वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीयएकता एवम् अखण्डता संस्कृत वाचस्पति डॉ० अन्नपूर्णा मिश्रा एम.ए. (संस्कृत), पी-एच.डी., शास्त्री, साहित्याचार्य, पूर्व प्राचार्या गोकुलदास हिन्दू गर्ल्स पोस्ट ग्रैजुएट कॉलेज, मुरादाबाद (उ०प्र०) पुस्तकालय 181321 कांगड़ी विश्वविद्यालय R14,MIS-V 181321 परिमल पब्लिकेशन्स दिल्ली CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्रकाशक : परिमल पब्लिकेशन्स कार्यालय : २७/२८, शक्ति नगर, दिल्ली - ११०००७ बिक्री केन्द्र : २२/३, शक्ति नगर, दिल्ली - ११०००७ दूरभाष : २३८४५४५६, ४७०१५१६८ ई-मेल : order@parimalpublication.com 14 मिश्रा - वै © प्रकाशक ISBN : 978-81-7110-375-1 प्रथम संस्करण : वर्ष २०११ मूल्य : ४५०.०० रुपये 181 मुद्रक विशाल कौशिक प्रिंटर्स नजदीक जी.टी.बी. हास्पिटल, जगतपुरी विस्तार, दिल्ली-११००९३ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्ररोचना वैदिकवाङ्मय समस्त ज्ञान का प्राचीनतम कोश है। यह क्रान्तदृष्टा भारतीय ऋषियों की ऋतम्भरा-प्रज्ञा की शाश्वत परिणति है। शब्द-ब्रह्म की पावन अवधारणा को सिद्ध करने वाला वैदिकवाङ्मय विश्व विश्रुत है। मानव-सभ्यता, संस्कृति एवं ज्ञान-विज्ञान का सूर्योदय 'वेद' से ही हुआ है। वेद अक्षय-ज्ञान की निधि हैं। इसमें ऐहिक एवं आमुष्मिक दोनों ही प्रकार का ज्ञान-विज्ञान पुष्कल मात्रा में विद्यमान है। प्राचीन भारतीयों का धर्म, दर्शन, आचार, रहन-सहन तथा परम्पराएँ आदि सब वैदिक वाङ्मय में सुरक्षित है। राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता किसी भी राष्ट्र का मूल आधार है, इसके बिना राष्ट्र का सर्वाङ्गीण विकास सम्भव ही नहीं हैं। वैदिक विदुषी डॉ० अन्नपूर्णा मिश्रा ने गम्भीर वैदिक वाङ्मय का गहन अध्ययन व अनुशीलन कर चारों वेदों, ब्राह्मणग्रन्थों, आरण्यकों तथा उपनिषदों में राष्ट्रीय एकता व अखण्डता का सार्थक अन्वेषण किया है, जो सकल सारस्वत-संस्कृतसाहित्य में सर्वथा उपयोगी होगा, ऐसा मुझे विश्वास है। अपने शोधग्रन्थ में स्थान-स्थान पर वैदिक सूक्तों के अनेक उद्धरणों द्वारा डॉ० अन्नपूर्णा मिश्रा ने राष्ट्रीयएकता व अखण्डता को बड़ी बुद्धिमत्ता से खोज निकाला है। उदाहरणार्थ- "राष्ट्रे जागृयाम वयम्" अर्थात्, हम सब राष्ट्र में जागें, इस वैदिक सूक्त का आशय यही है कि मानवमात्र में राष्ट्र की एकता तथा अखण्डता के प्रति जागरूकता सदा बनी रहे। वैदिक काल में प्रत्येक व्यक्ति अपने राष्ट्र के प्रति कर्त्तव्य बोध से परिचित होता था, उस समय मात्र राजा में ही गुणों की अपेक्षा नहीं की गई थी, अपितु नागरिकों में भी राष्ट्र के प्रति दायित्व निश्चित किये गये थे। यथा- 'मा त्वाद्राष्ट्रमधिभ्रशत्" अर्थात्- तुमसे राष्ट्र (कभी) गिरे नहीं। यहाँ राष्ट्र के न गिरने का अभिप्राय इसका एकता व अखण्डता की सुरक्षा की कामना से ही है। डॉ० मिश्रा के शोधग्रन्थानुसार, राष्ट्रीयएकता से ही राष्ट्र की अखण्डता सुनिश्चित होती है, तथा वही राष्ट्र शत्रु का सामना करने में पूर्ण सक्षम होता है- मिश्रा जी का यह कथन एक पूर्णतया अनुभूत सत्य है। डॉ० अन्नपूर्णा मिश्रा के प्रस्तुत बृहत्शोधग्रन्थ का मैंने आद्योपान्त अवलोकन एवं मनन किया है। निस्सन्देह, उन्होंने अपनी इस मौलिक शोध-कृति में सागर की गहराई में जाकर दुर्लभ रत्नों को खोज निकालने के समान ही अति परिश्रम किया है, क्योंकि CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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समुद्र इव अगम्य एवं अथाह वैदिक वाङ्मय के चारों वेदों, ब्राह्मणग्रन्थों, आरण्यकों, उपनिषदों एवं सूत्रों में से 'राष्ट्रीय एकता व अखण्डता' विषयक सुविस्तृत सन्दर्भों को, प्राप्त करने के लिए, डॉ० मिश्रा द्वारा उन सब का सूक्ष्म अध्ययन करके उनमें वर्णित समाजदर्शन, राजदर्शन, धर्मदर्शन, आचारदर्शन, शिक्षादर्शन तथा अर्थदर्शन का अलग अलग अनुशीलन करके, उक्त प्रत्येक 'दर्शन' में से शोधविषयक दुर्लभ अंश-रत्नों को खोज निकाला है। निस्सन्देह, वैदुष्य से विभूषित डॉ० अन्नपूर्णा मिश्रा वैदिक संस्कृत समीक्षा जगत् की विशिष्ट विभूति हैं। उनमें अभिव्यक्ति एवं अनुभूति का मणिकांचन योग है। उनका यह शोधग्रन्थ भी तात्विक विश्लेषण के साथ ही विशिष्ट अनुभूतियों को व्यक्त करता है। निश्चय ही यह बृहत्शोधग्रन्थ समीक्षा के भावक सहृदयों के लिए एक विलक्षण ज्ञानदीप सिद्ध होगा, जिसके आलोक में जिज्ञासु को वाञ्छित वस्तु प्राप्त हो सकेगी। अन्नपूर्णाप्रसादेन समीक्षा संप्रवर्द्धते। वेदानां दिव्यविज्ञानं तया लोकेषु दीव्यति॥ लोकमङ्गलकामेन राष्ट्रमङ्गलभावनाम। पुष्णातु भारती नित्यं शङ्करः शं तनोति च॥
