सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
७७६ सूर्य-सिद्धान्त
चित्र १३६
पर बाँधे जाते हैं। इन्हीं दोनों वृत्तों पर ध और धा से समान अन्तर पर 'प व पू श'
वृत्त बाँधा जाता है जिसे विषुवत् कक्षा कहा गया है। इन तीनों वृत्तों को ३६०
समान भागों में बाँट कर चिह्न बना देते हैं जो अंश कहलाते हैं। इसके बाद मेषादि
बारह राशियों के अहोरात्रवृत्त बनाने का आदेश है। परन्तु मेरी समझ में यह
आवश्यक नहीं है। ऊपर के तीन वृत्त बाँधने के बाद सीधे क्रान्ति-वृत्त को ही
बाँधना सुगम होगा। यह भी ऊपर के किसी वृत्त के समान लेना चाहिए। इसे
पहले व और श स्थानों पर विषुवद्वृत्त और धशधाव आधारवृत्त के जोड़ पर
बाँधना चाहिये फिर दूसरे आधारवृत्त 'क' और 'म' स्थानों पर बाँधना चाहिये ।
'क' या 'म' का अन्तर विषुवद् वृत्त से उतना ही होना चाहिये जितनी सूर्य का
परमक्रान्ति होती है जो आजकल साढ़े तेईस अंश (२३° ३०') के लगभग है।
इस क्रान्तिवृत्त को भी ३६० समान भागों में बाँट देना चाहिये । 'व' स्थान को
सायनमेष या वसंत सम्पात तथा 'श' स्थान को सायनतुला या शरद सम्पात
कहते हैं। 'क' और 'म' स्थानों को क्रम से सायन कर्क और सायन तुला अथवा
दक्षिणायन और उत्तरायण विन्दु कहते हैं (देखो पृ० २३०)। इन स्थानों के विचार
से 'ध श धा व' आधार कक्षा को विषुवसम्पातवृत्त (Equinoctial Colure) और
'ध प म धा पू क' आधार कक्षा को अयनवृत्त (Solstitial Colure) कहते हैं,
क्योंकि पहले पर दोनों विषुव-सम्पात विन्दु और दूसरे पर दोनों अयन विन्दु होते
हैं। चित्र में क्रान्ति वृत्त के 'अ' स्थान पर विषुवद् वृत के समानान्तर एक अहोरात्र
वृत्त 'अ इ आई' दिखलाया गया है। यह क्रान्तिवृत्त के दूसरे स्थान 'आ' पर मिलता
है । 'अ' विन्दु वसंत-सम्पात 'व' से जितने अंतर पर है उतने ही अंतर पर परन्तु
ज्योतिषोपनिषदध्याय ७७७
विलोम दिशा में शरद सम्पात 'श' से 'आ' का स्थान है अथवा 'क' से 'अ' और
'आ' समान दूरी पर हैं । यदि 'अ' सायन वृष राशि के आदि में हो तो 'आ' सायन
कन्या राशि के आदि में होगा और यदि पहला सायन मिथुन राशि के आदि में हो
तो दूसरा सायन सिंह राशि के आदि में होगा । इसी प्रकार क्रान्ति-वृत्त के किसी
स्थान का अहोरात्र वृत्त बांधा जा सकता है । यही बात श्लोक ६-७ में बतलायी गयी
है । इसके सिवा 'धा' स्थान के पास एक अहोरात्र वृत्त समझा जा सकता है ।
१२वें श्लोक में चन्द्रमा, मंगल आदि ग्रहों के कक्षा वृत्तों की भी चर्चा है
परन्तु चित्र में ऐसा कोई भी कक्षा वृत्त नहीं दिखलाया गया है । ऐसा कक्षा वृत्त
बांधने के लिये पहले ग्रह का पात-बिन्दु क्रान्ति-वृत्त पर स्थिर करना चाहिये । इसी
पर उस ग्रह का कक्षा वृत्त बांधना चाहिये जिसका दूसरा जोड़ इस स्थान से १८०
अंश पर क्रान्ति-वृत्त पर हो । यह दोनों स्थान ग्रह के पात स्थान हुए । फिर इस वृत्त
को ६० अंश के अंतर पर क्रान्ति-वृत्त से उस ग्रह के परम विक्षेप के बराबर उत्तर
और दक्षिण स्थानों पर भी बांध देना चाहिये (परम विक्षेप की चर्चा मध्यमाधिकार
के पृ० ७४-७६ में की गयी है ) ।
उदयलग्न, मध्यलग्न, अन्त्या, चरज्या आदि का निश्चय—
उदयं क्षितिजे लग्नदस्तं गच्छति तद्वशात् ।।१३।।
लङ्कोदयैस्तथा सिद्धं खमध्योपरि मध्यगम् ।
मध्यक्षितिजयोर्मध्ये या ज्या साऽन्त्याऽभिधीयते ।।१४।।
ज्ञेया चरदलज्या च विषुवत्क्षितिजान्तरम् ।
कृत्वोपरि स्वकं स्थानं मध्ये क्षितिजमण्डलम् ।।१५।।
अनुवाद—(१३) क्रान्ति वृत्त का जो बिन्दु पूर्व क्षितिज में लगा रहता है
वह उदय लग्न है। इस उदय लग्न के अनुसार क्रान्ति वृत्त का जो बिन्दु पच्छिम
क्षितिज में लगा रहता है वह अस्त लग्न होता है । (१४) यामोत्तर वृत्त पर मध्यम
लग्न होता है जिसकी गणना लंका के उदयासुओं से की जाती है । अहोरात्र वृत्त और
यामोत्तर वृत्त के संधिस्थान से क्षितिज वृत्त तक जो ज्या होती है उसे अन्त्या कहते
हैं । (१५) विषुवत् रेखा के क्षितिज जिसे उन्मण्डल कहते हैं और अपने स्थान के
क्षितिज के बीच जो अन्तर होता है वह चरज्या है । भूगोल पर अपने स्थान को सबसे
ऊपर करने पर क्षितिज वृत्त भूगोल के मध्य में होता है ।
विज्ञान-भाष्य—इन श्लोकों में एक ही शब्द कई परिभाषाओं के लिए
प्रयुक्त हुआ है इसलिये इनका भाव जल्दी समझ में नहीं आता । १२वें श्लोक के
पूर्वार्ध में 'मध्यम' मध्य लग्न के लिये आया है । उत्तरार्ध में 'मध्य' शब्द अहोरात्र
२२
७७८ सूर्य-सिद्धान्त
वृत्त और यामोत्तर वृत्त की सन्धि स्थान के लिये आया है। १५वें श्लोक के पूर्वार्ध
में 'विषुवत्' विषवक्षितिज या उन्मण्डल के लिये तथा क्षितिज शब्द अपने स्थान के
क्षितिज वृत्त के लिये प्रयुक्त हुआ है। इसके उत्तरार्ध में 'मध्ये' शब्द अपने स्थान के
ऊर्ध्वाधर यामोत्तर वृत्त के मध्य के लिये आया है। इस प्रकार का प्रयोग बड़ा ही
भ्रमोत्पादक होता है और वैज्ञानिक ग्रंथों के लिये दोष समझा जाता है ।
यह सब परिभाषाएँ त्रिप्रश्नाधिकार के २८६-६० पृष्ठों पर तथा स्पष्टा-
धिकार के चित्र ३६, ४२, ४३ और त्रिप्रश्नाधिकार के चित्र ६३ से अच्छी तरह
