वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
५९- ऋतध्वजका पातालकेतुपर आक्रमण कर प्रहार करना, अन्धकका गौरीको प्राप्त करनेके लिये प्रयत्न करना
| २६२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५८ |
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| जलेश्वरीं कुक्कुटिकां सुदामां लोहमेखलाम्।<br>वपुष्मत्युल्मुकाक्षी च कोकनामा महाशनी।<br>रौद्रा कर्कटिका तुण्डा श्वेततीर्थो ददौ त्विमाः॥ १०१<br>एतानि भूतानि गणांश्च मातरो<br>दृष्ट्वा महात्मा विनतातनूजः।<br>ददौ मयूरं स्वसुतं महाजवं<br>तथारुणस्ताम्रचूडं च पुत्रम्॥ १०२<br>शक्तिं हुताशोऽद्रिसुता च वस्त्रं<br>दण्डं गुरुःसा कुटिला कमण्डलुम्।<br>मालां हरिः शूलधरः पताकां<br>कण्ठे च हारं मघवानुरस्तः॥ १०३<br>गणैर्वृतो मातृभिरन्वयातो<br>मयूरसंस्थो वरशक्तिपाणिः।<br>सैन्याधिपत्ये स कृतो भवेन<br>रराज सूर्येव महावपुष्मान्॥ १०४ | श्वेततीर्थने तो जलेश्वरी, कुक्कुटिका, सुदामा, लोहमेखला, वपुष्मती, उल्मुकाक्षी, कोकनामा, महाशनी, रौद्रा, कर्कटिका और तुण्डा—इन अनुचरियोंको दिया। इन भूतों, गणों और मातृकाओंको देखकर विनता-पुत्र महात्मा गरुड़ने अपने पुत्र महावेगशाली मयूरको समर्पित किया और अरुणने अपने पुत्र ताम्रचूडको प्रदान कर दिया। अग्निने शक्ति, पार्वती ने वस्त्र, बृहस्पतिने दण्ड, उस कुटिलाने कमण्डलु, विष्णुने माला, शङ्करने पताका तथा इन्द्रने अपने हृदयका हार कार्तिकेयके कण्ठमें अर्पित कर दिया। गणोंसे युक्त, मातृकाओंसे अनुसरित, मयूरपर बैठे एवं श्रेष्ठ शक्तिको हाथमें लिये हुए महाशरीरधारी वे कुमार (कार्तिकेय) शङ्करके द्वारा सैन्याधिपतिके पदपर अभिषिक्त होकर (और उपहार पाकर) सूर्यके समान प्रकाशित होने लगे॥ १०१-१०४॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सत्तावनवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ५७॥
अट्टावनवाँ अध्याय
सेनापतिपदपर नियुक्त कार्तिकेयके लिये ऋषियोंद्वारा स्वस्त्ययन, तारक-विजयके लिये प्रस्थान, पातालकेतुका वृत्तान्त, तारक महिषासुर-वध तथा सुचक्राक्षको वर
| पुलस्त्य उवाच<br>सेनापत्येऽभिषिक्तस्तु कुमारो दैवतैरथ।<br>प्रणिपत्य भवं भक्त्या गिरिजां पावकं शुचिम्॥ १<br><br>षट् कृत्तिकाश्च शिरसा प्रणम्य कुटिलामपि।<br>ब्रह्माणं च नमस्कृत्य इदं वचनमब्रवीत्॥ २ | पुलस्त्यजी बोले— जब शङ्कर एवं देवताओंने देवताओंके सेनापतिके पदपर कुमार कार्तिकेयका अभिषेक किया तब उक्त पदपर अभिषिक्त कुमारने भक्तिपूर्वक शङ्कर, पार्वती और पवित्र अग्निको प्रणाम किया। उसके बाद छः कृत्तिकाओं एवं कुटिलाको भी सिर झुकाकर प्रणाम करके ब्रह्माको नमस्कार कर यह वचन कहा॥ १-२॥ | | कुमार उवाच<br>नमोऽस्तु भवतां देवा ओं नमोऽस्तु तपोधनाः।<br>युष्मत्प्रसादाज्जेष्यामि शत्रू महिषतारकौ॥ ३ | कुमारने कहा— देवताओ! आपलोगोंको नमस्कार है। तपोधनो! आपलोगोंको ओंकारके साथ नमस्कार ('ॐ नमः') है। आपलोगोंकी अनुकम्पासे मैं महिष एवं तारक दोनों शत्रुओंपर विजय प्राप्त करूँगा। |
अध्याय ५८ ] सेनापतिपदपर नियुक्त कार्तिकेयके लिये ऋषियोंद्वारा स्वस्त्ययन, महिषासुर-वध [ २६३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| शिशुरस्मि न जानामि वक्तुं किंचन देवताः।<br>दीयतां ब्रह्मणा सार्द्धमनुज्ञा मम साम्प्रतम्॥ ४<br>इत्येवमुक्ते वचने कुमारेण महात्मना।<br>मुखं निरीक्षन्ति सुराः सर्वे विगतसाध्वसाः॥ ५<br>शङ्करोऽपि सुतस्नेहात् समुत्थाय प्रजापतिम्।<br>आदाय दक्षिणे पाणौ स्कन्दान्तिकमुपागतम्॥ ६<br>अथोमा प्राह तनयं पुत्र एहोहि शत्रुहन्।<br>वन्दस्व चरणौ दिव्यौ विष्णोर्लोकनमस्कृतौ॥ ७ | देवताओ! मैं शिशु हूँ, मैं कुछ भी बोलना नहीं जानता। ब्रह्माके सहित आपलोग इस समय मुझे अनुमति दें। महात्मा कुमारके इस प्रकार कहनेपर सभी देवता निडर होकर उनका मुख देखने लगे। भगवान् शङ्कर पुत्रके स्नेहवश उठे और ब्रह्माको अपने दाहिने हाथसे पकड़कर स्कन्दके समीप ले आये। उसके बाद उमाने पुत्रसे कहा—शत्रुको मारनेवाले! आओ! आओ! संसारसे वन्दित विष्णुके दिव्य चरणोंको प्रणाम करो॥ ३-७॥ |
| ततो विहस्याह गुहः कोऽयं मातर्वदस्व माम्।<br>यस्यादरात् प्रणामोऽयं क्रियते मद्विधैर्जनैः॥ ८<br><br>तं माता प्राह वचनं कृते कर्मणि पद्मभूः।<br>वक्ष्यते तव योऽयं हि महात्मा गरुडध्वजः॥ ९<br><br>केवलं त्विह मां देवस्त्वत्पिता प्राह शङ्करः।<br>नान्यः परतोऽस्माद्धि वयमन्ये च देहिनः॥ १०<br><br>पार्वत्या गदिते स्कन्दः प्रणिपत्य जनार्दनम्।<br>तस्थौ कृताञ्जलिपुटस्त्वाज्ञां प्रार्थयतेऽच्युतात्॥ ११<br><br>कृताञ्जलिपुटं स्कन्दं भगवान् भूतभावनः।<br>कृत्वा स्वस्त्ययनं देवो ह्यनुज्ञां प्रददौ ततः॥ १२ | उसके बाद कार्तिकेयने हँसकर कहा—हे माता! मुझे स्पष्ट बतलाओ कि ये कौन हैं, जिन्हें हमारे-जैसे (अन्य) व्यक्ति भी प्रेमपूर्वक प्रणाम करते हैं? माताने उनसे कहा—ये महात्मा गरुडध्वज कौन हैं, यह तुम्हें कार्य कर लेनेपर ब्रह्मा ही बतलायेंगे। तुम्हारे पिता शङ्करदेवने मुझसे केवल यही बतलाया कि इनसे बढ़कर हमलोग या अन्य कोई शरीरधारी नहीं है। पार्वतीके स्पष्टतः कहनेपर कार्तिकेयने जनार्दनको प्रणाम किया एवं दोनों हाथोंको जोड़कर वे खड़े हो गये और भगवान् अच्युतसे आज्ञा माँगने लगे। लोकस्रष्टा भगवान् विष्णुने हाथ जोड़े हुए स्कन्दका स्वस्त्ययन कर उन्हें आज्ञा दी॥ ८-१२॥ |
| नारद उवाच<br>यत्तत् स्वस्त्ययनं पुण्यं कृतवान् गरुडध्वजः।<br>शिखिध्वजाय विप्रर्षे तन्मे व्याख्यातुमर्हसि॥ १३ | नारदने कहा— विप्रर्षे! गरुडध्वज विष्णुने मयूरध्वज कार्तिकेयके लिये जिस पवित्र स्वस्त्ययनका पाठ किया, उसे आप मुझसे कहें॥ १३॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>शृणु स्वस्त्ययनं पुण्यं यत्प्राह भगवान् हरिः।<br>स्कन्दस्य विजयार्थाय महिषस्य वधाय च॥ १४<br><br>स्वस्ति ते कुरुतां ब्रह्मा पद्मयोनी रजोगुणः।<br>स्वस्ति चक्राङ्कितकरो विष्णुस्ते विदधात्वजः॥ १५<br><br>स्वस्ति ते शङ्करो भक्त्या सपत्नीको वृषध्वजः।<br>पावकः स्वस्ति तुभ्यं च करोतु शिखिवाहन॥ १६<br><br>दिवाकरः स्वस्ति करोतु तुभ्यं<br>सोमः सभौमः सबुधो गुरुश्च।<br>काव्यः सदा स्वस्ति करोतु तुभ्यं<br>शनैश्वरः स्वस्त्ययनं करोतु॥ १७ | पुलस्त्यजी बोले— (नारदजी!) स्कन्दकी विजय एवं महिषके वधके लिये भगवान् विष्णुद्वारा कहे गये मङ्गलमय स्वस्तिवाचन—स्वस्त्ययनको सुनिये। (विष्णुने जो स्वस्त्ययन-पाठ किया, वह इस प्रकार है—) रजोगुणसे सम्पन्न कमलयोनि ब्रह्मा तुम्हारा कल्याण करें। हाथमें चक्र धारण करनेवाले अजन्मा विष्णु तुम्हारा मङ्गल करें। पत्नीसहित वृषध्वज शङ्कर प्रेमपूर्वक तुम्हारा मङ्गल करें। मयूरवाहन! अग्निदेव तुम्हारा कल्याण करें। सूर्य तुम्हारा मङ्गल करें, भौमसहित सोम तथा बुधसहित बृहस्पति तुम्हारा मङ्गल करें। शुक्र सदैव तुम्हारा मङ्गल करें तथा शनैश्चर तुम्हारा मङ्गल करें॥ १४-१७॥ |
| २६४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५८ | | :--- | :--- |
| मरीचिरत्रिः पुलहः पुलस्त्यः क्रतुर्वसिष्ठो भृगुरङ्गिराश्च।<br>मृकण्डुजस्ते कुरुतां हि स्वस्ति स्वस्ति सदा सप्त महर्षयश्च ॥ १८<br>विश्वेऽश्विनौ साध्यमरुद्गणाग्रयो दिवाकराः शूलधरा महेश्वराः।<br>यक्षाः पिशाचा वसवोऽथ किन्नरास्तेस्वस्ति कुर्वन्त सदोद्यतास्त्वमी ॥ १९<br>नागाः सुपर्णाः सरितः सरांसि तीर्थानि पुण्यायतनाः समुद्राः।<br>महाबला भूतगणा गणेन्द्रास्ते स्वस्ति कुर्वन्तु सदा समुद्यताः ॥ २०<br>स्वस्ति द्विपादिकेभ्यस्ते चतुष्पादेभ्य एव च।<br>स्वस्ति ते बहुपादेभ्यस्त्वपादेभ्योऽप्यनामयम् ॥ २१ | मरीचि, अत्रि, पुलह, पुलस्त्य, क्रतु, वसिष्ठ, भृगु, अङ्गिरा, मार्कण्डेय—ये ऋषि तुम्हारा मङ्गल करें। सप्तर्षिगण तुम्हारा सदा मङ्गल करें। विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, साध्य, मरुद्गण, अग्नि, सूर्य, शूलधर, महेश्वर, यक्ष, पिशाच, वसु और किन्नर—ये सब तत्परतासे सदा तुम्हारा मङ्गल करें। नाग, पक्षी, नदियाँ, सरोवर, तीर्थ, पवित्र देवस्थान, समुद्र, महाबलशाली भूतगण तथा विनायकगण सदा तत्पर होकर तुम्हारा मङ्गल करें। दो पैरवालों एवं चार पैरवालोंसे तुम्हारा मङ्गल हो। बहुत पैरवालोंद्वारा तुम्हारा मङ्गल हो एवं बिना पैरवालोंसे तुम्हारी स्वस्थता बनी रहे—तुम नीरोग बने रहो॥ १८-२१॥ | | प्राचीं दिग् रक्षतां वज्री दक्षिणां दण्डनायकः।<br>पाशी प्रतीचीं रक्षतु लक्ष्मांशः पातु चोत्तराम् ॥ २२<br><br>वह्निर्दक्षिणपूर्वां च कुबेरो दक्षिणापराम्।<br>प्रतीचीमुत्तरां वायुः शिवः पूर्वोत्तराम्पि ॥ २३<br><br>उपरिष्टाद् ध्रुवः पातु अधस्ताच्च धराधरः।<br>मुसली लाङ्गली चक्री धनुष्मानन्तरेषु च ॥ २४<br><br>वाराहोऽम्बुनिधौ पातु दुर्गे पातु नृकेसरी।<br>सामवेदध्वनिः श्रीमान् सर्वतः पातु माधवः ॥ २५ | वज्र धारण करनेवाले (इन्द्र) पूर्व दिशाकी, दण्डनायक (यम) दक्षिण दिशाकी, पाशधारी (वरुण) पश्चिम दिशाकी तथा चन्द्रमा उत्तर दिशाकी रक्षा करें। अग्नि अग्नि (पूर्व-दक्षिण)-कोणकी, कुबेर नैर्ऋत्य (दक्षिण-पश्चिम)-कोणकी, वायुदेव वायव्य (पश्चिम-उत्तर)-कोणकी और शिव ईशान (उत्तर-पूर्व)-कोणकी (रक्षा करें)। ऊपरकी ओर ध्रुव, नीचेकी ओर पृथ्वीको धारण करनेवाले शेषनाग एवं बीचके स्थानोंमें मुसल, हल, चक्र तथा धनुष धारण करनेवाले भगवान् विष्णु रक्षा करें। समुद्रमें वाराह, दुर्गम स्थानमें नरसिंह तथा सभी ओरसे सामवेदके ध्वनि-रूप श्रीमान् श्रीलक्ष्मीकान्त माधव तुम्हारी रक्षा करें॥ २२-२५॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>एवं कृतस्वस्त्ययनो गुहः शक्तिधरोऽग्रणीः।<br>प्रणिपत्य सुरान् सर्वान् समुत्पतत भूतलात् ॥ २६<br>तमन्वेव गणाः सर्वे दत्ता ये मुदितैः सुरैः।<br>अनुजग्मुः कुमारं ते कामरूपा विहङ्गमाः ॥ २७<br>मातरश्च तथा सर्वाः समुत्पेतुर्नभस्तलम्।<br>समं स्कन्देन बलिना हन्तुकामा महासुरान् ॥ २८<br>ततः सुदीर्घमध्वानं गत्वा स्कन्दोऽब्रवीद् गणान्।<br>भूम्यां तूर्णं महावीर्याः कुरुध्वमवतारणम् ॥ २९ | पुलस्त्यजी बोले— इस प्रकार स्वस्त्ययन सम्पन्न हो जानेपर शक्ति धारण करनेवाले सेनापति कार्तिकेयजी सभी देवताओंको प्रणामकर भूतलसे आकाशकी ओर उड़ चले। प्रसन्न होकर देवताओंने जिन गणोंको गुहके लिये दिया था, उन इच्छानुकूल रूप धारण करनेवाले सभी गणोंने पक्षीका रूप धारण कर कुमारका अनुगमन किया। सभी माताएँ भी पराक्रमी स्कन्दके साथ महान् असुरोंके वधके लिये आकाशमें उड़ चलीं। उसके बाद बहुत दूर जानेपर स्कन्दने गणोंसे कहा—महापराक्रमियो! तुमलोग शीघ्र ही पृथ्वीपर उतर जाओ॥ २६-२९॥ |
