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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

७६४ सूर्य-सिद्धान्त (चित्र नं० १३३) बहुत कम हो जिससे प्रत्येक अक्ष की गति पूरी तरह स्वतन्त्र हो तो घुमने-यंत्र में अनेक अद्भुत गुण पाये जाते हैं जब कि क ख चक्र खूब तेज़ी से घूम रहा हो । एक महत्व का गुण यह है कि यदि क ख चक्र तेज़ी से चला दिया जाय तो ग घ अक्ष की दिशा सर्वदा एक ही बनी रहती है जब कि घुमना-चक्र एक जगह से दूसरी जगह ज म को पकड़ कर हटाया जाता है । जब घुमना-चक्र के अक्ष की दिशा पृथ्वी के अक्ष के समानान्तर रखी जाती है तब तो इसकी दिशा आस पास की वस्तुओं की दृष्टि से स्थिर रहती है परन्तु यदि इसका अक्ष किसी अन्य दिशा में करके यह घुमाया जाय तो अक्ष उसी प्रकार दिशा बदलता है जैसे तारे । यदि अक्ष किसी विशेष तारे की दिशा में करके चक्र घुमाया जाय तो जब तक वह चक्र घूमता रहेगा अक्ष सदा उसी तारे की दिशा में रहेगा। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि तारों की

भूगोलाध्याय ७६५ दिशा स्थिर है और उनका प्रतिदिन का पूरब से पच्छिम को घूमना पृथ्वी की दैनिक गति के कारण है । इन प्रयोगों के सिवा बहुत सी घटनाएँ ऐसी हैं जिनसे पृथ्वी का अक्ष भ्रमण सिद्ध होता है। उत्तर गोल में लोलक की नोक से बनी हुई रेखा घड़ी की प्रतिकूल दिशा में घूमती है वैसे ही यहाँ बवंडरों के घूमने की दिशा भी होती है । परन्तु दक्षिण गोल में लोलक की नोक से बनी हुई रेखा तथा बवंडरों की दिशा घड़ी की अनुकूल दिशा में घूमती हैं। जो हवाएँ विषुवत् रेखा से ध्रुव की ओर चलती हैं वे उत्तर गोल में पूरब की ओर अर्थात् दाहिने और दक्षिण गोल में भी पूरब की ओर अर्थात् अपने बायें मुड़ जाती हैं। इसका कारण सिवा इसके और क्या हो सकता

उत्तर गोल में बवंडरों की दिशा

दक्षिण गोल में बवंडरों की दिशा (चित्र १३४)

७६६ सूर्य-सिद्धान्त है कि जब विषुवत् रेखा के ऊपर की हवा गरम होकर हलकी होती है तब यह ऊपर उठती है इसलिए इसकी जगह भरने के लिए ध्रुवों के पास की ठंडी हवा विषुवत् रेखा की ओर चलती है । परन्तु विषुवत् रेखा पर पृथ्वी की गति पूर्व की ओर अत्यन्त तीव्र होती है और ज्यों-ज्यों ध्रुवों की ओर जाओ त्यों-त्यों यह गति मन्द पड़ती जाती है इसलिए जो हवा विषुवत् रेखा से चलती है उसकी भी पूर्व की ओर गति तीव्र रहती है इसलिए यह ध्रुवों की ओर के देशों में पहुँचती है जिनकी पूर्वी गति मन्द रहती है । तब यह पूर्व की ओर मुड़ जाती है । इसी प्रकार जो हवा ध्रुवों से विषुवत् रेखा की ओर चलती है वह पच्छिम की ओर को मुड़ जाती है । समुद्र की धाराओं की दिशा भी इसी प्रकार की होती है । मेक्सिको की खाड़ी से जो विषुवत् रेखा के पास है जो गरम जलधारा अटलांटिक महासागर में उत्तर की ओर चलती है वह आगे चलकर पूरब की ओर मुड़ जाती है और उत्तर पूरब दिशा में चलती हुई अटलांटिक महासागर की दूसरी ओर फ्रांस, इंग्लैंड, नारवे आदि देशों में पहुँचती है तथा उत्तर की ठंडी धारा ग्रीनलैंड से उत्तरा अमेरिका की ओर जाती है । इसी का फल फल है कि नारवे का हैमरफैस्ट का बन्दरगाह जो ७० १/२ उत्तरी अक्षांश पर है बारहों महीने बर्फ से मुक्त रहता है जब कि उत्तरी अमेरिका का पूरबी किनारा ४० अक्षांश तक जाड़ा भर और गरमी के भी अधिक भाग तक बर्फ से ढका रहता है । इसी प्रकार हिन्द महासागर के द्वीपसमूह से जो गरम जल धारा उत्तर की ओर को चलती है वह पूरब की ओर को मुड़ कर जापान के पूरबी भाग को गरम रखती है और उत्तर से ठंडी जलधारा जापान के पच्छिमी किनारे से होती हुई चीन सागर में ठीक उलटी दिशा में आती है । यह संक्षेप में बतलाया गया है कि पृथ्वी की दैनिक गति के कारण हवाओं और धाराओं की दिशाओं में क्या परिवर्तन हो जाता है । यदि इस विषय पर अधिक जानना हो तो भूगोल की अच्छी पुस्तकों से काम लेना चाहिए । इस अक्ष भ्रमण के सिवा पृथ्वी में एक दूसरी गति भी होती है जिससे यह वर्ष में भर सूर्य की परिक्रमा कर लेती है परन्तु जान पड़ता है मानों सूर्य ही पृथ्वी की परिक्रमा करता है । पृथ्वी की इस गति का प्रमाण और भी सूक्ष्म है जिसका विचार आगे कहीं किया जायगा । इस समय केवल इतना स्मरण करा देना पर्याप्त होगा कि पृथ्वी की इस गति के ही कारण ग्रहों में आठ प्रकार की गतियाँ देख पड़ती हैं (देखो स्पष्टाधिकार पृष्ठ ८४-९४, ९७-१०५) । ७३ श्लोक के उत्तरार्ध में बतलाया गया है कि ग्रह कक्षाएँ भी भचक्र में

भूगोलाध्याय ७६७ बंधी हुई पूरब से पच्छिम को जा रही हैं। परन्तु इन सब गतियों का कारण पृथ्वी की दैनिक गति ही है। उ व विषुवत रेखा व द (चित्र १३५) उ = उत्तर ध्रुव द = दक्षिण ध्रुव व वि = विषुवत् रेखा सकृदुद्गतमब्दार्धं पश्यन्त्यर्कं सुरासुराः । पितरः शशिगाः पक्षं स्वदिनं च नराभुवि ॥७४॥ अनुवाद—सुर और असुर एक बार के उदय हुए सूर्य को लगातार आधे वर्ष तक देखते रहते हैं, चन्द्रलोक के निवासी पितृगण उसको एक पक्ष तक और पृथ्वी के निवासी मनुष्य उसको अपने एक दिन तक देखते हैं । विज्ञान-भाष्य—इस श्लोक के पूर्वार्ध का अर्थ वही है जो ६७वें श्लोक में बतलाया गया है। उत्तरार्ध के प्रथम पद के अर्थ में ही कुछ विशेषता है जिसे समझाने की आवश्यकता है। सनातनधर्मी हिन्दुओं का विश्वास है कि चन्द्रगोल के ऊर्ध्व भाग में पितृगण निवास करते हैं। यह भाग पृथ्वी के सन्मुख नहीं होता । पाश्चात्य ज्योतिषी भी कहते हैं कि चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा इस प्रकार करता है कि इसका अधोभाग ही पृथ्वी के सन्मुख रहता है और ऊर्ध्व भाग सदैव पीछे रहता

