भारतकोश
संग्रह पर लौटें

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

विनय तथा भक्ति ४१ चित्-बुद्धि-संवाद चकई री, चलि चरन-सरोवर, जहाँ न प्रेम वियोग । जहँ भ्रम-निसा होति नहिं कबहुँ, सोइ सागर सुख जोग । जहाँ सनक-सिव हंस मीन मुनि, नख रवि-प्रभा प्रकास । प्रफुलित कमल, निमिष नहिं ससि-डर, गुजत निगम सुवास । जिहिं सर सुभग-मुक्ति-मुक्ताफल, सुकृत-अमृत-रस पीजै । सो सर छांड़ि कुबुद्धि बिहंगम, इहाँ कहा रहि कीजै । लखमी सहित होति नित क्रीड़ा, सोभित सूरउदास । अब न सुहात विषय-रस छीलर, वा समुद्र की आस ॥४६॥ अर्थ-हे बुद्धि रूपी चक्रवी, भगवान् के चरण रूपी सरोवर को चलो जहाँ प्रेम मे वियोग (का दुःख) नही सहना पड़ता । जहाँ पर मिथ्या ज्ञान [भ्रम] रूपी रात्रि कभी नही होती वही अपार जल-राशि (सागर) के सुख के [लिए] योग्य [स्थान] है, जहाँ सनकादि तथा शिव रूपी हंस, मुनि रूपी मीन [सदा विहार करते हैं] और भगवान् के नख रूपी सूर्य-बिंब का सदा प्रकाश रहता है (कभी रात नही होती, एक क्षण [के लिए भी तुम्हे विरह का सन्ताप देने वाली] चन्द्रमा-युक्त रात्रि का भय नहीं रहता, [सदा] कमल खिलते है, और उनकी सुगन्ध से मत्त निगम वेद रूपी भ्रमर गुन्जार करते हैं (वेद ध्वनि होती रहती है), जिस सरोवर मे सुन्दर मुक्ति रूपी मोती प्राप्त होता है, और [इस सरोवर तक जाने के श्रम के] पारितोषिक रूप अमृतरस का पान करो । हे दुर्बुद्धि रूपी पक्षी ऐसे सरोवर का परित्याग कर यहाँ रह कर क्या कर रहे हो ? सूरदास कहते है कि [उस सरोवर मे] भगवान् के दास शोभा पाते, और लक्ष्मी सहित भगवान् की नित्य लीला में मग्न रहते हैं। अब मुझे उस [अगाध अपार] जलाशय की आशा मे यह विषय वासनाओ वाली छिछली तलैया नही सुहाती ॥४६॥ सुवा, चलि तो वन कौ रस पीजै । जा बन राम-नाम अमृत-रस, श्रवन पात्र भरि लीजै । को तेरौ पुत्र, पिता तू काकौ, घरनी, घर को तेरौ ? काग सृगाल-स्वान कौ भोजन, तू कहै मेरौ मेरौ ! बन बारानसि मुक्ति क्षेत्र है, चलि तोकौ दिखराऊँ । सूरदास साधुनि की संगति, बड़े भाग्य जो पाऊं ॥४७॥ अर्थ-हे शुक, चल कर उस [सत्संग रूपी] वन के रस का पान करो, जिस वन मे राम-नाम रूपी अमृतोपम रस प्राप्त होता है, उसे अपने कर्णरूपी पात्र मे भर लो । [इस नश्वर जगत मे] कौन तुम्हारा पुत्र है, तुम किसके पिता हो, कौन तुम्हारी गृहिणी है तथा कौन तुम्हारा घर है ? [ये सभी सम्बन्धी] कौवे, स्यार तथा कुत्ते के आहार हैं, [किन्तु] तुम कहते हो यह मेरा है, वह मेरा है। [यह सत्संग रूपी] वन

४२ सूरसागर सार सटीक वाराणसी [के समान] मुक्ति दायी क्षेत्र है, चलो तुम्हें [इसे] दिखला दूँ । सूरदास कहते हैं कि सन्तों की संगति ही यह [मुक्ति दायी वन-वाराणसी है], इसे पा जाऊँ तो मेरे धन्य भाग्य ! ॥४७॥ हरिविमुख-निन्दा अचंभौ इन लोगनि कौ आवै । छाँड़ि स्याम-नाम-अमृत फल, माया-विष-फल भावै । निंदत मूढ मलय चंदन कौं, राख अंग लपटावै । मानसरोवर छोड़ि हंस तट काग-सरोवर न्हावै । पग तर जरत न जानै मूरख, घर तजि घूर बुझावै । चौरासी लख जोनि स्वाँग धरि, भ्रमि-भ्रम जमहि हँसावै । मृगतृष्ना आचार-जगत जल, ता सँग मन ललचावै । कहतु जु सूरदास संतनि मिलि हरि जस काहे न गावै ॥४८॥ अर्थ—इन [असन्त (माया-ग्रस्त)] लोगो को देखकर आश्चर्य होता है । ये नाम रूपी अमरता प्रदान करने वाले फल का परित्याग करके माया रूपी विष फल को पसन्द करते हैं । ये मूर्ख (हरिविमुख) मलय चन्दन की निन्दा करते हैं और शरीर मे भस्म रमाते हैं । [इनका मन रूपी] हंस मानसरोवर के तट का परित्याग करके कौवो के तालाब में स्नान करता है । ये मूर्ख अपने पैरों के नीचे की जलन को नही जानते घर मे लगी हुई आग को छोड़कर घूरे की आग बुझाते हैं । [भाव यह है कि हृदयस्थ लोभ-मोहादि रूपी ताप को नही बुझाते वरन् बाह्य अंगो को जो ताप के वास्तविक स्थल नही हैं स्नानादि द्वारा सींचते हैं] चौरासी लाख योनियों मे विभिन्न पशु-पक्षियो के रूप धारण कर भ्रमते हुए यमराज (काल) की हँसी के पात्र बनते हैं । सांसारिक वाह्याचार समष्टि मृग-तृष्णा के जल के समान [भ्रम-मय तथा धोखा देने वाली] है, किन्तु इसी से ये [मूर्ख हरि विमुख] अपने मन मे तृप्ति पाने का लोभ करते हैं । सूरदास कहते है कि वे सन्तो के साथ मिलकर भगवान् का यशोगान [न जाने] क्यो नही करते ॥४८॥ भजन बिनु कूक़र-सूकर जैसौ । जैसे घर विलाव के मूसा, रहत विषय-वस बैसौ । वन-वगुली अरु गीध-गीधिनी, आइ जनम लियो तैसौ । उनहूँ केँ गृह, सुत, दारा हैं, उन्हैं भेद कहु कैसौ । जीव मारि के उदर भरत हैं, तिनकौ लेखौ ऐसौ । सूरदास भगवत-भजन विनु, मनौ ऊँट-वृष-भैंसौ ॥४६॥ अर्थ—[भगवान् के] भजन के बिना मनुष्य कुत्ते और सूअर के समान [निकृष्ट और अपवित्र] है। जैसे चूहा विलाव वाले घर मे [खाद्य पदार्थों के लोभ मे पड़कर]