अध्याय ५८ ] सेनापतिपदपर नियुक्त कार्तिकेयके लिये ऋषियोंद्वारा स्वस्त्ययन, महिषासुर-वध २६५
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गणा गुहवचः श्रुत्वा अवतीर्य महीतलम्।<br>आरात् पतन्तस्तद्देशं नादं चक्रुर्भयंकरम्॥ ३०<br>तन्निनादो महीं सर्वामापूर्य च नभस्तलम्।<br>विवेशार्णवरन्ध्रेण पातालं दानवालयम्॥ ३१<br>श्रुतः स महिषेणाथ तारकेण च धीमता।<br>विरोचनेन जम्भेन कुजम्भेनासुरेण च॥ ३२<br>ते श्रुत्वा सहसा नादं वज्रपातोपमं दृढम्।<br>किमेतदिति संचिन्त्य तूर्णं जग्मुस्तदान्धकम्॥ ३३ | गुहकी बात सुनकर सभी गण पृथ्वीपर उतर आये। उतरकर उस स्थानपर उन गणोंने एकाएक भयंकर नाद किया। वह भयंकर नाद सारी पृथ्वी एवं गगनमण्डलमें गूँज गया। फिर तो वह समुद्री छिद्रसे दानवोंके निवासस्थान पाताललोक (-तक)-में पहुँच गया। उसके बाद मतिमान् महिष, तारक, विरोचन, जम्भ तथा कुजम्भ आदि असुरोंने उस ध्वनिको सुना। एकाएक वज्रपातके समान उस भयंकर ध्वनिको सुनकर यह क्या है—यह सोचकर वे सभी शीघ्रतासे अन्धकके पास चले गये॥ ३०—३३॥ |
| ते समेत्यान्धकेनैव समं दानवपुङ्गवाः।<br>मन्त्रयामासुरुद्विग्नास्तं शब्दं प्रति नारद॥ ३४<br>मन्त्रयत्सु च दैत्येषु भूतलात् सूकराननः।<br>पातालकेतुर्दैत्येन्द्रः सम्प्राप्तोऽथ रसातलम्॥ ३५<br>स बाणविद्धो व्यथितः कम्पमानो मुहुर्मुहुः।<br>अब्रवीद् वचनं दीनं समभ्येत्यान्धकासुरम्॥ ३६ | नारदजी! वे सभी असुरश्रेष्ठ व्याकुल होकर अन्धकके साथ ही एकत्र होकर उस शब्दके विषयमें परस्पर विचार-विमर्श करने लगे। उन दैत्योंके विचार करते समय सूकर-जैसे मुखवाला दैत्यश्रेष्ठ पातालकेतु धरातलसे रसातलमें आया। बाणसे विद्ध होनेके कारण व्यथित होकर वह बारम्बार काँपता हुआ अन्धकासुरके पास आकर दैन्य वचन बोला—॥ ३४—३६॥ |
| पातालकेतुरुवाच<br>गतोऽहमासं दैत्येन्द्र गालवस्याश्रमं प्रति।<br>तं विध्वंसयितुं यत्नं समारब्धं बलान्मया॥ ३७<br>यावत्सूकररूपेण प्रविशामि तमाश्रमम्।<br>न जाने तं नरं राजन् येन मे प्रहितः शरः॥ ३८<br>शरसंभिन्नजत्रुश्च भयात् तस्य महाजवः।<br>प्रणष्ट आश्रमात् तस्मात् स च मां पृष्ठतोऽन्वगात्॥ ३९<br>तुरङ्गखुरनिर्घोषः श्रूयते परमोऽसुर।<br>तिष्ठ तिष्ठेति वदतस्तस्य शूरस्य पृष्ठतः।<br>तद्भयादस्मि जलधिं सम्प्राप्तो दक्षिणार्णवम्॥ ४० | पातालकेतुने कहा— दैत्येश्वर! मैं गालवके आश्रममें गया था और उसको बलपूर्वक नष्ट करनेका उद्योग करने लगा। राजन्! मैंने सूकरके रूपमें जैसे ही उस आश्रममें प्रवेश किया, वैसे ही पता नहीं, किस मानवने मेरे ऊपर बाण छोड़ दिया। बाणसे हँसलीके टूट जानेपर मैं उसके भयके कारण आश्रमसे तुरंत भागा। पर उसने मेरा पीछा किया। असुर! मेरे पीठ-पीछे आ रहे 'रुको-रुको' कहनेवाले उस वीरके घोड़ेकी टापका महान् शब्द सुनायी पड़ रहा था। उसके भयसे मैं जलनिधि दक्षिण समुद्रमें आ गया॥ ३७—४०॥ |
| यावत्पश्यामि तत्रस्थान् नानावेषाकृतीन् नरान्।<br>केचिद् गर्जन्ति घनवत् प्रतिगर्जन्ति चापरे॥ ४१<br>अन्ये चोचुर्वयं नूनं निघ्नामो महिषासुरम्।<br>तारकं घातयामोऽद्य वदन्त्यन्ये सुतेजसः॥ ४२ | वहाँ मैंने अनेक प्रकारके पहनावे तथा आकृतिवाले मनुष्योंको देखा। उनमें कुछ तो बादलकी भाँति गर्जन कर रहे थे और कुछ दूसरे उसी प्रकारकी प्रतिध्वनि कर रहे थे। दूसरे कह रहे थे कि हम महिषासुरको निश्चय ही मार डालेंगे और अति तेजस्वी दूसरे लोग कह रहे थे कि आज हम तारकको मारेंगे। |
| तच्छ्रुत्वा सुतरां त्रासो मम जातोऽसुरेश्वर।<br>महार्णवं परित्यज्य पतितोऽस्मि भयातुरः॥ ४३<br>धरण्यां विवृतं गर्तं स मामन्वपतद् बली।<br>तद्भयात् सम्परित्यज्य हिरण्यपुरमात्मनः॥ ४४ | असुरेश्वर! उसे सुनकर मुझे बहुत डर हो गया और मैं विशाल समुद्रको छोड़कर भयभीत हो पृथ्वीके नीचे विस्तृत गड्ढे (सुरंग)-के रूपमें बने हुए गुप्त मार्गसे भागा। तब भी उस बलशालीने मेरा पीछा किया। उसके डरसे मैं अपना हिरण्यपुर त्यागकर |
६०- पुनः तेजःप्राप्तिके लिये शिवकी तपश्चर्या, केदारतीर्थ-की उपलब्धि, शिवका सरस्वतीमें निमग्न होना, मुरासुरका प्रसङ्ग और सनत्कुमारका प्रसङ्ग
| २६६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५८ |
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| तवान्तिकमनुप्राप्तः प्रसादं कर्तुमर्हसि।<br>तच्छ्रुत्वा चान्धको वाक्यं प्राह मेघस्वनं वचः॥ ४५ | आपके पास आ गया हूँ। आप मेरे ऊपर अनुग्रह कीजिये। यह बात सुनकर अन्धकने बादलकी गर्जनध्वनिमें यह वचन कहा—॥ ४१–४५॥ | | न भेतव्यं त्वया तस्मात् सत्यं गोप्ताऽस्मि दानव।<br>महिषस्तारकश्चोभौ बाणश्च बलिनां वरः॥ ४६<br>अनाख्यायैव ते वीरास्त्वन्धकं महिषादयः।<br>स्वपरिग्रहसंयुक्ता भूमिं युद्धाय निर्ययुः॥ ४७<br>यत्र ते दारुणाकारा गणाश्चक्रुर्महास्वनम्।<br>तत्र दैत्याः समाजग्मुः सायुधाः सबला मुने॥ ४८<br>दैत्यानापततो दृष्ट्वा कार्तिकेयगणास्ततः।<br>अभ्यद्रवन्त सहसा स चोग्रो मातृमण्डलः॥ ४९ | दानव! तुम्हें उससे डरना नहीं चाहिये। मैं तुम्हारा सच्चा रक्षक हूँ। उसके बाद महिष और तारक—ये दोनों तथा बलवानोंमें श्रेष्ठ बाण—ये सभी अन्धकसे बिना पूछे ही अपने अनुगामियोंके साथ युद्ध करनेके लिये पृथ्वीपर निकल आये। मुने! जिस स्थानपर भयंकर आकारवाले गण गर्जन कर रहे थे, उसी स्थानपर हथियारोंसे सजे-धजे दल-बलके साथ दैत्य भी आ गये। इसके बाद दैत्योंको आक्रमण करते हुए देखकर कार्तिकेयके गण तथा उग्र मातृकाएँ (उनपर) सहसा टूट पड़ीं॥ ४६–४९॥ | | तेषां पुरस्सरः स्थाणुः प्रगृह्य परिघं बली।<br>निषूदयत् परबलं क्रुद्धो रुद्रः पशूनिव॥ ५०<br>तं निघ्नन्तं महादेवं निरीक्ष्य कलशोदरः।<br>कुठारं पाणिनादाय हन्ति सर्वान् महासुरान्॥ ५१<br>ज्वालामुखो भयंकरः करेणादाय चासुरम्।<br>सरथं सगजं साश्वं विस्तृते वदनेऽक्षिपत्॥ ५२<br>दण्डकश्चापि संक्रुद्धः प्रासपाणिर्महासुरम्।<br>सवाहनं प्रक्षिपति समुत्पाट्य महार्णवे॥ ५३ | उन सबमें सबसे आगे बलशाली स्थाणु भगवान् लोहेकी बनी गदा लेकर क्रोधसे भरकर पशुओंके तुल्य शत्रुओंके सैन्य-बलका संहार करने लगे। असुरोंको मारते हुए महादेवजीको देखकर कलशोदर (भी) हाथमें कुल्हाड़ा लेकर सभी बड़े असुरोंका विनाश करने लगा। भय उत्पन्न कर देनेवाला ज्वालामुख रथ, हाथी और घोड़ोंके साथ असुरोंको हाथसे पकड़-पकड़कर अपने फैलाये हुए मुखमें झोंकने लगा। हाथमें बर्छी लिये हुए दण्डक भी क्रुद्ध होकर महासुरोंको उनके वाहनोंसहित उठाकर समुद्रमें फेंकने लगा॥ ५०–५३॥ | | शङ्कुकर्णश्च मुसली हलेनाकृष्य दानवान्।<br>संचूर्णयति मन्त्रीव राजानं प्रासभृद् वशी॥ ५४<br>खड्गचर्मधरो वीरः पुष्पदन्तो गणेश्वरः।<br>द्विधा त्रिधा च बहुधा चक्रे दैतेयदानवान्॥ ५५<br>पिङ्गलो दण्डमुद्यम्य यत्र यत्र प्रधावति।<br>तत्र तत्र प्रदृश्यन्ते राशयः शावदानवैः॥ ५६<br>सहस्रनयनः शूलं भ्रामयन् वै गणाग्रणीः।<br>निजघानासुरान् वीरः सवाजिसथकुञ्जरान्॥ ५७ | मुसल एवं प्रास लिये हुए जितेन्द्रिय शङ्कुकर्ण दानवोंको हलसे खींच-खींचकर इस प्रकार मटियामेट करने लगा, जैसे मन्त्री (अनाचारी-अविचारी) राजाको नष्ट करता जाता है। तलवार और ढाल धारण करनेवाला गणोंका स्वामी वीर पुष्पदन्त भी दैत्यों एवं दानवोंमें किसीको दो-दो, किसीको तीन-तीन टुकड़ोंमें काट डालता तथा किसी-किसीको तो अनेक खण्डोंमें कर डालता था। पिङ्गल दण्डको उठाकर जहाँ-जहाँ दौड़ता, वहाँ-वहाँ दैत्योंके शवका ढेर दिखलायी पड़ने लगता। गणोंमें श्रेष्ठ वीर सहस्रनयन शूल घुमाते हुए घोड़े, रथ और हाथियोंसहित असुरोंको मार रहा था॥ ५४–५७॥ | | भीमो भीमशिलावर्षैः स पुरस्सरतोऽसुरान्।<br>निजघान यथैवेन्द्रो वज्रवृष्ट्या नगोत्तमान्॥ ५८ | भीम भयङ्कर शिलाओंकी वर्षासे सामने आ रहे असुरोंको इस भाँति मार रहा था, जिस प्रकार इन्द्र वज्रकी वृष्टिसे उत्तम पर्वतोंको ध्वस्त करते हैं। |
अध्याय ५८ ] सेनापतिपदपर नियुक्त कार्तिकेयके लिये ऋषियोंद्वारा स्वस्त्ययन, महिषासुर-वध २६७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| रौद्रः शकटचक्राक्षो गणः पञ्चशिखो बली।<br>भ्रामयन् मुद्गरं वेगान्निजघ्नान् बलाद् रिपून्॥ ५९<br><br>गिरिभेदी तलेनैव सारोहं कुञ्जरं रणे।<br>भस्म चक्रे महावेगो रथं च रथिना सह॥ ६०<br><br>नाडीजङ्घोऽङ्घ्रिपातैश्च मुष्टिभिर्जानुनाऽसुरान्।<br>कीलाभिर्वज्रतुल्याभिर्जघान बलवान् मुने॥ ६१ | भयङ्कर शकटचक्राक्ष और बलवान् पञ्चशिख नामक गण तेजीसे मुद्गर घुमाते हुए बलपूर्वक शत्रुओंका संहार कर रहे थे। प्रबल वेगवान् गिरिभेदी युद्धमें थप्पड़ोंके भीषण आघातसे ही सवारके साथ हाथीको एवं रथीके सहित रथको चूर्ण-विचूर्ण करने लगा। मुने! बलवान् नाडीजङ्घ पैरों, मुक्कों, घुटनों एवं वज्रके समान कोहनियोंके प्रहारसे असुरोंको मारने लगा॥ ५८—६१॥ |
