भारतकोश
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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

१६२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ३६ ततो गच्छेत सरकं त्रैलोक्यस्यापि दुर्लभम्। दुर्गदेवीके दर्शनके बाद तीनों लोकोंमें दुर्लभ कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां दृष्ट्वा देवं महेश्वरम् ॥ २० सरकतीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिको माहेश्वरदेवका दर्शन करके मनुष्य (अपने) लभते सर्वकामांश्च शिवलोकं स गच्छति । सभी मनोरथोंको प्राप्त करता और (अन्तमें) शिवलोकमें तिस्रः कोट्यस्तु तीर्थानां सरके द्विजसत्तमाः ॥ २१ चला जाता है। द्विजश्रेष्ठो! सरकतीर्थमें तीन करोड़ तीर्थ विद्यमान हैं। सरके बीच कूपमें रुद्रकोटि स्थित रुद्रकोटिस्तथा कूपे सरोमध्ये व्यवस्थिता। है। उस सरमें यदि व्यक्ति स्नान कर रुद्रकोटिका तस्मिन् सरे च यः स्नात्वा रुद्रकोटिं स्मरेन्नरः ॥ २२ स्मरण करता है तो निःसंदेह (उसके द्वारा) रुद्रकोटि पूजिता रुद्रकोटिश्च भविष्यति न संशयः। पूजित हो जाते हैं और रुद्रोंके प्रसादसे वह व्यक्ति रुद्राणां च प्रसादेन सर्वदोषविवर्जितः ॥ २३ समस्त दोषोंसे छूट जाता है। वह इन्द्रसम्बन्धी ज्ञानसे पूरित होकर परम पदको प्राप्त कर लेता है। वहीं ऐन्द्रज्ञानेन संयुक्तः परं पदमवाप्नुयात्। पापों और भयोंका दूर करनेवाला इडास्पद नामका इडास्पदं च तत्रैव तीर्थ पापभयापहम्॥ २४ तीर्थ वर्तमान है॥ २०–२४॥ अस्मिन् मुक्तिमवाप्नोति दर्शनादेव मानवः। इस इडास्पद नामके तीर्थके दर्शनसे ही मनुष्य तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च पितृदेवगणानपि ॥ २५ मुक्तिको प्राप्त कर लेता है। वहाँ स्नान करके पितरों एवं देवोंका पूजन करनेसे मनुष्यकी दुर्गति नहीं होती और न दुर्गतिमवाप्नोति मनसा चिन्तितं लभेत्। उसे मनोवाञ्छित वस्तु प्राप्त होती है। सभी पापोंका केदारं च महातीर्थं सर्वकल्मषनाशनम् ॥ २६ विनाश करनेवाला केदार नामक महातीर्थ है। वहाँ जाकर स्नान करनेसे मनुष्यको सभी प्रकारके दानोंका तत्र स्नात्वा तु पुरुषः सर्वदानफलं लभेत्। फल प्राप्त होता है। वहींपर पृथ्वीमें दुर्लभ किंरूप किंरूपं च महातीर्थं तत्रैव भुवि दुर्लभम्। नामका (भी) तीर्थ है। उसमें स्नान करनेवाले मनुष्यको तस्मिन् स्नातस्तु पुरुषः सर्वयज्ञफलं लभेत् ॥ २७ सभी प्रकारके यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। सरकके सरकस्य तु पूर्वेण तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्। पूर्वमें तीनों लोकोंमें सुप्रसिद्ध सम्पूर्ण पापोंका विनाश अन्यजन्म सुविख्यातं सर्वपापप्रणाशनम् ॥ २८ करनेवाला अन्यजन्म नामका तीर्थ है॥ २५-२८॥ नारसिंहं वपुः कृत्वा हत्वा दानवमूर्जितम्। नरसिंहका शरीर धारण कर शक्तिशाली दानव तिर्यग्योनौ स्थितो विष्णुः सिंहैषु रतिमाप्नुवन् ॥ २९ (हिरण्याक्ष)-का वध करनेके बाद विष्णु पशुयोनिमें स्थित सिंहोंमें प्रेम करने लगे। उसके बाद गन्धर्वोंके ततो देवाः सगन्धर्वा आराध्य वरदं शिवम्। साथ सभी देवताओंने वरदाता शिवकी आराधना कर ऊचुः प्रणतसर्वाङ्गा विष्णुदेहस्य लम्भने ॥ ३० साष्टाङ्ग प्रणाम करते हुए विष्णुसे पुनः स्वदेह (स्वरूप) ततो देवो महात्माऽसौ शारभं रूपमास्थितः । धारण करनेकी प्रार्थना की। उसके बाद (फिर) युद्धं च कारयामास दिव्यं वर्षसहस्रकम्। महादेवने शरभ (सिंहोंसे भी बलवान् पशु-विशेष)-का युध्यमानौ तु तौ देवौ पतितौ सरमध्यतः ॥ ३१ रूप धारण करके (नरसिंहसे) हजारों दिव्य वर्षोंतक युद्ध किया-कराया। दोनों देवता (आपसमें) युद्ध करते तस्मिन् सरस्तटे विप्रो देवर्षिर्नारदः स्थितः । हुए सरोवरमें गिर पड़े। उस सरोवरके तीरपर (स्थित) अश्वत्थवृक्षमाश्रित्य ध्यानस्थस्तौ ददर्श ह ॥ ३२ अश्वत्थ (पीपल)-वृक्षके नीचे देवर्षि नारद ध्यान लगाये

अध्याय ३६ ] कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य एवं क्रमका अनुक्रान्त वर्णन १६३ विष्णुश्चतुर्भुजो जज्ञे लिङ्गाकारः शिवः स्थितः । तौ दृष्ट्वा तत्र पुरुषौ तुष्टाव भक्तिभावितः ॥ ३३ नमः शिवाय देवाय विष्णवे प्रभविष्णवे । हरये च उमाभर्त्रे स्थितिकालभृते नमः ॥ ३४ हराय बहुरूपाय विश्वरूपाय विष्णवे । त्र्यम्बकाय सुसिद्धाय कृष्णाय ज्ञानहेतवे ॥ ३५ धन्योऽहं सुकृती नित्यं यद् दृष्टौ पुरुषोत्तमौ । ममाश्रममिदं पुण्यं युवाभ्यां विमलीकृतम् । अद्यप्रभृति त्रैलोक्ये अन्यजन्मेति विश्रुतम् ॥ ३६ य इहागत्य स्नात्वा च पितॄन् संतर्पयिष्यति । तस्य श्रद्धान्वितस्येह ज्ञानमैन्द्रं भविष्यति ॥ ३७ अश्वत्थस्य तु यन्मूलं सदा तत्र वसाम्यहम् । अश्वत्थवन्दनं कृत्वा यमं रौद्रं न पश्यति ॥ ३८ ततो गच्छेत विप्रेन्द्रा नागस्य ह्रदमुत्तमम् । पौण्डरीके नरः स्नात्वा पुण्डरीकफलं लभेत् ॥ ३९ दशम्यां शुक्लपक्षस्य चैत्रस्य तु विशेषतः । स्नानं जपं तथा श्राद्धं मुक्तिमार्गप्रदायकम् ॥ ४० ततस्त्रिविष्टपं गच्छेत् तीर्थं देवनिषेवितम् । तत्र वैतरणी पुण्या नदी पापप्रमोचनी ॥ ४१ तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च शूलपाणिं वृषध्वजम् । सर्वपापविशुद्धात्मा गच्छत्येव परां गतिम् ॥ ४२ ततो गच्छेत विप्रेन्द्रा रसावर्त्तमनुत्तमम् । तत्र स्नात्वा भक्तियुक्तः सिद्धिमाप्नोत्यनुत्तमाम् ॥ ४३ बैठे थे। उन्होंने उन दोनोंको देखा। (फिर तो) विष्णु चतुर्भुजरूपमें और शिव लिङ्गरूपमें (परिवर्तित) हो गये। उन दोनों पुरुषों (देवों)-को देखकर उन्होंने भक्तिभावसे उनकी स्तुति की ॥ २९-३३ ॥ [ नारदजीने स्तुति की ] - देवाधिदेव शिवको नमस्कार है। प्रभावशाली विष्णुको नमस्कार है। स्थिति (प्रजापालन) करनेवाले श्रीहरिको नमस्कार है। संहारके आधारभूत उमापति भगवान् शिवको नमस्कार है। बहुरूपधारी शङ्करजी एवं विश्वरूपधारी (विश्वात्मा) विष्णुको नमस्कार है। परमसिद्ध (योगीश्वर) शङ्कर एवं ज्ञानके मूल कारण भगवान् कृष्णको नमस्कार है। मैं धन्य तथा सदा पुण्यवान् हूँ; क्योंकि मुझे (आज) आप दोनों (श्रेष्ठ) पुरुषों (देवों)-के दर्शन प्राप्त हुए। आप दोनों पुरुषोंद्वारा पवित्र किया गया मेरा यह आश्रम पुण्यमय हो गया। आजसे तीनों लोकोंमें यह 'अन्यजन्म' नामसे प्रसिद्ध हो जायगा। जो व्यक्ति यहाँ आकर इस तीर्थमें स्नान कर अपने पितरोंका तर्पण करेगा श्रद्धासे सम्पन्न उस पुरुषको यहाँ इन्द्र-सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त हो जायगा ॥ ३४-३७ ॥ मैं पीपल वृक्षके मूलमें सदा निवास करूँगा। उस अश्वत्थ (पीपल वृक्ष) -को प्रणाम करनेवाला व्यक्ति भयंकर यमराजको नहीं देखेगा। श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! उसके बाद (उस तीर्थसेवीको) उत्तम नागह्रदमें जाना चाहिये। पौण्डरीकमें स्नान करके मनुष्य पुण्डरीक (एक प्रकारके यज्ञ)-का फल प्राप्त करता है। शुक्लपक्षकी दशमी, विशेषकर चैत्रमासकी (शुक्ला) दशमी तिथिमें वहाँ किया गया स्नान, जप और श्राद्ध मोक्षपथकी प्राप्ति करानेवाला होता है। पुण्डरीकमें स्नान करनेके बाद देवताओंद्वारा पूजित 'त्रिविष्टप' नामक तीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ पापोंसे विमुक्त करनेवाली पवित्र वैतरणी नदी है। वहाँ स्नानकर शूलपाणि वृषध्वज (शिव)-की पूजा कर मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा विशुद्ध होकर निश्चय ही परमगतिको प्राप्त कर लेता है ॥ ३८-४२ ॥ विप्रश्रेष्ठो ! तत्पश्चात् सर्वश्रेष्ठ रसावर्त (तीर्थ)-में जाना चाहिये। वहाँ भक्तिसहित स्नान करनेवाला सर्वश्रेष्ठ

४०- वसिष्ठापवाह नामक तीर्थका उत्पत्ति-प्रसङ्ग

१६४श्रीवामनपुराण[ अध्याय ३६
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
चैत्रशुक्लचतुर्दश्यां तीर्थे स्नात्वा ह्यलेपके।<br>पूजयित्वा शिवं तत्र पापलेपो न विद्यते॥ ४४<br><br>ततो गच्छेत विप्रेन्द्राः फलकीवनमुत्तमम्।<br>यत्र देवाः सगन्धर्वाः साध्याश्च ऋषयः स्थिताः।<br>तपश्चरन्ति विपुलं दिव्यं वर्षसहस्रकम्॥ ४५<br><br>दृषद्वत्यां नरः स्नात्वा तर्पयित्वा च देवताः।<br>अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलं विन्दति मानवः॥ ४६सिद्धि (मुक्ति) प्राप्त करता है। चैत्रमासके शुक्लपक्षकी चतुर्दशी (चौदस) तिथिको 'अलेपक' नामक तीर्थमें स्नान कर वहाँ शिवकी पूजा करनेसे पापसे लिप्त नहीं होता—पाप दूर भाग जाता है। विप्रवरो! वहाँसे उत्तम फलकीवनमें जाना चाहिये। वहाँ देवता, गन्धर्व, साध्य और ऋषिलोग रहते हैं एवं दिव्य सहस्र वर्षोंतक बहुत तप करते हैं। दृषद्वती (कग्गर) नदीमें स्नानकर देवताओंका तर्पण करनेसे मनुष्य अग्निष्टोम और अतिरात्र नामक यज्ञोंसे मिलनेवाले फलको प्राप्त करता है॥ ४३—४६॥
सोमक्षये च सम्प्राप्ते सोमस्य च दिने तथा।<br>यः श्राद्धं कुरुते मर्त्यस्तस्य पुण्यफलं शृणु॥ ४७<br><br>गयायां च यथा श्राद्धं पितॄन् प्रीणाति नित्यशः।<br>तथा श्राद्धं च कर्तव्यं फलकीवनमाश्रितैः॥ ४८<br><br>मनसा स्मरते यस्तु फलकीवनमुत्तमम्।<br>तस्यापि पितरस्तृप्तिं प्रयास्यन्ति न संशयः॥ ४९<br><br>तत्रापि तीर्थं सुमहत् सर्वदेवैरलंकृतम्।<br>तस्मिन् स्नातस्तु पुरुषो गोसहस्रफलं लभेत्॥ ५०<br><br>पाणिखाते नरः स्नात्वा पितॄन् संतर्प्य मानवः।<br>अवाप्नुयाद् राजसूयं सांख्यं योगं च विन्दति॥ ५१सोमवारके दिन चन्द्रमाके क्षीण हो जानेपर अर्थात् सोमवती अमावास्याको जो मनुष्य श्राद्ध करता है, उसका पुण्यफल सुनो। जैसे गया-क्षेत्रमें किया गया श्राद्ध पितरोंको नित्य तृप्त करता है, वैसे ही फलकीवनमें रहनेवालोंको श्राद्ध करनेसे पितरोंको तृप्ति होती है। जो मनुष्य मनसे फलकीवनका स्मरण करता है, उसके भी पितर निःसंदेह तृप्ति प्राप्त करते हैं। वहीं सभी देवोंसे सुशोभित एक 'सुमहत्' तीर्थ है; उसमें स्नान करनेवाला पुरुष हजारों गौओंके दानका फल प्राप्त करता है। मानव पाणिखात तीर्थमें स्नान करके एवं पितरोंका तर्पण कर राजसूय-यज्ञ तथा सांख्य (ज्ञान) और योग (कर्म)-के अनुष्ठान करनेसे होनेवाले फलको प्राप्त करता है॥ ४७—५१॥
ततो गच्छेत सुमहत्तीर्थं मिश्रकमुत्तमम्।<br>तत्र तीर्थानि मुनिना मिश्रितानि महात्मना॥ ५२<br><br>व्यासेन मुनिशार्दूला दधीच्यर्थं महात्मना।<br>सर्वतीर्थेषु स स्नाति मिश्रके स्नाति यो नरः॥ ५३<br><br>ततो व्यासवनं गच्छेद्व्रियतो नियताशनः।<br>मनोजवे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा देवमणिं शिवम्॥ ५४<br><br>मनसा चिन्तितं सर्वं सिध्यते नात्र संशयः।<br>गत्वा मधुवटीं चैव देव्यास्तीर्थं नरः शुचिः॥ ५५<br><br>तत्र स्नात्वाऽर्चयेद् देवान् पितॄंश्च प्रयतो नरः।<br>स देव्या समनुज्ञातो यथा सिद्धिं लभेन्नरः॥ ५६पाणिखातके बाद 'मिश्रक' नामक महान् एवं श्रेष्ठ तीर्थमें जाना चाहिये। मुनिश्रेष्ठो! वहाँ महात्मा व्यासदेवने दधीचिऋषिके हेतु तीर्थोंको एकमें मिश्रित किया था। इस मिश्रकतीर्थमें स्नान कर लेनेवाला मनुष्य (मानो) सभी तीर्थोंमें स्नान कर लेता है। फिर संयमशील तथा नियमित आहार करनेवाला होकर व्यासवनमें जाना चाहिये। 'मनोजव' तीर्थमें स्नानकर 'देवमणि' शङ्करका दर्शन करनेसे मनुष्यको अभीष्ट-सिद्धिकी प्राप्ति होती है—इसमें संदेह नहीं। मनुष्यको देवीके मधुवटी नामक तीर्थमें जाकर स्नान करके संयत होकर देवों एवं पितरोंकी पूजा करनी चाहिये। ऐसा करनेवाला व्यक्ति देवीकी आज्ञासे (जैसी चाहता है, वैसी) सिद्धि प्राप्त कर लेता है॥ ५२—५६॥
कौशिक्याः संगमे यस्तु दृषद्वत्यां नरोत्तमः।<br>स्नायीत नियताहारः सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ५७जो मनुष्य 'कौशिकी' और 'दृषद्वती' (कग्गर) नदियोंके संगममें स्नान करता और नियत भोजन करता है, वह श्रेष्ठ पुरुष सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है।

