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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

२८ | वेदान्तपरिभाषा | [ कामादीनां मनोधर्मत्वम्

मनोधर्म ( अन्तःकरण का धर्म है ) है । इस विषय में 'काम, संकल्प, विचिकित्सा ( संशय ), श्रद्धा, अश्रद्धा, धृति ( शिथिल हुए शरीरादि को उत्तेजित करने वाली वृत्ति ) अधृति, लज्जा, धी ( प्रज्ञा ), भय इत्यादि सब मन के ( अन्तःकरण के ) ही रूप हैं ।' यह श्रुति प्रमाण है । ( बृ० उ० १-५-३ ) इस श्रुति-वचन के 'धी' शब्द से वृत्तिरूप ज्ञान कहा गया है । 'कामादि समस्त मन ही है,' यह कहने से कामादि भी मनोधर्म ही हैं ।

विवरण—( प्रतिज्ञा ) अन्तःकरण निरवयव नहीं है । ( हेतु ) क्योंकि वह सादिद्रव्य है । ( दृष्टान्त ) घट के समान । इस अनुमान से आपके पूर्वोक्त अनुमान में 'निरवयवत्वात्' = क्योंकि वह निरवयव है, हेतु 'असिद्ध' ठहरता है । अन्तःकरण के सादित्व से उसके सावयवत्व की सिद्धि होती है ओर सावयवत्व से उसके परिणामित्व की सिद्धि होती है । इस विषय में "( प्रतिज्ञा )—अन्तःकरण परिणामी है । ( हेतु )—कारण वह अन्त्यावयवी ( अन्तिम कार्य ) न होकर सावयव है । ( दृष्टान्त )—मृत्तिका के समान ।" ऐसा अनुमान करना चाहिए । इस प्रकार अन्तःकरण सादिद्रव्य होने से सावयव है । और वह घट की तरह अन्त्यावयविद्रव्य नहीं है । इसलिए उसकी परिणामात्मक वृत्ति हो सकती है । इस कारण—अन्तःकरण वृत्तिविशिष्ट आत्मचैतन्य ही ज्ञान है । उससे भिन्न दूसरा कोई भी ज्ञान नहीं । इस आशय से ग्रन्थकार ने 'इत्थम्' इत्यादि ग्रन्थ से उपर्युक्त शंका का समाधान किया है ।

यहाँ अन्तःकरण का सावयवत्व, अनुमान से सिद्ध करना है, इसलिए वह साध्य है । उसकी सिद्धि में 'सादिद्रव्यत्व के कारण' ( यह ) हेतु दिया है । इसमें 'सादि' विशेषण और 'द्रव्यत्व' विशेष्य है । इनका प्रयोजन ( उपयोग ) बताना ही 'पदकृत्य' कहा जाता हैं । 'द्रव्यत्व के कारण' इतना ही यदि कहा होता तो तार्किकों ने अपने दर्शन के अनुसार हेतु में व्यभिचार दिखाया होता क्योंकि 'आत्मा, आकाश, काल इत्यादि द्रव्य तो हैं किन्तु वे सावयव नही हैं ।' यह व्यभिचार वे न दिखा पावें, एतदर्थ हेतु में 'सादि' विशेषण देने से उनका निवारण हो जाता है ।

शंका--आकाशादि नित्य द्रव्यों में सादित्व न होने से अन्तःकरण का सावयवत्व सिद्ध करने के लिए 'सादित्वात्' हेतु ही पर्याप्त है । पुनः 'द्रव्यत्वात्' विशेष्यांश क्यों दिया गया ?

समाधान—सादि निरवयव गुणों का निवारण करने के लिए विशेष्यांश जोड़ा गया है । रूपादि गुण सादि हैं पर सावयव नहीं हैं ।

शंका—परन्तु अन्तःकरण सादि ( उत्पन्न होने वाला ) द्रव्य है—इस विषय में कोई प्रमाण न होने से 'सादि-द्रव्यत्वात्' हेतु में 'सादि' विशेषण 'असिद्ध' है—यह हेतु विशेषणासिद्ध है ।

समाधान—अन्तःकरण के सादित्व में ( जन्यत्व में ) 'ब्रह्म ने मन (अन्तःकरण) को उत्पन्न किया'—श्रुति प्रमाण है । इस प्रकार अन्तःकरण के सादित्व में श्रुतिप्रमाण बताकर उसके ( अन्तःकरण के ) परिणामित्व में, पूर्वोक्त अनुमान ही केवल प्रमाण न

कामादीनां मनोधर्मत्वम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः २९

होकर भगवती श्रुति भी प्रमाण है। इस आशय से 'कामः संकल्पः' इत्यादि श्रुति का निर्देश किया है।

शंका—इस श्रुतिवचन में 'ज्ञान' शब्द तो कहा नहीं है तब उसके अन्तःकरण-धर्मत्व में श्रुति कैसे प्रमाण हो सकती है ?

समाधान—इस श्रुति में 'धी' शब्द से वृत्तिरूप ज्ञान ही विवक्षित है। 'धी' शब्द का अर्थ वृत्तिरूप ज्ञान होने से उसमें मनोधर्मत्व है।

शंका—( प्रतिज्ञा )—श्रुतिगत 'धी'¹ शब्द-वाच्य ज्ञान, मन का धर्म नहीं है, ( अन्तःकरण उसका उपादान कारण नहीं है )—( हेतु )—क्योंकि उसमें मानस-प्रत्यक्षत्व है ( वह मन, इस अन्तरिन्द्रिय को प्रत्यक्ष ज्ञात होता है )। ( दृष्टान्त )—कामादि अन्य पदार्थों के समान। परन्तु 'उसे अन्तःकरणोपादानक न मानने पर 'सर्वं मन एव' श्रुति से विरोध होगा--यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि उस 'धी' शब्दवाच्य ज्ञान का मनोजन्यत्व है ( वह मन से उत्पन्न होता है ) इस अर्थ में उस श्रुति की व्यवस्था लगाई जा सकती है।

समाधान—'सर्वं मन एव'—कामादि समस्त, मन ही ( अन्तःकरण ही ) है, इस श्रुति में 'कामादि समस्त' और 'मन' का सामानाधिकरण्य है। इस कारण 'मृद्घटः' मृत्तिका ही घट है इस वाक्य के मृत्तिका और घट–इन दो शब्दों के सामानाधिकरण्य से ( एक विभक्ति में होने के कारण ) मृत्तिका उपादान है और घट, कार्य अर्थात् उपादेय है, यह जैसे सिद्ध होता है, उसी तरह 'सर्वं मन एव' इस वाक्य में भी 'धी' शब्दवाच्य ज्ञान में भी अन्तःकरणोपादानकत्व है, यह निश्चित किया जाता है। 'अन्तःकरण उस ज्ञान का उपादान नहीं है, वह मनोजन्य है' यह स्वीकार करने में 'सर्वम्' और 'मनः' शब्दों का सामानाधिकरण्य बाधक है। इसके अतिरिक्त आपने उपर्युक्त अनुमान में 'कामादि अन्य पदार्थों के समान' दृष्टान्त दिया है। परन्तु यह दृष्टान्त साध्यविकल है। 'ज्ञान का अन्तःकरणोपादानकत्व न रहना' साध्य है। उसमें कामादि को तो अन्तःकरणोपादानकत्व ही है, तदनुपादानकत्व नहीं है। इसलिए 'कामादिक' साध्य से विकल ( शून्य ) हैं। इस आशय से ग्रन्थकार कहते हैं—'अत एव' उस कारण ही अर्थात् 'सर्वं मन एव' ऐसी सामानाधिकरण्यश्रुति होने से ही श्रुत्युक्त कामादि समस्त वृत्तियों में मनोधर्मत्व है। वे सब वृत्तियाँ अन्तःकरणोपादानक हैं। अब श्रुत्युक्त कामादिकों में भी अन्तःकरणोपादानकत्व ( मनोधर्मत्व ) है—इस सिद्धान्त पर शंका—


१. 'धी'-शब्दवाच्यं ज्ञानं, अन्तःकरणोपादानकं न भवति, मानसप्रत्यक्षत्वात् कामादिवत्।'
अत्र दृष्टान्तः साध्यविकलः। ज्ञाने अन्तःकरणोपादानकत्वाभाववत्त्वस्य साध्यत्वात्। कामादीनां तु अन्तःकरणोपादानकत्वमेवेति।

३० | वेदान्तपरिभाषा | [ कामादीनां मनोधर्मत्वम् ]

ननु कामादेरन्तःकरणधर्मत्वेऽहमिच्छाम्यहंजानाम्यहं बिभेमीत्या-
द्यनुभव आत्मधर्मत्वमवगाहमानः कथमुपपद्यते ?

अर्थ—'काम, संकल्प, संशय आदि अन्तःकरण के धर्म हैं—कहने पर 'मैं इच्छा करता हूँ, मैं जानता हूँ, मैं डरता हूँ, इत्यादि आत्मधर्मत्व को विषय करने वाला ( इच्छा, ज्ञान, भय, ये सब अहं शब्द-वाच्य आत्मा के धर्म हैं इस प्रतीति का विषय होने वाला ) अनुभव कैसे उपपन्न होता है ?

