सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
सौर वर्ष के मान—भिन्न-भिन्न मतों के अनुसार ( १२ ) दिन घंटा मिनट सेकंड वर्तमान सूर्य सिद्धान्त ३६५ ६ १२ ३६.५६ यथार्थ से ३ मिनट २७ सै० अधिक आर्यभटीय ३६५ ६ १२ २६.६४ ,, ३ ,, २० ,, ,, ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त ३६५ ६ १२ ६ ,, ३ मिनट अधिक मध्यमनाक्षत वर्ष लॉकियर के अनुसार ३६५ ६ ९ ६.३ यथार्थ नाक्षत वर्ष चान्द्र-केन्द्र-वर्ष ,, ३६५ ६ १३ ४६.३ सायनवर्ष ,, ३६५ ५ ४८ ४६.०५४ यथार्थ सायन वर्ष से ६ मि० २६ सै० सायनवर्ष तालमी के अनुसार* ३६५ ५ ५५ १२ अधिक ,, कोपरनिकस के अनुसार × ३६५ ५ ५५ ५८ ,, ,, ७ ,, ६ ,, नाक्षतवर्ष मेटन के अनुसार† ३६५ ६ १८ ५७ यथार्थ नाक्षत वर्ष से ६ ,, ४८ ,, ,, बेबीलोनियन§ ३६५ ६ १३ ३६.३ ,, ,, ४ ,, ३० ,,
- Syntaxis, Karl Manitius's edition, Vol. I, p. 146. × Heroes of Science, p. 63 § Encyclopaedia Britannica, History of Astronomy.
( १३ ) सिद्ध है कि हमारे ज्योतिषियों के बेध टालमी वा केपलर के बेधों की अपेक्षा अधिक शुद्ध हैं और इसलिए स्वतन्त्र भी हैं। इसी प्रकार यदि मन्दोच्चों, पातों तथा अन्य ध्रुवांकों की तुलना की जाय तो प्रगट हो जाता है कि हमारे आचार्यों के माने हुए ध्रुवांक अधिकांश में यथार्थ से अधिक निकट हैं। इसलिए यह सिद्ध हो जाता है कि हमारा ज्योतिष टालमी या किसी अन्य विदेशी ज्योतिष की छाया नहीं है वरन् स्वतन्त्र है। इन बातों का दिग्दर्शन विज्ञान-भाष्य में जगह-जगह कराया गया है। सूर्य-सिद्धान्त का रचना काल—इस सम्बन्ध में विद्वानों में बड़ा मतभेद है। इस पुस्तक में जो रचना काल बतलाया गया है वह तर्क से तो समझ में आता नहीं क्योंकि यदि यह इतने प्राचीनकाल, इक्कीस लाख पैंसठ हजार वर्ष से इसी प्रकार चला आता तो आज से पाँच हजार वर्ष पूर्व महाभारत-काल में उस समय के महाराजाधिराज दुर्योधन के दरबार में जहाँ उस समय के बड़े-बड़े विद्वान मौजूद थे यह प्रश्न क्यों उठ खड़ा होता कि पाण्डवों के चौदह वर्ष का बनवास-काल कब पूरा होगा ? इस सम्बन्ध में भीष्म का जो उत्तर है उससे तो यह समझ में नहीं आता कि उस समय सूर्य-सिद्धान्त जैसे ग्रन्थ की ज्योतिष-गणना का उनको परिचय था। परन्तु इसमें संदेह नहीं कि इस ग्रन्थ का आदि रूप वराहमिहिर के बहुत पहले का है और संभव है कि पंचसिद्धान्तिका में जो रूप देख पड़ता है वह आदि रूप नहीं है वरन् उसमें वराहमिहिर ने कुछ संशोधन किया है। परन्तु आश्चर्य है कि आर्यभट्ट (४७६ ई०) ने अपने ग्रन्थ इसकी कहीं चर्चा नहीं की है, इससे यह अनुमान होता है कि आर्यभटीय के रचना काल के आसपास ही इसकी रचना भी हुई है। वराह- मिहिर ने सूर्य-सिद्धान्त का जो रूप दिया है वह वर्तमान सूर्य-सिद्धान्त से भिन्न है जिसमें अयन-चलन की बातें पीछे से बढ़ायी गयी हैं क्योंकि यदि अयन-चलन की चर्चा सूर्य-सिद्धान्त में वराहमिहिर के पहले होती तो यह पञ्चसिद्धान्तिका में कहीं न कहीं इसका समावेश जरूर करते और इतना ही लिखकर न संतोष करते कि प्राचीनकाल में अयन-बिन्दु आश्लेषा नक्षत्र में था अब पुनर्वसु में है। ब्रह्मगुप्त (६२८-६६५ ई०) के समय में भी सूर्य-सिद्धान्त का जो रूप था उसमें अयन-चलन की बात नहीं थी क्योंकि ऐसी दशा में ब्रह्मगुप्त इसकी चर्चा अवश्य करते। यह बात तो भास्कराचार्य के कुछ पहले मिलायी गयी होगी परन्तु फिर भी उस रूप में नहीं जैसा कि अब देख पड़ती है क्योंकि भास्कराचार्य ने स्वयं इसकी शुद्धता पर शंका प्रकट की है। इसलिये यह सिद्ध है कि वर्तमान सूर्य-सिद्धान्त का आदि-रूप तो वही है जो पश्च सिद्धान्तिका में दिया गया है और वराहमिहिर के पहले भी मौजूद था अथवा वाराही सूर्य-सिद्धान्त उसका संशोधित रूप है और बाद में भी उसमें ज्योतिषियों ने समय-समय पर संस्कार
( १४ )
| ग्रह | कलियुग के आरंभ में ३१०२ ई० पूर्व | कलि संवत १००० में २१०२ ई० पूर्व | कलि संवत २००० में ११०२ ई० पूर्व | कलि संवत ३००० में १०२ ई० पूर्व | कलि संवत ३६३६ में ५३८ ई० | कलि संवत ४१०२ में १०६१ ई० | ठीक कब था ईस्वी |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अंश कला विकला | अंश कला विकला | अंश कला विकला | अंश कला विकला | अंश कला विकला | अंश कला विकला | ||
| बुध | + ३३ २५ ३५ | + २५ ६ ५२ | + १६ ५४ ६ | + ८ ३८ २६ | + ३ २१ ४० | - १ १२ २८ | ६४५ |
| शुक्र | + ३२ ४२ ३६ | - २४ ३७ ३१ | - १६ ३१ २६ | - ८ २५ २१ | - ३ १४ ५५ | + १ १४ ३ | ६३६ |
| मंगल | + १२ ५ ४२ | + ६ २६ ३२ | + ६ ४७ २२ | + ४ ८ १३ | + २ २६ ३० | + ० ५८ २६ | १४५८ |
| गुरु | - १७ २ ५३ | - १२ ४४ १६ | - ८ २५ ३६ | - ४ ७ २ | - १ २१ ४७ | + ० ४१ १४ | ६०६ |
| शनि | + २० ५६ ३ | + १५ ४३ २० | + १० २७ ३७ | - ५ ११ ५४ | + १ ५० १० | - १ ४ २५ | ८८७ |
| चन्द्र | - ५ ५२ ४१ | - ३ ५० ४८ | - २ ६ १७ | - ० ५२ ३२ | - ० १८ ३० | - ० ० ० | १११०६७ |
| चन्द्रोच्च | - ३० ११ २५ | - २३ ६ ३६ | - १६ ७ ४७ | - ६ ५ ५८ | - ४ ३६ २६ | - ० ४३ १० | -१६३ |