दि० ५-५-२०११ ई० डॉ० शिवबालक द्विवेदी प्राचार्य बद्रीविशाल स्नातकोत्तर महाविद्यालय फर्रुखाबाद (उ०प्र०) सम्पादक - नवप्रभातम्
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri अभिमत डॉ० अन्नपूर्णा मिश्रा संस्कृत वाङ्मय जगत् का गौरव हैं। उन्होंने वैदिक एवं लौकिक संस्कृत वाङ्मय का विशेष अध्ययन कर महत्त्वपूर्ण शोधकार्य किये हैं। उनका महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ "वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता" प्रकाशित हो रहा है, यह अत्यधिक प्रसन्नता की बात है। मैं उसका हार्दिक स्वागत करता हूँ। वैदिक वाङ्मय अपनी अनेक मौलिक विशेषताओं के कारण विश्वविश्रुत है। वेदों का सर्वत्र समादर है। वेद आर्यों की सभ्यता, संस्कृति एवं साहित्य का आदि स्रोत है। यह भारत की अमूल्य निधि है। ज्ञान की तरह वेद भी अनन्त, अखण्ड एवं ब्रह्मरूप है। वैदिक वाङ्मय के पाश्चात्य प्रकाण्ड विद्वान् मनीषी विण्टरनिट्स का यह कथन पूर्णतया सत्य है- "यदि हम अपनी संस्कृति की आदिम अवस्था को जानना चाहते हैं या पुरातन भारतीय संस्कृति को समझना चाहते हैं, तो हमें भारत की शरण में जाना होगा, जहाँ भारतीय जाति का पुरातन साहित्य सुरक्षित है।" इस प्रकार हम देखते हैं कि वेद का महत्त्व-गान केवल भारतवर्ष तक ही सीमित नहीं रहा, अपितु अनेक विदेशी विद्वान् भी वेदों में निहित ज्ञान-विज्ञान से अत्यधिक प्रभावित हुए। भारतीय एवं पाश्चात्य सभी विद्वानों के मत में वेद मानवजाति के प्राचीनतम साहित्य हैं। इसमें राष्ट्रीयएकता व अखण्डता तथा सकल विश्व के अभ्युदय एवं कल्याण का वह दिव्य आलोक सम्भृत है, जिसकी मानव जाति को आज भी आवश्यकता है और सदैव रहेगी। वेदों में अनेक स्थानों पर अपने राष्ट्र तथा मातृभूमि के प्रति श्रद्धा प्रकट की गई है। स्वराज्य रक्षा के लिए प्रार्थना की गयी है। वेदों में हमें सम्पूर्ण विश्व के लिए एक राष्ट्र की कल्पना मिलती है। राजा के लिए स्पष्ट निर्देश है कि उसे ईमानदार, जनप्रिय और प्रजापालक होना चाहिए। यथा निम्न मन्त्र में कहा गया है कि "राजा को पर्वत के समान स्थिर होकर राष्ट्र की रक्षा करनी चाहिए"- "इहैवैधि माप च्योष्ठाः पर्वत इवाचलिः। इन्द्र इवेह ध्रुवस्तिष्ठेह राष्ट्रमुपधारय॥" डॉ० अन्नपूर्णा मिश्रा वैदिक वाङ्मय की अधीती विदुषी हैं। वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीयएकता व अखण्डता के विवेचन की दृष्टि से डॉ० मिश्रा का यह मौलिक बृहत्शोधग्रन्थ विशेष महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने संहिताओं, ब्राह्मण, आरण्यक और CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri vi उपनिषदों में निरूपित राष्ट्रधर्म, राष्ट्रियचेतना एवं राष्ट्रियभावना को सम्यक् निरूपित किया है। उनके इस कार्य से राष्ट्रभक्तों को हमारे ऋषियों की अतिमहत्त्वपूर्ण विरासत प्राप्त हो सकेगी तथा राष्ट्रियता की दृष्टि से शोधकार्य करने वालों को वैदिक ज्ञान की शेवधि हस्तगत हो जायेगी। डॉ० मिश्रा ने विवेच्य विषय को गम्भीरता के साथ मनन कर प्रस्तुत किया है। वे अपने विवेच्य विषय के अन्तस्तल में प्रविष्ट होकर अनमोल शोधमुक्ताओं को हस्तगत करने में सफल हैं। प्रस्तुत ग्रन्थ में उनकी प्रवणता एवं विषयाभिव्यक्ति को सहज रूप में देखा जा सकता है। अतएव पाठक को वर्ण्य विषय को हृदयंगम करने में कोई कठिनाई नहीं होगी। डॉ० अन्नपूर्णा मिश्रा की अनवरत शोध-साधना का यह ग्रन्थ सुन्दर प्रतिफल है। इसके सम्यक् आस्वादन से जिज्ञासुजनों को विशेष लाभ होगा, यह हमारा सुदृढ़ विश्वास है। इस कृति का संस्कृत जगत् में समादर होगा और अध्येताओं तथा शोधकर्ताओं को नूतन दृष्टि तथा प्रेरणा प्राप्त होगी। दि० ११-११-२०१० ई० डॉ० राजदेव मिश्र पूर्व कुलपति सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी (उ०प्र०) CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri डा. रमाकान्त शुक्लः आवासः एम.ए. (हिन्दी-संस्कृतयोः) पीएच.डी. 'रमालयः' - आर-6, वाणी विहारः, साहित्याचार्यः, सांख्ययोगाचार्यः नई दिल्ली - 110059 राष्ट्रपतिसम्मानितः संस्कृतविद्वान् दूरभाष: 011-28561846 सम्पादकः, अर्वाचीनसंस्कृतम् (त्रैमासिकम्) मो. - 09560532392 महासचिवः, देववाणी-परिषद्, दिल्ली अध्यक्षः, भारतीयसंस्कृतपत्रकारसङ्घः शास्त्रचूड़ामणिविद्वान्, राष्ट्रियसंस्कृतसंस्थानम् दिनांक- १५/०७/२०११
अभिनन्दन