विवरण—'मैं इच्छा करता हूँ, मैं जानता हूँ', ऐसा प्रत्यक्ष अनुभव होते रहने से काम, संकल्प, ज्ञान इत्यादि सब आत्मा के धर्म हैं, अन्तःकरण के नहीं। यह सिद्ध होता है, क्योंकि 'अहम्'—मैं अर्थात् आत्मा। अहंकार को बिना विषय किये आत्मा का अनुभव कभी नहीं होता। सोने के बाद जागने पर 'मैं सुखपूर्वक सोया' यह स्मरण होने से सुषुप्ति में भी अहंकार का भान होता है ऐसा मानना पड़ता है। परन्तु कामादि को अन्तःकरण का धर्म मानने पर 'मैं इच्छा करता हूँ' इस प्रत्यक्ष अनुभव से विरोध आता है। प्रत्यक्ष अनुभव, श्रुति से भी प्रबल है। क्योंकि वह ज्येष्ठ ( सब प्रमाणों से पहिले उपस्थित होनेवाला, सब ज्ञान और ज्ञानकरणों का कारण ) है। इसलिए 'मैं इच्छा करता हूँ', 'मैं जानता हूँ' इस प्रत्यक्ष अनुभव से विरोध न हो एतदर्थ कामादिकों को आत्मधर्म ही मानना चाहिए, उन्हें अन्तःकरणधर्म मानना उचित नहीं। अतः अन्तः-करण, कामादिकों में निमित्त है, उपादान नहीं। यह—इस शंका का आशय है।

उच्यते। अयःपिण्डस्य दग्धृत्वाभावेऽपि दग्धृत्वाश्रय-वह्नि-
तादात्म्याध्यासात् यथा अयोदहतीति व्यवहारस्तथा सुखाद्याकार-
परिणाम्यन्तःकरणैक्याध्यासात् अहं सुखी दुःखीत्यादिव्यवहारः¹ ॥

अर्थ—( उपर्युक्त शंका का समाधान किया जाता है ) कामादिकों को किस प्रकार मनोधर्मत्व है उसे बताते हैं—लोहे के गोले में दग्धृत्व ( दाह करने का सामर्थ्य ) न होने पर भी दग्धृत्व धर्म से युक्त हुए ( दग्धृत्व धर्म का आश्रय ) अग्नि के तादात्म्य का अध्यास होने से 'यह लोहा ( लोहे का गोला ) जला रहा है' ऐसा व्यवहार जिस तरह होता है, उसी तरह सुखादि आकारों में परिणत हुए अन्तःकरण से आत्मा के ऐक्य का अध्यास होने पर 'मैं सुखी, मैं दुःखी' इत्यादि व्यवहार होता है।

**विवरण—**यदि कामादि, अन्तःकरण के ही धर्म हैं तो 'मैं इच्छा करता हूँ' इत्यादि शब्द-व्यवहार कैसे होता है ? सुखादि विषयों के आकार में परिणत (विकसित) हुए अन्तःकरण के साथ आत्मा का ऐक्याध्यास (तादात्म्य) हो जाने से वैसा व्यवहार होता है। अर्थात् सब प्रमाणों में प्रत्यक्ष प्रमाण की प्रथमता होने से ही वह


१. रो जायते-इति पाठान्तरम् ।

मनसः इन्द्रियत्वखण्डनम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ३१

श्रुति से प्रबल नहीं ठहरता। क्योंकि 'यह रजत है' ऐसा भ्रमज्ञान यद्यपि प्रथमतः होता है तथापि 'यह रजत नहीं, शुक्तिका है' आगे होने वाले इस सम्यक् ज्ञान से वह बाधित होता है। उसी तरह प्रत्यक्ष, अन्य प्रमाणों का उपजीव्य (कारण) होने से प्रबल है, यह सच होने पर भी वह प्रत्यक्ष, जिस व्यावहारिक प्रामाण्य से श्रुति का उपजीव्य होता है, उसके उस व्यावहारिक प्रामाण्य का बाध श्रुति नहीं करती। श्रुति तो केवल उसके तात्त्विक प्रामाण्य का ही बाध करती है।

कामादि वृत्तियों का अन्तःकरणधर्मत्व-बोधन कराने में ही प्रकृत श्रुति का तात्पर्य है। इसलिए 'मैं इच्छा करता हूँ' इत्यादि प्रत्यक्ष अनुभव का बाध करके ही कामादिक मनोधर्म हैं ऐसा समझना चाहिए।

व्यवहार में प्रत्यक्ष प्रमाण, श्रुति की अपेक्षा प्रबल है, परन्तु परीक्षित (प्रमाण से निरूपित किये हुए) प्रत्यक्ष का प्राबल्य है। 'मैं इच्छा करता हूँ' इत्यादि प्रत्यक्ष-अनुभव के प्रमाणों से निरूपण कर कामादिकों को आत्मधर्मत्व सिद्ध नहीं हुआ है। क्योंकि आप जैसा कह रहे हैं उस तरह 'आत्मा' अहं पदवाच्य नहीं है (अहं शब्द का अर्थ आत्मा नहीं है) क्योंकि सुषुप्ति में 'अहम्' इत्याकारक अनुभव नहीं हुआ करता। किन्तु 'मैं सुख से सोया था' यह चैतन्य-अंश में स्मरण है, और अन्तःकरण-अंश में अनुभव है। इस कारण अन्तःकरण और चैतन्य का परस्पर विवेक न होने से (वे दो भिन्न पदार्थ हैं यह ज्ञान न होने से) मैं दुःखी, मैं सुखी, मैं चाहता हूँ इत्यादि अनुभव, स्वरूप-चैतन्य के अज्ञान से अन्तःकरण में होने वाला तादात्म्य-भ्रम है। लोहा पार्थिव पदार्थ होने से उसका स्पर्श अनुष्णाशीत है। परन्तु उसे अग्नि में तप्त करने पर यदि स्पर्श किया जाय तो हाथ जलता है। किन्तु 'हाथ जलाना रूप दग्धृत्व' वस्तुतः लोहे का धर्म न होकर, अग्नि का है। तथापि 'इस लोहे से मेरा हाथ जल गया' यह शब्द व्यवहार होता है। क्योंकि अनुष्णाशीत लोहे का गोला और दाहक अग्नि का तादात्म्य होने से 'लोहे से ही हाथ जला' यह भ्रम होता है। इसी तरह 'मैं इच्छा करता हूँ' इत्यादि शब्द-व्यवहार कामसुखादि विषयाकार से परिणत होने वाले अन्तःकरण का चैतन्यरूप आत्मा से तादात्म्य हो जाने से होता है, परन्तु वह भ्रामक है। इस कारण 'मैं इच्छा करता हूँ' इस अपरीक्षित प्रत्यक्ष-प्रमाण से पूर्वोक्त श्रुति का बाध नहीं होता। इसलिए 'कामादि सब मन ही है' यह श्रुति कामादिकों के मनोधर्म होने में प्रमाण है। परन्तु लोहा और अग्नि की तरह आत्मा और अन्तःकरण के तादात्म्याध्यास का सम्भव ही नहीं होता, यह शंका करते हैं—

(मनसोऽनिन्द्रियत्वनिरूपणम्)

नन्वन्तःकरणस्येन्द्रियतयाऽतीन्द्रियत्वात् 'कथमहमिति प्रत्यक्षविषयतेति।


१. कथं प्रत्यक्षविषयतेति—पाठान्तरम्।

३२ वेदान्तपरिभाषा [ मनसः इन्द्रियत्वखण्डनम्

अर्थ-- अन्तःकरण के इन्द्रियत्व होने से (अर्थात् अन्तःकरण इन्द्रिय होने से) वह अतीन्द्रिय है (इन्द्रिय का विषय नहीं होता) कोई भी इन्द्रिय, प्रत्यक्ष नहीं दिखाई देती तब उसे 'अहम्' इस प्रकार इन्द्रिय-विषयत्व कैसे? ('मैं' इस प्रकार प्रत्यक्ष अनुभव कैसे होता है)।

विवरण-- अग्नि और लोहे का गोला दोनों के प्रत्यक्ष होने से उनका परस्पर तादात्म्याध्यास होकर लोहा 'जलाता है' यह भ्रामक व्यवहार हो सकता है। परन्तु आत्मा और अन्तःकरण में से आत्मा, प्रत्यक्षविषय और अन्तःकरण, प्रत्यक्षाविषय (अतीन्द्रिय) है। तब प्रत्यक्षविषय आत्मा और अतीन्द्रिय अन्तःकरण का तादात्म्याध्यास कैसे हो सकेगा? और जब तादात्म्याध्यास का ही संभव नहीं तब 'मैं इच्छा करता हूँ' यह भ्रामक व्यवहार भी कैसे होगा?

'अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य' यह 'अहं' शब्द का अर्थ होना संभव नहीं। क्योंकि अन्तःकरण 'इन्द्रिय' है, और इन्द्रिय, अतीन्द्रिय होती है। इसलिए वह अन्तःकरण, प्रत्यक्षप्रमा का विषय नहीं बन सकता। इस विषय में अनुमान^१ इस प्रकार किया जाता है—

(प्रतिज्ञा)—अन्तःकरण अतीन्द्रिय है। (हेतु)—क्योंकि वह इन्द्रिय है। (दृष्टान्त)—चक्षुःश्रोत्रादि इन्द्रियों के समान। इस आशय से वादी के शंका करने पर समाधान—

उच्यते। न तावदन्तःकरणमिन्द्रियमित्‍यत्र मानमस्ति। 'मनः षष्ठानीन्द्रियाणि' इति भगवद्गीतावचनं प्रमाणमिति चेत् न। अनिन्द्रियेणाऽपि मनसा षट्त्वसङ्ख्यापूरणाविरोधात्। न हीन्द्रियगतसङ्ख्यापूरणमिन्द्रियेणैवेति नियमः। 'यजमानपञ्चमा इडां भक्षयन्ति' इत्यत्र ऋत्विग्गतपञ्चत्वसङ्ख्याया अनृत्विजाऽपि यजमानेन पूरणदर्शनात्। वेदानध्यापयामास महाभारतपञ्चमान्' इत्यत्र^२ वेदगतपञ्चत्वसङ्ख्याया अवेदेनापि महाभारतेन पूरणदर्शनात्। 'इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः' (का० १-३-१०) इत्यादिश्रुत्या मनसोऽनिन्द्रियत्वावगमाच्च।

अर्थ— (उपर्युक्त शंका का समाधान कहते हैं—'अन्तःकरण इन्द्रिय है' तुम्हारे इस


१. अनुमान प्रयोग:—
'अन्तःकरणम् अतीन्द्रियम् इन्द्रियत्वात् चक्षुरादिवत्'
२. त्यादौ–इति पाठान्तरम्।

मनसः इन्द्रियत्वखण्डनम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ३३

इस कथन में पहिले तो कोई प्रमाण नहीं है।$^१$ 'जीव, मृत्यु के समय मन जिनमें छठवाँ है ऐसी इन्द्रियों का आकर्षण करता है'—गीता के पन्द्रहवें अध्याय का भगवान् का यह वचन ही मन के (अन्तःकरण के) इन्द्रियत्व में प्रमाण है—यह कहो तो ठीक नहीं है। क्योंकि इन्द्रिय न होकर भी मन से इन्द्रियों की छठी संख्या की पूर्ति करने में कोई विरोध नहीं है। क्योंकि इन्द्रियों की संख्या-पूर्ति इन्द्रिय से ही करने का कोई नियम नहीं है। इसी कारण 'यजमान जिनमें पाँचवाँ है ऐसे ऋत्विज, इडा का भक्षण करते हैं'$^१$ इस श्रौत (वैदिक) वचन में ऋत्विजों की पांचवीं संख्या ऋत्विजों से भिन्न यजमान के द्वारा भी पूर्ण की हुई दिखाई देती है। इसी तरह 'महाभारत जिसमें पाँचवाँ है ऐसे वेदों को पढ़ाया' इस स्मृतिवाक्य में भी वेदों की पांचवीं संख्या वेद से भिन्न महाभारत के द्वारा पूर्ण की हुई दिखाई देती है। इसी तरह 'इन्द्रियों से वासना- त्मक अर्थ परे है, उस वासनात्मक अर्थ से मन परे' है। इत्यादि श्रुति से भी मन का इन्द्रिय न होना ज्ञात होता है।