समझी जा सकती है। उपर्युक्त विवरण से भूभगोल यंत्र से इन सब परिभाषाओं का
ज्ञान सहज ही हो सकता है ।
युक्ति जिससे भूभगोल यंत्र सदा घूमता रहे—
वस्त्रच्छन्नं बहिश्चापि लोकालोकेन वेष्टितम् ।
अमृतस्रावयोगेन कालभ्रमणसाधनम् ॥१६॥
गुणबोजसमाकृष्टं गोलयंत्रं प्रकल्पयेत् ।
गोप्यमेतन्नकाशयोक्तं सर्वगम्यं भवेद्यतः ॥१७॥
अनुवाद—(१६) लोकालोक से अर्थात् क्षितिजवृत्त से घिरे हुए गोल को
ऊपर कपड़े से ढक कर जल प्रवाह के द्वारा ऐसा प्रबन्ध करे कि यह अपने आप घूम-
कर नाक्षत्रकाल सूचित करे । (१७) अथवा इस गोल यंत्र को पारे के संयोग से ऐसा
बनावे कि वह अपने आप घूमे । इसको गुप्त रखना चाहिये । साफ-साफ बतला देने
से इस संसार में यह सबको मालूम हो जायगा ।
विज्ञान-भाष्य—इन दोनों श्लोकों की भाषा बहुत ही अस्पष्ट है। इस बात का
तनिक भी बोध नहीं होता कि यह गोलयंत्र किस प्रकार अपने आप घूमकर आकाश का
प्रकार दैनिक भ्रमण सिद्ध करता था । इतना तो प्रकट है कि गोलयंत्र का मेरुदण्ड इस
प्रकार स्थिर किया जाता था कि वह ध्रुव की ओर रहे । फिर उसमें ऐसी युक्ति की जाती
होगी कि जल की धारा से उसमें ऐसी टक्कर लगे कि एक नाक्षत्र दिन में वह एक बार
घूम जाय जैसे पनचक्की चलती है। पानी की जगह पारे से भी काम लिया जाता था
परन्तु यह पता नहीं कि कैसे । अंत में यह बतलाया गया है कि यह युक्ति सबसे नहीं
बतलानी चाहिये । शायद इसीलिये संकेत मात्रकर दिया गया है। इससे लोग यह
परिणाम निकाल सकते हैं कि लेखक स्वयं इस क्रिया को अच्छी तरह नहीं जानता
था । उसको केवल आभास था कि ऐसा यन्त्र बन सकता है जो अपने आप चलता
हो, इसीलिये उसने सब बातें गोल रखी हैं । यह भी संभव है कि प्राचीन काल में
शिल्पकला की इतनी उन्नति थी कि ऐसे स्वयंवह यंत्र पारे और पानी के संयोग
ज्योतिषोपनिषदध्याय ७७६
से उसी प्रकार बनते थे कि जैसे आजकल घड़ी आदि अपने आप चलने वाले यन्त्र
बनते हैं, परन्तु बीच में समय के फेर से सब ज्ञान नष्ट हो गया हो ।
तस्माद्गुरूपदेशेन रचयेद्गोलमुत्तमम् ।
युगे युगे समुत्पन्ना रचनेयं विवस्वतः ॥१८॥
प्रसादात्कस्यचिद्भूयः प्रादुर्भवति कालतः ।
कालसंसाधनार्थाय तथा यन्त्राणि कारयेत् ॥१९॥
एकाकी योजयेद्बीजं यन्त्रे विस्मयकारणम् ।
अनुवाद—(१८) इसलिये गुरु के उपदेश के अनुसार उत्तम गोल की
रचना करनी चाहिये । यह रचना प्रत्येक युग में नष्ट हो जाती है और सूर्य भगवान
की (१९) इच्छानुसार उनके प्रसाद से फिर किसी को प्राप्त होती है । इसी प्रकार
समय का ज्ञान करने के लिये अन्य यन्त्रों की भी रचना करनी चाहिये । (२०)
आश्चर्य उत्पन्न करनेवाले यंत्र में (उसको चलाने के लिये) पारे का प्रयोग एकान्त
में करना चाहिये ।
विज्ञान-भाष्य—इन श्लोकों से प्रकट होता है कि स्वयंवह यंत्र बनाने की
क्रिया काल पाने पर नष्ट हो जाती है, जिसको फिर सूर्य भगवान् अपनी इच्छा से
किसी को बतला देते हैं । इसके सिवा समय बतलानेवाले अन्य यंत्रों को बनाने के
लिये भी कहा गया है और अंत में फिर बतलाया गया है कि पारे का प्रयोग एकान्त
में करना चाहिये, सबको नहीं बतलाना चाहिये ।
समय बतलानेवाले अन्य यन्त्रों के नाम—
शङ्कुयष्टिधनुश्चक्रैश्छाया यन्त्रैरनेकधा ॥२०॥
गुरूपदेशाद्विज्ञाय कालज्ञानमतन्द्रितः ।
तोययन्त्रैः कपालाद्यैर्मयूरनरवानरैः ।
सूत्रैश्च वेणुगर्भस्थैः सम्यक्कार्ल प्रसाधयेत् ॥२१॥
पारतालाबुसूत्राणि गुञ्जातैलजलानि च ।
बीजानि पांसवश्चैवां प्रयोगास्ते सुदुर्लभाः ॥२२॥
अनुवाद—(२०) शंकु, यष्टि, धनु और चक्र नामक अनेक प्रकार के छाया
यंत्रों के द्वारा (२१) चतुर और परिश्रमी मनुष्य गुरु के उपदेश से काल का ज्ञान
प्राप्त करते हैं । कपाल आदि जल यंत्रों से, मयूर, नर और वानर यंत्रों से जिनके
पेट में बालू रहती है जो सूत के सहारे निकलती है समय का ठीक-ठीक ज्ञान प्राप्त
७८० सूर्य-सिद्धान्त
करना चाहिये । (२२) पारे का आरा, जल, सूत, शुल्ब, तेल और जल, पारा और
बालू इन सबका प्रयोग करना चाहिये । परन्तु यह भी कठिन है।
विज्ञान-भाष्य- इन श्लोकों में समय जानने के अनेक यंत्रों के नाम गिना
दिये गये हैं परन्तु उनके बनाने की विधि कहीं नहीं बतलायी गयी है। पहले चार
यंत्रों से सूर्य की छाया देखकर समय जाना जा सकता है इसलिये वे दिन में ही
काम कर सकते हैं और उनको छाया यंत्र कहा गया है। इनमें से शंकु की चर्चा
त्रिप्रश्नाधिकार नामक तीसरे अध्याय में बहुत हुई है। उस अध्याय मे यह
बतलाया गया है कि १२ अंगुल के शंकु से अक्षांश, नतांश, नतकाल, दिशा आदि
का ज्ञान कैसे किया जाता है। इसके द्वारा समय जानने के लिये गुणा भाग की
क्लिष्ट क्रिया करनी पड़ती है, सीधे समय नहीं निकलता। छाया की नाप भी बहुत
शुद्ध नहीं ली जा सकती इसलिये इस यंत्र से जो समय आता है वह चार पाँच
मिनट अधिक या कम हो सकता है। इसलिये आजकल इससे काम लेने की जरूरत
नहीं।
यष्टि यंत्र - इसकी चर्चा इस पुस्तक में और कहीं नहीं की गई है इसलिये
यह नहीं बतलाया जा सकता कि इससे कैसे काम लिया जाता था। भास्कराचार्य
