त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
३१० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे मत्पराणां हि केषाञ्चिन्न हीयेताऽभिवाञ्छितम् ॥ २० ॥ इति श्रुत्वा परां वाणीं प्रणेमुर्मुनिपुङ्गवाः । ब्रह्मादयोऽपि तदनु तुष्टुवुर्विविधैः स्तवैः ॥ २१ ॥ अथ प्रोचुर्ऋषिगणा विद्यां तां त्रिपुरेश्वरीम् । नमस्तुभ्यं महेशानि श्रीविद्ये त्रिपुरेश्वरि ॥ २२ ॥ अशेषोत्पादयित्री त्वं स्थापयित्री निजात्मनि । विलापयित्री सर्वस्य परमेश्वरि ते नमः ॥ २३ ॥ अनूतना सर्वदाऽसि यतो नास्ति जनिस्तव । नवात्मिका सदा त्वं वै यतो नास्ति जरा तव ॥ २४ ॥ सर्वासि सर्वसारासि सर्वज्ञा सर्वहर्षिणी । असर्वाऽसर्वगाऽसाराऽसर्वज्ञाऽसर्वहर्षिणी ॥ २५ ॥ देवि भूयो नमस्तुभ्यं पुरस्तात् पृष्ठतोऽपि च । अधस्तादूर्ध्वतः पार्श्वे सर्वतस्ते नमो नमः ॥ २६ ॥ अपना अभीष्ट प्रकट करो। मेरे भक्तोंकी कोई भी इच्छा कभी विफल नहीं होती” ॥ १६ उ०-२० ॥ यह परा वाणी सुनकर सभी मुनिश्रेष्ठोंने प्रणाम किया और उनके ब्रह्मादिकने भी प्रणाम करके अनेकों स्तोत्रों द्वारा उनकी स्तुति की ॥ २१ ॥ फिर ऋषियोंने उन त्रिपुरेश्वरी विद्यादेवीसे कहा, “महेश्वरि ! श्रीविद्ये ! त्रिपुरेश्वरि ! आपको नमस्कार है ॥ २२ ॥ आप अपने ही में सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति स्थिति और लय करनेवाली हैं। परमेश्वरि ! आपको नमस्कार है ॥ २३ ॥ आप सर्वदा पुरातन हैं, क्योंकि आपका जन्म नहीं होता और सदा ही नवीना हैं, क्योंकि कभी आपकी वृद्धावस्था नहीं होती ॥ २४ ॥ आप सर्व हैं, सबकी सारभूता हैं, सर्वज्ञा हैं और सबको हर्षित करनेवाली हैं। [किन्तु आपके स्वरूपमें सर्व तो है ही नहीं, इसलिये] आप सर्वशून्या हैं, असर्वगता हैं, असारा हैं, असर्वज्ञा हैं और न सर्वको हर्षित करनेवाली हैं ॥ २५ ॥ देवि ! आपको पुनः नमस्कार है। आपको आगेसे, पीछेसे, नीचेसे, ऊपरसे, इधर-उधरसे और सभी ओरसे पुनः पुनः नमस्कार है ॥ २६ ॥
विंशोऽध्यायः। ३११ ब्रूहि यत्तेऽपरं रूपमैश्वर्यं ज्ञानमेव च । फलं तस्माद्दनं मुख्यं साधकं सिद्धमेव च ॥ २७ ॥ सिद्धेस्तु परमां काष्ठां सिद्धेषूत्तममेव च । देव्येतत् क्रमतो ब्रूहि भूयस्तुभ्यं नमो नमः ॥ २८ ॥ इत्यापृष्टा महाविद्या प्रवक्तुमुपचक्रमे । दयमाना ऋषिगणे स्पष्टार्थं परमं वचः ॥ २९ ॥ शृणुध्वमृषयः सर्वे प्रवक्ष्यामि क्रमेण तत् । अमृतं ह्यागमाम्भोधेः समुद्धृत्य ददामि वः ॥ ३० ॥ यत्र सर्वं जगदिदं दर्पणप्रतिविम्बवत् । उत्पन्नञ्च स्थितं लीनं सर्वेषां भासते सदा ॥ ३१ ॥ यदेव जगदाकारं भासतेऽविदितात्मनाम् । यद्योगिनां निर्विकल्पं विभात्यात्मनि केवलम् ॥ ३२ ॥ गम्भीरस्तिमिताम्भोधिरिव निश्चलभासनम् । यत् सुभक्तैरतिशयप्रीत्या कैतववर्जनात् ॥ ३३ ॥ स्वभावस्थं स्वरसतो ज्ञात्वापि स्वोदयं पदम् । आपका जो पर और अपर रूप है, जो ऐश्वर्य और ज्ञान है, उसका जो फल और मुख्य साधन है, जो साधक और सिद्ध हैं, जो सिद्धिकी पराकाष्ठा है और सिद्धोंमें जो श्रेष्ठ हैं—उन सबका क्रमशः वर्णन कीजिये । आपको पुनः अनेकों बार नमस्कार है” ॥ २७-२८ ॥ ऋषियों द्वारा इसप्रकार पूछे जानेपर देवी महाविद्याकी उनपर दयादृष्टि हो गयी और उन्होंने असन्दिग्ध एवं मधुर वचनोंमें अपना भाषण आरम्भ किया ॥ २९ ॥ “ऋषिगण ! आप सभी श्रवण करें, मैं क्रमशः वर्णन करती हूँ। मैं आगमरूपी समुद्रका अमृत निकालकर आप लोगोंको देती हूँ ॥ ३० ॥ जहाँ यह सम्पूर्ण जगत् दर्पणमें प्रतिबिम्बकी तरह सभीको सर्वदा उत्पन्न, स्थित और लीन हुआ भास रहा है, जो अज्ञानियोंको जगत्- रूप ही भासता है, किन्तु योगियोंको जो निर्विकल्प जान पड़ता है तथा अपने स्वरूपमें जो गम्भीर शान्त समुद्रके समान निश्चल रूपसे स्फुरित हो रहा है, श्रेष्ठ भक्तगण जिस अद्वय आत्मरूप पदको जान-
