त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
२६८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तस्माद् बुद्धौ वासनाभिस्त्वावृत्तेस्तारतम्यतः ॥ ६९ ॥ ज्ञानं भिन्नं लक्ष्यते हि स्थितिभेदस्तथा भवेत् । राम पश्य स्थितेर्भेदं ज्ञानिनां तु परस्परम् ॥ ७० ॥ ब्रह्मविष्णुमहेशानां स्वभावज्ञानिनस्तु ते । तेषां पश्य स्थितेर्भेदं स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥ ७१ ॥ नैषां ज्ञानस्य मालिन्यं वक्तुं शक्यं कथञ्चन । स्वभावगुणमाहात्म्यं भिन्नमेव तथापि हि ॥ ७२ ॥ यथा ज्ञानिशरीरं तु गौरं न श्यामतां व्रजेत् । एवं चित्तस्वभावोऽपि नान्यभावं प्रपद्यते ॥ ७३ ॥ अस्मान् राम तथा पश्य ज्ञानिनोऽत्रिसुतान् स्थितान् । दुर्वाससं चन्द्रमसं माञ्च भिन्नस्थितिं गतम् ॥ ७४ ॥ क्रोधिनं कामिनं त्यक्तसर्वलिङ्गपरिग्रहम् । होता है। अतः वासनाओंके कारण बुद्धिमें आवरणकी न्यूनाधिकता रहनेके कारण भिन्न-भिन्न कोटिका ज्ञान देखा जाता है और इसीसे स्थितिमें भी भेद रहता है ॥ ६९-७० पू० ॥ परशुराम ! तुम ज्ञानियोंकी पारस्परिक स्थितियोंका भेद तो देखो—ब्रह्मा, विष्णु और महादेव ये तीनों स्वभावसे ही ज्ञानी हैं; किन्तु देखो, अपने स्वभावसिद्ध गुणोंके कारण उनकी स्थितियोंमें कितना भेद है ॥ ७० उ०-७१ ॥ इनके ज्ञानमें किसी भी प्रकार मलिनता तो बतायी नहीं जा सकती। तथापि स्वाभाविक गुणोंका प्रभाव तो अलग ही होता है ॥ ७२ ॥ जिस प्रकार किसी ज्ञानीका गोरा शरीर साँवला नहीं हो सकता इसी प्रकार उसके चित्तका स्वभाव भी नहीं बदल सकता ॥ ७३ ॥ परशुराम ! तुम हम ही को देखो। महर्षि अत्रिके हम तीनों पुत्र ज्ञानी हैं। किन्तु दुर्वासा, चन्द्रमा और मेरी स्थितियोंमें बड़ा अन्तर है ॥ ७४ ॥ दुर्वासा क्रोधी है, चन्द्रमा कामी है और मैं सब प्रकारके लिंग
एकोनविंशोऽध्यायः। २६६ वसिष्ठं पश्य कर्मिष्ठं सनकादींश्च न्यासिनः ॥ ७५ ॥ नारदं भक्तिसंमग्नं कवयन्तञ्च भार्गवम् । दैत्यपक्षसंश्रयिणं गुरुं देवसमाश्रयम् ॥ ७६ ॥ वाग्मिनञ्च व्यासमपि शास्त्रनिर्माणतत्परम् । जनकं पश्य राजानं भरतं त्यागिनं तथा ॥ ७७ ॥ भिन्नस्थितीन् स्वभावेन ज्ञानिनः पश्य चापरान् । रहस्यं ते प्रवक्ष्यामि शृणु भार्गवनन्दन ॥ ७८ ॥ विविधा या वासनोक्ता द्वितीया तत्र या भवेत् । कर्मजा मूढतारूपा सा सर्वेभ्यो महत्तरा ॥ ७९ ॥ येषां तल्लेशकश्चित्ते नास्ति मेधाविनस्तु ते । अपराधविहीनानां तेषां कामादिवासनाः ॥ ८० ॥ अभ्यासेनाविलीनाश्च ज्ञानस्याप्रतिबन्धिकाः । और संगका त्याग किये हुए हूँ। वसिष्ठको देखो, वे बड़े कर्मकाण्डी और सनकादिक संन्यासी हैं ॥ ७५ ॥ नारदजी भक्तिभावमें लीन रहते हैं, शुक्राचार्य दैत्योंका पक्ष लेकर कविता करनेमें लगे रहते हैं और वृहस्पतिजी देवताओंका पक्ष लेने वाले हैं ॥ ७६ ॥ व्यासजी बड़े वादकुशल हैं और शास्त्ररचनामें तत्पर रहते हैं। जनकको देखो, वे राजा हैं और भरत राज्यका त्याग करनेवाले हैं ॥७७॥ इसी प्रकार तुम और भी अनेकों भिन्न स्थितिवाले ज्ञानियोंको देख सकते हो। भृगुनन्दन ! इसमें जो रहस्य है, वह मैं तुम्हें बताता हूँ, श्रवण करो ॥ ७८ ॥ मैंने ऊपर जो तीन प्रकारकी वासनाएँ बतलायी हैं उनमें दूसरी कर्मवासना, जिसका स्वरूप मूढ़ता ही है, सबसे बढ़कर है ॥ ७९ ॥ जिनके चित्तमें उसका लेशमात्र भी नहीं होता वे लोग बुद्धिमान् होते हैं। [ अपने निमित्त कर्मका अभाव होनेके कारण ] उनमें अपराधवासना भी नहीं होती। ऐसी स्थितिमें यदि अभ्यासके द्वारा उनकी कामवासना सर्वथा निवृत्त न भी हो तो भी वह ज्ञानकी प्रति- बन्धिका नहीं रहती ॥ ८०-८१ पू० ॥
३०० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे ततो वैराग्यादिकं तु न तेषामुपयुज्यते ॥ ८१ ॥ न वा भूयोऽपि मननं समाधिश्चोपयुज्यते । सकृच्छ्रवणमात्रेण मननं ध्यानमेव च ॥ ८२ ॥ तत्काल ईषत् संप्राप्य ज्ञातासन्दिग्धतत्पदाः । भवन्ति जीवन्मुक्तास्ते जनकप्रमुखा इव ॥ ८३ ॥ विपरीताभ्यासवशान्नैव तैः क्षपिताः खलु । कामादिवासनाः सम्यक् सूक्ष्मा निर्मलबुद्धिभिः ॥ ८४ ॥ अतस्तैस्तत्पदे ज्ञाते चापि पूर्वस्थितास्तु ताः । कामादिवासनाः प्राग्वत् प्रवर्त्तन्ते निरन्तरम् ॥ ८५ ॥ न ताभिरीषद्वा बुद्धेस्तेषां लेपो भवेत् क्वचित् । विद्वद्भिस्ते हि संप्रोक्ता मुक्ताश्च बहुमानसाः ॥ ८६ ॥ राम कर्मवासनाभिरतिमूढं तु यन्मनः । तस्य ज्ञानं नैव भवेच्छिवोदितमपि क्वचित् ॥ ८७ ॥ दृढापराधयुक्तानामपि न स्यात् कथञ्चन । फिर उन्हें वैराग्यादि साधनोंकी भी विशेष आवश्यकता नहीं रहती और न पुनः पुनः मनन या समाधिकी ही अपेक्षा रहती है। एकबार श्रवण करनेपर ही तत्काल उसका कुछ मनन और निदि- ध्यासन भी हो जाता है। और वे निःसन्देह होकर उस परमपदको जान लेते हैं तथा जनकादिकी तरह जीवन्मुक्त हो जाते हैं ॥ ८१ उ०-८३ ॥ उनकी बुद्धि बहुत सूक्ष्म और निर्मल रहती है, इसलिये अपनी कामादिवासनाओंको उन्होंने उनके विपरीत अभ्यास करके क्षीण नहीं किया ॥ ८४ ॥ इसलिये उस परमपदको जान लेनेपर भी वे पहले हीसे विद्यमान कामादि वासनाएं उसमें पहले हीकी तरह बराबर नहीं रहती हैं ॥८५॥ उनसे उसकी बुद्धि कभी लेशमात्र भी लिप्त नहीं होती। विद्वान् लोग उन्हें मुक्त और बहुमानस कहते हैं ॥ ८६ ॥ परशुराम ! जिनका मन कर्मवासनाके कारण अत्यन्त मूढ हो गया है उसे साक्षात् शंकरजी उपदेश करें तब भी कभी ज्ञान नहीं हो सकता। इसी प्रकार सुदृढ अपराध-वासनावालोंको भी कभी ज्ञान नहीं होता ॥ ८७-८८ पू० ॥
एकोनविंशोऽध्यायः । ३०१ यस्यापराधरूपापि कर्मरूपापि वासना ॥ ८८ ॥ स्वल्पा कामात्मकाश्चापि बहुलास्तस्य भार्गव । बहुलश्रवणैस्तद्वन्मननैश्च समाधिभिः ॥ ८९ ॥ चिरकालेन विज्ञानं बहुक्लेशेन जायते । तस्य व्यवहृतिः स्वल्पा तत्राभ्यासप्रकर्षतः ॥ ९० ॥ मनो यदि भवेन्नष्टप्रायं निर्वासनं ततः । ज्ञानिनस्त्वीदृशाः प्रोक्ता मध्यमा नष्टमानसाः ॥ ९१ ॥ तेषामेव तु केषाश्चिदभ्यासस्याप्रकर्षतः । वासनाविरलं यस्मादनष्टं मानसं भवेत् ॥ ९२ ॥ समनस्कास्तु ते प्रोक्ता मन्दज्ञानयुतास्तु वै । केवलज्ञानिनस्त्वेते जीवन्मुक्तास्तथेतरे ॥ ९३ ॥ केवलज्ञानिनो दृष्टदुःखाभाजो भवन्ति हि । प्रारब्धतन्त्रास्ते प्रोक्ता देहान्ते मुक्तिभागिनः ॥ ९४ ॥ ये नष्टमानसाः प्रोक्तास्तैः प्रारब्धं पराकृतम् । जिसमें अपराध और कर्मरूप वासनाएँ कम हैं किन्तु कामत्रासना अधिक है, परशुराम ! उसे बहुत श्रवण, मनन और समाधिका अभ्यास करनेपर चिरकालमें बड़ी कठिनतासे ज्ञान होता है ॥८८ उ०-६० पू०॥ उसका व्यवहार बहुत कम रहता है। अभ्यासकी अधिकता- से जब उसका मन नष्टप्राय हो जाता है, तो वह वासनाशून्य हो जाता है। ऐसे ज्ञानी मध्यम कोटिके होते हैं और 'नष्टमानस' कहलाते हैं ॥ ६० उ०-६१ ॥ उनमेंसे ही किन्हीं-किन्हींमें अभ्यासकी अधिकता न होनेके कारण कुछ वासनाएँ रह जाती हैं, क्योंकि उनका मन नष्ट नहीं होता ॥६२॥ वे 'समनस्क' कहे जाते हैं और मन्द ज्ञानवान् होते हैं। ये केवल ज्ञानी हैं, अन्य ( उत्तम और मध्यम कोटिके ) ज्ञानी जीवन्मुक्त होते हैं ॥ ६३ ॥ केवल ज्ञानियोंको दृष्ट दुःख भोगने पड़ते हैं। वे प्रारब्धके अधीन रहते हैं और उन्हें देह त्याग करनेपर मुक्ति मिलती है ॥ ६४ ॥ जो नष्टमनस ज्ञानी कहे गये हैं उन्होंने तो प्रारब्धको परास्त
३०२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे मनोभूमौ तु प्रारब्धबीजं भोगाङ्कुरं भवेत् ॥ ९५ ॥ मनोभूमेरभावेन तत् प्रारब्धं तु कालतः । कुसूलस्थं बीजमिव विनश्येन्नष्टशक्तिकम् ॥ ९६ ॥ यथात्यन्तसुमेधावी युगपद्दश पञ्च च । कार्याणि कुरुते कापि भवेदस्खलितोऽपि च ॥ ९७ ॥ भूय एवंविधा दृष्टाः क्रियानैपुण्यसंश्रयाः । यथा गच्छन् वदन् कुर्वन् युगपलक्ष्यते जनः ॥ ९८ ॥ तत्र चैकेन मनसा कथं स्यात् त्रिविधा क्रिया । अध्येतॄणां बहूनाञ्च युगपल्लक्षयेद् गुरुः ॥ ९९ ॥ अपभ्रंशानुच्चरितं वर्णभेदव्यवस्थितम् । राम यस्ते हतः शत्रुरर्जुनो हैहयाधिपः ॥ १०० ॥ सहस्रबाहुर्युगपद् हेतिभिर्बहुभिः पृथक् । अयुध्यदस्खलन् कापि मेधावी दृष्ट एव ते ॥ १०१ ॥ कर दिया होता है। मनकी भूमिपर ही प्रारब्धरूप बीजसे भोगरूप अङ्कुर उत्पन्न होता है। किन्तु इनकी मनरूप भूमि रहती नहीं, इस- लिये इनका प्रारब्ध खत्तीमें भरे हुए बीजकी तरह कालक्रमसे शक्ति- हीन हो जानेके कारण नष्ट हो जाता है ॥ ६५-६६ ॥ [ अब बहुमानस ज्ञानियोंका वर्णन करते हैं—] जिस प्रकार कोई अत्यन्त बुद्धिमान् पुरुष एकसाथ दस-पाँच काम करता है और उनमें कोई त्रुटि भी नहीं आने देता, इसी प्रकार ज्ञानियोंमें भी क्रियाकौशल- से सम्पन्न ऐसे अनेकों महापुरुष देखे जाते हैं ॥ ६७-६८ पू० ॥ जिस प्रकार एक ही आदमी एकसाथ चलता, बोलता और हाथोंसे काम करता देखा जाता है। यहाँ एक ही मनसे एक साथ तीन कार्य कैसे हो सकते हैं ? ॥ ६८ उ०-६९ पू० ॥ अध्यापक वर्णभेदमें रहनेवाले विद्यार्थियोंके अशुद्ध उच्चारण और अनुच्चारण को एक-साथ ही देख लेता है ॥ ६६ उ०-१०० पू० ॥ परशुराम ! तुमने जिस हैहयराज सहस्रार्जुन नामके शत्रु का वध किया था वह अलग-अलग अनेकों शस्त्रोंसे एकसाथ ही युद्ध करता था और ऐसा बुद्धिमान् था कि इसमें कभी चूक नहीं पड़ती थी। यह सब तुमने देखा ही था ॥ १०० उ०-१०१ ॥