७६८ सूर्य-सिद्धान्त है। इसलिए चन्द्रमा अपने अक्ष पर एक भ्रमण उतने ही दिनों में करता है जितने दिन में वह पृथ्वी की परिक्रमा करता है। इसका प्रमाण कठिन नहीं है। चन्द्र बिम्ब को ध्यान से देखने पर ज्ञात होता है कि उसके काले धब्बे बिम्ब के किनारे से सदैव एक ही स्थिति में देख पड़ते हैं जिससे प्रकट होता है कि चन्द्र बिम्ब का वह भाग जो पृथ्वी के सन्मुख है सदैव उसी दशा में रहता है अर्थात् चन्द्रमा का अक्ष-भ्रमण- काल उसके परिक्रमा काल के समान ही होता है। इस पर यह कहा जा सकता है कि चन्द्रमा में अक्ष-भ्रमण होता ही नहीं। परन्तु यह ठीक नहीं है। यह एक उदाहरण से स्पष्ट हो जायगा। एक दीपक बीच में रख दीजिये और उसकी ओर देखिए। मान लीजिए कि दीपक आपके उत्तर की ओर है। अब दीपक को देखते हुए आप उसके चारों ओर घड़ी की अनुकूल दिशा में घूमिए। जब आप चौथाई चक्कर कर लेंगे तब दीपक आपके पूरब हो जायगा। आधा चक्कर कर लेने पर दीपक आपके दक्षिण हो जायगा, तीन चौथाई चक्कर करने पर वह आपके पच्छिम हो जायगा और पूरा चक्कर करके उसी स्थान पर आ जाने पर जहाँ से चक्कर लगाना आरम्भ किया था वह दीपक फिर आपके उत्तर हो जायगा। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि इस प्रकार के एक चक्कर में आपका मुख सदैव दीपक की ओर रहता है और पीठ सदैव उसके पीछे। साथ ही साथ आपका शरीर भी एक बार घूम जाता है क्योंकि घूमने में भी तो आपका मुख उत्तर, पूरब, दक्षिण और पच्छिम की ओर होता रहता है। जब चन्द्रमा का ऊर्ध्व भाग सदा पृथ्वी से विमुख रहता है तब उसका सम्बन्ध सूर्य से किस प्रकार रहता है ? अमावस्या के दिन सूर्य और पृथ्वी के बीच में चन्द्रमा रहता है इसलिए इसका ऊर्ध्व भाग सूर्य के ठीक सामने रहता है। ऊर्ध्व भाग में पितृलोग निवास करते हैं इसलिए अमावस्या के दिन सूर्य पितरों के ठीक सिर पर रहता है अर्थात् इस दिन उनका मध्याह्न होता है। इसीलिए अमावस्या के मध्याह्न काल में पितरों के लिए श्राद्ध तर्पण आदि किये जाते हैं। पूर्णमासी के दिन इनकी मध्यरात्रि होती है। कृष्ण पक्ष का आधा भाग बीतने पर सूर्य पितरों को उदय होता हुआ देख पड़ता है और शुक्ल पक्ष के आधे भाग तक वह बराबर उनको देख पड़ता है अर्थात् पितरों का प्रातःकाल कृष्ण पक्ष की अष्टमी को होता है और सायंकाल शुक्ल पक्ष की अष्टमी को। ग्रह कक्षा और ग्रह गतियों का सम्बन्ध - उपरिस्थस्य महती कक्षाऽल्पाधः स्थितस्यच । महत्याकक्षया भागा महान्तोऽल्पास्तथल्पया ॥७५॥

भूगोलाध्याय ७६६ कालेनाल्पेन भगणं भुङ्क्तेऽल्प भ्रमणाधितः । ग्रहः कालेन महता मण्डले महति भ्रमन ॥७६॥ स्वल्पयातो बहून भुङ्क्ते भगणांश्छीतदीधितिः । महत्या कक्षया गच्छंस्ततः स्वल्पं शनैश्चरः ॥७७॥ अनुवाद—(७५) जो ग्रह कक्षा ऊपर है अर्थात् पृथ्वी से दूर है उसका परिमाण अधिक है और जो ग्रह कक्षा नीचे है अर्थात् पृथ्वी से निकट है उसका परिमाण कम है । बड़ी कक्षा के अंश बड़े और छोटी कक्षा के अंश छोटे होते हैं । (७६) छोटी कक्षा पर चलने वाले ग्रह अल्प काल में अपना भगण अर्थात् चक्कर पूरा कर लेते हैं और बड़ी कक्षा पर चलने वाले ग्रह अधिक काल में अपना भगण पूरा करते हैं । (७७) चन्द्र कक्षा बहुत छोटी है इसलिए चन्द्रमा अनेक भगण पूरा करता है जब कि शनिश्चर बड़ी कक्षा में होने के कारण थोड़े ही भगण पूरा कर पाता है । विज्ञान-भाष्य—ग्रहों की कक्षाओं और उनकी गतियों के सम्बन्ध में मध्यमाधिकार श्लोक २६, २७ तथा उसके विज्ञान भाष्य पृष्ठ १४-१७ में कुछ बतलाया जा चुका है इसलिए यहाँ अधिक विस्तार की आवश्यकता नहीं है । बड़ी कक्षा के अंश बड़े और छोटी कक्षा के अंश छोटे कैसे होते हैं इसका प्रमाण पृष्ठ १४ के चित्र १ से सहज ही मिल सकता है । बड़े वृत्त का २४ अंश जितना बड़ा है उतना ही छोटे वृत्त का ३६ अंश है अर्थात् बड़े वृत्त का एक अंश छोटे वृत्त के एक अंश से बड़ा है । यह भी स्पष्ट है कि जो ग्रह बड़ी कक्षा में भ्रमण करते हैं उनका भगण काल बड़ा और जो ग्रह छोटी कक्षा में भ्रमण करते हैं उनका भगण काल छोटा होता है । परन्तु ग्रह के भगण काल और उसकी दूरी में ऐसा सरल सम्बन्ध नहीं जैसा कि भारतीय ज्योतिषी समझते थे और जैसा कि इसी अध्याय में आगे बतलाया गया है । यह सम्बन्ध केपलर के तीसरे नियम के अनुसार है जो ग्रह गतियों और उनकी दूरियों के सूक्ष्म विचार से निश्चित किया गया है (देखो पृष्ठ ८४-६१) । दिनपति, मासपति आदि जानने की रीति मन्दादधः क्रमेण स्युश्चतुर्या दिवसाधिपः । वर्षाधिपतयस्तद्वत्तृतीयाश्चे प्रकीर्तिता ॥७८॥ ऊर्ध्वं क्रमेण शशिनो मासानमधिपाः स्मृताः । होरेशा सूर्यतनयादधोधः क्रमशःस्तथा ॥७६॥ अनुवाद - (७८) शनि से नीचे का चौथा ग्रह क्रमानुसार दिनपति और तीसरा ग्रह वर्षपति होता है । (७६) चन्द्रमा से ऊपर के ग्रह क्रमशः मासपति तथा शनि से नीचे ग्रह क्रमशः होरापति होते हैं ।