| चन्द्र-पात | + २३ ३७ ३१ | + १७ ५६ २१ | + १२ ३१ ११ | + ७ ३ १ | + ३ ३३ १६ | + ० ३१ ५० | १२८८ |
| मध्यम मान १०६१ |
करके इसको वर्तमान रूप में प्रकट किया है, जिसके लिये आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त आदि के ग्रन्थों या वेधों से सहायता ली गयी होगी, जैसा कि सेनगुप्त महोदय अपनी खण्डखाद्यक की भूमिका में सिद्ध करते हैं। पाश्चात्य विद्वानों का मत — इसके रचना काल के सम्बन्ध में पाश्चात्य विद्वानों ने बड़ा ऊहा-पोह किया है जिसके लिये उनको धन्यवाद देना हमारा परम कर्त्तव्य है। इस विषय में बेंटली महोदय ने बहुत परिश्रम किया है। इन्होंने सूर्य- चन्द्रमा आदि ग्रहों की गणना सूर्य-सिद्धान्त तथा नवीन वेधों के अनुसार भिन्न-भिन्न कालों के लिये करके उस समय को सूर्य-सिद्धान्त का रचनाकाल स्थिर किया है जब दोनों गणनाओं के अनुसार ग्रहों के भोगांश एक हो जाते हैं। यह बात पृष्ठ १४ के कोष्ठक से स्पष्ट होगी जिसमें ग्रहों की अशुद्धियां दिखलाई गयी हैं। इससे बेंटली यह परिणाम निकालते हैं कि सूर्य-सिद्धान्त ११वीं सदी के अन्तिम चरण में लिखा गया । देखने में तो यह बहुत ही युक्ति-युक्त जान पड़ता है और इसमें संदेह नहीं कि लेखक महोदय ने इसमें बड़ी नवीनता दिखलाई है परन्तु यथार्थ में यह रीति बिना अच्छी तरह परीक्षा किये मानने योग्य नहीं है। यह बात मैं बर्जेस के अनुवाद की प्रकाशन समिति के शब्दों में ही बतला देना पर्याप्त समझता हूं :— "दूसरे ग्रहों के सम्बन्ध में बेंटली ने शून्य अशुद्धि के जो समय निकाले हैं वे हमारे निकाले हुए समयों से बहुत मिलते हैं जिनको हमने १८६० ई० की अशुद्धियों से पीछे की तरफ गणना कर के निकाले हैं और जो ६७वें श्लोक की टीका के साथ दिये गये हैं।" "इन दोनों कोष्ठकों की तुलना करने पर यह तुरन्त देख पड़ेगा कि बेंटली ने अपना निर्णय ग्रहों के निरपेक्ष स्थानों की अशुद्धियों से नहीं निकाला है वरन् सूर्य के स्थान की तुलना में। परन्तु सूर्य के स्थान की अशुद्धि का उन्होंने विचार ही नहीं किया है। हिंदुओं का राशि-चक्र नाक्षत्रिक (Sidereal) है और सूर्य की गति पर किसी प्रकार निर्भर नहीं है। अन्य ग्रहों की तरह सूर्य भी ३१०२ ई० पूर्व उस स्थान पर नहीं था, जहाँ मान लिया गया है और इसलिये इस पद्धति के अनुसार सूर्य की जो गति मानी गयी है वह यथार्थ से भिन्न है क्योंकि नाक्षत्रवर्ष ३॥ मिनट बड़ा माना गया है। इसलिये सूर्य की अशुद्धि का विचार क्यों न किया जाय और ग्रहों की नाक्षत्रिक गति का विचार इसी अशुद्ध गति की तुलना में क्यों किया जाय ? यह प्रकट है कि बेंटली को सूर्य के स्थान का भी पूरी तरह विचार करना चाहिए था और यह दिखलाना चाहिए था कि इससे भी वही परिणाम निकलता है जैसा कि अन्य ग्रहों की गणना से और यदि नहीं तो असंगति का कारण क्या था ? ऐसा
पहली जनवरी सन् १८६० ई० को वाशिंगटन की मध्यरात्रि में ग्रहों के मध्यम भोगांश ( १६ )
\t\t\t\tसूर्य-सिद्धान्तानुसार\t\t\t\tअर्वाचीन ज्योतिषानुसार ग्रह\t\t\tमूल\t\t\tबीज संस्कृत \tअंश\tकला\tविकला\tअंश\tकला\tविकला\tअंश\tकला\tविकला
सूर्य\t६६\t१८\t२१\t६६\t१८\t२१\t१००\t५\t६ बुध\t१५५\t२\t३०\t१४८\t२५\t३६\t१५१\t२८\t२० शुक्र\t३३६\t५४\t५५\t३३४\t५७\t१८\t३६६\t१३\t३६ मंगल\t१६२\t३६\t५\t१६२\t३६\t५\t१६७\t२६\t३२ गुरु\t१०४\t७\t२२\t१००\t४८\t५६\t१०३\t३५\t१७ शनि\t१२८\t१७\t११\t१३३\t१४\t४६\t१३७\t१०\t१० चन्द्रमा\t६\t४\t६\t६\t४\t६\t१२\t४१\t२३ चन्द्रोच्च\t३२७\t५०\t२४\t३२६\t११\t११\t३२६\t४७\t३५ चन्द्रपात\t३१२\t२६\t५१\t३१०\t५०\t३८\t३१२\t४८\t१०
( १७ ) सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार निकाले हुए ग्रहों के मध्यम भोगांशों की अशुद्धियाँ | मूल ग्रन्थ के अनुसार अशुद्धियाँ | | | | बीज संस्कृत ग्रन्थ के अनुसार अशुद्धियाँ | | | | | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | | ग्रह | *निरपेक्ष<br>अंश कला विकला | कब शुद्ध<br>ई० | सूर्य की अपेक्षा<br>अंश कला विकला | कब शुद्ध<br>ई० | निरपेक्ष<br>अंश कला विकला | कब शुद्ध<br>ई० | सापेक्ष<br>अंश कला विकला | कब शुद्ध<br>ई० | | सूर्य | — ३ ४६ ४५ | २५० | ० ० ० | ...... | — ३ ४६ ४५ | २५० | ० ० ० | ...... | | बुध | + २ ३४ १० | २३३२ | + ७ २० ५५ | ३२७१ | — ३ २ ४१ | १५१७ | + ० ४४ ५ | १६७० | | शुक्र | + ३ ४१ १६ | १२२२ | + ७ २८ ४ | ६४१ | — १ १६ १८ | २१२६ | + २ ३० २७ | १५०६ | | मंगल | — ४ ५० २७ | ८८६ | — १ ३ ४२ | १४५५ | — ४ ५० २७ | ८८६ | — १ ३ ४२ | १४५५ | | गुरु | + ० ३२ ५ | १५७१ | + ४ १८ ५० | ८३२ | — २ ४६ २१ | ४२०३ | + १ ० २४ | १५७५ | | शनि | — ८ ५२ ५६ | ६६६ | — ५ ६ १४ | ८५७ | — ३ ५५ २१ | १२५० | — ० ८ ३६ | १८२५ | | चन्द्रमा | — ३ ३७ १४ | ११५ | + ० ६ ३१ | १०६७ | — ३ ३७ १४ | ११५ | + ० ६ ३१ | १०६७ | | चन्द्रोच्च | + १ २ ४६ | १६७६ | + ४ ४६ ३४ | १२५२ | — ० ३६ २४ | १६६६ | + ३ १० २१ | १४५६ | | चन्द्रपात | — ० १८ १६ | १६७६ | + ३ २८ २६ | ११६२ | — १ ५७ ३२ | २७१४ | + १ ४६ १३ | १४६८ | *निरपेक्ष स्थान वह है जो राशि-चक्र के स्थिर आदि बिन्दु से नापा जाता है और सापेक्ष वह स्थान है जो सूर्य से नापा जाता है जिसकी स्थिति सौर नाक्षत वर्ष के अनुसार निश्चय की जाती है जो यथार्थ से ३ मिनट के लगभग बड़ा है, इसलिये सूर्य का स्थान भी इसी के अनुसार बदल रहा है ।