विनय तथा भक्ति ४३ रहता है [और बिलाव का शिकार बनता है] वैसे ही [भजन-विहीन मनुष्य] विषयों के वशीभूत हो [काल का शिकार बन कर] रहता है। बगला-बगली, गृद्ध-गृद्धपत्नी [जैसे अपवित्र प्राणियो] की भाँति ही ऐसे स्त्री-पुरुषों ने [इस पृथ्वी पर] जन्म लिया है। [इनके समान] उनके भी तो घर, पुत्र और पत्नी हैं फिर बतलाइए, उनमे और इनमे क्या अन्तर है ? [जो लोग] जीव-हत्या करके अपना पेट भरते हैं, उनके विषय में इसी प्रकार की बात कही जा सकती है। सूरदास कहते हैं कि भगवान् के भजन के बिना मनुष्य ऊँट, बैल और भैंसे के समान [भार-वाही मात्र] है ॥४९॥ सत्संग-महिमा जा दिन संत पाहुने आवत । तीरथ कोटि सनान करैँ फल जैसौ दरसन पावत । नयौ नेह दिन-दिन प्रति उनकैँ चरन-कमल चित-लावत । मन-बच कर्म और नहिँ जानत, सुमिरत औ सुमिरावत । मिथ्याबाद-उपाधि-रहित ह्वैँ, बिमल-विमल जस गावत । बंधन कर्म जे पहिले, सोऊ काटि बहावत । संगति रहैँ साधु की अनुदिन, भव-दुख दूरि नसावत । सूरदास संगति करि तिनकी, जे हरि-सुरति कहावत ॥५०॥ अर्थ-जिस दिन [किसी सद्गृहस्थ के यहां] सन्त अतिथि [के रूप मे] आते हैं, उस दिन [उसे] करोड़ों तीर्थस्थानों जैसा फल [पुण्य] उनके दर्शन से प्राप्त हो जाता है। उनके चरणो में चित्त लगाने से [भगवान् के प्रति] नित-नूतन प्रेम उत्पन्न होता है। वे मन, वाणी तथा कर्म से और कुछ नहीं जानते, [भगवान् का] स्मरण [स्वयं] करते हैं और [दूसरों से] कराते हैं। झूठे वाद-विवाद और झगड़ों से अलग रहकर वे भगवान् का पवित्रयश का गान करते हैं [जन्म-जन्मान्तर के] कर्मों का जो कठिन बन्धन पहले से चला आ रहा है उसे भी वे समाप्त कर देते है। नित्य प्रति सत्संगति में रहने से जन्म-मरण का कष्ट दूर हो जाता है [तथा समूल] विनष्ट हो जाता है। सूरदास कहते हैं कि उन्ही [सन्तों] का साथ करो जो भगवान् का स्मरण कराते हैं ॥५०॥ स्थितप्रज्ञ हरि-रस तौँ डब जाइ कहुँ लहियै । गएँ सोच आएँ नहिँ आनंद, ऐसौ मारग गहियै । कोमल बचन, दीनता सब सौँ, सदा अनँदित रहियै । वाद बिवाद, हर्ष-आतुरता, इतौ द्वैंद जिय सहियै । ऐसी जो आवै या मन मैँ, तौ सुख कहँ लौँ कहियै । अष्ट सिद्धि, नवनिधि, सूरज प्रभु, पहुँचै जो कछु चहियै ॥५१॥

४४ सूरसागर सार सटीक अर्थ— अब तो (संसार तथा उसके सुखों का का मिथ्यात्व स्पष्ट हो जाने पर) कही जाकर भगवान् के भजन का आनन्द प्राप्त करना चाहिए । ऐसा मार्ग (जीवन- क्रम) ग्रहण करना चाहिए जिसमे [किसी वस्तु के नष्ट हो] जाने (हानि) पर चिन्ता न हो तथा (कोई वस्तु) आने (लाभ) पर आनन्द न हो, सभी के साथ मधुरवाणी तथा दैन्य भाव युक्त व्यवहार के साथ निरन्तर आनन्दपूर्ण जीवन हो [और] वाद-विवाद, हर्ष-व्याकुलता आदि द्वन्द्वो [के उद्वेगो) को मन मे सह लिया जाय । ऐसी भावना यदि मन मे घर कर ले तो उस सुख का वर्णन कहां तक शक्य है ? सूरदास कहते हैं कि [ऐसी स्थिति को पहुँच जाने पर] जो कुछ चाहिये—आठो सिद्धियां, नवो निधियां, आदि—सब कुछ प्राप्त हो जाता है ॥५१॥ जौ लौं मन-कामना न छूटै । तो कहा जोग-जज्ञ-व्रत कीन्हें बिन कन तुस कीँ कूटै । कहा सनान कियैँ तीरथ के, अंग भस्म जट जूटे । कहा पुरान जु पढैँ अठारह, ऊर्ध्व धूम के घूटे । जग शोभा की सफल बड़ाई इनतैँ कछू न खूटै । करनी और, कहैँ कछु औरै, मन दसहूँ दिसि टूटै । काम, क्रोध, मद, लोभ शत्रु हैं, जो इतनति सौँ छूटै । सूरदास तबहीँ तम नासै ज्ञान-अगिनि-झर फूटै ॥५२॥ अर्थ—जब तक मनोकामनाएं क्षीण नही पडती या दूर नही हो जाती तब तक योग साधन, यज्ञ तथा व्रत करने से क्या होता है ? [यह सब उसी प्रकार निरर्थक है जैसे] बिना दाने की भूसी का कूटना । [तब तक] तीर्थों मे स्नान करने, अंग मे भस्म रमाने तथा जटा जूट धारण करने से क्या लाभ ? पुराणो के अध्ययन तथा उल्टा लट- कते हुए नीचे जलती आग काधुआं पीने से क्या लाभ? इन सब से प्राप्त यश सांसारिक दिखावा संसार की समस्त शोभा मात्र है, [इनसे मनोकामनाओ मे] कुछ भी कमी नही आती । [इस प्रकार के जीवन मे] करनी ओर कथनी का भेद दूर नही होता ओर मन दसो दिशाओ मे दौड़ता हुआ [विषयो पर] झपटता रहता है । काम, क्रोध, मद और लोभ [बडे प्रबल] शत्रु हैं, मनुष्य जब इनसे छुटकारा पा लेता है तभी अज्ञानता का अन्धकार नष्ट होता है और ज्ञान रूपी अग्नि की ज्वाला प्रस्फुटित होती है ॥५२॥ आत्मज्ञान अपुनपौ आपुन ही बिसरचौ । जैसेँ स्वान कांच-मंदिर मैँ, भ्रमि-भ्रमि भूकि परचौ । ज्यौँ सौरभ मृग-नाभि वसत है, द्रुम तृन सूँघि फिरचौ । ज्यौँ सपने मैं रंक भूप भयौ, तसकर अरि पकरचौ । ज्यौँ केहरि प्रतिबिंब देखि कै, आपुन कूप परचौ । जैसेँ गज लखि फटिकसिला मैँ, दसननि जाइ अरचौ ।

विनय तथा भक्ति ४५ मर्कट मूठि छांड़ि नहीं दीनी, घर-घर-द्वार फिरयौ । सूरदास नलिनी को सुवटा, कहि कौनैं पकरयौ ॥५३॥ अर्थ—[हमारा आनन्दमय] आत्म-स्वरूप स्वयं हमारे द्वारा भुला दिया गया है जैसे शीश महल का कुत्ता शीशे मे [अपनी ही परछांइयां देख] भ्रमित हो होकर बार- बार भूक पड़ता है (भूकि पर्यो) या भूंकता हुआ मरता है (भूमि पर्यो), अर्थात् परेशान होता है । जैसे कस्तूरी (सौरभ) मृग की नाभि में रहती है किन्तु वह [बाहर] पौधों और घासो को सूंघता [हुआ उसे ढूंढता] फिरता है । जैसे स्वप्न मे राजा अपने को दरिद्र हुआ, अथवा डाकू या शत्रु द्वारा वन्दी बनाया गया मानता है । [और दुःखी होता है] । जैसे सिंह [कुएं में] अपना प्रतिबिम्ब देखकर [मूर्खता-वश उसमे] कूद पड़ा । जैसे हाथी बिल्लोर पत्थर (स्फटिक शिला) मे [अपना प्रतिबिम्ब देख] जाकर [उससे] दांतो से भिड़ गया । [जैसे] बन्दर ने [सँकरे मुंह वाले बर्तन में चनों से भर कर लोभ- वश] अपनी मुट्ठी नही छोड़ी और [इस प्रकार फँसकर] घर-घर के दरवाजे पर फिरता रहा । सूरदास कहते हैं कि नलिका पर बैठे हुए शुक को भला किसने पकड़ रखा है । (अपने बैठने के भार से नलिका के झुक जाने से सिर नीचा पैर ऊपर हो जाने पर भ्रम वह शुक स्वयं को को आबद्ध समझकर बहेलिये के आने पर उड़ नही जाता, और पकड़ा जाता है) ॥५३॥ अपनपौ आपुन ही मै पायौ । सब्दहि सब्द भयौ उजियारी, सतगुरु भेद बतायौ । ज्यौं कुरंग-नाभी कस्तूरी, ढूँढ़त फिरत भुलायौ । फिरि चितयौ जब चेतन ह्वै करि, अपनैं ही तन छायौ । राज-कुमारि कंठ-मनि-भूषन भ्रम भयौ कहूँ गँवायौ । दियौ बताइ और सखियनि तब, तनु कौ ताप नसायौ । अपने माहिं नारि कौं भ्रम भयौ बालक कहूँ हिरायौ । जागि लख्यौ, ज्यौं कौ त्यौं ही है ना कहूँ गयौ न आयौ । सूरदास समुझे को यह गति, मनहीं मन मुसुकायौ । कहि न जाइ या सुख की महिमा, ज्यौं गूँगैं गुर खायौ ॥५४॥ अर्थ—[अपना विस्मृत] आत्म-स्वरूप अपने [शरीर के] भीतर ही [फिर] उप- लब्ध हुआ । जब सद्गुरु ने मर्म बताया तो [उनके] शब्द (उपदेश नामोपदेश) से अनाहत नाद प्रकट हुआ, जो अन्तर्ज्योति (आत्म-प्रकाश) मे परिवर्तित हो गया । जैसे मृग की नाभि मे ही कस्तूरी होती है किन्तु वह [उसके बाहर होने के] भ्रम मे पड़कर [उसे चारों तरफ] ढूंढता फिरता है, किन्तु जब पुनः चेत कर विचार करता है तो [जान जाता है कि वह] अपने ही शरीर मे छिपी हुई (आच्छादित) है । राजकुमारी के कण्ठ में ही मणि-जटित आभूषण वर्तमान था किन्तु उसे भ्रम हुआ कि कही खो गया, परन्तु जब