३१२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे विभेदभासमारुह्य सेव्यतेऽत्यन्ततत्परैः ॥ ३४ ॥ अक्षान्तःकरणादीनां प्राणसूत्रं यदान्तरम् । यदभानेन किञ्चित् स्याद्यच्छास्त्रैरभिलक्षितम् ॥ ३५ ॥ परा सा प्रतिभा देव्याः परं रूपं मयेरितम् । ब्रह्माण्डानामेकनां वहिरूर्ध्वे सुधाम्बुधौ ॥ ३६ ॥ मणिद्वीपे नीपवने चिन्तामणिसुमन्दिरे । पञ्चब्रह्ममये मञ्चे रूपं त्रैपुरसुन्दरम् ॥ ३७ ॥ अनादिमिथुनं यत्तदपराख्यम् ऋषीश्वराः । तथा सदाशिवेशानौ विधिविष्णुत्रिलोचनाः ॥ ३८ ॥ गणेशस्कन्ददिक्पालाः शक्तयो गणदेवताः । यातुधानाः सुरा नागा यक्षकिम्पुरुषादयः ॥ ३९ ॥ पूज्याः सर्वा मम तनूरपराः परिकीर्त्तिताः । कर भी अपने चित्तकी स्वाभाविकी प्रवृत्तिके कारण उपास्य-उपा- सकरूप भेदकी कल्पना करके अत्यन्त तत्पर हो निश्चल भावसे परम प्रेमपूर्वक उसका सेवन करते हैं, जो इन्द्रिय और अन्तःकरणादिका प्राणरूप अन्तःसूत्र है, जिसके स्फुरित न होनेपर कुछ भी नहीं रहता तथा जो केवल शास्त्रों द्वारा ही लक्षित होता है, वह परम प्रकाश ही मुझ त्रिपुरादेवीका पर स्वरूप कहा गया है ॥ ३१-३६ पू० ॥ अनेकों ब्रह्माण्डोंके बाहर बहुत दूर जो अमृतका समुद्र है उसमें एक मणिमय द्वीप है, उसके कदम्ब-वनमें एक चिन्तामणियोंका बना मनोहर मन्दिर है । उसमें पञ्चब्रह्ममय१ सिंहासनपर जो अनादि मिथुनात्मक त्रिपुरसुन्दरी रूप है, ऋषीश्वरो ! वही मेरा अपर स्वरूप है ॥ ३६ उ०-३७ पू० ॥ इसी प्रकार सदाशिव, ईशान, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, गणेश, स्कन्द, इन्द्रादि दिक्पाल, महालक्ष्मी आदि शक्तियाँ, वसु आदि गण, राक्षस, देवता, नाग, यक्ष और किन्नर आदि जो भी पूज्य हैं वे सभी मेरे अपर स्वरूप कहे गये हैं ॥ ३८ उ०-४० पू० ॥ १. ब्रह्मा, विष्णु, शिव, ईश्वर और सदाशिव-ये पाँच ब्रह्म (भगवान्के स्वरूप) ही जिसके अवयव हैं । इनमें पहले उसके चार पाये हैं और सदाशिव ऊपरका पट्ट है ।
विंशोऽध्यायः । ३१३ मम मायाविमूढास्तु मां न जानन्ति सर्वतः ॥ ४० ॥ पूजिता ह्येव सर्वैस्तैर्ददामि फलमीहितम् । न मत्तोऽन्या काचिदस्ति पूज्या वा फलदायिनी ॥ ४१ ॥ यथा यो मां भावयति फलं मत् प्राप्नुयात्तथा । ममैश्वर्यमृषिगणा अपरिच्छिन्नमीरितम् ॥ ४२ ॥ अनपेक्ष्यैव यत् किञ्चिदहमद्वयचिन्मयी । स्फुराम्यनन्तजगदाकारेण ऋषिपुङ्गवाः ॥ ४३ ॥ तथा स्फुरन्त्यपि सदा नात्येम्यद्वैतचिद्वपुः । एतन्मे मुख्यमैश्वर्यं दुर्घटार्थविभावनम् ॥ ४४ ॥ ममैश्वर्यन्तु ऋषयः पश्यध्वं सूक्ष्मया दृशा । सर्वाश्रया सर्वगता चाप्यहं केवला चितिः ॥ ४५ ॥ स्वमायया स्वमज्ञात्वा संसरन्ती चिरादहम् । भूयो विदित्वा स्वात्मानं गुरोः शिष्यपदं गता ॥ ४६ ॥ इन सबरूपोंमें मैं हूँ, किन्तु मेरी मायासे मोहित पुरुष मुझे नहीं पहचानते । इन सबमें पूजित होनेपर मैं ही इनके द्वारा अभीष्ट फल प्रदान करती हूँ। मुझसे भिन्न न कोई पूजित होनेवाली है और न फल देनेवाली ॥ ४० उ०-४१ ॥ मुझमें जो जैसी भावना करता है वह वैसा ही फल प्राप्त कर लेता है। ऋषियो ! मेरा ऐश्वर्य असीम बतलाया गया हैं ॥ ४२ ॥ मुनिवरो ! मैं अद्वय और चिन्मयी हूं तथा अन्य किसीकी भी अपेक्षा न रख कर जगत्रूपसे भास रही हूँ ॥ ४३ ॥ किन्तु इस प्रकार भासनेपर भी मैं अपने अद्वितीय चिन्मय स्वरूपका त्याग नहीं करती हूँ। यही असम्भवको सम्भव कर देनेवाला मेरा मुख्य ऐश्वर्य है ॥ ४४ ॥ ऋषियो ! मेरे ऐश्वर्यको आप लोग तनिक सूक्ष्म दृष्टिसे देखें कि मैं सबकी आधार और सबमें अनुगत होकर भी केवल चिन्मात्र ही हूँ ॥ ४५ ॥ अपनी मायासे अपने हीको न जानकर मैं चिरकालसे जन्म- मरण रूप संसारचक्रमें पड़ी हुई हूं। फिर गुरुदेवका शिष्यत्व स्वीकार
३१४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे नित्यमुक्ता पुनर्मुक्ता भूयो भूयो भवाम्यहम् । निरुपादानसम्भारं सृजामि जगदीदृशम् ॥ ४७ ॥ इत्यादि सन्ति बहुधा ममैश्वर्यपरम्पराः । न तद् गणयितुं शक्यं सहस्रवदनेन वा ॥ ४८ ॥ शृण्वन्तु संग्रहाद्वक्ष्ये मदैश्वर्यस्य लेशतः । जगद्यात्रा विचित्रेयं सर्वतः संप्रसारिता ॥ ४९ ॥ ममज्ञानं बहुविधं द्वैताद्वैतादिभेदतः । परापरविभेदाच्च बहुधा चापि तत् फलम् ॥ ५० ॥ द्वैतज्ञानन्तु विविधं द्वितीयालम्बनं यतः । ध्यानमेव तु तत्प्रोक्तं स्वप्नराज्यादिसम्मितम् ॥ ५१ ॥ तच्चापि सफलं ज्ञेयं नियत्या नियतं यतः । अपरञ्चापि विविधं तत्र मुख्यं तदेव हि ॥ ५२ ॥ कर आत्मज्ञान प्राप्त करके मैं नित्यमुक्त होकर भी पुनः पुनः मुक्त होती हूँ। तथा किसी प्रकारकी साधनसामग्रीके बिना ही ऐसा संसार रच लेती हूँ ॥ ४६-४७ ॥ इसी प्रकार मेरी ऐश्वर्य-परम्परा अनेक प्रकारकी है। उसे सहस्र मुखवाले शेषजी भी नहीं गिन सकते ॥ ४८ ॥ सुनिये, संक्षेपसे बतलाती हूँ। मेरे ऐश्वर्यके लेशमात्रसे सब ओर यह अद्भुत जगद्व्यवहार फैला हुआ है ॥ ४९ ॥ द्वैत और अद्वैत आदि भेदसे मेरा ज्ञान भी अनेक प्रकार का है। तथा पर और अपर रूपसे उसके फल भी अनेकों प्रकारके हैं ॥ ५० ॥ द्वैत ज्ञान अनेकों प्रकारका है, क्योंकि उसका आश्रय कोई अन्य होता है। उसे ध्यान भी कहते हैं। यह स्वप्न और मनोराज्यके समान होता है ॥ ५१ ॥ किन्तु [ मनोराज्यके समान होनेपर भी ] उसे फलदायक ही समझना चाहिये, क्योंकि नियति (विधाता) का ऐसा ही विधान है। अपर ज्ञान यद्यपि अनेक प्रकारका है तथापि उनमें मुख्य वही है [ जो ऊपर श्लोक ३६-३७ में बतलाया गया है ] ॥ ५२ ॥