| अध्याय ३६ ] | कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य एवं क्रमका अनुक्रान्त वर्णन | १६५ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततो व्यासस्थली नाम यत्र व्यासेन धीमता।<br>पुत्रशोकाभिभूतेन देहत्यागाय निश्चयः ॥ ५८<br><br>कृतो देवैश्च विप्रेन्द्राः पुनरुत्थापितस्तदा।<br>अभिगम्य स्थलीं तस्य पुत्रशोकं न विन्दति ॥ ५९<br><br>किंदत्तं कूपमासाद्य तिलप्रस्थं प्रदाय च।<br>गच्छेत परमां सिद्धिं ऋणैर्मुक्तिमवाप्नुयात् ॥ ६०<br><br>अहं च सुदिनं चैव द्वे तीर्थे भुवि दुर्लभे।<br>तयोः स्नात्वा विशुद्धात्मा सूर्यलोकमवाप्नुयात् ॥ ६१श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! 'व्यासस्थली' नामका एक स्थान है, जहाँ पुत्रशोकसे दुःखी होकर वेदव्यासने अपने शरीरत्यागका निश्चय कर लिया था, पर देवोंने उन्हें पुनः सँभाल लिया। उसके बाद उस भूमिमें जानेवाले मनुष्यको पुत्रशोक नहीं होता। 'किंदत्त कूप'में जाकर एक पसर (तौलका एक परिमाण) तिलका दान करनेसे मनुष्य परमसिद्धि और ऋणसे मुक्ति प्राप्त करता है। 'अह' एवं 'सुदिन' नामक ये दो तीर्थ पृथ्वीमें दुर्लभ हैं। इन दोनोंमें स्नान करनेसे मनुष्य विशुद्धात्मा होकर सूर्यलोकको प्राप्त करता है॥ ५७—६१॥
कृतजप्यं ततो गच्छेत् त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्।<br>तत्राभिषेकं कुर्वीत गङ्गायां प्रयतः स्थितः ॥ ६२<br><br>अर्चयित्वा महादेवमश्वमेधफलं लभेत्।<br>कोटितीर्थं च तत्रैव दृष्ट्वा कोटीश्वरं प्रभुम् ॥ ६३<br><br>तत्र स्नात्वा श्रद्धधानः कोटियज्ञफलं लभेत्।<br>ततो वामनकं गच्छेत् त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ ६४<br><br>यत्र वामनरूपेण विष्णुना प्रभविष्णुना।<br>बलेरपहृतं राज्यमिन्द्राय प्रतिपादितम् ॥ ६५उसके बाद तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध 'कृतजप्य' नामके तीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ नियमपूर्वक संयत रहते हुए गङ्गामें स्नान करना चाहिये। वहाँपर महादेवका पूजन करनेसे अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है। वहींपर कोटितीर्थ स्थित है। वहाँ श्रद्धापूर्वक स्नानकर 'कोटीश्वर' नाथका दर्शन करनेसे मनुष्य कोटि यज्ञोंका फल प्राप्त कर लेता है। उसके बाद तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध 'वामनक' तीर्थमें जाना चाहिये, जहाँ प्रभावशाली विष्णुने वामनरूप धारणकर बलिको राज्य छीन कर इन्द्रको दे दिया था॥ ६२—६५॥
तत्र विष्णुपदे स्नात्वा अर्चयित्वा च वामनम्।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा विष्णुलोकमवाप्नुयात् ॥ ६६<br><br>ज्येष्ठाश्रमं च तत्रैव सर्वपातकनाशनम्।<br>तं तु दृष्ट्वा नरो मुक्तिं संप्रयाति न संशयः ॥ ६७<br><br>ज्येष्ठे मासि सिते पक्षे एकादश्यामुपोषितः।<br>द्वादश्यां च नरः स्नात्वा ज्येष्ठत्वं लभते नृषु ॥ ६८<br><br>तत्र प्रतिष्ठिता विप्रा विष्णुना प्रभविष्णुना।<br>दीक्षाप्रतिष्ठासंयुक्ता विष्णुप्रीणनतत्पराः ॥ ६९वहाँ 'विष्णुपद' तीर्थमें स्नान कर वामनदेवकी पूजा कर समस्त पापोंसे शुद्ध होकर (छूटकर) मनुष्य विष्णुके लोकको प्राप्त कर लेता है। वहींपर सभी पापोंको नष्ट करनेवाला ज्येष्ठाश्रम नामका तीर्थ है, उसका दर्शन कर मनुष्य मुक्ति प्राप्त करता है—इसमें संदेह नहीं। ज्येष्ठ महीनेके शुक्लपक्षकी एकादशी तिथिको उपवास कर द्वादशी तिथिके दिन स्नानकर मानव मनुष्योंमें श्रेष्ठता (बड़प्पन) प्राप्त करता है। वहाँ (सर्वाधिक) प्रभावशाली विष्णुभगवान्‌ने यज्ञादिमें दीक्षित (लगे हुए), प्रतिष्ठित एवं सम्मान्य तथा विष्णु-भगवान्‌की आराधनामें परायण ब्राह्मणोंको सम्मानित किया था॥ ६६—६९॥
तेभ्यो दत्तानि श्राद्धानि दानानि विविधानि च।<br>अक्षयाणि भविष्यन्ति यावन्मन्वन्तरस्थितिः ॥ ७०<br><br>तत्रैव कोटितीर्थं च त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्।<br>तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा कोटियज्ञफलं लभेत् ॥ ७१उन्हें दिये गये (पात्रक) श्राद्ध और अनेक प्रकारके दान अक्षय एवं मन्वन्तरतक स्थिर रहते हैं। वहीं तीनों लोकोंमें विख्यात 'कोटितीर्थ' है। उस तीर्थमें स्नानकर मनुष्य करोड़ों यज्ञोंके फल प्राप्त करता है।

१६६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ३७ कोटिश्वरं नरो दृष्ट्वा तस्मिंस्तीर्थे महेश्वरम् । महादेवप्रसादेन गाणपत्यमवाप्नुयात् ॥ ७२ तत्रैव सुमहत् तीर्थं सूर्यस्य च महात्मनः । तस्मिन् स्नात्वा भक्तियुक्तः सूर्यलोके महीयते ॥ ७३ ततो गच्छेत विप्रेन्द्रास्तीर्थं कल्मषनाशनम् । कुलोत्तारणनामानं विष्णुना कल्पितं पुरा ॥ ७४ वर्णानामाश्रमाणां च तारणाय सुनिर्मलम् । ब्रह्मचर्यात्परं मोक्षं य इच्छन्ति सुनिर्मलम् । तेऽपि तत्तीर्थमासाद्य पश्यन्ति परमं पदम् ॥ ७५ ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थो यतिस्तथा । कुलानि तारयेत् स्नातः सप्त सप्त च सप्त च ॥ ७६ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा ये तत्परायणाः । स्नाता भक्तियुताः सर्वे पश्यन्ति परमं पदम् ॥ ७७ दूरस्थोऽपि स्मरेद् यस्तु कुरुक्षेत्रं सवामनम् । सोऽपि मुक्तिमवाप्नोति किं पुनर्निवसन्नरः ॥ ७८ उस तीर्थमें 'कोटिश्वर' महादेवका दर्शन कर मनुष्य उन महादेवकी कृपासे गाणपत्य पद (गणनायक्त्वकी उपाधि) प्राप्त करता है। और वहीं महात्मा सूर्यदेवका महान् तीर्थ है। उसमें भक्तिपूर्वक स्नानकर मनुष्य सूर्यलोकमें महान् माना जाता है॥ ७०-७३॥ श्रेष्ठ ब्राह्मणो! कोटि तीर्थके बाद पापका नाश करनेवाले 'कुलोत्तारण तीर्थ' में जाना चाहिये, जिसे प्राचीनकालमें विष्णुने वर्णाश्रम-धर्मका पालन करनेवाले मनुष्योंको तारनेके लिये बनाया था। जो मनुष्य ब्रह्मचर्यव्रतसे विशुद्ध मुक्तिकी इच्छा करते हैं ऐसे लोग भी उस तीर्थमें जाकर परम पदका दर्शन कर लेते हैं। ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थी और संन्यासी वहाँ स्नानकर अपने कुलके (७+७+७=२१) इक्कीस पूर्व पुरुषोंका उद्धार कर देते हैं। जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र उस तीर्थमें तीर्थपरायण होकर एवं भक्तिसे स्नान करते हैं, वे सभी परम पदका दर्शन करते हैं। और जो दूर रहता हुआ भी वामनसहित कुरुक्षेत्रका स्मरण करता है, वह भी मुक्ति प्राप्त कर लेता है; फिर वहाँ निवास करनेवालेका तो कहना ही क्या? ॥ ७४-७८॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें छत्तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३६ ॥ सैंतीसवाँ अध्याय कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य और क्रमका पूर्वानुक्रान्त वर्णन लोमहर्षण उवाच पवनस्य हृदे स्नात्वा दृष्ट्वा देवं महेश्वरम् । विमुक्तः कलुषैः सर्वैः शैवं पदमवाप्नुयात् ॥ १ पुत्रशोकेन पवनो यस्मिंल्लीनो बभूव ह । ततः सब्रह्मकैर्देवैः प्रसाद्य प्रकटीकृतः ॥ २ अतो गच्छेत अमृतं स्थानं तच्छूलपाणिनः । यत्र देवैः सगन्धर्वैः हनुमान् प्रकटीकृतः ॥ ३ लोमहर्षण बोले- पवनके हृदमें, पुत्र (हनुमान्जी)- के शोकके कारण जिस सरोवरमें पवन लीन हो गये थे, उसमें स्नान करके महेश्वरदेवका दर्शन कर मनुष्य समस्त पापोंसे विमुक्त हो शिवपदको प्राप्त करता है। उसके बाद ब्रह्माके साथ सभी देवोंने मिलकर उन्हें प्रसन्न एवं प्रत्यक्ष प्रकट किया। यहाँसे शूलपाणि (भगवान् शंकर)- के अमृत नामक स्थानमें जाना चाहिये, जहाँ गन्धर्वोंके साथ देवताओंने हनुमान्जीको प्रकट किया था।