एकोनविंशोऽध्यायः । ३०३ तेषां मनो बहुविधं भूत्वा तत्तत्क्रमानुगम् । यथाकार्यं बहुविधं साधयेत्तद्गदेव हि ॥ १०२ ॥ उत्तमज्ञानिनामात्मदृष्टिर्वाह्यगतापि च । अविरुद्धा सर्वदा स्याद्येषां ते बहुमानसाः ॥ १०३ ॥ तत्प्रारब्धं मनोभूमौ भवेदङ्कुरितं पृथक् । भवेज्ज्ञानाग्निना दग्धं क्षतं भूतं पुनः पुनः ॥ १०४ ॥ प्रारब्धबीजाङ्कुरः स्यात् सुखदुःखसमागमः । तद्विमर्शः फलं प्रोक्तं कुतो दग्धाङ्कुरे फलम् ॥ १०५ ॥ आहृतेरनुसन्धानैस्तेषां व्यवहृतिर्भवेत् । यथा प्रौढो हि बालेन सह खेलन् हि दृश्यते ॥ १०६ ॥ हृष्टो विषण्णश्च शिलागजादीनां विनाशने । एवं हृष्यन्ति सीदन्ति कार्येषु बहुमानसाः ॥ १०७ ॥ यथाऽन्यकार्यसक्तस्य हर्षोद्वेगौ न चान्तरौ । इन सबका मन जैसे अनेकरूप होकर अनेक प्रकारके कार्योंको उन-उनके क्रमानुसार सम्पन्न करता है, वैसे ही जिन उत्तम ज्ञानियों- की आत्मदृष्टिमें बाहर जानेपर भी कभी कोई अन्तर नहीं पड़ता वे 'बहुमानस' कहलाते हैं ॥ १०२-१०३ ॥ उनका अलग-अलग प्रारब्ध जैसे-जैसे उनकी मनोभूमिमें अंकुरित होता है वैसे-वैसे ही वह पुनः पुनः ज्ञानाग्निसे दग्ध हो जाता है ॥१०४॥ प्रारब्धरूप बीजका अंकुर है सुख-दुःखकी प्राप्ति और उसका फल है सुख-दुःखपर विचार करना। किन्तु जब अंकुर ही जल गया तो फल कहाँ से होगा ? ॥ १०५ ॥ केवल स्वभावसिद्ध अनुसन्धानके द्वारा ही उनका व्यवहार चलता है। जैसे कोई-कोई प्रौढ पुरुष बच्चोंके साथ खेलते समय पत्थर- के हाथी आदि किसी खिलौनेके फूट जानेपर प्रसन्न या उदास होता देखा जाता है उसी प्रकार ये बहुमानस ज्ञानी भी व्यवहारमें हर्षित और दुःखित होते देखे जाते हैं ॥ १०६-१०७॥ जिस प्रकार किसी अन्य कार्यमें लगे हुए पुरुषको ऊपर हीसे
३०४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे एवं तेषां व्यवहृतौ समा सर्वत्र संस्थितिः ॥ १०८ ॥ मेधाविनां ज्ञानिनां तु वासनानाशहेतवे । विरुद्धवासनाभ्यासनिरोधादेरभावतः ॥ १०९॥ अनुवृत्तिर्भवेत् पूर्ववासनाऽनाशहेतुतः । अतः केचित् कर्मनिष्ठाः कामिनः क्रोधिनोऽपरे ॥ ११० ॥ उत्तमज्ञानिनो भान्ति विविधाचारतत्पराः । समनस्कस्तत्र यो वै मन्दज्ञानी निरूपितः ॥ १११ ॥ तेनापि वेद्यमखिलमसत्यत्वेन निश्चितम् । स्वरूपवित्तो नो किञ्चिद्भासते हि समाधिषु ॥ ११२ ॥ समाधिर्वै स्वरूपस्य विमर्शो नान्य उच्यते । निर्विकल्पस्वरूपं तु सर्वाश्रयतया सदा ॥ ११३ ॥ स्फुरत्येव हि सर्वेषां तदस्फूर्त्तौ न किञ्चन । हर्ष-शोक होते हैं, अन्तःकरणसे नहीं, उसी प्रकार तरह-तरहका व्यवहार करते समय भी उनकी स्थिति सर्वत्र समान होती है ॥ १०८ ॥ ये बुद्धिमान् ज्ञानी अपनी वासनाओंके नाशके लिये विरुद्ध वास- नाओंका अभ्यास अथवा मनोनिरोध आदि नहीं करते । अतः पूर्व- वासनाओंका नाश न होनेके कारण कभी-कभी उनमेंसे किसीकी अनुवृत्ति हो जाती है । इसीसे इन उत्तम ज्ञानियोंमेंसे कोई कर्मनिष्ठ, कोई कामी और कोई क्रोधी इस प्रकार तरह-तरहके आचरणवाले देखे जाते हैं ॥ १०६-१११ पू० ॥ ऊपर जिस समनस्क मन्द ज्ञानीका वर्णन किया उसने भी सम्पूर्ण दृश्यका असत्यत्व तो निश्चय कर लिया होता है तथा स्वरूपानुसन्धान और समाधिके समय उसे अन्य कुछ भासता भी नहीं है, [किन्तु अन्य अवस्थाओंमें उसे हर्ष-विषादादि हो जाते हैं ] ॥ १११ उ०-११२ ॥ वास्तवमें तो स्वरूपका अनुसन्धान ही समाधि कहा जाता है, और कुछ नहीं । एक निर्विकल्पस्वरूप आत्मा ही सर्वदा सबके आश्रयरूपसे स्फुरित हो रहा है । वह स्फुरित न हो तो कुछ भी