जी ने सिद्धान्त शिरोमणि के यंत्राध्याय में इसकी विशेष चर्चा की है जिससे जान पड़ता
है कि इससे भी समय का ज्ञान करने के लिये क्लिष्ट गणना करनी पड़ती है। इस-
लिये आजकल अच्छे साधनों के होते हुए यह यंत्र भी आवश्यक नहीं है।
धनुष और चक्र-यंत्र से समय का ज्ञान सहज ही हो सकता है। यह दोनों
यंत्र वास्तव में एक ही हैं। चक्र-यंत्र में एक गोल चक्र होता है जिसके किनारे समान
भागों में अंकित रहते हैं। यदि ६० समान भाग हों तो प्रत्येक भाग एक घड़ी का
समय सूचित करता है। इस चक्र के केन्द्र से एक सीधी कीली लोहे या पीतल की
कस दी जाय और चक्र पृथ्वी पर दो खंभों में इस प्रकार गाड़ दिया जाय कि कीली
का सिर आकाश के ध्रुव की दिशा में हो तो इस यन्त्र से सूर्य का नतकाल (Hour
Angle) सहज ही जाना जा सकता है। दिल्ली और काशी आदि के मान-मन्दिरों में
पत्थर के वृहदाकार चक्र यन्त्र बने हैं जो पृथ्वी पर इस प्रकार स्थिर किये गये हैं कि
इनके तल विषुवद्वृत्त के समानान्तर हैं और इनके केन्द्र से एक कीली दोनों ओर
६ इंच के लगभग निकली हुई ध्रुवों की दिशा में है। इस चक्र-यंत्र के दोनों तरफ़ के
किनारे सम भागों में अंकित हैं। जब सूर्य उत्तर गोल में रहता है (सायनमेष संक्रान्ति
से सायन तुला संक्रान्ति तक) तब कील की छाया यंत्र के उत्तरी तल पर पड़कर नत काल
बतलाती है और जब सूर्य दक्षिण गोल में रहता है तब कीली की छाया दखिनी तल
पर पड़ती है और नतकाल सूचित करती है। जैसे-जैसे सूरज ऊपर उठता है छाया
ज्योतिषोपनिषदध्याय ७८१
नीचे होती जाती है । मध्याह्नकाल में कील की छाया ठीक नीचे हो जाती है ।
यदि चाहें तो इसके किनारे घंटों में भी अंकित हो सकते हैं। यह भी एक प्रकार की
धूप-घड़ी है ।
भास्कराचार्य जी ने एक दूसरे प्रकार का चक्र-यंत्र बतलाया है। यह भी
चक्राकार होता है परन्तु यह स्थिर नहीं किया जाता । किनारे से कुछ दूर एक छेद
होता है जिसमें एक जंजीर लगी रहती है । इसी जंजीर से यह लटकाया जा सकता है ।
इसके किनारे ३६० अंशों में अंकित रहते हैं। लटकने पर इसका केन्द्र छेद के ठीक
नीचे रहता है। इन दोनों बिन्दुओं के मिलाने वाली रेखा से समकोण पर जो रेखा
होती है, और जो चक्र के केन्द्र पर भी रहती है उसके एक किनारे शून्य का अंक
रहता है और दूसरे किनारे १८० का । जब समय जानना हो इसको लटकाकर ऐसा
घुमाओ कि इसके केन्द्र पर जड़ी हुई कीली की नोक की छाया किनारे के भागों पर
पड़े । यदि इसके किनारे सायन राशियों के इष्ट स्थान के उदयमानों में भी विभाजित
हों तो इससे लग्न का ज्ञान भी किया जा सकता है। आजकल के सूक्ष्म यंत्रों के
सामने इस यंत्र से भी विशेष लाभ नहीं है ।
चाप या धनुष यन्त्र—यदि चक्र-यन्त्र का आधा भाग लेकर यंत्र बताया
जाय तो सूर्य का नतकाल उसी प्रकार जाना जा सकता है ।
आजकल दिन में सूर्य का किसी समय का नतांश एक साधारण चापयंत्र से
जो कार्ड-बोर्ड का बनाया जा सकता है सहज ही जाना जा सकता है और उससे
नतकाल का ज्ञान भी हो सकता है। ऐसे यंत्र की चर्चा इस लेखक ने विज्ञान भाग
४३ संख्या १ पृष्ठ १८ में चित्र १३८ में की है। उसमें कई सारणियां भी दी गयी हैं
जिनसे २८ अक्षांश से २२ अक्षांश तक के स्थानों में दिन में समय जाना जा सकता है।
इस यंत्र से सूर्य की छाया के अनुसार समय जाना जाता है और चार-पांच मिनट से
अधिक अंतर नहीं पड़ता । इस लेखक की घड़ी जब कभी बन्द हो जाती है या ठीक
समय नहीं देती तब वह इसी से मिला लेता है। इस यंत्र से किसी स्थान का अक्षांश
भी सहज ही जाना जा सकता है। यह सारणी त्रिप्रश्नाधिकार के पृष्ठ २६१ के गुर
(१) के अनुसार तैयार की गयी है । इससे काम लेने की संक्षिप्त रीति इस अध्याय
के अंत में दी गयी है जहाँ, एक धूप-घड़ी की भी चर्चा की जायगी ।
इन छाया-यन्त्रों के सिवा जल-घड़ी और बालू-घड़ी आदि से भी काम लिया
जाता था। जल-घड़ी को कपाल यंत्र कहते थे क्योंकि यह कपाल की तरह अर्द्ध-
गोलाकार होती थी इसके पेंदे में एक छोटा सा छेद होता है। यदि यह पानी में तैरा
दिया जाय तो छेद से पानी धीरे-धीरे कटोरे में भरने लगता है और इतना भर
जाता है कि कटोरा डूब जाता है। इस कटोरे का और छेद का आकार ऐसा होता
७८२ सूर्य-सिद्धान्त
था कि दिन रात में ६० बार डूब जाता था । जितनी देर में वह एक बार डूबता
था उसे घड़ी कहते थे । वह इसीलिये इसका नाम घटीयंत्र हो गया जो आगे चलकर
घड़ी के नाम से प्रसिद्ध हो गया । प्राचीनकाल में घटीयंत्र बनाने के लिये ऐसे नियम
बन गये थे जिनसे स्पष्ट बोध होता था कि कपाल या कटोरा कितना बड़ा हो और
छेद कैसा हो। इसका विशेष वर्णन २३वें श्लोक के विज्ञान-भाष्य में किया जायगा ।
मयूर और बानर यंत्रों के विषय में विस्तारपूर्वक कहीं नहीं लिखा गया है ।
यह शायद मोर, और वानर के आकार के यंत्र बनाये जाते होंगे जिनमें सूत और
बालू के सहारे समय का ज्ञान किया जाता रहा होगा । इन यंत्रों में पारा, तेल, जल
आदि के द्वारा ऐसी युक्ति की जाती थी कि वे स्वयम् चलें और समय का ज्ञान
करावें परन्तु इस बात का स्पष्ट वर्णन नहीं है कि वह किस प्रकार बनाये जाते थे,