| कूर्मग्रीवो ग्रीवयैव शिरसा चरणेन च।<br>लुण्ठनेन तथा दैत्यान् निजघान सवाहनान्॥ ६२<br><br>पिण्डारकस्तु तुण्डेन शृङ्गाभ्यां च कलिप्रिय।<br>विदारयति संग्रामे दानवान् समरोद्धतान्॥ ६३<br><br>ततस्तत्सैन्यमतुलं वध्यमानं गणेश्वरैः।<br>प्रदुद्रावाथ महिषस्तारकश्च गणाग्रणीः॥ ६४<br><br>ते हन्यमानाः प्रमथा दानवाभ्यां वरायुधैः।<br>परिवार्य समन्तात् ते युयुधुः कुपितास्तदा॥ ६५ | कूर्मग्रीव ग्रीवा, सिर एवं पैरोंके प्रहारोंसे तथा धक्का देकर वाहनोंके साथ दैत्योंको मारने लगा। नारदजी! पिण्डारक अपने मुख तथा दोनों सींगोंसे गर्वीले दानवोंको छिन्न-भिन्न करने लगा। इसके बाद गणेश्वरोंद्वारा उस असीम सेनाके दलोंको मारा जाता देख गणनायक महिष एवं तारक दौड़े। उन दोनों दानवोंद्वारा उत्तम-से-उत्तम आयुधोंसे संहारे जा रहे वे सभी प्रमथगण अधिक क्रुद्ध होकर चारों ओरसे घेरकर युद्ध करने लगे॥ ६२—६५॥ |
| हंसास्यः पट्टिशेनाथ जघान महिषासुरम्।<br>षोडशाक्षस्त्रिशूलेन शतशीर्षो वरासिना॥ ६६<br><br>श्रुतायुधस्तु गदया विशोको मुसलेन तु।<br>बन्धुदत्तस्तु शूलेन मूर्ध्नि दैत्यमताडयत्॥ ६७<br><br>तथान्यैः पार्षदैर्युद्धे शूलशक्त्युष्टिपट्टिशैः।<br>नाकम्पत् ताड्यमानोऽपि मैनाक इव पर्वतः॥ ६८<br><br>तारको भद्रकाल्या च तथोलूखलया रणे।<br>वध्यते चैकचूड़ाया दार्यते परमायुधैः॥ ६९ | हंसास्य पट्टिशसे, षोडशाक्ष त्रिशूलसे और शतशीर्ष श्रेष्ठ तलवारसे महिषासुरको मारने लगा। श्रुतायुधने गदासे, विशोकने मुसलसे तथा बन्धुदत्तने शूलसे उस दैत्यके मस्तकपर मारा। वैसे ही अन्य पार्षदोंद्वारा शूल, शक्ति, ऋष्टि एवं पट्टिशोंसे मार खाते रहनेपर भी वह मैनाकपर्वतके समान तनिक भी विकम्पित नहीं हुआ। रणमें भद्रकाली, उलूखला एवं एकचूड़ाने श्रेष्ठ आयुधोंसे तारकके ऊपर प्रहार किया॥ ६६—६९॥ |
| तौ ताड्यमानौ प्रमथैर्मातृभिश्च महासुरौ।<br>न क्षोभं जग्मतुर्वीरौ क्षोभयन्तौ गणानपि॥ ७०<br><br>महिषो गदया तूर्णं प्रहारैः प्रमथानथ।<br>पराजित्य पराधावत् कुमारं प्रति सायुधः॥ ७१<br><br>तमापतन्तं महिषं सुचक्राक्षो निरीक्ष्य हि।<br>चक्रमुद्यम्य संक्रुद्धो रुरोध दनुनन्दनम्॥ ७२<br><br>गदाचक्राङ्कितकरौ गणासुरमहारथौ।<br>अयुध्येतां तदा ब्रह्मन् लघु चित्रं च सुष्ठु च॥ ७३ | वे दोनों महान् असुर प्रमथों और मातृशक्तियोंसे मारे जाते हुए होनेपर भी (स्वयं) अक्षुब्ध रहकर गणोंको क्षुब्ध कर रहे थे। उसके बाद आयुधसहित महिषासुर गदाकी बार-बार मारसे प्रमथोंको शीघ्र पराजितकर कुमारकी ओर झपटा। उस महिषको झपटते देखकर अत्यन्त क्रुद्ध हुए सुचक्राक्षने चक्र उठाकर (उस) दनुनन्दनको (बीचमें ही) रोक दिया। ब्रह्मन्! हाथोंमें गदा और चक्र धारण किये हुए असुर और गण दोनों महारथी उस समय आपसमें कभी तेज, कभी अद्भुत, कभी निपुण (इस प्रकार विविध प्रकारकी) लड़ाई करने लगे॥ ७०—७३॥ |
| गदां मुमोच महिषः समाविध्य गणाय तु।<br>सुचक्राक्षो निजं चक्रममुत्ससर्जासुरं प्रति॥ ७४ | महिषने गदा घुमाकर सुचक्राक्षके ऊपर मारा और सुचक्राक्षने अपने चक्रको उस असुरकी ओर चलाया। |
| २६८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५८ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गदां छित्त्वा सुतीक्ष्णारं चक्रं महिषमाद्रवत् ।<br>तत उच्चुक्रुशुर्दैत्या हा हतो महिषस्त्विति ॥ ७५<br><br>तच्छ्रुत्वाऽभ्यद्रवद् बाणः प्रासमाविध्य वेगवान् ।<br>जघान चक्रं रक्ताक्षः पञ्चमुष्टिशतेन हि ॥ ७६<br><br>पञ्चबाहुशतेनापि सुचक्राक्षं बबन्ध सः।<br>बलवानपि बाणेन निष्प्रयत्नगतिः कृतः ॥ ७७ | अत्यन्त तीक्ष्ण अरोंसे युक्त वह चक्र गदाको टूक-टूक काट कर महिषके ऊपर चल पड़ा। उसके बाद दैत्यलोग यह कहते हुए जोरसे चिल्ला उठे कि हाय ! महिष मारा गया। उसे सुननेके बाद लाल-लाल आँखोंवाला बाणासुर प्रास लेकर वेगपूर्वक दौड़ा और पाँच सौ मुष्टियोंसे चक्रपर प्रहार किया तथा पाँच सौ बाहुओंसे सुचक्राक्षको बाँध लिया। बलवान् होते हुए भी सुचक्राक्ष बाणासुरके द्वारा प्रयत्नशून्य कर दिया गया॥ ७४-७७॥ |
| सुचक्राक्षं सचक्रं हि बद्धं बाणासुरेण हि ।<br>दृष्ट्वाद्रवद्गदापाणिर्मकराक्षो महाबलः ॥ ७८<br><br>गदया मूर्ध्नि बाणं हि निजघान महाबलः।<br>वेदनार्त्तो मुमोचाथ सुचक्राक्षं महासुरः।<br>स चापि तेन संयुक्तो व्रीडायुक्तो महामनाः ॥ ७९<br><br>स संग्रामं परित्यज्य सालिग्राममुपाययौ ।<br>बाणोऽपि मकराक्षेण ताडितोऽभूत्पराङ्मुखः ॥ ८०<br><br>प्रभज्यत बलं सर्वं दैत्यानां सुरतापस ।<br>ततः स्वबलमीक्ष्यैव प्रभग्नं तारको बली।<br>खड्गोद्यतकरो दैत्यः प्रदुद्राव गणेश्वरान् ॥ ८१ | फिर, बाणासुरके द्वारा सुचक्राक्षको चक्रसहित बँधा हुआ देखकर महाबली मकराक्ष हाथमें गदा लेकर दौड़ा। महाबली मकराक्षने गदासे बाणके मस्तकपर प्रहार किया। उसके बाद कष्टसे दुःखी बाणने सुचक्राक्षको छोड़ दिया और वह मनस्वी उससे छूटकर लज्जित होता हुआ युद्ध छोड़कर सालिग्रामके समीप चला गया। बाण भी मकराक्षसे चोट खाकर युद्धसे मुख मोड़ लिया। नारदजी! दैत्योंकी सारी सेना छिन्न-भिन्न हो गयी। उसके बाद अपनी सेनाको नष्ट हुआ देख बलवान् दैत्य तारक हाथमें तलवार लेकर गणेश्वरोंकी ओर दौड़ा॥ ७८-८१॥ |
| ततस्तु तेनाप्रतिमेन सासिना<br>ते हंसवक्त्रप्रमुखा गणेश्वराः।<br>समातरश्चापि पराजिता रणे<br>स्कन्दं भयार्त्ताः शरणं प्रपेदिरे ॥ ८२<br><br>भग्नान् गणान् वीक्ष्य महेश्वरात्मज-<br>स्तं तारकं सासिनमापतन्तम्।<br>दृष्ट्वैव शक्त्या हृदये बिभेद<br>स भिन्नमर्मा न्यपतत् पृथिव्याम् ॥ ८३<br><br>तस्मिन्हते भ्रातरि भग्नदर्पो<br>भयातुरोऽभून्महिषो महर्षे ।<br>संत्यज्य संग्रामशिरो दुरात्मा<br>जगाम शैलं स हिमाचलाख्यम् ॥ ८४<br><br>बाणेऽपि वीरे निहतेऽथ तारके<br>गते हिमाद्रिं महिषे भयार्त्ते ।<br>भयाद् विवेशोग्रमपां निधानं<br>गणैर्बले वध्यति सापराध ॥ ८५ | उसके बाद खड्ग धारण करनेवाले उस बेजोड़ वीरने उन मातृकाओंसहित हंसवक्त्र आदि गणेश्वरोंको हरा दिया। वे सभी डरकर स्कन्दकी शरणमें गये। महेश्वरके पुत्र कुमारने अपने गणोंको निरुत्साह तथा खड्गधारी तारकासुरको आते हुए देखकर शक्तिके प्रहारसे उसका हृदय विदीर्ण कर डाला। हृदय फट जानेके कारण वह पृथ्वीपर गिर पड़ा। महर्षे! उस भाईके मर जानेपर महिषासुरका अभिमान चूर हो गया। वह दुष्टात्मा डरसे व्याकुल होकर युद्धभूमिसे भागकर हिमालय पर्वतपर चला गया। वीर तारकके मारे जाने, डरकर महिषके हिमालयपर भाग जाने एवं गणोंद्वारा अपराधी सेनाका संहार किये जानेपर बाण भी डरके कारण अगाध समुद्रमें प्रवेश कर गया॥ ८२-८५॥ |
| हत्वा कुमारो रणमूर्ध्नि तारकं<br>प्रगृह्य शक्तिं महता जवेन।<br>मयूरमारुह्य शिखण्डमण्डितं<br>ययौ निहन्तुं महिषासुरस्य ॥ ८६ | युद्धभूमिमें तारकका संहार कर कुमारने शक्ति उठा ली और वे शिखण्डयुक्त मोरपर चढ़ गये। फिर अत्यन्त शीघ्रतासे महिषासुरको मारने चले। हाथमें श्रेष्ठ शक्ति लिये हुए मयूरध्वज (मोरछापकी पताकावाले) कार्तिकेयको |
अध्याय ५८ ] सेनापतिपदपर नियुक्त कार्तिकेयके लिये ऋषियोंद्वारा स्वस्त्ययन, महिषासुर-वध [ २६१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स पृष्ठतः प्रेक्ष्य शिखण्डिकेतनं<br>समापतन्तं वरशक्तिपाणिनम्।<br>कैलासमुत्सृज्य हिमाचलं तथा<br>क्रौञ्चं समभ्येत्य गुहां विवेश॥ ८७<br>दैत्यं प्रविष्टं स पिनाकिसूनु-<br>र्जुगोप यत्नाद् भगवान् गुहोऽपि।<br>स्वबन्धुहन्ता भविता कथं त्वहं<br>संचिन्तयन्नेव ततः स्थितोऽभूत् ॥ ८८<br>ततोऽभ्यगात् पुष्करसम्भवस्तु<br>हरो मुरारिस्त्रिदशेश्वरश्च।<br>अभ्येत्य चोचुर्महिषं सशैलं<br>भिन्दस्व शक्त्या कुरु देवकार्यम्॥ ८९ | पीछे आते देख वह महिषासुर कैलास एवं हिमालयको छोड़कर क्रौञ्चपर्वतपर चला गया और उसकी गुफामें प्रवेश कर गया। महादेवके पुत्र भगवान् गुह (कार्तिकेय) पर्वतकी गुफामें प्रविष्ट हुए दैत्यकी (अब) प्रयत्नपूर्वक रक्षा करने लगे। वे सोचने लगे कि मैं अपने (ममेरे) बन्धुका विनाशकर्ता कैसे होऊँ! वे (कुछ क्षण) स्तब्ध हो गये। उसके बाद ही कमलजन्मा ब्रह्मा, भगवान् शंकर, विष्णु और इन्द्र वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने कहा कि शक्तिके द्वारा पर्वतसहित महिषको विदीर्ण कर दो और देवताओंका कार्य पूरा करो ॥ ८६—८९ ॥ |
| तत् कार्तिकेयः प्रियमेव तथ्यं<br>श्रुत्वा वचः प्राह सुरान् विहस्य।<br>कथं हि मातामहनेप्तृकं वधे<br>स्वभ्रातरं भ्रातृसुतं च मातुः॥ ९०<br>एषा श्रुतिश्चापि पुरातनी किल<br>गायन्ति यां वेदविदो महर्षयः।<br>कृत्वा च यस्या मतमुत्तमायाः<br>स्वर्गं व्रजन्ति त्वतिपापिनोऽपि ॥ ९१<br>गां ब्राह्मणं वृद्धमथाप्तवाक्यं<br>बालं स्वबन्धुं ललनामदुष्टाम्।<br>कृतापराधा अपि नैव वध्या<br>आचार्यमुख्या गुरवस्तथैव ॥ ९२<br>एवं जानन् धर्ममग्र्यं सुरेन्द्रा<br>नाहं हन्यां भ्रातरं मातुलेयम्।<br>यदा दैत्यो निर्गमिष्यद् गुहान्त-<br>स्तदा शक्त्या घातयिष्यामि शत्रुम् ॥ ९३ | इस प्रिय-तथ्य वचनको सुनकर हँसते हुए कार्तिकेय देवताओंसे बोले—मैं नानाके नाती, माताके भतीजे और अपने ममेरे भाईको कैसे मारूँ? (इस विषयमें) यह (इनको न मारनेकी) प्राचीन श्रुति भी है, जिसे वेदज्ञाता महर्षिगण गाया करते हैं। (इसी प्रकार) गौ, ब्राह्मण, वृद्ध, यथार्थवक्ता, बालक, अपना सम्बन्धी, दोषरहित स्त्री तथा आचार्य आदि गुरुजन अपराध करनेपर भी अवध्य होते हैं। इस उत्तम श्रुतिके अनुसार आचरण करनेवाले महान् पापी भी स्वर्गलोकको जाते हैं। सुरश्रेष्ठो! मैं इस श्रेष्ठ धर्मको जानते हुए (ऐसी दशामें—गुफामें छिपी अवस्थामें) अपने भाईको नहीं मार सकूँगा। जब दैत्य गुहाके भीतरसे बाहर निकलेगा तब मैं शक्तिसे उस (देव-) शत्रुका संहार करूँगा (तब हमें धर्मबाधा नहीं होगी) ॥ ९०—९३ ॥ |