एकोनविंशोऽध्यायः। ३०५ तथा विकल्पविकलं स्फुरेत् प्रोक्तदशासु च ॥ ११४ ॥ तावता न हि सर्वेषां समाधिः स्याद्धि भार्गव । ये तद्विमर्शसंयुक्ताः स तेषामेव संस्मृतः ॥ ११५ ॥ व्यवहारपरा वित्तिरपि वेद्यविवर्जिता । विदितं नाभसं नैल्यं यथा भूयोऽवलोकने ॥ ११६ ॥ असत्यत्वेन विज्ञातं न वित्तिस्तेन संयुता । अन्यथा नैव भेदः स्यात्तत्त्वात्तत्त्वविभासयोः ॥ ११७ ॥ तथाऽसत्यगृहीतस्य वेद्यस्य न हि वेदने । सम्बन्धः कुत्र चिद्वा स्याज्ज्ञानिनामत एव हि ॥ ११८ ॥ वेद्यहीना भवेद्वित्तिर्बाधितस्य विभासनात् । अमनस्कस्य सुतरां यतः सा चोन्मनी दशा ॥ ११९ ॥ मनो वै निश्चलं यत्र तदुक्तं चोन्मनी दशा । नहीं रह सकता। तथा उपर्युक्त विभिन्न ज्ञानोंकी अन्तराल अवस्थाओंमें वही निर्विकल्परूपसे स्फुरित होता है ॥ ११३-११४ ॥ परशुराम ! किन्तु इतने हीसे सबको समाधिकी प्राप्ति नहीं हो जाती। जो आत्मानुसन्धानपूर्वक अभ्यास करते हैं उन्हें ही समाधिकी प्राप्ति मानी गयी है ॥ ११५ ॥ तत्त्वज्ञ महापुरुषोंकी दृष्टिमें तो व्यवहारके समय भी चेतन चेत्यवर्गसे रहित ही है। जिसे आकाशकी नीलिमाके असत्यत्व- का ज्ञान हो गया है उसे दिखाई देनेपर भी वह असत्य ही जान पड़ती है। उसी प्रकार ज्ञानियोंकी दृष्टिमें चेतन दृश्यशून्य है। यदि ऐसा न हो तो ज्ञानी और अज्ञानीके दृश्य दर्शनमें कोई भेद ही न रहे ॥ ११६-११७ ॥ दृश्यवर्गको इस प्रकार असत्यरूपसे ग्रहण कर लेनेपर उसका भान होनेपर भी ज्ञानियोंका उसके साथ कहीं कोई सम्बन्ध नहीं होता। इसीसे बाधित दृश्यका भान होनेपर भी उत्तम ज्ञानियोंकी दृष्टिमें चिच्छक्ति सर्वदा दृश्यहीन ही है। तथा जो अन्यमनस्क ज्ञानी हैं उन्हें तो दृश्यका भान ही नहीं होता क्योंकि उनकी तो उन्मनी अवस्था रहती है ॥ ११८-११९ ॥ जहाँ मन निश्चल हो जाता है उसे उन्मनी दशा कहते हैं और २० त्रि० ज्ञा०
३०६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे मनसश्चलनं तत् स्यात् सत्यवेद्यस्य सङ्गतिः ॥ १२० ॥ उत्तमज्ञानिनश्चैते दशे युगपदास्थिते । स सर्वदा व्युत्थितश्च समाधिस्थश्च भार्गव ॥ १२१ ॥ तस्मात्तस्यापि वेद्येन रहिता वित्तिरास्थिता । एवमेतद्धि संप्रोक्तं पृष्टं यद्यत् पुरा त्वया ॥ १२२ ॥ इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे ज्ञानिस्थितिवि- भेदकथनमेकोनविंशोऽध्यायः । जब उसका सत्य रूपसे गृहीत दृश्यके साथ सम्बन्ध रहता है तो वही उसका चलन है ॥ १२० ॥ उत्तम ज्ञानीमें ये दोनों अवस्थाएँ एक साथ रहती हैं । परशुराम ! वह सर्वदा ही व्युत्थित रहता है और सर्वदा ही समाधिस्थ ॥ १२१ ॥ अतः उनकी दृष्टिमें भी चेतन सर्वदा चेत्यशून्य ही है। इस प्रकार तुमने पहले जो प्रश्न किया था वह सब निरूपण कर दिया ॥ १२२ ॥ एकोनविंश अध्याय समाप्त ।
विंशोऽध्यायः अत्र ते वर्त्तयिष्यामि पुरा वृत्तं शृणुष्व तत् । पुरा ब्रह्मसभामध्ये सत्यलोकेऽतिपावने ॥ १ ॥ ज्ञानप्रसङ्गः समभूत् सूक्ष्मात् सूक्ष्मविमर्शनम् । सनकाद्या वसिष्ठश्च पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ॥ २ ॥ भृगुरत्रिराङ्गिराश्च प्रचेता नारदस्तथा । च्यवनो वामदेवश्च विश्वामित्रोऽथ गौतमः ॥ ३ ॥ शुक्रः पराशरो व्यासः कण्वः काश्यप एव च । दक्षः सुमन्तुः शङ्खश्च लिखितो देवलोऽपि च ॥ ४ ॥ एवमन्ये ऋषिगणा राजर्षिप्रवरा अपि । सर्वे समुदितास्तत्र ब्रह्मसत्रे महत्तरे ॥ ५ ॥ मीमांसां चक्रुरुत्तुच्चैः सूक्ष्मात् सूक्ष्मनिरूपणैः । ब्रह्माणं तत्र पप्रच्छुर्ऋषयः सर्व एव ते ॥ ६ ॥ भगवन् ज्ञानिनो लोके वयं ज्ञातपरावराः । विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥ श्रीत्रिपुरादेवीका भाविर्भाव और उपदेश [ श्रीदत्तात्रेयजी बोले- ] अब मैं तुम्हें एक प्राचीन वृत्तान्त सुनाता हूँ, सुनो । पूर्वकालकी बात है परम पवित्र सत्यलोकमें ब्रह्माजीकी सभामें ज्ञानचर्चा चली । उसमें सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म विचार हुआ ॥ १-२ पू० ॥ उस महती ज्ञानगोष्ठीमें सनकादि, वसिष्ठ, पुत्रस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, अत्रि, अंगिरा, प्रचेता, नारद, च्यवन, वामदेव, विश्वामित्र, गौतम, शुक्राचार्य, पराशर, व्यास, कण्व, कश्यप, दक्ष, सुमन्तु, शंख, लिखित, देवल तथा और भी अनेकों महर्षि एवं राजर्षिगण एकत्रित हुए । और सूक्ष्म निरूपण करते हुए वह बड़ी गहरी मीमांसा करने लगे । तब उन सभी ऋषियोंने ब्रह्माजीसे पूछा—॥ २ उ०-६ ॥ “भगवन् ! लोकमें हम लोग ज्ञानी माने जाते हैं और कार्य-