विवरण--'अन्तःकरण, इन्द्रिय होने से वह प्रत्यक्ष ज्ञान का विषय नहीं है' वादी के इस कथन का उत्तर हम इस प्रकार देते हैं—अन्तःकरण (मन) के अन्तरिन्द्रिय होने में कोई प्रमाण नहीं है। जब कि वह इन्द्रिय ही नहीं तब उसका अतीन्द्रियत्व कैसे सिद्ध हो सकता है। अतः अन्तःकरण प्रत्यक्ष-विषय नहीं होता, यह कथन अनुचित है। इसी बात को 'न तावद्' इत्यादि ग्रन्थ से सूचित किया है।

वादी की पुनः शंका--'मनः षष्ठानीन्द्रियाणि०' मन जिनमें छठा है ऐसी इन्द्रियों का जीव आकर्षण करता है—इत्यादि भगवद्-वाक्य मन के इन्द्रिय होने में प्रमाण है।

समाधान--इन्द्रियों की षष्ठ—संख्यापूर्ति अनिन्द्रिय 'मन' से भी की जा सकती है। अतः वादी के द्वारा प्रदर्शित भगवद् वाक्य से कोई विरोध नहीं है। भगवद्-वाक्य का तात्पर्य मन को इन्द्रियत्व बताने में ही नहीं है। मन को इन्द्रिय बताने वाली कोई श्रुति भी नहीं है। 'मेरा मन' इस अनुभव से भी मन का अनिन्द्रियत्व सिद्ध होता है।

इस पर भी मन का इन्द्रियत्व सिद्ध करने के लिए यदि आप अनुमान$^२$—प्रमाण को


१. सिद्धेन हेतुना साध्यं साधनीयं भवति। अत्र तु सिद्धेन इन्द्रियत्व-हेतुना अन्तः- करणस्य अतीन्द्रियत्वं साधनीयं, न असिद्धेन। अत्र च हेतुरेव असिद्धः।

२. यद् यद्गतसंख्यापूरकं तत् तज्जातीयमितिनियमेन मनस इन्द्रियगतसंख्यापूरकत्व- मिन्द्रियत्वं विना अनुपपन्नमिति इन्द्रियत्वं कल्पयति। अतो मनस इन्द्रियत्वे अर्थापत्तिः प्रमाणम्। तथाऽनुमानमपि—'मनः, इन्द्रियम्, इन्द्रियगतसंख्यापूरकत्वात्, यन्नैवं तन्नैवमिति।

किन्तु उक्तनियमस्य अनैकान्तिकत्वम्, अनुमानस्य च अप्रयोजकत्वं वर्तते। नियमव्य- भिचारो यथा—'यजमानपञ्चमा इडां भक्षयन्ति'—इति श्रुत्या यजमानसहितानां चतुर्णां- मृत्विजामिडाभक्षणं विधीयते। तत्र यजमानो यदि ऋत्विक् स्यात्, ऋत्विजामिडाभक्ष-

३४ वेदान्तपरिभाषा [ मनसः इन्द्रियत्वखण्डनम्

उपस्थित करें—'( प्रतिज्ञा ) मन इन्द्रिय है, ( हेतु ) इन्द्रियों की संख्या का पूरक होने से' तो इसमें हेतु प्रयोजक ( साध्य साधन में असमर्थ ) है । क्योंकि अनिन्द्रिय मन से भी इन्द्रियों की संख्यापूर्ति की जा सकती है ।

शिवाय उपर्युक्त अनुमान में 'जो इन्द्रियगत संख्यापूरक हो इन्द्रिय है' यह विशेष व्याप्ति, उसका ( अनुमान का ) मूल है, अथवा 'जो जिसका संख्यापूरक हो वह उसकी जाति का होता है' यह सामान्य व्याप्ति, उसका ( अनुमान का ) मूल है, ऐसा विकल्प करते हैं, किन्तु यहाँ दोनों पक्ष सम्भव नहीं हैं, इस आशय से सिद्धान्ती का कथन है कि ' इन्द्रियगत संख्या की पूर्ति इन्द्रिय से ही की जाय' ऐसा नियम न होने से विशेष व्याप्ति का यहाँ सम्भव नहीं है क्योंकि ऐसा दृष्टान्त कहीं दिखाई नहीं देता ।

इसी तरह पूर्वोक्त सामान्य व्याप्ति भी उपर्युक्त अनुमान में मूल नहीं है—क्योंकि 'यजमान जिसमें पांचवां है ऐसे ऋत्विज इडा भक्षण करते हैं, इस उदाहरण में 'ऋत्विजों की पञ्च-संख्या का पूरक यजमान है, परन्तु वह ऋत्विक् नहीं है । इस कारण 'जो जिनकी संख्या का पूरक होता है वह उनकी जाति का होता है' यह सामान्य व्याप्ति भी यहाँ घटित नहीं होती । इस प्रकार श्रौत उदाहरणों में व्याप्ति का भंग दिखलाकर सिद्धान्ती स्मार्त्त-उदाहरण में भी उसका भंग दिखाता है—'महाभारत जिसमें पांचवां है ऐसे वेद को अध्यापक ने पढ़ाया' उदाहरण में वेदगत पंचत्व ( पाँच ) संख्या जिस महाभारत के योग से पूर्ण होती है वह इतिहास नाम से प्रसिद्ध महाभारत पौरुषेय ( व्यास रचित ) होने से अपौरुषेय वेद की कोटि में नहीं है । जैसे 'मैं नक्षत्रों में चन्द्र हूँ' यह वचन चन्द्र के नक्षत्र होने में प्रमाण नहीं, वैसे ही 'इन्द्रियों में मन मैं हूँ' यह वचन भी मन के इस इन्द्रिय होने में प्रमाण नहीं है ।

शंका—मन के इन्द्रिय होने में बाधक प्रमाण तो कोई है नहीं ।

उत्तर—'इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः' यह श्रुति 'इन्द्रियों से पर विषय ( सूक्ष्म ), व्यापक और नित्य विषयों से मन पर है' बताकर मन के अनिन्द्रियत्व का बोधन कराती है । अतः मन के इन्द्रिय होने में बाधक प्रमाण नहीं है यह कथन अनुचित है । उसके इन्द्रियत्व की बाधक प्रत्यक्ष श्रुति ही प्रमाण है ।

शंका—'इन्द्रियेभ्यः पराः०' इस श्रुति का अर्थ इस प्रकार भी संभव हो सकता है— मन इन्द्रिय को छोड़कर अन्य सब इन्द्रियों से अर्थ पर है, और मन-इन्द्रिय उन अर्थों से


णेनैव तस्यापि तत् प्राप्तमिति 'यजमानपञ्चमा' इति नोक्तं स्यात्, किन्तूच्यते । तस्मात् ज्ञायते—यजमानो न ऋत्विक् इति । तेन अनृत्विजापि यजमानेन तथा ऋत्विग्गतसंख्यापूरणं, तथैवानिन्द्रियेणाऽपि मनसा इन्द्रियगतसंख्यापूरणम् । एवञ्चात्र नियमस्य व्यभिचरितत्वात् न तेन मनसः इन्द्रियत्वसिद्धिः ।

मनसः इन्द्रियत्वखण्डनम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ३५

( विषयों से ) भी पर है । अतः 'मन विषयों से पर है' इतना कह देने मात्र से वह इन्द्रिय नहीं है, यह सिद्ध नहीं होता ।

समाधान—उपर्युक्त 'इत्यादिश्रुत्या' इस वाक्य के आदि शब्द से 'एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च' ( मुं० २।१।३ ) इस पुरुष से प्राण, मन, सब इन्द्रियाँ, आकाश इत्यादि उत्पन्न होते हैं' इस श्रुति का ग्रहण किया गया है। इसलिए आदि शब्द से गृहीत इस श्रुति से एक वाक्यता को प्राप्त होकर 'इन्द्रियों से पर रहनेवाले विषयों से मन पर है' यह श्रुति मन के अनिन्द्रियत्व का बोधन कराती है । तस्मात् मन ( अन्तःकरण ) को इन्द्रियत्व नहीं है । अर्थात् मन इन्द्रिय नहीं है ।

मन की इन्द्रियता मुख्य न होकर गौणरूप से मानी जा सकती है, इससे उसकी प्रत्यक्ष प्रतीति का भी बाध नहीं होगा । 'वेदानध्यापयामास' इस वाक्य में महाभारत भी सकल वेदार्थ प्रतिपादक होने से गौणरूप से वेद है, यह स्वीकार करना चाहिए । इस पर सिद्धान्ती, तार्किकों की एक शंका का अनुवाद करके इसका समाधान करता है ।

न चैवं मनसोऽनिन्द्रियत्वे सुखादिप्रत्यक्षस्य साक्षात्त्वं न ^१स्यादिन्द्रियाजन्यत्वादिति वाच्यम् । ^२न हीन्द्रियजन्यत्वेन ज्ञानस्य साक्षात्त्वम्, अनुमित्यादेरपि मनोजन्यतया साक्षात्त्वापत्तेः, ईश्वरज्ञानस्यानिनिन्द्रियजन्यस्य^३ साक्षात्त्वानापत्तेश्च ॥