विंशोऽध्यायः । ३१५ प्रोक्तमुख्यापरमयं ध्यानं मुख्यफलक्रमम् । अद्वैतविज्ञानमेव परविज्ञानमीरितम् ॥ ५३ ॥ मामनाराध्य परमां चिरं विद्यां तु श्रीमतीम् । कथं प्राप्येत परमां विद्यामद्वैतसंज्ञिकाम् ॥ ५४ ॥ तदेवाद्वैतविज्ञानं केवला या परा चितिः । तस्याः शुद्धदशामर्शो द्वैतामर्शाभिभावकः ॥ ५५ ॥ चित्तं यदा स्वमात्मानं केवलं ह्यभिसम्पतेत् । तदेवानुविभातं स्याद्विज्ञानमृषिसत्तमाः ॥ ५६ ॥ श्रुतितो युक्तितो वापि केवलात्मविभासनम् । देहाद्यात्मावभासस्य नाशनं ज्ञानमुच्यते ॥ ५७ ॥ तदेव भवति ज्ञानं यज्ज्ञानेन तु किञ्चन । भासमानमपि क्वापि न विभायात् कथञ्चन ॥ ५८ ॥ तदेवाद्वैतविज्ञानं यद्विज्ञानेन किञ्चन । अविज्ञातं नैव भवेत् कदाचिल्लेशतोऽपि च ॥ ५९ ॥ ऊपर बतलाया हुआ वह अपर ब्रह्मका ध्यान मुख्य फल (मोक्ष) का परम्परा-साधन है। पर ज्ञान तो अद्वैतज्ञान ही कहा गया है ॥ ५३ ॥ मैं परमोत्कृष्ट श्रीविद्या हूँ। मेरी चिरकालतक आराधना किये बिना कोई अद्वैत नाम्नी पराविद्याको कैसे प्राप्त कर सकता है ॥ ५४ ॥ जो विशुद्ध पराचिति है वही अद्वैत ज्ञान है। उसके शुद्धस्वरूपका विचार ही द्वैतभावनाकी निवृत्ति करनेवाला है ॥ ५५ ॥ जिस समय चित्त केवल अपने आत्मा-स्वरूपकी ओर ही लगता है, मुनिवरो ! उसी समय उस विशुद्ध विज्ञानका साक्षात्कार होता है ॥५६॥ श्रुति और युक्ति के द्वारा विशुद्ध आत्माका अनुभव होना और देहा- दिमें आत्मभाव का अभाव हो जाना भी ज्ञान ही कहा जाता है ॥ ५७ ॥ ज्ञान तो वास्तवमें वही है जिसके होनेपर जो कुछ भासमान है वह कहीं भी तनिक भी नहीं भासता ॥ ५८ ॥ सच्चा अद्वैत ज्ञान वही है जिसके होनेपर फिर कभी, कुछ भा लेशमात्र भी अज्ञात नहीं रहता ॥ ५९ ॥
३१६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे सर्वविज्ञानात्मरूपं यद्विज्ञानं भवेत् खलु । तदेवाऽद्वैतविज्ञानं परमं तापसोत्तमाः ॥ ६० ॥ जाते यादृशविज्ञाने संशयाश्चिरसम्भृताः । वायुनेवाभ्रजालानि विलीयन्ते परं हि तत् ॥ ६१ ॥ कामादिवासनाः सर्वा यस्मिन् सन्ति न किञ्चन । स्युर्भग्नदंष्ट्राहिरिव तद्विज्ञानं परं स्मृतम् ॥ ६२ ॥ विज्ञानस्य फलं सर्वदुःखानां विलयो भवेत् । अत्यन्ताभयसंप्राप्तिर्मोक्ष इत्युच्यते फलम् ॥ ६३ ॥ भयं द्वितीयसङ्कल्पादद्वैते विदिते दृढम् । कुतः स्याद् द्वैतसङ्कल्पस्तमः सूर्योदये यथा ॥ ६४ ॥ ऋषयो न भयं क्वापि द्वैतसङ्कल्पवर्जने । अतो यत् फलमन्यत् स्यात्तद्भयं सर्वथा भवेत् ॥ ६५ ॥ अन्तवत्तु द्वितीयं स्याद् भूयो लोके समीक्षणात् । श्रेष्ठ तपस्वियो ! जिस विज्ञानके द्वारा घट-पटादि सम्पूर्ण विज्ञान आत्मस्वरूप हो जाते हैं वही वास्तवमें परम अद्वैतविज्ञान है ॥ ६० ॥ जिस प्रकारका विज्ञान उत्पन्न होनेपर चिरकालसे पोषित सारे संशय वायुसे मेघमालाके समान लीन हो जाते हैं वही परविज्ञान है ॥ ६१ ॥ जिसके होनेपर कामादि सम्पूर्ण वासनाएँ कुछ भी नहीं रहतीं- रहती भी हैं तो दाँत तोड़े हुए सर्पके समान व्यर्थ हो जाती हैं, वही विज्ञान पर माना गया है ॥ ६२ ॥ इस विज्ञानका फल सम्पूर्ण दुःखोंकी निवृत्ति और पूर्ण निर्भयताकी प्राप्ति है। यह मोक्ष ही उसका फल कहा जाता है ॥ ६३ ॥ भय तो किसी दूसरेका संकल्प होनेपर होता है। और दृढ अद्वैतज्ञान होनेपर द्वैतका संकल्प हो कैसे सकता है ? जैसे सूर्योदय होनेपर नहीं हो सकता ॥ ६४ ॥ ऋषियो ! द्वैतका संकल्प छूट जानेपर फिर कहीं भय नहीं रहता। इसलिये जो फल आत्मस्वरूपसे भिन्न होगा वह तो सब प्रकार भय रूप ही होगा ॥ ६५ ॥ अपनेसे भिन्न जो भी पदार्थ होगा वह नाशवान् ही होगा, क्योंकि