अध्याय ३७ ] कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य और क्रमका पूर्वानुक्रान्त वर्णन १६७ तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा अमृतत्वमवाप्नुयात्। कुलोत्तारणमासाद्य तीर्थसेवी द्विजोत्तमः ॥ ४ कुलानि तारयेत् सर्वान् मातामहपितामहान्। शालिहोत्रस्य राजर्षेस्तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् ॥ ५ तत्र स्नात्वा विमुक्तस्तु कलुषैर्देहसंभवैः । श्रीकुञ्जं तु सरस्वत्यां तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् ॥ ६ तत्र स्नात्वा नरो भक्त्या अग्निष्टोमफलं लभेत् । ततो नैमिषकुञ्जं तु समासाद्य नरः शुचिः ॥ ७ नैमिषस्य च स्नानेन यत् पुण्यं तत् समाप्नुयात् । तत्र तीर्थं महाख्यातं वेदवत्या निषेवितम् ॥ ८ रावणेन गृहीतायाः केशेषु द्विजसत्तमाः। तद्ध्याय च सा प्राणान् मुमुचे शोककर्शिता ॥ ९ ततो जाता गृहे राज्ञो जनकस्य महात्मनः। सीता नामेति विख्याता रामपत्नी पतिव्रता ॥ १० सा हृता रावणेनेह विनाशाय आत्मनः स्वयम्। रामेण रावणं हत्वा अभिषिच्य विभीषणम् ॥ ११ समानीता गृहं सीता कीर्तिरात्मवता यथा। तस्यास्तीर्थे नरः स्नात्वा कन्यायज्ञफलं लभेत् ॥ १२ विमुक्तः कलुषैः सर्वैः प्राप्नोति परं पदम्। ततो गच्छेत सुमहद् ब्रह्मणः स्थानमुत्तमम् ॥ १३ यत्र वर्णावरः स्नात्वा ब्राह्मण्यं लभते नरः। ब्राह्मणश्च विशुद्धात्मा परं पदमवाप्नुयात् ॥ १४ ततो गच्छेत सोमस्य तीर्थं त्रैलोक्यदुर्लभम् । यत्र सोमस्तपस्तप्त्वा द्विजराज्यमवाप्नुयात् ॥ १५ तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च स्वपितॄन् दैवतानि च । निर्मलः स्वर्गमायाति कार्तिकां चन्द्रमा यथा ॥ १६ उस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य अमृतपदको पा लेता है। नियमानुसार तीर्थका सेवन करनेवाला श्रेष्ठ ब्राह्मण 'कुलोत्तारण' तीर्थमें जाकर अपने मातामह और पितामहके समस्त वंशोंका उद्धार कर देता है। तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध राजर्षि शालिहोत्रके तीर्थमें स्नान कर मुक्त हो मनुष्य शारीरिक पापोंसे सर्वथा छूट जाता है। सरस्वती-क्षेत्रमें तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध श्रीकुञ्ज नामक तीर्थ है। उसमें भक्तिपूर्वक स्नान करनेसे मनुष्य अग्निष्टोम-यज्ञका फल प्राप्त कर लेता है। मनुष्य वहाँसे नैमिषकुञ्जतीर्थमें जाकर पवित्र हो जाता है और नैमिषारण्यतीर्थमें स्नान करनेसे जो पुण्य होता है, उसे प्राप्त कर लेता है। वहाँपर 'वेदवती' से निषेवित बहुत प्रसिद्ध तीर्थ है ॥ १-८ ॥ द्विजश्रेष्ठो ! रावणके द्वारा अपने केशके पकड़े जानेपर शोकसे संतप्त होकर (वेदवतीने) उसके (रावणके) वधके लिये अपने प्राणोंको छोड़ दिया था और उसके बाद महात्मा राजा जनकके घरमें वे उत्पन्न हुईं और उनका नाम 'सीता' विख्यात हुआ तथा वे रामकी पतिव्रता पत्नी हुईं। उस सीताको रावणने स्वयं अपने विनाशके लिये अपहृत कर लिया। सीताके अपहरण हो जानेपर राम-रावण-युद्ध हुआ, जिसमें रावणको मारनेके बाद विभीषणको (लङ्काके राज्यपर) अभिषिक्त कर राम सीताको वैसे ही घर लौटा लाये, जैसे आत्मवान् (जितेन्द्रिय) पुरुष कीर्तिको प्राप्त करता है। उनके तीर्थमें स्नान कर मनुष्य कन्यायज्ञ (कन्यादान)- का फल एवं समस्त पापोंसे मुक्त होकर परम पदको प्राप्त करता है। उस वेदवतीतीर्थके बाद ब्रह्माके उत्तम और महान् स्थानमें जाना चाहिये, जहाँ स्नान करनेसे अवर-वर्णका व्यक्ति (जन्मान्तरमें) ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लेता है और ब्राह्मण विशुद्ध अन्तःकरणवाला होकर परम पदकी प्राप्ति करता है ॥ ९-१४ ॥ उस ब्रह्माके तीर्थस्थलपर जानेके बाद तीनों लोकोंमें दुर्लभ 'सोमतीर्थ' में जाना चाहिये, जहाँ चन्द्रमाने तपस्या करके द्विजराजत्व-पदको प्राप्त किया था। वहाँ स्नानकर अपने पितरों और देवताओंकी पूजा करनेसे मनुष्य कार्तिककी पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान निर्मल

४१- कुरुक्षेत्रके तीर्थों—शतसाहस्रिक, शांतिक, रेणुका, ऋणमोचन, ओजस, संनिहति, प्राची सरस्वती, पञ्चवट, कुरुतीर्थ, अनरकतीर्थ, काम्यकवन आदिका वर्णन

१६८श्रीवामनपुराण[ अध्याय ३७

| सप्तसारस्वतं तीर्थं त्रैलोक्यस्यापि दुर्लभम्।<br>यत्र सप्त सरस्वत्य एकीभूता वहन्ति च॥ १७<br><br>सुप्रभा काञ्चनाक्षी च विशाला मानसह्नदा।<br>सरस्वत्योधनामा च सुरेणुर्विमलोदका॥ १८ | होकर स्वर्गको प्राप्त कर लेता है। तीनों लोकोंमें दुर्लभ 'सप्तसारस्वत' नामक एक तीर्थ है, जहाँ सुप्रभा, काञ्चनाक्षी, विशाला, मानसह्नदा, सरस्वती, ओघवती, विमलोदका एवं सुरेणु नामकी सातों सरस्वतियाँ (नदियाँ) एकत्र मिलकर प्रवाहित होती हैं॥ १५–१८॥ | | पितामहस्य यजतः पुष्करेषु स्थितस्य ह।<br>अब्रुवन् ऋषयः सर्वे नाऽयं यज्ञो महाफलः॥ १९<br><br>न दृश्यते सरिच्छ्रेष्ठा यस्मादिह सरस्वती।<br>तच्छ्रुत्वा भगवान् प्रीतः सस्माराथ सरस्वतीम्॥ २०<br><br>पितामहेन यजता आहूता पुष्करेषु वै।<br>सुप्रभा नाम सा देवी तत्र ख्याता सरस्वती॥ २१<br><br>तां दृष्ट्वा मुनयः प्रीता वेगयुक्तां सरस्वतीम्।<br>पितामहं मानयन्तीं ते तु तां बहु मेनिरे॥ २२ | पुष्करतीर्थमें स्थित ब्रह्माजीके यज्ञके अनुष्ठानमें लग जानेपर सभी ऋषियोंने उनसे कहा—आपका यह यज्ञ महाफलजनक नहीं होगा; क्योंकि यहाँ सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती (नदी) नहीं दिखलायी पड़ रही है। उसे सुनकर भगवान्ने प्रसन्नतापूर्वक सरस्वतीका स्मरण किया। पुष्करमें यज्ञ कर रहे ब्रह्माजीद्वारा आहूत की गयी 'सुप्रभा' नामकी देवी वहाँ सरस्वती नामसे प्रसिद्ध हुई। ब्रह्माजीका मान करनेवाली उस वेगवती सरस्वतीको देखकर मुनिजन प्रसन्न हो गये और उन सबोंने उनका अत्यधिक सम्मान किया॥ १९–२२॥ | | एवमेषा सरिच्छ्रेष्ठा पुष्करस्था सरस्वती।<br>समानीता कुरुक्षेत्रे मङ्कणेन महात्मना॥ २३<br><br>नैमिषे मुनयः स्थित्वा शौनकाद्यास्तपोधनाः।<br>ते पृच्छन्ति महात्मानं पौराणं लोमहर्षणम्॥ २४<br><br>कथं यज्ञफलोऽस्माकं वर्ततां सत्पथे भवेत्।<br>ततोऽब्रवीन्महाभागः प्रणम्य शिरसा ऋषीन्॥ २५<br><br>सरस्वती स्थिता यत्र तत्र यज्ञफलं महत्।<br>एतच्छ्रुत्वा तु मुनयो नानास्वाध्यायवेदिनः॥ २६<br><br>समागम्‍य ततः सर्वे सस्मरुस्ते सरस्वतीम्।<br>सा तु ध्याता ततस्तत्र ऋषिभिः सत्रयाजिभिः॥ २७<br><br>समागता प्लावनार्थं यज्ञे तेषां महात्मनाम्।<br>नैमिषे काञ्चनाक्षी तु स्मृता मङ्कणकेन सा॥ २८<br><br>समागता कुरुक्षेत्रं पुण्यतोया सरस्वती।<br>गयस्य यजमानस्य गयेष्वेव महाक्रतुम्॥ २९<br><br>आहूता च सरिच्छ्रेष्ठा गययज्ञे सरस्वती।<br>विशालां नाम तां प्राहुर्ऋषयः संशितव्रताः॥ ३० | इस प्रकार पुष्करतीर्थमें स्थित एवं नदियोंमें श्रेष्ठ इस सरस्वतीको महात्मा मङ्कण कुरुक्षेत्रमें लाये। एक समय नैमिषारण्यमें रहनेवाले तपस्याके धनी शौनक आदि मुनियोंने पुराणोंके ज्ञाता महात्मा लोमहर्षणसे पूछा—सत्पथगामी हमलोगोंको यज्ञका फल कैसे प्राप्त होगा? (—इसे कृपाकर समझाइये।) उसके बाद महानुभाव लोमहर्षणजीने ऋषियोंको सिरसे प्रणाम कर कहा कि ऋषियो! जहाँ सरस्वती नदी अवस्थित है, वहाँ (रहनेसे) यज्ञका महान् फल प्राप्त होता है। इसको सुनकर विविध वेदोंका स्वाध्याय करनेवाले मुनियोंने एकत्र होकर सरस्वतीका स्मरण किया। दीर्घकालिक यज्ञ करनेवाले उन ऋषियोंके ध्यान (स्मरण) करनेपर वे (सरस्वती) वहाँ नैमिषक्षेत्रमें उन महात्माओंके यज्ञमें प्लावन करनेके लिये काञ्चनाक्षी नामसे उपस्थित हो गयीं। वे ही प्रसिद्ध नदी मङ्कणके द्वारा स्मृत होनेपर पवित्र-सलिला सरस्वतीके रूपमें कुरुक्षेत्रमें (भी) आयीं और महान् व्रती ऋषियोंने गया-क्षेत्रमें महायज्ञका अनुष्ठान करनेवाले गयके यज्ञमें आहूत की गयी उन श्रेष्ठ सरस्वती नदीको 'विशाला'के नामसे स्मरण किया॥ २३–३०॥ | | सरित् सा हि समाहूता मङ्कणेन महात्मना।<br>कुरुक्षेत्रं समायाता प्रविष्टा च महानदी॥ ३१<br><br>उत्तरे कोशलाभागे पुण्ये देवर्षिसेविते।<br>उद्दालकेन मुनिना तत्र ध्याता सरस्वती॥ ३२ | महात्मा मङ्कण ऋषिद्वारा समाहूत की गयी वही नदी कुरुक्षेत्रमें आकर प्रवेश कर गयी। (फिर) उद्दालक मुनिने देवर्षियोंके द्वारा सेवित परम पवित्र उत्तरकोसल |

अध्याय ३८ ] मङ्कणक-प्रसङ्ग, मङ्कणकका शिवस्तवन और उनकी अनुकूलता प्राप्ति [ १६९

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
आजगाम सरिच्छ्रेष्ठा तं देशं मुनिकारणात्।<br>पूज्यमाना मुनिगणैर्वल्कलाजिनसंवृतैः॥ ३३<br>मनोहरेति विख्याता सर्वपापक्षयावहा।<br>आहूता सा कुरुक्षेत्रे मङ्कणेन महात्मना।<br>ऋषेः संमाननार्थाय प्रविष्टा तीर्थमुत्तमम्॥ ३४<br>सुवेणुरिति विख्याता केदारे या सरस्वती।<br>सर्वपापक्षया ज्ञेया ऋषिंसिद्धनिषेविता॥ ३५प्रदेशमें सरस्वतीका ध्यान किया। उन मुनिके कारण नदियोंमें श्रेष्ठ वह सरस्वती नदी उस देशमें आ गयी एवं वह वल्कल तथा मृगचर्मको धारण करनेवाले मुनियोंद्वारा पूजित हुई। तब सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाली वह ‘मनोहरा’ नामसे विख्यात हुई। फिर वह महात्मा मङ्कणद्वारा आहूत होकर ऋषिको सम्मानित करनेके लिये कुरुक्षेत्रके उत्तम तीर्थमें प्रविष्ट हुई। केदारतीर्थमें जो सरस्वती ‘सुवेणु’ नामसे प्रसिद्ध है, वह ऋषियों और सिद्धोंके द्वारा सेवित तथा सर्वपापनाशक रूपसे जानी जाती है॥ ३१—३५॥
सापि तेनेह मुनिना आराध्य परमेश्वरम्।<br>ऋषीणामुपकारार्थं कुरुक्षेत्रं प्रवेशिता॥ ३६<br>दक्षेण यजता सापि गङ्गाद्वारे सरस्वती।<br>विमलोदा भगवती दक्षेण प्रकटीकृता॥ ३७<br>समाहूता ययौ तत्र मङ्कणेन महात्मना।<br>कुरुक्षेत्रे तु कुरुणा यजिता च सरस्वती॥ ३८<br>सरोमध्ये समानीता मार्कण्डेयेन धीमता।<br>अभिष्टूय महाभागां पुण्यतोयां सरस्वतीम्॥ ३९<br>यत्र मङ्कणकः सिद्धः सप्तसारस्वते स्थितः।<br>नृत्यमानश्च देवेन शंकरेण निवारितः॥ ४०परमेश्वरकी आराधना कर उन मुनिने उसे (सुवेणुको) भी ऋषियोंका उपकार करनेके लिये इस कुरुक्षेत्रमें प्रवाहित कराया। गङ्गाद्वारमें यज्ञ कर रहे दक्षने ‘विमलोदा’ नामसे भगवती सरस्वतीको प्रकट किया। कुरुक्षेत्रमें कुरुद्वारा पूजित सरस्वती मङ्कणद्वारा बुलायी जानेपर वहाँ गयी। फिर बुद्धिमान् मार्कण्डेयजी उस पवित्र जलवाली महाभागा सरस्वतीकी स्तुति कर उसे सरोवरके मध्यमें ले गये। वहीं सप्तसारस्वततीर्थमें उपस्थित एवं नृत्य करते हुए सिद्ध मङ्कणकको नृत्य करनेसे शंकरजीने रोका था॥ ३६—४०॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सैंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३७॥


