदर साधु म (शान्ति.१ २४)७६।३० |
| त्रय्यन्तसिद्धान्जन ३६७।२४ | त्वत्प्रत्यर्थिवधूंघरे (कुव १७१) १३२।३६ | द |
| त्रात काकोदरो येन (कुव ६५) २१।९६ | त्वत्प्रारब्धप्रचण्ड ११२।२८० | दंष्ट्रासङ्कटवक्त्र (शा प ४०६६) ९९।५१ |
| त्रातुं लोकानि(सूक्ति १०९ ७)१०७।१७६ | त्वदङ्गमार्दवे दृष्टे कस्य (कुव ४५)३१२।८ | दक्ष श्रिय (हि ३ ११३) १७०।७७४ |
| त्रासहेतोर्विनी (हि २ १२३) ३८८।४२८ | त्वदरिनृपतिकेली १३१।१३ | दक्षता भद्र (काम नी ५ १५) ३८५।३३१ |
| त्रिजगद्दहनल्लङ्घन १३५।१८ | त्वदरिनृपतिमाशा १३१।१२ | दक्षिणाशाप्रवृत्तस्य (शा प ३९७) ७३।३ |
| त्रिनयनचूडारत्न (शा प ५४१) २९९।११ | त्वदीयमुखपङ्कज २९१।१३ | दग्धं खाण्डवमर्जुन ६७।६७ |
| त्रिनयनजटा (शा प ३६३०) ३०१।८४ | त्वद्वाणेषु यमो १०९।२१८ | दग्धं दग्धं (महा ना २५२) ३८६।३६२ |
| त्रिलोकेश शार्ङ्ग (विक्रम २२९) २३।८९ | त्वद्वाहोद्भूतधूल्य ११४।२२ | दग्धा सा (शा प ८३२) २२४।१०३ |
| त्रिविक्रमोऽभूद् (नीतिसार ५) १७३।८७५ | त्वद्यशोजलधौ (भोज २०९) ११७।८१ | दग्धो विधिर्वि (शा.प.३२६५) २५३।८ |
| त्रिविधा (शा प १३६६) १४६।१५५ | त्वद्रूपामृतपान (सूक्ति ४५ ७) २९२।२९ | दत्तं मया २६७।२५८ |
| त्रैलोक्यत्राण (शा प ४०८४) ३६६।१२ | त्वद्वक्त्रसाम्यमय (कुव ९०) ३१३।५६ | दत्तमात्तवदनं (शिशु १०.२३) ३१५।२६ |
| त्रैलोक्यभूषणमणि (सु १८३) ३३।४० | त्वद्वर्तुलस्थुलसुवर्ण ३१३।४१ | दत्तमिष्टतमया (शिशु १० ६) ३१४।९ |
| त्रैलोक्याभयलग्न १११।२५४ | त्वद्वाजिराजिनिर्धूत १२५।३ | दत्ते जनोऽसौ खलु ३३१।१८ |
| त्रैलोक्ये नोप १८७।२० | त्वद्विरहमसहमाना १८९।५२ | दत्तोऽस्या (अमरु ६) २९९।९६ |
| त्रोटीपुट करट २२८।२११ | त्वद्विरहे विस्तारितर २८८।१४ | दत्त्वा कटाक्ष (सा द १० ८०) २७७।१० |
| त्वं चेत्कल्पतरुर्वयं १२१।१५२ | त्वद्वैरिणो वीर (शा.प १२७८) १३१।७ | दत्त्वा दिशि (शा प.४०३७) ३६४।२३ |
| त्वं चेत्सचरसे(काव्यप्र.१० ४३) २४५।५ | त्वद्वैरिवनचलि ११८।१९८ | दत्त्वा धैर्यभुजंग ३५८।७८ |
| त्वं चेज्जीवजनानुराग ८०।४१ | त्वन्मुखं कम(काव्या २ १९०)३८७।४१२ | ददत मन्तरिता (शिशु.६.४१) ३४४।२९ |
| त्वं जामदग्न्य जन २४५।७ | त्वमद्य सिन्धो २१६।१३ | ददतो युच्य (भोज १०५) १५९।१९२ |
| त्वं तावद्वहुवल्लभ (शा प ३५७१) ३०९।३ | त्वमिव पथिक (रसगगाधर) ३५४।७० | ददाति प्रति (पच २ ५१) १६०।३०६ |
| त्वं दूति निरगा कुञ्ज २९३।४ | त्वमुचितं नयना २८२।१३४ | ददृशेऽपि (शिशु ९ २३) २९७।१९ |
| त्व दूरमपि गच्छन्ती २९१।१ | त्वमेव चातका (शा प ७८२) २११।५ | ददौ रसात्पङ्कज (कुमार ३.३७)३३१।३२ |
| त्व दित्राणि पदानि (सु २५१६) ११३।८ | त्वमेव (सर्वस्वटी १६ ७५१) ३९४।७०५ | दद्यात्साधुर्यदि (पच १ ३९७)१७८।९९९ |
| त्वं नो गोत्रपति १८३।६७ | त्वमा नीलो (काव्या २ १०६)३८७।४२६ | दधति कुहर (मालती ९.६) १४।१३ |
| त्वं पीयूष दिवो २६१।१५४ | त्वया मम समेतस्य २९१।३ | दधति तावदमी (शान्ति २ ५) ३६८।३७ |
| त्वं भो शंभोर्निंब २१०।३४ | त्वया वीर गुणाकृष्ट्या १०१।४ | दधति न जनास्तस्मै (सु ३१९०) ६७।६१ |
| त्वं मुग्धाक्षि (अमरु २७) ३२०।४९ | त्वयि दृष्ट (का प्र.१०.४५५) २८८।२२ | दधति स्फुटं (शिशु ९.६६) २८८।३० |
| त्वं राजा वय (शा प २०४) ८०।४२ | त्वयि दृष्टे (सा द १०.५०) २८७।२ | दधत्यधरचुम्बनं ३४७।४४ |
| त्वं विनिर्जितमनो २८८।३४ | त्वयि निबद्धरते ३०५।१८ | दधान प्रमाण(भामिनी अ ३१) २३८।७३ |
| त्वं सामान्यतरु २४०।१३१ | त्वयि प्रचलति प्रभो १२५।८ | दवि मधुर मधु १७०।७६६ |
| त्वत्क्षांसुरुधिर ३७१।१२२ | त्वयि लोचनगोचरं (कुव १७१)११५।४२ | दधौ हरि कं शुचि २००।५२ |
| त्वच समुत्तार्य २५९।८५ | त्वयि वर्षति (भोज १८७) २११।३ | दन्तप्रभा (सा.द १०.५६) २७०।७ |
| त्वञ्चित्ते भोज ११७।७४ | त्वयि सगर (सा द.१० ७७) १०२।४० | दन्तस्य निष्कोष (पच १ ७७)१७२।८३७ |
| त्वच्चिन्तापरिकल्पितं २९०।७१ | त्वयि सति शिवदातर्य (कुव ५४) ७०।३७ | दन्ता सप्त (शा प ९६४) २३५।१४६ |
| त्वत्कीर्तिं शशिन १३७।६९ | त्वय्यधर्मासनभाजि ३६१।४१ | दन्ताग्रनिर्भिन्नाहि (शिशु १२ ४७) २।१८ |
| त्वत्कीर्तिर्मौक्तिक १३५।१९ | दन्ताश्चलेन धरणीत २।१९ |
संस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः ३५
| दन्तानामधर (शिशु ८ ५५) ३३९।११२ | दहनजा न पृथु (नैषध ४ ४६) २८४।१५ | दारा परि (शा प ४१४०) ३७१।१२६ |
| दन्तालिदाडिमीबी २६०।११५ | दहमाना (शा प ३७५) १,४।२५ | दारार्यजितिप (सु ३२०४) ६८।८६ |
| दन्ता विश्लथदन्ता. ७६।२९ | दह्यमानेऽपि (शा प ३४०२) २७५।१ | दारिद्र्यदायादगणा १०४।१९१ |
| दन्तिदन्तसमान हि ४५।३२ | दाक्षिण्य खजने(सु २९४६) १७९।१०३९ | दारिद्र्य भोस्त्व परम ६६।४१ |
| दन्वीन्द्रादाना १२८।४४ | दाक्षिण्यं नाम (मालवि ४ १४) ३०५।४ | दारिद्र्यशीलोऽपि १००।२ |
| दन्तै. प्रस्थितम ३७५।२२६ | दाक्षिण्यं मलया २८४।३३ | दारिद्र्य शोचा (मृच्छ १ ३८०) ६६।४२ |
| दन्तैरुच्चलित धिया ७७।५२ | दातव्यमिति यद्दानं (हि १ १६) ६९।९ | दारिद्र्यस्य परा (पञ्च २ १६७) ७६।१७ |
| दन्तैर्हीन शिला १८५।१६ | दातव्य भोक्तव्य (शा प ४६९) ६९।१७ | दारिद्र्यात्पुरुषस्य (मृच्छ १ ३६) ६८।७३ |