विंशोऽध्यायः । ३१७ सान्ते भयं सर्वथैवाभयं तस्मात् कुतो भवेत् ॥ ६६ ॥ संयोगो विप्रयोगान्तः सर्वथैव विभावितः । फलयोगोऽपि तस्माद्धि विनश्येदिति निश्चयः ॥ ६७ ॥ यावदन्यत् फलं प्रोक्तं भयं तावत्प्रकीर्तितम् । तदेवाभयरूपन्तु फलं सर्वै प्रचक्षते ॥ ६८ ॥ यदात्मनोऽन्यदेव फलं मोक्षः प्रकीर्तितः । ज्ञाता ज्ञानं ज्ञेयमपि फलं चैकं यदा भवेत् ॥ ६९ ॥ तदा हि परमो मोक्षः सर्वभीतिविवर्जितः । ज्ञानं विकल्पसङ्कल्पहानं मौढ्यविवर्जितम् ॥ ७० ॥ ज्ञातुः स्वच्छात्मरूपं तदादावनुपलक्षितम् । उपदेशक एवातो गुरुः शास्त्रं च नेतरत् ॥ ७१ ॥ एतदेव हि विज्ञेयस्वरूपमभिधीयते । ज्ञातृज्ञानज्ञेयगतो यावद्भेदोऽवभासते ॥ ७२ ॥ लोकमें ऐसा अनेकों बार देखा गया है। नाशवान्में तो सब प्रकार भय रहता ही है, इसलिये उसे पाकर कोई निर्भय कैसे हो सकता है ? ॥ ६६ ॥ संयोग तो सब प्रकार वियोगमें समाप्त होनेवाला ही देखा गया है। इसलिये यह निश्चय है कि किसी अन्य फलका संयोग भी अन्तमें नष्ट होगा ही ॥ ६७ ॥ अतः जबतक आत्मासे भिन्न कोई और फल रहता है तबतक तो भय कहा ही है। सभी ने अभयरूप फल तो वही बतलाया है जिसे आत्मासे अभिन्न मोक्षरूप फल कहते हैं; जब कि ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय और फल भी एकरूप हो जाते हैं ॥ ६८-६९ ॥ तभी सब प्रकारके भयसे शून्य परम मोक्ष प्राप्त होता है तथा सम्पूर्ण सङ्कल्प-विकल्पों की निवृत्तिपूर्वक अज्ञानशून्य ज्ञानका उदय भी ॥ ७० ॥ ज्ञाताको अपना यह शुद्ध स्वरूप पहले मालूम नहीं होता। अतः गुरु और शास्त्र ही उसका उपदेश करनेवाले हैं, कोई अन्य नहीं ॥ ७१ ॥ यही विज्ञेयका स्वरूप भी कहा जाता है। जबतक ज्ञाता, ज्ञान
३१८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तावज्ज्ञाता ज्ञानमपि ज्ञेयं वा न भवेत् क्वचित् । यदा भेदो विगलितो ज्ञात्रादीनां मिथः स्थितः ॥ ७३ ॥ तदा ज्ञात्रादिसम्पत्तिरेतदेव फलं स्मृतम् । ज्ञात्रादिफलपर्यन्तं न भेदो वस्तुतो भवेत् ॥ ७४ ॥ व्यवहारप्रसिद्ध्यर्थं भेदस्तत्र प्रकल्पितः । अतः पूर्वं लभ्यमत्र फलं नास्त्येव किञ्चन ॥ ७५ ॥ आत्मैव मायया ज्ञातृज्ञानज्ञेयफलात्मना । यावद्भाति भवेत्तावत् संसारो ह्यचलोपमः ॥ ७६ ॥ यथा कथञ्चिदेतत्तु भायाद्भेदविवर्जितम् । संसारो विलयं यायाच्छिन्नाभ्रमिव वायुना ॥ ७७ ॥ एवंविधमहामोक्षे तत्परत्वं हि साधनम् । तत्परत्वे तु संपूर्गे नान्यत् साधनमिष्यते ॥ ७८ ॥ और ज्ञेयका भेद भासता है तबतक तो वास्तवमें वे ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय हैं ही नहीं। जिस समय इन ज्ञाता आदिका पारस्परिक भेद गलित हो जाता है तभी वास्तवमें वे ज्ञाता आदि होते हैं। और यही इस ज्ञानका फल भी माना गया है ॥ ७३-७४ पू० ॥ वास्तवमें ज्ञातासे लेकर फलपर्यन्त१ कोई भेद है ही नहीं, केवल व्यवहारकी सिद्धिके लिये ही इनमें भेद-कल्पना कर लिया गया है। अतः इस भेदकल्पनासे पूर्व यहाँ प्राप्त करने योग्य कोई फल भी नहीं है ॥ ७४ उ०-७५ ॥ जबतक मायासे यह आत्मा ही ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय और फल- रूपसे भास रहा है, तब तक तो यह संसार पर्वतके समान खड़ा हुआ है ॥ ७६ ॥ किन्तु किसी भी प्रकार यदि यह भेदहीन भासने लगे तो वायुसे छिन्न-भिन्न हुए बादलकी तरह सारा 'संसार लीन हो जाता है ॥ ७७ ॥ इस प्रकारका महामोक्ष प्राप्त करनेके लिये तत्परता ही मुख्य साधन है। यदि पूरी तत्परता हो तो फिर किसी अन्य साधनकी अपेक्षा नहीं होती ॥ ७८ ॥ १. अर्थात् ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय और फलमें।
विशोऽध्यायः। ३१६ अपूर्णे तत्परत्वे तु किं सहस्रसुसाधनैः । तस्मात्तात्पर्यमेव स्यान्मुख्यं मोक्षस्य साधनम् ॥ ७९ ॥ तात्पर्यं सर्वथैतत्तु साधयामीति संस्थितिः । यस्तात्पर्येण संयुक्तः सर्वथा मुक्त एव सः ॥ ८० ॥ दिनैर्मासैर्वत्सरैर्वा मुक्तः स्याद्वाऽन्यजन्मनि । बुद्धिनैर्मल्यभेदेन चिरशीघ्रव्यवस्थितिः ॥ ८१ ॥ बुद्धौ तु बहवो दोषाः सन्ति सर्वार्थनाशनाः । यैर्जनाः सततन्त्वेवं पच्यन्ते घोरसंसृतौ ॥ ८२ ॥ तत्राद्यः स्यादनाश्वासो द्वितीयः कामवासना । तृतीयो जाड्यता प्रोक्ता त्रिधैवं दोषसंग्रहः ॥ ८३ ॥ द्विविधः स्यादनाश्वासः संशयश्च विपर्ययः । मोक्षोऽस्ति नास्ति वेत्याद्यः संशयः समुदाहृतः ॥ ८४ ॥ यदि तत्परता पूरी न हो तो अन्य हजारों साधनोंसे भी क्या लाभ ? अतः तत्परता ही मोक्षका मुख्य साधन है ॥ ७९ ॥ ‘जैसे भी होगा इस कार्यको अवश्य पूर्ण करूँगा’ इस स्थितिका नाम ही तत्परता है। जो तत्परतासे युक्त है वह तो सब प्रकार मुक्त ही है ॥ ८० ॥ वह कुछ दिनोंमें, महीनोंमें, वर्षोंमें अथवा दूसरे जन्ममें मुक्त हो ही जायगा। बुद्धिकी निर्मलताके भेदसे ही उसके शीघ्र या देरीसे मुक्त होनेकी व्यवस्था समझनी चाहिये ॥ ८१ ॥ बुद्धिमें तो सब प्रकारके पुरुषार्थको विफल कर देनेवाले अनेकों दोष होते हैं, जिनके कारण लोग निरन्तर इसी तरह जन्ममरण- रूप भयंकर संसाराग्निमें जलते रहते हैं ॥ ८२ ॥ उनमें पहला दोष है अनाश्वास (अविश्वास), दूसरी है काम- वासना और तीसरी है जडता। इस प्रकार संक्षेपसे तीन प्रकारके दोष हैं ॥ ८३ ॥ अनाश्वास दो प्रकारका है—संशय और विपर्यय। मोक्ष है भी या नहीं—यह पहला संशय दोष कहा गया है ॥ ८४ ॥