अड़तीसवाँ अध्याय

मङ्कणक-प्रसङ्ग, मङ्कणकका शिवस्तवन और उनकी अनुकूलता प्राप्ति

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br>कथं मङ्कणकः सिद्धः कस्माज्जातो महानृषिः।<br>नृत्यमानस्तु देवेन किमर्थं स निवारितः॥ १ऋषियोंने कहा—(प्रभो!) मङ्कणक किस प्रकार सिद्ध हुए? वे महान् ऋषि किससे उत्पन्न हुए थे? नृत्य करते हुए उन मङ्कणकको महादेवने क्यों रोका?॥ १॥
लोमहर्षण उवाच<br>कश्यपस्य सुतो जज्ञे मानसो मङ्कणो मुनिः।<br>स्नानं कर्तुं व्यवसितो गृहीत्वा वल्कलं द्विजः॥ २<br>तत्र गता ह्यप्सरसो रम्भाद्याः प्रियदर्शनाः।<br>स्नायन्ति रुचिराः स्निग्धास्तेन सार्धमनिन्दिताः॥ ३लोमहर्षणने कहा—(ऋषियो!) मङ्कणकमुनि महर्षि कश्यपके मानसपुत्र थे। (एक समय) वे ब्राह्मण देवता वल्कल-वस्त्र लेकर स्नान करने गये। वहाँ रम्भा आदि सुन्दरी अप्सराएँ भी गयी थीं। अनिन्द्य, कोमल एवं मनोहर (रूपवाली वे सभी) अप्सराएँ उनके साथ (ही)

४२- काम्यकवन तीर्थका प्रसङ्ग, सरस्वती नदीकी महिमा और तत्सम्बद्ध तीर्थोंका वर्णन

१७०श्रीवामनपुराण[ अध्याय ३८
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततो मुनेस्तदा क्षोभाद्रेतः स्कन्नं यदम्भसि।<br>तद्रेतः स तु जग्राह कलशे वै महातपाः॥ ४<br><br>सप्तधा प्रविभागं तु कलशस्थं जगाम ह।<br>तत्रर्षयः सप्त जाता विदुर्यान् मरुतां गणान्॥ ५<br><br>वायुवेगो वायुबलो वायुहा वायुमण्डलः।<br>वायुज्वालो वायुरेतो वायुचक्रश्च वीर्यवान्॥ ६<br><br>एते ह्यपत्यास्तस्यर्षेर्धारयन्ति चराचरम्।<br>पुरा मङ्कणकः सिद्धः कुशाग्रेणेति मे श्रुतम्॥ ७<br><br>क्षतः किल करे विप्रास्तस्य शाकरसोऽस्रवत्।<br>स वै शाकरसं दृष्ट्वा हर्षाविष्टः प्रनृत्तवान्॥ ८स्नान करने लगीं। उसके बाद मुनिके मनमें विकृति हो गयी; फलतः उनका शुक्र जलमें स्खलित हो गया। उस रेतको उन महातपस्वीने उठाकर घड़ेमें रख लिया। वह कलशस्थ (रेत) सात भागोंमें विभक्त हो गया। उससे सात ऋषि उत्पन्न हुए, जिन्हें मरुद्गण कहा जाता है। (उनके नाम हैं—) वायुवेग, वायुबल, वायुहा, वायुमण्डल, वायुज्वाल, वायुरेता एवं वीर्यवान् वायुचक्र। उन (मङ्कणक) ऋषिके ये सात पुत्र चराचरको धारण करते हैं। ब्राह्मणो! मैंने यह सुना है कि प्राचीन कालमें सिद्ध मङ्कणकके हाथमें कुशके अग्रभागसे छिद जानेके कारण घाव हो गया था; उससे शाकरस निकलने लगा। वे (अपने हाथसे निकलते हुए उस) शाकरसको देखकर प्रसन्न हो गये और नाचने लगे॥ २—८॥
ततः सर्वं प्रनृत्तं च स्थावरं जङ्गमं च यत्।<br>प्रनृत्तं च जगद् दृष्ट्वा तेजसा तस्य मोहितम्॥ ९<br><br>ब्रह्मादिभिः सुरैस्तत्र ऋषिभिश्च तपोधनैः।<br>विज्ञाप्तो वै महादेवो मुनेरर्थे द्विजोत्तमाः॥ १०<br><br>नायं नृत्येद् यथा देव तथा त्वं कर्तुमर्हसि।<br>ततो देवो मुनिं दृष्ट्वा हर्षाविष्टमतीव हि॥ ११<br><br>सुराणां हितकामार्थं महादेवोऽभ्यभाषत।<br>हर्षस्थानं किमर्थं च तवेदं मुनिसत्तम।<br>तपस्विनो धर्मपथे स्थितस्य द्विजसत्तम॥ १२इससे (उनके नृत्य करनेसे उनके साथ) सम्पूर्ण अचर-चर जगत् भी नाचने लगा। उनके तेजसे मोहित जगत्को नाचते देखकर ब्रह्मा आदि देव एवं तपस्वी ऋषियोंने मुनिके (हितके) लिये महादेवसे कहा—देव! आप ऐसा (कार्य) करें, जिससे ये नृत्य न करें (उन्हें नृत्यसे विरत करनेका उपाय करें)। उसके बाद हर्षसे अधिक मग्न उन मुनिको देखकर एवं देवोंके हितकी इच्छासे महादेवने कहा—मुनिसत्तम! ब्राह्मणश्रेष्ठ! आप तो तपस्वी एवं धर्मपथमें स्थित रहनेवाले हैं। फिर आपके इस हर्षका क्या कारण है?॥ ९—१२॥
ऋषिरुवाच<br>किं न पश्यसि मे ब्रह्मन् कराच्छाकरसं स्रुतम्।<br>यं दृष्ट्वाऽहं प्रनृत्तो वै हर्षेण महताऽन्वितः॥ १३<br><br>तं प्रहस्याब्रवीद् देवो मुनिं रागेण मोहितम्।<br>अहं न विस्मयं विप्र गच्छामीह प्रपश्यताम्॥ १४<br><br>एवमुक्त्वा मुनिश्रेष्ठं देवदेवो महाद्युतिः।<br>अङ्गुल्यग्रेण विप्रेन्द्राः स्वाङ्गुष्ठं ताडयद् भवः॥ १५<br><br>ततो भस्म क्षतात् तस्मान्निर्गतं हिमसंनिभम्।<br>तद् दृष्ट्वा व्रीडितो विप्रः पादयोः पतितोऽब्रवीत्॥ १६ऋषिने कहा— ब्रह्मन्! क्या आप नहीं देखते कि मेरे हाथसे शाकका रस चू रहा है; जिसे देखकर मैं अत्यन्त आनन्दमग्न होकर नृत्य कर रहा हूँ। महादेवजीने हँसकर आसक्तिसे मोहित हुए उन मुनिसे कहा—विप्रवर! मुझे आश्चर्य नहीं हो रहा है। (किंतु) आप इधर देखें। विप्रेन्द्रो! श्रेष्ठ मुनिसे ऐसा कहकर देदीप्यमान भगवान् देवाधिदेव महादेवने अपनी अंगुलिके अग्रभागसे अपने अंगूठेको ठीक किया। उसके बाद उस चोटसे हिमतुल्य (स्वच्छ) भस्म निकलने लगा। उसे देखनेके बाद ब्राह्मण लज्जित होकर (महादेवके) चरणोंमें गिर पड़े और बोले—॥ १३—१६॥
नान्यं देवादहं मन्ये शूलपाणेर्महात्मनः।<br>चराचरस्य जगतो वरस्त्वमसि शूलधृक्॥ १७मैं महात्मा शूलपाणि महादेवके अतिरिक्त किसीको नहीं मानता। शूलपाणे! मेरी दृष्टिमें आप ही चराचर
अध्याय ३९ ]कुरुक्षेत्रके तीर्थोंका अनुक्रान्त वर्णन१७१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
त्वदाश्रयाश्च दृश्यन्ते सुरा ब्रह्मादयोऽनघ।<br>पूर्वस्त्वमसि देवानां कर्त्ता कारयिता महत्॥ १८<br><br>त्वत्प्रसादात् सुराः सर्वे मोदन्ते ह्यकुतोभयाः।<br>एवं स्तुत्वा महादेवमृषिः स प्रणतोऽब्रवीत्॥ १९<br><br>भगवंस्त्वत्प्रसादाद्धि तपो मे न क्षयं व्रजेत्।<br>ततो देवः प्रसन्नात्मा तमृषिं वाक्यमब्रवीत्॥ २०समस्त संसारमें सर्वश्रेष्ठ हैं। अनघ! ब्रह्मा आदि देवता आपके ही आश्रित देखे जाते हैं। आप ही देवताओंमें प्रथम हैं और आप (सब कुछ) करने एवं करानेवाले तथा महत्वस्वरूप हैं। आपकी कृपासे सभी देवगण निर्भय होकर मोदमग्न होते रहते हैं। ऋषिने इस प्रकार महादेवजीकी स्तुति करनेके बाद उन्हें प्रणामकर कहा—भगवन्! आपकी कृपासे मेरे तपका क्षय न हो। तब महादेवजीने प्रसन्न होकर उन ऋषिसे यह वचन कहा—॥ १७–२०॥
ईश्वर उवाच<br>तपस्ते वर्धतां विप्र मत्प्रसादात् सहस्रधा।<br>आश्रमे चेह वत्स्यामि त्वया सार्द्धमहं सदा॥ २१<br>सप्तसारस्वते स्नात्वा यो मामर्चिष्यते नरः।<br>न तस्य दुर्लभं किंचिदिह लोके परत्र च॥ २२<br>सारस्वतं च तं लोकं गमिष्यति न संशयः।<br>शिवस्य च प्रसादेन प्राप्नोति परमं पदम्॥ २३(सदाशिव) ईश्वरने कहा— विप्र! मेरी कृपासे तुम्हारी तपस्या सहस्रों प्रकारसे बढ़े। मैं तुम्हारे साथ इस आश्रममें सदा निवास करूँगा। जो मनुष्य इस सप्तसारस्वततीर्थमें स्नान करके मेरी पूजा करेगा, उसे इस लोक और परलोकमें कुछ भी दुर्लभ नहीं होगा। वह निःसंदेह उस सारस्वतलोकको जायगा एवं (मुझ) शिवके अनुग्रहसे परम पदको प्राप्त करेगा॥ २१–२३॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें अड़तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३८॥


उनतालीसवाँ अध्याय

कुरुक्षेत्रके तीर्थोंका अनुक्रान्त वर्णन

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
लोमहर्षण उवाच<br>ततस्त्वौशनसं तीर्थं गच्छेत्तु श्रद्धयान्वितः।<br>उशना यत्र संसिद्धो ग्रहत्वं च समाप्तवान्॥ १<br><br>तस्मिन् स्नात्वा विमुक्तस्तु पातकैर्जन्मसंभवैः।<br>ततो याति परं ब्रह्म यस्मान्नावर्तते पुनः॥ २<br><br>रहोदरो नाम मुनिर्यत्र मुक्तो बभूव ह।<br>महता शिरसा ग्रस्तस्तीर्थमाहात्म्यदर्शनात्॥ ३लोमहर्षणने कहा— (ऋषियो!) सप्तसारस्वतके बाद श्रद्धासे युक्त होकर 'औशनस'तीर्थमें जाना चाहिये, जहाँ शुक्र सिद्धि प्राप्तकर ग्रहत्वको प्राप्त हो गये। उस तीर्थमें स्नानकर मनुष्य अनेक जन्मोंमें किये हुए पातकोंसे छूटकर परब्रह्मको प्राप्त करता है, जहाँसे पुनः (जन्म-मरणके चक्करमें) लौटना नहीं पड़ता। (वह तीर्थ ऐसा है) जहाँ तीर्थ-दर्शनकी महिमासे भारी सिरसे जकड़े हुए रहोदर नामके एक मुनि उससे मुक्त हो गये थे॥ १–३॥
ऋषय ऊचुः<br>कथं रहोदरो ग्रस्तः कथं मोक्षमवाप्तवान्।<br>तीर्थस्य तस्य माहात्म्यमिच्छामः श्रोतुमादरात्॥ ४ऋषियोंने कहा (पूछा)— रहोदर मुनि सिरसे ग्रस्त कैसे हो गये थे? और वे उससे मुक्त कैसे हुए? हमलोग उस तीर्थके माहात्म्यको आदरके साथ सुनना चाहते हैं (जिसकी महिमासे ऐसा हुआ।)॥ ४॥