केवल इतना ही संकेत है कि इनका प्रयोग बड़ा दुर्लभ है ।
पता नहीं कि ऐसे स्वयंवह यंत्र यथार्थ में बनाये गये थे या केवल कल्पना
में ही थे । आज कल तो अपने आप चलने वाली तरह तरह की घड़ियां सभी काम में
ला सकते हैं परन्तु उनका सिद्धांत बतलाने की यहाँ आवश्यकता नहीं जा पड़ती ।
कपाल यन्त्र —
ताम्रपात्रमधश्छिद्रं न्यस्तं कुम्भेऽमलाम्भसि ।
षष्टिर्मज्जत्यहोरात्रे स्फुटं यन्त्रं कपालकम् ।।२३।।
अनुवाद—ताम्बे का कटोरा जिसके पेंदे में छेद हो निर्मल जल के कुंड में
रखने से दिन रात में ६० बार डूबे तो वह शुद्ध कपाल यन्त्र होता है ।
विज्ञान भाष्य—ऐसे कपाल यन्त्र का विशेष वर्णन आचार्य श्रीपति ने
सिद्धांत शेखर में इस प्रकार दिया :—
शुल्बस्य दिग्भिर्विहितं पलैर्यत् षडङ्गुलोच्चं द्विगुणायतास्यम् ।
तदम्भसा षष्ठिपलैः प्रपूर्य पात्रं घटार्धप्रतिमं घटीस्यात् ।।
सप्तांशमाषत्रयनिर्मिता या हेम्नः शलाका चतुरङ्गुलास्यात् ।
विद्धं तया प्राक्तनमत्र पात्रं प्रपूर्यते नाडिकयाम्बुना तत् ।।
अर्थात् दस पल तोल का तांबा लेकर उसका अर्धगोलाकार एक कटोरा
ऐसा बनाया जाय जिसकी ऊँचाई ६ अंगुल और जिसके मुख की चौड़ाई इसकी दूनी
हो, जिसमें ६० पल पानी आता हो और जिसकी पेंदी में इतना बड़ा छेद होना
चाहिये कि उसमें ३ १/७ माशा सोने की चार अंगुल लम्बी सुई जा सके जिससे एक
घड़ी में वह कटोरा पानी से भर जाय ।
इससे यह सिद्ध होता है कि यह आचार्य समय की शुद्ध-शुद्ध नाप के लिये
ज्योतिषोपनिषद्ध्याय ७८३
कितना प्रयत्नशील था । परन्तु इस प्रकार का यन्त्र बनाना सुगम नहीं था । इसी-
लिये भास्कराचार्य १ जी ने इसकी उपेक्षा की है ।
नरयन्त्र—
नरयन्त्रं तथा साधु दिवा च विमले रवौ ।
छाया संसाधनेः प्रोक्तं कालसाधनमुत्तमम् ॥२४॥
अनुवाद—इसी प्रकार नरयन्त्र अथवा शङ्कु दिन में जब सूर्य स्वच्छ हो
अच्छा होता है । छाया की ठीक-ठीक नाप से समय का ठीक-ठीक ज्ञान करने की
रीति बतलायी गयी है ।
विज्ञान-भाष्य—त्रिप्रश्नाधिकार में यह विस्तारपूर्वक बतलाया गया है कि
१२ अंगुल लम्बे शंकु की छाया से दिशा, देश और काल की गणना कैसे की
जाती है ।
उपसंहार—
ग्रहनक्षत्रचरितं ज्ञात्वा गोलं च तत्वतः ।
ग्रहलोकमवाप्नोति पययिणात्मवान् नरः ॥२५॥
इति सूर्य-सिद्धान्ते ज्योतिषोपनिषदध्याय
अनुवाद—ग्रह और नक्षत्रों की चाल तथा गोल गणित के तत्व को जानने
वाला मनुष्य ग्रहलोक को प्राप्त होता है और जन्मान्तर में आत्मज्ञानी होता है ।
विज्ञान-भाष्य—इस श्लोक से यह प्रकट होता है कि हमारे आचार्य
ज्योतिष-शास्त्र के तत्व की जानकारी का कितना महत्व समझते थे और इसका प्रत्यक्ष
बोध कराने के लिये अनेक प्रकार के यन्त्रों की कैसी रचना करते थे । आजकल यन्त्रों
की इतनी उन्नति हो गयी है कि इनके द्वारा आकाशीय पिंडों की गति का साधन
बड़ी सूक्ष्मता से किया जा सकता है । इसमें अध्याय में ऐसे एक यन्त्र की चर्चा
संक्षेप में की जाती है । जिनको इनके सम्बन्ध में विशेष रीति से जानने की इच्छा
हो उन्हें प्रकाश-विज्ञान की पुस्तकें पढ़नी चाहिए ।
दूरदर्शक—इस यन्त्र से दूर की वस्तुओं का प्रतिबिम्ब बहुत बड़ा और
स्पष्ट देख पड़ता है । इसका सिद्धान्त संक्षेप में यह है :—
पीतल की नलिका के एक सिरे पर ऐसा ताल रहता है जिससे दूर की वस्तु
का प्रतिबिम्ब उसकी नाभी पर या इसके पास ही बनता है । इस प्रतिबिम्ब के पास
१. अत्र दशभिः शुल्बस्य पलैरित्यादि यद् घटी लक्षणम् कैश्चित् कृतं
तद्युक्ति शून्यं दुर्घटं चेत्ये तदुपेक्षितम् । (गोलाध्याय, यन्त्राध्याय श्लोक ८ की
व्याख्या) ।
७८४ सूर्य-सिद्धान्त
ही दूसरे सिरे पर एक छोटा ताल होता है जिससे यह प्रतिबिम्ब बड़ा होकर दिखाई
पड़ता है। यह छोटा ताल एक दूसरी नलिका के सिरे पर जड़ा रहता है जो बड़ी
नलिका में खिसक सकती है। बड़ा ताल वस्तु की ओर रहता है इसलिये इसका
नाम 'वस्तु ताल' और छोटा ताल देखनेवाले के नेत्र की ओर रहता है इसलिये इसे
'नेत्र ताल' कहते हैं। माउन्ट विल्सन के वेधालय के दूरदर्शक के वस्तु ताल का
व्यास १०० इंच अथवा ८ फुट ४ इंच हैं। दस वर्ष से एक ऐसा ताल बनाया जा
रहा है जिसका व्यास २०० इंच का होगा। इसकी मोटाई २५ इंच की है और
तोल ३३००० पौंड अथवा ४०२ मन से कुछ ऊपर। इस ताल से जो प्रतिबिम्ब
बनेगा वह दस लाख गुना बढ़ाया जा सकता है। चन्द्रमा यहाँ से २५००० मील दूर
है परन्तु इस ताल से देखने पर वह ऐसा जान पड़ेगा मानो केवल २० मील की दूरी
पर है। यह ताल जिस नली में जड़ा जायगा उसकी लम्बाई ५५ फुट और तोल
२५०००० पौंड अथवा ३०४६ मन¹ है।
यदि यह यंत्र इस प्रकार स्थिर किया जाय कि यह पूर्व-पश्चिम दिशा में
स्थापित सम अक्ष पर यामोत्तर वृत्त के तल में घूमे तो इसका नाम यामोत्तर यंत्र हो
जाता है। इससे किसी ग्रह या तारे का यामोत्तरलंघन काल, विषुवांश और क्रान्ति
की नाप हो सकती है। चित्र १३७ से इस यंत्र के स्थिर करने की रीति मोटे तौर
पर मालूम हो सकती है। 'पू प' अक्ष के दोनों सिरों पर दो चक्र होते हैं जिनके
किनारों पर अंशों और कलाओं के चिह्न अंकित रहते हैं। दूरदर्शक को किसी ग्रह