३२० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे नास्त्येव मोक्ष इत्याद्यो भवेदत्र विपर्ययः । एतद् द्वयन्तु तात्पर्ये मुख्यं स्यात् प्रतिबन्धकम् ॥ ८५ ॥ विपरीतनिश्चयेन नश्येदेतद् द्वयं क्रमात् । अत्रोपायो मुख्यतमो मूलोच्छेदो न चापरः ॥ ८६ ॥ अनाश्वासस्य मूलन्तु विरुद्धतर्कचिन्तनम् । तत्परित्यज्य सत्तर्कावर्धनस्य प्रसाधने ॥ ८७ ॥ विपरीतो निश्चयः स्यान्मूलोच्छेदनपूर्वकः । ततः श्रद्धासमुदयादनाश्वासः प्रणश्यति ॥ ८८ ॥ कामादिवासना बुद्धेः श्रवणे प्रतिबन्धिका । कामादिवासनाविष्टा बुद्धिर्नैव प्रवर्त्तते ॥ ८९ ॥ लोकेऽपि कामी काम्यस्य सदा ध्यानैकतत्परः । पुरःस्थितं न पश्येच्च श्रोत्रोक्तं शृणुयान्न च ॥ ९० ॥ मोक्ष है ही नहीं—यह मुख्य विपर्यय दोष है। ये दोनों दोष तत्परताके प्रधान प्रतिबन्धक हैं ॥ ८५ ॥ इससे विपरीत निश्चय करनेसे क्रमशः ये दोनों दोष निवृत्त हो जाते हैं। किन्तु इनकी निवृत्तिका मुख्यतम उपाय तो इनके मूलका नाश कर देना ही है, कोई अन्य नहीं ॥ ८६ ॥ अनाश्वासका मूल है शास्त्रविरुद्ध तर्कोंका चिन्तन करना। उसे त्यागकर यदि शास्त्रानुसारी तर्कोंका आश्रय लिया जाय तो विपरीत निश्चय मूलोच्छेदनपूर्वक नष्ट हो जायगा। तब श्रद्धाका उदय होगा और अनाश्वास नष्ट हो जायगा ॥ ८७-८८ ॥ कामादि वासनाएँ बुद्धिके श्रवणमें प्रतिबन्ध डालने वाली हैं; क्योंकि जो बुद्धि कामादि वासनाओंसे भरी होती है वह तात्त्विक विषयको ग्रहण नहीं कर पाती ॥ ८९ ॥ लोकमें भी देखा जाता है कि कामनायुक्त पुरुष सर्वदा अपने काम्य विषयके चिन्तनमें ही लगा रहता है। वह सामने रखी वस्तु-को भी देख नहीं पाता और कानमें कही हुई बातको भी सुन नहीं पाता ॥ ९० ॥
विंशोऽध्यायः । ३२१ कामादिवासितस्यैवं श्रुतं चाश्रुतसम्मितम् । कामादिवासनां तस्माज्जयेद्वैराग्यसम्पदा ॥ ९१ ॥ सन्ति कामक्रोधमुखा वासनास्तु सहस्रशः । तत्र कामो मूलभूतस्तन्नाशे न हि किञ्चन ॥ ९२ ॥ ततो वैराग्यसंयोगान्नाशयेत् कामवासनाम् । आशा हि कामः संप्रोक्त एतन्मे स्यादिति स्थिता ॥ ९३ ॥ शक्येषु स्थूलभूता सा सूक्ष्माऽशक्येषु संस्थिता । दृढवैराग्ययोगेन सर्वां तां प्रविनाशयेत् ॥ ९४ ॥ तत्र मूलं काम्यदोषपरामर्शः प्रतिक्षणम् । वैमुख्यं विषयेभ्यश्च वासना नाशयेदिति ॥ ९५ ॥ यस्तृतीयो बुद्धिदोषो जाड्यरूपो व्यवस्थितः । असाध्यः सोऽभ्यासमुखैः सर्वथा ऋषिसत्तमाः ॥ ९६ ॥ येन तात्पर्यतश्चापि श्रुतं बुद्धिमनारुहेत् । अतः जिसका चित्त कामादि वासनाओंसे भरा है उसका शास्त्र- श्रवण तो न सुननेके ही समान है। अतः वैराग्यरूप सम्पत्तिसे कामादि वासनाओंको वशमें करे ॥ ६१ ॥ काम-क्रोधादि वासनाएँ तो हजारों हैं। उनमें काम सबका मूल है। उसका नाश होनेपर कोई वासना नहीं रहती ॥ ६२ ॥ अतः वैराग्यकी सहायतासे कामवासनाको नष्ट करे। आशा ही काम कही जाती है, जो 'मुझे यह मिल जाय' इस रूपमें रहती है॥६३॥ जो पदार्थ प्राप्त हो सकते हैं उनमें वह स्थूल रूपमें रहती है और जिनकी प्राप्ति नहीं हो सकती उनमें सूक्ष्म रूपसे । उस सभी प्रकारकी आशाको दृढ वैराग्यके द्वारा नष्ट कर देना चाहिये ॥ ६४ ॥ उसका मूल साधन है प्रतिक्षण काम्य · वस्तुओंका दोषचि- न्तन। विषयोंसे विमुखता रहेगी तो वह उनकी वासनाओंको नष्ट कर देगी ॥ ६५ ॥ बुद्धिका जडतारूप जो तीसरा दोष है, मुनिवरो ! उसे अभ्या- सादिके द्वारा निवृत्त करना तो सर्वथा असम्भव है ॥ ६६ ॥ जिसके कारण तत्परतापूर्वक सुनीहुई बात भी बुद्धिमें नहीं
३२२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तज्जाड्यं हि महान् दोषः पुरुषार्थविनाशनः ॥ ९७ ॥ तत्रात्मदेवतासेवामृते नान्यद्धि कारणम् । सेवायास्तारतम्येन जाड्यं तस्य हराम्यहम् ॥ ९८ ॥ जाड्याल्पानल्पभावेन सद्यो वा परजन्मनि । भवेत्तस्य फलप्राप्तिर्जाड्यसंयुक्तचेतसः ॥ ९९ ॥ सर्वसाधनसम्पत्तिर्ममैव प्रणिधानतः । उपयाति च यो भक्त्या सर्वदा मामकैटवात् ॥ १०० ॥ स साधनप्रत्यनीकं विधूयाशु कृती भवेत् । यस्तु मामीश्वरीं सर्वबुद्धिप्रसरकारिणीम् ॥ १०१ ॥ अनादृत्य साधनैकपरः स्यान्मूढभावतः । पदे पदे विहन्येत फलं प्राप्येत वा न वा ॥ १०२ ॥ तस्मात्तु ऋषयो मुख्यं तात्पर्यं साधनं भवेत् । एवं तात्पर्यवानेव साधकः परमः स्मृतः ॥ १०३ ॥