३०८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तेषां नो विविधा भाति स्थितिः प्रकृतिभेदतः ॥ ७ ॥ केचित् सदा समाधिस्थाः केचिन्मीमांसने रताः । अपरे भक्तिनिर्मग्नाश्चान्ये कर्मसमाश्रयाः ॥ ८ ॥ व्यवहारपरास्त्वेके बहिर्मुखनरा इव । तेषु श्रेयान् हि कतम एतन्नो वक्तुमर्हसि ॥ ९ ॥ स्वस्वपक्षं वयं विद्मः श्रेयांसमिति वै विधे । इति पृष्टोऽवदद् ब्रह्मा मत्वाऽनाश्वस्तमानसान् ॥ १० ॥ मुनीन्द्रा नाहमप्येतद्वेद्मि सर्वात्मना ततः । जानीयादिममर्थन्तु सर्वज्ञः परमेश्वरः ॥ ११ ॥ तत्र यामोऽर्थं संप्रष्टुमित्युक्त्वा तत्र तैरयौ । सङ्गम्य देवदेवेशं विष्णुं नाभिसमागतः ॥ १२ ॥ पप्रच्छ ऋषिमुख्यानां प्रश्नं तं लोकसृड् विधिः । कारण सभी तत्त्वोंके जाननेवाले हैं । किन्तु स्वभावभेदसे हम सबकी स्थितियाँ तरह-तरहकी हैं ॥ ७ ॥ हममें से कोई सर्वदा समाधिमें मग्न रहते हैं, कोई विचारमें लगे रहते हैं, कोई भक्तिभावमें लीन रहते हैं और कोई कर्ममें निष्ठा रखने वाले हैं ॥ ८ ॥ कोई बहिर्मुख पुरुषोंकी तरह व्यवहारमें लगे रहते हैं । इन सबमें श्रेष्ठ कौन हैं—यह हमें बतलानेकी कृपा करें । ब्रह्मन् ! हम लोग तो अपने-अपने पक्षको ही सबसे श्रेष्ठ मानते हैं ॥ ९--१० पू० ॥ मुनियों द्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर ब्रह्माजीने यह सोचकर कि इनके चित्तमें मेरे प्रति ठीक-ठीक श्रद्धा नहीं है, उनसे, कहा, “मुनीन्द्रो ! यह बात पूरी तरहसे मैं भी नहीं जानता । भगवान् महेश्वर सर्वज्ञ हैं, वे इस विषयमें जानते होंगे ! १० उ०--११ ॥ चलो, उनसे पूछनेके लिये वहाँ चलें ।” ऐसा कहकर वे उन सबको लेकर वहाँ गये । भगवान् विष्णु भी वहीं पधारे हुए थे । अतः उनके सहित श्रीमहादेवजीसे मिलकर लोकस्रष्टा श्रीब्रह्माजीने मुनिश्रेष्ठोंका प्रश्न पूछा ॥ १२--१३ पू० ॥
विंशोऽध्यायः । ३०६ प्रश्नं निशम्य च ज्ञात्वा विष्णुविधिमनोगतम् ॥ १३ ॥ मत्वाऽनाश्वस्तमनसा ऋषीन् देवो व्यचिन्तयत् । किञ्चिदुक्तं मयाऽत्रापि व्यर्थमेव भवेन्न तु ॥ १४ ॥ स्वपक्षत्वेन जानीयुर्ऋषयः श्रद्धया युताः । इति मत्वा प्रत्युवाच देवदेवो महेश्वरः ॥ १५ ॥ शृणुध्वं मुनयो नाऽहमप्येतद्वेद्मि सुस्फुटम् । अतो विद्यां भगवतीं ध्यायामः परमेश्वरीम् ॥ १६ ॥ तत्प्रसादान्निगूढार्थमपि विद्मस्ततः परम् । इत्युक्त्वा मुनयः सर्वे विधिविष्णुशिवैः सह ॥ १७ ॥ दध्युर्विद्यां महेशानीं त्रिपुरां चिच्छरीरिणीम् । एवं सर्वैरभिध्याता त्रिपुरा चिच्छरीरिणी ॥ १८ ॥ आविरासीच्चिदाकाशमयी शब्दमयी परा । अभवन्मेघगम्भीरनिःस्वनो गगनाङ्गणे ॥ १९ ॥ वदन्त्वृषिगणाः किं वो ध्याता तद् द्रुतमीहितम् । प्रश्न सुनकर श्रीमहादेवजी विष्णु और ब्रह्माजी के मनका आशय समझ गये और ऋषियोंके चित्तमें अश्रद्धा देखकर सोचने लगे कि इस विषयमें यदि मैं भी कुछ कहूँगा तो वह व्यर्थ ही होगी। ऋषियों- को श्रद्धा तो है नहीं, इसलिये उसे ये मेरे अपने ही पक्षकी बात मानेंगे ॥ १३ उ०--१५ पू० ॥ ऐसा सोचकर देवाधिदेव श्रीमहादेवजी बोले—“मुनिगण ! सुनिये, मैं भी यह बात स्पष्टतया नहीं जानता। इसलिये हम सब मिलकर परमेश्वरी भगवती विद्यादेवीका ध्यान करें। फिर तो उनकी कृपासे हम अत्यन्त गूढ़ रहस्यको भी जान सकते हैं” ॥ १५ उ०--१७ पू० ॥ महादेवजीके ऐसा कहनेपर ब्रह्मा, विष्णु और महादेवजीके सहित सभी मुनिगण चित्शरीरिणी महेश्वरी त्रिपुरादेवीका ध्यान करने लगे। इस प्रकार सबके द्वारा ध्यान किये जाने पर चित्स्वरूपिणी त्रिपुरा, जो चिदाकाशमयी और शब्दस्वरूपा हैं, प्रकट हो गयीं ॥ १७ उ०--१९ पू० ॥ तब आकाशमण्डलमें उनका यह मेघगम्भीर स्वर गूँज उठा— “ऋषियो ! बतलाओ, तुमने किसलिये मेरा ध्यान किया ? शीघ्र ही
३१० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे मत्पराणां हि केषाञ्चिन्न हीयेताऽभिवाञ्छितम् ॥ २० ॥ इति श्रुत्वा परां वाणीं प्रणेमुर्मुनिपुङ्गवाः । ब्रह्मादयोऽपि तदनु तुष्टुवुर्विविधैः स्तवैः ॥ २१ ॥ अथ प्रोचुर्ऋषिगणा विद्यां तां त्रिपुरेश्वरीम् । नमस्तुभ्यं महेशानि श्रीविद्ये त्रिपुरेश्वरि ॥ २२ ॥ अशेषोत्पादयित्री त्वं स्थापयित्री निजात्मनि । विलापयित्री सर्वस्य परमेश्वरि ते नमः ॥ २३ ॥ अनूतना सर्वदाऽसि यतो नास्ति जनिस्तव । नवात्मिका सदा त्वं वै यतो नास्ति जरा तव ॥ २४ ॥ सर्वासि सर्वसारासि सर्वज्ञा सर्वहर्षिणी । असर्वाऽसर्वगाऽसाराऽसर्वज्ञाऽसर्वहर्षिणी ॥ २५ ॥ देवि भूयो नमस्तुभ्यं पुरस्तात् पृष्ठतोऽपि च । अधस्तादूर्ध्वतः पार्श्वे सर्वतस्ते नमो नमः ॥ २६ ॥ अपना अभीष्ट प्रकट करो। मेरे भक्तोंकी कोई भी इच्छा कभी विफल नहीं होती” ॥ १६ उ०-२० ॥ यह परा वाणी सुनकर सभी मुनिश्रेष्ठोंने प्रणाम किया और उनके ब्रह्मादिकने भी प्रणाम करके अनेकों स्तोत्रों द्वारा उनकी स्तुति की ॥ २१ ॥ फिर ऋषियोंने उन त्रिपुरेश्वरी विद्यादेवीसे कहा, “महेश्वरि ! श्रीविद्ये ! त्रिपुरेश्वरि ! आपको नमस्कार है ॥ २२ ॥ आप अपने ही में सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति स्थिति और लय करनेवाली हैं। परमेश्वरि ! आपको नमस्कार है ॥ २३ ॥ आप सर्वदा पुरातन हैं, क्योंकि आपका जन्म नहीं होता और सदा ही नवीना हैं, क्योंकि कभी आपकी वृद्धावस्था नहीं होती ॥ २४ ॥ आप सर्व हैं, सबकी सारभूता हैं, सर्वज्ञा हैं और सबको हर्षित करनेवाली हैं। [किन्तु आपके स्वरूपमें सर्व तो है ही नहीं, इसलिये] आप सर्वशून्या हैं, असर्वगता हैं, असारा हैं, असर्वज्ञा हैं और न सर्वको हर्षित करनेवाली हैं ॥ २५ ॥ देवि ! आपको पुनः नमस्कार है। आपको आगेसे, पीछेसे, नीचेसे, ऊपरसे, इधर-उधरसे और सभी ओरसे पुनः पुनः नमस्कार है ॥ २६ ॥
विंशोऽध्यायः। ३११ ब्रूहि यत्तेऽपरं रूपमैश्वर्यं ज्ञानमेव च । फलं तस्माद्दनं मुख्यं साधकं सिद्धमेव च ॥ २७ ॥ सिद्धेस्तु परमां काष्ठां सिद्धेषूत्तममेव च । देव्येतत् क्रमतो ब्रूहि भूयस्तुभ्यं नमो नमः ॥ २८ ॥ इत्यापृष्टा महाविद्या प्रवक्तुमुपचक्रमे । दयमाना ऋषिगणे स्पष्टार्थं परमं वचः ॥ २९ ॥ शृणुध्वमृषयः सर्वे प्रवक्ष्यामि क्रमेण तत् । अमृतं ह्यागमाम्भोधेः समुद्धृत्य ददामि वः ॥ ३० ॥ यत्र सर्वं जगदिदं दर्पणप्रतिविम्बवत् । उत्पन्नञ्च स्थितं लीनं सर्वेषां भासते सदा ॥ ३१ ॥ यदेव जगदाकारं भासतेऽविदितात्मनाम् । यद्योगिनां निर्विकल्पं विभात्यात्मनि केवलम् ॥ ३२ ॥ गम्भीरस्तिमिताम्भोधिरिव निश्चलभासनम् । यत् सुभक्तैरतिशयप्रीत्या कैतववर्जनात् ॥ ३३ ॥ स्वभावस्थं स्वरसतो ज्ञात्वापि स्वोदयं पदम् । आपका जो पर और अपर रूप है, जो ऐश्वर्य और ज्ञान है, उसका जो फल और मुख्य साधन है, जो साधक और सिद्ध हैं, जो सिद्धिकी पराकाष्ठा है और सिद्धोंमें जो श्रेष्ठ हैं—उन सबका क्रमशः वर्णन कीजिये । आपको पुनः अनेकों बार नमस्कार है” ॥ २७-२८ ॥ ऋषियों द्वारा इसप्रकार पूछे जानेपर देवी महाविद्याकी उनपर दयादृष्टि हो गयी और उन्होंने असन्दिग्ध एवं मधुर वचनोंमें अपना भाषण आरम्भ किया ॥ २९ ॥ “ऋषिगण ! आप सभी श्रवण करें, मैं क्रमशः वर्णन करती हूँ। मैं आगमरूपी समुद्रका अमृत निकालकर आप लोगोंको देती हूँ ॥ ३० ॥ जहाँ यह सम्पूर्ण जगत् दर्पणमें प्रतिबिम्बकी तरह सभीको सर्वदा उत्पन्न, स्थित और लीन हुआ भास रहा है, जो अज्ञानियोंको जगत्- रूप ही भासता है, किन्तु योगियोंको जो निर्विकल्प जान पड़ता है तथा अपने स्वरूपमें जो गम्भीर शान्त समुद्रके समान निश्चल रूपसे स्फुरित हो रहा है, श्रेष्ठ भक्तगण जिस अद्वय आत्मरूप पदको जान-
३१२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे विभेदभासमारुह्य सेव्यतेऽत्यन्ततत्परैः ॥ ३४ ॥ अक्षान्तःकरणादीनां प्राणसूत्रं यदान्तरम् । यदभानेन किञ्चित् स्याद्यच्छास्त्रैरभिलक्षितम् ॥ ३५ ॥ परा सा प्रतिभा देव्याः परं रूपं मयेरितम् । ब्रह्माण्डानामेकनां वहिरूर्ध्वे सुधाम्बुधौ ॥ ३६ ॥ मणिद्वीपे नीपवने चिन्तामणिसुमन्दिरे । पञ्चब्रह्ममये मञ्चे रूपं त्रैपुरसुन्दरम् ॥ ३७ ॥ अनादिमिथुनं यत्तदपराख्यम् ऋषीश्वराः । तथा सदाशिवेशानौ विधिविष्णुत्रिलोचनाः ॥ ३८ ॥ गणेशस्कन्ददिक्पालाः शक्तयो गणदेवताः । यातुधानाः सुरा नागा यक्षकिम्पुरुषादयः ॥ ३९ ॥ पूज्याः सर्वा मम तनूरपराः परिकीर्त्तिताः । कर भी अपने चित्तकी स्वाभाविकी प्रवृत्तिके कारण उपास्य-उपा- सकरूप भेदकी कल्पना करके अत्यन्त तत्पर हो निश्चल भावसे परम प्रेमपूर्वक उसका सेवन करते हैं, जो इन्द्रिय और अन्तःकरणादिका प्राणरूप अन्तःसूत्र है, जिसके स्फुरित न होनेपर कुछ भी नहीं रहता तथा जो केवल शास्त्रों द्वारा ही लक्षित होता है, वह परम प्रकाश ही मुझ त्रिपुरादेवीका पर स्वरूप कहा गया है ॥ ३१-३६ पू० ॥ अनेकों ब्रह्माण्डोंके बाहर बहुत दूर जो अमृतका समुद्र है उसमें एक मणिमय द्वीप है, उसके कदम्ब-वनमें एक चिन्तामणियोंका बना मनोहर मन्दिर है । उसमें पञ्चब्रह्ममय१ सिंहासनपर जो अनादि मिथुनात्मक त्रिपुरसुन्दरी रूप है, ऋषीश्वरो ! वही मेरा अपर स्वरूप है ॥ ३६ उ०-३७ पू० ॥ इसी प्रकार सदाशिव, ईशान, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, गणेश, स्कन्द, इन्द्रादि दिक्पाल, महालक्ष्मी आदि शक्तियाँ, वसु आदि गण, राक्षस, देवता, नाग, यक्ष और किन्नर आदि जो भी पूज्य हैं वे सभी मेरे अपर स्वरूप कहे गये हैं ॥ ३८ उ०-४० पू० ॥ १. ब्रह्मा, विष्णु, शिव, ईश्वर और सदाशिव-ये पाँच ब्रह्म (भगवान्के स्वरूप) ही जिसके अवयव हैं । इनमें पहले उसके चार पाये हैं और सदाशिव ऊपरका पट्ट है ।