( १७ ) न करके हमारी समझ में सारी गणना का बहुत ही महत्त्वपूर्ण अंश छोड़ दिया गया है जिससे बहुत ही महत्वपूर्ण परिणाम निकलता है।"...... “लेकिन हमारे सिद्धान्त के बारे में यथार्थ बात क्या है ? हमें यह मिलता है कि इसमें ग्रहों के ऐसे ध्रुवाङ्क दिये गये हैं जिनके स्थानों की भूलों की परीक्षा ऊपर बतलायी हुई रीति से करने पर जान पड़ता है कि इन ध्रुवाङ्कों का निश्चय इस विचार से नहीं किया गया है कि किसी निर्दिष्ट काल में इनकी यथार्थ नाक्षत्रिक स्थिति जानी जा सके । बल्कि इसके प्रतिकूल ये ऐसी गवाही देते हैं कि ईसा की १० वीं या ११वीं सदी में इस बात का प्रयत्न किया गया है कि ग्रहों की स्थिति सूर्य की स्थिति की तुलना में ठीक-ठीक जानी जा सके । इसका भी ठीक-ठीक समय संदेहात्मक है क्योंकि उन समयों में बड़ी भिन्नता है, जिनमें अशुद्धि शून्य समझी जाती है । संस्कृत साहित्य के इतिहास में यह बात उतनी ही ध्रुव है जितनी कोई बात हो सकती है कि उस समय से बहुत पहले सूर्य-सिद्धान्त का अस्तित्व था । अन्य ज्योतिष के ग्रन्थों के निर्देशों और उद्धरणों से इस बात का भी पता चलता है कि इस नाम के ग्रन्थ के कई पाठान्तर भी थे और हम ऊपर (श्लोक ६ में) यह देख भी चुके हैं जो बहुत अस्पष्ट सूचना नहीं है कि वर्तमान ग्रन्थ में ठीक-ठीक वही ध्रुवाङ्क नहीं दिये गये हैं जो पहले सूर्य-सिद्धान्त के माने गये थे । इसलिए इस अनुमान के निकट और क्या हो सकता है कि १०वीं या ११वीं शताब्दी में संशोधन के लिये बीज की जो गणना की गयी थी यह मूल में केवल चार या पाँच श्लोकों को बदल कर खपा दी गयी । इसलिये जबकि दूसरे ग्रहों की तुलनात्मक अशुद्धियां उस समय का निर्देश करती हैं जब यह बीज संस्कार किया गया था, सूर्य की निरपेक्ष अशुद्धि मूल पुस्तक का प्रायः सच्चा समय प्रकट करती है।" “हमारे कोष्ठक में सूर्य की शून्य अशुद्धि का समय २५० ई० है । इस तारीख की अशुद्धता के लिये बहुत जोर देने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि यह उस वेध की शुद्धता पर निर्भर है जिससे सूर्य का स्थान पहले-पहल निश्चय किया गया और फिर उस विन्दु से निर्देश किया गया जिसको आकाश चक्र का आदि विन्दु कहते हैं । कोरी आंख से इसका वेध करना असंभव था कि सूर्य का केन्द्र मध्यम गति के अनुसार रेवती के योग तारा Zeta Piscium के दस कला पूर्व कब था और यह तो स्पष्ट है कि हिन्दुओं ने इस विन्दु से राशिचक्र के अन्य विन्दुओं का जो निश्चय किया है उनमें बड़ी-बड़ी भूलें हैं और यदि सूर्य के स्थान के निश्चय करने में एक अंश की भी भूल हो जाय तो इससे शून्य अशुद्धि के काल में ४२५ वर्ष का अन्तर पड़ सकता है ।
( १६ ) ब्रह्मगुप्त आदि के दिये हुए योग तारों के ध्रुवांकों ( Polar longitude ) की तुलना से भी सूर्य-सिद्धान्त का समय इसीके आस-पास आता है। इनमें कुछ ध्रुवांक परम्परा प्राप्त हैं । ये वह हैं जो तीनों ग्रन्थों में अभिन्न हैं, कुछ को ग्रन्थ- कर्त्ताओं ने स्वयं शुद्ध कर दिया है। इनके तुलनात्मक अध्ययन से हम सूर्य-सिद्धान्त काल की परा और अपरा सीमा ( Superior and inferior limit ) जान सकते हैं । वराह की पञ्चसिद्धान्तिका में भी ( थीबो के अनुसार ) सात योग तारों के ध्रुवांक दिये गये हैं जिनको हम उस प्राचीन सूर्य-सिद्धान्त के ध्रुवांक मानते हैं जो वराह के पहले मौजूद था (देखो पृष्ठ २०-२१)।* प्राचीन सूर्य-सिद्धान्त के समय निरूपण के लिये नीचे लिखे नक्षत्र चुने जाते हैं जिनके ब्रह्मगुप्त के ध्रुवांक सूर्य-सिद्धान्त के ध्रुवांक से जितने अधिक हैं वह सामने लिखे जाते हैं :- अंश कला कृत्तिका ४ ४८ रोहिणी १ २८ पुनर्वसु ५ ३ मघा ३ ० पू० फाल्गुनी ३ ० चित्रा ३ ० योग २० १६ मध्यममान ३ २३ इन छः तारों के ध्रुवांकों की अधिकता का मध्यममान ३ अंश २३ कला के समान है । यदि अयन चलन के कारण ध्रुवांकों की एक अंश की वृद्धि ७२ वर्ष में मानी जाय, तो यह वृद्धि लगभग २४४ वर्ष के समय में हुई होगी । परन्तु ब्रह्मगुप्त का समय हमें निश्चयपूर्वक मालूम है कि ६२८ ई० है । इसलिए सूर्य-सिद्धान्त का समय इससे २४४ वर्ष पूर्व अथवा ३८४ ईस्वी आता है। इसको स्थूल रूप से ४०० ई० समझा जा सकता है। जो इस समय की परा सीमा (Upper limit) है। अपरा सीमा की खोज करने के लिए हमें नीचे लिखे तारों के ध्रुवकों को देखना चाहिए जिनके ध्रुवांक ब्रह्मगुप्त के ध्रुवकों से जितने अधिक हैं उनका मध्यममान १ अंश १५ *बर्जेस के सूर्य-सिद्धान्त के अनुवाद के दूसरे संस्करण की पी० सी० सेनगुप्त की लिखी भूमिका पृष्ठ XXVI-XXIX