७७० सूर्य-सिद्धान्त विज्ञान-भाष्य — इन दोनों श्लोकों की पूरी व्याख्या मध्यमाधिकार के पृष्ठ ४०-४५ में की गयी है इसलिये यहाँ अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं है । नक्षत्र कक्षा, आकाश कक्षा तथा ग्रह की गतियों का सम्बन्ध— भवेद्भकक्षा तिग्मांशोर्भ्रमणं षष्टि ताडितम् । सर्वोपरिष्टाद्भ्रमति योजनैस्तैर्भमण्डलम् ॥८०॥ कल्पोक्त चन्द्रभगणा गुणिताः शशिकक्षया । आकाशकक्षा सा ज्ञेया कर व्याप्तिस्तथा रखेः ॥८१॥ सैव यत्कल्पभगणैर्भक्ता तद्भ्रमणं भवेत् । कुवासरैर्विभाज्याह्नः सर्वेषां प्राग्गतिः स्मृता ॥८२॥ भुक्तियोजनजा संख्या सेन्दोर्भ्रमण संगुणा । स्वकक्षाप्तातु सा तस्य तिथ्याप्ता गति लिप्तिकाः ॥८३॥ अनुवाद — (८०) सूर्य-कक्षा के योजनों को ६० से गुणा करने पर नक्षत्र- कक्षा के योजनों का मान आ जाता है। सब ग्रहों से ऊपर नक्षत्र मण्डल इतने ही योजना में घूमता है । (८१) शशिकक्षा के योजनों को एक कल्प के चन्द्र भगणों की संख्या से गुणा करने पर आकाश कक्षा का मान ज्ञात होता है । सूर्य की किरणें वहीं तक जाती हैं । (८२) आकाश कक्षा के मान को जिस ग्रह के कल्प-भगणों की संख्या से भाग दिया जायगा उसी ग्रह की कक्षा का मान योजनों में ज्ञात होगा । आकाश- कक्षा को कल्प के सावन दिनों के भाग देने पर सब गृहों की दैनिकगति योजनों में आ जाती है । (८३) इस योजनात्मक ग्रह गति को चन्द्र-कक्षा से गुणा करके जिस ग्रह की कक्षा से भाग देकर लब्धि को १५ से भाग दें उस ग्रह की दैनिक गति कलाओं में आ जायगी । विज्ञान-भाष्य — इन श्लोकों में जो कुछ बतलाया गया है उसकी चर्चा कई जगह की गयी है (देखो पृ० १५-१७; ४५१-५३) । संक्षेप में इसका सार यह है :— (१) नक्षत्र कक्षा = रवि कक्षा × ६० (२) आकाश कक्षा = कल्प के चन्द्र भगण × चंद्र कक्षा (३) $\frac{आकाशकक्षा}{कल्प में किसी ग्रह की भगण संख्या} =$ उस ग्रह की कक्षा (४) $\frac{आकाश कक्षा}{कल्प के सावन दिन} =$ प्रत्येक ग्रह की दैनिक योजनात्मक गति (५) $\frac{ग्रह की योजनात्मक गति\timesचंद्र कक्षा}{ग्रह कक्षा\times १५} =$ ग्रह की दैनिक कलात्मक गति

भूगोलाध्याय ७७१ दूसरे और तीसरे समीकरण से स्पष्ट है कि आकाश कक्षा का विस्तार उतना माना गया है जितना प्रत्येक ग्रह एक कल्प में योजनों में चलता है । इससे यह सिद्ध है कि हमारे आचार्य प्रत्येक ग्रह की योजनात्मक गति समान समझते थे जो आजकल के वेधों से अशुद्ध है । ग्रह की दैनिक कलात्मक गति जानने का सिद्धान्त वही है जो ४५१-५३ पृष्ठों में अच्छी तरह समझाया गया है । नक्षत्र कक्षा और आकाश कक्षा के विस्तार कल्पित हैं । नक्षत्रों या तारों की दूरी की सीमा नहीं है । आजकल के वेधों से सिद्ध होता है कि कोई-कोई तारे पृथ्वी से इतनी दूर हैं कि उनके प्रकाश के पहुँचने में लाखों वर्ष लग जाते हैं । ग्रह की दूरी जानने की रीति कक्ष्या भूर्कणगुणिता महीमण्डलभाजिता । तत्कर्णा भूमिकर्णस्त्यु ग्रहोच्चे स्वे दलीकृताः ।।८४।। अनुवाद—किसी ग्रह की कक्षा को भूव्यास से गुणा करने और भूपरिधि से भाग देने पर उस ग्रह की कक्षा का व्यास होता है । इससे भूव्यास घटा कर शेष का आधा करने से भू-पृष्ठ से उस ग्रह की ऊँचाई अथवा दूरी ज्ञात होती है । विज्ञान-भाष्य—परिधि से व्यास जानने का यह एक नियम है । भूव्यास का भू-परिधि से जो सम्बन्ध है वही सम्बन्ध है वही सम्बन्ध प्रत्येक ग्रह की कक्षा के व्यास और परिधि में होता है । इस श्लोक के पूर्वार्ध का सरल अर्थ यह है कि ग्रह की कक्षा को ३.१४१६ से भाग देने पर उसकी कक्षा का व्यास आ जाता है । श्लोक के उत्तरार्ध में जो बात बतलायी गयी है वह पृष्ठ ४०८ के चित्र ७८ से स्पष्ट हो जाती है । इस चित्र में यदि भ द रेखा को द की ओर इतना बढ़ाया जाय कि वह चन्द्र कक्षा और सूर्य कक्षा तक पहुँच जाय तो द से चन्द्र कक्षा के बिन्दु की दूरी को चन्द्रमा की ऊंचाई और सूर्य कक्षा के बिन्दु की दूरी को सूर्य की ऊँचाई समझनी चाहिये । इसी तरह अन्य ग्रहों की ऊँचाई के बारे में भी समझना चाहिये । ग्रह कक्षाओं के विस्तार योजनों में खत्रयाब्धिद्विवह्नयः कक्ष्या तुहिनदीधितेः । ज्ञशीघ्रस्याष्टखद्वित्रिकशून्येन्यवस्तथा ।।८५।। शुक्रशीघ्रस्य सप्ताग्नि रसाब्धि रसषड्यमाः । ततोऽर्कबुधशुक्राणां खखाथे कसुरार्णवाः ।।८६।। कुजस्यातोऽष्टशून्याङ्कषड्वेदैकभुजङ्गमाः । चन्द्रोच्चस्य रसार्थाष्टमुनिद्वित्यष्टहस्तयः ।।८७। कृतर्तुमुनिपञ्चाद्रिगुणेन्दुविषया गुरोः । स्वर्भानोर्दन्ततत्वाब्धिशंलाथाकाशकुञ्जराः ।।८८।।

[हस्तलिखित टिप्पणियाँ / Margin Notes]

  • Left Top: Compared to moon Sukra 8.2242 Buda 3.2198 Mangala 25.1448 Guru 158.5672 Sani 394.0378 Sun 13.3688
  • Right Top: Compared to Sun

७७२ | सूर्य-सिद्धान्त

पञ्चपञ्चाश्विनागर्तुं रसाद्र्यर्काश्विनेस्ततः । भानां खखखशून्याङ्कवसुरन्ध्रशराश्विनः ॥८६॥ खव्योमखत्रयखसागरषट्कनाग- व्योमाष्टशून्ययमरूपनगाष्टचन्द्राः । ब्रह्माण्डसंपुटपरिक्रमणं समन्ता- दभ्यन्तरा दिनकरस्य कर प्रसाराः ॥६०॥

अनुवाद—(८५) चन्द्रमा की कक्षा ३२४००० योजन, बुध शीघ्र की कक्षा १०४३२०६ योजन; (८६) शुक्र शीघ्र की कक्षा २६६४६३७ योजन, सूर्य, बुध और शुक्र की कक्षाएँ ४३३१५००; (८७) मङ्गल की कक्षा ८१४६६०६ योजन, चन्द्रोच्च की कक्षा ३८३२८४८४ योजन; (८८) गुरु की कक्षा ५१३७५७६४ योजन; राहु की कक्षा ८०५७२८६४ योजन; (८६) शनि की कक्षा १२७६६८२५५ योजन; नक्षत्र कक्षा २५६८६००१२ योजन और (६०) आकाश या ब्रह्माण्ड की परिधि १८,७१,२०- ,८०,८६,४०,००,००० योजन है जहाँ तक सूर्य की किरणों का प्रसार होता है ।

