सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
ाद्" -> wait! Let's look at the letters: यु (yu) ग्म (gma) There is a हलन्त or something? Look at: "युग्माद्"? No! There is an आ-कार! यु (yu) - ग्म (gma) - ा (ā) - द् (d) -> युग्माद् (yugmād)! Wait! Let's re-read: यु - ग्म - ा - द् = युग्माद्! Yes! "समेताज्जग्राह युग्माद् युगपद् द्वयं सः ।" Wait, "समेतात् ग्राह युग्माद् युगपद् द्वयं सः" -> समेतात् (from the united couple) + जग्राह (he took) + युग्मात् (from the pair) + युगपत् (simultaneously) + द्वयं (the two) + सः (he)! Yes! "युग्माद् युगपद् द्वयं सः ।" Look at the Hindi translation: "प्रगाढ़ प्रेम के कारण परस्पर मिले हुये दोनों पति-पत्नी से भीमदेव ने एक साथ दो उपहार ग्रहण किये—" "मिले हुये दोनों पति-पत्नी से" = समेताद् युग्मात्! "एक साथ" = युगपत्! "दो उपहार" = द्वयम्! "ग्रहण किये" = जग्राह! "भीमदेव ने ... सः" = सः! Brilliant! So it is definitely: `रसा
७ पञ्चमः सर्गः ४९ प्राचेतसीं प्राप्य दिशं प्रचेताः पाश्चात्ययोधैर्जववत्तुरङ्गैः । आयोधनं सज्यधनुःसहायः प्रसारयामास पुरःशरौघैः ॥५६॥ पश्चिम दिशा में पहुँच कर प्रकृष्ट चित्त वाले तथा मौर्वीयुत धनुष वाले राजा भीम ने अपने आगे वाणसमूह रखने वाले और वेगगामी घोड़ों वाले पाश्चात्य योद्धाओं से युद्ध छेड़ा ॥५६॥ खसानसाधूनसुभिर्वियोज्य स्वबन्धुभिः सिन्धुतटाधिवासान् । काम्बोजकाम्भोजवने तुषारैः शकान् स काण्डैः शकलीचकार ॥५७॥ दुष्ट खसों को प्राणों से वियुक्त करके तथा सिन्धु तट के वासियों को अपने बन्धुओं से वियुक्त करके, काम्बोज देशवासियों रूपी कमलवन के लिये तुषार रूप बाणों से उन्होंने शकों के टुकड़े टुकड़े उड़ा दिये ॥५७॥ इत्थं पराजित्य पराभिमर्दी नराधिनाथः प्रबलानरातीन् । तुरङ्गरत्नानि पुरङ्गतोऽसौ महार्हतेजांसि जहार तेषाम् ॥५८॥ शत्रु का दमन करने वाले श्रेष्ठ राजा भीमदेव ने इस प्रकार प्रबल शत्रुओं को परास्त करके उनके बड़े तेजस्वी बहुमूल्य तुरंगरूपी रत्नों को हर लिया ॥५८॥ आशामथासाद्य कुबेरगुप्तां स दुःसहं प्रज्वलयन् प्रतापम् । सारं कराक्रान्तिभरेण भास्वान् हिमाद्रिभूमे र्भृशमाचकर्ष ॥५९॥ तद्वश्चात् कुबेर द्वारा रक्षित उत्तर दिशा में जाकर भीमदेव ने हिमालय की भूमि का सार, अपने दुःसह प्रताप को प्रकट करते हुये, सूर्य के समान, करों (कर; किरणों) द्वारा लादे गये भार से, अच्छी तरह खींच लिया ॥५९॥ न कामरूपाक्रमणे तदानीं तेजःप्रकर्षोऽभिनवो ՚ नृपस्य । अयं हि देहप्रभया पुरैव विनापि यत्नं जितकामरूपः ॥६०॥ फिर भीमदेव ने कामरूप (आसाम) देश पर चढ़ाई की । अपने उत्कृष्ट तेज से कामरूप पर आक्रमण करना भीमदेव के लिये नई बात नहीं थी क्योंकि अपने शरीर की कान्ति से वे पहले ही, बिना यत्न किये ही, कामरूप (कामदेव के रूप) को जीत चुके थे ॥६०॥ इत्थं विधाय जगतीजययोग्ययात्रामुत्सादिताप्रतिभटक्षितिपालवर्गः । वृन्दावतीं रुचिरमङ्गलतोरणाङ्कां स प्राविशद् विशदकीर्तिपवित्रिताशः ॥६१॥ इस प्रकार जगद्विजय की यात्रा पूर्ण करके और शत्रु-राजाओं के समूह को नष्ट करके, भीमदेव अपने उज्वल यश से दिशाओं को पवित्र करते हुये, स्वागतार्थ सुन्दर और मांगलिक दरवाजों से सजाई हुई वृन्दावती (बूंदी) नगरी में लौट आये ॥६१॥ ॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये पञ्चमः सर्गः ॥
षष्ठः सर्गः तस्य विग्रहदेवोऽभूत् तनयश्चारुविग्रहः । निग्रहे वैरिबृन्दानां बहुशो दत्तनिग्रहः ॥ १ ॥ उन भीमदेव के पुत्र सुन्दर शरीरवाले विग्रहदेव हुये जिन्होंने शत्रुओं को युद्ध में कई बार पराजित किया ॥ १ ॥ पदं पैतामहं तस्मिन्नारोप्य नृपनायकः । प्रपेदे पूर्ववंश्यानां पदवीं वार्द्धकोचिताम् ॥ २ ॥ भीमदेव ने उनको पूर्वजों का राज्य सौंप कर पूर्वजों द्वारा वृद्धावस्था में स्वीकृत वानप्रस्थ आश्रम ग्रहण किया ॥ २ ॥ स्वबलेन विनिर्जित्य गुर्जरान् भृशदुर्जयान् । राज्यं तेषां गुणप्राज्यमथ जग्राह विग्रहः ॥ ३ ॥ विग्रहदेव ने अपने पराक्रम और सेना से अत्यन्त दुर्जय गुर्जरों को जीत कर उनके गुणसमृद्ध राज्य को ले लिया ॥ ३ ॥ यत् पुरं परितो रत्नैः पूरयित्वा प्रजापतिः । यानि शिष्टानि तान्येव नीरधौ निदधे ध्रुवम् ॥ ४ ॥ जिन गुर्जरों के नगर को ब्रह्मा जी ने चारों ओर रत्नों से भर कर निश्चय ही बचे-खुचे रत्नों को समुद्र में फेंका था ॥ ४ ॥ आरात् पारायणे पत्युः शृण्वत्यः श्रुतिसंहिताः । यत्र ताः शिक्षयन्ति स्म बहून् पटुगिरः स्त्रियः ॥ ५ ॥ जहाँ वेदपाठी पतियों के समीप वेदों की संहिताओं को सुन कर चतुरवाणी वाली स्त्रियाँ बहुतों को वेद पढ़ाती थीं ॥ ५ ॥ दधत्यो नखरत्नानि रदनच्छदविद्रुमान् । दन्तमुक्ताकलापं च कण्ठकम्बुभिरन्विताः ॥ ६ ॥ पञ्चबाणवणिक्पण्यवीथयो वामलोचनाः । यौवनद्रविणैः पुंभिर्यत्रासेव्यन्त सन्ततम् ॥ ७ ॥ जहाँ नख रूपी रत्नों से, अधर रूपी प्रवालों (मूँगों) से, दाँतरूपी मोतियों के समूहों से और कण्ठ रूपी शंखों से सुसज्जित तिरछे नयनों वाली रमणियाँ कामदेव रूपी जौहरी के बाजार के समान लगती थीं और यौवन रूपी धन वाले पुरुषों से सदा सेवित थीं ॥ ६-७ ॥ (१) दत्तनिग्रहः कृतपराजयो दत्तदण्डो वा ।
षष्ठः सर्गः ५१ सावर्ण्यदिवानिर्णयपीतकौशेयकञ्चुकाः । अविगूढस्वभावत्वादौन्नत्यपरिणाहयोः ॥ ८ ॥ चम्पकप्रतिमाङ्गीनां गाढंगुप्ता अपि स्तनाः । निरावरणवद् यत्र लक्ष्यन्ते स्म विदूरतः ॥ ९ ॥ चम्पे के फूल के समान हलके पीले रंग वाली कामिनियों के चोली के अन्दर अच्छी तरह छिपाये गये स्तन भी, जिनकी पीली रेशमी चोली का रंग शरीर के रंग से मिल रहा था और जिन स्तनों का उभार और विशाल आकार चोली के अन्दर भी नहीं छिप रहा था, दूर से, खुले हुये से दिखाई देते थे ॥ ८-९ ॥ भुजान्दोलरणत्कारिकङ्कणाकारितस्मरा । सविलासपदन्न्यासतारनूपुरकूजिता ॥१०॥ प्रगल्भं सञ्चरन्तीनां यत्र लोलदृशां मुहुः । स्वभावगतिरप्यासीन् नृत्यवच्चित्तहारिणी ॥११॥ जहाँ हाथ हिलाते समय बजने वाले कंकणों की ध्वनि द्वारा मानों कामदेव को बुलाने वालीं, सविलास चाल से चलने के कारण जोर से बजनेवाले नूपुरों की ध्वनि से शोभित, एवं चंचल नेत्र वालीं स्त्रियों की स्वाभाविक चाल भी नृत्य के समान मनोहर लगती थी ॥१०-११॥ यत्र गुर्जरगौराङ्गीदीर्घदृष्टिनिषेवणात् । जगतां विजये कामः सन्दधे दीर्घदर्शिताम् ॥१२॥ जगद् विजय करने के लिये गुर्जर देश की गौरवर्ण वाली रमणियों के विशाल नेत्रों का आश्रय लेकर कामदेव ने दूरदर्शिता से काम लिया ॥१२॥ मृष्टं मुखं मृगाक्षीणां शोणस्थासकरञ्जितम् । बन्धुजीवार्चितस्येन्दोः सन्दधे यत्र बन्धुताम् ॥१३॥ मृगनयनी तरुणियों का स्वच्छ और लाल बिन्दी से सुशोभित मुख लाल बन्धुजीव (गुल- दुपहरिया) पुष्प से पूजित चन्द्रमा के समान लगता था ॥१३॥ तत् पुरं स्ववशे कृत्वा प्रविश्य नगरं निजम् । अनयन् नयवित् कालं निर्वृंतो निर्जिताहितः ॥१४॥ उस नगर को अपने आधीन करके विग्रहदेव अपनी राजधानी में लौट आये । नीतिकुशल राजा शत्रुओं को जीत कर आनन्द से समय बिताने लगे ॥१४॥ अजायत जयो तस्मात् तनुजो मनुजाधिपात् । कीर्तिनिन्दितकुन्देन्दुर्गून्ददेव इति श्रुतः ॥१५॥ राजा विग्रहदेव के, यश से पूर्ण चन्द्र का तिरस्कार करने वाले, विजयी पुत्र गून्ददेव नाम से विख्यात हुये ॥१५॥ (१३) स्थासकं तिलकम् । बन्धुजीवः रक्तवर्णपुष्पविशेषः ।
: ५२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् सुतं वल्लभनामानं लभते स्म स भूपतिः । अगणेया गुणा यस्य स्वर्गिणामपि वल्लभाः ॥१६॥ इन गुन्ददेव के वल्लभ नामक पुत्र हुये जिनके असंख्य गुण देवताओं को भी प्रिय थे ॥१६॥ रागिणापि प्रतापेन सङ्गताया निरन्तरम् । भ्रान्तिभाजोपि यत्कीर्तेः शुद्धिर्व्वर्धिष्णुतामगात् ॥१७॥ रक्त (अनुरक्त; लाल) प्रताप के साथ सहवास करने वाली और इसीलिये (सहवास से दूषित होने की) भ्रान्ति वाली जिन वल्लभ राजा की कीर्ति की शुद्धि (शुद्धता; शुभ्रता) निरन्तर बढ़ती ही गई ॥१७॥ विकत्थमानं विक्रान्त्या भोजं भुजभृतां वरः । तेजसा जितदिक्पालश्चेदिपालमुपाद्रवत् ॥१८॥ अपने तेज से दिक्पालों को जीतने वाले राज-श्रेष्ठ वल्लभ ने पराक्रम की डींग हाँकने वाले चेदि-नरेश भोज पर चढ़ाई की ॥१८॥ स वाहिनीभिः सर्वाभिरबाधितविधित्सितः । अक्रमेण समाक्रामन्नग्रसत् कं धराभृताम् ॥१९॥ अपनी सब सेनाओं से अपनी इच्छा को अबाध रूप से पूर्ण करने में समर्थ वल्लभ ने क्रम का ध्यान न रख कर सब से पहले शत्रु-राजाओं के सिरमौर भोज पर ही आक्रमण किया ॥१९॥ अरुणत् सोऽरुणप्रख्यो वेगाद् वैरिवरूथिनीम् । युगान्ते मुक्तमर्यादो महीमिव महार्णवः ॥२०॥ (सूर्यसारथी) अरुण के समान तेजस्वी वल्लभ ने शत्रु-सेना को रौंद दिया, जिस प्रकार प्रलय के समय सीमा का ध्यान न रखने वाला समुद्र पृथ्वी को रौंद देता है ॥२०॥ स क्षणादकरोद् दक्षः प्रतिपक्षस्य पक्षगान् । सैनिकान् शरवर्षेण सम्पराये पराङ्मुखान् ॥२१॥ युद्ध-कुशल वल्लभ ने युद्ध में शत्रुपक्ष के सैनिकों को अपने बाणों की वर्षा से भगा दिया ॥२१॥ तरस्वी तुरगारूढं गरुत्मानिव पन्नगम् । जीवग्राहं स जग्राह सङ्ग्रामे भोजभूपतिम् ॥२२॥ वेगशील और अश्वारूढ वल्लभ ने युद्ध में राजा भोज को जीवित ही पकड़ लिया जैसे गरुड़ जीवित सर्प को वेग से पकड़ लेता है ॥२२॥ (१७) राज्ञः कीर्तिवनिता प्रेमयुक्तेन परपुंसा सङ्गच्छमानाऽपि तेन सह भ्राम्यन्ती अपि शुद्धेति विरोधः, रक्तवर्णेन प्रतापेन संगताऽपि कीर्तिः रक्ता नाभूत् किन्तु शुभ्रैवेत्यपरो विरोधः, परिहारस्तु प्रजासु प्रेम्णा सर्वत्र प्रभावेण च साहित्यात् विश्वं परिभ्राम्यन्त्या यदीयायाः कीर्तेर्निर्मलता प्रवर्धमानाऽभूदिति । (१९) धराभृतां राज्ञां कं मूर्द्धन्यम् ।
षष्ठः सर्गः ५३ निःसत्वो वीतशौटीर्यः परपाणिस्थजीवनः । सोऽभूत् क्षणादगस्त्येन गृहीत इव सागरः ॥२३॥ उस समय भोज बलहीन, अभिमानहीन और दूसरे के हाथ में स्थित निज जीवन वाला बन कर अगस्त्य मुनि द्वारा आक्रान्त समुद्र के समान लगा जिसके जलचर शान्त हो गये थे, जिसका वेग समाप्त हो गया था और जिसका सारा पानी अगस्त्य की चुल्लू में था ॥२३॥ शीर्णदंष्ट्रो यथा सिंहः प्रलीनास्त्रपरिच्छदः । परवान् पञ्जरावासं सेहे भोजः कथञ्चन ॥२४॥ जिसके अस्त्रशस्त्र रूपी आभूषण छीन लिये गये थे ऐसे भोज ने विवश होकर किसी प्रकार कारावास भोगा जैसे सिंह, जिसकी दाढ़ें तोड़ दी गई हों, विवश होकर किसी प्रकार पिंजरे में रहता है ॥२४॥ तं नियन्त्रितमारोप्य नियन्ता निजदन्तिनि । ययौ विजयनिर्घोषैः साकं शाकम्भरीपुरम् ॥२५॥ नियंत्रित भोज को अपने हाथी पर बैठा कर राजा वल्लभ विजय ध्वनि के साथ शाकंभरी नगरी की ओर रवाना हुये ॥२५॥ कृतप्रायोपवेशं तमन्वकम्पत वल्लभः । कृपैव कृपणे शत्रौ शोभते जयशोभिनाम् ॥२६॥ अनशन लेकर बैठे हुये भोज पर वल्लभ ने दया की । शत्रु के नम्र होने पर जयशील राजाओं को कृपा ही शोभा देती है ॥२६॥ विमोच्य वैरिणं बन्धादथाऽवन्ध्यपराक्रमः । सत्कारैः सान्त्वयामास सौम्यः सापत्रपं नृपः ॥२७॥ जिनका पराक्रम कभी व्यर्थ नहीं गया ऐसे सौम्यमूर्ति वल्लभ ने शत्रु राजा भोज को बन्धन से छुड़ा कर और उसका सत्कार कर लज्जित भोज को सान्त्वना दी ॥२७॥ किरीटेन शिरः शत्रोः स राजा समयोजयत् । उच्चैःशिरस्त्वमेतस्य बभूवाधिकमद्भुतम् ॥२८॥ राजा वल्लभ ने शत्रु के सिर पर किरीट रक्खा, किन्तु इससे उन्हीं का सिर ऊँचा हुआ ॥२८॥ परं संभावयामास सुवर्णाभरणैः प्रभुः । अभूवन्नस्य यशसा सुवर्णाभरणा दिशः ॥२९॥ वल्लभ ने शत्रु को सोने के आभूषणों से सज्जित किया, किन्तु इससे दिशाओं ने उन्हीं के यशरूपी आभूषण धारण किये ॥२९॥ कृत्वा महार्हसंभारैमंहेन्द्रोचितमर्हणम् । तं प्रतिविशदै वाक्यै विससर्ज विशां पतिः ॥३०॥ राजा वल्लभ ने बहुमूल्य उपहारों से भोज का इन्द्रोचित सत्कार किया और प्रेम से सुन्दर वचनों से आश्वासन देकर उन्हें अपनी राजधानी भेज दिया ॥३०॥
५४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् व्रजतः पथि भोजस्य यः श्रुतो दुन्दुभिध्वनिः । स एव वल्लभस्यासीज्जगत्यां जयघोषणा ॥३१॥ जाने वाले भोज के मार्ग में जो उनके नगाड़ों की ध्वनि सुनाई देती थी वही संसार में वल्लभ के विजय की घोषणा थी ॥३१॥ नीत्या नितान्तमित्येवं कृतकृत्यत्वमीयिवान् । अनामयमनाः सम्यक् शशास वसुधां सुधीः ॥३२॥ नीतिवान्, बुद्धिमान् और स्वस्थचित्त वल्लभ ने कृतकृत्य होकर पृथ्वी पर सुन्दर शासन किया ॥३२॥ ततस्तस्मिन् यशःशेषे शेषोपमयशोभरे । अभवत् पृथिवीनाथो रामनाथस्तदात्मजः ॥३३॥ शेष के समान शुभ्र यश वाले वल्लभ के यशःशेष (स्वर्गवासी) हो जाने पर उनके पुत्र रामनाथ राजा हुये ॥३३॥ रामोऽस्य नाथ इत्येतच्चरितैरन्वमीयत । भजन्ते स्वामिशीलं हि भृत्यास्तदनुवर्तिनः ॥३४॥ अनुचर भृत्य स्वामी के शील का अनुकरण करते हैं अतः राजा रामनाथ के गुण और शील के कारण यह अनुमान हुआ कि राम ही इनके नाथ हैं ॥३४॥ सुतोऽभूत् तस्य चामुण्डश्चण्डदोर्दण्डमण्डनः । खण्डितारिचमूमुण्डैश्चामुण्डागणतोषकृत् ॥३५॥ रामनाथ के चामुण्ड नामक पुत्र हुये जो प्रबल भुजयुग से शोभित थे और जिन्होंने शत्रु- सैनिकों के मुण्ड काट काट कर देवी चामुण्डा के गणों को संतुष्ट किया ॥३५॥ सितातपत्रं पुत्राय प्रतिपाद्य ततः पिता । आस्पदं मुनिभिर्मृग्यमारुरोह मरुत्वतः ॥३६॥ पिता रामनाथ ने अपने पुत्र चामुण्ड को श्वेत छत्र सौंप कर, मुनियों द्वारा इच्छित इन्द्र- पद प्राप्त किया ॥३६॥ चारुणा चरितेनाथ चामुण्डो मण्डयञ्जनान् । वृषाङ्कवरिवस्यायां वशी चित्तं न्यवेशयत् ॥३७॥ अपने सुन्दर चरितों से प्रजा को प्रसन्न रखने वाले चामुण्ड ने जितेन्द्रिय होकर भगवान् शिव की सेवा में मन लगाया ॥३७॥ आरोप्य मेदिनीभारं मन्त्रिवृद्धेष्वगृध्नुषु । विततान त्रिनेत्रस्य प्रसादोपयिकीः क्रियाः ॥३८॥ विश्वस्त और वृद्ध मंत्रियों को, जिनको लोभ छू भी नहीं गया था, राज्य-भार सौंप कर चामुण्ड ने शिव को प्रसन्न करने के लिये प्रयत्न प्रारंभ किया ॥३८॥
षष्ठः सर्गः ५५ त्रिसन्ध्यं त्रिविधाः पूजास्त्र्यम्बकस्य विशेषयन् । तप्यते स्म तपस्तीव्रं शैवव्रतपरायणः ॥३९॥ शैवव्रत में परायण चामुण्ड, प्रातः, मध्याह्न और सायं तीनों समय शिव की तीनों प्रकार की विशिष्ट पूजा करके तीव्र तप करने लगे ॥३९॥ तप्ताङ्गारकरालायां सरण्यां सञ्चचार सः। भक्तेरनन्यगामिन्या विशुद्धिमिव दर्शयन् ॥४०॥ मानों अनन्य भक्ति की विशुद्धि दिखाते हुये वे जलते हुये अंगारों के भीषण मार्ग पर भी चले जाते थे ॥४०॥ एवंविधैरथान्यैश्च तपोभिरतिदुष्करैः । प्रादात् प्रीतमनास्तस्मै प्रार्थितं प्रमथाधिपः ॥४१॥ इस प्रकार के तथा अन्य अत्यन्त कठिन तपों से प्रसन्न होकर भगवान् शिव ने उन्हें प्रार्थित वरदान दिया ॥४१॥ स जित्वा जित्वरः सङ्ख्ये यवनानीकनायकान् । शकानामधिपं शक्त्या कारातिथिमकारयत् ॥४२॥ जिसके कारण विजयी चामुण्ड ने अपनी शक्ति से यवन सेना के नायकों को युद्ध में जीता और शकों के स्वामी को रण में जीत कर कैद कर लिया ॥४२॥ सुतं दुर्लभराजाख्यं कृत्वा राजानमार्यधीः । चामुण्डश्चन्द्रचूडस्य लोकं लोकोत्तरं ययौ ॥४३॥ श्रेष्ठबुद्धि वाले चामुण्ड, अपने दुर्लभराज नामक पुत्र को राजा बना कर, भगवान् शिव के लोक कैलास में चले गये ॥४३॥ सुतो दुलसदेवोऽथ जातो दुर्लभराजतः । कुशलो वीरचर्यायां चिरं वसुमतीमशात् ॥४४॥ इन दुर्लभराज के दुलसदेव नामक पुत्र हुये जो वीरों की चर्या में कुशल थे और जिन्होंने बहुत समय तक पृथ्वी पर शासन किया ॥४४॥ तस्माद् विशालयशसो वीशलाख्यः सुतोऽजनि । विषयान् वशयामास विश्वोद्गीतगुणेन यः ॥४५॥ उन विशाल यश वाले दुलसदेव के बीसलदेव नामक पुत्र हुये जिन्होंने विश्व में गाये जाने वाले गुणों द्वारा प्रजा को और विषयों को अपने वश में कर लिया ॥४५॥ जगद्विजयिवीर्येण वज्रपाणिसमत्विषा । शक्तित्रयसनाथेन तेन षाड्गुण्यशोभिना ॥४६॥ आकर्णकृष्टचापेन सङ्गरे कर्णविक्रमम् । कर्णं संयम्य ककुभां कर्णपूरीकृतं यशः ॥४७॥ बीसलदेव ने, जिनका पराक्रम जगत् को विजय करने वाला था, जिनका तेज इन्द्र के समान
५६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् था, जो तीनों शक्तियों (प्रभुशक्ति, मंत्रशक्ति और उत्साहशक्ति) से युक्त थे और छहों गुणों (सन्धि, विग्रह, यान आदि) से शोभित थे, युद्ध में कान तक धनुष खींच कर कर्ण के समान पराक्रमी अवन्तिनरेश कर्ण को विजय करके अपने शुभ्र यश को दिशाओं का कर्णफूल बना दिया ॥४६-४७॥ निबध्याऽवन्ध्यनिर्वन्धः समरे कर्णभूपतिम् । आददेऽवन्तिनगरीं जयश्रियमिवापराम् ॥४८॥ अमोघ पराक्रम वाले बीसलदेव ने युद्ध में कर्ण राजा को मार कर अवन्ति नगरी (उज्जैन) को दूसरी विजय-लक्ष्मी के समान ग्रहण किया ॥४८॥ यस्यामुत्पन्नया नित्यं विशालवसुसम्पदा । यथार्थनामधेयत्वं लभते स्म वसुन्धरा ॥४९॥ जिस अवन्ति नगरी में नित्य उत्पन्न होने वाली विशाल वसु (धन-धान्य आदि) सम्पत्ति के कारण पृथ्वी का 'वसुन्धरा' नाम सार्थक होता था ॥४९॥ सौधोत्सङ्गपरिष्वङ्गनिर्वृते यत्र नीरदे । स्थिरसौदामिनीशोभामभजत् कामिनीजनः ॥५०॥ जहाँ के ऊँचे महलों के शिखरों का आलिंगन करके आनन्द से बैठे हुये बादलों में, शिखरा- रूढ़ कामिनियाँ स्थिर बिजलियों की शोभा प्राप्त करती थीं ॥५०॥ महाकालकिरीटस्था कला यत्र कलाभृतः । मालवीमुखपद्मानां द्युतिद्वैगुण्यमादधे ॥५१॥ जहाँ भगवान् महाकालेश्वर के मस्तक पर स्थित चन्द्रमा की कला मालव देश की स्त्रियों के मुख-कमलों की कान्ति को द्विगुणित बना रही थी (वैसे चन्द्रोदय के, समय कमल मुकुलित रहते हैं) ॥५१॥ रिङ्गद्गङ्गोत्तमाङ्गोऽपि यत्राऽनङ्गविमर्दनः । शिप्रारसाभिषेकाय साभिलाषः सदाऽभवत् ॥५२॥ जहाँ कामदेव को भस्म करने वाले भगवान् शिव, मस्तक पर गंगाजी के लहराते हुये भी, शिप्रा नदी के जलाभिषेक की सदा इच्छा रखते थे ॥५२॥ मध्यं दिनेऽपि देवस्य चूडाचन्द्रांशुचुम्बितम् । धारायन्त्रायते यत्र चन्द्रकान्तकृतं गृहम् ॥५३॥ जहाँ मध्याह्न में भी, चन्द्रकान्त मणियों से बना हुआ गृह भगवान् शिव के मस्तक पर स्थित चन्द्रमा की किरणों से चूमा जाकर धारायन्त्र (फौव्वारा) बन रहा था (चन्द्रकिरणों के स्पर्श से चन्द्रकान्त मणियों में से पानी निकलता है) ॥५३॥
८ षष्ठः सर्गः ५७ यत्रासन्नमहादेवदृष्टिपातभयादिव । मालवीलोचनोपान्ते विलीनो मीनकेतनः ॥५४॥ जहाँ समीपस्थित भगवान् शिव के दृष्टिपात के भय से (भस्म हो जाने के भय से) मानों कामदेव मालव-रमणियोँ के नेत्रों के कोनों में छिप रहा था ॥५४॥ वाणीपाणिलसद्वीणाक्वणितैर्मिलितस्वराः । यस्यां सोमं जगुः सोमशेखरं नगरस्त्रियः ॥५५॥ जहाँ सरस्वती के हाथ में शोभित वीणा के स्वरों से स्वर मिला कर नगर की स्त्रियाँ पार्वती- सहित भगवान् चन्द्रचूड़ साम्बशिव की स्तुतियाँ गाती थीं ॥५५॥ सदा हरशिरश्चन्द्रकरालम्बनलालिताः । शिप्राशीकरसम्भिन्नसमीरमृदुलीकृताः ॥५६॥ मानिनीसमुदायस्य यस्यां मानसवृत्तयः । आययुर्न कठोरत्वं वल्लीनामपि पल्लवाः ॥५७॥ जहाँ सदा शिव के मस्तक पर स्थित चन्द्र की किरणों द्वारा लालित, और शिप
५८ | सुर्जनचरितमहाकाव्यम्
सारमाकृष्य कैलासात् किंवा ब्रह्माण्डभाण्डतः । निर्मिता नु वृषाङ्केन निजावासाय या स्वयम् ॥६२॥ क्या इस अवन्ति नगरी को स्वयं भगवान् शिव ने अपने रहने के लिये कैलास या ब्रह्माण्ड के सार से निर्मित किया था ? ॥६२॥ शिप्रासरिति स स्नात्वा विप्राणां विहिताऽर्हणः । अथ प्रमथनाथस्य प्रासादं प्राविशद् वशी ॥६३॥ शिप्रा नदी में स्नान करके और ब्राह्मणों की पूजा करके जितेन्द्रिय नृपति बीसलदेव महाकाल के मन्दिर में गये ॥६३॥ अर्चयित्वाऽवनीपालः पुष्पधूपादिसाधनैः । प्रभुं प्रभूतया भक्त्या तुष्टावाऽष्टतनूभृतम् ॥६४॥ राजा ने पुष्प धूप आदि साधनों से भगवान् शिव की पूजा करके अष्टमूर्ति महेश्वर को अपनी प्रगाढ भक्ति से प्रसन्न किया ॥६४॥ जयकर्पूरगौराङ्ग गिरां साम्नामगोचर । गरीयःकरुणागार गौरीरूढार्धविग्रह ॥६५॥ हे कपूर के समान् शुभ्र शरीर वाले, सामवेद की ऋचाओं द्वारा भी अगोचर, महान् करुणा के आगार, अर्द्धनारीश्वर भगवान् शंकर ! आपकी जय हो ॥६५॥ बालचन्द्रलसद्भाल जय व्यालविभूषण । जय देव महाकाल जहि कालमहाभयम् ॥६६॥ हे बाल चन्द्र से शोभित मस्तक वाले, सर्प के आभूषण वाले, महाकाल ! आपकी जय हो । देव ! हमारे कालरूपी महाभय को नष्ट कीजिये ॥६६॥ कृपापालितदिक्पाल कपालप्रोल्लसत्कर । वेतालपूतनापाल कालकण्ठ नमोऽस्तु ते ॥६७॥ हे अपनी कृपा से दिक्पालों का पालन करने वाले, हाथ में कपाल धारण करने वाले, वेतालों की सेना का पालन करने वाले, नीलकण्ठ भगवन् ! आपको नमस्कार है ॥६७॥ त्रिलोकीशरण त्र्यक्ष त्र्यम्बक त्रिपुरापते । निस्त्रैगुण्य त्रयीसार तारयास्माद् भवार्णवात् ॥६८॥ हे तीनों लोकों के शरण, तीन अक्षमाला धारण करने वाले, त्रिनेत्र वाले, त्रिपुरा देवी के पति, निस्त्रैगुण्य, तीनों वेदों के सार ! इस भवसागर से हमें तार दीजिये ॥६८॥ स्मृतिमात्रेण जन्तूनां शमयन्तं तमः प्रभो । ये त्वां तमोमयं प्राहुस्त एव तमसा हताः ॥६९॥ प्रभो ! आप स्मरणमात्र से प्राणियों के तम को नष्ट कर देते हैं। जो आपको तमोमय कहते हैं वे ही तम रूपी अज्ञान से मारे गये हैं ॥६९॥
षष्ठः सर्गः ५९ ज्वलनं जलवेणिञ्च विधुं विषधरं तथा। अस्थिमालाञ्च बालाञ्च बिभर्षि सममीश्वर ॥७०॥ महेश्वर ! आप तृतीय नेत्र की अग्नि को और गंगा को, विषधर सर्प को और अमृतमय चन्द्रमा को, अस्थिमाला को और भगवती पार्वती को समान रूप से धारण करते हैं ॥७०॥ त्वमेव विश्वनिर्माणस्थितिसंहारहेतुकम् । वितनोषि त्रिधात्मानं त्रिलोचन गुणैस्त्रिभिः ॥७१॥ त्रिलोचन ! आप सत्वरजस्तमोरूप तीनों गुणों से, विश्व की उत्पत्ति-स्थिति-संहार के लिये स्वयं को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के रूप में अभिव्यक्त करते हैं ॥७१॥ अष्टमूर्तिं त्रिमूर्तिं वा त्वां वदन्तु पुराविदः । आनन्त्यात् तव मूर्तीनां वयमत्र निरुत्तराः ॥७२॥ विद्वान् लोग चाहे आपको अष्टमूर्ति कहें चाहे त्रिमूर्ति, वास्तव में आप अनन्तमूर्ति हैं अतः हम इस विषय में कुछ नहीं कह सकते ॥७२॥ कोटिशो रसनाः कस्य कस्यानान्ता सरस्वती । वक्तुं यः प्रतिजानीते महिमानं महेश ते ॥७३॥ किसके करोड़ों जीभें हैं ? किसकी वाणी अनन्त है ? महेश ! आपकी महिमा का वर्णन कौन कर सकता है ? ॥७३॥ अध्वराखिलसंभारसंभृतस्यापि धूर्जटे । पराचि त्वयि दक्षस्य दारुणाय तपःक्रियाः ॥७४॥ धूर्जटे ! प्रजापति दक्ष की, यज्ञ के समस्त साधनों से सम्पन्न होने पर भी, तप की क्रियायें, आपके विमुख होने के कारण, विनाश के लिये हुईं ॥७४॥ नाराधितौ पुराराते पुरा ते चरणावतः । जननैऽस्मिन्नहं षण्णां वैरिणां पतितो मुखे ॥७५॥ पुरारि.! मैंने पूर्वजन्म में आपके चरणों की आराधना नहीं की । इसीलिये इस जन्म में मैं कामक्रोधादिक छह शत्रुओं के मुख में पड़ रहा हूँ ॥७५॥ दुर्वासना पिशाचीयं मोहयित्वा मर्तिं मम । बलात् कवलयामास भवत्स्मृतिकथामपि ॥७६॥ यह दुर्वासना रूपी पिशाची, मेरी बुद्धि को मोह कर, आपकी स्मृतिकथा को भी बलपूर्वक खा गई (दुर्वासना में फँस कर मैं आपका स्मरण तक न कर सका) ॥७६॥ एतेनागामि जन्मापि तादृगेव निरूपयन् । किं वदाम्यपराद्धोऽहं त्वयि त्रिष्वपि जन्मसु ॥७७॥ अतः अगले जन्म में भी मेरा वही हाल होगा (क्योंकि इस जन्म में भी मैं आपकी आराधना नहीं कर रहा हूँ) । इस प्रकार तीनों जन्मों में मैं आपका अपराधी हूँ ॥७७॥
६० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् निरुपाधिकृपापूरपरतन्त्रीकृतात्मनः । दीनोद्धरणमात्रं ते व्यसनं वृषभध्वज ॥७८॥ वृषभध्वज ! आप अपनी सहज और असीम करुणा के वश में हैं और दीनों का उद्धार करना ही आपका एक मात्र व्यसन है ॥७८॥ ममाप्यन्धधियश्छिन्धि बन्धमन्धकमर्दन । कृपायास्तव नायासलेशोऽप्यत्र भवेद् विभो ॥७९॥ अन्धक दैत्य के नाशक ! मैं अन्ध बुद्धि वाला हूँ । मेरा बन्धन भी काट दीजिये । प्रभो ! इसमें आपकी कृपा को जरा सा भी परिश्रम नहीं होगा ॥७९॥ इति स्तुतिभिरीशानं संभाव्य स भुवः प्रभुः ॥ प्रादक्षिण्यात् परिक्रम्य प्रणिपत्य विनिर्ययौ ॥८०॥ पृथ्वीपति बीसलदेव इस प्रकार की स्तुति से भगवान् महाकाल की पूजा कर तथा प्रदक्षिणा परिक्रमा कर और भगवान् को प्रणाम कर चले आये ॥८०॥ कृत्वा करप्रदांस्तत्र बलवानथ मालवान् । जितैरनुगतो भूपैः प्राविशत् पुरमात्मनः ॥८१॥ बलवान् राजा, मालवों को कर देने वाले बना कर और विजित राजाओं को अपने पीछे लेकर, अपनी राजधानी लौट आये ॥८१॥ तस्मात् पृथुगुणात् पुत्रो जातः पृथुसमप्रभः । पूरयन् यशसा पृथ्वीं पृथ्वीराज इति स्मृतः ॥८२॥ उन महान् गुणों वाले बीसलदेव के पृथु राजा के समान पराक्रमी एवं अपने यश से पृथ्वी को पूर देने वाले पृथ्वीराज नामक पुत्र हुये ॥८२॥ उत्पन्नस्तनुजस्तस्य प्रपन्नो दनुजद्विषम् । बिभ्राणो गुणबाहुल्यं बल्हणो वल्लभः सताम् ॥८३॥ उन पृथ्वीराज के भगवान् विष्णु के भक्त, अनेक गुणों को धारण करने वाले और सज्जनों के प्रिय बल्हण नामक पुत्र हुये ॥८३॥ लब्धलक्षा अपि स्वैरं नातृप्यन् पक्षसंश्रिताः । शतकोटितुलादानगृध्नवो यस्य मार्गणाः ॥८४॥ जिनके बाण (और याचक), पंख से युक्त होकर (सत्पक्षाश्रित होकर) और इच्छित लक्ष (लक्ष्य; लाख) को भी प्राप्त करके शतकोटि (वज्र; सौ करोड़) की तुलना की प्राप्ति (तुलाऽऽदान; तुलादान) के लोभ से तृप्त नहीं हुये ॥८४॥ (८४) लब्धलक्षाः प्राप्तशरव्याः प्राप्तलक्षद्रव्याश्च । शतकोटेर्वज्रस्य तुलायास्तुलनाया आदानस्य ग्रहणस्य गृध्नवो लोभिनः शतकोटीनां द्रव्याणां तुलादानस्य लोभिनश्च । पक्षयुक्ताः सत्पक्षे स्थिताश्च । मार्गणा बाणा याचकाश्च ।
षष्ठः सर्गः ६१ निर्वाप्य प्रतिभटपार्थिवप्रतापं सिञ्चन्त्यः किसलयिनीं स्वकीर्तिवल्लीम् । सञ्चेरुः सुचरितशालिनोऽस्य विष्वग् विस्तीर्णा वितरणनीरनिर्झरिण्यः ॥८५॥ शत्रुराजाओं की प्रतापाग्नि को बुझा देने वालीं और अपने राजा की कोमल पत्तों वाली कीर्तिलता को सींचने वालीं चरित्रवान् राजा वल्हण की दानजल की विशाल नदियाँ चारों ओर बहने लगीं ॥८५॥ अथ गतवति नाकं वल्हणे बाहुलेय- प्रतिनिधिरधिरूढस्तत्पदं तस्य पुत्रः। अभवदनलदेवः शत्रुवंशाटवीना- मनल इव समिद्धः सोमवद् बान्धवानाम् ॥८६॥ राजा वल्हण के स्वर्गवासी होने पर, स्वामी कार्तिकेय के समान बलवान् उनके पुत्र अनलदेव राजसिंहासन पर बैठे, जो शत्रुओं के वंश रूपी बाँस के जंगलों के लिये प्रचण्ड अग्नि के समान भीषण और बन्धु-वर्ग के लिये चन्द्रमा के समान शीतल थे ॥८६॥ ॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये षष्ठः सर्गः ॥ (८६) बाहुलेयः कार्तिकेयः ।
सप्तमः सर्गः ततः समासाद्य पितुः समृद्धिं श्रियं विववानिव शारदीनाम् । प्रचीयमानाऽप्रतिमप्रतापः सुदुःसहोऽभून्महसा महीशः ॥ १ ॥ पृथ्वीपति अनलदेव, पिता की राज्यसमृद्धि को पाकर, शरद्ऋतु की शोभा को पाने वाले सूर्य के समान, निरन्तर बढ़ने वाले अप्रतिम प्रताप से युक्त और तेज से अत्यन्त दुःसह बन गये ॥ १॥ विशीर्णचापाश्चपला गरिम्णा त्यक्ता विपर्यस्तगभीरघोषाः । चिरादकिञ्चित्करतामवापुः पयोधरास्तस्य विरोधिनश्च ॥ २ ॥ उनके शत्रु और शरद्ऋतु के बादल चिरकाल तक टूटे धनुष वाले (टूटे इन्द्रधनुषवाले), चपल और हल्के बन कर तथा अपना गंभीर गर्जन छोड़ कर बेकार हो गये ॥ २ ॥ उदीयमानात् किल कुम्भयोनेर्जलाशयानामजनि प्रसादः । अस्योदये तु स्पृहणीयनीतेः शुद्धाशयाः साधु ययुः प्रसादम् ॥ ३ ॥ अगस्त्य तारे के उदय होने पर जलाशय (सरोवर; जडाशय = मूर्खहृदय) प्रसन्न और निर्मल हो गये; किन्तु श्लाघ्य नीति वाले अनलदेव के उदय होने पर शुद्ध हृदय वाले सत्पुरुष अत्यन्त प्रसन्न हुये ॥ ३ ॥ स्वभर्तुशत्रोरुदयादगस्तेर्नूनं रुदत्यः कुररीरुतेन । समुद्रपत्न्यस्तनिमानमापुर्यथास्य राज्ञः प्रतिपक्षकान्ताः ॥ ४ ॥ अपने पति समुद्र के शत्रु अगस्त्य के उदय होने पर मानों कुररी पक्षियों के शब्दों के बहाने रोती हुईं नदियां दुबली हो गई जैसे अनलदेव के शत्रुओं की स्त्रियां अपने पतियों के शत्रु (अनल- देव) के उदय होने पर कुत्सित स्वर से रोती हुईं दुबली हो गईं ॥ ४ ॥ आह्लादयामासतुसल्लसन्तौ लोकानुभौ शीतकरक्षितीशौ । करैर्यथार्थैः समयोरितैस्तानेको वितन्वन्नपरस्तु गृह्णन् ॥ ५ ॥ सुन्दर कान्ति वाले चन्द्रमा और राजा अनलदेव, इन दोनों ने ही लोगों को प्रसन्न किया— एक ने (चन्द्रमा ने) तो समयोचित, यथार्थ और शीतल कर (किरणों) देकर और दूसरे ने (अन- लदेव ने) समयोचित, यथार्थ और अल्प कर लेकर ॥ ५ ॥ क्षीरेण सप्तच्छदपादपानां तस्य द्विपानां मदरेखया च । आकृष्यमाणाः समसौरभत्वाद् भ्रमुर्द्विरेफाश्चिरमन्तराले ॥ ६ ॥ सप्तपर्ण वृक्षों के दूध से और राजा के हाथियों के मद की रेखा से आकृष्ट हुये भ्रमर, दोनों की सुगन्ध बराबर होने के कारण (यह निश्चय न कर सकने से कि किस पर बैठें), बहुत देर तक आकाश में ही उड़ते रहे ॥ ६ ॥
·सप्तमः सर्गः ६३ अन्तःसरागापि रुचामधीशनालम्ब्यमाना सहसा करेण । नितान्तमौग्ध्यान्मुखपद्ममुद्रामुपालि नालं नलिनी विमोक्तुम् ॥७॥ कमलिनी, अन्दर से लाल होने पर भी (हृदय से अनुरक्त होने पर भी), सूर्य की किरणों का (हाथ का) सहसा स्पर्श पाकर, अत्यन्त मुग्ध होने के कारण, अपने मुकुलित मुख-कमल को, भ्रमर के सामने (उपाऽलि; पर-पुरुष के सामने) विकसित नहीं कर सकी; जिस प्रकार कोई नवोढ़ा नायिका, हृदय से अनुरक्त होने पर भी, अपने स्वामी के हाथ का (अधीशेन) सहसा स्पर्श पाकर, अत्यन्त मुग्धा होने के कारण, सखियों के सामने (उपाऽऽलि) लज्जावश अपने मुख-कमल के घूंघट को नहीं हटाती ॥७॥ करेण रागाद् घनविप्रकीर्णं शनैः शनैरावरणं नियम्य । मुखं नलिन्या इव पद्मकोषं प्रकाशतां चण्डरुचिर्निनाय ॥८॥ बादलों के कारण छाये हुये अन्धकार को अपनी रक्त किरणों से धीरे धीरे हटाकर सूर्य ने कमलिनी के मुख-कमल को विकसित कर दिया, जिस प्रकार तीव्र अनुराग वाला (चण्डरुचिः) नायक लज्जावश गहरे खींचे गये घूंघट को अपने अनुरक्त हाथ से धीरे धीरे हटा कर घूंघट के अन्दर छिपे हुये नवोढा नायिका के मुख-कमल को प्रकाशित कर देता है ॥८॥ विदूरभिन्नाधरपत्रमीषद्विकासि किञ्जल्करदं दधाना । ससौरभोद्गारमुखारविन्दं विमुक्तनिद्रा नलिनी जजृम्भे ॥९॥ (सोई हुई) कमलिनी (सूर्य के कर-स्पर्श से) जाग कर अपने पत्र रूपी होठों को दूर फैला कर तथा अपने शुभ्र केसर रूपी दाँतों को कुछ कुछ प्रकट कर, अपने कमल रूपी मुख से सुगन्ध रूपी साँस निकालती हुई जम्हाई ले रही है ॥९॥ विजृम्भमाणोत्कलिका नलिन्द्यो दरन्नमत्कण्टकिकण्ठनालाः । विस्फारितैः पङ्कजकोषनेत्रैर्निभालयामासुरिवात्मबन्धुम् ॥१०॥ खुली हुई पंखुड़ियों वालीं (बढ़ी हुई उत्कण्ठा वालीं) और कुछ झुकते हुये रोयों से शोभित नालों वालीं (कुछ कुछ खड़े हुये रोंगटों से शोभित कण्ठों वालीं) कमलिनियाँ (नायिकाओं के समान) अपने पूर्ण खुले हुये कमल-नेत्र से सूर्य को (अपने प्रियतम को) देख रहीं हैं ॥१०॥ चिरप्रवासान्मिलितं मरालं पक्षानिलोद्धूततरङ्गलोला । प्रत्युज्जगामेव समालपन्ती सरोजिनी षट्पदहुङ्कृतेन ॥११॥ चिरप्रवास के बाद मिले हुये (वर्षा ऋतु भर बाहर रह कर अब शरद् में वापस आये हुये) हंस के स्वागत में कमलिनी मानों भ्रमरों की गूंज के बहाने स्वागत-वचन बोलती हुई और (हंस के) पंखों की वायु के कारण उठने वाली लहरों से हिलती हुई मानों उठ कर गई ॥११॥ (७) उपाऽलि, उपाऽऽलि च ।
कूजन् मुहुः शोणमुखः समन्ताद् व्यापारयन् पक्षमपेतधैर्यः । तारुण्यमत्तालिविलासलोलां सरोजिनीं हंसयुवा न सेहे ॥१२॥ लाल चोंच वाला (क्रोध से लाल मुँह वाला), बार बार कूजता हुआ (क्रोध में दुर्वचन बोलता हुआ), चारों ओर पंख फड़फड़ाता हुआ (चारों ओर हाथ हिलाता हुआ) और अधीर हुआ हंस-युवक, यौवनमद से उन्मत्त भ्रमर के साथ भोगविलास में चञ्चल सरोजिनी को सहन नहीं कर सका ॥१२॥ प्रसारयन् शीतकरः सुदूरात् करं परं खेदमिवाप्नुवानः । पतन् सरस्यां प्रतिमामिषेण कुमुद्वतीक्रोड़मुपाससाद ॥१३॥ (यह अस्त होने वाला) चन्द्रमा, अत्यन्त खिन्न हुआ, दूर से अपने कर (किरणों; हाथ) फैलाता हुआ, प्रतिबिम्ब के बहाने मानों सरोवर में गिर कर अपनी प्रेयसी कुमुदिनी की गोद में छिप रहा है ॥ १३॥ संयम्य नूनं जलदागमेन घनान्धकारं हरितो नि
६ सप्तमः सर्गः ६५ स. हंसलक्ष्मम्बरसङ्गिगौरपयोधरामुत्पलचारुनेत्राम्। प्रसन्नशीतांशुमुखीं सुतारनक्षत्रमालाभरणोपकण्ठाम् ॥१९॥ विनिद्रबन्धूकदलाधरोष्ठीं शरच्छ्रियं चारुशरं दधानाम्। प्रकाशपङ्केरुहताम्रपाणौ पतिर्ग्रहाणां जगृहे करेण ॥२०॥ सूर्य ने, उड़ते हुये हंसों की शोभा से युक्त शुभ्र आकाश में स्थित श्वेत मेघों से शोभित, कमल रूपी सुन्दर नेत्रों वाली, प्रसन्न चन्द्रमा रूपी मुख वाली, सुन्दर तारे और नक्षत्र-माला रूपी आभूषणों से सुशोभित, विकसित बन्धूक पुष्प रूपी अधर वाली, सुन्दर शर नामक पुष्प को धारण करने वाली शरद् ऋतु के प्रफुल्लित रक्तकमल रूपी पाणि (हाथ) का अपने कर (किरण; हाथ) से ग्रहण किया मानों किसी ब्राह्मण ने, हंसों के चित्रों से शोभित साड़ी का स्पर्श करने वाले गोरे स्तनों वाली, कमल के समान सुन्दर नेत्र वाली, प्रसन्न और पूर्ण चन्द्रमा के समान मुख वाली, सुन्दर तार में पिरोये गये नक्षत्र-माला (मोहन-माला) नामक आभूषण से सुशोभित कण्ठ वाली, विकसित लाल बन्धूक पुष्प जैसे अधर वाली और एक हाथ में सुन्दर बाण धारण करने वाली क्षत्रिया के प्रफुल्लित रक्तकमल के समान सुन्दर हाथ को अपने हाथ में लेकर पाणिग्रहण किया हो। (विवाह में वधू के लिये हंसों के चित्रों से शोभित साड़ी पहनना मांगलिक समझा जाता है। कालिदास ने भी कुमारसंभव में लिखा है—‘वधूदुकूलं कलहंसलक्षणम्।' धर्मशास्त्र के अनुसार जब ब्राह्मण क्षत्रिया का पाणिग्रहण करता है तो क्षत्रिया के हाथ में बाण दिया जाता है—‘शरः क्षत्रियया ग्राह्यः प्रतोदो वैश्यकन्यया।' यहाँ ग्रहराज सूर्य को ब्राह्मण और शरद् को क्षत्रिया माना गया है) ॥१९-२०॥ पुष्पामवं पत्रपुटैः पिबन्त्यः प्रवृद्धनेत्राननकण्ठरागाः। विशृङ्खलं शृङ्खलिताध्वनीनं जगुः सुगीतं कलमस्य गोप्यः ॥२१॥ पत्तों के दोनों में फूलों का आसव पीने से बढ़ी हुई नेत्र, मुख और कण्ठ की लाली वाली, कलम नामक धान्य के खेतों की रखवाली करने वाली स्त्रियाँ मनमाने सुन्दर गीत गा रही थीं, जिनको सुनकर राहगीर भी हठात् कुछ देर रुक जाते थे ॥