मुझे यह जानकर अत्यन्त हर्ष हुआ कि संस्कृत वाङ्मय की लब्ध प्रतिष्ठ विदुषी डा. (श्रीमती) अन्नपूर्णा मिश्रा द्वारा अत्यन्त परिश्रम से ग्रथित 'वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता और अखण्डता' शीर्षक दस अध्यायों का शोधग्रन्थ प्रकाशित हो रहा है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा स्वीकृत इस बृहत् परियोजना में डा. मिश्रा ने वेदों, उपनिषदों, ब्राह्मणों, आरण्यकों एवं कल्पसूत्र आदि का परिचय देने के साथ राष्ट्र और उसकी एकता और अखण्डता के विषय में वैदिक दृष्टि का सप्रमाण विवेचन कर महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष दिये हैं। डा. मिश्रा ने अनेक राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में भाग लेकर अपने वैदुष्य से विद्वज्जगत् को प्रभावित किया है। उनके निर्देशन में अनेक शोधकार्य हुए हैं जिनमें आपकी निर्देशनपटुता प्रतिबिम्बित होती है। उनका दीर्घकालीन विद्याव्यासंग का अनुभव इस ग्रन्थ में आद्यन्त झलकता है। प्रस्तुत शोध-ग्रन्थ डा. मिश्रा के दीर्घकालीन चिन्तन-मनन का परिणाम है जो कालातीत और सनातन वैदिक वाङ्मय की उस काल में विशेष प्रासंगिकता रेखांकित करता है जिसमें राष्ट्र की एकता, अखण्डता, सुरक्षा, समृद्धि और पुष्टि विशेषतः अपेक्षित है। मैं इस ग्रन्थ की रचना के लिए डा. मिश्रा का अभिनन्दन करता हूँ। [हस्ताक्षर] गुरुपूर्णिमा, आषाढ़ शुक्ल १५ वि.सं. २०६८ (रमाकान्त शुक्ल) CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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प्रो० महावीर उपाध्यक्ष अध्यक्ष, संस्कृत विभाग उत्तराखण्ड संस्कृत अकादमी आचार्य एवं उपकुलपति संस्कृत भवन गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार दिल्ली राष्ट्रीय राजमार्ग हरिद्वार ज्वालापुर, हरिद्वार पत्रांक.................. दिनांक- 16-7-2011
मनोगतम्
वैदिक एवं लौकिक संस्कृत साहित्य गंगा में सतत अवगाहन करने से उभयविध वाङ्गमय मे परम निष्णात, गोकुलदास स्नातकोत्तर कन्या महाविद्यालय, मुरादाबाद की पूर्व संस्कृत विभागाध्यक्ष एवं प्राचार्या डॉ० अन्नपूर्णा मिश्रा द्वारा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की बृहद्- शोध-परियोजना के अन्तर्गत 'वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रिय एकता और अखण्डता' शीर्षक से कृत कार्य का अवलोकन कर मुझे अपार हर्ष हो रहा है। इस बृहद् शोध कार्य में डॉ० अन्नपूर्णा जी का वैदुष्य, चिन्तनशीलता, गवेषणात्मकता तथा लेखन नैपुण्य का मञ्जुल समन्वय निश्चित ही आनन्दित करने वाला है। भाषा पर आपका असाधारण अधिकार है, विषयानुकूल भाषा के प्रयोग से ग्रन्थ चित्ताकर्षक हो गया है। हम भारतीयों का यह दृढ़ विश्वास है कि संसार का समस्त ज्ञान-विज्ञान एवं विविध विद्यायें वेदों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में विद्यमान हैं। 'वेदोऽखिलो धर्ममूलम्' का तथा- 'यः कश्चित् कस्यचित् धर्मः मनुना संप्रकीर्तितः। सः सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञान मयो हि सः' का यही अभिप्राय है। युगों-युगों से भारतीय मनीषियों ने ज्ञान की विविध शाखाओं का पल्लवन वेदतरु की छाया में ही किया है। वर्तमान समय में देश की एकता और अखण्डता कैसे बनी रहे, यह बहुत बड़ा यक्ष प्रश्न है। राष्ट्र की अवधारण, राष्ट्रधारक प्रमुख तत्त्व, एकता और अखण्डता के उपाय, विश्वसाहित्य में यदि कहीं उदात्त रूप में प्राप्त होते हैं, तो वह वैदिक वाङ्गमय है। वैदिक संहिताओं, ब्राह्मण ग्रन्थों,
निवास २२ नन्द विहार, निकट अवधूत मण्डल आश्रम, पो० गुरुकुल कांगड़ी हरिद्वार 249404 दूरभाष-0133-228544, 9412918949, Email-mahavir_gkv@yahoo.co.in
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri आरण्यकों एवं उपनिषदों में राष्ट्र की एकता एवं अंखण्डता के प्रतिपादक एवं परिपोषक अनेक सन्दर्भ प्राप्त होते हैं। परम विदुषी प्रो० अन्नपूर्णा जी ने अत्यन्त परिश्रम, योग्यता, श्रद्धा एवं निष्ठापूर्वक वेदोद्यान से चुने हुए सुन्दर पुष्पों का स्तबक पाठकों को उपायन के रुप में समर्पित किया है। अनेक विदेशी विद्वान् तथा उनके उच्छिष्ट भोजी भारतीय विद्वान् राष्ट्र विषयक चिन्तन पश्चिम की देन मानते हैं, डॉ० अन्नपूर्णा जी ने अपने विशद चिन्तन से इस भ्रमित धारणा का सप्रमाण निराकरण किया है। इस बृहद् शोध ग्रन्थ में गवेषिका का प्रौढ़-वैदुष्य पदे-पदे परिलक्षित होता है। मुझे यह विश्वास है कि आज संपूर्ण विश्व में आतंकवाद, प्रान्तवाद, सम्प्रदायवाद, भ्रष्टाचार एवं अनाचर का जो बीभत्स रुप दिखाई दे रहा है, उसका समाधान इस ग्रन्थरत्न के माध्यम से हो सकेगा। डॉ० अन्नपूर्णा जी के निर्देशन में अनेक छात्राओं ने शोध कार्य कर पी-एच०डी० उपाधि प्राप्त की है। अनेक राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से आप सम्मानित है। एक उच्चकोटि की लेखिका, आचार्या एवं मानवीय गुणों से