**विज्ञान-भाष्य—**यदि ग्रहों के कल्प-भगण मध्यमाधिकार के श्लोक २६-३३ के अनुसार मान कर इनकी कक्षाओं की गणना श्लोक ८२ के अनुसार की जाय तो ऊपर दी हुई संख्याओं की इकाई के अंक में थोड़ा सा अन्तर पड़ता है इसका कारण यह जान पड़ता है कि पूरी संख्या लिखने के लिए भिन्नात्मक अंश या तो छोड़ दिया गया है या आधे से अधिक होने के कारण १ मान लिया गया है। ऐसा जान पड़ता है कि चन्द्रोच्च और राहु की कक्षाएँ नियम की समानता दिखलाने के लिए दी गयी हैं क्योंकि ये आकाश में स्वतन्त्र पिंड नहीं हैं, ये तो चन्द्र कक्षा के ही दो विशेष बिन्दु हैं । नक्षत्र कक्षा का भी विशेष महत्व नहीं जान पड़ता ।

आजकल वेधों से यह सिद्ध होता है कि ग्रहों की कक्षाएँ गोल नहीं हैं वरन् दीर्घवृत्त हैं जिनकी एक नाभि पर सूर्य रहता है और सब ग्रह सूर्य की ही परिक्रमा करते हैं । पृथ्वी से किसी ग्रह की दूरी सर्वदा समान नहीं रहती जैसा कि ४१० पृष्ठ के लम्बनों की सारणी से तथा पृष्ठ ५६८ में दिये हुए शीघ्र कर्णों की सारणी से स्पष्ट है। इन शीघ्र कर्णों के मान ऐसी इकाइयों में दिये हुए हैं जिनकी १००० इकाई पृथ्वी से सूर्य की मध्यम दूरी मानी गयी है। ऐसी १००० इकाइयां ६२६००००० मील (६ करोड़ २६ लाख मील) के समान होती हैं क्योंकि पृथ्वी से सूर्य की मध्यम दूरी इतनी ही है (देखो पृष्ठ ४५२) । यदि यह दूरी योजनों में जानना हो तो मीलों को ५ से भाग दे देना चाहिए (देखो पृ० ५४) ।

इस प्रकार भूगोलाध्याय नामक १२वें अध्याय का विज्ञान-भाष्य समाप्त हुआ ।

त्रयोदश अध्याय ज्योतिषोपनिषदध्याय (संक्षिप्त वर्णन) [श्लोक १-३—भूमगोल की रचना का उपदेश कैसे करना चाहिये। श्लोक ३-१३ भूभगोल बनाने की रीति। श्लोक १३-१५—लग्न, अन्त्या आदि के स्थान निश्चय करना। श्लोक १६-१७—भूमगोल किस प्रकार अपने आप घूम सकता है। श्लोक १८-२४—समय बतलानेवाले अन्य यन्त्रों की चर्चा। श्लोक २५—ज्योतिष का माहात्म्य।] भूभगोल बनाने की तैयारी— अथ गुप्ते शुचौ देशे स्नातश्शुचिरलङ्कृतः । संपूज्य भास्करं भक्त्या ग्रहान्भान्यथ गुह्यकान् ॥१॥ पारंपर्योपदेशेन यथा ज्ञातं गुरोर्मुखात् । आचार्यः शिष्यबोधार्थं सर्वं प्रत्यक्षदर्शिवान् ॥२॥ भूभगोलकस्य रचनां कुर्यादाश्चर्यकारिणीम् । अनुवाद—तब आचार्य स्नान करने के बाद अलंकार धारण करके शुद्ध मन से एकान्त और पवित्र स्थान में सूर्य, ग्रहों, नक्षत्रों और यक्षों की भक्ति के साथ पूजा करके परम्परा से प्राप्त उपदेश के द्वारा गुरु के मुख से सुने हुए और स्वयं प्रत्यक्ष देखे हुए ज्ञान से शिष्य को पूरी तरह समझाने के लिये भूभगोल की आश्चर्य उत्पन्न करनेवाली रचना करे। विज्ञान-भाष्य—कई टीकाकारों ने आचार्य का अर्थ सूर्यांश पुरुष और शिष्य का अर्थ मयासुर किया है; परन्तु मेरी समझ में यह सभी आचार्यों के लिये साधारण उपदेश है। 'कुर्यात्' शब्द भी यही प्रकट करता है। इन श्लोकों से प्रकट होता है कि आचार्य को केवल मौखिक उपदेश से ही सन्तुष्ट नहीं होना चाहिये वरन् व्यावहारिक और क्रियात्मक ज्ञान भी कराना चाहिये जिसके लिये उसे स्वयं व्यावहारिक ज्ञान भी रखना चाहिये और ज्ञान को प्रत्यक्ष देनेवाला भी होना चाहिये, ऐसा नहीं कि टीका कर डालें सूर्य सिद्धांत ऐसे गूढ़ ग्रन्थ की, परन्तु आकाश के मुख्य- मुख्य तारों की भी पहचान न हो। ग्रहों की पूजा में सूर्य की पूजा भी आ जाती है परन्तु यहाँ ग्रहों के साथ सूर्य शब्द अलग भी आया है जो सूचित करता है कि सूर्य की विशेष प्रकार से

७७४ सूर्य-सिद्धान्त पूजा करनी चाहिये क्योंकि इस सिद्धांत के आदि आचार्य सूर्यदेव ही माने गये हैं। ग्रहों की आधुनिक परिभाषा में सूर्य आते भी नहीं हैं परन्तु सूर्य-सिद्धांतकार ने इस विचार से सूर्य का नाम अलग नहीं दिया है क्योंकि और कहीं यह मत नहीं प्रकट होता । यक्ष लोग धन के देवता कुबेर के सेवक हैं, उनके कोष और बाग की रखवाली करते हैं। यह शायद शिल्पकला में भी निपुण माने गये हैं क्योंकि पुष्पक विमान कुबेर का ही था । इसलिये यन्त्र रचना के अर्थ में दैवी सहायता प्राप्त करने के लिये इनकी भी पूजा करने का आदेश है। भूभगोल शब्द भू, भ और गोल तीन शब्दों से बना है इसलिये इसका अर्थ है ऐसा गोल जिसमें भूगोल के साथ आकाश का वह गोल हो जिसमें ग्रह नक्षत्र आदि घूमते हुए माने गये हैं । भूभगोल बनाने की रीति— अभीष्टं पृथिवीगोलं कारयित्वा तु दारवम् ॥३॥ दण्डं तन्मध्यगं मेरोरुभयत्र विनिर्गतम् । आधारकक्षाद्वितयं कक्ष्यां वैषुवतीं तथा ॥४॥ भगणांशाङ्गुलैः कार्या दलितास्तिस्र एव ताः । स्वाहोरात्रार्धकर्णैश्च तत्प्रमाणानुपाततः ॥५॥ क्रान्तिविक्षेपभागैश्च दलिता दक्षिणोत्तरा । स्वैःस्वैरपक्रमैः कार्या मेषादीनामपक्रमात् ॥६॥ कक्ष्याः प्रकल्पयेत्ताश्च कर्क्यादीनां विपर्ययात् । तद्वत्तिस्रस्तुलादीनां मृगादीनां विलोमतः ॥७॥ याम्यगोलाश्रिताः कुर्यात् कक्ष्याधारद्वयोपरि । याम्योदग्भागसंस्थानां भानामभिजितस्तथा ॥८॥ सप्तर्षीणामगस्त्यस्य ब्रह्मादीनां प्रकल्पयेत् । मध्ये वैषुवती कक्ष्या सर्वासामेव संस्थिता ॥९॥ तदाधारयुतेः भार्धमयने विषुवद्वये । विषुवत्स्थानतो भागैः स्फुटैर्भगणसञ्चरात् ॥१०॥ क्षेत्राण्येवमजादीनां तिर्यग्ज्याभिः प्रकल्पयेत् । अयनादयनं चैव कक्ष्या तिर्यक्तथाऽपरा ॥११॥ क्रान्तिसंज्ञा तया सूर्यः सदा पर्यति भासयन् । चन्द्राद्याश्च स्वकैः पातैरपमण्डलमाश्रितैः ॥१२॥ ततोऽपकृष्टा दृश्यन्ते विक्षेपाग्रे ऽवपक्रमात् ।

