सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
२०२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ जोध नाम तब जब मन कौ निरोध होई, वौध कौ बिचार शौव आतमा कौ करिये । सुन्दर कहत ऐसे जीवत ही मुक्त होइ, मूये तै मुकति कहै तिनकौ परिहरिये ॥२०॥ योगी जागै योग साधि भोगी जागै भोग रत, रोगी जागै दुख माहि रोग की उपाधि मैं । चोर जागै चोरी कौ पहरू जागै राखिवे कौ, निरधन जागै धन पाइबे की ब्याधि मैं ॥ दिवालो की राति जगै मन्त्रवादी मन्त्र जपि, क्यौ ही मेरौ मन्त्र फुरै देखौ मन्त्र साधि मै । बिबिध उपाइ करि जागत जगत सब, सोवै सुख सुन्दर सहज की समाधि मैं ॥२१॥ योगी तू कहावै तौ तू याही योग कौ बिचारि, आतमा कौ जोरि परमातमा ही जानिये । सन्यासी कहावै तौ तू देह कौ सन्यास करि, बाहिर भीतरि एक ब्रह्म पहिचानिये ॥ जगम कहावै तौ तू एक शिव ही कौ देखि, थावर जगम सब द्वैत भ्रम भानिये । जैनी तू कहावै तौ तू दोष बुद्धि दूर करि, सुन्दर कहत जिनराज उर आनिये ॥२२॥
॥ विचार को अंग ॥ [ २०३ जती तूं कहावै तो तू एक या जनन करि, याही जत नीकौ यह आतमा कों हेरिये । तपसी कहावै तौ तू एक याही तप गाढ़ि, याही तप नीकौ मन इन्द्रीन की घेरिये ॥ भक्त तूं कहावै तौ तू चित्त एक ठौर आनि, श्वासे श्वास सोहं जाप याही माला फेरिये । सं मी कहावै तो तूं एक या संयम करि, सुन्दर कहत देह आतमा निवेरिये । २३॥ ब्राह्मन कहावै तौ तूं ब्रह्म कौ विचार कर, सत्त रज तम तीनो ताग तोरि डारिये । पंडित कहावै तौ तू याही एक पाठ पढ़ि, अंत वेद मैं कह्यौ जू ताहि कौ विचारिये ॥ ज्यौतिषी कहावै तो तू ज्योति कौ प्रकाश कर, अंतहकरन अंधकार कौ निवारिये । आगमी कहावै तौ तू अगम ठौर कौ जानि, सुन्दर कहत याही अनुभव धारिये ॥२४॥ ब्राह्मन कहावं तौ तू आपुही कौं ब्रह्म जानि, अति ही पवित्र सुख सागर मैं न्हाइये । क्षत्री तू कहावै तौ तू प्रजा प्रतिपाल कर, शीश पर एक ज्ञान छत्र कौ फिराइये ॥
२०४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ वैश्य तू कहावै तौ तू एक ही व्यापार जानि, आतमा कौ लाभ सोई अनायास पाइये । शूद्र तू कहावै तौ तू शूद्र देह त्याग कर, सुन्दर कहत निज रूप मैं समाइये ॥५५॥ ब्रह्मचारी होइ तो तू वेद को बिचार देखि, ताहि कौ समुझि जोई कह्यौ वेद श्रत है। गृही तू कहावै तौ तू सुमति त्रिया कौ व्याहि, जाकै ज्ञान पुत्र होइ ऊही भाग्यवत है ॥ वानप्रस्थ होइ तौ तू काया वनवास करि, कर्म कद मूल खाहि फल हू अनन्त है। सन्यासी कहावै तौ तू तीनो लोक न्यास करि, सुन्दर परमहंस होइ या सिधत है । २६॥ रामानदी होइ तौ तू तुच्छानन्द त्याग करि, राम नाम भज रामानन्द ही कौ ध्याइये । निंबाद्वैती होइ तौ तू कामना कटुक त्याग, अमृत कौ पान कर अधिक अघाइये ॥ मध्वाचारी है तौ तू मधुर कौ बिचार, मधुर मधुर धुनि हृदै मधि गाइये । विष्णु स्वामी होइ तौ तू व्यापक बिष्णु कौ जान, सुन्दर बिष्णु कौ भजि बिष्णु मैं समाइये ॥२७॥