ओतप्रोत कुशल प्राचार्या के रुप में आपकी ख्याति है। मैं इस उत्तम ग्रन्थ लेखन के लिये डॉ० अन्नपूर्णा जी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं प्रेषित करता हूं। शोध कार्य की भूरि-भूरि प्रशंसा करता हूं एवं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि आपको स्वस्थ, धवल कीर्तियुक्त शत वर्षीय जीवन तथा सब प्रकार के सुख सौभाग्य प्राप्त हों और आप इसी प्रकार वैदिक वाङ्मय की एवं मानवता की सतत सेवा करती रहें। मंगलाभिलाषी (प्रो० महावीर) आचार्य एवं उपकुलपति गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार एवं उपाध्यक्ष, उत्तराखण्ड संस्कृत अकादमी निवास २२ नन्द विहार, निकट अवधूत मण्डल आश्रम, पो० गुरुकुल कांगड़ी हरिद्वार 249404 दूरभाष-0133-228544, 9412918949, Email-mahavir_gkv@yahoo.co.in CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्राक्कथन राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता की सुरक्षा एवं संरक्षा प्राचीन भारतीय-संस्कृति का सार्वकालिक सन्देश रहा है, और वैदिक वाङ्ग्मय इस भारतीय संस्कृति का वाहन रहा है। समस्त वैदिक वाङ्ग्मय राष्ट्रीयएकता अथवा विश्व-बन्धुत्व की भावना से आकण्ठ आप्लावित है, जिसका प्रभाव समय-समय पर अखिल-भारतीय-चिन्तन-पद्धति पर पड़ा, तथा जिसके कारण भारत में राष्ट्रीयएकता तथा धर्मनिरपेक्षता की भावना को बहुत बल मिला। भारत जैसे विशाल देश में विभिन्न जातियाँ, धर्म, वेश-भूषा तथा रीतिरिवाज होने के बाद भी राष्ट्रीयएकता स्थापित रहना इसी वैदिक-वाङ्मय की मूल संस्कृति के प्रभाव का परिणाम है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब मानव ने "सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित् दुःखभाग्भवेत्" की भावना से जितना अधिक तादात्म्य स्थापित किया है, वह उतना ही सुखी, सुरक्षित तथा चिरायु हुआ है। आज की विषम परिस्थितियों में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता को भारतीय समाज में जीवित रखने का प्रयास ही एक ज्वलन्त समस्या है। हमारा देश इस समय ऐसी भयावह स्थिति का सामना कर रहा है, जिसका समुचित एवं सार्थक समाधान यदि शीघ्र नहीं हो सका तो भारतीयसमाज को विघटित होने से बचा पाना बहुत ही कठिन हो जाएगा। कुछ बाह्य एवं आन्तरिक शक्तियों द्वारा अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए धार्मिक-संकीर्णता के आधार पर मनुष्य को बाँटने वाली राजनीति की जा रही है। मानवीय-कल्याण की भावनाओं को त्यागकर उच्च मूल्यों से विमुख होकर आज धर्म पर आधारित राजनीति को बढ़ावा दिया जा रहा है। राष्ट्रीयएकता एवं धर्मनिरपेक्षता के विपरीत भारतीय समाज के विभिन्न वर्ण अपनी-अपनी व्यक्तिगत, धार्मिक, क्षेत्रीय एवं जातीय विचारधाराओं तथा मान्यताओं के आधार पर देश को बाँटने के प्रयास कर रहे हैं। ऐसी विषम परिस्थितियों का सामना करने के लिए एक ऐसे शोधकार्य की परम आवश्यकता थी, जिससे राष्ट्रीयएकता और धर्म-निरपेक्षता की भावना को बढ़ावा मिले। इस सन्दर्भ में भारतीय संस्कृति के संवाहक तथा विविध-ज्ञान-विज्ञान के आदिस्रोत वैदिक वाङ्मय के गम्भीर-ज्ञान-सागर के असंख्य-सूक्त-रत्नों में से राष्ट्र- सम्बन्धित इस बहुमूल्य रत्न को भी खोजने की मेरी प्रबल इच्छा हुई, क्योंकि वेद असंख्य एवं अक्षय ज्ञान की निधि हैं, यह सर्वविदित है। इनमें आध्यात्मिक-ज्ञान के CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri xii साथ-साथ, इस भौतिक-जगत् का भी कोई विषय इनसे अछूता नहीं है। अतः यदिहास्ति तदत्र कथन की सार्थकता पर पूर्ण आश्वस्त होकर, मैंने अपनी बृहत्सोधयोजना हेतु, “राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में वैदिकवाङ्मय का समीक्षात्मक अनुशीलन" को अपने शोध का शीर्षक बनाकर 'विश्वविद्यालय अनुदान आयोग' को स्वीकृति हेतु नयी दिल्ली भेज दिया, जो वहाँ से सहर्ष स्वीकृत होकर आ गया। मेरी यह प्रबल-जिज्ञासा थी कि उल्लिखित राष्ट्रीयसमस्या के समाधान में वैदिक वाङ्मय ने अपना कितना योगदान प्रदान किया हैं। अभी तक अनेक दृष्टियों से संस्कृत-साहित्य का मूल्याङ्कन किया जा चुका था, किन्तु राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में संस्कृत-वैदिक साहित्य का अनुशीलन नहीं किया गया था। वैदिकवाङ्मय विश्वविश्रुत हैं। भारतीय एवं पाश्चात्य सभी विद्वान् एक स्वर से इसका महत्त्व स्वीकार करते हैं। वेदों में ऐहिक एवं आमुष्मिक दोनों ही प्रकार का ज्ञान-विज्ञान पुष्कल मात्रा में विद्यमान है। प्राचीन भारतीयों का धर्म, दर्शन, आचार, रहन-सहन तथा परम्पराएँ आदि सब वैदिक-वाङ्मय में सुरक्षित हैं। अतः उक्त विषय की जानकारी के लिए वेदों का अध्ययन एवं अनुशीलन अत्यावश्यक था। राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता किसी भी राष्ट्र का मूल आधार है। इसके बिना राष्ट्र का सर्वाङ्गीण विकास सम्भव ही नहीं है। वैदिकवाङ्मय में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के महत्त्वपूर्ण सूत्र विद्यमान हैं। राष्ट्रीय एकता के सन्दर्भ में वेदों का स्पष्ट निर्देश है कि हम सभी के लक्ष्य, कार्य व हृदय समान हों, हम सब मिलकर राष्ट्र के कल्याणकारी कार्यों में लगें— संगच्छध्वम्, संवदध्वम्, सं वो मनांसि जानताम्। देवाभागं यथापूर्वे, संजानाना उपासते॥ निस्सन्देह, परस्पर मिलकर राष्ट्रीय कार्यों को करते हुए ही लोककल्याण सम्भव है। पारस्परिक राग-द्वेष, इर्ष्या-कलह आदि से राष्ट्र विखण्डित होता है। अतः वेद हमें सावधान करता हुए कहता है कि हम भाई परस्पर द्वेष न करें, परस्पर मिलकर राष्ट्र के कार्यों में संलग्न होवें— मा भ्राता भ्रातरम् द्विक्षन्मा स्वसारमुत स्वसा। सम्यञ्चः सव्रता भूत्वा, वाचं वदत भद्रया॥ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri xiii ऋग्वेद में धर्म की विस्तृत व्याख्या करते हुए 'पारस्परिक-प्रेम' को 'राष्ट्रीयएकता' का मूल माना गया है। यही 'मानवधर्म' है— यथा, विश्वदानी सुमनसः स्याम्। (ऋग्वेद ६/५२/५) अर्थात् "हम मर्यादा सम्पन्न रहें, प्रसन्न रहें क्योंकि मन के प्रसाद से समस्त आपदाएँ शान्त होती हैं।" ऋग्वेद में अन्यत्र कहा गया है— पुमान् पुमांसं परिपातु विश्वतः अर्थात् "मानव मानव की रक्षा करे, यही मानवधर्म का मूल मन्त्र है।" अर्थात् धर्म की रक्षा करने में अपनी रक्षा है, और धर्म के हनन में अपना ही विनाश है। धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः (मनुस्मृति ८/१५) वैदिकवाङ्मय में 'विश्वधर्म' से लेकर 'व्यक्तिधर्म' तक, समष्टि से व्यष्टि तक, सभी धर्मों का निरूपण सन्निहित है। उदाहरणार्थ, यजुर्वेद का निम्नलिखित मन्त्र राष्ट्रधर्म का साङ्गोपाङ्ग वर्णन करता है— आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम् आ राष्ट्रे राजन्यः शूरइषव्योऽतिव्याधी महारथो जायताम्। दोग्ध्री धेनुर्वोढानड्वानाशुः सप्तिः पुरन्ध्रियोंषा जिष्णू रथेष्ठाः, सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायताम्। निकाने निकाने नः पर्जन्यो वर्षतु। फलवत्यो नः ओषधयः पचन्ताम्। योगक्षेमो नः कल्पताम्॥ (यजुर्वेद २२/२२) भाव यह है कि विश्वभावन-ब्राह्मण ब्रह्मतेज से सम्पन्न हों। राष्ट्र में क्षत्रियगण शूरवीर, धनुर्धर, लक्ष्यवेधी और महारथी हों। गायें दुधारू, बैल भारवहन में सक्षम, अश्व शीघ्रगामी, स्त्रियाँ शोभामयी, रथी विजयशील हों, और इस यजमान का युवा पुत्र निर्भय व वीर हो। आवश्यकतानुसार वर्षा हो, वनस्पतियाँ फलवती हों। हमारा योगक्षेम हो। यजुर्वेद के उक्त मन्त्र की व्याख्या से राष्ट्रधर्म का स्वरूप निर्दिष्ट होता है। अथर्ववेद में भी राष्ट्रोन्नति के उपाय बताये गये हैं, जो उपर्युक्त यजुर्वेद के मन्त्र के ही अधिपूरक हैं। पृथिवीसूक्त का वचन है कि बृहत्-सत्य, उग्र ऋतु अर्थात् (सत्यकर्म व CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri xiv सत्यज्ञान), दीक्षा, तप एवं ब्रह्मयज्ञ पृथिवी को धारण करते हैं:- सत्यं बृहदृतमुग्रदीक्षा तपो ब्रह्मयज्ञः। पृथिवीं धारयन्ति। (अथर्ववेद १२/१/१) वेदों के अनुसार राष्ट्रभावना के मूल आधार हैं- एकदेश (भौगोलिक एकता), एक केन्द्रीय शासन (संघटनात्मक एकता), एक संस्कृति (भावनात्मक एकता), एकसभ्यता (ऐतिहासिक एकता) और एक भाषा (अभिव्यक्ति की एकता), इन सभी का सुविस्तृत वर्णन वेदों में किया गया है। उक्तानुसार राष्ट्र, राष्ट्रीयएकता तथा राष्ट्र की संरक्षा के सन्दर्भित सूत्र वैदिकवाङ्मय में यत्र तत्र सर्वत्र उपलब्ध हैं, जिनका निरूपण एवं प्रकाशन भारत देश की वर्तमानकालिक परिस्थितियों में विशेष महत्त्व रखता है। आज के इस कठिन समय में प्रस्तुत यह बृहत्शोधकार्य निश्चय ही राष्ट्र के लिए मार्गदर्शक एवं कल्याणकारी सिद्ध होगा। भारतीयों में परस्पर भ्रातृत्वभाव के प्रति निष्ठा बढ़ेगी तथा राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता का मार्ग प्रशस्त हो सकेगा। आश्चर्य है कि इस परिप्रेक्ष्य में ज्ञान-विज्ञान के आदिस्रोत वैदिकवाङ्मय का अनुशीलन अभी तक नहीं किया गया था, जबकि धर्म, नीति, आचार, शिक्षा, दर्शन तथा राष्ट्रसंरक्षकादि के मूल्यवान एवं लाभदायक घटकतत्त्व पर्याप्त मात्रा में हमारे वैदिक साहित्य में विद्यमान हैं, जो सर्वथा सार्वकालिक तथा सार्वभौमिक हैं, कालातीत तथा देशातीत हैं। तपःपूत, वैदिकमन्त्रद्रष्टा ऋषियों-मुनियों ने अपनी अमरवाणी द्वारा राष्ट्र, राष्ट्रधर्म