ज्योतिषोपनिषदध्याय ७७५ अनुवाद—(३) लकड़ी का अभीष्ट आकार का एक गोला (भूगोल) बनाकर (४) इसमें छेद करके एक सीधा डंडा कस देना चाहिए जो भूगोल के केन्द्र से होकर दोनों ओर बराबर निकला रहे और मेरु दंड का काम करे । इसी दंड में दो आधार- वृत्त (एक दूसरे से समकोण पर) स्थिर करो जिनके बीचोबीच विषुवद्वृत्त हो । (५) इन तीनों वृत्तों को अंगुल से ३६० अंशों में बाँट दो । विषुवद्वृत्त के माना- नुसार अहोरात्र वृत्त के व्यासार्ध से (६) दक्षिणोत्तर वृत्त पर क्रान्ति और शर के अंशों के द्वारा जो इस पर अंकित हों मेष, वृष और मिथुन राशियों के अंतिम विन्दुओं की क्रान्तियों के अंतर पर इन तीन राशियों के (७) अहोरात्र वृत्त स्थिर करो जो विलोम रीति से कर्क, सिंह और कन्या के अहोरात्र वृत्त भी होंगे । इसी प्रकार तुला, वृश्चिक और धनु तथा विलोम रीति से मकर, कुम्भ और मीन राशियों के भी तीन अहोरात्र वृत्त (८) दोनों आधार वृत्तों के ऊपर दक्षिण गोल में स्थिर करो। ऐसे ही उत्तर और दक्षिण गोलों में स्थित नक्षत्रों, अभिजित (९) सप्तर्षि, अगस्त्य, ब्रह्महृदय आदि तारों के अहोरात्र वृत्त स्थिर करो । इन सब अहोरात्र वृत्तों के बीच में विषुवद्वृत्त होता है। (१०) विषुवद्वृत्त और दोनों आधारवृत्तों के युतिबिन्दुओं पर दोनों अयन बिन्दु और दोनों विषुव सम्पात होते हैं । विषुव सम्पात के स्थान से सायन राशि चक्र का आरम्भ करो । (११) इस प्रकार मेष वृष आदि राशियों के विभाग तिर्यक ज्याओं द्वारा करो । एक अयन विन्दु से दूसरे अयन विन्दु तक तथा दूसरे से फिर पहले तक जो तिर्यकवृत्त स्थिर किया जायगा (२) उसी का नाम क्रान्तिवृत्त है जिस पर सूर्य सदा प्रकाश देता हुआ भ्रमण करता है । चन्द्र, मंगल आदि ग्रह अपने अपने पातों के द्वारा जो क्रान्तिवृत्त पर होते हैं (१३) खिंचे हुए अपनी अपनी क्रान्ति से विक्षेप के अंत में देख पड़ते हैं । विज्ञान-भाष्य — यहाँ यह नहीं बतलाया गया है कि आधार कक्षा और विषुवत् कक्षा किस चीज का बनाना चाहिये । अन्य ग्रन्थों में बाँस की पतली-पतली तीलियों का प्रयोग किया गया है क्योंकि यही इतनी लचीली होती हैं कि गोलाई में मोड़ी जा सकती हैं । आजकल लोहे या पीतल के तार से यह काम आसानी से हो सकता है । ऊपर बतलायी हुई रीति से जो भूभगोल बनता है वह अनेक वृत्तों (वलयों) के कारण बहुत ही दुर्बोध हो जाता है इसलिये आजकल यदि चित्र १३६ के अनुसार भूभगोल बनाया जाय तो बनाने में भी सुगमता होगी और समझने में भी । इस चित्र के बीच में जो सबसे छोटा वृत्त है वह भूगोल ( पृथ्वी-गोल ) को सूचित करता है, इसीलिये बीच में 'भू' लिखा है । 'धधा' दंड है जो पृथ्वी-गोल के केन्द्र से होकर इसके दोनों ओर निकला रहता है । भू से ध और धा की दूरी समान है । इन्हीं स्थानों से दो आधारवृत्त 'धशधाव' और 'धपधापू' एक दूसरे से समकोण

७७६ सूर्य-सिद्धान्त

चित्र १३६

पर बाँधे जाते हैं। इन्हीं दोनों वृत्तों पर ध और धा से समान अन्तर पर 'प व पू श' वृत्त बाँधा जाता है जिसे विषुवत् कक्षा कहा गया है। इन तीनों वृत्तों को ३६० समान भागों में बाँट कर चिह्न बना देते हैं जो अंश कहलाते हैं। इसके बाद मेषादि बारह राशियों के अहोरात्रवृत्त बनाने का आदेश है। परन्तु मेरी समझ में यह आवश्यक नहीं है। ऊपर के तीन वृत्त बाँधने के बाद सीधे क्रान्ति-वृत्त को ही बाँधना सुगम होगा। यह भी ऊपर के किसी वृत्त के समान लेना चाहिए। इसे पहले व और श स्थानों पर विषुवद्वृत्त और धशधाव आधारवृत्त के जोड़ पर बाँधना चाहिये फिर दूसरे आधारवृत्त 'क' और 'म' स्थानों पर बाँधना चाहिये । 'क' या 'म' का अन्तर विषुवद् वृत्त से उतना ही होना चाहिये जितनी सूर्य का परमक्रान्ति होती है जो आजकल साढ़े तेईस अंश (२३° ३०') के लगभग है। इस क्रान्तिवृत्त को भी ३६० समान भागों में बाँट देना चाहिये । 'व' स्थान को सायनमेष या वसंत सम्पात तथा 'श' स्थान को सायनतुला या शरद सम्पात कहते हैं। 'क' और 'म' स्थानों को क्रम से सायन कर्क और सायन तुला अथवा दक्षिणायन और उत्तरायण विन्दु कहते हैं (देखो पृ० २३०)। इन स्थानों के विचार से 'ध श धा व' आधार कक्षा को विषुवसम्पातवृत्त (Equinoctial Colure) और 'ध प म धा पू क' आधार कक्षा को अयनवृत्त (Solstitial Colure) कहते हैं, क्योंकि पहले पर दोनों विषुव-सम्पात विन्दु और दूसरे पर दोनों अयन विन्दु होते हैं। चित्र में क्रान्ति वृत्त के 'अ' स्थान पर विषुवद् वृत के समानान्तर एक अहोरात्र वृत्त 'अ इ आई' दिखलाया गया है। यह क्रान्तिवृत्त के दूसरे स्थान 'आ' पर मिलता है । 'अ' विन्दु वसंत-सम्पात 'व' से जितने अंतर पर है उतने ही अंतर पर परन्तु