बैठती वह जडतारूप महान् दोष सभी पुरुषार्थोंको व्यर्थ कर देने- वाला है ॥ ९७ ॥ उसकी निवृत्तिका उपाय तो परमात्मदेवकी उपासनाके सिवा और कोई नहीं है। साधककी उपासनाकी न्यूनाधिकताके अनुसार मैं उसकी जडता दूर कर देती हूँ ॥ ९८ ॥ उस जडचित्तवाले साधकको उसकी जडताकी न्यूनता या अधिकताके अनुसार उसी अथवा अगले जन्ममें फलकी प्राप्ति हो जाती है ॥ ९९ ॥ सब प्रकारके साधनोंकी पूर्णता मेरी उपासनासे ही होती है। जो सर्वदा निश्छल भावसे भक्तिपूर्वक मेरी उपासना करता है वह साध- नके सभी विघ्नोंको पार करके कृतकृत्य हो जाता है ॥१००-१०१ पू०॥ जो सभीकी बुद्धियोंको प्रवृत्त करनेवाली मुझ भगवतीका अनादर करके मूढ चित्तसे केवल साधनमें लगा रहता है वह पद-पदमें ठोकर खाता है और उसे फल की प्राप्ति हो भी सकती है और नहीं भी ॥ १०१ उ०-१०२ ॥ इसलिये ऋषियो ! मुख्य साधन तो तत्परता ही है। इस प्रकार जो तत्परता-सम्पन्न है वही श्रेष्ठ साधक माना जाता है। उनमें भी
विंशोऽध्यायः । ३२३ तत्र मद्भक्तियुक्तस्तु साधकः सर्वपूजितः । सिद्धिरात्मव्यवस्थितिर्देहानात्मत्वभावना ॥ १०४ ॥ आत्मत्वभावनं नूनं शरीरादिषु संस्थितम् । तदभावनमात्रन्तु सिद्धिमौढ्यविवर्जितम् ॥ १०५ ॥ आत्मा व्यवसितः सर्वैरपि नो केवलात्मना । अतएव तु सम्प्राप्ता महानर्थपरम्परा ॥ १०६ ॥ तस्मात् केवलचिन्मात्रं यद्देहाद्यवभासकम् । तन्मात्रात्मव्यवस्थितिः सर्वसंशयनाशिनी ॥ १०७ ॥ सिद्धिरित्युच्यते प्राज्ञैर्नान्तः सिद्धिरनन्तरा । सिद्धयः खेचरत्वाद्या अणिमाद्यास्तथैव च ॥ १०८ ॥ आत्मविज्ञानसिद्धेस्तु कलां नार्हन्ति षोडशीम् । ताः सर्वास्तु परिच्छिन्नाः सिद्धयो देशकालतः ॥ १०९ ॥ इयं स्यादपरिच्छिन्ना स्वात्मविद्या शिवात्मिका । जो साधक मेरी भक्तिसे युक्त होता है वह तो सभी का आदरणीय होता है ॥ १०३-१०४ पू० ॥ देहमें अनात्मत्वकी भावना और आत्मामें स्थिति—इसका नाम ही सिद्धि है । शरीरादिमें जो आत्मत्व-भावना हो रही है उसका अभाव हो जाना ही अज्ञानसे रहित सिद्धि है ॥ १०४ उ०-१०५ ॥ सभी लोगोंसे आत्माका शुद्धरूपसे निश्चय किया हुआ नहीं है । इसीसे यह जन्म-मरणरूप महान् अनर्थ-परम्परा प्राप्त हुई है ॥ १०६ ॥ अतः जो शुद्ध चिन्मात्र देहादि दृश्यवर्गोंको प्रकाशित करने- वाला है केवल तद्रूपसे ही स्थित रहना—इस सम्पूर्ण संशयों- को नष्ट कर देनेवाली स्थितिको ही विज्ञजनोंने सिद्धि कहा है । इससे भिन्न आकाशगमनादि और अणिमादि सिद्धियाँ वास्तविक सिद्धि नहीं हैं ॥ १०७-१०८ ॥ वे सब सिद्धियाँ तो देश और कालसे परिच्छिन्न हैं । अतः वे आत्म- ज्ञानरूपा सिद्धिके तो सोलहवें अंशके बराबर भी नहीं हैं ॥ १०६ ॥ यह शिवस्वरूपा आत्मविद्या तो अपरिच्छिन्न है । वे सब तो
३२४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे स्वात्मविद्यासाधनेषु ताः सर्वाः सुप्रतिष्ठिताः ॥ ११० ॥ आत्मविद्याविधावेतास्त्वन्तरायप्रयोजकाः । किं ताभिरिन्द्रजालात्मसिद्धितुल्याभिरीहितम् ॥ १११ ॥ यस्य साक्षाद् ब्रह्मपदमपि स्यात्तृणसम्मितम् । कियन्त्येताः सिद्धयो वै कालक्षेपणहेतवः ॥ ११२ ॥ तस्मात् सिद्धिर्नेतरा स्यादात्मविज्ञानसिद्धितः । ययाऽत्यन्तशोकनाशो भवेदानन्दसान्द्रता ॥ ११३ ॥ सैव सिद्धिर्नेतरा तु मृत्युग्रासविमोचिनी । इयमात्मज्ञानसिद्धिर्विविधाऽभ्यासभेदतः ॥ ११४ ॥ बुद्धिर्नैर्मल्यभेदाच्च परिपाकविभेदतः । संक्षेपतस्तु त्रिविधा चोत्तमा मध्यमाऽधमा ॥ ११५ ॥ लोके द्विजानामृषयः पठिता श्रुतिसम्मिता । मेधया च महाभ्यासाद्व्यापारशतसङ्कुला ॥ ११६ ॥ आत्मज्ञानके साधनोंमें ही प्रतिष्ठित हैं। [ अर्थात् साधन करते-करते वे स्वयं ही आ जाती हैं ] ॥ ११० ॥ किन्तु वे आत्मज्ञानकी प्राप्तिमें तो विघ्न करनेवाली हैं, भला जिज्ञासुको इन्द्रजालिकके चमत्कारों-जैसी उन सिद्धियोंसे क्या लेना है ॥ १११ ॥ जिसकी दृष्टिमें साक्षात् ब्रह्माका पद भी तृणके समान है उसके लिये केवल समय काटनेमें उपयोगी इन सिद्धियोंका क्या मूल्य है ? ॥ ११२ ॥ अतः आत्मविज्ञानरूपा सिद्धिसे बढ़कर और कोई सिद्धि नहीं है, जिससे कि शोकका सर्वथा नाश और आनन्दघनताकी प्राप्ति हो जाती है ॥ ११३ ॥ कालके गालसे बचानेवाली भी केवल वही सिद्धि है, कोई अन्य नहीं। अभ्यास, बुद्धिकी शुद्धि और ज्ञानकी पुष्टिके तारतम्यसे यह आत्म- ज्ञानरूपा सिद्धि अनेक प्रकारकी है। किन्तु ऋषियो ! लोकमें ब्राह्मण द्वारा पढ़ी हुई श्रुतिके समान यह तीन प्रकार की है—उत्तम, मध्यम और अधम ॥ ११४-११६ पू० ॥ बुद्धिकी प्रखरता और अत्यन्त अभ्यासके कारण जिस श्रुतिके