अर्थ—मन की इन्द्रियता को स्वीकार न करने पर सुखादिकों के प्रत्यक्ष अनुभव की प्रत्यक्षता नहीं बन सकेगी, क्योंकि वह इन्द्रिय से जन्य नहीं है । परन्तु यह कहना उचित नहीं है, कारण ज्ञान को इन्द्रिय-जन्यत्व होने से ( ज्ञान इन्द्रियों से उत्पन्न होता है इसलिये ) उसका साक्षात्त्व ( प्रत्यक्षत्व ) है, यह नहीं कहा जा सकता । इन्द्रियजन्य होने से ज्ञान का साक्षात्त्व ( प्रत्यक्षत्व ) यदि स्वीकार किया जाय तो अनुमितिज्ञान, उपमितिज्ञान इत्यादि अन्य ज्ञान भी मन से ही उत्पन्न होने से उन्हें भी साक्षात्त्व ( प्रत्यक्षज्ञान ) कहना होगा । और ईश्वर का ज्ञान इन्द्रियजन्य न होने से उसे साक्षात्त्व नहीं है यह कहना होगा । ईश्वर का ज्ञान इन्द्रियों से पैदा न होने से उसे साक्षात्त्व की


१. "इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम्" इति न्यायसूत्रात् प्रत्यक्षत्वे इन्द्रियजन्यत्वं प्रयोजकम् । अतो मनस अनिन्द्रियत्वाभ्युपगमे तज्जन्यसुखादिज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वं न भवेत्, यतो हि कारणाभाव एव कार्याभावे हेतुरितिनियमादिति शङ्काकर्तुर्नैयायिकस्याशयः।

२. अनुमित्यात्मकस्य ज्ञानस्य मनोरूपेन्द्रियजन्यत्वेऽपि अप्रत्यक्षत्वमिति प्रत्यक्षे इन्द्रियजन्यत्वम्प्रयोजकं नास्ति, इति सिद्धान्तिन आशयः।

३. 'तया'-इति पाठान्तरम् ।

३६ | वेदान्तपरिभाषा | [ मानसः इन्द्रियत्वखण्डनम्

अनापत्ति ( अप्राप्ति ) होगी । ( परन्तु अनुमित्यादि अप्रत्यक्ष ज्ञानों को प्रत्यक्षत्व प्राप्त होना और ईश्वरज्ञान का साक्षात्त्व नष्ट होना, ये दोनों अनिष्ट हैं ) ।

विवरण— 'इन्द्रियजन्य ज्ञान को तो प्रत्यक्षत्व है परन्तु मन में इन्द्रियत्व नहीं है' ऐसा कहने से सुखदुःखादि का प्रत्यक्षत्व नहीं है यह सिद्ध होगा । क्योंकि मन तो इन्द्रिय नहीं है और सुख-दुःखादि का ज्ञान उसी से होता है तब अनिन्द्रियमनोजन्य सुख-दुःखादिकों के अनुभव की प्रत्यक्षता कैसे बन सकेगी । परन्तु सुखादिकों की तो प्रत्यक्ष-रूपेण उपलब्धि होती है अतः उनके प्रत्यक्षत्व की सिद्धि के लिये मन का इन्द्रियत्व अवश्य स्वीकार करना होगा । यह शंका 'इन्द्रियजन्यं ज्ञानं प्रत्यक्षम्' ( इन्द्रिय से उत्पन्न होने वाले ज्ञान को प्रत्यक्ष कहते हैं ) प्रत्यक्ष ज्ञान का इस प्रकार लक्षण करने वाले तार्किकों की है । उसका अनुवाद करके सिद्धान्ती—

समाधान— ज्ञान की प्रत्यक्षता में इन्द्रियजन्यत्व प्रयोजक ( निमित्त ) नहीं है । अतः 'सुखादिकों के साक्षात् अनुभव में इन्द्रियजन्यत्व न होने से उसे साक्षात्त्व नहीं है, यह कहना ठीक नहीं है ।

प्रश्न— प्रत्यक्षत्व में इन्द्रियजन्यत्व को प्रयोजक मानने में क्या बाधक है ?

उत्तर— तार्किक लोग मन को अन्तरिन्द्रिय कहते हैं और ज्ञान की प्रत्यक्षता में 'इन्द्रियजन्यत्व' को प्रयोजक मानते हैं । परन्तु सुखादिज्ञानों की प्रत्यक्षता सिद्ध करने के लिए उपर्युक्त प्रयोजक के अनुसार मन में इन्द्रित्व है तो मनोजन्य अनुमिति, उपमिति इत्यादि अन्य ज्ञान भी प्रत्यक्ष हैं ऐसा कहने का प्रसंग आवेगा । यही प्रत्यक्षत्व में इन्द्रियजन्यत्व को प्रयोजक मानने में बाधक है ।

इन्द्रियत्वरूप से इन्द्रियजन्यत्व, प्रत्यक्षता में प्रयोजक है और अनुमिति, उपमिति आदि ज्ञानों में मनस्त्वेन रूप से इन्द्रियजन्यत्व है, इस कारण ऐसा अतिप्रसंग ( अति-व्याप्ति ) नहीं हो पाता । ऐसा यदि आप कहें तो 'ईश्वर का ज्ञान' इन्द्रियजन्य न होने से उसे साक्षात्त्व नहीं है, यह कहने का प्रसंग आवेगा, अर्थात् आप का बताया हुआ 'प्रत्यक्षत्वप्रयोजक' ईश्वरज्ञान में अव्याप्त रहेगा । अथवा 'इन्द्रियजन्यत्व' का अर्थ 'इन्द्रियसन्निकर्षजन्यत्व' विवक्षित करेंगे तो अनुमिति आदि प्रमाएँ इन्द्रियसन्निकर्षजन्य न होने से प्रत्यक्षप्रयोजक का लक्षण अतिव्याप्त नहीं हो सकेगा । 'ईश्वर का ज्ञान अजन्य और प्रत्यक्षरूप है' यह कथन सर्वसम्मत नहीं है । अद्वैती उसे मायाजन्य मानते हैं । तथापि 'वह इन्द्रियजन्य नहीं' यह सर्वसम्मत है । तस्मात् मन के इन्द्रियत्व में कोई प्रमाण नहीं है, प्रत्युत बाधक प्रमाण हैं । इसलिए 'मन' इन्द्रिय नहीं है, इसी कारण 'मैं इच्छा करता हूँ'—इत्यादि अनुभव में अन्तःकरण का प्रत्यक्ष संभव होता है ।

इस प्रकार सिद्धान्ती के द्वारा तार्किकों के अभिमत प्रत्यक्षत्वप्रयोजक का निरसन किये जाने पर सिद्धान्तपक्ष में भी दूसरा प्रत्यक्षत्वप्रयोजक नहीं बन सकता, यह समझने-वाले तार्किक का आक्षेप—

प्रत्यक्षलक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ३७

सिद्धान्ते १प्रत्यक्षत्वप्रयोजकं किमिति चेत्, किं ज्ञानगतस्य प्रत्यक्षत्वस्य प्रयोजकं पृच्छसि किं वा विषयगतस्य ? आद्ये प्रमाणचैतन्यस्य विषयावच्छिन्नचैतन्याभेद इति ब्रूमः । तथा हि त्रिविधं चैतन्यं २विषयचैतन्यं प्रमाणचैतन्यं प्रमातृचैतन्यं चेति । तत्र घटाद्यवच्छिन्नं चैतन्यं विषयचैतन्यम्, अन्तःकरणवृत्त्यवच्छिन्नं चैतन्यं प्रमाणचैतन्यम्, अन्तःकरणावच्छिन्नं चैतन्यं प्रमातृचैतन्यम् ॥

अर्थ— ( इन्द्रियजन्यत्व यदि प्रत्यक्षता में प्रयोजक नहीं है तो ) आप के सिद्धान्त में भी प्रत्यक्षत्व का क्या प्रयोजक है ? इस प्रकार तार्किक के द्वारा पूछे जाने पर सिद्धान्ती प्रश्न को स्पष्ट कराने के लिए तार्किकों से ही प्रश्न करता है—हम (सिद्धान्ती) तुमसे पूछते हैं कि तुम ज्ञानगत-प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक पूछ रहे हो, या विषयगत प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक पूछ रहे हो ? ज्ञानगत प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक यदि पूछो तो प्रमाणचैतन्य का विषयावच्छिन्न चैतन्य से अभेद ( तादात्म्य, ऐक्य ) होना, ज्ञानगत प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक है—ऐसा हम कहते हैं । ( परन्तु एक ही अद्वितीय चैतन्य का भेद कैसे संभव होता है ? उत्तर—वास्तव में चैतन्य के एक होने पर भी उसका उपाधि के कारण इस प्रकार भेद होता है ) तथाहि—चैतन्य त्रिविध है—एक विषय चैतन्य, दूसरा प्रमाण चैतन्य व तीसरा प्रमातृचैतन्य । इन तीन प्रकार के चैतन्यों में से घटादि विषयों से अवच्छिन्न ( मर्यादित ) हुआ चैतन्य–विषयचैतन्य, अन्तःकरण की वृत्ति से अवच्छिन्न हुआ चैतन्य–प्रमाणचैतन्य, और अन्तःकरणावाच्छिन्न हुआ चैतन्य–प्रमातृचैतन्य है ।

**विवरण—**प्रत्यक्ष प्रमा का प्रयोजक ( कारण ) कोई तो अवश्य ही होगा । इन्द्रिय-


१. 'प्रत्यक्ष' शब्दस्य व्यवहारो प्रत्यक्षात्मके ज्ञाने, तद्विषये, तत्प्रमाणे चोपलभ्यते, प्रत्यक्षं ज्ञानम्, प्रत्यक्षो विषयः, प्रत्यक्षम्प्रमाणमिति । तेषु प्रमाणगतस्य प्रत्यक्षत्वस्य प्रयोजकं प्रत्यक्षप्रमाकरणत्वम् । तस्य प्रसिद्धत्वात् प्रागुक्तत्वाच्च तन्नैव जिज्ञास्यम् । ज्ञानगतस्य विषयगतस्य च प्रत्यक्षत्वस्य प्रयोजकं नैकं, किन्तु भिन्नम् । अतः तयोः कतरत् तव जिज्ञास्यमिति विभज्य पृच्छति ? इति सिद्धान्तिन आशयः ।

नैयायिकास्तावत् इन्द्रियजन्यत्वं ज्ञानगतप्रत्यक्षत्वे प्रयोजकम्, प्रत्यक्षज्ञानविषयत्वञ्च विषयगतप्रत्यक्षत्वे प्रयोजकम् इत्याहुः ।