| दन्तौ कोरकितास्सि तै १६।८ | दाता क्षमी (हि ३ १४०) १८४।२४४ | दारिद्र्याद्व्रियमेति (मृच्छ १ १४) ६८।७१ |
| दमेन हीनं (पञ्च सृष्टि अ.१९) ३८४।२९५ | दाता दानस्य १७२।८१७ | दारिद्र्यानलसत प (भोज १९३) ७३।१० |
| दम्पत्योर्निशि (अमरु १६) ३२८।१९ | दाता न दापयति ५०।१९८ | दारिद्र्यान्मरगाद्वा (मृच्छ १ ११) ६६।३६ |
| दम्भोलिस्फूर्जद्दम्भो २०७।२१ | दाता नीचोऽपि (शा प २८१) ७०।१२ | दारिद्र्येण समीरितोपि ६८।८० |
| दयिताबाहु (सूक्ति ५३ ४०) २४४।२२४ | दाता बलि (गरुड अ ११०) ९१।४८ | दारिद्र्योपहतौ यथा १०९।२२१ |
| दरफुल्लकमलकानन ३२५।४ | दातारो यदि (स क ४ ७१) ३९३।६४७ | दारेषु किञ्चि (पञ्च १ १०९) १७२।८३९ |
| दरललितहरिद्रा २७५।२३ | दाता लघुरपि (पञ्च २ ७१) ३८४।३८७ | दासे कृता (मा द १० ३२) ३१३।४८ |
| दरविदलित (गीत १३ १०) ३२६।१६ | दातु परोपकृति ७५।१४ | दासेरकस्य (शा प १०२७) २४१।१३६ |
| दरिद्रता १७४।१९३ | दातुश्छत्रत्त्वचि (सूक्ति ११६ ४)१५७।१९५ | दासेरको रस (शा प ९५९) २३४।१२५ |
| दरिद्रमुदरं ह(सूक्ति ५३ ६३) २६७।३३२ | दातुत्व प्रिय १५८।२१३ | दास्येऽहं परिभ्रमणाम्नि ६।६५ |
| दरिद्रस्य परा (शा प.३०९) ७३।११ | दात्यूहा (शा प ८५०) २५५।१४३ | दिक्कालातमसमेव यस्य (कुव १०६) ६।७७ |
| दरिद्रानभर कौन्तेय (हि.१.१५) ६९।८ | दान ददत्यपि (शिशु ५ ३७) २३२।७४ | दिकालाद्यनवच्छिन्ना (सु ३) १।२ |
| दर्पे कविभुजगाना(सूक्ति ४ ६८) ३६।३६ | दानं दरिद्रस्य(सूक्ति १३० ९)१७१।८२२ | दिक्कक्र तृणभस्म (सूक्ति ३४ ६)२२०।८ |
| दर्पणार्पित (शा प ११७) २२१।०२ | दानं न दत्त न तपश्च ६७।४८ | दिक्क्षेत्रीमोहतिजग २०९।१० |
| दर्पेषु परिभोग (रघु ९९ २८) ३२८।८ | दानं प्रियवाक्स (हि.१ १६३)१७०।७७० | दिगन्ते खेलन्ती स ६०।२४९ |
| दर्पान्धगन्ध (शा प.१२३७) १२५।६ | दान भोग च विना (सु ४७९) ७२।४२ | दिगन्ते श्रूयन्ते (भामिनी अ १)२३०।३२ |
| दर्पोद्रिक्त कुसुमथ ३०१।८९ | दानं भोगो (पञ्च २ १५७) ६९।१५ | दिगम्बरनितम्बिन्या ३।७ |
| दर्शनं नाघमद्वारा १५०।३३१ | दानं वित्ता (सा द १० ४८) १६७।६६२ | दिगीशवृन्ददाशिव (नैषध १ ६)१०५।१२२ |
| दर्शनपथ (अ शा ६ २०) २७८।२६ | दान सत्त्वा (शा प १५०८) १५४।६५ | दिग्बालाकरकन्दु ३०२।९८ |
| दर्शनाद्भवते चित्त ३४८।९ | दानपात्रमधर्मणीहैिक ६९।२३ | दिग्यन्त्रतस्तिमि ३०४।१५६ |
| दर्शने स्पर्शने वापि ८८।११ | दानाय लक्ष्मी (शा प ४६३) ४९।१७९ | दिग्वासस गतव्रीड ८९।६ |
| दर्शयन्ति शरन् (सु.१७९२) ३४४।४ | दानार्थिनो (शा प ९२९) २३१।७० | दिङ्नागा प्रति २३१।५४ |
| दर्शितातापोच्छ्रायै ७९।१६ | दाने कल्पतरुर्नये १०७।१८० | दिङ्नारीणा स्पृश १२५।२ |
| दर्शितानि (शा प.१४७१) १५४।५३ | दाने तपसि (शा प.१४७७) ९०।९ | दिङ्मण्डलं परिम २३९।१०८ |
| दंलति हृदय (उत्तर ३.३१) २७९।६८ | दानेन तुल्यो (पञ्च २ १६६) १७२।८४२ | दिङ्मण्डलीमुकुटम ३२३।१४ |
| दलदमलको (प्र.राघव.२.२७) ३१२।३० | दानेन भूतानि ६९।२५ | दिङ्मूढ त सुरारिं १८।१५ |
| दलविततिभृता ३०३।१२४ | दानेन भोगी १६६।६०१ | दिदृक्षमाण क्षणमा(शिशु ३ ३१)३३०।१ |
| दलितकुचनखाङ्कमङ्क ३१३।४५ | दानेन श्लाघ्यता ६९।१४ | दिनकरकरामुष्टं ३१४।६७ |
| दलितकोमल (शिशु ६.२३) ३३५।११ | दानोपभोगरहिता (हि ० ११) ७१।६ | दिनमवसितं वि (शा.प ११४६) २२०।८ |
| दलितमौक्तिक (शिशु ६ ३५) ३४१।४१ | दानोपभोगवन्ध्या (भोज ६१) ६९।११ | दिनमेक शशी पूर्ण ३६७।२१ |
| दवदहनजटाल(भामिनी अ ३४) २१३।५० | दामोदरकरा (शा प ४९८) १८१।१० | दिनयामिन्यौ साय (मोहमुद्गर) ७६।३४ |
| दवदहनादुत्पन्नो धूमो (कुव ९२) २३०।३ | दामोदरमुदरा (शा.प ११६२) २२१।१ | दिनान्ते भ्रान्तीना २६०।१०९ |
| दशकूपसमा (शा प २०८६) १४५।११४ | दामोदराय पुण्यात्म १९३।८ | दिवमप्युपया (रुद्रटाल ९ ६) ३३।२५ |
| दशकैरवबान्ध २६९।४११ | दायादत्वं मनसिज २७१।४७ | दियस भृशोष्ण (शिशु.९ ३४) ३००।५९ |
| दृष्ट्वातामरसकेसर २९६।२ | दायादा व्य (राजत ५ १३०)३८४।२७७ | दिवसGeneric / दिवसरजनीकू (शान्ति ३ २) ३७६।२५३ |
| दृष्टे जगद्वपुषि ३१४।१५५ | दायादा स्पृहयन्ति ६५।२० | दिवसे घटिकास्त्रिंशत् ३५२।७ |
| ३६ | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां |
|---|
| दिवसे सनिधा ३८६।३६७ | दुग्धाम्भोधावगाधे १३८।८६ | दुर्मित्रीणं कमुप (पञ्च १ ५) १७५।९४६ |
| दिवसोऽनुमित्र (शिशु ९ १७) २९६।५ | दुन्दुभिस्तु सुतरामचे ६४।१३ | दुर्मैत्री राज्यना १५६।१३७ |
| दिवानिशं वारि (रसगङ्गाधर) २६५।२७३ | दुर्गंधिगम पर (पच ५ ३४) १७१।७७८ | दुर्योधन सम(शा प १३५७) १४६।१४८ |
| दिवा पश्यति १५९।२६१ | दुर्धीता विषं (चाणक्य ९८) १६२।४२३ | दुर्लभं सस्कृत्त (चाणक्य ९१) १६१।३८६ |
| दिवारजन्यो र(नैषध ७ ५५) २६२।१८३ | दुरापाध्या श्रि (पच १ ७३) १४८।२७० | दुर्लभोऽप्युत्तम (दृ श ३३) १६८।६८६ |
| दिव्यं चूतस (नीतिरत्न ९) २३५।१५८ | दुरापाध्या हि रा(पच १ ६८) १४८।२६८ | दुर्लीलकक्षीपतिपुत्र २४७।५९ |
| दिव्यं वारि कथं यत ७।९० | दुरारोह (काम नी ११ ३६) १४८।२६९ | दुर्वारवीर्य सरुषि २०२।९५ |
| दिव्यचक्षुरह जात (सु १२०८) २७०।२ | दुरासदवनज्या(किरात.११ ६३) ७९।१२ | दुर्वास्रा स्मर(काव्यप्र १० ३०) २८५।३४ |
| दिशि दिशि (नैषध २२ १५१) २१७।४० | दुरासदान (किरात.११ २३) १६१।३६६ | दुर्वाशरातिवाजीव १३४।२९ |
| दिशि दिशि परिहास २८०।४ | दुराशेव दरिद्रस्य ३४५।२ | दुर्वृत्तं वा सुवृत्तं(विक्रम.२८४) ३८६।३५४ |
| दिशि दिशि (शा.प ३७२०) ३२३।१९ | दुरितसमूहबलाहक २।९ | दुर्वृत्त क्रियते धूर्तै (हि ३ १७५) ९७।५ |
| दिशा हाराकारा (सु ४७६६) ३४१।५८ | दुर्गं त्रिकूट (गरुड अ ११३) ३८२।२७१ | दुर्वृत्तसगतिरनर्थ (महा ना ४०८)८८।१२ |
| दिशो वास ३८२।२४१ | दुर्गदेशप्रविष्टोऽपि १५०।३५८ | दुष्करितैरेव निजै(शा.प ११७५) ५८।१६० |
| दिश्यात्म शीतकिरणा (सु ६४) ४।३९ | दुर्गाणि राज्ञा (शा प १३६१) १४४।६८ | दुष्टता दुष्टससर्गाद्दुष्ट ८७।३ |
| दिश्यात्सुखं नरहरि (सु ८५) १९।४६ | दुर्गा नदी शि (शा प ११८६) २४६।४० | दुष्टा भार्या (गरुड पू १०८) १५५।१११ |
| दिश्याद्व शकुलाङ्क (शा प १२३) १७।८ | दुर्जन कृतशिकोऽपि ५४।२४ | दुष्टाविनीता (शा प.१४११) १४५।१०५ |
| दिश्यान्महाशुरशिर स (सु ७७) १९।२१ | दुर्जन परिवर्तव्यो (हि १ ८९) ५४।५ | दुष्टैरपि निजै (शा प १४३९) १५३।१६ |
| दीना दीनमुखैस्तथै (सु ३१९६) ९७।१२ | दुर्जन परिहर्तव्य (सु ३५५) ५५।७० | दूति त्वं तरुणी (सु.११८६) २८७।९ |
| दीनाना कल्पवृक्ष (मृच्छ १ ४८) ५३।२७६ | दुर्जन प्रियवादी च (हि १ ८२) ५५।४९ | दूति त्वया कृतमहो २९३।५ |
| दीनानामिह प (भामिनी अ ९१) २१२।३६ | दुर्जन सुजनीकर्तु (सु ३८७) ५६।११४ | दूति श्वासविशेष एष २०३।९ |
| दीनोन्नतचलप (शा प ८५३) २२६।१५३ | दुर्जन सुजनो न ५४।३५ | दूतीद नयनोत्पलद्वय २०३।८ |
| दीपदशा कुलयुवती ३५१।२१ | दुर्जनगम्या (पच १ ३०१) १७०।७७२ | दूति विधुदुपागता ३५७।३४ |
| दीपनिर्वाणगन्ध (हि १ ७६) १६३।४४८ | दुर्जनजनससर्गात्स ८८।१० | दूतो न सचराति खे (वृ चा ९ ५) ४४।४ |
| दीपयन्रोदसीरन्ध्र (सा द ४ १४) १३३।३ | दुर्जनदूषितमनसा (सु ३९०) ५६।१२४ | दृये कान्ताकर वीक्ष्य ६६।१० |
| दीपयन्नथ नभ (किरात ९.२३) ३००।४० | दुर्जन प्रथमं वन्दे ५४।३४ | दूरं मुक्तालयता (स क ५.१७६) २९१।८ |
| दीपा स्थितं वस्तु (सु २५८) ४९।१८१ | दुर्जनवचनाङ्गारैर्दग्धो ४७।९० | दूरं यान्तु निशाच २०९।१८ |
| दीपितस्मरमुरस्तु (शिशु १० ४७) ३१६।७ | दुर्जनचदनविनिर्गं ४८।१२० | दूरं सुन्दरि निर्ग (सु १०६३) ३२९।१८ |
| दीपो भक्षयते (वृ चा ८ ३) १५८।२४२ | दुर्जनसगति (विक्रम १९७) ३८४।२८३ | दूरत शोभते (चाणक्य १५) १६१।३४४ |
| दीप्तक्षुद्रेगयोगाद्व (शा प ४०६५) १३।४० | दुर्जनसहवासादपि ४८।१२९ | दूरतया स्थूलतया २२२।५८ |
| दीप्प्यन्ता ये दीप्त्ये ७९।१७ | दुर्जनस्य विशिष्टत्वं ५४।२७ | दूरमस्तु दरघूर्णित २७८।३४ |
| दीर्घेशृङ्गमनड्वाहं १६८।६५६ | दुर्जनस्य च सर्प (वृ चा ३ ४) ३७९।९१ | दूरलमप्रमेयैर २९४।१९ |
| दीर्घाक्षं शरदिन्दु(मालवि २ ३) २७२।७० | दुर्जनहुताशत्तप (शा प १५३) ३७।११ | दूरस्थं जलमध्यस्थं १५५।१०० |
| दीर्घा वन्दनमालि (अमरु ४५) ३०५।४ | दुर्जनेन समं सख्यं (हि १ ८०) ५५।४८ | दूरस्था पवेता १५८।२१८ |
| दीर्णोऽसि चेत्कनक २४६।२७ | दुर्जनैरुच्यमानानि (हि ३ २३) ५५।४१ | दूरस्थापितहृदयो ५७।१४० |
| दीव्यन्मौलित्रिदशपरि ५।४७ | दुर्जनो जीयते (दृ.श ४६) १६८।६९१ | दूरस्थोऽपि ब (शा प.१६०९) १४३।५३ |
| दु ख दीर्घतर वह २७७।६४ | दुर्जनो दूषयत्येव सता (दृ श ३) ५।७३ | दूरस्थोऽपि स (विक्रम ७८) १६६।५९१ |
| दु खं दु खमिति (प्र भ १७) ६६।१३ | दुर्जनो दोषरादत्ते दुर्गन्धे ५५।४६ | दूरादर्थं घटयति (भर्तृ ३ १८) १४२।३१ |
| दु खाङ्गारकतौ (शान्तिश ३ १४) ८९।३ | दुर्जनो नार्जव याति (हि ३ २३) ५४।३९ | दूरादर्थिनमाकलय्य ९९।२४ |
| दु खेन ल्छि (मा १२ ४१६७) १५४।५४ | दुर्दिंवेसे घनतिमि (पच १ १८४) ३५२।४ | दूरादुच्छ्रितपाणि (हि ३ १६४) ६१।२६२ |
| दु प्रापमम्बु पवन २३४।१२७ | दुर्दैवप्रभवप्रभञ्जन २३०।६ | दूरादुत्सुकभागते (अमरु ४९) ३५८।६१ |
| दु प्रेक्ष्यमुच्चैर्गगन ३३५।८ | दुर्बलस्य बलं रा (चाणक्य ३६) १५२।३९३ | दूरादुज्झति (सूक्ति १९.१०) २२४।१०४ |
| दु सहसतापभया (सु १६९९) ३३६।३५ | दुर्बुद्धिमकृतप्र(भा ५ १४९४) ३९४।६७२ | दूरादेव कृतोऽज(सु १७०९) ३३९।११९ |
| दुकूलं दोर्मूलात्प्रण ३१९।३४ | दुर्भग स्यात्प्रकृ (दृ श ८३) १६९।७०९ | दूरीकरोति कुमतिं (रसगगाधर) ८७।३० |
| दुग्ध च यत्तदनु (सु.३२५९) ७६।३९ | दुर्भिक्षादेव (मा १२.६७४७) ३९३।६६४ | दूरेऽपि परत्यागस्ति (सु ८०७) ५८।१८१ |
संस्थाननिर्देशानुक्रमकोशः — ३७
| दूरेऽपि श्रुत्वा भव १३५।१० | दृष्ट्या केशव (सूक्ति २ ९३) २४।१५९ | देवेऽर्पितवरणस्रजि बहु १६।३ |
| दूरे मार्गा (नीतिप्रदीप १०) २४१।१५२ | दृष्ट्वाडम्बरमम्बरे ३४२।७१ | देवे वर्षत्यक्ष (सूक्ति ६१ २२) ३४१।५९ |
| दूरोक्षिप्तक्षिप्त (शिशु १८ ४५) १३०।८१ | दृष्ट्वा दर्पणमण्डले नि ३५९।९४ | देवैर्यद्यपि तक्रव २१६।३३ |
| दूर्वाङ्कुरतृणाहारा (शा प ९३७) ८०।२२ | दृष्ट्वापि दृश्यते दृश्य (सु २२८) ४६।७८ | देवो राजा ३८७।४२१ |
| दूर्वाया भूषणं पत्र (चा २४) ३८०।४१८ | दृष्ट्वा मण्डलम् १०८।२१० | देवो हरिव्र्हतु व (शा प ७४०) २०९।८ |
| दृकपात कमलासने (शा प ७५) १५।२५ | दृष्ट्वा वेद्यं परमथ ३६९।७१ | देव्या प्राक्परिरम्भणे ६।६७ |
| दृगन्तव्यापारप्रबल २८०।८४ | दृष्ट्वा शाखावकीर्णं २२८।२०२ | देश सोऽयमराति (वेणी ३ ३३) ३६६।७ |
| दृग्भङ्गभङ्ग्रिम (शा प ३७७७) ३५२।२८ | दृष्ट्वा स्फीतोऽभवद (अमरुश ६) २२३।९२ | देशकालविहीनानि (र ६ ६३) ३८०।३९७ |
| दृग्भ्या यस्य विलोक १८।२१ | दृष्ट्वाकासनसस्थिते (अमरु १९) ३११।१६ | देशाटन पण्डि १७३।८६४ |
| दृढ प्रेमा भग्न १७७।९८७ | दृष्ट्वैव विकृतं (शा.प ४१४५) ३७१।१२० | देशानामुपरि (पञ्च १ १६६) १४९।२८५ |
| दृढतरगलकनि (शा प ११९७) २४८।७० | दृष्ट्वैवाङ्कुशमुद्रया १११।२६४ | देशानुत्सृज्य ग १६७।६३९ |
| दृढतरनिबद्धमुष्टे को (कुव ५७) ७२।३५ | देय भो ह्यघने (वृ चा ११ १८) ६९।२८ | देशे देशे कलत्राणि ३६१।६ |
| दृप्यद्दैत्यनितम्बिनी (शा प १२५)१८।३३ | देयमार्तस्य शय(भा ३ १०१)३८६।३७४ | देशे देशे किमपि कुतुका ९८।४ |
| दृश पृथुतरीकृ (सूक्ति ५० ८) २५३।२८ | देव पायात्पयसि २३।१३३ | देशे देशे जडिमकु ३३५।५ |
| दृशा किंचि (शा प ३७६४) ३५२।३३ | देव पायादपा(सा द १० ९८) २२।१०० | देशे देशे दुराशा ३७५।२३० |
| दृशा दग्धं मनसिज (विद्ध.१ २) २५०।१ | देव क्षीरसमुद्रसान्द्र १३७।६३ | देशैरन्तरिता शते (अमरु ९९) २०८।३३ |
| दृशा विदधिरे दश ३४२।७६ | देव त्व जय (शा प १२२३) १०८।१९३ | देह हेमद्युति परि २६६।३२२ |
| दृशा सपदि मीलि(सू २०९७) ३१९।३६ | देव त्व मल (सूक्ति ९७ ३३) १०७।१७७ | देहावान्निद्रकान्ता ८।११४ |
| दृशो सीमावाद (सूक्ति ५२ १)२५५।२४ | देव त्वत्करनीरदे १०७।१७४ | देहि देहीति ज (शा प २६९) ३८३।२६१ |
| दृशौ किमस्या (नैषध ७ ३४) २५९।८७ | देव त्वत्करपद्म कोश १२५।१४ | देहि मटकन्दुकं राधे (कुव ६९) २२।१०४ |
| दृशौ तव मदा (गीत १०.७) ३१३।६६ | देव त्वच्चरणप्रतापत १३३।१४ | देहीति वक्तुकाम (शा प ३९२) ७२।१३ |
| दृश्य दशा सह (शा प ३२७३) २५४।५ | देव त्वत्तुरणप्रतापाशि ११५।४९ | देहीति वचनं श्रु(भर्तृ स ५३५)३८२।२६१ |
| दृश्यते पानगोष्ठीषु (सूक्ति ७३.७)३१४।१ | देव त्वद्धजवाजिप १२५।१५ | देहे दुर्ललितस्य देव ३५३।५५ |
| दृश्यन्ते भुवि भूरिनि ५३।२६० | देव त्वहानपाथो १०२।४४ | देहे पातिनि का (भोज ५३) ३५१।३५८ |
| दृश्यन्ते मानसोत्तं २६९।४०७ | देव त्वद्भुजद (सु २६४०) १३४।१६ | दैल्यानामधिपे न (शा प ८४) १९।५४ |
| दृष्टं दुर्जनचेष्टितं (सु ३१९३) ६८।८१ | देव त्वद्भुजदण्ड १३४।२५ | दैत्याना मनसि दया १८१।२६ |
| दृष्ट कातरनेत्रया (अमरु ८५) ३२९।१६ | देव त्वद्यशसा सदा १३६।४४ | दैत्यारातिरसो वरा २०३।१०८ |
| दृष्टः कापि स के (सु १००) २५।१८७ | देव त्वद्यशसि (शा प १२२६) १३६।३९ | दैत्यास्थिपञ्जरविदारण (सु ५२) १९।४६ |
| दृष्टः सप्रेम देव्या कि(वेणी १.३)८।१०८ | देव त्वद्विजयप्र (शा प.१२४५) १२५।१० | दैन्यं क्वचित्कच(शा प ४१०७)३६८।३३ |
| दृष्टः साक्षादसुरवि १०७।१७८ | देव त्वद्विजयोद्यमे १२५।१२ | दैवं पुरुष (मत्स्य अ २२१) ८२।१० |
| दृष्टदुर्जनदौरात्म्य (सु.२९८) ४६।६२ | देव त्वमेव पा(का प्र ९.१२०) १०३।६० | दैवं फलति सर्वत्र ९१।१० |
| दृष्टस्य यस्य हरिणा रण (सु ४९) १६।४६ | देव त्वामसमानदान १०७।१८५ | दैवं फलति सर्वत्र ९१।११ |
| दृष्ट्वा सकष्टदाहाः ९।१३३ | देव ब्रह्माण्डभाण्डे १४८।८४ | दैवमुल्लङ्घ्य यत्कार्य ९०।१ |
| दृष्ट्वा दृष्टिम् (नागानन्द ३ ३५) ३१८।१४ | देवराजो मया दृष्टो १८८।३१ | दैववशादुपलब्धे (पञ्च १ ३) ७१।३१ |
| दृष्टान्तो न तवा १०९।२१९ | देव श्रीनृप रामचन्द्र १२०।१४८ | दैवात्पश्येर्जगति (मालती.९ २६) २९१।१ |
| दृष्टिं देहि पुनर्बलि (शृङ्गारति.१) ३१२।६ | देवस्याम्बु (सूक्ति १०५ २) ३८३।३६३ | दैवादभ्युत्थमाना (हनु १३ १४) ६२।२८१ |
| दृष्टिं सालसता बिभ २५४।४७ | देवस्त्रैगुण्यभेदात्सू १०१।५९ | दैवादहमत्र (रुद्रट ७ २९) २७८।२१ |
| दृष्टिं हे प्रति (शा प ३७६९) ३५३।४३ | देवा दिक्पतय (शा प १०८) १०१।५० | दैवायद्यपि २०९।२ |
| दृष्टि. कापि सुरा २७२।७२ | देवाधिपो वा भुज १०४।१०५ | दैवीर्गीर केऽपि (सु १९४) ३८।३३ |
| दृष्टि शैशवमण्ड (सूक्ति.५१.६)२५६।५२ | देवानामिदमाम (सूक्ति १०९ ७२) ३२।२ | दैवेन प्रभुणा (भर्तृ. २ ९०) १५१।२३ |
| दृष्टिस्तृणीकृत (सूक्ति १०३ ६)३६०।२७ | देवी वाचमुपामते हि (कुव ५२) ३६।४० | दैवे पराग्वदन (भामिनी.क १) ३६२।२७ |
| दृष्टे चन्द्रमसि प्रल्लु(सु १३८७) २८९।६८ | देवी श्रीर्जे ३८३।२६४ | दैवे विमुखता याते ९१।७ |
| दृष्टे लोचनव (अमरु १६०) ३११।२१ | देवे तीर्थे द्विजे (धर्मवि १८) १६८।६६८ | दैवे समर्थ्य (शान्तिश ३ २०) ९२।७६ |
| दृष्टो वा सुकृतशतो ६०।२३१ | देवे दिग्विजयोद्यते १२५।११ | दो सदेहवशंवद ९४।१२१ |
३८ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| पद्य / पाद | पृष्ठ/संख्या | पद्य / पाद | पृष्ठ/संख्या | पद्य / पाद | पृष्ठ/संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| दोग्ध्री धान्यं(मा १२ २७३३) | ३८८।४३९ | द्वन्द्वो द्विगुरपि | १८९।५१ | धत्ते बर्हभरे | ३१४।७२ |
| दोर्दण्डद्वयकुण्ड (रसगङ्गाधर) | १०८।२०८ | द्वयमिदमलन्तस (सु १८१३) | ३४४।१२ | धत्ते भरं (भामिनी अ ८९) | २३६।१४ |
| दोर्दण्डद्वयलीलया | १०।१५१ | द्वात्रिंशद्द (शा प ११९९) | २४८।८० | धत्ते वक्षसि | ३६५।५१ |
| दोर्दण्डाञ्चित (सूक्ति ५५ ३) | ३६३।२३ | द्वारं खद्भि (सूक्ति १७ ७८) | १०८।२०२ | धत्ते वियोगि | १९९।२९ |
| दोर्योस्तदन्तखण्ड सक | २।२८ | द्वार गृहस्य (सु १८४३) | ३४७।१२ | धत्से मूर्धनि | २३७।२९ |
| दोर्भ्यां (काव्यप्र १० ११) | १०६।१४८ | द्वार द्वार रट | ७१।१० | धनं तावदसुलभं (हि १ १८९) | ६४।७ |
| दोर्भ्यां सय (शा प ३६८६) | ३१।९४० | द्वारि चक्षुर (किरात. ९.४३) | ३५७।४१ | धनं तावलब्ध कथ (प्रव ७७) | ३६८।४४ |
| दोलाया जघ (सूक्ति ५१.१४) | २५६।४५ | द्वारि प्रविष्ट | १७३।८४८ | धनं यदि गतं (कविता ४३) | ६७।५२ |
| दोषजातमवधीर्य | ४९।१६१ | द्वारि स्तम्भ | ३५२।११ | धन यदिह मे | ७१।२३ |
| दोषपोषमभियाति | ५९।२१३ | द्वारे कल्पतरुगृहे | २०१७३ | धन (वृ.चा १५ २१) | १५९।२७५ |
| दोषभीतेर (हि १ ५७) | १६४।४७९ | द्वारे द्वारे परेवाम | ७४।४८ | धनक्षय शिष्टगर्हा(प्र भ १७) | ३८८।४२७ |
| दोषमपि गुणवति (सु २४४) | ८२।३८ | द्वारे रुद्धमुपे (सु ३२३८) | १५३।४२० | धननाशेद (भा १२ ६६१९) | ३८७।४२३ |
| दोषाकरोऽपि (भोज १३८) | ५०।१९५ | द्वारोपान्तनिर (काव्यप्र. ३ २) | ३०४।६ | धनधैर्यमराजैश्च | १०१।३ |
| दोषागमन | ३०३।१३९ | द्वाविमावम्भसि (भा ५ १०३०) | ६५।८ | धनबाहुल्यमहेतु (सु ५२२) | ७०।३० |
| दोषानपि गुणीकर्तुं (सु २१५) | ४६।७२ | द्वाविमौ न (भा.५ १०२७) | ३८३।२५३ | धनमपि परदत्तं (सु ३०७) | ६५।१८ |
| दोषालोकन | ५७।१५१ | द्वाविमौ पुरुषौ (सु २९७३) | १५५।१०८ | धनमर्जय काकुत्स्थ (प्र म.४) | ६४।३ |
| दोषो गुणानां | ४८।१३८ | द्वाविमौ (भा ५ १०२८) | १५५।१०५ | धनमस्तीति (शा प १४४६) | १५३।२१ |
| दोषोऽपि | १५८।२४५ | द्वाविमौ पुरुषौ(शा प १५४९) | १५५।१०९ | धनवानिति हि (हि १ १६८) | ३७४।२०८ |
| दौर्गल्येन समीरिना | ७४।३९ | द्वाविमौ पुरुषौ(शा प १५४७) | १५५।१०४ | धनवान्क्रोध | ३७९।९४ |
| दौर्जन्य (शा प १०३१) | २४१।२४३ | द्वाविमौ पुरुषौ(शा प १९३३) | १५५।१०६ | धनवान्बलवाँलोके (हि १ १२३) | ६५।१ |
| दौर्मनष्या (भर्तृ स २३) | १७८।१०१० | द्वाविमौ पुरुषौ(शा प १५५०) | १५५।१०७ | धनहीनो न ही(वृ चा १० १) | ३८७।४२१ |
| द्या निरुन्ध (किरात. ९ २०) | ३००।३७ | द्वावेव क (र गो २ ६१ १७) | ३८८।४३६ | धनहेतोर्य ईहे(भा १२ ७८५) | ३८६।३५१ |
| द्वामारोहति (सूक्ति २७ १५) | २१६।३० | द्वि शर नाभि (हनु १ ४९) | १६५।५५३ | धनागमेऽधिकं | १६८।६८१ |
| द्युति वहन्तो (किरात ८ ३९) | ३३८।८२ | द्विजकुलपते | २२७।१९६ | धनानि जीवित चै (हि १ ४४) | २८६।३४६ |
| द्यूतं पुस्तक | १५७।२०५ | द्विजराजशेखरो | ३६४।३६ | धनानि भूमौ पश (भर्तृ ३ ३५) | ९२।५५ |
| द्यूतं यो यम (पच. १ ५७) | १४८।२६६ | द्विजा (शा प १३८४) | १४४।१०० | धनानि विद्वत्क | ११७।७३ |
| द्रवतवात्सर्वं (हि.१ ९३) | १६३।४५१ | द्विजातिपूजा (भा.५ १२५४) | ३८७।४२० | धनाशाया खली (वृ श ६१) | ६४।११ |
| द्रविणार्जनज परि (सु ५२४) | ७०।३१ | द्वित्रै केलि | ३५७।३५ | धनाशा कैतव | ३५५।४ |
| द्रव्यप्रकृति (काम नी. ५ २) | १४८।२५७ | द्वित्रैव्योम्नि | ३२५।५४ | धनाशा जीवि (हि १ ११२) | १६६।५८४ |
| द्रष्टव्येषु किमुत्तम (भर्तृ १ ७) | २५२।५५ | द्विधा (सूक्ति १०९ ८) | २६१।१५५ | धनिक (गरुड.पू.अ ११०) | १५३।३४ |
| द्राक्षा प्रवेहि | २२७।१८६ | द्विरददन्तवलक्ष (शिशु ६ ३४) | २४१।४० | वनिनोऽपि नि (सा द १०.६६) | ४६।५३ |
| द्राक्षा म्लानमुखी | २९।१० | द्विर्भव पुष्प (रसगङ्गाधर) | ११६।५८ | वनिनोऽप्यदानभोगा (भोज.१६) | ७२।४३ |
| द्रागाक्रम्योद | १३४।२७ | द्विषतामुदय. (किरात २ ८) | १५१।३८६ | धनु पौष्प मौवीं (भोज १७१) | ५२।२५२ |
| द्रागैन्द्रीमनु | २९५।६६ | द्विषा त्रास (कुमार १६ ४२) | ९१।३९ | धनेन कि यो (हि २ ९) | १७४।८९८ |
| द्राघीयसा धाष्ट्य (सूक्ति ५ १) | ३७।१६ | द्वीपादन्यस्मादपि (रत्ना १ ७) | ९१।३९ | धनेन वाससा प्रे (द श ४४) | ३८७।४०४ |
| द्राघीयास (शिशु १८.३३) | १२९।७२ | द्वेषादिवैक्क | ३८३।१६९ | वनेनाधर्मल (भा ५ १२५१) | ३९४।७०० |
| द्रुत यस्या | २५२।४५ | द्वेषिद्वेष (पच १.६०) | १४८।२६५ | धनेतु जीवित (शा प ४२५) | १६८।६५७ |
| द्रुततरकरदक्षा. (शिशु ११ ८) | ३२३।२४ | द्वेष्या (नैषध १२ १२) | ११०।२३४ | धनैर्निष्कुलीना (नीतिसार ३) | ६४।१२ |
| द्रुततरमितो (सु ६४९) | २३३।१०९ | ध | धनैर्वियुक्तस्य (मृच्छ ५ ४०) | ६६।४४ | |
| द्रुतद्रवद्रथचरण | १२७।९ | धत्तरकण्टक | २४३।१११ | धन्यस्तन्वि स | २९२।३२ |
| द्रुतशातकुम्भ (शिशु ९ ९) | २९४।३७ | धत्तूर धूर्तं | २४३।११० | धन्यस्त्वमसि | २८३।१५६ |
| द्रुतसमीरचले (शिशु ६ २८) | ३४१।३४ | धत्ते चक्षुर्मुफु (मालती.३.१२) | २७४।५ | धन्या शरदि | ३४४।७ |
| द्रुमा पाण्डुप्रथा | ३२४।४० | धत्ते नायक | १२०।१४१ | धन्या शुचीति (सु १८१) | २९।१९ |
| द्रोग्धव्यं न च(भा.३ ११४७) | ३९४।६९२ | धत्ते पद्मल्ल | ३३७।४४ | धन्या (शा प. १०४७) | २४२।१७२ |
| सस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः | ३९ | |
|---|---|---|
| धन्या केयं स्थिता (मुद्रा १ १) ८।१०५ | धान्याना (हि ३ ५५) १४८।२३५ | धैर्यमाधाय लज्जा ३०४।२ |
| धन्याना गिरि (भर्तृ ३ १५) ३७४।२२० | धारयित्वा त्वया(भोज २३४) १०२।४६ | धैर्यमुलबण (शिशु १० ६८) ३१८।११ |
| धन्या सा गृह २८०।९४ | धाराधरस्त्वद (भोज २२५) १२५।७ | धैर्यलावण्य १०३।५४ |
| धन्यासि या (काव्यप्र ४ १७) ३२८।१० | धारावीश (भोज २०२) ११७।८९ | ध्माता भालत २११।४३ |
| धन्यास्ता (शा प ३७४८) ३२८।२० | धाराधौतं (शा प ३८८१) ३४२।७९ | ध्माता भालत २९५।६७ |
| धन्यास्ते कवयो ३४।५८ | धारेश त्वत्प्रतापेन(भोज १७३) ११०।८० | ध्यानव्याज (शा.प १३१) २६।२०५ |
| धन्यास्ते ये (गरुड पू अ ११५) ६६।२९ | धार्मिक (काम नी १ ११) १४२।३ | ध्यानशस्त्र १६०।३३० |
| धन्योऽय मणि २१७।५० | धार्ष्टर्यलङ्घित (किरात ० ७२) ३१६।६४ | ध्रियते याव (शिशु २ ३५) १५१।३६२ |
| धन्वन्तरिक्षपण ३७।३७ | धावन्त (शा प ६१००) ३६९।१८ | ध्रुवं ध्वसो (प्रब ८२) ३६२।३३ |
| धम्मिल्लं परि (शा प ३१७४) ३२८।५ | धावन्तमनु १२३।२ | ध्वजपट ३३२।५५ |
| धम्मिले नव (सा द ४ ९) १९४।१३ | धावित्वा सुस (शा प ४१५९) ३७५।२२२ | ध्वनिरिति २१८।७८ |
| धम्मिल्लो भंग (सूक्ति ७८ १५) ३२०।५१ | धिक् चेष्टितानि (शा.प ९९६) २३७।४८ | ध्वस्त काव्यो (शा.प ३९९९)३६३।४१ |
| धरणिधर ११५।५१ | धिक् तस्य मूर्ख (शा प ३३२३)२६२।१८६ | ध्वान्तोघे ३०२।१०२ |
| धराध्र तव १३२।२७ | धिक्त्वा रे (शा प १९४) १००।३२ | न |
| धर्म पालय ११२।२७० | धिग्गृहं (स्काद वै अ २०) १५६।१३५ | न कठोर न (काव्या. २ ३२४) २५०।३ |
| धर्मे प्रसङ्गादपि ३७५।२४० | धिग्जीवि (स्काद काशी अ १) १७३।८७१ | न कदाचित्सता (सु ३०५) ४७।८३ |
| धर्मे प्रत्न (गरुड पू अ ११५)२८०।४८८ | धिग्धिन्ता (शाति ४ १०) ३७१।१९२ | न करोति १९४।२४ |
| धर्म प्रागेव (नवरत्न ४) १५३।४२२ | धिग्स्वैतां ६५।१४ | न कर्मणा ल (भा १२.७३६)१९२।४६० |
| धर्म एव प्लवो (भा ३ ११८३)३९४।६९० | धिग्वारिंदं (शा प ८६५) २२६।१६१ | न कश्चि (शा प १३७६) १४६।१६० |
| धर्मशास्त्रार्थं (शा प १३४३) १४२।१६ | धीर वारि (अमरु १२) ३४३।९४ | न कश्चि (बृहस्पति नी ११४) १६१।३४६ |
| धर्महन्त्यर्जिते १६६।५८८ | धीरध्वनिमिर (भामिनी अ ५९) २९२।१८ | न कश्चिदपि (शा प. ६४७) १५४।४० |
| धर्मात्मा (र गो २ ११४ १८)३९४।६९४ | धीराणा १६७।६४९ | न कस्यचित्कश्चि (हि.२ ४६) १७२।८३५ |
| धर्माख्याने श्म (वृ चा १४.६)३९४।६८६ | धुनोति चांसि (काव्यप्र.१०.३०) ९३।९२ | न काकारि ३७४।२१२ |
| धर्मार्थं प्रभ (र ३ ९ ३०) ३९४।६७७ | धुनोतु ध्वान्तं २५७।२५ | न का निशि (नैषध १ ३०) २५३।९ |
| धर्मार्थौपजवनो (का.नी १ १४)३८७।३८७ | धुन्वन्त्यमूनि ३३३।८२ | न कामभोगा ३४९।५१ |
| धर्मारम्भेऽप्य ५७।१४१ | धुन्वानाश्चन्द ३२६।३३ | न कार्येषु न ३५०।११ |
| धर्मार्थ यस्य (भा ३ ९५) १६२।४६२ | धूम पयो (सु ४४३) ६०।२४४ | न काल (शा प १३२०) १६०।३३४ |
| धर्मार्थकामत (हि २ १७९) १६४।४९४ | धूमव्याकुल १२।३२ | न कालस्य न (शा प ३९८८) ३६०।११ |
| धर्मार्थकाम (ब्रह्म अ १२०) १५९।२५५ | धूमाङ्गाढमली (राजत ४ ११) ३९३।६४९ | न कालस्य (र ४ २७ ७) ३९३।६५३ |
| धर्मार्थकाममोक्षेषु ३०।११ | धूमायन्ते व्य (भा ५ १३१९)२९३।१६६२ | न किंचित्(काम नी.११ ४७) ३९२।६४६ |
| धर्मार्थकामहीनस्य (सु २१६७) ६६।२४ | धूमायिता (भामिनी अ ९९) २४८।८२ | न कुर्या २३२।७८ |
| धर्मार्थो यत्र न १६७।६११ | धूर्त स्त्री वा (हि ३ १३१) १४८।२४२ | न कुर्यादभि (शा.प १५२६) १५५।८० |
| धर्मे तत्परता (वृ चा १२ १५) ५३।२६२ | धूर्तधोरण १२५।१४ | न कुल वृत्त (भा ५ ११३४) ३९४।६७१ |
| धर्मो यशो नयो २९।७ | धूलिधूसरसर्वाङ्गो (शा.प ५७५) ८९।७ | न कुले वापि २४४।२१८ |
| धवलकुसुमभाख १२२।७ | धूलीधारामिरन्धास्त १३३।४७ | न केनापि श्रुतं ३६।३४ |
| धवलयति समग्र ५१।२१९ | धूलीधूसर (काव्याल ७.३२) २०८।३५ | न केवलं मनुष्येषु (शा प ४४४) ९०।३ |
| धवलान्यात (पच.१.४३) १४८।२५३ | धूलीभिर्दिवमन्ध (नैषध १२.९९)१२४।९ | न कोकिला (शा प ८९२) २२९।२२७ |
| धवलीकरोति २६३।२०९ | धृततुषार (शिशु ६ ६०) ३४६।२१ | नक्र. खस्थान (पञ्च.३ ४४) ८६।१ |
| धातस्तात (भर्तृ स ५४५) ६१।२६५ | धृतधनुषि (शा.प ३९६५) ३६०।१३ | न क्रीडासु ३७२।६२ |
| धातु परीक्षा १६०।३३२ | धृतबिस (किरात. १० २४) ३४०।२६ | न क्रोध ६।६८ |
| धातु (काव्यप्र. १० ३९) २८९।५४ | धृत्वा पदस्खलन (भामिनी क ५)३६२।२९ | न क्रोधयालु १६६।६०५ |
| धातुवादेषु १५५।१०३ | धृष्ट कि ३०७।६४ | न क्वचिच्च ८०।१६ |
| धातुश्चतुर्मुखीकण्ठ ३।१ | धैर्य यस्य (शान्तिश ४ ९) ३७०।१०३ | न क्वापि १८२।३२ |
| धान्याकनागर (शा प ४०३३) ३६४।४१ | धैर्य हि कार्यं (पच / २२५) ३८३।२६० | नक्षत्रक्षिति ३२२।१३ |
४० | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| पद्यांश / सन्दर्भ | पृष्ठ।सङ्ख्या | पद्यांश / सन्दर्भ | पृष्ठ।सङ्ख्या | पद्यांश / सन्दर्भ | पृष्ठ।सङ्ख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| नक्षत्रभू | १०४।९८ | न दानेन न (गरुड पू अ.१०९) | ३४९।३९ | न पश्यति च | १५९।२८२ |
| नक्षत्रभूषण चन्द्रो (चाणक्य ८) | १६१।३४२ | न दानं शु (वृ चा १७ १०) | ३९३।६५५ | न पाणि (सूक्ति ६६ १०) | ३४८।१६ |
| नक्षत्राणि बहूनि | २११।४२ | न दिष्टमप्य (म ६ ७८) | ३९३।६५७ | न पिता ना (र २ २७ ६) | ३८१।१८६१ |
| न क्षुधा पीड्यते (पच १.९९) | १४४।९२ | नदीकूले च ये (वृ चा २ १५) | १६२।४२० | नपुंसकमिति ज्ञात्वा (कुव ९०) | २७७।३ |
| नखक्षतमुर स्थले | ३२८।१५ | नदीजलक्लेशवनिारि (बालभारत) | १९०।६४ | न पुत्रत्वेन पूज्यन्ते (शा प १४८६) | ८१।४ |
| न खनति खुरै (शा प ९७०) | ८२।४४ | नदीतीरेषु ये वृ (वृ चा २ १५) | १७७।६४४ | न पुत्रात्परमो | १६०।३३८ |
| न गजाना (शा.प १३६३) | १४३।६३ | नदीना च कुला (चाणक्य २७) | १६५।५४० | न पुत्रात्त (शा प.१५२४) | १५४।७७ |
| न गर्जनै नरै (शा प १६१०) | १४३।५४ | नदीना (गरुड वृ अ १०८) | १५४।७९ | न प्रसाद (किरात.९ २५) | ३००।४२ |
| न गणस्याग्रतो (शा प १४६४) | १५३।३३ | न दुर्जन (वृ चा ११ ६) | ५९।२२४ | न प्रीति पवने | २८६।३१ |
| न गम्यो (भर्तृ स १२६) | २५०।१८ | न दुर्जनानामिह | ४९।१८० | न बरीभरीति | ३५७।४६ |
| न गुणा क्वापि | ४६।६९ | न दूतीसचारो न | २८०।८२ | न ब्रह्मविद्या न च (प्र.राघव १ २३) | ३१।२७ |
| न गृहं गृहमित्याहु (पच ३ १४६) | ३५०।६ | नदेभ्योऽपि (पूर्वचातका ७) | २११।११ | न ब्रूते परुषा गि (सा द ३ ९७) | ३५८।६८ |
| न गृह्णाति ग्रास (शा प ९२६) | २३२।७५ | न देवकन्यका (काव्या २ ३२५) | २५३।२ | न भयान्यभाष्य (मा १३ २२१९) | ३४९।४४ |
| न च गन्ध (शा प १०१०) | २३९।८९ | न देवसेवया याति | ९।१२८ | न भवति (भर्तृ सं ५५९) | ४७।१०७ |
| न च मेडव (शिशु ९ ५६) | २८७।२ | न देवाय (गरुड पू आ अ १०९) | ५५।५७ | न भवति मलयस्य | २०९।६५ |
| न च रात्रौ (मा ५ १४३७) | ३८१।१६३ | न देवे देवत्व (भर्तृ स ५५५) | ९९।१३ | नभसि जलद (अमरु १०३) | ३४३।१०३ |
| न च विद्यासमो (चाणक्य ७५) | १६२।४०६ | न देयो विद्यते | १६६।५९६ | नभसि निरव (भोज.२०८) | २१३।५१ |
| न च शत्रुर (मा १२ २१०८) | ३८१।१६६ | न देव न पित्र्य च | ४४।३ | नभसि विरलतारा | ३२४।३५ |
| न चाभिमानी | ३८०।११२ | न दवमिति सञ्चिन्त्य (शा प ४५४) | ८२।४ | न भिक्षा दुर्भिक्षे | ६७।५८ |
| न चाराधि राधा | ३७४।२११ | नद्यो नीचगता (शा.प ८१४) | २२२।३३ | न भिक्षा दुष्प्रा (भर्तृ ३ ९७) | ३८६।३५५ |
| न चिर मम तापाय (कुव ७५) | ३३०।३ | न द्वारि द्विरदावली | २३७।३६ | न भूतपूर्वो न च केन | ९२।५४ |
| न चोरहार्यं न च (प्र भ ८) | ३०।१३ | न द्विषन्ति न (शा प १४२३) | १५३।४ | नभोदिगन्तप्रतिघोष | १२८।४६ |
| न जल्प दशनत्विषा | २९४।१८ | न द्रव्याणामविज्ञाय | १६७।६२२ | नभोन्दीव्य (शिशु.१७ ६५) | १२७।१३ |
| न जातु (वायु ९३.९५) | १६६।६०९ | न धर्मशास्त्र पठतीति (हि १ १७) | ८४।१६ | नभोभूषा पूषा (प्र.म १५) | १७७।९९१ |
| न जाने समुख (अमरु ६४) | २७३।१ | न धातोर्विज्ञानं न च | ४४।८ | नभोलताकुञ्जुमुपा | २९९।१५ |
| न जिघ्रत्याघ्रातं स्पृशति | ४३।५ | न ध्यात पदं (शा प ४१५२) | ३७४।२१८ | नभोवन नक्तमसौ | ३२३।६ |
| न जीमूतच्छेद स | २५७।२४ | न ध्वानं कुरुषे (शा प ९६७) | २३५।१४८ | न भ्रूणा स्फुरणं न | २२९।२३२ |
| न ज्ञातुं नाप्यनु (प्र.राघव ५.२) | १५८।२३४ | न नटा न विटा (भर्तृ स १६५) | ८०।३० | नम खलेभ्य क (सु ३२६) | ५९।२२० |
| नटोऽपि दयाद्रणकोऽपि | ४४।७ | न नरस्य नरो दासो (हि ३ ७८) | ६४।७ | नम शिवाय नि शेष (सु १६) | ४।९ |
| न तच्छत्त्रेर्न (पंच १ १३५) | १४६।१४७ | न निर्यायान्ति (सु ४८६) | ७२।५१ | नम सर्वविदे तस्मै | ३६।५५ |
| न तज्जल यन्न (भट्टि २ १९) | ३३१।३५ | न र्नातमुपनासिकं | २७६।३७ | नम स्तवन्नचिच्छक्ति (सु २१) | १।७ |
| न तथा तप्य (भाग ११ २३) | ३८४।३०१ | ननु नीलाञ्चल | २६२।१७० | न मणेरितोऽधिका | २४७।६४ |
| न तथा बाध्यते (पच २ ९५) | ६६।२२ | ननु सदिशोऽति (शिशु.९ ६१) | २८७।३ | न मध्यव्यसनी (शा प १५०७) | १५४।६४ |
| न तथेच्छन्त्य (सु ३६९) | ५६।१०० | नन्दनजन्मा मधुप | २२२।५७ | न मया गोर (काव्या ३ १०८) | १९५।४७ |
| न तथोत्थाप्यते (हि ३ ४२) | १४८।२२९ | नन्दनरेन्द्राधिषणे (शा प ३८१) | ७२।३८ | न मया रचित | २३७।३२ |
| न तद्युक्तं न (शा.प ४७५) | १५५।१९३ | नन्दन्ति म (शा प ४१२४) | ३७२।१६७ | नमस्कुर्म कूर्म नमद | १८।१८ |
| नतध्रुवो लोचन | २५५।८९ | नन्दयति कस्य न (सु.१७४१) | ३४०।१० | नमस्तस्मै गणेशाय | २।४ |
| न तस्यादिनं | १८५।१७ | नन्वाश्रय (सु ४४१) | २४८।६९ | नमस्तस्मै वराहाय (सु ७) | १८।२३ |
| न तादृक्कर्पूरे (शा प १०१६) | २४०।१९९ | न पक्षकृत्तिर्न सपक्षक | १२४।३ | नमस्तुङ्गशिरश्चुम्बिचन्द्र (सूक्ति १ १) | ३।१ |
| न तिर्यगवलोकितं | २६१।४८ | न पङ्करालेप (सूक्ति १ ३५) | १८।२९ | नमस्तुभ्यं देवासुरसुकु (सूक्ति १.५) | ५।४९ |
| न तृणाडु (नैषध १२ ४९) | १०९।१६३ | न पण्डिता साह (दशरू ४ २६) | ३९।२२ | नमस्त्रिभुवनोत्पत्तिस्थिति (सु ५) | १।४१ |
| न तेजस्तेजस्वी (सूक्ति १० ९) | ७९।२० | न पर फलति हि (सु ४१८) | ५८।१८९ | नमश्छिमूर्तये तुभ्यं | १४।१ |
| न दन्तुरमुर स्थलं | २५६।३६ | न परस्यापराधे (हि २ १०३) | १६४।४८८ | नमस्यामो देवाञ्जतु (भर्तृ २ ९२) | ९३।८८ |
| न दातुं नोपभोक्तु च (भोज ७०) | ७१।११ | न पर्वताग्रे नलिनी (मृच्छ ४ १७) | ३५५।६ | न मातरि न (गरुड पू अ ११४) | ८८।१३ |
संस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः ४१
| न माता शपते (धर्मवि १८) १६८।६६९ | न लज्जते सज्जन (सु ३५९) ५९।२२५ | नवे वयसि (गरुड पू अ ११४) १५६।१३४ |
| नमामि मामनो (शा.प ५४८) २०५।१ | न लज्जा न (हि १ १२०) ३४९।३८ | न वै ताडनात्ता २४६।१९ |
| नमिता फलभारेण न ३४४।८ | न लभन्ते विनोयोगं (दृ श ३५) ८३।१७ | न वैरमुद्दीपेय (मा ५ १०८२) ३९४।६९७ |
| न मिथ्यावादस्ते १०६।१५४ | नलिकागतमपि ५६।१९९ | न वैरण्यभि (मा २ २४३८) ३९४।६७८ |
| न मुग्धदयिता (शा प १८३) ३७।६१ | नलिनं मलिन (नैषध २ २३) २५९।९१ | नवोक्तिजतिरि (शा प १५२) ३०।४ |
| न मुद्रीयान्मुद्री (सु ५५) १८।३० | नलिनान्तिकोप (शिशु १३ ४३) १२६।४३ | न व्यावयो (मा.२ १९७४) ३८६।३७७ |
| न मे दु ख (शा प ३४५६) २७७।४ | नलिनि निपुणता २४४।२२४ | न व्याधिर्न (योगवा सा १ २७) ३८६।३७८ |
| नमो नम काव्यरसाय (सु.१६८) ३१।३० | नलिनीदलगत (शा प ५५७) १७१।७९० | न व्यासिरेषा (दृ श ४१) १६८।६८९ |
| नमो रामपदाम्भोजं २०१।६ | नलिनीदलगत (मोहमुद्गर) ३७३।१७२ | न शब्दशास्त्रे (पञ्च सू १९) ३८९।४८४ |
| नमो वाङ्मनसातीत (सु १५) १।५ | नलिनीदलताल २८५।६ | न शान्तान्तस्तुष्णा (सु ४९१) ७२।५६ |
| नमो विश्वसृजे (रघु १० १६) १४।२ | न लोकायत (शा प १५२१) १६६।६०६ | न शीलं दृग्भङ्गी २५५।३३ |
| नम्रत्वेनोन्नमन्त (भर्तृ २ ५९) ५३।२७७ | न लोपो वर्णाना १०६।१५३ | नश्यतो युध्य (मार्कण्डेयर ४९) ३८६।३७७ |
| नयगुणोपचितामि (रघु ९ २७) ३३२।४० | नवं वयो (शा प.२०८३) १४५।१११ | न श्लाघते खल १९९।१९ |
| न यज्वानो (पच १ ३२३) १४९।२९८ | नव वस्त्रं नव (नीतिप्र १५) १५९।२९६ | न श्वेतांगुव (शा प ११११) २१८।६५ |
| न यत्नकोटिशतकैरपि ५५।४४ | नवकदम्बरजोरु (शिशु ६ ३२) ३४१।३८ | नष्ट मृतमति (पच १ ३६३) १६४।५१३ |
| न यत्र गुणव (सूक्ति ३६ ३७) २४७।५५ | नवकनकपिंशङ्ग(शिशु ११ ४३)३२७।१२ | नष्टमपात्रे दान (सु ३४१) ५८।१६६ |
| न यत्र स्थेमानं २३०।३३ | नवकिसलयतल्प (ताराश १२२)२७५।२२ | नष्टे वारिजविपिने २२२।५९ |
| नयनच्छलेन सुत २५९।७५ | नवकुङ्कुमचर्चिका २९९।१८ | न सशयमना (मा १ ५६१३) १६३।४३४ |
| नयननिपाते (शा प ३५५५) ३१२।२६ | नवकुङ्कुमारुणपयो (शिशु ९ ७)२९४।३५ | न ससारोत्पन्नं (भर्तृ स २६३) ३६८।४३ |
| नयननीरज (शा प ३३३६) २६५।२८४ | नवकुमुदवनश्रीहा(शिशु ११ २२)३०२।९ | न सदश्वा कशाघातं (सु २२६५)८०।२७ |
| नयनपंथनिरोधा (शा प ५९४) २७७।८ | न नवोज्जालैषप्रभृति २८०।८६ | न समास समर्थस्य १०३।५२ |
| नयनमसि (शा प ७५५) २१०।२१ | नवचन्द्रिकाकुसुम(शिशु ९.२८)३००।५३ | न सर्पस्य मुखे १४७।१९३ |
| नयनयुगासेचन (सा द ३ २६७)२७०।१८ | न वध्यन्ते ह्य (पच १ १२३)१६४।५०५ | न सवर्णो न च रूप २८८।९ |
| नयनविकारै (शा प ३७६५) ३५९।५७ | नवनखपदमङ्ग (शिशु ११ ३४) ३०९।६ | न साधु कुत्रापि ५२।२३९ |
| नयनस्य तुला चक्रे २५९।७० | नवनीतोप (सूक्ति १३०.३) ३८५।३१२ | न सारणीया १५५।१०२ |
| नयनाञ्चलचञ्चरी २६०।१०५ | नवनीलमेघरुचिर (शा प ७३) ३६७।२९ | न सा (स्काद नागर अ ११५) ६५।३ |
| नयनानन्द (काव्यप्र १० ५४) २९९।५ | नवपय कणकोम (शिशु ६ ३६) ३४१।४२ | न सा प्रीति (मा १३ १८१८) ३९४।६७३ |
| नयनेन निरीक्षिता २७८।३१ | नवपलाशपलाशव (शिशु.६ २) ३३२।५८ | न सा सभा (शौन नी ११५) १७४।८८४ |
| नयनोत्पलजलधारा २७५।११ | न वाचा दुर्गम (र ६ ६७) ३९३।६६८ | न साहसैकान्त(हि ३० ११६)१७४।९०९ |
| न यस्य चेष्टितं(पच १ २८४)१६४।५१२ | न वारयामो भवती २१९।८ | न सुख न च सौभाग्यं ८३।२ |
| नयेन जाग्र (काम नी ७.५८) ३९४।६६९ | न वित्तं दर्शये (पच १ ४३३) ६४।२ | न सौख्यसौभाग्य(शा प ३००) ८३।४ |
| न येनाङ्कुरितं (वृ श ५३) १५०।३५९ | न विद्यया नैव कुलेन ६५।१२ | न स्कन्दते न (म ७ ८४) ३९४।६९१ |
| नं योजनशतं दूरं (हि १ १४८) ७५।११ | न विना परिवादेन (शा प ३४६) ५४।२ | न स्त्रीजित (शा प. १५११) १५४।६६ |
| नरत्वं दुर्लभं लो(अग्निपुराण) १६७।६६० | न विना पार्थिवो (पच १ ८७) १४४।८५ | न स्त्रीणामप्रिय (हि १ ११७) ३४९।४१ |
| नरनारीसमुत्पन्ना १८५।१५ | न विप्रापादोदकपङ्कि ८९।२ | न स्वातन्त्र्य (शा प ३२४) १६७।६२६ |
| नरपतिहित (शा प १३५३) १५२।४०९ | न विमोचयितु ४८।१३२ | न ज्ञानं न च २९२।३३ |
| न रम्य नारम्य १७७।९८९ | न विश्वसे (शा प.१३०१) १६०।३२३ | न स्पृशल्या (काव्या ३ १२१) ३९४।७०३ |
| नरस्य चिह्नं १७४।८९० | न विश्वासा (मा ५ १३६१) ३९४।६९५ | न स्म माति (शिशु १०५०) ३१६।१० |
| नरस्याभरणं रूपं रूप (चा नी ४३) ८३।२ | न विष विष (स ७ ४४) ९८।१ | न स्वप्नेन (गरुड पू अ १०८) १६६।५७३ |
| नरा सस्कार (सु ३०६) १७७।९८० | न विषममृतं (शा प ३७७) ६१।२५५ | न स्वल्पमप्यध्य (हि १ १७२) १७२।८३४ |
| नराणा नापितो (पच ३ ७४) १५९।२७९ | न विषयभोगो ३६७।२२ | न स्वल्पस्य कृते (भोज १३) १६१।३५५ |
| नराधिपा नीच(पच १ ४१४)१५०।३९६ | न विषेण न (कुव १२३) ३४९।५६ | न खा करेणुमपि २३१।७३ |
| नरेशे जीवलो(काम.नी ४.४२) १४५।१२८ | नवीनदीनभावस्य याच(कविता ३९) ७३।७ | न खादुनौषधमिदं १००।४ |
| नरैर्विफलजन्मभिर्गिरि ३१७।४ | न वेत्ति यो य (वृ चा ११ ८) १७३।८६५ | न खे सुखे (मा.५ १०८२) ३९४।६८८ |
६ सुभा०अनु०