| श्रुत्वा कुमारवचनं भगवान्महर्षे<br>कृत्वा मतिं स्वहृदये गुहमाह शक्रः।<br>मत्तो भवान् न मतिमान् वदसे किमर्थं<br>वाक्यं शृणुष्व हरिणा गदितं हि पूर्वम् ॥ ९४<br>नैकस्यार्थे बहून् हन्यादिति शास्त्रेषु निश्चयः।<br>एकं हन्याद् बहुभ्योऽर्थे न पापी तेन जायते॥ ९५<br>एतच्छ्रुत्वा मया पूर्वं समयस्थेन चाग्रिज।<br>निहतो नमुचिः पूर्वं सोदरोऽपि ममानुजः॥ ९६<br>तस्माद् बहूनामर्थाय सक्रौञ्चं महिषासुरम्।<br>घातयस्व पराक्रम्य शक्त्या पावकदत्तया ॥ ९७ | महर्षे! कुमारका वचन सुननेके बाद इन्द्रने अपने हृदयमें विचारकर गुहसे कहा—आप मुझसे अधिक मतिमान् नहीं हैं। आप (ऐसा) क्यों बोल रहे हैं। पहले समयमें भगवान् श्रीहरिकी कही हुई बातको सुनिये। शास्त्रोंमें यह निश्चय किया गया है कि एक व्यक्तिकी रक्षाके लिये बहुतोंका संहार नहीं करना चाहिये। परंतु बहुतोंके कल्याणके लिये एकका वध करनेसे मनुष्य पापी नहीं होता। अग्निपुत्र! इस शास्त्रनिर्णयको सुनकर पहले समयमें मैंने मेल रहनेपर भी अपने सहोदर छोटे भाई नमुचिको मार दिया। अतः बहुतोंके कल्याणके लिये तुम क्रौञ्चसहित महिषासुरका संहार अग्निद्वारा दी हुई शक्तिसे बलपूर्वक कर डालो ॥ ९४—९७ ॥ |
| श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५८ |
|---|---|
| २७० |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुरन्दरवचः श्रुत्वा क्रोधादारक्तलोचनः।<br>कुमारः प्राह वचनं कम्पमानः शतक्रतुम्॥ ९८<br>मूढ किं ते बलं बाह्वोः शारीरं चापि वृत्रहन्।<br>येनाधिक्षिपसे मां त्वं ध्रुवं न मतिमानसि॥ ९९<br>तमुवाच सहस्त्राक्षस्त्वत्तोऽहं बलवान् गुह।<br>तं गुहः प्राह एहोहि युद्ध्यस्व बलवान् यदि॥ १००<br>शक्रः प्राहाथ बलवान् ज्ञायते कृत्तिकासुत।<br>प्रदक्षिणं शीघ्रतरं यः कुर्यात् क्रौञ्चमेव हि॥ १०१ | इन्द्रकी बात सुनकर कुमारकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। आवेशमें काँपते हुए कुमारने इन्द्रसे कहा—मूढ़ वृत्रारि ! तुम्हारी बाहुओं और शरीरमें कितनी शक्ति है, जिसके बलपर तुम मेरे ऊपर (मतिमन्द कहकर ) आक्षेप कर रहे हो। तुम निश्चय ही बुद्धिमान् नहीं हो। हजार आँखोंवाले इन्द्रने उनसे कहा—गुह ! मैं तुमसे शक्तिशाली हूँ। गुहने इन्द्रसे कहा—यदि तुम शक्तिशाली हो तो आओ, युद्ध कर देख लो। तब इन्द्रने कहा—कृत्तिकानन्दन ! हम दोनोंमें जो पहले क्रौञ्च-पर्वतकी प्रदक्षिणा कर सकेगा वही शक्तिशाली समझा जायगा॥ ९८—१०१॥ |
| श्रुत्वा तद्वचनं स्कन्दो मयूरं प्रज्झय वेगवान्।<br>प्रदक्षिणं पादचारी कर्तुं तूर्णतरोऽभ्यगात्॥ १०२<br>शक्रोऽवतीर्य नागेन्द्रात् पादेनाथ प्रदक्षिणम्।<br>कृत्वा तस्थौ गुहोऽभ्येत्य मूढं किं संस्थितो भवान्॥ १०३<br>तमिन्द्रः प्राह कौटिल्यं मया पूर्वं प्रदक्षिणः।<br>कृतोऽस्य न त्वया पूर्वं कुमारः शक्रमब्रवीत्॥ १०४<br>मया पूर्वं मया पूर्वं विवदन्तो परस्परम्।<br>प्राप्योचतुर्महेशाय ब्रह्मणे माधवाय च॥ १०५ | उस बातको सुनकर स्कन्द अपने वाहन मयूरको छोड़कर पैदल प्रदक्षिणा करनेके लिये शीघ्रतासे चल पड़े। इन्द्र भी गजराजसे उतरकर पैदल ही प्रदक्षिणाकर वहाँ आ गये। स्कन्दने उनके पास जाकर कहा—मूढ़ ! क्यों बैठे हो? इन्द्रने उन कौटिल्य (कुटिलाके पुत्र स्कन्द)-से कहा—मैंने तुमसे पहले ही इसकी प्रदक्षिणा कर ली है। कुमारने इन्द्रसे कहा—तुमने पहले नहीं की है। 'मैंने पहले की है, मैंने पहले की है।' इस प्रकार परस्पर विवाद करते हुए उन दोनोंने शंकर, ब्रह्मा एवं विष्णुके पास जाकर कहा॥ १०२-१०५॥ |
| अथोवाच हरिः स्कन्दं प्रष्टुमर्हसि पर्वतम्।<br>योऽयं वक्ष्यति पूर्वं स भविष्यति महाबलः॥ १०६<br>तन्माधववचः श्रुत्वा क्रौञ्चमभ्येत्य पावकः।<br>पप्रच्छाद्रिमिदं केन कृतं पूर्वं प्रदक्षिणम्॥ १०७<br>इत्येवमुक्तः क्रौञ्चस्तु प्राह पूर्वं महामतिः।<br>चकार गोत्रभित् पश्चात्त्वया कृतमथो गुह॥ १०८<br>एवं ब्रुवन्तं क्रौञ्चं स क्रोधात्प्रस्फुरिताधरः।<br>बिभेद शक्त्या कौटिल्यो महिषेण समं तदा॥ १०९ | इसके बाद विष्णुने स्कन्दसे कहा कि तुम पर्वतसे पूछ सकते हो। वह जिसे पहले आया हुआ बतलायेगा, वही महाशक्तिशाली मान्य होगा। माधवकी उन बातोंको सुनकर अग्निनन्दने क्रौञ्चपर्वतके पास जाकर उससे यह पूछा कि प्रदक्षिणा पहले किसने की है? इस बातको सुनकर चतुर क्रौञ्चने कहा—कार्तिकेय ! पहले इन्द्रने प्रदक्षिणा की; इसके बाद तुमने की है। इस प्रकार कहनेवाले क्रौञ्चको क्रोधसे ओठ काँपते हुए उस कुटिलानन्दन कुमारने शक्तिकी मारसे महिषासुरके साथ ही विदीर्ण कर दिया॥ १०६-१०९॥ |
| तस्मिन् हतेऽथ तनये बलवान्<br> सुनाभो वेगेन भूमिधरपार्थिवजस्तथागात्।<br>ब्रह्मेन्द्ररुद्रमरुदश्विवसुप्रधाना<br> जग्मुर्दिवं महिषमीक्ष्य हतं गुहेन॥ ११०<br>स्वमातुलं वीक्ष्य बली कुमारः<br> शक्तिं समुत्पाट्य निहन्तुकामः।<br>निवारितश्चक्रधरेण वेगा-<br> दालिङ्ग्य दोर्भ्यां गुरुरित्युदीर्य॥ १११ | उस पुत्रके मार दिये जानेपर पर्वतराजपुत्र बलवान् सुनाभ शीघ्र ही वहाँ आ गये। ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, वायु, अश्विनीकुमार, वसु आदि देवता गुह (कार्तिकेय)-के द्वारा महिषको मारा गया देखकर स्वर्ग चले गये। अपने मामाको देखनेके बाद बलवान् कुमारने शक्ति लेकर (उन्हें) मारना चाहा। परंतु विष्णुने शीघ्रतासे उन्हें बाहुओंसे आलिङ्गित करते हुए 'ये गुरु हैं' ऐसा कहकर |
| अध्याय ५८ ] | सेनापतिपदपर नियुक्त कार्तिकेयके लिये ऋषियोंद्वारा स्वस्त्ययन, महिषासुर-वध | २७१ |
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| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सुनाभमभ्येत्य हिमाचलस्तु<br>प्रगृह्य हस्तेऽन्यत एव नीतवान्।<br>हरिः कुमारं सशिखण्डिनं नय-<br>द्वेगाद्दिवं पन्नगशत्रुपुत्रः॥ ११२<br>ततो गुहः प्राह हरिं सुरेशं<br>मोहेन नष्टो भगवन् विवेकः।<br>भ्राता मया मातुलजो निरस्त-<br>स्तस्मात् करिष्ये स्वशरीरशोषम्॥ ११३ | रोक दिया। हिमालय सुनाभके निकट आये और उनका हाथ पकड़कर दूसरी ओर ले गये तथा गरुडवाहन विष्णु मयूरसहित कुमारको जल्दीसे स्वर्गमें लिये चले गये। इसके बाद गुहने सुरेश्वर हरिसे कहा—भगवन्! मोहसे मेरी विचार-शक्ति नष्ट हो गयी और मैंने अपने ममेरे भाईका संहार कर दिया है। अतः (प्रायश्चित्तमें) मैं अपने शरीरको सुखा डालूँगा॥ ११०—११३॥ |
| तं प्राह विष्णुर्व्रज तीर्थवर्यं<br>पृथूदकं पापतरोः कुठारम्।<br>स्नात्वौघवत्यां हरमीक्ष्य भक्त्या<br>भविष्यसे सूर्यसमप्रभावः॥ ११४<br>इत्येवमुक्तो हरिणा कुमार-<br>स्त्वभ्येत्य तीर्थं प्रसमीक्ष्य शम्भुम्।<br>स्नात्वार्च्य देवान् स रविप्रकाशो<br>जगाम शैलं सदनं हरस्य॥ ११५ | विष्णुने उनसे कहा—कुमार! तुम पापरूपी वृक्षके लिये कुठारस्वरूप श्रेष्ठ तीर्थ पृथूदकमें जाओ। वहाँ ओघवतीके जलमें स्नानकर भक्तिपूर्वक महादेवका दर्शन करनेसे तुम (निष्पाप होकर) सूर्यके समान कान्तियुक्त हो जाओगे। हरिके इस प्रकार कहनेपर कुमार (पृथूदक) तीर्थमें गये और उन्होंने महादेवका दर्शन किया। स्नान करनेके बाद देवताओंकी पूजा करके वे सूर्यके समान तेजस्वी होकर महादेवके निवासस्थल पर्वतपर चले गये। |
| सुचक्रनेत्रोऽपि महाश्रमे तप-<br>श्चचार शैले पवनाशनस्तु।<br>आराधयानो वृषभध्वजं तदा<br>हरोऽस्य तुष्टो वरदो बभूव॥ ११६<br>देवात् स वव्रे वरमायुधार्थे<br>चक्रं तथा वै रिपुबाहुषण्डम्।<br>छिन्द्याद्यथा त्वप्रतिमं करेण<br>बाणस्य तन्मे भगवान् ददातु॥ ११७ | सुचक्रनेत्र भी केवल वायु पीकर पर्वतके महान् आश्रममें शंकरकी आराधना करता हुआ तपस्या करने लगा। तब प्रसन्न होकर शंकरने उसे वर देनेका वचन दिया। उसने अस्त्र-प्राप्तिके हेतु वर माँगा—हे भगवन्! शत्रुकी भुजाओंको काटनेवाला ऐसा अनुपम चक्र मुझे दें, जिससे मैं हाथसे ही बाणासुरकी भुजाओंको काट सकूँ॥ ११४—११७॥ |
| तमाह शम्भुर्व्रज दत्तमेतद्<br>वरं हि चक्रस्य तवायुधस्य।<br>बाणस्य तद्बाहुबलं प्रवृद्धं<br>संछेत्स्यते नात्र विचारणाऽस्ति॥ ११८<br>वरे प्रदत्ते त्रिपुरान्तकेन<br>गणेश्वरः स्कन्दमुपाजगाम।<br>निपत्य पादौ प्रतिवन्द्य हृष्टो<br>निवेदयामास हरप्रसादम्॥ ११९ | महादेवजीने उससे कहा—जाओ! तुमने चक्रके निमित्त जो वर माँगा, उसे मैंने दे दिया। यह बाणासुरके अत्यन्त बढ़े हुए बाहुबलको निःसन्देह काट डालेगा। त्रिपुरको मारनेवाले महेश्वरके वर देनेपर गणेश्वर (सुचक्रनेत्र) स्कन्दके निकट गया और (उसने) उनके चरणोंमें गिरकर वन्दना की। उसके बाद उनसे प्रसन्नतापूर्वक महादेवकी कृपाका वर्णन किया॥ ११८-११९॥ |
| एवं तवोक्तं महिषासुरस्य<br>वधं त्रिनेत्रात्मजशक्तिभेदात्।<br>क्रौञ्चस्य मृत्युः शरणागतार्थं<br>पापापहं पुण्यविवर्धनं च॥ १२० | इस प्रकार मैंने (पुलस्त्यने) तुमसे शंकरके पुत्रके द्वारा शक्तिसे महिषासुरके संहार किये जानेका वर्णन किया। शरणागतके हेतु क्रौञ्चकी मृत्यु हुई। यह आख्यान पापका विनाश एवं पुण्यकी वृद्धि करनेवाला है॥ १२०॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें अठावनवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ५८॥