४६ सूरसागर सार सटीक उसे अन्य सहेलियों ने बताया तब उसके शरीर (मन) का कष्ट नष्ट हुआ । स्वप्न में किसी स्त्री को भ्रम हो गया कि बच्चा कही खो गया है, किन्तु उसने जगकर देखा कि वह [पार्श्व मे] ज्यों का त्यों ही वर्तमान है, न कही गया है न कही से आया है । सूरदास जी कहते हैं कि [आत्म स्वरूप के] ज्ञान की ऐसी ही दशा है कि उसमें ज्ञानी मन ही मन मुसकरा कर रह जाता है । इस सुख की महिमा वर्णनातीत है, जैसे गूंगे द्वारा गुड के स्वाद की अभिव्यक्ति अशक्य होती है ॥५४॥

गोकुल लीला कृष्ण जन्म आनंदै आनंद बढ़यो अति । देवनि दिवि दुंदभी बजाई, सुनि मथुरा प्रगटे जादवपति । विद्याधर-किन्नर कलोल मन उपजावत मिलि कंठ अमित गति । गावत गुन गंधर्व पुलकि तन नाचतिँ सब सुर-नारि रसिक अति । बरषत सुमन सुदेस सूर सुर, जय-जयकार करत, मानत रति । सिव-विरंचि-इन्द्रादि अमर मुनि, फूले सुख न समात मुदित मति ॥१॥ अर्थ – मथुरा मे यदुपति श्री कृष्ण का प्रकट होना सुनकर देवताओं ने स्वर्ग में दुन्दुभिनाव किया ओर (चारो ओर) अत्यधिक आनन्द ही आनन्द बढ गया । विद्याधर तथा किन्नर लोग विनोदपूर्ण मन से (कलोलमन) परस्पर मिलकर (समवेत रूप में) स्व- कंठों मे (संगीत की) अमित गति (स्वर लहरियाँ) उत्पन्न करते हैं । गन्धर्व पुलकित होकर (भगवान् का) गुणगान करते हैं तथा अत्यधिक रसिक सभी देवांगनाये नृत्य कर रही हैं। सूरदास जी कहते हैं कि देवता पुष्पवृष्टि करते हैं, (भगवान् कृष्ण की) जय- जयकार करते है तथा (उनके प्रति) प्रेम-भाव प्रदर्शित करते हैं । शिव, ब्रह्मा तथा इन्द्र आदि देवता तथा ऋषि प्रसन्नमन होकर सुख से फूले नही समाते ॥१॥ देवकी मन मन चकित भई । देखहु आइ पुत्र-मुख काहे न, ऐसी कहुँ देखी न दई । सिर पर मुकुट, पीत उपरैना, भृगु-पद-उर भुज चारि धरे । पूरब कथा सुनाइ कही हरि, तुम माँग्यौ इहिँ भेष करे । छोरे निगड़, सोआए पहरू, द्वारे कौ कपाट उघरचौ । तुरत मोहिँ गोकुल पहुँचावहु, यह कहिके सिसु वेष धरचौ । तब बसुदेव उठे यह सुनतहिँ, हरषवंत नंद-भवन गए । बालक धरि, लै सुरदेवी कौँ, आइ सूर मधुपुरी ठए ॥२॥ अर्थ-देवकी मन ही मन चकित हो गयी । (उन्होने वसुदेव से कहा कि) आकर पुत्र का मुंह क्यों नही देखते, हे भगवान् ! ऐसा (विचित्र रूप) मैने कही नही देखा । (इनके) शिर पर मुकुट (सुशोभित) है तया इन्हो पीला उत्तरीय, हृदय पर भृगु के पद (चिह्न) तथा चार भुजाये धारण की है। भगवान् ने पूर्व कथा सुनाकर कहा कि "तुमने

४६ सूरसागर सार सटीक मुझे इसी वेष में मांगा था । (मैंने तुम्हारे) बन्धनों (बेड़ियो) को तोड़ दिया । पहरेदारों को सुला दिया तथा (कारावास के) किवाड़ों को खोल दिया है । तुरन्त मुझे गोकुल पहुँचा दो" ऐसा कहकर भगवान् ने शिशु रूप धारण कर लिया । यह सुनते ही वासुदेव हर्षित होकर उठे और नन्द के घर गये । सूरदास कहते हैं कि बालक (श्री कृष्ण) को (वहां रखकर सुरदेवी (नन्द कन्या) को लेकर मथुरा आ गये ॥२॥ गोकुल प्रगट भए हरि आइ । अमर-उधारन, असुर-सँहारन अंतरजामी त्रिभुवन राइ । माथैँ धरि बसुदेव जुं ल्याए, नद-महर-घर गए पहुँचाई । जागी महरि, पुत्र-मुख देख्यौ, पुलकि अंग उर मैं न समाइ । गदगद कंठ, बोल नहिं आवै, हरषवंत ह्वै नंद बुलाई । आवहु कंत, देव परसन भये, पुत्र भयौ, मुख देखौ धाइ । दौरि नद गए, सुत-मुख देख्यौ, सो सुख मोपे बरनि न जाई । सूरदास पहिलैँ ही माँग्यौ, दूध पियावन जसुमति माइ ॥३॥ अर्थ भगवान् श्रीकृष्ण गोकुल मे आकर प्रकट हुये । देवताओ का उद्धार करने वाले, असुरो का संहार करने वाले, अतर्यामी तथा त्रिभुवन पति (श्री कृष्ण) को वसुदेव मस्तक (सिर) पर रखकर लाये और बाबा नन्द के घर पहुँचा दिया । महरि (नन्दरानी) जागी, पुत्र का मुंह देखा शरीर पुलकित हो उठा और प्रसन्नता उनके हृदय मे नही समाती थी । (प्रसन्नता से) कण्ठ गदगद हो गया था, (मुंह से) शब्द नही निकल रहे थे हर्षित होकर उन्होने नन्द को बुलाया । पतिदेव आइये, देवता प्रसन्न हुए, पुत्र हुआ, दौड़कर आइए और उसका मुंह देखिये । नन्द दौड़कर गये और पुत्र का मुंह देखा, उस सुख का वर्णन मुझसे वर्णित नही किया जाता । सूरदासजी कहते है कि (कृष्ण भगवान् को पुत्र के रूप मे) यशोदा ने पहले ही मांग लिया था, अब वे उन्हे दूध पिला रही हैं ॥३॥ हौं इक नई बात सुनि आई । महरि जसोदा ढोटा जायौ, घर-घर होति बधाई । द्वारैँ भीर गोपि-गोपिनि की, महिमा बरनि न जाई । अति आनन्द होत गोकुल मैं, रतन भूमि सब छाई । नाचत वृद्ध, तरुन अरु बालक, गोरस-कीच मचाई । सूरदास स्वामी सुख-सागर, सुन्दर स्याम कन्हाई ॥४॥ अर्थ - (हे सखि) मैं एक नई बात सुन आयी हूँ । माँ यशोदा ने पुत्र जन्म दिया है तथा हर घर मे बधाइयाँ हो रही हैं । द्वार पर उपस्थित ग्वालो और गोपियो की भीड़ की महिमा का वर्णन नही किया जा सकता । गोकुल मे अत्यधिक आनन्द उत्पन्न हो रहा है तथा भूमि अब रत्नो से ढँक गई है । वृद्ध, तरुण और बालक नृत्य कर रहे हैं तथा गोरस (दूध, दही आदि) से (गोकुल मे) कीचड़ उत्पन्न कर दी है ।