वेदान्तिनस्तु प्रत्यक्षज्ञानविषयत्वरहितं स्वतोऽपरोक्षरूपं कञ्चन साक्षिणं मन्यन्ते । अतस्तस्य प्रत्यक्षत्वं न तद्विषयत्वप्रयुक्तम्, किन्तु अन्यप्रयुक्तमिति प्रयोजकद्वयजिज्ञासा समुचितेतिभावः ।

२. प्रमातृचैतन्यं प्रमाणचैतन्यं विषयचैतन्यं चेति । पाठान्तरम् ।

३८ वेदान्तपरिभाषा [ प्रत्यक्षलक्षणम्

जन्यत्व ही उसका प्रयोजक है, ऐसा तार्किक लोग मानते हैं। परन्तु वेदान्ती मन को इन्द्रिय नहीं कहते, प्रत्युत मन के इन्द्रियत्व का निराकरण करते हैं। परन्तु 'मैं सुखी हूँ' इत्यादि प्रत्यक्ष अनुभव में आनेवाले साधारण ज्ञानों में अनुवृत्त ( व्यापक ) होने वाला दूसरा प्रयोजक उपलब्ध न होने से सुखादिकों में प्रत्यक्षत्व नहीं है—ऐसा अनुभवविरुद्ध स्वीकार करना होगा। इस आशय से 'वेदान्त सिद्धान्त में प्रत्यक्षता का प्रयोजन क्या है ? कुछ भी नहीं है' इस प्रकार तार्किक के कहने पर सिद्धान्ती 'हमारे सिद्धान्त में प्रत्यक्षता का प्रयोजक है' कहने के उद्देश्य से तार्किकों के उपर्युक्त आक्षेप का निरसन करने के लिए उनसे प्रश्न करता है कि 'तुम ज्ञान ( वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य ) की प्रत्यक्षता का कारण पूछ रहे हो या ज्ञेय ( विषय ) की प्रत्यक्षता का प्रयोजन पूछ रहे हो ? तब वादी ने कहा कि—'मैं ज्ञानगत ( ज्ञान की ) प्रत्यक्षत्व ( प्रत्यक्षता ) का प्रयोजक ( कारण ) पूछ रहा हूँ ।' यह सुनकर सिद्धान्ती ने उत्तर दिया "प्रमाणचैतन्य ( वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य ) और प्रमेयचैतन्य ( विषयावच्छिन्न चैतन्य ) इन दोनों का ऐक्य ही ज्ञानगत प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक है ।"

तब वादी पूछता है—तुम अद्वैतियों के मत में चैतन्य का प्रमाणचैतन्य और प्रमेयचैतन्य आदि भेद ही कैसे संभव हो सकता है ? और यदि वह असंभव है तो 'प्रमाणचैतन्य और प्रमेयचैतन्यों का अभेद' ज्ञानगत प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक होता है यह कैसे कह सकते हो ? सिद्धान्ती—अद्वैतवाद में एक अद्वितीय चैतन्य का वास्तविक भेद नहीं है तथापि आकाश के घटाकाशादि भेदों की तरह उसका भी औपाधिक भेद होना संभव है । उसी को देखिए—विषयचैतन्य, प्रमाणचैतन्य और प्रमातृचैतन्य, यह त्रिविध चैतन्य है । घटादि विषयों से अवच्छिन्न हुआ चैतन्य ही विषयचैतन्य है । अन्तःकरण की वृत्ति से अवच्छिन्न हुआ चैतन्य ही प्रमाणचैतन्य है । अन्तःकरण से अवच्छिन्न हुआ चैतन्य ही प्रमातृचैतन्य है । इस प्रकार सिद्धान्ती ने आकाश के घटाकाश मठाकाशादि औपाधिक भेदों की तरह चैतन्य का भी विषय, अन्तःकरणवृत्ति, और अन्तःकरण इन तीन उपाधियों के कारण त्रिविध भेद होता है । इस प्रकार सिद्धान्ती के कहने पर वादी पूछता है—अन्तःकरण की वृत्ति से अवच्छिन्न हुआ चैतन्य प्रमाणचैतन्य होता है, यह आप कैसे कहते हैं ? क्योंकि अन्तःकरण का परिमाण 'अणु' है । अतः अणुपरिमाणवाले अन्तःकरण की वृति का होना सम्भव नहीं । अन्तःकरण का 'महत् परिमाण' भी नहीं कह सकते, क्योंकि प्राणशक्ति के आश्रयभूत अन्तःकरण की ही उत्क्रान्ति, गति आदि सुनी जाती है । महत् परिमाण से युक्त आकाश, काल आदि पदार्थों की उत्क्रान्ति, गति आदि नहीं हुआ करती । अन्तःकरण को 'मध्यम-परिमाण' वाला भी नहीं कह सकते, क्योंकि देह की तरह उसका 'मध्यम परिमाण' मानने पर देह की तरह उसकी गति भी मन्द माननी होगी । जिससे वह विषय को 'एक क्षण' में प्रकाशित नहीं कर सकेगा । परन्तु वह तो हजारों कोस दूर पर स्थित 'ध्रुव' को भी एक क्षण में प्रकाशित कर देता है ।

वृत्तिनिरूपणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ३९

इसके अतिरिक्त उसका मध्यमपरिमाण मानने पर शरीर के भीतर रहने से बाहर निकलना नहीं बन सकेगा। अतः अन्तःकरण का परिमाण 'अणु' है, यही मानना चाहिये। तब अणुपरिमाणयुक्त पदार्थ की वृत्ति (परिणाम) का होना संभव नहीं। इस कारण 'अन्तःकरणवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य-प्रमाणचैतन्य है' यह आपका कहना ठीक नहीं है। इस प्रकार तार्किकों के शङ्का करने पर सिद्धान्ती कहता है--

अन्तःकरण को अणुपरिमाणयुक्त मानने पर देहव्यापि सुखादियों का जो उपलब्धि होती है (देहगत सुखादियों का जो अनुभव होता है) उसकी उपपत्ति नहीं हो सकेगी। इसलिए मन को 'अणु' कहना ठीक नहीं। इसके अतिरिक्त प्राणशक्ति का आश्रयभूत 'मन' सुदूरस्थित 'ध्रुव' तक जब जायगा तो उसके साथ उससे अवच्छिन्न हुआ जीव भी जायगा, जिससे देह निर्जीव होने का प्रसङ्ग उपस्थित होगा। इसलिये मन (अन्तःकरण) का परिमाण 'मध्यम' ही मानना चाहिये। इस प्रकार अन्तःकरण 'मध्यमपरिमाणता' सिद्ध करके उसकी वृत्ति की संभावना भी दृष्टान्त से बताते हैं।

तत्र यथा तडागोदकं छिद्रान्निर्गत्य कुल्यात्मना केदारान्प्रविश्य तद्वदेव चतुष्कोणाद्याकारं भवति। तथा तैजस¹मन्तःकरणमपि चक्षुरादिद्वारा निर्गत्य घटादिविषयदेशं गत्वादिविषयाकारेण परिणमते²। स एव परिणामो वृत्तिरित्युच्यते। अनुमित्यादिस्थले तु नान्तःकरणस्य वह्न्यादिदेशगमनं, वह्न्यादेश्चक्षुराद्यसन्निकर्षात्।

अर्थ—'जैसे तालाब का जल छेद से निकल कर नाली के रास्ते से होता हुआ खेतों में प्रविष्ट होता है और उसी के आकार का तिकोना, चौकोना या वर्तुलाकार बन जाता है, वैसे ही पूर्वोक्त तीन उपाधियों में से 'तैजस अन्तःकरण' भी चक्षुःश्रोत्रादि इन्द्रियों के


१. अन्तःकरणस्य तैजसत्वविशेषणेन शीघ्रगमनसामर्थ्यं सूच्यते, यद्यपि नाणुपरिमाणमन्तःकरणम्, दूरवर्तिध्रुवादिविषयदेशपर्यन्तं गमनेन देहस्य विषयापरोक्षतादशायां निर्जीवत्वापत्तेः, नापि मध्यमपरिमाणन्तत्, देहादिवन्मन्दगमनप्रसंगेन झटिति विषयप्रतिभानायोगात्, नापि आकाशादिवत् परममहापरिमाणम्, निष्क्रियत्वापत्तेः तथापि अन्तःकरणस्य तैजसद्रव्यत्वेन रविकिरणवत् शीघ्रप्रसरणशीलत्वात् तत्परिणामो वृत्तिरिति सुसंगतमेव।

२. साकारद्रव्यसम्बद्धान्तःकरणस्य द्रव्याकारसमानाकारता तु भवितुमर्हति; किन्तु आकाररहितैर्गुणैः सम्बद्धस्वान्तःकरणस्य कथं गुणाकारसमानाकारता भवितुं शक्येति शंका शांकरभाष्यावलोकनेन निरस्ता भवति। तत्र च गुणादीनां द्रव्याऽभिन्नतया द्रव्याकारस्यैव गुणाद्याकारत्वात्। तथा च शांकरभाष्यम्--"तस्माद् द्रव्यात्मकता गुणस्य। एतेन कर्म-सामान्य-विशेष-समवायानां द्रव्यात्मकता व्याख्याता।"

४० | वेदान्तपरिभाषा | [ वृत्तिनिरूपणम्

द्वारा शरीर से बाहर निकल कर घटादि विषय तक जाता है और घटादि विषयों के आकार में परिणत होता है। उस परिणाम को ही वृत्ति कहते हैं। परन्तु अनुमित्यादि प्रमास्थलों में (अनुमिति, उपमिति इत्यादि प्रमाओं में) 'अन्तःकरण' अग्नि के देश में नहीं जाता, क्योंकि उस समय अग्नि आदि विषयों का चक्षुरादि इन्द्रियों से सन्निकर्ष (सम्बन्ध) नहीं हुआ रहता।