१७२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ३९ लोमहर्षण उवाच पुरा वै दण्डकारण्ये राघवेण महात्मना। वसता द्विजशार्दूला राक्षसास्तत्र हिंसिताः॥ ५ तत्रैकस्य शिरश्छिन्नं राक्षसस्य दुरात्मनः। क्षुरेण शितधारेण तत् पपात महावने॥ ६ रहोदरस्य तल्लग्नं जङ्घायां वै यदृच्छया। वने विचरतस्तत्र अस्थि भित्त्वा विवेश ह॥ ७ स तेन लग्नेन तदा द्विजातिर्न शशाक ह। अभिगन्तुं महाप्राज्ञस्तीर्थान्यायधनानि च॥ ८ स पूतिना विस्रवता वेदनात्तो महामुनिः। जगाम सर्वतीर्थानि पृथिव्यां यानि कानि च॥ ९ ततः स कथयामास ऋषीणां भावितात्मनाम्। तेऽब्रुवन् ऋषयो विप्रं प्रयाह्यौशनसं प्रति॥ १० तेषां तद्वचनं श्रुत्वा जगाम स रहोदरः। ततस्त्वौशनसे तीर्थे तस्योपस्पृशतस्तदा॥ ११ तच्छिरश्शरणं मुक्त्वा पपातान्तर्जले द्विजाः। ततः स विरजो भूत्वा पूतात्मा वीतकल्मषः॥ १२ आजगामाश्रमं प्रीतः कथयामास चाखिलम्। ते श्रुत्वा ऋषयः सर्वे तीर्थमाहात्म्यमुत्तमम्। कपालमोचनमिति नाम चक्रुः समागताः॥ १३ तत्रापि सुमहत्तीर्थं विश्वामित्रस्य विश्रुतम्। ब्राह्मण्यं लब्धवान् यत्र विश्वामित्रो महामुनिः॥ १४ तस्मिंस्तीर्थवरे स्नात्वा ब्राह्मण्यं लभते ध्रुवम्। ब्राह्मणस्तु विशुद्धात्मा परं पदमवाप्नुयात्॥ १५ ततः पृथूदकं गच्छेन्नियतो नियताशनः। तत्र सिद्धस्तु ब्रह्मर्षी रुषङ्गुर्नाम नामतः॥ १६ जातिस्मरो रुषङ्गुस्तु गङ्गाद्वारे सदा स्थितः। अन्तकालं ततो दृष्ट्वा पुत्रान् वचनमब्रवीत्। इह श्रेयो न पश्यामि नयध्वं मां पृथूदकम्॥ १७ लोमहर्षणजी बोले- द्विजश्रेष्ठो ! प्राचीन कालमें दण्डकारण्यमें रहते हुए रघुवंशी महात्मा रामचन्द्रने बहुत-से राक्षसोंको मारा था। वहाँ एक दुष्टात्मा राक्षसका सिर तीक्ष्णधारवाले क्षुर नामक बाणसे कटकर उस महावनमें गिरा। (फिर वह) संयोगवश वनमें विचरण करते हुए रहोदर मुनिकी जंघामें उनकी हड्डीको तोड़कर उससे चिपट गया। महाप्राज्ञ वे ब्राह्मणदेव (जंघेकी टूटी हड्डीमें) उस मस्तकके लग जानेके कारण तीर्थों और देवालयोंमें नहीं जा पाते थे॥ ५-८॥ वे महामुनि दुर्गन्धपूर्ण पीब आदि बहनेके कारण तथा वेदनासे अत्यन्त दुःखी रहते थे। पृथ्वीके जिन-जिन तीर्थोंमें वे गये, वहाँ-वहाँ उन्होंने पवित्रात्मा ऋषियोंसे (अपना दुःख) कहा। ऋषियोंने उन विप्रसे कहा- ब्राह्मणदेव ! आप औशनस (तीर्थ)-में जाइये। (लोमहर्षणने कहा-) द्विजो ! उनका यह वचन सुनकर रहोदर मुनि वहाँसे औशनसतीर्थमें गये। वहाँ उन्होंने तीर्थ-जलका स्पर्श किया। उनके द्वारा (जलका) स्पर्श होते ही वह मस्तक उनसे (जाँघ)-को छोड़कर जलमें गिर गया। उसके बाद वे मुनि पापसे रहित निर्मल रजोगुणसे रहित अतएव पवित्रात्मा होकर प्रसन्नतापूर्वक (अपने) आश्रममें गये और उन्होंने (ऋषियोंसे) सारी आपबीती कह सुनायी। फिर तो उन आये हुए सभी ऋषियोंने औशनसतीर्थके इस उत्तम माहात्म्यको सुनकर उसका नाम 'कपालमोचन' रख दिया॥ ९-१३॥ वहीं (कपालमोचन तीर्थमें ही) महामुनि विश्वामित्रका बहुत बड़ा तीर्थ है, जहाँ विश्वामित्रने ब्राह्मणत्वको प्राप्त किया था। उस श्रेष्ठ तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको निश्चय रूपसे ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति होती है और वह ब्राह्मण विशुद्धात्मा होकर ब्रह्मके परम पदको प्राप्त करता है। कपालमोचनके बाद पृथूदक नामके तीर्थमें जाय और नियमपूर्वक नियत मात्रामें आहार करे। वहाँ रुषङ्गु नामके ब्रह्मर्षिने सिद्धि पायी थी। सदा गङ्गाद्वारमें स्थित रहते हुए पूर्वजन्मके वृत्तान्तको स्मरण रखनेवाले रुषङ्गुने (अपना) अन्तकाल आया देखकर (अपने) पुत्रोंसे कहा कि यहाँ (मैं) अपना कल्याण नहीं देख रहा हूँ। मुझे पृथूदक

सम्बन्धमें प्रश्न और ब्रह्माके हवालेसे लोमहर्षणका उत्तर

अध्याय ३९] कुरुक्षेत्रके तीर्थोंका अनुक्रान्त वर्णन १७३ विज्ञाय तस्य तद्भावं रुषङ्गोस्ते तपोधनाः । तं वै तीर्थे उपानिन्युः सरस्वत्यास्तपोधनम् ॥ १८ स तैः पुत्रैः समानीतः सरस्वत्यां समाप्लुतः । स्मृत्वा तीर्थगुणान् सर्वान् प्राहेदृषिसत्तमः ॥ १९ सरस्वत्युत्तरे तीर्थे यस्त्यजेदात्मनस्तनुम् । पृथूदके जप्यपरो नूनं चामरतां व्रजेत् ॥ २० तत्रैव ब्रह्मयोन्यस्ति ब्रह्मणा यत्र निर्मिता। पृथूदकं समाश्रित्य सरस्वत्यास्तटे स्थितः ॥ २१ चातुर्वर्ण्यस्य सृष्ट्यर्थमात्मज्ञानपरोऽभवत्। तस्याभिधायतः सृष्टिं ब्रह्मणो व्यक्तजन्मनः ॥ २२ मुखतो ब्राह्मणा जाता बाहुभ्यां क्षत्रियास्तथा । ऊरुभ्यां वैश्यजातीयाः पद्भ्यां शूद्रास्ततोऽभवन् ॥ २३ चातुर्वर्ण्यं ततो दृष्ट्वा आश्रमस्थं ततस्ततः। एवं प्रतिष्ठितं तीर्थं ब्रह्मयोनीति संज्ञितम् ॥ २४ तत्र स्नात्वा मुक्तिकामः पुनर्योनिं न पश्यति। तत्रैव तीर्थं विख्यातमवकीर्णेति नामतः ॥ २५ यस्मिंस्तीर्थे वको दाल्भ्यो धृतराष्ट्रममर्षणम् । जुहाव वाहनैः सार्धं तत्राबुध्यत् ततो नृपः ॥ २६ ऋषय ऊचुः कथं प्रतिष्ठितं तीर्थमवकीर्णेति नामतः। धृतराष्ट्रेण राज्ञा च स किमर्थं प्रसादितः ॥ २७ लोमहर्षण उवाच ऋषयो नैमिषेया ये दक्षिणार्थं ययुः पुरा। तत्रैव च वको दाल्भ्यो धृतराष्ट्रमयाचत ॥ २८ तेनापि तत्र निन्दार्थमुक्तं पश्चानृतं तु यत्। ततः क्रोधेन महता मांसमुत्कृत्य तत्र ह ॥ २९ पृथूदके महातीर्थे अवकीर्णेति नामतः । जुहाव धृतराष्ट्रस्य राष्ट्रं नरपतेस्ततः ॥ ३० हूयमाने तदा राष्ट्रे प्रवृत्ते यज्ञकर्मणि । अक्षीयत ततो राष्ट्रं नृपतेर्दुष्कृतेन वै ॥ ३१ (तीर्थ)-में ले चलो। रुषङ्गुके उस भावको जानकर वे तपोधन (पुत्र) उन तपके धनीको सरस्वतीके तीर्थमें ले गये ॥ १४ - १८॥ उन पुत्रोंद्वारा लाये गये उन ऋषिश्रेष्ठने सरस्वतीमें स्नान करनेके पश्चात् उस तीर्थके सब गुणोंका स्मरण कर यह कहा था-'सरस्वतीके उत्तरकी ओर स्थित पृथूदक नामके तीर्थमें अपने शरीरका त्याग करनेवाला जपपरायण मनुष्य निश्चय ही देवत्वको प्राप्त होता है।' वहीं ब्रह्माद्वारा निर्मित 'ब्रह्मयोनितीर्थ' है, जहाँ सरस्वतीके किनारे अवस्थित पृथूदकमें स्थित होकर ब्रह्मा चारों वर्णोंकी सृष्टिके लिये आत्मज्ञानमें लीन हुए थे। सृष्टिके विषयमें अव्यक्तजन्मा ब्रह्माके चिन्तन करनेपर उनके मुखसे ब्राह्मण, भुजाओंसे क्षत्रिय, दोनों ऊरुओंसे वैश्य और दोनों पैरोंसे शूद्र उत्पन्न हुए ॥ १९-२३॥ उसके बाद उन्होंने चारों वर्णोंको विभिन्न आश्रमोंमें स्थित हुआ देखा। इस प्रकार ब्रह्मयोनि नामक तीर्थकी प्रतिष्ठा हुई थी। मुक्तिकी कामना करनेवाला व्यक्ति वहाँ स्नान करनेसे पुनर्जन्म नहीं देखता। वहीं अवकीर्ण नामक एक विख्यात तीर्थ भी है, जहाँपर दाल्भ्य (दल्भ या दल्भि गोत्रमें उत्पन्न) वक नामक ऋषिने क्रोधी धृतराष्ट्रको उसके वाहनोंके साथ हवन कर दिया था, तब कहीं राजाको (अपने किये कर्मका) ज्ञान हुआ था ॥ २४ - २६ ॥ ऋषियोंने पूछा- अवकीर्ण नामक तीर्थ कैसे प्रतिष्ठित हुआ एवं राजा धृतराष्ट्रने उन (वक दाल्भ्य मुनि)-को क्यों प्रसन्न किया था ? ॥ २७ ॥ लोमहर्षणने कहा- प्राचीन कालमें नैमिषारण्य- निवासी जो ऋषि दक्षिणा पानेके लिये (राजा धृतराष्ट्रके यहाँ) गये थे, उनमेंसे दल्भिवंशीय वक ऋषिने धृतराष्ट्रसे (धनकी) याचना की। उन्होंने (धृतराष्ट्रने) भी निन्दापूर्ण ग्राम्य और असत्य बात कही। उसके बाद वे (वक दाल्भ्य) अत्यन्त क्रुद्ध होकर पृथूदकमें स्थित अवकीर्ण नामक तीर्थमें जा करके मांस काट-काटकर धृतराष्ट्रके राष्ट्रके नाम हवन करने लगे। तब यज्ञमें राष्ट्रका हवन प्रारम्भ होनेपर राजाके दुष्कर्मके कारण राष्ट्रका क्षय होने लगा ॥ २८-३१ ॥

१७४श्रीवामनपुराण[ अध्याय ४०
ततः स चिन्तयामास ब्राह्मणस्य विचेष्टितम्।<br>पुरोहितेन संयुक्तो रत्नान्यादाय सर्वशः॥ ३२<br><br>प्रसादनार्थं विप्रस्य ह्यवकीर्णं ययौ तदा।<br>प्रसादितः स राज्ञा च तुष्टः प्रोवाच तं नृपम्॥ ३३<br><br>ब्राह्मणा नावमन्तव्याः पुरुषेण विजानता।<br>अवज्ञातो ब्राह्मणस्तु हन्यात् त्रिपुरुषं कुलम्॥ ३४<br><br>एवमुक्त्वा स नृपतिं राज्येन यशसा पुनः।<br>उत्थापयामास ततस्तस्य राज्ञे हिते स्थितः॥ ३५(राष्ट्रको क्षीण होते देख) उसने विचार किया और वह इसे ब्राह्मणका विकर्म जानकर (उस ब्राह्मणको) प्रसन्न करनेके लिये समस्त रत्नोंको लेकर पुरोहितके साथ अवकीर्णतीर्थमें गया (और उस) राजाने उन्हें प्रसन्न कर लिया। प्रसन्न होकर उन्होंने राजासे कहा — (राजन्!) विद्वान् मनुष्यको ब्राह्मणका अपमान नहीं करना चाहिये। अपमानित हुआ ब्राह्मण मनुष्यके कुलके तीन पुरुषों (पीढ़ियों)-का विनाश कर देता है। ऐसा कहकर उन्होंने पुनः राजाको राज्य एवं यशके साथ सम्पन्न कर दिया और वे उस राजाके हितकारी हो गये॥ ३२—३५॥
तस्मिंस्तीर्थे तु यः स्नाति श्रद्दधानो जितेन्द्रियः।<br>स प्राप्नोति नरो नित्यं मनसा चिन्तितं फलम्॥ ३६<br><br>तत्र तीर्थं सुविख्यातं यायातं नाम नामतः।<br>यस्येह यजमानस्य मधु सुस्राव वै नदी॥ ३७<br><br>तस्मिन् स्नातो नरो भक्त्या मुच्यते सर्वकिल्बिषैः।<br>फलं प्राप्नोति यज्ञस्य अश्वमेधस्य मानवः॥ ३८<br><br>मधुस्रवं च तत्रैव तीर्थं पुण्यतमं द्विजाः।<br>तस्मिन् स्नात्वा नरो भक्त्या मधुना तर्पयेत् पितॄन्॥ ३९<br><br>तत्रापि सुमहत्तीर्थं वसिष्ठोद्वाहसंज्ञितम्।<br>तत्र स्नातो भक्तियुक्तो वासिष्ठं लोकमाप्नुयात्॥ ४०उस (अवकीर्ण) तीर्थमें जो जितेन्द्रिय मनुष्य श्रद्धापूर्वक स्नान करता है, वह नित्य मनोऽभिलषित फल प्राप्त करता है। वहाँ 'यायात' (ययातिका तीर्थ) नामसे सुविख्यात तीर्थ है, जहाँ यज्ञ करनेवालेके लिये नदीने मधु बहाया था। उसमें भक्तिपूर्वक स्नान करनेसे मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है एवं उसे अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है। द्विजो! वहीं 'मधुस्रव' नामक पवित्र तीर्थ है। उसमें मनुष्यको भक्तिपूर्वक स्नान कर मधुसे पितरोंका तर्पण करना चाहिये। वहींपर 'वसिष्ठोद्वाह' नामक सुन्दर महान् तीर्थ है, वहाँ भक्तिपूर्वक स्नान करनेवाला व्यक्ति महर्षि वसिष्ठके लोकको प्राप्त करता है॥ ३६—४०॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें उन्तालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३९॥