( २० ) योग तारों के ध्रुवक (Polar Longitude)
तारा | पंच सिद्धान्तिका | ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त | शिष्यधीवृद्धि | वर्तमान सूर्य-सिद्धान्त | वर्तमान सूर्य सिद्धान्त के ध्रुवक कहाँ से लिये गये | अंश कला | अंश कला | अंश कला | अंश कला |
अश्विनी | ... | ८ ० | ८ ३ | ८ ३ | परम्पराप्राप्त भरणी | ... | २० ० | २० ० | २० ० | " कृत्तिका | ३२ ४० | ३७ २८ | ३६ ० | ३७ ३० | ब्रह्मगुप्त रोहिणी | ४८ ० | ४६ २८ | ४६ ० | ४६ ३० | " मृगशिरा | ... | ६२ ० | ६२ ० | ६२ ० | " आर्द्रा | ... | ६७ ० | ७० ० | ६७ २० | नया ? पुनर्वसु | ८८ ० | ९३ ३ | ९२ ० | ९३ ० | ब्रह्मगुप्त पुष्य | ९७ २० | १०६ ० | १०५ २० | १०६ ० | " अश्लेषा | १०७ ४० | १०८ ० | ११४ ० | १०६ ० | नूतन मघा | १२६ ० | १२६ ० | १२८ ० | १२६ ० | ब्रह्मगुप्त पू० फाल्गुनी | ... | १४७ ० | १३६ २० | १४४ ० | परम्पराप्राप्त उ० फाल्गुनी | ... | १५५ ० | १५४ ० | १५५ ० | ब्रह्मगुप्त
( २१ ) हस्त ...... १७० ० १७३ ० १७० ० ब्रह्मगुप्त चित्रा १८० ५० १८४ ० १८४ २० १८० ० परम्पराप्राप्त स्वाती ...... १६६ ० १६७ २० १६६ ० ब्रह्मगुप्त विशाखा ...... २१२ ० २१२ ० २१३ ० नूतन अनुराधा ...... २२४ ० २२२ ० २२४ ० ब्रह्मगुप्त ज्येष्ठा ...... २३६ ० २२८ ० २२६ ० ,, मूल ...... २४१ ० २४१ ० २४१ ० परम्पराप्राप्त पूर्वाषाढ़ा ...... २४४ ० २५४ ० २५४ ० ,, उत्तराषाढ़ा ...... २६० ० २६७ ० २६० ० ब्रह्मगुप्त अभिजित ...... २६५ ० २६७ २० २६६ ० नया श्रवण ...... २७८ ० २८३ १० २८० ० ,, धनिष्ठा ...... २६० ० २६६ २२ २६० ० ब्रह्मगुप्त शतभिषा ...... ३२० ० ३१३ २० ३२० ० ,, पूर्वाभाद्रपदा ...... ३२६ ० ३२७ ० ३२६ ० ,, उत्तराभाद्रपद ...... ३३७ ० ३३५ ० ३३७ ० ,, रेवती ...... ० ० ३५६ ० ३५६ ५० ,,
( २२ ) कला है जो ब्रह्मगुप्त से ६० वर्ष बाद हुआ होगा । इस प्रकार यह अपरा सीमा ६२८+६० = ७१८ ईस्वी होती है । अंश कला अश्लेषा १ ० विशाखा १ ० अभिजित १ ० श्रवण २ ० योग ५ ० मध्यम १ १५ इस प्रकार यह परिणाम निकाला जा सकता है कि सूर्य-सिद्धान्त की रचना ४०० ई० से लेकर ७२५ ई० तक हुई । बेंटली और बर्जेस ने भी सूर्य-सिद्धान्त में दिये हुए नक्षत्रों के ध्रुवाङ्कों की तुलना अर्वाचीन ज्योतिर्गणित से सिद्ध ध्रुवांकों से करके सूर्य-सिद्धान्त का समय निरूपण इसी प्रकार किया है, परन्तु वह इतना ठीक नहीं जान पड़ता, क्योंकि वेधों के विषय में जिस प्रकार की भूल सूर्य-सिद्धान्तकार ने की होगी, वैसी ही ब्रह्मगुप्त आदि ने भी की होगी । इस प्रकार रचनाकाल की परा सीमा इससे अधिक बढ़ायी जा सकती । परन्तु अपरा सीमा ११०० ई० तक आ सकती है जैसा कि बेंटली ने सिद्ध किया है । अयन-चलन की बात से भी बेंटली के मत का समर्थन होता है । भास्करा- चार्य के समय में सूर्य-सिद्धान्त में लिखित अयन गति उतनी नहीं थी जितनी वर्तमान सूर्य-सिद्धान्त में है । इससे जान पड़ता है कि अयन गति का संशोधन भास्कराचार्य के बाद किया गया है । परन्तु भास्कराचार्य का समय ११५० ई० है । सूर्य-सिद्धान्त का लेखक—यह दिखलाया जा चुका है कि सूर्य-सिद्धान्त के ध्रुवाङ्क यूनानी ज्योतिषी हिपार्कस, टालमी या अन्य पाश्चात्य देशों के ज्योतिषियों के ध्रुवाङ्कों से नहीं मिलते । इसलिये यह ग्रन्थ उन लोगों के वेधों के आधार पर नहीं लिखा गया । इसकी परम्परा विवस्वान् अर्थात् सूर्य से बतलायी गयी है (देखो मध्यमाधिकार श्लोक ८-६) जिस प्रकार भगवद्गीता में बतलाये हुए योग मार्ग की परम्परा बतलायी गयी है (देखो भगवद्गीता अध्याय ४ श्लोक १-२) । मयासुर विदेशी नहीं है । उसने भारत का निवासी होकर यह ज्ञान प्राप्त किया था और उसी से ऋषियों ने भी पीछे सीखा । यही सूर्य-सिद्धान्त में दी हुई कथा का रहस्य मालूम होता है । ब्रह्मशाप के कारण सूर्य भगवान् का रोमक नगर में उत्पन्न होने की कथा मनगढ़न्त है और केवल एक या दो हस्त-लिखित पुस्तकों में पायी जाती
( २३ ) है, इसलिए प्रक्षिप्त है जिसको किसी ने स्वीकार नहीं किया । यदि सूर्य-सिद्धान्त विदेशी के द्वारा प्राप्त हुआ होता तो ब्रह्मगुप्त अवश्य लिखते, क्योंकि रोमक सिद्धान्त के लिये, जो निस्सन्देह विदेशी है, उन्होंने साफ-साफ लिख दिया है। पंचसिद्धान्तिका प्रकाशिका टीका में म० म० पं० सुधाकर द्विवेदी का दिया हुआ सूर्यारुण-संवाद के मूल का पता नहीं है, इसलिए नहीं कहा जा सकता कि यह किसने लिखा और किस आधार पर लिखा । नित्यानन्द¹ का यह लिखना कि यह कलियुग के ३६०० वर्ष बीतने पर अर्थात् शक ४२१ या ४६६ ई० में लिखा गया जब कि आर्यभट्ट ने अपना आर्यभटीय ग्रन्थ लिखा है, भ्रम है। शायद इसी भ्रम के कारण मुनीश्वर ने भी आर्यभट्ट को सूर्य-सिद्धान्त का रचयिता मान लिया था। अलबेरूनी का यह कहना कि इसको लाटाचार्य या लाटसिंह ने बनाया भ्रम है² क्योंकि वराहमिहिर और ब्रह्मगुप्त किसी ने भी लाटाचार्य को सूर्य सिद्धान्त का रचयिता नहीं माना । वराहमिहिर