गोकुल लीला ४६ सूरदास कहते हैं कि (सम्पूर्ण जगत के) स्वामी सुन्दर श्याम कृष्ण, सुख के सागर हैं ॥४॥ आजु नन्द के द्वारैं भीर। इक आवत, एक जात बिदा ह्वै, इक ठाढ़े मन्दिर कैं तीर । कोउ केसरि कौ तिलक बनावति, कोउ पहिरति कंचुकी सरीर । एकनि कौं गौ-दान समर्पत, एकनि कौं पहिरावत चीर । एकनि कौं भूषन पाटंबर, एकनि कौं जु देत नग हीर । एकनि कौं पुहुपनि की माला, एकनि कौं चन्दन घसि नीर । एकनि मथैं दूध-रोचना, एकनि कौं बोधति दै धीर । सूरदास धनि स्याम सनेही, धन्य जसोदा पुन्य-सरोर ॥५॥ अर्थ—आज नन्द के दरवाजे पर भीड़ लगी है। एक आता है, एक विदा होकर जाता है और एक मन्दिर के पास खडा रहता है। कोई केशर का तिलक रचाती है और कोई अपने अंगो पर कंचुकी (चोली) धारणा करती है। (माँ यशोदा) किसी को गोदान कर रही हैं किसी को साडी (वस्त्र) पहना रही हैं, किसी को आभूषण और रेशमी-वस्त्र तथा किसी को नग-हीरा आदि रत्न, दे रही है। किसी को पुष्पो की माला, किसी को जल मे घिस कर चंदन लगा रही है। माता यशोदा किसी के मस्तक पर दूब और गोरो- चन डालती हैं। और किसी को धैर्य देकर सम्बोधित कर रही है। सूरदास कहते है कि श्याम के स्नेही और पुण्यशरीर धारण करने वाली मां यशोदा धन्य है ॥५॥ सोभा सिंधु न अन्त रही री। नंद-भवन भरि पूरि उमँगि चलि, ब्रज की बीथिनि फिरति वही री। देखी जाइ आजु गोकुल मैं, घर-घर बेँचति फिरति दही री। कहँ लगि कहौं बनाइ बहुत विधि, कहत न मुख सहसहुँ निबही री। जसुमति-उदर-अगाध-उदधि तैं उपजी ऐसी सबनि कही री। सूरश्याम प्रभु इंद्र-नीलमनि, ब्रज-बनिता उर लाइ गही री ॥६॥ अर्थ – एक गोपी दूसरी गोपी से कहती है कि हे सखि, श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव से उत्पन्न शोभा के सागर का कोई अन्त नही रहा। नन्द के भवन को तृप्त करके उमंग मे आकर वह (शोभा) ब्रज की गलियो मे वह रही है। आज मैंने घर-घर जाकर दही बेचते समय (गोकुल मे इस अपूर्व शोभा) को देखा। मैं उसका (शोभा का) वर्णन किस प्रकार अनेक प्रकार से करूँ। हजारो मुखो से भी प्रशंसा करने पर उसका (उस शोभा के वर्णन का) निर्वाह नही किया जा सकता। ऐसा सभी ने कहा कि (वह शोभा) यशोदा के उदररूपी अगाध समुद्र से उत्पन्न हुयी है। सूरदास कहते है कि इन्द्रनीलमणि के समान भगवान् को ब्रजांगनाओ ने हृदय से लगा कर पकड़ रखा है ॥६॥ ४

५० सूरसागर सार सटीक शैशव चरित्र जसोदा हरि पालनै झुलावै । हलरावै, दुलराइ मल्हावै, जोइ-सोइ कछू गावै । मेरे लाल कौं आउ निँदरिया, काहैं न आनि सुवावै । तू काहैं नहिं वेगहिं आवै, तोकों कान्ह बुलावै । कबहुँक पलक हरि मूँदि लेत हैं, कबहुँ अधर फरकावै । सोवत जानि मौन ह्वै रहि, करि करि सैन बतावै । इहिं अन्तर अकुलाइ उठे हरि, जसुमति मधुरैं गावै । जो सुख सूर अमर-मुनि दुरलभ, सो नंद भामिनि पावै ॥७॥ अर्थ — यशोदा भगवान् (कृष्ण) को पालने मे झुला रही हैं। वे उन्हे हिलाती हैं, दुलराती हुई मल्हारती हैं तथा जैसा-तैसा कुछ गाती हैं, यशोदा गाती हुई कहती हैं कि नीद मेरे लाल के पास आओ, क्यो नही (यहाँ) आकर (इन्हे) सुलाती है। तू जल्दी क्यो नही आती, तुझे कृष्ण बुला रहे हैं। कभी भगवान् (कृष्ण) पलके बन्द कर लेते है, कभी होठ फडफड़ाने लगते हैं। उन्हे सोता हुआ समझकर (मां यशोदा) मौन होकर इशारे से बताती है। इसी बीच भगवान् व्याकुल हो उठे और यशोदा जी पुनः मधुर गीत गाने लगती है। सूरदास जी कहते हैं कि जो सुख देवताओं और मुनियो को भी दुर्लभ है उसे नन्द-पत्नी (यशोदा) प्राप्त कर रही है ॥७॥ कपट करि ब्रजहिँ पूतना आई । अति सुरूप, विष अस्तन लाए, राजा कस पठाई । मुख चूमति अरु नैन निहारति, राखति कठ लगाई । भाग बड़े तुम्हरे नन्दरानी, जिहिँ के कुँवर कन्हाई । कर गहि छीर पियावति अपनी, जानत केसवराई । बाहर ह्वैं कै असुर पुकारी, अब बलि लेहु छुड़ाई । गइ मुरछाइ, परी धरनी पर, मनौ भुवंगम खाई । सूरदास प्रभु तुम्हरी लीला, भक्तनि गाइ सुनाई ॥८॥ अर्थ—पूतना कपट रूप धारण करके ब्रज मे आयी। राजा कंस द्वारा भेजी गयी वह बहुत रूपवती तथा विषाक्त स्तनों युक्त होकर आयी थी। वह भगवान् कृष्ण के मुख का चुम्बन लेती, उनके नेत्रों को देखती और उन्हें गले से लगा लेती। (कृष्ण के प्रति इस प्रकार झूठा प्रेम दिखाकर वह बोली नन्दरानी तुम्हारे भाग्य प्रबल है — जिसके कृष्ण जैसा कुमार है। वह उन्हे अपने हाथ मे लेकर अपना दूध पिलाने लगी। श्रीकृष्ण सब कुछ जानते थे) । बाहर होकर राक्षसी ने पुकारा कि हे बलि (दैत्यराज) अब मुझे छुड़ा लो। अथवा (हे कृष्ण मैं तुम्हारी बलिहारी हूँ मुझे छोड़ दो) वह मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ी मानो उसे सांप ने काट लिया हो। सूरदास जी कहते हैं हे भगवान् आपकी लीला को भक्तो ने गाकर सुनाया ॥८॥