विवरण— किसी तालाब या नदी का बाँध से रोक रखा जल किसी नहर अथवा स्वाभाविक मार्ग से ही बहकर खेत में प्रविष्ट होकर उस विशिष्ट आकार को धारण कर लेता है। अन्तःकरण के परिणाम होने के विषय में यह दृष्टान्त दिया है। इस जल के परिमाण की तरह ही 'तैजस अन्तःकरण' का भी परिणाम होता है। 'अन्तःकरण' सत्त्वगुण का कार्य है। सत्त्व को ही 'तेज' कहते हैं। क्योंकि वह प्रकाशक है। 'तैजस' विशेषण से अन्तःकरण अत्यन्त स्वच्छ, विरल, तेजोद्रव्य है, यह सूचित किया है। इसलिये सूर्यकिरण की तरह वह (अन्तःकरण) शीघ्र फैल सकता है। शीघ्र गमन करना उसका स्वभाव ही है। अतः 'मध्यमपरिमाण वाला अन्तःकरण' शरीर के बाहर कैसे जा सकेगा? यह शङ्का नहीं हो सकती। दृष्टान्त में बताये हुए जल की तरह ही 'तैजस मन' इन्द्रिय-छिद्रों में से बाहर निकल कर जहाँ विषय हो वहीं जाता है और उसके आकार का हो जाता है। इन आकारों में होनेवाला अन्तःकरण का परिणाम ही अन्तःकरण की वृत्ति कही जाती है। अर्थात् खेत के आकार में परिणत हुआ जल, तालाब के जल से जैसे पृथक् नहीं, वैसे ही विषयाकार हुआ मन 'मूल मन' से पृथक् नहीं है। इसलिए स्वतः विकसित हुआ 'मन' ही वृत्ति शब्द से कहा जाता है। 'वृत्ति' उसका वास्तविक परिणाम नहीं है।

शंका— अनुमिति आदि प्रमाओं में भी 'अन्तःकरण' अग्नि आदि के देश में जाकर 'वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य' का अग्नि आदि 'विषयावच्छिन्न चैतन्य' के साथ अभेद (ऐक्य) होने से आपका कहा हुआ 'ज्ञानगत प्रत्यक्ष' का प्रयोजक अनुमिति आदि में अतिव्याप्त हो रहा है।

उत्तर— अनुमिति आदि स्थलों में अतिव्याप्ति नहीं है, क्योंकि अनुमिति आदि स्थलों में 'अन्तःकरण' अग्नि आदि के देश में नहीं जाता। क्योंकि अनुमिति आदि प्रमाओं में अनुमित अग्नि आदि विषयों के साथ चक्षुःश्रोत्रादि इन्द्रियों का सन्निकर्ष नहीं रहता। चक्षुरादि इन्द्रियों का उसके धूमादि लिङ्गों से सन्निकर्ष रहता है। इसलिये ज्ञानगत 'स्वरूपचैतन्य' से भिन्न 'विषयगत प्रत्यक्ष' का प्रयोजक, अनुमिति आदि प्रमाओं में अतिव्याप्त नहीं होता।

'तथापि प्रत्यक्ष ज्ञान, में भी वृत्ति और घट इनका भेद होने से उन भिन्न उपाधियों से युक्त—'प्रमाण-प्रमेय चैतन्यों' का भी भेद अवश्य ही रहेगा। इसलिए पूर्वोक्त प्रयोजक

प्रत्यक्षविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ४१

यहाँ पर अव्याप्त है—ऐसी आशंका होने पर सिद्धान्ती 'यह घट है' इत्यादि प्रत्यक्षप्रमा में प्रत्यक्षलक्षण का समन्वय करके दिखाते हैं।

तथा^१ चायं घट इत्यादिप्रत्यक्षस्थले घटादेस्तदाकारवृत्तेश्च बहिरेकत्र देशे समवधानात् तदुभयावच्छिन्नं चैतन्यमेकमेव, विभाजकयोरप्यन्तःकरणवृत्ति-घटादिविषययोरेकदेशस्थत्वेन भेदाऽजनकत्वात्^२ । अत एव मठान्तर्वर्ति-घटावच्छिन्नाकाशो न मठावच्छिन्नाकाशाद्भिद्यते ।

अर्थ— इन्द्रिय ओर विषय के सन्निकर्ष के समय 'अन्तःकरण' शरीर से बाहर निकलता है। तब 'यह घट है' इत्यादि प्रत्यक्षप्रमा में घटादिविषय और तदाकार (घटाकार) वृत्ति का शरीर के बाहर एक स्थान में अवस्थान होने से उन दोनों से अवच्छिन्न हुआ 'चैतन्य' एक ही है। क्योकि अन्तःकरणवृत्ति और घटादिविषय, ये उपाधियां उपहित में भेद करनेवाली होने पर भी उनकी एक स्थान में स्थिति होने से वे भेद नहीं कर सकतीं। इसी कारण गृहस्थित घट से अवच्छिन्न हुआ आकाश, उस गृह से अवच्छिन्न हुए आकाश से भिन्न नहीं है।

विवरण— 'चैतन्य' के एक होने पर भी वह 'उपाधि' के भेद के कारण भिन्न होता है। 'घटाकाश' 'मठाकाश' से भिन्न है। इसी प्रकार 'प्रमाणचैतन्य' की 'वृत्ति' उपाधि है और 'विषयचैतन्य' की 'विषय' उपाधि है। इसलिये एक स्थान पर स्थित हुई भी दो विशेषणों की तरह उन दो उपाधियों में भेद-जनकत्व हैं (वे दो चैतन्य भिन्न ही हैं) तब उनमें अभेद कैसे सम्भव होता है? यह शंका होने पर सिद्धान्ती कहता है—'यह घट है' इत्याकारक ज्ञान 'घट' अंश में प्रत्यक्ष है। 'घट' और 'घट के सम्बन्ध से घटाकार हुई वृत्ति' इन दो उपाधियों से अवच्छिन्न हुआ 'द्विविध चैतन्य', शरीर के बाहर एक ही स्थान में स्थित हुईं उन दो उपाधियों से अवच्छिन्न (युक्त) हुआ है। अतः उनके भेद की प्रतीति नहीं हो सकती। क्योंकि भिन्न-भिन्न स्थानों में स्थित उपाधियां ही उपाधेयों में भेदप्रतीति करा सकती हैं। विशेषणों की तरह उपाधियों को स्वरूपतः भी भेदजनकत्व नहीं है। भिन्न देशों में स्थित उपाधियों में भेदजनकत्व होने पर भी एकदेशस्थित उपाधियों में (वृत्ति और विषय को) भेदजनकत्व नहीं है।


१. प्रत्यक्षलक्षणघटकत्वेन निरूपितं तावत् प्रमाणचैतन्यं विषयचैतन्यं च । इदानीं तु वृत्तेर्विषयदेशमनिर्गमनस्य चैतन्ययोरभेदात्मकं फलं निरूप्यते 'तथा चे'त्यनेन ग्रन्थेन ।
२. अयमभिप्रायः—उपाधिः उपाधित्वेन उपधेयस्य चैतन्यस्य न भेदप्रयोजकः, अपि तु भिन्नदेशस्थितत्वेन । एकदेशस्थितत्वेन तु स एव अभेदप्रयोजकः । एकश्चात्र उपाध्योर्वृत्ति-विषययोः एकदेशस्थितत्वात् उपाधेययोश्चैतन्ययोर्न भेदव्यवहारः, किन्तु अभेदव्यवहारः ।

४२ | वेदान्तपरिभाषा | [ प्रत्यक्षविचारः

'भिन्नदेशस्थ उपाधियों' को भेदजनकत्व है और 'एकदेशस्थ उपाधियों' को भेद-जनकत्व नहीं है—ऐसी गुरुकल्पना करने की अपेक्षा 'विशेषण' की तरह 'उपाधियों' में भी स्वरूप से ही भेदजनकत्व मानने में कल्पनालाघव होगा' ऐसी आशङ्का होने पर सिद्धान्ती 'अत एव' आदि ग्रन्थ से उसका समाधान करता है। एक देश में स्थित होने से ही उन दो उपाधियों को भेदजनकत्व नहीं है—यह अनुभव में आने से मठ (घर) में स्थित घट से अवच्छिन्न हुआ आकाश, मठावच्छिन्न-आकाश से भिन्न नहीं है। मठ-रूप उपाधि के भाग में 'घट' रहता है। इस कारण महाकाश और घटावच्छिन्नाकाश दोनों एक स्थान में स्थित हुई उपाधियों से अवच्छिन्न हैं, इसलिए वे परस्पर भिन्न नहीं हैं। घट के प्रत्यक्ष ज्ञान के समय घट देश के साथ अन्तःकरण का संयोग होता है। अन्तःकरण के 'एक भाग' को ही वृत्ति कहते हैं। इस कारण 'घटावच्छिन्न-चैतन्य', और घट को 'अभिव्यक्त करनेवाला चैतन्य' दोनों एक ही हैं। अर्थात् फलमुख (फल-प्रधान = सफल) गौरव दोषावह नहीं होता। अब इस विचार विनिमय से जो निष्कर्ष निकला उसे कहते हैं—

तथा चायं घट इति घटप्रत्यक्षस्थले घटाकारवृत्तेर्घटसंयोगितया घटावच्छिन्नचैतन्यस्य तद्वृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यस्य चाभिन्नतया तत्र घटज्ञानस्य घटांशे प्रत्यक्षत्वम्²।

अर्थ— इस प्रकार दो उपाधियों के एकदेशस्थित होने से उपाधेयों में भेद उत्पन्न करने का सामर्थ्य नहीं रहता। ऐसा निर्णीत होने पर 'यह घट है' इस प्रत्यक्ष ज्ञान में घटाकारवृत्ति में घटसंयोगित्व होता है। (वृत्ति, घट से संयुक्त हो जाती है) इस कारण 'घटावच्छिन्न चैतन्य' और घटाकारवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य' का अभेद (ऐक्य) होता है और इन दो चैतन्यों का ऐक्य होने से 'यह घट है' इस प्रत्यक्ष स्थल में घटज्ञान 'घट' अंश में प्रत्यक्षत्व है।


१. 'प्रत्यक्षस्थले'—इति पाठान्तरम्।
२. अयमभिप्रायः—'अयं घटः' इति प्रत्यक्षस्थले घटाकारवृत्तेः घटसम्बन्धे सति विषयस्य--घटावच्छिन्नचैतन्यस्य, प्रमाणस्य--घटसंयुक्तघटाकारान्तःकरणवृत्त्यवच्छिन्न-चैतन्यस्य च एकदेशस्थितोपाधिद्वयावच्छिन्नत्वेन अभेदात् अभिव्यक्तं घटावच्छिन्नचैतन्यं घटप्रत्यक्षमित्युच्यते।
उपाध्योः एकदेशस्थत्वं कुत्रचित् स्वतः कुत्रचिच्च परतः। तत्रान्तरप्रत्यक्षे स्वतः, वृत्ति-विषययोः सदैव एकस्मिन् देशे सम्बन्धात्। बाह्यप्रत्यक्षे तु परतः, तत्रोपाध्योः स्वतो भिन्नदेशत्वात्। यदा तु वृत्तेरिन्द्रियद्वारा विषयसम्बन्धः, तदा तत्सम्बन्धाधीनं तयोरुपाध्योरेकदेशस्थत्वम्।