ज्योतिषोपनिषदध्याय ७७७ विलोम दिशा में शरद सम्पात 'श' से 'आ' का स्थान है अथवा 'क' से 'अ' और 'आ' समान दूरी पर हैं । यदि 'अ' सायन वृष राशि के आदि में हो तो 'आ' सायन कन्या राशि के आदि में होगा और यदि पहला सायन मिथुन राशि के आदि में हो तो दूसरा सायन सिंह राशि के आदि में होगा । इसी प्रकार क्रान्ति-वृत्त के किसी स्थान का अहोरात्र वृत्त बांधा जा सकता है । यही बात श्लोक ६-७ में बतलायी गयी है । इसके सिवा 'धा' स्थान के पास एक अहोरात्र वृत्त समझा जा सकता है । १२वें श्लोक में चन्द्रमा, मंगल आदि ग्रहों के कक्षा वृत्तों की भी चर्चा है परन्तु चित्र में ऐसा कोई भी कक्षा वृत्त नहीं दिखलाया गया है । ऐसा कक्षा वृत्त बांधने के लिये पहले ग्रह का पात-बिन्दु क्रान्ति-वृत्त पर स्थिर करना चाहिये । इसी पर उस ग्रह का कक्षा वृत्त बांधना चाहिये जिसका दूसरा जोड़ इस स्थान से १८० अंश पर क्रान्ति-वृत्त पर हो । यह दोनों स्थान ग्रह के पात स्थान हुए । फिर इस वृत्त को ६० अंश के अंतर पर क्रान्ति-वृत्त से उस ग्रह के परम विक्षेप के बराबर उत्तर और दक्षिण स्थानों पर भी बांध देना चाहिये (परम विक्षेप की चर्चा मध्यमाधिकार के पृ० ७४-७६ में की गयी है ) । उदयलग्न, मध्यलग्न, अन्त्या, चरज्या आदि का निश्चय— उदयं क्षितिजे लग्नदस्तं गच्छति तद्वशात् ।।१३।। लङ्कोदयैस्तथा सिद्धं खमध्योपरि मध्यगम् । मध्यक्षितिजयोर्मध्ये या ज्या साऽन्त्याऽभिधीयते ।।१४।। ज्ञेया चरदलज्या च विषुवत्क्षितिजान्तरम् । कृत्वोपरि स्वकं स्थानं मध्ये क्षितिजमण्डलम् ।।१५।। अनुवाद—(१३) क्रान्ति वृत्त का जो बिन्दु पूर्व क्षितिज में लगा रहता है वह उदय लग्न है। इस उदय लग्न के अनुसार क्रान्ति वृत्त का जो बिन्दु पच्छिम क्षितिज में लगा रहता है वह अस्त लग्न होता है । (१४) यामोत्तर वृत्त पर मध्यम लग्न होता है जिसकी गणना लंका के उदयासुओं से की जाती है । अहोरात्र वृत्त और यामोत्तर वृत्त के संधिस्थान से क्षितिज वृत्त तक जो ज्या होती है उसे अन्त्या कहते हैं । (१५) विषुवत् रेखा के क्षितिज जिसे उन्मण्डल कहते हैं और अपने स्थान के क्षितिज के बीच जो अन्तर होता है वह चरज्या है । भूगोल पर अपने स्थान को सबसे ऊपर करने पर क्षितिज वृत्त भूगोल के मध्य में होता है । विज्ञान-भाष्य—इन श्लोकों में एक ही शब्द कई परिभाषाओं के लिए प्रयुक्त हुआ है इसलिये इनका भाव जल्दी समझ में नहीं आता । १२वें श्लोक के पूर्वार्ध में 'मध्यम' मध्य लग्न के लिये आया है । उत्तरार्ध में 'मध्य' शब्द अहोरात्र २२

७७८ सूर्य-सिद्धान्त वृत्त और यामोत्तर वृत्त की सन्धि स्थान के लिये आया है। १५वें श्लोक के पूर्वार्ध में 'विषुवत्' विषवक्षितिज या उन्मण्डल के लिये तथा क्षितिज शब्द अपने स्थान के क्षितिज वृत्त के लिये प्रयुक्त हुआ है। इसके उत्तरार्ध में 'मध्ये' शब्द अपने स्थान के ऊर्ध्वाधर यामोत्तर वृत्त के मध्य के लिये आया है। इस प्रकार का प्रयोग बड़ा ही भ्रमोत्पादक होता है और वैज्ञानिक ग्रंथों के लिये दोष समझा जाता है । यह सब परिभाषाएँ त्रिप्रश्नाधिकार के २८६-६० पृष्ठों पर तथा स्पष्टा- धिकार के चित्र ३६, ४२, ४३ और त्रिप्रश्नाधिकार के चित्र ६३ से अच्छी तरह समझी जा सकती है। उपर्युक्त विवरण से भूभगोल यंत्र से इन सब परिभाषाओं का ज्ञान सहज ही हो सकता है । युक्ति जिससे भूभगोल यंत्र सदा घूमता रहे— वस्त्रच्छन्नं बहिश्चापि लोकालोकेन वेष्टितम् । अमृतस्रावयोगेन कालभ्रमणसाधनम् ॥१६॥ गुणबोजसमाकृष्टं गोलयंत्रं प्रकल्पयेत् । गोप्यमेतन्नकाशयोक्तं सर्वगम्यं भवेद्यतः ॥१७॥ अनुवाद—(१६) लोकालोक से अर्थात् क्षितिजवृत्त से घिरे हुए गोल को ऊपर कपड़े से ढक कर जल प्रवाह के द्वारा ऐसा प्रबन्ध करे कि यह अपने आप घूम- कर नाक्षत्रकाल सूचित करे । (१७) अथवा इस गोल यंत्र को पारे के संयोग से ऐसा बनावे कि वह अपने आप घूमे । इसको गुप्त रखना चाहिये । साफ-साफ बतला देने से इस संसार में यह सबको मालूम हो जायगा । विज्ञान-भाष्य—इन दोनों श्लोकों की भाषा बहुत ही अस्पष्ट है। इस बात का तनिक भी बोध नहीं होता कि यह गोलयंत्र किस प्रकार अपने आप घूमकर आकाश का प्रकार दैनिक भ्रमण सिद्ध करता था । इतना तो प्रकट है कि गोलयंत्र का मेरुदण्ड इस प्रकार स्थिर किया जाता था कि वह ध्रुव की ओर रहे । फिर उसमें ऐसी युक्ति की जाती होगी कि जल की धारा से उसमें ऐसी टक्कर लगे कि एक नाक्षत्र दिन में वह एक बार घूम जाय जैसे पनचक्की चलती है। पानी की जगह पारे से भी काम लिया जाता था परन्तु यह पता नहीं कि कैसे । अंत में यह बतलाया गया है कि यह युक्ति सबसे नहीं बतलानी चाहिये । शायद इसीलिये संकेत मात्रकर दिया गया है। इससे लोग यह परिणाम निकाल सकते हैं कि लेखक स्वयं इस क्रिया को अच्छी तरह नहीं जानता था । उसको केवल आभास था कि ऐसा यन्त्र बन सकता है जो अपने आप चलता हो, इसीलिये उसने सब बातें गोल रखी हैं । यह भी संभव है कि प्राचीन काल में शिल्पकला की इतनी उन्नति थी कि ऐसे स्वयंवह यंत्र पारे और पानी के संयोग