चालीसवाँ अध्याय

वसिष्ठापवाह नामक तीर्थका उत्पत्ति-प्रसङ्ग

ऋषय ऊचुः<br>वसिष्ठस्यापवाहोऽसौ कथं वै सम्बभूव ह।<br>किमर्थं सा सरिच्छ्रेष्ठा तमृषिं प्रत्यवाहयत्॥ १ऋषियोंने कहा (पूछा)— महाराज! वह वसिष्ठापवाह कैसे उत्पन्न हुआ? उस श्रेष्ठ सरिताने उन ऋषिको अपने प्रवाहमें क्यों बहा दिया था?॥ १॥
लोमहर्षण उवाच<br>विश्वामित्रस्य राजर्षेर्वसिष्ठस्य महात्मनः।<br>भृशं वैरं बभूवेह तपःस्पर्द्धाकृते महत्॥ २लोमहर्षण बोले— (ऋषियो!) राजर्षि विश्वामित्र एवं महात्मा वसिष्ठमें तपस्याके विषयमें परस्पर चुनौती होनेके कारण बड़ी भारी शत्रुता हो गयी।

| अध्याय ४० ] | वसिष्ठापवाह नामक तीर्थका उत्पत्ति-प्रसङ्ग | १७५ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
आश्रमो वै वसिष्ठस्य स्थाणुतीर्थे बभूव ह।<br>तस्य पश्चिमदिग्भागे विश्वामित्रस्य धीमतः॥ ३<br>यत्रेष्ट्वा भगवान् स्थाणुः पूजयित्वा सरस्वतीम्।<br>स्थापयामास देवेशो लिङ्गाकारां सरस्वतीम्॥ ४<br>वसिष्ठस्तत्र तपसा घोररूपेण संस्थितः।<br>तस्येह तपसा हीनो विश्वामित्रो बभूव ह॥ ५वसिष्ठका आश्रम स्थाणुतीर्थमें था और उसके पश्चिम दिशामें बुद्धिमान् विश्वामित्र महर्षिका आश्रम था; जहाँ देवाधिदेव भगवान् शिवने यज्ञ करनेके बाद सरस्वतीकी पूजा कर मूर्तिके रूपमें सरस्वतीकी स्थापना की थी। वसिष्ठजी वहीं घोर तपस्यामें संलग्न थे। उनकी तपस्यासे विश्वामित्र (प्रभावतः) हीन-से होने लगे॥ २-५॥
सरस्वतीं समाहूय इदं वचनमब्रवीत्।<br>वसिष्ठं मुनिशार्दूलं स्वेन वेगेन आनय॥ ६<br>इहाहं तं द्विजश्रेष्ठं हनिष्यामि न संशयः।<br>एतच्छ्रुत्वा तु वचनं व्यथिता सा महानदी॥ ७<br>तथा तां व्यथितां दृष्ट्वा वेपमानां महानदीम्।<br>विश्वामित्रोऽब्रवीत् क्रुद्धो वसिष्ठं शीघ्रमानय॥ ८<br>ततो गत्वा सरिच्छ्रेष्ठा वसिष्ठं मुनिसत्तमम्।<br>कथयामास रुदतो विश्वामित्रस्य तद् वचः॥ ९(एक बार) विश्वामित्रने सरस्वतीको बुलाकर यह वचन कहा—सरस्वति! तुम मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठको अपने वेगसे बहा लाओ। मैं उन द्विजश्रेष्ठ वसिष्ठको यहाँ मारूँगा—इसमें संदेहकी बात नहीं है। इस (अवाञ्छनीय बात)-को सुनकर वह महानदी दुःखित हो गयी। (पर) विश्वामित्रने उस प्रकार दुःखित एवं काँपती हुई उस महानदीको देखकर क्रोधमें भरकर कहा कि वसिष्ठको शीघ्र लाओ। उसके बाद उस श्रेष्ठ नदीने मुनिश्रेष्ठके पास जाकर उनसे रोते हुए विश्वामित्रकी उस बातको कहा॥ ६-९॥
तपःक्रियाविशीर्णां च भृशं शोकसमन्विताम्।<br>उवाच स सरिच्छ्रेष्ठां विश्वामित्राय मां वह॥ १०<br>तस्य तद् वचनं श्रुत्वा कृपाशीलस्य सा सरित्।<br>चालयामास तं स्थानात् प्रवाहेणाम्भसस्तदा॥ ११<br>स च कूलापहारेण मित्रावरुणयोः सुतः।<br>उह्यमानश्च तुष्टाव तदा देवीं सरस्वतीम्॥ १२<br>पितामहस्य सरसः प्रवृत्ताऽसि सरस्वति।<br>व्याप्तं त्वया जगत् सर्वं तवैवाम्भोभिरुत्तमैः॥ १३उन वसिष्ठजीने तपश्चर्यासे दुर्बल एवं अतिशय शोक-समन्वित उस श्रेष्ठ सरिता (सरस्वती)-से कहा—(तुम) विश्वामित्रके पास मुझे बहा ले चलो। उन दयालुके उस वचनको सुनकर उस सरस्वती सरिताने जलके (तेज) प्रवाहद्वारा उन्हें उस स्थानसे बहाना प्रारम्भ किया। किनारेसे ले जाये जानेके कारण बहते हुए मित्रावरुणके पुत्र वसिष्ठ-ऋषि प्रसन्न होकर देवी सरस्वतीकी स्तुति करने लगे—सरस्वति! आप ब्रह्माके सरोवरसे निकली हैं। आपने अपने उत्तम जलसे समस्त जगत्को व्याप्त कर दिया है॥ १०-१३॥
त्वमेवाकाशगा देवी मेघेषु सृजसे पयः।<br>सर्वास्त्वापस्त्वमेवेति त्वत्तो वयमधीमहे॥ १४<br>पुष्टिर्धृतिस्तथा कीर्तिः सिद्धिः कान्तिः क्षमा तथा।<br>स्वधा स्वाहा तथा वाणी तवायत्तमिदं जगत्॥ १५<br>त्वमेव सर्वभूतेषु वाणीरूपेण संस्थिता।<br>एवं सरस्वती तेन स्तुता भगवती सदा॥ १६<br>सुखेनोवाह तं विप्रं विश्वामित्राश्रमं प्रति।<br>न्यवेदयत्तदा खिन्ना विश्वामित्राय तं मुनिम्॥ १७'आप ही आकाशगामिनी देवी हैं और मेघोंमें जलको उत्पन्न करती हैं। आप ही सभी जलोंके रूपमें वर्तमान हैं। आपकी ही शक्तिसे हमलोग अध्ययन करते हैं। आप ही पुष्टि, धृति, कीर्ति, सिद्धि, कान्ति, क्षमा, स्वधा, स्वाहा तथा सरस्वती हैं। यह पूरा विश्व आपके ही अधीन है। आप ही समस्त प्राणियोंमें वाणीरूपसे स्थित हैं।' वसिष्ठजीने भगवती सरस्वतीकी इस प्रकार स्तुति की और सरस्वती नदीने उन विप्रदेवको विश्वामित्रके आश्रममें सुखपूर्वक पहुँचा दिया और खिन्न होकर उन मुनिको विश्वामित्रके लिये निवेदित कर दिया॥ १४-१७॥
१७६श्रीवामनपुराण[ अध्याय ४०

| तमानीतं सरस्वत्या दृष्ट्वा कोपसमन्वितः।<br>अथान्विषत् प्रहरणं वसिष्ठान्तकरं तदा ॥ १८<br><br>तं तु क्रुद्धमभिप्रेक्ष्य ब्रह्महत्याभयान्नदी।<br>अपोवाह वसिष्ठं तं मध्ये चैवाम्भसस्तदा।<br>उभयोः कुर्वती वाक्यं वञ्चयित्वा च गाधिजम् ॥ १९<br><br>ततोऽपवाहितं दृष्ट्वा वसिष्ठमृषिसत्तमम्।<br>अब्रवीत् क्रोधरक्ताक्षो विश्वामित्रो महातपाः ॥ २०<br><br>यस्मान्मां सरितां श्रेष्ठे वञ्चयित्वा विनिर्गता।<br>शोणितं वह कल्याणि रक्षोग्रामणिसंयुता ॥ २१ | उसके बाद सरस्वतीद्वारा बहाकर लाये गये वसिष्ठको देखकर विश्वामित्र क्रोधसे भर गये और वसिष्ठका अन्त करनेवाला शस्त्र ढूँढ़ने लगे। उन्हें क्रोधसे भरा हुआ देखकर ब्रह्महत्याके भयसे डरती हुई वह सरस्वती नदी गाधिपुत्र विश्वामित्रको वञ्चित कर दोनोंकी बातोंका पालन करती हुई उन वसिष्ठको जलमें (पुनः) बहा ले गयी। उसके बाद ऋषिप्रवर वसिष्ठको अपवाहित होते देखकर महातपस्वी विश्वामित्रके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। फिर विश्वामित्रने कहा—ओ श्रेष्ठ नदी! यतः तुम मुझे वञ्चितकर चली गयी हो, कल्याणि! अतः श्रेष्ठ राक्षसोंसे संयुक्त होकर तुम शोणितका वहन करो—तुम्हारा जल रक्तसे युक्त हो जाय ॥ १८–२१ ॥ | | ततः सरस्वती शप्ता विश्वामित्रेण धीमता।<br>अवहच्छोणितोन्मिश्रं तोयं संवत्सरं तदा ॥ २२<br><br>अथर्षयश्च देवाश्च गन्धर्वाप्सरसस्तदा।<br>सरस्वतीं तदा दृष्ट्वा बभूवुर्भृशदुःखिताः ॥ २३<br><br>तस्मिंस्तीर्थवरे पुण्ये शोणितं समुपावहत्।<br>ततो भूतपिशाचाश्च राक्षसाश्च समागताः ॥ २४<br><br>ततस्ते शोणितं सर्वे पिबन्तः सुखमासते।<br>तृप्ताश्च सुभृशं तेन सुखिता विगतज्वराः।<br>नृत्यन्तश्च हसन्तश्च यथा स्वर्गजितस्तथा ॥ २५ | उसके बाद बुद्धिमान् विश्वामित्रसे इस प्रकार शाप प्राप्तकर सरस्वतीने एक वर्षतक रक्तसे मिले हुए जलको बहाया। उसके पश्चात् सरस्वती नदीको रक्तसे मिश्रित जलवाली देखकर ऋषि, देवता, गन्धर्व और अप्सराएँ अत्यन्त दुःखित हो गयीं। (यतः) उस पवित्र श्रेष्ठ तीर्थमें रुधिर ही बहने लगा। अतः वहाँ भूत, पिशाच, राक्षस एकत्र होने लगे। वे सभी रक्तका पान करते हुए वहाँ आनन्दपूर्वक रहने लगे। वे उससे अत्यन्त तृप्त, सुखी एवं निश्चिन्त होकर इस प्रकार नाचने एवं हँसने लगे, मानो उन्होंने स्वर्गको जीत लिया हो ॥ २२–२५ ॥ | | कस्यचित्त्वथ कालस्य ऋषयः सतपोधनाः।<br>तीर्थयात्रां समाजग्मुः सरस्वत्यां तपोधनाः ॥ २६<br><br>तां दृष्ट्वा राक्षसैर्घोरैः पीयमानां महानदीम्।<br>परित्राणे सरस्वत्याः परं यत्नं प्रचक्रिरे ॥ २७<br><br>ते तु सर्वे महाभागाः समागम्य महाव्रताः।<br>आहूय सरितां श्रेष्ठामिदं वचनमब्रुवन् ॥ २८<br><br>किं कारणं सरिच्छ्रेष्ठे शोणितेन ह्रदो ह्यहम्।<br>एवमाकुलतां यातः श्रुत्वा वेत्स्यामहे वयम् ॥ २९ | कुछ समय बीतनेपर तपस्याके धनी ऋषिलोग तीर्थयात्रा करते-करते सरस्वतीके तटपर पहुँचे। (वहाँ) भयानक राक्षसोंके द्वारा पीती जाती हुई महानदी सरस्वतीको देखकर वे उसकी रक्षाके लिये महान् प्रयत्न करने लगे। और महान् व्रतोंका अनुष्ठान करनेवाले उन महाभागोंने श्रेष्ठ नदीको (पास) बुलाकर उससे यह वचन फिर कहा—श्रेष्ठ सरिते! हम सब आपसे यह जानना चाहते हैं कि यह जलाशय रक्तसे भरकर ऐसा क्षुब्ध कैसे हुआ है? ॥ २६–२९ ॥ | | ततः सा सर्वमाचष्ट विश्वामित्रविचेष्टितम्।<br><br>ततस्ते मुनयः प्रीताः सरस्वत्यां समानयन्।<br><br>अरुणां पुण्यतोयौघां सर्वदुष्कृतनाशिनीम् ॥ ३० | तब उसने विश्वामित्रके समस्त विकर्मोंका (उनके सामने ही) वर्णन किया। उसके पश्चात् प्रसन्न हुए मुनिजन सरस्वती तथा समस्त पापोंका विनाश करनेवाली अरुणा नदीको ले आये। (जिससे सरस्वती-ह्रदका |