या तारे की सीध में करते समय चक्र जितना घूम जाता है उसी से उस ग्रह का
चित्र १३७
नतांश जान लिया जाता है। स्थान का अक्षांश मालूम ही रहता है। बस इन दोनों
की सहायता से उस ग्रह की क्रान्ति सहज ही जानी जा सकती है।
१. २५ अक्टूबर १६३८ के अंग्रेजी दैनिक 'लीडर' से
ज्योतिषोपनिषदध्याय ७८५
साधारण चापयन्त्र (अथवा सभी जगह काम देने वाली धूप-घड़ी)
चाप-यंत्र
विज्ञान भाग ४३ संख्या १ पृष्ठ १८ का ब्लाक यहाँ देना चाहिये
चाप यंत्र से समय जानने की सारणी (२५॥ अक्षांश के स्थानों के लिये जैसे काशी, प्रयाग, पटना आदि)
{|c|c|c|c|c|c|c|c|c|c|c|c|c|c|c|}
\hline
मास & तारीख & काल समी-करण & १२ & ११ & १० & ९ & ८ & ७ & ६ & काल समीकरण & तारीख & मास & \multicolumn{2}{c|}{सूर्योदय}
& & & & १ & २ & ३ & ४ & ५ & ६ & & & & घं० & मि०
\hline
जनवरी & १ & +३ & ४६ & ५१ & ५७ & ६५॥ & ७६ & ८७॥ & & -१॥ & २२ & दिस० & ६ & ४८
& १० & ७॥ & ४७॥ & ४६॥ & ५६ & ६४॥ & ७५ & ८७ & & १०। & ३ & & ६ & ४४
& २१ & ११॥ & ४५॥ & ४७॥ & ५४। & ६३। & ७४ & ८६ & & १३॥ & २२ & & ६ & ४०
& २६ & १२। & ४३॥ & ४५॥ & ५२॥ & ६२ & ७२ & ८५ & & १५॥ & १३ & & ६ & ३५
\hline
फरवरी & ५ & १४ & ४१॥ & ४३॥ & ५०॥ & ६०॥ & ७१॥ & ८४ & & १६। & ३ & नवम्बर & ६ & ३१
& ११ & १४॥ & ३६॥ & ४२ & ४६। & ५६ & ७०॥ & ८३ & & १६। & ३१ & & ६ & २७
& १७ & १४। & ३७॥ & ४०। & ४७॥ & ५७॥ & ६६॥ & ८२ & & १५॥ & २५ & & ६ & २३॥
& २३ & १३॥ & ३५॥ & ३८। & ४६ & ५६॥ & ६८॥ & ८१ & & १५ & १६ & अक्टूबर & ६ & १६॥
& २८ & १२॥ & ३३॥ & ३६॥ & ४४॥ & ५५। & ६७। & ८०। & / १३॥ & १४ & & ६ & १५॥
\hline
७८६ सूर्य-सिद्धान्त
{|c|c|c|c|c|c|c|c|c|c|c|c|c|c|c|c|}
\hline
\multirow{2}{}{मास} & \multirow{2}{}{तारीख} & \multirow{2}{}{{c} काल समी-
करण } & १२ & ११ & १० & ९ & ८ & ७ & ६ & \multirow{2}{}{{c} काल
समीकरण } & \multirow{2}{}{तारीख} & \multirow{2}{}{मास} & \multicolumn{2}{c|}{सूर्योदय}
\cline{4-10} \cline{14-15}
& & & & १ & २ & ३ & ४ & ५ & ६ & & & & घं० & मि०
\hline
\multirow{6}{}{मार्च} & ५ & ११।। & ३१।। & ३४।।।। & ४२ & ४४ & ६६। & ७६। & & १२।। & ६ & \multirow{6}{}{सितम्बर} & ६ & १२
& १० & १०।। & २६।। & ३२।।। & ४१।। & ५२।।। & ६५। & ७८। & & १०।।। & ६ & & ६ & ८
& १६ & ६।।। & २७।। & ३१ & ४० & ५१।। & ६४। & ७६।। & & ६। & २८ & & ६ & ४
& २१ & ७।। & २४।। & २६। & ३८।।। & ५०।। & ६३। & ७६।। & & ७।। & २३ & & ६ & ०
& २६ & ५।।। & २३।। & २७।। & ३७। & ४६। & ६२। & ७५।। & ८६ & ५।।। & १८ & & ५ & ५६
& ३१ & ४। & २१।। & २५।।।। & ३६ & ४८। & ६१। & ७४।।।। & ८८। & ४ & १३ & & ५ & ५२
\hline
\multirow{5}{*}{अप्रैल} & ५ & २।।। & १६।। & २४। & ३४।।।। & ४७। & ६०।। & ७४ & ८७।। & २ & ७ & & ५ & ४८
& १० & १।। & १७।। & २२।। & ३३।। & ४५। & ५६।।। & ७३ & ८६।। & १ & २ & & ५ & ४४।।
& १६ & ० & १५।। & २१ & ३२।। & ४५।।। & ५८।।। & ७२। & ८५।।। & $+१।।$ & २७ & \multirow{5}{*}{अगस्त} & ५ & ४०।।
& २२ & -१।। & १३।। & १८।। & ३१।। & ४४।। & ५८ & ७१।। & ८४।।। & ३ & २२ & & ५ & ३६।।
& २८ & २।। & ११।। & १८ & ३०।। & ४३।।। & ५७। & ७०।।।। & ८४ & ४।। & १५ & & ५ & ३२
\hline
\multirow{3}{*}{मई} & ४ & ३। & ६।। & १६।।। & २६।। & ४३ & ५६।। & ७० & ८३ & ५।। & ६ & & ५ & २६
& १२ & ३।।। & ७।। & १५।।।। & २८।।। & ४२। & ५५।।। & ६६। & ८२। & ६। & १ & & ५ & २५
& २० & ३।।। & ५।। & १४।।।। & २८।।। & ४०।।। & ५५ & ६८।। & ८१।। & ६। & २४ & \multirow{3}{*}{जुलाई} & ५ & २०
\hline
\multirow{3}{*}{जून} & १ & २।। & ३।। & १४ & २७।।। & ४१। & ५४।। & ६७।।।। & ८०।।। & ५।। & १२ & & ५ & १६
& १४ & ० & ... & ... & ... & ... & ... & ... & ... & ... & ... & & ... & ...
& २१ & $+१।।$ & २ & १३।। & २७। & ४०।।। & ५४ & ६७ & ८० & & & & ५ & १२
\hline
ज्योतिषोपनिषदध्याय ७८७
सारणी को ध्यान से देखने पर पता चलेगा कि जहां १२ लिखा हुआ है वह
मध्याह्न काल सूचित करता है । इसके बाद वाले खाने में नीचे १ और ऊपर ११
लिखे हुए हैं। इनका अर्थ यह है कि सूर्य का नतांश ११ बजे जितना होता है उतना
ही एक बजे होता है। परन्तु मध्याह्नकालिक नतांश से इनमें अधिक अन्तर नहीं
रहता। जनवरी और दिसम्बर में तो यह अन्तर सवा दो अंश से अधिक नहीं होता ।
फरवरी और अक्टूबर में यह २।। से अंश तक हो जाता है। मार्च और सितम्बर में
४। के लगभग हो जाता है। अप्रैल और अगस्त में ६।। अंश और मई, जून, जुलाई,
अगस्त में इससे भी अधिक हो जाता है। इसलिये इस धूप घड़ी से जाड़े के दिनों में
११ बजे से १ बजे तक का समय बहुत शुद्धता के साथ नहीं जाना जा सकता।
एक बजे से २ बजे तक या १० बजे से ११ बजे तक का समय सुगमता से
जाना जा सकता है। इसके अतिरिक्त अन्य कालों में समय का ज्ञान बहुत हो सूक्ष्मता
के साथ किया जा सकता है।
काल-समीकरण—धूप घड़ी से जो समय आता है वह शुद्ध स्थानीय काल
होता है। तार घर की घड़ी से जा समय जाना जाता है वह इससे भिन्न होता है।