के अनुसार लाटाचार्य रोमक और पौलिश सिद्धान्तों के व्याख्याता हैं। लाट के अहर्गण³ यवनपुर के सूर्यास्त-काल के हैं। इस प्रकार मत प्रकट है कि सूर्य-सिद्धान्त के रचना काल तथा रचयिता के सम्बन्ध में जितने अनुमान हैं वे सिद्ध नहीं होते । अंतरंग प्रमाणों के आधार पर केवल इतना ही कहा जा सकता है कि इसकी वृद्धि ४०० ई० के आसपास से प्रारम्भ होकर १२०० ई० तक समाप्त हुई । पहले-पहल इसका विस्तार ( संशोधन ) वराहमिहिर ने किया होगा । फिर अन्य संशोधकों ने आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त, मंजुल आदि के वेधों से लाभ उठाकर इसको अप्-टु-डेट (Up-to-date) बनाने की कोशिश की। यह संशोधन उस समय तक जारी था जब तक रंगनाथ जी ने इसकी टीका लिखकर इसके श्लोकों को बाँध नहीं दिया । माधव पुरोहित की टीका में कुछ श्लोक अधिक मिलते हैं, पता नहीं वे किसी पुराने ग्रन्थ के आधार पर लिखे गये या यों ही बढ़ा दिये गये । प्रयाग भ्रातृ-द्वितीया; सं १६६७ वि० महावीर प्रसाद श्रीवास्तव
¹ सूर्य-सिद्धान्त रचनाकालस्तु नित्यान्देन सिद्धान्तराजकृता कलेः षट्त्रिंशच्छ- तमिते अब्दगणे व्यतीते निगद्यते—पंचसिद्धान्तिका प्रकाशिका पृष्ठ २ ²लाटाचार्येणोक्तो यवनपुरेऽर्द्धास्तगे सूर्ये पंच सिद्धान्तिका अध्याय १ श्लोक ३. ³वही अध्याय १५ श्लोक १८.
प्रथम अध्याय मध्यमाधिकार (संक्षिप्त वर्णन) [ १ श्लोक — ईश्वर वंदना । २-७ श्लोक — ज्योतिःशास्त्र जानने के लिए मयासुर का सूर्य भगवान की तपस्या करना, सूर्य भगवान का प्रसन्न होकर वर देना तथा अपने शरीर से एक पुरुष का उत्पन्न करना । ८-९ श्लोक — सूर्यांश पुरुष का मायासुर से कहना कि जो शास्त्र पहले सूर्य भगवान ने महर्षियों से कहा था वही कुछ परिवर्तन के साथ कहा जा रहा है । १० श्लोक — काल के दो भेद (१) अनादि और अनन्त, (२) कलनात्मक । ११-२० श्लोक -- निमेष से लेकर कल्प तक की काल की इकाइयाँ । २१-२३ श्लोक — ब्रह्मा की वर्तमान आयु । २४ श्लोक — कल्प के आरंभ से कितने समय में सृष्टि रची गयी । २५-२७ श्लोक — नक्षत्रों और ग्रहों की गति का कारण । २८ श्लोक — कोण नापने की इकाइयाँ । २९-३४ श्लोक — एक महायुग में ग्रहों, उनके शीघ्रोच्चों, चन्द्रमा के उच्च और पात तथा नक्षत्रों के कितने चक्कर होते हैं । ३५- ३६ श्लोक — चान्द्र और सौर मासों का सम्बन्ध । ३७-३९ श्लोक — एक महायुग में कितने सावन दिन, अधिमास तथा तिथियाँ होती हैं । ४० श्लोक — एक कल्प में कितने सावन दिन तथा तिथियां होती हैं । ४१-४४ श्लोक — एक कल्प में ग्रहों के मन्दोच्चों तथा पातों के कितने चक्कर होते हैं । ४५-४७ श्लोक — कल्प के आरंभ से सत्ययुग के अंत तक का समय । ४८-५० श्लोक — सृष्टि के आरंभ से अब तक कितने दिन बीते, यह जानने की रीति । ५१-५२ श्लोक — दिनपति, वर्षपति और मासपति जानने की रीति । ५३-५४ श्लोक — ग्रहों के मध्यम स्थान जानने की रीति । ५५ श्लोक — वृहस्पति का वर्ष (संवत्सर) जानने की रीति । ५६-५८ श्लोक - सत्ययुग के अंत में ग्रहों के स्थान क्या थे । ५९ श्लोक — व्यास और परिधि का सम्बन्ध तथा भूपरिधि का परिमाण । ६०-६१ श्लोक — किसी स्थान के अक्षांश-वृत्त का परिमाण जानना तथा उससे ग्रह का मध्यम स्थान निकालना । ६२ श्लोक - भारतवर्ष की मध्यरेखा पर कौन-कौन प्रसिद्ध नगर हैं । ६३- ६५ श्लोक — चंद्र-ग्रहण से यह जानना कि अमुक स्थान मध्य रेखा से कितना पूर्व या पश्चिम है । ६६ श्लोक - सौर-प्रवृत्ति कब होती है । ६७ श्लोक — किसी इष्टकाल में ग्रहों का स्थान क्या है । ६८-७० श्लोक — चन्द्रमा इत्यादि ग्रह कान्ति-वृत्ति से कितने उत्तर या दक्षिण जा सकते हैं । ]
२ सूर्य सिद्धान्त अचिन्त्याव्यक्तरूपाय निर्गुणाय गुणात्मने । समस्तजगदाधारमूर्तये ब्रह्मणे नमः ॥१॥ अनुवाद—उस परब्रह्म को नमस्कार है जिसका रूप न तो ध्यान में आ सकता है और न प्रकट किया जा सकता है, जो निर्गुण है परन्तु जिससे सब गुण उत्पन्न हुए हैं और जो सम्पूर्ण विश्व का आधार है ॥ १ ॥ अल्पावशिष्टे तु कृते मयो नाम महासुरः । रहस्यं परमं पुण्यं जिज्ञासुर्ज्ञानमुत्तमम् ॥ २ ॥ वेदाङ्गमग्र्यमखिलं ज्योतिषां गतिकारणम् । आराधयन्विवस्वन्तं तपस्तेपे सुदुष्करम् ॥ ३ ॥ अनुवाद—सत्ययुग के कुछ शेष रहने पर मय नामक महा असुर ने सब वेदाङ्गों में श्रेष्ठ, सारे ज्योतिष पिंडों की गतियों का कारण बतलाने वाले, परम पवित्र और रहस्यमय उत्तम ज्ञान को जानने की इच्छा से कठिन तप करके सूर्य भगवान की आराधना की ॥ २-३ ॥ विज्ञान भाष्य—सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग की व्याख्या इसी अध्याय के १६वें श्लोक में की गयी है । वेदाङ्ग ६ हैं—शिक्षा, छन्द, व्याकरण, निरुक्त, कल्प और ज्योतिष । इनसे वेदों के समझने-समझाने में सहायता मिलती है, इसलिए यह वेदाङ्ग कहलाते हैं । वेदाङ्गों में ज्योतिष की श्रेष्ठता भास्कराचार्य जी ने इस प्रकार दिखलाई है—शब्द-शास्त्र वेद भगवान का मुख है, ज्योतिःशास्त्र आँख है, निरुक्त कान है, कल्प हाथ है, शिक्षा नासिका है, छन्द पाँव हैं, इसलिए जैसे सब अंगों में आँख श्रेष्ठ होती है वैसे ही सब वेदाङ्गों में ज्योतिःशास्त्र श्रेष्ठ है । तोषितस्तपसा तेन प्रीतस्तस्मै वरार्थिने । ग्रहाणां चरितं प्रादान्मयाय सविता स्वयम् ॥ ४ ॥ अनुवाद—उसकी तपस्या से संतुष्ट और प्रसन्न होकर सूर्य भगवान् ने स्वयम् वर चाहनेवाले मय को ग्रहों के चरित अर्थात् ज्योतिःशास्त्र का उपदेश दिया ॥ ४ ॥ विज्ञान भाष्य—पाश्चात्य ज्योतिषी ग्रह उन ज्योतिष्क पिंडों को कहते हैं जो सूर्य की परिक्रमा किया करते हैं । इस परिभाषा के अनुसार बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, गुरु, शनि, युरेनस और नेपचून यह आठ ग्रह हैं, जिनमें से पिछले दो ग्रहों का पता
मध्यमाधिकार ३ पिछले दो सौ वर्ष के भीतर लगा है और यह कोरी आँख से नहीं दिखाई पड़ते। चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करता है, इसलिए यह उपग्रह है। अन्य ग्रहों के भी उपग्रह दूरवीक्षण यंत्र से देखे गये हैं। परन्तु हमारे ज्योतिष ग्रन्थों में पृथ्वी को नहीं वरन् सूर्य को ग्रह माना है। चन्द्रमा भी ग्रहों की श्रेणी में रखा गया है। युरेनस और नेपचून की कहीं चर्चा नहीं है। इसलिए हमारे यहाँ सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, गुरु अथवा वृहस्पति, शुक्र और शनि सात स्थूल ग्रह तथा राहु और केतु दो सूक्ष्म ग्रह माने जाते हैं। दो सूक्ष्म ग्रहों का पूरा विवरण इसी अध्याय में चन्द्रमा के पातों का वर्णन करते समय लिखा जायगा। ज्योतिःशास्त्र में इन ग्रहों की गतियों से जो घटनाएँ आकाश में होती हैं उनका वर्णन है, इसलिए इस श्लोक में ज्योतिःशास्त्र का दूसरा नाम 'ग्रहों का चरित' बतलाया गया है। विदितस्ते मया भावः तपसाऽऽराधितस्त्वहम्¹ । दद्यां कालाश्रयं ज्ञानं ज्योतिषां² चरितं महत् ॥ ५ ॥ न मे तेजस्सहः कश्चिद्दाह्यातुं नास्ति मे क्षणः । मदंशः पुरुषोऽयं ते निश्शेषं कथयिष्यति ॥ ६ ॥ अनुवाद—भगवान् सूर्य ने कहा कि तेरा भाव मुझे विदित हो गया है और तेरे तप से मै बहुत संतुष्ट हूँ, मैं तुझे ग्रहों के महान् चरित का उपदेश करता हूँ, जिससे समय का ठीक-ठीक ज्ञान हो सकता है; परंतु मेरा तेज कोई सह नहीं सकता और उपदेश देने के लिए मुझे समय भी नहीं है इसलिए यह पुरुष, जो मेरा अंश है, तुझे भली भांति उपदेश देगा ॥ ५-६ ॥ इत्युक्त्वाऽन्तर्दधे देवस्तमादिश्यांशमात्मनः । स पुमान्मयमाहेदं प्रणतं प्राञ्जलि स्थितम् ।।७।।* शृणुष्वैकमनाः पूर्वं यदुक्तं ज्ञानमुत्तमम् । युगे युगे महर्षीणां स्वयमेव विवस्वता ।।८।।
- इस श्लोक के पहले पूना के आनन्दाश्रम के सूर्य सिद्धान्त की एक टीका रहित प्रति में यह श्लोक भी पाया जाता है :— तस्मात्त्वं स्वां पुरीं गच्छ तत्र ज्ञानम् ददामि ते । रोमके नगरे ब्रह्मशापानम्लेच्छावतार धृक् ।। परन्तु यह सूर्य सिद्धान्त की अन्य किसी प्रति में नहीं है। आगे पीछे के श्लोकों से इसका कोई सम्बन्ध भी नहीं देख पड़ता, इसलिए यह क्षेपक है ।
४ सूर्य सिद्धान्त शास्त्रमाद्यं तदेवेदं यत्पूर्वं प्राह भास्करः । युगानां परिवर्तेन कालभेदोऽत्र केवलम् ॥६॥ अनुवाद—इतना कह कर सूर्य भगवान अन्तर्ध्यान हो गये और सूर्यांश पुरुष ने, आदेशानुसार, मय से जो विनीत भाव से झुके हुए और हाथ जोड़े हुए थे कहा— एकाग्र चित होकर यह उत्तम ज्ञान सुनो, जिसे भगवान सूर्य ने स्वयम् समय-समय पर महर्षियों से कहा था; भगवान सूर्य ने पहले जिस शास्त्र का उपदेश दिया था वही आदि शास्त्र यह है; युगों के परिवर्तन से केवल काल में कुछ भेद पड़ गया है ॥७-६॥ विज्ञान भाष्य—नवें श्लोक के दूसरे पद का कुछ लोग यह अर्थ करते हैं कि सूर्य भगवान ने जिस शास्त्र का उपदेश महर्षियों को किया था वही शास्त्र बिना किसी परिवर्तन के यह है, केवल कहने के समय में भेद है । परन्तु यदि इसका यही अर्थ होता तो यह कहने की क्या आवश्यकता थी कि केवल काल में भेद है, पहले पद में जो कुछ कहा गया है वही पर्याप्त था। इसलिए इस पद का अधिक युक्तियुक्त अर्थ यह है कि पहले के बतलाये हुए और इस समय बतलाये जाने वाले ज्योतिः- शास्त्र में यदि कुछ भेद है तो वह काल के कारण हो गया है, तत्वतः कोई अन्तर नहीं है। काल के कारण भेद कैसे हो सकता है; इसका कारण यह है कि ज्योतिः- शास्त्र प्रयोगात्मक विज्ञान है और प्रयोग में कुछ न कुछ सूक्ष्म भूल रह ही जाती है, जिसे प्रयोगात्मक भूल (Experimental error) कहते हैं। ज्योतिःशास्त्र में यह भूल प्रति वर्ष इकट्ठी होती रहती है और सैकड़ों वर्ष के बाद वह बहुत बड़ा रूप धारण कर लेती है; इसलिए समय-समय पर उसका संशोधन करना पड़ता है, जिसको बीज-संस्कार कहते हैं। इसी दृष्टि से यह वाक्य सूर्यांश पुरुष ने कहा है जिसके प्रमाण में सूर्य सिद्धान्त के अन्तिम अध्याय में 'बीजोपनयन' नाम के २१ श्लोक हैं, जिनकी टीका रंगनाथ जी ने तथा पं० इन्द्रनारायण द्विवेदी जी ने क्षेपक मान कर नहीं की है और क्षेपक मानने का कारण यह बतलाया