प्रत्यक्षविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ४३

विवरण—घटाकारवृत्ति ( घटसदृश आकार से युक्त हुआ मन का भाग ) घट से संयुक्त होती है । यहाँ संयोग शब्द का अर्थ भी घट को चूना लगाने पर घट और चूने ( सफेद रङ्ग ) का जैसा संयोग होता है वैसा ही 'परिणामपदवाच्य' घटनिष्ठ 'सम्बन्ध-विशेष' है । अतः संयोग, नियमेन अव्याप्यवृत्ति होने से मन का संयोग भी पूरे घट को नहीं व्याप्त कर सकेगा । तब 'सर्वांश से घट प्रत्यक्ष है' यह व्यवहार कैसे सम्भव होगा । तार्किकों की इस शंका का निरसन हुआ । अर्थात् घटाकारवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य का अर्थ घट से संयुक्त हुए मन के भाग से अवच्छिन्न चैतन्य है । और घटज्ञान का ( घटाधिष्ठान ब्रह्मचैतन्य का ) 'घट' अंश में घटावच्छिन्नत्वेन प्रत्यक्ष है ।

सुख-दुःखादि पदार्थों से चक्षुरादि इन्द्रियों का सन्निकर्ष नहीं रहने से अन्तःकरण की सुखाद्याकार वृत्ति भी उत्पन्न नहीं हो सकती । तब सुखादि अंश में प्रत्यक्ष कैसे ? यह आशङ्का कर सुखादिकों का 'आन्तर-विषयत्व' है, घटादिकों की तरह की तरह 'बाह्य विषयत्व' नहीं है । उससे उनकी 'प्रत्यक्ष प्रमा' में चक्षुरादि-सन्निकर्ष की अपेक्षा नहीं होती । इसी आशय से सिद्धान्ती कहता है—

'सुखाद्यवच्छिन्नचैतन्यस्य तद्वृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यस्य च नियते-नैकदेशस्थितोपाधिद्वयावच्छिन्नत्वात् नियमेनाहं सुखीत्यादिज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वम् ।

अर्थ—सुखादिकों से अवच्छिन्न हुआ 'चैतन्य' और सुखादि के आकार से परिणत हुई 'अन्तःकरण-वृत्ति' से अवच्छिन्न हुआ चैतन्य—ये दोनों, नियम से एक ही स्थान में ( अन्तःकरण रूप एक ही स्थान में ) स्थित उपाधिद्वय ( सुखादि और सुखाद्याकार-वृत्तिरूप ) से अवच्छिन्न होने से नियमेन 'मैं सुखी हूँ' इत्यादि ज्ञान को ( सुखादि के अंश में ) प्रत्यक्षत्व है ।

विवरण—यदि सुखादि, घटादिकों की तरह बाह्य ( शरीर के बाहर ) होते तो उसके प्रत्यक्ष-ज्ञान के लिए ( विषयाकार वृत्ति के लिए ) बाह्य इन्द्रियसन्निकर्ष की आवश्यकता पड़ती, परन्तु सुखादि-विषय तो आन्तर हैं । इस कारण सुखादि ज्ञान को (सुखाद्याकार वृत्ति को) सन्निकर्ष की आवश्यकता नहीं है । वेदान्त-सिद्धान्त के अनुसार सुख, दुःख, काम, सङ्कल्प इत्यादि भाव, अन्तःकरण के धर्म हैं । इसलिए वे अन्तःकरण में ही रहते हैं । सुखादिकों के अनुभवकाल में सुखाद्याकार-वृत्ति भी अन्तःकरण में ही रहती है । अतः सुखादिविषयावच्छिन्न-चैतन्य और सुखाद्याकारवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य का पूर्वोक्त प्रकार से ( दो उपाधियाँ एक प्रदेश में स्थित होने पर उन्हें उपधेय-भेदजनकत्व नहीं होता, इस प्रकार से ) एकत्व होने के कारण सुखादि अंश में उसे प्रत्यक्षत्व है । बाह्यविषयाकार-वृत्ति को इन्द्रियसन्निकर्ष की अपेक्षा होती है । परन्तु आन्तर विषया-


१. 'सुखदुःखाद्य'—इति पाठान्तरम् ।

४४वेदान्तपरिभाषा[ प्रत्यक्षविचारः

कारवृत्ति स्वयं ही उत्पन्न होती है। यही आन्तर और बाह्य विषयों में विशेष है। अब 'दो उपाधियों को एकदेश में स्थित होने से उनमें भेदजनकत्व नहीं होता' इस कथन पर अतिव्याप्ति दोष का अनुवाद कर उसका परिहार करते हैं।

नन्वेवं स्ववृत्ति-सुखादि-स्मरणस्यापि सुखाद्यंशे प्रत्यक्षत्वापत्ति- रिति चेन्न । तत्र स्मर्यमाणसुखस्यातीतत्वेन स्मृतिरूपान्तःकरणवृत्ते- र्वर्तमानत्वेन तत्रोपाध्योर्भिन्नका^१लीनतया तत्तदवच्छिन्नचैतन्ययो- र्भेदात् । उपाध्योरेकदेशस्थत्वे सत्येकका^२लीनत्वस्यैवोपेधयाभेद- प्रयोजकत्वात् ॥

अर्थ—'दो उपाधियों को एकदेशस्थत्व होने पर भेदजनकत्व नहीं रहता'—यह कहने पर अन्तःकरणस्थित सुखादिस्मरण को भी सुखादि अंश में प्रत्यक्षत्व प्राप्त होगा। (परन्तु ऐसा होना अनिष्ट है, स्मरण को प्रत्यक्ष कहना किसी को भी सम्मत नहीं) यह कहना ठीक नहीं। क्योंकि 'अन्तःकरणवृत्ति सुख' (अन्तःकरण में होने वाले स्मरण का विषय जो सुख) भूतकालीन है और 'स्मृतिरूप अन्तःकरणवृत्ति' वर्तमानकालीन होती है। इस कारण 'सुखविषय' और 'सुखाकारस्मृतिवृत्ति' इन दोनों उपाधियों में भिन्नकालत्व है। उनका काल भिन्न होने से (सुखरूप विषय का काल भूत, और स्मृति का काल वर्तमान ऐसा कालभेद होने से) सुख और स्मृतिवृत्ति से अवच्छिन्न हुए दोनों चैतन्य भी भिन्न हैं। (इस कारण अप्रत्यक्ष स्मृतिज्ञान में, प्रत्यक्षसुखादिज्ञान के प्रयोजक की अतिव्याप्ति नहीं होती) क्योंकि दोनों उपाधियों को एकदेशस्थत्व होकर एककालीनत्व भी जब हो, तभी वह उपधेय के (उपहित चैतन्य के) अभेद में प्रयोजक हो सकता है। (केवल एकदेशस्थत्व होकर एकाकालीनत्व यदि न हो तो वह उपधेय के अभेद में प्रयोजक नहीं हो सकता)।

**विवरण—**एक प्रदेश में स्थित होने पर भी यदि भिन्नकालित्व दो उपाधियों को हो तो उन्हें उपधेय का भेदकत्व ही रहता है, अभेदकत्व नहीं। (एककालीनत्व तथा एकदेशस्थत्व भी यदि उपाधियों में हो तो उनमें उपभेद का अप्रयोजकत्व रहता है, अन्यथा नहीं।) इस कारण 'मैं सुखी हूँ' इस सुखप्रत्यक्ष के समय जिस प्रदेश में सुखाकार अन्तःकरणपरिणाम था वहीं पर सुखरूप विषय भी था। इस कारण सुखावच्छिन्न चैतन्य से अभिन्न, सुखाकारवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य होता है। परन्तु 'मैं इस सुखस्मरण के समय 'सुख' भूतविषय, और तदाकार वर्तमान वृत्ति इन दोनों के अन्तःकरण रूप एकदेश में स्थित होने पर भी 'सुख' भूतकालीन और 'वृत्ति' वर्तमानकालीन


१. 'कालिकतया'—इति पाठान्तरम् ।
२. 'कालिकत्व'—इति पाठान्तरम् ।

प्रत्यक्षविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ४५

होने से 'सुखावच्छिन्न-तद्वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य न हो पाने के कारण ( सुखावच्छिन्न चैतन्य और तद्वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य दोनों का अभेद न हो पाने के कारण ) प्रत्यक्षत्व-प्रयोजकत्व की सुखस्मरण में अतिव्याप्ति नहीं होती ।

अब सिद्धान्ती ही पूर्वोक्त समाधान की अरुचि से दूसरा समाधान दे रहा है—

यदि चैकदेशस्थत्वमात्रमुपधेयाभेदप्रयोजकं, तदा ^१'अहं पूर्वं सुखीत्यादिस्मृतावतिव्याप्तिवारणाय वर्तमानत्वं विषयविशेषणं देयम् ।

**अर्थ—**और यदि दो उपाधियों का एकदेशस्थत्व ही उपधेय के अभेद में प्रयोजक ( नियामक ) मानना है तो 'मैं पहले सुखी था' इत्यादि स्मृति में उसकी अतिव्याप्ति न होने देने के लिए 'विषय' में 'वर्तमानत्व' विशेषण देना चाहिये ।