स्थानीय-काल से तार घर की घड़ी का समय जानने के लिये स्थानीय-काल में २
संस्कार करने पड़ते हैं। एक को काल-समीकरण और दूसरे को देशान्तर-संस्कार
कहते हैं। काल-समीकरण पहली जनवरी से १६ अप्रैल तक धनात्मक होता है, इसके
बाद १४ जून तक वह ऋणात्मक रहता है। १४ जून के बाद फिर धनात्मक हो
जाता है और अगस्त तक ऐसा ही रहता है। सितम्बर से दिसम्बर तक प्रायः
ऋणात्मक रहता है। जब धनात्मक रहता है तब धूप घड़ी के समय में इसे जोड़ना
पड़ता है और जब ऋणात्मक होता है तब घटाना पड़ता है। यह संस्कार करने पर
शुद्ध स्थानीय-काल मध्यम स्थानीय काल के समान हो जाता है।
देशान्तर संस्कार—मध्यम-स्थानीय काल जान लेने के बाद यदि अपना
स्थान ८२।। अंश की देशान्तर रेखा से १ अंश पूर्व हुआ तो ४ मिनट, २ अंश पूर्व
हुआ तो आठ मिनट और दस अंश पूर्व हुआ तो ४० मिनट घटाना पड़ता है। परन्तु
यदि अपना स्थान ८२।। अंश की देशान्तर रेखा से पश्चिम हुआ तो उसी हिसाब से
जोड़ना पड़ता है। ऐसा करने से जो समय आता है वही तारघर या रेलघड़ी का
समय होता है।
सूर्योदय और सूर्यास्त-काल—सारणी में सूर्योदय काल भी घण्टा मिनटों
में दिया हुआ है। यदि सूर्योदय काल को १२ घंटे से घटा दिया जाय तो सूर्यास्त
काल आ जायेगा। यह वह समय है जिस समय सूर्य के बिम्ब का केन्द्र क्षितिज पर
७८८ सूर्य-सिद्धान्त
गणित के अनुसार आना चाहिये । परन्तु वास्तव में प्रकाश-वर्तन के कारण सूर्य का
बिम्ब क्षितिज के नीचे रहते हुए भी दिखाई पड़ने लगता है। इस वर्तन के कारण
सूर्योदय दिये हुये समय से प्रायः २।। मिनट पहले और सूर्यास्त २।। मिनट बाद
होता है।
सूर्य का बिम्ब भी बिन्दु के समान नहीं है इसलिये उसके ऊपरवाला किनारा
प्रायः एक मिनट पहले उदय हो जाता है और १ मिनट बाद अस्त होता है। इसलिये
सूर्योदय काल में ३।।। मिनट घटा देने से वह समय आ जायगा जिस समय सूर्य बिम्ब
का ऊपर वाला किनारा देख पड़ने लगता है। इसी प्रकार सूर्यास्त काल में ३।।
मिनट जोड़ देने से यह समय आ जायगा जिस समय सूर्य का पूरा बिम्ब छिप जाता
है । परन्तु यह समय स्थान का स्पष्ट-काल है। रेल घड़ी का समय जानने के लिये
काल-समीकरण और देशान्तर-संस्कार भी करना चाहिये । समीकरण को देखने से
पता चलता है कि दो तारीखों में सूर्योदय काल एक ही होता है। उदाहरण के लिये
१० जनवरी और ३ दिसम्बर को सूर्योदय ६ बजकर ४४ मिनट पर इलाहाबाद में
या २५।। अक्षांश के स्थानों में सब जगह होता है। परन्तु इन तारीखों में सूर्योदय के
समय रेल की घड़ी में भिन्नता दीख पड़ती है। कारण स्पष्ट है। ३ दिसम्बर को
काल समीकरण १०। मिनट घटाना पड़ता है। और १० जनवरी को ७।। मिनट
जोड़ना पड़ता है। अन्य संस्कार दोनों में समान होते हैं। उदाहरण के लिये इन दो
तारीखों का सूर्योदय काल रेल की घड़ी से जो आता है, वह नीचे बतलाया जाता है—
३ दिसम्बर १० जनवरी
स्पष्ट सूर्योदय काल ६ घं० ४४ मि० ६ घं० ४४ मि०
वर्तन-संस्कार —२।। मि० —२।।
काल समीकरण संस्कार —१०।'' +७।।
देशान्तर संस्कार (इलाहाबाद के लिये) +२'' +२
रेल की घड़ी से सूर्योदय काल ६ घं० ३३।मि० ६ घं० ५१ मि०
यदि सूर्य बिम्ब के ऊपरी किनारे के उदय का समय जानना हो तो १
मि० कम कर देना चाहिये । इन तारीखों में रेल घड़ी से सूर्यास्त-काल जानने के
स्पष्ट सूर्योदय काल को १२ घंटे से घटाने पर ५ घंटा १६ मिनट होता है। इसमें
वर्तन, काल-समीकरण और देशान्तर-संस्करण इस प्रकार करना चाहिये ।
३ दिसम्बर १० जनवरी
स्पष्ट सूर्यास्त ५ घं० १६ मि० ५ घं० १६ मिनट
वर्तन-संस्कार +२।। मि० +२।। मि०
ज्योतिषोपनिषद्ध्याय ७८६
काल-समीकरण -१०'' +७।। मि०
देशान्तर +२ मि० +२ ''
रेल घड़ी का समय ५ घं० १० मि० ५ घंटा २८ मि०
टिप्पणी—गणित सिद्ध सूर्योदय काल में वर्तन-संस्कार घटाना और सूर्यास्त
काल में जोड़ना चाहिये ।
सूर्य का नतांश नापकर समय जानना—
उदाहरण १—१७ फरवरी को मध्याह्न के पहले सूर्य का नतांश ५० है ।
समय क्या है ? इस तारीख को १० बजे का नतांश ४७।।। और ९ बजे का ५७।।। है
इसलिये ९ बजे और १० बजे के बीच सूर्य का नतांश ५० होगा । यह भी प्रगट है
कि ९ से १० बजे तक नतांश १० अंश कम होता है । इसलिये इस घंटे में नतांश
१ घंटे में १० अंश की दर से घट रहा है अर्थात् १ अंश ६ मिनट में घटता है ।
५७।।। से ५० तक ७।।। अंश होते हैं। इसलिये ७।।। अंश की कमी ६ x ७।।। मिनट
अथवा ४६।। मि० में होती है। इसलिये स्पष्ट स्थानीय काल ९ बजकर ४६।। मिनट
हुआ । इस दिन काल-समीकरण +१४। मिनट है। इसलिये यह संस्कार देने पर
मध्यम स्थानीय काल ९ घं० ४६।। मिनट + १४। मिनट = १० घण्टा १ मिनट
हुआ । यदि स्थान इलाहाबाद है तो उसमें २ मिनट और जोड़ना चाहिये । इस
प्रकार रेल का समय १० घंटा ३ मिनट हुआ । यदि स्थान काशी हो तो दस घंटा
१ मिनट से २ मिनट घटाना चाहिये, क्योंकि काशी २ मिनट पूर्व है । इसलिये
काशी में इस तारीख को जिस समय सूर्य का नतांश ५० होगा उस समय ९ बजकर
५६ मिनट हुआ होगा ।
उदाहरण २—२३ मार्च को पटना नगर में दोपहर के बाद सूर्य का नतांश
७४ अंश है । इस समय रेल की घड़ी में क्या बजा है ?