ज्योतिषोपनिषदध्याय ७७६ से उसी प्रकार बनते थे कि जैसे आजकल घड़ी आदि अपने आप चलने वाले यन्त्र बनते हैं, परन्तु बीच में समय के फेर से सब ज्ञान नष्ट हो गया हो । तस्माद्गुरूपदेशेन रचयेद्गोलमुत्तमम् । युगे युगे समुत्पन्ना रचनेयं विवस्वतः ॥१८॥ प्रसादात्कस्यचिद्भूयः प्रादुर्भवति कालतः । कालसंसाधनार्थाय तथा यन्त्राणि कारयेत् ॥१९॥ एकाकी योजयेद्बीजं यन्त्रे विस्मयकारणम् । अनुवाद—(१८) इसलिये गुरु के उपदेश के अनुसार उत्तम गोल की रचना करनी चाहिये । यह रचना प्रत्येक युग में नष्ट हो जाती है और सूर्य भगवान की (१९) इच्छानुसार उनके प्रसाद से फिर किसी को प्राप्त होती है । इसी प्रकार समय का ज्ञान करने के लिये अन्य यन्त्रों की भी रचना करनी चाहिये । (२०) आश्चर्य उत्पन्न करनेवाले यंत्र में (उसको चलाने के लिये) पारे का प्रयोग एकान्त में करना चाहिये । विज्ञान-भाष्य—इन श्लोकों से प्रकट होता है कि स्वयंवह यंत्र बनाने की क्रिया काल पाने पर नष्ट हो जाती है, जिसको फिर सूर्य भगवान् अपनी इच्छा से किसी को बतला देते हैं । इसके सिवा समय बतलानेवाले अन्य यंत्रों को बनाने के लिये भी कहा गया है और अंत में फिर बतलाया गया है कि पारे का प्रयोग एकान्त में करना चाहिये, सबको नहीं बतलाना चाहिये । समय बतलानेवाले अन्य यन्त्रों के नाम— शङ्कुयष्टिधनुश्चक्रैश्छाया यन्त्रैरनेकधा ॥२०॥ गुरूपदेशाद्विज्ञाय कालज्ञानमतन्द्रितः । तोययन्त्रैः कपालाद्यैर्मयूरनरवानरैः । सूत्रैश्च वेणुगर्भस्थैः सम्यक्कार्ल प्रसाधयेत् ॥२१॥ पारतालाबुसूत्राणि गुञ्जातैलजलानि च । बीजानि पांसवश्चैवां प्रयोगास्ते सुदुर्लभाः ॥२२॥ अनुवाद—(२०) शंकु, यष्टि, धनु और चक्र नामक अनेक प्रकार के छाया यंत्रों के द्वारा (२१) चतुर और परिश्रमी मनुष्य गुरु के उपदेश से काल का ज्ञान प्राप्त करते हैं । कपाल आदि जल यंत्रों से, मयूर, नर और वानर यंत्रों से जिनके पेट में बालू रहती है जो सूत के सहारे निकलती है समय का ठीक-ठीक ज्ञान प्राप्त

७८० सूर्य-सिद्धान्त करना चाहिये । (२२) पारे का आरा, जल, सूत, शुल्ब, तेल और जल, पारा और बालू इन सबका प्रयोग करना चाहिये । परन्तु यह भी कठिन है। विज्ञान-भाष्य- इन श्लोकों में समय जानने के अनेक यंत्रों के नाम गिना दिये गये हैं परन्तु उनके बनाने की विधि कहीं नहीं बतलायी गयी है। पहले चार यंत्रों से सूर्य की छाया देखकर समय जाना जा सकता है इसलिये वे दिन में ही काम कर सकते हैं और उनको छाया यंत्र कहा गया है। इनमें से शंकु की चर्चा त्रिप्रश्नाधिकार नामक तीसरे अध्याय में बहुत हुई है। उस अध्याय मे यह बतलाया गया है कि १२ अंगुल के शंकु से अक्षांश, नतांश, नतकाल, दिशा आदि का ज्ञान कैसे किया जाता है। इसके द्वारा समय जानने के लिये गुणा भाग की क्लिष्ट क्रिया करनी पड़ती है, सीधे समय नहीं निकलता। छाया की नाप भी बहुत शुद्ध नहीं ली जा सकती इसलिये इस यंत्र से जो समय आता है वह चार पाँच मिनट अधिक या कम हो सकता है। इसलिये आजकल इससे काम लेने की जरूरत नहीं। यष्टि यंत्र - इसकी चर्चा इस पुस्तक में और कहीं नहीं की गई है इसलिये यह नहीं बतलाया जा सकता कि इससे कैसे काम लिया जाता था। भास्कराचार्य जी ने सिद्धान्त शिरोमणि के यंत्राध्याय में इसकी विशेष चर्चा की है जिससे जान पड़ता है कि इससे भी समय का ज्ञान करने के लिये क्लिष्ट गणना करनी पड़ती है। इस- लिये आजकल अच्छे साधनों के होते हुए यह यंत्र भी आवश्यक नहीं है। धनुष और चक्र-यंत्र से समय का ज्ञान सहज ही हो सकता है। यह दोनों यंत्र वास्तव में एक ही हैं। चक्र-यंत्र में एक गोल चक्र होता है जिसके किनारे समान भागों में अंकित रहते हैं। यदि ६० समान भाग हों तो प्रत्येक भाग एक घड़ी का समय सूचित करता है। इस चक्र के केन्द्र से एक सीधी कीली लोहे या पीतल की कस दी जाय और चक्र पृथ्वी पर दो खंभों में इस प्रकार गाड़ दिया जाय कि कीली का सिर आकाश के ध्रुव की दिशा में हो तो इस यन्त्र से सूर्य का नतकाल (Hour Angle) सहज ही जाना जा सकता है। दिल्ली और काशी आदि के मान-मन्दिरों में पत्थर के वृहदाकार चक्र यन्त्र बने हैं जो पृथ्वी पर इस प्रकार स्थिर किये गये हैं कि इनके तल विषुवद्वृत्त के समानान्तर हैं और इनके केन्द्र से एक कीली दोनों ओर ६ इंच के लगभग निकली हुई ध्रुवों की दिशा में है। इस चक्र-यंत्र के दोनों तरफ़ के किनारे सम भागों में अंकित हैं। जब सूर्य उत्तर गोल में रहता है (सायनमेष संक्रान्ति से सायन तुला संक्रान्ति तक) तब कील की छाया यंत्र के उत्तरी तल पर पड़कर नत काल बतलाती है और जब सूर्य दक्षिण गोल में रहता है तब कीली की छाया दखिनी तल पर पड़ती है और नतकाल सूचित करती है। जैसे-जैसे सूरज ऊपर उठता है छाया

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नीचे होती जाती है । मध्याह्नकाल में कील की छाया ठीक नीचे हो जाती है । यदि चाहें तो इसके किनारे घंटों में भी अंकित हो सकते हैं। यह भी एक प्रकार की धूप-घड़ी है । भास्कराचार्य जी ने एक दूसरे प्रकार का चक्र-यंत्र बतलाया है। यह भी चक्राकार होता है परन्तु यह स्थिर नहीं किया जाता । किनारे से कुछ दूर एक छेद होता है जिसमें एक जंजीर लगी रहती है । इसी जंजीर से यह लटकाया जा सकता है । इसके किनारे ३६० अंशों में अंकित रहते हैं। लटकने पर इसका केन्द्र छेद के ठीक नीचे रहता है। इन दोनों बिन्दुओं के मिलाने वाली रेखा से समकोण पर जो रेखा होती है, और जो चक्र के केन्द्र पर भी रहती है उसके एक किनारे शून्य का अंक रहता है और दूसरे किनारे १८० का । जब समय जानना हो इसको लटकाकर ऐसा घुमाओ कि इसके केन्द्र पर जड़ी हुई कीली की नोक की छाया किनारे के भागों पर पड़े । यदि इसके किनारे सायन राशियों के इष्ट स्थान के उदयमानों में भी विभाजित हों तो इससे लग्न का ज्ञान भी किया जा सकता है। आजकल के सूक्ष्म यंत्रों के सामने इस यंत्र से भी विशेष लाभ नहीं है । चाप या धनुष यन्त्र—यदि चक्र-यन्त्र का आधा भाग लेकर यंत्र बताया जाय तो सूर्य का नतकाल उसी प्रकार जाना जा सकता है । आजकल दिन में सूर्य का किसी समय का नतांश एक साधारण चापयंत्र से जो कार्ड-बोर्ड का बनाया जा सकता है सहज ही जाना जा सकता है और उससे नतकाल का ज्ञान भी हो सकता है। ऐसे यंत्र की चर्चा इस लेखक ने विज्ञान भाग ४३ संख्या १ पृष्ठ १८ में चित्र १३८ में की है। उसमें कई सारणियां भी दी गयी हैं जिनसे २८ अक्षांश से २२ अक्षांश तक के स्थानों में दिन में समय जाना जा सकता है। इस यंत्र से सूर्य की छाया के अनुसार समय जाना जाता है और चार-पांच मिनट से अधिक अंतर नहीं पड़ता । इस लेखक की घड़ी जब कभी बन्द हो जाती है या ठीक समय नहीं देती तब वह इसी से मिला लेता है। इस यंत्र से किसी स्थान का अक्षांश भी सहज ही जाना जा सकता है। यह सारणी त्रिप्रश्नाधिकार के पृष्ठ २६१ के गुर (१) के अनुसार तैयार की गयी है । इससे काम लेने की संक्षिप्त रीति इस अध्याय के अंत में दी गयी है जहाँ, एक धूप-घड़ी की भी चर्चा की जायगी । इन छाया-यन्त्रों के सिवा जल-घड़ी और बालू-घड़ी आदि से भी काम लिया जाता था। जल-घड़ी को कपाल यंत्र कहते थे क्योंकि यह कपाल की तरह अर्द्ध- गोलाकार होती थी इसके पेंदे में एक छोटा सा छेद होता है। यदि यह पानी में तैरा दिया जाय तो छेद से पानी धीरे-धीरे कटोरे में भरने लगता है और इतना भर जाता है कि कटोरा डूब जाता है। इस कटोरे का और छेद का आकार ऐसा होता