अध्याय ४० ]वसिष्ठापवाह नामक तीर्थका उत्पत्ति-प्रसङ्ग१७७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दृष्ट्वा तोयं सरस्वत्या राक्षसा दुःखिता भृशम्।<br>ऊचुस्तान् वै मुनीन् सर्वान् दैन्ययुक्ताः पुनः पुनः॥ ३१<br><br>वयं हि क्षुधिताः सर्वे धर्महीनाश्च शाश्वताः।<br>न च नः कामकारोऽयं यद् वयं पापकारिणः॥ ३२<br><br>युष्माकं चाप्रसादेन दुष्कृतेन च कर्मणा।<br>पक्षोऽयं वर्धतेऽस्माकं यतः स्मो ब्रह्मराक्षसाः॥ ३३शोणित पवित्र जल हो गया) (पर) सरस्वतीके जलको (इस प्रकार शुद्ध हुआ) देखकर राक्षस बहुत दुःखित हो गये। वे दीनतापूर्वक उन सभी मुनियोंसे बार-बार कहने लगे कि हम सभी सदा भूखे एवं धर्मसे रहित रहते हैं। हम अपनी इच्छासे पापकर्म करनेवाले पापी नहीं बने हुए हैं, अपितु आपलोगोंकी अकृपा एवं अशोभन कर्मोंसे ही हमारा पक्ष बढ़ता रहता है; क्योंकि हम सभी ब्रह्मराक्षस हैं॥ ३०—३३॥
एवं वैश्याश्च शूद्राश्च क्षत्रियाश्च विकर्मभिः।<br>ये ब्राह्मणान् प्रद्विषन्ति ते भवन्तीह राक्षसाः॥ ३४<br><br>योषितां चैव पापानां योनिदोषेण वर्द्धते।<br>इयं संततिरस्माकं गतिरेषा सनातनी॥ ३५<br><br>शक्ता भवन्तः सर्वेषां लोकानामपि तारणे।<br>तेषां ते मुनयः श्रुत्वा कृपाशीलाः पुनश्च ते॥ ३६<br><br>ऊचुः परस्परं सर्वे तप्यमानाश्च ते द्विजाः।<br>क्षुत्कीटावपन्नं च यच्चोच्छिष्टाशितं भवेत्॥ ३७<br><br>केशावपन्नमाधूतं मारुतश्वासदूषितम्।<br>एभिः संसृष्टमन्नं च भागं वै रक्षसां भवेत्॥ ३८इसी प्रकार जो क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ब्राह्मणोंसे द्वेष करते हैं, वे (ऐसे ही) विकर्म करनेके कारण राक्षस हो जाते हैं। पापिनी स्त्रियोंके योनिदोषसे हमारी यह संतति बढ़ती रहती है। यह हमारी प्राचीन गति है। आपलोग सभी लोकोंका उद्धार करनेमें समर्थ हैं। (लोमहर्षणजी कहते हैं—) द्विजो! वे कृपालु मुनि उन सदाकी रीति ब्रह्मराक्षसोंके इन वचनोंको सुनकर बहुत दुःखी हुए और परस्पर परामर्शकर उनसे बोले—(ब्रह्मराक्षसो!) छींक तथा कीटके संसर्गसे दूषित, उच्छिष्ट भोजन, केशयुक्त, तिरस्कृत एवं श्वासवायुसे दूषित अन्न तुम राक्षसोंका भाग होगा॥ ३४—३८॥
तस्माज्ज्ञात्वा सदा विद्वान् अन्यान्येतानि वर्जयेत्।<br>राक्षसानामसौ भुङ्क्ते यो भुङ्क्तेऽन्नमीदृशम्॥ ३९<br><br>शोधयित्वा तु तत्तीर्थमृषयस्ते तपोधनाः।<br>मोक्षार्थं रक्षसां तेषां संगमं तत्र कल्पयन्॥ ४०<br><br>अरुणायाः सरस्वत्याः संगमे लोकविश्रुते।<br>त्रिरात्रोपोषितः स्नातो मुच्यते सर्वकिल्बिषैः॥ ४१<br><br>प्राप्ते कलियुगे घोरे अधर्मे प्रत्युपस्थिते।<br>अरुणासंगमे स्नात्वा मुक्तिमाप्नोति मानवः॥ ४२<br><br>ततस्ते राक्षसाः सर्वे स्नाताः पापविवर्जिताः।<br>दिव्यमाल्याम्बरधराः स्वर्गस्थितिसमन्विताः॥ ४३(पुनः लोमहर्षणजी बोले—) ऋषियो! इसको जानकर विद्वान् पुरुषको चाहिये कि इस प्रकारके अन्नोंको त्याग दे। इस प्रकार अन्न खानेवाला व्यक्ति राक्षसोंका भाग खाता है। उन तपोधन ऋषियोंने उस तीर्थको शुद्धकर उन राक्षसोंकी मुक्तिके लिये वहाँ एक सङ्गमकी रचना की। [उसका फल इस प्रकार है] लोक-प्रसिद्ध अरुणा और सरस्वतीके सङ्गममें तीन दिनोंतक व्रतपूर्वक स्नान करनेवाला (व्यक्ति) सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। (आगे भी) घोर कलियुग आनेपर तथा अधर्मका अधिक प्रसार हो जानेपर मनुष्य अरुणाके सङ्गममें स्नान करके मुक्ति प्राप्त कर लेंगे। इसको सुननेके बाद उन सभी राक्षसोंने उसमें स्नान किया और वे निष्पाप हो गये तथा दिव्य माला और वस्त्र धारणकर स्वर्गमें विराजने लगे॥ ३९—४३॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४०॥

१७८श्रीवामनपुराण[ अध्याय ४१

इकतालीसवाँ अध्याय

कुरुक्षेत्रके तीर्थों—शतसाहस्रिक, शतिक, रेणुका, ऋणमोचन, ओजस, संनिहति, प्राची सरस्वती, पञ्चवट, कुरुतीर्थ, अनरकतीर्थ, काम्यकवन आदिका वर्णन

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
लोमहर्षण उवाच<br>समुद्रास्तत्र चत्वारो दर्विणा आहृताः पुरा।<br>प्रत्येकं तु नरः स्नातो गोसहस्रफलं लभेत्॥ १<br>यत्किञ्चित् क्रियते तस्मिंस्तपस्तीर्थे द्विजोत्तमाः।<br>परिपूर्णं हि तत्सर्वमपि दुष्कृतकर्मणः॥ २<br>शतसाहस्रिकं तीर्थं तथैव शतिकं द्विजाः।<br>उभयोर्हि नरः स्नातो गोसहस्रफलं लभेत्॥ ३<br>सोमतीर्थं च तत्रापि सरस्वत्यास्तटे स्थितम्।<br>यस्मिन् स्नातस्तु पुरुषो राजसूयफलं लभेत्॥ ४लोमहर्षणने कहा— प्राचीन कालकी बात है महर्षि दर्वि वहाँ चार समुद्रोंको ले आये थे। उनमेंसे प्रत्येक समुद्रमें स्नान करनेसे मनुष्योंको हजार गोदान करनेका फल प्राप्त होता है। द्विजोत्तमो ! उस तीर्थमें जो तपस्या की जाती है, वह पापीद्वारा की गयी होनेपर भी सिद्ध हो जाती है। द्विजो ! वहाँ शतसाहस्रिक एवं शतिक नामके दो तीर्थ हैं। उन दोनों ही तीर्थोंमें स्नान करनेवाला मनुष्य हजार गौ-दान करनेका फल प्राप्त करता है। वहीं सरस्वतीके तटपर सोमतीर्थ भी स्थित है, जिसमें स्नान करनेसे पुरुष राजसूययज्ञका फल प्राप्त करता है॥ १—४॥
रेणुकाश्रममासाद्य श्रद्दधानो जितेन्द्रियः।<br>मातृभक्त्या च यत्पुण्यं तत्फलं प्राप्नुयान्नरः॥ ५<br>ऋणमोचनमासाद्य तीर्थं ब्रह्मनिषेवितम्।<br>ऋणैर्मुक्तो भवेन्नित्यं देवर्षिपितृसम्भवैः।<br>कुमारस्याभिषेकं च ओजसं नाम विश्रुतम्॥ ६<br>तस्मिन् स्नातस्तु पुरुषो यशसा च समन्वितः।<br>कुमारपुरमाप्नोति कृत्वा श्राद्धं तु मानवः॥ ७<br>चैत्रषष्ठ्यां सिते पक्षे यस्तु श्राद्धं करिष्यति।<br>गयाश्राद्धे च यत्पुण्यं तत्पुण्यं प्राप्नुयान्नरः॥ ८माताकी सेवा करनेसे जो पुण्य प्राप्त होता है, उस पुण्य-फलको इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त करनेवाला श्रद्धालु मनुष्य रेणुकातीर्थमें जाकर प्राप्त कर लेता है और ब्रह्माद्वारा सेवित ऋणमोचन नामके तीर्थमें जाकर देव-ऋण, ऋषि-ऋण और पितृ-ऋणसे छूट जाता है। कुमार (कार्तिकेय)-का अभिषेकस्थल ओजसनामसे विख्यात है; उस तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्य कीर्ति प्राप्त करता है और वहाँ श्राद्ध करनेसे उसे कार्तिकेयके लोककी प्राप्ति होती है। चैत्रमासकी शुक्ला षष्ठी तिथिमें जो मनुष्य वहाँ श्राद्ध करेगा, वह गयामें श्राद्ध करनेसे जो पुण्य प्राप्त होता है, उस पुण्यको प्राप्त करता है॥ ५—८॥
संनिहत्यां यथा श्राद्धं राहुग्रस्ते दिवाकरे।<br>तथा श्राद्धं तत्र कृतं नात्र कार्या विचारणा॥ ९<br>ओजसे ह्यक्षयं श्राद्धं वायुना कथितं पुरा।<br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन श्राद्धं तत्र समाचरेत्॥ १०<br>यस्तु स्नानं श्रद्दधानश्चैत्रषष्ठ्यां करिष्यति।<br>अक्षय्यमुदकं तस्य पितॄणामुपजायते॥ ११<br>तत्र पञ्चवटं नाम तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।<br>महादेवः स्थितो यत्र योगमूर्तिधरः स्वयम्॥ १२राहुद्वारा सूर्यके ग्रस्त हो जानेपर (सूर्यग्रहण लगनेपर) सन्निहतीतीर्थमें किये गये श्राद्धके समान वहाँका श्राद्ध पुण्यप्रद होता है; इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। पूर्वसमयमें वायुने कहा था कि ओजसतीर्थमें किये गये श्राद्धका क्षय नहीं होता है। इसलिये प्रयत्नपूर्वक वहाँ श्राद्ध करना चाहिये। चैत्रमासके शुक्लपक्षकी षष्ठी तिथिके दिन जो उसमें श्रद्धापूर्वक स्नान करेगा, उसके पितरोंको अक्षय (कभी भी क्षय न होनेवाले) जलकी प्राप्ति होगी। तीनों लोकोंमें विख्यात एक ‘पञ्चवट’ नामका तीर्थ है, जहाँ स्वयं भगवान् महादेव योगसाधना करनेकी मुद्रामें विराजमान हैं॥ ९—१२॥

अध्याय ४१ ] कुरुक्षेत्रके तीर्थोंका वर्णन १७९

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च देवदेवं महेश्वरम्।<br>गाणपत्यमवाप्नोति दैवतैः सह मोदते॥ १३<br>कुरुतीर्थं च विख्यातं कुरुणा यत्र वै तपः।<br>तप्तं सुघोरं क्षेत्रस्य कर्षणार्थं द्विजोत्तमाः॥ १४<br>तस्य घोरेण तपसा तुष्ट इन्द्रोऽब्रवीद् वचः।<br>राजर्षे परितुष्टोऽस्मि तपसाऽनेन सुव्रत॥ १५<br>यज्ञं ये च कुरुक्षेत्रे करिष्यन्ति शतक्रतोः।<br>ते गमिष्यन्ति सुकृताँल्लोकान् पापविवर्जितान्॥ १६<br>अवहस्य ततः शक्रो जगाम त्रिदिवं प्रभुः।<br>आगम्यागम्य चैवेनं भूयो भूयो वहस्य च॥ १७<br>शतक्रतुरनिर्विण्णः पृष्ट्वा पृष्ट्वा जगाम ह।<br>यदा तु तपसोग्रेण चकर्ष देहमात्मनः।<br>ततः शक्रोऽब्रवीत् प्रीत्या ब्रूहि यत्ते चिकीर्षितम्॥ १८उस (पञ्चवट) स्थानपर स्नान करके देवाधिदेव महादेवकी पूजा करनेवाला मनुष्य गणपतिपद और देवताओंके साथ आनन्द प्राप्त करता हुआ प्रसन्न रहता है। श्रेष्ठ द्विजो! 'कुरुतीर्थ' विख्यात तीर्थ है, जिसमें कुरुने कीर्तिकी प्राप्तिके लिये धर्मकी खेती करनेके लिये तपस्या की थी। उनकी घोर तपस्यासे प्रसन्न होकर इन्द्रने कहा—सुन्दर व्रतोंके करनेवाले राजर्षि! तुम्हारी इस तपस्यासे मैं संतुष्ट हूँ। (सुनो) इस कुरुक्षेत्रमें जो लोग इन्द्रका यज्ञ करेंगे, वे लोग पापरहित हो जायँगे और पवित्र लोकोंको प्राप्त होंगे। इतना कहकर इन्द्रदेव मुस्कराकर स्वर्ग चले गये। बिना खिन्न हुए इन्द्र बारंबार आये और उपहासपूर्वक उनसे (उनकी योजनाके सम्बन्धमें कुछ) पूछ-पूछकर चले गये। कुरुने जब उग्र तपस्याद्वारा अपनी देहका कर्षण किया तो इन्द्रने प्रेमपूर्वक उनसे कहा—'कुरु! तुम्हें जो कुछ करनेकी इच्छा हो उसे कहो'॥ १३-१८॥
कुरुरुवाच<br>ये श्रद्दधानास्तीर्थेऽस्मिन् मानवा निवसन्ति ह।<br>ते प्राप्नुवन्तु सदनं ब्राह्मणाः परमात्मनः॥ १९<br>अन्यत्र कृतपापा ये पञ्चपातकदूषिताः।<br>अस्मिंस्तीर्थे नराः स्नात्वा मुक्ता यान्तु परां गतिम्॥ २०<br>कुरुक्षेत्रे पुण्यतमं कुरुतीर्थं द्विजोत्तमाः।<br>तं दृष्ट्वा पापमुक्तस्तु परं पदमवाप्नुयात्॥ २१<br>कुरुतीर्थे नरः स्नातो मुक्तो भवति किल्बिषैः।<br>कुरुणा समनुज्ञातः प्राप्नोति परमं पदम्॥ २२कुरुने कहा— इन्द्रदेव! जो श्रद्धालु मानव इस तीर्थमें निवास करते हैं, वे परमात्मरूप परब्रह्मके लोकको प्राप्त करते हैं। इस स्थानसे अन्यत्र पाप करनेवालों एवं पञ्चपातकोंसे दूषित मनुष्य भी इस तीर्थमें स्नान करनेसे मुक्त होकर परमगतिको प्राप्त करता है। (लोमहर्षणने कहा—) श्रेष्ठ ब्राह्मणो! कुरुक्षेत्रमें कुरुतीर्थ सर्वाधिक पवित्र है। उसका दर्शन कर पापात्मा मनुष्य (भी) मोक्ष प्राप्त कर लेता है तथा कुरुतीर्थमें स्नानकर पापोंसे छूट जाता है एवं कुरुकी आज्ञासे परमपद (मोक्ष)-को प्राप्त करता है॥ १९-२२॥
स्वर्गद्वारं ततो गच्छेच्छिवद्वारे व्यवस्थितम्।<br>तत्र स्नात्वा शिवद्वारे प्राप्नोति परमं पदम्॥ २३<br>ततो गच्छेदनरकं तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।<br>यत्र पूर्वे स्थितो ब्रह्मा दक्षिणे तु महेश्वरः॥ २४<br>रुद्रपत्नी पश्चिमतः पद्मनाभोत्तरे स्थितः।<br>मध्ये अनरकं तीर्थं त्रैलोक्यस्यापि दुर्लभम्॥ २५फिर (कुरुतीर्थमें स्नान करनेके बाद) शिवद्वारमें स्थित स्वर्गद्वारको जाय (और स्नान करे); क्योंकि वहाँ (शिवद्वारमें) स्नान करनेसे मनुष्य परमपदको प्राप्त करता है। शिवद्वार जानेके पश्चात् तीनों लोकोंमें विख्यात अनरक नामके तीर्थमें जाय। उस अनरकके पूर्वमें ब्रह्मा, दक्षिणमें महेश्वर, पश्चिममें रुद्रपत्नी एवं उत्तरमें पद्मनाभ और इन सबके मध्यमें अनरक नामका तीर्थ स्थित है; वह तीनों लोकोंके लिये भी दुर्लभ है॥ २३-२५॥