विंशोऽध्यायः। १२५ अप्यस्खलितवर्णा या पठिता श्रुतिरुत्तमा । समाहितस्य व्यापारेऽसमाहितस्य चान्यदा ॥ ११७ ॥ पूर्ववद्याऽप्यस्खलिता पठिता मध्यमा श्रुतिः । या सदा ह्यनुसन्धानयोगादेव भवेत्तथा ॥ ११८ ॥ पठिता श्रुतिरत्यन्तास्खलिता मध्यमा हि सा । एवमेवात्मविज्ञानसिद्धिरुक्ता त्रिधर्षयः ॥ ११९ ॥ या महाव्यवहारेषु प्रतिसन्धानवर्जने । अन्यदा तद्वर्जने वा सर्वदा प्रतिसन्धितः ॥ १२० ॥ अन्यूनाधिकभावा स्यात् सोत्तमा मध्यमाऽधमा । अत्रोत्तमैव संसिद्धेः पराकाष्ठा निरूपिता ॥ १२१ ॥ स्वप्नादिष्वप्यवस्थासु यदा स्यात् परमा स्थितिः । विचारक्षणतुल्येव सिद्धिः सा परमोत्तमा ॥ १२२ ॥
पाठमें सैकड़ों व्यापारोंके रहते हुए भी वर्ण या स्वरमें अन्तर नहीं आता वह उत्तम श्रुति है ॥ ११६ उ०-११७ पू० ॥ व्यापारके समय समाहित ( सावधान ) रहनेपर और अन्य समय ( व्यापारका झंझट न होनेपर ) समाहित न रहनेपर भी जो पहले ही की तरह अस्खलितरूपसे पढ़ी जा सकती है वह मध्यम श्रुति है ॥ ११७ उ०-११८ पू० ॥ जो सर्वदा अनुसन्धानपूर्वक ही पढ़ी जाती है और जिसमें बहुत-सी भूलें भी रहती हैं वह अधमा श्रुति है ॥ ११८ उ०-११९ पू० ॥ ऋषियो ! उसी प्रकार आत्मविज्ञानकी सिद्धि भी तीन प्रकारकी कही गयी है । जो बहुत अधिक व्यवहार होनेपर अथवा अनुसन्धान न करनेपर भी रहती है वह उत्तम, जो व्यापार न रहनेपर ही स्वभावसिद्ध है वह मध्यम और जो सर्वदा आत्मानुसन्धान करते रहनेपर ही न्यूनाधिक भावसे रहित रहती है वह अधम सिद्धि है । इनमें उत्तम ही सिद्धिकी पराकाष्ठा कही गयी है ॥ ११९ उ०-१२१ ॥ जिस समय स्वप्नादि अवस्थाओंमें भी विचारकालकी तरह ही उत्तम स्थिति रहे वह सिद्धि परम उत्तम मानी गयी है ॥ १२२ ॥
३२६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे सर्वत्र व्यवहारेषु यत्नात् संस्कारबोधतः । यदा प्रवृत्तिस्सिद्धेः सा पराकाष्ठा समीरिता ॥ १२३ ॥ अयत्नेनैव परमे स्थितिः संवेदनात्मनि । अव्याहता यदा सिद्धिस्तदा काष्ठां समागता ॥ १२४ ॥ व्यवहारपरो भावान् पश्यन्नपि न पश्यति । द्वैतं तदा हि सा सिद्धिः पूर्णतामभिसङ्गता ॥ १२५ ॥ जागरादौ व्यवहरन्नपि निद्रितवद्यदा । स्थितिस्तदा हि सा सिद्धिः पूर्णतामभिसङ्गता ॥ १२६ ॥ एवं सिद्धिमनुप्राप्तः सिद्धेषूत्तम उच्यते । व्यवहारपरो नित्यं न समाधिं विमुञ्चति ॥ १२७ ॥ कदाचिदपि मेधावी स सिद्धेषूत्तमो मतः । ज्ञानिनां विविधानां च स्थितिं जानाति सर्वदा ॥ १२८ ॥ स्वानुभूत्या स्वान्तरेव स सिद्धेषूत्तमो मतः । संशयो वापि कामो वा यस्य नास्त्येव लेशतः ॥ १२९ ॥ जिस समय पूर्व-संस्कार उदित होनेपर सब व्यवहारोंमें प्रयत्न करनेपर प्रवृत्ति हो उसे सिद्धिकी पराकाष्ठा कहा है ॥ १२३ ॥ तथा बिना प्रयत्न ही ज्ञानस्वरूप परमतत्त्वमें निरन्तर स्थिति रहे तब सिद्धिकी पराकाष्ठा हो जाती है ॥ १२४ ॥ जिस समय व्यवहारमें लगे रहनेपर भी विभिन्न वस्तुओंको और द्वैतको देखते हुए भी नहीं देखता तो उस समय वह उत्तमा सिद्धि पूर्णताको प्राप्त हो जाती है। जब जाग्रत आदि अवस्थाओंमें व्यवहार करते हुए भी सोये हुएके समान रहे तब ही वह सिद्धि पूर्णताको प्राप्त होती है। इस प्रकारकी सिद्धिको प्राप्त हुआ पुरुष सिद्धोंमें श्रेष्ठ कहा जाता है ॥ १२५-१२७ पू० ॥ जो निरन्तर व्यवहारमें लगा रहनेपर भी कभी समाधिको नहीं छोड़ता वह सिद्धोंमें श्रेष्ठ माना गया है ॥ १२७ उ०-१२८ पू० ॥ जो अपने अनुभवके द्वारा अपनी ही तरह अन्य ज्ञानियोंकी विभिन्न स्थितियोंको भी सर्वदा जान लेता है वह सिद्धोंमें श्रेष्ठ माना गया है ॥ १२८ उ०-१२६ पू० ॥ जिसे लेशमात्र भी संशय या कामना नहीं है तथा व्यव-