विंशोऽध्यायः । ३१३ मम मायाविमूढास्तु मां न जानन्ति सर्वतः ॥ ४० ॥ पूजिता ह्येव सर्वैस्तैर्ददामि फलमीहितम् । न मत्तोऽन्या काचिदस्ति पूज्या वा फलदायिनी ॥ ४१ ॥ यथा यो मां भावयति फलं मत् प्राप्नुयात्तथा । ममैश्वर्यमृषिगणा अपरिच्छिन्नमीरितम् ॥ ४२ ॥ अनपेक्ष्यैव यत् किञ्चिदहमद्वयचिन्मयी । स्फुराम्यनन्तजगदाकारेण ऋषिपुङ्गवाः ॥ ४३ ॥ तथा स्फुरन्त्यपि सदा नात्येम्यद्वैतचिद्वपुः । एतन्मे मुख्यमैश्वर्यं दुर्घटार्थविभावनम् ॥ ४४ ॥ ममैश्वर्यन्तु ऋषयः पश्यध्वं सूक्ष्मया दृशा । सर्वाश्रया सर्वगता चाप्यहं केवला चितिः ॥ ४५ ॥ स्वमायया स्वमज्ञात्वा संसरन्ती चिरादहम् । भूयो विदित्वा स्वात्मानं गुरोः शिष्यपदं गता ॥ ४६ ॥ इन सबरूपोंमें मैं हूँ, किन्तु मेरी मायासे मोहित पुरुष मुझे नहीं पहचानते । इन सबमें पूजित होनेपर मैं ही इनके द्वारा अभीष्ट फल प्रदान करती हूँ। मुझसे भिन्न न कोई पूजित होनेवाली है और न फल देनेवाली ॥ ४० उ०-४१ ॥ मुझमें जो जैसी भावना करता है वह वैसा ही फल प्राप्त कर लेता है। ऋषियो ! मेरा ऐश्वर्य असीम बतलाया गया हैं ॥ ४२ ॥ मुनिवरो ! मैं अद्वय और चिन्मयी हूं तथा अन्य किसीकी भी अपेक्षा न रख कर जगत्रूपसे भास रही हूँ ॥ ४३ ॥ किन्तु इस प्रकार भासनेपर भी मैं अपने अद्वितीय चिन्मय स्वरूपका त्याग नहीं करती हूँ। यही असम्भवको सम्भव कर देनेवाला मेरा मुख्य ऐश्वर्य है ॥ ४४ ॥ ऋषियो ! मेरे ऐश्वर्यको आप लोग तनिक सूक्ष्म दृष्टिसे देखें कि मैं सबकी आधार और सबमें अनुगत होकर भी केवल चिन्मात्र ही हूँ ॥ ४५ ॥ अपनी मायासे अपने हीको न जानकर मैं चिरकालसे जन्म- मरण रूप संसारचक्रमें पड़ी हुई हूं। फिर गुरुदेवका शिष्यत्व स्वीकार
३१४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे नित्यमुक्ता पुनर्मुक्ता भूयो भूयो भवाम्यहम् । निरुपादानसम्भारं सृजामि जगदीदृशम् ॥ ४७ ॥ इत्यादि सन्ति बहुधा ममैश्वर्यपरम्पराः । न तद् गणयितुं शक्यं सहस्रवदनेन वा ॥ ४८ ॥ शृण्वन्तु संग्रहाद्वक्ष्ये मदैश्वर्यस्य लेशतः । जगद्यात्रा विचित्रेयं सर्वतः संप्रसारिता ॥ ४९ ॥ ममज्ञानं बहुविधं द्वैताद्वैतादिभेदतः । परापरविभेदाच्च बहुधा चापि तत् फलम् ॥ ५० ॥ द्वैतज्ञानन्तु विविधं द्वितीयालम्बनं यतः । ध्यानमेव तु तत्प्रोक्तं स्वप्नराज्यादिसम्मितम् ॥ ५१ ॥ तच्चापि सफलं ज्ञेयं नियत्या नियतं यतः । अपरञ्चापि विविधं तत्र मुख्यं तदेव हि ॥ ५२ ॥ कर आत्मज्ञान प्राप्त करके मैं नित्यमुक्त होकर भी पुनः पुनः मुक्त होती हूँ। तथा किसी प्रकारकी साधनसामग्रीके बिना ही ऐसा संसार रच लेती हूँ ॥ ४६-४७ ॥ इसी प्रकार मेरी ऐश्वर्य-परम्परा अनेक प्रकारकी है। उसे सहस्र मुखवाले शेषजी भी नहीं गिन सकते ॥ ४८ ॥ सुनिये, संक्षेपसे बतलाती हूँ। मेरे ऐश्वर्यके लेशमात्रसे सब ओर यह अद्भुत जगद्व्यवहार फैला हुआ है ॥ ४९ ॥ द्वैत और अद्वैत आदि भेदसे मेरा ज्ञान भी अनेक प्रकार का है। तथा पर और अपर रूपसे उसके फल भी अनेकों प्रकारके हैं ॥ ५० ॥ द्वैत ज्ञान अनेकों प्रकारका है, क्योंकि उसका आश्रय कोई अन्य होता है। उसे ध्यान भी कहते हैं। यह स्वप्न और मनोराज्यके समान होता है ॥ ५१ ॥ किन्तु [ मनोराज्यके समान होनेपर भी ] उसे फलदायक ही समझना चाहिये, क्योंकि नियति (विधाता) का ऐसा ही विधान है। अपर ज्ञान यद्यपि अनेक प्रकारका है तथापि उनमें मुख्य वही है [ जो ऊपर श्लोक ३६-३७ में बतलाया गया है ] ॥ ५२ ॥
विंशोऽध्यायः । ३१५ प्रोक्तमुख्यापरमयं ध्यानं मुख्यफलक्रमम् । अद्वैतविज्ञानमेव परविज्ञानमीरितम् ॥ ५३ ॥ मामनाराध्य परमां चिरं विद्यां तु श्रीमतीम् । कथं प्राप्येत परमां विद्यामद्वैतसंज्ञिकाम् ॥ ५४ ॥ तदेवाद्वैतविज्ञानं केवला या परा चितिः । तस्याः शुद्धदशामर्शो द्वैतामर्शाभिभावकः ॥ ५५ ॥ चित्तं यदा स्वमात्मानं केवलं ह्यभिसम्पतेत् । तदेवानुविभातं स्याद्विज्ञानमृषिसत्तमाः ॥ ५६ ॥ श्रुतितो युक्तितो वापि केवलात्मविभासनम् । देहाद्यात्मावभासस्य नाशनं ज्ञानमुच्यते ॥ ५७ ॥ तदेव भवति ज्ञानं यज्ज्ञानेन तु किञ्चन । भासमानमपि क्वापि न विभायात् कथञ्चन ॥ ५८ ॥ तदेवाद्वैतविज्ञानं यद्विज्ञानेन किञ्चन । अविज्ञातं नैव भवेत् कदाचिल्लेशतोऽपि च ॥ ५९ ॥ ऊपर बतलाया हुआ वह अपर ब्रह्मका ध्यान मुख्य फल (मोक्ष) का परम्परा-साधन है। पर ज्ञान तो अद्वैतज्ञान ही कहा गया है ॥ ५३ ॥ मैं परमोत्कृष्ट श्रीविद्या हूँ। मेरी चिरकालतक आराधना किये बिना कोई अद्वैत नाम्नी पराविद्याको कैसे प्राप्त कर सकता है ॥ ५४ ॥ जो विशुद्ध पराचिति है वही अद्वैत ज्ञान है। उसके शुद्धस्वरूपका विचार ही द्वैतभावनाकी निवृत्ति करनेवाला है ॥ ५५ ॥ जिस समय चित्त केवल अपने आत्मा-स्वरूपकी ओर ही लगता है, मुनिवरो ! उसी समय उस विशुद्ध विज्ञानका साक्षात्कार होता है ॥५६॥ श्रुति और युक्ति के द्वारा विशुद्ध आत्माका अनुभव होना और देहा- दिमें आत्मभाव का अभाव हो जाना भी ज्ञान ही कहा जाता है ॥ ५७ ॥ ज्ञान तो वास्तवमें वही है जिसके होनेपर जो कुछ भासमान है वह कहीं भी तनिक भी नहीं भासता ॥ ५८ ॥ सच्चा अद्वैत ज्ञान वही है जिसके होनेपर फिर कभी, कुछ भा लेशमात्र भी अज्ञात नहीं रहता ॥ ५९ ॥
३१६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे सर्वविज्ञानात्मरूपं यद्विज्ञानं भवेत् खलु । तदेवाऽद्वैतविज्ञानं परमं तापसोत्तमाः ॥ ६० ॥ जाते यादृशविज्ञाने संशयाश्चिरसम्भृताः । वायुनेवाभ्रजालानि विलीयन्ते परं हि तत् ॥ ६१ ॥ कामादिवासनाः सर्वा यस्मिन् सन्ति न किञ्चन । स्युर्भग्नदंष्ट्राहिरिव तद्विज्ञानं परं स्मृतम् ॥ ६२ ॥ विज्ञानस्य फलं सर्वदुःखानां विलयो भवेत् । अत्यन्ताभयसंप्राप्तिर्मोक्ष इत्युच्यते फलम् ॥ ६३ ॥ भयं द्वितीयसङ्कल्पादद्वैते विदिते दृढम् । कुतः स्याद् द्वैतसङ्कल्पस्तमः सूर्योदये यथा ॥ ६४ ॥ ऋषयो न भयं क्वापि द्वैतसङ्कल्पवर्जने । अतो यत् फलमन्यत् स्यात्तद्भयं सर्वथा भवेत् ॥ ६५ ॥ अन्तवत्तु द्वितीयं स्याद् भूयो लोके समीक्षणात् । श्रेष्ठ तपस्वियो ! जिस विज्ञानके द्वारा घट-पटादि सम्पूर्ण विज्ञान आत्मस्वरूप हो जाते हैं वही वास्तवमें परम अद्वैतविज्ञान है ॥ ६० ॥ जिस प्रकारका विज्ञान उत्पन्न होनेपर चिरकालसे पोषित सारे संशय वायुसे मेघमालाके समान लीन हो जाते हैं वही परविज्ञान है ॥ ६१ ॥ जिसके होनेपर कामादि सम्पूर्ण वासनाएँ कुछ भी नहीं रहतीं- रहती भी हैं तो दाँत तोड़े हुए सर्पके समान व्यर्थ हो जाती हैं, वही विज्ञान पर माना गया है ॥ ६२ ॥ इस विज्ञानका फल सम्पूर्ण दुःखोंकी निवृत्ति और पूर्ण निर्भयताकी प्राप्ति है। यह मोक्ष ही उसका फल कहा जाता है ॥ ६३ ॥ भय तो किसी दूसरेका संकल्प होनेपर होता है। और दृढ अद्वैतज्ञान होनेपर द्वैतका संकल्प हो कैसे सकता है ? जैसे सूर्योदय होनेपर नहीं हो सकता ॥ ६४ ॥ ऋषियो ! द्वैतका संकल्प छूट जानेपर फिर कहीं भय नहीं रहता। इसलिये जो फल आत्मस्वरूपसे भिन्न होगा वह तो सब प्रकार भय रूप ही होगा ॥ ६५ ॥ अपनेसे भिन्न जो भी पदार्थ होगा वह नाशवान् ही होगा, क्योंकि
विंशोऽध्यायः । ३१७ सान्ते भयं सर्वथैवाभयं तस्मात् कुतो भवेत् ॥ ६६ ॥ संयोगो विप्रयोगान्तः सर्वथैव विभावितः । फलयोगोऽपि तस्माद्धि विनश्येदिति निश्चयः ॥ ६७ ॥ यावदन्यत् फलं प्रोक्तं भयं तावत्प्रकीर्तितम् । तदेवाभयरूपन्तु फलं सर्वै प्रचक्षते ॥ ६८ ॥ यदात्मनोऽन्यदेव फलं मोक्षः प्रकीर्तितः । ज्ञाता ज्ञानं ज्ञेयमपि फलं चैकं यदा भवेत् ॥ ६९ ॥ तदा हि परमो मोक्षः सर्वभीतिविवर्जितः । ज्ञानं विकल्पसङ्कल्पहानं मौढ्यविवर्जितम् ॥ ७० ॥ ज्ञातुः स्वच्छात्मरूपं तदादावनुपलक्षितम् । उपदेशक एवातो गुरुः शास्त्रं च नेतरत् ॥ ७१ ॥ एतदेव हि विज्ञेयस्वरूपमभिधीयते । ज्ञातृज्ञानज्ञेयगतो यावद्भेदोऽवभासते ॥ ७२ ॥ लोकमें ऐसा अनेकों बार देखा गया है। नाशवान्में तो सब प्रकार भय रहता ही है, इसलिये उसे पाकर कोई निर्भय कैसे हो सकता है ? ॥ ६६ ॥ संयोग तो सब प्रकार वियोगमें समाप्त होनेवाला ही देखा गया है। इसलिये यह निश्चय है कि किसी अन्य फलका संयोग भी अन्तमें नष्ट होगा ही ॥ ६७ ॥ अतः जबतक आत्मासे भिन्न कोई और फल रहता है तबतक तो भय कहा ही है। सभी ने अभयरूप फल तो वही बतलाया है जिसे आत्मासे अभिन्न मोक्षरूप फल कहते हैं; जब कि ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय और फल भी एकरूप हो जाते हैं ॥ ६८-६९ ॥ तभी सब प्रकारके भयसे शून्य परम मोक्ष प्राप्त होता है तथा सम्पूर्ण सङ्कल्प-विकल्पों की निवृत्तिपूर्वक अज्ञानशून्य ज्ञानका उदय भी ॥ ७० ॥ ज्ञाताको अपना यह शुद्ध स्वरूप पहले मालूम नहीं होता। अतः गुरु और शास्त्र ही उसका उपदेश करनेवाले हैं, कोई अन्य नहीं ॥ ७१ ॥ यही विज्ञेयका स्वरूप भी कहा जाता है। जबतक ज्ञाता, ज्ञान