तथा राष्ट्रीयएकता के साथ-साथ राष्ट्रीय-सर्वाङ्गीण-विकास हेतु आवश्यक, उसकी सुरक्षा के जो तात्कालिक एवं सार्वकालिक सूक्त प्रदान किये हैं, उन सभी का इस 'बृहद्शोधग्रन्थ के परिशीलन नामक तृतीय खण्ड के सातों अध्यायों में सुविस्तृत विवेचन किया गया है। सागर इव अपार-ज्ञान के भण्डार, वैदिक वाङ्मय की यह अनुपमयेता ही है कि वैदिक ऋषियों की दिव्य-दृष्टि, सहस्राब्दियों पूर्व उद्भूत होते हुए भी आज भी, उनके निर्देश व सन्देश प्रत्येक देश, प्रत्येक समाज, प्रत्येक परिवार व प्रत्येक व्यक्ति के लिए यथापूर्व ग्राह्य एवं लाभप्रद हैं। प्राचीनतम् वेद आज भी अर्वाचीन है- "THOUGH THE VEDAS ARE THE OLDEST, BUT THEIR MESSAGE IS ALWAYS LATEST." CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri xv अभीष्ट ग्रन्थ चार खण्डों तथा दश अध्यायों में विभक्त हैः- प्रथम खण्ड- परिप्रेक्ष्य (विषय प्रवेश) द्वितीय खण्ड- परिपार्श्व तृतीय खण्ड- परिशीलन चतुर्थ खण्ड- तुलनात्मक परिशीलन अन्तिम दशम अध्याय में उपसंहार दिया गया है। प्रस्तुत राष्ट्र-परक यह बृहत्ग्रन्थ, जो लगभग ३०० पृष्ठों में है, अत्यन्त संक्षेप में विषयानुक्रमानुसार निम्नवत् अवलोकनीय है :- १. परिप्रेक्ष्य नाम से ग्रन्थ के प्रथम खण्ड के प्रथम अध्याय में अभीष्ट शोध विषय का प्रारम्भ (प्रवेश) किया गया है, जिसमें राष्ट्र, राष्ट्र की संकल्पना व राष्ट्र का स्वरूप आदि को पाश्चात्य तथा भारतीय विशेषज्ञों के अनेक उद्धरणों द्वारा स्पष्ट किया गया है। वस्तुतः राष्ट्र के सुदृढ़ अस्तित्व का आधार राष्ट्रीयएकता ही होती हैं, और राष्ट्रीयएकता पर ही राष्ट्र की अखण्डता निर्भर करती है। इसीलिए नेहरू जी ने कहा था- मेरे जीवन का मुख्य कार्य भारत एकीकरण है। उनके कथन का तात्पर्य यह नहीं था कि भारत में एकता का अभाव है। हमारा स्वाधीनता-संग्राम एक ऐसा दृढ़ स्तम्भ था, जिसने राष्ट्रीयता (राष्ट्रीयएकता) के अङ्कुर को सींच-सींच कर बड़ा किया, तथा हमारे संविधान ने भी उसे बल प्रदान किया, कि- हम सब भारतवासी हैं, हम सब का एक ही संविधान है व एक ही राष्ट्रीय चिह्न है। २. परिपार्श्व नामक द्वितीय खण्ड तथा ग्रन्थ के द्वितीय अध्याय में वैदिकवाङ्मय का संक्षिस सर्वेक्षण किया गया है, जिसके अन्तर्गत 'वेद' का अर्थ, वेदों का महत्त्व, वेदों का कालनिरूपण एवं वेदों की शाखाएँ तथा ऋक्, यजुः, साम व अथर्ववेद- इन चारों संहिताओं तथा उनके ब्राह्मणों, आरण्यकों तथा उपनिषदों के साथ-साथ, गृह्यसूत्रों तथा धर्मसूत्रों का भी पूर्ण विवेचन तथा परिचय प्रदान किया गया है। ३. परिशीलन नाम का तृतीय खण्ड इस ग्रन्थ का सबसे बड़ा व सर्वप्रमुख अंश है। यही शोध विषय का मूलभाग है। वस्तुतः यह तृतीय खण्ड इस बृहत्ग्रन्थ का 'हृदय' है, केन्द्र बिन्दु है। यह तृतीय अध्याय से लेकर अष्टम अध्याय तक, अर्थात् छः अध्यायों में विस्तृत है। राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ऋग्वेद का समीक्षात्मक अनुशीलन तृतीय अध्याय में, यजुर्वेद का चतुर्थ अध्याय में, सामवेद का पञ्चम अध्याय में तथा CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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xvi अथर्ववेद का षष्ठ अध्याय में किया गया है। इसी प्रकार, ब्राह्मणों, आरण्यकों तथा उपनिषदों का एवं गृह्यसूत्रों व धर्मसूत्रों का अनुशीलन क्रमशः सप्तम व अष्टम- इन दो अध्यायों में किया गया है। हमें गृह्यसूत्रों और धर्मसूत्रों के भी आधारतत्त्व वैदिक-ग्रन्थों से ही प्राप्त होते हैं। इन्हीं के अनुसार धर्मयुक्त समाज एवं समाज के सदस्यों का धर्मयुक्त आचरण ही राष्ट्र की उन्नति में सहायक होता है। धर्म की कसौटी पर खरा उतरने वाला राजा ही राष्ट्र की एकता व अखण्डता की रक्षा में सक्षम होता है, इसीलिए अथर्ववेद में लिखा है- त्वां विशो वृणुतां राज्यायत्वामिमाः प्रदिशः पञ्च देवीः। अर्थात् राजा का चयन प्रजा द्वारा किया जाए। ये पाँच दिव्य दिशाएँ भी तुम्हें (राजा को) स्वीकार करें। राष्ट्र के उत्कृष्ट पद पर तुम आसीन रहो। राजन्! सदैव राष्ट्र की रक्षा के प्रति सचेत रहो। इस प्रकार प्राचीन वाङ्मय में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के प्रति सम्पूर्ण दायित्व प्रजा का ही नहीं था, उसमें प्रथम भूमिका राज की ही होती थी। यथा अथर्ववेद में वर्णित है- ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं विरक्षति। (अथर्ववेद ११/५/१७) (ब्रह्मचर्य एवं तपस्या का पालन करने वाला राजा ही राष्ट्र की रक्षा कर सकता है)। ४. उल्लिखित तृतीय खण्ड के बाद इस ग्रन्थ के चतुर्थ एवं अन्तिम खण्ड के नवम अध्याय में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के