गोकुल लीला ५१ काग-रूप इक दनुज धर्यौ । नृप-आयसु लै धरि माथे पर, हरषवंत उर गरव भर्यौ । कितिक बात प्रभु तुम आयसु तें, वह जानी मो जात मर्यौ । इतनी कहि गोकुल उड़ आयौ, आइ नन्द-घर-छाज रह्यौ । पलना पर पौढै हरि देखे, तुरत आइ नैननिहिं अर्यौ । कंठ चाँपि बहु वार फिरायो, गहि पटक्यो, नृप पास पर्यौ । तुरत कंस पूछन तिहिं लाग्यो, क्यो आयौ नहिं काज कर्यौ । वातैं जाम बोलि तब आयौ, सुनहु कंस, तब आइ सर्यौ । धरि अवतार महाबल कोऊ, एकहिं कर मेरौ गर्व हर्यौ । सूरदास प्रभु कंस-निकंदन, भक्त-हेत अवतार धर्यौ ॥६॥ अर्थ-एक दैत्य ने कौवे का रूप धारण किया । राजा कंस की आज्ञा शिरो- धार्य कर, गर्वयुक्त तथा हर्षित होकर वह कंस से बोला- यह कौन-सी (बड़ी) बात है। आपकी आज्ञा से मेरे वहाँ जाते ही आप उसे (कृष्ण को) मरा हुआ ही समझें । इतना कहकर वह गोकुल मे उड़ आया और आकर नन्द के घर पर बैठ गया । पालने पर श्री कृष्ण को लेटा हुआ देखकर तुरन्त आकर वह उनकी आंखो पर अड़ गया । (कृष्ण ने उसका) गला पकड़ कर कई बार घुमाया और पकड़ कर पटक दिया तथा वह राजा कंस के पास जा गिरा । कंस तुरन्त उससे पूछने लगा, 'क्यों चले आये क्या कार्य नही किया !' पहर भर बीतने पर वह बोल पाया 'कंस सुनो, (तुम्हारी) आयु पूरी हो गयी । किसी महाबली ने अवतार ले कर एक ही हाथ से मेरे गर्व का हरण कर लिया । सूरदास जी कहते है कंस को समाप्त करने वाले भगवान् ने भक्तो (की रक्षा) के लिए अवतार धारण किया ॥६॥ कर पग गहि, अंगुठा मुख मेलत । प्रभु पौढे पालनैं अकेले, हरषि-हरषि अपनैं रङ्ग खेलत । सिव सोचत, विधि बुद्धि विचारत, वट बाढ्यौ सागर-जल झेलत । बिडरि चले घन प्रलय जानि कै, दिगपति दिग दतीनि सकेलत । मुनि मन भीत भए, भुब कंपित सेष सकुचि सहसौ फन पेलत । उन व्रज-वासिनि बात न जानी, समुझे सूर सकट पग ठेलत ॥१०॥ अर्थ - (भगवान् श्री कृष्ण) हाथ से पकड़ कर पैर का अँगूठा मुख मे डालते हैं। भगवान् पलने में अकेले लेटे हुये हर्षित होकर अपनी ही धुन मे खेलते है । (उनकी इस शोभा को देख कर) शिव जी कहते है तथा ब्रह्मा बुद्धिपूर्वक विचार करने लगे । (प्रलय काल सन्निकट होने के कारण) वट वृक्ष बडा हो गया । (बढते हुए) सागर के जल (मे डूबने के कष्ट) को झेल रहा है। (यह परिस्थिति देखकर) बादल प्रलय काल (सन्निकट) जानकर तितर-बितर होने लगे और दिग्पाल दिग्गजों को इकट्ठा करने लगे ! मुनि लोग मन मे भयभीत हुये, धरती कांप उठी और शेषनाग संकुचित होकर

५२ सूरसागर सार सटीक अपने सहस्र फनो को (पृथ्वी का भार सहने के लिए) लगा देते हैं। सूरदास कहते हैं कि (इतना होने पर भी) वे ब्रजनिवासी बात नहीं समझ सके। उन्होंने मात्र यही जाना कि भगवान् पैर से छकड़ा ठेल रहे हैं ॥१०॥ महरि मुदित उलटाइ कै मुख चूमन लागी । चिरजीवौ मेरौ लाडिलौ, मैं भई सभागी । एक पाख त्रय-मास कौ मेरौ भयौ कन्हाई । पटकि रान उलटौ पऱ्यौ, मैं करैं बधाई । नन्द-घरनि आनन्द भरी, बोलीं ब्रजनारी । यह-सुख सुनि आईं सबै, सूरज बलिहारी ॥११॥ अर्थ - यशोदा (महरि) प्रसन्न होकर (कृष्ण को ऊपर) उलट कर उनका मुख चूमने लगी (और कहा कि) मेरे प्रिय तुम चिरंजीव हो मैं भाग्यवती हुई। मेरे कृष्ण साढ़े तीन मास के हुये। ये अब जांघ पटक कर उलट पड़ते हैं। मैं बधाई देती हूँ। नन्द की पत्नी (यशोदा) ने आनन्दित होकर यह बात व्रजांगनाओ से भी बता दी यह सुखमय समाचार सुनकर सभी (उन्हे देखने) आयी। सूरदास (भी उनकी इस शोभा पर) बलिहारी हैं ॥११॥ जसुमति मन अभिलाप करै । कब मेरौ लाल घुटुरुवनि रेंगै, कब धरनी पग द्वैक धरै । कब द्वै दाँत दूध के देखौं, कब तोतरैं मुख वचन झरै । कब नदहि बाबा कहि बोलै, कब जननी कहि मोहिं ररै । कब मेरौ अँचरा गहि मोहन, जोइ-सोइ कहि मोसौँ झगरै । कब धौँ तनक-तनक कछु खैहै, अपने कर सौं मुखहिं भरै । कब हँसि बात कहैगो मोसौँ, जा छबि तैं दुख दूरि हरै । स्याम अकेले आँगन छोड़ि, आपु गई कछु काज घरै । इहिँ अंतर अँधवाह उठ्यो इक, गरजत गगन सहित घहरै । सूरदास-ब्रज-लोग सुनत धुनि, जो जहँ-तहँ सब अतिहिं डरै ॥१२॥ अर्थ - यशोदा जी अपने मन मे (अनेक) अभिलापाये करती हैं। कब मेरे लाल घुटनो के बल चलेगे, कब पृथ्वी पर दो-एक कदम रखेगे। कब (मैं) दूध के दो दांत देखूंगी, कब इनके मुख से तोतले स्वर निकलेगे। कब नन्द को बाबा कह कर पुका- रेगे, कब मां कहकर मुझे बार-बार रटेगे। मोहन कब मेरा आंचल पकड़ कर इधर- उधर कुछ कह कर मुझसे हठ करेगे। कब तक [ये थोड़ा-थोड़ा कुछ खाने लगेगे ओर अपने हाथ से (अपना) मुख भरेगे] अपने आप खाने लगेगे। कब कृष्ण हँस कर मुझसे बात करेगे जिसकी शोभा से मेरे दुःख दूर हो जायेगे। श्याम को अकेले आंगन मे छोड कर कुछ कार्यवश वे घर मे गयी। इसी बीच एक अन्धड़ गर्जन करता हुआ तथा

गोकुल लीला ५३ आकाश सहित गहराता हुआ उठा । सूरदास कहते हैं कि ब्रज के लोग उस ध्वनि को सुनकर यथास्थिति अत्यन्त भयभीत हुये ॥१२॥ सुत मुख देखि जसोदा फूली । हरषति देखि दूध की दँतियाँ, प्रेममगन तन की सुधि भूली । बाहिर तैं तब नंद बुलाए, देखौ धौं सुन्दर सुखदाई । तनक-तनक सी दूध दँतुलिया, देखौ, नैन सफल करौ आई । आनंद सहित महर तब आए, मुख चितवत दोउ नैन अघाई । सूर स्याम किलकत द्विज देख्यौ, मनौ कमल पर बिज्जु जमाई ॥१३॥ अर्थ—पुत्र के मुँह को देखकर यशोदा (हर्ष से) प्रफुल्लित हो उठी । कृष्ण के दूध के दांत देखकर, हर्षित हो (श्री कृष्ण के) प्रेम मे निमग्न होकर शरीर की सुध- बुध भूल गयी । उन्होने तब बाहर से नन्द को बुलाया और कहा कि सुन्दर सुखदायक (श्री कृष्ण) को देखो । छोटे-छोटे से दूध के दांतो को देखिये और अपने नेत्रो को सफल कीजिये । तब प्रसन्न होकर नन्द आये तथा (पुत्र के) मुख को देखकर उनके नेत्र तृप्त हो गए । सूरदास कहते है कि यदुराज नन्द ने किलकारी मारते हुए कृष्ण को देखा तो ऐसा लगा कि जैसे कमल पर बिजली उग आयी हो ॥१३॥ हरि किलकत जसुमति की कनियाँ । मुख मैं तीनि लोक दिखराए, चकित भई नंद-रनियाँ । घर-घर हाथ दिखावति डोलति, बाँधति गरैँ बघनियाँ । सूर स्याम की अद्भुत लीला नहिँ जानत मुनिजनियाँ ॥१४॥ अर्थ—भगवान् कृष्ण यशोदा की गोद में किलक रहे हैं । उन्होने (अपने मुंह) में तीनों लोको को दिखाया जिससे नन्दरानी (अत्यन्त) चकित हो गईं । वे घर-घर जा कर हाथ दिखाती डोलती है और गले मे (कृष्ण के) (बघनख ताबीज) बांधती है । सूरदास कहते हैं कि श्याम की अद्भुत लीला का ज्ञान मुनिजनों को भी नही है ॥१४॥ कान्ह कुँवर की करहु पासनी, कछु दिन घटि षट मास गए । नंद महर यह सुनि पुलकित जिय, हरि अनप्रासन जोग भए । विप्र बुलाई नाम लै बूझ्यौ, रासि सोधि एक सुदिन धरयौ । आछौ दिन सुनि महरि जसोदा, सखिनि बोलि सुभ गान करयौ । जुवति महरि कौँ गारी गावति, और महर कौ नाम लिए । ब्रज-घर-घर आनंद बढ़यौ अति, प्रेम पुलक न समात हिए । जाकौँ नेति-नेति स्रुति गावत, ध्यावत सुर मुनि ध्यान धरे । सूरदास तिहिँ कौँ ब्रज-वनिता, झकझोरतिँ उर अंक भरे ॥१५॥