॥ विचार को अंग ॥ [ २०५ देह ओर देखिये तौ देह पच भूतन कौ, ब्रह्मा अरु कीट लग देह ही प्रधान है। प्रान ओर देखिये तौ प्रान सबही कौ एक, क्षुधा पुनि तृषा दोऊ व्यापत समाँन है॥ मन ओर देखिये तौ मन कौ स्वभाव एक, सकल्प विकल्प करि सदा ई अज्ञान है। आतमा बिचार किये आतमा ई दीसै एक, सुन्दर कहत कोऊ दूसरौ न आन है ॥२८॥ ॥ इति बिचार को अंग सम्पूर्ण ॥
२०६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ अथ ब्रह्म निष्कलांक को अंग ॥२७॥ एक कोऊ दाता गाय ब्राह्मन कौ देत दान, एक कोऊ दयाहीन मारत निंशक है । एक कोऊ तपस्वी तपस्या मांहि सावधान, एक कोऊ कामी क्रीडै कामिनी कै अंक है ॥ एक कोऊ रूपवंत अधिक बिराजमान, एक कोऊ कोढी कोढ चूवत करक है । आरसी मैं प्रतिबिब सबही कौ देखियत, सुन्दर कहत ऐसैं ब्रह्म निष्कलंक है ॥१॥ रवि कै प्रकाश ते प्रकाश होत नेत्रनि कौ, सब कोऊ शुभाशुभ कर्म कौ करतु है । कोऊ यज्ञ दान जप तप यम नेम ब्रत, कोऊ इद्रिय बसि कर ध्याँन कौ धरतु है ॥ (२) परदारा-पराई स्त्री ।
॥ निष्कलक को अंग ॥ [ २०७ कोऊ परदारा पर धन कौं तकत जाइ, कोऊ हिंसा करके उदर कौ भरतु है। सुन्दर कहत ब्रह्म माखी रूप एकरस, वाही मैं उपज कर वाही मै मरतु है।२॥ जैसे जल जंतु जल ही मैं उतपन्न होहि, जल ही मै विचरत जल के आधार है। जल ही मैं क्रीडत विविध विवहार ह.त, काम क्रोध लोभ मोह जन मैं सहार है॥ जल कौ न लागै कछु जीवन के राग द्वेष, उनही के क्रिया कर्म उन ही की [लार है। तैसे ही सुन्दर यह ब्रह्म मै जगत सब, ब्रह्म कौ न लागै कछु जगत विकार है ॥३॥ स्वदेज जरायुज अंडज उदभिज पुनि, चारि खानि तिनकै चौरासी -लख जत है। जलचर थलचर व्योमचर भिन्न भिन्न, देह पचभूतन की उपजि खपत है॥
२०८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ शीत घाम पवन गगन मैं चलत आइ, गगन अलिप्त जा मैं मेघ हू अनत हैं। तैसै ही सुन्दर यह सृष्टि एक ब्रह्म माहिं, ब्रह्म नि कलंक सदा जानत महत है ॥४॥ ॥ इति ब्रह्म निष्कलंक को अंग सम्पूर्ण ॥ (४) महत-उच्च श्रेणी के ज्ञानी पुरुष। स्वेदज- ऊष्मा से पैदा होने वाले प्राणी। जरायुज-जेर से निकलने वाले प्राणी। अंडज-अंडे से निकलने वाले। उदभिज- जमीन मे से निकलने वाले।