सारणी में २३ मार्च कहीं नहीं है । उसमें तो मार्च की २१ और २६
तारीखों के नतांश और नतकाल दिये हुए हैं । २१ मार्च को ४ बजे का नतांश ६३।
और ५ बजे का ७६।। है । २६ मार्च को ४ बजे का नतांश ६२। और ४ बजे का
७५।।। है । ५ दिन में ४ बजे के नतांश में १ अंश की कमी पड़ती है और ४ बजे के
नतांश में पौन अंश की । इसलिये २ दिन में चार बजे के नतांश में लगभग आधे
अंश की कमी पड़ेगी और पाँच बजे के नतांश में लगभग चौथाई अंश की । इसलिये
२३ ता० को ४ बजे का नतांश ६२।। और ५ बजे का नतांश ७६। होंगे । इन दोनों
का अन्तर हुआ १३।। अंश । यह वृद्धि १ घंटे में होती है । इसलिये नतांश के बढ़ने
की गति लगभग ४।। मिनट प्रति अंश है । परन्तु ७४ नतांश का समय जानना है
७६० सूर्य-सिद्धान्त
जो ७६। से २। अंश कम है। ४।। मिनट प्रति अंश की दर से २। अंश लगभग
१० मिनट में पूरा होगा। इसलिये स्थानीय स्पष्ट काल ५ बजने में १० मिनट है
अर्थात् ४ बजकर ५० मिनट हुआ है। यही पटने की धूप-घड़ी का समय है।
अब देखना चाहिये कि इस दिन का काल-समीकरण क्या है। २१ मार्च
का काल-समीकरण ७।। मिनट और २६ तारीख का ५।।। है इसलिये ५ दिन में
काल-समीकरण में १।।। मिनट की कमी हुई, और २ दिन में पौन मिनट की।
इसलिये २३ मार्च को काल समीकरण ६।।। मिनट है। यह धनात्मक है, इसलिये
इसको जोड़ने पर स्थानीय मध्यमकाल ४ बजकर ५६।।। मिनट अथवा ४ बजकर
५७ मिनट हुआ।
पटने का देशान्तर ग्रीनविच से ८५ अंश ३० कला के लगभग है जो भारत-
वर्ष के प्रधान देशान्तर ८२° ३०' से ३ अंश पूर्व है। इसलिये पटने का देशान्तर-
काल १२ मि० पूर्व हुआ। उपर्युक्त समय से १२ मि० घटाने पर आया ४ घंटा
४५ मिनट। यही रेल-घड़ी का का समय हुआ।
किसी स्थान का अक्षांश जानना—किसी सारणी से इष्ट दिन का
मध्याह्नकालिक (१२ बजे का) नतांश जान लीजिये। फिर उसी सारणी में देखिये
कि २१ मार्च का मध्याह्नकालिक नतांश कितना है। दोनों का अन्तर जान लीजिये।
यही उस दिन की सूर्य की क्रान्ति है। अब अपने स्थान का मध्याह्नकालिक नतांश
नतांशदर्पण से देख लीजिये। यदि क्रान्ति उत्तर हो तो इस नतांश में जोड़ने से और
दक्षिण हो तो घटाने से उस स्थान का अक्षांश आ जावेगा।
उदाहरण—१७ फरवरी को रायबरेली का मध्याह्नकालिक नतांश ३८।।
है। सारणी में १७ फरवरी का मध्याह्नकालिक नतांश ३७।। है, और २१ मार्च
का २५।।; इन दोनों नतांशों का अन्तर हुआ १२. इसलिये इस दिन की सूर्य की
क्रान्ति हुई १२° दक्षिण। इस क्रान्ति को ३८।। से घटाने पर आता है २६।।, जो
रायबरेली का अक्षांश हुआ। यह यथार्थ में २६। है। इसलिये इसमें चौथाई अंश
की अशुद्धि है।
जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने ज्योतिष शास्त्र का उचित
रीति से अध्ययन करने के लिए पहले दिल्ली में, फिर जयपुर, मथुरा, काशी और उज्जैन
में ईसा को १८वीं शताब्दी के पहले चरण में अथवा विक्रम की उसी शताब्दी के
चौथे चरण में वेधालय बनवाये। प्रत्येक वेधालय में सात आठ यंत्र प्रायः एक ही
ढंग के परन्तु भिन्न भिन्न आकार के अब भी दीख पड़ते हैं। उनके नाम यह हैं :--
१—सम्राट यन्त्र, २—षष्ठांश यन्त्र, ३—राशिवलय यन्त्र, ४—जयप्रकाश
ज्योतिषोपनिषदध्याय ७६१
यन्त्र, ५—कपाल यन्त्र, ६- राम यन्त्र, ७- दिगंश यन्त्र, ८- नाडीवलय यंत्र, ९—
दक्षिणोत्तरभित्ति यन्त्र, १०-उन्नतांश यन्त्र, ११- चक्र यन्त्र, १२-क्रान्तिवृत्त यन्त्र ।
इन यन्त्रों की विशेष चर्चा करने की आवश्यकता यहाँ नहीं है। इनसे प्रकट
होता है कि प्राचीन काल में हमारे राजे महाराजे ज्योतिष सम्बन्धी खोज के लिये
कैसा परिश्रम करते थे और कितना रुपया खर्च करते थे । इस अध्याय को एक
साधारण धूप घड़ी के बनाने की रीति लिखकर समाप्त किया जायगा । ऐसी धूप
घड़ी के लिये पीतल की चद्दर जिसकी मुटाई ३/८ इंच के लगभग, लम्बाई १५ से २०
इंच तक और चौड़ाई दस या बारह इन्च हो तो काम चल सकता है। इस चद्दर से
एक समकोण त्रिभुज ऐसा काट लेना चाहिये जिसकी लम्बी भुज पर जो कोण बने वह
उस स्थान के अक्षांश के समान हो जहाँ धूप-घड़ी स्थापित करना हो। इसी प्रकार
का एक समकोण त्रिभुज बची हुई चद्दर में भी बन जायगा । मान लीजिये त थ न ध
पीतल की चद्दर का चौकोर टुकड़ा है। इससे द ध न एक समकोण त्रिभुज ऐसा
काट लिया जिसका कोण द ध न प्रयाग के अक्षांश २५°२५' के समान है। बचा
हुआ टुकड़ा त थ द ध है जिसमें द से त थ के समानान्तर द उ रेखा खींच दी
जाय तो इसका उ द ध कोण भी २५°२५', के समान होगा। अब द ध न टुकड़े को
लेकर यह देखना चाहिये कि इसमें से बड़े से बड़ा वृत्त खंड किस प्रकार काटा जा
सकता है। ऐसे वृत्त खंड का केन्द्र निश्चय करके इसी के पास दो समानान्तर रेखाएं
जिनके बीच की दूरी चद्दर की मुटाई के समान हो और जो द ध भुज पर लम्ब
बनाती हों खींच लेनी चाहिये । फिर प्रत्येक रेखा की नोक को केन्द्र मान कर दो
समान धनु खींच लेने चाहिये । इन धनुओं के केन्द्र पर का कोण ६० अंश से कम न
हो और १०५ अंश से अधिक न हो क्योंकि प्रयाग में दिनमान १४ घंटे से अधिक
नहीं होता । इस वृत्त खंड के किनारों को पहले पन्द्रह-पन्द्रह अंकों के अंतर पर
विभाजित करना चाहिये फिर इन भागों को तीन-तीन या चार-चार समान भागों
में बांटना चाहिये (चित्र में तीन ही तीन भाग दिखलाये गये हैं) । पन्द्रह-पन्द्रह अंश-
वाले भाग घंटा बतलावेंगे और यदि प्रत्येक घंटे में तीन-तीन भाग हों तो हर एक से
२० मिनट और चार-चार भाग हो तो हर एक से पन्द्रह मिनट का ज्ञान हो सकता
है। चित्र में इससे छोटे-छोटे भाग नहीं दिखलाये जा सके परन्तु यथार्थ में प्रत्येक
चौथे भाग के भी तीन-तीन समान भाग किये जा सकते हैं जिनसे पाँच मिनट का
अन्तर जाना जा सकता है। बलिया और रायबरेली के गवर्नमेंट हाई स्कूलों में