विंशोऽध्यायः । ३२७ निर्भयो व्यवहारेषु स सिद्धेषूत्तमो मतः । सर्वं सुखञ्च दुःखञ्च व्यवहारञ्च जागतम् ॥ १३० ॥ स्वात्मन्येवाभिजानाति स सिद्धेषूत्तमो मतः । अत्यन्तं बद्धमात्मानं मुक्तञ्चापि प्रपश्यति ॥ १३१ ॥ यः स्वात्मनि तु सर्वात्मा स सिद्धेषूत्तमो मतः । यः पश्यन् बन्धजालानि सर्वदा स्वात्मनि स्फुटम् ॥ १३२ ॥ मोक्षं नापेक्षते क्वापि स सिद्धेषूत्तमो मतः । सिद्धोत्तमोऽहमेवेह न भेदस्त्वावयोः क्वचित् ॥ १३३ ॥ एतद्वो ऋषयः प्रोक्तं सुस्पष्टमनुयुक्त्या । एतन्मयोक्तं विज्ञाय न क्वचित् परिमुह्यते ॥ १३४ ॥ इत्युक्ता सा परा विद्या विरराम भृगूद्वह । श्रुत्वैतदृषयः सर्वे सन्देहमपहाय च ॥ १३५ ॥ हारमें किसी प्रकारका भय नहीं है वह सिद्धोंमें श्रेष्ठ माना गया है ॥ १२६ उ०-१३० पू० ॥ जो सम्पूर्ण सुख, दुःख और संसारके व्यवहारको अपने आत्मा- में ही भासमान समझता है वह सिद्धोंमें श्रेष्ठ माना गया है ॥ १३० उ०-१३१ पू० ॥ जो अत्यन्त बद्ध और मुक्त पुरुषको भी अपने स्वरूपमें ही देखता है वह सर्वात्मा सिद्धोंमें श्रेष्ठ माना गया है ॥ १३१ उ०-१३२ पू० ॥ जो सम्पूर्ण बन्धनोंको भी सर्वदा स्पष्टतया अपने आत्मस्वरूपमें ही भासमान देखनेके कारण कभी मोक्षकी भी इच्छा नहीं करता वह सिद्धोंमें श्रेष्ठ माना गया है ॥ १३२ उ०-१३३ पू० ॥ अधिक क्या वह श्रेष्ठ सिद्ध मैं ही हूँ। मेरा और उसका कभी कोई अन्तर नहीं है। ऋषियो ! यह मैंने तुम्हारे प्रश्नोंका स्पष्ट उत्तर दे दिया। मेरे इस कथन को ठीक-ठीक समझ लेनेपर फिर मोह नहीं होता ॥ १३३ उ०-१३४ ॥ भृगुनन्दन ! ऐसा कहकर वह परा विद्या मौन हो गयी। उसका उपदेश सुनकर सभी ऋषियोंका सन्देह दूर हो गया तथा वे
३२८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे नत्वा शिवादीन् लोकेशान् जग्मुः स्वं स्वं निवेशनम् । विद्यागीता मयैषा ते प्रोक्ता पापौघनाशिनी ॥ १३६ ॥ श्रुता विचारिता सम्यक् स्वात्मसाम्राज्यदायिनी । विद्यागीताऽत्युत्तमेयं साक्षाद्विद्या निरुपिता ॥ १३७ ॥ पठतां प्रत्यहं प्रीता ज्ञानं दिशति सा स्वयम् । संसारतिमिराम्भोधौ मज्जतां तरणिर्भवेत् ॥ १३८ ॥ इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे विद्यागीतानाम विंशतितमोऽध्यायः । शिव आदि देवगणोंको नमस्कार कर अपने-अपने स्थानको चले गये ॥ १३५-१३६ पू० ॥ यह मैंने तुम्हें सम्पूर्ण पापसमूहका नाश करनेवाली विद्यागीता सुनायी। इसका यदि अच्छी तरह श्रवण और विचार किया जाय तो वह स्वात्मानन्दरूप साम्राज्य प्रदान करनेवाली है ॥ १३६ उ०-१३७ पू० ॥ यह अति उत्तम विद्यागीता साक्षात् विद्यादेवीकी ही कही हुई है। जो लोग इसका प्रतिदिन पाठ करते हैं उन्हें प्रसन्न होकर वह स्वयं ज्ञान प्रदान कर देती हैं। इस संसाररूप अन्धकारके समुद्रमें डूबने- वालोंके लिये यह सूर्य या नौकाके समान है ॥ १३७ उ०-१३८ ॥ विंश अध्याय समाप्त । १. यहाँ मूलमें 'तरणि' शब्द है। इसका अर्थ 'सूर्य' भी है और 'नौका' भी। अन्धकारसे पार होनेसे सूर्य और समुद्रसे पार होनेमें नौका उपयोगी है। अतः इसके दोनों ही अर्थ सार्थक हैं। शब्दश्लेषका यह सुन्दर उदाहरण है।
एकविंशतितमोऽध्यायः श्रुत्वेत्थं भार्गवो रामो दत्तात्रेयमुनेरितम् । अविद्याजालविभ्रान्तेर्मुक्तप्रायो बभूव ह ॥ १ ॥ पुनः पप्रच्छाऽत्रिसुतं किञ्चिन्नत्वा सुभक्तितः । भगवन् ब्रूहि विज्ञानसाधनं सुनिश्चितम् ॥ २ ॥ सारभूतञ्च सुलभं यत् साक्षात् फलदायकम् । ज्ञानिनां लक्षणञ्चापि येन ज्ञास्यामि तान् द्रुतम् ॥ ३ ॥ ज्ञानिनां देहसंयोगे वियोगे च स्थितिं यथा । व्यवहारं कुर्वतां चाप्यनासक्तं मनः कथम् ॥ ४ ॥ एतत् सर्वं सुकृपया स्पष्टं मे वक्तुमर्हसि । एवमत्रिसुतः पृष्टो जमदग्निसुतेन वै ॥ ५ ॥ सन्तुष्टः प्राह करुणासिन्धुः सम्बोध्य भार्गवम् । शृणु राम प्रवक्ष्यामि रहस्यं ज्ञानसाधनम् ॥ ६ ॥ एकविंशतितमोऽध्यायः ॥ २१ ॥ ज्ञानके मुख्य साधन, ज्ञानियोंके लक्षण तथा हेमाङ्गद और ब्रह्मराक्षसका संवाद इस प्रकार भृगुनन्दन परशुराम दत्तात्रेयजीका उपदेश सुनकर अवि- द्याजालरूप भ्रमसे प्रायः मुक्त हो गये ॥ १ ॥ फिर अत्यन्त भक्तिपूर्वक नमस्कार कर उन्होंने अत्रिनन्दन दत्ता- त्रेयजीसे इस प्रकार कुछ प्रश्न किया, "भगवन् ! ज्ञानप्राप्तिके अत्यन्त निश्चित और सारभूत साधन बताइये, जो सुलभ भी हों और साक्षात् मोक्षरूप फल प्रदान करनेवाले हों । साथ ही ज्ञानियों के लक्षण भी बतलाइये, जिनसे मैं उन्हें तत्काल पहचान सकूँ ॥ २-३ ॥ देहका अनुसन्धान रहने और न रहनेके समय उनकी जैसी स्थिति रहती है तथा व्यवहार करते समय भी किस प्रकार उनका मन उसमें आसक्त नहीं होता—कृपया ये सभी बातें मुझे स्पष्टतया बतलाइये" ॥ ४-५ पू० ॥ परशुरामके इस प्रकार प्रश्न करनेपर करुणासागर दत्तात्रेयजी बड़े प्रसन्न हुए और उन्हें सम्बोधन करके कहने लगे—"परशुराम ! सुनो, मैं तुम्हें ज्ञानके गुप्त साधन बतलाता हूँ ॥ ५ उ०-६ ॥