५४ सूरसागर सार सटीक अर्थ- (यशोदा ने नन्द से कहा) कुमार कृष्ण का अन्नप्राशन संस्कार कीजिये क्योकि छः मास बीतने मे कुछ ही दिन शेष हैं । यह सुनकर कि कृष्ण अन्नप्राशन के योग्य हो गये, बाबा नन्द अपने मन मे बहुत प्रसन्न हुये । उन्होने ब्राह्मण को बुलाकर कृष्ण का नाम और राशि शोध करके शुभ दिन का निश्चय किया । इस शुभ दिन को सुनकर मां यशोदा ने सखियो को बुलाकर सुन्दर गान सुनाया । युवतियाँ बाबा नन्द और यशोदा का नाम ले कर गाली (गीत) गा रही हैं । ब्रज के प्रत्येक घर मे आनन्द की अत्यन्त वृद्धि हुई । प्रेम से उत्पन्न प्रसन्नता हृदय मे नही समाती । [सूरदास कहते है कि] श्रुतियां जिसका गुणगान 'नेति-नेति' कहकर गाती है, देव और ऋषि जिसका ध्यान धारण करते हैं उसी (ब्रह्म) को ब्रज वनिताये गोद में लेकर हृदय से लगाकर झकझोर रही हैं ॥१५॥ लाल हौँ बारी तेरे मुख पर । कुटिल अलक, मोहनि-मन बिहँसनि भृकुटी बिकट ललित नैननि पर । दमकति दून-दँतुलिया बिहँसत, मनु सीपज घर कियौ बारिज पर । लघु-लघु लट सिर घुघरवारी, लटकन लटकि रह्यो माथैँ पर । यह उपमा कापै कहि आवै, कछुक कहौँ सकुचति हौँ जिय पर । नव-तन-चंद्र रेख-मधि राजत, सुरगुरु-सुक्र-उदोत परसपर । लोचन लोल कपोल ललित अति, नासा कौ मुकता रदछद पर । सूर कहा न्यौछावर करिये अपने लाल ललित लरखर पर ॥१६॥ अर्थ-हे लाल मैं तुम्हारे मुख (की शोभा) पर निछावर हूँ । घुंघराली लटे, नेत्रो पर टेढी भौंहे और मुस्कान मन को मोहित करने वाली हैं । हँसते समय दूध के दांत इस प्रकार चमकते है मानो कमल पर मोती ने स्थान बना लिया हो । सिर पर की छोटी-छोटी घुंघराली लटे माथे पर लटक रही है । इस उपमा को कौन कह सकता है । कुछ कहने पर कवि के मन मे संकोच होता है । (ऐसा प्रतीत होता है जैसे) द्वितीया के चन्द्रमा की रेखा के बीच वृहस्पति और शुक्र की पारस्परिक आभा का प्रकाश (सुशोभित) हो । (कृष्ण के) नेत्र चंचल है, कपोल सुन्दर हैं तथा नाक का मोती होठो पर (झलक रहा) है । सूरदास कहते हैं कि अपने लाल (कृष्ण) की लड़- खडाहट (डगमगा कर गिरने की क्रिया) पर क्या न्योछावर करुँ ॥१६॥ उमगीँ ब्रजनारि सुभग, कान्ह बरष गाँठि उमंग, चहतिँ बरष बरषनि । गावहिँ मगल सुगान, नीके सुर नीके तान, आनँद अति हरषनि । कंचन मनि-जटित-थार, रोचन, दधि, फूल-डार, मिलिबे कौ तरसनि । प्रभु बरष-गाँठि जोरति, वा छवि पर तृन तोरति, सूर अरस परसनि ॥१७॥ अर्थ कृष्ण की वर्ष गांठ पर सौभाग्य वाली ब्रज की गोपियां उल्लसित होकर अपने उल्लास की वरषा करना चाहती है । वे मगलमय सुन्दर गीत अत्यन्त आनदित होकर सुरीले स्वरो मे गा रही है । वे (गोपियाँ) सोने के मणि जटित थाल मे दधि,

गोकुल लीला ५५ रोली, फूल रख कर कृष्ण से मिलने (कृष्ण को तिलक करने) के लिए आतुर है। सूर कहते है कि प्रभु (कृष्ण) की वर्ष गांठ जोड़ी जा रही है (लम्बाई नापने वाले धागे मे गांठ लगाई जा रही है)। सब मिल भेट कर कृष्ण की सुन्दरता पर तृन तोड़ रहे है। (नजर लगने से बचा रहे हैं) ॥१७॥ सोभित कर नवनीत लिये । घुटुरुनि चलत रेनु तन मंडित, मुख दधि लेप किये । चारु कपोल, लोल लोचन, गोरोचन-तिलक दिये । लट-लटकनि मनु मत्त मधुप-गन मादक मधुहिं पिए । कठुला-कंठ, बज्र केहरि-नख, राजत रुचिर हिए । धन्य सूर एकौ पल इहिं सुख, का सत कल्प जिए ॥१८॥ अर्थ - (भगवान् कृष्ण) हाथ मे माखन लिये हुये सुशोभित हो रहे हैं। धूल धूसरित शरीर तथा मुख मे दधि लपेट कर वे घुटनो के बल चल रहे हैं। उनके कपोल सुन्दर हैं, नेत्र चंचल हैं तथा वे गोरोचन का तिलक दिये हैं। उनके लटो की लटकन ऐसी प्रतीत होती है मानो उन्मत्त भ्रमरो का समूह, मादक मधु का पान कर (के झूम) रहा हो । उनके कण्ठ मे कठुला और हृदय पर सिंह का वज्र नाखून (अथवा सिंह नख और मणि) सुशोभित हो रहा है (रहे हो)। सूरदास कहते है कि इस सुख मे एक पल का जीवन भी धन्य है। सैकड़ों कल्प (जीवन) जीने से क्या लाभ ? ॥१८॥ किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत । मनिमय कनक नंद कैं आँगन, बिंब पकरिबौ, धावत । कबहु निरखि हरी आपु छाँह कौं, कर सौं पकरन चाहत । किलकि हँसत राजत द्वै दतियाँ, पुनि-पुनि तिहिं अवगाहत । कनक-भूमि पर कर-पग-छाया, यह उपमा इक राजति । करि-करि प्रतिपद प्रतिमनि बसुधा, कमल बैठकी साजति । बाल-दसा-मुख निरखि जसोदा, पुनि-पुनि नन्द बुलावत । अँचरा तर लै ढाँकि, सूर के प्रभु कौं दूध पियावति ॥१९॥ अर्थ - कृष्ण किलकारी करते हुये घुटनो के बल आ रहे हैं। नन्द के मणियुक्त स्वर्णिम आँगन मे वे परछाई पकड़ने के लिये दौड रहे हैं। कभी कृष्ण अपनी छाया को देखकर उसे हाथ से पकडना चाहते है। किलक कर हँसने से उनके दूध के दो दाँत सुशोभित होते है कृष्ण उस (स्थिति) को बार-बार देखते हैं। (आँगन की) स्वर्ण-भूमि पर उनके हाथ और चरणो की छाया देखकर यही उपमा सुशोभित होती है मानो पृथ्वी प्रत्येक चरण एवं हाथ को प्रतिमा बना कर उनके लिए कमलासन सजा रही है। (कृष्ण के हाथ तथा चरण प्रतिमा हैं उनकी परछायी कमलासन है) । (कृष्ण के इस)

५६ सूरसागर सार सटीक बाल्यावस्था के सुख को देखकर यशोदा वार-वार नन्द को बुलाती हैं। यशोदा 'सूर' के स्वामी को आंचल से ढक कर दूध पिलाती है ।।११९॥ सिखवति चलन जसोदा मैया । अरबराइ कर पानि गहावत, डगमगाइ धरनी धरे पैया । कबहुँक सुंदर वदन विलोकति, उर आनंद भरि लेत बलैया । कबहुँक कुल देवता मनावति, चिरजीवहु मेरौ कुँवर कन्हैया । कबहुँक बल कौं टेरि बुलावति, इहिँ आँगन खेलौ दोउ भैया । सूरदास स्वामी की लीला, अति प्रताप विलसत नँदरैया ॥१२०॥ अर्थ- मां यशोदा (श्री कृष्ण को) चलना सिखाती हैं। कृष्ण लडखड़ाते है तो (अपना) हाथ उनके हाथ में पकड़ा देती हैं; वे डगमगा कर पृथ्वी पर पैर रखते हैं। (मां यशोदा) कभी उनके सुन्दर मुख को देखती हैं और अत्यन्त प्रसन्न हृदय से उनकी बलैया लेती हैं। कभी अपने कुल के देवताओं की मनौती मानती है कि मेरे कुमार कृष्ण चिरजीव हो। कभी बलराम को जोर से पुकारती हैं (और कहती हैं) कि इसी आंगन मे दोनों भाई खेलो। सूरदास कहते हैं कि स्वामी की लीला के प्रताप से राजा नन्द उल्लसित हो रहे हैं ॥१२०॥ चलत देखि जसुमति सुख पावै । ठुमकि-ठुमकि पग धरनी रेंगत, जननी देखि दिखावै । देहरि लौं चलि जात, बहुरि फिरि-फिरि इतहीं कौं आवै । गिरि-गिरि परत, बनत नहिं नाँघत सुर-मुनि सोच करावै । कोटि ब्रह्मांड करत छिन भीतर, हरत विलंब न लावै । ताकौं लिए नंद की रानी, नाना खेल खिलावै । तब जसुमति कर टेकि स्याम कौ, क्रम-क्रम करि उतरावै । सूरदास प्रभु देखि-देखि, सुर-नर-मुनि-बुद्धि भुलावै ॥१२१॥ अर्थ- कृष्ण को चलता हुआ देख कर मां (अत्यन्त) सुख प्राप्त करती हैं। वे ठुमुक-ठुमुक कर पृथ्वी पर चलते है और मां को देखकर (अपना चलना) दिखाते हैं। वे घर की देहली तक चले जाते हैं और फिर यही वापस आ जाते हैं। वे बार-बार गिर पडते हैं। उनसे देहली लांघते नही बनता इसलिये देवताओ और मुनियो के हृदय मे सोच उत्पन्न करवा देते है (कि भगवान् इतने अशक्त हैं कि देहली नही लांघ सकते फिर असुरों का विनाश किस प्रकार करेंगे ?) जो भगवान् करोडो ब्रह्माण्डो का निर्माण एक क्षण के भीतर करता है तथा उसका हरण करने मे भी देर नही करता उसको नन्दरानी गोद मे लेकर अनेक प्रकार के खेल खिलाती हैं। तब यशोदा श्याम का हाथ पकड़ कर क्रम से एक-एक सीढ़ी उतारती है। सूरदास कहते है कि प्रभु को (इस रूप मे) देख-देख कर देवता, मनुष्य और ऋषि गण अपना विवेक भूल जाते हैं ॥१२१॥

गोकुल लीला ५७ नंद जु के वारे कान्ह, छाँड़ि दे मथनियाँ । बार-बार कहति मातु जसुमति नँदरनियाँ । नैंकु रहौ माखन देउँ मेरे प्रान-धनियाँ । आरि जनि करौ, बलि बलि जाउँ हौं निधनियाँ । जाकौ ध्यान धरैं सबै, सुर-नर-मुनि जनियाँ । ताकौ नंदरानी मुख चूमै लिए कनियाँ । सेष सहस आनन गुन गावत नहिं बनियाँ । सूर स्याम देखि सबै भूलीं गोप-धनियाँ ॥२२॥ अर्थ—हे नन्द जी के छोटे कृष्ण, मथानी छोड़ दीजिए। बार-बार नन्दरानी, मां यशोदा कहती हैं कि थोडा ठहरो, मेरे प्राणधन, मैं तुम्हे मक्खन दूँगी। हे मेरी असीम सम्पत्ति, हठ मत करो, मैं तुम्हारे ऊपर बलिहारी हूँ। जिसका ध्यान सुर-नर- मुनि जन धारण करते हैं उनको कन्धे पर लेकर नन्दरानी यशोदा उनका मुख चूमती हैं। शेषनाग को हजारो मुखों से उनका गुणगान करते नही बनता। सूरदास कहते हैं कि उन्हे देखकर गोपवधुएँ सब कुछ भूल गयी ॥२२॥ कहन लागे मोहन मैया-मैया । नंद महर सौं बाबा बाबा, अरु हलधर सौं भैया । ऊँचे चढ़ि चढ़ि कहति जसोदा, लै लै नाम कन्हैया । दूरि खेलन जनि जाहु लला रे, मारैगी काहु की गैया । गोपी ग्वाल करत कौतूहल, घर-घर बजति वधैया । सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस कौं, चरननि की वलि जैया ॥२३॥ अर्थ—श्री कृष्ण (यशोदा को) मां-मां कहने लगे। नन्द को बाबा और बलराम को भैया (कहने लगे) । (कृष्ण को बाहर खेलने के लिए जाता हुआ देखकर) माँ यशोदा ऊपर चढ़कर कृष्ण का नाम लेकर कहती है कि हे लाल, दूर खेलने मत जाओ, किसी की गाय मार देगी। गोपियाँ और ग्वाले परस्पर कौतूहल करते है, घर-घर में बधाइयाँ बज रही है। सूरदास कहते हैं कि हे प्रभु, तुम्हारे दर्शन के लिए मैं तुम्हारे चरणो पर निछावर हूँ ॥२३॥ गोपालराइ दधि माँगत अरु रोटी । माखन सहित देहि मेरी मैया, सुपक सुकोमल, मोटी । कत हौ आरि करत मेरे मोहन तुम आँगन मैं लोटी । जो चाहौ सो लेहु तुरतहीँ, छाँड़ौँ यह मति खोटी । करि मनुहारि कलेऊ दाँह्रौ, मुख चुपरचौ अरु चोटी । सूरदास कौ ठाकुर ठाढौ, हाथ लकुटिया छोटी ॥२४॥ अर्थ—गोपाल श्री कृष्ण दही और रोटी माँगते हैं। मेरी मां मुझे सुन्दर पकी हुई पुष्टिकर मोटी रोटी मक्खन के साथ दो। (मां यशोदा कहती है कि) हे मेरे मोहन

५८ सूरसागर सार सटीक

तुम आंगन मे लोट कर हठ क्यो कर रहे हो जो कुछ चाहते हो उसे तुरन्त ही लो और यह खोटी बुद्धि छोड दो। (मां यशोदा ने) कृष्ण को मनाकर उन्हें कलेवा दिया, मुख में उबटन लगाया और चोटी संवारी। (अब) सूरदास के स्वामी हाथ मे छोटी सी लाठी लेकर खड़े हैं ॥२४॥ बरनौँ बाल-वेप मुरारि। थकित जित-तित अमर-मुनि-गन, नंद-लाल निहारि। केस सिर बिन बपन के चहुँ दिसा छिटके झारि। सीस पर धरि जटा, मनु सिसु रूप कियौ त्रिपुरारि। तिलक ललित ललाट केसरबिंदु सोभाकारि। रोष-अरुन तृतीय लोचन, रह्यौ जनु रिपु जारि। कंठ कठुला नील मनि, अंभोज-माल सँवारि। गरल ग्रीव, कपाल उर इहिँ भाइ भए मदनारि। कुटिल हरि-नख हिएँ हरि के हरषि निरखति नारि। ईस जनु रजनीस राख्यो भाल तैँ जु उतारि। सदन-रज तन स्याम सोभित, सुभग इहिँ अनुहारि। मनहुँ अंग-बिभूति-राजित सभु सो मधुहारि। त्रिदस-पति-पति असन कौँ अति जननि सौँ करै आरि। सूरदास विरंचि जाकौँ जपत निज मुख चारि ॥२५॥ अर्थ—मैं मुरारी (श्री कृष्ण) के बाल रूप का वर्णन कर रहा हूँ। नन्दलाल (श्री कृष्ण) को देखकर देवर्षि समूह यत्र-तत्र थकित हो गया है। बिना मुण्डन किये हुए सिर के सभी बाल चारो ओर बिखरे हुए हैं ऐसा प्रतीत होता है मानो शंकर जी ने सिर पर जटा धारण कर शिशु-रूप बनाया हो। सुन्दर मस्तक पर शोभा उत्पन्न करने वाली केशर की बिन्दी लगी है वह ऐसी प्रतीत होती है जैसे शत्रु (कामदेव) को जलाने के लिए क्रोधारुण तृतीय नेत्र हो। कण्ठ मे नीलमणि का कण्ठा तथा (सुन्दर) कमलों की संवारी हुयी माला (की शोभा) ऐसी प्रतीत होती है जैसे शंकर के कण्ठ मे विष तथा हृदय पर कपाल माला सुशोभित हो रही हो। स्त्रियां कृष्ण के हृदय पर सिंह का टेढ़ा नाखून हर्षित होकर देखती हैं ऐसा लगता है जैसे शंकर जी ने चन्द्रमा को मस्तक से (हृदय पर) उत्तार लिया हो। घर की धूल से भगवान् का शरीर इस प्रकार सुशोभित हो रहा है जैसे श्मशान की भस्म लगाये शंकर जी सुशोभित हों। सूरदास कहते हैं ब्रह्मा अपने चारो मुखो से जिनको जपते रहते हैं वही देवराज इन्द्र के स्वामी (श्री कृष्ण) भोजन के लिए हठ कर रहे हैं ॥२५॥ मैया, कबहिँ बढैगी चोटी ? किती वार मोहिँ दूध पियत भई, यह अजहूँ है छोटी। तू जो कहति बल की बेनी ज्यौँ, ह्वै है लाँबी-मोटी।