विवरण—'तुष्यतु दुर्जनन्याय' से वादी के कथन को ( दो उपाधियों के एकदेशस्थत्व को ही उपधेय भेद में प्रयोजकत्व—नियामकत्व—है ) स्वीकार कर उस प्रयोजकत्व के लक्षण पर भी अतिव्याप्ति नहीं हो पाती, यह बताते हैं । 'प्रमाणचैतन्यस्य विषयावच्छिन्नचैतन्याभेदः' इस पूर्वोक्त लक्षण के 'विषय' पद में 'वर्तमानत्व' विशेषण के देने पर 'वर्तमानविषयावच्छिन्नचैतन्याभिन्नवृत्त्यवच्छिन्नचैतन्य ही' = वर्तमानकालीन विषय से अवच्छिन्न हुए चैतन्य से अभिन्न जो वृत्त्यवच्छिन्न-चैतन्य, वही ज्ञानप्रत्यक्षत्व का प्रयोजक है, ऐसा लक्षण निष्पन्न होने से सुखादिकों के स्मरणज्ञान में उसकी अतिव्याप्ति नहीं होगी । क्योंकि सुखादिस्मरण में सुखादिविषय, वर्तमानकालीन न होकर भूतकालीन हैं । इस कारण स्मृति में लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होती । अब अवर्तमानत्व को उपाधित्व नहीं होता ( अविद्यमान पदार्थ, उपाधि नहीं होता ) । इसलिये 'विषयावच्छिन्न' इतने ही से पूर्वोक्त अतिव्याप्ति का निरसन हो जायगा । उसके लिये 'वर्तमानत्व' इस विषयविशेषण की आवश्यकता न रहने पर भी 'विषय शब्द को उपलक्षण मानकर भूत, भविष्यत्, अविषय इत्यादि अन्य पदार्थों का भी ग्रहण किया जाय—ऐसा यदि कोई कहे तो उसके लिये विषयत्व के उपलक्षणत्व का भी निरसन कर तद्द्वारा पूर्वोक्त अतिव्याप्ति का भी निवारण करने के लिये 'वर्तमानत्व' इस विषय-विशेषण की नितान्त अपेक्षा है । इस प्रकार 'प्रमाणचैतन्य का वर्तमानकालीनविषयावच्छिन्न चैतन्याभेद' यही प्रत्यक्षप्रयोजक है सिद्ध हुआ । इस पर पुनः शंका—

नन्वेवमपि स्वकीयधर्माधर्मौ वर्तमानौ यदा शब्दादिना ज्ञायेते तदा तादृश-शाब्दज्ञानादावतिव्याप्तिः, तत्र धर्माद्यवच्छिन्न-^२तद्वृत्त्यवच्छिन्नचैतन्ययोरेकत्वात् ।


१. 'पूर्वमहं सुखी'—इति पाठान्तरम् । २. 'न्नचैतन्य-तद्०'—इति पाठान्तरम् ।

४६वेदान्तपरिभाषा[ प्रत्यक्षविचारः

अर्थ—ऐसा मानने पर भी जिस समय अपने वर्तमान धर्माधर्म, शब्दादिप्रमाणों के द्वारा जाने जाते हैं, तब उस तरह के शाब्द ज्ञान में अतिव्याप्ति होती है। क्योंकि वहाँ पर धर्मादिकों से अवच्छिन्न हुए चैतन्य और तदाकार-वृत्त्यवच्छिन्न हुए चैतन्य दोनों का एकत्व रहता है।

विवरण—'विषय' में 'वर्तमान' विशेषण को लगाने पर भी धर्माधर्मविषयकशाब्द-ज्ञान में उस लक्षण की अतिव्याप्ति होती है। क्योंकि धर्माधर्म में वर्तमानत्व है। धर्म और अधर्म, मन के धर्म होने पर भी वे स्वभाववैचित्र्य के कारण परोक्ष ही हैं। तथापि 'आप धार्मिक हैं,' 'तू अधार्मिक है' इत्यादि वाक्यरूप शब्द सुनकर 'मैं धार्मिक हूँ' इत्यादि ज्ञान होता है। वह ज्ञान शब्दजन्य होने से शाब्द है। इस शाब्द-ज्ञान में धर्मा-धर्म रूप विषय और तदाकार-वृत्ति (अन्तःकरणपरिणाम) ये दोनों उपाधियाँ एकदेश में स्थित होने से दोनों से अवच्छिन्न हुए चैतन्य का भी अभेद है। इस कारण विषया-वच्छिन्न से वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य के अभेदरूप प्रत्यक्ष का प्रयोजकत्व, धर्माधर्मादिकों के शाब्द ज्ञान में है। क्योंकि सुखादि आन्तर पदार्थों का अन्तःकरण के साथ बिना बाहर गये ही परिणाम होता है, यह अनुभवसिद्ध है। यही प्रकार धर्माधर्मादिकों में भी है। मूलस्थ 'शब्दादिना' के आदि पद से 'मैं सुकृतादृष्ट से (पुण्य से) युक्त हूँ, क्योंकि मैं सुखी हूँ। मैं दुष्कृतादृष्ट से युक्त हूँ, क्योंकि मैं दुःखी हूँ' इत्याकारक अनुमानादिकों का ग्रहण करना चाहिये। शाब्द ज्ञानादिकों में उन धर्मादिकों के जो शब्दादि प्रमाण हैं, उनसे अवच्छिन्न-चैतन्य का और वर्तमान धर्मादिविषयावच्छिन्न-चैतन्य का अभेद है। इस कारण ऐसे धर्माधर्मादिकों के शब्द-ज्ञान में पुनः प्रत्यक्षत्व-प्रयोजक के लक्षण की अतिव्याप्ति हुई। मूल में 'स्वकीयधर्माधर्मों' कहा गया है। यहाँ 'स्वकीय' शब्द से प्रमाण और विषय का एकदेशस्थत्व सूचित किया है।

अब सिद्धान्ती 'इति चेत्' पद से पूर्वोक्त शंका का अनुवाद करके 'न' इत्यादि अग्रिम ग्रन्थ से उसका निरसन करता है—

इति चेत् ? न। योग्यत्वस्यापि विषयविशेषणत्वात्। अन्तःकरण-धर्मत्वाविशेषेऽपि किञ्चिदयोग्यं किञ्चिद्योग्यमित्यत्र फलबलकल्प्यः स्वभाव एव शरणम्। अन्यथा न्यायमतेऽप्यात्मधर्मत्वाविशेषात्¹ सुखादिवद्धर्मादेरपि² प्रत्यक्षत्वापत्तिर्दुर्वारा ॥

अर्थ—('विषय' में 'वर्तमान' विशेषण के देने पर भी वर्तमान धर्माधर्म के शाब्दजन्य ज्ञान में लक्षण की अतिव्याप्ति होती है) ऐसा यदि कहें तो ठीक नहीं है।


१. 'षेऽपि' - इति पाठान्तरम् ।
२. 'देः प्रत्य०'-इति पाठान्तरम् ।

प्रत्यक्षविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ४७

क्योंकि योग्यत्व को भी विषयविशेषणत्व है । ( प्रत्यक्षत्वप्रयोजक के लक्षण में 'विषय' शब्द के साथ 'वर्तमान' विशेषण की तरह 'योग्य' विशेषण भी जोड़ना चाहिये । तब धर्मा-धर्मादिकों के शाब्द-ज्ञान में प्रत्यक्षत्वप्रयोजक लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होगी । क्योंकि सुखादिकों की तरह धर्मादिकों में अन्तःकरणधर्मत्व होने पर भी उनमें से कुछ प्रत्यक्षयोग्य और कुछ प्रत्यक्ष के अयोग्य हुआ करते हैं, इस विषय में फलबल से कल्पनीय स्वभाव ही शरण ( आधार ) है । ऐसा न मानने पर न्यायमत पर भी यही दोष आता है । न्यायमत में भी सुखादिकों की तरह धर्मादिकों में भी आत्मधर्मत्व समान होने से प्रत्यक्षत्व की प्राप्ति होना दुर्वार ( अपरिहार्य ) है । अर्थात् नैयायिक सुख-दुःख के समान धर्म अधर्म को भी आत्मा के धर्म जानते हैं । इस कारण फलबलकल्प्य स्वभाव का शरण न मानने पर उन्हें भी सुखादि की तरह धर्माधर्म का प्रत्यक्ष होना स्वीकार करना होगा ।

विवरण--'प्रमाणचैतन्य और वर्तमानविषयावच्छिन्न-चैतन्य का अभेद' प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक है । यहाँ पर 'विषय' को 'वर्तमान' विशेषण की तरह 'योग्यत्व' विशेषण भी देना चाहिये । योग्यत्व का अर्थ है—प्रत्यक्षयोग्यत्व । इस विशेषण के जोड़ने पर 'वर्तमान और प्रत्यक्ष ज्ञान के योग्य होना—विषयावच्छिन्न चैतन्य का वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य के साथ अभेद रहना—प्रत्यक्षत्व में प्रयोजक है—' यह लक्षण सिद्ध होता है । धर्म और अधर्म प्रत्यक्षयोग्य नहीं हैं किन्तु परोक्ष हैं, और प्रस्तुत लक्षण में 'विषय' को 'प्रत्यक्षयोग्य' विशेषण दिया है । इस कारण उक्त लक्षण की धर्माधर्म में अतिव्याप्ति नहीं होती ।

शंका—सुखादि और धर्मादि दोनों यदि अन्तःकरण के ही धर्म हैं अर्थात् दोनों में अन्तःकरणधर्मत्व यदि समान है तो उनमें से कुछ धर्मों में प्रत्यक्ष योग्यता है और कुछ में नहीं—यह मानने में क्या नियामक है ?

समाधान—सुखादि और धर्मादि दोनों यद्यपि एक अन्तःकरण के ही धर्म हैं तथापि तद्वृत्ति-सुखादि, प्रत्यक्ष ज्ञान के योग्य हैं और धर्मादि, प्रत्यक्ष योग्य नहीं हैं—ऐसा मानने में कारण उनका भिन्न-स्वभाव ही है । अनुद्भूतत्व, धर्मादिकों का स्वभाव है । इस कारण धर्मादिक, प्रत्यक्ष के योग्य नहीं हैं और उद्भूतत्व, सुखादिकों का स्वभाव है, इस कारण सुखादिक, प्रत्यक्ष के योग्य हैं । अर्थात् अन्तःकरण के धर्मों में से कुछ प्रत्यक्ष के योग्य हैं और कुछ नहीं । इस विषय में फलबल से कल्पनीय ( फल रूप कार्य से अनुमान किया जाने वाला ) पूर्वोक्त उद्भूतत्व और अनुद्भूतत्वरूप स्वभाव ही अगत्त्या स्वीकार करना पड़ता है । इसके सिवाय अन्य उपाय नहीं । नैयायिकों को भी इस फलबलकल्प्य स्वभाव का सहारा लेना है । अन्यथा उनके मत में भी धर्मादिकों का प्रत्यक्ष होने लगेगा । क्योंकि वे सुखादिकों को तो प्रत्यक्ष योग्य मानते हैं और धर्मादिकों को प्रत्यक्ष के अयोग्य मानते हैं । परन्तु इसकी उपपत्ति को वे भी फलबलकल्प्य-स्वभाव