सम्बन्ध में प्राचीन तथा अर्वाचीन विचारों का तुलनात्मक अनुशीलन किया गया है। यद्यपि भारत की अनेकता में एकता का होना विस्मयकारी है, तथापि भारत एक राष्ट्र है। इसका प्रतीक है हमारी तीनों सेनाएँ। जिनमें सभी प्रदेशों, जातियों के लोग मिलकर एक राष्ट्र की सुरक्षा में दिन-रात सीमा पर चौकन्ने रहते हैं। वे सब अपने को भारतीय ही मानते हैं, इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं। सर्वपल्ली राधाकृष्णन् ने भी व्यक्त किया है- हमारी राष्ट्रीयएकता व अखण्डता की नींवें खोखली नहीं हैं, बल्कि वटवृक्ष की तरह अन्दर मीलों तक गहराई तक फैली हुई हैं। वह वैदिक काल से ही उस ज़मीन की तह में समाई हुई हैं। यह एकता एक स्थायी-भावना है, जो पावन-भूमि पर जन्म लेते ही मानव के मन में समाहित हो जाती है। इसी राष्ट्रीयएकता व अखण्डता पर सम्पूर्ण राष्ट्र को गर्व
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri xvii है— कि हमारा एक संविधान, एक राष्ट्रीय ध्वज तथा एक ही राष्ट्रीय सम्मान सदैव अक्षुण्ण रहेंगे। अन्तिम दशम अध्याय के उपसंहार में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता की संरक्षा के लिए वर्तमान, आतंकवादी-विध्वंसक प्रवृत्तियों को समाप्त करने के लिए महत्त्वपूर्ण उपाय व कतिपय सुझाव भी प्रस्तुत किये गये हैं। आज भारतीय लोकतन्त्र के लिए आतङ्कवाद एक गम्भीरतम चुनौती बना हुआ है। यह देश की राष्ट्रीयएकता व अखण्डता के लिए ‘बारूद के गोले' की तरह भयावह है। फिर भी यह आतङ्कवाद केवल कानून व व्यवस्था का प्रश्न नहीं है, यह एक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य है, एक मनोवैज्ञानिक पक्ष है, जो बल प्रयोग से नहीं सुलझ सकता है। बल प्रयोग भी विवेक व सद्भावना के साथ करना चाहिए। शासन द्वारा आतङ्कवादियों से बातचीत अवश्य की जानी चाहिए। शर्त केवल यह हो कि बातचीत संविधान के दायरे में हो, तथा बातचीत हेतु आगे आने वाले आतंकवादी भविष्य में अपने आपको देश की एकता व अखण्डता के लिए प्रतिबद्ध घोषित करें तथा आतंकवाद का रास्ता छोड़ने की घोषणा करें। उक्तानुसार, भारत के वर्तमान प्रजातान्त्रिक परिवेश में वैदिक ऋषियों द्वारा प्रदत्त वैदिक-वाङ्मय में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के संरक्षित सूत्रों, का समीक्षात्मक अध्ययन कर आगामी मानवता हेतु उनकी उपादेयता प्रमाणित करना ही मेरी इस शोधयोजना का लक्ष्य रहा है। मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि मेरे शोधावधि में वैदिक वाङ्मय के ऐसे अनेक अनछुए एव उपयोगी प्रसङ्ग उभर कर सम्मुख आए हैं; जिनसे वर्तमान एवं आगामी भारतीय मानवता अपने हितों की रक्षा कर सकती है, तथा विश्वमानवता के मञ्च पर समादृत हो सकती है। मुझे आशा ही नहीं, पूर्ण विश्वास है कि मेरी इस बृहत- शोधयोजना के अन्तर्गत प्रस्तुत शोधकार्य के माध्यम से न केवल बुद्धिजीवी-देशवासी प्रेरणा प्राप्त करके लाभान्वित होंगे; प्रत्युत् यह विशद् एवं बृहतशोधग्रन्थ राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता को सुरक्षित रखने में भी महान् उपयोगी सिद्ध होगा। और, अब मैं सर्वप्रथम, अपने पितृ-तुल्य गुरु स्वर्गीय डॉ० हरिदत्त शास्त्री को अपनी भावाञ्जलि अर्पित करते हुए उन्हें हृदय से नमन करना चाहूँगी, जिनसे प्राप्त सुशिष्यत्व, शोधनिर्देशन, मार्गदर्शन तथा पितृ-तुल्य स्नेहिल आशीर्वादों के कारण ही मैं विगत पञ्चाशताधिक वर्षों से सुरभारती संस्कृत की सतत् सात्विक-अनेकविध- सेवाओं द्वारा आज इस गन्तव्य तक पहुँच सकी हूँ। मैंने न केवल अनेक छात्र- छात्राओं का निःस्वार्थ संस्कृत-शोधनिर्देशन करके उन्हें सुयोग्य बनाया, प्रत्युत् महाविद्यालयीय-सत्यनिष्ठ-प्राचार्यत्व के साथ ही साथ, विश्व-संस्कृत-परिषद् तथा CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri xviii अखिल भारतीय प्राच्य परिषद् पुणे, की आजीवन सदस्या के रूप में स्वदेश-भारत एवं विदेशों में भी आयोजित संस्कृत-सम्मेलनों में उपस्थित होकर अपने मौलिक संस्कृत शोधपत्रों को प्रस्तुत किया तथा परिषदीय-अध्यक्षों व श्रोतृसमूह से प्रशस्ति- पत्र प्राप्त किये। यह मेरे इन्हीं प्रातःस्मरणीय श्रद्धेय गुरु से प्राप्त प्रेरणाओं का ही प्रतिफल है। तत्पश्चात् मैं, अपने गुरुभाई, परम प्रिय अनुज, आजीवन-संस्कृत-सेवी डॉ० शिवबालक द्विवेदी, जो सम्प्रति स्नातकोत्तर महाविद्यालय, फरुखाबाद में प्राचार्य हैं, के प्रति भी अपना हार्दिक कृतज्ञताज्ञापन करती हूँ, जिन्होंने मेरे, यू०जी०सी० से स्वीकृत बृहत्शोधयोजना के कार्यान्वयन हेतु, नियमानुसार विज्ञापित किये गये साक्षात्कार के लिए 'संस्कृत विशेषज्ञ' के रूप में उपस्थित होकर