॥ आतम अनुभव को अंग ॥ [ २०६ अथ आतम अनुभव को अंग ॥२८॥ इन्दव छंद है दिल मैं दिलदार सही, आंखिया उलटो कर ताहि चितइये । आब मैं खाक मैं वाद मैं आतस, सुन्दर जानि मैं जानि जनइये ॥ नूर मैं नूर है तेज मैं तेज है, ज्योति मैं ज्योति मिलै मिल जइये । क्या कहिये कहतै न बनै कछु, जौ कहिये कहतै हि लजइये ॥१॥ जासौ कहू सब मैं वह एक सौं, तौ कहै कैसौ है आखि दिखइये । जौ कहू रूप न रेख तिसै कछु, तौ सब झूठ के मानि कहइये ॥ जौ कहू सुन्दर नैननि माझि, तौ नैनहू बैन गये पुनि कहइये । क्या कहिये कहते न बनै कछु, जौ कहिये कहते ही लजइये ॥२॥ (१) दिलदार-प्रियतम, परमेश्वर । आब पानी । खाक-पृथ्वी । वाद-वायु । आतस-अग्नि, तेज ।
२१० ] ॥ सुन्दर विलास ॥ होत बिनोद जु तौ अभिअन्तरि, सो सुख आपु मैं आपु ही पइये । बाहिर कौ उमग्यौ पुनि आवत, कठ तै सुन्दर फेरि पठइये ॥ स्वाद निबेरै निबेर्यौ न जात, मनौ गुड गू गे हि ज्यौं नित खइये । क्या कहिये कहते न बनै कछु, ' जौ कहिये कहतैं ही लजइये ॥ ॥ व्योम सौ सौम्य अनत अखंडित, आदि न अंत सु मध्य कहा है । को परिमान करै परिपूरन, द्वैत अद्वैत कछू न जहा है ॥ कारन कारज भेद नही कछु, आपु मैं आपु ही आपु तहा है । सुन्दर दीसत सुन्दर माहि सु, सुन्दरता कहि कौन उहा है ॥४॥ (३) अभिअन्तर-भीतर । (४) व्योम-आकाश । सौम्य-व्यापक । कारज-कार्य ।
॥ आतम अनुभव को अंग ॥ [ २११ प्रश्नोत्तर एक कि दोइ न एक न दोइ, उही कि इही न उही न इही है । शून्य कि थूल न शून्य न थूल, जही कि तही न जही न तही है ॥ मूल कि डाल न मूल न डाल, वही की मही न वही न मही है । जीव कि ब्रह्म न जीव न ब्रह्म, तौ है कि नही कछु है न नही है ॥५॥ एक कहू तौ अनेक सौ दीसत, एक अनेक नही कछु ऐसाँ । आदि कहू तिहि अंतहू आवत, आदि न अंत न मध्य सु कैसाँ ॥ गोपि कहू तौ अगौपि कहा यह, गोपि अगोपि न ऊभौँ न वैसाँ । जोइ कहू सोइ है नही सुन्दर, है तौ सही पर जैसी की तैसौ ॥६॥ मनहर छंद एक कै कहै जौ कोऊ एक ही प्रकाशत है, दोइ कै कहे जौ कोऊ दूसरौ ऊ देखिये । (६) गोपि-गुप्त, गोपनीय ।
२१२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ अनेक कहै जौ कोऊ अनेक आभासै ताहि, जाकै जैसौ भाव ताकौ तैसौ ई विसेखिये । बचन बिलास कोऊ कैसे ही बखान कहौ, व्योम मांहि चित्र कहू कैसे करि लेखिये । अनुभै किये तैं एक दोइ न अनेक कछु, सुन्दर कहत ज्यौ है त्यौ ही ताहि पेखिये ।७॥ बचन ई बेदबिधि बचन ई शास्त्र पुनि, बचन ई स्मृति अरु बचन पुरान जू । बचन ई और ग्रन्थ बचन ई व्याकरन, बचन ई काव्य छंद नाटक बखान जू ॥ बचन ई सस्कृत बचन ई पराकृत, बचन ई भाषा सब जगत मैं जान जू । बचन कै परै सु बचन माहि आवै ना हे, सुन्दर कहत वह अनुभौ प्रमान जू ॥८॥ इन्द्रिय नहिं जानि सकै अल्प ज्ञान इन्द्रीन कौ, प्रान हू न जानि सकै श्वास आवै जाइ है । मन हू न जानि सकै सकल्प विकल्प करै, बुद्धि हू न जानि सकै गुनि सौ वताइ है ॥ चित्त अहकार पुनि दोऊ नहि जानि सकै, शब्द हू न जानि सकै अनुमान पाइ है ! सुन्दर कहत ताहि कोऊ नहि जानि सकै, दीवा कर देखिये सु ऐसी नहि लाइ है ॥६॥