ऐसी ही धूप-घड़ी स्थापित की गयी हैं। बलिया की धूप-घड़ी को तो नवीं कक्षा के
एक विद्यार्थी ने ही इस लेखक की देख-रेख में तैयार की थी परन्तु रायबरेली की
धूप-घड़ी एक मिस्त्री से बनवायी गयी थी ।
७६२ सूर्य-सिद्धान्त
चित्र १३६ को ध्यान से देखने पर यह बातें समझ में आ जायँगी । वृत्त
खंड के दो समानान्तर त्रिज्याओं के बीच के आधे भाग को जो परिधि की ओर है
काट कर निकाल देना चाहिये और द ध भुज पर लम्ब बनाती हुई दो समानान्तर
रेखाएँ इस प्रकार खींचनी चाहिये कि दोनों के बीच का अंतर चद्दर की मुटाई के
समान हो । इन्हीं रेखाओं के बीच के उतने हिस्से को निकाल देना चाहिये जिसकी
लम्बाई वृत्त खंड के उस भाग के बराबर हो जो कटी हुई रेखाओं से प्रकट किया
गया है। अब इस वृत्त खंड को द ध भुज पर इस प्रकार जोड़ देना चाहिये कि वृत्त खंड
का केन्द्र द ध भुज पर आ जाय और इसका खुला हुआ भाग त्रिभुज के उस भाग
पर बैठ जाय जो कटी हुई रेखाओं से प्रकट किया गया है। ऐसा करने पर इन दोनों
का आकार चित्र १४० के उस भाग के समान हो जायगा जो खम्भे पर दिखलाया
गया है।
चित्र १३६
इस धूप घड़ी को ऐसे स्थान पर स्थापित करना चाहिये जहाँ धूप दिन भर
रहती हो, घर या पेड़ की छाया कम पड़े तो अच्छा है। चार साढ़े चार फुट ऊंचा
पक्का खम्भा बनवा कर उस पर यह इस प्रकार स्थिर करना चाहिये कि इसका त
थ द उ भाग खम्भे की गच के नीचे हो, द उ ठीक दक्षिण-उत्तर रेखा पर हो, द उ
ध त्रिभुज का तल ठीक सीधा खड़ा हो पूरब या पच्छिम किसी तरफ झुका न हो ।
ऐसी दशा में द ध किनारा ठीक आकाशीय ध्रुव की दिशा में रहेगा। यह खम्भे में
अच्छी तरह जकड़ा रहना चाहिये, इसलिये यह अच्छा होगा कि क, ग, स्थानों पर
छेद करके इनमें दो लोहे की छड़ें एक-एक हाथ लम्बी जड़ दी जायँ जिनके दूसरे
किनारे दो-दो इन्च पर झुके रहें। इनके द्वारा यह धूप घड़ी खम्भे में डेढ़ फुट की
गहराई तक जकड़ी रहेगी (देखो चित्र १४०) ।
ज्योतिषोपनिषदध्याय ७६३
चित्र १४०
इस घड़ी का समय भी स्थानीय काल के समान होता है । रेलवे टाइम
जानने के लिये काल समीकरण और देशान्तर संस्कार उसी प्रकार करना चाहिये
जैसा पहले बतलाया गया है ।
इस प्रकार ज्योतिषोपनिषदध्याय नामक १३वें अध्याय का विज्ञान भाष्य समाप्त हुआ ।
चतुर्दश अध्याय
मानाध्याय
(संक्षिप्त वर्णन)
[श्लोक १-२—मानों की संख्या और व्यवहार । श्लोक ३-११—सौर मान
से अहोरात्र, षडशीतिमुख, अयन, विषुव संक्रान्तियाँ; संक्रान्तियों के पुण्यकाल और ऋतु
की गणना । श्लोक १२-१४—चान्द्रमान से तिथि, करण, विवाहादि संस्कार, व्रतोप-
वासादि तथा पितरों के दिन रात का निश्चय । श्लोक १५-१६— नाक्षत्र दिन तथा
नक्षत्रों से चान्द्रमासों के नाम । श्लोक १७ – बृहस्पति के वर्षों के नाम । श्लोक
१८-१६—सावन दिन से यज्ञकाल तथा सूतक आदि का निश्चय । श्लोक २०-२१—
दिव्य, प्राजापत्य तथा ब्रह्ममान । श्लोक २२-२७—उपसंहार । अन्त में बीजो-
पनयनाध्याय के २१ श्लोक हैं जो क्षेपक कहे जाते हैं।
नव मानों के नाम
ब्राह्मं पित्र्यं तथा दिव्यं प्राजापत्यं च गौरवम् ।
सौरं च सावनं चान्द्रमार्क्षं मानानि वै नव ॥१॥
अनुवाद—ब्राह्म, दिव्य, पित्र्य, प्राजापत्य, वार्हस्पत्य, सौर, सावन, चान्द्र
और नाक्षत्र नव कालमान हैं ।
विज्ञान भाष्य — इन शब्दों की व्याख्या आगे आनेवाले श्लोकों में ही दे दी
गयी है इसलिये इस समय अधिक कहने की आवश्यकता नहीं है ।
व्यवहार में आनेवाले मान
चतुर्भिर्व्यवहारोऽत्र सौरचान्द्रार्क्ष सावनै ।
बार्हस्पत्येन षष्ट्यब्दा ज्ञेया नान्यैस्तु नित्यशः ॥२॥
अनुवाद—इस श्लोक में सौर, चान्द्र, नाक्षत्र और सावन मानों का व्यव-
हार होता है । साठ संवत्सरों की गणना बृहस्पति मान से होती है, शेष चार
मानों का काम नित्य नहीं पड़ता ।
विज्ञान भाष्य—इन पांच मानों की चर्चा मध्यमाधिकार में भी आ
चुकी है ।
मानाध्याय ७६५
सौरमान
सौरेण द्यु॒ तिशोर्मानं षडशीतिमुखानि च ।
अयनं विषुवच्चैव सङ्क्रान्तेः पुण्यकालता ॥३॥
अनुवाद—दिन रात्रि का परिमाण, षडशीतिमुख, उत्तरायण और दक्षिणा-
यन, विषुव संक्रान्ति, तथा अन्य संक्रान्तियों का पुण्यकाल सौरमान से निश्चय किया
जाता है ।
षडशीतिमुख
तुलादेः षडशीत्यंशैः षडशीतिमुखं दिनम् ।
भचतुष्टयमेवं स्याद् द्विस्वभावेषु राशिषु ॥४॥
षड्विशे धनुषो भागे द्वाविंशेऽतिमिनस्य च ।
मिथुनेऽष्टादशे भागे कन्यायां च चतुर्दशे ॥५॥
अनुवाद—(४) तुला संक्रान्ति से छियासी दिनों का षडशीति मुख क्रम से
होता है । यह चार हैं और द्विस्वभाव राशियों में होते हैं। (५) धनु राशि के २६वें
अंश, मीन राशि के २२वें अंश, मिथुन राशिके १८वें अंश और कन्या राशि के १४वें
अंश तक ।
विज्ञान भाष्य—इन श्लोकों में दिन का अर्थ सावन दिन नहीं है, वरन् वह
समय है जिसमें सूर्य एक अंश चलता है। ऐसे ३६० दिनों का एक वर्ष होता है
जो सावनमानानुसार ३६५ दिन ६ घंटे से कुछ अधिक हुआ । परन्तु सूर्य की
गति सदा समान नहीं होती इसलिये चारों षडशीतिमुखों के मान भी सावन दिनों में
समान नहीं हैं। तुला राशि से आरंभ करके तुला और वृश्चिक राशियों के तीस-
तीस अंश और धनु के २६ अंश मिलकर ८६ अंश हुए इसलिये प्रथम षडशीतिमुख
धनु के २६ अंश पर समाप्त होता है। दूसरा षडशीतिमुख धनु के २७वें अंश से
आरम्भ होकर मीन के २२वें अंश पर समाप्त होता है। इसी प्रकार तीसरा मिथुन
के १८वें अंश पर और चौथा कन्या के १४वें अंश पर समाप्त होता है। जिन चारों
राशियों में षडशीति मुखों का अंत होता है वे द्विस्वभाव की बतलायी गयी हैं
जिसकी चर्चा फलित ज्योतिष में आयी है।
किसी किसी ग्रन्थ में तिमिनस्य के स्थान में निमिषस्य पाठ है जो अशुद्ध
जान पड़ता है क्योंकि निमिष का अर्थ मीन राशि नहीं है।
पितृपक्ष
ततश्शेषे तु कन्याया यान्यहानि तु षोडश ।
क्रतुभिस्तानितुल्यानि पितॄणांदत्तमक्षयम् ॥६॥