सुयोग्य एवं संस्कृतनिष्ठ शोध-सहायकों की नियुक्ति करके, मेरे बृहत्शोधकार्यभार को सुकर बनाया। इसके अतिरिक्त भी अनेक बार संस्कृत अधिवेशनों में आमन्त्रित करके मुझे विनम्र सम्मान प्रदान किया है। अन्त में, मैं अपनी उन तीनों शोधसहायिकाओं- डॉ० विनोदिनी पाण्डेय, डॉ० सुषमा शर्मा तथा डॉ० लक्ष्मीदेवी शर्मा को उनके सुखी एवं सफल जीवन हेतु अपना शुभाशीर्वाद प्रदान करती हूँ, जिन्होंने ही मेरे इस बृहत्शोधकार्य के संस्कृत महायज्ञ में अपनी अपनी सश्रम कर्त्तव्यनिष्ठता की आहुतियाँ अर्पित की हैं। विशेषतः मेरी शिष्या, डॉ लक्ष्मीदेवी शर्मा द्वारा इस शोधग्रन्थ के प्रूफसंशोधन तथा संस्कृतसम्बन्धी अन्यानेक लेखनकार्य में कृतसाहाय्य के लिए मैं आभार व्यक्त करती हूँ। तत्पश्चात् मैं उन विद्वत्जनों व पाठक गणों को भी हार्दिक धन्यवाद देना अपना कर्त्तव्य समझती हूँ, जो मेरे इस अथक श्रमसाध्य बृहत्ग्रन्थ को साभिरुचि पढ़कर, मेरे श्रम को सार्थक बनाने में सहायक होंगे। मुझे पूर्ण विश्वास है कि मेरे इन ग्रन्थ द्वारा प्रस्तुत, राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता से सम्बन्धित, वैदिक वाङ्मय का अक्षुण्ण- बहुमूल्यज्ञान, जो सार्वकालिक एवं सार्वदेशिक है, सभी देशभक्त राजनीतिज्ञों व केन्द्रस्थ नेताओं के लिए सर्वदा एवं सर्वथा हितकर सिद्ध होगा। इस बृहत्ग्रन्थ के प्रकाशन में सहायक दिल्ली निवासी स्व० के०एल० जोशी तथा उनके सुपुत्र सुप्रिय परिमल जोशी तथा 'परिमल पब्लिकेशन्स' से सम्बद्ध सभी आत्मीयजनों को मैं साधुवाद देती हूँ, जिनके नैष्ठिक योगदान से मेरा यह ग्रन्थ देश के सम्मुख उपस्थित हो सका है। बसन्त पञ्चमी, सन् २०११ अन्नपूर्णा मिश्रा CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri विषयसूची प्रथम खण्ड - परिप्रेक्ष्य प्रथम अध्याय - विषय प्रवेश १ १. राष्ट्र की संकल्पना :- १ क. राष्ट्र का स्वरूप एवं प्रकृति। १ ख. राष्ट्र की विषय वस्तु एवं क्षेत्र। ४ ग. राष्ट्र के विषय में भारतीय एवं पाश्चात्य अवधारणाएँ। १० २. राष्ट्रीयएकता एवम् अखण्डता :- १४ क. राष्ट्रीयएकता एवम् अखण्डता के आधारतत्व। १४ ख. राष्ट्रीयएकता एवम् अखण्डता का प्रयोजन। २४ ग. राष्ट्रीयएकता एवम् अखण्डता की अवधारणा। २६ ३. राष्ट्रीयएकता एवम् अखण्डता विषय का उद्देश्य :- २८ क. विषय का उद्देश्य। २८ ख. विषय की मौलिकता और महत्त्व। ३१ ग. तत्त्वचिन्तन एवं सत्य के उद्घाटन की दिशा में योगदान। ३३ घ. विषय की प्रासंगिकता। ३४ द्वितीय खण्ड - परिपार्श्व द्वितीय अध्याय - वैदिक वाङ्मय का संक्षिप्त सर्वेक्षण ३७ १. वेद क्या है? ३७ अ. वेद एवं उपवेद। ३८ ब. वेदत्रयी। ३९ स. वेदाङ्ग। ४९ द. सूत्र साहित्य। ५१ २. वेदों का महत्त्व। ५४ ३. वेदों का कालनिरूपण। ७१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri xx ४. वेदों की शाखाएँ। ८४ ५. संहिताएँ :- ९९ अ. ऋग्वेद ९९ ब. यजुर्वेद १३५ स. सामवेद १५१ द. अथर्ववेद १६२ तृतीय खण्ड – परिशीलन तृतीय अध्याय – ऋग्वेद में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता का अनुशीलन १८२ १. ऋग्वेद में निरूपित राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के आधार तत्त्व। १८२ २. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ऋग्वैदिक समाजदर्शन का अनुशीलन। १८८ ३. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डतां के परिप्रेक्ष्य में ऋग्वैदिक राजदर्शन का अनुशीलन। १९४ ४. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ऋग्वैदिक धर्मदर्शन का अनुशीलन। १९८ ५. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ऋग्वैदिक आचारदर्शन, शिक्षादर्शन एवं अर्थदर्शन का अनुशीलन। २०२ ६. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता को ऋग्वेद का प्रदेय। २०६ चतुर्थ अध्याय – यजुर्वेद में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता का अनुशीलन २०८ १. यजुर्वेद में निरूपित राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के आधार तत्त्व। २०८ २. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में यजुर्वेद के समाजदर्शन का अनुशीलन। २१० ३. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में यजुर्वेद के राजदर्शन का अनुशीलन। २१५ ४. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में यजुर्वेद के धर्मदर्शन का अनुशीलन। २१९ ५. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में यजुर्वेद के आचारदर्शन, शिक्षादर्शन एवं अर्थदर्शन का अनुशीलन। २२० ६. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता को यजुर्वेद का प्रदेय। २२६ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar