वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
२२८ वेदान्तपरिभाषा [ प्रकारान्तरेण लक्षणा त्रिविधा
अब अजहल्लक्षणा के स्वरूप को बताते हैं—
यत्र शक्यार्थमन्तर्भाव्यैवार्थान्तर-प्रतीतिस्तत्राजहल्लक्षणा,१ यथा शुक्लो घट इति । अत्र हि शुक्लशब्दः स्वार्थं शुक्लगुणमन्तर्भाव्यैव तद्वति द्रव्ये लक्षणया वर्तते ।
जहाँ पर शक्यार्थ का अन्तर्भाव करके ही अन्य (लक्ष्य) अर्थ की प्रतीति होती है, वहाँ पर (वाच्यार्थ का त्याग न किया होने से) अजहल्लक्षणा होती है। जैसे—'शुक्लो घटः' इस वाक्य में शुक्ल शब्द, अपने 'शुक्लगुण' रूप स्वार्थ (वाच्यार्थ) का शुक्लगुणविशिष्ट द्रव्यरूप लक्ष्यार्थ में अन्तर्भाव करके ही शुक्लगुणवान् द्रव्य (घट) रूप अर्थ में लक्षणावृत्ति से रहता है अर्थात् उपर्युक्त अर्थ का बोधन करता है, इसलिए यह अजहल्लक्षणा का उदाहरण है।
विवरण—लक्षणा से प्रतीत होनेवाले लक्ष्यार्थ में वाच्यार्थ भी जब अन्तर्भूत होता है तब उस लक्षणा को अजहल्लक्षणा कहते हैं। शक्यार्थविशिष्टविषया-वृत्तिरजहल्लक्षणा' शक्यार्थ से (वाच्यार्थ से) विशिष्ट विषय को विषय करने वाली वृत्ति को अजहल्लक्षणा कहते हैं। क्योंकि—अजहल्लक्षणा में 'गङ्गायां घोषः' या 'विषं भुङ्क्ष्व' आदि जहल्लक्षणा के उदाहरणों में वाच्यार्थ का सर्वथा त्याग करना पड़ता है वैसा इसमें वाच्यार्थ का सर्वथा त्याग नहीं करना पड़ता। जैसे—'शुक्लो-घटः' में शुक्ल शब्द शुक्लगुण का वाचक है अर्थात् शुक्ल (शुभ्र) वर्ण उसका वाच्यार्थ है। वह गुण होने से 'घट' अर्थात् द्रव्य नहीं है यह स्पष्ट है। इस कारण शुक्ल शब्द के वाच्यार्थ की वाक्य में—उपपत्ति न लग सकने से (अनुपपत्ति होने से) उस शब्द की शुक्लगुण के साथ नित्यसम्बद्ध रहने वाले 'शुक्लगुणवान् घट' रूप अर्थ में लक्षणा माननी पड़ती है। किन्तु लक्षणा के स्वीकार करने पर भी शुक्लगुण रूप वाच्यार्थ की सर्वथा अप्रतीति नहीं होती। क्योंकि शुक्लगुणविशिष्ट घट का ज्ञान 'शुक्ल गुण' रूप विशेषण के ज्ञान के बिना सम्भव नहीं है इसलिए यह अजहल्लक्षणा का उदाहरण है। इसी प्रकार 'रक्तो धावति' वाक्य में रक्त शब्द की 'रक्तगुणविशिष्ट अश्व' रूप अर्थ में वृत्ति स्वीकार कर 'लाल घोड़ा दौड़ता है' अर्थ की प्रतीति अजहल्लक्षणा से ही होती है।
अब तीसरी जहदजहल्लक्षणा का लक्षण और उदाहरण बताते हैं—
यत्र हि विशिष्ट-वाचकः शब्दः २एकदेशं विहाय एकदेशे वर्तते
१. शक्यार्थविशिष्टविषया वृत्तिः अजहल्लक्षणेत्यर्थः ।
२. 'स्वार्थैक'—इति पाठान्तरम् ।
प्रकारान्तरेण लक्षणा त्रिविधा ] आगमपरिच्छेदः २२९
तत्र जहदजहल्लक्षणा¹, यथा सोऽयं देवदत्त इति । अत्र हि पदद्वय- वाच्ययोर्विशिष्टयोरैक्यानुपपत्त्या पदद्वयस्य विशेष्यमात्रपरत्वम् । यथा वा तत्त्वमसीत्यादौ तत् पद-वाच्यस्य सर्वज्ञत्वादिविशिष्टस्य त्वंपद- वाच्येनान्तःकरण-विशिष्टेनैक्यायोगादैक्यसिद्धयर्थं स्वरूपे लक्षणेति साम्प्रदायिकाः ।
अर्थ— जिस वाक्य में विशिष्ट वाचक शब्द अपने विशेषणरूप एकदेश को ( एक अंश को ) छोड़कर विशेष्यरूप एक अंश का बोधक होता है, वहाँ जहदजहल्लक्षणा होती है । जैसे—'सोऽयं देवदत्तः'—वह यह देवदत्त—इस वाक्य में 'वह' पद का 'तत्कालविशिष्ट' और 'यह' पद का 'एतत्कालविशिष्ट' अर्थ है । परन्तु 'देवदत्त' परोक्ष और अपरोक्षरूप विरुद्ध उभय कालों से विशिष्ट होकर एक ही समय में स्थित नहीं हो सकता । इसलिये 'वह' और 'यह' दोनों पद केवल देवदत्त रूप विशेष्य अर्थ के ही बोधक हैं अर्थात् दोनों पद केवल विशेष्यपरक हैं । स्वार्थपरक ( वाच्यार्थपरक ) नहीं हैं । इसलिये यह जहदजहल्लक्षणा का उदाहरण है । अथवा 'तत् त्वमसि'—वह ब्रह्म तू है—आदि अभेदबोधक वाक्यों में 'तत्' पद का वाच्य सर्वज्ञत्वादिविशिष्ट चैतन्य के साथ ऐक्य का संभव नहीं हो सकता । अतः चैतन्यों की एकता के लिये स्वरूप में ( शुद्ध चैतन्य में ) उनकी लक्षणा करनी पड़ती है ऐसा साम्प्रदायिक ( प्राचीन वेदान्ती ) कहते हैं ।
विवरण— व्यवहार में 'सोऽयं देवदत्तः' कहा जाता है । इस वाक्य का वाच्यार्थ है 'वह यह देवदत्त' । इसमें 'सः'—वह शब्द का वाच्यार्थ है 'पूर्वकाल में स्थित' अर्थात् वर्तमान में जिसका प्रत्यक्ष न हो । और 'अयम्'—यह शब्द का वाच्यार्थ है, जिसको उंगली से निर्देश कर सकें, ऐसा वर्तमान काल में स्थित व्यक्ति । तत्कालीन देवदत्त तत्काल से विशिष्ट होने से परोक्ष और एतत्कालीन देवदत्त, इस काल से युक्त होने से अपरोक्ष ( प्रत्यक्ष ) है । किन्तु एक ही देवदत्त का एक ही काल में, उस काल से और इस काल से विशिष्ट रहना सम्भव नहीं । क्योंकि परोक्षत्व और अपरोक्षत्व दोनों धर्म परस्पर विरुद्ध हैं । इस कारण पूर्वोक्त वाक्य से तथाकथित विरुद्ध धर्मों से युक्त देवदत्त का ऐक्य संभवनीय नहीं । किन्तु वह वाक्य ( सोऽयं देवदत्तः ) तत्कालविशिष्ट और एतत्कालविशिष्ट देवदत्त, एक ही है, भिन्न नहीं है—इस उद्देश्य से ही यह वाक्य कहा गया है । इस कारण जहाँ ऐसे विशिष्टों का ऐक्य सम्भव न हो वहाँ उनके विशेषणों का त्याग कर केवल विशेष्य ही दोनों पदों का अर्थ स्वीकृत किया जाता है । ऐसी लक्षणा को ही 'जहदजहल्लक्षणा' या 'भागत्यागलक्षणा' कहते हैं । इसमें विशेषण और
१. शक्यैकदेशमात्रवृत्तिः जहदजहल्लक्षणेत्यर्थः ।
२३० वेदान्तपरिभाषा [ सोऽयं देवदत्तः इत्यत्र स्वमतम्
विशेष्यवाचक पदों में से 'विशेषण' के भाग ( अंश ) को त्याग कर 'विशेष्य' भाग का ग्रहण किया जाता है इसलिए इस वृत्ति को भागत्याग या जहदजहल्लक्षणा कहना सर्वथा योग्य है । प्राचीन वेदान्तियों ने अभेदबोधक महावाक्यों का अर्थ लगाने के लिए इस लक्षणा को स्वीकार किया है । परन्तु वेदान्तपरिभाषाकार—श्रीधर्मराजाध्वरीन्द्र को यह साम्प्रदायिक मत मान्य नहीं है—यह अग्रिम ग्रन्थ से ही स्पष्ट होगा । तथापि उन्होंने सम्प्रदाय का अनुसरण कर 'तत्त्वमसि' इत्यादि महावाक्यों में इस लक्षणा के लक्षण को घटित कर दिखाया है । 'तत्' का अर्थ है सर्वज्ञत्वादिधर्मों से विशिष्ट ईश्वरचैतन्य, और 'त्वम्' का अर्थ है अन्तःकरणोपाधिविशिष्ट अल्पज्ञ चैतन्य । इनका अभेद ( ऐक्य ) होना सम्भव नहीं । क्योंकि मायोपाधिक जो सर्वज्ञ ईश्वर है वह अल्पज्ञ जीव कैसे हो सकेगा ? अर्थात् इस वाच्यार्थ का असंभव होने पर लक्षणा स्वीकार करनी पड़ती है । परन्तु पहले की तरह जहत् और अजहत् लक्षणाओं का लक्षण इसमें घटित न हो सकने से इस वाक्य में उनका ग्रहण नहीं किया जा सकता । क्योंकि उन शब्दों के वाच्यार्थ का त्याग पर चैतन्यरूप विशेष्यांश का भी त्याग करना पड़ता है, और उसके करने पर उस वाक्य का श्रुति को विवक्षित अभेदार्थ नहीं बन पाता और अजहल्लक्षणा के न्याय से वाच्यार्थ सर्वथा त्याग न करने पर भी विवक्षित ऐक्य का असंभव ही रहता है । अतः पूर्वोक्त दोनों लक्षणाओं से भिन्न ऐसी तीसरी जहदजहल्लक्षणा का ही स्वीकार करना पड़ता है । अर्थात् तत्पद के वाच्यार्थ में से सर्वज्ञत्वादि और त्वं पद के वाच्यार्थ में से किंचिज्ज्ञत्वादिरूप औपाधिक विशेषणों का त्याग कर केवल विशेष्यभूत चैतन्य अर्थ को ही दोनों पदों में से स्वीकार करना पड़ता है । इस कारण श्रुतिविवक्षित चैतन्याभेदरूप अर्थ सिद्ध होता है ।
इस प्रकार साम्प्रदायिक मत को बताकर अब अपने मत के अनुसार 'सोऽयं देवदत्तः' 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों के अभेदार्थरूप वाक्यार्थ की उपपत्ति बताते हैं—
'वयन्तु ब्रूमः—सोऽयं देवदत्तः, तत्त्वमसीत्यादौ विशिष्टवाचकपदानामेकदेशपरत्वेऽपि न लक्षणा, शक्त्युपस्थितयोर्विशिष्टयोरभेदान्वयानुपपत्तौ विशेष्ययोः शक्त्युपस्थितयोरेवाभेदान्वयाऽविरोधात् ।
१. साम्प्रदायिकाः सर्वज्ञात्मपादादयो भागत्यागलक्षणामपादादयो भागत्यागलक्षणमाश्रित्य शुद्धचैतन्यस्वरूपे 'तत्-त्वम्' पदयोर्लक्षणेति वदन्ति । किन्तु ग्रन्थकारायैतन्नरोचत इति 'वयन्तु' इत्यनेन सूच्यते । यतः 'शक्त्यैव तात्पर्यविषयप्रतीत्युपपत्तौ लक्षणाश्रयणमन्याय्यम्' । तथा चोक्तमद्वैतसिद्धौ प्रत्यक्षस्य आगमबाध्यत्वप्रकरणे—"'सोऽयं देवदत्तः' इत्यादिवाक्य इव शक्यैकदेशस्य अन्वयाभ्युपगमात्, विशेषणबाधेन विशेष्यमात्रान्वयस्यैव अत्र लक्षणाशब्देन व्यपदेशात्" ।
सोऽयं देवदत्तः इत्यत्र स्वमतम् ] आगमपरिच्छेदः २३१
यथा घटोऽनित्य इत्यत्र घटपदवाच्यैकदेशघटत्वस्यायोग्यत्वेऽपि योग्यघटव्यक्त्या सहानित्यत्वान्वयः।
अर्थ— इस विषय में हम तो ऐसा कहते हैं—'वही यह देवदत्त' 'वह ब्रह्म तू है' आदि वाक्यों में 'सः' 'अयम्' 'तत्' और 'त्वम्' ये विशिष्टवाचक पद यद्यपि विशेष्य के एकदेश के ही बोधक हैं तथापि उस बोध के लिये उन पदों की विशेष्यांश में लक्षणा करने की आवश्यकता नहीं। क्योंकि शक्ति-वृत्ति से उपस्थित (ज्ञात) हुए तत्काल-तया एतत्काल से विशिष्ट देवदत्त के अभेदान्वयरूप अर्थ की अनुपपत्ति रहने पर भी शक्तिवृत्ति से ही उपस्थित हुए विशेष्यों का अभेदान्वय करने में किसी प्रकार का विरोध नहीं है। यथा—'घट अनित्य है' इस वाक्य में 'घट' पद के 'घटत्व जाति-विशिष्ट घट' रूप वाच्यार्थ का एकदेश (विशेषणांश) यद्यपि-अनित्यत्व के साथ अन्वित होने के योग्य नहीं है, तथापि अन्वययोग्य घटव्यक्तिरूप विशेष्यांश के साथ उसका अन्वय हो सकता है। तात्पर्य यह है कि—हम 'घट' व्यक्ति को ही अनित्य समझते हैं 'घटत्व' जाति को नहीं—यह ज्ञान-शक्ति से ही होता है। अतः यहाँ लक्षणा मानने की आवश्यकता नहीं है।
विवरण— ग्रन्थकार ने 'घट' पद की शक्ति 'घटत्वजातिविशिष्ट घट' रूप अर्थ में गृहीत कर अपना मत प्रतिपादन किया है। 'शब्द' की 'विशिष्ट' में शक्ति होती है—ऐसा मानने पर घट पद की 'घटत्व' जाति रूप अर्थ में शक्ति जैसी है तद्वत् वह 'घट व्यक्ति' रूप अर्थ में भी है—यह सिद्ध होता है। इसलिये जहां पर विशिष्टपदार्थान्वय का बाध होता हो, वहाँ जिस अंश का बाध नहीं हो रहा है उसी अंश में उस शब्द का पर्यवसान मानना चाहिये। क्योंकि जितने अंश में शक्ति रहती है उस सम्पूर्ण अंश का शाब्द बोध में भान होना ही चाहिये यह कोई नियम नहीं है। 'आकाश' शब्द की शब्दाश्रयत्वविशिष्ट आकाश पदार्थ में शक्ति है, इसलिये 'आकाश है' ऐसा कहने पर शब्दाश्रयत्व का बोध जैसे तात्पर्य का विषय नहीं होता उसी तरह विशिष्टवाचकपदों का पर्यवसान एकदेश में मानने पर भी मुख्यवृत्ति से ही 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों की अखण्डार्थत्व (ऐक्यार्थत्व) उपपन्न होता है। अतः उसके निमित्त लक्षणा मानने का आवश्यकता नहीं।
अन्य दार्शनिकों ने भी ऐसा ही माना है। 'घट अनित्य है' इस वाक्य में 'घट' पद का 'घटत्व-विशिष्ट घट' वाच्यार्थ है। परन्तु 'घटत्व' और 'घट' दोनों से भी अनित्यत्व का अन्वय होना संभव नहीं। क्योंकि 'घटत्व' जाति होने से उनके मतानुसार वह नित्य है। हमारे मत में भी उसे व्यावहारिक नित्यत्व तो है ही। इसलिये नैयायिक यहाँ पर वाच्य के एकदेश रूप विशेष्यांश घट के साथ ही अनित्यत्व का अन्वय स्वीकार करते हैं और 'घटव्यक्ति अनित्य है' यही उपर्युक्त वाक्य का अर्थ करते हैं। यहाँ यह बोध शक्ति से ही होता है। इसलिये लक्षणा नहीं स्वीकार करनी पड़ती।
२३२ वेदान्तपरिभाषा [ सोऽयं देवदत्तः इत्यत्र स्वमतम्
शंका—ऐसा मानने पर 'घट नित्य है' इस वाक्य में घटरूप विशेष्यांश का नित्यत्व के साथ अन्वय जब बाधित होता है तब उसका घटत्व रूप विशेषणांश में पर्यवसान भी मुख्यवृत्ति से ही होने लगेगा, जिससे 'यह बोध लक्षणा से ही होता है' इस प्रमाणिक व्यवहार का बाध होगा—इस शंका के समाधानार्थ ग्रन्थकार कहते हैं—
यत्र पदार्थैकदेशस्य विशेषणतयोपस्थितिः, तत्रैव स्वातन्त्र्येणोपस्थितये लक्षणाऽभ्युपगमः। यथा घटो नित्य इत्यत्र घटपदाद्घटत्वस्य शक्त्या स्वातन्त्र्येणानुपस्थित्या तादृशोपस्थित्यर्थं घटपदस्य घटत्वे लक्षणा।
अर्थ—जिस वाक्य में पदार्थ के एकदेश की (एक अंश की) विशेषण रूप से उपस्थिति हो वहीं पर उसकी (केवल विशेषण की) स्वतंत्रताया उपस्थिति होने के लिये लक्षणा का अभ्युपगम (स्वीकार) करना पड़ता है। जैसे—'घट नित्य है' इस वाक्य में 'घट' पद से शक्तिवृत्ति के द्वारा केवल घटत्व की स्वतंत्रताया उपस्थिति (ज्ञान) नहीं होती, इसलिये वैसी (विशेषण रूप घटत्व की) उपस्थिति होने के लिये घट पद की घटत्वरूप अर्थ में लक्षणा का स्वीकार करना पड़ता है।
विवरण—शक्ति प्रधानतया विशेष्य में रहती है, इसलिये उसका (विशेष्य का) स्वतंत्रताया (केवल व्यक्ति के रूप से) होने वाला बोध, शक्तिवृत्ति से ही हो सकता है, इसलिये वहाँ लक्षणा की आवश्यकता नहीं पड़ती। परन्तु विशेषण में गौणता रहती है, इसलिये जिस वाक्य में स्वतंत्रताया (विशेष्य की अपेक्षा न करते हुए) केवल गुणभूत विशेषण से ही पदार्थ का अन्वय होना होता है, उस वाक्य में उस विशेषण रूप अंश की ही उपस्थिति के लिये लक्षणा अवश्य स्वीकार करनी चाहिये। जैसे 'घट नित्य है' कहने पर घट पद से विशेषण और विशेष्य (घटत्व और घटत्वावच्छिन्न घट व्यक्ति) के साथ परस्पर संबद्ध दोनों अर्थों की उपस्थिति का संभव होने पर भी घटव्यक्ति रूप विशेष्यांश से नित्यत्व का अन्वय हो नहीं सकता। क्योंकि घटव्यक्ति के नित्य न होने से विशेष्यरूप अंशके साथ नित्यत्व का अन्वय-बोध न होकर केवल विशेषणीभूत घटत्व रूप एकदेश के ही साथ नित्यत्व अन्वित होता है, इस प्रकार की उपस्थिति के लिये घट पद की घटत्वरूप अर्थ में लक्षणा ही माननी पड़ती है। क्योंकि पदार्थ, पदार्थ के साथ ही अन्वित होता है। 'पदजन्य पदार्थ की प्रतीति में शक्तिवृत्ति के द्वारा विशेष्य-भूत अंश के ही साथ पदार्थ का अन्वय होता है, उसके एकदेश के साथ पदार्थ अन्वित नहीं होता' यह नियम होने से 'घट' पद से विशेष्य-निरपेक्ष 'घटत्व' इस विशेषणरूप अंश की उपस्थिति लक्षण के बिना नहीं हो पाती। अतः ऐसे स्थल पर लक्षणा माननी ही पड़ती है।
इस प्रकार विशिष्टवाचक पद से केवल विशेष्य की उपस्थिति होने के लिए लक्षणा को स्वीकार करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। वहाँ तो केवल विशेषण की उपस्थिति
महावाक्यलक्षणाखण्डनम् ] आगमपरिच्छेदः २३३
के लिये लक्षणा माननी पड़ती है यह नियम बताया गया । अब उसी नियम को प्रकृत 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों में लगाकर वहाँ भी लक्षणा के बिना ही अखण्डार्थ की उपपत्ति को बताते हैं—
एवमेव तत्त्वमसीत्यादिवाक्येऽपि न लक्षणा । शक्त्या स्वातन्त्र्ये- णोपस्थितयोस्तत्त्वम्पदार्थयोरभेदान्वये बाधकाभावात् । अन्यथा गेहे घटो, घटे रूपं, घटमानयेत्यादौ घटत्वगेहत्वादेरभिमतान्वयबोधायोग्य- तया तत्रापि घटादिपदानां विशेष्यमात्रपरत्वं लक्षणयैव स्यात् । तस्मात्तत्त्वमसीत्यादिवाक्येषु आचार्याणां लक्षणोक्तिरभ्युपगमवादेन बोध्या ।
**अर्थ—**इसी न्याय के अनुसार 'तत्त्वमसि' इत्यादि प्रकृत वाक्यों में भी लक्षणा करने की आवश्यकता नहीं है । क्योंकि शक्तिवृत्ति के द्वारा, स्वतंत्रतया ( सर्वज्ञत्वादि विशेषणों की अपेक्षा न करते हुए केवल विशेष्यरूप से ) चैतन्यरूप से उपस्थित होने वाले 'तत्' और 'त्वम्' पदार्थों का अभेद से अन्वय होने में कोई भी बाधक नहीं है । अन्यथा ( ऐसे स्थल पर यदि लक्षणा को न माने ) 'घर में घट है' 'घट में रूप है' 'घट लाओ' आदि वाक्यों में भी घटत्व, गेहत्व आदि धर्मों में गृहादि पदार्थरूप अंशों में अभिमत अन्वय-बोध करा देने की योग्यता न होने से वहाँ पर भी घटादिपदों का केवल विशेष्यपरत्व लक्षणा से ही होने लगेगा । तस्मात् पूर्वाचार्यों ने 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों में जहदजहल्लक्षणा का अभ्युपगमवाद से स्वीकार किया है, ऐसा समझना चाहिये ।
**विवरण—**उपर्युक्त नियम मानने पर विशिष्टवाचक पदों से केवल विशेष्य का ज्ञान होने के लिये लक्षणा का स्वीकार करने की आवश्यकता नहीं, यह सिद्ध होता है । इसी प्रकार 'तत्त्वमसि' आदि अभेदार्थक वाक्यों में भी लक्षणारूप गौण वृत्ति को नहीं मानना पड़ता । क्योंकि 'तत्' पद से सर्वज्ञत्वविशिष्ट चैतन्य और 'त्वम्' पद से अल्पज्ञत्व विशिष्ट चैतन्यरूप विशिष्ट अर्थों के उपस्थित होने पर भी तथा उनका भेदान्वय बाधित होने पर भी वे पद जहदजहल्लक्षणा के द्वारा शुद्ध ( सर्वज्ञत्वादिविशेषरहित ) चैतन्य के बोधक होते हैं' यह आप का मन्तव्य ( केवल विशेष्यमात्र की उपस्थिति ) तो ऊपर बताये नियम से ही हो सकता है । तब लक्षणारूप गौण वृत्ति को मानने की आवश्यकता नहीं होती ।
**शंका—**घट आदि पद स्वाभाविक रूप से ही घटत्वादि विशेषण और घटादि विशेष्य दोनों के बोधक होते हैं अर्थात् उनकी शक्ति उन दोनों में होती है, इसलिये जहाँ पर उनमें से एक ही की उपस्थिति होती हो वहाँ वह एकदेश, उन पदों का वाच्यार्थ है, यह नहीं कहा जा सकता । इसलिये 'घट नित्य है' इत्यादि वाक्यों में केवल विशेषण का
२३४ वेदान्तपरिभाषा [ महावाक्यलक्षणाखण्डनम्
ज्ञान होने के लिये आप को वहाँ पर जैसी लक्षणा माननी पड़ती है, वैसे ही 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्यों में भी उसे मानना पड़ता है, तब यहाँ लक्षणा की आवश्यकता नहीं है' यह आप कैसे कहते हैं ?
समा०—ग्रन्थकार ने इस शंका का निराकरण 'अन्यथा०' इत्यादि वाक्य से किया है। विशेषण के समान केवल विशेष्य का बोध भी लक्षणा से ही होता है, ऐसा मानने पर 'घर में घट है' इस वाक्य में गृहत्वविशिष्ट गृह इस प्रकार के विशिष्टार्थ-बोधक 'गृह' पद से केवल 'गृह' रूप विशेष्यांश का बोध होने के लिये ऐसे वाक्य में भी लक्षणा का स्वीकार करना पड़ेगा। क्योंकि यहाँ पर भी वाच्यैकदेशभूत घटत्वरूप अर्थ के साथ 'गृह' पदार्थ का आधेयता-सम्बन्ध से अन्वय का होना असंभव है। क्योंकि गृह में घटत्व नहीं रहता। उसी प्रकार घट गृह में रहता है, वह गृहत्व जाति में नहीं रह सकता। वैसे ही घट में रूप है' इस वाक्य का घटत्वविशिष्ट घट में अर्थात् घटत्व और घट इन दोनों में रूप है—यह अर्थ उपपन्न नहीं होता, क्योंकि रूप घट में रहता है, उसका घटत्व-जाति में होना संभव नहीं। इसलिये घटत्व का रूप के साथ आधेयता-सम्बन्ध से अभिलषित अन्वय हो नहीं सकता। इसलिये इस वाक्य से 'घट में रूप है' इत्याकारक जो बोध होता है वह भी लक्षणा से ही होता है—कहना पड़ेगा। इसी प्रकार 'गाय को लाओ' इस वाक्य में 'गो' इस विशिष्ट पद की भी केवल 'गो' इस अर्थ में लक्षणा मानकर ही विशेष्य का आनयन ( लाना ) क्रिया में अन्वय होता है—कहना होगा, क्योंकि वहाँ भी वाच्यैकदेशरूप ( विशेषणरूप ) अमूर्त गोत्व का आनयन क्रिया में कर्मत्वरूप से अन्वित होना संभव नहीं है।
इस पर—'गेहे घट:' आदि वाक्यों में हम लक्षणा मानते हैं उसमें क्या बाधक है—यदि कहें तो यह उचित न होगा। क्योंकि 'प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति' प्राधान्य से सब व्यवहार हुआ करते हैं, इस नियम के अनुसार उस वाक्य के वाच्यार्थ का प्रधानभूत एकदेशरूप विशेष्य की उपस्थिति होने पर वह अर्थ शक्य ( वाच्य ) है, यही मानना उचित है। वाक्य में विशेषण की प्रधानता न होने से विशेष्यरहित विशेषण का ज्ञान लक्षणा के बिना हो नहीं सकता। इसलिये केवल विशेषणरूप अंश में लक्षणा को अवश्य मानना पड़ता है। क्योंकि 'घट पद का घटत्व वाच्य है' ऐसा प्राधान्य से व्यवहार नहीं होता, इसलिये 'पदार्थ: पदार्थेनान्वेति न तु तदेकदेशेन' यह नियम भी विशेषण-विषयक ही है, ऐसा समझना चाहिये, अर्थात् विशेषण के साथ पदार्थ का अन्वय न होकर विशेष्य के ही साथ होता है, यह उस नियम का अर्थ समझना चाहिये।
शंका—परन्तु ऐसा कहने पर वाक्यवृत्ति, पंचदशी आदि पूर्वाचार्यकृत वेदान्त-ग्रन्थों के साथ विरोध होता है, क्योंकि 'तत्त्वमस्यादिवाक्येषु लक्षणा भागलक्षणा' 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों में भागलक्षणारूप लक्षणा माननी पड़ती है, इस कहने से विरोध होता है, उसका परिहार किस प्रकार से होगा ?
जहदजहल्लक्षणाया उदाहरणम् ] आगमपरिच्छेदः १३५
समाधान—श्रीमदाचार्य ने तथा विद्यारण्य आदिकों ने 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों में जो भागलक्षणा मानी है, वह पूर्वपरम्परा का अनुसरण कर मानी है । वस्तुतः उन्हें भी वैसी लक्षणा मानने की आवश्यकता नहीं थी ।
इस पर यदि कोई ऐसा कहें कि 'तत्त्वमसि' आदि वाक्य में अभेदान्वय की उपपत्ति लगाने के लिये ही यह तीसरा प्रकार अर्थात् 'जहदजहल्लक्षणा' माना गया है । यदि आप के कथनानुसार इस वाक्य में भी उसका उपयोग न हो तो 'लक्षणा त्रिविधा' इस प्रकार लक्षणा के तीन प्रकार बताने का क्या उपयोग होगा ? इस प्रश्न पर ग्रन्थकार कहते हैं-
जहदजहल्लक्षणोदाहरणं तु--काकेभ्यो दधि रक्ष्यतामित्याद्येव । तत्र शक्यकाकपरित्यागेनाशक्यदध्युपघातकत्वपुरस्कारेण काकेऽ-काकेऽपि काकशब्दस्य प्रवृत्तेः ।
अर्थ—'कौओं से दही की रक्षा की जाय' इत्यादि वाक्य ही जहदजहल्लक्षणा के उदाहरण हैं । क्योंकि ऐसे वाक्यों में 'काक' शब्द के वाच्यार्थ (काकत्वविशिष्टकाक) का परित्याग कर और अशक्यार्थ (अवाच्य लक्ष्यार्थ-दध्युपघातकत्व) का पुरस्कार कर 'काक' शब्द की काक तथा अकाक (काकभिन्न अर्थात् दधि को दूषित करने वाले मार्जारादि प्राणी) अर्थ में प्रवृत्ति है । (इसलिये यह जहदजहल्लक्षणा का उदाहरण है।)
विवरण—'काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम्' यह जहदजहल्लक्षणा का उदाहरण है । मूल-ग्रन्थस्थ 'इत्यादि' शब्द से 'छत्रिणो यान्ति' इत्यादि उदाहरणों को समझना चाहिये । इस कारण 'लक्षणा त्रिविधा' इस वाक्य के साथ कोई विरोध नहीं हो पाता ।
जब कि घर के बड़े लोग बच्चों से कहते हैं कि 'दही की ओर देखना, कौए उसे दूषित न करने पायें' तब केवल कौए दही को दूषित न करें, बिल्ली, कुत्ते आदि उसे दूषित करें' यह उस वाक्य का आशय नहीं होता, अपितु सभी से उसका (दही का) रक्षण करना ही उस वाक्य का तात्पर्य-विषयभूत अर्थ होता है । इसलिये उस वाक्य का अर्थ श्रोता बालक यह समझता है कि मुझे सभी-दध्युपघातक प्राणियों से दही की रक्षा करने की आज्ञा हुई है । इस प्रकार की प्रतीति उसे काक शब्द की दध्युपघातक प्राणियों में लक्षणा मानने से ही होती है । यहाँ दधिरक्षण रूप तात्पर्यार्थ की केवल वाच्यार्थ से अनुपपत्ति होने पर लक्षणा का स्वीकार करना पड़ता है, अतः यही जहदजहल्लक्षणा है ।
शंका—उपर्युक्त वाक्य में लक्षणा का स्वीकार आवश्यक होने पर भी 'विरुद्ध विशेष अंशों का त्याग कर अविरुद्ध विशेष अंशों का स्वीकार करना' रूप जहदजहल्लक्षणा का लक्षण प्रकृत स्थल में संभव नहीं होता, क्योंकि उसमें 'काक' पद के वाच्यार्थ का त्याग नहीं होता है । इसलिये इसे (काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम्) जहदजहल्लक्षणा का उदाहरण कैसे कहा जा सकता है ।
| २३६ | वेदान्तपरिभाषा | [ लक्षणायां बीजम् |
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समाधान—प्राचीन साम्प्रदायिकों ने 'विरुद्धांश-त्यागपूर्वक अविरुद्ध अंश-विशेष का स्वीकार करना' यह लक्षण जहदजहल्लक्षणा का किया है। परन्तु धर्मराजाध्वरीन्द्र आदि नवीन वेदान्तियों ने उसे स्वीकार नहीं किया। नवीनों का कहना है कि शक्य और अशक्य अर्थ का सामान्यतया बोध करा देने वाली जो लक्षणा हो वही जहदजहल्लक्षणा है।
प्रकृत उदाहरण में इस लक्षण का समन्वय होता है। क्योंकि यहाँ पर 'काक' शब्द काकत्वरूप वाच्यार्थ का त्याग कर अशक्य (वाच्यार्थभिन्न) 'दध्युपघातकत्व' धर्म का पुरस्कार करता है और मार्जार, श्वान आदि लक्ष्यार्थों के साथ वाच्यरूप 'काक' का भी उसी धर्म से (दध्युपघातकत्वरूप से) बोध कर देता है। इस रीति से यह वाक्य (काक) और अशक्य (मार्जार आदि) का बोधक होने से जहदजहल्लक्षणा का उदाहरण हो सकता है इसी प्रकार 'छत्रिणो गच्छन्ति' छाते वाले लोग जा रहे हैं—आदि वाक्य भी इसी लक्षणा के उदाहरण बन सकते हैं। इस वाक्य में भी 'एकसार्थवाहित्व'—एक समूह का घटक होना—सम्बन्ध से 'छत्रिन्' पद शक्य (छत्रवान् लोग) और अशक्य (छत्ररहित लोग) दोनों का ही बोधक है।
इस प्रकार लक्षणा का स्वरूप बताकर अब उसका बीज बताते हैं—
लक्षणाबीजं तु तात्पर्यानुपपत्तिरेव न त्वन्वयानुपपत्तिः, काकेभ्यो दधि रक्ष्यतामित्यत्रान्वयानुपपत्तेरभावात्। गङ्गायां घोष इत्यादौ तात्पर्यानुपपत्तेरपि सम्भवात्।
**अर्थ—**परन्तु तात्पर्य की अनुपपत्ति ही लक्षणा में बीज है। अन्वय की अनुपपत्ति, लक्षणा में बीज नहीं है। क्योंकि 'काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम्' वाक्य में अन्वय की अनुपपत्ति नहीं है। (वाक्य के पदों का परस्पर अन्वय लग सकता है) उसी प्रकार 'गङ्गायां घोषः' आदि वाक्यों में तात्पर्य की अनुपपत्ति का भी सम्भव होता है। (इसलिये एकमात्र तात्पर्यानुपत्ति को ही लक्षणा में बीज मानने में लाघव है)
विवरण—'तत्त्वमसि' आदि अभेदबोधक वाक्यों में गौणी लक्षणा (गौण लक्षणा-वृत्ति) मानने की आवश्यकता नहीं है, यह ऊपर बताया गया है। इसी पर यदि कोई कह दे कि 'जिस प्रकार 'शक्ति' शब्द की एक वृत्ति है--उसी प्रकार 'लक्षणा' भी शब्द की एक वृत्ति है। इस कारण शक्ति से जैसे शक्यार्थ का ज्ञान होता है वैसे ही लक्षणा से शक्यसम्बद्ध लक्ष्यार्थ का भी ज्ञान होता है, तब उसमें गौणत्व कैसा ?
इस शङ्का के निरसनार्थ यहाँ पर लक्षणा का बीज बताया गया है। शब्द से लक्षणा के द्वारा लक्ष्यार्थ का ज्ञान होने में जो कारण हो उसे लक्षणा का बीज कहते हैं। शब्द के प्रसिद्ध अर्थ को शक्यार्थ या वाच्यार्थ कहते हैं, जहाँ पर वाच्यार्थ की उपपत्ति नहीं लगती वहाँ अगत्या लक्षणा का स्वीकार करना पड़ता है। इसलिये उसे मुख्य शक्ति की
लक्षणायां बीजम् ] आगमपरिच्छेदः २३७
अपेक्षया गौणत्व समझा जाता है। अर्थात् जहाँ वाक्यार्थ से ही शाब्दबोध का होना संभव हो वहाँ लक्षणा को मानने की आवश्यकता नहीं होती।
परन्तु कुछ वादी—मुख्यार्थ के अन्वयानुपपत्ति को ही लक्षणा में बीज मानते हैं। अतः उसका निराकरण करने के लिये ग्रन्थकार ने मूल में कहा है—'अन्वयानुपपत्ति, लक्षणा में बीज नहीं है।' क्योंकि 'काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम्' इस वाक्य में दधिरक्षण का केवल 'काक' शब्द के साथ (उसके मुख्यार्थ के साथ अन्वय मानने पर भी वह अनुपपन्न नहीं होता, इसलिये अन्वयानुपपत्तिरूप लक्षणाबीज प्रकृत उदाहरण में अव्याप्त रहता है। किन्तु मार्जार आदि प्राणियों को यदि दूषित करने दिया जाय तो 'दधिरक्षण' रूप तात्पर्य की अनुपपत्ति होती है। अतः तात्पर्यानुपपत्ति को ही लक्षणा में बीज मानना आवश्यक है। उसके मानने पर सभी जगह शाब्द-बोध की उपपत्ति लग जाती है। अतः पृथक्रूप से 'अन्वयानुपपत्ति' रूप लक्षणाबीज मानने की आवश्यकता ही नहीं रहती। क्योंकि 'अन्वयानुपपत्ति और तात्पर्यानुपपत्ति' रूप दो लक्षणाबीज मानने की अपेक्षा सर्वत्र एक को ही बीज मानने में लाघव है।
इसके अतिरिक्त जहाँ कहीं वाक्य में अन्वयानुपपत्ति रहती है वहाँ तात्पर्यानुपपत्ति भी रहती है। 'गङ्गायां घोषः' यह वाक्य अन्वयानुपपत्ति रूप लक्षणाबीज के उदाहरण में दिया जाता है। क्योंकि 'गङ्गा' पद का मुख्यार्थ प्रवाह का घोष के साथ आधेयता-सम्बन्ध से अन्वय हो नहीं सकता। इस अन्वयानुपपत्ति के कारण गङ्गापद की 'गङ्गा-सम्बन्धी तीर' अर्थ में लक्षणा माननी पड़ती है—यह अन्वयानुपपत्ति को बीज मानने वालों का कहना है। परन्तु यहाँ जैसी अन्वयानुपपत्ति है वैसी ही तात्पर्यानुपपत्ति भी है। क्योंकि 'गङ्गा' पद का 'प्रवाह' रूप मुख्य अर्थ करने पर उस वाक्य के 'तीरप्रतीति-जननयोग्यत्व' रूप तात्पर्य का असम्भव हो जाता है। इस कारण इस वाक्य में भी तात्पर्यानुपपत्ति होने से लक्षणा का स्वीकार किया जाना चाहिये। तस्मात् भिन्न-भिन्न उदाहरणों में लक्षणा के भिन्न-भिन्न प्रयोजक मानने की अपेक्षा 'तात्पर्यानुपपत्ति' रूप एक ही बीज मानना उचित है। तात्पर्यार्थ के स्वरूप को ग्रन्थकार स्वयं बतावेंगे। 'गङ्गायां घोषः' इस उदाहरण में तात्पर्य निश्चय करने के लिये अन्वयानुपपत्ति का उपयोग हो सकता है। उसी प्रकार 'काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम्' यहाँ प्रयोजनासिद्धि का और 'सैन्धवमानय' में देश, काल, प्रकरण आदिकों का भी तात्पर्य निश्चय करने में उपयोग होता है। अर्थात् तात्पर्यार्थ के निश्चायक कारण भिन्न-भिन्न होते हैं।
नैयायिकों का कहना है कि—'जिस प्रकार शक्ति केवल पदवृत्ति होती है उसी प्रकार लक्षणा भी पदवृत्ति ही है। क्योंकि लक्षणा में भी शक्ति के समान वृत्तित्व है। अतः जो भी वृत्ति हो उसका पदनिष्ठ होना ही उचित है'। इस मत का निराकरण ग्रन्थकार करते हैं—
२३८ वेदान्तपरिभाषा [ लक्षणाया वाक्यवृत्तित्वमपि
लक्षणा च न पदमात्रवृत्तिः, किन्तु वाक्यवृत्तिरपि । यथा गम्भीरायां नद्यां घोष इत्यत्र गम्भीरायां नद्यामिति पदद्वयसमुदायस्य तीरे लक्षणा ।
अर्थ—लक्षणा केवल पदमात्रवृत्ति नहीं है किन्तु वाक्यवृत्ति भी है । जैसे—'गम्भीरायां नद्यां घोषः' गहरी नदी पर ग्वाले का घर है । इस वाक्य में गंभीर और नदी दो पदों के समूह की तीर अर्थ में लक्षणा है ।
विवरण—नैयायिक अनुमान¹ करते हैं कि—'लक्षणा, पदमात्रवृत्ति है, क्योंकि उसमें वृत्तित्व है, शक्ति के समान ।' परन्तु उनका यह अनुमान ठीक नहीं है । क्योंकि 'गम्भीरायां नद्यां घोषः' वाक्य में पदमात्रवृत्तित्व का व्यभिचार होता है । इस वाक्य में गंभीर विशेषण से विशिष्ट नदी पद की ही तीररूप अर्थ में लक्षणा की जाती है । इस कारण यहाँ लक्षणा में पदमात्रवृत्तित्व का संभव नहीं हो पाता ।
इसके अतिरिक्त इस अनुमान में 'वृत्तित्व' हेतु सोपाधिक² है, क्योंकि यहाँ 'शक्तित्व' उपाधि है । तथाहि—जहाँ 'पदमात्रवृत्तित्व' रूप साध्य होता है वहाँ ( घट पट आदि स्थलों में ) शक्तित्व भी रहता है । इस कारण 'शक्तित्व' साध्यव्यापक हुआ । और जहाँ 'वृत्तित्व' रूप हेतु हो वहाँ 'शक्तित्व' के रहने का कोई नियम नहीं है जैसे—गंभीर और नदी दोनों पदों में लक्षणावृत्ति है किन्तु 'शक्तित्व' नहीं है, इस कारण 'शक्तित्व' साधनाव्यापक हुआ । अतः यह अनुमान सोपाधिकत्वरूप दोष से दूषित है ।
गम्भीरायां नद्यां घोषः । वाक्य में नदी में 'गंभीर' विशेषण दिया है । परन्तु गंभीर जल पर घर का होना असंभव है । और यह व्यक्ति तो ऐसा बता रहा है, अतः इन दो पदों के उच्चारण से नदी शब्द का तीररूप अर्थ ही इस व्यक्ति को विवक्षित होगा, यह प्रतीति होती है, इस कारण यहाँ पर दोनों पदों की तीररूप अर्थ में लक्षणा है—यह मानना होगा । क्योंकि केवल 'नदी' पद की 'तीर' रूप अर्थ में यदि लक्षणा मान लें तो 'गंभीर तीर पर घोष है' यह अर्थ होने लगेगा । परन्तु तीर में 'गंभीर' विशेषण नहीं दिया जा सकता । क्योंकि तीर गंभीर नहीं होता । यदि 'गंभीर' पद की ही तीर अर्थ में लक्षणा मानें तो वह भी नहीं हो सकता, क्योंकि 'गंभीर' और 'तीर' में अभेद का होना संभव ही नहीं, इसी तरह 'तीर' और 'नदी' का भी अभेदान्वय कभी नहीं बन सकता । इसी प्रकार इन दो पदों में से किसी एक पद की तीररूप अर्थ में लक्षणा कर समीप के पद को उस तात्पर्य का केवल ज्ञापक मान लेने पर भी गंभीर और नदी दो पदों की
१. 'लक्षणा पदमात्रवृत्तिः वृत्तित्वात् शक्तिवत् ।'
२. उक्तानुमाने 'शक्तित्वम्' उपाधिः । यथा—दृष्टान्ते शक्तौ पदमात्रवृत्तित्वरूपं साध्यमस्ति, शक्तित्वमपि अस्ति, अतः साध्यव्यापकत्वम्, साधनं वृत्तित्वं लक्षणायामपि, तत्र शक्तित्वं नास्ति इति साधनाव्यापकत्वमपि ।
वाक्यलक्षणाया उपपादनम् ] आगमपरिच्छेदः २३९
आवृत्ति करने में कोई कारण नहीं है । अतः पुनरुक्ति की उपपत्ति ही नहीं लगाई जा सकती ।
इस पर यदि ऐसा कहें कि—'नदी' शब्द की केवल 'तीर' अर्थ में लक्षणा न कर 'नदी तीर' अर्थ में लक्षणा है, और 'नदीतीर' रूप लक्ष्यार्थ के 'नदी' रूप अंश के साथ ही गंभीर पद का अन्वय होता है, ऐसा करने पर कोई दोष नहीं है ।
परन्तु यह कहना ठीक नहीं है—एक पदार्थ का दूसरे पदार्थ के साथ ही अन्वय होता है, उसके एकदेश के साथ नहीं । यह शाब्दबोध के विषय में नियम है । अतः 'नदीतीर' पद के नदीरूप एक अंश के साथ गंभीर पद का अन्वय हो नहीं सकता । इसलिये परिशेषन्याय से गंभीर और नदी दोनों पदों की तीररूप अर्थ में लक्षणा माननी पड़ती है । वह अर्थ गंभीर और नदी परस्परान्वित इन दो पदों से निष्पन्न होता है इस कारण यह वाक्यवृत्ति लक्षणा है । अर्थात् शक्ति के समान लक्षणा भी पदमात्रवृत्ति ही होती है, यह नियम नहीं बनाया जा सकता । प्रत्युत लक्षणा जैसी पदवृत्ति होती है, वैसी वाक्यवृत्ति भी होती है—यह मानना पड़ता है ।
शंका—लक्षणा का स्वरूप तो 'शक्यसम्बन्धो लक्षणा' बताया गया है । किन्तु वाक्यार्थ में शक्ति के न होने से उसको शक्यसम्बन्धरूप लक्षणा कैसे संभव हो सकेगी ? इस प्रकार शंका उपस्थित कर उसका समाधान ग्रन्थकार करते हैं—
ननु ^१वाक्यार्थस्याशक्यतया कथं शक्यसम्बन्धरूपा लक्षणा ? ।
उच्यते । शक्त्या ^२यत्पदसम्बन्धेन ज्ञाप्यते तत्सम्बन्धो लक्षणा, शक्तिज्ञाप्यश्च यथा पदार्थस्तथा वाक्यार्थोऽपीति न काचिदनुपपत्तिः ।
**अर्थ—**वाक्यार्थ में अशक्यता होने से अर्थात् वाक्यार्थ में शक्यत्व के न होने से उसमें शक्यसम्बन्धरूप लक्षणा है—यह कैसे कहा जा सकेगा ? ऐसा शंका यदि हो तो समाधान बताते हैं—शक्ति से पदसम्बन्ध के द्वारा जो बोधित किया जाता है उसका सम्बन्ध ही लक्षणा है, और पदार्थ जैसे शक्ति से ज्ञाप्य ( बोध्य ) होता है, वैसे वाक्यार्थ भी शक्ति से ज्ञाप्य होता है । अतः वाक्य में लक्षणा के स्वीकार करने में कोई अनुपपत्ति नहीं है ।
**विवरण—**जब किसी शाक्यार्थ ( वाच्यार्थ ) की उपपत्ति नहीं लगती, तब उसकी शक्यार्थसंबद्ध अर्थ में लक्षणा करनी पड़ती है । परन्तु जो अर्थ, वाच्य ही नहीं है उसकी तत्संबद्ध अर्थ में लक्षणा कहना तो बन्ध्यापुत्र का किसी से सम्बन्ध प्रदर्शन करने के
१. क्यस्याश०'–इति पाठान्तरम् ।
२. पदेन स्वनिष्ठशक्त्या यज्ज्ञाप्यते तत्सम्बन्धो लक्षणा । तथा च—'स्वबोध्यसम्बन्धत्वं' लक्षणाया लक्षणमुभयसाधारणत्वादावश्यकम् ।
२४० वेदान्तपरिभाषा [ अर्थवादानां पदैकवाक्यता
समान ही होगा—यह आशय शंका करने वाले का है। इस पर ग्रन्थकार यह समाधान देते हैं—पदार्थ (पदजन्य अर्थ) जैसे शक्य (वाच्य) है वैसे ही वाक्यार्थ भी शक्य (वाच्य) है। इसलिये शक्यसंबंधरूप लक्षणा वाक्य में भी हो सकती है क्योंकि 'जो अर्थ, शक्ति से साक्षात् बोधन किया जाय वही शक्यार्थ है' इस प्रकार शक्य शब्द की व्याख्या यदि हमने स्वीकार की होती तो आपको कथनानुसार हमारे पक्ष में भी वाक्य में लक्षणा की अनुपपत्ति हुई होती। परन्तु शक्यार्थ का वैसा लक्षण न कर 'शक्ति से साक्षात् या परम्परा से जो अर्थ ज्ञात हो वही शक्यार्थ है' लक्षण मानते हैं—इस कारण शक्ति से साक्षात् यद्यपि पदार्थ ही बोधित होता है तथापि परंपरा से वाक्यार्थ भी बोधित होता है। पद से पदार्थ का ज्ञान होते ही उन पदार्थों के परस्पर अन्वय से हमें जो अर्थ ज्ञात होता है, वही वाक्यार्थ है, वह भी शक्ति से ही परम्परया ज्ञात होता है। इसलिये पदार्थ के समान वाक्यार्थ में भी शक्यता है। इस कारण पद के समान वाक्य की भी अपने शक्यार्थ—सम्बद्ध अर्थ में लक्षणा हो सकती है।
अब लौकिक वाक्य में जैसी लक्षणा हो सकती है उसी प्रकार वैदिक वाक्य में भी लक्षणा होती है—इस बात को ग्रन्थकार कह रहे हैं—
एवमर्थवादवाक्यानां प्रशंसारूपाणां प्राशस्त्ये लक्षणा। सोऽरोदी-
दित्यादिनिन्दार्थवाक्यानां¹ निन्दितत्वे लक्षणा। अर्थवादगतपदानां
²प्राशस्त्यादिलक्षणाऽभ्युपगमे एकेन पदेन लक्षणया तदुपस्थितिसम्भवे
पदान्तरवैयर्थ्यं स्यात्। एवं च विध्यपेक्षित-प्राशस्त्यरूपपदार्थ-
प्रत्ययकतया अर्थवादपदसमुदायस्य³ पदस्थानीयतया विधिवाक्येन⁴
एकवाक्यत्व भवतीत्यर्थवादानां⁵ पदैकवाक्यता।
**अर्थ—**इसी प्रकार प्रशंसारूप अर्थवाद-वाक्यों की विधि के प्राशस्त्य में लक्षणा एवं 'सोऽरोदीत्' इत्यादि निन्दार्थक अर्थवादवाक्यों की 'निन्दितत्व' रूप अर्थ में लक्षणा होती है।
१. 'वादानां'–इति पाठान्तरम्।
२. स्त्ये ल०'–इति पाठान्तरम्।
३. 'प्रशस्तः' इत्येकेन पदेन यावानपेक्षितः अर्थो बोध्यते, तावानेव 'वायुर्वैक्षेपिष्ठा देवता वायुमेव स्वेन भागधेयेन उपधावति स एवैनं भूतिं गमयति' अस्यार्थवादवाक्यस्या- प्यर्थः इति पदसमुदायस्यापि अस्य पदस्थानीयत्वम्।
४. 'पदेन'–इति पाठान्तरम्।
५. 'दवाक्यानां'–इति पाठान्तरम्।
वाक्यलक्षणोपपादनम् ] आगमपरिच्छेदः २४१
शंका—अर्थवादवाक्य के पदों की ही प्राशस्त्यादि अर्थ में लक्षणा होती है—यह क्यों नहीं मानते ?
समाधान—अर्थवादवाक्य के पदों की ही प्राशस्त्य अथवा निन्दितत्व रूप अर्थ में लक्षणा यदि मान लें तो एक ही पद से लक्षणा के द्वारा उन अर्थों की उपस्थिति हो जायगी जिससे अन्य पद व्यर्थ होंगे अर्थात् एक ही पद से प्राशस्त्य या निन्दितत्वादि अर्थों का लक्षणा के द्वारा यदि ज्ञान हो जाय तो अन्य पद व्यर्थ हैं, समझना पड़ेगा । इसलिये अर्थवाद-वाक्य के पदसमूह में विधि से अपेक्षित ऐसे प्राशस्त्यरूप पदार्थ की बोधकता होने के कारण पदस्थानीयत्व होता है। अर्थात् वह पदसमूह एक पद के समान ही होता है। इस कारण उनकी विधिवाक्य के साथ एकवाक्यता होती है। इसलिये अर्थवादवाक्यों की पदैकवाक्यता मानी जाती है।
विवरण—'गम्भीरायां नद्यां घोषः' इस वाक्य के किसी एक ही पद की लक्षणा न होकर गम्भीर एवं नदी दो पदों की अर्थात् वाक्य की ही तीर अर्थ में लक्षणा माननी पड़ती है।
इस पर यदि कोई कहे कि 'पदार्थः पदार्थेनान्वेति न तु तदेकदेशेन' यह नियम व्यभिचारी है अर्थात् नित्य ( अव्यभिचारी ) नहीं। जैसे—'चैत्रस्य गुरुकुलम्' चैत्र के गुरु का कुल इस वाक्य में 'चैत्रस्य' ( इस ) षष्ठ्यन्तपद का 'गुरुकुलम्' के गुरु शब्द के साथ अन्वय माने बिना गति ही नहीं है, इसलिये एकदेशान्वय का स्वीकार करना पड़ता है तो प्रकृत में भी उसी प्रकार एकादेशान्वय मानकर, गंभीर ऐसी जो नदी, उसका तीर-ऐसा अर्थ करने में क्या दोष है ? इसलिये ग्रन्थकार ने पूर्व समाधान की अरुचि से 'जहाँ वाक्य की लक्षणा माने बिना गति नहीं है', ऐसे वैदिक अर्थवाद-वाक्यों को दिखाया है।
अर्थवाद, विधि अथवा निषेध के साक्षात् बोधक नहीं होते, किन्तु गुणवाद और अनुवाद रूप से वे अपने अर्थ को बताते हैं। परन्तु वह अर्थ सदैव उत्पन्न ही हो सो बात नहीं है। इसलिए अर्थवाद-वाक्यों में साक्षात् विधिनिषेधबोधकत्व का संभव नहीं होता। इस कारण अर्थवाद-वाक्यों के मुख्यार्थ को भी सदैव स्वीकार नहीं किया जाता। अतः लक्षणा के द्वारा विधि के प्राशस्त्यादि का ज्ञान करा देना ही अर्थवादवाक्यों का अर्थ माना जाता है।
वेद में 'वायुर्वै क्षेपिष्ठा देवता'—वायु अतिवेगवती देवता है—इत्यादि स्तुतिपरक अर्थवाद-वाक्यों की वायव्यपशुयागरूप विधि की स्तुति में लक्षणा माननी चाहिये। इसी प्रकार 'सोऽरोदीत् यदरोदीत्तद्रुद्रस्य रुद्रत्वम्' इत्यादि निन्दापरक अर्थवादवाक्यों की 'बर्हिर्याग में रजतदान नहीं करना चाहिये' इस विवक्षित निषेध के लिए 'जो बर्हिर्याग में रजतदान करता है वह रोता है' इस प्रकार निन्दा के अर्थ में लक्षणा है, यह स्वीकार करना ही होगा। यहाँ किसी एक पद की लक्षणा है—ऐसा नहीं कह सकते।
शंका—इस उदाहरण में भी प्राशस्त्यादि अर्थों में पदों की ही लक्षणा मान ली जाय। समस्त वाक्य की यह लक्षणा है—यह आग्रह क्यों ?
१६ वे० प०
| २४२ | वेदान्तपरिभाषा | [ वाक्यलक्षणोपपादनम् |
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समाधान—अर्थवाद-वाक्य के अन्तर्गत—पदों की ही प्राशस्त्यादि अर्थ में लक्षणा मान लेने पर उनमें से एक ही पद, प्राशस्त्य-द्योतक होगा और अन्य पद व्यर्थ होने लगेंगे। क्योंकि विधि-निषेधों के प्रतिपादक वचनों को ही स्वार्थ में प्रामाण्य होता है, और अर्थवाद उनके प्रत्यक्षरूप से बोधक नहीं होते। इस कारण 'अनार्थक्यमतदर्थानाम्' इस नियम से उस वेदभाग को अनार्थक्य प्राप्त होने लगेगा।
परन्तु 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' इस अध्ययनविधि से प्रेरित होकर अक्षरशः ग्रहण किये जाने वाले वेदसमूह को अनार्थक्य प्राप्त होना इष्ट नहीं है। इसलिए अर्थवाद-वाक्यों की प्राशस्त्यादि अर्थ में लक्षणा स्वीकार करनी चाहिए। अतः सभी वाक्य, विधेय की स्तुति कर उसकी अवश्यकर्तव्यता का ज्ञान करा देने के कारण उन्हें अनर्थकत्व नहीं है—मानना पड़ता है।
$^१$अर्थवाद के चार प्रकार होते हैं। उनमें से 'पुराकल्प' और 'परकृति' इन दो प्रकारों का यथासंभव प्राशस्त्य अथवा निन्दा में ही अन्तर्भाव हो जाने से यहाँ स्तुति-निन्दापरक अर्थवाद से उनका भी ग्रहण कर लेना चाहिए।
शंका—लक्षणा के द्वारा अर्थवादवाक्यों को प्राशस्त्यबोधक मानने पर भी उनकी अनर्थकता (व्यर्थता) कैसे दूर होगी? क्योंकि 'जो वाक्य, विधिनिषेध का साक्षात् बोधक होता है वही सार्थक समझा जाता है', यह मीमांसा का नियम है। और अर्थवाद वाक्यों का साक्षात् विधि-निषेध बोधन न करना तो प्रसिद्ध ही है। ऐसी आशंकाके के समाधानार्थ ग्रन्थकार 'एवं च विध्यपेक्षित०' ग्रन्थ प्रारम्भ करते हैं।
स्तुतिपरक अर्थवाद, प्राशस्त्यबोधन के द्वारा विधि के साथ और निन्दापरक अर्थवाद, निषिद्ध पदार्थ के निन्दितत्व को बताते हुए निषेध के साथ एकवाक्यता को प्राप्त होते हैं। इस कारण अर्थवादों को परम्परा से विधिनिषेधबोधकत्व होता है। इसलिये उन्हें व्यर्थ नहीं कह सकते।
इस एकवाक्यता के 'पदैकवाक्यता' तथा 'वाक्यैकवाक्यता' नामक दो प्रकार हैं। इनमें से अर्थवादवाक्यों में पदैकवाक्यता ही होती है। क्योंकि विधि एवं निषेधों को प्रशस्तत्व तथा निन्दितत्व की अपेक्षा रहती है, और समग्र अर्थवादवाक्य, विहित का
१. अर्थवादश्चतुर्विधः—स्तुतिः, निन्दा, परकृतिः पुराकल्पश्चेति। (गो. सू. २।१।६४) तत्र परकृतिः एककर्तृकमुपाख्यानम्— (भाट्टदी० ६।७।२६), पुराकल्पः बहुकर्तृको विधिः— (जै. सू. वृ. अ. ६)। प्रकारान्तरेण स त्रिविधोऽर्थवादः—गुणवादः, अनुवादः, भूतार्थवादश्चेति। — (न्या. सि. मं. ४ पृ. २०) तदुक्तम्—विरोघे गुणवादः स्यादनुवादोऽवधारिते। भूतार्थवादस्तद्धानादर्थवादस्त्रिधामतः। — (न्या. सि. मं. ४ पृ. ६१) मीमांसकास्तु विधिशेषः निषेधशेषश्चेत्यर्थवादं द्वैविध्येन विभेजिरे।— (लौ. भा.)।
वाक्यैकवाक्यताविचारः ] आगमपरिच्छेदः २४३
प्राशस्त्य या निन्दित का निन्दितत्व अर्थ का ही बोधन करते हैं । इसलिए समस्त वाक्य से लक्षणा के द्वारा जितने अर्थ का ज्ञान होता है । उतने ही अर्थ का ज्ञान, प्रशस्त अथवा निन्द्य पदों से भी होता है । इस कारण प्राशस्त्यादि अर्थ, पदार्थरूप ही समझा जाता है । अतः अर्थवाद भी पदरूप है । और उसकी विधि के साथ एकवाक्यता होकर जो बोध होता है, वह पदैकवाक्यता से ही होता है । इसलिए अर्थवादों में पदैक-वाक्यता ही होती है । वाक्यैकवाक्यता नहीं होती ।
यदि अर्थवाद-वाक्यों में वाक्यैकवाक्यता नहीं होती, तो वह कहाँ होती है ? इस प्रकार अकांक्षा का उत्थापन कर उसका उत्तर ग्रन्थकार स्वयं देते हैं —
क्व तर्हि वाक्यैकवाक्यता ? । यत्र प्रत्येकं भिन्न-भिन्न-संसर्ग-प्रतिपादकयोर्वाक्ययोराकाङ्क्षावशेन महावाक्यार्थ-बोधकत्वम्¹ । यथा ‘दर्श²पूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत’ इत्यादि-वाक्यानां ‘समिधो यजति’ इत्यादि-वाक्यानां च परस्परापेक्षिताङ्गाङ्गि³-बोधक-⁴वाक्य-तयैकवाक्यता । तदुक्तं भट्टपादैः—
स्वार्थबोधे समाप्तानामङ्गाङ्गित्वाद्यपेक्षया । वाक्यानामेकवाक्यत्वं पुनः संहत्य जायते ॥ इति ।
**अर्थ—**अच्छा तो, वाक्यैकवाक्यता कहाँ होती है ? ( उत्तर— ) जहाँ भिन्न-भिन्न संसर्गप्रतिपादक ( अर्थप्रतिपादक ) दो वाक्यों को परस्पर आकांक्षा के कारण महा-वाक्यार्थ-बोधकत्व होता है वहाँ वाक्यैकवाक्यता होती है । जैसे—‘स्वर्गकाम व्यक्ति ( पुरुष ) दर्श-पूर्णमास याग करे’ इत्यादि वाक्य और ‘समिध नामक याग करे’ आदि दूसरे प्रयाजवाक्यों को परस्पर अपेक्षित अङ्गाङ्गिभावबोधकत्व होने से उनकी जो एक-वाक्यता सिद्ध होती है, वही वाक्यैकवाक्यता है । अतएव भट्टपाद ने ऐसा कहा है—प्रथमतः स्वार्थ का बोध कराकर चरितार्थ हुए वाक्यों की परस्पर अंगांगिभाव की अपेक्षा से पुनः समुदायरूप से एकवाक्यता होती है ।
**विवरण—**अर्थवादों के वाक्यरूप होने पर भी उनमें पदैकवाक्यता ही यदि संमत है तो वाक्यैकवाक्यता का उदाहरण कहाँ होगा ? इस आशंका के प्रसङ्गतः प्राप्त होने पर ग्रन्थकार वाक्यैकवाक्यता का उदाहरण बताते हैं । ‘दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत’ स्वर्गेच्छु पुरुष दर्श-पूर्णमास नामक याग करे—इस विधिवाक्य के सुनते ही ‘दर्शपूर्णमास-याग, स्वर्ग का साधन है’ यह अर्थ समझ में आता है । इसी प्रकार ‘समिधो यजति’—समिध्संज्ञक याग करे—इत्यादि विधिवाक्य से समिध् याग का विधान भी प्रतीत होता
१. 'म् तत्रवाक्यैकवाक्यता'—इति पाठान्तरम् । २. 'पोर्ण'—इति पाठान्तरम् । ३. 'ङ्गिभावबो'—इति पाठान्तरम् । ४. 'कतयैकवाक्यत्वम्'—इति पाठान्तरम् ।
२४४ | वेदान्तपरिभाषा | [ आसत्तिनिरूपणम्
है परन्तु दर्श-पूर्णमास याग से स्वर्ग कैसे संपादन किया जाय ? इस प्रकार अंगीभूत याग को अंगों की आकांक्षा होती है । उसी प्रकार 'समिधो यजति' इत्यादि प्रयाजरूप यागों का प्रत्यक्ष फल कुछ भी न बताने के कारण इस याग से क्या साध्य है ? ऐसी साध्य ( अंगी ) की आकांक्षा होती है । इस कारण प्रथमतः स्वार्थ में चारितार्थ हुए दोनों प्रकार के वाक्यों का परस्पर अन्वय होकर समिधादिरूप अंगों का अनुष्ठान कर 'दर्श-पूर्णमास याग से स्वर्ग को पाना चाहिये' इस प्रकार से जो अंगांगिभावरूप महावाक्यार्थ निष्पन्न होता है — उसी को वाक्यैकवाक्यता कहते हैं । यहाँ एक वाक्यार्थ का दूसरे वाक्यार्थ के साथ अन्वय होता है और उन दो वाक्यों से मिलकर एकरूप तात्पर्य निश्चित होता है, इसलिये इसे वाक्यैकवाक्यता कहते हैं। इसी न्याय के अनुसार अन्यत्र भी अंगबोधक एवं अंगिबोधक वाक्यों की एकवाक्यता समझ लेनी चाहिये ।
ग्रन्थकार ने अपने इस कथन में 'तदुक्तम् ०' इत्यादि ग्रन्थ से मीमांसकों की सम्मति प्रदर्शित की है । मीमांसकों का यह आशय है—प्रत्येक वाक्य की स्वसंनिहित-पदों से कर्मतादिसम्बन्ध से अन्वय होकर पदैकवाक्यता होती है, और प्रत्येक वाक्य का भिन्न-भिन्न शाब्दबोध होने पर वह वाक्य यदि अंगी याग का बोधक हो तो उसे अंग की और वह वाक्य अंग प्रतिपादक हो तो अंगी की—इस प्रकार वाक्यों में परस्पर आकांक्षा होती है । दर्श-पूर्णमास याग से स्वर्ग कैसे संपादन किया जाय—इस आकांक्षा की 'प्रयाजादि अंगों का अनुष्ठान कर दर्श-पूर्णमास याग करे' इस प्रकार निवृत्ति होने से दोनों वाक्यों का परस्पर अन्वय होकर जो एकवाक्यता ( एक तात्पर्य-प्रतिपादकत्व ) सिद्ध होता है—यही महावाक्यार्थ है और उसी को वाक्यैकवाक्यता कहते हैं ।
इसी प्रकार 'पदार्थश्च द्विविधः०' से पदार्थ के द्विविधत्व का आरम्भ किया हुआ निरूपण समाप्त कर उसका उपसंहार करते हैं और प्रकृतप्राप्त आसत्ति में शाब्दज्ञानहेतुत्व को बताते हैं ।
एवं द्विविधोऽपि पदार्थो निरूपितः ।
तदुपस्थितिश्चासत्तिः । सा च शाब्दबोधे हेतुः, तथैवान्वयव्यतिरेकदर्शनात् । एवं महावाक्यार्थ-बोधेऽवान्तरवाक्यार्थ-बोधो हेतुः, तथैवान्वयाद्यवधारणात् ।
अर्थ— इस प्रकार से शक्य और लक्ष्य दोनों पदार्थों का निरूपण कर दिया ।
पदजन्य पदार्थ की अव्यवधान से उपस्थिति को ही आसत्ति कहते हैं । वह शाब्दबोध में कारण होती है । क्योंकि आसत्ति रहने पर शाब्दबोध होता है और आसत्ति के न रहने पर शाब्दबोध नहीं होता—यह अन्वय-व्यतिरेक प्रत्यक्षतया सभी के अनुभव में आता है । इसी प्रकार महावाक्यार्थ का बोध होने में अवान्तर वाक्यों के प्रत्येक वाक्य का ज्ञान कारण होता है, क्योंकि उसके अन्वयादि का भी वैसा ही निश्चय होता है ।
तात्पर्य्यनिरूपणम् ] आगमपरिच्छेदः २४५
विवरण—आसत्ति के लक्षण में 'पदजन्यपदार्थोपस्थितिः' कहा गया है। अब पदार्थ क्या है ? और वह कितने प्रकार का है ? यह आकांक्षा होने पर पदार्थ के शक्य तथा लक्ष्य भेद से दो प्रकार बताते हुए यहां तक उन्हीं का निरूपण किया गया है और अब प्रसंगप्राप्त पदार्थ-निरूपण को समाप्त कर प्रकृत आसत्ति से उसके सम्बन्ध को 'तदुपस्थितिश्च' इत्यादि वाक्यों से बताया गया और पदजन्य पदार्थ की जो अव्यवधान से उपस्थिति ( प्राप्ति ) है, उसी को आसत्ति कहते हैं। इस प्रकार पूर्व प्रकृत आसत्ति-लक्षण का उपसंहार किया है। उपर्युक्त स्वरूप की आसत्ति होने पर पदों से शाब्द-बोध होता है और वह न हो तो शाब्दबोध नहीं होता, इस अन्वय-व्यतिरेक को देखने से आसत्ति शाब्दबोध में कारण है, यह निश्चित होता है। और इसी प्रमाण के द्वारा आसत्ति और शाब्दबोध में कार्य्य-कारण भाव सिद्ध होता है।
इसी प्रकार आकांक्षा आदि के द्वारा अवान्तर वाक्यों का शाब्दबोध होने पर प्रक-रणगत समस्त वाक्यों का मिलकर एक महावाक्यार्थ-बोध होता है, और वह न हुआ हो तो महावाक्यार्थ ज्ञात नहीं होता, इस अन्वय-व्यतिरेक से उनमें भी परस्पर ऐसी ही कार्यकारणता सिद्ध होती है।
इस प्रकार शाब्दबोध में आकांक्षा, योग्यता, आसत्ति नामक तीन कारणों का प्रतिपादन कर अब क्रमप्राप्त तात्पर्यज्ञानरूप चतुर्थ अवशिष्ट कारण के निरूपण की प्रतिज्ञा करते हैं।
क्रमप्राप्तं तात्पर्यं निरूप्यते। तत्र तत्प्रतीतीच्छयोच्चरितत्वं न तात्पर्यम्। अर्थज्ञानशून्येन पुरुषेणोच्चारिताद्वेदार्थ¹प्रत्ययाभावप्रसङ्गात्। अयमध्यापको व्युत्पन्न इति विशेषदर्शनेन² तत्र तात्पर्य्यभ्रमस्याप्यभावात्। न चेश्व³रीयतात्पर्यज्ञानात् तत्र शब्दबोध इति वाच्यम्। ईश्वरानङ्गीकर्तुरपि तद्वाक्यार्थप्रतिपत्तिदर्शनात्।
अर्थ—अब क्रमप्राप्त तात्पर्य का निरूपण किया जाता है। तत्रेति। निरूपणीय तात्पर्य के लक्षण प्रमाण को बताते समय यदि 'तत्प्रतीतीच्छयोच्चरितत्वम्' विवक्षित अर्थ की ( तात्पर्य्यार्थ ) प्रतीति की इच्छा से उच्चरितत्व ( वाक्य का या शब्द का उच्चारण किया जाना )—यह तात्पर्य का लक्षण करें, तो वह ठीक नहीं होगा। क्योंकि जिस पुरुष को वाक्यार्थ ज्ञान नहीं है ऐसे के द्वारा उच्चारण किये जाने वाले वेदवाक्य से अर्थज्ञान न होने का प्रसंग आवेगा। ( अर्थज्ञानशून्य व्यक्ति के द्वारा कहे गये वेद-वाक्य से अर्थप्रतीति नहीं हो सकेगी। )
१. 'र्थभान-प्रसङ्गात्'—इति पाठान्तरम्। २. 'न तात्प'—इति पाठान्तरम्।
३. 'रतात्प'—इति पाठान्तरम्।
| २४६ | वेदान्तपरिभाषा | [ तात्पर्यंनिरूपणम् |
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इसके अतिरिक्त 'यह अध्यापक अव्युत्पन्न है' इस प्रकार के विशेष दर्शन ( ज्ञान ) से उसमें तात्पर्यभ्रम की अभाव रहता है, इस कारण उसे उसका ज्ञान है—यह भी नहीं कह सकते। अब यदि ऐसा कहें कि उन वाक्यों का अर्थज्ञान ईश्वर के तात्पर्य-ज्ञान से होता है वह भी ठीक नहीं क्योंकि ईश्वर का अस्तित्व न मानने वाले व्यक्ति को भी उन वाक्यों के अर्थ का ज्ञान होता देखने में आता है।
विवरण—इस परिच्छेद के आरम्भ में बताया गया है कि आकांक्षा, योग्यता, आसत्ति और तात्पर्यज्ञान--ये चार कारण, वाक्यजन्य ज्ञान में हुआ करते हैं। उनमें से आकांक्षा, योग्यता, आसत्ति—इन तीन कारणों को यहाँ तक बताया गया। अब क्रमप्राप्त तात्पर्यज्ञान नामक चौथे कारण का निरूपण करना है, इसलिये तात्पर्य किसे कहते हैं ? उसमें प्रमाण क्या है ? और वह शाब्दबोध में कैसे कारण बनता है ? इन सब बातों को बताना आवश्यक है। इस प्रकार तात्पर्य का लक्षण बताना आवश्यक होने पर प्रथमतः उसका स्वाभिमत लक्षण न बताकर, लोकप्रसिद्धि से प्रथमतः उपस्थित होने वाला नैयायिकाभिमत लक्षण बताते हैं—'वक्तुरिच्छा तु तात्पर्यम्' वक्ता की इच्छा को ही तात्पर्य कहते हैं। वक्ता के विवक्षित अर्थ की प्रतीति श्रोता को हो, इस इच्छा से उसके द्वारा उच्चारण किये हुए शब्द का तात्पर्य उसी अर्थ में होता है। इस प्रकार नैयायिकों का बताया हुआ तात्पर्य का लक्षण ठीक नहीं है। क्योंकि इस लक्षण को मानने पर, संस्कृतभाषानभिज्ञ ( पद-पदार्थ-व्युत्पत्तिहीन ) व्यक्ति के द्वारा कहे गये वेदवाक्य के अर्थ का ज्ञान ही नहीं हो सकेगा। क्योंकि वक्ता अव्युत्पन्न है। इस कारण 'मेरे द्वारा कहे गये इस वेदवाक्य से श्रोता को अमुक अर्थ की प्रतीति हो' ऐसी इच्छा से वह वेदवाक्य उसके द्वारा कहा जाना संभव ही नहीं।
इसके अतिरिक्त वक्ता को अर्थज्ञान हो, चाहे न हो किन्तु उसके द्वारा 'अग्निमीले' अक्षरों का उच्चारण होते ही सुनने वाले व्युत्पन्न व्यक्ति को तत्काल 'मैं अग्नि की स्तुति करता हूँ' इस अर्थ की प्रतीति होती दिखाई देती है।
शंका—शाब्दबोध में तात्पर्य, कारण न होकर उसका ज्ञान ही कारण होता है, इस कारण अव्युत्पन्न व्यक्ति को अपने द्वारा कहे गये वाक्य का ज्ञान न होने पर भी 'यह वक्ता अव्युत्पन्न है' यह श्रोता को ज्ञात न होने से 'इस व्यक्ति ने यह वाक्य अमुक अर्थ की प्रतीति की इच्छा से ही कहा है' ऐसा समझता है, इस प्रकार भ्रमरूप तात्पर्य-ज्ञान से उसे उस वाक्यार्थ की प्रतीति हो सकती है। तब यह कैसे कहा जा सकता है कि अव्युत्पन्न व्यक्ति के द्वारा कहे गये वाक्य से अर्थप्रतीति नहीं हो सकेगी।
समाधान—जबकि सुनने वाले को यह ज्ञात रहे कि 'यह व्यक्ति अव्युत्पन्न है', तब तो आपके कथनानुसार तात्पर्यभ्रम से ही शाब्दबोध हो सकेगा। परन्तु जब सुनने वाले को यह निश्चित रीति से ज्ञात रहे कि 'यह अध्यापक अव्युत्पन्न है' तब भी उसे वाक्यार्थबोध होता दिखाई देता है। किन्तु भ्रमरूप या प्रमारूप कोई भी तात्पर्य-
तात्पर्य्यनिरूपणम् ] आगमपरिच्छेदः २४७
ज्ञान नहीं रहता, अतः नैयायिकों का यह तात्पर्य-लक्षण अव्याप्त रहता है। ऐसे अवसर पर श्रोता के अर्थज्ञान की उपपत्ति नहीं लग सकती।
**शंका—**काव्य का अध्ययन न किये हुए व्यक्ति के द्वारा भी किसी श्लोक के कहने पर उसे उसके अर्थ का ज्ञान होना संभव नहीं रहता तथापि उस श्लोक के मूलकर्ता कालिदास आदि कवि का तात्पर्यज्ञान, दूसरों को शाब्दबोध होने में कारण समझा जाता है, इसी रीति से वेदकर्ता परमेश्वर ने इस वाक्य का यही अर्थ किया है, इस इच्छा से ही वेदवाक्यों का उच्चारण किया होने से उससे तात्पर्यज्ञान से ही व्युत्पन्न श्रोताओं को उन वाक्यों के अर्थ का ज्ञान होना संभव है।
समाधान—'परमेश्वर के तात्पर्य ज्ञान से व्युत्पन्न श्रोताओं को वेदवाक्यों के अर्थ का ज्ञान हो जाता है' यह कहना ठीक नहीं है। क्योंकि 'परमेश्वर, वेदकर्ता हैं' यह सिद्धान्त जिन्हें मान्य हो उनके मत में ईश्वर के तात्पर्यज्ञान से शाब्दबोध होना मान लिया जा सकता है, किन्तु जिन्हें ईश्वर का अस्तित्व ही मान्य न हो उन चार्वाकादि नास्तिकों को वेदवाक्य से शाब्दबोध नहीं होता है, कहना पड़ेगा। परन्तु अनुभव तो विपरीत है। व्युत्पन्न व्यक्ति आस्तिक हो चाहे नास्तिक हो उसे वैदिक वाक्य के श्रवण होने पर अर्थज्ञान होता दिखाई देता है। इसलिये नैयायिकों का 'वक्तुरिच्छा तात्पर्यम्'— तात्पर्य का लक्षण निर्दोष नहीं है।
**प्रश्न—**तो आप अद्वैतवेदान्ती तात्पर्य का कौन-सा लक्षण करते हैं?
उच्यते। तत्प्रतीति-जनन-योग्यत्वं तात्पर्यम्। गेहे घट इति वाक्यं गेहे घटसंसर्ग-प्रतीति-जनन-योग्यं, न तु पटसंसर्गप्रतीति-जन-नयोग्यमिति तद्वाक्यं घटसंसर्गपरं, न तु पट-संसर्गपरं $^१$मित्युच्यते।
**अर्थ—**हमें तात्पर्य का कौन-सा लक्षण अभीष्ट है सो बताते हैं—'पदार्थों के संसर्ग का अनुभव उत्पन्न करने की वाक्य में योग्यता का होना' ही तात्पर्य है। 'घर में घट है' यह वाक्य, घर और घट के सम्बन्ध का अनुभव कराने में योग्य है। न कि गृह और पट के संसर्ग (सम्बन्ध) बोध कराने में। इसलिये 'गेहे घट:' यह वाक्य घटसंसर्गपरक (गृह और घट के संसर्ग का बोधक) है, न कि गृह और पट के संसर्ग का—ऐसा कहा जाता है।
**विवरण—**तात्पर्य का लक्षण 'तत्प्रतीतीच्छया उच्चरितत्वम्' करने पर उपर्युक्त दोष आते हैं, अतः वैसा लक्षण न कर 'तत्प्रतीतीजननयोग्यत्वम्' ही तात्पर्य का लक्षण करना उचित है। वाक्य में वक्ता के विवक्षित अर्थ का ज्ञान करा देने की योग्यता को ही तात्पर्य कहते हैं। जैसे—'घर में घट है' इस वाक्य के कहे जाने पर, वक्ता को उस
१. 'ति व्यपदिश्यते'—इति पाठान्तरम्।