४४- ऋषियोंसहित ब्रह्माजीका शंकरजीकी शरणमें जाना और स्तवन; स्थाण्वीश्वरप्रसङ्ग और हस्तिरूप शंकरकी स्तुति एवं लिङ्गमें संनिधान

१८०श्रीवामनपुराण[ अध्याय ४२

| यस्मिन् स्नातस्तु मुच्येत पातकैरुपपातकैः।<br>वैशाखे च यदा षष्ठी मङ्गलस्य दिनं भवेत्॥ २६<br><br>तदा स्नानं तत्र कृत्वा मुक्तो भवति पातकैः।<br>यः प्रयच्छेत करकांश्चतुरो भक्ष्यसंयुतान्॥ २७<br><br>कलशं च तथा दद्यादपूपैः परिशोभितम्।<br>देवताः प्रीणयेत् पूर्वं करकैरन्नसंयुतैः॥ २८<br><br>ततस्तु कलशं दद्यात् सर्वपातकनाशनम्।<br>अनेनैव विधानेन यस्तु स्नानं समाचरेत्॥ २९<br><br>स मुक्तः कलुषैः सर्वैः प्रयाति परमं पदम्।<br>अन्यत्रापि यदा षष्ठी मङ्गलेन भविष्यति॥ ३०<br><br>तत्रापि मुक्तिफलदा क्रिया तस्मिन् भविष्यति। | जिस (अनरकतीर्थ)-में स्नान करनेवाला मनुष्य छोटे-बड़े सभी पापोंसे छूट जाता है। जब वैशाखमासकी षष्ठी तिथिको मङ्गल दिन हो तब वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य पापोंसे छूट जाता है। (उस दिन) खाद्य पदार्थसे संयुक्त चार करक (करवे या कमण्डलु) एवं मालपुओं आदिसे सुशोभित कलशका दान करे। पहले अन्नसे युक्त करवोंसे देवताकी पूजा करे, फिर सम्पूर्ण पापोंके नाश करनेवाले कलशका दान करे। जो मानव इस विधानसे स्नान करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे छूट जायगा और परमपदको प्राप्त करेगा। इसके अतिरिक्त (वैशाखके सिवा) अन्य समयमें भी मङ्गलके दिन षष्ठी तिथि होनेपर उस तीर्थमें की हुई पूर्वोक्त क्रिया मुक्ति देनेवाली होगी॥ २६—३०॥ | | तीर्थे च सर्वतीर्थानां यस्मिन् स्नातो द्विजोत्तमाः॥ ३१<br><br>सर्वदेवैरनुज्ञातः परं पदमवाप्नुयात्।<br>काम्यकं च वनं पुण्यं सर्वपातकनाशनम्॥ ३२<br><br>यस्मिन् प्रविष्टमात्रस्तु मुक्तो भवति किल्बिषैः।<br>यमाश्रित्य वनं पुण्यं सविता प्रकटः स्थितः॥ ३३<br><br>पूषा नाम द्विजश्रेष्ठा दर्शनान्मुक्तिमाप्नुयात्।<br>आदित्यस्य दिने प्राप्ते तस्मिन् स्नातस्तु मानवः।<br>विशुद्धदेहो भवति मनसा चिन्तितं लभेत्॥ ३४ | श्रेष्ठ द्विजो ! वहीं समस्त पापोंका विनाश करनेवाला तीर्थ-शिरोमणि काम्यकवन नामका एक तीर्थ है। जो मनुष्य उसमें स्नान करता है, वह सभी देवोंकी अनुमतिसे परमपदको प्राप्त करता है। इस वनमें प्रवेश करनेसे ही मनुष्य अपने समस्त पापोंसे छूट जाता है। इस पवित्र वनमें पूषा नामके सूर्यभगवान् प्रत्यक्ष रूपसे स्थित हैं। द्विजश्रेष्ठो ! उन सूर्यभगवान्‌के दर्शनसे मुक्ति प्राप्त होती है। रविवारको उस तीर्थमें स्नान करनेवाला मनुष्य विशुद्ध-देह हो जाता है और अपने मनोरथको प्राप्त करता है॥ ३१—३४॥ |

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें इकतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४१॥


बयालीसवाँ अध्याय

काम्यकवन-तीर्थका प्रसङ्ग, सरस्वती नदीकी महिमा और तत्सम्बद्ध तीर्थोंका वर्णन

ऋषय ऊचुःऋषियोंने पूछा—
काम्यकस्य तु पूर्वेण कुञ्जं देवैर्निषेवितम्।<br>तस्य तीर्थस्य सम्भूतिं विस्तरेण ब्रवीहि नः॥ १(लोमहर्षणजी !) काम्यकवनके पूर्वमें स्थित कुञ्जका आश्रयण देवताओंने किया था, पर उस काम्यकवन-तीर्थकी उत्पत्ति कैसे हुई, इसे आप हमें विस्तारसे बतलाइये॥ १॥
लोमहर्षण उवाचलोमहर्षणजी बोले—
शृण्वन्तु मुनयः सर्वे तीर्थमाहात्म्यमुत्तमम्।<br>ऋषीणां चरितं श्रुत्वा मुक्तो भवति किल्बिषैः॥ २(उत्तर दिया) — मुनियो ! आप सभी लोग इस तीर्थके श्रेष्ठ माहात्म्यको सुनें। ऋषियोंके चरित्रको सुननेसे मनुष्य पापोंसे मुक्त हो जाता है।

अध्याय ४२] काम्यकवन-तीर्थका प्रसङ्ग, सरस्वती नदीकी महिमा और तत्सम्बद्ध तीर्थोंका वर्णन [१८१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नैमिषेयाश्च ऋषयः कुरुक्षेत्रे समागताः।<br>सरस्वत्यास्तु स्नानार्थं प्रवेशं ते न लेभिरे॥ ३<br><br>ततस्ते कल्पयामासुस्तीर्थं यज्ञोपवीतिकम्।<br>शेषास्तु मुनयस्तत्र न प्रवेशं हि लेभिरे॥ ४<br><br>रन्तुकस्याश्रमात्तावद् यावत्तीर्थं सचक्रकम्।<br>ब्राह्मणैः परिपूर्णं तु दृष्ट्वा देवी सरस्वती॥ ५<br><br>हितार्थं सर्वविप्राणां कृत्वा कुञ्जानि सा नदी।<br>प्रयाता पश्चिमं मार्गं सर्वभूतहिते स्थिता॥ ६(एक बारकी बात है—) नैमिषारण्यके निवासी ऋषि सरस्वती नदीमें स्नान करनेके लिये कुरुक्षेत्र आये। परंतु वे सरस्वतीमें स्नान करनेके लिये प्रवेश न पा सके। तब उन्होंने यज्ञोपवीतिक नामके एक तीर्थकी कल्पना कर ली। (पर फिर भी) शेष मुनिलोग उसमें भी प्रवेश न पा सके। सरस्वतीने देखा कि रन्तुक आश्रमसे सचक्रकतक जितने भी तीर्थस्थल हैं, वे सब-के-सब ब्राह्मणोंसे भर गये हैं। इसलिये सभी ब्राह्मणोंके कल्याणके लिये उस सरस्वती नदीने कुञ्ज बना दिया और सभी प्राणियोंकी भलाईमें तत्पर होकर वह पश्चिम मार्गको (पश्चिमवाहिनी बनकर) चल पड़ी॥ २—६॥
पूर्वप्रवाहे यः स्नाति गङ्गास्नानफलं लभेत्।<br>प्रवाहे दक्षिणे तस्या नर्मदा सरितां वरा॥ ७<br><br>पश्चिमे तु दिशाभागे यमुना संश्रिता नदी।<br>यदा उत्तरतो याति सिन्धुर्भवति सा नदी॥ ८<br><br>एवं दिशाप्रवाहेण याति पुण्या सरस्वती।<br>तस्यां स्नातः सर्वतीर्थे स्नातो भवति मानवः॥ ९जो मनुष्य सरस्वतीके पूर्वी प्रवाहमें स्नान करता है, उसे गङ्गामें स्नान करनेका फल प्राप्त होता है। उसके दक्षिणी प्रवाहमें सरिताओंमें श्रेष्ठ नर्मदा एवं पश्चिम दिशाकी ओर यमुना नदी संश्रित है। किंतु जब वह उत्तर दिशाकी ओर बहने लगती है तो वह सिन्धु हो जाती है। इस प्रकार विभिन्न दिशाओंमें वह पवित्र सरस्वती नदी (भिन्न-भिन्न रूपोंमें) प्रवाहित होती है। उस सरस्वती नदीमें स्नान करनेवाला मनुष्य मानो सभी तीर्थोंमें स्नान कर लेता है। द्विजश्रेष्ठो! सरस्वती नदीमें स्नान करनेके बाद तीर्थसेवीको तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध महात्मा मदनके 'विहार' नामक तीर्थमें जाना चाहिये॥ ७—१०॥
ततो गच्छेद् द्विजश्रेष्ठा मदनस्य महात्मनः।<br>तीर्थं त्रैलोक्यविख्यातं विहारं नाम नामतः॥ १०<br><br>यत्र देवाः समागम्य शिवदर्शनकाङ्क्षिणः।<br>समागता न चापश्यन् देवं देव्या समन्वितम्॥ ११<br><br>ते स्तुवन्तो महादेवं नन्दिनं गणनायकम्।<br>ततः प्रसन्नो नन्दीशः कथयामास चेष्टितम्॥ १२<br><br>भवस्य उमया सार्धं विहारे क्रीडितं महत्।<br>तच्छ्रुत्वा देवतास्तत्र पत्नीराहूय क्रीडिताः॥ १३<br><br>तेषां क्रीडाविनोदेन तुष्टः प्रोवाच शंकरः।<br>योऽस्मिंस्तीर्थे नरः स्नाति विहारे श्रद्धयान्वितः॥ १४<br><br>धनधान्यप्रियैर्युक्तो भवते नात्र संशयः।<br>दुर्गातीर्थं ततो गच्छेद् दुर्गया सेवितं महत्॥ १५जहाँपर भगवान् शिवके दर्शनाभिलाषी देवता आये, पर वे उमासहित शिवका दर्शन न कर पाये। वे लोग गणनायक महादेव नन्दीकी स्तुति करने लगे। इससे नन्दीश्वर प्रसन्न हो गये और (उन्होंने) उमाके साथ की जा रही शिवकी महती विहार-क्रीडाका वर्णन किया। यह सुनकर देवताओंने भी अपनी पत्नियोंको बुलाया और उनके साथ (उन लोगोंने भी) क्रीडा की। उनके क्रीडा-विनोदसे शंकर प्रसन्न हो गये और बोले—इस विहार-तीर्थमें जो श्रद्धाके साथ स्नान करेगा, वह निःसंदेह धन-धान्य एवं प्रिय सम्बन्धियोंसे सम्पन्न होगा। उमा-शिवके विहार-स्थलकी यात्राके बाद दुर्गासे प्रतिष्ठित उस महान् दुर्गातीर्थमें जाना चाहिये॥ ११—१५॥
यत्र स्नात्वा पितॄन् पूज्य न दुर्गतिमवाप्नुयात्।<br><br>तत्रापि च सरस्वत्याः कूपं त्रैलोक्यविश्रुतम्॥ १६जहाँ स्नानकर पितरोंकी पूजा करनेसे मनुष्यको दुर्गति की प्राप्ति नहीं होती। उसी स्थानपर तीनों लोकोंमें