६१- पुन्नाम नरकोंका वर्णन, पुत्र-शिष्यकी विशेषता एवं बारह प्रकारके पुत्रोंका वर्णन, सनत्कुमार-ब्रह्माका प्रसङ्ग, चतुर्मूर्तिका वर्णन और मुरु-वध
| २७२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५९ ] |
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उनसठवाँ अध्याय
ऋतध्वजका पातालकेतुपर आक्रमण कर प्रहार करना, अन्धकका गौरीको प्राप्त करनेके लिये प्रयत्न करना
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नारद उवाच<br>योऽसौ मन्त्रयतां प्राप्तो दैत्यानां शरताडितः।<br>स केन वद निर्भिन्नः शरेण दितिजेश्वरः ॥ १ | नारदने पूछा — आप हमें यह बतलायें कि सलाह करते हुए दैत्योंमेंसे जो वह दैत्य बाणद्वारा बिंध गया था उसे किसने बाणसे विदीर्ण कर दिया था॥ १॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>आसीन्नृपो रघुकुले रिपुजिन्महर्षे<br>तस्यात्मजो गुणगणैकनिधिर्महात्मा।<br>शूरोऽरिसैन्यदमनो बलवान् सुहृत्सु<br>विप्रान्धदीनकृपणेषु समानभावः ॥ २<br>ऋतध्वजो नाम महान् महीयान्<br>स गालवार्थे तुरगाधिरूढः।<br>पातालकेतुं निजघान पृष्ठे<br>बाणेन चन्द्रार्धनिभेन वेगात् ॥ ३ | पुलस्त्यजी बोले — महर्षे! रघुकुलमें रिपुजित् नामके एक राजा थे। उनके ऋतध्वज नामका एक पुत्र था। वह सभी गुणोंकी निधि, महात्मा, वीर, शत्रुके सेनाओंका नाश करनेवाला, बली, मित्रों, ब्राह्मणों, अन्धों, गरीबों एवं दयापात्र दीनोंमें समान भाव रखनेवाला था। उसने गालवके लिये घोड़ेपर सवार होकर पातालकेतुकी पीठमें अर्धचन्द्रके सदृश बाणसे बड़ी तेजीसे मारा था॥ २-३॥ |
| नारद उवाच<br>किमर्थं गालवस्यासौ साधयामास सत्तमः।<br>येनासौ पत्रिणा दैत्यं निजघान नृपात्मजः ॥ ४ | नारदने कहा (पूछा) — उस श्रेष्ठ राजपुत्रने जिस कारण बाणसे उस दैत्यको मारा, उससे गालवका कौन-सा कार्य सिद्ध किया?॥ ४॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>पुरा तपस्तप्यति गालवर्षि-<br>र्महाश्रमे स्वे सततं निविष्टः।<br>पातालकेतुस्तपसोऽस्य विघ्नं<br>करोति मौढ्यात् स समाधिभङ्गम्॥ ५<br>न चेष्यतेऽसौ तपसो व्ययं हि<br>शक्तोऽपि कर्तुं त्वथ भस्मसात् तम्।<br>आकाशमीक्ष्याथ स दीर्घमुष्णं<br>मुमोच निःश्वासमनुत्तमं हि ॥ ६<br>ततोऽम्बराद् वाजिवरः पपात<br>बभूव वाणी त्वशरीरिणी च।<br>असौ तुरङ्गो बलवान् क्रमेत<br>अह्ना सहस्राणि तु योजनानाम्॥ ७<br>स तं प्रगृह्याश्ववरं नरेन्द्रं<br>ऋतध्वजं योज्य तदात्तशस्त्रम्।<br>स्थितस्तपस्येव ततो महर्षि-<br>र्दैत्यं समेत्य विशिखैर्नृपजो बिभेद ॥ ८ | पुलस्त्यजी बोले — पहले समयकी बात है कि गालव अपने आश्रममें तपस्यामें सदा लीन रहा करते थे। दैत्य पातालकेतु मूर्खताके कारण उनकी तपस्यामें बाधा डाला करता और उनकी समाधि (ध्यान)-को भंग किया करता था। वे उसको जलाकर राख कर देनेमें समर्थ होते हुए भी अपनी तपस्या क्षीण नहीं करना चाहते थे; (क्योंकि तपोबलसे दूसरोंका अनिष्ट करनेपर तपस्या क्षीण हो जाती है।) उन्होंने ऊपरकी ओर देखकर लंबा, गर्म निःश्वास छोड़ा। वह सर्वथा अनुपम था। उसके बाद आकाशसे एक सुन्दर घोड़ा गिरा और अशरीरिणी वाणी—आकाशवाणी हुई कि यह बलवान् अश्व एक दिनमें हजारों योजन जा सकता है। शस्त्रसे सजे हुए उस राजा ऋतध्वजको वह घोड़ा सौंपकर वे महर्षि (पुनः) तपस्या करने लगे। उसके बाद राजपुत्रने दैत्यके पास जाकर उसे बाणसे घायल कर दिया॥ ५-८॥ |
| नारद उवाच<br>केनाम्बरतलाद् वाजी निसृष्टो वद सुव्रत।<br>वाक् कस्याऽदेहिनी जाता परं कौतूहलं मम ॥ ९ | नारदने कहा (पुनः पूछा) — सुव्रत! आप यह बतलायें कि किसने आकाशसे इस अश्वको गिराया था एवं आकाशवाणी किसकी थी? (इस विषयमें) मुझे बड़ी उत्सुकता है॥ ९॥ |
अध्याय ५९] ऋतध्वजका पातालकेतुपर आक्रमण कर प्रहार करना २७३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुलस्त्य उवाच<br>विश्वावसुर्नाम महेन्द्रगायनो<br>गन्धर्वराजो बलवान् यशस्वी।<br>निसृष्टवान् भूवलये तुरङ्गं<br>ऋतध्वजस्यैव सुतार्थमाशु॥ १० | पुलस्त्यजी बोले— महेन्द्रका गुणगान करनेवाले बलशाली विश्वावसु नामके यशस्वी गन्धर्वराजने अपनी पुत्रीके लिये ऋतध्वजके हेतु उस समय अश्वको पृथ्वीपर गिराया था॥ १०॥ |
| नारद उवाच<br>कोऽर्थो गन्धर्वराजस्य येनाप्रैषीन्महाजवम्।<br>राज्ञः कुवलयाश्वस्य कोऽर्थो नृपसुतस्य च॥ ११ | नारदने कहा (फिर पूछा)— महान् वेगशाली इस अश्वको भेजनेमें गन्धर्वराजका क्या उद्देश्य था तथा राजपुत्र राजा कुवलयाश्वका इसमें क्या लाभ था? (कृपया इसे भी बतलाइये।)॥ ११॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>विश्वावसोः शीलगुणोपपन्ना<br>आसीत्पुरंध्रीषु वरा त्रिलोके।<br>लावण्यराशिः शशिकान्तितुल्या<br>मदालसा नाम मदालसैव॥ १२<br>तां नन्दने देवरिपुस्तरस्वी<br>संक्रीडतीं रूपवतीं ददर्श।<br>पातालकेतुस्तु जहार तन्वीं<br>तस्यार्थतः सोऽश्ववरः प्रदत्तः॥ १३<br>हत्वा च दैत्यं नृपतेस्तनूजो<br>लब्ध्वा वरोरूमपि संस्थितोऽभूत्।<br>दृष्टो यथा देवपतिर्महेन्द्रः<br>शच्या तथा राजसुतो मृगाक्ष्या॥ १४ | पुलस्त्यजी बोले— विश्वावसुकी मदसे अलसायी-सी मदालसा नामकी एक (भोलीभाली) कन्या थी। वह शील और गुणसे सम्पन्न, त्रिलोककी स्त्रियोंमें उत्तम, सुन्दरताकी खानि और चन्द्रमाकी कान्तिके समान (कोमलकिशोरी) थी। नन्दनवनमें क्रीडा कर रही उस सौन्दर्यशालिनीको देवताओंके शत्रु पातालकेतुने देखा और तुरन्त उसे उठा ले गया। उसीके कारण वह श्रेष्ठ घोड़ा दिया गया था। दैत्यको मारनेके बाद श्रेष्ठ ऊरुवाली स्त्रीको पाकर राजपुत्र निश्चिन्त हो गये। राजपुत्र (उस) मृगनयनीके साथ ऐसे सुशोभित हो रहे थे जैसे शचीके साथ इन्द्र सुशोभित होते हैं॥ १२—१४॥ |
| नारद उवाच<br>एवं निरस्ते महिषे तारके च महासुरे।<br>हिरण्याक्षसुतो धीमान् किमचेष्टत वै पुनः॥ १५ | नारदने पुनः पूछा— इस प्रकार महान् असुर तारक और महिषके निरस्त—समाप्त हो जानेपर हिरण्याक्षके बुद्धिमान् पुत्र (अन्धक)-ने पुनः क्या किया?॥ १५॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>तारकं निहतं दृष्ट्वा महिषं च रणेऽन्धकः।<br>क्रोधं चक्रे सुदुर्बुद्धिर्देवानां देवसैन्यहा॥ १६<br>ततः स्वल्पपरिवारः प्रगृह्य परिघं करे।<br>निर्जगामाथ पातालाद् विचचार च मेदिनीम्॥ १७<br>ततो विचरता तेन मन्दरे चारुकन्दरे।<br>दृष्टा गौरी च गिरिजा सखीमध्ये स्थिता शुभा॥ १८<br>ततोऽभूत् कामबाणार्त्तः सहसैवान्धकोऽसुरः।<br>तां दृष्ट्वा चारुसर्वाङ्गीं गिरिराजसुतां वने॥ १९ | पुलस्त्यजी बोले— तारक और महिष दोनोंको संग्राममें मारे गये देखकर देवसेनाके समूहोंका नाश करनेवाला, महामूर्ख अन्धक देवताओंपर कुपित हो गया। उसके बाद थोड़ी-सी सेनाके साथ वह हाथमें परिघ लेकर पातालसे बाहर निकल आया और पृथ्वीपर विचरण करने लगा। उसके बाद घूमते हुए ही उसने सुन्दर कन्दराओंवाले मन्दर गिरिपर सखियोंके बीचमें गिरिनन्दिनी कल्याणी गौरीको देखा। उस सर्वाङ्गसुन्दरी गिरिराजनन्दिनीको वनमें देखकर अन्धकासुर एकाएक काम-बाणसे पीड़ित हो गया॥ १६—१९॥ |
| अथोवाचासुरो मूढो वचनं मन्मथान्धकः।<br>कस्येयं चारुसर्वाङ्गी वने चरति सुन्दरी॥ २०<br>इयं यदि भवेन्नैव ममान्तःपुरवासिनी।<br>तन्मदीयेन जीवेन क्रियते निष्फलेन किम्॥ २१ | तब कामसे अंधे हुए उस मूर्ख असुर अन्धकने कहा—वनमें भ्रमण कर रही यह सर्वाङ्गसुन्दरी ललना किसकी है? यदि यह मेरे अन्तःपुरमें निवास करनेवाली न हुई तो मेरे इस व्यर्थके जीवनसे क्या लाभ? यदि |
| २७४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यदस्यास्तनुमध्याया न परिष्वङ्गवानहम्।<br>अतो धिङ् मां रूपेण किं स्थिरेण प्रयोजनम्॥ २२<br><br>स मे बन्धुः स सचिवः स भ्राता साम्परायिकः।<br>यो मामसितकेशां तां योजयेन्मृगलोचनाम्॥ २३ | इस कृशोदरी सुन्दरी ललनाका आलिङ्गन मुझे प्राप्त न हुआ तो मुझे धिक्कार है! मेरी इस स्थायी सुन्दरतासे क्या लाभ? मेरा वही बन्धु, वही सचिव, वही भ्राता तथा वही संकटकालका साथी है जो इस काले केशवाली मृगनयनी सुन्दरीको मुझसे मिला दे॥ २०—२३॥ |
| इत्थं वदति दैत्येन्द्रे प्रह्लादो बुद्धिसागरः।<br>पिधाय कर्णौ हस्ताभ्यां शिरःकम्पं वचोऽब्रवीत्॥ २४<br><br>मा मैवं वद दैत्येन्द्र जगतो जननी त्वियम्।<br>लोकनाथस्य भार्येयं शङ्करस्य त्रिशूलिनः॥ २५<br><br>मा कुरुष्व सुदुर्बुद्धिं सद्यः कुलविनाशिनीम्।<br>भवतः परदारेयं मा निमज्ज रसातले॥ २६<br><br>सत्सु कुत्सितमेवं हि असत्स्वपि हि कुत्सितम्।<br>शत्रवस्ते प्रकुर्वन्तु परदारावगाहनम्॥ २७ | दैत्यराजके इस प्रकार कहनेपर महाबुद्धिमान् प्रह्लाद दोनों हाथोंसे दोनों कानोंको ढँककर सिर हिलाते हुए बोले—दैत्येन्द्र! इस प्रकार मत कहो। ये तो संसारकी जननी और लोकस्वामी, त्रिशूलधारी शङ्करकी पत्नी हैं। तुम कुलका सद्यः विनाश करनेवाली ऐसी दुर्बुद्धि मत करो। तुम्हारे लिये ये परस्त्री हैं। अतः रसातलमें मत गिरो; क्योंकि (ऐसा दुष्कर्म) सज्जनोंमें तो अत्यन्त निन्दित है ही, असत् पुरुषोंमें भी निन्दित है। ऐसा दुष्कर्म—परदारा-अभिगमन तुम्हारे शत्रु करें (जिससे उनका विनाश हो जाय)॥ २४—२७॥ |
| किंचित् त्वया न श्रुतं दैत्यनाथ<br>गीतं श्लोकं गाधिना पार्थिवेन।<br>दृष्ट्वा सैन्यं विप्रधेनुप्रसक्तं<br>तथ्यं पथ्यं सर्वलोके हितं च॥ २८<br><br>वरं प्राणास्त्याज्या न च पिशुनवादेष्वभिरति-<br>र्वरं मौनं कार्यं न च वचनमुक्तं यदनृतम्।<br>वरं क्लीबैर्भाव्यं न च परकलत्राभिगमनं<br>वरं भिक्षार्थित्वं न च परधनास्वादमसकृत्॥ २९ | दैत्येश! ब्राह्मणकी गौपर प्रसक्त सेनाको देखकर गाधिराजने समस्त जगत्के लिये कल्याणकारी, सत्य एवं उचित जो श्लोक कहा है क्या उसे आपने नहीं सुना है? (उन्होंने कहा है—) प्राणोंका छोड़ देना अच्छा है, परंतु चुगलखोरोंकी बातमें दिलचस्पी लेना उचित नहीं। मौन रहना अच्छा है, किंतु असत्य बोलना ठीक नहीं। नपुंसक होकर रहना ठीक है, परंतु परस्त्रीगमन उचित नहीं। भीख माँगना अच्छा है, किंतु बार-बार दूसरेके धनका उपभोग करना उचित नहीं। |