गोकुल लीला ५६ काढ़त-गुहत न्हवावत जैहै नागिनि सी भुइँ लोटी। काचौ दूध पियावति पचि-पचि, देति न माखन-रोटी। सूरज चिरजीवौ दोउ भैया, हरि-हलधर की जोटी॥२६॥ अर्थ - (कृष्ण यशोदा से शिकायत करते हैं) माँ (मेरी) चोटी कब बड़ी होगी ? मुझे कितना समय दूध पीते हो गया और यह आज भी छोटी ही है। तुम तो कहती हो कि यह बलराम की वेणी की भांति लम्बी और मोटी होगी। काढ़ते, गुहते तथा स्नान करते समय नागिन की तरह पृथ्वी पर लोटने लगेगी। तुम बार-बार मुझे कच्चा दूध पिलाती हो तथा मक्खन और रोटी नही देती हो। सूरदास कहते है कि कृष्ण और बलराम दोनो भाइयो की जोड़ी चिरंजीवी हो ॥२६॥ हरि अपनैं आँगन कछु गावत । तनक-तनक चरननि सौँ नाचत, मनहिँ मनहिँ रिझावत । बाँह उठाइ काजरी-धौरी, गैयनि टेरि बुलावत । कबहुँक बाबा नंद पुकारत, कबहुँक घर मैं आवत । माखन तनक अपनैं कर लै, तनक बदन मैं नावत । कबहुँक चितै प्रतिबिंब खंभ मैं, लौनी लिए खवावत । दुरि देखति जसुमति यह लीला, हरष आनंद बढ़ावत । सूर स्याम के बाल चरित, नित नितही देखत भावत ॥२७॥ अर्थ- कृष्ण अपने आँगन मे कुछ गा रहे हैं। छोटे-छोटे चरणो से वह नाचते हैं तथा मन-ही-मन प्रसन्न होते हैं। बांह उठाकर कजरी (काले रंग की) और धौरी (सफेद रंग की) नाम की गायों को जोर से बुलाते हैं। कभी नन्द बाबा को पुकारते है और कभी घर मे आते हैं। (कभी) अपने छोटे-छोटे हाथो मे मक्खन लेकर अपने छोटे मुँह में डालते हैं। कभी खम्भे मे अपनी परछाईं देखकर नवनीत लेकर उसे खिलाते हैं। यशोदा छिपकर उनकी यह लीला देखती है जो कि हर्ष और आनन्दवर्द्धक है। सूरदास कहते हैं कि श्री कृष्ण का बालचरित्र प्रतिदिन ही देखने मे अच्छा लगता है ॥२७॥ जसुमति जबहि कह्यौ अन्हवावन, रोइ गए हरि लोटत री । तेल उबटनौ लै आगैं धरि, लालहिँ चोटत पोटत री । मैं बलि जाऊँ न्हाउ जनि मोहन, कत रोवत बिनु काजैं री । पाछे धरि राख्यो छपाइ कै, उबटन-तेल-समाजें री । महरि बहुत बिनती करि राखति, मानत नहीँ कन्हैया री । सूर स्याम अतिहीँ बिरझाने, सुर-मुनि अंत न पैया री ॥२८॥ अर्थ - यशोदा ने जब कृष्ण को नहलाने की बात कही तो वे रोते हुए (पृथ्वी पर) लोट गये । तेल और उबटन आगे रखकर (माँ यशोदा) लाल श्री कृष्ण को लाड- प्यार करती है। मोहन मैं बलिहारी हूँ तुम मत नहाओ, व्यर्थ में ही क्यों रो रहे हो।

६० सूरसागर सार सटीक (यह कह कर मां यशोदा ने) उवटन और तेल का सामान पीछे रख दिया । मां यशोदा अनेक प्रकार से विनती करती है, किन्तु कृष्ण नहीं मानते । सूरदास कहते हैं कि श्री कृष्ण (स्नान करने के बिलकुल) विरुद्ध हो गये तथा उनका अन्त सुर और मुनि भी नही पा सके ॥२८॥ ठाढ़ी अजिर जसोदा अपनैं, हरिहिं लिए चंदा दिखरावत । रोवत कत बलि जाऊँ तुम्हारी, देखौँ धौ भरि नैन जुड़ावत । चितै रहै तब आपुन ससि-तन अपने कर लै-लै जु बतावत । मीठौ लगत किधौं यह खाटौ, देखन अति सुन्दर मन भावत । मनहीँ मन हरि बुद्धि करत हैं, माता सौँ कहि ताहिं मँगावत । लागी भूख, चंद मैँ खैहौँ; देहि देहि रिस करि विरुझावत । जसुमति कहति कहा मैँ कीनौँ रोवत मोहन अति दुख पावत । सूर स्याम कौँ जसुमति बोधति, गगन चिरैया उड़त दिखावत ॥२६॥ अर्थ - यशोदा अपने आँगन मे खडी होकर भगवान् को (गोद मे) लेकर चन्द्रमा दिखाती हैं। (और उनसे कहती हैं कि) क्यो रो रहे हो मै तुम्हारी बलिहारी हूँ तुम्हे देखकर मेरे नेत्र शीतल (तृप्त) हो जाते है। तब श्री कृष्ण स्वयं चन्द्रमा की ओर देखकर हाथ (से इशारा) बनाकर कहते है कि यह मीठा हो अथवा खट्टा, देखने मे अत्यन्त सुन्दर तथा मन को मोहित करने वाला है। मन-ही-मन (भगवान् श्री कृष्ण) बाल- बुद्धि (का स्वाग) रचते है और माँ (यशोदा) से कहकर उस (चन्द्रमा) को (पृथ्वी पर) मँगाते है। मुझे भूख लगी है मैं चन्द्रमा खाऊँगा इस प्रकार (कृत्रिम) क्रोध करके (माँ यशोदा को) उलझन मे डाल देते हैं। यशोदा कहती हैं कि यह मैने क्या किया कृष्ण रोते हुए बहुत दुख पा रहे है। सूरदास कहते हैं कि (इस प्रकार हठ मे पडे हुए) श्याम को यशोदा समझाती हैं और आकाश मे उडती चिडियाँ उन्हे दिखला रही हैं ॥२६॥ सुनि सुत, एक कथा कहौँ प्यारी । कमल-नैन मन आनंद उपज्यों, चतुर सिरोमनि देत हुँकारी । दसरथ नृपति हुतौ रघुबंसी, ताकै प्रगट भए सुत चारी । तिनमैँ मुख्य राम जो कहियत, जनक सुता ताकी बर नारी । तात-बचनलगि राज तज्योतिन, अनुज घरनिसँग गए बनचारी । धावत कनक मृगा के पाछै, राजिव लोचन परम उदारी । रावन हरन-सिया कौ कीन्हौ, सुनि नंद-नंदन नींद निंवारी । चाप चाप कहि उठे सूर प्रभु, लछिमन देहु, जननि भ्रम भारी ॥३०॥ अर्थ - (मां यशोदा कृष्ण से कहती है कि) हे पुत्र मैं एक अच्छी कहानी कह रही हूँ। कमलनेत्र (श्री कृष्ण) के मन मे (अत्यन्त) आनन्द प्राप्त हुआ और चतुर शिरोमणि (श्रीकृष्ण) हुँकारी (कथा सुनते समय हां, हां की उक्ति) देते हैं। रघुवश मे दशरथ नाम के एक राजा हुये उनके चार पुत्र उत्पन्न हुये । उनमे मुख्य जिन्हे राम