२१॥ शुष्यन्मुखः संमुखमापतन्तं विच्छेदखेदं गणयन्निवान्तः। आलम्बमानो नलिनीं नतेन मूर्ध्ना श्लथोऽभूत् कलमः क्रमेण ॥२२॥ सूखे मुंह वाला कलम का वृक्ष मानों शीघ्र सामने आने वाले विरह के दुःख का मन में विचार करता हुआ, अपने झुके हुये सिर को कमलिनी के ऊपर रख कर धीरे धीरे शिथिल हो गया ॥२२॥ (१९) हंसानां लक्ष्म्या शोभया युतं यदम्बरमाकाशं तत्संगिनो गौराः शुभ्राः पयोधरा मेघा यस्यास्ताम् । अन्यत्र हंसमिथुनस्य या लक्ष्मी शोभा तया चित्रितं यदम्बरं दुकूलं तत्संगिनी गौरी पयोधरौ स्तनौ यस्या- स्ताम् । तदुक्तं कालिदासेरपि—‘वधूदुकूलं कलहंसलक्षणम्' इति। वक्ष्यति चाग्रे ‘परिधाप्य धौतममलं दुकूलयोर्युगलं मरालमिथुनोपलक्षितम्' इति (१४, १४) । (२०) चारु शरं शरनामकं शरत्कालीनं सुन्दरं पुष्पम् । शरं बाणञ्च। यदा ब्राह्मणः क्षत्रियामुद्वहति तदा क्षत्रियवध्वा करे शरो गृह्यते । तदुक्तं धर्मशास्त्रे—‘शरः क्षत्रियया ग्राह्यः प्रतोदो वैश्यकन्यया ।' इति ।
६६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् उपैतुकामा कलमान् विदूरान् मरालनिह्लादमथो निशम्य । शुकावलिः शङ्कितशालिगोपोमञ्जीरतारक्वणिता निवृत्ता ॥२३॥ दूर के कलमों के खेतों में जाने की इच्छा रखने वाली तोतों की पंक्ति ने, हंसों के स्वरों को सुन कर, उन्हें कलमों के खेतों की रखवाली करने वाली स्त्रियों के मंजीरों के उच्च स्वर समझ कर, वहाँ जाने का विचार छोड़ दिया ॥२३॥ घनोदितानां तमसामपायात् सुनिर्मलं वीतजडानुषङ्गम् । ज्योतिःप्रसादाद् विलसत्प्रसादं बभौ नभः संयमिनामिवान्तः ॥२४॥ बादलों के कारण होने वाले घने अन्धकार के हट जाने से अत्यन्त निर्मल और कुहरे के संग से विमुक्त तथा प्रकाश के कारण प्रसन्न शरद् ऋतु का आकाश योगियों के, अज्ञानान्धकार और तमोगुण की निवृत्ति के कारण अत्यन्त निर्मल तथा जड़ पदार्थों की आसक्ति से रहित और आत्मा की ज्योति से प्रकाशित होने के कारण प्रसन्न, अन्तःकरण के समान सुशोभित हुआ ॥२४॥ नवप्रबुद्धाम्बुरुहप्रताना वितायमानारुणरम्यरोचिः । निरस्तनिःशेषघनान्धकारा शरत् प्रभातस्य बभार शोभाम् ॥२५॥ नये खिले हुये कमलों के वितान वाली, प्रवृद्ध अरुण और सुन्दर प्रकाश वाली और मेघों के कारण होने वाले अन्धकार से बिलकुल रहित शरद् ऋतु, प्रातःकाल की शोभा को धारण कर रही थी ॥२५॥ तुरङ्गचारोचितराजमार्गां व्यपेतजीमूतघनान्धकाराम् । शरच्छ्रियं सौम्यसरित्प्रवाहां समीक्ष्य वीतप्रतिपक्षशङ्कः ॥२६॥ पुरोधसा धौम्यसमौजसाऽथ धर्मवितारोऽधिपतिर्धरित्र्याः । प्रातिष्ठत प्रात्यहिकं समाप्य कृत्यं कृती कार्त्तिकमासि तीर्थम् ॥२७॥ सड़कें घोड़ों के चलने योग्य हो गई थीं। बादलों का घना अन्धकार मिट चुका था। नदियाँ धीरे धीरे बह रही थीं। ऐसी शरद् ऋतु की शोभा देखकर, शत्रुओं की आशंका से रहित, युधिष्ठिर के समान धर्मराज, कार्यकुशल राजा अनलदेव अपने धौम्य ऋषि (पांडवों के पुरोहित) के समान तेजस्वी पुरोहित के साथ, प्रातःकाल का (संध्यावन्दनादिक) कृत्य समाप्त करके, (शुभ मुहूर्त में) कार्तिक मास के तीर्थ पुष्कर को चले ॥२६-२७॥ स पुष्करं पुष्करपत्रनेत्रः स्वनेत्रयोराभरणीचकार । निर्वाणरत्नस्य खनिं जगत्याः श्रेयः समापन्नमिव द्रवत्वम् ॥२८॥ कमलपत्र के समान सुन्दर नेत्र वाले राजा ने पुष्कर तीर्थ को अपने नेत्रों का आभूषण बनाया (देखा)—उस पुष्कर को जो संसार में निर्वाण (मोक्ष) रूपी रत्न की खान है और जो मानों पिघला हुआ साक्षात् कल्याण है ॥२८॥ तपस्विना कुम्भसमुद्भवेन निपीतमालोक्य पतिं नदीनाम् । कल्पान्ततल्पं प्रथमेन पुंसा मन्ये परं तोयशयेन सृष्टम् ॥२९॥ क्षीर-सागर में सोने वाले विष्णु भगवान् ने, समुद्र को अगस्त्य मुनि द्वारा पिया हुआ जान कर, प्रलय काल में अपने सोने के लिये ही मानों इस पुष्कर को बनाया है ॥२९॥
सप्तमः सर्गः ६७ सप्तापि गाधान् सरितामधीशानल्पप्रमाणान् पुरतः परीक्ष्य । क्रोडाविमर्दक्षममादिमेन क्रोडेन किं निर्मितमष्टमं वा ॥३०॥ अथवा क्या वराहावतार ने, सातों समुद्रों को परिमित और अल्प देख कर, अपनी गोद (शरीर) की टक्कर को सहने में समर्थ यह आठवाँ समुद्र बनाया है ? ॥३०॥ तं तत्र विश्रान्तदृशं धरित्रीपुरन्दरं वीक्ष्य पुरः पुरोधाः । प्रस्ताववित् प्रस्तुतवस्तुतत्त्वविवेचनीं वाचमिमां बभाषे ॥३१॥ बुद्धिमान् पुरोहित ने पृथ्वी के इन्द्र अनलदेव को एकटक गड़ी हुई दृष्टि से पुष्कर को देखते हुये देख कर प्रस्तुत वस्तु (पुष्कर) का वर्णन करने वाली यह वाणी कही ॥३१॥ त्रिधा विभक्तात्मतनोरमुष्य धृतावतारस्य जगद्धिताय । नामापि कामं समुदीर्यमाणं नारायणस्येव पुनाति विश्वम् ॥३२॥ संसार के हित के लिये अवतार ग्रहण करने वाले और जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और लय के लिये स्वयं को ब्रह्मा, विष्णु और महेश रूपी