| स प्रह्लादवचः श्रुत्वा क्रोधान्धो मदनार्दितः।<br>इयं सा शत्रुजननीत्येवमुक्त्वा प्रदुद्रुवे॥ ३०<br><br>ततोऽन्वधावन् दैतेया यन्त्रमुक्ता इवोपलाः।<br>तान् रुरोध बलान्नन्दी वज्रोद्यतकरोऽव्ययः॥ ३१ | प्रह्लादका वचन सुननेके बाद काम-पीड़ित अन्धक क्रोधसे अंधा होकर 'यह वही शत्रु की जननी है'—यह कहते हुए दौड़ पड़ा। उसके बाद दूसरे और दानव भी यन्त्रसे छूटे हुए पत्थरकी गोलीके समान उसके पीछे दौड़ चले। परंतु अव्यय नन्दीने हाथमें वज्र उठाकर बलपूर्वक उन सबको रोक दिया॥ २८—३१॥ |
| मयतारपुरोगास्ते वारिता द्रावितास्तथा।<br>कुलिशेनाहतास्तूर्णं जग्मुर्भीता दिशो दश॥ ३२<br><br>तानर्दितान् रणे दृष्ट्वा नन्दिनाऽन्धकदानवः।<br>परिघेण समाहत्य पातयामास नन्दिनम्॥ ३३<br><br>शैलादिं पतितं दृष्ट्वा धावमानं तथान्धकम्।<br>शतरूपाऽभवद् गौरी भयात् तस्य दुरात्मनः॥ ३४ | वज्रकी मारसे रोक दिये गये और भगाये जाते हुए वे मय एवं तारक आदि सभी दैत्य डरकर दसों दिशाओंमें भाग गये। संग्राममें अन्धकासुरने उन सभीको नन्दीद्वारा पीड़ित देखकर नन्दीको परिघसे मारकर गिरा दिया। नन्दीको गिरा हुआ और अन्धकको दौड़कर आते हुए देखकर गौरी उस दुष्टात्माके भयसे सैकड़ों रूपवाली |
अध्याय ५९ ] \hfill ऋतध्वजका पातालकेतुपर आक्रमण कर प्रहार करना \hfill २७५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततः स देवीगणमध्यसंस्थितः<br>परिभ्रमन् भाति महाऽसुरेन्द्रः।<br>यथा वने मत्तकरी परिभ्रमन्<br>करेणुमध्ये मदलोलदृष्टिः॥ ३५ | हो गयीं। उसके बाद देवियोंके बीच घूमता हुआ (वह) दैत्य ऐसा लग रहा था जैसे कि वनमें हथिनियोंके बीच घूमता हुआ मदसे चञ्चल दृष्टिवाला मतवाला हाथी सुशोभित होता है॥ ३२—३५॥ |
| न परिज्ञातवांस्तत्र का तु सा गिरिकन्यका।<br>नात्राश्चर्यं न पश्यन्ति चत्वारोऽमी सदैव हि॥ ३६<br><br>न पश्यतीह जात्यन्धो रागान्धोऽपि न पश्यति।<br>न पश्यति मदोन्मत्तो लोभाक्रान्तो न पश्यति।<br>सोऽपश्यमानो गिरिजां पश्यन्नपि तदान्धकः॥ ३७<br><br>प्रहारं नाददत् तासां युवत्य इति चिन्तयन्।<br>ततो देव्या स दुष्टात्मा शतावर्या निराकृतः॥ ३८<br><br>कुट्टितः प्रवरैः शस्त्रैर्निपपात महीतले।<br>वीक्ष्यान्धकं निपतितं शतरूपा विभावरी॥ ३९<br><br>तस्मात् स्थानादपाक्रम्य गताऽन्तर्धानमम्बिका।<br>पतितं चान्धकं दृष्ट्वा दैत्यदानवयूथपाः॥ ४०<br><br>कुर्वन्तः सुमहाशब्दं प्राद्रवन्त रणार्थिनः।<br>तेषामापततां शब्दं श्रुत्वा तस्थौ गणेश्वरः॥ ४१ | (पर) वह नहीं समझ रहा था कि उनमें वे गिरिनन्दिनी कौन हैं? इसमें (उसके न समझनेमें) कोई आश्चर्य नहीं है; क्योंकि संसारमें ये चार प्रकारके व्यक्ति सदा ही (ठीक-ठीक) नहीं देख पाते। जन्मका अन्धा नहीं देखता, प्रेममें अन्धा हुआ नहीं देखता, मदोन्मत्त नहीं देखता एवं लोभसे पराभूत भी नहीं देखता है। अतः अन्धक उस समय देखते हुए भी गिरिजाको नहीं देख पा रहा था। उस दानवने उन सभीको युवती समझकर उनपर आघात नहीं किया, फिर तो शतावरीदेवीने (ही) उस दुष्टात्मापर आघात कर दिया। उत्कृष्ट कोटिके शस्त्रोंसे बिंधकर वह पृथ्वीपर गिर पड़ा। अन्धकको गिरा हुआ देखकर शतरूपोंवाली विभावरी अम्बिका उस स्थानसे हटकर अन्तर्हित हो गयीं। अन्धकको गिरा हुआ देख दैत्यों एवं दानवोंके सेनापति युद्धके लिये ललकारते हुए दौड़ पड़े। आक्रमण करनेवाले उन (दैत्यों)-के शब्दको सुनकर गणेश्वर खड़े हो गये॥ ३६–४१॥ |
| आदाय वज्रं बलवान् मघवानिव कोपितः।<br>दानवान् समयान् वीरः पराजित्य गणेश्वरः॥ ४२<br><br>समभ्येत्याम्बिकां दृष्ट्वा ववन्दे चरणौ शुभौ।<br>देवी च ता निजा मूर्तीः प्राह गच्छध्वमिच्छया॥ ४३<br><br>विहरध्वं महीपृष्ठे पूज्यमाना नरैरिह।<br>वसतिर्भवतीनां च उद्यानेषु वनेषु च॥ ४४<br><br>वनस्पतिषु वृक्षेषु गच्छध्वं विगतज्वराः।<br>तास्त्वेवमुक्ताः शैलेय्या प्रणिपत्याम्बिकां क्रमात्॥ ४५<br><br>दिक्षु सर्वासु जग्मुस्ताः स्तूयमानाश्च किन्नरैः।<br>अन्धकोऽपि स्मृतिं लब्ध्वा अपश्यनद्रिनन्दिनीम्।<br>स्वबलं निर्जितं दृष्ट्वा ततः पातालमाद्रवत्॥ ४६<br><br>ततो दुरात्मा स तदान्धको मुने<br>पातालमभ्येत्य दिवा न भुङ्क्ते।<br>रात्रौ न शेते मदनेषुताडितो<br>गौरीं स्मरन्कामबलाभिपन्नः॥ ४७ | क्रुद्ध हुए गणेश्वर इन्द्रके समान वज्र लेकर मयसहित दानवोंको हराकर अम्बिकाके निकट गये और (उन्होंने) उनके शुभ चरणोंमें प्रणाम किया। देवीने भी अपनी उन मूर्तियोंसे कहा—तुम सभी इच्छानुरूप स्थानोंको जाओ और मनुष्योंकी आराधना प्राप्त करती हुई पृथ्वीपर भ्रमण करो। तुम सबका निवास उद्यानों, वनों, वनस्पतियों एवं वृक्षोंमें होगा। अब तुम सभी निश्चिन्त होकर जाओ। पार्वतीके इस प्रकार कहनेपर वे सभी देवियाँ अम्बिकाको प्रणामकर किन्नरोंसे स्तुत होती हुई (दसों) दिशाओंमें चली गयीं। अन्धक भी होशमें आनेके बाद गिरिजाको न देखकर तथा अपनी सेनाको हारी हुई समझकर पातालमें चला गया। मुने! उसके बाद कामबाणसे घायल एवं कामके वेगसे पीड़ित दुष्टात्मा अन्धक पातालमें जाकर गौरीका चिन्तन करता हुआ न दिनमें खाता था और न रातमें सोता था—वह बेचैन-सा हो गया था॥ ४२–४७॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें उनसठवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ५९ ॥
| २७६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६० |
|---|
साठवाँ अध्याय
पुनः तेजःप्राप्तिके लिये शिवकी तपश्चर्या, केदारतीर्थकी उपलब्धि, शिवका सरस्वतीमें निमग्न होना, मुरासुरका प्रसंग और सनत्कुमारका प्रसंग
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| नारद उवाच<br>क्व गतः शङ्करो ह्यासीद् येनाम्बा नन्दिना सह।<br>अन्धकं योधयामास एतन्मे वक्तुमर्हसि॥ १ | नारदने कहा (पूछा)— आप मुझे यह बतलायें कि शङ्कर कहाँ चले गये थे, जिससे नन्दिसहित अम्बिकाने अन्धकसे (स्वयं) युद्ध किया॥ १॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>यदा वर्षसहस्रं तु महामोहे स्थितोऽभवत्।<br>तदाप्रभृति निस्तेजाः क्षीणवीर्यः प्रदृश्यते॥ २<br>स्वमात्मानं निरीक्ष्याथ निस्तेजोऽङ्गं महेश्वरः।<br>तपोऽर्थाय तथा चक्रे मतिं मतिमतां वरः॥ ३<br>स महाव्रतमुत्पाद्य समाश्वास्याम्बिकां विभुः।<br>शैलादिं स्थाप्य गोप्तारं विचचार महीतलम्॥ ४<br>महामुद्रार्पितग्रीवो महाहिकृतकुण्डलः।<br>धारयाणः कटीदेशे महाशङ्खस्य मेखलाम्॥ ५ | पुलस्त्यजी बोले— वे (शंकरजी) जिस समय एक हजार वर्षतक महामोहमें पड़ गये थे, उस समयसे वे तेजरहित एवं शक्तिहीन-से दिखायी दे रहे थे। मतिमानोंमें श्रेष्ठ महेश्वरने स्वयं अपने अङ्गोंको निस्तेज देखकर तप करनेके लिये निश्चय किया। उन व्यापक शङ्करने महाव्रतका निर्णय करनेके बाद अम्बिकाको धैर्य धारण कराया और वे शैल आदि (नन्दी)-को उनकी रक्षाके लिये नियुक्त कर पृथ्वीपर विचरण करने लगे। उन्होंने गलेमें तन्त्रानुसार महामुद्रा पहन ली। महासर्पोंके कुण्डल एवं कमरमें महाशङ्खकी मेखला धारण कर ली॥ २–५॥ |
| कपालं दक्षिणे हस्ते सव्ये गृह्य कमण्डलुम्।<br>एकाहवासी वृक्षे हि शैलसानुनदीष्वटन्॥ ६<br>स्थानं त्रैलोक्यमास्थाय मूलाहारोऽम्बुभोजनः।<br>वाय्वाहारस्तदा तस्थौ नववर्षशतं क्रमात्॥ ७<br>ततो वीटां मुखे क्षिप्य निरुच्छ्वासोऽभवद् यतिः।<br>विस्तृते हिमवत्पृष्ठे रम्ये समशिलातले॥ ८<br>ततो वीटा विदार्यैव कपालं परमेष्ठिनः।<br>सार्चिष्मती जटामध्यान्निषण्णा धरणीतले॥ ९ | दाहिने हाथमें कपाल एवं बायें हाथमें कमण्डलु लेकर वे वृक्षोंके नीचे (कभी) पड़े रहते, कभी पहाड़ोंकी चोटियोंपर तथा नदियोंके तटपर चक्कर लगाते रहते। प्रथम (आरम्भमें) मूल-फल खाकर फिर जल पीकर, उसके बाद वायु पीकर (यम-नियमका) व्रत पालन करनेवाले उन्होंने क्रमशः तीनों लोकोंमें नौ सौ वर्ष व्यतीत किये। उसके बाद उन्होंने हिमालयके ऊपर रमणीय तथा समतल पर्वतीय चट्टानपर आसन लगा लिया और अपने मुखमें काष्ठकी बनी गुल्ली डालकर श्वास रोक लिया—कुम्भक प्राणायाम कर लिया। उसके बाद शंकरके कपालको फोड़कर ज्वालामयी वह गुल्ली (उनकी) जटाके बीचसे निकलकर पृथ्वीपर गिर पड़ी॥ ६–९॥ |
| वीटया तु पतन्त्याऽद्रिर्दारितः क्ष्मासमोऽभवत्।<br>जातस्तीर्थवरः पुण्यः केदार इति विश्रुतः॥ १० | उस गुल्लीके गिरनेसे पर्वत टूट-फूटकर पृथ्वीके समान (समतल) हो गया और वहाँ केदार नामका प्रसिद्ध तीर्थ बन गया। |
| ततो हरो वरं प्रादात् केदाराय वृषध्वजः।<br>पुण्यवृद्धिकरं ब्रह्मन् पापघ्नं मोक्षसाधनम्॥ ११ | ब्रह्मन्! उसके बाद वृषध्वज महादेवने केदारको पुण्यकी वृद्धि करनेवाले एवं पापके विनाश करनेवाले और मोक्षके साधनका वर दिया तथा |
| अध्याय ६० ] | पुनः तेजःप्राप्तिके लिये शिवकी तपश्चर्या, केदारतीर्थकी उपलब्धि | २७७ |
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| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| ये जलं तावके तीर्थे पीत्वा संयमिनो नराः।<br>मधुमांसनिवृत्ता ये ब्रह्मचारिव्रते स्थिताः॥ १२<br><br>षण्मासाद् धारयिष्यन्ति निवृत्ताः परपाकतः।<br>तेषां हृत्पङ्कजेष्वेव मल्लिंगं भविता ध्रुवम्॥ १३ | यह भी वर दिया कि जो संयमी मनुष्य परान्न-भोजनको त्यागकर तथा ब्रह्मचर्यव्रत धारणकर तुम्हारा जल पीते हुए यहाँ छः महीनेतक निवास करेंगे उनके हृदयकमलमें निश्चय ही मेरे लिङ्गकी सत्ता प्रत्यक्ष प्रकट होगी॥ १०—१३॥ |