है कि सूर्य भगवान के कहे हुए शास्त्र में बीज-संस्कार स्वयम् सूर्य भगवान कैसे करते । परन्तु रंगनाथ जी अपनी गूढ़ार्थ-प्रकाशिका टीका में ६ वें श्लोक की व्याख्या करते हुए यह भी बतलाते हैं कि काल पाकर कुछ अन्तर हो जाया करता है। उनके वाक्य ज्यों के त्यों यह हैं:— “तथा च कालवशेन ग्रहचारे किञ्चिद्वैलक्ष्यण्यं भवतीति युगान्तरे तत्तदनन्तरं ग्रहचारेषु प्रसाध्य तत्कालस्थित लोकव्यवहारार्थं शास्त्रान्तरमिव कृपालुरुक्तवानिभि- नानन्तर शास्त्राणां वैयर्थ्यम् । एवञ्च मया वर्तमान युगीय सूर्योक्त शास्त्र सिद्धग्रहचार- मंगीकृत्याद्य सूर्योक्त शास्त्रसिद्ध' ग्रहचारं च प्रयोजनाभावादुपेक्ष्य तदुक्तमेवत्वां प्रत्युपदिश्यत इति भावः । एवञ्च युग मध्येऽप्यवान्तर काले ग्रहचारोष्वन्तर दर्शने तत्तत्काले तदन्तरं
मध्यमाधिकार ५ ऽसाध्यग्रंथास्तत्काल वर्तमानाभियुक्ताः कुर्वन्ति । तदिदमन्तरं पूर्व ग्रंथे बीजमित्याम- नन्ति । पूर्वग्रंथानां लुप्तत्वात्सूर्यर्षि संवादोऽपीदानीं न दृश्यत इति । तदप्रसिद्धेरागम प्रामाण्याच्च नाशंक्या ।।'† काल पाकर अन्तर पड़ने के उदाहरण अनेक हैं, जो इसी टीका में उचित स्थान पर बतलाये जायेंगे । लोकानामन्तकृत्कालः कालोन्यः कलनात्मकः । स द्विधा स्थूल सूक्ष्मत्वान्मूर्त्तंश्चामूर्त्त उच्यते ॥१०॥ अनुवाद—एक प्रकार का कोल संसार को नाश करता है और दूसरे प्रकार का कलनात्मक है अर्थात् जाना जा सकता है। यह भी दो प्रकार का होता है—(१) स्थूल और (२) सूक्ष्म । स्थूल नापा जा सकता है, इसलिए मूर्त कहलाता है और सूक्ष्म नापा नहीं जा सकता इसलिए अमूर्त कहलाता है ॥१०॥ विज्ञान भाष्य—पहले प्रकार के काल की कल्पना भी नहीं हो सकती, क्योंकि न तो यही मालूम है कि वह कब से आरंभ हुआ और न यही मालूम होगा कि उसका अन्त कब होगा । यह अखंड और व्यापक है; परन्तु इसके बीच में ही अथवा इसके उपस्थित रहते ही लोक का अन्त हो जाता है, ब्रह्मा उत्पन्न होते, सृष्टि रचते तथा लय करते हैं, परन्तु काल बना ही रहता है। इसलिए इसको लोकों का अन्त कर देनेवाला, नाश कर देनेवाला, कहते हैं। इसीलिए मृत्यु को भी काल कहते हैं । काल का जो थोड़ा-सा मध्य भाग जाना जा सकता है; उसमें भी जो बहुत छोटा है वह नापा नहीं जा सकता है और अमूर्त कहलाता है। नापने में जितनी ही सूक्ष्मता होगी अमूर्त काल की परिभाषा भी नयी होती जायगी; जैसा कि अगले श्लोक की व्याख्या में दिखाया जायगा । प्राणादिः कथितो मूर्तः त्रुट्याद्योऽमूर्तसंज्ञकः । षड्भिःप्राणैः विनाड़ी स्यात्तत्षष्ट्या नाड़िका स्मृता ॥११॥ नाड़ी षष्ट्या तु नाक्षत्रमहोरात्रं प्रकीर्तितम् । तत्तिंशता भवेन्मासः सावनोऽर्कोदयैःस्मृतः ।।१२।। ऐन्दवस्तिथिभिः तद्वत्सङ्क्रान्त्या सौर उच्यते । मासैर्द्वादशभिर्वर्षं दिव्यं तदह उच्यते ।।१३।। अनुवाद—प्राण से लेकर ऊपर की जितनी समय की इकाइयाँ हैं वह मूर्त †वेंकटेश्वर प्रेस का १६५३ वि० का छपा सूर्य सिद्धान्त, पृष्ठ ७ ।
६ सूर्य सिद्धान्त कहलाती हैं और त्रुटि से लेकर प्राण के नीचे की इकाइयों को अमूर्त कहते हैं । ६ प्राणों की एक विनाड़ी (पल) तथा ६० विनाड़ियों की एक नाड़ी (घड़ी) होती है ॥ ११ ॥ ६० नाड़ियों का एक नाक्षत्र अहोरात्र (दिन रात का एक जोड़ा) तथा ३० नाक्षत्र अहोरात्रों का एक नाक्षत्र मास होता है । इसी प्रकार ३० सावन दिनों का एक सावन मास होता है ॥ १२ ॥ उसी प्रकार ३० चान्द्र तिथियों का एक चान्द्रमास तथा एक संक्रान्ति से दूसरी संक्रान्ति तक के समय को सौरमास कहते हैं । १२ मासों का एक वर्ष होता है; जिसको* दिव्यदिन अथवा देवताओं का दिन कहते हैं । विज्ञान भाष्य—स्वस्थ मनुष्य सुख से बैठा हुआ हो तो जितने समय में वह सहज ही हवा (प्राण वायु) भीतर खींचता और बाहर निकालता है उस समय को प्राण कहते हैं । यही सबसे छोटी इकाई है, जो उस समय नापी जा सकती थी । इससे कम समय के नापने का कोई साधन उस समय नहीं था; इसलिए उसको अमूर्त कहते थे । अब ऐसी घड़ियां बनायी जाती हैं जिनसे उस इकाई का भी नापना सहज है जो अमूर्त कही गयी हैं । एक नाक्षत्र दिन में ६० घड़ी = ६० × ६० पल = ६० × ६० × ६० प्राण अथवा २१६०० प्राण होते हैं । इसी तरह १ दिन में २४ घंटे = २४ × ६० मिनट = २४ × ६० × ६० सेकंड अथवा ८६४०० सेकंड होते हैं । इसलिए १ प्राण में ४ सेकंड होते हैं । जिस घड़ी में सेकंड जानने की सुई लगी रहती है उससे सेकंड का नापना कितना सहज है, यह सबको विदित है । ऐसी घड़ियां भी हैं जिनसे १ सेकंड का पांचवां अथवा दसवां भाग सहज ही जाना जा सकता है । परन्तु १ सेकंड का दसवां भाग १ प्राण के चालीसवें भाग के समान है । इसलिए आजकल प्राण के नीचे की कुछ इकाइयाँ भी मूर्त कही जा सकती हैं । प्राण को असु भी कहते हैं । प्रसिद्ध ज्योतिषी भास्कराचार्य जी सिद्धान्त- शिरोमणि में प्राण की दूसरी परिभाषा छन्द-शास्त्र के शब्दों में यों देते हैं— एक गुरु अक्षर के उच्चारण करने में जितना समय लगता है उसके दस गुने समय को प्राण कहते हैं । सानुस्वार, विसर्गान्त, दीर्घ और जिस लघु अक्षर के पीछे कोई संयुक्ताक्षर हो उसको गुरु अक्षर कहते हैं । पल तोलने की एक इकाई का भी नाम है, जो चार तोले के समान होता है । *इस शब्द से यह प्रकट होता है कि जिन १२ मासों का वर्ष होता है वह सौर- मास हैं । चांद्र, नाक्षत्र अथवा सावन मासों का वर्ष नहीं होता है ।