॥ आतम अनुभव को अंग ॥ [ २१३ इन्द्रव छंद श्रोत्र न जानत चक्षु न जानत, जानत नाहि जु सूघत घ्रानै । ताहि सपर्श त्वचा न सकै पुनि, जांनन नाहि न जीभ बखानै ॥ ना मन जानत बुद्धि न जानत, चित्त अह कहि क्यों पहिचानै । शब्द हु सुन्दर जानि सकै नहिं, आतमा आपुकौ आपु ही जानै ॥१०॥ सूर के तेज तैं सूरज दीसत, चंद के तेज तैं चंद उजासै । तारे के तेज तैं तारे उ दीसत, वीजुरि तेज तै विज्जु चकासै ॥ दीप के तेज तै दीपक दीसत, हीरे के तेज तैं हीरो ऊ भासै । तैसे ही सुन्दर आतम जानहु, आपु के तेजतैं आपु प्रकासै ॥११॥ कोउ कहै यह सृष्टि सुभाव ते, कोउ कहै यह कर्म तै सृष्टी । कोउ कहै यह काल उपावत, कोउ कहै यह ईश्वर तिष्टी ॥
२१४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ कोउ कहै यह ऐसैं ही होत है, क्यौं कर मानिये बात अनिष्टी ? सुन्दर एक किये अनुभे बिनु, जान सकै नहिं बाहिर दृष्टि ॥१२.। कोउ तौ मोक्ष अकास बतावत, को कहै मोक्ष पताल के माहीं । कोउ तौ मोक्ष कहै पृथवी पर, कोउ कहै कहु और कहा ही ॥ कोउ बतावत मोक्ष शिला पर, को कहै मोक्ष मिटै पर छाही । सुन्दर आतम के अनुभे बिनु, और कहूं कोउ मोक्ष ही नाही ॥१३॥ मूये तै मोक्ष कहै सब पण्डित, मूये तै मोक्ष कहै पुनि जैना । मूये तै मोक्ष कहै रिषि तापस, मूये तै मोक्ष कहैं शिव सेना ॥ (१२) ईश्वर तिष्टी-ईश्वर निर्मित । अनिष्टी- तुचित । (१३) मोक्ष शिला-जैन सम्प्रदाय मे अभिमत न्व अवस्था ।
॥ आतम अनुभव को अग ॥ [ २१५ मूये तै मोक्ष मलेच्छ कहैं, तेऊ धोखै ही धोखै बखानत वैना । सुन्दर आतम कों अनुभै जोई, जीवत मोक्ष सदा सुख चैना ॥१४॥ जाग्रत तौ नहि मेरे विषै कछु, स्वप्न सु तौ नहि मेरे दिखै है । नाहि सुषूपति मेरे विषै पुनि, विश्व हु तेजस प्राज्ञ परै है ॥ मेरे विषै तुरिया नहि दीसत, याही तैं मेरो स्वरूप अखै है । दूर तैं दूर परै तैं परै अति, सुन्दर काउ न मोहि लखै है ॥१५॥ मनहर छन्द कोउ तौ कहत ब्रह्म नाभि के कवल मधि, कोउ तौ कहत ब्रह्म हृदै मैं प्रकास है । कोउ तौ कहत कठ नासिका कै अग्रभाग, कोउ तौ कहत ब्रह्म भृकुटी मैं वास है ॥ (१४) शिवसैना-शैव-सम्प्रदाय । मलेच्छ-मुस्लिम सम्प्रदाय ।
२१६ [ ॥ सुन्दर विलास ॥ कोउ तौ कहत ब्रह्म दसवे द्वार के बीच, कोउ नौ कहत भौर गुफ़ा में निवास है । पिंड नै ब्रह्माण्ड तै निरंतर बिराजै ब्रह्म, सुन्दर अखंड जैसे व्यापक आकाश है ॥१६॥ पाव जिनि गह्यो सु तौ कहत है ऊखल सौ, पूछ जिनि गही तिन लाब सौ सुनायौ है । सूंडि जिन गही तिन दगली की बांह कह्यौ, दंत जिन गह्यौ तिन मूसर दिखायौ है । कान जिन गह्यो तिन सूप सो बनाइ कह्यौ, पीठ जिन गही तिन बिटोरा बतायो है । जैसो है सु तैसो ताहि सुन्दर मयाखी जाने, आंधरेनि हाथी देखि झगरा मचायौ है ॥१७॥ न्याय शास्त्र कहत है प्रगट ईश्वर वाद, मीमासक शास्त्र महि कर्मवाद कह्यौ है । वैशेषिक शास्त्र पुनि कालवादी है प्रसिद्ध, पातंजली शास्त्र महि योगवाद लह्यौ है । सांख्य शास्त्र माहि पुनि प्रकृति पुरुष वाद, वेदान्त शास्त्र तिनहि ब्रह्मवाद गह्यौ है । सुन्दर कहत षट् शास्त्र माहि भयौ वाद, जाकें अनुभव ज्ञान वाद मै न वह्यौ है ॥१८॥ (१६) पिंड-शरीर ।
॥ आतम अनुभव को अंग ॥ [ २१७ 'प्रज्ञानमानन्द ब्रह्म' ऐसें ऋग्वेद कहत, 'अहं ब्रह्म अस्मि' इति यजुर्वेद यौ कहै । 'तत्वमसि' इति सामवेद यौं बखानत है, 'अयमात्मा ब्रह्म' वेद अथरवन लहै ॥ एक एक बचन मैं तीन पद है प्रसिद्ध, तिनकौ बिचार कर अर्थ तत्व कौ गहै । चारि वेद भिन्न भिन्न सब कौ सिद्धांत एक, सुन्दर समुझि कर चुपचाप व्है रहै ॥१६॥ इन्द्रिनि के भोग जब चाहै तब आइ रहै, नाशवत तातै तुच्छानन्द यौ सुनायी है । देवलोक इन्द्रलोक विधिलोक शिवलोक, बैकुण्ठ कै सुख लौ गलीतानंद गायी है ॥ अक्षय अखंड एकरस परिपूरन है, ताहि तै पूरनानंद अनुभै तै पायी है । याही कै अन्तरभूत आनंद जहां लौं और, सुन्दर समुद्र माहि सर्व जल आयी है ॥२०॥ एक तौ माया विलास जगत प्रपंच यह, चारि खानि भेद पाइ द्वैत भान तहाँ है ; दूसरौ विषै विलास इन्द्रिनि कें विषै पंच शब्द हू स्पर्श रूप रस गंध,
२१८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ तीजौ वाचिक विलास सु तौ सब बेदौ माहि, बरनि कै जहा लग बचन ते कह्यौ है । चौथौ ब्रह्म कौ विलास तिहू कौ अभाव जहा, सुन्दर कहत वह अनुभै तै लह्यौ है ॥२१॥ जीवत ही देवलोक जीवत ही इन्द्रलोक, जावत ही जन तप सति लोक आयौ हे ! जीवत ही बिधि लोक जीवत ही शिव लोक, जीवत बैकुण्ड लोक जो अकुण्ठ गायौ है । जीवत ही मोक्षशिला जीवत ही भिस्त मांहि, जीवत ही निकट परम पद पायौ है । आत्मा कौ अनुभव जिनकौ जीवत भयौ, सुन्दर कहत तिन सशय मिटायौ है ॥२२। इच्छा ही न प्रकृति न महत्तत्त अहकार, त्रिगुन न व्योम आदि शब्दादि न कोइ है । श्रवणादि बचनादि देवता न मन आदि, सूक्षिम न स्थूल पुनि एक ही न दोइ है ॥ (२१) मायाविलास-माया का खेल या निर्माण । प्रपच-विस्तार । (२२) सति-सत्य । भिस्त-वहिस्त, स्वर्ग ।