| न चास्य पापाभिरतिर्भविष्यति कदाचन।<br>पितॄणामक्षयं श्राद्धं भविष्यति न संशयः॥ १४<br><br>स्नानदानतपांसीह होमजप्यादिकाः क्रियाः।<br>भविष्यन्त्यक्षया नृणां मृतानामपुनर्भवः॥ १५<br><br>एतद् वरं हरात् तीर्थं प्राप्य पुष्णाति देवताः।<br>पुनाति पुंसां केदारस्त्रिनेत्रवचनं यथा॥ १६<br><br>केदाराय वरं दत्त्वा जगाम त्वरितो हरः।<br>स्नातुं भानुसुतां देवीं कालिन्दीं पापनाशिनीम्॥ १७ | उन्हें कभी पापमें अभिरुचि नहीं होगी तथा उनसे किया गया पितरोंका श्राद्ध अक्षय होगा—इसमें कोई सन्देह नहीं है। मनुष्योंद्वारा यहाँ की गयी स्नान, दान, तपस्या, होम एवं जप आदिकी क्रियाएँ अक्षय होंगी तथा इस स्थानपर मनुष्योंके मरनेपर उनका पुनर्जन्म नहीं होगा। महादेवसे इस प्रकारका वर पाकर वह केदारतीर्थ त्रिनेत्र महादेवके वचनके अनुकूल प्राणिवर्गको पवित्र एवं देवताओंका पोषण करने लगा। केदारतीर्थको वर देकर महादेव पापविनाशिनी रवितनया देवी कालिन्दी (यमुना)-में स्नान करनेके लिये शीघ्र चले गये॥ १४—१७॥ |
| तत्र स्नात्वा शुचिर्भूत्वा जगामाथ सरस्वतीम्।<br>वृतां तीर्थशतैः पुण्यैः प्लक्षजां पापनाशिनीम्॥ १८<br><br>अवतीर्णस्ततः स्नातुं निमग्नश्च महाम्भसि।<br>द्रुपदां नाम गायत्रीं जजापान्तर्जले हरः॥ १९<br><br>निमग्ने शङ्करे देव्यां सरस्वत्यां कलिप्रिय।<br>साग्रः संवत्सरो जातो न चोन्मज्जत ईश्वरः॥ २०<br><br>एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मन् भुवनाः सप्त सार्णवाः।<br>चेलुः पेतुर्धरण्यां च नक्षत्रास्तारकैः सह॥ २१ | वहाँ स्नान करके पवित्र होकर भगवान् शंकर सैकड़ों पवित्र तीर्थोंसे घिरी (वृत) और प्लक्षवृक्षसे उत्पन्न पापनाशिनी सरस्वतीके निकट गये। उसके बाद वे स्नान करनेके लिये उसमें उतरे एवं अगाध जलमें भलीभाँति स्नान कर द्रुपदा गायत्रीका जप करने लगे। कलिप्रिय! देवी सरस्वतीके जलमें शङ्करको डुबकी लगाये हुए एक वर्षसे अधिक बीत गया; परंतु भगवान् ऊपर नहीं उठे। ब्रह्मन्! उस समय समुद्रोंसहित सातों भुवन काँपने लगे और ताराओंके साथ नक्षत्र (टूट-टूटकर) भूतलपर गिरने लगे॥ १८—२१॥ |
| आसनेभ्यः प्रचलिता देवाः शक्रपुरोगमाः।<br>स्वस्त्यस्तु लोकेभ्य इति जपन्तः परमर्षयः॥ २२<br><br>ततः क्षुब्धेषु लोकेषु देवा ब्रह्माणमागमन्।<br>दृष्ट्वोचुः किमिदं लोकाः क्षुब्धाः संशयमागताः॥ २३<br><br>तानाह पद्मसंभूतो नैतद् वेद्मि च कारणम्।<br>तदागच्छत वो युक्तं द्रष्टुं चक्रगदाधरम्॥ २४<br><br>पितामहेनैवमुक्ता देवाः शक्रपुरोगमाः।<br>पितामहं पुरस्कृत्य मुरारिसदनं गताः॥ २५ | इन्द्र प्रमुख हैं जिनमें, ऐसे देवता अपने-अपने आसनोंसे उचक पड़े और महर्षिगण 'संसारका कल्याण हो'—इस भावनासे जप करने लगे। तत्पश्चात् जगत्के अशान्त हो जानेपर देवगण ब्रह्माके निकट आये और उन्हें देखकर उन लोगोंने पूछा—ब्रह्मन्! संसार अशान्त होकर क्यों सन्देहके झोंके खा रहा है? कमलयोनि ब्रह्माने उनसे कहा—मैं इसके कारणको नहीं जान पा रहा हूँ। तुमलोग जाओ, (इसके लिये) चक्र-गदाधारी विष्णुका दर्शन करना उचित है। पितामहके इस प्रकार कहनेपर इन्द्र आदि सभी देवता पितामहको आगे कर मुरारिलोक (विष्णुलोक)-में गये॥ २२—२५॥ |
६२- शिवके अभिषेक और तप्त-कृच्छ्र-व्रतका उपदेश, हरि-हरके संयोगसे विष्णुके हृदयमें शिवकी संस्थिति, शुक्रको संजीवनी विद्याकी शिक्षा, मङ्कणकी कथा और सप्त सारस्वततीर्थका माहात्म्य
| २७८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६० |
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| नारद उवाच<br>कोऽसौ मुरारिर्देवर्षे देवो यक्षो नु किन्नरः।<br>दैत्यो राक्षसो वापि पार्थिवो वा तदुच्यताम् ॥ २६ | नारदने पूछा— देवर्षे! आप यह बतलायें कि ये मुरारि कौन हैं? ये देवता हैं या यक्ष, किन्नर हैं या दैत्य, राक्षस हैं या मनुष्य?॥ २६॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>योऽसौ रजः सत्त्वमयो गुणवांश्च तमोमयः।<br>निर्गुणः सर्वगो व्यापी मुरारिर्मधुसूदनः ॥ २७ | पुलस्त्यजीने कहा— देवताओ! जो ये मुरारि हैं वे मधु नामके राक्षसके विनाशकारी हैं; वे सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुणसे युक्त हैं; निर्गुण और सगुण हैं; सर्वगामी और सर्वव्यापी हैं॥ २७॥ | | नारद उवाच<br>योऽसौ मुर इति ख्यातः कस्य पुत्रः स गीयते।<br>कथं च निहतः संख्ये विष्णुना तद् वदस्व मे ॥ २८ | नारदने (पुलस्त्यजीसे) पूछा— आप मुझे यह बतलायें कि यह मुर-नामधारी दानव किसका पुत्र है और लड़ाईके मैदानमें भगवान् विष्णुने उसे किस प्रकार मारा?॥ २८॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>श्रूयतां कथयिष्यामि मुरासुरनिबर्हणम्।<br>विचित्रमिदमाख्यानं पुण्यं पापप्रणाशनम् ॥ २९<br>कश्यपस्यौरसः पुत्रो मुरो नाम दनूद्भवः।<br>स ददर्श रणे शस्तान् दितिपुत्रान् सुरोत्तमैः ॥ ३०<br>ततः स मरणाद् भीतस्तप्त्वा वर्षगणान्बहून्।<br>आराधयामास विभुं ब्रह्माणमपराजितम् ॥ ३१<br>ततोऽस्य तुष्टो वरदः प्राह वत्स वरं वृणु।<br>स च वव्रे वरं दैत्यो वरमेनं पितामहात् ॥ ३२ | पुलस्त्यजी बोले— नारद! मुर असुरके विनाशकी कथा अद्भुत है; वह पापका विनाश करनेवाली और पवित्रकारिणी है; मैं उसे कहूँगा; तुम सुनो। दनुकी कोखसे कश्यपका औरस पुत्र मुर उत्पन्न हुआ। उसने श्रेष्ठ देवोंद्वारा संग्राममें दैत्योंको पराजित देखा। उसके बाद मृत्युसे भयभीत होकर उसने बहुत वर्षोंतक तपस्या करते हुए व्यापक अजेय ब्रह्माकी आराधना की। उसके बाद उसके ऊपर संतुष्ट होकर ब्रह्माने कहा—वत्स! वर माँगो। उस दैत्यने पितामहसे यह श्रेष्ठ वर माँगा—॥ २९—३२॥ | | यं यं करतलेनाहं स्पृशेयं समरे विभो।<br>स स मद्धस्तसंस्पृष्टस्त्वमरोऽपि मरत्वतः ॥ ३३<br>बाढमित्याह भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>ततोऽभ्यागान्महातेजा मुरः सुरगिरिं बली ॥ ३४<br>समेत्याह्वयते देवं यक्षं किन्नरमेव वा।<br>न कश्चिद् युयुधे तेन समं दैत्येन नारद ॥ ३५<br>ततोऽमरावतीं क्रुद्धः स गत्वा शक्रमाह्वयत्।<br>न चास्य सह योद्धुं वै मतिं चक्रे पुरंदरः ॥ ३६ | विभो! युद्धमें मैं जिसे हाथसे छू दूँ वह मेरे हाथसे छूते ही अमर (देवता) होनेपर भी मृत्युको प्राप्त हो जाय। लोकपितामह भगवान् ब्रह्माने कहा—बहुत ठीक; ऐसा ही होगा। उसके बाद महातेजस्वी बलशाली मुर देवगिरिपर जा पहुँचा। [पुलस्त्यजी कहते हैं कि] नारदजी! वहाँ पहुँचकर उसने देवता, यक्ष, किन्नर आदिको युद्धके लिये ललकारा, किंतु किसीने भी उसके साथ युद्ध नहीं किया। उसके बाद क्रुद्ध होकर वह अमरावतीकी ओर चला गया और इन्द्रको संग्राम करनेके लिये ललकारने लगा। किंतु इन्द्रने भी उसके साथ युद्ध करनेका विचार नहीं किया॥ ३३—३६॥ | | ततः स करमुद्यम्य प्रविवेशामरावतीम्।<br>प्रविशन्तं न तं कश्चिन्निवारयितुमुत्सहेत् ॥ ३७<br>स गत्वा शक्रसदनं प्रोवाचेन्द्रं मुरस्तदा।<br>देहि युद्धं सहस्राक्ष नो चेत् स्वर्गं परित्यज ॥ ३८<br>इत्येवमुक्तो मुरुणा ब्रह्मन् हरिरयस्तदा।<br>स्वर्गराज्यं परित्यज्य भूचरः समजायत ॥ ३९ | उसके बाद हाथ उठाये हुए उसने अमरावतीमें प्रवेश किया। परंतु किसीने भी प्रवेश करते हुए उसको रोकनेका साहस नहीं किया। उसके बाद इन्द्रके भवनमें जाकर मुरने इन्द्रसे कहा—सहस्राक्ष! मुझसे संग्राम करो, अन्यथा स्वर्गको छोड़ दो। ब्रह्मन्! मुरके इस प्रकार कहनेपर इन्द्र (युद्ध न कर) स्वर्गका राज्य छोड़कर |
| अध्याय ६० ] | पुनः तेजःप्राप्तिके लिये शिवकी तपश्चर्या, केदारतीर्थकी उपलब्धि | २७१ | | :--- | :--- |
| ततो गजेन्द्रकुलिशौ हृतौ शक्रस्य शत्रुणा ।<br>सकलत्रो महातेजाः सह देवैः सुतेन च ॥ ४०<br><br>कालिन्द्या दक्षिणे कूले निवेश्य स्वपुरं स्थितः ।<br>मुरुश्चापि महाभोगान् बुभुजे स्वर्गसंस्थितः ॥ ४१ | पृथ्वीपर विचरण करने लगे। उसके बाद (उस) शत्रुने इन्द्रके गजराज (ऐरावत) और वज्रको छीन लिया। महातेजस्वी इन्द्र अपनी पत्नी, पुत्र और देवताओंके साथ कालिन्दीके दक्षिण तटपर अपना नगर बसाकर रहने लगे और मुर स्वर्गमें रहते हुए महान् भोगोंका उपभोग करने लगा ॥ ३७-४१ ॥ | | दानवाश्चापरे रौद्रा मयतारपुरोगमाः ।<br>मुरमासाद्य मोदन्ते स्वर्गे सुकृतिनो यथा ॥ ४२<br><br>स कदाचिन्महीपृष्ठं समायातो महासुरः ।<br>एकाकी कुञ्जरारूढः सरयूं निम्नगां प्रति ॥ ४३<br><br>स सरय्वास्तटे वीरं राजानं सूर्यवंशजम् ।<br>ददृशे रघुनामानं दीक्षितं यज्ञकर्मणि ॥ ४४<br><br>तमुपेत्याब्रवीद् दैत्यो युद्धं मे दीयतामिति ।<br>नो चेन्निवर्ततां यज्ञो नेष्टव्या देवतास्त्वया ॥ ४५ | मय और तारक आदि दूसरे भयंकर दानव भी मुरके निकट पहुँचकर स्वर्गमें पुण्यात्माओंके समान आमोद-प्रमोद करने लगे। वह महान् असुर किसी समय पृथ्वीपर आया और अकेला ही हाथीपर चढ़कर सरयू नदीके तटपर उपस्थित हुआ। उसने सरयूके किनारे सूर्यवंशमें उत्पन्न हुए एवं यज्ञकर्ममें दीक्षित रघु नामके राजाको देखा। उनके पास जाकर उस दैत्यने कहा— मुझसे संग्राम करो, नहीं तो यज्ञ करना बंद कर दो। तुम देवताओंकी पूजा नहीं कर सकते ॥ ४२-४५ ॥ | | तमुपेत्य महातेजा मित्रावरुणसंभवः ।<br>प्रोवाच बुद्धिमान् ब्रह्मन् वसिष्ठस्तपसां वरः ॥ ४६<br><br>किं ते जितैर्नरैर्दैत्य अजिताननुशासय ।<br>प्रहर्तुमिच्छसि यदि तं निवारय चान्तकम् ॥ ४७<br><br>स बली शासनं तुभ्यं न करोति महासुर ।<br>तस्मिञ्जिते हि विजितं सर्वं मन्यस्व भूत लम् ॥ ४८<br><br>स तद् वसिष्ठवचनं निशम्य दनुपुङ्गवः ।<br>जगाम धर्मराजानं विजेतुं दण्डपाणिनम् ॥ ४९ | ब्रह्मन् ! मित्रावरुणके पुत्र महातेजस्वी, बुद्धिमान् और तपस्वियोंमें श्रेष्ठ वसिष्ठने उस दैत्यके पास जाकर कहा—दैत्य ! मनुष्योंको जीत लेनेसे तुम्हें क्या लाभ होगा ? जो नहीं जीते गये हैं उनको पराजित करो। यदि तुम (चढ़ाई कर) प्रहार करना चाहते हो तो उन यमराजका अवरोध करो। महासुर ! वे बलशाली हैं। तुम्हारा शासन नहीं मानते। उनको जीत लेनेपर समस्त भूतलको पराजित हुआ समझो। वसिष्ठका वह वचन सुनकर दानवश्रेष्ठ दण्ड धारण करनेवाले धर्मराजको जीतनेके लिये चल पड़ा ॥ ४६-४९ ॥ | | तमायान्तं यमः श्रुत्वा मत्वाऽवध्यं च संयुगे ।<br>स समारुह्य महिषं केशवान्तिकमागमत् ॥ ५०<br><br>समेत्य चाभिवाद्यैनं प्रोवाच मुरचेष्टितम् ।<br>स चाह गच्छ मामद्य प्रेषयस्व महासुरम् ॥ ५१<br><br>स वासुदेववचनं श्रुत्वाऽभ्यागात् त्वरान्वितः ।<br>एतस्मिन्नन्तरे दैत्यः सम्प्राप्तो नगरीं मुरः ॥ ५२<br><br>तमागतं यमः प्राह किं मुरो कर्तुमिच्छसि ।<br>वदस्व वचनं कर्त्ता त्वदीयं दानवेश्वर ॥ ५३ | उसे आता हुआ सुनकर तथा संग्राममें वह अवध्य है—ऐसा विचारकर वे यमराज महिषपर सवार होकर भगवान् केशवके पास चले गये। उनके पास जाकर प्रणाम करनेके पश्चात् (यमराजने) मुरके कृत्योंको बताया। उन्होंने कहा—तुम जाकर अभी उस महासुरको मेरे पास भेज दो। वासुदेवके वचनको सुनकर वे शीघ्र चले आये। इतनेमें मुर दैत्य उनकी नगरीमें आया। उसके आनेपर यमने कहा—हे मुर ! बतलाओ तुम क्या करना चाहते हो ? दानवेश्वर ! मैं तुम्हारी आज्ञाका पालन करूँगा ॥ ५०-५३ ॥ | | मुरुवाच<br>यम प्रजासंयमनान्निवृत्तिं कर्त्तुमर्हसि ।<br>नो चेत् तवाद्य छित्त्वाऽहं मूर्धानं पातये भुवि ॥ ५४ | मुरु या मुरने कहा— यम ! तुम प्रजाओंके ऊपर नियन्त्रण करना बंद कर दो, नहीं तो मैं तुम्हारा सिर |
| २८० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६० |
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| तमाह धर्मराड् ब्रह्मन् यदि मां संयमाद् भवान्।<br>गोपायति मुरो सत्यं करिष्ये वचनं तव ॥ ५५<br><br>मुरस्तमाह भवतः कः संयन्ता वदस्व माम्।<br>अहमेनं पराजित्य वारयामि न संशयः॥ ५६<br><br>यमस्तं प्राह मां विष्णुर्देवश्चक्रगदाधरः।<br>श्वेतद्वीपनिवासी यः स मां संयमतेऽव्ययः ॥ ५७ | काटकर पृथ्वीपर फेंक दूँगा। ब्रह्मन्! धर्मराजने उससे कहा—यदि तुम मेरे ऊपर संयम करनेवालेसे मेरी रक्षा कर सको तो मैं सत्य कहता हूँ कि तुम्हारे वचनका पालन करूँगा। मुरने उनसे कहा—मुझे बतलाओ कि तुम्हारा संयन्ता (शासक) कौन है? मैं निस्सन्देह उसे पराजित कर रोक दूँगा। यमने उससे कहा—जो श्वेतद्वीपके निवासी, चक्र-गदा धारण करनेवाले, अविनाशी भगवान् विष्णु हैं, वे ही मुझे शासित करते हैं॥ ५४–५७॥ | | तमाह दैत्यशार्दूलः क्वासौ वसति दुर्जयः।<br>स्वयं तत्र गमिष्यामि तस्य संयमनोद्यतः॥ ५८<br><br>तमुवाच यमो गच्छ क्षीरोदं नाम सागरम्।<br>तत्रास्ते भगवान् विष्णुर्लोकनाथो जगन्मयः॥ ५९<br><br>मुरस्तद्वाक्यमाकर्ण्य प्राह गच्छामि केशवम्।<br>किं तु त्वया न तावद्धि संयम्या धर्म मानवाः॥ ६०<br><br>स प्राह गच्छ त्वं तावत् प्रवर्तिष्ये जयं प्रति।<br>संयन्तुर्वा यथा स्याद्वि ततो युद्धं समाचर॥ ६१<br><br>इत्येवमुक्त्वा वचनं दुग्धाब्धिमगमन्मुरः।<br>यत्रास्ते शेषपर्यङ्के चतुर्मूर्तिर्जनार्दनः॥ ६२ | दैत्योंमें श्रेष्ठ मुरने यमराजसे कहा—यम! वह कहाँ रहता है, जिसे कठिनतासे जीता जा सकता है? उसका संयमन करनेके लिये मैं तैयार होकर वहाँ स्वयं जाऊँगा। यमराजने उससे कहा—तुम क्षीरसागरमें जाओ। वहाँ लोकस्वामी जगन्मूर्ति भगवान् विष्णु रहते हैं। मुरने उनकी बात सुनकर कहा—धर्मराज! मैं केशवके पास जा रहा हूँ, परंतु तुम तबतक मनुष्योंका नियमन मत करना। उस (मुर)-ने कहा—तुम जाओ। तबतक मैं तुम्हारे नियामकको जैसे भी हो जीतनेका प्रयत्न करूँगा। उसके बाद तुम युद्ध करना। इतना कहकर मुर या मुर दैत्य क्षीरसागरमें जा पहुँचा। वहाँ (जाकर उसने देखा कि) चतुर्भुजाधारी जनार्दन अनन्त नागकी शय्यापर (पड़े हुए) हैं॥ ५८–६२॥ | | नारद उवाच<br><br>चतुर्मूर्तिः कथं विष्णुरेक एव निगद्यते।<br>सर्वगत्वात् कथमपि अव्यक्तत्वाच्च तद्वद॥ ६३ | नारदजीने पूछा— आप (कृपया) यह बतलायें कि विष्णु एक होनेपर भी चतुर्मूर्ति क्यों कहे जाते हैं। क्या सर्वगत एवं अव्यक्त होनेके कारण तो नहीं कहा जाता? (आप) उसे कहें॥ ६३॥ | | पुलस्त्य उवाच<br><br>अव्यक्तः सर्वगोऽपीह एक एव महामुने।<br>चतुर्मूर्तिर्जगन्नाथो यथा ब्रह्मांस्तथा शृणु॥ ६४<br><br>अप्रतर्क्यमनिर्देश्यं शुक्लं शान्तं परं पदम्।<br>वासुदेवाख्यमव्यक्तं स्मृतं द्वादशपत्रकम्॥ ६५ | पुलस्त्यजी बोले— ब्रह्मन्! अव्यक्त एवं सर्वव्यापी होनेपर भी वे एक ही हैं। जिस कारणसे जगन्नाथ चतुर्मूर्ति कहे जाते हैं, उसे बताता हूँ, सुनो। वासुदेव नामक श्रेष्ठ पद (तर्क या अनुमानद्वारा अज्ञेय) एवं निर्देश किये जानेमें अशक्य, शुक्ल (शुद्ध), शान्तियुक्त, अव्यक्त (अप्रकट) एवं द्वादशपत्रक ('ॐ नमो भगवते वासुदेवाय'—) द्वादशाक्षर मन्त्रवाला कहा गया है॥ ६४-६५॥ | | नारद उवाच<br><br>कथं शुक्लं कथं शान्तमप्रतर्क्यमनिन्दितम्।<br>कान्यस्य द्वादशैवोक्ता पत्रका तानि मे वद॥ ६६ | नारदजीने [पुनः] पूछा— किस प्रकार वे शुक्ल, शान्त, अप्रतर्क्य एवं अनिन्दित हैं? मुझे बतलाइये कि उनके कथित द्वादशपत्रक कौन हैं॥ ६६॥ | | पुलस्त्य उवाच<br><br>शृणुष्व गुह्यं परमं परमेष्ठिप्रभाषितम्।<br>श्रुतं सनत्कुमारेण तेनाख्यातं च तन्मम॥ ६७ | पुलस्त्यजी बोले— पितामह ब्रह्माने जिस परम गुह्य वचनको कहा है, उसे सुनिये। सनत्कुमारने उसे सुना था और उन्होंने मुझसे कहा था॥ ६७॥ |
| अध्याय ६० ] | पुनः तेजःप्राप्तिके लिये शिवकी तपश्चर्या, केदारतीर्थकी उपलब्धि | २८१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| नारद उवाच<br>कोऽयं सनत्कुमारोति यस्योक्तं ब्रह्मणा स्वयं।<br>तवापि तेन गदितं वद मामनुपूर्वशः॥ ६८ | नारदजीने [फिर] कहा— इस विषयमें स्वयं ब्रह्माजीने जिनसे कहा है, वे सनत्कुमार कौन हैं? और उन्होंने भी आपसे जो कहा है उसे क्रमशः मुझसे कहें॥ ६८॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>धर्मस्य भार्याहिंसाख्या तस्यां पुत्रचतुष्टयम्।<br>संजातं मुनिशार्दूल योगशास्त्रविचारकम्॥ ६९<br>ज्येष्ठः सनत्कुमारोऽभूद् द्वितीयश्च सनातनः।<br>तृतीयः सनको नाम चतुर्थश्च सनन्दनः॥ ७०<br>सांख्यवेत्तारमपरं कपिलं वोढुमासुरिम्।<br>दृष्ट्वा पञ्चशिखं श्रेष्ठं योगयुक्तं तपोनिधिम्॥ ७१<br>ज्ञानयोगं न ते दद्युर्ज्यायांसोऽपि कनीयसाम्।<br>मानमुक्तं महायोगं कपिलादीनुपासतः॥ ७२<br>सनत्कुमारश्चाभ्येत्य ब्रह्माणं कमलोद्भवम्।<br>अपृच्छद् योगविज्ञानं तमुवाच प्रजापतिः॥ ७३ | पुलस्त्यजी बोले— धर्मकी पत्नी अहिंसा है। उससे चार पुत्र हुए। मुनिश्रेष्ठ! वे सभी योगशास्त्रके विचार करनेमें कुशल थे। उनमें सनत्कुमार ज्येष्ठ, सनातन द्वितीय, सनक तृतीय एवं चतुर्थ सनन्दन हुए। वे सभी सांख्यवेत्ता कपिल, वोढु, आसुरी एवं योगसे युक्त तपोनिधि श्रेष्ठ पञ्चशिख नामक (ऋषि)-को देखकर उनके पास गये। बड़े होनेपर भी उन लोगोंने अपनेसे छोटोंको ज्ञानयोगका उपदेश नहीं दिया। कपिल आदिकी उपासना करनेवालोंको महायोगका परिणाममात्र बतला दिया। सनत्कुमारने कमलोद्भव ब्रह्माके पास जाकर योग-विज्ञान पूछा। प्रजापतिने उनसे कहा॥ ६९—७३॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>कथयिष्यामि ते साध्य यदि पुत्रत्वमिच्छसि।<br>यस्य कस्य न वक्तव्यं तत्सत्यं नान्यथेति हि॥ ७४ | ब्रह्माने कहा— साध्य! यदि तुम पुत्र होना चाहो तो मैं तुमसे कहूँगा। उसे जिस-किसीसे नहीं कहना चाहिये; क्योंकि यह सत्य है, अन्यथा नहीं है॥ ७४॥ |
| सनत्कुमार उवाच<br>पुत्र एवास्मि देवेश यतः शिष्योऽस्म्यहं विभो।<br>न विशेषोऽस्ति पुत्रस्य शिष्यस्य च पितामह॥ ७५ | सनत्कुमारने कहा— देवेश! मैं पुत्र ही हूँ; क्योंकि विभो! मैं शिष्य हूँ। पितामह! पुत्र और शिष्यमें कोई भेद नहीं होता॥ ७५॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>विशेषः शिष्यपुत्राभ्यां विद्यते धर्मनन्दन।<br>धर्मकर्मसमायोगे तथापि गदतः शृणु॥ ७६<br><br>पुन्नाम्नो नरकात् त्राति पुत्रस्तेनेह गीयते।<br>शेषपापहरः शिष्य इतीयं वैदिकी श्रुतिः॥ ७७ | ब्रह्माने कहा— धर्मनन्दन! शिष्य और पुत्रमें धर्म-कर्मके संयोगमें (जो) कुछ भेद होता है उसे बताता हूँ, मुझसे सुनो। यह वैदिकी श्रुति है—जो 'पुम्' नामक नरकसे उद्धार कर देता है उसे 'पुत्र' कहा जाता है और शेष पापोंका हरण करनेवाला होनेसे 'शिष्य' कहा जाता है (—यही दोनोंमें भेद है)॥ ७६-७७॥ |
| सनत्कुमार उवाच<br>कोऽयं पुन्नामको देव नरकात् त्राति पुत्रकः।<br>कस्माच्छेषं ततः पापं हरेच्छिष्यश्च तद्वद॥ ७८ | सनत्कुमारने कहा (पूछा)— देव! वह 'पुम्' नामक नरक कौन है? जिस नरकसे पुत्र रक्षा करता है और शिष्य किससे अवशिष्ट पापका हरण करता है; आप कृपया इन्हें बतलाइये॥ ७८॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>एतत् पुराणं परमं महर्षे<br>योगाङ्गयुक्तं च सदैव यच्च।<br>तथैव चोग्रं भयहारि मानवं<br>वदामि ते साध्य निशामयैनम्॥ ७९ | ब्रह्माने कहा— महर्षे! मैं तुमको अत्यन्त प्राचीन,<br><br>योगाङ्गसे युक्त, उग्र भय दूर करनेवाली परम पवित्र<br><br>कथा सुनाता हूँ। हे साध्य! तुम इसे सुनो॥ ७९॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें साठवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ६०॥
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