७८२ सूर्य-सिद्धान्त था कि दिन रात में ६० बार डूब जाता था । जितनी देर में वह एक बार डूबता था उसे घड़ी कहते थे । वह इसीलिये इसका नाम घटीयंत्र हो गया जो आगे चलकर घड़ी के नाम से प्रसिद्ध हो गया । प्राचीनकाल में घटीयंत्र बनाने के लिये ऐसे नियम बन गये थे जिनसे स्पष्ट बोध होता था कि कपाल या कटोरा कितना बड़ा हो और छेद कैसा हो। इसका विशेष वर्णन २३वें श्लोक के विज्ञान-भाष्य में किया जायगा । मयूर और बानर यंत्रों के विषय में विस्तारपूर्वक कहीं नहीं लिखा गया है । यह शायद मोर, और वानर के आकार के यंत्र बनाये जाते होंगे जिनमें सूत और बालू के सहारे समय का ज्ञान किया जाता रहा होगा । इन यंत्रों में पारा, तेल, जल आदि के द्वारा ऐसी युक्ति की जाती थी कि वे स्वयम् चलें और समय का ज्ञान करावें परन्तु इस बात का स्पष्ट वर्णन नहीं है कि वह किस प्रकार बनाये जाते थे, केवल इतना ही संकेत है कि इनका प्रयोग बड़ा दुर्लभ है । पता नहीं कि ऐसे स्वयंवह यंत्र यथार्थ में बनाये गये थे या केवल कल्पना में ही थे । आज कल तो अपने आप चलने वाली तरह तरह की घड़ियां सभी काम में ला सकते हैं परन्तु उनका सिद्धांत बतलाने की यहाँ आवश्यकता नहीं जा पड़ती । कपाल यन्त्र — ताम्रपात्रमधश्छिद्रं न्यस्तं कुम्भेऽमलाम्भसि । षष्टिर्मज्जत्यहोरात्रे स्फुटं यन्त्रं कपालकम् ।।२३।। अनुवाद—ताम्बे का कटोरा जिसके पेंदे में छेद हो निर्मल जल के कुंड में रखने से दिन रात में ६० बार डूबे तो वह शुद्ध कपाल यन्त्र होता है । विज्ञान भाष्य—ऐसे कपाल यन्त्र का विशेष वर्णन आचार्य श्रीपति ने सिद्धांत शेखर में इस प्रकार दिया :— शुल्बस्य दिग्भिर्विहितं पलैर्यत् षडङ्गुलोच्चं द्विगुणायतास्यम् । तदम्भसा षष्ठिपलैः प्रपूर्य पात्रं घटार्धप्रतिमं घटीस्यात् ।। सप्तांशमाषत्रयनिर्मिता या हेम्नः शलाका चतुरङ्गुलास्यात् । विद्धं तया प्राक्तनमत्र पात्रं प्रपूर्यते नाडिकयाम्बुना तत् ।। अर्थात् दस पल तोल का तांबा लेकर उसका अर्धगोलाकार एक कटोरा ऐसा बनाया जाय जिसकी ऊँचाई ६ अंगुल और जिसके मुख की चौड़ाई इसकी दूनी हो, जिसमें ६० पल पानी आता हो और जिसकी पेंदी में इतना बड़ा छेद होना चाहिये कि उसमें ३ १/७ माशा सोने की चार अंगुल लम्बी सुई जा सके जिससे एक घड़ी में वह कटोरा पानी से भर जाय । इससे यह सिद्ध होता है कि यह आचार्य समय की शुद्ध-शुद्ध नाप के लिये

ज्योतिषोपनिषद्ध्याय ७८३ कितना प्रयत्नशील था । परन्तु इस प्रकार का यन्त्र बनाना सुगम नहीं था । इसी- लिये भास्कराचार्य १ जी ने इसकी उपेक्षा की है । नरयन्त्र— नरयन्त्रं तथा साधु दिवा च विमले रवौ । छाया संसाधनेः प्रोक्तं कालसाधनमुत्तमम् ॥२४॥ अनुवाद—इसी प्रकार नरयन्त्र अथवा शङ्कु दिन में जब सूर्य स्वच्छ हो अच्छा होता है । छाया की ठीक-ठीक नाप से समय का ठीक-ठीक ज्ञान करने की रीति बतलायी गयी है । विज्ञान-भाष्य—त्रिप्रश्नाधिकार में यह विस्तारपूर्वक बतलाया गया है कि १२ अंगुल लम्बे शंकु की छाया से दिशा, देश और काल की गणना कैसे की जाती है । उपसंहार— ग्रहनक्षत्रचरितं ज्ञात्वा गोलं च तत्वतः । ग्रहलोकमवाप्नोति पययिणात्मवान् नरः ॥२५॥ इति सूर्य-सिद्धान्ते ज्योतिषोपनिषदध्याय अनुवाद—ग्रह और नक्षत्रों की चाल तथा गोल गणित के तत्व को जानने वाला मनुष्य ग्रहलोक को प्राप्त होता है और जन्मान्तर में आत्मज्ञानी होता है । विज्ञान-भाष्य—इस श्लोक से यह प्रकट होता है कि हमारे आचार्य ज्योतिष-शास्त्र के तत्व की जानकारी का कितना महत्व समझते थे और इसका प्रत्यक्ष बोध कराने के लिये अनेक प्रकार के यन्त्रों की कैसी रचना करते थे । आजकल यन्त्रों की इतनी उन्नति हो गयी है कि इनके द्वारा आकाशीय पिंडों की गति का साधन बड़ी सूक्ष्मता से किया जा सकता है । इसमें अध्याय में ऐसे एक यन्त्र की चर्चा संक्षेप में की जाती है । जिनको इनके सम्बन्ध में विशेष रीति से जानने की इच्छा हो उन्हें प्रकाश-विज्ञान की पुस्तकें पढ़नी चाहिए । दूरदर्शक—इस यन्त्र से दूर की वस्तुओं का प्रतिबिम्ब बहुत बड़ा और स्पष्ट देख पड़ता है । इसका सिद्धान्त संक्षेप में यह है :— पीतल की नलिका के एक सिरे पर ऐसा ताल रहता है जिससे दूर की वस्तु का प्रतिबिम्ब उसकी नाभी पर या इसके पास ही बनता है । इस प्रतिबिम्ब के पास १. अत्र दशभिः शुल्बस्य पलैरित्यादि यद् घटी लक्षणम् कैश्चित् कृतं तद्युक्ति शून्यं दुर्घटं चेत्ये तदुपेक्षितम् । (गोलाध्याय, यन्त्राध्याय श्लोक ८ की व्याख्या) ।