॥ आतम अनुभव को अग ॥ [ २१६ स्वेदज न अडज जरायुज न उदभिज, पशु ही न पखी ही न पुरुष ही न जोइ है । सुन्दर कहत ब्रह्म ज्यौं कौ त्यौ ही देखियत, न तौ कछु भयौ अब है न कछु होइ है ॥२३॥ क्षिति भ्रम जल भ्रम पावक पवन भ्रम, व्योम भ्रम तिनकौ शरीर भ्रम मानिये । इन्द्रिय दस तेऊ भ्रम अन्तहकरन भ्रम, तिनहू के देवता सु भ्रम तै बखानिये ॥ सत्व रज तम भ्रम पुनि अहकार भ्रम, महत्तत प्रकृति पुरुष भ्रम भानिये । जोई कछु कहिये सु सुन्दर सकल भ्रम, अनुभै किये तैं एक आतमा ही जानिये ॥२४॥ भूमि हू विलीन होइ आप हू विलीन होइ, तेज हू त्रिलोन होइ बायु जो वहतु है । ब्योम हू विलीन होइ त्रिगुन विलीन होइ, शब्द हू विलीन होइ अह जो कहतु है । (२३) त्रिगुण-सत्व, रज,तम । स्वेदज-ऊष्मा से पैदा होने वाले जीव, दीमक, जू आदि । अण्डज-अण्डे से पैदा होने वाले जीव, चिडिया, मोर, कबूतर आदि । जरायुज- जेर से लिपटे हुए पैदा होने वाले जीव, मनुष्य पशु आदि । उदभिज्ज-जमीन से निकलने वाले पेड़ पौधे । (२४) भ्रम-माया जन्य, असत्य ।
२२० ] ॥ सुन्दर विलास ॥ महत्तत्त लीन होइ प्रकृति बिलीन होइ, पुरुष बिलीन होइ देह जो गहतु है । सुन्दर सकल जो जो कहिये सु लीन होइ, आतमा के अनुभव आतमा रहतु है ॥२५॥ माया को अपेक्षा ब्रह्म रात्रि की अपेक्षा दिन, जड की अपेक्षा करि चेतनि बखानिये । अज्ञान अपेक्षा ज्ञान बंध की अपेक्षा मोक्ष, द्वैत की अपेक्षा सो तो अद्वैत प्रमानिये । दुख की अपेक्षा सुख पाप को अपेक्षा पुनि, झूठ की अपेक्षा ताहि सति कर मानिये । सुन्दर सकल यह बचन बिलास भ्रम, वचन ऊ अबचन रहित सोई जानिये ।२६॥ आतमा कहत गुरु शुद्ध निरबध नित्य, सत्य कर मानै सु तौ शब्द हू प्रभान है । जैसे ब्योम ब्यापक अखंड परिपूरन है, ब्योम उपमा तैं उपमान सो प्रमान है ॥ जाकी सत्ता पाइ सब इन्द्रिय चेतन होइ, याही अनुमान तैं अनुमान हू प्रमान है । अनुभव जानै तब सकल सदेह मिटै, सुन्दर कहत यह प्रत्यक्ष प्रमान है ॥२७॥ (२५) पुरुष-जीवात्मा । (२७) निरबध-बंधन रहित । सत्ता-आश्रय ।
॥ आतम अनुभव को अंग ॥ [ २२१ एक घर दोइ घर तीन घर चार घर, पंच घर तजै तब छठी घर पाइ है । एक एक घर कै आधार एक एक घर, एक घर निराधार आपु ही दिखाइ है ॥ सो तौ घर साक्षीरूप घर घर मैं अनूप, ताहू घर मधि कोऊ दिन ठहराइ है । ताकै परै साक्षी न असाक्षी न सुन्दर कछु, बचन अतीत कछू आइ है न जाइ है ॥२८॥ एक तौ श्रवन ज्ञान पावक ज्यौ देखियत, माया जल वरसत वेगि बूझि जातु हे । एक है मनन ज्ञान बिजुरि ज्यीं घन मधि, माया जल वरसत तामैं न बुझातु है । एक निदिध्यास ज्ञान बडवा अनल सम, प्रगट समुद्र माहि माया जल खातु है । आत्मा अनुभव ज्ञान प्रलय अगनि जैसे, सुन्दर कहत द्वैत प्रपंच बिलातु है ॥२६॥ (२८) घर-शरीर आदि का घेरा, पञ्च कोष । (२६) पावक-अग्नि, आग । बिजुरि-बिजली । घन- बादल । वडवा अनल-समुद्र की अग्नि । प्रपंच-विस्तार ।