मध्यमाधिकार ७ जितने समय में १ पल अथवा ४ तोला जल एक विशेष नाप के छिद्र द्वारा घटिका १ यंत्र में चढ़ता है उस समय को पल कहते हैं । त्रुटि की कल्पना भास्कराचार्य जी ने २ इस प्रकार की है । जितने समय में पलक गिरती है उसको निमेष कहते हैं । १ निमेष के तीसवें भाग को तत्पर तथा १ तत्पर के सौवें भाग को त्रुटि कहते हैं । निमेष के ऊपर की इकाइयों का सम्बन्ध यह है :— १८ निमेष = १ काष्ठा ३० काष्ठा = १ कला ३० कला = १ घटिका २ घटिका = १ मुहूर्त्त ३० मुहूर्त्त = १ दिन (नाक्षत्र) इस प्रकार १ नाक्षत्र दिन = ३० × २ × ३० × ३० × १८ निमेष = ९७२००० निमेष पहले दिखलाया गया है कि १ दिन में २१६०० प्राण अथवा ८६४०० सेकंड होते हैं इसलिए १ प्राण में ९७२०००/२१६०० निमेष अथवा ४५ निमेष और १ सेकंड में ११ १/४ निमेष होते हैं । नाक्षत्र अहोरात्र—नक्षत्र का अर्थ है तारा, तारा-समूह तथा उस चक्र का २७वां भाग जिस पर सूर्य एक वर्ष में एक परिक्रमा करता हुआ दीख पड़ता है। पृथ्वी की दैनिक गति के कारण आकाश के सब तारे पूरब में उदय हो कर ऊपर उठते, पश्चिम की ओर बढ़ते, पश्चिम में अस्त होते और फिर पूरब में उदय होते हैं । किसी तारे के उदय का समय घड़ी में देखकर लिख लीजिये और देखिए कि वह तारा फिर कब उदय होता है। यदि घड़ी ठीक हो तो इन दोनों उदयोँ के बीच का समय २३ घंटा ५६ मिनट और ४ सेकंड के लगभग होता है। इसी को नाक्षत्र अहोरात्र या केवल नाक्षत्र दिन कहते हैं । यह सदा एक-सा होता है, घटता बढ़ता नहीं, यदि तारों के बहुत सूक्ष्म गति का विचार न किया जाय । इसलिए ज्योतिषी लोग इसीसे समय का हिसाब लगाते हैं । सावन दिन — सूर्य के एक उदय से लेकर दूसरे उदय तक के समय को सावन दिन कहते हैं । यह नाक्षत्र दिन से कोई ४ मिनट बड़ा होता है । सावन दिन का १. इसका विशेष विवरण ज्योतिषोपनिषत नामक १३वें अध्याय में किया जायगा । २. सिद्धान्त शिरोमणि गणिताध्याय मध्यमाधिकार, काल मानाध्याय श्लोक १६, १७ ।
८ सूर्य सिद्धान्त मान समान नहीं होता । इसलिए मध्यम सावन दिन का जो मान होता है वही समय घड़ियों के द्वारा जाना जाता है । ऐन्दव तिथि या चान्द्र तिथि—चन्द्रमा आकाश में चक्कर लगाता हुआ जिस समय सूर्य के बहुत पास पहुँचता है उस समय अमावस्या होती है । एक अमावस्या से दूसरी अमावस्या तक के समय को चान्द्रमास कहते हैं। इसका मध्यम मान २९•५३०५८७६४६ मध्यम सावन दिन का होता है । अमावास्या के बाद चन्द्रमा सूर्य से आगे पूर्व की ओर बढ़ता जाता है और जब १२ अंश आगे हो जाता है तब पहली तिथि (परिवा) बीतती है, १२ अंश से २४ अंश तक का जब अन्तर रहता है तब दूइज रहती है। २४ अंश से ३६ अंश तक जब चन्द्रमा सूर्य से आगे रहता है तब तीज रहती है। जब अन्तर १६८ से १८० अंश तक होता है तब पूर्णिमा होती है, १८० अंश से १९२ अंश तक जब चन्द्रमा आगे रहता है तब १६वीं तिथि अथवा परिवा (प्रतिपदा) होती है, १९२° से २०४° तक दूइज होती है, इत्यादि । पूर्णिमा के बाद चन्द्रमा सूर्यास्त से प्रति दिन कोई २ घड़ी (४८ मिनट) पीछे निकलता है। पूर्णिमा से अमावस्या तक के १४, १५ दिन को कृष्णपक्ष कहते हैं। अमावस्या को ३०वीं तिथि भी कहते हैं, इसीलिए पंचांगों में अमावस्या के लिए ३० लिखते हैं। सौरमास—सूर्य जिस मार्ग से चलता हुआ आकाश में परिक्रमा करता है उसको क्रांतिवृत्त कहते हैं। इसके बारहवें भाग को राशि कहते हैं। सूर्यमंडल का केन्द्र जिस समय एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है उस समय दूसरी राशि की संक्रान्ति होती है। एक संक्रान्ति से दूसरी संक्रान्ति तक के समय को सौरमास कहते हैं। १२ सौर मास परिमाण में भिन्न-भिन्न होते हैं; इसका कारण यह है कि सूर्य की गति सर्वदा समान नहीं होती । जब सूर्य की गति तीव्र होती है तब वह एक राशि को जल्दी पूरा कर लेता है और वह सौरमास छोटा होता है। इसके प्रतिकूल जब सूर्य की गति मन्द होती है तब सौरमास बड़ा होता है। वर्ष—जितने प्रकार के महीने होते हैं उतने ही प्रकार के वर्ष होते हैं, बारह चान्द्र मासों का एक चान्द्रवर्ष, १२ सावन मासों का एक सावनवर्ष तथा बारह सौरमासों का एक सौरवर्ष होता है। हमारे ज्योतिषी परम्परा से यही मानते आये हैं। परन्तु १३वें श्लोक में दूसरे पद का सीधा अर्थ यह है कि १२ मासों का वर्ष होता है, जिसको दिव्यदिन कहते हैं। इसलिए जिन बारह मासों का वर्ष कहा गया है वह अन्य मास नहीं हैं, केवल सौरमास हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि सूर्य सिद्धान्त में केवल सौर वर्ष की चर्चा है और सौर वर्ष को ही वर्ष माना गया है, अन्य को नहीं।